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'मोक्ष' 'मृत्यु की कला'

'मोक्ष' 'मृत्यु की कला' डॉ. रवीन्द्र पस्तोर प्रस्तावना 'मोक्ष', मुक्ति का मार्ग, 'मृत्यु की कला': अनन्त चक्र को भेदने की गाथा यह कृति केवल एक कहानी नहीं है; यह उस अनन्त प्यास का आख्यान है जो प्रत्येक मानव हृदय में युगों-युगों से पलती आई है, बंधन से मुक्ति की प्यास। हमारा अस्तित्व, जिसका मूल 'जन्म से जगत तक' की यात्रा में निहित है, अक्सर कर्मों के भ्रमजाल में उलझ जाता है। हम सुख-दुःख, लाभ-हानि, और मोह के चक्रव्यूह को ही जीवन मान बैठते हैं, भूल जाते हैं कि इसके पार 'मृत्यु से मोक्ष तक' का एक मार्ग भी बिछा है। 'कलयुग के रणक्षेत्र' में स्थापित, यह गाथा तीन पीढ़ियों की समानांतर कथा है जो यह दर्शाती है कि मोक्ष की खोज न तो समय से बंधी है और न ही परिस्थितियों से। यह एक आंतरिक क्रांति है। यह उपन्यास हमें उस ज्ञान की ओर ले जाता है जो जीवन के सबसे बड़े प्रश्नों का उत्तर देता है: हम कौन हैं? हम यहां क्यों हैं? और कैसे 'सिद्ध-शून्य' (शून्य से लौटा हुआ) बना जा सकता है? यह उन साहसी आत्माओं को समर्पित है जिन्होंने स्वयं को जानन...