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"गजवा-ए-हिंद" 

"गजवा-ए-हिंद" “गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” 'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत' डॉ रवीन्द्र पस्तोर प्रस्तावना भारत की कहानी हमेशा तलवारों या सेनाओं की नहीं रही। यह उन अदृश्य लड़ाइयों की कहानी है जो मन में लड़ी जाती हैं। जिनमें धर्म कभी हथियार बनता है और कभी आश्रय। जहाँ प्रतीकों की भाषा कभी सत्य को छिपाती है और कभी उजागर करती है। इस उपन्यास “गजवा-ए-हिंद बनाम भगवा-ए-हिंद” में पाठक को वही अंतः युद्ध दिखाया गया है। एक ऐसा युद्ध जो किसी सरहद पर नहीं, किसी मैदान में नहीं, बल्कि भारत के दिल की धड़कनों के बीच चल रहा है। यहाँ हदीसों की व्याख्याओं के बहाने उभरती महात्वाकांक्षाएँ हैं। यहाँ गीतोपदेश की प्रतिध्वनियों में अपने-अपने धर्म की रक्षा का दावा है। एक ओर वे लोग हैं जो भविष्यवाणी के नाम पर अंधेरा फैलाना चाहते हैं। दूसरी ओर वे जो अपने रंग को अंतिम सच्चाई मानकर हर अन्य रंग को मिटाना चाहते हैं। और इनके बीच छुपी वह तीसरी ताकत है, जो इन दोनों की आग में अपने षड्यंत्र पकाती है। इस कथा में दिल्ली की गलियों से लेकर सीमावर्ती शहरों तक, प्राचीन स्मृतियों से लेकर...