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युग-संधि
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युग-संधि डॉ रवीन्द्र पस्तोर भूमिका इस उपन्यास को लिखने का विचार मेरे मन में तब आया, जब मैंने महान महाभारत युद्ध के उपसंहार पर विचार किया। हमने हमेशा धर्म की लड़ाई लड़ते हुए नायकों की गाथाएँ पढ़ी है, लेकिन युद्ध के बाद क्या होता है? जब स्वयं श्रीकृष्ण अपने जीवन के अंतिम क्षणों में हों, और उनके बनाए हुए साम्राज्य द्वारका का पतन होने लगे तब धर्म को बचाने का भार कौन उठाएगा? यह उपन्यास केवल अनिरुद्ध और उषा की प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि उस अनिश्चित काल की कथा है जब द्वापर युग समाप्त हो रहा था और कलियुग का आगमन सुनिश्चित था। मेरा उद्देश्य उस प्रश्न का उत्तर खोजना था, जब बाहरी संसार में नैतिकता, लोभ और अहंकार की आग भड़क उठे, तो आंतरिक धर्म की लौ को कैसे सुरक्षित रखा जाए? यह कथा राजदण्ड के बजाय ज्ञान के दीप को बचाने की कहानी है। मैंने यह उपन्यास दो मूलभूत कारणों से लिखा है: पहला कारण है कृष्ण की विरासत का संरक्षण, कृष्ण ने ज्ञान गीता और कर्म द्वारका का मार्ग दिखाया। लेकिन पौराणिक कथाओं में, द्वारका डूब गई और यादव आपस में लड़कर समाप्त हो गए। इस उपन्यास का जन्म इस विचार से हुआ कि कृष्ण...