बोलते पत्थर

 




बोलते पत्थर 

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                         (Sūnavādalel)






डॉ. रवीन्द्र पस्तोर 



प्रकाशन विवरण
प्रकाशक:

करमासेतू संस्थान

डब्लू बी 09, साकार बिल्डिंग

स्कीम 94

इंदौर – 452010

भारत

प्रथम संस्करण: सन् 2025

आवरण डिज़ाइन: मोहिनी नागरा

शब्द-संयोजन: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर


प्रस्तावना 7

नियति का खेल 13

कलकत्ता आगमन 21

विद्वान से मुलाकात 24

काशी का गंगा तट 28

बनारस की टकसाल 29

बनारस का जादू 33

टकसाल का जीवन 36

कला की गलियां 37

लिपि का रहस्य 38

लिपि का रहस्य 40

'दान' शब्द का रहस्य 43

लंका का बालक 44

बर्मा के जंगल 45

एक अधूरा संदेश 46

अंतिम संदेश 47

सिक्के और रहस्य 49

खरोष्ठी का रहस्य 50

भारतीय पुरातत्व 50

'काल्पनिक' राजा 53

आत्माओं का मिलन 58

सरकार का निर्णय 64

अशोक का धम्म 65

सांची का स्तूप 68

बुद्ध के पदचिह्न 69

लाइट ऑफ़ एशिया 70

विरासत का निर्माण 72

नदी का रहस्य 75

एक अँधेरा अतीत 79

शासक का पुनर्जन्म 80

विभाजन का शाप 80

बोलते पत्थर 82

पत्थरों की गवाही 88

अशोक का चक्र 89

मगध का सिंह 92

तक्षशिला का विद्रोह 100

विदिशा का रहस्य 101

प्रेम की शर्त 105

उज्जैन का विद्रोह 106

दो हृदय 107

राजमहल और दूरी 109

दूर से प्रभाव 113

सत्ता का खेल 116

चंड अशोक 118

दानव का जन्म 119

नरक महल 125

अग्नि परीक्षा 129

भविष्यवाणी 132

उपगुप्त 136

वासवदत्ता 139

पाँच विवाह 144

कौरवकी 146

मजबूरियाँ 151

सत्ता का दुष्चक्र 152

कलिंग की चुनौती 158

मानवता का चमत्कार 160

हृदय परिवर्तन 163

धम्म दूत 168

धर्म का अभयारण्य 170

सिंहल का मिशन 172

पत्तों पर इतिहास 175

आध्यात्मिक केंद्र 176

चमकता सितारा 177

बोधि वृक्ष 178

गूंजता धम्म 181

तलवार से विचार तक 188

विद अशोक 191

विष कन्या 200

युवराज कुणाल 207

तिष्यरक्षिता 212

दर्दनाक अंत 223

अंतिम विश्वासघात 228

रहस्यमयी ग्रंथ 237

अज्ञात पुरुष 241

रहस्यमयी प्रतीक 242

ख़तरनाक खेल 243

इंजीनियर से पुरातत्वविद् 244

एक नई विरासत 245



प्रस्तावना

यह सिर्फ़ एक किताब नहीं है, यह एक निमंत्रण है। एक ऐसे सफर का निमंत्रण, जो तुम्हें अपने ही पैरों के नीचे दबी उस ज़मीन पर ले जाएगा, जहाँ की गलियाँ हज़ारों साल पहले ज्ञान की कहानियाँ सुनाती थीं। क्या तुमने कभी सोचा है कि जिन पत्थरों को तुम खामोश समझते हो, उनके भीतर कितने रहस्य दफ़न हैं?

हमारा अतीत एक भूली हुई कहानी की तरह था, जिसे सदियों से रेत की परतों के नीचे दबाकर रखा गया था। उन गौरवशाली युगों की गाथाएं, उन सम्राटों के शौर्य, उन नगरों की चमक, सब मौन हो गए थे।

हमारी सभ्यता के निशान खंडहरों में तब्दील हो गए थे, और वे भाषाएँ, जिनमें हमारे ज्ञान का सार लिखा गया था, अनजान बन गईं। विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों की राख से उठकर कोई बता नहीं सकता था कि हमारा इतिहास कहाँ गुम हो गया है।

एक समय था जब यह ज्ञान का सागर था और हर कोई इसका हिस्सा बनना चाहता था। और फिर, एक अजीब सी शांति छा गई। मानो इतिहास खुद ही साँस रोककर बैठ गया हो, किसी जादूगर के इंतज़ार में।

पर शायद नियति ने एक और कहानी लिख रखी थी। जब हर कोई हार मान चुका था, तब कुछ लोग उस समुद्री पार से आए, जिन्हें ना तो हमारे धन का लालच था और ना ही हमारे सिंहासन का। उनका जुनून सिर्फ़ एक था उस खामोशी को तोड़ना, उन पत्थरों को फिर से बोलना सिखाना।

वे भूली हुई लिपियों के अक्षरों को ऐसे पढ़ते थे, जैसे कोई खोया हुआ प्रेमी अपने प्रिय के चेहरे की हर एक रेखा को पहचान रहा हो। उन्होंने अपना पसीना, अपनी नींद और अपना जीवन, उस एक पल के लिए खपा दिया जब इतिहास फिर से सांस ले।

वे दिन-रात उन भूली हुई लिपियों को पढ़ने की कोशिश करते रहे, जैसे कोई भूले हुए गीत की धुन को याद करने की कोशिश करें।

और फिर, वह चमत्कार हुआ... पत्थर बोलने लगे!

उनकी पहली फुसफुसाहट में ही 'सोने की चिड़िया' की चमक फिर से दिखाई दी। वह समृद्धि, जो रोम के बाज़ारों से हमारे खज़ानों तक सोना ले आती थी, एक बार फिर दुनिया के सामने उभरकर आई।

इतिहास ने करवट ली और यह साबित हो गया कि भारत का गौरव एक काल्पनिक कथा नहीं था, बल्कि एक सच था। लेकिन जहाँ रौशनी की एक किरण आती है, वहाँ परछाइयाँ भी गहरी हो जाती हैं।

जैसे ही हमारा इतिहास सामने आया, पुरातत्व की वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय तस्करी का एक काला अध्याय शुरू हो गया। लुटेरों ने हमारी धरोहर को बड़ी निर्दयता से देश से बाहर बेचा।

यह समृद्धि उजागर होते ही एक काला युग शुरू हुआ। लुटेरे अपनी बर्बरता का निशान हमारे इतिहास पर छोड़ गए। जो मूर्तियां वे चुरा नहीं पाए, उनकी नाकें तोड़ दी गई, चेहरे बिगाड़ दिए गए, और स्त्री प्रतीकों को बेदर्दी से खंडित कर दिया गया।

और यहाँ तक कि महिला चित्रों के स्तनों को तोड़ दिया गया। जिन्हें हम अपनी इज्जत से जोड़कर देखते थे। यह केवल लूट नहीं थी, यह एक पहचान को मिटाने की साजिश थी। वे सोचते थे कि हमारे प्रतीकों को तोड़कर वे हमारी आत्मा को भी तोड़ देंगे।

पर वे नहीं जानते थे कि हमारी विरासत सिर्फ़ मूर्तियों और पत्थरों में नहीं, बल्कि उन कहानियों में भी जीवित है जो हवा में तैरती हैं, और उन देशों में भी जो कभी हमारी सभ्यता के स्नेह से जुड़े थे। जैसे ही उन पत्थरों ने अपनी कहानी सुनाई, भारत का गौरवशाली अतीत एक बार फिर दुनिया के सामने उभर आया। वह 'सोने की चिड़िया' जिसकी समृद्धि के किस्से सदियों तक कहे जाते रहे, फिर से रेखांकित हुई।

उस दौर में रोम से हमारा व्यापार सोने में होता था। लेकिन समृद्धि कभी एक जगह नहीं ठहरती। यह भारत से पश्चिम एशिया, फिर यूरोप और अमेरिका तक गई, और अब जापान, कोरिया और चीन होते हुए फिर से हमारी ओर लौट रही है।

हमारा ज्ञान श्रीलंका, नेपाल, चीन और दक्षिण-पूर्वी एशिया में बच गया, और अब वह फिर से भारत की ओर लौट रहा है। यह वह समय है जब हमारी नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों को दोगुना गहरा करना होगा, तभी यह नई समृद्धि टिक पाएगी।

यह पुस्तक तुम्हें सिर्फ़ एक इतिहासकार की नज़रों से नहीं, बल्कि उन लोगों की भावनाओं और संघर्षों से जोड़ेगी, जिन्होंने हमारे अतीत को फिर से जीवंत करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।

यह कोई ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है, बल्कि एक अनुभव है, एक रहस्य है, और एक प्रेम कहानी है उन लोगों के साथ, जिन्होंने हमारी खोई हुई पहचान को खोजने के लिए अपने जीवन को समर्पित कर दिया। यह एक खोजी की भावनाओं, एक लुटेरे के लालच और एक टूटे हुए पत्थर के दर्द को महसूस करने का प्रयास है।

यह उन लोगों को याद करने की एक छोटी सी कोशिश है, जिन्होंने अपनी जिंदगी इस जुनून में लगा दी कि भारत का अतीत फिर से बोल उठे।

तो आओ, इस यात्रा पर मेरे साथ चलो। उन पत्थरों के साथ बैठो और सुनो, उनकी खामोशी में कितनी कहानियां छिपी हैं। अपनी आँखें बंद करो और सुनो, क्या तुम्हें उन पत्थरों की फुसफुसाहट सुनाई दे रही है?

डॉ. रवीन्द्र पस्तोर




नियति का खेल

मेरे पिता जॉन प्रिंसेप ने मुझे बताया कि शुरू में हमारा परिवार बहुत गरीब था।  पर मेरे पिता ने भारत आकर खूब धन कमाया और ब्रिटेन में सांसद बन गए। जब मेरा जन्म हुआ वह वर्ष था 1799 का।  यह वर्ष इंग्लैंड के इतिहास के लिहाज से एक सामान्य वर्ष था। 


उस समय मेरे पिता ईस्ट इंडिया कंपनी के एक धनी व्यापारी और जमींदार थे।  जिनका भारत में व्यापार सफल था। मेरे पिता ने इंग्लैंड में अपनी पूंजी स्थापित की। जिससे परिवार की पारिवारिक स्थिति मजबूत हो गई। 


जब में कुछ बड़ा हुआ तब मेरी दिलचस्पी वास्तुकला में थी, लेकिन बचपन में आँख के इन्फेक्शन ने मेरी किस्मत बदल दी मेरा सपना अधूरा रह गया। मेरे पिता ने काम के अवसर खोजने में मेरी बहुत मदद की। 


ईस्ट इंडिया कंपनी में मेरे पिता के अच्छे संबंध थे, जिसकी बदौलत मुझे 1817 में कलकत्ता की टकसाल में सिक्कों की जांच करने का काम मिला।


बहुत प्राचीन काल से भारतवर्ष का विदेशों से व्यापार हुआ करता था। यह व्यापार स्थल मार्ग और जल मार्ग दोनों से होता था। इन मार्गों पर एकाधिकार प्राप्त करने के लिए विविध राष्ट्रों में समय-समय पर संघर्ष हुआ करता था। 


जब इस्लाम का उदय हुआ और अरब, फारस मिस्र और मध्य एशिया के विविध देशों में इस्लाम का प्रसार हुआ, तब धीरे-धीरे इन मार्गों पर मुसलमानों का अधिकार हो गया और भारत का व्यापार अरब निवासियों के हाथ में चला गया। अफ्रीका के पूर्वी किनारे से लेकर चीनी  समुद्र तक समुद्र तट पर अरब व्यापारियों की कोठियां स्थापित हो गईं। 


यूरोप में भारत का जो माल जाता था वह इटली के दो नगर जिनेवा और वेनिस से जाता था। ये नगर भारतीय व्यापार से मालामाल हो गए। 


वे भारत का माल कुस्तुन्तुनिया की मंडी में खरीदते थे। इन नगरों की धन समृद्धि को देखकर यूरोप के अन्य राष्ट्रों को भारतीय व्यापार से लाभ उठाने की प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई और वे इस इच्छा की पूर्ति में सफल हो सके। 


बहुत प्राचीन काल से यूरोप के लोगों का अनुमान था कि अफ्रीका होकर भारतवर्ष तक समुद्र द्वारा पहुंचने का कोई कोई मार्ग आवश्यक है। चौदहवीं शताब्दी में यूरोप में एक नए युग का प्रारंभ हुआ।


नए-नए भौगोलिक प्रदेशों की खोज आरंभ हुई। कोलम्बस ने सन् 1492 ईस्वी में अमेरिका का पता लगाया और यह प्रमाणित कर दिया कि अटलांटिक के उस पार भी भूमि है। पुर्तगाल की ओर से बहुत दिनों से भारतवर्ष के आने के मार्ग का पता लगाया जा रहा था। 


अंत में, अनेक वर्षों के प्रयास के अनंतर सन् 1498 . में वास्कोडिगामा शुभाशा अंतरीपकैप ऑफ़ गुड होपको पार कर अफ्रीका के पूर्वी किनारे पर आया; और वहाँ से एक गुजराती  व्यापारी को लेकर मालाबार में कालीकट पहुंचा।


पुर्तगाल वासियों ने धीरे-धीरे पूर्वी व्यापार को अरब के व्यापारियों से छीन लिया। इस व्यापार से पुर्तगाल की बहुत श्री-वृद्धि हुई। देखा-देखी, डच अंग्रेज और फ्रांसीसियों ने भी भारत से व्यापार करना शुरू किया। 


इन विदेशी व्यापारियों में भारत के लिए आपस में प्रतिद्वंद्विता चलती थी और इनमें से हर एक का यह इरादा था कि दूसरों को हटाकर अपना अक्षुण्ण अधिकार स्थापित करें। 


व्यापार की रक्षा तथा वृद्धि के लिए इनको यह आवश्यक प्रतीत हुआ कि अपनी राजनीतिक सत्ता कायम करें। यह संघर्ष बहुत दिनों तक चलता रहा और अंग्रेजों ने अपने प्रतिद्वंद्वियों पर विजय प्राप्त की और सन् 1763 के बाद से उनका कोई प्रबल प्रतिद्वंदी नहीं रह गया। 


इस बीच में अंग्रेजों ने कुछ प्रदेश भी हस्तगत कर लिए थे और बंगाल, बिहार, उड़ीसा और कर्नाटक में जो नवाब राज्य करते थे वे अंग्रेजों के हाथ की कठपुतली थे। उन पर यह बात अच्छी तरह जाहिर हो गई थी कि अंग्रेजों का विरोध करने से पदच्युत कर दिए जाएंगे।


यह विदेशी व्यापारी भारत से मसाला, मोती, जवाहरात, हाथी दांत की बनी चीजें, ढाके की मलमल और आबेरवां, मुर्शीदाबाद का रेशम, लखनऊ की छींट, अहमदाबाद के दुपट्टे, नील आदि पदार्थ ले जाया करते थे और वहां से शीशे का सामान, मखमल साटन और लोहे के औजार भारतवर्ष में बेचने के लिए लाते थे।


ईस्ट इंडिया कंपनी एक अंग्रेजी और बाद में ब्रिटिश, संयुक्त स्टॉक कंपनी थी जिसकी स्थापना 1600 में हुई।  इसका गठन हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार करने के लिए किया गया था। शुरुआत में वेस्टइंडीज भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया के साथ, और बाद में पूर्वी एशिया के साथ। 

कंपनी ने भारतीय उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से और दक्षिण पूर्व एशिया और हांगकांग के उपनिवेशित हिस्सों पर कब्जा कर लिया। अपने चरम पर, कंपनी विभिन्न मापों से दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी थी। 


ईस्ट इंडिया कंपनी के पास कंपनी की तीन प्रेसीडेंसी सेनाओं के रूप में अपनी सशस्त्र सेनाएं थीं, जिनकी कुल संख्या लगभग 260,000 सैनिक थी, जो उस समय ब्रिटिश सेना के आकार से दोगुनी थी। 


कंपनी के संचालन ने व्यापार के वैश्विक संतुलन पर गहरा प्रभाव डाला, रोमन काल से देखी जाने वाली पश्चिमी सराफा सोना-चांदी की पूर्व की ओर निकासी की प्रवृत्ति को लगभग अकेले ही उलट दिया। 


शुरुआत में कंपनी दुनिया के आधे व्यापार के लिए जिम्मेदार हो गई।  विशेष रूप से कपास, रेशम, नील रंग, चीनी, नमक, मसाले, शोरा, चाय और अफीम सहित बुनियादी वस्तुओं में। कंपनी ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की शुरुआत में भी शासन किया।


कंपनी अंततः भारत के बड़े क्षेत्रों पर शासन करने लगी, सैन्य शक्ति का प्रयोग किया और प्रशासनिक कार्यों को संभाला। 

1799 में भारत में ब्रिटिश उपस्थिति और विस्तार जारी रहा, जिससे लार्ड वेलेस्ली के नेतृत्व में चौथा आंग्ल-मैसूर युद्ध में टीपू सुल्तान को हराकर फ्रांसीसी प्रभाव को समाप्त किया और ब्रिटिश शक्ति को मजबूत किया। आर्थिक रूप से, भारत कच्चे माल का निर्यातक और ब्रिटिश निर्मित वस्तुओं का आयातक बन गया, जिससे भारतीय उद्योग प्रभावित हुए और धन की निकासी हुई। 


संस्कृति के क्षेत्र में, वेलेस्ली ने ब्रिटिश सिविल सेवकों को प्रशिक्षित करने के लिए 1799 में प्रेस सेंसरशिप अधिनियम लागू किया और फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की, जो भारतीय भाषाओं और संस्कृति को बढ़ावा देता। 


सन् 1750 से पूर्व इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति भी नहीं आरंभ हुई थी। उसके पहले भारत वर्ष की तरह इंग्लैंड भी एक कृषिप्रधान देश था। उस समय इंग्लैंड को आज की तरह अपने माल के लिए विदेशों में बाजार की खोज नहीं करनी पड़ती थी। उस समय गमनागमन की सुविधाएं होने के कारण सिर्फ हल्की-हल्की चीजें ही बाहर भेजी जा सकती थीं। 


भारतवर्ष से जो व्यापार उस समय विदेशों से होता था, उससे भारत को कोई आर्थिक क्षति भी नहीं थी। सन् 1765 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी को मुगल बादशाह शाह आलम से बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी प्राप्त हुई, तब से वह इन प्रांतों में जमीन का बंदोबस्त और मालगुजारी वसूल करने लगी। 


इस प्रकार सबसे पहले अंग्रेजों ने यहां की मालगुजारी की प्रथा में हेर-फेर किया। उस समय पत्र-व्यवहार की भाषा फारसी थी। कंपनी के नौकर देशी राजाओं से फारसी में ही पत्र व्यवहार करते थे।


फौजदारी अदालतों में काजी और मौलवी मुसलमानी कानून के अनुसार अपने निर्णय देते थे। दीवानी की अदालतों में धर्मशास्त्र और शहर अनुसार पंडितों और मौलवियों की सलाह से अंग्रेज कलेक्टर मुकदमों का फैसला करते थे। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने शिक्षा पर कुछ व्यय करने का निश्चय किया, तो उनका पहला निर्णय अरबी, फारसी और संस्कृत शिक्षा के पक्ष में ही हुआ। 


बनारस में संस्कृत कालेज और कलकत्ते में कलकत्ता मदरसा की स्थापना की गई। पंडितों और मौलवियों को पुरस्कार देकर प्राचीन पुस्तकों को मुद्रित कराने और नवीन पुस्तकों को लिखने का आयोजन किया गया। उस समय ईसाइयों को कंपनी के राज में अपने धर्म के प्रचार करने की स्वतंत्रता नहीं थी।


बिना कंपनी से लाइसेंस प्राप्त किए कोई अंग्रेज भारतवर्ष में आकर बस सकता था और जायदाद खरीद सकता था। कंपनी के अफसरों का कहना था कि यदि यहां अंग्रेजों को बसने की आम इजाजत दे दी जाएगी तो उससे विद्रोह की आशंका है; क्योंकि विदेशियों के भारतीय धर्म और रस्म-रिवाज से भली भांति परिचित होने के कारण इस बात का बहुत भय है कि वे भारतीयों के भावों का उचित आदर करेंगे। 


देश की पुरानी प्रथा के अनुसार कंपनी अपने राज्य के हिंदू और मुसलमान धर्म स्थलों का प्रबंध और निरीक्षण करती थी। मंदिर, मस्जिद, इमामबाड़े और खानकाह के आय-व्यय का हिसाब रखना, इमारतों की मरम्मत कराना और पूजा का प्रबंध, यह सब कंपनी के जिम्मे था। अठारहवीं शताब्दी के अंत से इंग्लैंड के पादरियों ने इस व्यवस्था का विरोध करना शुरू किया। 


उनका कहना था कि ईसाई होने के नाते कंपनी विधर्मियों के धर्म स्थलों का प्रबंधन अपने हाथ में नहीं ले सकती। वे इस बात की भी कोशिश कर रहे थे कि ईसाई धर्म के प्रचार में कंपनी की ओर से कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।


उस समय देशी ईसाइयों की अवस्था बहुत शोचनीय थी। यदि कोई हिंदू या मुसलमान ईसाई हो जाता था तो उसका अपनी जायदाद और बीवी एवं बच्चों पर कोई हक नहीं रह जाता था। देसी ईसाइयों को बड़ी-बड़ी नौकरियां नहीं मिल सकती थीं। इनको भी हिंदुओं के धार्मिक कार्यों के लिए टैक्स देना पड़ता था। 

जगन्नाथ जी का रथ खींचने के लिए रथ यात्रा के अवसर पर जो लोग बेगार में पकड़े जाते थे उनमें कभी-कभी ईसाई भी होते थे। यदि वे इस बेगार से इनकार करते थे तो उनको बेंत लगाए जाते थे।

 

इंग्लैंड के पादरियों का कहना था कि ईसाइयों को उनके धार्मिक विश्वास के प्रतिकूल किसी काम को करने के लिए विवश नहीं करना चाहिए और यदि उनके साथ कोई रियायत नहीं की जा सकती तो कम से कम उनके साथ वही व्यवहार होना चाहिए जो अन्य धर्मावलम्बियों के साथ होता है। 


धीरे-धीरे इस दल का प्रभाव बढ़ने लगा और अन्त में ईसाई पादरियों की मांग को बहुत कुछ अंश में पूरा करना पड़ा। उसके फलस्वरूप अपनी जायदाद से हाथ नहीं धोना पड़ेगा। अंग्रेजी शिक्षा के कारण धीरे-धीरे लोगों की अभिरुचि बदल रही थी। यूरोपीय वेशभूषा और यूरोपीय रहन-सहन अंग्रेजी शिक्षित वर्ग को प्रलोभित करने लगा। 


कलकत्ता आगमन

मैने वर्ष 1819 में, एक युवा अंग्रेज के रूप में अपनी मातृभूमि ब्रिटेन को अलविदा कहा। जब मेरा जहाज कलकत्ता के बंदरगाह पर रुका, तो मैंने पहली बार उस भूमि को देखा, जो मेरे जीवन की सबसे बड़ी खोजों और पीड़ाओं का गवाह बनने वाली थी। 


ईस्ट इंडिया कंपनी के टकसाल में मुझे एक पद मिला था और मेरी मंजिल थी भारत का रहस्यमय और दूरस्थ किनारा।


कलकत्ता, उस समय ब्रिटिश भारत की राजधानी, एक विचित्र और विरोधाभासों से भरी दुनिया थी। हुगली नदी के किनारे बसा यह शहर, ब्रिटिश शक्ति और भारतीय संस्कृति का एक अजीब मिश्रण था। 


एक और, फोर्ट विलियम की भव्य इमारतें, घुड़सवार अधिकारियों के शोर और यूरोपीय संगीत की धुनें थी; दूसरी ओर, पुरानी गलियों में तुलसी की खुशबू, मंदिरों की घंटियाँ और हिंदी और बंगाली का शोर था।


इसी शहर में, मैं एक युवा अंग्रेज, जेम्स प्रिंसेप, इंग्लैंड से अपने भाई विलियम के साथ आया। मेरा मकसद कलकत्ता की टकसाल में सहायक परीक्षक के रूप में काम करना था। 


मैं एक शानदार वास्तुकार और एक मेहनती इंजीनियर था। मेरे पास भारत की सभ्यता और इतिहास का कोई अनुभव नहीं था।


एक शाम, जब में हुगली नदी के किनारे अपने भाई के साथ टहल रहा था, तो मैंने अपने भाई विलियम से कहा, "विलियम, यह शहर कितना अजीब है! यहाँ हर जगह एक अजीब सी गंध है, और शोर भी बहुत है।"


विलियम ने मुस्कुराते हुए कहा, "जेम्स, यह सिर्फ शुरुआत है। तुम यहाँ की संस्कृति, कला और इतिहास में खो जाओगे।"


कलकत्ता में, मैंने टकसाल के परीक्षण मास्टर के रूप में कार्यभार संभाला। मैं बहुत मेहनत से काम करता था। और जल्दी ही मैं अपने काम में इतना निपुण थे कि मेरा नाम विभाग में चारों ओर फैल गया। 


इसी शहर में मेरी मुलाकात ब्रिटिश क्लब में एक लड़की से हुई जो बाद में मेरी जीवन संगिनी हुई। 


विवाह के बाद, जीवन एक नई दिशा में मुड़ गया। मेरी पत्नी ने केवल घरेलू जीवन को सहारा दिया, बल्कि मेरे बौद्धिक कार्यों में भी मेरी सबसे बड़ी समर्थक बनीं। मैं एक साधारण विद्वान नहीं था; बल्कि मेरी  रगों में विज्ञान, कला और इतिहास का गहरा जुनून दौड़ता था।  

विद्वान से मुलाकात

एक शाम, एक ब्रिटिश क्लब में, मेरा परिचय एक ऐसे व्यक्ति से हुआ, जिसकी भारत में एक अलग ही पहचान थी। उनका नाम था हॉरिस हेमन विल्सन, और वे एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान थे। विल्सन ने संस्कृत, बंगाली और अन्य भारतीय भाषाओं पर कई शोध किए थे और उनका सम्मान ब्रिटिश और भारतीय दोनों समुदायों में था।


हॉरिस हेमन विल्सन एक अंग्रेजी प्राच्यविद् थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में संस्कृत का पहला बोडेन प्रोफेसर चुना गया था।


उन्होंने सेंट थॉमस अस्पताल में चिकित्साशास्त्र का अध्ययन किया और 1808 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल स्थापना में सहायक शल्य चिकित्सक के रूप में भारत आये। 


धातु विज्ञान के अपने ज्ञान के कारण उन्हें कलकत्ता की टकसाल से संबद्ध कर दिया गया, जहां वे कुछ समय के लिए जॉन लेडेन के साथ जुड़े रहे।


उन्होंने कई वर्षों तक लोक शिक्षण समिति के सचिव के रूप में कार्य किया और कोलकाता स्थित संस्कृत महाविद्यालय में अध्ययन का पर्यवेक्षण किया।

1832 में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने विल्सन को संस्कृत के नव-स्थापित बोडेन विभाग के प्रथम अध्यक्ष के रूप में चुना गया 1836 में उन्हें ईस्ट इंडिया कंपनी का लाइब्रेरियन नियुक्त किया गया। उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी कॉलेज में अध्यापन भी किया। 10 अप्रैल 1834 को उन्हें रॉयल सोसाइटी ऑफ लंदन का फेलो चुना गया।


हेनरी थॉमस कोलब्रुक की सिफारिश पर, विल्सन को 1811 में बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी का सचिव नियुक्त किया गया। वे कलकत्ता की मेडिकल एंड फिजिकल सोसाइटी के सदस्य थे और रॉयल एशियाटिक सोसाइटी के मूल सदस्य थे, जिसके वे 1837 से अपनी मृत्यु तक निदेशक रहे। 


उन्होंने प्रसिद्ध अभिनेत्री सारा सिडन्स की पोती फ्रांसेस सिडन्स से विवाह किया, जो उनके पुत्र जॉर्ज के माध्यम से हुई थी।

विल्सन भारत की प्राचीन भाषा और साहित्य में गहरी रुचि रखते थे और ऋग्वेद का अंग्रेजी में अनुवाद करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1813 में उन्होंने कालिदास के काव्य, मेघदूत के अंग्रेजी में अनुवाद के साथ संस्कृत पाठ प्रकाशित किया।


उन्होंने स्थानीय विद्वानों द्वारा संकलित सामग्री और अपने स्वयं के शोधों से पूरित पहला संस्कृत-अंग्रेजी शब्दकोश 1819 तैयार किया। 


उन्हें आयुर्वेद और पारंपरिक भारतीय चिकित्सा एवं शल्य चिकित्सा पद्धतियों में रुचि थी। उन्होंने कलकत्ता की मेडिकल एंड फिजिकल सोसाइटी में अपने प्रकाशनों में हैजा और कुष्ठ रोग के लिए अपनाई जाने वाली स्थानीय पद्धतियों को संकलित किया।


1827 में विल्सन ने "सेलेक्ट स्पेसिमन्स ऑफ़ थिएटर ऑफ हिंदूज़" प्रकाशित किया, जिसमें भारतीय नाटक का एक संपूर्ण सर्वेक्षण, छह पूर्ण नाटकों के अनुवाद और तेईस अन्य नाटकों का संक्षिप्त विवरण शामिल था।


विल्सन एक शांत और विनम्र व्यक्ति थे, जिनके चेहरे पर हमेशा एक मुस्कान रहती थी। उन्होंने मेरा स्वागत करते हुए कहा, "सुना है, आप नए आए हैं? कोलकाता में आपका स्वागत है।"

मैंने कहा, "धन्यवाद, श्रीमान। मैं यहाँ के शोर और अराजकता से थोड़ा हैरान हूँ।"


विल्सन ने हँसते हुए जवाब दिया, "जेम्स, यह शोर नहीं, यह जीवन है। आपको इस शोर में संगीत खोजना सीखना होगा। भारतीय संस्कृति में, हर चीज़ में एक गहरा अर्थ छिपा होता है।"

उनकी बातें सुनकर मैं हैरान रह गया। विल्सन ने मुझे बताया कि उन्होंने हितोपदेश, एक प्रसिद्ध संस्कृत कहानी संग्रह, का अनुवाद किया है, और उन्होंने कलकत्ता के पास एक प्राचीन शिलालेख को समझने की कोशिश की है, जो अभी तक अज्ञात है।


इसके पहले फिरोजशाह तुगलक ऐसे ही स्तम्भों को कोपरा से दिल्ली लाये थे। जब उन को इन स्तम्भों पर लिखी लिपि पढ़वाने में सफलता नहीं मिली थी। उन्होंने कहा  हमें  बीता मुगलकाल याद आया जब अकबर ने भी इन स्तम्भों को पढ़वाने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली।


उन्होंने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया कि सर विलियम जोन्स बंगाल प्रेसीडेन्सी में सुप्रीम कोर्ट के जज तथा प्राचीन भारत के विद्वान थे। एक दिन वह बहुत परेशान थे। 


उन्हें प्रचीन भारत के लिखें शिला लेख की भाषा पड़ने में कठनाई हो रही थी। उन्होंने इसकी कागज पर प्रतिलिपि तैयार कर बनारस अनुवाद करवाने भेजा था। लेकिन उन्हें भी इन शिला लेखों को पढ़ने में सफलता नहीं मिली थी। बनारस के पंडितों ने उसे रामायण और महाभारत की कहानियों से जोड़ दिया था।  तब से यह रहस्यमय शिलालेख पहेली बने हुए है। 


मैंने इतने रहस्यमय शिलालेखों के बारे में पहली बार सुना तो मुझे इनकों और गहराई से जानने में दिलचस्पी जगीं। 



काशी का गंगा तट 


विल्सन की बातों से प्रेरणा पाकर, मेरी रुचि भारतीय इतिहास और संस्कृति में बढ़ी। कुछ वर्षों बाद, 1820 में, मेरा तबादला कलकत्ता  से  बनारस की टकसाल में हुआ। 


कलकत्ता की भव्यता और हुगली के शोर से दूर, बनारस एक ऐसी दुनिया थी जहां समय भी ठहर गया था। यहां की हर गली, हर घाट और हर पत्थर पर सदियों का इतिहास दर्ज था। 


मैं जेम्स प्रिंसेप, जो कोलकाता की टकसाल में काम करता था, अब बनारस की टकसाल में सहायक परीक्षक के रूप में आया था। मेरे साथ मेरी पत्नी, लिजी, और परिवार था।


जब मेरा जहाज गंगा नदी के घाट पर पहुँचा, तो  मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं। हवा में घी के दीयों, चंदन और जलती हुई लकड़ियों की मिली-जुली सुगंध थी। घाटों पर मंत्रोच्चार और घंटियों की आवाजें गूंज रही थीं। जहाँ कलकत्ता एक ब्रिटिश शहर की तरह लगता था, वहीं बनारस पूरी तरह से भारत की आत्मा थी।

लिजी ने मेरा हाथ थामते हुए कहा, "जेम्स, यह बहुत ही अलग है।"

मैंने गहरी साँस ली और मुस्कुराते हुए कहा, "हाँ, लेकिन इसमें एक अजीब सी शांति है, जो कलकत्ता में नहीं थी। मुझे लगता है कि यह जगह कुछ रहस्य छुपाए हुए है।


बनारस की टकसाल 


बनारस, जो भारत का सबसे पुराना शहर था, ज्ञान, संगीत, और धर्म का केंद्र था। इस शहर में रहते हुए मैंने खुद को भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के प्रतीकों में गहराई से डुबो दिया।


ब्रिटिश शासन के दौरान बनारस मिंट ऑफिस एक महत्वपूर्ण संस्था थी, जो भारत के सबसे पुराने और सांस्कृतिक रूप से महत्वपूर्ण शहरों में से एक में स्थित थी। 


यह शहर, जिसे पहले काशी और फिर बनारस के नाम से जाना जाता था, पहले बनारस रियासत का हिस्सा था, और ब्रिटिश राज में, 1770 के दशक के आसपास, इसका स्थान मिंट ऑफिस के रूप में था, जहां सोने और चांदी के सिक्कों का उत्पादन किया जाता था। 


बनारस रियासत की स्थापना 1725 में राजा मनसाराम सिंह ने की थी और उनके बेटे, राजा बलवंत सिंह ने 1770 तक शासन किया था। इस अवधि के दौरान, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने कई रियासतों में अपनी शक्ति और प्रभाव स्थापित किया, और बनारस उनमें से एक था। बनारस मिंट ऑफिस में सोने और चांदी के सिक्के ढाले जाते थे.

ये सिक्के तत्कालीन भारतीय अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान देते थे और व्यापार को सुविधाजनक बनाने के लिए उपयोग किए जाते थे। यह मिंट ऑफिस बनारस और उसके आसपास के क्षेत्रों में ब्रिटिश आर्थिक प्रभाव का एक महत्वपूर्ण प्रतीक था। 


मुद्रा ने हमेशा समाज में एक निर्णायक भूमिका निभाई है, और अतीत के सिक्के इतिहास के एक सच्चे स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। बनारस और उसके आसपास की टकसाल गतिविधियां प्राचीन काल से चली रही हैं, लेकिन सिक्कों पर शहर के नाम का पहला उल्लेख दिल्ली के सूरी शासक, इब्राहिम शाह सूर के समय का है।


मुगलों के अधीन, मुहम्मद शाह के शासनकाल में शहर का नाम बदलकर 'मोहम्मदाबाद' कर दिया गया। इसके बाद, अवध के पहले नवाब सआदत अली खान और उनके उत्तराधिकारी सफदरजंग द्वारा मुहम्मद शाह के नाम पर जारी किए गए सिक्कों पर टकसाल का नाम 'मोहम्मदाबाद बनारस' के रूप में दिखाई देता है। 


नए वज़ीर, आसफउद्दौला ने बनारस जिले में अंग्रेजों को मालिकाना हक सौंप दिया, लेकिन टकसाल 1781 . तक अंग्रेजों के अधीन नहीं हुई।

बाद में, कंपनी प्रशासन के अधीन, बनारस टकसाल का प्रबंधन कई योग्य नौकरशाहों द्वारा किया गया, जिसमें बार्लो, एच.एच. विल्सन और मैं शामिल थे, और अंततः 1830 में इसे समाप्त कर दिया गया। 


बनारस, जो कोलकाता से बिल्कुल अलग था, एक ऐसा शहर था जहां इतिहास और धर्म हर कोने में मौजूद थे। वहां की पुरानी इमारतें और मंदिर, मुझ को एक रहस्यमय दुनिया में खींच रहे थे।


मैंने विल्सन को एक पत्र लिखा, जिसमें मैंने अपनी बनारस यात्रा का वर्णन किया।



प्रिय विल्सन,

मैं बनारस में हूँ, और यह एक अविश्वसनीय शहर है। यहाँ की गलियाँ, मंदिर और लोग... यह सब कुछ इतना रहस्यमय और गहरा है। मैं उन पत्थरों और शिलालेखों को देख रहा हूँ, जिन्हें आप समझने की कोशिश कर रहे थे। मुझे ऐसा लगता है कि ये पत्थर मुझ से कुछ कहना चाहते हैं।


आपका,

जेम्स प्रिंसेप



विल्सन ने जवाब में लिखा,


प्रिय जेम्स,

मैं जानता था कि तुम्हें बनारस पसंद आएगा। तुम्हें बस अपनी आंखें और दिमाग खुला रखना होगा। इन पत्थरों में ही हमारी विरासत छिपी हुई है। एक दिन, तुम भी इस पहेली को सुलझा लोगे।

शुभकामनाएं,


बनारस का जादू

यह एक ऐसा शहर था जिसने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। बनारस की गलियों, घाटों और प्राचीन मंदिरों ने मेरे मन को मोह लिया। मैंने अपनी वैज्ञानिक और कलात्मक प्रतिभा को बनारस के अध्ययन में लगा दिया। 


दिन-रात काम करके, मैंने बनारस का एक विस्तृत और सटीक नक्शा तैयार किया। यह सिर्फ एक नक्शा नहीं था, बल्कि शहर की आत्मा का एक चित्र था। मैंने हर गली, हर घाट और हर ऐतिहासिक इमारत को अपनी कलम और ब्रश से चित्रित किया।


यहां मैं अगले दस साल तक रहा और बहुत मेहनत से काम किया। बनारस की बड़ी-बड़ी इमारतें देखा कर मुझे अपने बचपन के सपने की याद आई कि मैं भी आर्किटेक्ट बनना चाह रहा था। 


बनारस ने मुझे यह मौका दिया इसलिये अपनी ड्यूटी के बाद मैंने आर्किटेक्ट का काम करना शुरू कर दिया। मैंने  यहां कई मंदिरों के आर्किटेक्ट का अध्ययन किया और रेखाचित्र बनाये। 


इन चित्रों और नक्शों में मैंने बनारस के उन मंदिरों और मस्जिदों को भी दर्शाया, जो आज भी ऐतिहासिक और धार्मिक चर्चाओं का विषय हैं, जैसे कि ज्ञानवापी परिसर। 

मेरे ये चित्र इतने सटीक और विस्तृत थे कि वे उस समय की वास्तुकला और शहरी संरचना का एक अमूल्य दस्तावेज़ बन गए। 


ये काम "बंगाली एशियाई सोसाइटी" के जर्नल में प्रकाशित हुए, जिसने मुझे एक प्रतिष्ठित विद्वान के रूप में स्थापित किया। 


मैंने काशी विश्वनाथ मंदिर का नक्शा बनाया था।  मैंने अपने रेखाचित्रों की प्रदर्शनी भी लंदन में आयोजित की थी।


हॉरिस हेमन विल्सन का यह विश्वास सही था कि भारत का इतिहास एक अमूल्य खजाना है, और मेरी मेहनत और लगन से  उस खजाने को दुनिया के सामने लाया जा सकता है। 


विल्सन के साथ रहते हुए  मैंने भारतीय इतिहास, संस्कृति में खूब दिलचस्पी ली और बनारस में यह आगे विकसित हुई

बनारस में रहते हुए, मैंने  खुद को इतिहास की खोज में समर्पित कर दिया। मैंने विभिन्न शिलालेखों का अध्ययन किया और भारतीय इतिहास के बारे में जानने के लिए भारतीय विद्वानों से मुलाकात की। 


एक दिन, जब मैं बनारस के एक पुराने मंदिर के पास बैठा था, तो एक बुजुर्ग पंडित ने मुझ से पूछा, "क्या आप इतिहास के विद्यार्थी हैं, साहब?"


मैंने जवाब दिया, "मैं बस एक जिज्ञासु व्यक्ति हूँ, पंडित जी।"


पंडित ने मुस्कुराते हुए कहा, "इतिहास सिर्फ़ किताबों में नहीं होता, साहब। यह यहाँ की मिट्टी में, हवा में और हर पत्थर में है।"

मैंने पंडित जी की बात मान ली। मैंने भारतीय इतिहास में गहरा गोता लगाया और अंततः मैंने उस लिपि को समझने में अपना जीवन लगाने का निश्चय किया, जो भारत के शिलालेखों में इस्तेमाल होती थी।


इस बीच मेरी उनकी रूचि भारतीय सिक्कों में बढ़ी तब मैंने सिक्कों की व्याख्या की। मैं पंजाब और राजस्थान  में मिलने वाले सिक्कों की भाषा नहीं पढ़ पा रहा था जिसे ले कर मैं बहुत परेशान था।

टकसाल का जीवन

मेरा दिन टकसाल में शुरू होता था। मेरी टकसाल का काम सिक्के बनाना और पुराने सिक्कों का विश्लेषण करना था। मैं अपने काम में बहुत मेहनती था, और मेरी वैज्ञानिक सोच ने मुझे हर सिक्के की बनावट, वजन और धातुओं के बारे में बहुत उत्सुक कर दिया था।

लेकिन शाम ढलते ही, मेरा जीवन बदल जाता था। मैं गंगा के घाटों पर घूमने जाता था, जहाँ मुझे सदियों पुराने मंदिर, साधु और पंडित मिलते थे। बनारस उस समय भारत का सबसे बड़ा ज्ञान का केंद्र था। यहां दूर-दराज के विद्वान आते थे, जो वेदों, उपनिषदों, संगीत, नृत्य और ज्योतिष का ज्ञान रखते थे।

एक शाम, जब मैं दशाश्वमेध घाट पर था, तो मेरी मुलाकात एक वृद्ध पंडित से हुई। पंडित ने मुझे देखा और कहा, "साहब, आप सिक्के नहीं, इतिहास खोज रहे हैं।"

जेम्स ने आश्चर्य से पूछा, "आप यह कैसे जानते हैं?"

पंडित ने मुस्कुराते हुए कहा, "आपकी आँखों में एक जिज्ञासा है, जो केवल ज्ञान की तलाश करने वालों में होती है। इस शहर में हर पत्थर में एक कहानी है, और हर कहानी में एक रहस्य है।"

कला की गलियां

बनारस केवल धर्म का केंद्र नहीं था, बल्कि यहाँ संगीत, नृत्य और नाटक भी हर गली में मौजूद थे। मुझे भगवान शिव की नगरी का यह रूप भी बहुत पसंद आया।

मैंने यहां भगवान शिव के भैरव रूप के बारे में जाना, जो एक तरफ शांत और दूसरी तरफ क्रोधित थे। भैरव का यह रूप भारतीय अध्यात्म की गहराई दिखाता था, जहाँ जीवन और मृत्यु, शांति और क्रोध, एक ही सिक्के के दो पहलू थे।

मैंने कई बार गलियों में घूमते हुए कलाकारों को देखा जो अपनी कला का प्रदर्शन कर रहे थे। मैंने देखा कि संगीत और नृत्य का हर कदम किसी देवता को समर्पित था।

एक शाम, जब मैं भैरवनाथ मंदिर के पास था, तो मैंने पंडित से पूछा, "पंडित जी, यह भैरव कौन हैं?"

पंडित ने जवाब दिया, "भैरव, महादेव का ही एक रूप हैं। वे इस शहर के संरक्षक हैं। वे हमें सिखाते हैं कि सच्चाई और न्याय के लिए हमें कभी-कभी अपनी क्रूरता को भी बाहर लाना पड़ता है।"


मुझे यह सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ, क्योंकि मैंने हमेशा अंग्रेजों के अपने धर्म को श्रेष्ठ मानते हुए देखा था। लेकिन इस शहर ने मुझे सिखाया कि हर धर्म में एक गहरा अर्थ छिपा होता है।

एक शाम, जब मैं दशाश्वमेध घाट पर बैठा था, तो मेरी मुलाकात एक पंडित से हुई। मैंने पंडित से कुछ हिंदू प्रतीकों के बारे में पूछा, जैसे कि ओम का चिह्न। पंडित ने मुझे बताया कि ये सिर्फ़ चिह्न नहीं हैं, बल्कि इनमें ब्रह्मांड का रहस्य छिपा है।

लिपि का रहस्य

रात दिन शिला लेखों की लिपि तथा भाषा के सोच में डूबे  रहने के कारण मुझे एक रात सपने में एक विचित्र लिपि में लिखा एक शिलालेख दिखा। मैं समझ नहीं सका  कि यह कौन सी भाषा तथा लिपि है। यह सपना अब अक्सर आने लगा।

मेरा मन धीरे-धीरे लिपि को समझने की ओर आकर्षित हुआ। यह वह लिपि थी जो स्तंभों और प्राचीन भारतीय सिक्कों पर इस्तेमाल होती थी। लेकिन यह लिपि इतनी पुरानी थी कि कोई भी विद्वान इसे समझ नहीं पा रहा था।

मैंने अपने काम के अलावा, इस लिपि को समझने में दिन-रात बिता दिए। मेरी पत्नी लिजी हमेशा मेरे साथ थी। वह कभी-कभी चिंता करती थीं कि जेम्स अपने काम में इतना खोए रहते हैं कि उन्हें परिवार का ख्याल नहीं रहता।

एक रात, जब मैं थककर बैठा था, तो लिजी ने पूछा, "क्या आप इस पहेली को कभी सुलझा पाएंगे, जेम्स? क्या यह सब व्यर्थ है?"

मैंने जवाब दिया, "लिजी, मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे लगता है कि यह इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक है। ये शिलालेख और सिक्के हमें उस समय के बारे में बताएंगे जब भारत में सचमुच एक महान सभ्यता थी। मुझे लगता है कि हर हिंदू धार्मिक प्रतीक में एक कहानी है।"

कोई भी लिपि तब पड़ी जा सकती है जब उसके द्विभाषी लेख उपलब्ध हो। अभिलेख को लम्बा होना भी आवशयक है ताकि एक चिन्ह जो बार-बार रहा हो उसे समझा जा सके।


लिपि का रहस्य


सहस्राब्दियों की धूल में एक भाषा सोई हुई थी। वह पत्थरों की आत्मा में गूंजती थी, गुफाओं की दीवारों पर सांस लेती थी, पर कोई उसे समझ नहीं पाता था। वह थी ब्राह्मी - देवताओं और राजाओं की लिपि, जो समय के शाप से गूंगी हो गई थी। विद्वानों ने उसे देखा, उसका अध्ययन किया, पर उसके मूक चिन्हों को एक पहेली के सिवा कुछ और समझ पाए।

उस समय का सबसे बड़ा भाषाविद भी इस रहस्य के आगे घुटने टेक चुका था। उसकी किताबें, उसके नक्शे, उसकी सारी बुद्धि उस चुप्पी को नहीं तोड़ पा रही थी। वह जानता था कि एक अदृश्य द्वार है, लेकिन उसकी चाबी कहीं खो गई थी।

किंवदंती कहती थी कि इस लिपि को केवल वही आत्मा पढ़ सकती है जिसने प्राचीन ध्वनियों को अपने रक्त में समाया हो।

मेरे लिए, यह एक मूर्खतापूर्ण लोककथा थी। पर जब मेरे सारे प्रयास विफल हो गए, तो मेरे कान में एक फुसफुसाहट पहुँची दूर लंका द्वीप से, जहां समय की धाराएं धीमी बहती हैं, वहां का एक विस्मृत भिक्षु कलकत्ता शहर में रहता है।

उसका नाम था रत्नपाल। उसने ज्ञान को किताबों में नहीं, बल्कि श्लोकों में, मंत्रों में और सदियों पुरानी मौखिक परंपराओं की साँस में जीवित रखा था। वह केवल पाली नहीं जानता था; वह पाली की आत्मा से परिचित था।


मैंने एक दिन निश्चित किया कि मै रत्नपाल  से मिलने उनके घर जाऊंगा। मै उस स्थान पर पहुँचा जहाँ रत्नपाल रहता था। हालांकि रत्नपाल  एक उद्योगपति था पर वह बहुत साधारण तरीके से रहता था। 

जब मैने ने उस बूढ़े पूर्व भिक्षु को देखा, तो मुझे आश्चर्य हुआ। रत्नपाल का रूप-रंग साधारण था, उसकी आँखें शांत थीं, पर उनमें सहस्राब्दियों का ज्ञान झलक रहा था। मैंने उसे ब्राह्मी के शिलालेखों की प्रतिलिपियां दिखाई।

रत्नपाल ने उन्हें छुआ नहीं, सिर्फ देखा। उसकी आँखें बंद हो गईं और उसके होंठ धीरे-धीरे हिलने लगे। वह मंत्रों की तरह कुछ गुनगुना रहा था।

मै खुद एक बहुत ही प्रभावशाली ब्रिटिश विद्वान था। जो  बनारस में रहता था और टकसाल में काम करता था। मुझे प्राचीन भारतीय सिक्कों और शिलालेखों में बहुत रुचि थी।

मै अधीर हो गया। "आप क्या कर रहे हैं, वृद्ध?" मैंने पूछा। 

रत्नपाल ने आँखें खोलीं। "मैं पढ़ नहीं रहा हूँ, मैं सुन रहा हूँ।

"क्या सुन रहे हैं?"

"उस राजा की साँस, जो सदियों पहले अपनी दीवारों पर अपनी कथा अंकित कर गया था। ब्राह्मी केवल चिन्ह नहीं है, भाषा की एक जीवित प्रतिध्वनि है। तुमने उसे आँख से देखा, मैं उसे कान से सुनता हूँ।"

अगले कुछ हफ्तों तक, मैंने अपने जीवन का सबसे रहस्यमय अनुभव जिया। रत्नपाल ने सिखाया कि कैसे चिन्हों को ध्वनि में बदला जाए, कैसे एक प्रतीक को एक स्वर में ढाला जाए। उसने बताया कि प्रत्येक चिह्न एक प्राचीन ध्वनि का अवशेष है, जो सदियों से एक गूढ़ परंपरा में छिपा हुआ है।

रत्नपाल के मुंह से निकलने वाले पाली के शब्द और सदियों से जीवित श्लोक, मेरे लिए एक पुल का काम कर रहे थे। रत्नपाल की हर ध्वनि, एक चाबी थी जो हजारों साल पुराने ताले को खोल रही थी।

धीरे-धीरे, ब्राह्मी का रहस्य खुलने लगा। वे गूंगे पत्थर बोलने लगे। उन्होंने एक महान राजा की कहानी सुनाई, जिसने पूरे भारत पर शासन किया, पर इतिहास ने जिसे एक "भूत राजा" मानकर भुला दिया था।
उस लिपि में उसकी विजय, उसका धर्म और उसकी चेतावनी छिपी थी। रत्नपाल का ज्ञान और मेरी बुद्धि मिलकर एक ऐसी शक्ति बन गई जिसने समय की परतों को हटा दिया।

'दान' शब्द का रहस्य

यह लिपि मेरा मन में लगातार पीछा कर रही थी। रह-रह कर मैं हमेशा विचारों में खोया रहता था। इसी से मेरी रूचि उन शिला लेखों को पढ़ने में जागृत हुई जिसकी भाषा कोई नहीं पढ़ पा रहा था।

इस पर मैं चार साल तक काम करता रहा। साल 1837 में कैप्टन एडवर्ड स्मिथ नाम के मिलिट्री इंजिनियर ने मुझे साँची के स्तूप के बारे में बताया और कुछ शिला लेखों के टुकड़े भेजे।

ब्राह्मी लिपि को समझने के लिए, मैंने भारत भर से आए कई शिलालेखों का अध्ययन किया। मैंने देखा कि सांची जैसे कई स्तूपों पर छोटे शिलालेखों के अंत में अक्सर एक ही शब्द लिखा होता था।

मैंने सही अनुमान लगाया कि यह शब्द 'दानम' था, जिसका अर्थ ब्राह्मी लिपि में "दान" होता है। यह एक छोटा सा सुराग था, जिसने पूरी लिपि को समझने की कुंजी दी और अशोक के शिलालेखों को पढ़ने का रास्ता खोल दिया।

इन टुकड़ों में मैंने  दानम शब्द को पढ़ लिया। फिर मैने रत्नपाल की सहायता से एक-एक कर पूरी ब्राह्मी लिपि को पढ़ डाला। 


लंका का बालक

रत्नपाल का जन्म सीलोन अब श्रीलंका के एक छोटे से गाँव में हुआ था। वह बचपन से ही शांत स्वभाव के थे और उन्होंने अपनी युवावस्था एक बौद्ध मठ में बिताई। वहाँ उन्होंने पाली भाषा के प्राचीन ग्रंथों का गहन अध्ययन किया, और जल्द ही वह एक ऐसे विद्वान बन गए जिनकी पहचान केवल मठ की दीवारों तक सीमित नहीं थी। यहीं उनका परिचय अनुला देवी से हुआ।

अनुला देवी, गाँव की एक साधारण लड़की थी, लेकिन उनकी आंखे इतनी गहरी थी कि उनमें पूरे ब्रह्मांड का ज्ञान समाया हुआ लगता था। रत्नपाल और अनुला देवी का विवाह हुआ, और उनका प्रेम केवल दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन था।


एक दिन, अनुला देवी ने रत्नपाल से कहा, "आपका ज्ञान इस मठ की दीवारों में नहीं समा सकता। आपका मार्ग दूर तक फैला हुआ है। आप जाएँ और उस गूंगी भाषा को आवाज़ दें जो पत्थरों में सोई हुई है।"

रत्नपाल समझ नहीं पाए, पर अनुला देवी की बात में एक अजीब सी गहराई थी।

उन्होंने वादा किया, "मैं वापस आऊँगा, अनुला देवी। जब तक मैं उस भाषा को नहीं समझ लेता, मेरा हृदय शांत नहीं होगा।"

बर्मा के जंगल

कुछ समय बाद, एक भयंकर सूखा पड़ा। रत्नपाल ने अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए बर्मा अब म्यांमार जाने का फैसला किया। बर्मा के घने जंगलों में उन्होंने खुद को एक भाषाविद के रूप में स्थापित किया।

उन्होंने विभिन्न जातियों के बीच अनुवादक के रूप में काम किया और युद्ध के समय सैनिकों के लिए गुप्त संदेशों को समझने में मदद की। इस दौरान, उन्होंने एक महत्वपूर्ण सबक सीखा भाषा केवल शब्दों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह संस्कृति और इतिहास की एक गहरी नदी है।

यहीं उन्होंने व्यापार के कुछ गुर भी सीखे, जो जीवन में आगे काम आने वाले थे। वह सफल तो हुए, पर उनका मन अशांत था, क्योंकि उन्हें अनुला देवी का वादा याद था।

एक अधूरा संदेश

वर्षों बाद, रत्नपाल अपने व्यापार के सिलसिले में भारत आए और कलकत्ता अब कोलकाता शहर में बस गए। एक दिन, उन्हें श्रीलंका से एक पुराना पत्र मिला। यह अनुला देवी की एक सहेली ने भेजा था। पत्र में लिखा था कि अनुला देवी की तबीयत खराब थी और उनके आखिरी दिनों में वह हमेशा यही कहती थीं, "रत्नपाल को कहना, जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान पैसे में नहीं, बल्कि उन ध्वनियों में है जिन्हें हम सुनते हैं।"

रत्नपाल पर मानो पहाड़ टूट पड़ा। उनकी पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी, और वे उनका आखिरी संदेश सुन भी नहीं पाए थे। उन्हें अपनी पत्नी की कही हुई बात याद आई और उन्होंने अपनी सारी दौलत छोड़ दी।

उनका मन फिर से बेचैन हो गया। उन्हें लगा कि वह अपने जीवन के असली उद्देश्य से भटक गए हैं। वह एक व्यापारिक साम्राज्य के शिखर पर थे, लेकिन उनकी आत्मा खाली थी।

अंतिम संदेश

रत्नपाल ने अपने व्यवसाय को छोड़ दिया, और अपना सारा समय प्राचीन लिपियों और ग्रंथों के अध्ययन में समर्पित कर दिया। उन्होंने अपनी पत्नी के संदेश को अपनी प्रेरणा बनाया। उन्होंने महसूस किया कि दुनिया की हर चीज का एक अंत होता है, लेकिन ज्ञान और प्रेम अनंत होते हैं।

वह कलकत्ता के एक शांत कोने में रहने लगे और उन्होंने उस "ध्वनि" की खोज में खुद को डुबो दिया, जिसकी बात अनुला देवी ने की थी।

यहीं, उन्हें मुझसे मिलना था। मेरे लिए ब्राह्मी एक पहेली थी, पर रत्नपाल के लिए वह उनकी पत्नी का संदेश था एक ऐसी ध्वनि जिसे उन्हें सुनना था। रत्नपाल ने अपने ज्ञान और अपनी अंतरात्मा से उस गूंगी लिपि को सुना और मेरे साथ मिलकर उसे फिर से जीवित कर दिया। उनकी यह सफलता अनुला देवी की याद में थी।

जब उनका अंत समय आया, तो वह एक विशाल महल में नहीं, बल्कि एक साधारण से घर में थे। उन्होंने अपनी  आखिरी साँस में अपने एक मित्र से कहा, "मैंने पैसा कमाया, सम्मान पाया, पर मेरी पत्नी का सबसे बड़ा उपहार वह ज्ञान था, जिसे मैंने अपनी आत्मा में पाया। मेरा जीवन अब पूर्ण हुआ।"

रत्नपाल ने अपनी यात्रा से यह साबित कर दिया कि एक व्यक्ति के जीवन में कई मोड़ सकते हैं, लेकिन सच्चा ज्ञान वही है जो दिल से जुड़ा हो। उनके जीवन में एक विद्वान, एक व्यापारी और एक प्रेमी का सार था, और अंत में उन्होंने इन सभी को मिलाकर अपने जीवन को पूर्ण किया।

जब दुनिया को इस सफलता के बारे में पता चला, तो मुझको सारी वाहवाही मिली। मेरा नाम हर किताब में सुनहरे अक्षरों में लिखा गया। पर रत्नपाल, जिसे प्रसिद्धि की कोई चाह नहीं थी, अपनी गुमनामी में वापस चला गया। उसका उद्देश्य पूरा हो चुका था।

वह सिर्फ एक पुल था, जिसने अतीत और वर्तमान को जोड़ा। उसकी भूमिका हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों से मिट गई, पर उसने एक ऐसी आवाज को जीवित कर दिया, जिसे समय ने हमेशा के लिए चुप करा दिया था। वह एक ऐसा दीपक था, जो खुद को जलाकर दुनिया को रोशन कर गया।


सिक्के और रहस्य

मैं बनारस की टकसाल में एक सहायक परीक्षक के रूप में काम करता था

मेरा काम सिक्कों की जांच करना था, लेकिन मैं जल्द ही पुराने सिक्कों और उन पर अंकित रहस्यमय चिह्नों के प्रति आकर्षित हो गया मेरी पत्नी, लिजी, हमेशा मेरे इस जुनून से चिंतित रहती थी।

एक रात, जब मैं देर तक काम कर रहा था, लिजी ने उनसे कहा, "जेम्स, क्या तुम कभी घर भी आओगे? तुम इन पुरानी धातुओं में इतना क्या देखते हो?"

मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "लिजी, ये केवल धातु नहीं हैं। ये इतिहास है। इन पर कुछ लिखा है, और मुझे लगता है कि यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता।"

मैंने  इन सिक्कों पर ब्राह्मी लिपि के अंश देखे थे, जिसे कोई भी विद्वान पढ़ नहीं पा रहा था। वह जानते थे कि इन चिन्हों को समझने से भारत का एक नया इतिहास सामने सकता है। बुद्ध ने कहा था कि चांद, सूरज और सत्य छुप नहीं सकता है। 

खरोष्ठी का रहस्य

बनारस में एक और अंग्रेज था मैं। मेरी  जिज्ञासा कलकत्ता के कनिंघम की तरह ही थी। मेरी  इस खोज ने भारतीयों के एक ऐसी कड़ी से जोड़ा जिसमें वह अंग्रेजों को अपनी विरासत दिखा सकते थे। मैंने खरोष्ठी लिपि भी पढ़ी।

पर मेरा असली जुनून भारतीय सिक्कों में था। पंजाब और राजस्थान में मिलने वाले सिक्कों पर लिखी भाषा को मैं समझ नहीं पा रहा था। वहीं से मेरी रुचि उन शिलालेखों में बढ़ी जिनकी भाषा कोई नहीं पढ़ सकता था। यह एक ऐसा रहस्य था, जो पूरे भारत को घेरे हुए था।

मैने  खरोष्ठी लिपि को भी पढ़ा। इस भाषा को पड़ने के लिए मैने पंजाब पर शासन करने बाले इंडो ग्रीक राजाओं के सिक्कों का प्रयोग किया जिस में राजा का नाम एक तरफ ग्रीक भाषा तथा दूसरी तरफ खरोष्ठी भाषा में लिखा था।

भारतीय पुरातत्व

सर अलेक्जेंडर कनिंघम का जन्म 1814 में लंदन में हुआ था। उनकी शिक्षा-दीक्षा एक सैनिक इंजीनियर के रूप में हुई। अठारह साल की उम्र में, सर अलेक्जेंडर कनिंघम को लंदन के उस शांत जीवन की आदत थी, जहां सब कुछ व्यवस्थित और उम्मीद के मुताबिक था।

मात्र 19 साल की उम्र में, उन्होंने ब्रिटिश सेना में एक लेफ्टिनेंट के रूप में भारत की ओर रुख किया। जब उनका जहाज भारत की ओर चला, तो उनकी आत्मा में एक अज्ञात उत्साह जाग गया। 


वह एक सैनिक इंजीनियर के रूप में ईस्ट इंडिया कंपनी में सेवा करने आए थे, लेकिन उनके दिल में कुछ और ही था। उनके सैनिक साथी भारत को सिर्फ़ एक उपनिवेश के रूप में देखते थे, एक ऐसी भूमि जहां वे अपनी बंदूकें और ताकत का प्रदर्शन कर सकते थे।

लेकिन कनिंघम के लिए, यह एक ऐसी भूमि थी जिसके नीचे एक खोई हुई सभ्यता का खजाना दबा था।

समुद्र ने अपनी यात्रा पूरी कर ली थी और अब बंगाल की खाड़ी के गर्म और आर्द्र हवा ने सर अलेक्जेंडर कनिंघम का स्वागत किया। एक युवा लेफ्टिनेंट के रूप में, कनिंघम भारत आए थे। 


वे एक सैनिक इंजीनियर थे, जिन्हें सड़कें, पुल और किले बनाने के लिए प्रशिक्षित किया गया था, लेकिन उनकी आँखें केवल सैन्य मानचित्रों को नहीं, बल्कि उस प्राचीन भूमि के रहस्यों को भी खोज रही थी।

कोलकाता के बंदरगाह पर उतरते ही, उन्हें भारत की गंध महसूस हुई - मसालों, नम मिट्टी, और अनगिनत फूलों की खुशबू। अपने सैनिक साथियों के विपरीत, वह उन प्राचीन खंडहरों को देखने के लिए उत्सुक थे जो उन्होंने नक्शों और किताबों में देखे थे।

कलकत्ता का बंदरगाह एक जीवंत, कोलाहल भरी जगह थी, जहाँ ब्रिटिश जहाज एक तरफ खड़े थे और दूसरी तरफ भारतीय नावें और नाविक काम कर रहे थे।

भारतीय लोग, अपनी रंगीन वेशभूषा, चेहरे पर शांत भाव और सदियों पुरानी परंपराओं के साथ, कनिंघम के लिए एक रहस्य थे।

उन्होंने अपने एक साथी से कहा, "हेनरी, यह देश युद्ध के मैदान से कहीं अधिक एक संग्रहालय लगता है।"

हेनरी ने हँसते हुए जवाब दिया, "कनिंघम, तुम बहुत कल्पनाशील हो। यह सिर्फ़ एक ऐसी जगह है जहाँ हम ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार कर सकते हैं।"

"हेनरी," कनिंघम ने अपने एक साथी से कहा, "क्या तुम इन मिट्टी के टीलों को देखते हो? मुझे लगता है कि इनके नीचे सदियों पुरानी कहानियाँ दबी हैं।"

हेनरी ने हँसते हुए जवाब दिया, "कनिंघम, तुम बहुत कल्पनाशील हो। यह सिर्फ़ मिट्टी है।"

लेकिन कनिंघम की जिज्ञासा केवल मिट्टी तक ही सीमित नहीं थी। वह हर उस जगह को देखते थे जहां उन्हें अतीत की झलक मिलती थी।

उन्होंने अपनी पत्नी एलिनॉर को एक पत्र में लिखा, "यहाँ की हर एक दीवार, हर एक पत्थर और हर एक पेड़ में एक कहानी है। मुझे लगता है कि मेरा असली काम यहाँ की सड़कों को नहीं, बल्कि इतिहास के रास्तों को बनाना है।"

कनिंघम की सोच अलग थी। वह भारत को केवल एक उपनिवेश के रूप में नहीं, बल्कि एक खोई हुई सभ्यता के रूप में देखते थे।

'काल्पनिक' राजा

मुझे इस तरह के शिला लेख सम्पूर्ण भारत से मिल रहे थे। इसी तरह के एक शिला लेख को जो उन्हें इलाहाबाद में मिला था एक स्थानीय संस्कृत के विद्वान की मदद से कुछ पड़ने में कामयाब हो गया।

मैने दानम शब्द को पढ़कर ब्राह्मी लिपि के रहस्य को खोला। जिस में किसी समुद्र गुप्त राजा की कई विजयों के बारे में लिख हुआ था। उस शिला लेख में कई शब्द ऐसे थे जिन्हें मैं पढ़ नहीं पा रहा था। 


1837 से पहले, भारत में जगह-जगह शिला स्तंभों की श्रृंखलाएँ थीं, लेकिन उन पर क्या लिखा है, यह कोई नहीं जानता था। फिर मैंने उन शिलालेखों को पढ़ने का तरीका रत्नपाल की सहायता से ढूंढ निकाला।

एक स्तम्भ कौशाम्बी से इलाहबाद लाया गया था। इसी स्तम्भ को  पढ़ने में सफलता मिली थी। जिसमें लिखा थादेवानाम प्रिय का आदेश कौशाम्बी में महामात्रों जो कोई भी संघ को विभाजित करता है जो अब एकजुट है उसे संघ में प्रवेश नहीं दिया जाना है।

जो कोई भी चाहे वह भिक्षु हो या भिक्षुणी। संघ को विभाजित करने के अलावा मठ में रहने और सफ़ेद कपडे पहनने के अलावा और कही निवास करना है।

इस लेख में अशोक पंचमार्गियों की बात कर रहे है। पंचमार्गी वह होते है जो किसी दूसरे के संघ में घुस जाते है फिर वहां अपना वर्चस्व बनाते है।

फिर उसे तोड़ कर अपना कब्ज़ा कर लेते है। इन्हीं लोगों को चेतावनी देने के लिए अशोक ने स्तम्भ पर लिखवाया था। इसे लोगों को संघ से निकाला तो जाना ही है साथ में सफ़ेद कपड़े पहन कर रखना है।

मेरी मेहनत रंग लाई सन 1838 में उन्होंने एशियाटिक सोसायटी बंगाल को मैने अपनी रिपोर्ट दी। इस शिलालेख की भाषा समझने में मैंने  30 वर्ष लगाए थे। पता चला कि यह शिलालेख देवनाम प्रियदर्शी राजा के आदेश पर लिखे गए थे। जिसने अपना धर्म बदल लिया था।

अब सवाल यह खड़ा हो गया कि भारतीय इतिहास में इस नाम के किसी राजा का कोई उलेख नहीं था। यह राजा कौन था? जिसने सम्पूर्ण भारत वर्ष के साथ अफगानिस्तान तक राज किया? अपने सन्देश शिलालेखों पर लिखवाये। और इतिहास उसे भूल गया।

एक बार जब यह खोज हो गई तब श्री लंका में बौद्ध धर्म के इतिहास को पढ़ने बाले इतिहासकार जॉर्ज टर्नर ने मुझे बताया कि उन्हें बौद्ध धर्म ग्रंथों से पता चला है कि प्रियदर्शी एक भारतीय राजा अशोक के लिये इस्तेमाल किये जाने बाला टाइटल  है जो चन्द्र गुप्त मौर्य नाम के राजा का पोता था।

तब मेरा मन प्रश्नों से भर गया। क्या यह एक षड़यंत्र था कि अशोक को भारतीय इतिहास से गायब कर दिया गया? उनके स्तंभों को भुला दिया गया? लेकिन सम्राट अशोक की दूर्दर्शिता देखिए कि पत्थर पर खींची उनकी लकीरों को समय भी मिटा नहीं सका और वह धरती  का सीना चीर कर बाहर गई है।

तब हमें पता चली सम्राट अशोक की कहानी। यह एक ऐसा साम्राज्य था जिसके साबुत तो थे लेकिन उसे कोई पहचानता नहीं था।

मैंने ब्राह्मी तथा खरोष्ठी लिपि पहलीवार पढ़ी थी। जैन और बौद्ध ग्रन्थों में माने जाने वाले कल्पित राजा को मान्यता मिली जब मैंने उनके अभिलेखों को पढ़ने का तरीका ढूंढ लिया।

अशोक ने अपने संदेशों को लिखने के लिये चुनार वर्तमान उत्तर प्रदेश में शिलालेख बनवाने का काम करवाया था। यहीं से यह शिलालेख पूरी दुनिया में भेजे गए थे। यह शिलालेख अफगानिस्तान से लेकर कर्नाटक तक फैले हुए थे।

उस समय शिल्प कला बहुत विकसित थी। इस कारण यह स्तम्भ बहुत चमकदार है। इन्हें चुनार में बनवाकर अशोक ने जगह-जगह भेजा था। अनेक लोग इनकी चमक के कारण इन्हें धातु के स्तम्भ समझ बैठे थे।

लेकिन मेरी  कहानी भी कम रोचक नहीं है कि मैंने कैसे यह तरीका खोजा। धूल में लिपटी भारत वर्ष की सभ्यताओं को जब मैं पढ़ने लगता हूँ तो उनमें से कुछ नाम चमकने लगते है।

उन्हीं नामों में से एक नाम है सम्राट अशोक। इस बीच मुझे यह भी पता चल कि अशोक का बहुत विशाल साम्राज्य था तथा वह एक शांतिप्रिय राजा था। पता चला कि ये शिलालेख 'देवानां प्रियदर्शी' राजा के आदेश पर लिखे गए थे, जिसने अपना धर्म बदल लिया था।

जल्द ही पता चला कि 'प्रियदर्शी' बौद्ध धर्मग्रंथों में भारतीय राजा अशोक के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक टाइटल था, जो चंद्रगुप्त मौर्य का पोता था। मेरी इस खोज ने जैन और बौद्ध ग्रंथों के 'काल्पनिक' राजा को एक वास्तविक ऐतिहासिक व्यक्ति बना दिया।  

आत्माओं का मिलन

एक शाम में कलकत्ता के एक क्लब में बैठा था। कनिंघम  से मेरी  मुलाकात  यहीं  हुई थी। मैं तब बनारस की टकसाल में काम करता था।  मैं एक बहुत ही शांत और विनम्र अन्तर्मुखी व्यक्ति था। लेकिन मेरे  दिल में एक आग थी। हाल ही में मैंने ब्राह्मी लिपि को समझने में सफलता प्राप्त की थी।

इस शाम, कलकत्ता के इस ब्रिटिश क्लब में, दो अलग-अलग रास्तों से आए दो व्यक्ति मिले। एक युवा और उत्साही सैनिक इंजीनियर, अलेक्जेंडर कनिंघम, और दूसरा मैं एक मेहनती अधेड़ टकसाल अधिकारी, जेम्स प्रिंसेप।

दोनों का परिचय एक कॉमन मित्र ने कराया।

मित्र: "जेम्स, यह अलेक्जेंडर कनिंघम हैं। यह भारत के प्राचीन किलों में बहुत रुचि रखते हैं।"

जेम्स ने हाथ मिलाया और मुस्कुराते हुए कहा, "और मैं इनके निर्माताओं के बारे में जानना चाहता हूँ।"

कनिंघम ने जवाब दिया, "मुझे लगता है कि हम दोनों की रुचि एक ही है, बस हमारे रास्ते  अलग है।"

कनिंघम ने मुझ को अपने द्वारा बनाए गए प्राचीन इमारतों के रेखाचित्र दिखाएं, और मैंने उन्हें अपने संग्रह के कुछ प्राचीन सिक्के दिखाएं। मैने  अपनी बातचीत में ब्राह्मी लिपि का उल्लेख किया।

कनिंघम ने पूछा, "यह क्या है?"

मैंने  जवाब दिया, "मुझे नहीं पता। लेकिन मुझे लगता है कि यह उस महान सम्राट अशोक की भाषा है, जिसके बारे में कुछ लोग कहते हैं कि उन्होंने अपने भाई-बहनों का वध किया था। मुझे ऐसा लगता है कि यह लिपि हमें उसकी सच्चाई बताएगी।"

मैने कनिंघम से कहा, "कनिंघम, मैंने इन पत्थरों की भाषा को समझा है। यह एक ऐसी भाषा है जो हमें इतिहास में वापस ले जाएगी।"

कनिंघम ने पूछा, "लेकिन ये पत्थर है किसके?"

मैंने ने एक प्राचीन शिलालेख दिखाते हुए कहा, "इन पर एक ऐसे राजा का नाम लिखा है जिसने कभी दुनिया का सबसे बड़ा साम्राज्य बनाया था। 

उसका नामदेवानाम प्रियथा, यानी 'देवताओं का प्रिय' लेकिन मैंने यह भी खोजा है कि ये शिलालेख सम्राट अशोक के हैं। मुझे लगता है कि यह अशोक वही है, जिसने कलिंग युद्ध के बाद हिंसा छोड़ दी थी।"

इस खोज ने कनिंघम को एक नया उद्देश्य दिया। मैने ब्राह्मी लिपि की चाबी उन्हें दी, और कनिंघम ने भारत के प्राचीन स्थलों की खोज करने का फैसला किया।

कनिंघम एक साधारण सैनिक नहीं थे; उनके मन में भारत के प्राचीन इतिहास और संस्कृति को जानने की गहरी जिज्ञासा थी।

उनकी मुलाकात में मैंने कनिंघम को ब्राह्मी लिपि को समझाने का काम किया था। मैने कनिंघम की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें प्राचीन भारतीय सिक्कों और शिलालेखों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। यह मुलाकात कनिंघम के जीवन का एक निर्णायक मोड़ साबित हुई।

मेरी मुलाकात एक ऐतिहासिक साझेदारी की शुरुआत थी। इस दौरान, कनिंघम भी अपनी सैन्य यात्राओं के बीच प्राचीन स्थलों का दौरा करते रहे। दोनों ने एक-दूसरे को पत्र लिखना जारी रखा, जहां वे अपने निष्कर्ष साझा करते थे।

कनिंघम ने एक पत्र में लिखा,

प्रिय जेम्स,

मैंने कलिंग की पहाड़ियों में कुछ ऐसे शिलालेख देखे हैं, जो तुम्हारे सिक्कों पर अंकित चिह्नों से मिलते-जुलते हैं। मुझे लगता है कि ये शिलालेख अशोक के हैं।

यह जानकारी मेरे  लिए बहुत महत्वपूर्ण थी। मैंने अपने सभी निष्कर्षों को एक साथ जोड़ा और अंततः इस खोज से, भारत का इतिहास पूरी दुनिया के सामने आया और अशोक का नाम एक महान राजा के रूप में स्थापित हुआ।

बनारस में रहते हुए, मैने एक ऐसी पहेली पर काम शुरू किया, जिसने मुझे अमर कर दिया। वह थी ब्राह्मी लिपि को समझने की पहेली। ब्राह्मी लिपि को समझने में सफलता प्राप्त की। इस लिपि को समझने के लिए भारतीय सिक्कों और शिलालेखों पर लिखे गए नामों का इस्तेमाल किया। 


दिन-रात की कड़ी मेहनत, लगातार अध्ययन और भारत की गर्म जलवायु ने मेरे स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला। मैंने लगातार कई वर्षों तक बिना थके काम किया। 


मेरा  दिमाग हमेशा विचारों और अक्षरों के जाल में उलझा रहता था। मेरे काम ने अशोक को इतिहास के धुंधले पन्नों से निकालकर एक जीवंत व्यक्तित्व में बदल दिया।

कनिंघम ने बताया कि  धीरे-धीरे, जेम्स के मानसिक स्वास्थ्य में गिरावट आने लगी। 1838 तक, उनकी हालत इतनी खराब हो गई कि वह अपनी पहचान तक भूलने लगे। उनका शरीर और दिमाग दोनों जवाब देने लगे थे। उन्हें कलकत्ता वापस लाया गया, लेकिन उनके स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं हुआ। 


यह खोज दुनिया के सामने भारत के प्राचीन इतिहास को लाई और जेम्स प्रिंसेप को एक प्रसिद्ध विद्वान के रूप में स्थापित किया।

अंत में, जेम्स प्रिंसेप को इलाज के लिए वापस ब्रिटेन भेज दिया गया। समुद्र की लंबी यात्रा के दौरान उनकी हालत और बिगड़ गई। 1840 में, उन्होंने मात्र 40 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली।

एक ऐसी प्रतिभा का दुखद अंत, जिसने अपने जुनून के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया था। एक महान भाषाविद, जिसने भारत के गूंगे पत्थरों को आवाज़ दी थी, खुद मूक हो गया था।


प्रिंसेप की खोज ने सम्राट अशोक को इतिहास के पन्नों में फिर से जिंदा कर दिया। यह एक ऐसे राजा की कहानी थी जिसके सबूत तो थे, पर उसे कोई पहचानता नहीं था। जेम्स प्रिंसेप के बिना शायद आज भी सम्राट अशोक धूल में दबे होते।

उनकी यह खोज केवल इतिहास की एक बड़ी कड़ी थी, बल्कि इसने भारत को अपनी खोई हुई विरासत से फिर से जोड़ा।

जेम्स प्रिंसेप की मृत्यु मस्तिष्क की बीमारी के कारण हुई और उनका काम अधूरा रह गया, पर कलकत्ता के लोगों ने हुगली नदी के किनारे उनका एक स्मारक बनवाया, जो आज भी 'प्रिंसेप घाट' के नाम से जाना जाता है।


सरकार का निर्णय


कनिंघम ने बताया कि जेम्स प्रिंसेप ने बनारस में रहते हुए केवल एक लिपि नहीं समझी, बल्कि भारत की आत्मा को भी समझा। यह वह शहर था जिसने एक ब्रिटिश अधिकारी को एक भारतीय विद्वान में बदल दिया।

जेम्स प्रिंसेप की मृत्यु के बाद, उनका काम और उनके चित्र ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेखागार में सुरक्षित रखे गए। उनकी असाधारण प्रतिभा और उनके द्वारा बनाए गए दस्तावेज़ों का महत्व समय के साथ और भी बढ़ गया।

हाल ही में, जब भारत में ज्ञानवापी मस्जिद से संबंधित मामला अदालत में चल रहा था, तो इस ऐतिहासिक विवाद को सुलझाने के लिए प्रमाणों की आवश्यकता थी। प्रिंसेप के 19वीं शताब्दी के बनारस पर बनाए गए नक्शे और चित्र इस विवाद में महत्वपूर्ण साबित हुए। 


उनकी सटीकता और ऐतिहासिक प्रामाणिकता के कारण, यह अटकलें लगाई गईं कि भारत सरकार ने ब्रिटिश अधिकारियों से उनके चित्रों और नक्शों को आधिकारिक तौर पर भारत वापस लाने का अनुरोध किया ताकि उन्हें अदालत में साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया जा सके।

यह दिखाता है कि एक विद्वान का काम, जो उसने अपनी आँखों की रौशनी और मानसिक शांति की कीमत पर किया था, सदियों बाद भी जीवित रहता है और ऐतिहासिक विवादों को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

प्रिंसेप की गाथा हमें यह सिखाती है कि सच्चा ज्ञान कभी व्यर्थ नहीं जाता, भले ही उसे अर्जित करने वाले व्यक्ति को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी हो।


अशोक का धम्म

प्रिंसेप की खोज के बाद, कनिंघम ने अपनी सैन्य सेवा से छुट्टी ली और अपने मिशन पर निकल पड़े। वह जानते थे कि ब्राह्मी लिपि के शिलालेखों से ही वह अशोक के साम्राज्य का पता लगा सकते हैं। 


उनकी पहली यात्रा मध्य भारत के सांची की थी। जब वह सांची पहुंचे, तो उन्होंने एक विशाल टीला देखा, जिसके ऊपर एक भव्य स्तूप था।

"यह वही जगह है," कनिंघम ने अपनी पत्नी को लिखा, "जिसके बारे में प्रिंसेप ने बताया था। यहाँ अशोक के स्तम्भ हैं।"

कनिंघम ने सांची की खुदाई शुरू की। उन्होंने अशोक के स्तंभों को देखा, जिन पर ब्राह्मी लिपि में धम्म का संदेश लिखा था। इन स्तंभों पर यह संदेश था कि सम्राट अशोक ने हिंसा छोड़ दी थी और अब वे प्रेम, शांति और अहिंसा का प्रचार कर रहे हैं। 


इस खोज ने दुनिया को बताया कि अशोक सिर्फ़ एक क्रूर राजा नहीं था, बल्कि एक महान धार्मिक नेता भी था।

इसके बाद, कनिंघम सारनाथ गए, जहाँ उन्हें अशोक का एक और स्तंभ मिला, जिसके ऊपर चार शेरों की एक मूर्ति थी। इस खोज से, कनिंघम ने साबित कर दिया कि अशोक ने पूरे भारत में धम्म का प्रचार करने के लिए ये स्तंभ बनवाए थे।


बौद्ध धर्म ने अशोक को वह हथियार दिया जिससे वह बिना तलवार चलाए पूरे एशिया महाद्वीप पर प्रभाव डाल सके। तो क्या अशोक सच में एक करुणामयी राजा बने या यह भी सत्ता की एक चाल थी


अशोक का चक्र आज भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर है उनका सिंह राष्ट्रीय चिन्ह है और उनकी कूटनीति आज भी भारत की विदेश नीति की प्रेरणा का स्रोत है। 


उन्होंने दुनिया को शांति तथा करुणा का सन्देश दिया। उन्हें शांति का दूत कहा जाता है। अशोक की कहानी यह बताती है कि यदि पश्चात्ताप दिल से किया जय तो आदमी भीतर से बदल  सकता है। अशोक एक रहस्यमयी राजा थे जो आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते है।  


क्या आपने कभी सोचा है कि जो राजा लाखों लोगों का क़त्ल करा दे वही राजा दुनिया का सबसे बड़ा शांतिदूत कैसे बन जाता है। यह कहानी है भारत के उस सम्राट की जिसे इतिहास अशोक महान कहता है। एक ऐसा शासक जिसने खून खराबा छोड़ कर करुणा को अपना धर्म बना लिया। 


लेकिन क्या सच में अशोक केवल करुणामयी सम्राट थे या उनके फैसलों के पीछे राजनीति भी छुपी थी। अशोक का जन्म मौर्य वंश में हुआ और वे सम्राट बिन्दुसार के पुत्र थे। बचपन से ही उन्हें चण्ड अशोक कहा जाता था, क्योंकि वह बहुत निर्दयी और कठोर स्वभाव के थे। 



सांची का स्तूप


कनिंघम ने बताया कि सम्राट अशोक की धर्म यात्रा लुंबिनी से कपिलवस्तु फिर सारनाथ, श्रावस्तीकुशीनारा, बुद्ध गया, तथा नालंदा  होती हुई पाटलिपुत्र लौटी। सम्राट अशोक ने इस यात्रा के दौरान  नालंदा में सारिपुत्र के चैत्र की पूजा की और एक संघाराम बनबाया। इस तरह सम्राट अशोक नालन्दा महाविहार आदि का निर्माता भी मान सकते है। 


जहां-जहां तथागत गौतम बुद्ध के चरण पड़े वहां-वहां की सम्राट अशोक तथा कनिंघम ने यात्रा की। अशोक के बारे में होंसियांग  लिखते है कि अशोक ने तक्षशिला में तीन बड़े स्तूप बनबाये थे। जो सौ-सौ फ़ीट ऊंचे थे। 


इसके अलावा मथुरा, थानेश्वर, कन्नौज, साकेत यानी अयोध्या, प्रयाग, कौशांबी, श्रावस्ती, श्रीनगर, कपिलवस्तु, कुशीनारा, काशी, सारनाथ, मसाद, शाहाबाद, आठवी, वैशाली, श्वेतपुर, राजगृह, बुद्ध गया, हिरण्य पर्वत, सांची के अलावा अन्य प्रदेशों में भी सम्राट अशोक ने स्तूप बनबाये। 


अशोक का सांची का स्तूप शिल्पकला तथा वास्तुकला का एक बेजोड़ उदाहरण है। सांची का यह स्तूप सम्राट अशोक ने महेन्द्र की माता देवी से प्रेरित हो कर बनबाया। 

बैसे तो यह स्तूप तथागत के ज्येष्ठ शिष्य सारिपुत्र तथा मौद्गलायन के अस्थि कलश पर बनाये गए है। लेकिन सांची से एक तथ्य यह भी जुड़ता है कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र यहीं से प्रवजित हुए थे।


अशोक का सांची का स्तूप, शिल्पकला और वास्तुकला का बेजोड़ उदाहरण है। अशोक ने अपने संदेशों को पत्थरों पर उकेरने का काम चुनार में शुरू करवाया था। यहीं से ये शिलालेख अफगानिस्तान से लेकर कर्नाटक तक भेजे गए थे।

बुद्ध के पदचिह्न

कनिंघम ने अपनी खोज जारी रखी और उनका अगला मिशन बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहों का पता लगाना था। वह बोधगया पहुँचे, जहाँ बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यहाँ उन्होंने महाबोधि मंदिर की खुदाई की और पाया कि यह मंदिर कई सदियों पुराना था।

"एलिनॉर," कनिंघम ने अपने एक और पत्र में लिखा, "मुझे लगता है कि मैं बुद्ध के जीवन के केंद्र में हूँ। यहाँ की हर एक जगह पर एक पवित्र ऊर्जा है।"

उनकी सबसे बड़ी खोज कुशीनगर में हुई, जहां बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। वहां, उन्होंने एक विशाल टीले की खुदाई की और एक प्राचीन मंदिर को खोज निकाला, जिसमें एक विशाल शयन मुद्रा में बुद्ध की प्रतिमा थी।

यह प्रतिमा इस बात का प्रमाण थी कि बुद्ध ने इसी जगह पर अपना अंतिम शरीर छोड़ा था। इस खोज ने बुद्ध के जीवन के ऐतिहासिक पहलुओं को साबित किया और भारतीय इतिहास को एक नया मोड़ दिया।


लाइट ऑफ़ एशिया

कनिंघम ने बताया बौद्ध संस्कृति में इसे ही धर्म चक्र कहा जाता है। सारनाथ के शिलालेख पर बने चार सिंह बुद्ध द्वारा चारों दिशाओं में किये गए सिंहनाद का द्योतक है और अश्व, वृषभ, हंस और गज सिद्धार्थ कुमार और भगवान बुद्ध के प्रतीक माने जाते है। 


सम्राट अशोक ने तथागत बुद्ध के वचन और धम्म विनय बड़ी ही खूबसूरती से प्रतीकों के रूप में इन पत्थरों में ख़ुदबबाये। 

जो आज बुद्ध के ढाई हजार साल बाद भी मानवीय संस्कृति के विकास में एक समृद्ध परम्परा का निर्वहन करते है। बौद्ध भिक्षुओं की एक संघ परंपरा है कि समय-समय पर एकत्र होकर धर्म और विनय पर चर्चा करते है और विचार विमर्श कर मानवीय समुदायों की विकास की नीति पर कोई कार्य योजना बनाते है। इसे बौद्ध संस्कृति में संगीति कहा जाता है।  


बुद्ध को लाइट ऑफ़ एशिया किसने बनाया था? अशोक अपने एक शिला लेख में लिखबाते  है कि हर समय और हर जगह मुझे जनता की आवाज सुनाने के लिये बुलाया जा सकत है चाहें मैं  भोजन कर रहा होऊ, चाहे अंतःपुर में होऊ, मैं सो रहा होऊ या अपने उद्यान में होऊ, मेरे राज्य के अधिकारी जनता की कोई भी बात मुझ तक पंहुचा सकते है। सर्वलोक हित ही मेरा कर्तव्य है। सर्वलोक हित से बड़ कर दूसर कोई कर्म नहीं। 


कनिंघम ने बताया समय बदला और सब कुछ बदल गया। आज तो पूरा इतिहास ही बदल गया। मौर्य काल के गौरवशाली इतिहास के बारे में मेगस्थनीज ने लिखा कि भारत के लोग कभी झूठ नहीं बोलते। मकानों में ताला नहीं लगाते। और न्यायालयों में बहुत कम जाते है। 


तब उसके बारे में उसने लिखा शहर के बीच शाही महल और उसके हाल पहले की तरह अब भी खड़े है। वह दांतो तले उंगली दबा कर आश्चर्य व्यक्त किया और कहा कि ऐसा निर्माण मानव शक्ति के बूते की बात नहीं है।

विरासत का निर्माण

लगभग 30 वर्षों तक भारत में काम करने के बाद, कनिंघम ने महसूस किया कि उन्हें एक ऐसे संगठन की आवश्यकता है जो इन प्राचीन स्मारकों की रक्षा कर सके। 1861 में, उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की स्थापना की और उसके पहले महानिदेशक बने। 


इस संस्था के माध्यम से, उन्होंने पूरे भारत में हजारों प्राचीन स्थलों का पता लगाया, उनकी खुदाई की और उन्हें संरक्षित किया। उन्होंने एक व्यवस्थित तरीके से भारत के प्राचीन स्मारकों का संरक्षण और अध्ययन शुरू किया।

उनके काम ने यह सुनिश्चित किया कि भारत के प्राचीन इतिहास को वैज्ञानिक तरीकों से संरक्षित और समझा जाए।

कनिंघम ने अपने जीवन का अधिकांश समय भारत को समर्पित कर दिया। वह एक सैनिक के रूप में आए थे, लेकिन एक पुरातत्वविद् के रूप में अमर हो गए। अपने अंतिम दिनों तक अपने शोध में लगे रहे। उनका जीवन एक विद्वान, एक खोजकर्ता और एक संरक्षक का अद्भुत मिश्रण था।

उन्होंने हमें अशोक का इतिहास, बुद्ध का जीवन और भारत की गौरवशाली सभ्यता के बारे में बताया। उनका काम भारत के इतिहास को फिर से लिखने का एक मिशन था, और उन्होंने इसे बड़े ही साहस और समर्पण के साथ पूरा किया।


कनिंघम ने भारत में अपनी सारी ऊर्जा भारत के अतीत को उजागर करने में लगा दी, और आज भी उनके काम के कारण ही हम अपनी समृद्ध विरासत को समझ पाते हैं। वह भारत के इतिहास के एक ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं जिन्होंने केवल बौद्ध धर्म के इतिहास को फिर से खोजा, बल्कि भारतीय पुरातत्व की नींव भी रखी।


कनिंघम ने पूरे भारत में यात्रा की और सांची, सारनाथ, बोधगया, और कुशीनगर जैसे बौद्ध स्थलों की खुदाई की। उन्होंने अशोक के स्तंभों और शिलालेखों का पता लगाया, जिन पर ब्राह्मी लिपि में संदेश अंकित थे।

उनके काम से ही हमें पता चला कि सम्राट अशोक ने पूरे भारत में धम्म के प्रचार के लिए ये स्तंभ बनवाए थे। उन्होंने अशोक के इन संदेशों को इकट्ठा किया और उनके बारे में लिखा।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक सारनाथ में स्थित अशोक का सिंह स्तंभ था, जिसे बाद में भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में अपनाया गया। उन्होंने बौद्ध धर्म के इतिहास को फिर से दुनिया के सामने रखा, जो सदियों से भुला दिया गया था।

उन्होंने अपनी खोजों पर कई किताबें और लेख लिखे, जिनमें " महाबोधि" और " आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया रिपोर्ट्स" प्रमुख हैं।


1885 में, कनिंघम भारत से हमेशा के लिए चले गए, लेकिन उनकी विरासत आज भी जीवित है। भारत में हर एक प्राचीन स्मारक, हर एक शिलालेख और हर एक संग्रहालय उनकी कहानी कहता है। 


धर्म की आधारशिला पर खड़े सम्राट अशोक के भौगोलिक साम्राज्य के कारण भारत जम्बू द्वीप बना। इतिहास कहता है कि अशोक के जीवन काल में जम्बू द्वीप में छोटे बड़े मिला कर 84,000 शहर थे। 


राजधानी पाटलिपुत्र से सीधे सम्राट अशोक शासन चलाते थे। सम्राट अशोक द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि स्थानीय शासन की देखरेख करते थे। 


सम्राट अशोक की शासन व्यवस्था में सिंचाई तथा सड़कों के निर्माण में पर्याप्त धन खर्च किया जाता था। दवाखाने, कुओं की खुदाई, छायादार वृक्ष लगबाना, यत्रियों की सुविधा तथा सुरक्षा की व्यवस्था तथा शिक्षा पर बहुत बड़ी राशि खर्च की जाती थी। कर का कुछ हिस्सा सेना पर खर्च किया जाता था। 


आज जिस तरह की शासन व्यवस्था तथा योजनाबद्ध विकास देखते है उस तरह की व्यवस्था सम्राट अशोक ने उस समय बनाई थी। उन्होंने स्वर्णिम भारत का निर्माण किया तथा दुनिया को एक आदर्श शासन व्यवस्था का मॉडल दिया। अशोक के दादा तथा पिता और वह स्वयं सम्राट थे लेकिन शिलालेखों में उन्होंने सम्राट पद का उल्लेख नहीं करवाया। 


नदी का रहस्य

1986, गुलबर्गा, कर्नाटक। भीमा नदी के तट पर सदियों से खड़ा एक प्राचीन मंदिर, समय और प्रकृति के रहस्यों को अपनी दीवारों में छिपाए था। ग्रामीण बताते थे कि इसके भीतर चंद्र लाभा देवी की एक पवित्र मूर्ति है, लेकिन कोई नहीं जानता था कि मंदिर की नींव में उससे भी ज़्यादा अमूल्य कुछ छिपा है।

उस तूफ़ानी रात, जब बिजली कड़की और आसमान फटा, तो मंदिर की छत ढह गई। छत के पत्थर सीधे मूर्ति पर गिरे और उसे तोड़कर, जमीन में धंस गए। फर्श से टूट गया।

पर जो बाहर आया, वह विनाश नहीं, बल्कि एक नया इतिहास था। फर्श के नीचे से चार विशाल पत्थर निकले। पत्थर, जिन पर अजीबोगरीब आकृतियाँ और लिखावट उकेरी हुई थीं। ये वही पत्थर थे जिनसे मंदिर की नींव और फर्श बनाया गया था।

भारतीयों को अपने इतिहास से कितना लगाव है, इसका इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है? अमूल्य धरोहरों को वे अपने रोजमर्रा के कामों में इस्तेमाल कर रहे थे। एक शिलालेख को तो मूर्ति की चौकी बना दिया गया था।

पुरातत्व विभाग को सूचना मिली और खुदाई शुरू हुई। जैसे-जैसे मिट्टी हटती गई, एक रहस्यमयी दुनिया सामने आती गई। एक विराट बौद्ध विहार, एक भव्य स्तूप, सैकड़ों बुद्ध की मूर्तियाँ, एक धर्म चक्र और अनगिनत ग्रामीण अभिलेख।

हर खुदाई एक नई परत खोल रही थी। वहीं से वह मूर्ति भी मिली, जिस पर ब्राह्मी लिपि में लिखा था: "राया अशोक" अशोक, जिसे भारतीय इतिहास ने सदियों से भुला दिया था, अब पत्थर की कब्र से निकल कर बोल रहा था।

यह कहानी दिखाती है कि कैसे इतिहास, जिसे हम भूला हुआ मान लेते हैं, एक तूफान, एक टूटे हुए मंदिर और एक जिज्ञासु व्यक्ति के हाथों से फिर से उजागर हो सकता है।

इतिहास की गूंज

एक राजा जो दुनिया की 33 प्रतिशत आबादी पर राज करता था। 52 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला उसका साम्राज्य हिमालय से लेकर अरब सागर तक था। 


प्रिंसेप की खोज के बाद, 20वीं सदी में रोड्रिच अगस्टस स्ट्रोम ने इन अभिलेखों पर गहन अध्ययन किया और अशोक की नीतियों पर और भी प्रकाश डाला। लेकिन अशोक की कहानी केवल शिलालेखों तक सीमित नहीं थी।

बौद्ध ग्रंथ जैसे 'दिव्यावदान', 'अशोकावदान', 'महावंश' और 'दूतवंश' में उनके जीवन की झलक मिलती है। ये ग्रंथ उन्हें सिर्फ़ एक सम्राट के रूप में नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक यात्री के रूप में भी प्रस्तुत करते हैं, जिसने अपने हृदय की क्रांति को पूरे समाज तक पहुँचाया।


यूनानी राजदूत मेगस्थनीज और रोमन इतिहासकार प्लिनी एल्डर ने भी अशोक और उनके साम्राज्य का ज़िक्र किया था। इस दौरान भारत को 'सोने की चिड़िया' कहा जाता था।


इतिहासकार मेगस्थनीज ने अपनी किताब 'इंडिका' में लिखा था कि भारतीय कभी झूठ नहीं बोलते, मकानों में ताला नहीं लगाते और न्यायालयों में बहुत कम जाते हैं।

मेगास्थनीज ने मौर्यों के शाही महल का वर्णन किया था, जहाँ स्तंभों पर सोने की बेलें चढ़ी थी और चांदी के पक्षी सजे थे। सोने चांदी से शाही महल सुसज्जित था। 500 साल बाद चीनी यात्री फाह्यान पाटलिपुत्र आया और राजभवन को देखकर दंग रह गया।

उसने अपनी यात्रा वृत्तांत में लिखा, "शहर के बीच शाही महल और उसके हॉल पहले की तरह अब भी खड़े हैं। ऐसा निर्माण मानव शक्ति के बूते की बात नहीं है।" क्या यह सिर्फ़ वास्तुकला थी, या एक संदेश, एक चेतावनी?

फाह्यान ने पाटलिपुत्र में सम्राट अशोक के जन्मदिन का ज़िक्र भी किया। हर साल, द्वितीय चंद्रमा की 8वीं तिथि को एक भव्य जुलूस निकलता था। 20 हाथ ऊँचे, चार-पहिये वाले रथ पर एक स्तूप बना होता था, जिसके बीच में बुद्ध की मूर्ति स्थापित थी। 


लोग नाचते-गाते, औषधालय स्थापित करते और गरीबों, अपंगों तथा विधवाओं की मदद करते थे। यह सब एक ऐसे राजा के बारे में था, जिसे प्रिंसेप की खोज तक कोई नहीं जान सका था।

फिरोज़ शाह तुगलक और अकबर, दोनों ने इन स्तंभों को पढ़ाने की कोशिश की, पर नाकाम रहे। क्या यह नियति थी कि सिर्फ़ एक अँग्रेज ही इस रहस्य को सुलझा सकता था?

एक अँधेरा अतीत

अशोक, जिसे 'चंड अशोक' कहा जाता था, अपने भाइयों को मारकर गद्दी पर बैठा था। उसका जीवन सिर्फ़ एक शब्द पर टिका था- सत्ता। 


कलिंग के युद्ध में लाखों लोगों का नरसंहार हुआ। लाशों के ढेर, माओं के आँसू और बच्चों की चीखों ने अशोक को अंदर तक हिला दिया। यहीं से उसने बौद्ध धर्म अपनाया। पर क्या यह सचमुच हृदय परिवर्तन था? या सत्ता की एक चाल?

अशोक के धर्म परिवर्तन ने उसे एक नया हथियार दिया  'सॉफ्ट पावर' बिना तलवार उठाए वह पूरे एशिया महाद्वीप पर अपना प्रभाव फैला सकता था। क्या एक क्रूर शासक सच में दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत बन गया था? या यह उसकी एक और कुटिल चाल थी?

उसका चक्र आज भी भारत के राष्ट्रीय ध्वज पर है और उसका सिंह राष्ट्रीय चिह्न है। उसकी कूटनीति आज भी भारत की विदेश नीति का हिस्सा है। अशोक एक रहस्य था, जो आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करता है।

शासक का पुनर्जन्म

अशोक, जिसने दुनिया को शांति और करुणा का संदेश दिया, एक ऐसा शासक था जिसने खून-खराबा छोड़कर धर्म को अपनाया। लेकिन क्या यह सिर्फ हृदय परिवर्तन था? या सत्ता की एक सोची-समझी चाल?

अशोक ने अपनी धर्म यात्रा लुंबिनी से शुरू की और कपिलवस्तु, सारनाथ, श्रावस्ती, कुशीनारा होते हुए पाटलिपुत्र लौटे। उन्होंने जहाँ-जहाँ तथागत गौतम बुद्ध के चरण पड़े, वहाँ-वहाँ की यात्रा की और स्तूप बनवाए।

विभाजन का शाप

भारत को गुलाम बनाने की कहानी, किसी युद्ध या ताकत की नहीं थी, बल्कि यह विभाजन की एक गहरी, साजिश थी। उन्हें धर्म, जातियों और उपजातियों में बांटकर आपस में लड़ाया गया।

पहले वर्ण के नाम पर चार हिस्से किए गए, फिर 3000 से ज़्यादा जातियाँ और 33,000 से ज़्यादा उपजातियाँ बना दी गयी। यह एक ऐसा जहर था जो सदियों तक भारत की मिट्टी में रिसता रहा, और इस ज़हर का पहला प्रभाव था, इतिहास की सबसे महान कहानियों में से एक को भुला देना  कहानी सम्राट अशोक की।

इतिहास के पन्नों में उनका ज़िक्र राजा 'देवानांप्रिय प्रियदर्शी अशोक' के रूप में मिलता है। बौद्ध साहित्य में उन्हें 'धर्म राज' या 'धर्म शोक' कहा गया है। उनके विशाल स्तूप, विहार और शिला स्तंभ, दुनिया के साथ उनके मैत्रीपूर्ण संबंधों के सबूत थे।

वह एक महान विजेता, दूरदर्शी राजनीतिज्ञ और सर्वसाधारण के दिल पर राज करने वाले सम्राट थे। लेकिन उनकी कहानी, जो पत्थरों पर खुदी थी, उसे जानबूझकर छिपाया गया था।

बोलते पत्थर

अशोक के पहले भारत में भवन इमारतें लकड़ी की हुआ कराती थी। सम्राट अशोक से ही भारत में पत्थरों से इमारतें बनाने की परम्परा भारत में शुरू हुई। सम्राट अशोक के शिला स्तम्भ सुन्दर तो है ही चमकदार और चिकने भी है। 


कितनी मेहनत की गई इस कार्य में। सम्राट अशोक के चक्र का निर्माण तथागत भगवान बुद्ध के प्रतीक सम्पात तथा आष्टांगिक मार्ग के सिद्धांत पर बनबाये गए है। 


बौद्ध संस्कृति में इसे ही धर्म चक्र कहा जाता है। सारनाथ के शिलालेख पर बने चार सिंह बुद्ध द्वारा चारों दिशाओं में किये गए सिंह नाद का द्योतक है और अश्व, बृषभ, हंस और गज सिद्धार्थ कुमार और भगवन बुद्ध के प्रतिक माने जाते है। सम्राट अशोक ने तथागत बुद्ध के वचन और धम्म विनय बड़ी ही खूबसूरती से प्रतीकों के रूप में इन पत्थरों में ख़ुदबबाये। 


जब भी उनके पद का उल्लेख किया गया तो राजा देवानांप्रिय प्रियदर्शी अशोक का उल्लेख किया गया। बौद्ध साहित्य में उन्हें धर्म राज या धर्म शोक कहा गया है। 


विशाल स्तूप, विहार, गुफाएं, शिला स्तंम्भ और उन पर की गई बेजोड़ नक्कासी तथा भारत के पूरी दुनियां में विकसित हुए मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों के लिए सम्राट अशोक एक महान दूरदर्शी, महान विजेता, महान राजनीतिज्ञ और सर्वसाधारण के ह्रदय पर राज करने बाले सम्राट के रूप में हमेशा जाने जायगे।

सम्राट अशोक के जीवन की कहानी भी ऐसे ही अमूल्य स्रोतों से जुड़ी है। जिससे हमें उनके युग की झलक मिलती है। अशोक के जीवन के बारे में सबसे विश्वसनीय जानकारी हमें उनके शिला लेखों से मिलती है। 


यह अभिलेख भारत से विभिन्न हिस्सों नेपाल और अफगानिस्तान में फैले है। और इनमें सम्राट ने अपने विचार, नीतियां और धार्मिक सन्देश पत्थरों और चट्टानों पर खुदवाये थे। 


कुल मिला कर 35 शिलालेख मिले है। जिनमें से 14 बड़े और कुछ छोटे अभिलेख है। यह अभिलेख मुख्यतः प्राकृत भाषा में लिखे गये है। लेकिन कुछ में संस्कृत, यूनानी और अरामाई लिपियां भी देखने को मिलती है। 


इन अभिलेखों की खोज हमें भारत के इतिहास के उन गलियारों में ले जाती है जहां पत्थर बोलते है। धौली उड़ीसा में स्थित शिलालेख कलिंग युद्ध के बाद अशोक के परिवर्तनशील हृदय की गावही देते है। 


लुंबिनी, नेपाल जहाँ भगवान बुद्ध का जन्म हुआ वहां एक शिलालेख में अशोक ने स्वयं को भगवान बुद्ध का एक महान भक्त कहा है। 


अफगानिस्तान के बैरुत और करनाली जैसे स्थानों पर पाए गए अभिलेख मौर्य साम्राज्य की पश्चिमी सीमाओं को दर्शाते है। वही सारनाथ में स्थित अशोक स्तम्भ जहां बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। भारतीय स्थापत्य और बौद्ध संस्कृति का अद्भुत प्रतीक है। 


इन शिलालेखों का महत्व केवल ऐतिहासिक या स्थापत्य दृष्टि से नहीं है बल्कि वे नैतिकता और शासन के मूल्यों की नींव भी रखते है। अशोक ने इन अभिलेखों में धम्म यानि धर्म के प्रचार की बात की। जो अहिंसा, सत्य, दया, करुणा और सामाजिक समरसता पर आधारित था। उन्होंने रामराज्य की परिकल्पना प्रस्तुत की। 


जो केवल एक प्रशानिक व्यवस्था थी बल्कि एक नैतिक शासन का आदर्श भी था। उन्होंने वर्ण और जातियों के बीच समरसता को बढ़ावा दिया। भुक्षुओं और मठों की रक्षा की बात की। और न्याय, दण्ड तथा अपराध नियंत्रण की नीतियां स्पष्ट की। 


अशोक के अभिलेखों की खोज और उनके पाठ को समझने का श्रेय 19वीं सदी के विद्वान जेम्स प्रिंसेप को जाता है। उन्होंने ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा को पद कर इन शिला लेखों को पहली बार आधुनिक दुनिया के सामने लाया।


उनके कार्य ने अशोक को इतिहास के धुंधले परदे से खींच कर एक सजीव व्यक्तित्व में परिवर्तित कर दिया। 20 वी शादी में रोड्रिच अगस्टस स्ट्रोम ने इन अभिलेखों पर और गहन अध्ययन कर अशोक की नीतियों और शासन संरचना पर प्रकाश डाला। लेकिन अशोक की कहानी केवल शिलालेखों में सीमित नहीं रही। 


बौद्ध ग्रंथों में भी उनके जीवन की जीवंत झलक मिलती है। दिव्यावदान, अशोकावदान, महावंश और दूत वंश जैसे ग्रंथों में कलिंग युद्ध, उनके धार्मिक परिवर्तन और धम्म प्रचार की घटनाएं विस्तृत रूप में मिलती है। यह ग्रन्थ अशोक को केवल एक सम्राट के रूप में प्रस्तुत करते है बल्कि एक आध्यात्मिक यात्री के रूप में भी। 


जिसने अपने हृदय की आंतरिक क्रांति को समूचे समाज तक पहुंचाया। इतिहास के अन्य स्रोत भी अशोक की गाथा को पुष्टि प्रदान करते है। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने मौर्य साम्राज्य के प्रशासनिक ढांचे का उल्लेख किया। 


रोमन इतिहासकारों जैसे क्यूटस कोरयेटस और क्लिनी दा एल्डोर ने भी अशोक और उनके साम्राज्य की चर्चा की। इस समय भारत को सोने की चिड़िया के नाम से जाना जाता था। इस समय भारत विश्व की सकल घरेलु उत्पाद जी डी पी में 23 प्रतिशत का योगदान देता था। 


सारनाथ के अशोक स्तम्भ जिस पर चार शेरों की आकृति है आज भारतीय गणराज्य का रष्टीय प्रतीक है। यह केवल स्थापत्य की दृष्टि से महान है बल्कि उस विचारधारा का प्रतीक भी है जो शक्ति को न्याय और करुणा के साथ जोड़ता है। शिलालेखों की भाषा और लिपि भी अपने आप में विशेष है। 


इस समय भारतवर्ष में 70 से अधिक विश्वविद्यालय थे जिन में देसी तथा विदेशी छात्र अध्ययन करते थे। प्रारम्भिक अभिलेख ब्राह्मी लिपि में थे। जो उस समय की प्रमुख लिपि थी। इसके अलावा अरामाई और यूनानी लिपि में मिले अभिलेख यह संकेत देते है कि अशोक केवल भारतीय जनता को ही नहीं बल्कि अपने साम्राज्य के बाहर के लोगों को भी अपने विचारों से जोड़ना चाहते थे। 

यह अभिलेख पूरे एशिया में बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रमाण बने। इन शिलालेखों को एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे बेहद सरल, स्पष्ट और सीधे सन्देश देते है। इनमें सत्ता का धमण्ड नहीं। बल्कि सेवा और नैतिकता की भावना प्रबल है। 


इतिहास में यह पहली बार था जब किसी सम्राट ने अपने शासन को नैतिकता के आधार पर स्थापित करने का प्रयास किया। अशोक के अभिलेख इतिहास के वे दस्तावेज है जो प्राचीन भारत में शासकीय नीति और धार्मिक जीवन को समझने का अनूठा अवसर देते है।  


अशोक के शिलालेख राजनीति के इतिहास में एक क्रांति थी। यह सत्ता का उपयोग शांति और न्याय के लिए करना था। कि केवल विजय के लिये। अनन्तः यह सब हमें एक ऐसे शासक की कहानी सुनाते है जिसने शक्ति के साथ करुणा को जोड़ा। 


जब पत्थर बोलने लगे तो इतिहास सुनता है। और अशोक के पत्थर सदियों से मानवता के लिए पुकार रहे है। जब इतिहास के पन्नों को पालते है तब अशोक केवल एक विजेता सम्राट नहीं बल्कि एक महान प्रशासक, धर्मनिष्ठ, संस्कृति के संरक्षक और कला के उन्नायक के रूप में उभरते है। 


अशोक का सबसे प्रभावशाली पक्ष था उनका धर्म के प्रति दृष्टिकोण। युद्धों और रक्तपात से ऊबकर उन्होंने जिस धम्म नीति को अपनाया वो केवल बौद्ध धर्म का प्रचार था। बल्कि नैतिक जीवन शैली, सहिष्णुता और समाज सेवा का संदेश भी था। 


उन्होंने अपने अभिलेखों में यह स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ केवल पूजा पथ नहीं बल्कि एक दूसरे के प्रति करुणा और सहयोग है। उन्होंने बौद्ध धर्म को विशेष संरक्षण दिया। 



पत्थरों की गवाही

कभी-कभी विजय का अर्थ होता है हार जाना। स्वयं से, अपने अभिमान से, और अपने अतीत से। जब हम इतिहास के पन्नों को खोलते है तो केवल शब्द ही नहीं बल्कि पत्थरों पर खुदी हुई कहानियां भी सच्चाई बताती है। अशोक की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी। उनके जीवन का सबसे विश्वसनीय प्रमाण उनके शिलालेखों से मिलता है।

ये अभिलेख भारत के विभिन्न हिस्सों, नेपाल और अफगानिस्तान में फैले हैं। कुल 35 शिलालेख मिले हैं, जिनमें से 14 बड़े और कुछ छोटे हैं। ये ज्यादातर प्राकृत भाषा में लिखे गए हैं, लेकिन कुछ में संस्कृत, यूनानी और अरामी लिपियाँ भी हैं।

इन शिलालेखों की खोज हमें एक ऐसे अतीत में ले जाती है, जहां पत्थर बोलते हैं। ओडिशा के धौली में स्थित शिलालेख, कलिंग युद्ध के बाद अशोक के हृदय परिवर्तन की गवाही देता है।

वहीं, नेपाल के लुंबिनी में मिला एक शिलालेख बताता है कि अशोक ने स्वयं को भगवान बुद्ध का एक महान भक्त बताया था। अफगानिस्तान के बैरुत और करनाली जैसे स्थानों पर पाए गए अभिलेख मौर्य साम्राज्य की पश्चिमी सीमाओं का रहस्य उजागर करते हैं।

इन अभिलेखों का महत्व केवल ऐतिहासिक नहीं है। वे नैतिकता और शासन के सिद्धांतों को भी स्थापित करते हैं। अशोक ने इन अभिलेखों मेंधम्म' का प्रचार किया एक ऐसा धर्म जो अहिंसा, सत्य, दया और सामाजिक समरसता पर आधारित था। वह एक ऐसे नैतिक शासन की कल्पना कर रहे थे, जहाँ धर्म और प्रशासन एक-दूसरे के पूरक थे।


अशोक का चक्र

सारनाथ का अशोक स्तंभ, जिस पर चार शेरों की आकृति है, आज भारतीय गणराज्य का राष्ट्रीय प्रतीक है। यह सिर्फ़ एक महान कलाकृति नहीं, बल्कि उस विचारधारा का प्रतीक भी है जो शक्ति को न्याय और करुणा से जोड़ती है। इन शिलालेखों की सबसे बड़ी विशेषता उनकी सादगी है।

वे सीधे और स्पष्ट संदेश देते हैं। इनमें सत्ता का अभिमान नहीं, बल्कि सेवा और नैतिकता की भावना प्रबल है। यह इतिहास में पहली बार था जब किसी सम्राट ने अपने शासन को नैतिकता के आधार पर स्थापित करने की कोशिश की।

अशोक के शिलालेख राजनीति के इतिहास में एक क्रांति थे। उनका शासन एक क्रांतिकारी मॉडल था, जो आज भी दुनिया को प्रेरित करता है। उन्होंने पूरे देश को कई प्रांतों में बाँटा, जिनका संचालन सीधे सम्राट के प्रति जवाबदेह राज्यपाल करते थे।

उनका शासन एक क्रांतिकारी मॉडल था। जो आज भी विश्व को प्रेरित करता है। अशोक ने मौर्य साम्राज्य को केवल तलवार की ताकत से नहीं बल्कि सुचारु प्रशासनिक व्यवस्था से भी मजबूत किया। उन्होंने पूरे देश को कई प्रांतों में बांटा।

जिनका संचालन राज्यपाल करते थे। यह राज्यपाल सीधे सम्राट को उत्तरदायी होते थे। हर प्रान्त में न्याय, कर संग्रह और सुरक्षा व्यवस्था को संभालने के लिए उप प्रशासक नियुक्त किये गये।

सम्राट ने राज मार्गो और संचार के साधनों को इस तरह से विकसित किया कि केंद्र और प्रांतों के बीच सम्पर्क सरल और प्रभावी हो गया।

न्याय को उन्होंने शासन की आत्मा माना। उनके शिलालेखों में न्यायिक प्रक्रिया की स्पष्ट झलक मिलती है। अपराधियों को कठोर दंड दिए जाते थे। परन्तु पुनर्वास की भी व्यवस्था थी।

जनता की शिकायतें सीधे सम्राट तक पहुंचे इसके लिये एक विशेष तंत्र स्थापित किया गया। उन्होंने गुप्तचरों की एक मजबूत प्रणाली तैयार की। जो केवल सुरक्षा नहीं बल्कि प्रशासन और न्याय व्यवस्था की निगरानी भी करते थे।

न्याय को उन्होंने अपनी शासन की आत्मा माना। अपराधियों को सजा दी जाती थी, लेकिन उनके पुनर्वास की भी व्यवस्था थी। जनता की शिकायतें सीधे उन तक पहुंचे, इसके लिए एक विशेष प्रणाली स्थापित की गई थी।

अशोक का सबसे प्रभावशाली पक्ष था उनका धर्म के प्रति दृष्टिकोण। उन्होंने जिस 'धम्म' नीति को अपनाया, वह केवल बौद्ध धर्म का प्रचार नहीं था, बल्कि एक नैतिक जीवन शैली, सहिष्णुता और समाज सेवा का संदेश भी था। उन्होंने अपने अभिलेखों में यह स्पष्ट किया कि धर्म का मतलब सिर्फ़ पूजा-पाठ नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति करुणा और सहयोग है।


मगध का सिंह

मगध का पहला राज वंश था हर्यक वंश। इस वंश के पहले राजा का नाम था बिम्बीसार था। बिम्बीसार की राजधानी थी राजगीर। यहां केवल राजपरिवार के लोग रहते थे। इसलिए इस जगह का नाम राजगृह था। यह चारों ओर से पहाड़ों से धिरी जगह होने से राजा के रहने के लिए बहुत सुरक्षित स्थान था। बिम्बीसार बहुत कुटिल राजा था। 


यह अपने राज्य का विस्तार करना चाहता था। बिम्बिसार ने वैशाली पर हमला किया था। उसी समय उज्जैनी अवन्ति जनपद के राजा थे चन्द्र प्रद्योत। उन्हें बहुत खतरनाक बीमारी पीलिया हो गया था। 


राजा का इलाज कर रहे वैद्य का मत था कि यह बीमारी लाइलाज है। ठीक नहीं हो सकती है। जब बिम्बिसार को यह समाचार मिला तो उन्होंने अपने वैद्य जीवक को चन्द्र प्रद्योत का इलाज करने के लिए भेजा था। 


जीवक के इलाज से चन्द्र प्रद्योत का रोग ठीक हो गया था। तब चन्द्र प्रद्योत ने  बिम्बिसार की अधीनता स्वीकार कर ली। इस कारण मगध का विस्तार अवंतिका जनपद तक हो गया था। तब से उज्जैन का अवन्ति जनपद मगध जनपद के अधीन था। बिंबिसार का पुत्र था अजातशत्रु। बिम्बिसार के बाद वह गद्दी पर बैठा था।


कहानी शुरू होती है ईसा पूर्व 326 में। जब पूरी दुनिया को जीतने का सपना ले कर अलेक्जेण्डर मेसेडोनिया से व्यास नदी के किनारे तक पहुंचा। मगध के शासक नन्द वंश के खौफ के कारण उसकी सेना ने आगे जाने से इंकार कर दिया। 


नतीजतन अलेक्जेण्डर वापस लौट गया। अलेक्जेण्डर भारत में बहुत कुछ हासिल नहीं कर सका लेकिन भारत के उत्तर पश्चिम के राजनीतिक ताने बाने को नष्ट कर दिया। 


मगध के राजा कालाशोक के दस पुत्र थे, जिन्होंने उनकी मृत्यु के बाद बाईस वर्षों तक राज्य पर न्यायपूर्वक शासन किया। उनके बाद नौ अन्य भाई, नंद, राज्य में आए, जिन्होंने भी वरिष्ठता के क्रम में बाईस वर्षों तक राज्य पर शासन किया।


चाणक्य नामक एक ब्राह्मण, जिसने नौ भाइयों में से अंतिम जीवित बचे घनानंद के प्रति अदम्य घृणा की थी, ने उस राजा को मार डाला और मौर्य वंश के एक सदस्य चंद्रगुप्त को सिंहासन पर बैठाया


जिसका फायदा उठा कर चन्द्र गुप्त मौर्य ने ईसा पूर्व 320 नन्द वंश को समाप्त कर पाटलिपुत्र पर अधिकार कर मगध में मौर्य साम्राज्य को स्थापित किया। इस वंश की स्थापना की थी चाणक्य की रणनीति और चन्द्र गुप्त मौर्य की तलवार ने। 


जब सिकंदर भारत की सीमाओं से लौट रहा था तब एक नया सूर्य मौर्य साम्राज्य का उगा रहा था। चन्द्र गुप्त ने एक विशाल साम्राज्य की नींव रखी। जो पश्चिम में अफगानिस्तान से ले कर पूर्व में बंगाल तक फैला था। जिसने पूरे भारत पर शासन किया और चौबीस वर्षों तक गौरवशाली शासन किया। 


दिग निकाय का कहना है कि पीपली के लोग क्षत्रिय कुल के थे। और मौर्य नाम से जाने जाते थे। बौद्ध परम्परा के अनुसार मौर्य का सम्बन्ध मोर से है। जहां लोग अपने घरों की छतें  मोर के पंख से बनवाते थे। 


इसी कारण मौर्य कहलाते थे। नन्दगढ़ तथा सांची के स्तूप पर अशोक ने मोर की छवि अंकित करवाई थी। लेकिन वह अपने नाम के साथ मौर्य का उपयोग नहीं करते थे।


चन्द्र गुप्त के पुत्र हुये बिन्दुसार। जिन्हें कहा जाता था अमित्रघात। यानि शत्रुओं का संहारक। उन्होंने इस सम्राज्य को सहेजा और आगे बढ़ाया। उनके बाद उनके पुत्र बिंदुसार ने शासन किया, जिन्होंने अट्ठाईस वर्षों तक इस देश पर शासन किया।


एक कहानी थी चंपा की एक गरीब ब्राह्मण कन्या की, बिन्दुसार के बड़े पुत्र सुसीमा का जन्म हो चुका था। तभी चंपा वर्तमान भागलपुर के एक गरीब ब्राम्हण के घर एक बहुत सुन्दर कन्या का जन्म हुआ।

जिसे ज्योतिषियों ने बताया था कि वह 'चक्रवर्ती सम्राट' की मां बनेगी तथा उसकी कुण्डली में राजयोग लिखा है। वह गरीब ब्राह्मण आशा से भर कर पाटलिपुत्र गया।

वह ब्राह्मण अपनी बेटी को बिंदुसार के महल में छोड़ आया।  बिन्दुसार ने उस कन्या को स्वीकार किया तथा अन्य रानियों के साथ रनिवास में रखा। उस कन्या के आने से राजमहल की अन्य महिलाएं ईर्ष्या से भर गई। महल की अन्य रानियों ने ईर्ष्या में उसे नाई का काम सौंप दिया।

वह कन्या नाई  के काम में निपुण बनाकर  दासी के रूप में राजा की सेवा करने लगी। परन्तु जब भी कन्या राजा के केशों का रखरखाव करती और जब भी वह राजा के बाल बनाती, राजा को गहरी शांति मिलती।

प्रसन्न हो कर राजा ने कन्या से खुश हो कर कहाअपनी सेवा के बदले कोई भी मनचाहा वरदान मांगो।

कन्या ने राजा से विवाह करने का वरदान मांगा। समय आने पर राजा ने उससे विवाह किया।

महाराजा बिंदुसार ने उसे अपनी रानी बनाया। उसका नाम शुभांगी था। वह साधारण सी कन्या रानी शुभांगी बन गई, जिसे 'धर्म' के नाम से भी जाना जाता था। इसी कारण अशोक के शिलालेखों में अशोक का नाम धर्म शोक मिलता है।

ईसा पूर्व 304 में शुभांगी ने एक पुत्र को जन्म दिया। पीड़ा से भरी माँ ने कहा, "अब मैं शोक रहित हूँ।" और इस तरह, बालक का नाम अशोक पड़ा। अशोक का जन्म पाटलिपुत्र में भारत के सबसे शक्तिशाली राजवंश मौर्य वंश में हुआ था। चन्द्र गुप्त मौर्य के बेटे बिंदुसार के दूसरे पुत्र थे अशोक   

 

शुभांगी ने बाद में एक और पुत्र को जन्म दिया , उस बालक को विट अशोक या तिष्य नाम दिया था। यह अशोक का सगा छोटा भाई था। लेकिन वह विट अशोक के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ।

बचपन से ही अशोक तेजस्वी, बुद्धिमान तथा साहसी थे। अशोक ने बहुत काम उम्र में शास्त्रों तथा अस्त्रों में दक्षता प्राप्त कर ली थी। मौर्य परिवार में युवराजों को बहुत कठोर शिक्षा दी जाती थी। 

अशोक ने तलवारबाजी, धनुर्विद्या और युद्ध की रणनीतियाँ सीखीं। उन्हें राजनीति और कूटनीति में चाणक्य के अर्थशास्त्र और न्याय सूत्रों का ज्ञान दिया गया।

वह संस्कृत, प्राकृत और यूनानी भाषा से परिचित था। मौर्य साम्राज्य में यवनों का प्रभाव तथा। उसके गुरुओं ने एक बात उसके मन में बैठा दी थी "राजा का पहला धर्म न्याय है, भय नहीं।


यह बात उस राजकुमार के लिए एक चेतावनी थी, जो बाद में 'चंड अशोक' कहलाया। लेकिन समय ने दिखाया अशोक ने पहले भय और बाद में न्याय को अपनाया। मगध में अशोक की कहानियां उनके बचपन से ही प्रसिद्ध थी।

पर असली कहानी तो बिंदुसार के बाद शुरू हुई। पाली ग्रंथों के अनुसार महाराजा विन्दुसार की सोलह रानियां थी। जिनसे 101 पुत्र हुए, पर मगध का सिंहासन केवल एक को ही मिलना था। लेकिन मुख्य नाम चार थे सुमन, सुसीम, विट अशोक और अशोक। उनमें सुमन कुमार या सुसीमा सबसे बड़ा था और अशोक दूसरे नम्बर पर था

राजमहल में एक गहरा षड्यंत्र पल रहा था। सुसीम सबसे बड़ा था और राजा बनने का अधिकारी माना जाता था। लेकिन वह बहुत धमंडी तथा क्रूर था। अशोक उसके विपरीत था सख्त लेकिन न्याय प्रिय। जिसे सभी राज्याधिकारी पसंद करते थे। लेकिन नियति की चाल कुछ और ही थी।


कुछ समय बाद महाराजा बिन्दुसार को यह जानने की अभिलाषा हुई कि कौन राजकुमार उपयुक्त तथा होशियार है। जो कुशल राजा सिद्ध होगा। 


पिंगल वत्स जीव नाम के सिद्ध पुरुष को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई। सारे राजकुमारों को स्वर्ण बगीचे में एकत्रित किया गया। 


बिन्दुसार को अशोक कुछ ख़ास पसन्द नहीं थे। उनकी त्वचा और रंग राजकुमारों जैसा खूबसूरत नहीं था। जब अशोक स्वर्ण बगीचे की और जा रहा था तभी रास्ते में प्रधानमंत्री का पुत्र राधा गुप्त मिला।

राधा गुप्त ने अशोक को अपना राजशाही हाथी प्रस्तुत किया। अशोक उस गज की शान से सवारी करता वहां पहुंचा।

बिन्दुसार ने पिंगल वत्स जीव से कहा महाराज इन राजकुमारों का परीक्षण कर कृपया मुझे बताएं कि मेरी मृत्यु के बाद कौन उपयुक्त राजा सिद्ध होगा। 


पिंगल वत्स जीव ने सब राजकुमारों को देखा और पाया कि अशोक ही सम्राट बनने के योग्य है। 


परन्तु बिन्दुसार अशोक को ज्यादा पसंद नहीं करते थे। तब पिंगल वत्स जीव ने सोचा कि यदि मैं यह बात राजा को बताऊंगा तो वह जरूर मुझे ही मार डालेगा। उसने कहा मैं अपनी भविष्यवाणी करुगा परन्तु बिना नाम लिए। 


पिंगल वत्स जीव ने कहा राजा वही बनेगा जिसकी सवारी सबसे शानदार थी। सभी राजकुमारों को लगा कि उनकी सबसे शानदार सवारी है। लेकिन अशोक ने सोचा मैं तो गजराज की सवारी करके आया हूँ। मेरी शानदार सवारी है। 


इसके बाद बिन्दुसार ने कहा महाराज और परीक्षण करके देखे। पिंगल वत्स जीव ने और परीक्षण किया और बिना नाम लिए इशारा अशोक की ओर किया। 


इसके उपरांत पिंगल वत्स जीव अशोक की माता का सत्कार करने लगा। पिंगल वत्स जीव राजा के सवालों से बचने के लिए दूर प्रान्त में जाकर बस गया।  



तक्षशिला का विद्रोह

जब अशोक किशोर से युवा हुए तब उनके पिता ने उन्हें तक्षशिला भेजा एक ऐसा इलाका जो बार-बार विद्रोह करता था। यह एक ख़तरनाक परीक्षा थी। क्या बिंदुसार उसे उसकी योग्यता परखने भेज रहे थे, या सुसीम के कहने पर उसे रास्ते से हटा रहे थे?


यह विद्रोह इतना उग्र था कि इसे रोकने के लिए एक सेना की ज़रूरत थी। लेकिन अशोक ने कुछ ऐसा किया, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। उसने बिना खून बहाए, शांति और न्याय से लोगों का दिल जीता। वह बागी सरकारों से मिला, उनकी शिकायतें सुनीं और उन्हें न्याय दिलाया।

केवल अठारह साल की उम्र में, अशोक ने केवल तक्षशिला के विद्रोह को शांत किया, बल्कि लोगों के दिलों में अपना सम्मान भी बनाया। इस घटना ने उसे सत्ता का असली स्वाद चखाया वह स्वाद, जो तलवार की धार से नहीं, बल्कि बुद्धि और कूटनीति से आता है। यहां अशोक ने साहस संगठन और न्याय प्रियता का परिचय दिया।

विदिशा का रहस्य

तक्षशिला की सफलता के बाद, अशोक को उज्जैन का उप-राजा बनाया गया। यह उसके गुणों का इनाम था, लेकिन साथ ही एक और परीक्षा भी। वह जानते थे कि राजमहल में हर कोई उनकी बढ़ती शक्ति से ईर्ष्या करता है।

कहा जाता है कि अशोक देखने में आकर्षक नहीं थे, पर उनके गुण उनके रूप से कहीं ज़्यादा महान थे। उनकी यही विशेषताएँ उन्हें अपने भाइयों से अलग करती थीं। उज्जैन जाते समय, उन्होंने विदिशा नगर में पड़ाव डाला।

एक ज़माने में इस छोटे से शहर का भारत की राजनीति में बहुत महत्व था... हाँ, लेकिन यह भारत हमारी 21वीं सदी का भारत नहीं है... यह सम्राट अशोक के समय का भारत है... शुंग, सातवाहन और गुप्त शासन के शुरुआती दौर में विदिशा व्यापार और वाणिज्य का मुख्य केंद्र था।

इस जगह के नामकरण के पीछे एक प्रेम कहानी है। इस जगह का मूल नाम बेसनगर था। स्थानीय लोगों के अनुसार, राज्य की प्रमुख नदियों में से एक बेतवा नदी को स्थानीय रूप से बेस कहा जाता था।

चूँकि यह शहर नदी के किनारे बसा था, इसलिए इसे बेसनगर के नाम से जाना जाता था। कालिदास के मेघदूत में बेसनगर शहर का उल्लेख मिलता है।

यह एक छोटा-सा विश्राम था, पर नियति का एक और खेल शुरू होने वाला था। उज्जैन का रास्ता विदिशा से होकर जाता था, और इस शहर में अशोक का इंतजार एक ऐसा रहस्य कर रहा था, जो हमेशा के लिए उसके जीवन की दिशा बदल देगा।

गंगा के मैदानों से बहुत दूर, नर्मदा नदी के तट पर बसा विदिशा एक शांत और समृद्ध नगर था। यह नगर अपने व्यापार मार्गों, रेशम, मसालों और पत्थरों के व्यापार के लिए जाना जाता था।

सूर्य की सुनहरी किरणें बेतवा नदी के शांत जल पर नाच रही थीं, जबकि व्यापारी अपनी बैलगाड़ियों पर माल लाद रहे थे और दूर-दराज के जनपदों के कारीगर अपने शिल्प को प्रदर्शित कर रहे थे।

विदिशा उस समय एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र होने के साथ-साथ बौद्ध धर्म का भी एक प्रमुख केंद्र था। यहाँ कई विहार और मठ थे, जहाँ भिक्षु और भिक्षुणियों अपनी साधना में लीन रहते थे।

इसी शांतिपूर्ण वातावरण में, एक तूफानी व्यक्तित्व वाले राजकुमार का आगमन हुआ। 18 वर्ष की आयु के राजकुमार अशोक, जिनके बारे में कहा जाता था कि वे अपने पिता सम्राट बिंदुसार के सभी पुत्रों में सबसे क्रूर और उग्र थे। बिंदुसार ने उन्हें उज्जैन प्रांत में हो रहे विद्रोह को दबाने के लिए भेजा था।

अशोक का रथ विदिशा के मुख्य द्वार से होते हुए नगर में प्रवेश किया। उनका मन विद्रोह की योजनाएँ बनाने में लगा था, लेकिन नगर की शांति और बेतवा के तट पर बहती हवा ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया।

एक शाम, जब अशोक अपने सैनिकों के साथ नगर के बाजार में घूम रहे थे, उनकी आँखें एक युवती पर पड़ीं। वह अपनी दासी के साथ घूम रही थी। वह देखने में साधारण थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी करुणा थी, जो अशोक ने पहले कभी किसी में नहीं देखी थी।

जब युवती ने एक गरीब बच्चे को अपनी दासी से डांट खाते देखा, तो वह अचानक रुक गई और उस बच्चे को प्यार से गले लगा लिया। अशोक ने युवती की आँखों में क्रोध और क्रूरता के बदले दया देखी।
अशोक, जो हमेशा युद्ध और संघर्ष में रहते थे, देवी की दयालुता और शांत स्वभाव से तुरंत आकर्षित हो गए। वह किसी भी हाल में उनसे बात करना चाहते थे। पहली नजर में ही उन्हें प्यार हो गया और फिर अशोक ने महादेवी शाक्य कुमारी जो परम सुन्दर थी से मेलजोल बढ़ाना शुरू कर दिया।

"क्या आप एक राजकुमार को इतनी आसानी से माफ कर देंगी?" अशोक ने देवी के पास जाकर धीमी आवाज़ में पूछा।

देवी ने अशोक की ओर देखा और मुस्कुराते हुए कहा, "एक व्यक्ति का मन कितना भी कठोर क्यों हो, उसमें दया का बीज हमेशा छिपा रहता है। मुझे नहीं लगता कि राजकुमार के लिए किसी माफी की ज़रूरत है।"

उनकी बातें सुनकर अशोक चकित रह गए। उन्होंने अपने जीवन में कभी किसी को इतनी सहजता और विश्वास के साथ बोलते हुए नहीं देखा था।

अशोक, जो अपने युद्ध कौशल के लिए जाने जाते थे, एक साधारण-सी युवती की सादगी और सुंदरता के आगे हार गए थे।
कम ही लोग जानते हैं कि पूरी दुनिया को अपनी बहादुरी से जीतने वाले सम्राट अशोक भी एक बार हार गए। यह कोई युद्ध नहीं था, लेकिन वे प्यार में एक युवती से हार गए थे।

प्रेम की शर्त

अशोक को पता चला कि उसका नाम देवी था, देवी एक व्यापारी की पुत्री हैं और बौद्ध धर्म में गहरी आस्था रखती हैं। अशोक ने उनके पिता से विवाह के लिए उनकी अनुमति मांगी। देवी के पिता, भिक्षुओं और अपने बच्चों से बहुत प्रेम करते थे। अशोक उनके स्वभाव से बहुत खुश थे और उन्होंने तुरंत विवाह के लिए कहा।

लेकिन देवी ने उस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। एक राजकुमार के लिए यह एक बड़ा सदमा था। वह अपने अहंकार से टूट गए।

"मुझे विवाह के लिए मना करने की आपकी हिम्मत कैसे हुई?" अशोक ने उनसे पूछा।

देवी ने शांति से उत्तर दिया, "राजकुमार, आपके पास साहस है, शक्ति है, लेकिन दया नहीं है। आप मेरे धर्म के प्रति क्रूर और असहिष्णु हैं।"

अशोक ने क्रोध में कहा, "तो तुम मुझसे क्या चाहती हो, देवी?"

देवी ने कहा, "यदि आप बिना किसी युद्ध के और बिना एक भी सैनिक को घायल किए, उज्जैन के विद्रोह को दबा दें, तो मैं आपसे विवाह कर लूँगी।"

अशोक ने हाँ कह दिया।

"ठीक है, देवी। मैं तुम्हारी चुनौती स्वीकार करता हूँ।"

 
उज्जैन का विद्रोह

अशोक ने उज्जैन में अपनी योजना पर काम किया। उन्होंने विद्रोहियों के सरदारों को गुप्त रूप से बुलाया और उनसे बातचीत की। उन्होंने उन्हें समझाया कि हिंसा से केवल विनाश ही होगा।

अशोक ने उन्हें शांतिपूर्ण समाधान का प्रस्ताव दिया और उन्हें उज्जैन के लोगों की भलाई के लिए काम करने के लिए मना लिया। उन्होंने अपनी बात रखी और शांतिपूर्वक विद्रोह को दबा दिया।

लेकिन जब वह वापस लौट रहे थे, तो उनके ईर्ष्यालु सौतेले भाई सुसीम के भेजे गए हत्यारों ने उन पर हमला कर दिया। अशोक गंभीर रूप से घायल हो गए और उन्हें पास के एक बौद्ध मठ में ले जाया गया। जहाँ बौद्ध भिक्षुओं और, सबसे महत्वपूर्ण रूप से, देवी द्वारा उनकी देखभाल की गई। वहाँ, देवी ने एक भिक्षु की तरह अशोक की सेवा की।

देवी ने उनकी मरहम-पट्टी की और उनके साथ रहकर उनकी देखभाल की। इस दौरान, अशोक ने देवी की दयालुता और बौद्ध भिक्षुओं के शांत जीवन को करीब से देखा। अशोक की आँखों में जो गुस्सा थावह अब धीरे-धीरे कम होता जा रहा था।

एक रात, जब वह ठीक हो गए, तो उन्होंने देवी से कहा, "तुमने मुझे जीवनदान दिया है, देवी। मेरे दिल में अब शांति है।"

देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं सिर्फ़ एक माध्यम थी। असली परिवर्तन आपके भीतर से आया है।"

उस समय, अशोक ने पहली बार महसूस किया कि युद्ध और हिंसा ही सब कुछ नहीं है।


दो हृदय


अपने स्वास्थ्य लाभ के बाद, अशोक ने देवी के साथ रहने और उनसे विवाह करने का फैसला किया। अशोक के प्रेम प्रस्ताव पर देवी ने उनसे विवाह कर लिया, लेकिन उन्होंने अपने पति अशोक से आजीवन विदिशा में ही रहने का वचन ले लिया। 

अशोक ने उनकी भावनाओं का सम्मान करते हुए वचन दिया और दोनों ने उसे निभाया भी। उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उनका यह वादा उनके जीवन के सबसे बड़े संघर्ष का कारण बन जाएगा।


इस दौरान, देवी की देखभाल और बौद्ध भिक्षुओं की शिक्षाओं का उन पर गहरा प्रभाव पड़ा। कहा जाता है कि इस अनुभव और देवी के प्रति उनके प्रेम ने शांति और अहिंसा के बीज बोए, जिन्हें उन्होंने बाद में अपनाया। उन्होंने उनसे प्रेम किया, और देवी ने उनके परिवर्तित हृदय को देखकर अंततः उनके प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।


दोनों ने एक सादे समारोह में विवाह कर लिया। यह एक राजसी विवाह नहीं था, लेकिन उनके प्रेम के लिए यह पर्याप्त था। यह विवाह राजनीतिक भी नहीं था, बल्कि अशोक के भीतर छिपे एक संवेदनशील इंसान की निशानी था। 


इतिहास के पन्ने इस बात को नकारते हैं कि कोई महान सम्राट किसी आम व्यापारी की बेटी से विवाह करेगा, पर प्रेम की कोई राजनीति नहीं होती।

देवी कभी पाटलिपुत्र नहीं गई। बाद में अशोक सम्राट बन गए, लेकिन देवी ने अपना वचन नहीं तोड़ा, सम्राट की रानी होते हुए भी उन्होंने विदिशा में ही पूरा जीवन बिताया था।

देवी, जो खुद बौद्ध धर्म को मानती थीं, अशोक उन्हें उज्जैन ले गये उज्जैन में रहते हुए अशोक को बौद्ध विचारों में गहरी रुचि होने लगी थी। यह एक बीज था, जो बाद में एक विशाल वटवृक्ष बनने वाला था।

अगले कुछ वर्षों में, देवी ने महेंद्र और संघमित्रा को जन्म दिया। दोनों बच्चे विदिशा में पले-बढ़े, जहाँ उनकी माता ने उन्हें बौद्ध धर्म के सिद्धांतों और मूल्यों से परिचित कराया। देवी ने उन्हें करुणा, अहिंसा और प्रेम का महत्व सिखाया।

राजमहल और दूरी

सम्राट बिंदुसार की मृत्यु के बाद, अशोक को मौर्य साम्राज्य का नया सम्राट बनने के लिए पाटलिपुत्र वापस बुलाया गया। यह उनके और देवी के लिए एक कठिन क्षण था।

देवी एक सामान्य महिला थीं, इसलिए उन्हें पाटलिपुत्र में रानी के रूप में जाना उचित नहीं था। राजनीतिक रूप से, अशोक को एक शाही राजकुमारी से विवाह करना था।

अशोक ने देवी से कहा, "मुझे तुम्हें छोड़ना नहीं चाहिए, देवी। लेकिन मेरी नियति मुझे वापस बुला रही है।"

देवी ने नम आँखों से कहा, "हमारा प्रेम दूर से भी उतना ही मजबूत रहेगा, सम्राट। मैं यहाँ हमारे बच्चों को आपकी विरासत के लिए तैयार करूंगी।"


एक गैर-राजकीय मिलन अशोक और देवी विवाहित थे, लेकिन चूँकि वह एक सामान्य महिला थीं और किसी शाही परिवार की राजकुमारी नहीं थी, इसलिए उन्हें पाटलिपुत्र की शाही राजधानी में उनकी मुख्य रानी के रूप में जाने की अनुमति नहीं थी। 


अशोक पाटलिपुत्र गए, जहाँ उन्होंने राजकुमारी असंधिमित्रा से विवाह किया। देवी का पाटलिपुत्र बाद में जाना राजकुमारी असंधिमित्रा से अशोक के विवाह के विपरीत था, जो अशोक की मुख्य रानी बनीं। लेकिन अशोक का मन हमेशा देवी और उनके बच्चों के साथ विदिशा में ही रहा।


देवी विदिशा में ही रहीं, जहाँ उन्होंने अपने दोनों बच्चों, महेंद्र और संघमित्रा, का पालन-पोषण किया और उनमें बौद्ध धर्म के मूल्यों का संचार किया।

देवी के बच्चों पर अशोक की विरासत और अशोक के प्रभाव से अधिक देवी का प्रभाव बहुत गहरा था। देवी को अशोक की बौद्ध धर्म में रुचि को प्रोत्साहित करने और विदिशा के निकट साँची में प्रसिद्ध स्तूपों के निर्माण के लिए स्थल के रूप में चुनने में उनकी भूमिका का श्रेय दिया जाता है। 


साँची स्तूप को देवी के प्रति उनके प्रेम और उनकी धार्मिक मान्यताओं के प्रति उनके सम्मान का प्रमाण माना जाता है। 


कलिंग युद्ध के बाद, अशोक का बौद्ध धर्म में पूर्ण रूपांतरण एक महत्वपूर्ण क्षण था, लेकिन इस परिवर्तन की नींव विदिशा में देवी के साथ बिताए समय के दौरान रखी गई थी। उनके बच्चे, महेंद्र और संघमित्रा, आगे चलकर प्रमुख बौद्ध मिशनरी बने और श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।


देवी और अशोक की प्रेम कहानी को अक्सर सम्राट के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में उद्धृत किया जाता है, जो एक शक्तिशाली और शुरू में क्रूर शासक पर एक शांत, दयालु व्यक्ति के प्रभाव को उजागर करती है।


महेंद्र और संघमित्रा की माता देवी ने उन्हें बचपन से ही बौद्ध मूल्यों से परिचित कराकर भिक्षु बनने के लिए प्रेरित किया और अपने पति अशोक के बौद्ध धर्म अपनाने के बाद उन्हें बौद्ध धर्म के लिए अपना जीवन समर्पित करने के लिए प्रेरित किया। 


हालाँकि अशोक ने उन्हें धर्म का प्रचार करने के लिए श्रीलंका भेजा था, लेकिन देवी द्वारा प्रदान की गई बौद्ध शिक्षाओं और पालन-पोषण की नींव ने ही उन्हें भिक्षु और उपदेशक बनने के लिए प्रेरित किया।


देवी की भूमिका महेंद्र और संघमित्रा दो भावी मिशनरियों की माँ, अशोक की पहली पत्नी और बौद्ध धर्म के प्रसार के रूप में थी। बौद्ध पालन-पोषण श्रीलंकाई बौद्ध इतिहास के अनुसार, देवी स्वयं बौद्ध थीं। इस धार्मिक वातावरण ने संभवत उनके बच्चों में बौद्ध धर्म के प्रति गहरी रुचि पैदा की।


विदिशा में रहकर, देवी ने अपने बच्चों को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी। उन्होंने उन्हें जीवन में एक उद्देश्य खोजने के लिए प्रोत्साहित किया। महेंद्र और संघमित्रा बड़े हुए और उन्होंने अपनी माता के प्रभाव से बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।


बौद्ध धर्म के प्रति समर्पण की प्रेरणा महेंद्र और संघमित्रा दोनों अपने पिता के बौद्ध झुकाव से बहुत प्रभावित थे, लेकिन उनकी माँ के प्रभाव ने बौद्ध पथ के प्रति उनकी प्रतिबद्धता के लिए महत्वपूर्ण आधार प्रदान किया।

दूर से प्रभाव

जब अशोक ने कलिंग युद्ध में रक्तपात देखा, तो उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार करने का फैसला किया। इस निर्णय में उनकी पत्नी देवी का दूर से ही बहुत बड़ा प्रभाव था। यह देवी ही थीं, जिन्होंने अशोक के जीवन में शांति और करुणा के बीज बोए थे।

महेंद्र और संघमित्रा ने जीवन के सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी बनने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पिता से श्रीलंका में धर्म का प्रचार करने की अनुमति मांगी। अशोक ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और वे अपनी यात्रा पर निकल पड़े। वे श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले पहले व्यक्ति थे।

अशोक और देवी का प्रेम, हालांकि राजनीतिक मजबूरियों के कारण अधूरा था, लेकिन उनके बच्चों और अशोक के भविष्य पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। देवी के शांत स्वभाव और करुणा ने एक क्रूर योद्धा को महान सम्राट में बदल दिया। उनका प्रेम एक साम्राज्य से बढ़कर था और उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने बच्चों का बलिदान दिया।

महेंद्र, अशोक और देवी के ज्येष्ठ पुत्र थे, जिनका जन्म 285 ईसा पूर्व हुआ था। महेंद्र भारत से बाहर जाकर दक्षिण एशिया में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले पहले बौद्ध भिक्षु थे। उन्होंने श्रीलंका के राजा देवानांप्रिय तिस्सा को बौद्ध धर्म में परिवर्तित किया था। 


अशोक चाहते थे कि उनका प्रिय ज्येष्ठ पुत्र अगला सम्राट बने। लेकिन मंत्रियों और दरबारियों को यह पसंद नहीं था कि एक सामान्य पत्नी से उत्पन्न बौद्ध पुत्र अगला सम्राट बने। महेंद्र ने भी 21 वर्ष की आयु में अपनी बहन के साथ बौद्ध भिक्षु बनना स्वीकार कर लिया। महेंद्र का जीवन हमेशा राजनीतिक शत्रुओं से खतरे में रहता था। 


हालाँकि महेंद्र को कभी भी राजकुमार के रूप में विलासिता या अगला सम्राट या युवराज बनने में कोई रुचि नहीं थी, फिर भी दरबारी राजनीति ने यह सुनिश्चित कर दिया कि एक सामान्य माँ की संतान होने और बौद्ध होने के कारण उन्हें निशाना बनाया जाए। 


खैर, शत्रुओं को इसकी परवाह करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि महेंद्र भिक्षु बनने में रुचि रखते थे और कुछ वर्षों बाद श्रीलंका चले गए। उनकी मृत्यु 80 वर्ष की आयु में 205 ईसा पूर्व में श्रीलंका में ही हुई, ठीक उनकी बहन की तरह।


संघमित्रा का जन्म लगभग 282 ईसा पूर्व अशोक और देवी के यहाँ हुआ था। 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह अशोक के भतीजे अग्रिभमी से हुआ था। 18 वर्ष की आयु में वे अरिहंत तेरी भिक्षुणी बन गईं और बौद्ध धर्म का प्रचार करने श्रीलंका चली गई। 


उनका एक पुत्र सुमना था जिसने भी बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अरिहंत बन गया तथा अपने चाचा महेंद्र के साथ बौद्ध धर्म का प्रचार करने श्रीलंका चला गया। संघमित्रा ने श्रीलंका और अन्य देशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में मदद की। 


अशोक अपनी पुत्री से बहुत प्रेम करते थे और शुरू में उन्हें श्रीलंका जाने की अनुमति नहीं देना चाहते थे। लेकिन संघमित्रा ने हठ किया और फिर उन्होंने उन्हें अनुमति दे दी। 


लेकिन उन्होंने उनके साथ 10 अन्य पुजारिनों को भी भेजा। संघमित्रा 32 वर्ष की आयु में श्रीलंका चली गई और 202 ईसा पूर्व में 79 वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक वहीं रहीं। श्रीलंका में उनके द्वारा भिक्षुणी संघ की स्थापना की गई।


यह बहुत गर्व की बात है कि सम्राट के बड़े बच्चे होने के नाते, जो उनके उत्तराधिकारी बन सकते थे और अगले सम्राट या महारानी बन सकते थे, महेंद्र और संघमित्रा दोनों ने जीवन के सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर बौद्ध धर्म का प्रचार किया। 

यह इस बात का प्रमाण है कि उनकी माँ देवी ने उन्हें जीवन के शुरुआती वर्षों में कितनी महान शिक्षाएँ और पालन-पोषण दिया था। देवी का निधन 242 ईसा पूर्व में 58 वर्ष की आयु में उज्जैन में हुआ था।

सत्ता का खेल

इस बीच, पाटलिपुत्र में एक गहरा राजनीतिक षड्यंत्र चल रहा था। बिंदुसार की उम्र ढल रही थी, और दरबार में उत्तराधिकारी को लेकर साज़िशों का जाल बुना जा रहा था।

सुसीम, बड़ा पुत्र होने के नाते, स्वाभाविक उत्तराधिकारी था, पर अशोक, जो अपनी कुशलता साबित कर चुके थे, एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे।

सुसीम ने तक्षशिला के विद्रोह का फायदा उठाया, और अपने पिता से अशोक को वहाँ भेजने का षड्यंत्र रचा। अशोक सेना लेकर गए और विद्रोह को शांतिपूर्ण तरीके से दबा दिया। उनकी इस उपलब्धि ने सैनिकों और जनता का भरोसा जीत लिया।

अशोक की सफलताओं के बावजूद, मगध की गद्दी तक पहुँचना उनके लिए असंभव था। उनकी माँ, शुभांगी, एक साधारण परिवार से थीं, जबकि सुसीम की माँ एक राजघराने से थी।

बिंदुसार ने सुसीम को अपना उत्तराधिकारी चुना था। लेकिन जब सुसीम एक और गंभीर विद्रोह को शांत करने तक्षशिला गए थे, तभी बिंदुसार गंभीर रूप से बीमार पड़ गए।

यह अशोक के समर्थकों, खासकर उनके महामंत्री राधागुप्त, के लिए एक मौका था। उन्होंने बिंदुसार से अशोक को अस्थायी राजा घोषित करने का अनुरोध किया। कहते हैं कि यह सुनते ही बिंदुसार को मिर्गी का दौरा पड़ा और उनकी मृत्यु हो गई। पर क्या यह वाकई एक स्वाभाविक मृत्यु थी, या राधागुप्त की एक चाल?

जब सुसीम पाटलिपुत्र लौटे, तो उन्होंने पाया कि राजगद्दी पर अशोक का कब्जा हो चुका था। किले के मुख्य द्वार पर यूनान से लाए गए भाड़े के सैनिक पहरा दे रहे थे। यह एक रक्तरंजित संघर्ष की शुरुआत थी जो चार साल तक चला।

इस संघर्ष में अशोक ने अपने 99 सौतेले भाइयों का बर्बरतापूर्वक वध कर दिया, जिनमें से पहला शिकार सुसीम थे।

25 साल की उम्र में, 269 ईसा पूर्व में, अशोक का राज्याभिषेक हुआ। यह केवल एक राजतिलक नहीं था, बल्कि सत्ता के परिवर्तन का एक नाटकीय प्रतीक था। हाथी, वैदिक मंत्रों की गूंज और रत्नों से जड़े सिंहासन के साथ एक ऐसे राजा का जन्म हुआ, जो आने वाले वर्षों में एक अजेय योद्धा के रूप में और बाद में करुणा के प्रतीक के रूप में पहचाना जाने लगा।

चंड अशोक

सत्ता में आते ही अशोक के अत्याचारों की कहानी शुरू हो गई। प्रारंभिक वर्षों में उनका शासन कठोर और निरंकुश था। कर प्रणाली में सुधार लाया गया, गुप्तचर व्यवस्था को मजबूत किया गया। प्रजा उन्हें 'चंड अशोक' के नाम से जानने लगी। उनके निर्णय कठोर थे और दंड तुरंत दिया जाता था।

उन्होंने राजधानी में एक जेल का निर्माण करवाया, जिसे 'अशोक का नरक' कहा जाता था। वहां विद्रोहियों और अपराधियों को अमानवीय यातनाएं दी जाती थीं। उनके अपने समर्थक मंत्री भी इस बर्बरता से नाराज थे। अशोक ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना शुरू कर दिया।

लेकिन इस क्रूरता के पीछे एक कुशल प्रशासक और एक न्यायप्रिय राजा छिपा था। उनके दरबार में विद्वानों का एक समूह था जो उन्हें हर विषय पर सलाह देता था। उनके न्यायालय में न्याय का स्पष्ट विधान था। वह वैदिक ब्राह्मणों, जैन मुनियों और बौद्ध भिक्षुओं, सभी का सम्मान करते थे। उनके शासन में धर्म एक राजनीतिक हथियार बन चुका था।


दानव का जन्म

कलिंग के बाद, भले ही अशोक ने अपनी क्रूरता से किनारा कर लिया था, लेकिन उसके शासनकाल की शुरुआत में एक ऐसा दौर था, जब उसकी क्रूरता ने एक नया रूप लिया था।

अपने शुरुआती दिनों में, अशोक इतना क्रूर था कि उसने अपने 500 मंत्रियों को भी मार डाला था, जब उन्होंने उसके ख़िलाफ़ साज़िश की थी। इसी तरह उन्होंने अपनी कई रानियों को दूसरे लोगों से संसर्ग करने पर जिंदा जला दिया था।

सम्राट अशोक के बचपन के मित्र थे राधा गुप्त। सम्राट अशोक राधा गुप्त पर बहुत भरोसा किया करते थे। वह अपने हाथों से लोगों को दंड देता था, जिससे पूरे मगध में उसकी छवि एक दानव राजा की बन चुकी थी।

उनके बचपन के मित्र और महामंत्री राधागुप्त ने उन्हें सलाह दी, "महाराज, जब आप स्वयं दंड देते हैं, तो आपकी क्रूरता की चर्चा होती है। अपनी इस छवि को बदलने के लिए, किसी ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करें जो आपके आदेश पर मृत्युदंड दे।"

अशोक को यह बात पसंद आई, लेकिन एक शर्त थी। "मुझे कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए जो मुझसे भी ज्यादा क्रूर हो।"

सारे अधिकारियों ने अशोक की इस आज्ञा को सुना और एक ऐसे ही व्यक्ति की खोज करने लगे। उसी समय राजगीर की पहाड़ियों में बसा एक गांव था जिसमें एक जुलाहा रहा करता था। 


अधिकारियों ने खोज शुरू की। उस जुलाहे के घर में एक बच्चा पैदा हुआ जिसका नाम रखा गया गिरिका। गिरका बचपन से ही बड़े क्रूर स्वाभाव का था। उन्हें राजगीर की पहाड़ियों में एक गाँव में एक जुलाहा का बेटा मिला, जिसका नाम गिरिका था।

जब वह बच्चा छोटा था तब वह चीटियों तथा पतंगों को मार दिया करता था। जब दूसरे बच्चे उनके साथ खेलने में सुख का अनुभव करते वही गिरिका उन्हें मारने में सुख का अनुभव करता था।


मरता भी था तो सामन्य नहीं बल्कि उन्हें पीस डालता था। जब वह थोड़ा बड़ा हुआ तब वह पशु पक्षियों का शिकार करने लगा। परन्तु वह उनका शिकार शिकारी की तरह नहीं करता। बल्कि उन्हें बहुत क्रूरता तथा निर्दयता से मारता था कि लोग उसकी वीभत्सता को देख कर डर जाते। धीरे-धीरे पूरे गांव में वह गन्दा गिरिका के नाम से प्रसिद्ध हो गया। 

बड़ा होकर उसने कई गांव वालों और अपने भाइयों तक की हत्या कर दी थी। जब उसने हत्याऐं करना आरम्भ की तब उसकी चर्चा अधिकारियों तक पहुंची। लोग उसकी शिकायत ले कर अधिकारियों के पास गये। अधिकारियों को एक ऐसे ही क्रूर व्यक्ति की तलाश थी। वे लोग उसे खोजते हुए उस गांव में गए और गन्दा गिरिका से मिले।

गिरिका की कहानियां सुनकर अधिकारियों को लगा कि यह वह व्यक्ति है, जिसकी सम्राट को तलाश है।

गंदा गिरिका का चरित्र अशोक के भीतर की क्रूरता का ही एक भयावह प्रतिबिंब है। वह अशोक की उस अमानवीय प्रवृत्ति का मानवीय रूप था, जिसे अशोक खुद भी स्वीकार नहीं करना चाहते थे।

गिरिका एक जन्मजात मनोरोगी था। वह बिना किसी पछतावे या सहानुभूति के दूसरों को पीड़ा देकर आनंद महसूस करता था। उसकी क्रूरता का कोई बाहरी कारण नहीं था, यह उसके स्वभाव का हिस्सा था।

छोटे जानवरों को मारना, अपने माता-पिता की हत्या करना ये सब उसके भीतर की खालीपन और संवेदनहीनता को दर्शाते हैं। उसे मृत्युदंड देना एक नौकरी नहीं, बल्कि अपनी प्यास बुझाने का एक माध्यम था।

उसकी कहानियां सुनकर उन्होंने सोचा कि सम्राट ने जिस व्यक्ति की बात की थी वह यहीं है। उन्होंने उससे कहा तुम हमारे साथ सम्राट के पास चलो। तब गन्दा गिरिका ने पूछा कि मुझे क्या करना होगा। 


तब अधिकारियों के उसे बताया कि तुम्हें सम्राट की आज्ञा से लोगों को क्रूरता से मृत्यु दण्ड देना होगा। गन्दा गिरिका को यह काम पसंद था उसने कहा मैं अवश्य ही चलूंगा। पहले मैं अपने माता पिता से अनुमति ले कर आता हूँ। 


अधिकारियों ने कहा जल्दी आओ। तब वह वहां से चला गया परन्तु उसे आने में थोड़ी देर हो गई। तब अधिकारियों ने देरी का कारण पूछा तब उसने बताया कि जब मैं अपने माता पिता के पास गया तब उन्होंने मुझसे पूछा तुम क्या करने जा रहे हो तब मैने उन्हें बताया कि में राजा की आज्ञा से लोगों को मृत्यु दंड देने जा रहा हूँ।

लेकिन मेरे माता पिता को मेरी यह नौकरी पसंद नहीं आई। उन्होंने मना किया। फिर मैंने उन्हें चुप करा दिया। उसने लहू से सनी अपनी तलवार को अधिकारियों के सामने रख दिया।

जब गिरिका को सम्राट के पास लाया गया, तो उसने अपने माता-पिता की हत्या करके उनकी सहमति का सबूत दिया। अशोक ने उसकी जांच की और जब पूरी तरह आश्वस्त हो गए, तो उसे अपने क्रूरतम कार्यों के लिए नियुक्त कर दिया।

उसके इस क्रूर कर्म को सुनकर अधिकारियों के प्राण सिहिर गये। परन्तु उन्हें एक ऐसे ही व्यक्ति की तालाश थी वह उसे ले क्र अशोक के पास गये। जब अशोक ने उसकी कहानियों को सुना उसकी जाँच पड़ताल की और परीक्षा भी ले ली तब वह पूरी तरह निश्चिन्त हो गया। यह व्यक्ति मेरी तरह ही क्रूरता से लोगों को मृत्यु दण्ड दे देगा। इसीलिए अशोक ने उसे उस काम के लिए नियुक्त कर लिया।

गिरिका की नियुक्ति अशोक के लिए एक मनोवैज्ञानिक छल थी। राधागुप्त की सलाह मानकर उन्होंने सोचा कि वे अपनी क्रूरता को छिपा लेंगे। लेकिन गिरिका की वीभत्सता ने उनकी अपनी क्रूरता को और भी उजागर कर दिया।

जब गिरिका ने कहा कि लोग अब मृत्युदंड के लायक काम नहीं करते, तो अशोक ने उसके लिए एक ऐसा महल बनवाया जो खुद उनकी विकृत मानसिकता को दर्शाता था। गिरिका के माध्यम से अशोक अपनी क्रूरता को परोक्ष रूप से जी रहे थे।

परन्तु धीरे-धीरे पूरे साम्राज्य में अशोक तथा गन्दा गिरिका की क्रूरता के किस्से फैलने लगे थे। उनका खौफ इतना बाद गया कि लोगों ने कानून तोड़ना ही बंद कर दिया। धीरे-धीरे ऐसा हो गया कि अब लोग ऐसे काम नहीं कृते थे कि मृत्यु दण्ड के अधिकारी बने। 


गंदा गिरिका अशोक के सामने क्रूरता से मुस्कुराते हुए "सम्राट! मेरे हाथ खाली हैं। आपकी प्रजा इतनी आज्ञाकारी हो गई है कि कोई भी मृत्युदंड का अधिकारी नहीं है। मुझे शांति नहीं मिलती।"


यह देख कर गन्दा गिरका ने राजा से कहा कि आपने तो मुझे इस काम के लिए रखा था कि में लोगों को मृत्यु दंड दू। फिर अब लोग ऐसे काम करते ही नहीं है कि उन्हें मृत्यु दण्ड मिले। फिर में यहां अपने मन की संतुष्टि कैसे प्राप्त करू। 

सम्राट अशोक गहरी सोच में "शांति? तुम शांति चाहते हो, गिरिका? तुम तो रक्त के प्यासे हो। ठीक है। मैं तुम्हें एक ऐसा स्थान देता हूँ, जहाँ तुम अपनी प्यास बुझा सको।"



नरक महल

जल्द ही पूरे साम्राज्य में अशोक और गिरिका की क्रूरता के किस्से फैलने लगे। भय इतना बढ़ गया कि लोगों ने अपराध करना ही बंद कर दिया। गिरिका ने अशोक से शिकायत की, "महाराज, मुझे काम नहीं मिल रहा। लोग अब मृत्युदंड के लायक काम नहीं करते। मेरा मन अशांत है।"

अशोक ने जवाब दिया, "एक सुंदर महल बनवाओ। वह इतना आकर्षक हो कि कोई भी उसके भीतर प्रवेश करें, और जो एक बार अंदर जाए, वह फिर कभी बाहर निकले।"

और इस तरह, पाटलिपुत्र में एक ऐसा महल बना जो बाहर से स्वर्ग जैसा दिखता था, लेकिन अंदर एक नरक था। गिरिका ने वहाँ लोगों को तरह-तरह से क्रूरता से मारना शुरू कर दिया।

एक दिन वहां समुद्र नाम का श्रमण आया। पहले वह एक व्यापारी का पुत्र था और समुद्र यात्रा के दौरान इस बालक का जन्म हुआ था इसलिए उसका नाम समुद्र रखा गया था। जब वह बालक बारह वर्ष का हुआ तब एक दिन डाकुओं ने उसके जहाज पर आक्रमण कर दिया। उन्होंने सभी को मौत के घाट उतार दिया। बच गया केवल समुद्र। किनारे आने पर कुछ बौद्ध भिक्षुओं ने उसे देखा और बौद्ध मठ में ले गये। 


वह बढ़ वर्ष तक समुद्र में ही रहा था। उसने पृथ्वी पर बौद्ध मठ में ही अपनी आँखें खोलो थी इस कारण उस पर बौद्ध धर्म का प्रभाव हो गया। वह एक सन्यासी बन गया। वह निरंतर ही अपने मन को शुद्ध करता रहता एयर निर्वाण प्राप्ति का प्रयास करता था। 


एक दिन घूमते-घूमते वह पाटलिपुत्र नगर में आया। उसने वह सुन्दर महल देखा। उसकी सुंदरता से खींचा हुआ वह उस महल की तरफ चला गया। 

द्वार पर किसी को ना पाकर वह महल के अंदर प्रवेश कर गया। महल के अंदर उसने बहुत खूबसूरत तरह-तरह की चीजें देखी। उसे ऐसा आभास हो रहा था कि बाहर से सुन्दर दिखने वाला यह महल अंदर से क्यों नरक की तरह प्रतीत हो रहा है। 


वह इन्हीं विचारों के साथ महल घूम कर जब बहार आया तब वहां अपनी क्रूर मुस्कान के साथ गन्दा गिरका उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

गन्दा गिरका ने कहा अब कहा जाते हो तुम्हारी मृत्यु का समय गया है। अपने मरने की बात सुन कर वह श्रमण रोने लगा और बालकों की तरह जिद करने लगा। तब गन्दा गिरका ने कहा तुम बालकों की तरह क्यों रोते हो। तुम तो भिक्षु हो मरने से क्यों डरते हो। तब श्रमण ने कहा मुझे मृत्यु का डर नहीं है। मुझे इस बात का दर है कि मुझे बार-बार जन्म लेना पड़ेगा तथा बार-बार मरना पड़ेगा। मृत्यु मेरे निर्वाण में एक बाधा की तरह है। 


यदि मुझे कुछ और समय मिल जाता तो मैं इसी जन्म में निर्वाण को प्राप्त कर लेता। फिर में जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्त ही जाता। इसीलिए उसने उसे छोड़ देने की बात कहीं। परन्तु गिरका के मन में प्रेम था ही नहीं। उसमें करुणा की भावना थी ही नहीं। उसने कहा में तुम्हें नहीं छोड़ सकता हूँ। 


तब सन्यासी ने उससे एक माह का समय मांगा। तो गिरका ने उसे एक सप्ताह का समय दिया। वह भी तुम इस महल में मेरी आँखों के सामने बिताओं। इतने दिनों तक तुम्हें खाना पानी कुछ नहीं मिलेगा। 

उसने उसकी शर्तो को मान कर निर्वाण प्राप्ति के लिए लगातार रात दिन ध्यान करने लगा। इसी समय एक घटना घटी। महल में सम्राट की एक पत्नी पर एक राजकुमार मोहित हो गया। उन दोनों के प्यार के चर्चे महल में होने लगे। एक दिन वह आपत्तिजनक हालत में पकड़े गये। सम्राट अशोक ने अपने पुत्र तथा अपनी रानी को मृत्यु दण्ड दे दिया।

उन्हें मृत्यु दंड देने के लिए उसी गन्दा गिरका के महल में लाया गया। जहां पर गिरका उन्हें मरने के पहले एक लोहे पर लिटा देता है और अपना आरा तेज करने लगता है। ताकि आरे से चीर कर उन दोनों की हत्या कर सकें।

तब श्रमण ने यह दृश्य देखा। रानी और राजकुमार बहुत सुंदर थे। उनकी सुंदरता को देख कर उसके पाप को याद कर तथा उनके अंत को देख कर श्रमण का मन संसार से विरक्त हो गया। उसे एहसास हुआ कि यह सुंदरता, यह जीवन, सब क्षणभंगुर है।

वह सोचने लगा। इतनी सुंदरता का क्या अर्थ है? इस जीवन का क्या अर्थ है? जो दुखों से ही घिरा हुआ है और जिसकी संपत्ति निश्चित है। जो नित्य नहीं है। निरंतर नहीं है। यदि व्यक्ति निर्वाण प्राप्त करले तो फिर वह दुखों से मुक्त हो जाता है। इस तरह के प्रपंच में नहीं फंसता है।

इस तरह उस श्रमण को निर्वाण की प्राप्ति हो गई। इधर गिरका ने उन दोनों को मौत के घाट उतार दिया। अगले दिन सुबह गिरका ने श्रमण से कहा तुम्हारा अंतिम दिन बीत गया है यह नई सुबह है अब तुम मरने के लिए तैयार को जाओं। यह बात सुन कर श्रमण के चेहरे पर एक मुस्कान गई।

उसने कहा तुमने ठीक कहा रात बीत गई है नई सुबह आई है। तुम मुझे मरना चाहते हो तो मुझे मार लो मैं अपने जीवन को तुम्हें एक उपहार की तरह सौंपता हूँ। यह कहते हुए वह श्रमण मुस्कुराते हुए मृत्यु के लिए तैयार हो गया।


अग्नि परीक्षा

जब समुद्र को मारने का समय आया, तो गिरिका ने उसे एक खौलते हुए कड़ाहे में डाल दिया। गन्दा गिरका ने खून तथा मांस मज्जा से भरे एक कड़ाहे में उसे फैक दिया। उस कड़ाहे में बैठ कर वह सन्यासी मुस्करा रहा था। गिरका ने कड़ाहे के नीचे आग लगा दी। 


आग इतनी तेज थी कि उसमे लोहा भी पिघल जाता। लेकिन आश्चर्य कि उस आग का कड़ाहे तथा श्रमण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था। कड़ाहे के अंदर का पानी उसी तरह ठंडा था जैसे वह आग के जलाने के पहले रहा होगा।


लेकिन आश्चर्य! पानी ठंडा रहा और आग का उस पर कोई असर नहीं हुआ। गिरिका ने तुरंत अशोक को बुलाया। 


यह पहली बार था जब उन्होंने अपनी तलवार से बड़ी किसी शक्ति का अनुभव किया था। समुद्र ने अशोक को सिखाया कि सच्ची शक्ति भय में नहीं, बल्कि आध्यात्मिक स्थिरता में होती है। समुद्र को उबलते कड़ाहे में डालने के बाद भी, वह शांत थे। गिरिका और अशोक उन्हें देख रहे थे।


सम्राट अशोक आश्चर्यचकित होकर "हे भिक्षु! तुम कैसे जीवित हो? यह आग... यह तुम्हें जला क्यों नहीं रही?"


श्रमण समुद्र शांत मुस्कान के साथ "महाराज, जहाँ सत्य होता है, वहाँ आग भी जल नहीं पाती। आप अपनी क्रूरता का त्याग कर दीजिए। सत्य और करुणा ही सच्चा धर्म है।"

अशोक ने जब यह चमत्कार देखा, तो वह अभिभूत हो गए। उन्होंने समुद्र के चरणों में गिरकर माफी मांगी। समुद्र ने उनसे कहा, "महाराज, आप अपनी क्रूरता का त्याग कर दें और अहिंसा के मार्ग पर चलें।"

श्रमण समुद्र का चरित्र अशोक के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लेकर आता है। वे एक ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मृत्यु के डर को पार कर लिया था। समुद्र का जीवन संघर्षों से भरा था। अपने परिवार को खोने के बाद, उन्होंने जीवन के दुख को बहुत करीब से देखा था। 


यही दुख उन्हें निर्वाण की खोज की ओर ले गया। वे एक उच्च स्तर के आत्म-जागरूक व्यक्ति थे, जिन्हें यह समझ थी कि जीवन और मृत्यु केवल एक चक्र है।


समुद्र की निर्मलता और उनकी मुस्कान ने अशोक के भीतर एक गहरी हलचल पैदा कर दी। अशोक ने उन्हें मरने के लिए फेंका, लेकिन जब उन्होंने देखा कि आग भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती, तो वे भयभीत हो गए। यह घटना अशोक के लिए एक आध्यात्मिक जागरण थी।

जब अशोक महल से बाहर निकले, तो गिरिका ने उन्हें रोका और कहा, "महाराज, आपने मुझे आदेश दिया था कि इस महल से जो भी बाहर निकले, मैं उसकी हत्या कर दूँ।"

अशोक ने कहा, "इस महल में सबसे पहले कौन घुसा था?" "मैं घुसा था, महाराज," गिरिका ने जवाब दिया। "तो तुम भी तो बाहर आए हो," अशोक ने कहा और अपनी तलवार निकालकर गिरिका का सिर कलम कर दिया। यह अशोक की अपनी क्रूरता का अंतिम संस्कार था।

भविष्यवाणी

इस घटना बाद शंख वासिन ने उप गुप्त को नट वाटिका मठ में लाए और उन्हें भिक्षु जीवन से परिचित कराया। शंख वासिन ने उन्हें यह भी बताया कि भगवान बुद्ध ने इस बात की भविष्यवाणी आज से 100 वर्ष पूर्व की थी। यही उप गुप्त आगे चल कर सम्राट अशोक के गुरु बने। 


वासवदत्ता की मुक्ति के बाद, शंख वासिन उपगुप्त को नट वाटिका मठ ले गए। वहाँ उन्होंने उपगुप्त को बताया कि यह सब कुछ पहले ही तय था। आज से 100 साल पहले, स्वयं भगवान बुद्ध ने अपने शिष्य आनंद से कहा था,

"आनंद, मेरे परिनिर्वाण के 100 साल बाद, मथुरा में उपगुप्त का जन्म होगा। वह सभी शिष्यों में सर्वश्रेष्ठ होगा और विश्व का उद्धार करेगा।"

शंख वासिन ने उपगुप्त को बताया कि उनके पूर्व जन्मों की कहानी भी इस मठ और इस पर्वत से जुड़ी हुई है। उन्होंने उपगुप्त को उस वानर की कहानी सुनाई, जो अपनी टोली को छोड़कर 500 बुद्धों के पास गया था। जब उन बुद्धों ने अपने प्राण त्यागे, तो वानर ने उनके खाली शरीरों को देखकर जीवन की नश्वरता को समझा।

बाद में, जब उसने ऋषियों की तपस्या भंग की, तो ऋषियों ने उसी योग मुद्रा को अपनाया और ज्ञान प्राप्त किया। बुद्ध ने आनंद से कहा था कि वह वानर कोई और नहीं, उपगुप्त ही था, जिसने अपने पिछले जन्म में भी दूसरों के कल्याण के लिए काम किया था।

यह सब सुनकर उपगुप्त को अपनी नियति का बोध हुआ। वह समझ गए कि उनका जन्म किसी विशेष उद्देश्य के लिए हुआ है। और उसी समय, मगध में एक युवा सम्राट अपनी क्रूरता के चरम पर था, जिसका नाम था अशोक।


एक दिन बुद्ध ने आनंद से कहा हे आनद मेरे परिनिर्वाण के 100 वर्ष पश्चात एक गुप्त नमक इत्र के व्यापारी के आँगन में उप गुप्त का जन्म होगा। हे तिष्य यह उपगुप्त सारे विश्व में मेरे सभी शिष्यों से सर्वश्रेष्ठ होगा। हे आनंद देखो उस पर्वत को ओर। उसे ऊरु मंत्र पर्वत कहते है। 


मेरे परिनिर्वाण के पश्चात शंख वासिन नामक भिक्षु द्वारा एक मठ की स्थापना की जाएगी। इसी मठ में उपगुप्त अपने योग्य जीवन को प्रारम्भ करेंगे। इसके अलावा नट और भट नमक शिल्पकार उस मठ का निर्माण करेंगे। यह मठ नट वाटिका के नाम से प्रसिद्ध होगा। और मेरे सारे मठों में योग्य तथा सबसे उत्तम होगा।


इन बातों से प्रभावित हो कर आनंद ने कहा भगवान यह तो अति उत्तम है कि उप गुप्त अपने कर्मों और धर्म ज्ञान के प्रचार से इतने लोगों का उद्धार करेंगे। भगवान बुद्ध मुस्कुराये। उन्होंने कहा आनन्द यह पहली बार नहीं होगा। अपने पूर्व जन्म में भी उप गुप्त ने इसी भूमि पर कई लोगों के उपकार का काम किया था। 


भगवान बुद्ध आनन्द को आगे बताते है यह कई वर्षों पूर्व की बात है इस पर्वत की तीन ढलानों पर ऋषि, बुद्ध तथा वानर अपने काम में लगे हुए थे। एक दिन एक वानर अपनी टोली को छोड़ कर ढलान की उस ओर चला दिया जहां 500 बुद्ध अपने काम में लीन थे। 


उन बुद्धों को देख आकर उस वानर के मन में आस्था जागी। उस वानर ने उन्हें फल तथा फूल की भेंट चढ़ाई। और जब प्रत्येक बुद्ध ने योग मुद्रा धारण की तब वह वानर नौ सिखिया बुद्धों की टोली में जा कर बैठ गया। 


कुछ समय को योग मुद्रा के पश्चात प्रत्येक बुद्ध ने अपने प्राण त्याग दिए। और परिनिर्वाण प्राप्त किया। वानर को उनका शरीर तो दिखा परन्तु उस में आत्मा नहीं। वानर ने फल फूल की भेंट चढ़ाई परन्तु कोई भी शरीर अपने स्थान से नहीं हिला। वानर को कुछ समय उपरांत महसूस हुआ कि सारे प्रत्येक बुद्ध ने अपने प्राण त्याग दिए। 


गम से भरे वानर ने वह स्थान छोड़ दिया। वानर उसके बाद पहाड़ के उस ओर चला गया जहां ऋषि रहते थे। वानर ने देखा कुछ ऋषि अपने काँटों की सेज पर तपस्या कर रहे है। कुछ राख के विस्तार पर तो कुछ अपने हाथों को हवा में जोड़े खड़े है। तो कुछ अग्नि में लीन है। 


वानर ने उन ऋषियों की तपस्या को भंग करना शुरू कर दिया। जब सब ऋषियों की तपस्या भंग हो गई तब वह वानर खुद बुद्ध योग की मुद्रा बना कर वहां बैठ गया।  


जब यह बात ऋषियों ने अपने महर्षि को बताई तो उन्होंने सभी ऋषियों की उसी आसन को धारण करने की सलाह दी। उस आसन को धारण करने के उपरांत बिना किसी गुरु के 37 ज्ञान मार्गों के ज्ञान की प्राप्ति हुई। 


जब उस वानर का समय आया उसने अपने प्राण त्याग दिए। और परिनिर्वाण प्राप्त किया। उन ऋषियों ने आस्था से उस वानर के शरीर को सुगन्धित लकड़ियों की चिता पर जला दिया। 


गौतम बुद्ध कहते है हे आनद यह वानर उप गुप्त ही था। जो वानर समूह का मुखिया भी था उसने उस वानर शरीर का उपयोग करके उप गुप्त ने उद्धार के ही काम किये। और मेरे परिनिर्वाण के पश्चात उप गुप्त फिर भलाई के काम करेंगे इसी भूमि से।

अब, नियति के दो महान पात्र एक जिसने अपनी क्रूरता का त्याग कर दिया और दूसरा जिसने ज्ञान के मार्ग को चुना एक-दूसरे से मिलने वाले थे। लेकिन क्या अशोक, जो अपने क्रोध और हिंसा के लिए कुख्यात था, उपगुप्त के शांत और अहिंसक स्वभाव को स्वीकार करेगा? और कैसे उपगुप्त, एक साधारण भिक्षु, एक सम्राट को दीक्षा देगा?


उपगुप्त

भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण के वर्षों बाद, एक रहस्यमयी भिक्षु शंख वासिन, बिन्दु पर्वत पर नट वाटिका मठ में निवास कर रहे थे। उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से एक भविष्य देखा मथुरा में एक इत्र व्यापारी के घर में एक ऐसे बालक का जन्म होगा, जो समूचे विश्व को ज्ञान का मार्ग दिखाएगा। यह बालक कोई और नहीं, उपगुप्त थे।

शंख वासिन बिन्दु पर्वत पर नट वाटिका मठ का निर्माण कर निवास कर रहे थे। शंख वासिन ने एक दिन ध्यान लगा कर देखा कि एक इत्र व्यापारी के रूप में उप गुप्त का जन्म हो चुका है। परन्तु उप गुप्त का जन्म नहीं हुआ था। लेकिन वह गुप्त बौद्ध मार्ग पर चल पड़े थे। उनके घर बौद्ध भिक्षुओं का आना जाना था। 


एक दिन शंख वासिन भिक्षुओं के साथ उनके घर पर पहुंचें। उसके अगले दिन एक भिक्षु के साथ और उसके अगले दिन अकेले ही उसके घर पहुंचे।शंख वासिन को अकेले देख कर गुप्त ने पूछा महाराज आज आप अकेले। शंख वासिन ने कहा क्या उम्र के इस पड़ाव पर हमारे सेवक होने चाहिए या नहीं


अगर कोई हमारी आस्था को समझ कर हमारी सहज जिन्दगी में आयेगा वही सच्चा सेवक और धर्म का साथी होगा। गुप्त ने कहा महाराज मैं इस भोग विलास के जीवन में लिप्त हूँ और इससे बाहर नहीं सकता। 


परन्तु जब मेरा पुत्र होगा उसे मैं आप को समर्पित कर दूंगा। जैसी तुम्हारी इच्छा गुप्त शंख वासिन ने कहा। किन्तु समय आने पर अपनी प्रतिज्ञा भूल मत जाना। 


कुछ समय पश्चात गुप्त के आंगन में एक पुत्र का जन्म हुआ। उसे नाम मिला अश्रुत जब वह बड़ा हुआ तब शंख वासिन उसे बौद्ध धर्म की प्राप्ति और जीवन यापन के लिए पुकारने गए। उन्होंने गुप्त को उसका वचन याद करवाया। शंख वासिन, अपने शिष्यों के साथ इत्र व्यापारी गुप्त के घर पहुंचे। गुप्त ने, अपनी भक्ति से प्रभावित होकर, वचन दिया कि वह अपना पहला पुत्र उन्हें समर्पित कर देगा। लेकिन जब पहला पुत्र हुआ, तो गुप्त ने बहाना बना दिया।

परन्तु गुप्त ने गिड़गिड़ा हर कहा महाराज यह मेरा एक ही पुत्र है आप कृपया इस मेरे पास ही रहने दे। जब दूसरा पुत्र होगा तो उसे मैं आप को सौंप दूंगा। शंख वासिन ने बालक की और घ्यान से देखा उन्हें आभास हुआ कि यह बालक तो उपगुप्त नहीं है। 


वह वहां से चले गए। इसी प्रकार जब घन गुप्त की बारी आई तब गुप्त ने कहा बड़ा बेटा तो बाहर व्यापार करेगा। दूसरा बेटा घर की रक्षा करेगा।  गुप्त ने फिर से अपने वचन से मुंह मोड़ लिया।


जब उनका तीसरा पुत्र हुआ, जिसका नाम उपगुप्त रखा गया, तो गुप्त ने अपनी लाचारी दिखाते हुए कहा, "महाराज, मैं इस बालक को आपको दे दूंगा, लेकिन तभी, जब मेरे व्यापार में लाभ और हानि बराबर हो जाएँ।" शंख वासिन मुस्कुराए और लौट गए, क्योंकि वे जानते थे कि नियति अपना मार्ग ढूँढ ही लेती है।


वासवदत्ता

मथुरा की गलियों में वासवदत्ता का नाम किसी कोमल हवा की तरह तैरता था। उसकी सुंदरता, उसके नृत्य, और उसकी अदाएं... सब कुछ किसी कविता जैसा था। पर इन सबके बीच, उसके भीतर एक खालीपन था, जिसे वह धन और प्रशंसा से भरने की कोशिश करती थी। 


उसने अपने लिए इत्र लाने अपने सहायिका  को उस उप गुप्त के पास भेजा। जब वह सहायक वापस आए तब वासव दत्त को बहुत आश्चर्य हुआ। इत्र की मात्रा मोहरों के हिसाब से बहुत ज्यादा थी।

मथुरा में, एक प्रसिद्ध नर्तकी और कला-प्रेमी वासवदत्ता ने उपगुप्त के बारे में सुना। जब उसने सुना कि एक इत्र व्यापारी का पुत्र, उपगुप्त, धर्म के हिसाब से व्यापार करता है, तो उसके मन में आश्चर्य हुआ और एक जिज्ञासा जागी। यह कैसा व्यक्ति है, जो धन के इस संसार में भी धर्म का पालन करता है?


वासव दत्त के मन में गुप्त के लिए चाहत उमड़ पड़ी। क्योंकि सहायिका ने बताया कि उप गुप्त धर्म के हिसाब से व्यापार करता है। 


एक रात, उसने अपनी दासी को उपगुप्त के पास भेजा। वासवदत्ता अपनी सहायिका से "जाओ, उस इत्र व्यापारी के बेटे को मेरा बुलावा दो। कहो, मैं उससे मिलना चाहती हूँ। मेरा मन उसके लिए उत्सुक है।"


उस सहायिका के वासव दत्त की चाहत उप गुप्त को बताई तब गुप्त ने कहा कि अभी मिलने का सही समय नहीं है। सहायिका लौटकर आती है, उसके चेहरे पर निराशा का भाव था।

वासवदत्ता "क्या हुआ? वह क्यों नहीं आया?"

सहायिका "देवी, वह कहते हैं, 'मिलने का समय अभी सही नहीं है।' उनका स्वर शांत था, पर उनकी आँखों में एक अजीब सी दृढ़ता थी।"

वासवदत्ता का अभिमान चूर-चूर हो गया। उसे आज तक किसी ने ठुकराया नहीं था। उसके मन में उपगुप्त के लिए चाहत और गहरी हो गई, लेकिन यह चाहत प्रेम की नहीं, बल्कि अपने अभिमान को संतुष्ट करने की थी।

दासी ने लौटकर बताया कि उपगुप्त ने कहा है, "अभी आपसे मिलने का सही समय नहीं है।" वासवदत्ता ने इसे अपने रूप का अपमान समझा, लेकिन उसके मन में उपगुप्त के प्रति एक गहरा आकर्षण जाग उठा। वह जानना चाहती थी कि कौन है वह व्यक्ति, जिसे उसके सौंदर्य का कोई लालच नहीं।

कुछ समय उपरांत एक बड़े व्यापारी का पुत्र वासव दत्त के यहां ठहरा हुआ था। उसी समय एक छत्रिय जिसने उत्तर की दिशा में 500 घोड़े पकड़े थे वह मथुरा पहुंचा।  


मथुरा में उसने वासव दत्त से मिलाने की चाहत की। जब वासव दत्त को यह बात पता चली तो उसने लालच में कर व्यापारी के बेटे जो पहले से वहां मौजूद था उसे कूड़े के अम्बार में छिपा दिया। व्यापारी को जब यह बात पता चली तब उसने अपने बेटे को बचाया और वहां के राजा को इस बात की खबर दी। 


नियति ने वासवदत्ता के साथ एक क्रूर खेल खेला। एक व्यापारी के पुत्र को छुपाने के अपराध में, राजा ने उसे भयानक दंड दिया। उसके हाथ, पैर, नाक और कान काट दिए गए और उसे श्मशान में मरने के लिए छोड़ दिया गया। जब उपगुप्त को यह खबर मिली, तो वह बिना एक पल भी सोचे श्मशान की ओर भागे।

समय ने अपनी चाल चली। वासवदत्ता को उसके कर्मों का दंड मिला और उसे श्मशान घाट पर छोड़ दिया गया। उसके हाथ, पैर, नाक और कान काट दिए गए थे। उसकी सुंदरता, जो उसका सबसे बड़ा हथियार थी, अब उसकी सबसे बड़ी पीड़ा बन गई थी।
तभी उसने देखा, उपगुप्त उसकी ओर रहे हैं।

वासवदत्ता अपनी पीड़ा से कराहते हुए, उप गुप्त से पूछा जब मैंने आपको बुलावा भेजा तब आप नहीं आये। 


 "जब मैं सुंदर थी, तब आपने मुझे ठुकरा दिया। अब, जब मैं इतनी कुरूप हूँ, तो मुझसे मिलने क्यों आए हैं? इस अवस्था में अब आप क्या प्राप्त करेंगे। इस वीभत्स शरीर में आप क्या पाना चाहते हैं?"

उपगुप्त शांत और गंभीर स्वर में "देवी, आप गलत हैं। मैं तब भी यहाँ नहीं था और अब भी यहाँ नहीं हूँ। आप तब भी वही थी जो अब हैं, और मैं भी वही हूँ जो तब था। सुंदर आकार को देखकर मूर्ख ही आकर्षित होते हैं। एक समझदार व्यक्ति इस आकार से दूर ही रहता है। मैंने तब भी आपका सम्मान किया था और अब भी करता हूँ।"

उपगुप्त "यह शरीर, यह सुंदरता, यह सब नश्वर है, देवी। यह जीवन एक यात्रा है, जहां हमें सिर्फ़ सत्य को खोजना है। एक ज्ञानी तो सत्य को पहचानता है। यह शरीर नश्वर है, यह रूप झूठा है। यह दुख और पीड़ा भी एक भ्रम है। मृत्यु कोई अंत नहीं, बल्कि एक नया जन्म है। आप इस पीड़ा को अपनी आत्मा की शुद्धि का माध्यम बनाएँ।"

उप गुप्त ने कहा देवी सुन्दर आकार को देख  मूर्ख ही आकर्षित होते है। एक समझदार व्यक्ति इस आकार से दूर ही रहता है। उप गुप्त ने वासव दत्त को उस अवस्था में बौद्ध धर्म का उपदेश दिया। 


उपगुप्त ने अपनी आध्यात्मिक शक्ति से वासवदत्ता की पीड़ा को शांत किया। वासवदत्ता के मन में पहली बार अपने शरीर से परे एक सत्य का आभास हुआ। वह रोई, पर यह आँसू पीड़ा के नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान के थे।

वासवदत्ता ने उपगुप्त के शब्दों को सुना और उसके भीतर के सारे मैल धुल गए। उसे सत्य का ज्ञान हुआ। उसकी शारीरिक पीड़ा अब उसके लिए कोई मायने नहीं रखती थी। वह जान चुकी थी कि सच्ची सुंदरता शरीर में नहीं, बल्कि आत्मा में होती है।

उपगुप्त ने उसे बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का उपदेश दिया। उन शब्दों को सुनकर वासवदत्ता की आत्मा शुद्ध हो गई। उसने संसार से परे सत्य का ज्ञान प्राप्त किया और उसी क्षण, अपने शरीर का त्याग कर, निर्वाण को प्राप्त हो गई। इस घटना ने मथुरा के लोगों को हिला दिया।

जब मथुरा के लोगों को यह बात पता चली, तो वे हैरान रह गए। जिसने सबसे सुंदर वासवदत्ता को ठुकराया था, उसने ही उसके सबसे बदसूरत रूप को अपनाया। यह घटना लोगों के लिए एक महान उपदेश बन गई।

वासवदत्ता ने अपनी मृत्यु से पहले निर्वाण प्राप्त किया। यह कहानी प्रेम के सबसे ऊँचे रूप को दर्शाती है, जहाँ शारीरिक प्रेम का कोई स्थान नहीं होता, बल्कि प्रेम आत्मा से होता है।


वासव दत्त को इस संसार से परे सत्य का ज्ञान हुआ। वासव दत्त को मृत्यु के उपरांत निर्वाण प्राप्त हुआ और उन्हें जन्म काल से मुक्ति मिली। जब यह बात मथुरा के नागरिकों को पता चली तब एक-एक कर वासव दत्त से मिलने उस स्थान पर आने लगे।

भगवान बुद्ध का वचन "हे आनंद, उपगुप्त की तरह ही, हर व्यक्ति के भीतर वह आध्यात्मिक शक्ति है जो उसे संसार के दुख से मुक्त कर सकती है। यह केवल इस बात पर निर्भर करता है कि वह कब उस सत्य को पहचानता है। वासवदत्ता के लिए वह समय तब आया, जब उसका सब कुछ उससे छिन गया।"

पाँच विवाह

सम्राट अशोक का जीवन सिर्फ़ तलवार और न्याय का नहीं था; यह एक अकेलापन और प्यार की खोज की कहानी भी थी। उन्होंने पांच बार विवाह किया, लेकिन हर रिश्ता अलग था। उनकी तीन शादियाँ दिल से थीं, और दो सिंहासन की राजनीति का हिस्सा। 


अशोक की पहली पत्नी विदिशा के शाक्य परिवार के श्रेष्ठि की पुत्री थी। उनके पुत्र महेंद्र तथा पुत्री संघमित्रा थी। अशोक की द्वितीय पत्नी का नाम है कारुवाकी यह मछुआरा जाति की थी। उसने बौद्ध धर्म को अपना लिया था। इसका विवरण के जगह मिलता है। यह अशोक के पुत्र तिवला की माता थी।

जिसे अशोक ने तक्षशिला का उपराजा नियुक्त किया था। कारुवाकी  का अशोक पर बहुत प्रभाव था। तीसरी पत्नी रानी पद्मिनी नाम था। 


यह राज परिवार से संबंध रखती थी। इस का पुत्र कुणाल था। उनकी मृत्यु बहुत जल्दी हो गई  थी। अशोक की चौथी पत्नी का नाम असंगमित्रा था। यह हरियाणा के एक राज परिवार से सम्बन्ध रखती थी। उनकी कोई संतान नहीं थी। 


इन्होंने कुणाल का पालन पोषण अपने पुत्र की तरह किया था। अशोक की एक पुत्री थी चारुमित्रा। जिससे असंगमित्रा ने अपनी पुत्री की तरह पाला था। यह एक रखैल की पुत्री थी। जिसने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया था और धर्म के प्रचार के लिए नेपाल चली गई थी। जहां उसका स्तूप बना है।

रानी तिष्यरक्षिता सम्राट अशोक की पांचवी अंतिम पत्नी थी। यह बहुत साधारण परिवार से सम्बन्ध रखती थी। यह बहुत सुंदर तथा नाच गाने में कुशल थी। अशोक तथा तिष्यरक्षिता की उम्र में काफी अंतर था।


कौरवकी

जब अशोक ने उज्जैन के विद्रोह को आसानी से दबा दिया, तो उनकी प्रसिद्धि तेज़ी से फैली। उनके बड़े भाई सुसीम को यह पसंद नहीं आया। उसने अशोक को बदनाम करने का षड्यंत्र रचा और सफल भी रहा।

इसी कारण अशोक को कुछ समय के लिए मगध छोड़कर निर्वासित जीवन जीना पड़ा। इस दौरान, वे कलिंग पहुँचे, जहाँ उन्हें एक मछुआरे की बेटी कौरवकी से प्यार हो गया।

यह प्यार उस समय हुआ, जब अशोक अपनी पहचान छिपाकर जी रहे थे। कौरवकी ने उन्हें एक आम इंसान के रूप में प्यार किया, कि एक राजकुमार के रूप में।

महान अशोक, जिनके हृदय में कलिंग युद्ध से पहले तक सिर्फ़ सत्ता और क्रूरता का राज था, उनके जीवन में एक दिन प्रेम की ऐसी आंधी आई, जिसने सब कुछ बदल दिया। यह कहानी है उस प्रेम की, जिसने चंडाशोक को धर्माशोक बनाया।

उस समय, अशोक एक महत्वाकांक्षी और उग्र राजकुमार थे। सत्ता के लिए अपने भाइयों को मारना, युद्ध में विजय के लिए किसी भी हद तक जाना यह सब उनके स्वभाव का हिस्सा था। उनका हृदय कठोर था, उनकी आँखों में सिर्फ सिंहासन की चमक थी।

वे प्रेम जैसी भावनाओं को कमजोरी मानते थे, पर उनके भीतर एक गहरा अकेलापन था। वे एक ऐसे रिश्ते की तलाश में थे जो उनकी ताकत से नहीं, बल्कि उनके असल अस्तित्व से प्रेम करे।

कौरवकी एक साधारण, स्वतंत्र और निडर युवती थी। वह राजकुमार के वैभव से प्रभावित नहीं होती थीं। उनकी आँखें अशोक के राजसी परिधानों के पीछे छिपे अकेलेपन और उदासी को देख सकती थी। वह शांत, दयालु और दृढ़ निश्चयी थीं। 


उनका प्रेम किसी राजा के लिए नहीं, बल्कि एक इंसान के लिए था, जिसके भीतर वह एक महान आत्मा को महसूस कर सकती थीं। कलिंग के तट पर अशोक एक भयंकर समुद्री तूफान में फंसे थे।
उनकी नौका टूट चुकी थी, और वे जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे थे। तभी एक छोटी सी नाव उनकी ओर बढ़ी, जिस पर एक युवती, कौरवकी, बैठी थी। उसने बिना किसी भय के राजकुमार को बचाया।

अशोक लड़खड़ाती आवाज़ मेंतुम कौन हो, और तुमने एक अनजान यात्री की जान क्यों बचाई?”


कौरवकी सहजता सेमैं एक इंसान हूँ, और मैंने एक डूबते हुए इंसान की जान बचाई है। इस धरती पर जीवन से बड़ा कोई दान नहीं, राजकुमार। तुम कौन हो, मुझे इससे कोई लेना-देना नहीं।

कौरवकी के इन शब्दों ने अशोक को स्तब्ध कर दिया। आज तक किसी ने उनसे इस तरह बात नहीं की थी। वह उस राजकुमारी की आँखों में देखते रहे, जहाँ तो कोई भय था, ना ही कोई लालच।

अशोक ने अपना परिचय नहीं दिया, और कई दिनों तक वह एक साधारण नागरिक बनकर कौरवकी के साथ रहे। उन्होंने देखा कि कौरवकी कितनी दयालु थी। वह घायल मछुआरों की मदद करती, भूखे बच्चों को खाना खिलाती। अशोक के कठोर हृदय में पहली बार संवेदना का अंकुर फूटा।

एक शाम, जब वे समुद्र तट पर बैठे थे, अशोक ने कौरवकी से अपने हृदय की बात कही।

अशोक लहराती रेत पर उँगलियों से चित्र बनाते हुएकौरवकी, तुम जैसी निर्मल आत्मा मैंने आज तक नहीं देखी। तुम मुझे मेरे उस रूप से प्रेम करती हो जो कोई और नहीं देख पाता। तुम मुझे एक राजकुमार नहीं, बल्कि एक इंसान मानती हो।


कौरवकी ने मुस्कुराते हुएमैं किसी पद से प्रेम नहीं करती, महाराज। मुझे तो उन आँखों से प्रेम है, जिनमें मैंने पहली बार एक योद्धा की नहीं, बल्कि एक अकेले इंसान की उदासी देखी थी।

उनका प्रेम भौतिक सुख से कहीं बढ़कर था। यह एक दूसरे की आत्माओं को छूने जैसा था। रात के अँधेरे में, जब अशोक अपने सभी राजसी दायित्वों से मुक्त होते थे, तो वे चुपके से कौरवकी से मिलने आते। वे घंटों बिना कुछ बोले एक-दूसरे का हाथ थामे बैठे रहते। उनकी चुप्पी में ही वे सब कुछ कह देते थे।

एक बार, जब अशोक ने अपनी बाहों में कौरवकी को भरा, तो पहली बार उन्हें लगा कि प्रेम कोई कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है।

अशोक आँखें बंद करकेकौरवकी, जब तुम मेरे पास होती हो, तो मेरा मन शांत हो जाता है। मुझे लगता है जैसे इस दुनिया के सारे युद्ध और सारा शोर थम गया है। तुम्हारा प्रेम मेरे लिए एक आश्रय है, एक ऐसा स्थान जहाँ मैं अपनी सारी क्रूरता को भूल जाता हूँ।

कौरवकीमहाराज, प्रेम युद्ध नहीं है, यह एक शांति है। मेरा प्रेम आपको आपके ही भीतर की दया से मिलाना चाहता है।


कौरवकी ने अशोक के भीतर के चंड को नहीं बदला, बल्कि उनके भीतर छिपे हुए धर्म को जगाया। उनका प्रेम एक आत्म-खोज की यात्रा थी। इसी प्रेम के कारण, कलिंग युद्ध के बाद, जब अशोक ने हजारों लाशों को देखा, तो उन्हें कौरवकी के शब्द याद आए प्रेम युद्ध नहीं, शांति है।'

कौरवकी ने अशोक को सिखाया कि सच्ची शक्ति विजय में नहीं, बल्कि करुणा में है। वह केवल उनकी रानी बनीं, बल्कि उनकी सह-धर्मपत्नी भी। उनका प्रेम एक ऐसा था जिसने एक कठोर सम्राट को मानवता की राह दिखाई।

इस रिश्ते से उनके दूसरे पुत्र तिवल का जन्म हुआ, जो बाद में तक्षशिला के उप-राजा बने। कौरवकी और तिवल दोनों का नाम अशोक के शिलालेखों में मिलता है, जो इस बात का सबूत है कि यह रिश्ता केवल एक प्रेम कहानी नहीं था, बल्कि इतिहास का हिस्सा था।

मजबूरियाँ

अशोक का तीसरा विवाह रानी पद्मावती से हुआ, जिनके बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। हालांकि, यह माना जाता है कि वह एक शाही परिवार से थीं, क्योंकि उनके बेटे कुणाल को हमेशा अशोक का उत्तराधिकारी माना गया। कुणाल, महेंद्र और तिवल से छोटे होने के बावजूद, सिंहासन के लिए सबसे उपयुक्त समझे जाते थे।

 यह शादी शायद राजनीतिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए की गई थी, क्योंकि देवी और कौरवकी दोनों ही शाही पृष्ठभूमि से नहीं थीं।

सम्राट बनने के बाद, अशोक को एक बार फिर से विवाह करना पड़ा। इस बार यह राजनीतिक निर्णय था। उन्होंने असंधिवत की राजकुमारी असंधिमित्रा से शादी की, जो उनके शासनकाल के ज्यादातर समय तक उनकी प्रमुख रानी रहीं।

हालाँकि, उन्होंने कोई संतान पैदा नहीं की, लेकिन वह कुणाल की जैविक माँ, पद्मावती की मृत्यु के बाद उनकी देखभाल करती थी। यह रिश्ता उनकी पिछली शादियों से अलग था यह प्यार से ज्यादा कर्तव्य और राजनीति का गठबंधन था।


सत्ता का दुष्चक्र

सम्राट अशोक का यश सिंहासन के साथ नहीं आया। वह युद्ध क्षेत्रों से हो कर आया। तलवारों की टंकार, हाथियों की गर्जना और रक्त की नदियों के बीच एक सम्राट ने अपने साम्राज्य को विस्तृत किया। लेकिन वह एक युद्ध एक अंतिम युद्ध उसकी आत्मा को जगाने वाला था।


अशोक को सही मायने में भारत का संस्थापक पिता कहा जाता है। राधा गुप्त जो बिन्दुसार के महामंत्री थे उन्होंने अशोक को राजगद्दी पर बैठने में बहुत मदद की।


अशोक की जीवक की यात्रा उनके सिंहासनारोहण से शुरू होती है। ईशा पूर्व 268 की और बढ़ाते हुए मौर्य साम्राज्य का परिदृश्य बदल रहा था। सम्राट बिन्दुसार की आयु ढल रही थी। और दरबार में उत्तराधिकारी को ले कर साजिशों का जाल बुना जा रहा था। 


परम्परा अनुसार सबसे बड़े पुत्र को गद्दी मिलनी थी। लेकिन अशोक जिसने तक्षशिला और उज्जैन जैसे अशांत प्रांतों में कुशल प्रशासन कर अपनी क्षमता सिद्ध कर दी थी। 


दरबार में एक मजबूत दावेदार के रूप में उभरे। अशोक को राजधानी पाटलिपुत्र में बुलाया गया।लेकिन यह आमंत्रण नहीं एक षडयंत्र था। अशोक ने राजधानी लौटते ही सैन्य समर्थन जुटाया। और दरबार में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। बिन्दुसार की मृत्यु के बाद अशोक ने राजगद्दी की और पहल कदम बढ़ाया। लेकिन यह एक शांतिपूर्ण मार्ग नहीं था। यह इतिहास को बदलने वाला कदम था।  


लेकिन जब सुसीमा को यह पता चला तब मगध में उत्तराधिकार को लड़ाई शुरू हो गई। 25 वर्ष की आयु में ईशा पूर्व 269 में अशोक का राज्याभिषेक हुआ। अशोक का राज्याभिषेक बहुत वैभवशाली था। 


जिसका उद्देश्य परिवर्तन का प्रतीक और नाटकीय बनाना था। इस में हाथियों, और वैदिक मंत्रों की ध्वनि के साथ रत्न जड़ित आसनों और वैदिक मंत्रों की ध्वनि के साथ। इस क्षण से एक ऐसा राजा जन्मा जिसे आने वाले वर्षों में अजेय यौद्धा और बाद में करुणा के प्रतिक के रूप में पहचान मिली। 


इस लड़ाई का अंत ईशा पूर्व 270 में अशोक की जीत के साथ ही हुआ। एक किवदन्ती है कि अशोक ने अपने 99 भाइयों का बर्बरता पूर्वक वध कर दिया।अशोक मौर्य साम्राज्य के तीसरे शासक थे। 


अशोक को एक ऐसी सैन्य व्यवस्था विरासत में मिली थी। जो चन्द्र गुप्त मौर्य और बिन्दुसार के समय में ही उपमहाद्वीप की सबसे संगठित सेनाओं में गिनी जाती थी। 


मौर्य सेना के प्रमुख घटक थे  छह लाख पैदल सैनिक, 30,000 घुड़सवार, 9000 योद्धा थे। अग्नि और युद्ध विद्या में प्रशिक्षित योद्धा। यह बहुत अनुशासित सेना थी। अशोक इस विरासत को और भी सशक्त बनाने में सफल रहे। 


सत्ता में आते ही अशोक के अत्याचारों तथा उतावलेपन की कहानी शुरू होती है।सिंहासन पर बैठते ही अशोक ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन शुरू किया। राजकीय संरचनाओं की पुनर्संरचना की गई। विन्द्रोही प्रदेशों में सैन्य टुकड़ियां भेजी गई। प्रारम्भिक वर्षो में अशोका का शासन कड़क और निरकुंश था।  


कर प्रणाली में सुधार लाया गया। गुप्तचर व्यवस्था को मजबूत किया गया। वो पहले के मौर्य शासकों की नीतियों का पालन कर रहे थे। लोहे के शासन का। प्रजा उसे चण्ड अशोक के नाम से जानने लगी। 

निर्णय कठोर होते दण्ड त्वरित होता। लेकिन वही अशोक एक प्रशासक के रूप में कुशल और न्यायप्रिय था। उनके न्यायालय में अपराधियों को जाता। दण्ड का स्पष्ट विधान था। 


और दरबार में विद्वानों की उपस्थिति भी अनिवार्य थी। उन्होंने नौ विद्वानों का एक समूह बनाया था। जो उन्हें हर विषय पर सलाह देते थे। राजधानी में एक यातनाऐं देने के लिए एक जेल का निर्माण करवाया गया। जिसको अशोक का नरक कहते थे। जिसमें विद्रोहियों तथा कैदियों को यातनाऐं दी जताई थी। 


इससे अशोक के वह समर्थक मंत्री भी नाराज हो गए थे जिन्होंने उन्हें गद्दी पर बैठने में मदद की थी। अशोक ने चक्रवर्ती राजा बनाने के लिए अपने राज्य का विस्तार किया। 


अशोक के प्रारम्भिक शासन काल में धार्मिक सहिष्णुता थी। वे वैदिक ब्राह्मणों, जैन मुनियों, और बौद्ध भिक्षुओं सभी को सम्मान देते थे। उन्होंने राज्य में यज्ञों तथा वैदिक अनुष्ठानों को अनुमति दी। लेकिन साथ ही बौद्ध भिक्षुओं को राजप्रासाद में जगह दी। उनके शासन में धर्म एक राजनीतिक साधन ही था। 


अशोक अब पूर्ण रूप से मौर्य सम्राट बन चुके थे। शक्तिशाली, निर्णायक और प्रशासनिक दृष्टि से श्रेष्ठ। लेकिन एक चीज अभी बाकी थी। उनकी अंतिम विजय। जिसका लक्ष्य था कलिंग। क्या कलिंग सिर्फ एक राज्य था? या अशोक के जीवन का मोर। क्या वहां विजय की ज्वाला भड़केगी? या करुणा की आग में जल जाएगा सम्राट स्वयं। 


राज्य अभिषेक के बाद अशोक ने अपनी सीमाओं को सुदृढ़ करना शुरू किया। उत्तर पश्चिमी सीमा पर तक्ष्यशिला और गांधार में छिटपुट विद्रोह होते रहे थे। अशोक ने वहां अपने विश्सनीय सेनापतियों को भेजा। और बिना बड़े युद्ध के इन क्षेत्रों को पुनः नियंत्रित किया। 


दक्षिण भारत की ओर बढ़ाते हुए उन्होंने आंध्र, कर्नाटक तमिल प्रदेशों के कुछ हिस्सों को सैनिक और कूटनीतिक तरीकों से अपने अधीन किया। इनमें राजनय, विवाह सम्बन्ध और कूटनीतिक दूतावासों का भी उपयोग हुआ। 


यह इसलिए जरुरी था क्योंकि भू राजस्व ही मुख्य आय का साधन था। लगभग 260 से 261 ईसा पूर्व हुए कलिंग युद्ध का कारण यहीं नीतियां थी। लेकिन अब बात आती है उस राज्य की जिसने केवल अशोक की सामरिक क्षमता को चुनौती दी बल्कि उसकी आत्मा को भी।

सम्राट अशोक के पास वह सब था जो एक राजा को चाहिए एक विशाल साम्राज्य, जो हिमालय से लेकर मैसूर और हिन्दुकुश से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फैला था। लेकिन इस विस्तार की एक बड़ी कीमत थी।

सैन्य खर्च बेतहाशा बढ़ रहे थे और ख़राब संचार व्यवस्था के कारण मुश्किलें खड़ी हो रही थीं। इन समस्याओं का एक ही हल था और ज्यादा विस्तार, और ज़्यादा युद्ध। अशोक, जो अभी-अभी सत्ता के लिए अपने भाइयों के खून से हाथ धोकर आए थे, एक नए द्वंद्व में फँस गए थे सत्ता का घमंड या आत्मा की शांति?

रात के अँधेरे में, जब राजमहल सो जाता, अशोक अकेले बैठकर धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते। उनके महामंत्री राधागुप्त, एक क्रूर प्रशासक, उन्हें बार-बार चेताते, "महाराज, युद्ध से साम्राज्य बढ़ता है, लेकिन मन की शांति घटती है।" पर अशोक का जवाब हमेशा एक ही होता, "पहले साम्राज्य सुदृढ़ होगा, फिर मन भी स्थिर होगा।"

सामरिक दृष्टि से बंगाल की खाड़ी के तट पर स्थित यह भाग दक्षिण भारत के साथ समुद्री मार्ग को नियंत्रित करता था।

कलिंग, मगध के पूर्व में एक समृद्ध समुद्री तटीय राज्य था। यह व्यापार, नौका चालन और शिल्प में पारंगत था, और मौर्य साम्राज्य का हिस्सा नहीं था। एक सम्राट के लिए, यह एक ऐसी चुनौती थी जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता था। राधागुप्त ने अशोक से कहा था, "एक कण भी यदि स्वतंत्र खड़ा है, तो वह साम्राज्य की अखंडता पर धब्बा है।"

कलिंग की चुनौती

अशोक ने सबसे पहले भारत के सबसे बड़े भूभाग पर राज किया। जिस समय अशोक राजगद्दी पर बैठे उस समय रो और कार्थेज के बीच युद्ध हो रहा था। फारस में खूनी संघर्ष चल रहा था और चीन का सम्राट अपनी महान दिवार बनवा रहा था।


जिससे मगध का साम्राज्य हिमालय से लेकर मैसूर तथा हिन्दुकुश से लेकर ब्रह्मपुत्र तक फल गया। साम्राज्य विस्तार की निति एक दुष्चक्र सावित हुई। क्योंकि बढ़ते सैन्य खर्चे। ख़राब संचार प्रणाली के कारण  समस्याऐं कड़ी रहती थी। इनके खर्च उठाने के लिए और नई सीमाओं तक राज्य विस्तार करना आवशयक हो गया।

अशोक अब पूरी तरह से मौर्य सम्राट थे शक्तिशाली, निर्णायक और प्रशासनिक रूप से श्रेष्ठ। लेकिन एक चीज़ अभी भी बाकी थी, उनकी अंतिम विजय। जिसका लक्ष्य था कलिंग। क्या कलिंग सिर्फ़ एक राज्य था, या अशोक के जीवन का सबसे बड़ा मोड़?

मौर्य साम्राज्य के बीच एक स्वतंत्र सत्ता का होना अशोक के लिए असहनीय था। एक सम्राट के लिए यदि एक कण भी स्वतंत्र खड़ा है तो वह साम्राज्य की अखण्डता पर धब्बा बनता है। यह फिर राजपुरोहित राजा गुप्त ने अशोक को कहा था।


हालांकि वह सत्ता में चुके थे। लेकिन उनके भीतर एक द्वन्द शुरू हो चुका था। सत्ता के घमण्ड और आत्मा की शांति के बीच। यह द्वंद्व तब और गहराया जब उन्होंने एक ऐतिहासिक युद्ध की तैयारी शुरू की। कलिंग युद्ध जिसने उनके जीवन की दशा बदल दी। 


हाथी दांत के सामान के लिए कलिंग बहुत प्रसिद्ध था। वर्मा के अलावा अन्य देशों से कलिंग के व्यापारिक संबंध थे। आक्रमण से पहले कलिंग बौद्ध धर्म लम्बी था।

कलिंग का युद्ध 260-261 ईसा पूर्व में हुआ। अशोक ने इस युद्ध का नेतृत्व स्वयं किया। कलिंग के लोग अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कटिबद्ध थे और उन्होंने समर्पण नहीं किया। दो हफ्तों तक चले इस भीषण युद्ध में हज़ारों हाथी और सैनिक आमने-सामने भिड़ गए।

रातों को अशोक अक्सर अकेले बैठा करते। कभी राजपुरोहितों से धर्म के बारे में प्रश्न करते। तो कभी पुराने ग्रंथों का अध्यन करते। उनके मन्त्री राधा गुप्त जो चाणक्य की परम्परा के क्रूर प्रशासक माने जाते थे उन्हें बार-बार चेताते थे। 


अशोक का मन उस समय एक क्रूर और अहंकारी शासक का था। सत्ता की भूख, वासना, और एक अजेय योद्धा होने का अभिमान यही उनकी पहचान थी। वे खुद को "देवानांप्रिय" देवताओं को प्रिय कहलाते थे, पर वास्तव में वे अपने ही अहंकार के गुलाम थे। उनकी नजरों में, युद्ध केवल एक खेल था, और लोग मोहरे। लेकिन आज... आज मोहरे जीवित नहीं थे।

मानवता का चमत्कार

लेकिन अशोक ने जो देखा, वह उनकी आत्मा को भीतर तक झकझोर गया। युद्ध के मैदान में सिर्फ़ मरे हुए सैनिक नहीं थे, बल्कि वे औरतें और बच्चे भी थे, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया था।

उन्होंने देखा, एक बूढ़ा पिता अपनी मृत बेटी के सिर पर हाथ रखकर रो रहा था। एक युवा विधवा अपने पति के शरीर को गले लगाए विलाप कर रही थी।

और एक बच्चा, अपनी माँ के शव के पास बैठा, भूख से रो रहा था। अशोक ने अपनी तलवार फेंक दी। यह उनकी जीत नहीं थी, यह मानवता पर एक कलंक था।

नदियाँ लाल हो गईं, धरती लाशों से ढक गई। इस युद्ध में एक लाख से ज़्यादा लोग मारे गए, और दो लाख से ज़्यादा बेघर हो गए। अशोक ने कलिंग को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।

कलिंग युद्ध की धूल अभी भी हवा में तैर रही थी। सम्राट अशोक, जिनकी महत्वाकांक्षाओं ने एक लाख से अधिक लोगों का जीवन निगल लिया था, युद्ध भूमि का निरीक्षण कर रहे थे। एक समय, यह उनकी सबसे बड़ी जीत थी। पर आज, यह जीत उन्हें किसी सबसे बड़ी हार जैसी लग रही थी।

तब कलिंग के राजा नन्द राज थे। इस युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे। और इतने ही लोग युद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों से मरे थे। डेढ़ लाख से अधिक लोगों को या तो बंदी बनाया गया था या निर्वासित किया गया था। 


मारे गए लोगों में से अधिकतर लोग असैनिक थे। उस समय कलिंग की जनसंख्या दस लाख के करीब थी। तो मरने वालों की संख्या मरने वालों की बीस फीसदी थी। अगर बंदियों की संख्या मिला ले तो लगभग 35 प्रतिशत लोग इस युद्ध से प्रभावित हुए थे। 


यह एक बहुत बड़ा नरसंहार था। इस विजय ने अशोक के साम्राज्य को बंगाल की कड़ी तक पहुंचा दिया। अगले 37 सालों तब मगध का कलिंग पर आधिपत्य बना रहा।

अशोक अपने मन सेयह क्या विजय है? यह कैसी शक्ति है? जहाँ मेरी प्रजा की रुलाई मेरे कानों में गूंज रही है। मैंने अपनी प्रजा को नहीं जीता, मैंने उनका सर्वनाश कर दिया है, यह जीत बहुत रक्तरंजित है।

यह पहली बार था जब उनकी क्रूरता की परतें फट रही थीं। उनकी आत्मा काँप रही थी। उनका अहंकार, उनकी वासना, सब कुछ निरर्थक लग रहा था। उन्होंने खाना-पीना छोड़ दिया, पारिवारिक जीवन से विरक्त हो गए। उनकी रातें तनाव और पश्चाताप में कटने लगीं।

मृत्यु और विनाश के इस भयानक परिणाम ने अशोक को हिलाकर रख दिया। उस क्रूर मन में, जिसने सत्ता के लिए अपने 99 भाइयों का कत्ल किया था, कहाँ से करुणा आई? क्या एक ऐसा व्यक्ति जो सत्ता के लिए इतना रक्तपात कर सकता था, बाद में अहिंसा का प्रतीक बन सकता था?

दुनिया के इतिहास में शायद अशोक अकेला ऐसा राजा था जिसने जीत का जश्न नहीं मनाया, बल्कि दुख व्यक्त किया। यह एक बदलते हुए इंसान की कहानी थी, जिसने अपने पापों को स्वीकार किया और हमेशा के लिए बदल गया।

जब भी कोई बात अति पर चली जाती है तो बदलाव जाता है। सच्चा चमत्कार तब होता है, जब कोई व्यक्ति अपने अतीत से लड़कर, अपनी क्रूरता को छोड़कर करुणा को अपनाता है।


हृदय परिवर्तन

कलिंग युद्ध के बाद, जब अशोक युद्ध भूमि का निरीक्षण करने पहुंचे, तो उन्होंने जो देखा वह उनके दिल को चीर गया। लाशों का ढेर, बुज़ुर्गों का विलाप, और अनाथ बच्चों की रुलाई। वह जीत की खुशी नहीं, बल्कि हार का गहरा दर्द महसूस कर रहे थे।

उसी क्षण, उन्होंने देखा कि उनका भतीजा निग्रोध, जिसे उन्होंने अपने भाई सुसीम की हत्या के बाद छोड़ दिया था, शांति और निर्विकार भाव से उन शवों के बीच से गुज़र रहा था।

जब राजकुमार सुसीमा का वध अशोक ने किया, तब उसकी पत्नी गर्भवती थी। वह वध से बचकर भाग गई और उसे पूर्वी द्वार के पार बहिष्कृत लोगों के एक गाँव में शरण लेनी पड़ी।

बहिष्कृत लोगों के मुखिया ने उसकी दुर्दशा पर दया करके, उससे दयापूर्वक प्रार्थना की और उसका आदर करते हुए, सात वर्षों तक उसकी निष्ठापूर्वक सेवा की। जिस दिन उसे महल से निकाला गया था, उसी दिन उसने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम निग्रोध रखा गया।

बालक पवित्रता के लक्षणों के साथ पैदा हुआ था और सात वर्ष की आयु में ही वह एक भिक्षु बन चुका था।


वह पवित्र बालक, जिसका राजसी मूल अज्ञात था, एक दिन महल के पास से गुज़रा और राजा का ध्यान उसकी ओर आकर्षित हुआ। राजा उसके गंभीर और आदरणीय आचरण से प्रभावित हुए। राजा अशोक अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को बुलवाया, जो शालीनता और संयम के साथ उनके पास आया।

राजा ने कहा, 'हे मेरे बालक, जो भी स्थान तुम्हें उचित लगे, ग्रहण करो।' निग्रोध ने यह देखकर कि उसके अलावा कोई अन्य पुजारी उपस्थित नहीं था, राज सिंहासन की ओर अग्रसर हुआ जो उसके लिए उपयुक्त स्थान था।

यह जानकर कि इस भिक्षु का महल का स्वामी बनना तय है, राजा अशोक ने बालक को अपना हाथ दिया और उसे सिंहासन पर बिठाकर, अपने राजसी उपयोग के लिए तैयार भोजन और पेय से उसे तृप्त किया।

इस प्रकार अपना सम्मान प्रकट करने के बाद, राजा ने बालक भिक्षु से बुद्ध के सिद्धांतों के बारे में प्रश्न किया और उससे गंभीरता के सिद्धांत की व्याख्या प्राप्त की, जिसका आशय था कि 'गंभीरता अमरता का मार्ग है, उदासीनता मृत्यु का मार्ग है।' इस उपदेश ने राजा के हृदय पर इतना गहरा प्रभाव डाला। 


सम्राट अशोक ने अपने भाइयों का वध करके सिंहासन प्राप्त किया, जिसके कारण उन्हें 'दुष्ट अशोक' के नाम से जाना जाने लगा। लेकिन एक दिन, एक युवा बौद्ध भिक्षु, निग्रोध, ने उनके हृदय को छू लिया। निग्रोध राजकुमार सुमन का बेटा था। अशोक उसकी पवित्रता और शांत स्वभाव से प्रभावित हुए।

अशोक ने निग्रोध से पूछा, "हे मेरे बालक, क्या तुम मुझे धर्म के बारे में कुछ सिखाओगे?"

निग्रोध ने उत्तर दिया, "महाराज, गंभीरता अमरता का मार्ग है, उदासीनता मृत्यु का मार्ग है।"

इस एक वाक्य ने अशोक को हिला दिया। उनका हृदय परिवर्तन हुआ और उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया। उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को दान देना शुरू किया और चौरासी हज़ार स्तूपों का निर्माण करवाया। 'दुष्ट अशोक' अब 'धम्म-अशोक' बन गए।


लेकिन अशोक सुसीमा के बेटे निगरोध  के प्रभाव में पहले ही बुद्ध के उपासक बन गए थे। अशोक निगरोध से बहुत प्रभावित थे। हालांकि अशोक ने उनके पिता सुसीमा की हत्या की थी लेकिन निगरोध अशोक से नाराज नहीं हुआ यह बात अशोक के दिल को छू गई।

अशोक के मन में एक सवाल कौंधा, "यह क्या विजय है? जहाँ मेरी अपनी प्रजा की रुलाई मेरे कानों में गूंज रही है।" उन्होंने निग्रोध से उसकी शांति का राज़ पूछा।

अशोक की इस मानसिक उथल-पुथल के बीच, उनकी आंखें अपने भतीजे निग्रोध पर पड़ीं। जहाँ हर कोई दुखी और भयभीत था, निग्रोध शांत भाव से गुजर रहा था। अशोक, जो क्रूरता के सागर में डूब रहे थे, उन्हें उस शांति की तलाश थी।

अशोक विस्मित होकर "तुम... तुम इतने शांत कैसे हो? तुम क्यों नहीं डरते? मैंने तुम्हारे पिता की हत्या की है।"

निग्रोध शांत और विनम्रता से "सम्राट, क्रोध से क्रोध शांत नहीं होता, प्रेम से ही शांत होता है। घृणा से घृणा शांत नहीं होती, करुणा से ही शांत होती है। जीवन और मृत्यु केवल एक चक्र है। मैंने यह सत्य जान लिया है।


निग्रोध ने उन्हें धम्म पद के उपदेश दिए। निग्रोध के ये शब्द अशोक के हृदय को छू गए। उन्होंने अपने भतीजे से बौद्ध धर्म के बारे में और जानने की इच्छा व्यक्त की।

निग्रोध उन्हें उपगुप्त के पास ले गए, और उपगुप्त ने अशोक को धम्म का उपदेश दिया। यह उपदेश अशोक के मन की भूमि पर गिरती हुई वर्षा की पहली बूँद की तरह था।

उपगुप्त ने उन्हें सिखाया कि सच्ची शक्ति तलवार में नहीं, बल्कि विचारों में होती है। उन्होंने अशोक की क्रूरता को देखा, उनके अहंकार को समझा, और उन्हें बताया कि असली जीत दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि खुद को जीतने में है।

यह वह क्षण था जब अशोक का क्रूर मन करुणा में बदलने लगा। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था, बल्कि यह वर्षों से चल रही एक प्रक्रिया थी जो कलिंग के नरसंहार के बाद निर्णायक मोड़ पर पहुँची।


धम्म दूत

सम्राट अशोक का सिंहासनारूढ़ होना, अपने 99 भाइयों का वध और फिर कलिंग युद्ध की भयानक क्रूरता ने पाटलिपुत्र में सब कुछ बदल दिया था। 


अशोक, जो कभी दुष्ट अशोक कहलाते थे, अब एक बदले हुए इंसान थे। उन्होंने अहिंसा और शांति के मार्ग को अपनाया था। लेकिन विदिशा में, देवी और उनके बच्चे इस बदलाव से अनभिज्ञ थे। वे अपनी साधारण, धार्मिक जिंदगी जीते रहे।


विदिशा में रहकर, देवी ने अपने बच्चों को बौद्ध धर्म की शिक्षा दी। उन्होंने उन्हें जीवन में एक उद्देश्य खोजने के लिए प्रोत्साहित किया। महेंद्र और संघमित्रा बड़े हुए और उन्होंने अपनी माता के प्रभाव से बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

एक दिन, महेंद्र और संघमित्रा अपनी माता के पास आए। उनके चेहरे पर एक अदम्य दृढ़ता थी। "माता," महेंद्र ने कहा, "हमारा मन अब इस संसार के सुखों में नहीं लगता। हम बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी बनना चाहते हैं।"

देवी की आँखों में आँसू थे, पर ये खुशी के आँसू थे। उनका संकल्प पूरा हो गया था। उन्होंने अपने बच्चों को गले लगाया और उनके इस पवित्र निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने अपने बच्चों को बौद्ध धर्म की शिक्षाओं और शांति के मार्ग के प्रति अपने समर्पण को सिखाया था।

"
जाओ, मेरे बच्चों," देवी ने कहा, "तुम्हारा मार्ग अब और भी महान है।"

महेंद्र और संघमित्रा पाटलिपुत्र के लिए रवाना हुए, जहां उनके पिता, सम्राट अशोक, उनका इंतजार कर रहे थे। अशोक के महल में, उनकी मुलाकात अपने पिता से हुई। 


जब अशोक ने कलिंग युद्ध में रक्तपात देखा, तो उन्होंने बौद्ध धर्म को स्वीकार करने का फैसला किया। इस निर्णय में उनकी पत्नी देवी का दूर से ही बहुत बड़ा प्रभाव था। यह देवी ही थीं, जिन्होंने अशोक के जीवन में शांति और करुणा के बीज बोए थे।

महेंद्र और संघमित्रा का निर्णय केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि यह एक राजनीतिक और आध्यात्मिक महत्व का निर्णय था। वे दोनों ही अशोक की सबसे बड़ी संतान थे और सम्राट के उत्तराधिकारी हो सकते थे, लेकिन उन्होंने एक पवित्र मार्ग चुना। इससे यह साबित हुआ कि सत्ता और वैभव से कहीं बढ़कर मन की शांति और धर्म का महत्व है।


अशोक और देवी का प्रेम, हालांकि राजनीतिक मजबूरियों के कारण अधूरा था, लेकिन उनके बच्चों और अशोक के भविष्य पर इसका गहरा प्रभाव पड़ा। देवी के शांत स्वभाव और करुणा ने एक क्रूर योद्धा को महान सम्राट में बदल दिया। उनका प्रेम एक साम्राज्य से बढ़कर था और उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अपने बच्चों का बलिदान दिया।


धर्म का अभयारण्य


सहस्राब्दियों पूर्व, जब धरती पर ज्ञान और अज्ञान के बीच एक युद्ध चल रहा था, एक द्वीप था जो महासागर के बीच में एक रत्न की तरह चमकता था। यह कोई साधारण भूमि नहीं थी; यह भविष्य के लिए एक प्रतिज्ञा थी। उस समय, भारत में एक महान सम्राट था, जिसका नाम अशोक था। 


उसके साम्राज्य की नींव तलवार पर नहीं, बल्कि धम्म धर्म पर टिकी थी। अशोक ने अपने जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य पूरा कर लिया था कलिंग के युद्ध के बाद शांति की खोज। लेकिन उसका हृदय जानता था कि इस शांति को दुनिया में फैलाना अभी बाकी है।


एक रात, अशोक को एक रहस्यमयी स्वप्न आया। उसने देखा कि एक कमल का फूल उसके हाथ में है और वह उसे दूर दक्षिण के द्वीप की ओर फेंक रहा है। फूल हवा में उड़ता हुआ गया और एक पर्वत के ऊपर जाकर खिल गया। 


यह कोई साधारण कमल नहीं था, बल्कि ज्ञान का कमल था। उसी रात, अशोक के पुत्र, अरिहंत महेन्द्र को भी एक दिव्य दर्शन हुआ। उसे पता चला कि उसका कर्तव्य है कि वह बुद्ध के उपदेशों को उस द्वीप तक ले जाए, जहां वह कमल खिला था।


पाटलिपुत्र में उस समय में कई बिहार और संधाराम बने। लेकिन उसमें एक अशोका राम भी बना। और इस अवसर पर बड़ा उत्सव मनाया गया। इस अवसर पर अशोक ने बड़ी विनम्रता से भन्ते मोगली पुत्र से पूछाभन्ते बुद्ध दम्म में वह कौन सी चीज है जिसका त्याग महान त्याग कहलाता है?” 


तब स्थविर मोगलीपुत्त तिष्य ने उत्तर दियावैसे तो भगवान के जीवन काल में भी तुम्हारे समान कोई त्यागी नहीं था लेकिन राजन तुम्हारे जैसा व्यक्ति भी धर्म का दयाद नहीं कहला सकता। 

जो अपने पुत्र या पुत्री को धर्म में प्रवजित करता है वहीं धर्म का दयाद और दायक कहलाता है।” 


धर्म का दयाद बनाने की कामना से सम्राट अशोक ने पास ही खड़े महेन्द्र और संघमित्रा से पूछाक्या प्रवज्या ग्रहण करोगे?” 


महेन्द्र और संघमित्रा दोनों तैयार हुए। सम्राट ने एक बड़े समरोह में महेन्द्र और संघमित्रा को धर्म में प्रवजित कराया।  इस समय उनके आचार्य महादेव स्थविर थे। 


जिन्होंने बच्चों को दीक्षा देने के लिए अपने गुरु मोग्गलिपुत्त तिस्स से बात की। महेंद्र को 20 वर्ष की आयु में दीक्षा दी गई, और संघमित्रा, जो अभी 18 वर्ष की थीं, को दो साल बाद दीक्षा देने का वादा किया गया।


जिन्हें बाद में मोगली पुत्र तिष्य ने महिषम मण्डल में यानि कि सतपुड़ा के इर्द गिर्द फैले महाकौशल क्षेत्र में धर्म दूत बना कर भेजा। जिनका मुख्य केंद्र पचमढ़ी में था। 


सिंहल का मिशन


तीसरी बौद्ध संगीति के बाद, मोग्गलिपुत्त तिस्स ने बौद्ध धर्म को विदेशों में फैलाने का फैसला किया। उन्होंने महेंद्र को सिंहल श्रीलंका भेजने का प्रस्ताव दिया, जहां का राजा देवानांपिय तिस्स, अशोक का मित्र था।


महेंद्र और संघमित्रा ने जीवन के सभी सुख-सुविधाओं का त्याग कर बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणी बनने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने पिता से श्रीलंका में धर्म का प्रचार करने की अनुमति मांगी। अशोक ने उन्हें आशीर्वाद दिया, और वे अपनी यात्रा पर निकल पड़े। वे श्रीलंका में बौद्ध धर्म का प्रचार करने वाले पहले व्यक्ति थे।

महेंद्र ने अपने पिता से कहा, "पिताश्री, मैं सिंहल जा रहा हूँ। मैं बुद्ध के धम्म का संदेश लेकर जा रहा हूँ।"

अशोक, अपने पुत्र से दूर होने के विचार से दुखी थे, लेकिन उन्होंने अपने पुत्र के पवित्र मिशन का समर्थन किया। तीसरी संगीति के संपन्न होने के बाद महेन्द्र अपने साथियों सहित बुद्ध वचनों के प्रचार के लिए श्रीलंका गये। 


महेन्द्र अपने साथ पांच भिक्षुओं को लेकर लंका के लिए रवाना हुए। उनकी यात्रा किसी साधारण यात्रा की तरह नहीं थी; यह एक आध्यात्मिक यात्रा थी, जिसमें हर कदम एक पवित्र कदम था। महेंद्र अपने साथियों के साथ हवा में उड़ते हुए सिंहल के मिस्सा या मीहिन्तले पर्वत पर उतरे।

जब वे लंका के मीहिन्तले पर्वत पर पहुंचे, तो उन्होंने वहाँ के राजा देवनंपिया तिस्स से भेंट की। राजा शिकार कर रहे थे, लेकिन जब उन्होंने महेन्द्र और उनके साथियों को देखा, तो उन्हें तुरंत एहसास हुआ कि ये कोई साधारण व्यक्ति नहीं हैं। देवानांप्रिय तिस्स ने महेंद्र से पूछा, "हे भिक्षु, तुम कौन हो?"

महेंद्र ने उत्तर दिया, "हम धम्मराज के शिष्य हैं।"

राजा ने पूछा, "आपकी शिक्षा क्या है?"

महेन्द्र ने राजा को बुद्ध के उपदेशों के बारे में बताया। उन्होंने समझाया कि जीवन का सत्य तो तलवार में है, ही सिंहासन में, बल्कि मन की शांति में है और कहा, "हजारों खोखले शब्दों से अच्छा वह एक शब्द है, जो शांति लाए।"

महेंद्र के उपदेशों ने राजा और उनके अनुयायियों के हृदय को छू लिया। राजा देवानांप्रिय तिस्स ने तुरंत बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया और अपने पूरे राज्य में बौद्ध धर्म का प्रचार करने का संकल्प लिया।


यह केवल एक धर्म परिवर्तन नहीं था; यह एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पुनर्जन्म था। उस दिन से, लंका केवल एक द्वीप नहीं रहा, बल्कि धम्म का एक जीवित अभयारण्य बन गया। अशोक का स्वप्न पूरा हुआ।

पत्तों पर इतिहास


समय बीतता गया और धम्म लंका की आत्मा में समा गया। बौद्ध भिक्षुओं ने ज्ञान को मौखिक रूप से जीवित रखा, लेकिन युद्ध और अकाल का खतरा हमेशा मंडराता रहा। इस खतरे को महसूस करते हुए, महाविहार के भिक्षुओं ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। 


उन्होंने त्रिपिटक बौद्ध धर्म के पवित्र ग्रंथ को ताड़ के पत्तों पर लिखने का काम शुरू किया। यह कार्य अलु विहार में हुआ, जो एक गुफा मठ था। यह कोई साधारण लेखन नहीं था; यह ज्ञान को अमर बनाने का एक प्रयास था। हर अक्षर एक प्रार्थना था, हर शब्द एक ध्यान था। 


यह लेखन ने सुनिश्चित किया कि बुद्ध के उपदेश सदियों तक सुरक्षित रहें। भारत में बौद्ध धर्म के कमजोर पड़ने के बाद भी, लंका में यह जीवित रहा। लंका के भिक्षुओं ने केवल इन ग्रंथों को संरक्षित किया, बल्कि उन पर टीकाएँ और व्याख्याएँ भी लिखीं, जिससे बौद्ध धर्म का ज्ञान और गहरा होता गया।



आध्यात्मिक केंद्र


सदियों बाद, जब म्यांमार, थाईलैंड, कंबोडिया और लाओस जैसे देशों में बौद्ध धर्म की परंपराएं कमजोर पड़ने लगीं, तो उन्हें लंका से पुनर्जीवित किया गया। यह एक अद्भुत प्रतीकात्मक घटना थी। लंका ने, जो कभी अशोक के पुत्र से ज्ञान प्राप्त कर रहा था, अब स्वयं एक शिक्षक की भूमिका निभा रहा था।


म्यांमार, 11वीं शताब्दी में, म्यांमार के राजा अनिरुद्ध ने लंका से पवित्र बौद्ध ग्रंथों और भिक्षुओं को बुलाया ताकि वे उनके देश में थेरवाद परम्परा को फिर से स्थापित कर सकें। 


थाईलैंड 14वीं शताब्दी में, थाईलैंड के सुखोथाई साम्राज्य के राजाओं ने भी लंका से भिक्षुओं को आमंत्रित किया ताकि वे बौद्ध धर्म का पुनरुद्धार कर सकें। 


कंबोडिया और लाओस, इन देशों में भी बौद्ध धर्म की परंपराओं को लंका के भिक्षुओं ने पुनर्जीवित किया।


लंका ने केवल धम्म की रक्षा ही नहीं की, बल्कि उसे दुनिया के साथ साझा भी किया। उसने एक ऐसा आध्यात्मिक केंद्र बनाया, जहाँ से ज्ञान की किरणें पूरे एशिया में फैली।

चमकता सितारा


आज भी, आधुनिक युग में, श्रीलंका थेरवाद बौद्ध धर्म का एक महत्वपूर्ण गढ़ बना हुआ है। अनागरिक धर्मपाल जैसे महान विद्वानों ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद में बौद्ध धर्म का प्रतिनिधित्व किया, और श्रीलंका के भिक्षु दुनिया भर में धम्म का प्रचार कर रहे हैं।


लंका की कहानी केवल एक द्वीप की कहानी नहीं है, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र की कहानी है जिसने अपने धर्म और संस्कृति को युद्धों, अकाल और उपनिवेशवाद की चुनौतियों के बावजूद संरक्षित रखा। 


वह आज भी चमक रहा है  लचीला, एकीकृत, और जीवंत। उसका इतिहास, भारत के इतिहास से गहराई से जुड़ा हुआ है, और दोनों मिलकर हमें यह बताते हैं कि ज्ञान और शांति की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती।

बोधि वृक्ष

सिंघल की राजकुमारी अनुला और उनकी 500 सेविकाओं ने भी बौद्ध धर्म में दीक्षा लेने की इच्छा व्यक्त की, लेकिन महेंद्र ने बताया कि पुरुषों को महिलाओं को दीक्षा देने की अनुमति नहीं है। राजा देवानांप्रिय तिस्स ने अशोक के पास एक दूत भेजा, जिसमें उन्होंने संघमित्रा और पवित्र बोधि वृक्ष की एक शाखा की मांग की।

बोधि वृक्ष बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र वृक्ष है। इसका नाम "बोधि" शब्द से आया है, जिसका अर्थ है ज्ञान या आत्मज्ञान। यह वही वृक्ष है जिसके नीचे बैठकर राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ और वे गौतम बुद्ध बन गए।

बोधि वृक्ष एक प्रकार का पीपल का पेड़ है। यह मूल रूप से भारत, नेपाल, और दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। जो मूल बोधि वृक्ष गया में था, वह समय के साथ नष्ट हो गया, लेकिन उसकी कई शाखाओं को अलग-अलग जगहों पर लगाया गया। आज जो पेड़ बोधगया में है, उसे उसी मूल पेड़ की शाखा का वंशज माना जाता है।

बोधि वृक्ष की महत्ता का मुख्य कारण यह है कि यह आत्मज्ञान का प्रतीक है। गौतम बुद्ध ने इसी वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या और ध्यान किया था। ऐसा माना जाता है कि जब वे गहन ध्यान में थे, तो उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई और उन्होंने संसार के दुख का कारण और उससे मुक्ति का मार्ग खोजा।

इसलिए, यह वृक्ष केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि बौद्ध धर्म के जन्म का गवाह है। यह ज्ञान, शांति और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक बन गया है।

बौद्ध धर्म में बोधि वृक्ष का महत्व कई कारणों से है। यह वह पवित्र स्थान है जहाँ बुद्ध ने आत्मज्ञान प्राप्त किया था। यह बौद्धों के लिए सबसे महत्वपूर्ण तीर्थ स्थलों में से एक है। बोधि वृक्ष बौद्ध धर्म में ज्ञान और निर्वाण मुक्ति का प्रतीक है।

यह लोगों को याद दिलाता है कि आत्मज्ञान और आंतरिक शांति कठिन तपस्या और ध्यान से प्राप्त की जा सकती है। वृक्ष अपनी स्थिरता और धैर्य के लिए जाना जाता है। बौद्ध धर्म में, यह हमें सिखाता है कि सत्य की खोज में हमें धैर्य और दृढ़ता रखनी चाहिए।

वंशवृक्ष बोधगया में मूल बोधि वृक्ष से ही कई शाखाएँ दुनिया भर में भेजी गईं, और आज भी कई जगहों पर बोधि वृक्ष मौजूद हैं। यह एक तरह से बौद्ध धर्म के फैलाव और विस्तार को भी दर्शाता है।

बोधि वृक्ष बौद्धों के लिए एक पूजनीय प्रतीक है और इसे अक्सर ध्यान और प्रार्थना के लिए इस्तेमाल किया जाता है। इसकी छाया में बैठकर ध्यान करने से लोग बुद्ध की उस अवस्था के करीब महसूस करते हैं, जब उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ था।

जब यह खबर पाटलिपुत्र पहुँची, तो अशोक अपनी पुत्री के वियोग से बहुत दुखी हुए। लेकिन संघमित्रा ने अपने पिता को समझाया, "पिताश्री, यह एक पवित्र मिशन है। मैं वहाँ जाकर महिलाओं के लिए एक बौद्ध भिक्षुणी संघ की स्थापना करूँगी।"

अशोक ने भारी मन से सहमति दी। उन्होंने पवित्र बोधि वृक्ष की एक शाखा को बड़ी धूमधाम से काटा और उसे संघमित्रा को सौंप दिया। संघमित्रा एक जहाज पर सवार होकर सिंहल के लिए रवाना हुईं।

जिस जहाज में पवित्र बोधि वृक्ष को रखा गया था, वह तेजी से पानी में उछला, और सागर की लहरें शांत हो गई। चारों ओर फूल खिल गए और हवा में संगीत की मधुर धुनें गूंजने लगीं। यह एक चमत्कारी यात्रा थी।

सिंहल में संघमित्रा का भव्य स्वागत किया गया। उन्होंने सबसे पहले राजकुमारी अनुला और उनकी 500 सेविकाओं को दीक्षा दी और श्रीलंका में बौद्ध भिक्षुणी संघ की स्थापना की।

संघमित्रा ने अपना शेष जीवन सिंहल में ही बिताया, जहां वे 79 वर्ष की आयु तक रहीं। उनके भाई महेंद्र का पिछले वर्ष निधन हो गया था, जब वे अपनी दीक्षा के बाद साठवाँ 'एकांतवास' मना रहे थे। 80 वर्ष की आयु में 205 ईसा पूर्व में श्रीलंका में ही उनकी मृत्यु हो गई

महेंद्र और संघमित्रा दोनों ने अपने जीवन को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए समर्पित कर दिया। उनकी माता देवी ने उन्हें बचपन में जो शिक्षा दी थी, वह पूरे विश्व में फैल गई। देवी की साधारण परवरिश ने अशोक के बच्चों को राजा और रानी बनने के बजाय, दुनिया को शांति का संदेश देने वाले महान दूत बना दिया।



गूंजता धम्म

कलिंग युद्ध के दो साल के बाद अशोक बोधि धाम, सारनाथ, लुम्बिनी और कुशीनगर की तीर्थ यात्रा करने गए। उन्होंने धम्म के सिद्धांतो का प्रचार करना शुरू किया। बोधगया में बुद्ध ने समाधि को पाया था सारनाथ में अपना पहला उपदेश दिया था। लुंबिनी में बुद्ध पैदा हुए और कुशीनगर में निर्वाण प्राप्त किया।

240 ईसा पूर्व में, अशोक ने तीसरी बौद्ध परिषद का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य बौद्ध संघ में फैली अराजकता को समाप्त करना था। इस परिषद के बाद, उन्होंने एक ऐसा मिशन शुरू किया जिसने बौद्ध धर्म को एक विश्व धर्म बना दिया।

साठ हज़ार ब्राह्मण, जो तीन वर्षों तक प्रतिदिन अशोक के राजसी वैभव का आनंद लेते रहे थे, सिंहासनारूढ़ उसके पूर्ववर्तियों की तरह, पदच्युत कर दिए गए और उनकी जगह बराबर संख्या में बौद्ध भिक्षुओं का महल में लगातार स्वागत किया जाता था और उनके साथ इतनी उदारता से व्यवहार किया जाता था कि प्रतिदिन चार लाख का खजाना खर्च होता था।


आठ भिक्षुओं  के भोजन दान से शुरू हुआ सिलसिला साठ हज़ार भिक्षुओं तक जा पहुंचा। ऐसे में सम्राट अशोक ने पूछा बुद्ध द्वारा दिए गये उपदेश कितने है? भन्ते मोगली पुत्र तिष्य ने कहा धर्म के 84,000 स्कन्द है। 


सम्राट अशोक ने कहा में प्रत्येक के लिए एक-एक विहार बनवाकर सबकी पूजा करूँगा। अशोक ने बुद्ध धर्म अपना कर निर्माण कार्य शुरू कर दिया। मोगली पुत्र द्वारा कथावस्तु धर्मग्रन्थ पूर्ण किया गया।

अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचारकों को कश्मीर, गांधार, बर्मा, सीरिया, मिस्र और यहाँ तक कि मैसेडोनिया तक भेजा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण मिशन था अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका भेजना।

संघमित्रा ने श्रीलंका की राजधानी अनुराधापुरा में बोधि वृक्ष की एक शाखा लगाई, जो आज भी वहाँ स्थित है। यह अशोक की 'सॉफ्ट पावर' की रणनीति थी, जहाँ उन्होंने बल के बजाय सांस्कृतिक प्रभाव का उपयोग किया।

कुणाल के जन्म के पूर्व सम्राट अशोक ने 84,000 धर्म विहार बना कर पूर्ण कर लिए थे। अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को सात जगह से निकाल कर 84,000 इन स्तूपों में रखवाया गया।

जब अशोक ने बुद्ध के अवशेषों को सात जगह से निकाल कर 84,000 स्थानों पर रखने का काम शुरू किया तब उन्हें कोलियों द्वारा निर्मित राम ग्राम के स्तूप से  अवशेषों को नहीं निकाला जा सका। यह स्तूप नागों द्वारा संरक्षित था।

साँची का स्तूप प्रमुख स्तूप है। जो दुनियाभर में प्रसिद्ध है। इसके अलावा भरहुत, धार्मिक तथा अमरावती के स्तूप भी प्रसिद्ध स्तूप है। गया में बहुत बड़ा मंदिर बनाया गया।

यह आधुनिक भारत की  सॉफ्ट पावर बन गया। सॉफ्ट पावर से तात्पर्य देश की उस क्षमता से है, जो किसी सैन्य या आर्थिक शक्ति के बजाय सांस्कृतिक आकर्षण, राजनीतिक आदर्शों और कूटनीतिक जुड़ाव के माध्यम से अन्य देशों को प्रभावित करती है। 


यह बिना बल प्रयोग या आर्थिक प्रलोभन के दूसरों के व्यवहार और प्राथमिकताओं को आकार देने की एक विधि है। 


अशोक की इस रणनीति के कारण अशोक अपने सीमा क्षेत्रों पर शांति कायम करने में सफल रहे। अशोक ने इन देशों में धर्म स्तम्भ स्थापित करवाए जिन पर राज्य की नीतियां तथा धर्म उपदेश लिखे गये। अशोक ने राज्य करने के लिए गौतम बुद्ध के धर्म के सिद्धांतों के आधार पर माध्यम मार्ग तथा अहिंसा की नीति अपनाई थी।


अशोक ने बुद्ध धर्म को राजधर्म घोषित नहीं किया था। उन्होंने दूसरे धर्मों का वह उतना ही सम्मान किया। जैसे शिला लेखों में लिखा गया। उन्होंने लिखा प्रजा के साथ पुत्रवत व्यवहार हो। जनता को प्यार दिया जाए। अकारण लोगों को कारावास का दण्ड ना दिया जाए। यातना ना दी जाए। जनता के साथ न्याय किया जाना चाहिए।  


अशोक ने अतिवादी नीतियों को छोड़ कर मध्यम मार्ग के आधार पर एक राजनैतिक संगठन तैयार किया। जनता की भलाई के के कार्यक्रम शुरू किये गये। अशोक अब जन नायक राजा बन गए थे।


अशोक धार्मिक कट्टरवादी नहीं थे सभी धर्मों का सम्मान उनके शासन में किया जाता था। उन्होंने धम्म महामात्र नाम के अधिकारी नियुक्त किये थे जो धार्मिक मामलों को देखते थे। सभी धर्मों को दान दिया जाता था। इन कामों के कारण अशोक को देवानाम प्रिया की उपाधि दी गई थी। 


अशोक को आधुनिक शासन व्यवस्था विकसित करने के अलावा पत्थरों की इमारतें बनवाने का श्रेय दिया जाता है। अशोक ने अनेक खंभे लगाए गए। इन स्तंभों पर स्थानीय भाषा पाली, प्राकृत तथा अरेमिक में लिखा गया है। एक अच्छे शासक की तरह अशोक ने अपने आप को जनता के लिये उपलब्ध करवाया। 


लेकिन अशोक को कुछ गिने चुने लोग ही सुन सकते थे। इसलिए उन्होंने पूरे साम्राज्य में लिखित में संदेश देने की पहल शुरू की। ताकि वह हमेशा जीवित रहे। उन्होंने अपने संदेशों को स्थानीय भाषा में लिखवाया। मौर्य सम्राटों में अशोक की शैली सबसे अलग थी। अशोक की मंशा थी कि उनके सन्देश जब तक उपलब्ध रहे जब तक सूरज चांद चमकते रहें। 


इन शिला लेखों से हमें अशोक की संवेदनशीलता देखने को मिलती है। अशोक ने धम्म की अवधारणा को आत्मसात किया। धम्म आध्यात्मिक रीति रिवाजों पर नहीं बल्कि दुनियावी रिवाजों तथा दैनिक आचार व्यवहार पर निर्धारित था। यह हिंसा के विरुद्ध था। अशोक ने विभिन्न मतमतान्तरों के सह अस्तित्व को महत्त्व दिया। 


उनका मानना था कि सब को मिलजुल कर सह अस्तित्व की भावना से रहना सीखना होगा। दूसरे मनुष्यों तथा सम्प्रदाओं का सम्मान करना होगा।  किसी ओर के सम्प्रदाय का सम्मान कर ही तुम अपने  सम्प्रदाय का सम्मान कर पाओगे। यह धम्म का मूल सिद्धांत है। 


धम्म के अनुसार प्रजा कल्याण के बारे में सोचना और उसके बारे में काम करना शासक का कर्तव्य है। अशोक ने वाक संयम पर जोर दिया। अशोक ने उनके आदेशों की निगरानी करने की लिए धम्म महामात्र पद पर एक मंत्री को नियुक्त किया। 


स्त्रियों के कल्याण की देखरेख करने के लिए महिला महामात्र की नियुक्ति की। अशोक की पांच पत्नियां थी करुवति अशोक की प्रिय पत्नी थी। अशोक ने अपने शिलालेख पर अशोक नाम लिख कर प्रियदर्शी नाम का उपयोग किया था। 


धीरे-धीरे प्राकृत और पाली भाषाएँ लुप्त हो गई। अशोक को भुला दिया गया। उनके संदेशों को कोई पढ़ नहीं पाया। लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी में अशोक की दुबारा खोज की ब्रिटिश इतिहासकार विलियम जोन्स तथा जेम्स प्रिंसिस ने। उन्होंने ब्राम्ही लिपि का मतलब लोगों को समझाया। 


स्वतंत्र भारत के सरकारी चिन्हों में अशोक के इतने चिन्हों को जगह दी गई कि वे हर भारतीय के प्रेरणा स्रोत बन गये। जिसका आज हर जगह प्रमुखता से उपयोग किया जाता है। 


सारनाथ के अशोक चक्र को भारत के झंडे पर तथा शेरों की मूर्ति को भारत सरकार का राज्य चिन्ह बनाया गया। चार सिंहों के चिन्ह को भारत का राजकीय चिन्ह घोषित किया गया।


तलवार से विचार तक

एक घटना ने अशोक को पूरी तरह बदल दिया। उन्होंने सभी धर्मों का समान सम्मान करना शुरू कर दिया। उनका अंतिम समय गंगा नदी के किनारे ध्यान में बीता, जहाँ उन्हें सत्ता की चकाचौंध से दूर, आत्मा की शांति मिली। 232 ईसा पूर्व में, एक ऐसा सम्राट जो तलवार से नहीं, करुणा से जीता था, इस संसार से चला गया।

उनके बनवाए गए शिलालेख, मठ और स्तूप आज भी हमें बताते हैं कि सच्ची शक्ति वह नहीं जो भय से राज करे, बल्कि वह है जो प्रेम से दिलों में राज करे।


उपगुप्त की दीक्षा के बाद, अशोक एक नए व्यक्ति बन गए। उनका वह हिंसक, वासनापूर्ण और अहंकारी व्यक्तित्व पूरी तरह बदल गया।

क्रूरता की जगह करुणा उन्होंने युद्ध का मार्ग पूरी तरह से त्याग दिया। जो अशोक कभी हजारों लोगों को मार डालते थे, वही अब जानवरों के लिए अस्पताल बनवा रहे थे।

अहंकार की जगह नम्रता उन्होंने अपने शिलालेखों पर खुद को "देवानाम प्रिय" और "प्रियदर्शी" कहा, जिसका अर्थ है 'देवताओं को प्रिय' और 'जो सबको प्यार से देखता है' यह उनके भीतर के अहंकार के अंत का प्रमाण था।

वासना की जगह ध्यान उन्होंने अपने जीवन को ध्यान, चिंतन और सेवा में समर्पित कर दिया। उनकी सारी ऊर्जा अब दूसरों की भलाई में लग गई।

कलिंग युद्ध उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक जीत थी, पर उनकी आत्मा की सबसे बड़ी हार। और इसी हार ने उन्हें इतिहास का सबसे महान सम्राट बना दिया। उन्होंने तलवार से नहीं, बल्कि विचारों से राज करना सीखा।

उनका यह परिवर्तन एक दिन में नहीं हुआ। यह वर्षों की आध्यात्मिक यात्रा थी। जब वे अपनी प्रिय पत्नी करूवकी के साथ थे, तब भी उनका मन शांत नहीं था, क्योंकि उनके अतीत की क्रूरता उन्हें सताती रहती थी। लेकिन धम्म की शिक्षा ने उन्हें शांति दी।

अंततः, अशोक ने सिद्ध कर दिया कि एक सच्चा राजा वही होता है जो अपने दिल पर राज करता है। उन्होंने अपनी प्रजा को एक शासक की तरह नहीं, बल्कि एक पिता की तरह प्यार किया। और यही कारण है कि उनकी विरासत आज भी जीवित है।

उपगुप्त से बौद्ध धर्म की दीक्षा लेने के बाद, अशोक ने अपने शिलालेख पर खुद लिखवाया, "कलिंग के युद्ध के बाद मुझे महान खेद हुआ। अब मैं धर्म विजय चाहता हूं, ना कि रक्त विजय।" यह सिर्फ़ एक घोषणा नहीं थी, बल्कि एक शक्तिशाली सम्राट का अपनी आत्मा से किया गया वादा था।

अब वह अशोक नहीं थे जो कलिंग गए थे। अब वे ध्यान, चिंतन और सेवा के मार्ग पर चल पड़े थे। उन्होंने अपनी सैन्य शक्ति का उपयोग युद्ध के लिए नहीं, बल्कि मानवता की सेवा के लिए किया। उनका नारा था: "मैं अब तलवार से नहीं, विचारों से जीतूंगा।"

अशोक ने अपने शासन को बुद्ध के नैतिक सिद्धांतों पर आधारित किया। उन्होंने अपने अधिकारियों को 'धम्म महामात्र' नाम दिया, जिनका काम सिर्फ़ धार्मिक मामलों को देखना नहीं, बल्कि सभी धर्मों के बीच सद्भाव और सह-अस्तित्व को बढ़ावा देना था।

उन्होंने अपने शासन में प्रजा के लिए अनेक कल्याणकारी कार्यक्रम शुरू किए और उन्हें अपने पुत्रों के समान माना। उनका राज 'चंड अशोक' से 'धर्माशोक' में बदल चुका था।

मृत्यु तथा विनाश के इस परिणाम ने अशोक को झकझोर कर रख दिया। अशोक के क्रूर मन में वह करुणा कहां से आई जिसने बुद्ध के चरणों में एक साम्राज्य को झुका दिया।


विद अशोक


उसी दौरान, अशोक के छोटे भाई विद-अशोक को बौद्ध धर्म में कोई रुचि नहीं थी। वह मानते थे कि सच्चा साधु वह होता है जो जंगल में तपस्या करें, कि जो राजमहल में भोजन और वस्त्र पाए। अशोक ने उसे सबक सिखाने का फ़ैसला किया। 




विद अशोक का चरित्र तर्क और आध्यात्मिक समझ के बीच के संघर्ष को दर्शाता है। वह एक ऐसा व्यक्ति था जो धम्म को केवल बाहरी रूप से देखता था, उसकी गहराई को नहीं समझता था। 


विद अशोक एक तर्कवादी और संदेहवादी थे। वे मानते थे कि दुख से मुक्ति केवल कठोर तपस्या और कष्टों से ही मिल सकती है। वे भौतिक सुख-सुविधाओं में रहने वाले बौद्ध भिक्षुओं पर विश्वास नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह सच्चा त्याग नहीं है।


सम्राट अशोक का एक छोटा भाई था विद अशोक। कलिंग युद्ध के बाद जब अशोक ने बौद्ध धर्म अपना लिया। तब अशोक बौद्ध सन्यासियों की खूब सेवा करते उन्हें खाना वस्त्र देते थे। इससे विद अशोक को बहुत दुख होता था। 


वह सोचता था कि यह कैसे सन्यासी है जो सम्राट के दिए अच्छे-अच्छे वस्त्र पहनते है खाना खाते है और फिर कहते है कि हम संसार के दुखों से मुक्त हो जाएंगे। 


जबकि विद अशोक को लगता जो सन्यासी जंगल में रहते है दुःख में समय गुजरते है वहीं वस्तुता दुखों से मुक्त हो पाते है। वह सम्राट अशोक को मना करता था। लेकिन सम्राट अशोक उसकी बातों पर ध्यान नहीं देते वे सन्यसियों की खूब सेवा करते थे। वह अपने भाई को भी कहते कि तुम बुद्ध धर्म के बारे में सीखो। लेकिन वह बुद्ध धर्म से नफ़रत करता था।

एक दिन वह दोनों भाई जंगल से गुजर रहे थे। जंगल में एक सन्यासी पञ्च अग्नि तप कर रहा था। उस सन्यासी से विद अशोक ने कह आप तो बड़े महान है। आप इस जंगल में अकेले रहते है। आप खाते पीते क्या है। तब उस सन्यासी ने बताया मैं फल और जड़ों को खा कर गुजरा करता हूँ। 


जब विद अशोक ने पूछा आप सोते कहा है। तब सन्यासी ने कहा मैं एक पुराने घास के विस्तार पर ही सोता हूँ। आप ने पत्तियों के वस्त्र पहन रखें है क्या आप ऐसे ही वस्त्र हमेशा पहनते है। तब सन्यासी ने कहा में पत्तियों के अलावा और कोई वस्त्र धारण नहीं करता हूँ। 


उसकी तपस्या देख कर विद अशोक बहुत प्रसन्न हुआ। उसने कहा है महाराज आप तो इतनी तपस्या से जीवन गुजरते है तब आप के मन में कोई वासना या अहंकार तो नहीं रहता होगा। तब साधु ने कहा मैं तुम से सच बोलूगा। जब में मृग तथा मृगी को सम्भोग करते देखता हूँ तब मेरे मन में वासना आती है।  


मैने अपनी तपस्या से अभी तक उस वासना पर विजय प्राप्त नहीं की है। मेरा शरीर उस वासना से जलने लगता है। सन्यासी के मुख से यह बात सुन कर विद अशोक ने कहा एक यह सन्यासी है जो इतनी तपस्या के बाद भी वासना से मुक्त नहीं हो सका। दूसरे वे  लोग है जो कि राजा द्वारा दिए गए अन्न पर पालते है।

उनके द्वारा दिए गए आश्रम में सुख से जीते है। और दावा करते है कि वे वासनाओं से मुक्त है। ऐसा कदापि नहीं हो सकता। यह सुनकर सम्राट अशोक ने निश्चय किया कि वह विद अशोक को सीख देंगे। उन्होंने महल में लोट कर अपने मंत्रियों से कहा कि जब में स्नान करने जाऊ तब मेरे वस्त्र तथा मुकुट विद अशोक को पहना देना। 


और कहना कि सम्राट अशोक इस दुनिया में नहीं रहे अब तुम राजा बन गए हो। राजा बन कर इस देश का संचालन करों। मंत्रियों ने ऐसा ही किया। जब मंत्रियों की बात मान कर विद अशोक सिंहासन पर बैठा तब सम्राट अशोक वहां आये उन्होंने कहा कि तुम मेरे जीते जी सिंहासन हथियाना चाहते हो। तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई। 


मैं तुम्हें मृत्यु दण्ड दुगा। तब योजना के अनुसार वहां मंत्रीगण आये उन्होंने सम्राट से विनय की कि यह आप का भाई है। इसे माफ़ कर दे। तब सम्राट ने कहा इसे राजा बनाने का शौक है मैं इसे आठ दिन के लिए राजा बना देता हूँ। यह सब सुख सुविधाओं का भोग करेगा लेकिन आठवें दिन इस की हत्या कर दी जाएगी।  


अशोक ऐसा कह कर वहां से चले गये। तब मंत्रियों ने राजाज्ञा के अनुसार सब व्यवस्था कर दी। वहां अच्छा भोजन, वस्त्र, नाच गाना होता। द्वारपाल रोज विद अशोक को याद दिलाते महाराज एक दिन और बीत गया महाराज आप आनंद लीजिए। 


विद अशोक की शंकाओं ने अशोक को एक अनूठा सबक सिखाने पर मजबूर किया। उन्होंने अपने भाई को आठ दिन के राजा बनने का नाटक करने दिया ताकि वह यह समझ सके कि भौतिक सुख के साथ भी मृत्यु का भय कैसे जुड़ा रहता है। 


इस तरह सात दिन निकल गए। सातवें दिन विद अशोक को अशोक के सामने लाया गया। सम्राट अशोक ने विद अशोक से पूछा इन सात दिन तो तुमने अपने जीवन का सबसे सुन्दर सुख लिया होगा। सम्राट अशोक "बताओ, विद अशोक। इन सात दिनों में तुमने क्या अनुभव किया?"


विद अशोक डर से काँपते हुए "महाराज! मैंने कुछ भी अनुभव नहीं किया। हर क्षण मुझे केवल मृत्यु का भय सताता रहा। यह सुख किसी काम का नहीं।"


तब विद अशोक ने कहा मैं इन सात दिनों में क्या उपयोग करता मैं इस सात दिनों इस बात से डरता था कि सात दिन बाद मेरी मृत्यु होने वाली है। 


सम्राट अशोक "तो सोचो, उन भिक्षुओं का क्या हाल होता होगा, जो हर पल मृत्यु का भान रखते हुए भी सुख-सुविधाओं में रहते हैंवे सुख से जुड़े नहीं हैं, जैसे कमल का पत्ता पानी से नहीं जुड़ता। यही धम्म है।"

यह घटना अशोक की मनोवैज्ञानिक समझ को दर्शाती है। उन्होंने हिंसा की जगह एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग का सहारा लिया ताकि उनका भाई सत्य को समझ सके।


यह कहानी हमें यह दिखाती है कि कैसे अशोक के जीवन के हर पात्र ने उनके व्यक्तित्व को आकार दिया, और अंततः उन्हें एक महान सम्राट से एक आध्यात्मिक पथ-प्रदर्शक बनने में मदद की।

आठवें दिन, अशोक ने उसे समझाया, "जब सात दिन के डर से तुम्हारा यह हाल है, तो उन भिक्षुओं का सोचो जिन्हें हर पल मृत्यु का भान रहता है  वे हर तरह की सुख सुविधाओं में रहते हुए भी उनसे अलग रहते है। जैसे जल की एक बून्द कमल के पत्ते से अलग रहती है।" विद-अशोक ने सच्चाई को समझा और एक बौद्ध भिक्षु बन गया।


और फिर सम्राट अशोक ने कहा तुम्हें कोई मृत्यु दंड नहीं दिया जा रहा है। यह तो तुम्हें समझाने के लिए किया गया एक कृत्य था। विद अशोक को सचाई पता चल गई थी। वह जीवन के दुःख को समझ चुका था। उसने कहा कि अब मैं राजकुमार बन कर जीवन नहीं गुजरना चाहता हूँ मैं बौद्ध श्रमण बनूंगा। 


तब सम्राट अशोक ने कहा मेरी ऐसी मंशा नहीं थी तुम मेरे सामने श्रमण बनोगे तो मुझे कितना दुख होगा। पर वह नहीं माना। वह श्रमण बन गया और भीख मांगने लगा। 

लेकिन अशोक ने जब कहा कि उसे दुःख होता है तब वह पाटलिपुत्र छोड़ कर अन्य जगह चला गया। जब वह अर्हत पद को प्राप्त हुआ तब अशोक से मिलने आया। जब  वह  जाने लगा तब अशोक उसे सीमा तक छोड़ने गया। 

बाद में विद अशोक को रोग हो गया। उसके सब बाल गिर गये थे। वह केवल दूध पर जीवन गुजारने के लिए ग्यालो के साथ रहने लगा था। 


इस समय जैन तथा बौद्ध धर्म के लोगों के बीच संघर्ष चलता रहता था। एक जैन चित्रकार ने एक ऐसा चित्र बनाया जिसमें भगवान बुद्ध भगवान महावीर को प्रणाम कर रहे है। इससे अशोक को इतना क्रोध आया कि उन्होंने बंगाल में 80,000 जैनियों को मरवा डाला था।

ऐसी ही एक और घटना होने पर अशोक ने घोषणा कि जो एक जैनी का सिर काट कर लाएगा उसे एक स्वर्ण मुद्रा देगा। तब विद अशोक को जैनी समझा कर एक व्यक्ति उसका सिर लेकर राजा के पास गया। 


विद अशोक का सिर देख आकर अशोक को बहुत दुःख हुआ। वह उस व्यक्ति को मृत्यु दण्ड देने ही बाले थे जब उनके मित्र तथा मंत्री राधा गुप्त ने कहा किहे ! सम्राट जब तक आप हिँसा पथ को पूरी तरह नहीं छोड़ देते तब तक आप को ऐसे ही दुःख उठाने पड़ेगे।” 


और फिर अपने भाई की मृत्यु से द्रवित हुए सम्राट अशोक ने सभी धर्मो का सामान भाव से आदर करना प्रांरभ किया।  


कहा जाता है कि उनका अंतिम समय गंगा के किनारें बीता। पलटिपुत्र के पाह जहा वे घ्यान में लीं थे। सत्ता की चकाचौंध से दूर आत्मा की शांति मिली। उनकी मृत्यु ईशा पूर्व 232 के आस पास हुई। लेकिन वे इस संसार से चुचाप नहीं गये। वे अपने पीछे शांति और न्याय की वह लौ छोड़ गए। जो सदियों तक बुझी नहीं। 


उन्होंने अपने उत्तराधिकारियों को केवल एक विशाल साम्राज्य सौंपा बल्कि एक विचार एक दर्शन भी दिया। धर्म करुणा और अहिंसा का। उनकी अस्थियां कई भागों में बांटी गई। और उन पर स्तूपों का निर्माण हुआ सिर्फ उनके लिये बल्कि उस विचार के लिये जो उन्होंने जिया। एक ऐसा सम्राट जो तलवार की जगह विचार से जीतता था। इतिहास में अशोक की विरासत अनमोल है। 


भारत में उनके बनवाये गए मठ. स्तूप और शिलालेख आज भी जीवित प्रमाण है उस युग के जब एक सम्राट ने अपना अहंकार त्याग कर मनुष्यता का वरण किया। ये स्थान आज भी श्रद्धा के केंद्र है। इतिहास के नहीं बल्कि जीते जागते विश्वास के।

इतिहासकारों ने अशोक को केवल एक सम्राट नहीं एक युगदृष्टा कहा है। अशोक ने बताया कि सच्ची शक्ति वह नहीं जो भय से राज करें बल्कि वह जो प्रेम से दिलों में राज करें। उनके भीतर के परिवर्तन ने इतिहास को बदल दिया। एक युद्ध नायक से करुणामय सम्राट तक की यह यात्रा आज भी प्रेरणा देती है।  

अशोक ने दिख दिया कि सम्राट की सबसे बड़ी विजय तलवार से नहीं दिल से होती है। इस तरह अशोक महान मौर्य वंश के केवल सबसे शक्तिशाली सम्राट थे बल्कि धर्म, करूणा और मानवता के प्रतिक बन गये। राजपथ से उतर कर धर्म पथ पर चलने  वाले महा पुरुष के रूप में दिखते है। 


जिसने वास्तव में महान होने का अर्थ दुनिया को सिखाया। तो यह थी उस सम्राट की कहानी जिसने तलवार से नहीं करुणा से इतिहास रचा। एक ऐसा राजा जिसने युद्ध की राख में अपनी आत्मा को खोला और फिर पूरी दुनिया को धम्म की रोशनी से जगाया। अशोक के बाद क्या हुआ? क्या धम्म जीवित रहा? क्या मौर्य साम्राज्य उसी दिशा में आगे बड़ा?



विष कन्या

सम्राट अशोक के जीवन का उत्तरार्ध चल रहा था। कलिंग के युद्ध से आहत हो कर सम्राट ने बौद्ध धर्म अपना लिया। वे अहिंसक हो गए। युद्ध से दूर हो गए। उसी समय श्रीलंका में तिष्य नमक राजा राज्य करते थे। वे बहुत ही लोकप्रिय तथा जन प्रिय थे। 


उनके अंदर सद्भावना कूट कूट कर भरी हुई थी। जनता उन्हें अपने पिता की तरह प्रेम करती थी। राजा तिष्य ने अपने राज्य संचालन के लिए अनेक विभाग बनाए थे। जो कि वास्तव में अशोक के महामंत्री कौटिल्य के विभागों से प्रेरित थे। 


उन्हीं विभागों में एक विभाग था गुप्तचर विभाग। वैसे तो गुप्तचरों में अधिकांश पुरुष ही होते थे। लेकिन उसमें भी विष कन्याओं का एक खास विभाग था। जिसमें केवल सुन्दर और शिक्षित स्त्रियाँ ही रहा करती थी। ये विष कन्याऐं बास्तव में उस देश की वेश्याएं होती थी। ऐसी वेश्याए जो बचपन से ही तेजतर्रार तथा सुन्दर हुआ करती थी। 


वेश्या या गणिका की जो भी पुत्री बहुत सुन्दर और शिक्षा में दक्ष्य होने लगाती थी उसे विष की बहुत ही छोटी मात्रा दी जाने लगती थी। इतनी मात्रा जिससे उसके शरीर पर विपरीत प्रभाव ना पड़े। लगातार विष की छोटी-छोटी मात्रा देते रहने से उसके शरीर में विष के लिए अनुकूलन पैदा हो जाता। 


और अपनी युवावस्था में आते आते इतनी खतरनाक हो जाती कि उस विष से जिसकी चाहे जान ले सकती थी। अथवा जिसकी चाहे विष से जीवन रक्षा कर सकती थी। वे गणिकाएं अपनी कला में भी माहिर हो जाती थी। 

वे शत्रु राज्यों में जाती और वहां के बड़े-बड़े ऊंचे पदों पर बैठे अमात्यों से अपनी कला के द्वारा सनसर्ग स्थापित करती। और उनसे ऐसे-ऐसे गुप्त रहस्य निकवा लेती जिससे कि उनके अपने देश का अहित हो सकता था। इन्हीं विष कन्याओं में से एक थी तिष्यरक्षिता। 


तिष्यरक्षिता की उम्र बड़ी ही काम थी और उसका कोई नाम भी नहीं था। क्योंकि वास्तव में विष कन्याओं का नाम होता घर और ही परिवार ही होता था। तो तिष्यरक्षिता का तब तक नाम कुछ भी नहीं था इसलिए उसे विष कन्या के नाम से पुकारा जाता था। 


विष कन्याओं के बारे में लोगों को तभी पता चलता जब उसको तैयार करने वाली महिला राजा के सामने जा कर कहती थी कि हमारे यहां एक विष कन्या तैयार हो गई है। उस विष कन्या को वह शिक्षिका बड़े मनोयोग से तैयार कर रही थी। 


वह विष कन्या अभी अपनी युवावस्था में भी नहीं पहुंची थी कि शिक्षिका को उससे पुत्री जैसा प्रेम हो गया। वह शिक्षिका भी अपनी युवावस्था में विष कन्या रह चुकी थी। वह जानती थी कि एक विष कन्या का जीवन कितना निर्मम होता है। 


वह ना तो किसी से प्रेम कर सकती है और घर बसा सकती है। और जीवन के अंतिम पलों में वह बिलकुल निसंग और अकेली हो जाती है। जब उस शिक्षिका को उससे पुत्री जैसा प्रेम हो गया तो वह नहीं चाहती थी कि इसका जीवन ऐसे गुजरे। 


वह सोचने लगी कि किसी तरह यह राजा के रानिवास में शामिल हो जाए या राजा की दासी ही बन जाए तो जीवन सुचारू रूप से चलने लगेगा। इसमें शिक्षिका का स्वार्थ भी था। यदि उसकी प्रिय शिष्या राजा की खास हो जाएगी तो वह भी किसी किसी राजा के नजदीक हो जाएगी। और फिर उसके जीवन का अंतिम समय सुखमय हो जाएगा। 


उसने एक षड़यंत्र रचा उसने राजा के उद्यान में एक नाग छोड़ दिया। यह वही नाग था जिसके विष से वह नाग कन्या को विष देकर तैयार कर रही थी। उसे नागों के बारे में अच्छी जानकारी थी। तो षड़यंत्र के अनुसार जब राजा उद्यान में टहल रहे थे। उस नाग ने राजा को काट लिया। 


उसी समय वह विष कन्या भी वहां पर उपस्थित थी। जब तक दास दासी कुछ समझते, जब तक वे राज वैद्य को बुलाते तब तक उस युवा विष कन्या ने राजा का विष को चूस कर उनके शरीर से बाहर निकाल दिया। 


राजा के प्राण बच गए। लेकिन अपने गुरु के सिखाए अनुसार वह विष कन्या वहां नाटक करने लगी। राज्य वैध आये और उन्होंने बेहोशी की दवा दी। फिर सही समय पर वह विष कन्या अपने होश में आने का नाटक करने लगी। 


विष कन्या तो होश में गई लेकिन राज्य में यह खबर आग की तरह फ़ैल गई कि एक सुन्दर लड़की ने राजा के प्राण बचाये है। वह अतीव सुन्दर तथा बड़ी बहादुर है। 


कुछ समय बाद राजा तिष्य ने उस लड़की की और देख वह बहुत सुन्दर थी। लेकिन राजा तिष्य उससे उम्र में बहुत बड़े थे। वे सद्भावना बाले व्यक्ति थे उनको उस लड़की पर पुत्रीवत ही स्नेह आया। उन्होंने उस लड़की को अपनी खास दासियों में शामिल कर लिया। वहां से वह तिष्यरक्षिता के नाम से जानी जाने लगी। 


तिष्यरक्षिता इसके बाद राजा के महल में रहने लगी। वह सुन्दर तो थी ही उसमे काम कला भी थी। वह बड़ी ही सुन्दर स्त्री में परिणत हो रही थी। उसकी यौवनावस्था आने ही वाली थी। इसी समय राजा अशोक के एक पुत्र तथा एक पुत्री श्रीलंका आते है। 


वे राजा तिष्य के यहां जा कर बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार करते है। अशोक की कई रानियां थी। इनमें से असंगमित्रा पट्ट महिरिषी यानी राज माता थी। जिनको मुख्य रानी का अधिकार प्राप्त था। बाकी सब महारानियां थी। इन्ही मे से देवी के पुत्र तथा पुत्री राज्य काज में रुचि ले करके बौद्ध धर्म में रुचि लेने लगे थे। 


वे दोनों ही श्री लंका बौद्ध धर्म का प्रचार करने गए थे। तो इन लोगों के प्रभाव में कर राजा तिष्य ने बौद्ध धर्म अपना लिया और बौद्ध बन गए। जब महेंद्र राजा को दीक्षित कर वहां से लौटने लगे तो राजा ने उन्हें बहुमूल्य वस्तुएं भेंट की। उन वस्तुओं में तिष्यरक्षिता भी शामिल थी। वह महेन्द्र के साथ अशोक के दरबार में लाई गई।

उस नवयौवना का सौंदर्य देख कर सब आश्चर्य चकित रह गये। सभी उसे आँखें अपलक उसे देख रही थी। उस स्त्री रत्न के सामने सभी उपहार फीके पड़ गए थे। पूरे राजदरबार में एक सन्नाटा छा गया। बहुत देर बाद महेन्द्र ने राजा के सामने जब अपनी उपलब्धियों को वहां कहा तब राजदरबार में खुशी की लहार दौड़ गई। 


तिष्यरक्षिता को रनिवास में भेज दिया गया। अब अशोक से उसकी नजदीकियां बढ़ाने लगी। और उस समय काल ही बलवान था जब उस नवयौवना तिष्यरक्षिता से विवाह का निर्णय कर लिया। यहीं विवाह मौर्य वंश के पतन का कारण बना। सम्राट अशोक उसके रूप पर मोहित थे और वह लड़की अपनी शिक्षिका के महत्वाकांक्षा के बोये बीज से प्रेरित थी।

उस लड़की ने इस विवाह का विरोध नहीं किया और नहीं कोई राजा की इच्छा  का विरोध कर सकता था। तिष्यरक्षिता सम्राट अशोक की रानी बनी। वह राजमाता तो नहीं बन सकती थी लेकिन अशोक की प्रिय रानी होने का खिताब तो उसे मिल ही गया था। 


वह सम्राट अशोक के महल में रहने लगी। वहां रहते हुए उसने अपने यौवन के दिनों का अनुभव किया। सम्राट अशोक उसकी यौन इच्छा को पूरा नहीं कर पाते थे। वह अपनी यौन इच्छा की आग में जलती रही।

उसकी उस आग को बुझाने वाला कोई नहीं था। वह सम्राट की पत्नी थी तो किसी दूसरे पुरुष में तो इतनी हिम्मत ही नहीं थी कि उसे काम भाव से देख भी सके।  


और उसके आसपास दासियां भी होती थी जिनके रहते वह ऐसा कुछ भी नहीं कर सकती थी। उसकी महत्वाकांक्षा तो पूरी हो गई थी लेकिन शारीरिक जरूरतें पूरी नहीं हो रही थी। उसके सबसे बड़े दुश्मन थे बौद्ध धर्माचार्य। 


क्योंकि सम्राट अशोक अपनी वृद्धावस्था में विवाह तो कर लिए थे लेकिन उनका अधिकांश समय उन्हीं लोगों के साथ गुजरता था। वे अपने धर्म चक्र प्रवर्तन तथा सत्संगों में इतने व्यस्त रहा करते थे कि वे तिष्यरक्षिता को समय भी नहीं दे पाते थे।


युवराज कुणाल 


ऐसे ही दिन गुजर रहे थे। तिष्यरक्षिता का महल बहुत वैभवशाली था। राज उद्यान उसके बगल में था। लेकिन इस वैभव से वह सन्तुष्ट नहीं थी। उसकी देह को कोई संतुष्टि नहीं थी।  एक दिन वह इसी असंतुष्टि  के कारण उदास अपने महल में बैठी थी कि वीणा की स्वर लहरिया उसके कानों में पड़ी।

वे वीणा की स्वर लहरियां इतनी जीवट तथा मादक थी कि उसे लगा उसकी इच्छाओं को स्वर मिल रहे हो। इतना मधुर संगीत उसने पहले कभी नहीं सुना था। उसके मन की समस्त चिंता संगीत के सुरों में डूब गई।  


उस स्वर का पीछा करते तिष्यरक्षिता की दृष्टि एक अमलतास के वृक्ष के नीचे बैठे युवक से टकराई। वह मुग्ध हो उठी। पीत वस्त्र धारण किये रत्न जड़ित उत्तरीय कन्धे पर डाले वीणा के तारों से अठखेलियां करती स्वर्ण मुद्रिका बाली उंगलियां दुनिया से बेखबर अपने संगीत में खोया यह युवक कौन है


इसके पहले तो कभी भी उसके इस उद्यान में इस युवक को नहीं देखा था। तभी एक युवती दासियों के साथ वीणा बादक के पास आई। दासियां उसे वीणा बादक के पास छोड़ कर चली गई। 


वह कुछ देर ठोढ़ी पर हाथ रखे वीणा वादन में खोई रही। फिर धीरे-धीरे युवक के बाल सहलाने लगी। वाद्यन्त्र का स्वर और भी मधुर और उत्तेजक हो उठा।


देह का रोमांच वीणा के तारों में कर समां गया। संगीत एकाएक अपने चरम पर पहुंच कर रुक गया। युवक ने उस युवती को अपने अंकपाश में बांध लिया। मानो प्रकृति इस दृश्य को देख कर ठिठक गई हो। महादेवी तिष्यरक्षिता अपने गवाक्ष में खड़े-खड़े उन दोनों की प्रेम लीला को देख रही थी। 


उसके दिल में एक तूफान उत्पन्न हो रहा था। क्या यह युवक मुझे नहीं मिल सकता। यह कौन है इतना सुन्दर युवक? इस स्त्री के साथ। यह मेरे साथ क्यों नहीं। उसने ताली बजाई। ताली बजने के साथ एक परिचारिका अभिवादन के साथ नतमस्तक हो कर खड़ी हो गई। 


उस परिचारिका ने कहा आज्ञा करे महादेवी। महादेवी ने कहा पता लगाओं यह युवक कौन है। महादेवी ने अमलतास के पेड़ की और इशारा किया। परिचारिका ने एक दृस्टि उधर डाली। और तत्काल ही अभिनय के साथ बोली। 

क्षमा करें महादेवी शायद आप को ज्ञात नहीं एक कुमार महारानी पद्मावती के पुत्र युवराज कुणाल है। यही मगध के भावी सम्राट होंगे। इस समय तक्षशिला के अधिपति है। साथ में युवरागी कनक लता है।  


तिष्यरक्षिता को यह सुन कर बड़ा ही आश्चर्य हुआ कि सम्राट का एक पुत्र इतना युवा इतना सुन्दर है। और उसे इसका पता भी नहीं है। उसने अपनी परिचारिका से कहा कि हमारे विवाह को इतना समय हो गया और युवराज और युवरागी हमें प्रणाम करने भी नहीं आये। 


तब उस परिचारिका ने कहा कि कल संध्या को ही यह तक्षशिला से लौटे है। यह सुनकर महादेवी तिष्यरक्षिता ने कहा कि ठीक है। जाओ और युवराज कुणाल को हमारा संदेश दे दो कि मैं उनसे मिलाना चाहती हूँ। लेकिन यह सन्देश अभी मत देना रात्रि के पहले पहर में देना। 


सम्राट के बच्चों में कुणाल सम्राट का प्रिय पुत्र था जिसे सम्राट ने तक्षशिला का उप राजा नियुक्त किया था। कुणाल हिमालय में पाये जाने वाले एक पक्षी का नाम है जिसकी आँखें बड़ी सुन्दर होती है। कुणाल की भी आँखें बड़ी सुन्दर थी। इसीलिए उसका नाम कुणाल रखा गया था। वास्तव में कुणाल अशोक के सभी पुत्रों में सबसे अधिक योग्य था। 

अशोक के विशाल राज्य के संचालन के लिए एक योग्य राजा की ही आवश्यकता थी और कुणाल उस योग्य था। इसी कारण अशोक कुणाल से बहुत प्रेम करते थे। उसे तक्षशिला का राज्य दे दिया गया था।  


जब परिचारिका तिष्यरक्षिता का संदेश ले कर चली गई तब तिष्यरक्षिता ने अपनी शृंगार करने में दक्ष सखी वसुमित्रा को अपने कक्ष में बुलाया। कक्ष में अंधेरा था। वसुमित्रा ने कक्ष में दीप स्तम्भ प्रज्वलित किये। कक्ष प्रकाश से जगमगा उठा। महादेवी स्वर्ण पीठिका पर उदास बैठी थी। 


वसुमित्रा ने इसे लक्ष्य किया फिर प्रणाम करते हुए पूछा महादेवी कैसे याद किया क्या उदासी का कारण जान सकती हूँ। महादेवी ने कहा क्या सम्राट राज भवन में पधार चुके है वसुमित्रा


नहीं महादेवी आज तो सम्राट को लौटने में विलम्ब होगा। ज्ञात हुआ है कि सभा भवन में महामत्यों के साथ कोई गुप्त मंत्रणा चल रही है। 


उसके बाद धर्माचार्य का प्रवचन धर्म प्रांगण में होगा। अर्ध रात्रि से पहले सम्राट राज प्रसाद में लौट ही नहीं पायेगें। तब उस महादेवी का कंठ भर आया उसने कहा हां वसुमित्रा सम्राट के पास अपनी महादेवी के लिए समय ही कहा होता है।

इसके बाद उसने वसुमित्रा से कहा क्या तुम मेरे श्रृंगार करेगी। तब वसुमित्रा ने कहा क्यों नहीं महादेवी। यह तो मेरा काम है है। वसुमित्रा ने राज उद्यान से चंपा, चमेली और मोगरे की अधखिली कालिया मंगवाई। उन्हें गूथ-गूथ कर वसुमित्रा महादेवी की वेणी सजाने लगी।  हाथ अपना काम कर रहे थे। 


लेकिन मन में कौतूहल था कि आज असमय यह शृंगार क्यों? लेकिन उसने शृंगार किया। उससे रहा नहीं गया। उसने महादेवी से पूछा कि महादेवी इस असमय श्रृंगार का कारण क्या है? तब महादेवी ने कहा युवराज कुणाल हमें प्रणाम करने आने वाले है आखिर वह मगध के भावी सम्राट है क्या उनका स्वागत ऐसे नहीं करना चाहिए। 


वसुमित्रा समझ नहीं पाई कि महादेवी युवराज की प्रशंसा कर रही है या उपहास उड़ा रही है। उसने कहा युवराज कुणाल है ही ऐसे जो भी उन्हें देखता है प्यार करने लगत है। क्या आपने उन्हें बुलवाया है? महादेवी ने एक मीठी सी हुंकार ली और फिर चुप हो गई। 


महादेवी के चुप होते ही वसुमित्रा की यह अधिकार नहीं था कि वह आगे कोई प्रश्न करती। वह शृंगार पूरा कर वहां से चली गई। रात्रि के पहले पहर में दासी ने जैसे ही कुणाल को बताया कि महादेवी तिष्यरक्षिता याद कर रही है तब कुणाल तत्काल ही महादेवी के कक्ष में आये।


तिष्यरक्षिता

अशोक की पांचवी और अंतिम पत्नी तिष्यरक्षिता थी, जो एक साधारण महिला थीं। प्रमुख रानी असंधिमित्रा की मृत्यु के बाद, तिष्यरक्षिता ने अशोक की देखभाल की और अपनी खूबसूरती और नृत्य से उन्हें मोहित कर लिया। उनका रिश्ता जटिल था, क्योंकि तिष्यरक्षिता की उम्र अशोक से बहुत कम थी। उन्होंने बाद में खुद को प्रमुख रानी घोषित करवा लिया।

तिष्यरक्षिता का व्यक्तित्व जटिलताओं से भरा था। वह एक अधीर, लोभी और गहन असुरक्षा से घिरी महिला थी। एक साधारण परिवार से होने के कारण, वह सदैव राजमहल की चकाचौंध के बीच खुद को छोटा महसूस करती थी।

यह हीन भावना एक ऐसे मानसिक ज्वर में बदल गई, जिसने उसे लगातार यह विश्वास दिलाया कि उसका अस्तित्व केवल कुणाल के प्रेम और उसके पद पर निर्भर होगा।

उसके भीतर का यह प्रेम, शुद्ध स्नेह नहीं, बल्कि एक जुनून था। कुणाल पर उसका अधिकार पाना एक ऐसी प्यास बन गया था, जो कभी बुझ नहीं सकती थी।

उसे यह असहनीय था कि कुणाल  का ध्यान किसी और पर जाए। कुणाल की सुंदरता, उसकी विनम्रता और सम्राट के हृदय में उसका स्थान तिष्यरक्षिता के लिए एक असहनीय पीड़ा बन गया था।

यह पीड़ा धीरे-धीरे ईर्ष्या के विष में बदल गई, जिसने उसकी बुद्धि को हर लिया। उसने कुणाल को अपनी सत्ता और प्रेम दोनों के लिए एक सीधा खतरा मान लिया, और इस मानसिक अस्थिरता ने उसे एक ऐसी भयानक साजिश रचने पर मजबूर किया।

एक दिन उसने कुणाल को अपने कक्ष में बुलाया। तिष्यरक्षिता को महादेवी का पद प्राप्त था। उसके आदेश पर कुणाल को आना ही था।

उस सुन्दर युवक ने कक्ष में प्रवेश करते हुए कहा माते आपका यह पुत्र आपको प्रणाम निवेदित करता है। कहिए आपने कैसे याद किया? माते शब्द सुनते ही तिष्य रक्षिता के शरीर में आग की ज्वाला भड़क उठी।

तिष्यरक्षिता विनम्रता से "राजकुमार, आपके नेत्रों की सुंदरता ने मुझे मोहित कर लिया है।"

कुणाल आश्चर्य से "रानी माँ, आप यह कैसी बातें कह रही हैं? ये नेत्र तो बस मेरे हैं।"

तिष्यरक्षिता "नहीं, ये नेत्र नहीं, ये तो सूर्य की दो किरणें हैं, जो मुझ जैसी साधारण नारी को भी प्रकाशमान कर देती हैं।"

तिष्यरक्षिता की बातों में चालाकी झलकती है। वह कुणाल के सरल स्वभाव का फायदा उठाना चाहती है।

राजमहल के उद्यान में तिष्यरक्षिता कुणाल को एक सुनसान जगह पर बुलाती है।

तिष्यरक्षिता मुस्कुराते हुएराजकुमार, तुम्हारे नेत्र तो किसी ऋषि की तरह निर्मल हैं। क्या तुम जानते हो कि इन नेत्रों में मुझे सम्राट का ही प्रतिबिंब दिखता है? ऐसा लगता है, जैसे इन नेत्रों के कारण ही सम्राट का प्रेम तुम पर बरसता है।

कुणाल विनम्रता सेरानी माँ, आप यह कैसी बातें कर रही हैं? ये नेत्र तो बस मेरे शरीर का एक अंग हैं।

तिष्यरक्षिता चालाकी सेनहीं, राजकुमार। ये नेत्र तुम्हारे मन का दर्पण है। मैं चाहती हूं कि तुम एक दिन के लिए अपनी दृष्टि मुझे दे दो, ताकि मैं भी तुम्हारे माध्यम से महाराज के हृदय को देख सकूँ।


लेकिन उसने अपने आप को शांत रहते हुए कहा माते? क्या मैं तुम्हें माते लगाती हूँ? मैं तुमसे समवयस्क हूँ। उम्र में तुमसे कम ही रहूंगी अधिक नहीं।

इसलिए हे सुन्दर तुम मुझे माते मत कहो। यह अजीब सा लगता है। तुम मुझे कुछ और कहों। कुछ और नहीं तो मेरे नाम से पुकारो। मुझे तिष्यरक्षिता कहों। इतना सुनते ही उस सुन्दर युवक की आँखें फैल गई।

उसने कहा कि आप मेरे पिता की पत्नी है। आप मेरी माता है और समवयस्क होते हुए भी मैं आपको माता के अलावा कुछ नहीं कह सकता हूँ। यह सब सुनने के बाद भी तिष्यरक्षिता का हौसला नहीं टूटा।

उसने अपने हावभाव से उस सुन्दर युवक को लुभाने की पूरी चेष्टा की। लेकिन जब वह युवक नहीं पिघला तो तिष्यरक्षिता ने खुल कर अपने प्रणय का निवेदन कर दिया। यह सुन वह युवक आग बबूला हो गया।

उसने कहा कि यदि आप मेरी माँ नहीं होती तो आपका वह हश्र करता जो आप सोच नहीं सकती है। इतना कह कर वह युवक जिसका नाम कुणाल था वह तो कमरे से बाहर चला गया। लेकिन उसका यह कह देना ही उस मौर्य वंश के पतन का कारण बना।

कुणाल उसकी बातों में छिपे छल को नहीं समझ पाता। उसे लगता है कि उसकी रानी माँ बस एक अजीब सी इच्छा व्यक्त कर रही हैं। उसके भोलेपन और सद्भावना ने ही उसे उस जाल में फँसा दिया, जो तिष्यरक्षिता के असुरक्षित मन ने बुना था।

तिष्यरक्षिता का प्रेम एक ऐसा एक तरफा प्रेम था, जिसमें दूसरे व्यक्ति की खुशी से अधिक स्वयं का अधिकार और सुरक्षा महत्वपूर्ण थी। उसने अशोक से प्रेम किया, पर उस प्रेम का आधार उसकी अपनी ही असुरक्षा थी।

तिष्यरक्षिता के एक दिन फिर कुणाल को अपने कक्ष में बुलाया। कक्ष में आते ही उन्होंने महादेवी को प्रणाम करते हुए कहा माते आपका पुत्र आपको प्रणाम निवेदित करता है। इसे स्वीकार करे। माते शब्द सुनते ही उसके शरीर में आग लग गई। उसे अपना शृंगार जलता हुआ प्रतीत होने लगा।

उसे लग रहा था जैसे उसके शरीर पर फूल नहीं अंगारे रख दिए गए हो। लेकिन उसने शांत रहते हुए कहा कि इतने दिन हो गए कि तुमने कभी यह नहीं सोचा कि अपनी मां से चल कर मिल लिया जाय और माँ ही क्यों क्या मैं तुम्हें माँ लगाती हूँ? क्या मैं तुम्हारी ही उम्र की नहीं हूँ


जब तुम मुझे माँ कहते हो तो मुझे बड़ी ग्लानि महसूस होती है। तुम मुझे तिष्यरक्षिता कहो। तब कुणाल ने कहा माँ ऐसा नहीं है मैं अभी एक गुप्त मंत्रणा में व्यस्त हूँ इसलिए में यहां अधिक देर ठहर नहीं सकता हूँ। लेकिन में फिर भी आप को यह कह देता हूँ क़ि में आप को माँ के अलावा कुछ नहीं कहूँगा।

आप भले ही मेरी समवयस्क है लेकिन है तो मेरे पिता की पत्नी ही। और यह मेरा कर्तव्य बनता है कि मैं आप को माँ कहूँ और माँ की तरह आप के साथ व्यव्हार करू। यह कह कर कुणाल तेजी के साथ वहां से निकल गए। तिष्यरक्षिता ठगी सी खड़ी उन्हें जाते हुए देखती रही।

प्रथम दिवस से ही जबसे उसने कुणाल को देखा था वह लगातार कामदेव के तीर से घायल हो रही थी। कुणाल जब भी आते वह किसी किसी बहाने उनके अंग लग जाती और उसकी काम की ज्वाला और भड़क जाती।

समय बीत रहा था कुणाल को पाने की कामना लगातार बलवती होती जा रही थी।

उसे सम्राट का सहचर कतई पसंद नहीं था और सम्राट को भी उसके कक्ष में जाने की कोई जल्दी नहीं होती थी। उनके पास उसके कक्ष में जाने का समय भी नहीं था। वे अपनी वृद्धावस्था में थे। वे धर्म को अधिक समय देना चाहते थे। ऐसे में कुणाल उसके जीवन में एक शांति की लहर की तरह आया।

कुणाल जिसकी आँखें वास्तव में बहुत सुन्दर थी। उसकी आँखों ने तिष्यरक्षिता को काबू में कर लिया था। एक दिन फिर उसने कुणाल को अपने कक्ष में बुलाया। जब दसियों ने कुणाल के आने की खबर दी तब उस का मलिन चेहरा पुष्प की भांति खिल गया।

उसने दसियों से उसे तैयार करने को कहा।  चंदन और हल्दी का लेप पूरे शरीर पर लगाया गया। सुगन्धित पुष्प और इत्र के जल से उसे स्नान कराया गया। फिर सुगंधित धूप के धुएं उसके शरीर के पास घुमाये गए। उसने सबसे सुन्दर वस्त्र धारण किये।

उसके केशों को बड़ी ही कला से सुसज्जित किया गया। उसने अपनी दासी को आदेश दिया राजकुमार को कमरे में पूरे सम्मान के साथ लाया जाय। और हां ध्यान रहे कक्ष में मेरे और राजकुमार के अलावा कोई ना रहे। बाहर खड़े प्रहरी को भी कमरे के आसपास नहीं रहने देना। ऐसा उसे आदेश है मेरा।

आज तिष्यरक्षिता अपना मन पूरी तरह बना चुकी थी। उसे आज राजकुमार कुणाल के सामने प्रणय निवेदन करना था। दासी ने हामी भरी और राजकुमार को लिवाने चली गई। वह आईने के पास बैठी खुद को देखकर मंत्रमुग्ध हो रही थी।

उसके रूप के सामने स्वर्ग की अप्सरा भी फीकी पड़ जाए। वह इतनी रूपवती लग रही थी। वह मन ही मन बहुत खुश थी उसे पूर्ण विश्वास था कि राजकुमार उसे अनदेखा कर ही नहीं सकते। वह जरूर उसके निवेदन को स्वीकार कर लेंगे।

कुछ देर वह बैठी-बैठी भविष्य के सपने राजकुमार के साथ बुनने लगी। तभी दासी ने आवाज लगाई महारानी राजकुमार गए है। राजकुमार के आते ही वह अपनी चेतना से बाहर निकली। उसने दासी से कहा कि तुम कक्ष से बाहर जाओ और प्रहरी को कक्ष से दूर जाने को कहो।

दासी वहां से चली गई। राजकुमार ने आगे बढ़ाते हुए कहा प्रणाम माते। माते, कह कर मुझे वृद्ध होने का अहसास क्यों कराते है। जाइये फिर में आप से नहीं बोलूगी। तिष्यरक्षिता ने दांतों को ओठों से दबा कर रूठने का झूठा बहाना किया। कुणाल ने फिर वही तर्क दिए।

कुणाल ने कहा आप जरूर मेरी समवयस्क है पर आप मेरी माता है। इस पर तिष्यरक्षिता ने कहा अच्छा चलिए बैठिये खड़े क्यों है। मेरे पास बैठिये। कुणाल संकोच करते हुए वहीं एक कुर्सी पर बैठ गए। इस पर तिष्य रक्षिता ने कुणाल को अपने करीब आने के लिए कहा। 


राजकुमार को आज तिष्यरक्षिता के हाव भाव ठीक नहीं लग रहे थे वे जल्द से जल्द वहां से जाना चाहते थे। करीब कर तिष्यरक्षिता ने उनके चेहरे को उठाया। यह खूबसूरत आँखे। आप की इन्हीं आँखों ने मुझे घायल कर दिया है राजकुमार।

उसने जानबूझ कर अपना उत्तरीय सरक जाने दिया। जिससे उसके शुगर श्वेत अंग साफ-साफ गोचर हो रहे थे। उस अवस्था में भी कुमार संयमित रहे। अप्रभावित शिव की भांति बैठे रहे।

फिर तिष्यरक्षिता ने आगे कहा मैं आप से अनुराग कर बैठी हूँ। मुझे आप के बिना इस बिस्तर पर जैसे सैकड़ों सर्प डसते है। मैं सम्राट के साहचर्य में भी आप को भूल नहीं पाती। मेरे प्रेम को स्वीकार करे कुमार मैं सर्वदा आपकी दासी बन कर रहूंगी।

तिष्यरक्षिता के इस प्रेम के प्रस्ताव को सुन अचानक कुमार एक शेर की तरह उठे और उन्होंने तिष्यरक्षिता को अपने से दूर धकेल दिया। वे गुर्राए यह क्या कर रही है आप? आप ने पूर्णतः मर्यादा को भुला दिया है। इस पर तिष्यरक्षिता ने कहा हां मैं भूल चुकी हूँ सारी मर्यादा। मैं तुम्हें देख कर लगातार काम के ज्वर से तप रही हूँ।

मुझे अपना लो कुमार। छिः कुमार ने भर्त्सना वाली आवाज में कहा। मुझे तो आप को अब स्त्री कहने में भी लज्जा रही है। आप मेरे पिता की पत्नी है।  आप मेरी माता के समान है। और हाँ में एक विवाहित पुरुष हूँ जो अपनी पत्नी कनक लता से बेहद प्रेम करता है। मैं पूर्णतः संतुष्ट हूँ।

राजकुमार शायद पहली बार इतने गुस्से में थे। वे तेजी से बाहर निकल गए। वे धिक्कार ते हुए चले गए। तिष्यरक्षिता के अहम को आज अत्यधिक चोट लगी थी। उसके आंसू लगातार उसके वस्त्रों को भिगो रहे थे। घायल शेरनी की तरह उसका रुदन बहुत देर तक चलता रहा।

कुछ देर बाद दासी ने कक्ष में प्रवेश किया। लेकिन उसने दासी को भी मन कर दिया और सम्राट को आने से मना कर दिया। अगले ही दिन राजकुमार कुणाल वापिस अपने राज्य लौट गए। जबकि सम्राट चाहते थे कि राजकुमार कुछ दिन और पाटलिपुत्र में रहे। लेकिन राजकुमार की इच्छा वहां रहने की नहीं थी।
 

वह सम्राट के विशाल हृदय को अपना नहीं बना सकी, और जब उसने देखा कि कुणाल को यह प्रेम सहज ही मिल रहा है, तो उसका प्रेम ईर्ष्या में बदल गया।

उसने अपने मन में यह विश्वास बना लिया कि अशोक का प्रेम कुणाल के कारण अधूरा है, और यदि वह कुणाल को हटा दे, तो वह सम्राट के प्रेम की एकमात्र अधिकारी बन जाएगी।

यही वह मानसिक स्थिति थी जिसने एक साधारण नर्तकी को एक निर्मम रानी बना दिया। उसका व्यवहार, उसकी साज़िशें, और उसका क्रूर कार्य... ये सब उसके गहरे मानसिक घावों और एकतरफा प्रेम की त्रासदी का परिणाम थे।

तिष्यरक्षिता का व्यवहार एक ऐसे व्यक्ति का था जो प्रेम और सत्ता दोनों से वंचित होने के डर में जी रहा था। उनका मन एक भंवर जैसा था, जहाँ एक ओर अशोक के प्रति उनका जुनून था, तो दूसरी ओर कुणाल के प्रति घृणा। तिष्यरक्षिता एक साधारण महिला थीं, जो अपनी खूबसूरती और नृत्य के हुनर के कारण सम्राट की रानी बनीं।

उनकी उम्र अशोक से काफी कम थी। इस स्थिति ने उनमें कई तरह की मानसिक उलझनें पैदा की। एक साधारण पृष्ठभूमि से होने के कारण उन्हें हमेशा यह डर रहता था कि कहीं वह अशोक के जीवन से दूर हो जाएं। सम्राट की अन्य रानियों और उनके शाही परिवार के बीच, खुद को स्थापित करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी।

उनका अपनी सुंदरता और नृत्य पर अत्यधिक विश्वास भी इसी असुरक्षा का एक हिस्सा था, क्योंकि यही उनकी पहचान थी।


दर्दनाक अंत

अशोक की प्रिय रानी असंधिमित्रा, जो बौद्ध धर्म के प्रति उनकी भक्ति में भागीदार थीं, का निधन हो गया। अब वह सामग्री के रूप में भी असीमित अधिकार हासिल कर चुकी थी।  


उनकी मृत्यु के चौथे वर्ष बाद, राजा ने कामवासना से प्रेरित होकर राजकुमारी तिष्यरक्षिता को राज-पत्नी का पद प्रदान किया। वह युवा और अभिमानी थी, और अपने व्यक्तित्व आकर्षण के प्रति अत्यंत संवेदनशील थी।

समय गुजरता गया और तिष्यरक्षिता का क्रोध समय के साथ बढ़ता ही गया। उसके हृदय में चुभा हुआ वह कांटा अब नासूर बन कर घाव का एक रूप ले चुका था।

वह मन ही मन सोचती और योजना बनाती कि किस तरह युवराज से अपने अपमान का बदला ले। तभी सम्राट अशोक अस्वस्थ हो गए। राज वैद्य बुलाए गए। परिचारिकाएँ सम्राट की सेवा करती।

लेकिन तिष्यरक्षिता स्वयं सम्राट की सेवा करती। महादेवी के इस सेवा भाव ने सम्राट को अभिभूत कर दिया। वह प्रसन्न हो कर बोले महादेवी तुमने हमें नया जीवन दिया है। हम तुमसे बहुत प्रसन्न है। जो चाहे वह मांग लो। कुछ भी सम्राट, महादेवी ने कहा।

यह प्रश्न पूछ कर क्या सम्राट अशोक की परीक्षा लेना चाहती हो? मांग कर तो देखो सम्राट ने कहा। महाराज अपने वचन से पीछे मत हटियेगा। हंसकर महादेवी ने जैसे सचेत किया।

अशोक वचन देकर पीछे नहीं हटता। क्या यह महादेवी को ज्ञात नहीं। मेरा यह आशय नहीं था महाराज। महादेवी ने कहा। तो फिर इतना विलंब क्यों? सम्राट ने कहा। मैं अपने मन ही मन तौल रही थी महाराज। यदि आप देना ही चाहते है तो मुझे कुछ दिनों के लिए मगध का साम्राज्य चाहिए। 

मगध का साम्राज्य तुम्हारा कब नहीं था महादेवी। यदि फिर भी तुम मगध की एकछत्र सामग्री होना चाहती हो तो तुम्हें आठ दिनों के लिए मगध का साम्राज्य देता हूँ। जय हो सम्राट की। महादेवी ने करबद्ध पुलकित हो कर कहा। उस समय महादेवी मगध की केकई जैसी प्रतीत हो रही थी।

जय हो मगध की सामग्री महादेवी तिष्यरक्षिता की महाराज ने पुलकित हो कर कहा और अपना राजमुकुट उतार कर महादेवी के सिर पर रख दिया। और अपनी उंगली से राजमुद्रा  निकल कर भी महादेवी की उंगली में पहना दी। महादेवी का मन खिल गया। इसी अवसर की तो उन्हें प्रतीक्षा थी।

एक बार जब वह प्रमुख रानी बन गई, तो उन्हें लगा कि यह सत्ता ही उन्हें स्थायी बना सकती है। सत्ता को बनाए रखने के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती थीं। उन्हें डर था कि अशोक की मृत्यु के बाद उनकी स्थिति खतरे में पड़ जाएगी।

राजकुमार कुणाल केवल उत्तराधिकारी थे, बल्कि वे अपनी सुंदरता, दयालुता और ज्ञान के लिए भी प्रसिद्ध थे। अशोक का कुणाल के प्रति गहरा स्नेह तिष्यराक्षा की असुरक्षा को और बढ़ा देता था।

उन्हें लगा कि कुणाल उनकी सत्ता और अशोक के प्यार, दोनों को उनसे छीन लेंगे। उनकी ईर्ष्या एक मानसिक बीमारी का रूप ले चुकी थी, जिसमें उन्हें हर पल खतरा दिखाई देता था।

अशोक शांत भाव से "तिष्यरक्षिता, क्या हुआ है तुम्हें? तुम आजकल उदास रहती हो।"

तिष्यरक्षिता अश्रुपूर्ण नेत्रों से "सम्राट, यह उदासी नहीं, मेरे मन का डर है। मुझे लगता है कि यह महल, यह राजसी वैभव, सब एक दिन मुझसे छिन जाएगा।"

अशोक उसका हाथ पकड़कर, "ऐसा क्यों सोचती हो? तुम मेरी प्रिय रानी हो।"

तिष्यरक्षिता "क्या आप सच कहते हैं, महाराज? आपका हृदय तो उस राजकुमार में बसता है, जिसके लिए आप मुझे भी भूल सकते हैं। वह कुणाल... उसकी आँखों में आपकी छाया दिखती है। मुझे लगता है वह मुझसे भी अधिक सुंदर और प्रिय है।"

अशोक "तिष्यरक्षिता, कुणाल मेरा पुत्र है। वह मेरा उत्तराधिकारी है। उसके प्रति मेरा स्नेह स्वाभाविक है। लेकिन तुम... तुम मेरे जीवन की अंतिम ज्योति हो। तुम्हारे बिना मेरा जीवन सूना है।"

तिष्यरक्षिता अशोक की ओर देखती है, पर उसके मन में संदेह का बीज और गहरा होता जाता है। उसे लगता है कि यह केवल दिलासा है, सच्चा प्यार नहीं।

शाम का समय था, अशोक अपने कक्ष में बैठे थे, जब तिष्यराक्षा उनके पास आईं। उनके चेहरे पर एक अजीब बेचैनी थी।

तिष्यरक्षिता कोमल स्वर मेंमहाराज, क्या आप कभी सच में मुझसे प्रेम कर पाएँगे? मुझे भय है कि यह महल और आप... दोनों मुझसे बहुत दूर हैं।

अशोक उसे अपने पास खींचकरतिष्यरक्षिता, यह कैसी बातें कर रही हो? मेरा हृदय तो अब बूढ़ा हो चला है, और तुम ही हो जो इस संध्या में मेरे जीवन को प्रकाशित करती हो। तुम मेरी प्रमुख रानी हो।

यह सुनकर तिष्यरक्षिता के नेत्रों में एक क्षण के लिए चमक आती है, पर फिर वह शंका के भंवर में डूब जाती है। उसे लगता है कि सम्राट का प्रेम केवल दया है, वह जुनून नहीं जो वह चाहती थी। यह सोचकर उसके मन में कुणाल के प्रति घृणा और गहरी हो जाती है।

अंतिम विश्वासघात

एक दिन तिष्यरक्षिता ने कुणाल को अपने कक्ष में बुलाया था उसने उसे लुभाने की पूरी कोशिश की, लेकिन कुणाल ने उसे अपनी माता कहकर दुत्कारा। इस तिरस्कार ने तिष्यरक्षिता के अहंकार को गहरा घाव दिया। उसके मन में प्रतिशोध की आग भड़क उठी।

उसका कुणाल के प्रति आकर्षण कुछ ही समय में एक जुनून में बदल गया। कुणाल, पद्मावती का बेटा, केवल अशोक का सबसे योग्य उत्तराधिकारी था, बल्कि उसकी आंखें इतनी सुंदर थी कि उसे हिमालयी पक्षी 'कुणाल' का नाम दिया गया था।

तिष्यरक्षिता के पास अब राजमुद्रा थी। उसने तुरंत तक्षशिला के महामात्य वीरभद्र को एक गुप्त संदेश भेजा, जिसमें लिखा था कि वे तुरंत कुणाल की आँखें निकाल लें और उसे राज्य से निकाल दें।

दूसरे दिन सुबह महादेवी का एक विश्वास पात्र संदेशवाहक राजमुद्रा से अंकित एक आदेश लेकर तक्षशिला के महामात्य वीरभद्र के पास पहुंचा। पत्र महामात्य के नाम था। पत्र पढ़ कर वह महामात्य चौक पड़ा। यह कैसी राजाज्ञा? युवराज कुणाल जैसे राजा के लिए ऐसी कठोर आज्ञा।

महामात्य सोच में पड़ गए। युवराज कुणाल के समय से तक्षशिला में पूर्णता शांति और सुव्यवस्था है। युवराज स्वयं तक्षशिला वासियों के सुख दुःख का पूरा ध्यान रखते है। वह प्रजा के प्राण है उनसे किसी का अनर्थ नहीं हो सकता। जब महामत्य को कुछ बात समझ में नहीं आई तब उन्होंने सभी अमात्यों की एक गुप्त बैठक आयोजित की।

पत्र को पढ़कर सब को सुनाया गया। पत्र में लिखा था कि पत्र मिलते ही महामात्य वीरभद्र युवराज कुणाल की दोनों आंखें निकल कर पत्रवाहक के साथ भेज दे तथा कुमार को पत्नी सहित राजभवन से ही नहीं बल्कि तक्षशिला से निष्कासित कर दिया जाय।

यह राजाज्ञा है इसका पालन तत्काल किया जाए। कुणाल को इससे अवगत करा दिया जाए।राजाज्ञा का विलम्ब अपराध माना जाएगा।

पत्र के नीचे राजचिन्ह और राजमुद्रिका अंकित थी। इसे देखकर शक की कोई गुंजाइश नहीं बचती थी। सभी अमात्य सोच में पड़ गये। सम्राट अशोक द्वारा महारानी को साम्रगी बनाये जाने की खबर बाहर किसी को पता नहीं थी।

वह केवल सम्राट और सामग्री के बीच की बात थी। बाहर सम्राट ही वास्तविक राजा थे। कुमार के लिए इतने कठोर दण्ड की व्यवस्था क्यों? यह कुमार के प्रति कोई षड़यंत्र है। यह राजाज्ञा कुमार को पढ़कर कौन सुनाए।

सभी के चेहरे इस बात को सोचते हुए लटक गए। इसी उहापोह में समय खिसकता रहा। महामात्य वीरभद्र ने एक बार फिर पत्र की अच्छी तरह जांच की। आखिर राजाज्ञा का पालन तो करना ही था। राजा से राजाज्ञा की पुष्टि करना राजा का अपमान था।

महामात्य वीरभद्र ने पात्र युवराज कुणाल के सामने रख दिया। पात्र पढ़ कर युवराज ने कहा महामात्य इस पत्र को यहां पहुंचे तीन दिन निकल चुके है तुमने राजाज्ञा पालन में विलम्ब कर राजकोप को आमंत्रित किया है। मैं आदेश देता हूँ कि तुम स्वंय मेरी आँखें ले जा कर महाराज के सामने उपस्थित करोंगे। क्षमा करे युवराज इतना कठोर दण्ड मुझे ना दे।

कुणाल अपने मन में दृढ़ थे उन्हें लग रहा था कि यह पिता कि आज्ञा है और पिता की आज्ञा को टाला नहीं जाता है। उन्होंने महामात्य को कहा आप बधिक को ले कर तुरन्त वधस्थल पर पहुंचे मैं वहां अपने तथा अपनी पत्नी के राजसी वस्त्रों का त्याग कर उपस्थित होता हूँ।

जैसी कुणाल की प्रतिज्ञा थी वैसा ही हुआ। कुणाल की आँखें निकाल ली गई और महामात्य वीरभद्र उन आँखों को ले कर दरबार में पहुंचे। अपने वैभव से परिपूर्ण वह दरबार आम तथा विशेष लोगों से भरा हुआ था। उस दरबार में महामात्य वीरभद्र ने उन आँखों को सम्राट अशोक से सामने कर दिया। 


उन आँखों को देखकर अशोक की धिग्गी बांध गई उन्होंने कहा यह क्या बेहूदा सा मजाक है। महामात्य वीरभद्र ने भरी आवाज में कहा महाराज यह आपकी ही राजाज्ञा थी कि राजकुमार कुणाल की आँखें निकलवा कर उन्हें राज्य से निर्वासित करके आपके सामने उनकी आँखें प्रस्तुत की जाय।  


उन्होंने कुणाल को धोखा देकर अंधा करवा दिया। क्या यह अशोक की आंखों के सामने हो रहा था? या वह अपनी अंतिम पत्नी के धोखे से अनजान थे?

यह देखिये आपका पत्र और आपकी राजमुद्रा का चिन्ह। अशोक यह देख कर दुःख से क़तर हो गए कि यह उनके प्रिय पुत्र की आँखें है। फिर उन्होंने राजाज्ञा को देखा तथा उस पर अंकित मुद्रा को देखा। 


अशोक का जीवन, जो कलिंग युद्ध के बाद पूरी तरह बदल चुका था, एक और तूफ़ान का सामना कर रहा था उनकी पांचवी और अंतिम पत्नी, तिष्यरक्षिता। एक साधारण परिवार से आने वाली, अति सुंदर और नृत्य-कला में निपुण तिष्यरक्षिता, उम्र में अशोक से बहुत छोटी थी। 


वह पहले एक 'विष कन्या' थी, जिसे श्रीलंका के राजा तिष्य ने तैयार किया था और बाद में एक उपहार के रूप में अशोक के दरबार में भेजा गया।


अशोक ने अपने जीवन के अंतिम दिनों में भी शांति नहीं पाई। उनकी अंतिम पत्नी, तिष्यराक्षा, उनकी तरह धार्मिक नहीं थी। वह ईर्ष्या से भरी थी। अशोक के सबसे प्रिय पुत्र कुणाल, जो रानी पद्मावती के बेटे थे, को उनकी आंखें निकालने के लिए एक भयानक साजिश रची गई। वे तुरंत समझ गए कि यह किस की चाल है। 


इसी बीच में तिष्यरक्षिता ने बोधि वृक्ष को भी कटवा दिया था। वह अशोक के बौद्ध धर्म में इतना समय देने से जला करती थी। उसे बोधि वृक्ष अपनी सौतन की तरह प्रतीत होता और इसलिए उसने  बोधि वृक्ष  को कटवा दिया। 


अशोक की इस पत्नी ने ईसा पूर्व 232 में बौद्धी वृक्ष को नष्ट कर दिया गया था। राजा तिष्यरक्षिता के इस पाप को देख कर आहत हो गए। 


वे बौद्ध धर्म में दीक्षित थे अहिंसक थे लेकिन इस क्रूर कृत्य को देखने के बाद उनकी अहिंसा की प्रतिज्ञा भू टूट गई। उन्होंने तिष्यरक्षिता को भरे दरबार में बुलवाया। तिष्यरक्षिता वहां एक बंदी की तरह लाई गई और उस बंदी को राजा ने अपने आसन पर बैठ कर यह दंड दिया कि इस दुष्ट स्त्री को भरे बाजार चौक पर ले जा कर जिन्दा जला दिया जाय। 


यह बड़ा ही वीभत्स था। कभी किसी को भी इतना कठोर दण्ड नहीं मिला था। वह भी एक स्त्री को। महामंत्री ने राजा को समझाने का प्रयास किया। लेकिन राजा ने किसी की बात नहीं सुनी। उसने राजज्ञा दे दी तो दे दी।


जब अशोक को अपनी पत्नी के क्रूर कृत्य का पता चला, तो उनकी अहिंसा की प्रतिज्ञा टूट गई। और फिर भरे बाजार चौक के बीचों बीच तिष्यरक्षिता को जला कर मार डाला गया।

यह विश्वासघात अशोक के लिए एक और गहरा घाव था। वह अब एक टूटा हुआ इंसान बन गए थे। उन्होंने 40 साल तक शासन किया। ईसा पूर्व 232 में अशोक का देहावसान हो गया। मौर्य वंश कुल 137 वर्षों तक चला। अशोक के आगे के वंशज अशोक की विरासत को सम्भाल नहीं सके। 


तिष्यरक्षिता को यह दंड दे दिया गया। तिष्यरक्षिता का अंत एक भयानक नरसंहार के रूप में हुआ, और उसकी क्रूरता ने अशोक को इतना आहत किया कि वे बीमार पड़ गए। 

लोगों को जब तिष्यरक्षिता के इस क्रूर कृत्य के बारे में पता चला तो वे भी उसकी भर्त्सना करने लगे। उन्होंने कहा की अशोक का दिया गया दण्ड सही है। 


तिष्यरक्षिता के द्वारा कुणाल को अँधा करा देने तथा बोधि वृक्ष को कटवाने के कृत्य से दुखी हो कर अशोक बीमार पड़ गया और उसकी मृत्यु हो गई। 


तिष्यरक्षिता ने क्रोध में कर कुणाल की आँखें निकलवाई थी। बाद में उस जगह सम्राट अशोक ने उस जगह पर एक सौ फ़ीट का ऊंचा स्तूप बनवाया था। कुणाल रानी पद्मावती का पुत्र था। जो धर्म वर्धन के नाम से प्रसिद्ध था। 


लेकिन यह विश्वासघात यहीं नहीं रुका। तिष्यरक्षिता ने अशोक की आध्यात्मिक यात्रा के प्रतीक, बोधि वृक्ष को भी कटवा दिया। यह एक सोची-समझी चाल थी, क्योंकि वह अशोक को बौद्ध धर्म से दूर करना चाहती थी। यह तो समय का प्रभाव था कि उस बृक्ष की कुछ कोपलें फिर से फूट पड़ी थी और वह बृक्ष फिर से जीवन्त हो गया था।


अशोक की मृत्यु के बाद, उनके बेटे कुणाल ने राज संभाला, लेकिन आँखों से अंधा होने के कारण वे इतना विशाल साम्राज्य नहीं संभाल पाए। धीरे-धीरे मगध का राज्य छोटा होता गया।मौर्य  साम्राज्य धीरे-धीरे बिखरने लगा। यह राज्य इतना छोटा हो गया। 

कहा जाता है कि अपने जीवन के अंतिम दिनों में, कुणाल पाटलिपुत्र के 'भिखना पहाड़ी' नामक एक चौराहे पर बैठकर भीख मांगते थे।


वह अंधे तथा इतने लाचार थे कि भीख मांगने के कारण इस पहाड़ी का नामभीकना पहाड़ीचौराहा पड़ गया। मौर्य साम्राज्य का इतना दर्दनाक पतन हुआ। 


यह नाम आज भी उनके दुखद अंत की याद दिलाता है। अशोक की महानता के बावजूद, उनके परिवार के भीतर का विश्वासघात मौर्य साम्राज्य के पतन का कारण बन गया।


इतिहास में तिष्यरक्षिता का नाम एक क्रूर और ईर्ष्यालु रानी के रूप में दर्ज है। उन्हें डर था कि अशोक का उत्तराधिकारी कुणाल, उनकी सत्ता को छीन लेगा। इसलिए, उन्होंने एक भयानक साजिश रची। 


सत्ता, प्रेम, और महत्वाकांक्षा का मिश्रण कितना घातक हो सकता है। अशोक ने अपनी तलवार को शांत किया, लेकिन वे अपने राजमहल के भीतर के षड्यंत्रों को शांत नहीं कर पाए।


उन्होंने दिखाया कि जब तलवारें थम जाया तब कलम और कला बोलती है।  साम्राज्य में संवेदना हो तो वह सदियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहता है। 


हर सम्राट का जीवन एक यात्रा होती है। कुछ सूर्य की तरह चमकते है और कुछ चन्द्रमा की तरह शीतलता फैलाते है। 


अशोक की यात्रा केवल एक सम्राट की कहानी नहीं थी यह उस आत्मा की कहानी थी जिसने शक्ति की ऊंचाइयों से उतर कर मानवता की गहराइयों में उतरना चुना। उनके जीवन का अंतिम अध्याय भी उनकी तरह शांत और विचार पूर्ण था। 


अशोक का जीवन, उनकी पत्नियों के जरिए, एक कहानी कहता है एक राजकुमार की कहानी जो सत्ता के लिए अपने भाइयों को मारता है, जो अपनी सत्ता की रक्षा के लिए क्रूरता की हद पार कर देता है, और जो फिर भी प्यार और परिवार की तलाश करता है। 


उनकी विरासत को उनके उत्तराधिकारी संभाल नहीं पाए, और धीरे-धीरे अशोक को भुला दिया गया। उनकी कहानियां और संदेश पत्थरों के नीचे दफन हो गए।


19
वीं सदी में, ब्रिटिश इतिहासकार विलियम जोन्स और जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि का रहस्य खोला। अलेक्जेंडर कनिंघम के काम ने अशोक को इतिहास की धूल से बाहर निकाला और दुनिया को एक ऐसे सम्राट से मिलवाया जिसने क्रूरता को करुणा में बदला था।


आज, सारनाथ का अशोक चक्र भारतीय झंडे पर गौरव से चमकता है, और चार सिंहों वाला प्रतीक भारत का राष्ट्रीय चिन्ह है। यह हमें याद दिलाता है कि एक व्यक्ति की कहानी को भले ही भुला दिया जाए, लेकिन उसके विचार हमेशा जीवित रहते हैं।


लेकिन हर बार, उसकी खोज उसे एक नई साजिश और नए दुख की ओर ले जाती है। क्या वह कभी शांति पा पाएगा?


रहस्यमयी ग्रंथ

अशोक की मृत्यु के बाद भी, उनकी विरासत का एक ऐसा अध्याय था जो इतिहास की किताबों में दर्ज नहीं हुआ। यह एक ऐसा रहस्य था जो तलवार की क्रूरता से भी कहीं ज़्यादा भयावह था। 


कलिंग युद्ध के बाद, जब अशोक ने धम्म का मार्ग अपनाया, तब उनके मन में एक गहरा डर बैठ गया था। उन्हें लगा कि जो वैज्ञानिक ज्ञान और विनाशकारी तकनीक युद्ध में इस्तेमाल की गयी, अगर वह आम लोगों के हाथ लग गई, तो दुनिया का विनाश हो जाएगा।


अशोक ने एक गुप्त संगठन की स्थापना की थी। जिनके पास दुनिया के सबसे खतरनाक तथा रहस्यमयी राज थे। नौ अज्ञात पुरुष और इनके पास थे नौ रहस्यमयी ग्रन्थ। ऐसा कहा जाता है कि इन ग्रंथों में छिपे थे ऐसे रहस्य जो आज भी दुनिया से छुपाये गए है। 


इसी डर से, उन्होंने अपने जीवन का सबसे बड़ा रहस्य स्थापित किया एक गुप्त संगठन, जिसे 'नौ अज्ञात पुरुष' के नाम से जाना जाता था। ये नौ पुरुष, सम्राट के सबसे विश्वासपात्र और बुद्धिमान सलाहकार थे। 


उनका एकमात्र उद्देश्य था दुनिया के सबसे खतरनाक और रहस्यमयी ज्ञान को नौ गुप्त ग्रंथों में संकलित करना और उन्हें मानवता की पहुँच से दूर रखना। यह ज्ञान किसी भी साधारण व्यक्ति के लिए नहीं था। इन नौ ग्रंथों में, हर एक अलग-अलग विज्ञान को समर्पित था।


यह गुप्त संगठन और उसके रहस्यमयी ग्रंथ आज भी इतिहास की पहेली बने हुए हैं। लेकिन क्या ये केवल किंवदन्तियाँ हैं? या अशोक का यह गुप्त संगठन आज भी काम कर रहा है, उन रहस्यों को बचा रहा है जो दुनिया को हमेशा के लिए बदल सकते हैं?


प्रिंसेप की खोज से, इन नौ ग्रंथों के बारे में चौंकाने वाली जानकारी सामने आने लगी पहला ग्रंथ, एक पांडुलिपि के हाशिये पर लिखे एक नोट में प्रिंसेप को 'युद्ध' का ज़िक्र मिला। नोट में लिखा था, "एक कला ऐसी है जो तलवार से नहीं, शरीर से लड़ती है।


उसे लगा कि यह युद्ध कला पर आधारित ग्रंथ का संकेत है, जिसमें मार्शल आर्ट्स की ऐसी तकनीक थीं, जिनसे एक अकेला योद्धा पूरी सेना को घुटनों पर ला सकता था।


दूसरा ग्रंथ एक और दस्तावेज़ में उसे 'स्पर्श से मृत्यु' की बात मिली। प्रिंसेप ने इसे अंधविश्वास माना, लेकिन उस दस्तावेज़ का लेखक जिस भय से यह लिख रहा था, वह उसे चौंका गया


तीसरा ग्रंथ एक पुराने आयुर्वेदिक ग्रंथ में उसे सूक्ष्मजीवों के बारे में असामान्य जानकारी मिली, जिसमें बीमारियों को हथियार बनाने की बात थी। प्रिंसेप ने इसे 'जैविक हथियार' का ग्रंथ समझा।


चौथा ग्रंथ एक पारसी व्यापारी से बात करते हुए, उसे 'पारस पत्थर' की कहानी मिली। यह कहानी सदियों से प्रचलित थी, लेकिन प्रिंसेप को लगा कि यह कहानी नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक रहस्य है।


पाँचवाँ ग्रंथ एक भिक्षु ने उसे 'विचारों के मौन संवाद' के बारे में बताया। यह टेलीपैथी का ही एक रूप था, जिसकी तकनीकें इतनी गुप्त थीं कि सिर्फ़ कुछ चुनिंदा लोग ही जानते थे।

छठा ग्रंथ एक ज्योतिषीय चार्ट में, उसे ग्रहों की चाल का एक ऐसा अनूठा विवरण मिला जो प्राकृतिक आपदाओं से जुड़ा था। यह 'प्रकृति के नियंत्रण' का संकेत था।


सातवाँ ग्रंथ एक शिलालेख में उसे एक ऐसे यंत्र की नक़्क़ाशी मिली जो हवा में तैरता हुआ लगता था। यह 'गुरुत्वाकर्षण-विरोधी' तकनीक की बात कहता था।


आठवाँ ग्रंथ एक सूफी फकीर से उसे 'सम्मोहन' के बारे में पता चला, जिससे किसी के भी मन को नियंत्रित किया जा सकता था। यह ज्ञान किसी के लिए भी खतरा बन सकता था।


नौवाँ ग्रंथ अंत में, एक पुराने जैन मठ में उसे 'भविष्यवाणी' का एक ग्रंथ मिला, जिसमें राजाओं के उत्थान और पतन के सटीक अनुमान लगाने की विधि थी।


अज्ञात पुरुष


प्रिंसेप ने अपने भारतीय पंडितों और विद्वानों से इस प्रतीक के बारे में पूछा, लेकिन सभी ने अनभिज्ञता जताई। एक बूढ़ा साधु, जो वर्षों से उस क्षेत्र में रह रहा था, ने उसे देखकर अपनी आँखें झुका लीं और फुसफुसाया, "साहब... कुछ राज़ को हमेशा राज ही रहने देना चाहिए।


इस चेतावनी ने प्रिंसेप की जिज्ञासा को और बढ़ा दिया। वह समझ गया कि वह सिर्फ़ इतिहास की धूल नहीं झाड़ रहा, बल्कि एक जीवित, खतरनाक रहस्य को छू रहा था।


प्रिंसेप ने अपनी खोज को गुप्त रखा। उसने अलग-अलग मठों, पुरानी पांडुलिपियों और यहाँ तक कि अफ़ीमख़ानों में बैठे बूढ़े कहानीकारों से भी संपर्क किया। 


धीरे-धीरे, टुकड़ों में उसे जानकारी मिली कि अशोक ने नौ ऐसे पुरुषों का संगठन बनाया था, जिन्हें सबसे खतरनाक ज्ञान की रक्षा का भार सौंपा गया था। ये नौ पुरुष और उनके रहस्यमयी ग्रंथ किसी भी सम्राट की सबसे बड़ी ताकत या सबसे बड़ा खतरा बन सकते थे।


रहस्यमयी प्रतीक


उन्नीसवीं सदी का भारत। जहाँ एक ओर ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार और राजनीति की कमान संभाल रही थी, वहीं दूसरी ओर एक ब्रिटिश अधिकारी, जेम्स प्रिंसेप, एक बिल्कुल अलग दुनिया में खोया हुआ था। 


वह कोई साधारण अधिकारी नहीं था, बल्कि एक विद्वान और पुरातत्वविद् था, जो भारत के भूले हुए इतिहास को पुनर्जीवित करने के मिशन पर था। उसका सबसे बड़ा जुनून था अशोक के शिलालेखों को समझना उन रहस्यमयी लिपियों को, जो सदियों से मौन खड़ी थीं।


दिन-रात की मेहनत के बाद, प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि को लगभग पूरी तरह से समझ लिया था। वह सम्राट अशोक के उन स्तंभों और शिलालेखों को पढ़ पा रहा था, जो धम्म और शांति के संदेश देते थे। लेकिन, जैसा कि हर रहस्यमयी कहानी में होता है, उसकी खोज ने उसे एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया, जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी।


एक दिन, जब वह सांची के एक प्राचीन स्तूप पर मौजूद एक दुर्लभ शिलालेख की नकल उतार रहा था, तो उसकी नजर एक अजीब प्रतीक पर पड़ी। यह अशोक के किसी भी ज्ञात चिन्ह से मेल नहीं खाता था। 


यह एक नौ-बिंदुओं वाला तारा था, जिसके चारों ओर एक गुप्त लिपि के कुछ अक्षर खुदे थे। यह चिन्ह इतना सूक्ष्म था कि एक आम इंसान इसे नजरअंदाज कर देता, लेकिन प्रिंसेप की पारखी नज़र इसे पहचान गई। जब उसने उन अक्षरों को समझने की कोशिश की, तो उसे सिर्फ एक शब्द मिला 'गुप्त' यह शब्द उसे बेचैन कर गया।


ख़तरनाक खेल


जेम्स प्रिंसेप जैसे-जैसे इन ग्रंथों के बारे में अधिक जानने लगा, उसे अजीबोगरीब घटनाओं का अनुभव होने लगा। उसके शोध के दस्तावेज गायब होने लगे। उसे लगा कि कोई उसे देख रहा है। एक दिन, जब वह अपने कार्यालय में काम कर रहा था, तो उसे एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक ऐतिहासिक खोज नहीं है। 


यह एक ऐसा जाल है, जिसके धागे आज भी मौजूद हैं। कोई ऐसा है जो नहीं चाहता कि ये राज़ बाहर आएं। वह समझ गया कि 'नौ अज्ञात पुरुषों' का संगठन अभी भी जीवित है, और वह उनके लक्ष्य के रास्ते में रहा है।

जेम्स प्रिंसेप ने एक गुप्त नोट लिखा। वह जानता था कि उसके पास समय कम है। वह अपनी खोज को अधूरा नहीं छोड़ना चाहता था। "यह सिर्फ़ इतिहास की किताबें नहीं हैं," उसने लिखा, "यह एक जीवित रहस्य है। मैं जानता हूँ कि मैं बहुत क़रीब हूँ, लेकिन मुझे लगता है कि वे भी मेरे बहुत क़रीब हैं।


उसने वह नोट अपनी सबसे गुप्त जगह पर छुपा दिया। उसने यह गुप्त नोट एक दिन चुपके से अलेक्जेंडर कनिंघम को दे दिया था। उस रात, अचानक तेज बुखार में वह बीमार पड़ गया, और उसकी मृत्यु हो गई। लेकिन क्या यह सच में एक प्राकृतिक मौत थी? या यह उस रहस्यमय संगठन का काम था, जो हमेशा से राज़ों की रक्षा करता रहा है?


यह कहानी यहां समाप्त नहीं होती, बल्कि जेम्स प्रिंसेप की मृत्यु के साथ एक नया अध्याय शुरू करती है एक ऐसा अध्याय, जिसकी गुत्थी सुलझाने के लिए आने वाली पीढ़ियां तैयार थी। यह सिर्फ एक शुरुआत थी।


इंजीनियर से पुरातत्वविद् 


कनिंघम ने अपने सैनिक कर्तव्यों को निभाते हुए भारत के विभिन्न हिस्सों में यात्रा की। उन्होंने अपने इंजीनियरिंग कौशल का उपयोग प्राचीन इमारतों और टीलों को समझने के लिए किया। उन्होंने अपने समय का उपयोग केवल इमारतों के निर्माण में नहीं, बल्कि जमीन के नीचे दबे हुए इतिहास को खोजने में भी किया। 


इसी दौरान, उन्होंने अपनी जीवन संगिनी से विवाह किया, जिन्होंने उनके इस असामान्य जुनून का समर्थन किया। उनकी पत्नी ने उनके शोध और लेखन कार्यों में उनका साथ दिया, जिससे उनका पारिवारिक जीवन भी उनके व्यावसायिक जीवन की तरह समृद्ध रहा।


कनिंघम के शोध ने जल्द ही उन्हें प्रसिद्धि दिलाई। उन्होंने बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहों को खोजने का बीड़ा उठाया। इस खोज में उनके मार्गदर्शन का आधार थे चीनी यात्री ह्वेन त्सांग और फाह्यान के यात्रा वृतांत। उन्होंने इन प्राचीन लेखों में वर्णित स्थानों को आज के भारत के भू-भाग से मिलाने का अथक प्रयास किया।


एक नई विरासत


प्रिंसेप की खोज ने भारत में एक नए युग की शुरुआत की। कनिंघम, जो तब तक एक सैनिक इंजीनियर थे, अब पुरातत्व में पूरी तरह से समर्पित हो गए। उन्होंने प्राचीन बौद्ध स्थलों, जैसे कि सांची और सारनाथ, का पता लगाया और उनका उत्खनन किया। प्रिंसेप की खोज से मिली जानकारी ने कनिंघम को सही दिशा दी और उन्होंने उन सभी जगहों को खोज निकाला जो कभी केवल कहानियों में थी।


जेम्स प्रिंसेप का 1840 में निधन हो गया, लेकिन उनकी विरासत अमर हो गई। उनकी खोज के 30 साल बाद, 1861 में, कनिंघम ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण  की स्थापना की, जो आज भी भारत के इतिहास और स्मारकों की रक्षा करता है।


दो अलग-अलग लोग, एक सैनिक और एक इंजीनियर, ने अपनी जिज्ञासा और सहयोग से एक पूरी सभ्यता को फिर से खोज निकाला और दुनिया को भारत का असली इतिहास दिखाया। 


यह खोज यही ख़त्म नहीं हुई है यह खोज निरंतर जारी है और हर नई खुदाई नए रहस्य प्रगट करती है। उम्मीद है कि यह यात्रा एक दिन अशोक के गुप्त ज्ञान तक ले कर जाएगी। यह सनातन ज्ञान ही विश्व को एक नये रस्ते पर ले जाएगा और भारतवर्ष एक वार फिर विश्व गुरु बन के पथ प्रदर्शक बनेगा। 







 










 




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