सत्य की अधूरी गाथा
सत्य की अधूरी गाथा डॉ. रवीन्द्र पस्तोर प्रस्तावना आदिकाल से ही मानव सभ्यताओं के विकास के साथ मनुष्य का भौतिक जीवन प्रकृति के काम करने के तरीकों को समझ कर प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग जीवन को सुखी और समृद्ध बनाने के लिए किया जाने लगा। सभ्यता के उषाकाल में, मनुष्य ने जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी जैसे पंचतत्वों के रहस्य को समझा और अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप उन्हें ढालना सीखा। उसने नदियों के तट पर बस्तियाँ बसाईं, भूमि को जोतकर अन्न उगाया, और प्रकृति के नियमों के साथ सामंजस्य स्थापित कर एक सुव्यवस्थित समाज का निर्माण किया। यह एक ऐसा समय था जब बाहरी विश्व के साथ उसका संबंध अत्यंत सीधा और सहज था, और भौतिक समृद्धि की पहली सीढ़ियाँ चढ़ी जा रही थीं। जैसे-जैसे मनुष्य का भौतिक जीवन सुखमय होता गया, उसकी मानसिक समस्याओं में वृद्धि होने लगी। यह एक विचित्र और विरोधाभासी सत्य था, क्योंकि जिन सुख-सुविधाओं को पाने के लिए उसने इतना श्रम किया था, वे ही उसके भीतर एक गहन और अज्ञात बेचैनी को जन्म दे रही थीं। भौतिक उपलब्धियाँ जैसे-जैसे बढ़ती गईं, आंतरिक रिक्तता का अहसास उतना ही गहरा होता गया।...