युग-संधि
युग-संधि
डॉ रवीन्द्र पस्तोर
भूमिका
इस उपन्यास को लिखने का विचार मेरे मन में तब आया, जब मैंने महान महाभारत युद्ध के उपसंहार पर विचार किया। हमने हमेशा धर्म की लड़ाई लड़ते हुए नायकों की गाथाएँ पढ़ी है, लेकिन युद्ध के बाद क्या होता है? जब स्वयं श्रीकृष्ण अपने जीवन के अंतिम क्षणों में हों, और उनके बनाए हुए साम्राज्य द्वारका का पतन होने लगे तब धर्म को बचाने का भार कौन उठाएगा?
यह उपन्यास केवल अनिरुद्ध और उषा की प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि उस अनिश्चित काल की कथा है जब द्वापर युग समाप्त हो रहा था और कलियुग का आगमन सुनिश्चित था। मेरा उद्देश्य उस प्रश्न का उत्तर खोजना था, जब बाहरी संसार में नैतिकता, लोभ और अहंकार की आग भड़क उठे, तो आंतरिक धर्म की लौ को कैसे सुरक्षित रखा जाए? यह कथा राजदण्ड के बजाय ज्ञान के दीप को बचाने की कहानी है।
मैंने यह उपन्यास दो मूलभूत कारणों से लिखा है: पहला कारण है कृष्ण की विरासत का संरक्षण, कृष्ण ने ज्ञान गीता और कर्म द्वारका का मार्ग दिखाया। लेकिन पौराणिक कथाओं में, द्वारका डूब गई और यादव आपस में लड़कर समाप्त हो गए।
इस उपन्यास का जन्म इस विचार से हुआ कि कृष्ण का विवेक केवल एक शहर में नहीं, बल्कि एक विचार में जीवित रहना चाहिए। अनिरुद्ध और ऊषा, अपने पुत्र वज्र के माध्यम से, उस ज्ञान को कलियुग के लिए सुरक्षित रखते हैं, जिससे यह सिद्ध होता है कि महान सभ्यताएं भौतिक रूप से नष्ट हो सकती हैं, पर उनका दर्शन अमर रहता है।
दूसरा कारण है धर्म का बदलता स्वरूप, यह उपन्यास दिखाता है कि कलयुग में आकर धर्म का पालन कितना कठिन हो गया है, क्योंकि अधर्म का रंग धुँधला हो गया है। ऊषा की भक्ति के माध्यम से, मैं यह दिखाना चाहता था कि कैसे शिव का रूप भी युग के अनुसार बदला वह विध्वंसक से स्वीकारक बन गए जो हमें सिखाते हैं कि बुराई को नष्ट करने के बजाय, उसे सहन कर रूपांतरित करना ही कलियुग का एकमात्र मार्ग है।
आज के दौर में, जब हम चारों ओर जटिलताओं और असंतोष से घिरे हैं, यह उपन्यास पाठकों को एक आध्यात्मिक मार्गदर्शिका प्रदान करता है।
संयम और संतोष की शक्ति,वज्र के 'धर्म-संकाय' का सिद्धांत है कि "धन को नहीं, व्यक्तिगत संतोष को शक्ति बनाओ।" यह सिखाता है कि लोभ ही सबसे बड़ा शत्रु है, और साधारण जीवन ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।
प्रेम का व्यावहारिक पक्ष, ऊषा और अनिरुद्ध का प्रेम केवल एक रोमांस नहीं है, यह शक्ति उषा और विवेक अनिरुद्ध का संतुलन है। यह दर्शाता है कि एक सफल साझेदारी चाहे वह व्यक्तिगत हो या राजनीतिक तभी संभव है जब उसमें साहस और समझदारी दोनों का मिश्रण हो।
सरलता में धर्म, उषा की कुंडेश्वर महादेव के प्रति अटूट आस्था हमें सिखाती है कि आस्था का सार किसी जटिल अनुष्ठान या भव्य मंदिर में नहीं, बल्कि हृदय की सरलता में है। यह उपन्यास भारतीय पौराणिक कल्पना में कुछ अनूठे तत्वों का मिश्रण करता है।
प्रेम की दार्शनिक नींव, यह कहानी इस बात पर टिकी है कि एक राजकुमारी उषा का प्रेम, जिसे महादेव ने विद्रोह के लिए बल दिया था, अंततः कृष्ण के विवेक के साथ मिलकर एक शांत धर्म की नींव रखता है। यह युद्ध से शांति तक के प्रेम का सफर है।
लोक आस्था का केंद्र 'कुंडेश्वर', हमने कथा के आध्यात्मिक केंद्र के रूप में मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ स्थित वास्तविक कुंडेश्वर शिव मंदिर को चुना है। यह मंदिर और यहाँ के बुंदेलखंडी लोकगीत, कथा को भारत की मिट्टी और लोक-आस्था की गहराई से जोड़ते हैं, जिससे यह कहानी कहीं अधिक प्रामाणिक महसूस होती है।
कलियुग का यथार्थ चित्रण, यह उपन्यास केवल अतीत को नहीं दिखाता, बल्कि भविष्य के लिए एक चेतावनी देता है। यह दर्शाता है कि कैसे यादवों के बीच का असंतोष आज के सामाजिक विभाजन का प्रतीक है, और ज्ञान का संरक्षण ही उस पतन से बचने का एकमात्र मार्ग है।
'युग-संधि' का चित्रण, उपन्यास का सबसे शक्तिशाली पहलू द्वापर से कलयुग में होने वाले संक्रमण का चित्रण है, जहां स्वयं देवताओं के सिद्धांत भी बदल जाते हैं, और नायकों को एक नई नैतिकता की स्थापना करनी पड़ती है।
कुण्डेश्वर के पास ही मेरा जन्म हुआ। बचपन से ही यह स्थान हमारे परिवार, समाज और देश के लोगों के लिये आस्था का केंद्र रहा है। इस कारण मेरे अपने अनुभवों को शब्दों के माध्यम से पाठकों के सामने रखने का विचार शायद बचपन में ही पनप गया था।
वह बीज कहीं अवचेतन में पड़ा रहा। समय आने पर वह बीज ऊगा, बड़ा हुआ और फल को आपके हाथों में बड़े अरमानों के साथ सौंप रहा हूँ।
मेरा मानना है कि यह उपन्यास उन सभी पाठकों के लिए एक प्रेरणा है, जो अराजकता में शांति खोजना चाहते हैं और मानते हैं कि प्रेम की शक्ति किसी भी युद्ध या युग से बड़ी होती है।
डॉ रवीन्द्र पस्तोर
उषा कुंड का रहस्य
बाहर प्रलयंकारी वर्षा की धुन थी। गत तीन दिनों से गगन के मेघ अविराम बरस रहे थे, मानो किसी प्राचीन पाप को धो रहे हों। जमड़ार नदी का जलस्तर गर्भगृह की सीढ़ियों को चूम रहा था, और उसका उफ़ान उषा कुण्ड में एक अलौकिक गर्जना भर रहा था।
मंदिर के वृद्ध सेवक, पंडा जी, जिनके रक्त में पीढ़ी-दर-पीढ़ी की सेवा का संकल्प प्रवाहित था, ने काँपते हाथों से कपाट खोले। ब्रह्ममुहूर्त की प्रथम रश्मियाँ भी गहन मेघों के कारण पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाई थीं, पर मंदिर के भीतर एक अद्भुत प्रकाश व्याप्त था। और फिर, पंडा जी ने वह देखा वह अनादि चमत्कार जो केवल कथाओं में सुना था।
स्वयंभू शिवलिंग पर किसी ने अभी-अभी जल चढ़ाया था। जल की बूँदें इतनी शीतल थीं, जैसे वे अभी-अभी हिमालय के किसी शिखर से लाई गई हों। वहाँ दो धतूरे के फल श्रद्धापूर्वक चढ़ाए गए थे, और पास में ही गंगाजल के पात्र का कुछ अंश भूमि पर बिखरा था।
यह निश्चित था। यह उषा थी। दैत्यराज बाणासुर की पुत्री, जो आज भी अपने महादेव की पूजा करने आती है। पंडा जी का हृदय रहस्य और विस्मय से भर उठा। उनके पिता की बात सत्य थी यह स्थान मनुष्य की सीमा से परे था।
वहीं, उसी क्षण, जब प्रकृति गहन निद्रा में लीन थी, यदुवंश का एक तेजस्वी युवा राजकुमार, अनिरुद्ध, बाणपुर के निकट की सघन वनस्थली में भटक रहा था। वह श्रीकृष्ण के पौत्र थे, जिनका मनमोहक और चंचल था।
किसी दैवीय प्रेरणा या किसी अज्ञात स्वप्न के वशीभूत होकर, वह उस स्थान पर आ पहुँचे थे जहाँ जमड़ार नदी, अपने सारे वेग के साथ, पत्थरों से टकराकर नीचे उषा जलप्रपात के रूप में गिरती थी।
अनिरुद्ध ने घोड़े को रोका। उस गहन अंधकार और वर्षा के मध्य भी, उन्हें उस जलधारा के भीतर एक दिव्य आभा का अनुभव हुआ। यह आभा किसी भौतिक प्रकाश की नहीं, बल्कि विशुद्ध आध्यात्मिक ऊर्जा की थी।
उषा, जो अपनी आराधना पूर्ण कर, उस भूमिगत जलधारा के शांत स्रोत के पास खड़ी थी, अपने ध्यान के आवरण में थीं। उनके केश मेघों के जल से सिक्त थे, और उनके मुख पर महादेव की भक्ति का अनुपम तेज था।
बाणासुर की पुत्री होते हुए भी, उनका सौंदर्य किसी अप्सरा से कम नहीं था, पर उनकी आँखें, जो अब खुलीं, संसार की मोह-माया से परे, एक दैवीय प्रेम की प्यास लिए हुए थीं।
उषा ने जलधारा के पार खड़े उस युवा को देखा।
अनिरुद्ध ने भी देखा।
समय थम गया। वायु का वेग शांत हो गया। वर्षा की बूँदें, जो अब तक प्रलय का संगीत गा रही थी, ओस की कणों-सी शांत हो गईं। उषा के नयनों में शिव के प्रति अनुराग और अनिरुद्ध के हृदय में अनादि काल से चली आ रही नियति का बोध एक साथ जागृत हुआ।
यह एक ऐसा प्रेम था, जो देवता और दैत्य की सीमाओं से परे था, जो काल और कर्म के बंधनों से मुक्त था। अनिरुद्ध को आभास हुआ कि उनके जीवन का उद्देश्य, जिसका आरम्भ कभी द्वारका में हुआ था, अब इस रहस्यमय कुंडेश्वर की भूमि पर, महादेव के समक्ष में, पूर्ण होने जा रहा था।
अनिरुद्ध, जो द्वारका के राजप्रासाद में हँसी और तर्क-वितर्क के लिए जाने जाते थे, उस क्षण स्तब्ध और मौन-विमूढ़ खड़े थे। उनके मन में कोई प्रश्न नहीं उठा कि वह कौन है, कहाँ से आई है, या इस भयावह वर्षा में क्यों अकेली खड़ी है। उन्हें लगा, जैसे उनके भीतर की कोई अधूरी धुन अचानक संपूर्ण हो गई हो।
यह दर्शन केवल नेत्रों का नहीं था, यह उनकी आत्मा का साक्षात्कार था। उनके पिता, कामदेव के अवतार प्रद्युम्न, की शक्ति उनके भीतर अनायास जाग्रत हो उठी थी, जिसने तत्काल पहचान लिया कि यह कन्या, यह तपस्विनी, उनकी साधना की सिद्धि है।
"यह कौन है?" मन ने फुसफुसाया, पर हृदय चिल्लाया, "यह वही है, जिसकी प्रतीक्षा में युगों-युगों से भटक रहे थे!"
उनके तेजस्वी मुख पर एक साथ भय और आकर्षण का द्वंद्व उमड़ पड़ा। एक ओर, उनकी यदुवंशी चेतना उन्हें आगाह कर रही थी: यह बाणासुर की पुत्री हो सकती है, दैत्यों के कुल की। यह एक राजनीतिक आपदा है।
चक्रधारी श्री कृष्ण के पौत्र का संबंध एक दैत्य कन्या से? यह सोच भी असंभव थी। किंतु दूसरी ओर, उसके मुख पर महादेव के प्रति समर्पण की जो दिव्य आभा थी, उसने उनके संपूर्ण तर्क को ध्वस्त कर दिया।
उस कन्या की भंगिमा, उसके मुख का शांत-सौंदर्य और महादेव के प्रति समर्पण की आभा, उनके संपूर्ण तर्क को ध्वस्त कर रही थी। वह दैत्य कुल की हो सकती है, पर उसके भीतर की दिव्यता किसी भी देव-कुल की कन्या से अधिक पवित्र थी।
अनिरुद्ध ने अपनी मुट्ठियाँ भींच लीं। उनकी आँखों में द्वारका का सारा अनुशासन और मर्यादा, और उषा का अछूता प्रेम दो विपरीत ध्रुवों की तरह टकरा रहे थे। वे सदा निर्भीक रहे थे, पर इस क्षण, उन्हें लगा जैसे वे एक अज्ञात, मधुर बंधन में बंध गए हैं। उस क्षण स्तब्ध और मौन-विमूढ़ खड़े थे। यह दर्शन केवल नेत्रों का नहीं, उनकी आत्मा का साक्षात्कार था। उनके भीतर नियति का बोध जाग्रत हो उठा।
उन्होंने जलप्रपात की गर्जना को पार करते हुए, अपने कंठ से धीमी, लगभग कांपती हुई ध्वनि निकाली, जो शायद उस गर्जना में खो गई: "देवी..."
उषा ने अपनी पलकें धीरे से झपकाईं। उनके नेत्रों में कोई भय नहीं था, केवल एक अद्वितीय पहचान थी। उन्होंने उस युवा को देखा, जिसके आगमन का स्वप्न उन्होंने अपनी सखी चित्रालेखा से छिपाकर देखा था। उन्हें आभास था कि यह महादेव की लीला है, और इस मिलन का परिणाम चाहे कुछ भी हो, उनका जीवन अब इस परम-पुरुष के साथ जुड़ चुका है।
अनिरुद्ध अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकते थे। प्रेम की जिस चिंगारी को उन्होंने एक क्षण पहले महसूस किया था, वह अब उनके रक्त में एक अग्नि-प्रवाह बनकर बहने लगी थी। उन्हें मालूम था कि अब वह वापस नहीं लौट सकते। इस प्रेम की कीमत चाहे एक भयंकर युद्ध क्यों न हो, वह उस जलधारा को पार करेंगे, उषा को अपना बनाएंगे।
उन्हें नहीं पता था कि यह प्रेम उन्हें एक युद्ध की ओर ले जाएगा, क्योंकि उषा दैत्यराज की पुत्री थी और वह स्वयं चक्रधारी के रक्त से संबंधित। पर उस क्षण, केवल उनके दो हृदयों की धड़कनें थीं, जो कुंडेश्वर के जलप्रपात के शांत होते ही, एक-दूसरे को पुकार रही थीं।
एक रहस्यमय प्रेम कथा का आरम्भ हो चुका था, जिसके साक्षी केवल महादेव और यह प्राचीन कुंडेश्वर की धरती थी।
ॐ नमः शिवाय!
एक दिन, शिव के परम भक्त, पंडा पुजारी जिज्ञासु ने टीकमगढ़ के समीप स्थापित कुंडेश्वर शिव के प्राचीन मंदिर में उनसे प्रार्थना की। उस न विनम्रता से पूछा, "हे प्रभु कुंडेश्वर! आप त्रि-ईश्वरीय शक्तियों ब्रह्मा सृष्टिकर्ता, विष्णु पालक, और महेश संहारकर्ता में से कौन परम है, यह जानने की मेरी इच्छा है। मुझ अज्ञानी को कृपा करके बताएं, इन तीनों देवों में सबसे महान कौन है?"
कुंडेश्वर शिव, जो ध्यानमग्न थे, मंद मुस्कान के साथ प्रकट हुए। उनकी वाणी में तीनों लोकों का सामंजस्य और गंभीर शांति थी। उन्होंने कहा, "हे वत्स! तुम जिस सत्य की खोज कर रहे हो, वह केवल बल या पदवी से नहीं, बल्कि अनादि और अनंत स्वरूप से जाना जाता है। इस जिज्ञासा का उत्तर मैं तुम्हें एक ऐसी घटना से देता हूँ, जब स्वयं ब्रह्मा और विष्णु ने मेरी महत्ता को जानने का प्रयास किया था। यह उस समय की बात है जब सृष्टि अपने चरम पर थी, और अहंकार ने दोनों महान देवताओं के मन को छू लिया था।"
कुंडेश्वर शिव, "एक बार, जब मैं समाधि में लीन था, मेरे सामने एक विकराल प्रश्न खड़ा हुआ। सृष्टि में कौन सर्वश्रेष्ठ है? तभी, मेरे आराध्य श्री विष्णु और मेरे मानस पुत्र ब्रह्मा के बीच श्रेष्ठता को लेकर वाद-विवाद उत्पन्न हो गया। विष्णु स्वयं को 'पालक' होने के नाते महान बताते थे, तो ब्रह्मा स्वयं को 'सृष्टिकर्ता' होने के नाते सबसे ऊपर मानते थे।"
कुंडेश्वर शिव ने अपनी कथा जारी रखी, और उनका स्वर गहरा हो गया।
"जब यह विवाद अपने चरम पर था, तभी सहसा एक भयंकर ध्वनि हुई। उनके बीच, शून्य से प्रकट हुआ एक विशाल, अनन्त ज्योति-स्तम्भ अग्नि की एक ऐसी लपट, जिसका न आदि था न अंत। वह स्तम्भ न केवल पृथ्वी को चीरता हुआ पाताल की ओर जा रहा था, बल्कि आकाशगंगाओं को भेदता हुआ स्वर्ग से भी ऊपर उठ रहा था। उसका तेज ऐसा था कि दोनों देवताओं की आँखें चौंधिया गईं।"
विष्णु और ब्रह्मा ने उस अलौकिक स्तम्भ को देखकर विस्मय और भय से एक-दूसरे की ओर देखा।
विष्णु, "ब्रह्मा! यह क्या है? मैंने अपने असंख्य युगों के ध्यान में, अपने चौदह लोकों के भ्रमण में ऐसी अद्भुत, तेजस्वी, और अनंत अग्नि का स्तम्भ पहले कभी नहीं देखा। यह निश्चय ही किसी परम शक्ति का संकेत है।"
ब्रह्मा, "महराज! आप सत्य कहते हो। यह प्रकाश इतना प्रचंड है कि मेरी सृष्टिकर्त्ता की शक्ति भी इसके सामने क्षीण है। हमें इसका रहस्य जानना ही होगा। इस स्तम्भ का जहाँ से उदय होता है आधार, और जहाँ इसका अंत होता है शीर्ष, वही परम सत्य होगा।"
विष्णु: "तो फिर विलंब कैसा, पितामह? मैं नीचे की ओर जाता हूँ, पाताल, रसातल, और गहन तम को चीरता हुआ इसके आधार की खोज करूँगा। और आप?"
ब्रह्मा: "मैं आकाश की अनंतता को भेदता हुआ, अपने हंसवाहन पर सवार होकर, इसके शीर्ष का पता लगाऊँगा। हम दोनों में से जो पहले इस स्तम्भ के अंत को जान लेगा, वही निश्चय ही सृष्टि का परम देव माना जाएगा।"
कुंडेश्वर शिव: "वज्र! तब श्री विष्णु ने अपने वराह रूप को धारण किया और तीव्रता से नीचे की ओर प्रस्थान किया। उन्होंने गहनतम अंधकार, भयानक सर्पों के लोक, और सात पातालों को पार किया। नीचे जाते हुए विष्णु के मन में गहन विचार थे:"
विष्णु, स्वयं से-
"कहाँ है इसका आदि? कहाँ है इसका छोर?
यह कैसा स्तम्भ जो भेद रहा है घोर।
पाताल की सीमाएँ, रसातल का गहन तम,
बीत गए कल्प पर, यह अग्नि स्तम्भ न हुआ कम।
गति मेरी तीव्र है, पर यह प्रकाश-धार,
अटल, अछेद्य, अनादि, करता अहंकार पर वार।
यह तो मेरी शक्ति से परे, है कोई परम सत्ता,
मैं हूँ पालक, पर कौन है मेरा भी नियंता?"
"हजारों वर्ष नीचे जाने के बाद, थककर और निराश होकर विष्णु ने स्वीकार कर लिया कि इस ज्योतिर्लिंग का आधार खोजना असंभव है। वह विनीत भाव से वापस लौट आए।"
ब्रह्मा की ऊर्ध्व यात्रा ऊर्ध्व-गमन।
कुंडेश्वर शिव: "उधर, ब्रह्मा जी अपने हंस पर सवार होकर, वेद मंत्रों का उच्चारण करते हुए ऊपर की ओर उड़े। वे स्वर्ग, महर्लोक, जनलोक और उससे भी परे तपोलोक की ओर बढ़ते गए। ऊपर जाते हुए ब्रह्मा के मन में अहंकार का सूक्ष्म भाव था, परन्तु धीरे-धीरे वह भी क्षीण होता गया।"
ब्रह्मा, मार्ग में-
"मैं हूँ ब्रह्मा, मैं हूँ सृष्टि का विधाता,
मुझसे परे कौन है, जो यह रहस्य गाता?
तेरा शीर्ष पाकर, मैं ही सत्य जानूँगा,
सृष्टि के कण-कण को, मैं ही पहचानूँगा।
गईं दिशाएं विलीन, नभ का अंत न दिखता,
समय स्वयं मुझसे, पराजय है लिखता।
मेरे ज्ञान की सीमा, मेरे संकल्प की गति,
इस प्रकाश के सम्मुख, हो गई सारी मति।"
"अनंतकाल तक उड़ने के बाद भी, ब्रह्मा को स्तम्भ का शीर्ष नहीं मिला। अहंकार से प्रेरित होकर, उन्होंने मार्ग में एक केतकी फूल और एक गाय को देखा। ब्रह्मा ने उनसे झूठ बोलने का आग्रह किया कि उन्होंने स्तम्भ का शीर्ष देख लिया है। झूठ के सहारे, ब्रह्मा वापस लौटे।"
कुंडेश्वर शिव, "जब दोनों देव वापस लौटे, तो विष्णु ने विनम्रता से स्वीकार किया कि वे स्तम्भ का आधार नहीं खोज पाए। परन्तु ब्रह्मा ने अहंकारवश झूठ कहा कि उन्होंने शीर्ष देख लिया है, और केतकी फूल तथा गाय ने उनकी झूठी गवाही दी।"
"तभी, वह अग्नि का अनंत स्तम्भ फट गया, और उसमें से मैं, रुद्र-रूप कुंडेश्वर में, प्रकट हुआ। मेरे भयंकर तेज से ब्रह्मा का झूठा गर्व खंडित हो गया। मैंने ब्रह्मा के अहंकार को दंडित किया और केतकी फूल को मेरी पूजा में वर्जित कर दिया, क्योंकि उन्होंने झूठ का साथ दिया था।"
कुंडेश्वर शिव, "वत्स! यह कथा किसी को 'बड़ा' या 'छोटा' सिद्ध करने के लिए नहीं है। यह बताती है कि सृष्टि का परम सत्य जो निराकार, अनादि और अनंत है। उसे बुद्धि, बल या अहंकार से नहीं पाया जा सकता। विष्णु ने अपनी विनम्रता से सत्य को स्वीकार किया, इसीलिए वे सृष्टि के पालक कहलाए। ब्रह्मा ने अहंकार किया, इसीलिए उनका स्थान सीमित हुआ। और मैं, शिव, उस अनंत, अगम्य ऊर्जा का प्रतीक हूँ, जो इन तीनों कार्यों से परे है।"
"याद रखो, वत्स! ब्रह्मा, विष्णु और महेश, ये तीनों एक ही परम तत्व की तीन भिन्न क्रियाएँ हैं। वे अलग नहीं हैं, वे सब एक ही कुंडेश्वर के भीतर समाहित हैं। तुम प्रेम और भक्ति से किसी की भी आराधना करो, वह अंततः मुझ तक ही पहुंचेगी।"
मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ ज़िले में, प्रकृति की शांत और हरी-भरी गोद में, जमड़ार नदी के तट पर स्थित है श्री कुंडेश्वर महादेव मंदिर। यह स्थान केवल एक तीर्थ नहीं है, बल्कि एक ऐसा भू-स्थल है जहाँ धरती स्वयं शिव की आराधना करती प्रतीत होती है।
मंदिर के गर्भ गृह में विराजमान शिवलिंग को देखकर हर भक्त विस्मय से भर जाता है। यह कोई गढ़ी हुई प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक स्वयंभू प्राकृतिक संरचना है जो धरती के गर्भ से प्रकट हुई है। शिवलिंग का यह स्वरूप किसी अद्भुत प्राकृतिक चट्टान का हिस्सा है, जैसे कोई प्राचीन भूगर्भीय रचना, जो सदियों के जल, पृथ्वी और समय के संगम से बनी है।
इस पवित्र स्थान का नामकरण भी इसके उद्गम से हुआ है। 'कुंड' जल-स्रोत या झरना और 'ईश्वर' भगवान। माना जाता है कि शिवलिंग ठीक उसी स्थान पर प्रकट हुआ जहाँ से एक अनवरत जल-स्रोत भूमिगत झरना बहता है। यह शिवलिंग निरंतर बढ़ रहा है, जो इसकी प्राकृतिकता और पवित्रता को और भी बढ़ा देता है।
यह शिवलिंग हमें याद दिलाता है कि शिव ही समस्त सृष्टि के मूल में हैं वह केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि धरती के कण-कण, चट्टानों और गुफाओं में भी स्वयं को प्रकट करते हैं। कुंडेश्वर महादेव का यह शिवलिंग अपनी अनगढ़ता और मौलिक स्वरूप के कारण ही करोड़ों भक्तों के लिए पूजनीय है, जहाँ शिव निराकार से सहसा साकार हो उठते हैं।
एक श्रद्धालु गर्भगृह में प्रवेश करता है और शिवलिंग के प्राकृतिक गोलाकार आकार और उसके निरंतर भीगे रहने के स्वरूप को देखकर अचंभित होता है।
भक्त, “पुजारी जी, इस शिवलिंग का स्वरूप इतना अद्भुत क्यों है? यह तो किसी सामान्य शिवलिंग जैसा नहीं दिखता, ऐसा लगता है जैसे यह कोई बड़ी सी चट्टान हो जो धरती से बाहर निकल आई हो।”
पुजारी जी, मंद मुस्कान के साथ, “वत्स, तुम्हारी दृष्टि बिलकुल सही है। यह महादेव का स्वयंभू रूप है। यह किसी शिल्पी द्वारा नहीं गढ़ा गया, बल्कि स्वयं भूदेवी के गर्भ से प्रकट हुआ है।”
भक्त, “स्वयंभू? कृपया इसके उद्गम की कहानी बताएं।”
पुजारी जी, “अवश्य। इस स्थान का नाम कुंडेश्वर है, क्योंकि प्राचीन काल से यहाँ एक अखंड जल का कुंड झरना है। किंवदंतियों के अनुसार, यहां बाणासुर की पुत्री उषा प्रतिदिन बाणपुर से आकर इस कुंड के जल में शिव की पूजा करती थी।
एक दिन जिज्ञासा के कारण बाणासुर उषा का पीछा करता कुंड पर आया। लेकिन उषा कुंड में प्रवेश कर गई। बाणासुर किनारे पर उसकी प्रतीक्षा करता रहा। जब उषा कुंड से पूजा कर बाहर आई तो उसने कुंड के भीतर शिवलिंग की पूजा की बात बाणासुर को बताई।
वाणासुर ने उषा से कहा कि वह अपने शिव को कुंड के बाहर लाये ताकि आम जान भी शिव भक्ति का लाभ उठा सके। बाणासुर के आग्रह पर उषा ने शिव की आराधना कर उन्हें कुंड के बाहर आने का अनुरोध किया। तब शिव आज के स्थान पर विराजमान हुए। जहां भक्त शिव को तुम आज देख रहे हो। इसी कारण तभी से इस कुंड का नाम उषा कुंड है।”
भक्त, आश्चर्य से, “और यह शिवलिंग उसी कुंड से प्रकट हुआ?”
पुजारी जी, “हाँ। यह शिवलिंग भू-गर्भ से धीरे-धीरे ऊपर की ओर आया। इसका स्वरूप बताता है कि यह उस गहराई से जुड़ा है जिसे हम पाताल लोक कहते हैं। जहाँ शिव अनंत और अनादि रूप में विराजमान हैं। यह शुद्ध रूप से प्राकृतिक चट्टान है, या किसी प्राचीन लावा का अंश। यह अपनी अनोखी बनावट में ही शिव के विराट स्वरूप को समेटे हुए है।”
भक्त, “तो यह शिवलिंग वर्षों से इसी तरह जल के समीप या जल में ही स्थित है?”
पुजारी जी, “यह इसकी विशेषता है। यह शिवलिंग हमें सिखाता है कि शिव प्रकृति के हर रूप में हैं। वह पत्थर भी हैं, और उस पत्थर को शीतलता देने वाले जल भी। यहां दर्शन करना, महादेव के सबसे शुद्ध और मौलिक रूप को पूजना है। यह स्वयं धरती का शिव को अर्पण है।”
भक्त, श्रद्धा से सिर झुकाते हुए, “इस अद्भुत रहस्य को जानकर मन को परम शांति मिली। जय भोलेनाथ! अब मैं सच्चे मन से इस स्वयंभू स्वरूप का पूजन करूँगा।”
पुजारी जी, “तुम्हारा कल्याण हो, वत्स। शिव की कृपा सदा तुम पर बनी रहे। ॐ नमः शिवाय!”
शोणितपुर का लावण्य
भारत के मध्य भाग, बुंदेलखंड की प्राचीन भूमि, जहाँ पत्थरों में भी इतिहास धड़कता है। वहीं जमड़ार नदी के किनारे बाणपुर नामक एक विशाल नगर बसा था। यह शहर उस युग की स्थापत्य कला का अद्भुत नमूना था, जिसकी रक्षा स्वयं महाबली दैत्यराज बाणासुर, बलि के पुत्र, करते थे।
दैत्यराज बाणासुर की राजधानी बाणपुर जिसे शोणितपुर भी कहते थे, त्रिकाल से महादेव की रुद्र-भक्ति के तेज से आलोकित थी।
बाणासुर के पास एक हजार भुजाएं थीं, जो उसकी अदम्य शक्ति का प्रतीक थीं। उसकी राजधानी बाणपुर अभेद्य थी। ऊंची प्राचीरें, विशाल द्वार और मध्य में एक स्वर्ण-मण्डित दुर्ग। यह नगरी भले ही एक असुर राजा की थी, परन्तु यहाँ का वातावरण धार्मिक था, क्योंकि बाणासुर स्वयं भगवान शिव का परम भक्त और महान संगीतकार था।
महल की विशालकाय दीवारें और भव्य प्रसाद बाणासुर के कठोर अनुशासन और प्रचंड शक्ति के प्रतीक थे, पर इस कठोरता के केंद्र में एक कोमल पुष्प खिला था राजकुमारी उषा।
उषा का बचपन इसी वातावरण में व्यतीत हुआ। एक ओर जहाँ पिता का शिव के प्रति अटूट प्रेम उन्हें हर भोर कुंडेश्वर के गुप्त मार्ग तक खींच ले जाता था, वहीं दूसरी ओर राजसी शिक्षा और कलाओं ने उन्हें अपूर्व लावण्य प्रदान किया था। जैसे-जैसे यौवन की प्रथम दहलीज पर उन्होंने कदम रखा, उनके भीतर का सौंदर्य केवल शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक आभा से दमक उठा।
उन्हें धनुर्विद्या से गहन प्रेम था। प्रातःकाल जब बाणपुर का दुर्ग शांत रहता था, वह एकांत में अभ्यास करतीं। उनके बाणों में गज़ब की फुर्ती थी यह उनके दैत्य-कुल की शक्ति का प्रमाण था। पर इसके ठीक विपरीत, उनकी आत्मा संगीत और नृत्य में बसती थी। इस प्रकार, उषा के व्यक्तित्व में शौर्य और सौंदर्य, बल और कला का अद्भुत समन्वय था।
बाणासुर की पुत्री, उषा, अपनी कोमलता और सात्विक स्वभाव के कारण प्रसिद्ध थी। यद्यपि वह एक असुर कुल में जन्मी थी, परन्तु उसका हृदय देवत्व और भक्ति से भरा था।
एक संध्या, जब सूर्य की अंतिम किरणें बाणपुर के स्वर्ण शिखरों को छूकर जा रही थीं, उषा अपने पिता बाणासुर के राजसी कक्ष में पहुंची। बाणासुर उस समय अपने प्रिय वाद्य मृदंग पर शिव तांडव स्तोत्र की लय साध रहे थे।
उषा, विनम्रता और आदर से, "पिताश्री! मैं आपके वाद्य की ध्वनि में एक ऐसी शक्ति महसूस करती हूँ जो न केवल युद्ध के शौर्य को, बल्कि तीनों लोकों के गहनतम सत्य को भी दर्शाती है। मैं जानती हूँ कि आप हमारे कुल के महानतम योद्धा हैं, पर आपका हृदय महादेव के चरणों में इतना क्यों लीन रहता है? आप तो स्वयं एक हजार भुजाओं के स्वामी हैं।"
बाणासुर, मृदंग को शांत करते हुए, उनकी एक हजार भुजाएं धीरे-धीरे सिमट गईं और उनका मुखमंडल शांत हुआ। "पुत्री उषा! तुम इस नगरी की सबसे प्यारी किरण हो। यह सत्य है कि यह हजार भुजाएँ मेरी शक्ति हैं, परन्तु ये शक्ति मुझे एक ऐसे देव ने दी है, जो मुझसे भी कहीं अधिक शक्तिशाली और महान हैं। उनकी महानता का वर्णन शब्दों में करना असंभव है, पर मैं तुम्हें वही कथा सुनाता हूँ, जो मेरे जीवन का आधार है।"
बाणासुर, "वत्स! मैंने स्वयं अपनी आँखों से देवों के अहंकार को टूटते देखा है। जब सृष्टि के संरक्षक विष्णु और सृष्टिकर्ता ब्रह्मा में श्रेष्ठता का विवाद हुआ, तो वहाँ एक अनंत ज्योति-स्तम्भ लिंगोद्भव प्रकट हुआ। उस समय न विष्णु उसे पाताल में उसका आधार खोज पाए, और न ब्रह्मा आकाश में उसका शीर्ष। वह अग्नि-स्तम्भ केवल एक ही सत्य सिद्ध कर रहा था शिव ही अनादि और अनंत हैं, जिनका कोई आरम्भ या अंत नहीं है। वही परम शून्य हैं, और वही परम पूर्ण हैं।"
बाणासुर के चेहरे पर भक्ति का तेज आ गया।
बाणासुर, "इस सत्य को जानकर, मैंने अपने जीवन को केवल उनकी तपस्या में लगाना उचित समझा। मैंने वर्षों तक भयानक तपश्चर्या की। मैंने अपने हजार हाथों को त्यागकर, वर्षों तक केवल एक पैर पर खड़े होकर, इस जमड़ार नदी के तट पर, कुंडेश्वर की पवित्र भूमि पर, केवल 'ॐ नमः शिवाय' का जाप किया। मेरी तपस्या इतनी तीव्र थी कि स्वयं मेरी त्वचा गल गई, और मेरी अस्थियां दिखने लगीं।"
उषा, विस्मय से आँखें चौड़ी करते हुए। "इतनी कठोर तपस्या, केवल महादेव के लिए?"
बाणासुर, "हाँ, मेरी पुत्री! क्योंकि वही एक मात्र हैं जो भक्ति को देखते हैं, कुल को नहीं। मेरी तपस्या से प्रसन्न होकर, अंततः मेरे त्रिलोकीनाथ मेरे सामने प्रकट हुए। उनके जटाजूट से गंगा बह रही थी, गले में विषधर सर्प लिपटे थे, और शरीर पर भस्म लगी थी। उनका वह रूप इतना मनोहर था कि मेरी आत्मा तृप्त हो गई।"
बाणासुर, "महादेव ने मुझे इच्छित वरदान माँगने को कहा। मैंने उनसे केवल तीन चीजें माँगीं, जो मेरे जीवन की निधि बन गईं:"
अभेद्यता, "पहला, मैंने उनसे मेरी हजार भुजाओं को बनाए रखने और मुझे युद्ध में अजेय बनाने का वरदान माँगा। यह वरदान मेरे कुल को सुरक्षा देता है।"
समीप्य, "दूसरा, मैंने उनसे यह वर माँगा कि वे मेरी राजधानी बाणपुर के समीप कुंडेश्वर के कुंड में सदैव निवास करें, ताकि मैं प्रतिदिन उनकी पूजा कर सकूँ। इसलिए ही यह मंदिर हमारे लिए इतना पूजनीय है।"
संगीत, "और तीसरा, और सबसे महत्वपूर्ण, मैंने उनसे यह माँगा कि वे मेरे साथ नृत्य करें और मेरा मृदंग वादन सुनें। वे मेरे नृत्य-कला के साथी बनें। इसीलिए, जब मैं यह मृदंग बजाता हूँ, तो मैं केवल एक राजा नहीं, बल्कि उनका सेवक होता हूँ, और मुझे लगता है कि वे स्वयं मेरे सम्मुख खड़े होकर तांडव कर रहे हैं।"
बाणासुर, गहन संतोष के साथ, "यही कारण है, उषा, कि मैं उनके चरणों में लीन रहता हूँ। मेरी यह पूरी नगरी, मेरी यह हजार भुजाएँ, और मेरा यह जीवन, सब कुछ उन्हीं की कृपा है। शिव ही परम तत्व हैं, जो सृजन और संहार दोनों से परे हैं।"
उषा ने अपने पिता की बात अत्यंत एकाग्रता से सुनी। उसके मन में जो भी सांसारिक प्रश्न थे, वे सभी शिव की अनंत गाथा के सम्मुख शांत हो गए। बाणासुर के शब्दों ने उसे केवल महादेव की शक्ति ही नहीं, बल्कि एक असुर राजा के हृदय में छिपी गहरी भक्ति का भी परिचय कराया।
उषा, उठकर, पिता के चरणों को छूने के बाद। "धन्यवाद, पिताश्री। आज आपने मुझे केवल एक कथा नहीं सुनाई, बल्कि मेरे जीवन का ध्येय निर्धारित कर दिया। अब मैं समझ गई हूँ कि शक्ति, धन और साम्राज्य सब क्षणभंगुर हैं, केवल भक्ति ही सत्य है। कल से, मैं भी आपकी आज्ञा और प्रेरणा से, प्रतिदिन कुंडेश्वर के कुंड में महादेव के दर्शन और पूजा के लिए जाऊँगी। उनकी कृपा ही हमारे कुल की सच्ची रक्षा है।"
बाणासुर ने अपनी पुत्री के माथे पर हाथ रखा और आशीर्वाद दिया। वह जानता था कि उसकी बेटी ने अब जीवन के सबसे बड़े सत्य को पहचान लिया है, और कुंडेश्वर की पवित्र भूमि अब उसकी भक्ति से और भी तेजस्वी हो उठेगी। शहर से कुछ ही दूरी पर, जमड़ार के तट पर, एक प्राचीन कुंड तथा कुंडेश्वर शिव मंदिर स्थित है । यह मंदिर बाणासुर की भक्ति का केंद्र था और इस क्षेत्र में तपोभूमि के रूप में विख्यात था।
स्वप्न-चित्र
अगली भोर, कुंडेश्वर से लौटकर, उषा ने अपने कक्ष में चित्रलेखा को बुलाया। उनके चेहरे पर वह दिव्य-शांत आभा अब अधीर प्रेम के तेज से बदल गई थी।
उषा, "चित्रा, यह केवल क्षणिक दर्शन नहीं था, यह मेरी तपस्या का प्रतिफल है। महादेव ने मुझे अपने धाम कुंडेश्वर की इस पावन भूमि पर मेरा ईश्वर दिखाया है। यह प्रेम उस नदी के उफ़ान की भांति है, जिसे अब रोका नहीं जा सकता।"
चित्रलेखा, "राजकुमारी, आप धैर्य रखें। और क्या आपने यह विचार किया कि वह इस दैत्यराज की भूमि पर क्यों आया होगा? यह कोई सामान्य संयोग नहीं हो सकता।"
उषा, "यही तो रहस्य है! मेरे पिता कहते हैं कि ईश्वर के रहस्य को रहस्य ही रहने देना चाहिए, पर मैं अब मानव हूँ, केवल भक्त नहीं। मैंने अपने महादेव से संसार मांगा है, चित्रा। और मुझे विश्वास है कि इस मेघ-गर्जन और नदी के वेग के बीच जो पुरुष मुझे मिला, वह केवल प्रेम नहीं, वह जीवन है।"
उषा, "मैंने उसे केवल एक बार देखा, पर उसकी छवि मेरी आत्मा में उकेरी गई है। वह शौर्य, वह तेज, वह संकोच..."
चित्रलेखा, "यदि ऐसा है, तो हमें तुरंत कार्य करना होगा। मैं जानती हूँ कि मेरा चित्रकला का कौशल केवल हस्त-कौशल नहीं है, यह दिव्य वरदान है, जिसके द्वारा मैं किसी भी दृश्य को कल्पना से जीवंत कर सकती हूँ। आप मुझे उसकी छवि बताएं, राजकुमारी! मैं उसे रंगों में बांध दूँगी, और फिर उस चित्र के बल पर, उसे पृथ्वी के किसी भी कोने से खोज लाऊँगी।"
उषा ने तत्काल चित्रलेखा को अत्यंत विस्तार से उस राजकुमार की छवि बताई। वह द्वारका के उस साँवले पुरुष के परिवार का ही हो सकता है जिसके नाम से बाणपुर के वीर भी भय खाते हैं। और यदि वह वास्तव में कृष्ण-कुल से संबंधित हुआ, तो यह प्रेम-कथा शौर्य और बलिदान की एक नई गाथा लिखेगी।
चित्रलेखा ने तत्काल अपनी तुलिका और रंग निकाले। उसने एक श्वेत पट पर आँखें बंद करके ध्यान लगाया और फिर, वायु की गति से, रंग भरना आरंभ कर दिया। कुछ ही क्षणों में, एक दिव्य छवि उस पट पर उतर आई वह युवा, वह तेजस्वी, वह अनिरुद्ध।
उषा, आँखों में आँसू और होठों पर मुस्कान लिए "यही है, चित्रा! यही मेरा स्वप्न-पुरुष है, जिसे मैंने कुंडेश्वर में पाया। अब तुम जाओ, और पृथ्वी के किसी भी दुर्ग या महल में हो, उसे मेरे पास लेकर आओ।"
उषा के जीवन में यदि कोई थी जो उनके हृदय के प्रत्येक तार को पहचानती थी, तो वह थी उनकी प्राणसखी चित्रलेखा। चित्रलेखा केवल उनकी सखी नहीं, बल्कि एक सिद्ध चित्रकार और अंतरंग परामर्शदाता भी थी। उषा का सारा एकांत, सारे अव्यक्त भाव चित्रलेखा के सम्मुख प्रकट होते थे।
गहन संध्या में, जब दोनों सखियां महल के उपवन में बैठी थीं, उषा ने अपने हृदय का वह अज्ञात रहस्य चित्रलेखा के साथ साझा किया।
उषा ने धीमी, रहस्यमयी आवाज़ में कहा, "चित्रा, मेरा हृदय शांत नहीं है।"
चित्रलेखा ने उत्सुकता से पूछा, "राजकुमारी, आप कुंडेश्वर की भोर-पूजा की बात कर रही हैं? क्या पंडा जी के वहाँ पहुँचने से पूर्व कोई अप्रत्याशित घटना हुई?"
"घटना नहीं, साक्षात्कार," उषा ने उत्तर दिया। उनकी आँखों में वही दैवीय विस्मय था जो उन्होंने भोर में कुंडेश्वर के जलप्रपात के पार देखा था। "जब मैं ब्रह्म मुहूर्त में कुंडेश्वर के जलधारा के निकट होती हूँ, तो वहाँ एक स्वप्न-पुरुष का आभास होता है। वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है, चित्रा। उसके मुख पर देवता जैसा तेज है और उसकी भंगिमा किसी राजकुल के राजकुमार जैसी है।"
उषा ने अपने रहस्य के सबसे गहरे कोने को छुआ, "मैंने केवल उसे देखा है, पर मेरा हृदय जानता है कि वही मेरा नियति-पुरुष है। मेरा मन यह स्वीकार नहीं कर पा रहा कि मेरा जीवन केवल भक्ति तक सीमित रहे। क्या यह संभव है, चित्रा, कि मेरा महादेव मेरी आराधना के प्रतिफल में मुझे इस दिव्य-प्रेम से जोड़ना चाहते हों?"
चित्रलेखा ने जान लिया कि यह केवल एक साधारण प्रेम नहीं, बल्कि देवताओं की योजना का एक भाग है। उसने धीरे से कहा, "राजकुमारी, यदि यह महादेव की इच्छा है, तो वह स्वप्न-पुरुष अवश्य किसी दिन आपके सम्मुख प्रत्यक्ष होगा।"
बाणासुर की पुत्री उषा अपने कक्ष में अपनी प्रिय सखी चित्रलेखा के साथ बैठी है। रात का समय है और दोनों के बीच गुपचुप बातों का सिलसिला चल रहा है।
चित्रलेखा, उषा! सच-सच बता, आज दोपहर जब तुम झूला झूल रही थी, तब भी ख़यालों में कौन था? तुम्हारे गालों की ये हल्की गुलाबी रंगत किसी साधारण विचार की तो नहीं है!
उषा, शर्मा कर करवट लेती है, चुप कर, चित्रा! तुम तो सब जानती हो... और जानबूझकर मुझे छेड़ रही हो! ज़रा देखो तो, मेरे दिल की धड़कन कैसी ढोल जैसी बज रही है।
चित्रालेखा, हँसते हुए, प्यार से उसकी बाँह पर हाथ रखती है। तुम्हारी सखी, तुम्हारी चित्रलेखा, हर राज़ की पहरेदार है। हाँ, मैं जानती हूँ... वो स्वप्न वाला राजकुमार! जिसकी एक झलक दिखाने के लिए मैंने इंद्रजाल की सारी कलाएं लगा दी! बताओ, क्या उनके चित्र को देखकर भी तुम्हारा मन नहीं भरा?
उषा, आँखें बंद करके, एक गहरी साँस लेती है। भरना कैसा, चित्रा? जब तुम उनके रूप का वर्णन करती हो और मैं उनके कमल से नयन याद करती हूँ, तो लगता है कि ये दुनिया कितनी फीकी है। तुम बताओ ना, क्या सचमुच कोई पुरुष इतना सुंदर और मनमोहक हो सकता है?
चित्रलेखा, मैंने उन्हें अपनी जादुई आँखों से देखा है, उषा। इसीलिए तो तुम्हारे लिए उनका हूबहू चित्र बना पाई। उनके घुंघराले बाल... उनकी छाती पर लटकती वो वनमाला... आह! ऐसा लगता है जैसे स्वयं कामदेव तुम्हारे लिए साक्षात धरती पर उतर आए हों।
उषा, फुसफुसाते हुए। उनके होंठ... चित्रा! मैंने तुम्हारे चित्र में देखा था। वो ऐसे लगते हैं जैसे ताज़े गुलाब की दो पंखुड़ियाँ... जब वो मुस्कुराते होंगे, तो ऐसा लगता होगा मानो चांदनी बरस रही हो। मुझे तो बस एक बार उनके पास जाकर... उनके भीने-भीने सुगंध को महसूस करना है। क्या वो भी मेरे बारे में सोचते होंगे?
चित्रलेखा, शरारत भरी हँसी के साथ। सोचते क्यों नहीं होंगे? प्रेम की अदृश्य डोर बड़ी मज़बूत होती है। और फिर, तुम्हारी सुंदरता का जादू तो देवताओं को भी मोहित कर दे! तुम्हें पाने के लिए तो वो अग्नि-परीक्षा से भी गुज़र सकते हैं। और चिंता क्यों करती हो? मेरी मायावी शक्ति किस दिन काम आएगी?
उषा, उत्साहित होकर उठ बैठती है। चित्रा! फिर देर क्यों? तुम तो कहती थी कि तुम अपनी कला जादू से उन्हें अभी यहाँ ला सकती हो! मेरा दिल अब एक पल का भी इंतज़ार नहीं कर सकता। मैं बस उन्हें देखना चाहती हूँ... उनके मज़बूत कंधे... और उनकी शांत आँखें...
चित्रलेखा, उषा के बाल संवारते हुए। मेरी भोली और प्रेम-दीवानी सखी! शांत हो जाओ। तुम्हारी प्रेम-तपस्या अब पूरी होने वाली है। रात अभी बाक़ी है, और यह रात तुम्हारे लिए यादगार बनेगी। तुम बस अपने कक्ष को सजा लो। मैं उन्हें अपने जादू के दम पर तुम्हारे पास लाती हूँ। पर हाँ, जब तक तुम दोनों बात कर रही हो, मैं तुम्हारी सारी गुप्त बातें नहीं सुनना चाहती, इसलिए मैं बाहर रहूँगी।
उषा, खुशी से चित्रलेखा को गले लगाती है। तुम मेरी सबसे प्यारी सखी हो! जाओ, जल्दी जाओ! मेरा दिल अभी से ही पंख लगाकर उड़ना चाहता है!
चित्रलेखा ने चित्र को लपेटा और उषा के चरणों को छुआ। दैत्यराज की पुत्री का प्रेम, और यदुवंश के राजकुमार का मिलन यह कार्य केवल एक सिद्ध चित्रकार ही कर सकती थी। उसने अपनी अलौकिक शक्तियों का उपयोग करके, उस प्रेम के रहस्य को खोज के संकल्प में बदल दिया था।
दोनों सखियाँ हँसती हैं। उषा का चेहरा अब ख़ुशी से दमक रहा है।
चित्रलेखा की यात्रा
चित्र को अपनी छाती से लगाए, चित्रलेखा ने अपनी अलौकिक सिद्धियों योगिक शक्तियों का आह्वान किया। वह केवल एक चित्रकार नहीं थी, अपितु एक सिद्ध योगिनी भी थी जो पलक झपकते ही मीलो की दूरी तय कर सकती थी।
उसने अपने शरीर को सूक्ष्म रूप दिया और बाणपुर के कठोर पहरेदारों की दृष्टि से बचते हुए, वायुमंडल में विलीन हो गई। उसकी यात्रा का उद्देश्य स्पष्ट था, उस स्वप्न-पुरुष को खोजना जो श्वेत पट पर चित्रित था, और उसे उषा के पास लाना था।
उसने अपने दिव्य दृष्टि से पृथ्वी के महान नगरों की ओर देखना शुरू किया। वह काशी के घाटों पर उतरी, जहाँ ज्ञान और वैराग्य का वास था; उसने मथुरा के गलियारों को छाना, जहाँ कृष्ण की बाल-लीलाएं गूंजती थीं। वह इंद्रप्रस्थ के भव्य प्रासादों तक पहुँची, पर चित्र में अंकित तेजस्वी मुख उसे कहीं नहीं मिला।
अंततः, उसकी दृष्टि ने द्वारका की ओर संकेत किया वह नगरी जो समुद्र के मध्य भगवान श्री कृष्ण ने अपने हाथों से बसाई थी। जैसे ही उसने उस स्वर्ण नगरी में प्रवेश किया, चित्रलेखा को बाणपुर की शिव-भक्ति के कठोर वातावरण और द्वारका की वैष्णव-चेतना के लावण्य में तीव्र विरोधाभास महसूस हुआ।
द्वारका की सड़कों पर, सुंदर और सजे-धजे यदुवंशी राजकुमार घूम रहे थे, पर चित्रलेखा की आँखें केवल उस चेहरे को खोज रही थी जो उषा के हृदय में अंकित था।
और फिर, महल के एक शांत उपवन में, जहाँ कमल के सरोवर पर चाँदनी बिखरी थी, उसने उसे देखा। वह युवा, वह तेजस्वी, वह अनिरुद्ध।
वह अपनी एक पलंग पर लेटा हुआ था, उसके मुख पर वही उदासी और विस्मय था जो उसने कुंडेश्वर के जलप्रपात के पार उषा को देखकर महसूस किया होगा। चित्रलेखा ने चित्र से अनिरुद्ध के रूप का मिलान किया। वह शत-प्रतिशत सही था। वह चक्रधारी श्री कृष्ण का पौत्र था, और अब वह दैत्यराज की पुत्री के प्रेम-बंधन में बंधने वाला था।
चित्रलेखा ने क्षण भर भी नहीं गँवाया। वह जानती थी कि उसे यह कार्य गुप्त रूप से करना है, ताकि किसी को इस महा-साहस का पता न चले। उसने अपनी योग-शक्ति का प्रयोग किया, और अपनी अदृश्य भुजाओं से अनिरुद्ध को सावधानीपूर्वक उठाया। अनिरुद्ध को गहरा और मधुर निद्रा का वरदान मिला, और वह बिना किसी आहट के, उस स्वर्ण नगरी से उठकर, वायु में उड़ चला।
आकाश मार्ग से होते हुए, नदी और पर्वतों को पार करते हुए, चित्रलेखा, अपने कंधे पर यदुवंश के भविष्य को उठाये, तीव्र गति से शोणितपुर की ओर लौट आई।
जब भोर होने में केवल कुछ ही क्षण शेष थे, चित्रलेखा ने अनिरुद्ध को चुपके से उषा के कक्ष में लिटा दिया। उषा का कक्ष फूलों और सुगंध से भरा था। अनिरुद्ध, जो अभी भी गहरी नींद में था, एक अज्ञात, मधुर स्वप्न में खोया हुआ लग रहा था।
उषा ने जब अपने कक्ष में उस स्वप्न-पुरुष को साकार देखा, तो उसका हृदय भक्ति, प्रेम और भय के त्रिवेणी में डूब गया। वह जानती थी कि यह मिलन उसके पिता के क्रोध को जगाएगा और देवता तथा दैत्य के बीच एक भयंकर युद्ध का कारण बनेगा, पर उस क्षण, उसकी आँखें केवल अपने नियति-पुरुष को देखकर तृप्त हो रही थीं, जिसे कुंडेश्वर के महादेव ने उनकी पूजा के प्रतिफल में भेजा था।
प्रथम संवाद
जब सूर्य की प्रथम सुनहरी किरणें बाणपुर के प्रसाद के झरोखों से होकर उषा के कक्ष में पहुँचा, तब अनिरुद्ध की निद्रा टूटी। उन्होंने आँखें खोलीं और स्वयं को एक अज्ञात, अत्यंत सुंदर कक्ष में पाया। यह द्वारका नहीं थी। यह कोई स्वर्गिक धाम प्रतीत होता था।
उन्होंने पास ही बैठी उषा को देखा। उनके मुख पर वही महादेव-सी शांति थी जो उन्होंने कुंडेश्वर के जलप्रपात के पास देखी थी। अनिरुद्ध तत्काल उठ खड़े हुए, उनके यदुवंशी तेज में आश्चर्य और क्रोध का मिश्रण था।
अनिरुद्ध, क्रोध और विस्मय से "देवी, आप कौन हैं और मैं कहाँ हूँ? मुझे यहाँ किसने लाया? क्या यह कोई दैत्य-माया है? मैं श्रीकृष्ण का पौत्र अनिरुद्ध हूँ, और मेरे साथ ऐसा छल करने का साहस कौन कर सकता है?"
उषा का हृदय उस तेजस्वी स्वर को सुनकर काँप उठा। पर उनके प्रेम ने उन्हें शक्ति दी।
उषा, आँखों में भक्ति और प्रेम लिए, विनम्रता से, "राजकुमार, शांत हो जाइए। आप बाणासुर की राजधानी, शोणितपुर के महल में हैं। मेरा नाम उषा है, और मैं उसी दैत्यराज की पुत्री हूँ। किसी ने आपके साथ छल नहीं किया, अपितु यह नियति का आह्वान है, जिसे मेरी सखी चित्रलेखा ने पूरा किया।"
अनिरुद्ध, आँखें सिकोड़ते हुए, "बाणासुर की पुत्री? तब तो यह अवश्य ही बंधक बनाने का प्रयत्न होगा! यदुवंश और दैत्यकुल के बीच की शत्रुता को आप नहीं जानतीं, देवी। मेरा यहाँ होना... यह युद्ध का निमंत्रण है।"
उषा, उनके समीप आकर, आँखों में निडर प्रेम के साथ, "राजकुमार, मेरा प्रेम युद्ध नहीं, महादेव की पूजा का प्रसाद है। जिस दिन मैंने आपको कुंडेश्वर की उस पावन भूमि पर देखा था, उसी क्षण मैंने जान लिया था कि मेरी भक्ति का फल आप हैं। मेरी आत्मा ने आपको पहचान लिया था, भले ही आपके शरीर ने मुझे अब पहचाना हो।"
अनिरुद्ध, उषा के लावण्य से विचलित होकर, अपनी तलवार पर हाथ रखते हुए, "क्या आप नहीं जानतीं कि आप क्या कह रही हैं? मैं द्वारका का राजकुमार हूँ, और आप शोणितपुर की राजकुमारी। यह प्रेम... यह असंभव है, यह धर्मापमान है!"
उषा, "प्रेम न धर्म जानता है, न कुल। वह केवल हृदय की पुकार जानता है। क्या आप उस कुंडेश्वर की भूमि को भूल गए, जहाँ न तो यदुवंश का नाम था, न दैत्यकुल का, जहाँ केवल शिवलिंग और जल का उफ़ान था? हमारे बीच का प्रथम मिलन स्वयं महादेव की इच्छा थी।"
अनिरुद्ध ने उषा की आँखों में देखा। उनके शौर्य और समर्पण ने अनिरुद्ध के सारे तर्क ध्वस्त कर दिए। वह धीरे-धीरे तलवार से अपना हाथ हटा लेते हैं। उन्हें आभास होता है कि यह राजकुमारी केवल अपने पिता की पुत्री नहीं, अपितु शक्ति और भक्ति का प्रतीक है।
अनिरुद्ध, विचलित होकर, धीमी आवाज़ में, "आपकी सखी ने मुझे कैसे लाया? यह कैसा जादू है?"
उषा, "मेरी सखी चित्रलेखा एक सिद्ध चित्रकार है, जिसमें अलौकिक शक्तियां हैं। मैंने आपको अपने स्वप्न में देखा, उसने आपको चित्र में उकेरा, और फिर उस चित्र के बल पर वह आपको यहाँ लाई। यह सब मेरे हृदय की अनन्य भक्ति के कारण संभव हुआ है, राजकुमार।"
अनिरुद्ध, प्रेम और विस्मय के इस दैवीय जाल में फंस चुके थे। उन्होंने धीरे से कहा-
अनिरुद्ध, "तब तो देवी, मेरा जीवन अब आपके हाथ में है। इस निषिद्ध प्रेम का जो भी परिणाम हो, मैं स्वीकार करता हूँ।"
यह सुनते ही, उषा के मुख पर विजय की दिव्य आभा फैल गई।
बाणासुर को सूचना
इधर महल में उषा और अनिरुद्ध के प्रेम का प्रथम अंक आरंभ हुआ, उधर बाणपुर के गुप्तचरों ने अपने दैत्यराज को एक अत्यंत अशुभ और अपमानजनक सूचना दी।
बाणासुर अपने राज सिंहासन पर बैठा, शिव-स्तुति में लीन था, जब उसके एक वफादार सेनापति ने भय से काँपते हुए सूचना दी।
सेनापति, "महाराज! एक अत्यंत भयंकर सूचना है। राजकुमारी उषा के कक्ष में... एक अज्ञात पुरुष का वास है।"
बाणासुर का ध्यान भंग हुआ। उसकी आँखें लाल हो गईं।
बाणासुर, भीषण गरज के साथ, "अज्ञात पुरुष? इस शौर्य-दुर्ग में? क्या तुम होश में हो? कौन है वह मूर्ख जिसने बाणासुर की पुत्री के कक्ष में प्रवेश करने का साहस किया?"
सेनापति, सिर झुकाकर, "महाराज, वह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। वह... वह द्वारका का राजकुमार है। वह श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध हैं।"
यह सुनकर, बाणासुर के मुख से एक ऐसी भयंकर ध्वनि निकली, जिसने राजभवन की दीवारों को हिला दिया। उसके मस्तक पर त्रिशूल के समान तीन रेखाएँ खिंच गईं।
बाणासुर का क्रोध
बाणासुर, क्रोध से दहाड़ते हुए, "अनिरुद्ध! कृष्ण के पौत्र ने मेरे पवित्र कुल को कलंकित करने का साहस किया? मेरी बेटी... एक यदुवंशी से प्रेम? यह शिव-भक्त बाणासुर का घोर अपमान है! तुरंत जाओ, और उस राजकुमार को बंधन में डालो! इस धृष्टता का दंड उसे और उसकी समूची द्वारका को भुगतना पड़ेगा!"
बाणासुर के क्रोध की भयंकर अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उषा और अनिरुद्ध का प्रेम, अब दैत्य कुल और यदुवंश के बीच महायुद्ध का कारण बन चुका था।
स्थान, शोणितपुर का गुप्त परामर्श कक्ष। बाणासुर अपने मुख्यमंत्री, कुम्भाण्ड, के साथ तीव्र क्रोध में बैठे हैं। कक्ष में भीषण धूप-धुएँ की तीखी गंध व्याप्त है, जो दैत्यराज के क्रोध को दर्शाती है।
बाणासुर, दहाड़ते हुए, उनकी एक सहस्र भुजाएँ सिहांसन की स्वर्ण-जड़ित मूठों पर ऐसे कस जाती हैं कि चूरा होने की हल्की ध्वनि आती है।
"कुम्भाण्ड! क्या तुमने सुना? मेरे हृदय में यह अपमान! यह अपमान कृष्ण के पौत्र ने किया है! वह... वह मेरे पवित्र दुर्ग में घुस आया! क्या वह नहीं जानता कि मैं कौन हूँ? क्या उसे मेरे असुरत्व का ज्ञान नहीं?"
कुम्भाण्ड, विनम्रता और भय से काँपते हुए, "महाराज, सारा जगत आपके अजेय बल को जानता है। आप भक्त प्रह्लाद के पौत्र और राजा बलि के पुत्र हैं। आपका दैत्य-तेज सूर्य से भी अधिक प्रखर है।"
बाणासुर, आँखें बंद करके, मानो अतीत को महसूस कर रहे हो, "तुम मेरी तपस्या को नहीं जानते, कुम्भाण्ड! मेरे बाल्यकाल में भी, मुझे केवल शिव की धुन थी। मैंने वर्षों तक हिमखंडों के ऊपर, केवल एक पैर पर खड़े रहकर तप किया है। मेरे शरीर की त्वचा तप की ज्वाला से सूखकर, वृक्ष की छाल-सी हो गई थी। मेरे कंठ में सूखी मिट्टी का स्वाद भर जाता था, पर मेरे होंठों पर केवल 'ॐ नमः शिवाय' की ध्वनि थी।"
कुम्भाण्ड, "आपकी भक्ति अतुलनीय है, देव।"
बाणासुर, अहंकार से मुस्कुराते हुए,
"हाँ! और जब महादेव मेरे सामने प्रकट हुए, तो उनके तेज का रूप ऐसा था कि मेरी आँखें झुलसने लगीं। मैंने वर माँगा एक सहस्र भुजाएँ! सोचो, कुम्भाण्ड, एक हज़ार भुजाएँ! जब मैं अपने अस्त्रों को धारण करता हूँ, तो मेरी सहस्त्र भुजाओं के टकराने की ध्वनि तीनों लोकों को भयभीत करती है। महादेव ने मुझे रुद्र-गणों का अधिपति बनाया और मेरे नगर शोणितपुर की रक्षा का भार स्वयं लिया!"
कुम्भाण्ड, "इस वरदान के समक्ष देव भी नहीं टिक पाते।"
बाणासुर, "यही सत्य है! मैंने इंद्र को ऐसे पराजित किया जैसे कोई बालक मिट्टी का घरौंदा तोड़ता है। युद्ध में, जब मेरी भारी गदा का स्पर्श शत्रु के मस्तक से होता था, तो उसे अपनी आत्मा निकलती हुई महसूस होती थी! मैंने असुरों के बल और भक्तों के समर्पण को एक साथ जिया है!"
बाणासुर, उनकी आवाज़ में अचानक गहरी ऊब का स्वर आता है।
"किंतु... इस अखंड शक्ति का भार उठाना भी एक दंड है। मेरी भुजाएँ इतनी शक्तिशाली हो गई कि उन्हें कोई चुनौती देने वाला नहीं बचा। मुझे अपनी अजेयता पर ऊब होने लगी। मेरी भुजाओं में शस्त्र चलाने की खुजली होने लगी, पर कोई शत्रु नहीं था!"
कुम्भाण्ड, "तब महादेव ने क्या कहा था?"
बाणासुर, क्रोध से पुन: दहाड़ते हुए,
"उन्होंने कहा कि जब मेरे युद्ध-केतु का स्तंभ टूटेगा, तब मेरा अहंकार टूटेगा, और मुझे एक ऐसा शत्रु मिलेगा जो मेरे बल को परीक्षण देगा! और आज... आज मेरे महल की पवित्रता को, मेरी पुत्री के सपनों को, उस यदुवंशी ने चुनौती दी है!"
बाणासुर, "अनिरुद्ध का मेरी पुत्री के कक्ष में प्रवेश करना। यह केवल प्रेम नहीं, कुम्भाण्ड, यह मेरे वरदान का अपमान है! यह महादेव की उस भविष्य-वाणी का आरंभ है! मैं इस यदुवंशी को बंधन में डालूँगा, और इस अपमान का स्वाद वह और उसका कृष्ण कुल मिलकर चखेगा! यह युद्ध अब केवल दो वंशों का नहीं, बल्कि मेरे गर्व और कृष्ण के नियति-चक्र का होगा!"
शौर्य और बंधन
स्थान: उषा का कक्ष, अब युद्ध का अखाड़ा। चंदन के इत्र और गुलाब की मीठी गंध अब लोहे और दैत्य सेना के पसीने की तीखी बदबू से दब गई है।
बाणासुर के सेनापति, क्रूर और विशाल दैत्य योद्धाओं के साथ, उषा के कक्ष के द्वार पर पहुंचते हैं। उनके भारी धातु के जूते संगमरमर के फर्श पर गूंजती हुई ध्वनि करते हैं।
सेनापति, विकराल स्वर में, "राजकुमारी! द्वार खोलो! दैत्यराज का आदेश है कि हम यदुवंशी अपराधी अनिरुद्ध को बंधन में डालें!"
भीतर, अनिरुद्ध और उषा एक-दूसरे को देखते हैं। अनिरुद्ध की आँखें जल रही हैं, जबकि उषा के मुख पर भय के साथ दृढ़ संकल्प है।
उषा, शांत, पर दृढ़ स्वर में, "राजकुमार, मुझे क्षमा करें। मैं नहीं चाहती थी कि प्रेम का आरंभ इस भयानक युद्ध से हो।"
अनिरुद्ध, तेजस्वी मुस्कान के साथ, अपनी तलवार खींचते हुए, तलवार की धातु की ठंडी पकड़ उनके हाथ में महसूस करते हुए।
"देवी, युद्ध तो मेरे रक्त में है। यह बंदी बनने से अधिक गरिमापूर्ण है। मैं यदुवंश का हूँ, और मैं युद्ध के लिए तैयार हूँ। आप पीछे हट जाएँ।"
उषा कुछ कह पाती, उससे पहले ही द्वार एक भयानक धड़ाम की आवाज़ के साथ टूटकर गिर जाता है। दैत्य सैनिकों की विशाल सेना अंदर आती है, उनकी लाल आँखें क्रोध से चमक रही हैं।
अनिरुद्ध, ऊँचे स्वर में, "दैत्य सैनिकों! मैं अनिरुद्ध हूँ, यहाँ अपनी इच्छा से आया हूँ। यदि तुम में साहस है, तो सीधे मेरे पास आओ, अपनी शक्ति दिखाओ!"
अनिरुद्ध बिजली की गति से आगे बढ़ते हैं। उनकी तलवार और दैत्यों के भयंकर अस्त्रों के टकराने से एक खनखन की तीव्र ध्वनि वातावरण में भर जाती है।
अनिरुद्ध अद्भुत पराक्रम दिखाते हैं। उनकी गति इतनी तीव्र है कि दैत्यों के विशाल शरीर के टुकड़े होकर गिरते हैं, और फर्श पर गरम रक्त की तीखी धातुमय गंध फैल जाती है। उषा भय से काँप कर, कमरे के कोने में चली जाती है, उनके मुँह में डर का कड़वा स्वाद भर गया है।
अनिरुद्ध, पसीने से लथपथ, हाँफते हुए।
"तुम्हारे दैत्यराज का बल कहाँ है? क्या वह स्वयं नहीं आ सकते?"
ठीक इसी समय, बाणासुर कक्ष में प्रवेश करते हैं। उनका दैत्य-रूप अत्यंत भयंकर है। उनके सहस्र हाथ और तेजस्वी नेत्र कक्ष की सारी रोशनी को निगल लेते हैं। उनके आगमन से वायु में भयंकर ताप महसूस होता है।
बाणासुर, एक गरज के साथ, जिससे उषा के कानों में दर्द होने लगता है ।
"बस करो, यदुवंशी! तुम्हारी वीरता सराहनीय है, पर यह बाणासुर का प्रसाद है! तुमने मेरे वरदान को चुनौती दी है!"
बाणासुर अपनी एक भुजा से अनिरुद्ध पर एक दिव्य अस्त्र चलाते हैं, जो महादेव द्वारा प्रदत्त माया है। अस्त्र अनिरुद्ध को जकड़ लेता है। अनिरुद्ध की सारी शक्ति अचानक शून्य हो जाती है।
अनिरुद्ध, निराश होकर, अपनी निष्क्रिय भुजाओं को देखते हुए ।
"यह कैसा छल है! यह वीरता नहीं!"
बाणासुर, क्रूर हँसी के साथ ।
"यह छल नहीं, मूर्ख! यह शक्ति है! तुम कृष्ण के पौत्र हो, इसलिए तुम्हें जीवनदान दिया जाता है, पर अब तुम मेरे अपमान का प्रतीक बनोगे!"
दैत्य सैनिक लोहे की ठंडी, मोटी साँकलें लेकर आते हैं और अनिरुद्ध को कसकर बांध देते हैं। अनिरुद्ध के शरीर पर ठंडी धातु का असहनीय स्पर्श होता है।
उषा, उठकर, उनके चेहरे पर अब केवल क्रोध और दृढ़ता है ।
"पिताश्री! रुक जाइए!"
उषा दौड़कर अनिरुद्ध के सामने खड़ी हो जाती है। उसके हाथों में अपने आँसुओं का नमकीन स्वाद है, पर उसकी आवाज़ में बाघिन-सा साहस है।
उषा, "आप उन्हें बंदी नहीं बना सकते! यदि आप उन्हें छुएंगे, तो आप मेरी मृत्यु को आमंत्रित करेंगे!"
बाणासुर, अपनी पुत्री को घूरते हुए।
"उषा! एक यदुवंशी के लिए मृत्यु का भय? तुम्हारा दैत्य रक्त कहाँ गया? चुपचाप अपने कक्ष में जाओ! तुम्हारा प्रेम, तुम्हारा अनुराग... सब व्यर्थ है! मैं उसे ऐसी गुफा में डालूँगा, जहाँ सूर्य का प्रकाश भी नहीं पहुँचेगा!"
उषा, हाथों में अनिरुद्ध के रक्त का स्पर्श महसूस करते हुए ।
"आप उन्हें गुफा में नहीं, मेरे हृदय में बंद कर रहे हैं! सुनिए, पिताश्री! मैं बाणासुर की पुत्री हूँ, और मैं महादेव की परम भक्त! जिस तरह मैंने उन्हें कुंडेश्वर में पाया है, उसी तरह मैं उन्हें स्वतंत्र कराऊँगी! मैं इस अपमान का प्रतिकार अवश्य करूँगी!"
बाणासुर एक पल के लिए स्तब्ध रह जाते हैं, क्योंकि उषा का यह प्रतिरोध उनके दैत्य-अधिकार को सीधी चुनौती थी। पर उनके अहंकार ने उन्हें झुकने नहीं दिया। उन्होंने उषा को एक ओर धकेला और सैनिकों को अनिरुद्ध को ले जाने का आदेश दिया।
अनिरुद्ध, जाते हुए, उषा को देखते हैं और उनके होंठों पर एक वीरोचित मुस्कान आती है।
"देवी उषा, मुझे बंधन में नहीं डाला गया है, मैंने तुम्हें जीवनदान दिया है। अब नियति अपना अगला चक्र चलाएगी।"
अनिरुद्ध को घसीटकर ले जाया जाता है। उषा गिर जाती है, और उसका माथा ठंडे फर्श पर टिका हुआ है। कक्ष में अब केवल टूटे हुए द्वार, रक्त की गंध और बाणासुर की विजेता मुस्कान शेष है।
नियति का चक्र
स्थान: द्वारका का राजप्रसाद। प्रसाद के भीतर भी सागर की नमकीन हवा महसूस हो रही है। अनिरुद्ध के पिता प्रद्युम्न,जो स्वयं कामदेव के अवतार थे, की आँखों में नींद नहीं है, और उनके माथे पर चिंता की ठंडी बूँदें छलक रही हैं। भोर का समय है।
प्रद्युम्न, परेशानी से अपने भारी वस्त्र को कसकर पकड़ते हुए, उनके मुख से डर का सूखा स्वाद नहीं जा रहा।
"रुक्मिणी माँ! यह कैसा अशुभ मौन है? बीते चौबीस घंटों से अनिरुद्ध का कोई समाचार नहीं! उसके कक्ष में न कोई हलचल, न कोई चिन्ह। क्या वह किसी गुप्त यात्रा पर गया होगा? वह कभी बिना बताए नहीं जाता।"
रुक्मिणी, शांत रहने का प्रयास करते हुए, पर उनकी आवाज़ में सूक्ष्म कंपन है।
"प्रद्युम्न, पुत्र! शांत हो जाओ। वह यदुवंश का तेजस्वी राजकुमार है, कोई साधारण बालक नहीं। परंतु मेरा मातृत्व हृदय भी बेचैन है। इस प्रसाद की स्तब्धता अच्छी नहीं लग रही। लगता है, कोई भयंकर रहस्य इस चुप्पी के भीतर छिपा है।"
प्रद्युम्न, क्रोध में अपनी चमड़े की तलवार की म्यान को फर्श पर पटकते हुए, जिसकी तीखी आवाज़ हॉल में गूँजती है।
"मैं सारे गुप्तचरों को पृथ्वी के कोने-कोने में भेज चुका हूँ! गंधर्व, यक्ष, मनुष्य... कोई नहीं जानता वह कहाँ है! यदि किसी ने मेरे पुत्र को छुआ है, तो मैं उस कुल को मिट्टी में मिला दूंगा! यह अपमान द्वारका सहन नहीं करेगी!"
ठीक उसी क्षण, आकाश में एक गहन, शक्तिशाली ध्वनि गूंजती है। यह स्वयं श्रीकृष्ण के शंख पाञ्चजन्य का नाद है। शंख की दिव्य ध्वनि राजमहल के हर स्तंभ में गूँजकर, हर हृदय को शांत कर देती है।
श्रीकृष्ण कक्ष में प्रवेश करते हैं। उनके आगमन से ही वातावरण में चंदन और तुलसी की मंद सुगंध फैल जाती है। उनके श्याम वर्ण और शांत नेत्रों में तीनों लोकों का ज्ञान समाया है।
श्रीकृष्ण, स्नेह और दृढ़ता के साथ, उनकी अमृतमयी वाणी सुनकर प्रद्युम्न को क्षण भर के लिए शांति महसूस होती है।
"प्रद्युम्न! अपने क्रोध को शांत करो। शंख का नाद सदैव नियति का सूचक होता है। अनिरुद्ध न तो भटका है, न ही स्वयं भागा है।"
रुक्मिणी, श्रीकृष्ण के चरणों के पास आकर।
"नाथ! हमें सत्य बताएं। क्या अनिरुद्ध सुरक्षित है? किस शत्रु ने इस साहस को करने की धृष्टता की है?"
श्रीकृष्ण, अपनी योग-माया से सत्य को देखते हुए, उनके गहरे नेत्रों में शोणितपुर का दृश्य स्पष्ट होता है।
"अनिरुद्ध शोणितपुर में है, रुक्मिणी। वह दैत्यराज बाणासुर के दुर्ग में है। उसे बाणासुर ने अपनी पुत्री उषा के कक्ष से बंदी बनाया है। यह किसी शत्रुता का परिणाम नहीं, बल्कि प्रेम की नियति है।"
प्रद्युम्न, आश्चर्य और अपमान से तड़पकर।
"दैत्यराज बाणासुर? महादेव का परम भक्त? और उसकी पुत्री? क्या उस असुर ने मेरे पुत्र का अपहरण कर, हमारे कुल का इतना बड़ा अपमान किया है? मैं अभी अपनी सेना लेकर शोणितपुर पर आक्रमण करूँगा!"
श्रीकृष्ण, प्रेमपूर्वक प्रद्युम्न के कंधे पर हाथ रखते हुए।
"धैर्य रखो, पुत्र। बाणासुर ने अहंकार में आकर नियति को छेड़ा है। वह भूल गया है कि उसका बल शिव के वरदान पर टिका है, पर प्रेम स्वयं ईश्वर का स्वरूप है। इस कार्य का निर्णय अब युद्ध ही करेगा।"
श्रीकृष्ण, अपनी दृष्टि दूर, क्षितिज पर टिकाते हुए, जहाँ सूर्योदय हो रहा है, उनकी आवाज़ अब गरज बन जाती है।
"बाणासुर ने मेरे परिवार और धर्म को चुनौती दी है। महादेव उसके रक्षक हो सकते हैं, पर धर्म के विरुद्ध मैं स्वयं काल हूँ। मैं बलराम को आदेश देता हूँ कि वह सम्पूर्ण यादव सेना को तैयार करें। हम शोणितपुर को घेरेंगे। यह युद्ध केवल अनिरुद्ध को मुक्त कराने का नहीं, बल्कि दैत्य के अहंकार को तोड़ने का होगा।"
श्रीकृष्ण पुनः पाञ्चजन्य उठाते हैं। इस बार शंख का नाद केवल शांत करने वाला नहीं, बल्कि प्रलय का आह्वान है। द्वारका के वातावरण में निश्चित विजय का तेज और आगामी युद्ध का भयंकर उत्साह भर जाता है। कृष्ण के होंठों पर एक शांत, निर्णायक मुस्कान है।
बंदी का दर्शन
स्थान: शोणितपुर का अंधकारमय कारागार। यहाँ पत्थर की पुरानी, नमी भरी गंध और लोहे की साँकलों की झंकार के अतिरिक्त कुछ नहीं है। दीवारों पर काई जमी है और हवा ठंडी व बासी है।
अनिरुद्ध को कारागार के सबसे गहरे और ठंडे कक्ष में रखा गया है। उनके हाथ-पैर मोटी, भारी लोहे की जंजीरों से जकड़े हैं। इन जंजीरों का ठंडा स्पर्श उनकी त्वचा को जला रहा है।
अनिरुद्ध, अंधेरे में एक सूखी हँसी हँसते हुए।
"कैसी विडंबना है! प्रेम ने मुझे बंदी बनाया। कृष्ण के पौत्र को दैत्यराज की पुत्री के प्रेम ने बंधन में डाला। मेरे होंठों पर अभी भी उषा के प्रेम के वचन का स्वाद है, पर मेरी भुजाओं पर ये लोहे की जंजीरें हैं।"
तभी, एक पतली, दुर्बल प्रकाश की रेखा उस कक्ष में आती है। यह चित्रलेखा है, जो एक छोटे से दीपक के साथ आई है। दीपक की गर्म लौ और तेल की हल्की गंध उस बासी हवा को काटने का प्रयास करती है। उषा, एक साधारण परिचारिका के वेश में, उसके पीछे है, उसका चेहरा चिंता और आँसुओं से तना हुआ है।
उषा, दबी, लगभग फुसफुसाहट में, ताकि प्रहरी न सुन पाए।
"राजकुमार!"
अनिरुद्ध ने प्रकाश की ओर आँखें खोलीं। उनकी आँखों में कारागार का अंधकार नहीं, उषा का प्रेम-प्रकाश था।
अनिरुद्ध, "उषा! तुम... यहाँ? तुम्हारे पिता के आदेशों का उल्लंघन करके?"
उषा, घुटनों के बल बैठकर, उनके हाथ में बंधी ठंडी जंजीर को गरम आँसुओं से धोते हुए।
"मेरे पिता के आदेश अब मेरे लिए अर्थहीन हैं। मैं आपकी इस यातना को अपनी आँखों से नहीं देख सकती। मुझे इस कारागार में सड़ी हुई मिट्टी और लोहे की दुर्गंध महसूस हो रही है। क्या आप सच में क्षमा करेंगे मुझे?"
अनिरुद्ध, उषा के आँसुओं के नमकीन स्पर्श को अपने हाथों पर महसूस करते हुए।
"उषा, यह यातनामय बंधन नहीं है। यह महादेव की परीक्षा है। तुमने प्रेम के लिए अपने पिता के विरुद्ध जाने का साहस किया है, और मैंने तुम्हारे लिए मृत्यु को गले लगाने का। यह बंधन ही हमारे प्रेम की अमरता का पहला साक्ष्य है।"
उषा, "पर द्वारका के राजकुमार, आप यहाँ असुरों के बंधन में हैं! मुझे भय है, कि यदि मेरे पिता को पता चला कि मैं यहां आई हूँ, तो वह और क्रूर हो जाएंगे। मुझे बताएं, मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ? क्या आप यहाँ से भागने का कोई मार्ग जानते हैं?"
अनिरुद्ध, शांत और दृढ़ स्वर में।
"भागना? नहीं, उषा। यह दैत्यराज का अभिमान है। इसे मैं तब तक नहीं तोडूंगा, जब तक मेरे दादा, श्रीकृष्ण, यहाँ नहीं आते। मेरी मुक्ति केवल युद्ध से होगी। तुम्हारी चिंता जायज है, पर तुम मेरे लिए केवल एक ही कार्य करो।"
उषा, "क्या?"
अनिरुद्ध, उनकी ओर झुककर, धीमी आवाज़ में, आँखें मिलाते हुए।
"तुम जीवित रहो। तुम आशा बनो। जब मेरे दादा यहाँ यादव सेना के साथ आएंगे, तो यह युद्ध भयंकर होगा। महादेव स्वयं बाणासुर की रक्षा करेंगे। तुम मेरे लिए युद्ध की प्रेरणा और विजय का कारण बनो। तुम हर भोर कुंडेश्वर जाओ और अपने महादेव से धर्म की रक्षा के लिए प्रार्थना करो।"
उषा, अंगुली से अनिरुद्ध के गाल पर फैले हुए रक्त को धीरे से पोंछते हुए।
"मैं आपकी बात समझ गई, राजकुमार। मेरा प्रेम अब केवल भावना नहीं, संकल्प है। मैं हर भोर, कुंडेश्वर के शीतल जल से महादेव को यह प्रार्थना अर्पित करूँगी कि वह मेरे प्रेम और आपके शौर्य की रक्षा करें।"
चित्रलेखा, बाहर भारी कदमों की आहट सुनकर, उषा को संकेत करती है।
चित्रलेखा, "राजकुमारी! अब हमें चलना होगा। प्रहरी वापस आ रहे हैं। इस संवेदनात्मक क्षण को यहीं समाप्त करना होगा।"
उषा, उठकर, आखिरी बार अनिरुद्ध को देखकर, उसकी आँखों में अब विरह की अग्नि है।
"मैं फिर आऊंगी, राजकुमार! मेरा प्रेम आपका अस्त्र है।"
उषा और चित्रलेखा, दीपक बुझा कर, अंधकार में विलीन हो जाते हैं। अनिरुद्ध, अंधेरे में अकेले, जंजीरों की ठंडी खनक के साथ, उषा के गरम आँसुओं की नमी को अपनी त्वचा पर महसूस करते रहते हैं।
शोणितपुर का अहंकार
शोणितपुर यह नाम सुनते ही हर दिशा में रक्त और लोहे की गंध तैर जाती थी। यह केवल एक नगरी नहीं, बल्कि दैत्यराज बाणासुर के सहस्त्र वर्षों के अजेय अहंकार का प्रत्यक्ष प्रमाण था। दुर्ग की दीवारें काली, अभेद्य धातुओं से गढ़ी गई थीं, जिन पर स्वयं महादेव के वरदान का सुरक्षा-चक्र था। हर पत्थर पर भय का शिलालेख खुदा था, और हर द्वार किसी मृत दंभ की समाधि जैसा प्रतीत होता था।
बाणासुर अपने मुख्य सभागार में आसीन था। उसके विशालकाय शरीर और सिंहासन को घेरती हुई उसकी एक हजार भुजाएं ऐसी लग रही थी, मानो वह रौद्र युद्ध की ज्वालाओं का एक जीता-जागता पर्वत हो। उसके नेत्रों में क्रोध की नहीं, बल्कि अनादि शक्ति की उन्मादी चमक थी। उसके सम्मुख, शोणितपुर का सबसे अनुभवी सेनापति प्रलम्ब सिर झुकाए खड़ा था।
बाणासुर, अत्यंत ऊँचे स्वर में। जिससे कक्ष की शिलाएँ काँप उठीं, "प्रलम्ब! क्या मेरी नगरी के भीतर भी इतनी तेज़ी से हथौड़े चल रहे हैं कि मैं अपने रक्षकों की श्वास भी नहीं सुन पा रहा हूँ? क्या यह कृष्ण नामक ग्वाले का भय है, जो मेरे अजेय दुर्ग को जगा रहा है?"
प्रलम्ब, झुककर, शांत किंतु दृढ़ स्वर में। "नहीं, महाराज! यह भय नहीं, आपकी शक्ति का जयघोष है। शोणितपुर का प्रत्येक कण युद्ध के लिए तैयार है। हमने नगर के चारों ओर अग्नि-प्राचीर स्थापित कर दी है, जहाँ हमारे अस्त्र-शस्त्रों को स्वयं अग्नि देव का तेज प्राप्त है। शस्त्रागार में हर वह महाअस्त्र तैयार है, जो स्वर्ग को भी झुका सके।"
बाणासुर, क्रूर मुस्कान के साथ, अपनी एक भुजा उठाकर। "अग्नि-प्राचीर! उत्तम! मैं तो कब से देख रहा हूं कि यह यदुवंशी किस बल पर मेरे द्वार तक आने की हिम्मत करेगा! मेरे पास सहस्र भुजाएँ हैं, और मेरी ढाल पर स्वयं वृषभध्वज महादेव का आशीर्वाद है। कृष्ण को बता दो, यदि वह धर्म-नीति का पाठ पढ़ाने आया है, तो बाणासुर उसे केवल शक्ति-नीति समझाएगा।"
प्रलम्ब, "परंतु स्वामी, कृष्ण की चतुराई और उनकी सेना की गति अतुलनीय है। उनके रथ के पहिए धर्म पर टिके हैं।"
बाणासुर, क्रोध से दहाड़ते हुए। "बस! यह कैसा अल्पज्ञान है, प्रलम्ब! यह प्रेम-कथा उषा-अनिरुद्ध, मेरे विनाश का कारण नहीं बन सकती! मैं कैलाशवासी का परम भक्त हूँ! मेरा अहंकार ही मेरा कवच है! कृष्ण की धर्म-नीति मेरी रुद्र-शक्ति के सामने एक क्षण भी नहीं टिकेगी! क्या वे भूल गए कि मेरी चौदह अक्षौहिणी की सेना, जिसके आगे स्वर्ग के देवता भी काँपते हैं, अभी तक मेरे दुर्ग में विश्राम कर रही है?"
प्रलम्ब, "हम समझते हैं, महाराज! हमने दुर्ग के गुप्त मार्गों पर भी मायावी दैत्यों को नियुक्त कर दिया है। कृष्ण के हर प्रहार का उत्तर, प्रहार से भी अधिक भयंकर होगा। शोणितपुर एक अभेद्य पहेली है, जिसे भेदना असंभव है।"
बाणासुर, सिंहासन से उठकर, उसके सहस्र हाथों के अस्त्र झनझना उठे। "तो जाओ! मेरी आज्ञा है कि युद्ध-दुन्दुभि बजाई जाए! वह शोर इतना भयंकर हो कि द्वारका के हर कोने तक पहुँचे! महायुद्ध का बिगुल इस तरह गूँजे कि देवताओं का मन भी भय से विचलित हो जाए! कृष्ण की सेना को मेरे इस अहंकारी मंच पर नचवाओ, प्रलम्ब! यह युद्ध मेरा गौरव है, और मैं इसे रक्त की नदियों से सजाऊंगा!"
बाणासुर के शब्दों के साथ ही, शोणितपुर के सप्त-परकोटों पर एक साथ लाखों युद्ध-दुन्दुभियाँ बज उठीं। यह ध्वनि केवल शोर नहीं थी यह दैत्यराज के अविनाशी अहंकार का गर्जन था। अस्त्र-शस्त्रों की भयानक खनखनाहट और दैत्यों की उन्मादी गर्जना ने उस नगरी को महाकाल का क्रीड़ा स्थल बना दिया। युद्ध का मंच अब पूरी तरह सज चुका था।
यादव प्रस्थान
द्वारका। जिस क्षण शोणितपुर की युद्ध-दुन्दुभी का उन्मादी नाद पवन में घुल कर आया, द्वारका के शांत सागर-तटों पर भी एक धर्म-संकल्प का गर्जन गूँज उठा। यहाँ शोर अस्त्रों की खनखनाहट का नहीं, बल्कि न्याय के उद्घोष का था।
योगेश्वर श्रीकृष्ण, अपने विराट सभा-कक्ष में, अपने अग्रज बलराम और अन्य प्रमुख सेनापतियों के साथ आसीन थे। उनके मुख पर न क्रोध था और न ही चिंता; केवल एक स्थिर, कालजयी संकल्प की आभा थी।
बलराम, रोषपूर्ण स्वर में। "कन्हैया! बाणासुर का यह अहंकार-युक्त आमंत्रण अब असहनीय है! उस दैत्य ने हमारी भावी पीढ़ी के प्रेम को बंदी बनाया है, और अब वह महादेव के वरदान के बल पर हमें चुनौती दे रहा है। हम क्यों विलंब कर रहे हैं? मेरी हलधारी सेना कब से उसके दुर्ग को धूल चटाने को आतुर है!"
श्रीकृष्ण, मुस्कुराते हुए, शांत और गंभीर स्वर में। "दाऊ, विलंब नहीं, यह समय का नियोजन है। बाणासुर ने केवल अनिरुद्ध को बंदी नहीं बनाया है, उसने धर्म की मर्यादा को चुनौती दी है। हम युद्ध अवश्य करेंगे, परंतु यह युद्ध केवल शक्ति का नहीं, बल्कि नीति और धर्म का होगा। हमें स्मरण रखना होगा बाणासुर पर स्वयं पशुपतिनाथ महादेव की कृपा है। यदि हम सीधे उस पर प्रहार करते हैं, तो वह रुद्र के क्रोध को भी आमंत्रित कर सकता है।"
बलराम, भौंहे सिकोड़ते हुए। "तो फिर हमारी रणनीति क्या होगी? क्या हम उसके वरदान के सामने झुक जाएँगे?"
श्रीकृष्ण, अपनी दृष्टि दूर शोणितपुर की ओर केंद्रित करते हुए। "झुकना नहीं, दाऊ, बल्कि मार्ग खोजना। बाणासुर की शक्ति उसके अहंकार में है, और उसकी सुरक्षा महादेव के वरदान में। हमारी रणनीति दो भागों में विभाजित होगी:
सबसे पहले, हम अपनी एक अक्षौहिणी की सेना के साथ शोणितपुर पर भीषण घेराबंदी करेंगे। यह घेराबंदी इतनी सशक्त होगी कि बाणासुर का अहंकार दुर्ग की दीवारों में ही दबकर रह जाए।
और दूसरा, मूल समस्या पर प्रहार। बाणासुर का अस्त्र-भंडार, उसकी अजेयता ये सब महादेव के वरदान से संचालित हैं। हमें सीधे बाणासुर पर नहीं, बल्कि उसके अहंकार के स्रोत पर प्रहार करना होगा। अस्त्र-शक्ति का सामना बुद्धि-शक्ति से किया जाएगा। हमारा लक्ष्य रुद्र के वरदान को खंडित करना नहीं, बल्कि बाणासुर को विवश करना है कि वह अपने इष्ट महादेव के सम्मुख स्वयं ही शक्तिहीन हो जाए।"
बलराम, आश्चर्य मिश्रित गर्व से। "तुम्हारी लीलाएँ तुम ही जानो, कन्हैया। परंतु मुझे यह महायुद्ध की पुकार सुनाई दे रही है। आदेश दो! कब प्रस्थान करना है?"
श्री कृष्ण, अपने सुदर्शन चक्र को स्पर्श करते हुए, दृढ़ता से। "अब और नहीं! सेनापतियों, मेरी आज्ञा है! आज ही, इसी मुहूर्त में, हमारी यादव सेना शोणितपुर की ओर कूच करेगी! हमारी सेना का प्रत्येक सैनिक धर्म की पताका लेकर चलेगा। हम असुरों की नगरी को नहीं जीतेंगे, बल्कि सत्य को मुक्त कराएंगे!"
क्षण भर में, द्वारका नगरी के शांत स्वरूप ने एक भव्य युद्ध-यात्रा का रूप ले लिया। शंख और भेरियों का उद्घोष हुआ। रथों के पहियों की गर्जना, अश्वों की टॉप और वीरों के जयकारों ने आकाश को भर दिया। यादवों की सेना, जो वर्षों से शांति और समृद्धि के प्रतीक थे, अब धर्म-स्थापना के लिए महासंग्राम में उतर रही थी।
सेना के मध्य में, श्रीकृष्ण अपने गरुड़ध्वज रथ पर आरूढ़ थे, उनके सारथी दारुक थे। उनके पीछे, बलराम अपने तालध्वज रथ पर, मूसल और हल को धारण किए हुए, ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो स्वयं संहार के देवता चल रहे हों। यह प्रस्थान केवल सेना का नहीं था; यह प्रेम और न्याय की अमर गाथा को पूर्ण करने के लिए एक विराट संकल्प था।
आकाशवाणी में देव-दुन्दुभी बज उठी। पृथ्वी काँप उठी।
कुछ ही समय में, क्षितिज पर, रक्त के समान लाल और अभेद्य शोणितपुर दुर्ग की विशाल, काली दीवारें दिखाई देने लगीं। एक ओर बाणासुर की अहंकार भरी चुप्पी थी, और दूसरी ओर, श्रीकृष्ण की सेना की गर्जना, जिसने शोणितपुर के बाहर पहुंचकर अपने रथों को रोक दिया।
रणभूमि पूरी तरह सज चुकी थी। अब केवल पहला प्रहार शेष था।
युद्ध-तैयारी
बाणासुर उठा और अपनी दसों दिशाओं में फैली तैयारियों का वर्णन करने लगा। उसकी वाणी में अहंकार की ऐसी पराकाष्ठा थी कि कक्ष में खड़े हर दैत्य का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।
बाणासुर, अपनी भुजाएं फैलाते हुए। "देखो, मेरे मंत्रियों! यह शोणितपुर नहीं, यह काल का पिंजरा है! कृष्ण की सेना के लिए यह स्वर्ग का द्वार नहीं, बल्कि अधोलोक का रास्ता है।"
"क्या वे कृष्ण के यादव इन ऊँचाइयों को देख पाएँगे? ये प्राचीरें नहीं, ये पहाड़ हैं, जिन्हें रुद्र के तप से सींचा गया है। हर बुर्ज पर काल-यंत्र स्थापित हैं, जो एक ही झटके में पूरी सेना को भस्म कर सकते हैं! हमारे युद्ध-पताके लाल नहीं हैं वे रक्त से रंगे हैं, जो कृष्ण की सेना का पहला दृश्य होगा।"
"सुनो! यह हवा की सरसराहट नहीं है। यह लाखों दैत्यों के अस्त्रों के टकराने की ध्वनि है! अखंड युद्ध-दुन्दुभी बजनी चाहिए! इतनी ज़ोर से कि द्वारका से आए अश्वों के कान के पर्दे फट जाएँ, और वे अपने ही सैनिकों को रौंद डालें! यहाँ कोई मधुर शंखनाद नहीं, केवल मृत्यु का चीत्कार सुनाई देगा!"
"शोणितपुर की भूमि अब भूमि नहीं रही, यह एक चुंबकीय जाल बन चुकी है। कृष्ण के रथ के पहिए, जैसे ही इस क्षेत्र में प्रवेश करेंगे, उन्हें लाखों टन भार महसूस होगा! मैंने गुप्त सुरंगों का जाल बिछाया है, जहाँ हर पग पर अग्नि-वर्षा और विष-बाण उनका स्वागत करेंगे। उन्हें महसूस होना चाहिए कि वे नरक की सतह पर चल रहे हैं!"
"हर द्वार पर गर्म, उबलते हुए तेल और भस्म का छिड़काव किया गया है। यह गंध जीवन की नहीं, अंत की है! यह असुरों के पराक्रम और हवन की क्रूर अग्नि की गंध है, जो यादवों को क्षण भर में मोहग्रस्त कर देगी!"
कूपकर्ण, प्रश्न करते हुए। "महाराज! यदि कृष्ण महादेव को अपनी धर्म-नीति से प्रसन्न करने में सफल हुए, तो क्या हमारे लिए कोई कूटनीतिक विकल्प है?"
बाणासुर, अपने सहस्र हाथों को घुमाते हुए, प्रचंड क्रोध में। "कैसी कूटनीति, कूपकर्ण? इस युद्ध में केवल एक ही कूटनीति है शक्ति! कृष्ण की धर्म-नीति मेरे अखंड वरदान के सामने काँच की तरह टूट जाएगी! यदि स्वयं महादेव भी मेरे विरुद्ध खड़े होते हैं, तो भी मैं उन्हें स्मरण करा दूंगा कि उनके वचन का मान रखना उनका कर्तव्य है।"
बाणासुर, सिंहासन पर वापस बैठते हुए, अंतिम घोषणा। "यह युद्ध अनिरुद्ध की मुक्ति के लिए नहीं, बल्कि देवताओं के सर्वोच्च अधिकार के लिए लड़ा जाएगा! यादव सेना को बता दो उन्हें शोणितपुर में वीरगति नहीं, केवल अपमानजनक मृत्यु मिलेगी! महायुद्ध का आरंभ हो!"
रणभूमि का दर्शन
शोणितपुर के बाहरी क्षेत्र में यादव सेना का विशाल शिविर स्थापित हो चुका था। जहाँ एक ओर दैत्यराज बाणासुर की नगरी से मृत्यु की शीतलता निकल रही थी, वहीं दूसरी ओर यादवों के शिविर में धर्म और साहस की ऊष्मा व्याप्त थी।
संध्या का समय था। योगेश्वर श्रीकृष्ण अपने अग्रज बलराम के साथ, एक ऊँचे टीले पर खड़े थे, जहाँ से शोणितपुर का काला, अभेद्य परकोटा स्पष्ट दिखाई दे रहा था।
बलराम, क्रोध से अपनी मूसल की नोक भूमि पर टिकाते हुए। "कन्हैया! देखो, यह रणभूमि नहीं, यह तो जैसे किसी महादैत्य का शव हो। यह भूमि रक्त-वर्ण की धूल से ढकी है और दुर्ग के चारों ओर गहरे गड्ढे और कांटेदार अवरोध बनाए गए हैं। बाणासुर ने भूमि को भी शत्रु बना दिया है। क्या हमारी सेना इस ऊबड़-खाबड़ रणांगण में तेजी से आगे बढ़ पाएगी?"
श्रीकृष्ण, शांत दृष्टि से सब देखते हुए, एक गहरी श्वास लेते हैं। "दाऊ! यह युद्ध-क्षेत्र दैत्यों की माया और भय से ओत-प्रोत है। बाणासुर जानता है कि यादव-सेना की शक्ति उनके रथों की गति और संगठन में है, इसलिए उसने भूमि को दलदल और बाधाओं से भर दिया है। वह चाहता है कि हमारी गति धीमी हो, ताकि उसकी अग्नि शस्त्रों से लैस सेना हमें खुले में निशाना बना सके।"
बलराम, शोणितपुर की दीवार की ओर इशारा करते हुए। "और उसके दैत्य-योद्धा! देखो कन्हैया, वे दीवार पर इस तरह खड़े हैं, मानो लोहे की विशाल मूर्तियां हों। उनकी काया में न कोई भावना है, न कोई विचार केवल महादेव के वरदान का मद है। उनके हाथ में वे विशालकाय महागदाएँ और तीक्ष्ण त्रिशूल हैं, जिनका भार एक सामान्य मनुष्य उठा भी नहीं सकता।"
श्रीकृष्ण, बलराम के कंधे पर हाथ रखते हुए, अपनी रणनीति बताते हैं। "हाँ, दाऊ। बाणासुर के सैनिक संख्या और बल पर निर्भर हैं। उनके अस्त्र-शस्त्र भी क्रूरता से भरे हैं जैसे विषाक्त बाण और भयानक द्वि-फाली कुल्हाड़ियाँ। वे हमारी सेना के अनुशासन को नहीं समझते।
परंतु, दाऊ, हमारे यादव-वीर उनकी चाल देखो! हमारे सैनिक चक्र, शांर्ग धनुष और भाले धारण किए हुए हैं। वे बाणासुर के दैत्यों से छोटे ज़रूर हैं, पर उनकी गति और चपलता दैत्यों के बल पर भारी पड़ेगी। यह युद्ध स्थूलता और सूक्ष्मता का है। हमारी सेना रण-नीति से लड़ेगी, न कि केवल बल से।"
बलराम, "रणनीति? यदि हम दुर्ग की ओर बढ़ते हैं, तो वह काला परकोटा हमें निगल जाएगा! मैंने सुना है, वह अग्नि-प्राचीर एक भी बाण भीतर नहीं जाने देगी! पहले प्रहार का लक्ष्य क्या होगा? द्वार तोड़ना असंभव लगता है।"
श्रीकृष्ण, मुस्कुराते हैं, उनकी आँखों में 'काल' का संकल्प झलकता है।
"द्वार तोड़ना हमारा लक्ष्य नहीं है, दाऊ। हमारा लक्ष्य है बाणासुर के अहंकार को भ्रमित करना। देखो, उसके दुर्ग के पीछे जो गुप्त मार्ग दिखाई दे रहे हैं... वहीं उसकी सेना का भोजन और रसद आता है। हमारी सेना का पहला प्रहार उस दुर्ग के सबसे मजबूत बिंदु पर नहीं होगा, बल्कि उसके सबसे गोपनीय और महत्वपूर्ण बिंदु पर होगा। ताकि बाणासुर विचलित हो जाए और अपने अहंकार के दुर्ग से बाहर आने को विवश हो जाए। हम उसे उसके ही घर में घेरे रहेंगे।"
बलराम, अपने मूसल को उठाकर, उनमें उत्साह भर जाता है। "तुम्हारी जय हो, कन्हैया! यह तो उत्तम नीति है! एक ओर घेराबंदी और दूसरी ओर रसद-मार्ग पर प्रहार! आज सूर्य अस्त हो चुका है, परंतु कल के सूर्योदय के साथ ही शोणितपुर का दंभ भी अस्त होगा! हलधारी सेना अब और इंतज़ार नहीं कर सकती!"
श्रीकृष्ण और बलराम उस टीले से नीचे उतरते हैं। यादव सेना का शिविर अब युद्ध के शंखनाद के लिए तैयार था। क्षितिज पर, शोणितपुर का काला परकोटा, आने वाले महाविनाश की प्रतीक्षा में, मौन खड़ा था।
शिव-गणों का प्रलय
सूर्य क्षितिज पर आया ही था कि युद्ध का प्रथम शंखनाद गूंज उठा। यह यादव सेना के अदम्य संकल्प का उद्घोष था।
श्रीकृष्ण की रणनीति के अनुसार, यादव सेना ने शोणितपुर के मुख्य द्वार पर सीधे आक्रमण नहीं किया। इसके बजाय, बलराम के नेतृत्व में एक विशाल सैन्य दल ने दुर्ग के पश्चिमी भाग में, जहां रसद मार्ग था, तीव्र और अप्रत्याशित प्रहार किया।
रणभूमि का दृश्य,पहला प्रहार।
जैसे ही यादव-वीरों ने बाणासुर द्वारा बिछाई गई काँटेदार बाधाओं को पार करना शुरू किया, शोणितपुर के अभेद्य परकोटे के भीतर से एक भयंकर गर्जना हुई। यह गर्जना किसी दैत्य की नहीं, बल्कि स्वयं रुद्र-गणों शिव के अनुचरों की थी, जिन्हें बाणासुर ने अपनी सबसे बड़ी ढाल के रूप में आगे किया था।
श्रीकृष्ण, टीले से रणभूमि को देखते हुए, शांत स्वर में। "दाऊ का प्रहार सही स्थान पर हुआ है, परंतु देखो, बाणासुर ने अपने सबसे भयानक रक्षकों को भेजा है। ये सामान्य दैत्य नहीं हैं, ये प्रमथ गण हैं, जिन्हें काल का भी भय नहीं होता।"
बलराम, सेना के मध्य से, मूसल को घुमाते हुए। "इनके रूप! देखो, कन्हैया! कोई विकराल मुख वाला है तो किसी का शरीर भस्म से लिप्त है। उनके अस्त्र भी अजीबोगरीब हैं एक और दैत्य रक्त पात्र से पानी पी रहे हैं, तो दूसरी ओर कोई सर्प की रस्सी से प्रहार कर रहा है! इनकी भयंकरता हमारे वीरों का मनोबल तोड़ने के लिए काफी है!"
रुद्र-गणों का दल ऐसे वेग से आया, मानो पर्वत की चट्टानें टूटकर गिर पड़ी हों। उनके पास विभिन्न प्रकार के अस्त्र थे, जिनमें विशाल त्रिशूल, खट्वांग मानव अस्थियों से बना दंड, और डमरू की ध्वनि से उत्पन्न होने वाली विभ्रमकारी तरंगें थीं।
डमरुओं की कर्कश ध्वनि से यादव सेना के अश्वों में भय और अनियंत्रण पैदा होने लगा। इसके साथ ही, हजारों हाथों से चलाए जा रहे लोहे के अस्त्रों की चीत्कार हवा में तैर गई।
वातावरण में भस्म, पसीना और रक्त की मिश्रित, तीखी गंध छा गई। रुद्र-गणों के शरीर से आने वाली अज्ञात, तीक्ष्ण दुर्गंध यादव सैनिकों को विचलित कर रही थी।
भयंकर युद्ध के कारण लाल धूल का एक बादल रणभूमि पर छा गया। इसके बीच, रुद्र-गणों के उन्मादी नृत्य और यादवों की सुनियोजित ढालों की चमक का टकराव किसी कालरात्रि जैसा दृश्य रच रहा था।
श्रीकृष्ण, अपने सारथी दारुक से। "ये रुद्र-गण केवल बाणासुर के लिए नहीं लड़ रहे, ये रुद्र की आज्ञा का पालन कर रहे हैं। दाऊ को उनकी प्रचंडता का ज्ञान देना होगा। हमें इन गणों की भयंकर शक्ति को शांत करना होगा, अन्यथा ये हमारी सेना का मनोबल तोड़ देंगे।"
भीषण प्रहारों के बीच, जहाँ कई यादव-वीर गणों के मायावी अस्त्रों के सामने विचलित हो रहे थे, वहाँ बलराम ने अपना हल और मूसल धारण किया।
बलराम, दैत्यों पर दहाड़ते हुए। "अरे अंधकार के पुत्रों! तुम अपने स्वामी बाणासुर के अहंकार के लिए लड़ रहे हो! परंतु यादव-सेना धर्म और प्रेम की मुक्ति के लिए खड़ी है! मैं हलधर हूँ, और मेरी शक्ति से यह भूमि विदीर्ण हो जाएगी!"
बलराम ने अपने हल के प्रचंड बल से एक बार भूमि को खींचा। भूमि थर्रा उठी, और बाणासुर द्वारा बिछाई गई सारी जालियाँ और बाधाएं टूटकर बिखर गईं। इसके बाद, उन्होंने अपने मूसल के प्रहार से कई रुद्र-गणों के अस्त्रों को चूर-चूर कर दिया।
दोनों सेनाओं के बीच लोहे और मांस का पहला महासंग्राम शुरू हो चुका था। यादवों के अनुशासन और युद्ध-कौशल की अग्नि रुद्र-गणों की पाशविक शक्ति के सामने धधक उठी थी। यह युद्ध केवल ज़मीन पर नहीं था, यह देव-वरदान और योग-नीति का सीधा संघर्ष था।
शंखनाद और रुद्र-गणों की चीखें रणभूमि में समा गईं। महायुद्ध का आरंभ हो चुका था।
रुद्र का आह्वान
रणभूमि में रुद्र-गणों और यादव-वीरों के बीच का संघर्ष अपनी पराकाष्ठा पर था। चारों ओर अस्त्रों की भीषण ध्वनि, वीरों का गर्जन और शोणित रक्त की वर्षा हो रही थी। एक ओर जहाँ बलराम का हल और मूसल दैत्यों का संहार कर रहा था, वहीं श्रीकृष्ण अपने रथ को एक ऊँचे स्थान पर स्थिर करवाकर युद्ध के इस विराट प्रलय को शांत दृष्टि से देख रहे थे।
श्रीकृष्ण को ज्ञात था कि यदि यह संघर्ष इसी तरह चलता रहा, तो उनके प्रिय भोलेनाथ महादेव और उनके बीच, केवल बाणासुर के अहंकार के कारण, एक भीषण टकराव होना अनिवार्य है। यह धर्मयुद्ध विष्णु और रुद्र के बीच का युद्ध नहीं बनना चाहिए था।
रथ के अग्रभाग पर खड़े होकर, योगेश्वर ने अपनी बांसुरी को नहीं, बल्कि अपने शंख पाञ्चजन्य को उठाया।
श्रीकृष्ण, पाञ्चजन्य फूंकते हुए, युद्ध की ध्वनि पर भारी पड़ते शांत स्वर में। "शिवम्! शाँतम्! इस रण में क्षणिक विराम हो!"
जैसे ही पाञ्चजन्य का दिव्य घोष गूंजा, महायुद्ध की भयंकर ध्वनि सहसा ठहर गई। रुद्र-गणों और यादव-वीरों ने अपने अस्त्रों को थाम लिया। पूरा ब्रह्मांड श्रीकृष्ण के इस शांत, किंतु निर्णायक आह्वान को सुनने के लिए स्तब्ध रह गया।
श्रीकृष्ण ने अपनी आँखें मूंद लीं और अपने हृदय में त्रिदेवों के आदि-देव, महादेव का ध्यान किया।
कैलाश से संवाद
अचानक, रणभूमि के ऊपर कैलाश पर्वत की ठंडी, पावन पवन का एक झोंका आया। आकाश में उज्ज्वल भस्म की वर्षा होने लगी, और एक दिव्य, गंभीर ध्वनि प्रकट हुई स्वयं शिव का स्वर, जो डमरू की ताल पर थिरकता था।
महादेव, गहन, पर्वतीय गर्जन जैसा स्वर। "हे वासुदेव! रणभूमि के मध्य, इस प्रकार मेरा आह्वान क्यों? क्या तुम नहीं जानते कि मैं अपने भक्तों के वरदान से बँधा हूँ? शोणितपुर का द्वार मेरे प्रमथ-गणों द्वारा रक्षित है। यदि तुम अपने धर्मपुत्र अनिरुद्ध को मुक्त कराना चाहते हो, तो मेरे गणों पर विजय प्राप्त करो!"
श्रीकृष्ण, हाथ जोड़कर, प्रेम और विनम्रता के साथ। "हे शम्भू! मैं आपका सेवक हूँ, आपका भक्त हूँ। मेरा यह आह्वान शक्ति-प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि धर्म की स्थापना और कर्तव्य की मर्यादा के लिए है। मैं जानता हूँ कि आप अपने वरदान से विमुख नहीं हो सकते, और मैं अपने धर्म से। यही कारण है कि यह युद्ध हो रहा है।
परंतु, हे रुद्र! कृपया मेरी बात सुनें! बाणासुर ने आपका वरदान अधर्म के लिए उपयोग किया है। उसने निष्पाप प्रेम को कारागार में डाला है। उसका अहंकार इतना बढ़ गया है कि वह स्वयं को काल से भी ऊपर समझने लगा है।
हमारा संघर्ष बाणासुर से है, आपसे नहीं!"
महादेव, उनकी ध्वनि में दृढ़ता और पीड़ा दोनों थी। "मैं बाणासुर को शस्त्र के रूप में नहीं, बल्कि भक्त के रूप में देखता हूँ। मेरे लिए, उसका संकल्प मेरा कर्तव्य है। मेरा वरदान उसे अजेयता का कवच देता है, और मैं अपने वचन को टूटने नहीं दूंगा।"
श्रीकृष्ण, दृढ़ता से, अपने सुदर्शन चक्र को स्पर्श करते हुए। "तो फिर, हे नीलकंठ! यदि आप अपने भक्त के अधर्म का पक्ष लेने के लिए बाध्य हैं, तो मुझे भी धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना होगा। मेरा यह संघर्ष व्यक्तिगत नहीं, बल्कि काल-चक्र का निर्णय है।
मैं दया का सागर हूँ, पर मर्यादा का रक्षक भी। यदि आप बाणासुर की ढाल बनेंगे, तो मुझे अधर्म की शक्ति से लड़ना ही होगा चाहे वह शक्ति कितनी ही महान क्यों न हो। यह युद्ध प्रेम को मुक्त कराने के लिए है, और इस कार्य में कोई भी बाधा अधर्म मानी जाएगी।"
महादेव का दिव्य रूप पलभर के लिए प्रकट हुआ। उनकी आँखों में श्रीकृष्ण के प्रति स्नेह और अपरिहार्य कर्तव्य का द्वंद्व साफ झलक रहा था।
महादेव, एक गहरी, निर्णायक श्वास लेते हुए। "हे केशव! मैं तुम्हारे संकल्प की दृढ़ता को समझता हूँ। तुम्हारा यह पथ धर्म की पराकाष्ठा है। मेरा वचन अटल है, और मुझे अपनी सेना को पीछे हटाने का अधिकार नहीं है। परंतु..."
महादेव क्षण भर के लिए मौन रहे।
महादेव, "परंतु यह युद्ध एकतरफा नहीं रहेगा। मैं तुम्हारी धर्म-नीति की सराहना करता हूँ। मैं तुम्हारी और बाणासुर के बीच खड़ा रहूँगा। यह महाप्रलय होकर रहेगा, और इसमें तुम्हारी विजय तभी संभव है जब तुम मेरे वरदान के मूल को खंडित करो। तैयार रहो, वासुदेव!"
जैसे ही महादेव ने यह बात कही, उज्ज्वल भस्म का झोंका तीव्र हुआ और उनकी आवाज़ आकाश में विलीन हो गई।
रणभूमि में एक अघोषित संदेश फैल चुका था। महादेव स्वयं बाणासुर की ओर से युद्ध में उतरेंगे, और यह युद्ध अब केवल दैत्य और मानव का नहीं, बल्कि दो परम शक्तियों के संकल्प का हो चुका था।
पाञ्चजन्य को नीचे रखते हुए, श्रीकृष्ण ने दारुक से कहा।
श्रीकृष्ण, "दारुक, अब काल-चक्र घूम चुका है। महादेव अपने वचन से बँधे हैं, और मैं अपने धर्म से। युद्ध! अब यह युद्ध संपूर्ण शक्ति से लड़ा जाएगा। बाणासुर को उसके वरदान के मद से मुक्त करने का समय आ गया है!"
रणभूमि में फिर से युद्ध-दुन्दुभी का नाद गूंजा, जो पहले से कहीं अधिक भयंकर और निर्णायक था।
अंधकार में आशा
बाहर रणभूमि पर युद्ध की पहली चिंगारी भड़क चुकी थी। दीवारों के पार से रह-रहकर शंखनाद और युद्ध-दुन्दुभी की आवाज़ें आ रही थी, जो शोणितपुर के कारागार में कैद उषा और अनिरुद्ध के हृदय को और भी तेज धड़का रही थी। बाणासुर ने अपनी पुत्री को पाताल की गहराई में बने एक गुप्त कक्ष में रखा था, जहां लोहे के भारी दरवाज़ों के बावजूद, मृत्यु की आहट पहुँच रही थी।
अंधेरे और ठंडे पत्थर के बीच, अनिरुद्ध उषा के पास बैठे थे। उन्होंने अभी-अभी द्वारका के प्रहार के बारे में सुना था।
ऊषा, डर और व्याकुलता भरे स्वर में, अनिरुद्ध का हाथ थामते हुए। "प्रियतम! वह कैसी आवाज थी? क्या यह... क्या यह वही है जिसका मुझे भय था? क्या योगेश्वर श्रीकृष्ण शोणितपुर आ पहुंचे हैं?"
अनिरुद्ध, उषा की हथेली को अपने होठों से छूते हुए, दृढ़ता से। "हाँ, ऊषा। मेरी सेना आ चुकी है। मैंने तुम्हें वचन दिया था कि मैं तुम्हें इस कारावास से मुक्त कराऊँगा, और धर्म की नीति कभी पीछे नहीं हटती। मेरे दादाजी श्रीकृष्ण अपनी प्रतिज्ञा पर अटल है।"
ऊषा ,आँखों में आँसू लिए, परंतु दृढ़ता से उनकी ओर देखती हुई। "आपकी प्रतिज्ञा... और मेरे पिता का अहंकार! अनिरुद्ध, आप नहीं जानते! यह केवल दैत्यों की सेना नहीं है। यहाँ महादेव का वरदान है। मेरे पिता ने स्वयं रुद्र-गणों को युद्ध की ढाल बनाया है। मैं जानती हूँ, देवों के देव अपने भक्त की रक्षा के लिए युद्ध करेंगे। आप अकेले, उस त्रिकालदर्शी शक्ति के सामने कैसे टिकेंगे?"
अनिरुद्ध, शांत मुस्कान के साथ। "ऊषा, प्रेम और धर्म में अकेलेपन का विचार नहीं होता। मेरे साथ केवल मेरी सेना का बल नहीं है, मेरे साथ आपकी निष्पाप प्रीति की शक्ति है। और जहाँ तक महादेव की बात है मेरे दादाजी, श्रीकृष्ण, स्वयं योगेश्वर हैं। वह जानते हैं कि रुद्र का सम्मान कैसे करना है और धर्म की स्थापना कैसे। उनका संघर्ष शिव से नहीं, बल्कि शिव के वरदान के दुरुपयोग से है।"
ऊषा, अधीर होकर। "परंतु युद्ध में कोई नीति या तर्क नहीं होता, अनिरुद्ध! वहाँ केवल खून और संहार होता है। यदि... यदि युद्ध में आपको कुछ हो गया... तो मेरे लिए उस मुक्ति का क्या अर्थ होगा?"
अनिरुद्ध, प्रेम से उनके केशों को सहलाते हुए। "युद्ध में जाने से पहले, मैं तुम्हें एक अंतिम सत्य बताना चाहता हूँ। यह कुंडेश्वर का रहस्य जिसे हमने साथ जिया है, वह किसी भी दैत्य-भय या देव-वरदान से बड़ा है। हमारी आत्माएँ एक हो चुकी है। यदि मेरा शरीर भी रणभूमि में गिर जाए, तब भी मेरी आत्मा द्वारका लौटकर तुम्हें स्वतंत्र देखने के लिए बैठी रहेगी।"
ऊषा, उनका चेहरा अपने हाथों में लेती हुई। "नहीं, ऐसी बातें न करें! मैं आपकी वीरांगना हूँ, आपकी शक्ति हूँ। आप मेरी अंतिम इच्छा सुनें इस युद्ध में विजयी होकर लौटें, केवल मेरे लिए नहीं, बल्कि उस अमर प्रेम कथा के लिए जिसकी नींव हमने इस अंधकार में रखी है। मैं यहाँ बैठकर हर पल आपके लिए प्रार्थना करूँगी।"
अनिरुद्ध, "मैं लौटूंगा, उषा। यह मेरा वचन है। और जब मैं लौटूंगा, तो हम शोणितपुर की रक्तरंजित दीवारों को छोड़कर, प्रेम और शांति के एक नए द्वारका की ओर प्रस्थान करेंगे।"
बाहर से अचानक रणभेरी की एक और तेज़ आवाज़ आती है, जो सेना के अंतिम प्रस्थान का संकेत थी। अनिरुद्ध जानते थे कि अब और रुकना संभव नहीं है।
अनिरुद्ध, अंतिम विदाई के स्वर में। "सुनो! मुझे जाना होगा। युद्ध का शंखनाद हो चुका है। मेरी सेना मेरी प्रतीक्षा कर रही है। अब यह क्षण प्रेम का नहीं, कर्तव्य का है।"
ऊषा, आँखों से आँसू बह रहे थे, पर होंठों पर एक फीकी मुस्कान। "जाइए! और संसार को बता दीजिए कि प्रेम की शक्ति महादेव के वरदान से भी अधिक प्रबल है! आपकी विजय मेरी विजय होगी! जाओ, वीर!"
अनिरुद्ध ने एक लंबी श्वास ली, उन्हें अंतिम बार देखा, और कारागार के द्वार की ओर मुड़ गए। द्वारपालों को आदेश देकर, वह उस अंधेरी सुरंग से बाहर निकले, जहाँ से सीधा रणभूमि का मार्ग जाता था। पीछे, ऊषा अकेले, युद्ध के भय और प्रेम की आशा के बीच, उस अभेद्य कारावास में बैठी रह गई।
जैसे ही अनिरुद्ध बाहर निकले, उन्होंने देखा सूर्य की पहली किरणें दुर्ग की काली दीवारों पर पड़ रही थीं। उनका हृदय उषा की चिंता और महायुद्ध के संकल्प से भरा था। उन्होंने अपनी ढाल को कसकर पकड़ा और महायुद्ध के केंद्र, जहाँ महादेव के गण खड़े थे, उसकी ओर अपना पहला कदम बढ़ाया। अब कोई मोड़ नहीं था केवल युद्ध!
महायुद्ध का मंच
दैत्यराज बाणासुर का दुर्ग, शोणितपुर, इस समय विनाश की गंध से भरा हुआ था। दुर्ग की विशाल, अभेद्य प्राचीरें रक्त के रंग के पत्थरों से बनी थीं, जिन पर युद्ध के लिए तैयार असुर सैनिकों की काली छायाएँ मंडरा रही थी।
स्थल: शोणितपुर का महा-युद्ध कक्ष। यह कक्ष लोहे और अंधेरे का एक भयंकर संयोजन था, जिसकी छत पर लगे त्रिशूलों की आकृति से एक खौफनाक रोशनी छनकर आ रही थी।
बाणासुर, अपने विशाल सिंहासन पर बैठा हुआ, उसके सौ हाथ सक्रिय थे। "मेरे वीर दैत्यों! बाहर किसका शंखनाद हो रहा है? वह कौन है जो महाकाल की इस नगरी के द्वार पर मृत्यु का गीत गाने आया है?"
सामने उसके सेनापति कुम्भाण्ड और कूपकर्ण झुके खड़े थे, जिनके चेहरों पर अहंकार के साथ-साथ एक सूक्ष्म अज्ञात भय भी था।
कुम्भाण्ड, झुक कर, गंभीर स्वर में। "महाराज! यह द्वारका की सेना है। वासुदेव कृष्ण स्वयं नेतृत्व कर रहे हैं, और उनके साथ बलराम तथा अनिरुद्ध भी हैं, जिसे आपने अपनी शक्ति से बंधक बनाया है।"
बाणासुर, हाथ पटक कर ज़ोर से हँसते हुए, उसकी हँसी लोहे की जंजीरों की तरह गूंजी। "हाँ! योगेश्वर कृष्ण! वह मुझे धर्म का पाठ पढ़ाने आए हैं, जिसकी एकमात्र नीति बांसुरी बजाना है! क्या वह सोचते हैं कि उनकी मीठी बातों से शोणितपुर के लोहे के द्वार खुल जाएंगे? वह भूल रहे हैं कि मेरे पास सहस्त्र भुजाएं हैं, और मेरे मस्तक पर स्वयं रुद्र का वरदान है!"
बाणासुर के आदेश पर, शोणितपुर की अखंड दुन्दुभी भयंकर गर्जना के साथ बज उठी, जिससे ऐसा लगा मानो पूरी धरती कंपकंपा गई हो।
योगेश्वर की नीति
शोणितपुर की रक्तवर्णी प्राचीरों से कुछ दूर, जहाँ दुर्ग की भयंकर युद्ध-दुन्दुभी की ध्वनि क्षीण हो जाती थी, वहाँ यादव सेना का विशाल डेरा स्थापित हो चुका था। द्वारका का गौरव और शौर्य हर सैनिक के मुख पर झलक रहा था। रण-कोलाहल नहीं, बल्कि दृढ़ संकल्प की एक शांत ऊर्जा पूरे शिविर में व्याप्त थी।
स्थल: यादव सेना का केंद्रीय रण-शिबिर।
एक ओर बलराम, जिनका हाथ हल और मूसल ज़मीन पर रखा था, उनका माथा क्रोध से तमतमा रहा था। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण, अपने रथ पर खड़े होकर, दूर शोणितपुर की अंधेरी छाया को देख रहे थे, उनकी आँखों में कोई उतावलापन नहीं, बल्कि गहन चिंतन था।
बलराम, तीव्र क्रोध में, हाथ की मुट्ठी भींचकर। "हे केशव! यह कैसी प्रतीक्षा? हमारी सेना यहाँ काल की तरह खड़ी है। हमारे वीर योद्धा, महा शौर्य से भरे हुए, एक पल भी देर नहीं चाहते! तुम उस दैत्य बाणासुर की अहंकार भरी गंध को और कितना सहन करोगे? मुझे आदेश दो! मैं अपने मूसल से क्षण भर में शोणितपुर की नींव हिला दूंगा और अनिरुद्ध को मुक्त कराऊँगा!"
श्रीकृष्ण, शांत, धीमे, किंतु अत्यंत गंभीर स्वर में। "दाऊ बलराम, तुम्हारा क्रोध धर्म से प्रेरित है, और तुम्हारा बल अप्रतिम है। परंतु, यह युद्ध केवल शौर्य का नहीं, संयम और मर्यादा का भी है। यह शोणितपुर साधारण दुर्ग नहीं है। यह महादेव के वरदान से अजेय है।"
बलराम, आश्चर्यचकित। "तो क्या हम रुद्र के भय से पीछे हट जाएंगे? क्या तुम अपने पौत्र को उस दैत्य की कैद में सड़ने दोगे?"
श्रीकृष्ण ने अपने रथ से नीचे उतरकर बलराम के कंधे पर हाथ रखा, और अपनी रणनीति का गहन दर्शन दिया।
श्रीकृष्ण, शांत नेत्रों से शोणितपुर की ओर देखते हुए। "नहीं, दाऊ! भय से पीछे हटना मेरी नीति कभी नहीं रही। परंतु देवों के देव का सम्मान करना हमारा परम कर्तव्य है। यदि हम सीधे दुर्ग पर प्रलयंकारी प्रहार करते हैं, तो हम सीधे महादेव को उनके वचन के पालन के लिए बाध्य करेंगे। और तब यह युद्ध यादवों और दैत्यों का नहीं, बल्कि विष्णु और रुद्र के बीच का महाविनाश बन जाएगा, जो सृष्टि के लिए अशुभ होगा।"
बलराम, "तो हमारी नीति क्या है? घेराबंदी? क्या हम उन्हें भूखा मारकर आत्मसमर्पण करने को मजबूर करेंगे?"
श्रीकृष्ण, मुस्कुराते हुए। "हमारी नीति चार चरणों की है: मर्यादा की घेराबंदी, बाहरी नीति। हम दुर्ग को चारों ओर से घेरेंगे, परंतु पहले रक्तपात से बचेंगे। यह बाणासुर को कूटनीतिक अहंकार का अवसर देगा, लेकिन दुनिया को संदेश जाएगा कि हमने पहले युद्ध नहीं छेड़ा। यह महादेव को यह सोचने का अवसर देगा कि क्या उनका भक्त वास्तव में धर्म पर है या नहीं।
आंतरिक विघटन, मानसिक प्रहार। हमें बाणासुर की शक्ति नहीं, बल्कि उसके अहंकार को तोड़ना है। मेरे दूत गुप्त रूप से दुर्ग में प्रवेश करेंगे। वे बाणासुर के निचले सैनिकों के बीच उषा और अनिरुद्ध के निष्पाप प्रेम की कथा फैलाएँगे। जब सैनिक यह जानेंगे कि वे केवल एक अहंकारी पिता के लिए लड़ रहे हैं, जो अपनी ही बेटी के प्रेम को कुचल रहा है, तो उनका मनोबल टूटेगा।"
बलराम, "और यदि यह सब विफल हो जाए, और बाणासुर हमें युद्ध के लिए बाध्य करे?"
श्रीकृष्ण, उनकी आवाज़ अब दृढ़, निर्णायक थी।"तब हम अंतिम चरण में प्रवेश करेंगे वरदान पर प्रहार! यदि बाणासुर अपने रुद्र-गणों को मैदान में उतारता है, तो हमें उनसे लड़ना होगा। लेकिन हमारा लक्ष्य उनके गण नहीं होंगे, बल्कि स्वयं महादेव होंगे। मुझे अंतिम क्षण में उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि बाणासुर का मार्ग अधर्म का है, ताकि महादेव स्वयं अपने वरदान से बाणासुर को मुक्त कर दें।
यह युद्ध शक्ति से नहीं, धर्म की परिभाषा से जीता जाएगा, दाऊ!"
बलराम, गहरी साँस लेते हुए। "तुम्हारी नीति हमेशा अप्रत्याशित रही है, केशव। मेरा हाथ बल के लिए तैयार है, पर मेरा मस्तिष्क तुम्हारी नीति का सम्मान करता है। तो, प्रथम आदेश क्या है?"
श्री कृष्ण, पांचजन्य शंख उठाकर। "प्रथम आदेश! पाञ्चजन्य का घोष हो! यह केवल युद्ध का आरंभ नहीं, यह धर्म के आगमन की घोषणा है। सेनापति सात्यकि को आदेश दिया जाए कि वह दुर्ग के चारों ओर अखंड घेराबंदी करें! किसी को भीतर आने या बाहर जाने की अनुमति नहीं!"
जैसे ही पाञ्चजन्य का दिव्य, मधुर, किंतु निर्णायक घोष गूंजा, यादव सेना ने एक साथ कदम बढ़ाया। हर सैनिक को पता था कि वे केवल एक युद्ध नहीं, बल्कि धर्म और प्रेम की महागाथा लिखने जा रहे हैं। रणभूमि पर दो महाशक्तियां आमने-सामने थीं, और अब महायुद्ध का आरंभ बस क्षण भर की दूरी पर था।
महायुद्ध का आरंभ
जैसे ही पाञ्चजन्य का घोष शांत हुआ, शोणितपुर के चारों ओर मृत्यु की चुप्पी छा गई। यादव सेना ने श्रीकृष्ण के आदेशानुसार, दुर्ग को पूर्ण रूप से घेर लिया था, पर किसी भी सैनिक ने पहला बाण नहीं चलाया। यह शांत घेराबंदी बाणासुर के अहंकार पर सीधा प्रहार थी।
स्थल: शोणितपुर के दक्षिणी द्वार के बाहर।
यादव सेनापति सात्यकि ने अपने धनुष को नीचे रखा और दुर्ग की ओर देखा। उनकी सेना का शांत संयम बाणासुर के क्रोध को उकसाने के लिए पर्याप्त था।
सात्यकि, अपने सहायक से, शांत स्वर में। "योगेश्वर की नीति अद्भुत है। यह शांति, बाणासुर के मन में तूफान लाएगी। वह इंतज़ार नहीं कर पाएगा।"
अंदर, बाणासुर अपने महायुद्ध कक्ष में प्रचंड क्रोध से धधक रहा था। श्रीकृष्ण की शांत उपस्थिति उसे असहनीय लग रही थी।
बाणासुर, चिल्लाते हुए, उसकी आवाज़ दीवारों से टकराई। "वह ग्वाला मुझे शांत रहकर अपमानित कर रहा है! वह चाहता है कि मैं डरकर आत्मसमर्पण करूं! यह बाणासुर है! मैं इंतज़ार नहीं करूँगा! मेरे दंभ को उनकी शांति नहीं तोड़ सकती!"
बाणासुर ने अपने सौ हाथों में से दो से एक विशाल घंटा बजाया। यह घंटा साधारण नहीं था यह रुद्र-गणों को युद्ध के लिए आह्वान करने का संकेत था।
बाणासुर, अपने सेनापति कुम्भाण्ड से। "जाइए! और महादेव के उन गणों को युद्ध में उतारिए, जिनका सामना करने का सामर्थ्य इंद्र में भी नहीं है। यह कृष्ण की शांति को प्रलय में बदल देंगे! पहला प्रहार इतना भयंकर हो कि यादवों की आँखें शिव की शक्ति देखकर बंद हो जाएँ!"
जैसे ही आदेश मिला, शोणितपुर के लोहे के द्वार भयंकर गर्जना के साथ खुले। भीतर से मनुष्य-रहित, विकराल आकृतियाँ जो शिव के अनुयायी, रुद्र-गण थे तेजी से बाहर निकलने लगे।
उनके मुख से मानव-विरोधी, कर्कश ध्वनि निकल रही थी, जो भेड़ियों के चीत्कार और पत्थरों के टूटने के मिश्रण जैसी थी। उनके ढोलों की ध्वनि युद्ध-दुन्दुभी से भी अधिक तेज और अमानवीय थी।
वे भयंकर दिखाई दे रहे थे किसी के तीन सिर थे, किसी के विशाल, विकृत हाथ। उनकी आँखें अग्नि की तरह जल रही थीं और उनके शरीर पर भस्म राख लिपटा था। वे न तो दैत्य थे, न मनुष्य वे दिव्य क्रोध के मूर्त रूप थे।
हवा में अचानक श्मशान और तीव्र धूप की गंध फैल गई, जो सामान्य युद्ध की गंध नहीं थी। यह दिव्य और भयावह ऊर्जा का अहसास था।
बलराम, क्रोध में, अपने मूसल को उठाकर। "हे केशव! यह क्या है? ये तो मनुष्य नहीं! यह तो प्रकृति का विकृत रूप है! क्या बाणासुर ने अपनी पुत्री के प्रेम के लिए सृष्टि के नियमों को चुनौती दे दी?"
श्रीकृष्ण, शांत, परंतु पाञ्चजन्य को अपने होठों के पास लाते हुए। "दाऊ! यही रुद्र का वरदान है। यह बाणासुर का अंतिम शस्त्र है। इन गणों को सामान्य अस्त्रों से पराजित नहीं किया जा सकता। इन्हें केवल दिव्य नीति से ही शांत किया जा सकता है।"
रुद्र-गणों का पहला लक्ष्य यादव सेना की घेराबंदी को तोड़ना था।
रुद्र-गण सेनापति विशाल त्रिशूल उठाकर, गरजते हुए। "यादव! तुम रुद्र के क्रोध का अपमान कर रहे हो! जाओ, और अपने बाँसुरी वाले राजा से कहो कि वह महाकाल के रास्ते में न आएँ! संहार आरंभ हो!"
गणों ने बिना किसी भय या नीति के, सीधे यादवों की अग्रिम पंक्ति पर धावा बोल दिया। उनके त्रिशूल और पाश यादव सैनिकों पर ऐसे गिरे, मानो आकाश से बिजली गिर रही हो।
दृश्य: यादव सेना ने अपनी ढालें उठाई, पर गणों के दैवीय अस्त्र उनसे टकराकर उन्हें क्षण भर में तोड़ रहे थे। युद्ध का मैदान अमानवीय चीखों और विनाशकारी टकरावों से गूँज उठा। सात्यकि ने अपने धनुष से अनेक बाणों की वर्षा की, पर गणों के शरीर पर उनका कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि उन्हें दैवीय सुरक्षा प्राप्त थी।
बलराम, रणभूमि में कूदते हुए। "नहीं! मैं इन्हें ऐसे विजय प्राप्त नहीं करने दूँगा!"
बलराम ने अपने मूसल से एक गण पर ऐसा प्रहार किया कि धरती काँप उठी, पर वह गण केवल दस कदम पीछे हटकर फिर से उठ खड़ा हुआ, हँसने लगा!
श्री कृष्ण, पांचजन्य बजाते हुए, जिसकी ध्वनि से गणों की कर्कश आवाज़ों में व्यवधान आया। "दाऊ! ठहरो! यह शक्ति का प्रयोग नहीं, नीति का समर्पण है। यह क्षण महादेव के समक्ष मेरी कूटनीति का है!"
श्रीकृष्ण अपने रथ को सीधे रुद्र-गणों के बीच ले गए, जहां वे मृत्यु के खेल में लगे थे। उन्होंने गणों को ललकारा और सीधे दुर्ग की ओर देखा मानो वे बाणासुर से नहीं, बल्कि महादेव से संवाद कर रहे हों।
अब रणभूमि के केंद्र में, यादव शौर्य और रुद्र-शक्ति का भीषण टकराव था, और उसके ठीक बीच में थे योगेश्वर श्रीकृष्ण, जिन्होंने युद्ध को अध्यात्म के मोड़ पर ला दिया था।
योगेश्वर का निवेदन
रणभूमि अब युद्ध की नहीं, प्रलय की साक्षी बन चुकी थी। बाणासुर के रुद्र-गणों ने यादव सेना की अग्रिम पंक्तियों को रौंदना शुरु कर दिया था। मानवीय शक्ति और दिव्य क्रोध के बीच का अंतर स्पष्ट था। बलराम का मूसल भी उन विकराल आकृतियों को केवल क्षणिक झटका दे पा रहा था।
स्थल: शोणितपुर के द्वार के समीप, रुद्र-गणों के घेरे के बीच।
श्रीकृष्ण ने अपने रथ को सीधे उस स्थान पर खड़ा कर दिया जहां सर्वाधिक भयंकर युद्ध हो रहा था। उन्होंने अपना पाञ्चजन्य शंख फिर उठाया। इस बार उसका घोष युद्ध का आह्वान नहीं, बल्कि शांति का निवेदन था। एक दिव्य संगीत जो युद्ध के कोलाहल को भेदता हुआ, सीधे कैलाश की ओर गया।
श्रीकृष्ण, रथ पर खड़े होकर, न तो बाणासुर को देखते हुए, न ही गणों को सीधे आकाश की ओर। "हे नीलकंठ! हे विश्वनाथ! रणभूमि के इस कोलाहल में, मैं, वासुदेव कृष्ण, आपको संबोधित करता हूँ। मैं जानता हूँ, आप अपने भक्त के वरदान की रक्षा में यहाँ सूक्ष्म रूप में उपस्थित हैं।"
रुद्र-गणों ने अचानक अपने प्रहार रोक दिए। उनकी क्रूर आँखें अब अचंभित थीं, जैसे किसी ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया हो।
बलराम, हैरानी से फुसफुसाते हुए। "केशव... तुम सीधे महादेव को क्यों पुकार रहे हो? क्या यह हमारी रणनीति का भाग है?"
श्रीकृष्ण, बलराम की ओर देखे बिना, अपनी आवाज़ में प्रेम और दृढ़ता भरकर। "दाऊ! अब यह युद्ध बाणासुर से नहीं रहा। अब यह धर्म और वरदान के बीच का द्वंद्व है। महादेव को स्वयं अपने वचन की परिभाषा देनी होगी।"
जैसे ही श्रीकृष्ण ने अपने नयन मूंदकर गहन ध्यान लगाया, आकाश में बिजली की एक कौंध हुई। रणभूमि में एक तीव्र, दैवीय ऊर्जा प्रकट हुई। वहाँ किसी का भौतिक रूप नहीं था, पर सबको यह अनुभव हो रहा था कि देवाधिदेव महादेव स्वयं वहाँ उपस्थित हैं। हवा में चंदन और भस्म की दिव्य गंध फैल गई।
महादेव, गंभीर, ब्रह्मांडीय स्वर में, जो हवा में गूँजता था। "हे जनार्दन! मैं तुम्हारी इस शांत चुनौती को स्वीकार करता हूँ। तुम जानते हो कि मैं यहाँ क्यों हूँ। बाणासुर मेरा परम भक्त है, और मैंने उसे अजेयता का वरदान दिया है। क्या तुम मुझे अपने वचन से पीछे हटने को कह रहे हो, या तुम सीधे हमसे युद्ध चाहते हो?"
श्रीकृष्ण, विनम्रता से हाथ जोड़कर। "हे शम्भो! न मैं आपके वचन को तोड़ने आया हूँ, और न ही आपसे युद्ध चाहता हूँ। मैं तो आपके धर्म-स्वरूप के समक्ष केवल एक प्रश्न रखने आया हूँ। यह मेरा निवेदन है, रुद्र!
पहला, क्या बाणासुर अपने वरदान का प्रयोग धर्म की स्थापना के लिए कर रहा है, या अपनी पुत्री के प्रेम को कुचलने के लिए? क्या भक्त की वासना को पूरा करना ही आपके वरदान का लक्ष्य है?
दूसरा, बाणासुर ने अनिरुद्ध को छल से बंधक बनाया। यह प्रेम के विरुद्ध क्रूरता है। क्या आपका आशीर्वाद उस पितृ-अहंकार की रक्षा करेगा जो निष्पाप प्रेम का शत्रु बन गया है? तीसरा: यदि मैं बल का प्रयोग करता, तो यह विनष्ट होता। मैंने धर्म-नीति का मार्ग चुना। मैंने आपको सीधे संवाद के लिए बुलाया, ताकि आप स्वयं अपने भक्त के कर्मों का न्याय कर सके। क्या यह धर्म नहीं है?"
महादेव, थोड़ी देर की चुप्पी के बाद, जिनकी आवाज़ में अब वेदना थी। "वासुदेव! तुम हमेशा मार्ग को सरल बना देते हो, पर मेरे लिए इसे और कठिन कर देते हो। भक्त का वचन मेरे लिए ब्रह्म की रेखा है। हाँ, बाणासुर अधर्म कर रहा है, और उसका अहंकार उसकी विनाश-लीला लिखेगा। किंतु मेरे गण तब तक उसकी रक्षा करेंगे, जब तक मेरा वरदान पूर्ण रूप से विफल नहीं हो जाता।"
श्रीकृष्ण, अंतिम कूटनीतिक प्रहार। "तब मैं आपके कर्तव्य का सम्मान करता हूँ, हे पशुपतिनाथ! मैं बाणासुर के अहंकार को मिटाने आया हूँ, न कि आपके वरदान को। यदि आप वरदान की रक्षा के लिए रणभूमि में खड़े हैं, तो मुझे यह युद्ध आपसे ही लड़ना होगा। क्योंकि प्रेम की मुक्ति और अधर्म का पतन ही मेरा परम धर्म है।"
महादेव के चारों ओर की दिव्य ऊर्जा क्षण भर के लिए अत्यंत तीव्र हो गई, जैसे वे किसी महान द्वंद्व से गुजर रहे हों।
महादेव, अंतिम, भारी घोषणा। "तुम्हारा धर्म ही तुम्हारा विजय होगा, कृष्ण। किंतु, नियम नहीं टूटेंगे। मेरे रुद्र-गण तब तक लड़ेंगे, जब तक तुम उन्हें पराजित नहीं कर देते। और यदि तुम बाणासुर तक पहुँचे, तो मैं स्वयं तुम्हारे मार्ग में खड़ा मिलूंगा।"
यह कहकर, महादेव की दिव्य उपस्थिति अंतर्धान हो गई। रुद्र-गणों की स्थिरता भंग हुई, और वे पहले से कहीं अधिक क्रोध के साथ यादव सेना पर टूट पड़े। लेकिन अब अंतर यह था कि श्रीकृष्ण को महादेव की अनुमति मिल चुकी थी। अब यह युद्ध अधर्म के विरुद्ध धर्म का था, न कि दो देवताओं के बीच की शत्रुता का।
श्रीकृष्ण, बलराम की ओर मुड़कर, मुस्कुराते हुए। "दाऊ! अब यह युद्ध केवल बल का है। महादेव ने हमें आशीर्वाद दे दिया है। अब उनके गणों को परास्त करो। यह शोणितपुर अब अजेय नहीं रहा!"
रुद्र-वासुदेव महासंग्राम
महादेव के अंतर्धान होते ही रणभूमि का वातावरण दुगनी तीव्रता से भयंकर हो उठा। रुद्र-गण, जो पहले वरदान से लड़ रहे थे, अब ईश्वरीय आज्ञा से लड़ रहे थे। उनकी शक्ति अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई। यादव सेना, बलराम के नेतृत्व में, रुद्र-गणों को परास्त करने में जुटी थी, पर उनकी दिव्य ऊर्जा उन्हें बार-बार पीछे धकेल रही थी।
स्थल: शोणितपुर के मुख्य द्वार से कुछ ही दूरी पर।
श्रीकृष्ण का रथ, दारुक द्वारा संचालित, सीधे बाणासुर के दुर्ग की ओर बढ़ रहा था। अचानक, उनके मार्ग में एक विशाल छाया प्रकट हुई।
अंधेरे और धुआं धुंध के बीच, महादेव अपने वृषभ नंदी पर आरूढ़ होकर, रणक्षेत्र में प्रकट हुए। उनके माथे पर लगा तीसरा नेत्र शांत था, पर उनके जटा जूट में लिपटी गंगा की धारा और उनके हाथ में त्रिशूल यह स्पष्ट कर रहा था कि वे यहाँ संरक्षक के रूप में नहीं, बल्कि महाकाल के रूप में उपस्थित हैं।
महादेव, गहन, गंभीर स्वर में, रणभूमि में कंपन पैदा करते हुए। "जनार्दन! तुमने मेरे वरदान की सीमा को चुनौती दी। मैंने तुम्हें अवसर दिया, पर तुमने प्रेम के धर्म को अपने कर्तव्य से ऊपर रखा। अब यह युद्ध भक्त के अहंकार का नहीं रहा। अब यह दो परम-तत्त्वों के बीच का अंतिम द्वंद्व है।"
श्रीकृष्ण, विनम्रता से मुस्कुराते हुए, पर उनकी आँखों में ब्रह्मांड का संकल्प था। "हे रुद्र! आप कल्याणकारी हैं। आप जानते हैं कि धर्म कहाँ है। यह युद्ध बाणासुर का नहीं, बल्कि उस अहंकार का पतन है, जिसे आपका वरदान प्राप्त हुआ है। मैं यहाँ न्याय स्थापित करने आया हूँ। यदि उस न्याय के मार्ग में आप खड़े हैं, तो मैं सहर्ष आपके विरुद्ध खड़ा होऊंगा। प्रणाम स्वीकार करें, और लीला आरंभ हो!"
महादेव ने एक गहरी साँस ली। उन्होंने अपना त्रिशूल आकाश की ओर उठाया, और प्रथम प्रहार किया।
महादेव, क्रोध और वेदना मिश्रित स्वर में। "यदि यही तुम्हारा निर्णय है, तो मैं अपने अंतिम शस्त्र से तुम्हें शांत करूँगा! पशुपतास्त्र!"
जैसे ही उन्होंने पशुपतास्त्र का आह्वान किया, आकाश से असंख्य बाणों की एक वर्षा हुई, जो काल की गति से आ रही थी। हर बाण में संपूर्ण रुद्र-शक्ति समाहित थी।
श्रीकृष्ण, शांत स्वर में, अपने सारथी दारुक से। "दारुक, रथ को स्थिर रखो।"
कृष्ण ने अपना कौमोदकी गदा प्रकट किया। लेकिन गदा को फेंकने के बजाय, उन्होंने उसे अपने चारों ओर चक्रवात की तरह घुमाया।
श्रीकृष्ण, गर्जना करते हुए। "हे रुद्र! मेरे संकल्प को जानो! यह वासुदेव चक्र है! शक्ति को नीति से काटा जाए! नारायणास्त्र!"
कृष्ण की गदा से प्रकाश की एक तीव्र किरण निकली, जिसने पाशुपतास्त्र के बाणों को बीच हवा में ही वाष्प बना दिया। यह दो परम अस्त्रों का टकराव था, जिसका कंपन धरती की गहराई तक गया।
बलराम, दूर खड़े होकर, सात्यकि से। "सात्यकि! यह कैसा युद्ध है? यह तो सृष्टि का अंत जैसा लग रहा है! मेरे मूसल की शक्ति इनके सामने तुच्छ है!"
सात्यकि, "दाऊ! हमें बस अपने काम पर ध्यान देना होगा। योगेश्वर ने हमें समय दिया है। हमें रुद्र-गणों को हटाना होगा!"
महादेव ने देखा कि उनका सर्वोच्च अस्त्र विफल हो गया है। उनके मुख पर संघर्ष का भाव आया।
महादेव, "तुम्हारा नारायणास्त्र अद्भुत है, केशव! पर क्या तुम मेरे मोह को काट सकते हो? मैं तुम्हें निद्रा में डालूँगा! जृम्भणास्त्र!"
महादेव ने एक मंत्र का उच्चारण किया। रणभूमि पर गहन निद्रा की एक शक्ति छा गई। यादव सेना के कई सैनिक तुरंत अचेत होकर गिरने लगे। बलराम की आँखें भी भारी होने लगीं।
बलराम, आँखों को मलते हुए। "हे केशव! यह... यह कैसी थकावट है? मेरा शरीर सुन हो रहा है..."
श्रीकृष्ण, हँसते हुए, शांत लेकिन दृढ़। "हे भोलेनाथ! मैं योगेश्वर हूँ, और योग निद्रा को काटता है! आप मुझे माया से नहीं जीत सकते! योगमाया का आह्वान हो!"
श्रीकृष्ण ने अपने शरीर से एक तेज पुंज निकाला, जिसने जृम्भणास्त्र की शक्ति को सोख लिया। जो सैनिक बेहोश हुए थे, वे तुरंत उठ खड़े हुए, जैसे उन्हें नई ऊर्जा मिल गई हो।
महादेव, "तुम वास्तव में पूर्ण पुरुषोत्तम हो, वासुदेव! लेकिन मैं तुम्हें अंतिम चेतावनी देता हूँ। यदि तुम मेरे भक्त पर प्रहार करते हो, तो मैं तुम्हारी मृत्यु का कारण बनूँगा! रुद्रास्त्र!"
महादेव ने रुद्रास्त्र का आह्वान किया, जिससे उनके चारों ओर अग्नि की एक विशाल दीवार बन गई, जो हर चीज़ को भस्म कर रही थी।
श्रीकृष्ण, क्षण भर रुके, फिर अंतिम निर्णय लिया। "हे रुद्र! अब और नहीं! मैं आपके सम्मान और आपके वरदान दोनों की रक्षा करूँगा। मैं बाणासुर को शारीरिक कष्ट नहीं दूंगा, पर उसका अहंकार तो अवश्य तोडूँगा! सुदर्शन चक्र!"
श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र का आह्वान किया। यह तेज का गोला, लाखों सूर्यों से भी अधिक प्रकाशित था।
श्रीकृष्ण, अंतिम निवेदन। "हे महादेव! यदि यह चक्र बाणासुर पर चलता है, तो यह उसके सौ हाथों को काटेगा। आपका वरदान बना रहेगा, क्योंकि मैंने उसे मारा नहीं, केवल उसके अहंकार की शक्ति को छीना। क्या यह धर्म है, या अधर्म?"
महादेव का चेहरा शांत हो गया। उन्होंने त्रिशूल नीचे कर लिया।
महादेव, शांति से, हार मानते हुए। "हे कृष्ण! तुम्हारा ज्ञान और तुम्हारी नीति मेरे बल से कहीं अधिक शक्तिशाली है। यह अधर्म नहीं, यह परम-धर्म है। सुदर्शन को चलने दो! मैं तुम्हारे मार्ग में नहीं आऊँगा।"
महादेव का चेहरा शांत हो गया। उन्होंने त्रिशूल नीचे कर लिया।
सुदर्शन का प्रलय
महादेव के त्रिशूल के नीचे होते ही, रणभूमि पर छाया दिव्य तनाव एकाएक टूट गया। श्रीकृष्ण ने अंतिम बार अपनी उंगली को घुमाया और सुदर्शन चक्र को मुक्त कर दिया।
सुदर्शन चक्र लाखों सूर्यों की ऊर्जा समेटे हुए, एक तेज पुंज के रूप में आकाश में उछला। वह केवल प्रकाश नहीं था; वह निर्णय था। उसकी गति इतनी तीव्र थी कि वह प्रकाश की लकीर से अधिक, काल का कटाव लग रहा था। यादव सैनिकों ने आँखें मूँद लीं, और रुद्र-गणों के मुख पर अंतिम भय की छाया स्पष्ट दिखाई दी।
बलराम, चमक से आँखें सिकोड़ते हुए। "केशव! मैंने जीवन में इतना तीव्र प्रकाश कभी नहीं देखा। यह केवल विनाश नहीं, यह सत्य का प्रदर्शन है!"
सुदर्शन चक्र के प्रस्थान से जो गर्जना हुई, वह किसी भी बादल की गड़गड़ाहट से भिन्न थी। यह शून्य को चीरने की ध्वनि थी एक प्रचंड चीख जो एक पल में आरंभ हुई और दूसरे पल में शोणितपुर की ओर जाते हुए दूर होती चली गई। युद्ध का सारा कोलाहल थम गया, और वहाँ केवल न्याय की ध्वनि शेष रही।
सात्यकि, आँखों पर हाथ रखकर। "उसकी ध्वनि काल के पहियों जैसी है! लगता है, जैसे ब्रह्मांड स्वयं अपनी धुरी पर घूम रहा हो!"
चक्र के जाने की दिशा में हवा का तापमान अचानक घट गया, और फिर एक तीव्र गर्म लहर पीछे की ओर आई, जैसे किसी दिव्य अग्नि ने मार्ग बनाया हो। यादव सैनिकों ने अपने कवच के नीचे भी ऊर्जा का कंपन महसूस किया एक पवित्र कंपकंपी जिसने शरीर के सारे संशय मिटा दिए।
श्रीकृष्ण, चक्र को जाते हुए देखते हुए, अपने सारथी दारुक से। "दारुक! हवा में अहंकार की गंध अब भय में बदल गई है। इस सुदर्शन का स्पर्श अंधकार को जलाता है।"
रणभूमि से धूल और रक्त की गंध पूरी तरह से गायब हो गई। हवा में अब तीव्र ओज़ोन और दिव्य फूलों की मिली-जुली गंध थी जैसे पाप का शुद्धिकरण हो रहा हो, और धर्म की स्थापना हो रही हो।
बाणासुर, जो दुर्ग के शीर्ष पर खड़ा था, उसने अपने मुख में एक तीव्र, धातुई स्वाद महसूस किया यह पतन का स्वाद था। इस पल, उसे अपने मृत्यु-बोध का स्वाद आया, जो उसके जीवन भर के अहंकार से अधिक कड़वा था।
बाणासुर, बुदबुदाते हुए, दुर्ग के शीर्ष पर। "यह... यह कैसा कड़वा सत्य है? यह अजेयता का नहीं, विनाश का स्वाद है..."
पूरे शोणितपुर में एक अंतर्ज्ञान की लहर दौड़ गई। रुद्र-गणों ने महसूस किया कि उनका संरक्षण टूट चुका है, और बाणासुर ने महसूस किया कि उसकी सौ भुजाएँ अब केवल मिट्टी है। यह ईश्वरीय न्याय की अपरिहार्यता थी।
सुदर्शन चक्र ने क्षण भर में दुर्ग की दीवारों को पार किया और, बिना प्राणों को छुए, बाणासुर के सौ हाथों को एक साथ काट दिया। बाणासुर ने एक अंतिम चीख मारी, जो हवा में गूंजती रही, और अपने कटे हुए हाथों को देखता रहा। वह अचेत होकर दुर्ग के शीर्ष पर गिर गया।
महादेव की सांत्वना
सुदर्शन चक्र की प्रचंड गर्जना शांत हो चुकी थी, लेकिन शोणितपुर का वातावरण अब भी उस दिव्य न्याय के प्रभाव से गूँज रहा था। दुर्ग के शीर्ष पर, दैत्यराज बाणासुर अपने सौ कटे हुए हाथों के साथ अचेत पड़े थे। उनका विशाल शरीर अब दंभ का नहीं, दर्द का प्रतीक था।
स्थल: बाणासुर के दुर्ग का शीर्ष, जहां वह गिरा पड़ा है।
बाणासुर की चेतना धीमी गति से लौटी। उसने आँखें खोलीं और अपने शरीर को देखा। उसके कंधों से रक्त की धारा बह रही थी, पर उससे कहीं अधिक बह रहा था, उसका अहंकार। वह उठने का प्रयास करता है, लेकिन कराहट के सिवा कुछ नहीं निकलता।
बाणासुर, दर्द से कराहते हुए। "शिव... शिव! मेरे स्वामी... मेरी सौ भुजाएँ... मेरा गौरव... सब छीन लिया गया! क्या यह मेरे हजारों वर्षों की तपस्या का फल है? मुझे क्यों छोड़ा गया... अधम होकर जीने के लिए?"
तभी, वायुमंडल में फिर से चंदन और भस्म की दिव्य गंध फैली। महादेव अपने सौम्य, शांत रूप में बाणासुर के निकट प्रकट हुए। उनके चेहरे पर करुणा थी, क्रोध नहीं।
महादेव, पिता तुल्य सांत्वना देते हुए। "उठो, बाणा। तुम अब भी मेरे परम भक्त हो। मैंने तुम्हें अमरता का वरदान नहीं दिया था, बल्कि अजेयता दी थी। मैंने तुम्हारा जीवन नहीं, केवल तुम्हारी शक्ति का दंभ छीना है। तुम्हारी तपस्या विफल नहीं हुई। तुम अब मुक्त हो, उस अहंकार से, जो तुम्हें विनाश की ओर ले जा रहा था।"
बाणासुर, आँसू और रक्त के साथ, महादेव के चरणों में गिरकर। "प्रभु... अब मैं किस काम का? एक छलहीन योद्धा... एक बेबस पिता... मेरी पुत्री... ऊषा... मुझे क्षमा करें, प्रभु! मैंने प्रेम के विरुद्ध युद्ध किया।"
महादेव, "प्रेम के मार्ग में क्रोध सदैव पराजित होता है। उठो, अपने पिता होने का कर्तव्य पूरा करो। अब युद्ध समाप्त हो चुका है। तुम्हारा यह पतन तुम्हें पुनर्जीवन देगा। शेष चार भुजाएँ ही अब तुम्हारे धर्म और कर्तव्य का वहन करेगी।"
महादेव ने बाणासुर को उठाया और अपने हाथों से उसकी पीड़ा को शांत किया। बाणासुर की आँखों में अब भक्ति थी, अहंकार नहीं।
प्रेम की विजय
स्थल: शोणितपुर के दुर्ग के भीतर, जहाँ उषा और अनिरुद्ध बंदी थे।
जैसे ही सुदर्शन चक्र का कंपन शांत हुआ, कारागार के द्वार स्वयं ही खुल गए। अनिरुद्ध, जो जृम्भणास्त्र के प्रभाव से मुक्त होकर उषा के पास बैठे थे, उठे।
अनिरुद्ध, उषा का हाथ थामते हुए, उसके चेहरे पर अपार प्रेम। "ऊषा! जय हुई है! योगेश्वर श्रीकृष्ण ने धर्म की स्थापना की है। अब हमें कोई नहीं रोक सकता।"
ऊषा, आँखों में आँसू, पर चेहरे पर सूर्य जैसी चमक। "अनिरुद्ध... मैं तो यह सोचकर ही मर रही थी कि कहीं इस युद्ध में... कहीं पिता के हठ के कारण... आपका कोई अनिष्ट न हो जाए। यह कारागार मुझे महल से भी अधिक सुरक्षित लगा, क्योंकि तुम मेरे साथ थे।"
वे दोनों एक क्षण के लिए एक-दूसरे के गले मिलते हैं। यह आलिंगन भय की समाप्ति और अनंत प्रेम के आरंभ का प्रतीक था। तभी, दूर से रथों की आहट आती है। श्रीकृष्ण, बलराम और यादव सेना के नायक कुंडेश्वर के द्वार पर आ पहुंचे थे।
ऊषा, अधीर होकर। "वे आ गए! अब हमें तुरंत बाहर चलना चाहिए!"
जब वे मंदिर के मुख्य प्रांगण में पहुंचे, तो उन्होंने श्रीकृष्ण को शांत मुद्रा में खड़े देखा। बाणासुर, अब अपनी शेष चार भुजाओं के साथ, विनम्रता से उनके पास खड़ा था।
बाणासुर, झुके हुए स्वर में, उषा और अनिरुद्ध से। "पुत्री... उषा । मैं अपराधी हूँ। मैंने अपने हठ से तुम्हारे प्रेम को युद्ध में झोंका। मैंने अपने जीवन में सबसे बड़ा अधर्म किया।"
ऊषा, दौड़कर अपने पिता के पास जाती है, कटे हुए हाथों की ओर इशारा करते हुए मंदिर "पिताजी! यह... यह सब मेरे कारण हुआ। यह पाप मुझ पर है। मैं आपको इस दर्द में नहीं देख सकती।"
बाणासुर, पुत्री का सिर प्यार से सहलाते हुए। "नहीं, पुत्री। यह पाप नहीं, यह प्रायश्चित है। यह वरदान की कीमत थी। अब मैं समझ गया हूँ कि वास्तविक शक्ति प्रेम को कुचलने में नहीं, बल्कि उसे स्वीकारने में है।"
श्रीकृष्ण, मुस्कुराते हुए, दोनों प्रेमियों को आशीर्वाद देते हुए। "बाणासुर! तुमने सत्य को स्वीकार किया। प्रेम कभी पराजित नहीं होता, क्योंकि वह स्वयं धर्म है। उषा और अनिरुद्ध की अमर प्रेम कथा अब पूरी हुई। यह मिलन केवल दो आत्माओं का नहीं, बल्कि दैत्य और मानव के बीच शांति का प्रतीक है।"
अनिरुद्ध, श्रीकृष्ण के चरणों में झुककर। "योगेश्वर! आपने न केवल उषा को बचाया, बल्कि बाणासुर को भी अहंकार से मुक्त किया। आपका ज्ञान और नीति ही सर्वोपरि है।"
बलराम, हँसते हुए, गंभीर माहौल को तोड़ते हुए। "चलो, बहुत हुई ज्ञान चर्चा। अब द्वारका चलो! हमें इस नए युगल के विवाह की तैयारी करनी है। शोणितपुर का यह काला अध्याय समाप्त हुआ!"
ऊषा, बाणासुर की ओर देखती है, जो अब शांत और विरक्त दिखाई दे रहा था। वह अपने पिता को अंतिम बार गले लगाती है। इस मिलन में आँसू, खुशी, और शांति तीनों का समावेश था।
द्वारका का उल्लास
पिछले कई मासों से यादवी सेना ने जिस प्रकार की हिंसा, रक्तपात और विनाश देखा था, उसकी छाया अब द्वारका के तट पर पड़ने वाले पहले प्रकाश से धुल गई थी। शंखनाद की ध्वनि ऐसी थी जैसे प्रकृति स्वयं उत्सव मना रही हो। यह हर्ष केवल एक युवराज की घर वापसी का नहीं था; यह युद्ध की समाप्ति और विजय की घोषणा के बाद, शांति के पुनः आगमन का आनंद था।
द्वारका, क्षीर सागर पर तैरती हुई सी प्रतीत होती थी। उसकी स्वर्ण-जटित अट्टालिकाएँ सूर्य की किरणों में चमक रही थीं, और मुख्य मार्ग पर ऊषा तथा अनिरुद्ध के स्वागत में चंदन, अगर और केसर मिश्रित जल का छिड़काव किया गया था। हर घर के तोरण द्वार पर आम्र पल्लव और फूलों की मालाएँ थीं, और हर गली से मधुर संगीत और यादव महिलाओं के उल्लासपूर्ण गीत सुनाई दे रहे थे।
अनिरुद्ध, जो पिछले कुछ समय से एक योद्धा के रूप में अपनी शक्ति और पराक्रम को सिद्ध कर चुके थे, आज ऊषा के साथ एक रथ पर सवार थे। उनके चेहरे पर युद्ध की कठोरता नहीं, बल्कि प्रेम और शांति का संतोष था।
रथ जब राजपथ पर धीरे-धीरे बढ़ रहा था, तब बलराम जी ने श्री कृष्ण की ओर देखकर हँसते हुए कहा, “कन्हैया, द्वारका को देखकर लगता है कि इसने अपने हर पुत्र की प्रतीक्षा की है। यह नगरी केवल ईंट और पत्थरों की नहीं, बल्कि प्रेम और त्याग की नींव पर खड़ी है।”
श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, “दाऊ, जब हमने मगध के आतंक से त्रस्त होकर यहाँ आश्रय लिया, तो हमने एक संकल्प लिया था: एक ऐसी नगरी का निर्माण करना, जहाँ धर्म केवल नियम न हो, बल्कि जीवन का उत्सव हो। यह नगरी उस संकल्प का मूर्त रूप है।”
रथ महल के विशाल प्रांगण में रुका। उषा और अनिरुद्ध नीचे उतरे। इस भव्य भीड़ में, द्वारका के ज्ञानी और श्री कृष्ण के प्रिय सखा उद्धव, एक युवा निशान्त को द्वारका के वैभव का रहस्य समझा रहे थे।
निशान्त, आश्चर्य से चारों ओर देखते हुए। “हे तात उद्धव! मैंने कभी नहीं सोचा था कि किसी नगर में इतना ऐश्वर्य हो सकता है। पर यह ऐश्वर्य यहाँ इतनी शांति के साथ कैसे रहता है? अन्य राज्यों में धन अक्सर कलह लाता है।”
उद्धव, गहरी, शांत आवाज़ में। “वत्स निशान्त, यही द्वारका की सबसे बड़ी विशेषता है, और यही श्रीकृष्ण का सबसे महान कार्य। यह नगरी समुद्री व्यापार के माध्यम से समृद्ध हुई, परंतु इसका सामाजिक ढाँचा धन पर नहीं, बल्कि समानता और श्रम के सम्मान पर टिका है।”
निशान्त, “समानता? क्या यहां भी वर्ण व्यवस्था नहीं है?”
उद्धव, “वर्ण व्यवस्था है, पर उसका आधार जन्म नहीं, बल्कि कार्य और गुण है। यहाँ हर यादव को उसके कौशल और व्यापार के लिए सम्मान मिलता है। श्रीकृष्ण ने हमें सिखाया है कि कोई भी कर्म छोटा नहीं होता। हमारे अहिंसक 'वृष्णि' संघ में, सभी की राय मायने रखती है। यह नगरी अर्ध-गणतांत्रिक है, जहाँ ज्येष्ठों की सभा यादव परिषद हर बड़े निर्णय में भाग लेती है।”
निशान्त, “अर्ध-गणतांत्रिक... यह तो किसी भी बड़े साम्राज्य से भिन्न है! और संस्कृति? इस उल्लास का क्या रहस्य है?”
उद्धव, हँसते हुए, चारों ओर हो रहे संगीत की ओर इशारा करते हुए। “यह यादव संस्कृति है, वत्स! यह भूमि 'कला' को जीवन का अभिन्न अंग मानती है। तुम जो नृत्य और संगीत देखते हो, जो रास-लीला यहाँ होती है, वह केवल मनोरंजन नहीं है। वह प्रेम और भक्ति का प्रदर्शन है। द्वारका का हर नागरिक, चाहे वह व्यापारी हो या शिल्पी, संध्याकाल में एक कलाकार होता है।”
निशान्त, “तो, द्वारका की भव्यता उसके स्वर्ण में नहीं, बल्कि उसके विचार में है?”
उद्धव, “बिलकुल! श्रीकृष्ण ने द्वारका को 'शरण' देने के लिए बसाया। यह केवल यादवों की राजधानी नहीं है; यह एक ऐसा आश्रय है जहाँ क्षत्रिय का बल, ब्राह्मण का ज्ञान, वैश्य का उद्यम और शूद्र का श्रम - सब समान रूप से सम्मानित हैं। युद्ध समाप्त हो गया, पर इस नगरी का निर्माण आज भी जारी है, हर उस हृदय में जो शांति और धर्म के साथ जीना चाहता है।”
उन दोनों का संवाद समाप्त होते ही, राजपुरोहित ने उषा और अनिरुद्ध को आशीर्वाद देने के लिए आसन ग्रहण किया। श्री कृष्ण ने सामने खड़े सभी लोगों को देखा। उनकी आँखों में केवल उषा और अनिरुद्ध का सुखी भविष्य ही नहीं, बल्कि उस नई यादवी सभ्यता की झलक थी, जो कठोर युद्धों की राख से उठकर, प्रेम, व्यापार और समानता के सिद्धांतों पर आधारित एक स्वर्णिम युग का सूत्रपात करने जा रही थी।
द्वारका का यह उल्लास केवल आज के उत्सव का नहीं था। यह एक दर्शन था एक भविष्य की प्रतिज्ञा।
विवेक का परीक्षण
उषा और अनिरुद्ध का विवाह उत्सव समाप्त हो चुका था। द्वारका का वैभव, उसका संगीत और उल्लास अब भी नगर की हवा में घुला हुआ था, किंतु राजभवन के भीतर, शांति के आगमन के साथ ही प्रशासनिक कार्यों की गति बढ़ गई थी।
अनिरुद्ध, जो पिछले कई मासों से युद्ध की चकाचौंध और रक्त की ललक में रहा था, अब अपनी ऊर्जा को शांत होते महसूस कर रहा था। उसके भीतर की योद्धा-वृत्ति अब भी किसी लक्ष्य की तलाश में थी। एक दोपहर, जब वह अपने कक्ष में अस्त्रों का निरीक्षण कर रहा था, तब श्री कृष्ण ने उन्हें सभा-कक्ष में बुलाया।
सभा-कक्ष में केवल श्री कृष्ण और उद्धव उपस्थित थे। श्री कृष्ण ने अनिरुद्ध को बैठने का संकेत दिया और शांत स्वर में बात शुरू की।
श्री कृष्ण, “अनिरुद्ध, युद्ध समाप्त हो गया। तुमने अपनी वीरता सिद्ध की, और तुम्हारा नाम वृष्णि वंश के महानतम योद्धाओं में अंकित हो गया। पर अब समय है यह समझने का कि एक सच्चा नेतृत्व तलवार की धार पर नहीं, बल्कि विवेक की नींव पर टिका होता है।”
अनिरुद्ध, उत्सुकता से। “मुझे आज्ञा दें, तात। क्या कोई नई चुनौती है? क्या कहीं सेना भेजने की आवश्यकता है?”
श्री कृष्ण, “चुनौती तो है, पर वह मानव-हृदय की जटिलता से जुड़ी है, शस्त्रों से नहीं। तुम जानते हो कि इस महायुद्ध में हमारे कई महान यादव योद्धा वीरगति को प्राप्त हुए, और मगध के पतन के बाद बड़ी संख्या में विस्थापित नागरिक द्वारका आए हैं।”
उन्होंने सामने रखी एक ताड़पत्रों की गड्डी अनिरुद्ध की ओर बढ़ाते हुए कहा, “इस गड्डी में उन सभी परिवारों का विवरण है जिन्हें हमने युद्ध-क्षतिपूर्ति देनी है, और उन विस्थापितों का भी जिन्हें पुनर्वास प्रदान करना है।”
अनिरुद्ध ने गड्डी उठाई। उसके मन में आया कि एक निश्चित राशि सभी को वितरित कर दी जाए। यह सबसे आसान तरीका था।
अनिरुद्ध, “यह तो सीधा कार्य है, तात। प्रत्येक मृत योद्धा के परिवार को एक समान धनराशि, और प्रत्येक विस्थापित परिवार को एक समान भूमि का टुकड़ा समानता ही धर्म है।”
उद्धव, बीच में टोकते हुए, स्नेह से। “राजकुमार, केवल समान वितरण ही न्याय नहीं है। यह द्वारका है, जहाँ हर व्यक्ति के श्रम और गुण को महत्व दिया जाता है।”
श्री कृष्ण, मुस्कुराते हुए। “अनिरुद्ध, तुम्हारा निर्णय एक क्षत्रिय राजा का निर्णय है, जो अपनी तिजोरी खोलकर समस्या को खत्म करना चाहता है। पर द्वारका में हम अर्थ-गणतांत्रिक सिद्धांत का पालन करते हैं। तुम इस विवरण-पत्र को देखो: एक योद्धा जिसका एकमात्र सहारा उसका शरीर था, और एक कारीगर जिसने अपना कारखाना और उपकरण खो दिए दोनों की क्षतिपूर्ति क्या एक समान हो सकती है?”
अनिरुद्ध ने ध्यान से विवरण देखा। एक परिवार ने अपना मुख्य शिल्पकार खोया था, जिसका कौशल अमूल्य था; दूसरे ने अपना खेतिहर पुत्र खोया था।
श्री कृष्ण, “यदि तुम दोनों को समान धन दोगे, तो शिल्पकार का परिवार उस धन को जल्द ही खर्च कर देगा और फिर से विपन्न हो जाएगा, क्योंकि उनके पास कौशल है पर उसे प्रयोग करने के लिए अब संसाधन नहीं। जबकि खेतिहर परिवार शायद उसी धन से छोटी ज़मीन लेकर फिर से जीवन शुरू कर सकता है। न्याय का अर्थ है, क्षतिपूर्ति ऐसी हो जो उन्हें आत्मनिर्भर बनाए, भिखारी नहीं।”
उद्धव, “तुम्हें यह समझना होगा कि किसी की जान का मूल्य, उसके भविष्य की कमाई की क्षमता और उसकी अनुपस्थिति से समाज को होने वाली क्षति से मापा जाना चाहिए। यह एक कठिन नैतिक और आर्थिक संतुलन है।”
अनिरुद्ध, गहरी साँस लेते हुए। “यह तो युद्ध से भी कठिन है। युद्ध में शत्रु स्पष्ट होता है, पर यहाँ तो शत्रु असंतुलन है। मुझे लगता है, मुझे उन परिवारों की वास्तविक आवश्यकता और उनके कौशल को ध्यान में रखकर हर मामले पर अलग से विचार करना होगा।”
श्री कृष्ण, संतोष से सिर हिलाते हुए। “यही तो मैं चाहता था, वत्स। अब तुम विजेता से एक प्रशासक बन गए हो। तुम्हें सांख्य दर्शन का प्रयोग करना है, न कि केवल शौर्य का। जाओ, पहले उद्धव के साथ बैठकर द्वारका के व्यापारिक कानूनों और सामाजिक सहायता कोष के नियमों को समझो।”
अनिरुद्ध ने वह गड्डी अब पूरी जिम्मेदारी और विनम्रता के साथ उठाई। उसे महसूस हुआ कि तलवार उठाने से कहीं ज़्यादा भारी यह राजकीय उत्तरदायित्व है। यह उसका पहला विवेक का परीक्षण था, और द्वारका की शांति को बनाए रखने का यह नया युद्ध उसे भीतर से बदल देगा।
ऊषा का नव-ताल
अनिरुद्ध अब राजभवन के शांत कक्षों में, उद्धव और कृष्ण के साथ राजनीतिक पत्राचार और अर्थव्यवस्था की जटिलताओं को समझ रहा था। दूसरी ओर, ऊषा को भी शोणितपुर के कठोर सैन्य प्रशिक्षण से निकलकर द्वारका की सौंदर्य और कला से भरी दुनिया में एक नया मार्ग खोजना था।
शोणितपुर में, उषा के लिए नृत्य केवल युद्ध-देवता की स्तुति का एक माध्यम था, तेज, आक्रमण और उग्र। लेकिन द्वारका में, नृत्य जीवन का आनंद, प्रेम का विलास और आत्मा की अभिव्यक्ति था।
एक दोपहर, ऊषा महल के 'नृत्य-गृह' में अकेली बैठी थी। यह कक्ष कमल के पत्तों से सजे कुंड के किनारे था, जहां दिन भर 'मृदंग' और 'वीणा' की मधुर ध्वनि गूंजती रहती थी। तभी, रुक्मिणी श्री कृष्ण की मुख्य पटरानी और सत्यभामा वहाँ आईं।
रुक्मिणी, स्नेह से। “ऊषा, हम देख रहे हैं कि तुम यहां घंटों बैठती हो। क्या हमारे संगीत और नृत्य में तुम्हें कोई आनंद नहीं आता?”
ऊषा, विनम्रता से खड़ी होते हुए।
“देवी, ऐसी बात नहीं है। यह संगीत... यह मेरे लिए बहुत नया है। शोणितपुर में, हमारा संगीत रणभेरी जैसा था, जो हृदय में केवल उत्तेजना भरता था। यह द्वारका का 'ताल' इतना शांत और मधुर है कि मुझे डर है, मेरी उग्रता इसे तोड़ देगी।”
सत्यभामा, हँसते हुए। “द्वारका तुम्हें बाँधती नहीं है, ऊषा। यह तुम्हें मुक्त करती है। यही तो कृष्ण का दर्शन है। युद्ध की शक्ति आवश्यक है, पर शांति का सौंदर्य उससे भी अधिक आवश्यक है।”
अगले कुछ दिनों में, रुक्मिणी ने उषा को द्वारका की सबसे प्रसिद्ध परंपरा रास-लीला के बारे में विस्तार से समझाया।
रुक्मिणी, “रास केवल नृत्य नहीं है। यह प्रेम, भक्ति और प्रकृति के बीच का संवाद है। इसमें हर गोपी, हर यादव, कृष्ण के प्रति अपने व्यक्तिगत भाव को व्यक्त करता है। यहाँ कोई नियम नहीं है। तुम्हारी तलवार की धार, ऊषा, अब तुम्हारे पैरों की गति में बदल सकती है।”
रुक्मिणी ने उषा को एक आगामी शरद पूर्णिमा उत्सव के लिए तैयार हो रहे एक विशेष 'युगल नृत्य' का नेतृत्व करने का प्रस्ताव दिया। यह नृत्य प्रेम की विजय और युद्ध के अंत को दर्शाने वाला था।
ऊषा ने यह चुनौती स्वीकार की। उसने पारंपरिक लावण्य और श्रृंगार रस को समझने की कोशिश की, पर उसके भीतर की योद्धा की ऊर्जा शांत नहीं हो रही थी। उसने एक रात अनिरुद्ध से इस बारे में बात की।
उषा, “प्रिय, मैं 'वृषभानु' युद्ध और शक्ति का प्रतीक की ऊर्जा को अपने नृत्य से बाहर नहीं निकाल पा रही हूँ। मुझे लगता है, मैं द्वारका की बहू होने के बावजूद इस भूमि के सच्चे आनंद को नहीं समझ पा रही हूँ।”
अनिरुद्ध, उषा का माथा चूमते हुए। “ऊषा, यही तो द्वारका का सार है। यहाँ कोई भी अपनी सच्ची प्रकृति को त्यागता नहीं है, बल्कि उसे विकसित करता है। यदि तुम्हारे नृत्य में युद्ध का बल है, तो वह बल शांति की रक्षा और प्रेम की स्थापना को दर्शाना चाहिए। अपनी प्रकृति को मत मारो, उसे समाहित करो।”
अनिरुद्ध के शब्दों से प्रेरित होकर, ऊषा ने अपनी कल्पना को उड़ान दी। उसने रुक्मिणी से अनुमति लेकर नृत्य में कुछ परिवर्तन किए।
शरद पूर्णिमा की रात आई। कृष्ण, बलराम और यादव परिषद के गण-प्रमुख उपस्थित थे। जब युगल नृत्य शुरू हुआ, तो पहले भाग में परंपरागत माधुर्य था, जिसमें गोपियों ने कृष्ण के प्रेम को दर्शाया।
परंतु, जैसे ही ऊषा ने मंच संभाला, ताल बदल गया। उसके पद-संचालन में अद्भुत शक्ति थी। उसके हाथों की मुद्राएँ केवल प्रेम का आह्वान नहीं थीं, वे अन्याय के विरुद्ध चुनौती और धर्म की दृढ़ता भी दर्शा रही थी। उसके शरीर की भाषा में युद्ध की यादें थी, जो अब स्थायित्व और समर्पण में बदल गई थीं।
दर्शकों ने पहली बार ऐसा 'नव-ताल' देखा था। एक ऐसा नृत्य जो कोमलता में शक्ति और भक्ति में दृढ़ता को समाहित करता था। जब नृत्य समाप्त हुआ, तो पूरा कक्ष तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
श्री कृष्ण ने मुस्कुराते हुए ऊषा की ओर देखा।
श्री कृष्ण, सभी से। “ऊषा ने आज हमें द्वारका का एक नया अध्याय दिखाया है। यह नगर केवल व्यापार और राजनीति से नहीं चलता। यह हर उस हृदय से चलता है, जो अपने अतीत को स्वीकार कर, वर्तमान में शांति का एक नया रूप गढ़ता है। ऊषा, तुम्हारा ताल 'पराक्रम' और 'प्रेम' का अद्भुत मिश्रण है।”
ऊषा को महसूस हुआ कि उसने अंततः द्वारका में अपना स्थान पा लिया है। वह अब केवल अनिरुद्ध की पत्नी नहीं थी; वह यादव संस्कृति में एक नई धारा लाने वाली थी।
व्यापार की चुनौती
राजभवन का सभा-कक्ष आज शांत नहीं था। मध्य में वृष्णि संघ की विशाल गोल मेज के चारों ओर गण-प्रमुख और प्रमुख यादव सरदार बैठे थे। वातावरण में किसी आगामी युद्ध की उत्तेजना नहीं, बल्कि आर्थिक संकट की गंभीर चिंता थी। अनिरुद्ध और उषा, अब पति-पत्नी के रूप में, पहली बार एक साथ औपचारिक परिषद में उपस्थित थे। अनिरुद्ध कृष्ण के पार्श्व में, और उषा रुक्मिणी के साथ।
सात्यकि, गण-प्रमुख, गंभीरता से मेज पर अपनी मुट्ठी पटकते हुए। “हे देवकी-नंदन, अब हमें कोई निर्णायक कदम उठाना ही होगा। मगध के पतन के बाद, जो छोटे तटीय राज्य अब स्वतंत्र हुए हैं, उन्होंने हमारे समुद्री व्यापार गलियारों पर मनमाने पारगमन शुल्क लगा दिए हैं!”
बलराम, क्रोध से। “शुल्क? यह शुल्क नहीं, समुद्री डकैती है! ये कायर राज्य जानते हैं कि युद्ध से थकी हुई द्वारका अभी विशाल सेना नहीं भेजेगी। हमारा प्रमुख व्यापारिक बेड़ा जो पूर्वी तट से मसाले और रत्न लाता है, वह पिछले तीन सप्ताह से अटका हुआ है। इससे द्वारका की आर्थिक स्थिरता पर सीधा प्रहार हो रहा है!”
श्री कृष्ण, शांत और स्थिर स्वर में। “सात्यकि, बलदाऊ। क्रोध समस्या का समाधान नहीं, केवल उसकी अभिव्यक्ति है। हमें यह समझना होगा कि ये राज्य ऐसा क्यों कर रहे हैं।”
बलराम, “वे क्यों कर रहे हैं? इसलिए कि वे दुर्बल हैं और उन्हें लगाम की आवश्यकता है! मेरा मत है, हमें तुरंत तीस युद्धपोतों का बेड़ा भेजना चाहिए। यह सैन्य प्रदर्शन एक चेतावनी होगी। यदि वे शुल्क कम नहीं करते, तो हम उनके बंदरगाहों को अवरुद्ध कर देंगे!”
उद्धव, गहरी साँस लेते हुए। “बलदाऊ का दृष्टिकोण क्षत्रिय धर्म के अनुरूप है, किंतु द्वारका का धर्म व्यापार और कूटनीति है। हम मगध नहीं हैं जो आतंक से शासन करें। यदि हम शक्ति का प्रयोग करते हैं, तो हम इन राज्यों को शत्रु बनाकर समुद्री मार्गों को स्थायी रूप से असुरक्षित कर देंगे।”
सात्यकि, “किंतु महाराज, व्यापारिक घाटा बढ़ता जा रहा है। यदि हम दुर्बलता दिखाते हैं, तो यह शुल्क दोगुना हो जाएगा! हमें त्वरित, प्रभावी कार्रवाई चाहिए!”
अब तक चुपचाप सुन रहे अनिरुद्ध ने यह सही समय समझा कि वह अपने नए प्रशिक्षण का उपयोग करें।
अनिरुद्ध, विनम्रता से, पर दृढ़ता से। “मैं गण-प्रमुख सात्यकि की चिंता से सहमत हूँ, और बलदाऊ के शौर्य का सम्मान करता हूँ। किंतु, तात कृष्ण ने मुझे सिखाया है कि किसी भी शत्रु की शक्ति का नहीं, बल्कि उसकी आवश्यकता का विश्लेषण करना चाहिए।”
बलराम, चौंककर। “आवश्यकता? उनकी आवश्यकता धन है, अनिरुद्ध!”
अनिरुद्ध, “ठीक है, बलदाऊ। मगध के पतन से ये राज्य स्वतंत्र हुए हैं, पर वे निर्धन भी हैं। उनके पास अपना उत्पादन बढ़ाने के साधन नहीं हैं, इसलिए वे आयातित माल पर निर्भर हैं। वे द्वारका से इतना शुल्क इसलिए वसूल रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि हम यह भुगतान करने को विवश हैं।”
श्री कृष्ण, संतोष भरी मुस्कान के साथ “और तुम्हारा समाधान क्या है, वत्स?”
अनिरुद्ध, “मेरा प्रस्ताव है कि हम उन तीन सबसे आक्रामक तटीय राज्यों को छोड़कर, उनके पीछे के सभी छोटे और गरीब राज्यों को सीधा व्यापारिक प्रस्ताव भेजें। हम उन्हें दो विकल्प दें:
'शून्य-शुल्क गलियारा' यदि वे हमारे माल पर कोई शुल्क नहीं लगाते, तो हम उन्हें उनके मुख्य आवश्यकता वाले माल जैसे अनाज और उपकरण पर बीस प्रतिशत अनुदान देंगे।
'साझेदारी संधि' हम उनके बंदरगाहों के विकास में पूंजी निवेश करेंगे, जिसके बदले में हमें स्थायी और निम्न पारगमन दरें मिलेंगी।”
सात्यकि, सोचते हुए। “इसका अर्थ है कि हम उन तीन राज्यों को व्यापारिक रूप से अलग-थलग कर देंगे?”
अनिरुद्ध, “बिलकुल! हम उन राज्यों से कहेंगे, आप शुल्क लगाओ, पर आपका माल तो कोई नहीं खरीद रहा! जब उनके पीछे के राज्य समृद्ध होने लगेंगे, तो उन तीन राज्यों के व्यापारी स्वयं अपने राजाओं पर दबाव डालेंगे कि वे द्वारका से संधि करें, या वे भूख से मरेंगे। यह बिना शस्त्र उठाए विजय होगी।”
तभी, उषा ने इस विचार का समर्थन किया, जिसमें शोणितपुर की राजनीतिक समझ थी।
ऊषा, “मैं अनिरुद्ध के विचार का समर्थन करती हूँ। मैंने शोणितपुर में देखा है कि जब शक्ति का संतुलन बिगड़ता है, तो छोटे शासक अपनी दुर्बलता छिपाने के लिए अक्सर अहंकार का सहारा लेते हैं। सैन्य प्रदर्शन से उनका अहंकार और बढ़ेगा। लेकिन जब उनके लोग स्वयं उनके विरुद्ध हो जाएंगे, क्योंकि उनका व्यापार बंद हो गया है, तो राजा को झुकना ही पड़ेगा। यह मानसिक युद्ध है।”
बलराम, आश्चर्यचकित और प्रभावित होते हुए। “कन्हैया, तुम्हारा यह पुत्र और बहू... लगता है तुमने इन्हें युद्ध के मैदान से हटाकर बुद्धि के मैदान में उतार दिया है।”
श्री कृष्ण, मेज़ पर हाथ रखकर। “तो वृष्णि संघ का निर्णय क्या है? क्या हम बलराम के शौर्य को चुनते हैं, या अनिरुद्ध के विवेक को?”
पूरी परिषद ने एक स्वर में अनिरुद्ध के कूटनीतिक और आर्थिक समाधान का समर्थन किया। श्री कृष्ण ने सात्यकि को तुरंत नए समझौतों पर हस्ताक्षर करने के लिए दूत तैयार करने का निर्देश दिया।
श्री कृष्ण, अनिरुद्ध की ओर देखते हुए।
“अब तुम राजभवन से बाहर जाओ, वत्स। तुम्हारा यह निर्णय उन सभी सैन्य जीतों से बड़ा है जो तुमने युद्ध में हासिल की। तुमने द्वारका के धर्म को सिद्ध किया है।”
अनिरुद्ध और उषा ने एक-दूसरे को देखा। उन्हें पहली बार यह एहसास हुआ कि उनकी सच्ची साझेदारी अब शुरू हुई है न केवल प्रेम में, बल्कि राजधर्म के निर्वहन में भी।
प्रेम-संवाद
द्वारका के राजभवन का शयनकक्ष। रात का गहरा समय है। कक्ष में दीपक की मंद, शांत रोशनी फैली है। अनिरुद्ध लेटे हुए हैं और उषा उनके सीने पर सिर रखकर लेटी है। दिन भर की व्यस्तता के बाद, यह पल केवल उनका है। उनकी श्वासें एक ताल में चल रही हैं।
ऊषा, आँखें बंद करके, मंद स्वर में। “मुझे विश्वास नहीं होता, प्राणनाथ, कि मैं अंततः इस शांति को जी रही हूँ। शोणितपुर में, मैंने रात का अर्थ समझा था अगली सुबह की लड़ाई की तैयारी। यहाँ, रात का अर्थ है... सुरक्षा।”
अनिरुद्ध, उषा के बालों को सहलाते हुए। “और मुझे विश्वास नहीं होता, मेरी प्रिय, कि कभी मैंने इस सुरक्षा को दुर्बलता समझा था। युद्धभूमि में मेरा शरीर इतना थकता नहीं था, जितना यह राजधर्म की पत्रावली देखकर थकता है।” हंसते हैं।
“तुम सत्य कह रही हो। यह शयनकक्ष मेरी तलवार से अधिक शक्तिशाली है। यहाँ हमें कुछ भी सिद्ध नहीं करना।”
ऊषा, सिर उठाकर, अनिरुद्ध की आँखों में देखते हुए। “हमें बहुत कुछ सिद्ध करना पड़ा, अनिरुद्ध। हमने उस समय क्या किया, जब हम इतने नासमझ थे कि अपने प्रेम को केवल बल से पाना चाहते थे? क्या आपको कभी डर लगता है कि हमारी वह उग्रता इस शांति को भंग कर देगी?”
अनिरुद्ध, गहनता से। “मुझे डर नहीं लगता, ऊषा। क्योंकि हमारी वह उग्रता ही हमें यहां तक लाई। यदि हम डरकर अलग हो जाते, तो शायद कभी मिल ही नहीं पाते। हमारे प्रेम ने हमें सिखाया कि सत्य के लिए कितना लड़ना पड़ता है। लेकिन अब, तात कृष्ण ने मुझे सिखाया है कि असली शक्ति समझौतों और शब्दों में होती है। तुम मेरा वेग हो, उषा, और मैं तुम्हारा विवेक बनने का प्रयास कर रहा हूँ।”
ऊषा उसके और करीब आती है, उनकी अंतरंगता और गहरी होती है।
ऊषा, मंद स्वर में, अनिरुद्ध की छाती पर अपना हाथ फेरते हुए। “मुझे डर नहीं लगता कि हमारी उग्रता शांति भंग करेगी... मुझे डर है कि यह असीम शांति हमें कमजोर न बना दे। मेरे शरीर की हर नस ने संघर्ष को पहचाना है। अब जब कोई लड़ाई नहीं है, तो मुझे लगता है, जैसे मैं इस विशाल शांति के लायक नहीं हूँ।”
अनिरुद्ध, उसके सिर को अपने हाथों में लेकर, माथे से माथा मिलाते हुए। “तुम्हारी सबसे बड़ी जीत यही है, उषा, कि तुमने अपनी ज्वाला को मेरी शांति में विलीन होने दिया। हम दोनों के शरीर पर, हमारे युद्ध के पुराने निशान हैं।” प्रेम से।
“हर बार जब हमारी आत्माएं इस शयनकक्ष में एक-दूसरे को छूती हैं, ये निशान निशस्त्र हो जाते हैं। तुम अब केवल मेरी रानी नहीं हो। तुम मेरी आत्मा की शांति-संधि हो।”
ऊषा, मुस्कुराते हुए। “तो अब आप मुझे रोकेंगे नहीं, बल्कि मुझे दिशा देंगे?”
अनिरुद्ध, “मैं तुम्हें कभी नहीं रोक सकता। कौन है जो उस तूफान को रोक पाया है, जिसने युद्ध के बाद भी मेरा हृदय जीत लिया? मैं तो बस यह चाहता हूँ कि मेरी मार्गदर्शिका बनो। जब मैं परिषद में थका हुआ महसूस करूँ, तो तुम्हारी आँखें मुझे यह याद दिलाएँ कि मैंने यह शांति किसके लिए जीती है।”
ऊषा प्रेम से अनिरुद्ध के गाल को छूती है, फिर उसे गहरी अंतरंगता से चूमती है।
ऊषा, “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ। चाहे तुम युद्ध में सेना का नेतृत्व करो, या सभा में सत्य का नेतृत्व। अब मुझे और कोई चिंता नहीं है। इस पल में, तुम मेरे हो, और मैं तुम्हारी। और यह सत्य दुनिया की किसी भी रणभेरी से अधिक मधुर है।”
अनिरुद्ध, आँखें बंद करके, गहन शांति महसूस करते हुए। “हाँ। यह प्रेम का राग है।”
अगली सुबह। द्वारका के नंदनवन सदृश विशाल बाग़ीचे में धूप खिल रही है। उषा और अनिरुद्ध एक छोटे फव्वारे के पास टहल रहे हैं। उषा के बाल हवा में लहरा रहे हैं।
अनिरुद्ध, छेड़ते हुए। “कल रात तो तुम राजनीतिक सिद्धांतों पर गंभीर विमर्श कर रही थी, और आज सुबह, तुम्हारा ध्यान इस नीले कमल पर अटका है। क्या यही द्वारका का जादू है, जो एक योद्धा को इतना कोमल बना देता है?”
ऊषा, कमल की एक पंखुड़ी को छूकर। “यह कोमलता नहीं है, प्रिय। यह सत्य है। इस कमल को देखो यह कितना सुंदर है, पर इसकी जड़ें तो कीचड़ में हैं। यह मुझे याद दिलाता है कि भले ही हम कहाँ से आए हों, हम अपनी सुंदरता और अपना प्रकाश चुन सकते हैं। और यह बाग़ीचा यह युद्ध की यादों से कितना दूर है।”
अनिरुद्ध, हाथ बढ़ाकर उषा का हाथ पकड़ते हुए। “हम अब युद्ध से दूर हैं। तुम्हें पता है, मैं आज सारा दिन उद्धव के साथ व्यापारिक मार्गों पर बैठूँगा। मेरा मस्तिष्क संख्याओं और शुल्कों में उलझा रहेगा।”
ऊषा, चंचल होकर। “यदि ऐसा है, तो मैं तुम्हें एक दण्ड दूँगी। जब तुम वापस आओगे, तो मैं तुम्हें युद्ध की नहीं, बल्कि प्रेम की रणनीति सिखाऊँगी। तुम्हें सिद्ध करना होगा कि कौन सा प्रेम-गीत इस बाग़ीचे की चिड़ियों के कलरव से अधिक मधुर है!”
अनिरुद्ध, हंसते हुए, उसे अपने पास खींचते हुए। “यह दण्ड मुझे स्वीकार है! पर शर्त यह है कि तुम मुझे पहले यह बताओ कि यह प्रेम-गीत शुरू कहाँ से होगा? क्या इसे नृत्य-गृह से शुरू करना है, या फिर सीधे समुद्र तट से, जहां लहरें अपना प्रेम व्यक्त करती हैं?”
ऊषा एक नया संकल्प व्यक्त करती है, जो उनके प्रेम का नया मार्ग है।
ऊषा, नया विचार देते हुए। “नहीं। कल रात हमने शांति पर विजय पाई। आज मैं तुमसे एक शपथ चाहती हूँ जो हमारे प्रेम को द्वारका की कला विवेक और शोणितपुर के साहस वेग से जोड़ती है।
अनिरुद्ध, “कैसी शपथ?” गहन रुचि से देखता है।
ऊषा, “तुम्हें कलम से मेरे लिए प्रेम का एक महाकाव्य लिखना होगा, जो तुम्हारी तलवार के शौर्य का वर्णन न करे, बल्कि उस प्रेम की कठिन यात्रा का वर्णन करें। और मैं, मैं तुम्हारे उस महाकाव्य के लिए एक नया 'युद्ध-नृत्य' रचूँगी। जिसमें हर पग, हर मुद्रा, उस महाकाव्य के शब्दों को जी उठेगी। यही हमारा नया प्रेम-मार्ग है, अनिरुद्ध। शब्दों और गति का संगम।”
अनिरुद्ध, गहराई से प्रभावित होकर, उसका हाथ चूमते हुए। “वाह! शब्दों को जीवन देना, और जीवन को शब्दों में ढालना। यह प्रेम की सबसे बड़ी कला है, उषा! यह दण्ड नहीं, यह मेरे लिए जीवन का उद्देश्य है।”
ऊषा, आँखें मटकाते हुए। “नहीं। इसे वहीं से शुरू करना है, जहाँ सूर्य की पहली किरण मेरे कक्ष को छूती है। क्योंकि मेरी सुबह अब तुम्हारे बिना शुरू नहीं होती। मेरे लिए सबसे बड़ा सुख अब यह है कि मैं तुम्हारे कंधे पर सिर रखकर यह जानती हूँ कि युद्ध समाप्त हो चुका है, और हमारा भविष्य यहाँ, इस शांत बाग़ीचे में, हमारे हाथों में है।”
अनिरुद्ध, प्रेम से उषा के माथे पर चूमते हुए। “मेरा भी यही सुख है। अब कोई युद्ध नहीं। बस तुम, और द्वारका की यह अद्भुत शांति। आओ, आज समुद्र तट पर चलते हैं। मुझे संख्याओं से पहले यह देखना है कि लहरें किस तरह प्रेम में तट से टकराती हैं।”
कूटनीति का फल
कुछ सप्ताह बीत चुके हैं। पहले की बेचैनी अब शांत आत्मविश्वास में बदल गई है। श्री कृष्ण, बलराम, उद्धव, सात्यकि, अनिरुद्ध और उषा द्वारका की वृष्णि परिषद का सभाकक्ष में आसन ग्रहण किए हुए हैं। सात्यकि के चेहरे पर संतोष का भाव है।
सात्यकि, गर्व से, “महाराज, अनिरुद्ध का 'शून्य-शुल्क गलियारा' का प्रस्ताव सफल रहा। जिन तीन राज्यों ने हमारे व्यापार मार्ग को अवरुद्ध किया था, उनके पीछे के सभी ग्यारह तटीय राज्यों ने द्वारका की 'साझेदारी संधि' को स्वीकार कर लिया है।
बलराम, हंसते हुए। “यानी, वे तीनों मूर्ख राज्य अब अपने ही जाल में फँस गए?”
उद्धव, “बिलकुल, बलदाऊ। वे तीनों अब व्यापारिक रूप से अलग-थलग पड़ गए हैं। उनके पीछे के राज्यों को द्वारका से सस्ता अनाज और हथियार निर्माण के उपकरण मिल रहे हैं। अब उन तीन राज्यों के व्यापारी और नागरिक स्वयं अपने राजाओं पर दबाव बना रहे हैं कि वे द्वारका के साथ बिना शर्त संधि करें।”
अनिरुद्ध, विनम्रता से। “तात कृष्ण का सिद्धांत सिद्ध हुआ। जब आप किसी शत्रु के पेट पर प्रहार करते हैं, तो उसका अहंकार स्वयं ही टूट जाता है।”
श्री कृष्ण, संतोष भरी मुस्कान के साथ। “यह जीत तलवार की नहीं, समझदारी की है। किंतु सात्यकि, उन तीन राज्यों के राजाओं का संदेश क्या है? क्या वे अपने अहंकार को छोड़ेंगे?”
सात्यकि, “उनमें से दो, कल ही अपने दूतों के साथ द्वारका पहुंच रहे हैं। वे बिना किसी शुल्क के शाश्वत व्यापारिक मार्ग की शपथ लेने को तैयार हैं। लेकिन, एक राज्य, 'कोसला का दक्षिणी तट', अभी भी अडिग है। उनका राजा, वीरभद्र, यह संदेश भेज रहा है कि वह शुल्क कम नहीं करेगा, और यदि द्वारका सैन्य बल का प्रयोग करती है, तो वह अपने बंदरगाहों को जलाकर समुद्र में मिल जाएगा।”
परिषद में हल्की बेचैनी फैलती है। वीरभद्र का नाम एक पुरानी, छोटी समस्या को दर्शाता है।
बलराम, क्रोध में। “वह हमें चुनौती दे रहा है? इस छोटे से राज्य का इतना साहस! अब समय आ गया है कि हम उस पर बल प्रयोग करें और इन आर्थिक जटिलताओं को समाप्त करें।”
ऊषा, शांत लेकिन दृढ़ता से परिषद में हस्तक्षेप करते हुए। “क्षमा करें, तात बलराम। सैन्य बल ही वीरभद्र का एकमात्र अंतिम शस्त्र है। यदि वह बंदरगाह जला देता है, तो हम अपनी जीत का फल भी खो देंगे, और व्यापारिक गलियारा स्थायी रूप से बाधित हो जाएगा।”
अनिरुद्ध, “उषा सही कह रही है। वीरभद्र जानता है कि हम बल प्रयोग नहीं करेंगे, और वह इसी का लाभ उठा रहा है। हमें उसे एक ऐसा प्रस्ताव देना होगा, जो उसके सम्मान को भी बचाए और हमारे व्यापार को भी सुरक्षित करें।”
श्री कृष्ण, अनिरुद्ध और उषा की ओर देखते हुए। “बोलो, वत्स और वधू। तुम दोनों का संयुक्त विवेक क्या कहता है?”
अनिरुद्ध, “वीरभद्र एक योद्धा है, वह एक व्यापारी नहीं। वह धन से नहीं, सम्मान से संतुष्ट होगा। मेरा प्रस्ताव है कि हम उसे शुल्क समाप्त करने के बदले, एक नया 'कोसला-द्वारका सुरक्षा समझौता' प्रस्तावित करें।”
उद्धव’ “सुरक्षा समझौता? इसका क्या अर्थ है?”
अनिरुद्ध, “इसका अर्थ है कि हम उसे सैन्य सहायता देंगे। उसे अपने बंदरगाहों की सुरक्षा के लिए हमारे वृष्णि नौसेना प्रशिक्षण और कुछ युद्धपोत नाममात्र के शुल्क पर दिए जाएंगे। इसके बदले में, वह हमारे व्यापारिक बेड़ों को 'द्वारका संरक्षित बेड़े' का दर्जा देगा, जिस पर कोई शुल्क नहीं लगेगा।
ऊषा, बात को आगे बढ़ाते हुए। “इससे वीरभद्र का अहंकार शांत हो जाएगा। वह दुनिया को दिखाएगा कि उसने द्वारका के सामने हार नहीं मानी, बल्कि द्वारका को एक शक्तिशाली मित्र के रूप में जीता है। वह अब खुद को द्वारका का एक समान भागीदार मानेगा, न कि एक अधीन राज्य।”
बलराम, दंग होकर। “यह तो अद्भुत विचार है! हम उसे उसकी दुर्बलता छिपाने के लिए हथियार दे रहे हैं, ताकि वह हमारे व्यापारिक मार्ग को सुरक्षित करें!”
श्री कृष्ण, तालियाँ बजाते हुए। “अब मुझे विश्वास हो गया है कि द्वारका का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। अनिरुद्ध ने सिद्ध कर दिया कि विवेक बल से बड़ा है, और ऊषा ने सिद्ध कर दिया कि सम्मान धन से बड़ा है। जाओ, अनिरुद्ध और उषा। तुम दोनों वीरभद्र से मिलने जाओगे। यह तुम्हारा पहला राजदूती मिशन होगा।”
अनिरुद्ध और उषा एक-दूसरे को देखते हैं। उनकी आँखों में प्रेम और उत्साह का एक नया मिश्रण है अब वे केवल प्रेमी नहीं, बल्कि राजधर्म के साझेदार हैं।
ऊषा की कृतज्ञता
द्वारका के राजभवन का एक शांत, निजी कोना। यह एक छोटा-सा, पत्थरों से बना शिवालय है, जिसे ऊषा ने स्वयं 'कुंडेश्वर' नाम दिया है। ब्रह्म मुहूर्त का समय है, सूर्योदय से ठीक पहले की मधुर वेला। ऊषा ने अभी-अभी शिवलिंग पर गंगाजल और बिल्वपत्र अर्पित किए हैं। उसके माथे पर चंदन और भस्म लगी है। अनिरुद्ध द्वार पर खड़ा होकर उसकी गहन साधना को देख रहा है।
अनिरुद्ध, द्वार पर खड़े होकर, मंद स्वर में। “ऊषा... तुम इतनी भोर में, इतनी ठंड में, रोज़ यह कठोर नियम क्यों निभाती हो? मैं तुम्हारी तीव्रता को जानता हूँ, पर यह तपस्या... यह किस लिए है?”
ऊषा, आँखें खोले बिना, हाथ जोड़कर। “अंदर आइए, प्राणनाथ। यह नियम नहीं है, यह मेरा ऋण है। यह कुंडेश्वर मेरी उस यात्रा के साक्षी हैं, जिसमें एक जिद्दी योद्धा राजकुमारी को यह एहसास हुआ कि उसका भाग्य उसके बल से नहीं, बल्कि देवों के आशीर्वाद से लिखा गया था।”
अनिरुद्ध धीरे से उसके पास आता है, पास की शिला पर बैठ जाता है।
अनिरुद्ध, “तुम किस ऋण की बात कर रही हो, मेरी प्रिय? तुम्हारा प्रेम, तुम्हारी शक्ति... वह सब तो तुम्हारा अपना था।”
ऊषा, शांत मुस्कान के साथ, शिवलिंग की ओर देखकर। “मेरा बल मेरा था, अनिरुद्ध। पर मेरा प्रेम... वह तो महादेव का है। मुझे लगता है कि मैं उनसे मिली, इससे पहले कि मैं तुमसे मिली। मेरी उग्रता, मेरा अधिकार-भाव यह सब उनका ही अंश है। जब मैं तुम्हें पाना चाहती थी, तो मेरे हृदय में कोई राग नहीं था, विद्रोह था। और कौन है जो विद्रोह का देवता है, सिवाय उनके?”
अनिरुद्ध, गहनता से। “तुम उन्हें विद्रोह के लिए धन्यवाद देती हो?”
ऊषा, “मैं उन्हें निडरता के लिए धन्यवाद देती हूँ। शोणितपुर में, जब सब ने कहा कि यह प्रेम असंभव है, तब मुझे उन्हीं की तांडव शक्ति याद आई। उन्होंने मुझे सिखाया कि जब सत्य तुम्हारे साथ हो, तो तुम देवों से भी लड़ सकते हो। उन्होंने मुझे वह बल दिया कि मैं तुम्हारे तात से भी टकरा जाऊं। मेरे हर घाव, मेरी हर जीत, मेरे हर आँसू के सूत्रधार वही थे।”
अनिरुद्ध, हाथ बढ़ाकर उसका हाथ थामता है। “तो यह प्रतिदिन की पूजा, यह कठोर नियम... यह उसी अतीत के संघर्ष की याद दिलाता है?”
उषा, अनिरुद्ध की ओर मुड़कर, आँखों में अथाह प्रेम। “नहीं, प्राणनाथ। अब यह अतीत का संघर्ष नहीं, वर्तमान की कृतज्ञता है। मैं रोज सुबह उनसे यही प्रार्थना करती हूँ-
"हे महाकाल, आपने मुझे वह शक्ति दी कि मैं अनिरुद्ध को पा सकूँ। अब मुझे वह शांत विवेक दीजिए कि मैं उन्हें संभाल सकूँ। मेरा प्रेम पहले प्रलय था। अब मेरा प्रेम द्वारका की शाश्वत शांति बनना चाहता है। यह कमल, जल में एक कमल अर्पित करते हुए। केवल इसलिए खिला है, क्योंकि आपने हमें जीवन दिया। यह मेरे जीवन में तुम्हारे आगमन का धन्यवाद है।"
अनिरुद्ध, उसकी बात से भीतर तक हिल जाता है, उसका हाथ थाम कर। “ऊषा, तुम्हारा प्रेम... यह इतना विशाल है कि इसमें स्वर्ग और मृत्यु दोनों समाहित हैं। तुम मेरे लिए केवल प्रेम नहीं हो। तुम मेरी आध्यात्मिक मार्गदर्शिका हो।”
ऊषा, मुस्कुराते हुए। “आप तो केवल राजधर्म की पत्रावलियां देखते हैं, और मैं यहाँ देवताओं के हस्ताक्षर देखती हूँ। मेरा प्रेम, अनिरुद्ध, तुम्हारी तलवार की तरह होना चाहता है: तीखा, पर केवल न्याय के लिए उठने वाला। और तुम्हारी राजव्यवस्था की तरह होना चाहता है: दृढ़, पर भीतर से कोमल।”
ऊषा उठकर अनिरुद्ध के गले लग जाती है। सूर्य की पहली किरणें शिवालय पर पड़ती है, जिससे भस्म में लगा उनका माथा चमक उठता है।
अनिरुद्ध, “मेरा वचन है, प्रिय। मैं हमेशा उस देवत्व का सम्मान करूँगा जिसने तुम्हें मेरे जीवन में भेजा। अब आओ, तुम्हारी तपस्या पूरी हुई। आज सारा दिन, मैं तुम्हें अपनी शांति अर्पित करूँगा।”
ऊषा, प्रेम से। “आज मैं भी आपको अपनी उग्रता अर्पित करूँगी पर इस बार, वह केवल हमारे प्रेम को और गहरा करेगी।”
यह दृश्य उषा के चरित्र की आंतरिक गहराई को उजागर करता है और यह स्थापित करता है कि उसका प्रेम केवल मोह नहीं, बल्कि दिव्य शक्ति के प्रति कृतज्ञता पर आधारित है।
कुंडेश्वर की प्रतिज्ञा
मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ स्थित कुंडेश्वर शिव मंदिर का परिसर। ब्रह्म मुहूर्त का समय है, जमड़ार नदी के तट पर हल्की धुंध छाई है। ऊषा ने अभी-अभी शिवलिंग पर जल चढ़ाया है और ध्यान में बैठी है। अनिरुद्ध, जो पिछले कई दिनों से उसकी यह लगन देख रहा है, अब उसके पास आकर बैठता है।
अनिरुद्ध, शांत स्वर में। “ऊषा, मैं तुम्हें रोज़ इतनी लगन से देखती हूँ। द्वारका में, तुम उस छोटे-से शिवालय को 'कुंडेश्वर' कहकर पूजती थी, पर यहां, इस दूर की भूमि पर, तुमने इसे अपना स्थायी कृतज्ञता-स्थल बना लिया है। यह कुंडेश्वर तुम्हें इतना प्रिय क्यों है?”
ऊषा, आँखें खोलकर प्रेम से अनिरुद्ध की ओर देखती है। “यह केवल कृतज्ञता-स्थल नहीं है, प्राणनाथ। यह मेरे वेग और विवेक का संगम है। मेरा कुंडेश्वर तो मेरा निजी था, पर यह कुंडेश्वर... यह लोक-आस्था का प्रतीक है।
अनिरुद्ध, “मुझे यहाँ के स्थानीय लोग बताते हैं कि इस मंदिर का इतिहास बहुत अनोखा है। वे इसे 'तेरहवां ज्योतिर्लिंग' भी कहते हैं, जो थोड़ा विरोधाभासी है, क्योंकि पुराणों में तो केवल बारह का ही उल्लेख है।
ऊषा, मुस्कुराके “विरोधाभास नहीं, आस्था का बल! बुंदेलखंड के लोग इस सत्य को जीते हैं। उनकी कहानियों के अनुसार, कई सौ वर्ष पूर्व, यह शिवलिंग इसी 'कुंड' जलाशय में स्वयंभू प्रकट हुआ था। जिसका अंत मूल वह कुंड में पा न सका। यह शिवलिंग जमड़ार नदी के प्रवाह को नियंत्रित करता है, क्या यह किसी ज्योतिर्लिंग से कम शक्ति रखता है?”
अनिरुद्ध, गहनता से। “स्वयंभू ... इसका अर्थ है कि यहां शिव की इच्छा से ही मंदिर स्थापित हुआ।
ऊषा, यही मेरा प्रेम है, अनिरुद्ध! मेरा प्रेम बल से नहीं, इच्छा से उत्पन्न हुआ। जब मैं युद्ध के बाद यहां आई और पहली बार इस शिवलिंग के दर्शन किए, मुझे लगा जैसे महादेव मुझसे कह रहे हों: "तुम्हारा प्रेम कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि एक दैवीय इच्छा थी।" यह विश्वास ही इसे तेरहवां ज्योतिर्लिंग बनाता है। यह बुंदेलखंड की सीधी-सादी भक्ति है, जो किसी शास्त्र की मोहताज नहीं है।”
अनिरुद्ध, भावुक होकर, “तुमने इसे कृतज्ञता का ऋण कहा था। वह किसलिए?”
उषा अनिरुद्ध का हाथ थाम कर, “आपने मुझे उस दिन सही कहा था कि मैंने महादेव से विद्रोह का बल माँगा था। पर जब मैंने तुम्हें पाया, और जब युद्ध समाप्त हुआ, मुझे एहसास हुआ कि महादेव ने मुझे अस्तित्व की सबसे बड़ी शांति दी है। यह मेरे युद्ध की समाप्ति का प्रतीक है।”
“मेरी प्रतिदिन की पूजा यही है, प्राणनाथ, यह धन्यवाद है कि मेरे जीवन का सबसे खतरनाक युद्ध तुम्हें पाने का संघर्ष मेरी सबसे मधुर संधि तुम्हारे साथ मेरा जीवन में बदल गया।
इस शिवलिंग पर जल चढ़ाकर, मैं हर सुबह यह प्रतिज्ञा करती हूँ कि मेरे हृदय में तुम्हारे लिए जो प्रेम है, वह इस कुंडेश्वर की तरह शांत, पर अनंत होगा।”
अनिरुद्ध, “यह क्षेत्र बुंदेलखंड शिव भक्ति में कितना सराबोर है। यहाँ के लोग, उनका भोलापन... मैं इसे महसूस करता हूँ।”
ऊषा, “हाँ! यहाँ की भक्ति में एक अलग ही उल्लास है। यहाँ श्रावण मास में पूरे चालीस दिन का मेला लगता है। शिवरात्रि के दिन यहां की महाआरती देखने लायक होती है। स्थानीय लोकगीतों और फाग होली के गीत में केवल राम-सीता या कृष्ण-राधा ही नहीं होते, बल्कि शिव-पार्वती के विवाह और उनकी सरल गृहस्थी का वर्णन होता है।”
अनिरुद्ध, “मैंने सुना है कि यहाँ के स्थानीय बुंदेली लोकगीतों में शिवजी को 'भोले भंडारिया' कहा जाता है।
ऊषा, “बिल्कुल! हंसते हुए, यहाँ की महिलाएं अपने पुत्रों और पतियों की लंबी उम्र के लिए जो गीत गाती हैं, उनमें वे महादेव से प्रार्थना करती हैं कि वह उनके परिवार को सुख-समृद्धि दें, जैसे उन्होंने स्वयं मां पार्वती को दिया। यह प्रेम और विश्वास, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोक कथाओं और गीतों में पलता रहा है, मुझे ऊर्जा देता है। यह मेरी अनिरुद्ध के प्रति निष्ठा को बुंदेलखंड की मिट्टी से जोड़ता है।”
ऊषा उठती है और अनिरुद्ध की ओर बढ़ती है। सूर्य की किरणें अब मंदिर को छू रही हैं।
ऊषा, “तो अब आप समझते हैं, मेरे प्राणनाथ? मेरा यहाँ आना केवल भक्ति नहीं, बल्कि इस भूमि के प्रेम का सम्मान है। यह कुंडेश्वर मेरे उस प्रेम की आत्मा है, जिसने मुझे तुम्हें पाने के लिए लड़ने का साहस दिया, और अब तुम्हारे साथ शांति से जीने का विवेक दे रहा है।”
अनिरुद्ध, उषा के माथे को चूमते हुए, “मेरा हृदय भर आया है, उसे। आज से, मैं भी रोज तुम्हारे साथ आऊँगा। क्योंकि जहाँ तुम्हारी आस्था है, वहीं मेरा सर्वोच्च धर्म है।”
यह दृश्य उषा की व्यक्तिगत भक्ति को कुंडेश्वर मंदिर की वास्तविक और गहरी लोक-आस्था से जोड़ता है।
राजधर्म
कोसला के दक्षिणी तट पर स्थित वीरभद्र के छोटे, किंतु किलेबंद बंदरगाह का राज दरबार। यह स्थान द्वारका की भव्यता के विपरीत, कठोर और सैन्य-केंद्रित है। राजा वीरभद्र, एक क्रूर और अनुभवी योद्धा, अपने आसन पर बैठा है। उसके ठीक सामने अनिरुद्ध और उषा, द्वारका के दूत बनकर, पूर्ण आत्मविश्वास के साथ खड़े हैं।
वीरभद्र, कठोर आवाज़ में, “स्वागत है, वृष्णि राजकुमार और शोणितपुर की राजकुमारी। द्वारका ने मुझे शांति का प्रस्ताव भेजा है। मैं हैरान हूँ कि महान कृष्ण ने अपने सबसे अनुभवी कूटनीतिज्ञों को भेजने के बजाय, आप दोनों नवविवाहित बच्चों को भेजा है। क्या यह मेरी अनादर है, या द्वारका का अहंकार?”
अनिरुद्ध, शांत और संयमित, “महाराज वीरभद्र। यह अनादर नहीं, द्वारका का विश्वास है। तात कृष्ण जानते हैं कि आप शक्ति का सम्मान करते हैं। और हम दोनों, बल और प्रेम दोनों के सबसे कठिन युद्ध लड़कर यहाँ आए हैं। हमारा आगमन यह दर्शाता है कि द्वारका आपके शौर्य को युद्ध से नहीं, संधि से जीतना चाहती है।”
वीरभद्र, गुस्से से, “शांति? आप मुझे व्यापारिक दृष्टि से अलग-थलग करके शांति की बात करते हैं? आपके शून्य-शुल्क गलियारे ने मेरी प्रजा को विद्रोह के कगार पर ला खड़ा किया है! मुझे शुल्क चाहिए, अन्यथा मैं आपके व्यापारिक मार्गों को तोड़ दूंगा, भले ही मुझे अपने बंदरगाह जलाने पड़ें।”
ऊषा, आगे बढ़कर, दृढ़ता से, “महाराज, एक योद्धा कभी अपने अस्त्र बंदरगाह को नहीं जलाता। आप धन नहीं चाहते, आप सम्मान चाहते हैं। और हमें यह भी ज्ञात है कि आपके बंदरगाहों पर पिछले तीन महीनों में, उत्तरी सागर से आने वाले समुद्री लुटेरों का खतरा बढ़ा है।”
वीरभद्र चौंक जाता है। यह जानकारी केवल उसकी गुप्तचर संस्था को थी।
वीरभद्र, अविश्वसनीयता से, “यह... यह सूचना आपको कहाँ से मिली?”
अनिरुद्ध, “द्वारका केवल व्यापारिक बेड़े नहीं, सूचनाओं का जाल भी संचालित करती है। हमने देखा कि आप बाहरी चुनौतियों से जूझ रहे हैं, और आपके शुल्क केवल आपकी प्रजा पर अतिरिक्त बोझ डाल रहे हैं। हमारी ओर से युद्ध की कोई इच्छा नहीं है। हमारी ओर से एक प्रस्ताव है: शाश्वत व्यापारिक गलियारा और शुल्क की पूर्ण समाप्ति।”
वीरभद्र, गर्जन करते हुए, “और इसके बदले में, मैं कृष्ण का गुलाम बन जाऊँ?”
ऊषा, “आप गुलाम नहीं बनेंगे, महाराज। आप भागीदार बनेंगे। द्वारका आपको सुरक्षा देगी परंपरागत नहीं, बल्कि अत्याधुनिक सुरक्षा। हम आपको वृष्णि नौसेना प्रशिक्षण, हमारे सर्वश्रेष्ठ युद्धपोतों का नक्शा, और आपके तटों की सुरक्षा के लिए पच्चीस पूर्ण-सशस्त्र नौसैनिक देंगे।
वीरभद्र, सावधानी से, “सैन्य सहायता? वह भी बिना शर्त?”
अनिरुद्ध, “शर्त केवल एक है: आप हमारे व्यापारिक जहाजों को 'द्वारका-कोसला संरक्षित बेड़ा' घोषित करेंगे। आप दुनिया को यह दिखाएँगे कि वृष्णि नौसेना और कोसला की सेना अब एक साथ इस मार्ग की रक्षा करती है।”
ऊषा, गहनता से उसकी आँखों में देखती है। “महाराज, यह आपको वह सम्मान देगा जो शुल्क कभी नहीं दे सकता। लोग देखेंगे कि आपने द्वारका की अधीनता स्वीकार नहीं की, बल्कि द्वारका को एक शक्तिशाली संधि के लिए विवश किया है। एक सच्चा योद्धा शांति को भी विजय की तरह प्रस्तुत कर सकता है।”
वीरभद्र कुछ पल के लिए शांत हो जाता है। वह अनिरुद्ध की बुद्धिमत्ता और उषा की निर्भीकता से प्रभावित है।
वीरभद्र, गहरी साँस लेता हुआ। “मैं मानता हूँ कि द्वारका के दूतों ने पहली बार मेरी आत्मा की बात पकड़ी है। आपने मुझे धन का लालच नहीं दिया, बल्कि अस्तित्व और शौर्य का मार्ग दिखाया।”
अनिरुद्ध, “तो, क्या आप संधि को स्वीकार करते हैं?”
वीरभद्र, हंसते हुए, जो एक कठोर मुस्कान है। “मैं स्वीकार करता हूँ। लेकिन यह याद रहे, राजकुमार। मैं केवल इसलिए शांत हुआ हूँ क्योंकि मुझे लगता है कि मैं कृष्ण से एक बेहतर सौदा पाने में सफल रहा। इस व्यापारिक गलियारे की सुरक्षा अब मेरी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा बन गई है।”
ऊषा, “हमें यही चाहिए था, महाराज। प्रतिष्ठा धन से कहीं अधिक स्थायी और विश्वसनीय गारंटी होती है।”
अनिरुद्ध और उषा झुककर सम्मान व्यक्त करते हैं और विदा लेते हैं। दरबार की शांति यह सिद्ध करती है कि कूटनीति की जीत हुई है।
वंश का अंकुरण
द्वारका के राजभवन का आंतरिक कक्ष, जिसे रानी रुक्मिणी स्वयं देखती हैं। यह वह स्थान है जहाँ परिवार के सबसे निजी और महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते हैं। कक्ष में इस समय श्री कृष्ण, बलभद्र बलराम, महारानी रुक्मिणी, सत्यभामा, और अनिरुद्ध मौजूद हैं। ऊषा अभी-अभी एक वैद्य से मिलकर आई है, जिसका चेहरा हल्की मुस्कान से सजा है।
रुक्मिणी, कोमलता से उषा का माथा चूमते हुए। “मेरी बेटी! वैद्य ने क्या कहा? कुछ दिनों से तुम्हारा रंग बदला हुआ है।”
ऊषा, आँखें नीची करके, उत्साह और लज्जा के मिश्रण के साथ। “माते... यह किसी रंग बदलने का नहीं, बल्कि जीवन के रंग बदलने का संकेत है। वैद्य ने पुष्टि की है कि जल्द ही... वंश का अंकुरण होगा।”
पूरे कक्ष में एक पल की स्तब्धता छा जाती है, जिसके बाद उत्सव और आनंद की लहर दौड़ जाती है। रुक्मणी और सत्यभामा तुरंत ऊषा को गले लगा लेती हैं। बलराम ज़ोर से हँस पड़ते हैं।
बलराम, ज़ोर से हंसते हुए, अनिरुद्ध की पीठ थपथपाते हुए। “अरे वाह, मेरे लाडले! तुमने तो राजधर्म और गृहस्थ धर्म दोनों में ही झंडे गाड़ दिए! अब हमारी परिषद में केवल विवेक ही नहीं, किलकारी भी गूंजेगी!”
अनिरुद्ध, अविश्वसनीय खुशी और विस्मय के साथ ऊषा को देखता है। “उषा... मुझे विश्वास नहीं हो रहा। यह मेरे जीवन की सबसे बड़ी विजय है।”
श्री कृष्ण, शांत और आनंदित मुद्रा में, “यही जीवनचक्र है। युद्ध से थककर जब तुम वापस लौटे थे, तब मैंने कहा था कि अब सृजन का समय है। तुमने अपने प्रेम और विवेक से जो नींव रखी, अब यह उसका पहला फल है। यह न केवल वृष्णि कुल के लिए, बल्कि पूरी द्वारका के लिए आशा का प्रतीक है।”
रुक्मिणी, उषा का हाथ थाम कर, गंभीर और स्नेहपूर्ण स्वर में। “मेरी बेटी, अब तुम्हें युद्ध के मैदान से दूर रहना होगा। तुम्हारा शरीर अब केवल तुम्हारा नहीं, यह हमारे कुल की निधि है। अब तुम्हारे लिए संयम और संतुलन ही तुम्हारा राजधर्म है।”
सत्यभामा, ऊषा को उत्साहित करते हुए, “और केवल शारीरिक आराम नहीं! अब से, तुम्हें अपनी दिनचर्या में सुंदरता और आनंद को भी शामिल करना होगा। हमने तुम्हारे लिए विशेष दासी नियुक्त की है, जो तुम्हारी कलात्मक रुचियों में तुम्हारी सहायता करेंगी। स्वस्थ और प्रसन्न चित्त ही महान आत्मा को जन्म देता है।”
ऊषा, कृतज्ञता से, “मैं आपके स्नेह से अभिभूत हूँ, माते। मैं हर निर्देश का पालन करूँगी। अनिरुद्ध की ओर मुड़कर, मेरा सबसे बड़ा धर्म अब इस नए जीवन को सुरक्षित रखना है।”
अनिरुद्ध घुटने टेककर ऊषा के सामने बैठ जाता है, उसके पेट पर कोमलता से हाथ रखता है।
अनिरुद्ध, “मेरी प्रिय ऊषा। आज से, तुम्हारी सुरक्षा मेरा एकमात्र व्रत है। तुम हमेशा से मेरी रानी थी, पर अब तुम मेरे राज्य का केंद्र हो। मैंने तुम्हें कभी युद्ध से पीछे हटने को नहीं कहा, पर आज, मैं तुमसे यह प्रतिज्ञा चाहता हूं कि तुम प्रत्येक चुनौती से पहले अपनी और इस शिशु की सुरक्षा को रखोगी।”
ऊषा, आँखों में आँसू के साथ, “अनिरुद्ध, तुम्हारी चिंता मेरे लिए तुम्हारे प्रेम से भी बड़ी है। अब मैं कोई योद्धा राजकुमारी नहीं, मैं तुम्हारे प्रेम की धारक हूँ। मेरा कुंडेश्वर का रोज का नियम भी अब शक्ति के लिए नहीं, सुरक्षा के लिए होगा।”
श्री कृष्ण, गंभीरता से, “अनिरुद्ध, उषा। यह शिशु तुम्हारे प्रेम का परिणाम मात्र नहीं है। यह द्वारका के उस दर्शन का प्रतीक है, जिसे तुमने कूटनीति से जीता है। यह संतान शांति और समृद्धि के युग का वारिस होगी। इसके पालन-पोषण में बलराम की शक्ति और उद्धव का विवेक दोनों का मिश्रण होना चाहिए।”
बलराम, हंसते हुए, “हाँ! मैं इसे गदा चलाना सिखाऊँगा, और उद्धव इसे गणतंत्र के नियम!”
उद्धव, विनम्रता से, “और मैं इसे यह सिखाऊँगा कि तलवार हमेशा अंतिम उपाय होना चाहिए, राजकुमार।”
पूरा परिवार प्रसन्नता और हास्य से भर उठता है। इस घोषणा ने राजभवन में एक नई, सुखद व्यस्तता ला दी है।
यह उषा और अनिरुद्ध के जीवन में एक महत्वपूर्ण पारिवारिक मोड़ लाता है, साथ ही यह भी दर्शाता है कि उस ऐतिहासिक काल में वंश वृद्धि को न केवल पारिवारिक, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक घटना के रूप में देखा जाता था।
शांत शक्ति
गर्भावस्था के चौथे माह की संध्या। द्वारका के शांत राज उद्यान का झूला। अनिरुद्ध उषा के पास बैठा है और वह उसे धीरे-धीरे झूले पर झुला रहा है। उषा का चेहरा शांत है, पर आँखों में थोड़ी बेचैनी है।
अनिरुद्ध, कोमलता से, “तुम्हें पता है, उषा? आचार्य ने कहा था कि एक योद्धा को अपने शस्त्र से अधिक अपने शांत मन की देखभाल करनी चाहिए। पिछले चार महीनों से, तुम वह राजयोग जी रही हो, जो किसी भी तपस्या से कठिन है।”
आशा, निराशा की हल्की सी झलक के साथ। “यह तपस्या नहीं, बंधन है, प्राणनाथ। मैं न अश्व पर बैठ सकती हूँ, न मैं खड्ग उठा सकती हूँ। मेरा शरीर जो कल तक प्रकृति की तरह प्रचंड था, अब एक शांत तालाब बन गया है। मेरा मन द्वारका के व्यापारिक समीकरणों में उलझा रहता है, और मैं यहाँ फूलों को देखकर समय बिता रही हूँ। क्या मैं कमजोर हो रही हूँ?”
अनिरुद्ध, झूले को रोककर, उसके हाथ अपने हाथों में लेता है। “तुम कमजोर नहीं, गहरी हो रही हो। पहले तुम्हारी शक्ति बाहर की ओर थी, अब वह भीतर की ओर केंद्रित हो गई है। तुम इस शिशु के लिए दुनिया बना रही हो। और मेरा प्रेम... वह झुक कर उसके उदर को छूता है। यह तुम्हारी हर बेचैनी को मेरा सुख बना रहा है।।”
ऊषा, भावुक होकर, “अनिरुद्ध, मुझे डर लगता है। मैंने हमेशा सक्रियता में अपना मूल्य देखा है। क्या यह नया जीवन मुझे राजधर्म से अलग कर देगा?”
अनिरुद्ध, मुस्कुराते हुए, “राजधर्म ने तुमसे केवल रूप बदला है। अब तुम्हें युद्ध का अभ्यास नहीं, विवेक का अभ्यास करना है। और मैं तुम्हें इसका एक अवसर दूँगा।”
गर्भावस्था का सातवाँ माह। वृष्णि परिषद का निजी कक्ष। कृष्ण, बलराम और उद्धव किसी गंभीर विषय पर चर्चा कर रहे हैं। ऊषा एक आसन पर बैठी है, अनिरुद्ध उसके पास खड़ा है।
उद्धव, “महाराज, समस्या जटिल है। कोसला का राजा वीरभद्र, जिसका हमने व्यापार समझौता किया था, अब अपने आंतरिक विद्रोह से त्रस्त है। कुछ छोटे पर्वतीय राज्यों ने उसके भंडारगृह लूट लिए हैं और वह हमसे वृष्णि सैन्य टुकड़ी की मांग कर रहा है।”
बलराम, क्रोध में, “मैंने पहले ही कहा था कि उन पर भरोसा मत करो! अब हमें उसे सैनिक भेजने होंगे, अन्यथा हमारा व्यापारिक गलियारा फिर खतरे में पड़ जाएगा।”
श्री कृष्ण, “सैन्य बल भेजना अंतिम उपाय है, बलभद्र। इससे हमारी तटस्थता भंग होगी। हमें वीरभद्र की सहायता करनी होगी, पर बिना हथियार उठाए।”
अनिरुद्ध, उषा की ओर देखते हुए। “तात, मैंने ऊषा से इस विषय पर चर्चा की है। वह एकमात्र व्यक्ति है जो वीरभद्र के योद्धा-अहंकार को समझती है।”
श्री कृष्ण, उषा की ओर मुड़ते हुए। “ऊषा, तुम्हारी क्या सलाह है? तुम्हारा शांत विवेक क्या कहता है?”
ऊषा, पेट पर हाथ रखकर, आँखें बंद करके विचार करती है, फिर दृढ़ता से। “महाराज, वीरभद्र को सैनिकों की आवश्यकता नहीं, उसे प्रतिष्ठा की आवश्यकता है। यदि हम सैनिक भेजेंगे, तो वह पूरी दुनिया के सामने कमजोर साबित होगा। इससे उसकी प्रजा का विद्रोह और बढ़ेगा।”
उद्धव, “तो हमें क्या करना चाहिए? उसे विद्रोहियों के हाथों मरने दें?”
ऊषा, एक समाधान प्रस्तुत करती है। “नहीं। हम उसे गुप्त सहायता देंगे। वीरभद्र के सैनिक युद्ध की कला जानते हैं, पर वे भूख से तड़प रहे हैं। पर्वतीय राज्य उसी का लाभ उठा रहे हैं। मेरा प्रस्ताव है कि हम तुरंत अनाज और आवश्यक औषधियों के बड़े खेप बिना किसी उद्घोषणा के वीरभद्र के सैनिकों के शिविरों में पहुंचा दें।”
बलराम, “लेकिन इससे हमारी प्रतिष्ठा को क्या लाभ?”
ऊषा, “लाभ प्रतिष्ठा का नहीं, कर्तव्य का है। वीरभद्र का अस्तित्व हमारे व्यापारिक गलियारे के लिए आवश्यक है। जब उसके सैनिक पेट भरा महसूस करेंगे, तो वे विद्रोहियों को आसानी से कुचल देंगे। और वीरभद्र को यह भी एहसास होगा कि द्वारका बिना शर्त उसकी सहायता करती है, जिससे उसका विश्वास और मजबूत होगा।”
श्री कृष्ण, हंसते हुए, प्रसन्नता से। “अद्भुत! ऊषा, तुमने राजधर्म की सबसे जटिल गुत्थी को सुलझा दिया। तुमने सिद्ध कर दिया कि कोमलता में भी तीक्ष्णता हो सकती है। यह तुम्हारे गर्भस्थ शिशु के लिए सबसे बड़ा आशीर्वाद है।”
गर्भावस्था के नौवें माह की रात्रि। शयन कक्ष। उषा और अनिरुद्ध लेटे हुए हैं। उसे मुस्कुरा रही है।
उषा, अनिरुद्ध के सीने पर सिर रखकर। “प्राणनाथ, आज परिषद में आपकी प्रशंसा सुनकर मुझे लगा जैसे मैंने कोई नया युद्ध जीत लिया हो। मुझे अब अपनी स्थिरता से प्रेम है।”
अनिरुद्ध, उसके बालों में हाथ फेरते हुए। “तुम्हारा विवेक, ऊषा, मेरी तलवार से कहीं अधिक प्रभावी है। तुमने मुझे सिखाया कि सच्चा प्रेम और सच्चा राजधर्म दोनों ही संयम से जन्म लेते हैं।” वह झुककर शिशु से बात करने के अंदाज में, मेरे प्यारे शिशु, तुम्हारी माँ ने शांत शक्ति से हमारा साम्राज्य बचा लिया।
ऊषा, आँसू पोंछते हुए, “और मेरा एकमात्र डर अब यह है कि... क्या यह शिशु योद्धा बनेगा या राजनेता?”
अनिरुद्ध, “जो भी बने, वह हमारा होगा। तुम्हारी शक्ति और मेरा विवेक उसमें समाहित होगा। अब तुम शांत रहो। जन्म का क्षण निकट है।”
वे एक-दूसरे की आँखों में देखते हैं, उनके प्रेम में अब संघर्ष की आग नहीं, बल्कि भविष्य की शांत प्रतीक्षा है।
द्वारका का उत्सव
द्वारका के राजभवन का प्रसूति कक्ष। रात का अंतिम प्रहर। कक्ष में केवल रानी रुक्मिणी, सत्यभामा, एक अनुभवी वैद्य, और ऊषा की सबसे विश्वसनीय सेविका मौजूद हैं। बाहर के कक्ष में अनिरुद्ध बेचैनी से टहल रहा है, उसके साथ कृष्ण और बलराम हैं।
अनिरुद्ध, बेचैनी से, “तात! यह प्रतीक्षा मेरे सबसे भयंकर युद्ध से भी कठिन है। मुझे बाहर क्यों रखा गया है? उषा... क्या वह ठीक है?”
बलराम, शांत करने के प्रयास में, “धैर्य रखो, मेरे वीर। प्रसूति एक प्राकृतिक युद्ध है, जिसे केवल माँ की शक्ति ही जीत सकती है। तुम अपने बल से यहाँ कुछ नहीं कर सकते।”
श्री कृष्ण, गहरी शांति के साथ, “तुम्हारा प्रेम ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है, अनिरुद्ध।”
अनिरुद्ध की ओर देखकर, “याद रखो, तुमने हमेशा कहा था कि तुम योद्धा के पुत्र हो। अब तुम सृजन के पिता बनने जा रहे हो। यह सबसे बड़ी कला है।”
अंदर से उषा की एक अंतिम, तीव्र पीड़ा की आवाज़ आती है, और फिर... एक शिशु के जन्म की पहली, तीखी किलकारी। यह ध्वनि युद्ध की शंख ध्वनि से भी अधिक तीव्र और जीवनदायी है।
जन्म का क्षण
कुछ ही क्षणों में, रुक्मिणी बाहर आती हैं। उनके चेहरे पर माँ और दादी का दोहरा उल्लास है।
रुक्मिणी, उत्साह और भक्ति से भरे स्वर में। “द्वारका के राजा! वृष्णि कुल के वंशज! महादेव की कृपा से... पुत्र रत्न का आगमन हुआ है! हमारी वीर वधू ऊषा कुशल हैं, और शिशु स्वस्थ है!”
अनिरुद्ध की आँखों में आँसू आ जाते हैं। वह खुशी से कृष्ण को गले लगा लेता है। बलराम की आँखों में भी स्नेह की चमक है।
बलराम, गर्व से, “पुत्र! यह शिशु शांति के युग की पहली विजय-पताका है! अब उत्सव होगा, ऐसा उत्सव जो द्वारका ने कभी नहीं देखा होगा!”
अनिरुद्ध, अंदर जाने की बेचैनी में। “मैं... मैं उषा से मिलना चाहता हूँ!”
रुक्मिणी उसे अंदर जाने की अनुमति देती हैं। अनिरुद्ध अंदर जाता है। उषा थकी हुई है, पर उसके चेहरे पर एक अलौकिक तेज है। उसके पास लिपटा हुआ शिशु रखा है।
अनिरुद्ध, आवाज भर्रा जाती है। “उषा... मेरी प्रिय रानी... तुमने मुझे... तुमने मुझे जीवन का सबसे बड़ा उपहार दिया है। तुम... तुम ठीक हो?”
उषा कमजोर मुस्कान के साथ। “हाँ, प्राणनाथ। मेरे युद्ध का सबसे मीठा फल है यह। (शिशु की ओर इशारा करके) देखिए, इसकी आँखें... इनमें आपकी शांति और मेरा साहस दोनों हैं।”
अनिरुद्ध, शिशु को गोद में लेते हुए। “मेरा पुत्र... इसका नाम क्या होगा, ऊषा?”
ऊषा, गहनता से, यह वज्र है, प्राणनाथ। यह भविष्य है। यह वृष्णि और शोणितपुर दोनों का अगला अध्याय लिखेगा। हम इसे 'वज्र' नाम देंगे।
अनिरुद्ध, शिशु को प्यार से चूमता है। वज्र... हाँ। यह नाम उस आशा का प्रतीक है जिसके लिए तात कृष्ण ने सारा युद्ध सहा।
अगले दिन द्वारका में भव्य उत्सव शुरू होता है। सड़कों को फूलों और रंगोली से सजाया गया है। सोने-चाँदी के सिक्के लुटाए जा रहे हैं। कृष्ण ने स्वयं घोषणा की है कि सात दिन तक कोई भी राज्य-शुल्क नहीं लिया जाएगा।
राजभवन के बाहर का चौक। उद्धव और सात्यकि, नागरिकों के साथ उत्सव देख रहे हैं। ढोल-नगाड़े बज रहे हैं, और महिलाएं पारंपरिक लोकगीत गा रही हैं।
सात्यकि, उत्सव का आनंद लेते हुए, “उद्धव, यह सिर्फ राजकुमार का जन्म नहीं है। यह द्वारका के सिद्धांत की जीत है। यह बच्चा कौरवों की हिंसा के बाद जन्मा है, यह नए युग का शुभारंभ है।”
उद्धव, गंभीरता से, “बिल्कुल, सात्यकि। आज यहां पुत्र जन्म के पारंपरिक गीत ही नहीं, बल्कि समुद्री विजय और व्यापारिक सफलता के गीत भी गाए जा रहे हैं। लोग जानते हैं कि यह वंश युद्ध नहीं, व्यवस्था लाएगा।”
दो स्थानीय बुंदेलखंडी व्यापारी, जो कुंडेश्वर के रास्ते द्वारका आए हैं, पास खड़े होकर बातचीत कर रहे हैं।
पहला व्यापारी, “मैंने सुना है कि यह पुत्र रानी उषा का है। वह रानी जो महादेव की भक्त है और रोज़ भोर में पूजा करती है।”
दूसरा व्यापारी, “हाँ, भाई। लोकगीतों में भी यही कहा जा रहा है कि इस शिशु पर शिव का तेज और कृष्ण का विवेक दोनों हैं। बुंदेलखंड के गाँवों में लोग गा रहे हैं कि रानी ऊषा ने कुंडेश्वर के वरदान से यह पुत्र पाया है। यह शिशु केवल द्वारका का नहीं, संपूर्ण भारतवर्ष की शांति का उत्तराधिकारी है।”
भविष्य की तैयारी
शाम को, श्रीकृष्ण, बलराम और अन्य गण-प्रमुख शिशु 'अनागत' को आशीर्वाद देने आते हैं।
श्री कृष्ण, शिशु को गोद में लेते हुए, प्रेम से, “अनागत... तुम उस समय आए हो जब तलवारें शांत हो चुकी हैं और लेखनी का महत्व बढ़ गया है। तुम्हारा राजधर्म पृथ्वी पर स्वर्ग की स्थापना करना होगा।”
बलराम, शिशु के गाल पर हाथ फेरते हुए। “तुम मेरे लाडले हो। मैं तुम्हें बल, साहस और अपने हल की शक्ति दूँगा। क्योंकि किसान का बल ही राज्य का आधार होता है।”
अनिरुद्ध, उषा की ओर देखते हुए। “हे मेरी रानी। तुमने मुझे एक पूर्ण पुरुष बना दिया। अब हमारा प्रेम केवल हमारा नहीं, इस शिशु का भविष्य है।”
ऊषा, प्रेम से, “हमारा जीवन अब केवल अनागत के लिए है, प्राणनाथ।”
पूरा परिवार एक साथ शिशु को आशीर्वाद देता है। उत्सव सात दिन तक चलता है, जो द्वारका की समृद्धि और भविष्य में उसकी अटूट आस्था का प्रतीक बन जाता है।
युग-संधि
समय अंतराल के १२ वर्ष बाद। द्वारका का राज-उद्यान। वज्र अब लगभग १२ वर्ष का हो चुका है। शक्ति में उषा और विवेक में कृष्ण का प्रतिबिंब। वह अपने दादा, श्रीकृष्ण के साथ बैठा है, जो अब शांत और गंभीर मुद्रा में हैं।
वज्र, उत्सुकता से, “दादाश्री, आचार्य उद्धव मुझे गणतंत्र की जटिलताओं को समझाते हैं, पिताश्री मुझे संधि और कूटनीति सिखाते हैं, और माताश्री मुझे कुंडेश्वर की भक्ति और शौर्य का पाठ पढ़ाती हैं। पर आप मुझे केवल शांत रहना क्यों सिखाते हैं? आप कहते हैं, 'बाहर देखो, पर भीतर देखो।' बाहर तो सब कुछ शांत है।”
श्री कृष्ण, प्रेम से अनागत के सिर पर हाथ फेरते हुए, “वत्स, शांति बाहर नहीं है। शांति केवल युद्ध विराम है। मैं तुम्हें उस समय के लिए तैयार कर रहा हूँ, जो आ रहा है।”
वज्र, “आप किस समय की बात कर रहे हैं, दादाश्री?”
श्री कृष्ण, “मैं युग-संधि की बात कर रहा हूँ, पुत्र। जिस युग को तुमने देखा है, वह द्वापर था जहाँ धर्म और अधर्म दोनों स्पष्ट थे। अब कलियुग आ रहा है। यह वह समय होगा जब सत्य का रंग धुँधला पड़ जाएगा।
वज्र, “कलियुग? उसका प्रभाव कैसा होगा?”
श्री कृष्ण, गहरी साँस लेते हुए, उनकी आवाज़ में उदासी है।
“कलियुग में सबसे पहले धर्म का अहंकार बढ़ेगा। लोग ज्ञान को नहीं, प्रसिद्धि को पूजेंगे।”
“अब न्याय सबूतों से नहीं, धन और बल से खरीदा जाएगा। राजसभाओं में सत्य कमजोर पड़ जाएगा, और झूठ को अलंकार पहनाए जाएंगे।”
“परिवारों में स्नेह कम होगा, स्वार्थ बढ़ेगा। पुत्र पिता का सम्मान नहीं करेगा, और पति-पत्नी का संबंध प्रेम से नहीं, समझौतों से चलेगा।”
“लोग देवताओं की पूजा तो करेंगे, पर केवल फल पाने के लिए। भक्ति एक व्यापार बन जाएगी। तुम्हारा कुंडेश्वर महादेव का प्रेम ऊषा की भक्ति को याद करते हुए शुद्ध है, पर लोग मंदिरों को धन-संग्रह का माध्यम बनाएंगे।”
वज्र, भयभीत होकर, “तो क्या यह युग विनाशकारी होगा? क्या हम इसे रोक नहीं सकते?”
श्री कृष्ण, “तुम इसे रोक नहीं सकते, वत्स। तुम इसे जीत सकते हो। तुम्हारी माता का शौर्य और पिता का विवेक दोनों को मिलाकर तुम्हें धर्म को बचाना होगा, राज्य को नहीं।”
कुछ महीने बाद। अनिरुद्ध और उषा, कृष्ण के शयनकक्ष में हैं। कृष्ण अब वृद्ध और थके हुए दिखते हैं। द्वारका में अपशकुन होने लगे हैं। यादवों के बीच मतभेद बढ़ने लगे हैं।
ऊषा, आँखों में आँसू के साथ, “तात! द्वारका में यादवों के बीच छोटे-छोटे विवाद रक्तपात तक पहुँच रहे हैं। उद्धव और बलदाऊ भी उन्हें शांत नहीं कर पा रहे। क्या यह कलियुग का प्रभाव है?”
श्री कृष्ण, कोमलता से, “हाँ, पुत्री। कलियुग पहले मन को भ्रष्ट करता है। वह असंतोष फैलाता है, जहां सब कुछ पाकर भी मनुष्य खाली महसूस करता है। मेरे यादवों ने युद्ध नहीं सहा, उन्होंने केवल भोग किया। अब वे आपस में ही लड़ने लगे हैं। यह नियति है।”
अनिरुद्ध, हाथ जोड़कर, “आप क्यों नहीं उन्हें उपदेश देते? आपका एक शब्द उन्हें शांत कर सकता है!”
श्री कृष्ण, उदासीनता से, “अब मेरा समय समाप्त हो गया है, पुत्र। मेरे शब्द अब केवल कान तक पहुँचेंगे, हृदय तक नहीं। मैंने अपने जीवन में तीन महत्वपूर्ण कार्य किए: कौरवों का विनाश: मैंने अधर्म को समाप्त किया। द्वारका की स्थापना: मैंने धर्म की नींव रखी। तुम्हें तैयार करना: अब मैं तुम्हें भविष्य सौंपता हूँ।”
“मेरा अंतिम उपदेश - सत्य का त्याग मत करना कलियुग में लोग कहेंगे कि स्वार्थ ही सत्य है। तुम अनागत आने वाला हो, तुम्हें भविष्य को अतीत की त्रुटियों से बचाना है।”
“प्रेम को बल बनाना, ऊषा, तुम्हारी भक्ति और अनिरुद्ध का प्रेम ही द्वारका की अंतिम दीवार है। कुंडेश्वर को कभी मत भूलना क्योंकि सरल आस्था ही तुम्हें जटिलताओं से बचाएगी।”
द्वारका का त्याग: जब तुम देखो कि यादव स्वयं का विनाश करने लगे हैं, तो शहर का मोह छोड़ देना। क्योंकि धर्म केवल मिट्टी में नहीं, मनुष्य के हृदय में वास करता है।
अंतिम विदाई
कुछ दिनों बाद। श्रीकृष्ण, एक पीपल वृक्ष के नीचे एकांत में बैठे हैं। अनिरुद्ध, उषा और वज्र दूर से उन्हें देख रहे हैं। राजभवन के भीतर यादवी उपद्रव और बढ़ गया है।
अनिरुद्ध, दुखी होकर, “तात, उन्होंने हमसे विदा लिए बिना योग-निद्रा में प्रवेश किया है। उन्होंने अपनी अंतिम साँसें ली हैं। वह वज्र को गले लगाता है, हमारी ढाल अब चली गई।
ऊषा, दृढ़ता से, अपनी आँखों के आँसू रोककर, “नहीं, प्राणनाथ। उनकी ढाल चली गई, पर उनका उपदेश हमारे साथ है। उन्होंने कहा था: 'शहर का मोह छोड़ देना।' द्वारका अब अधर्म की आग में जल रही है। हमें वज्र को लेकर यहाँ से निकलना होगा।”
वज्र, दृढ़ता से, अपने दादा के अंतिम शब्दों को याद करते हुए, “दादाश्री ने मुझे शांत विवेक सिखाया था। मेरा धर्म अब विनाश को देखना नहीं, धर्म को बचाना है।”
अंतिम यात्रा
द्वारका का अंतिम प्रहर। समुद्र की गर्जना अब सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि प्रलय की चेतावनी बन चुकी है। कृष्ण के महाप्रयाण के बाद, यादवों का आपसी संघर्ष अपनी चरम सीमा पर है।
द्वारका की सड़कें अब उत्सव की नहीं, रक्त और विनाश की गवाह हैं। राजभवन के एक ऊँचे बुर्ज पर अनिरुद्ध, उषा और वज्र खड़े हैं। दूर क्षितिज पर, द्वारका का कुछ हिस्सा पहले ही समुद्र में समा चुका है।
अनिरुद्ध, क्रोध और निराशा से मुट्ठी भींचते हुए, “मैंने बलराम तात से गदा चलाना सीखा था। मेरी रगों में वृष्णि रक्त है। मैं इस विनाश को खड़े होकर कैसे देख सकता हूँ? मेरे पास सैन्य बल है, मैं इन उन्मत्त यादवों को रोक सकता हूँ!”
ऊषा, शांति से, अनिरुद्ध का हाथ थाम कर, “प्राणनाथ। आप किसे रोकेंगे? यह शत्रु बाहर नहीं है, यह शत्रु यादवी मन में है यह कलियुग है। तात कृष्ण ने अपनी योग-निद्रा में जाने से पहले क्या कहा था?”
अनिरुद्ध, “उन्होंने कहा था, "जब तुम देखो कि यादव स्वयं का विनाश करने लगे हैं, तो शहर का मोह छोड़ देना।"
ऊषा, “तो फिर यह महल, यह भूमि, यह अब हमारा धर्मक्षेत्र नहीं है, अनिरुद्ध। यह अधर्म का दंश है। हमें मिट्टी को नहीं, विचार को बचाना है। यह शिशु... वज्र... यह भविष्य का बीज है।”
वज्र, शांत और गंभीर, “पिताश्री, दादाश्री ने मुझे शांत रहना सिखाया था। उन्होंने कहा था कि धर्म केवल मनुष्य के हृदय में वास करता है। यदि हम यहां रुके, तो हम भी इस विनाश की अंधेरी लपटों में जल जाएँगे।”
अनिरुद्ध, वज्र के विवेक से हिलकर, “तुम्हारा ज्ञान... हाँ। कृष्ण का अंतिम उपदेश... वह घुटने टेककर द्वारका की धरती को चूमता है, मैं तुम्हें छोड़ रहा हूँ, मेरी प्यारी द्वारका। पर मैं तुम्हारे विवेक को जीवित रखूँगा।”
तीनों अंधेरी रात में, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और यादवों के चीत्कार के बीच, एक छोटी नाव से द्वारका को छोड़ देते हैं। यह राजसी वस्त्रों का त्याग और साधारण यात्रा का क्षण है।
कलि की सीमा
यादवों के विनाश और द्वारका के सागर में डूब जाने के बाद, अनिरुद्ध भगवान कृष्ण के पौत्र और उनकी पत्नी उषा के पुत्र वज्र ही यदुवंश के एकमात्र उत्तराधिकारी थे जिन्हें अर्जुन ने सुरक्षित मथुरा में स्थापित किया था।
युग-संधि का वह काल अत्यंत विषादपूर्ण था। श्री कृष्ण के देह त्याग के बाद, पृथ्वी पर धर्म की शक्ति क्षीण हो गई थी। मथुरा के निकट एक एकांत स्थल पर, जहाँ उजाड़ वृक्षों के बीच शांति थी, पिता अनिरुद्ध अपने पुत्र वज्र के साथ बैठे थे, उन्हें उस नए युग के नियम समझा रहे थे जो अब शुरू हो चुका था।
वज्र, आँखों में गहरी उदासी लिए, आवाज़ में दर्द के साथ बोला, "पिताश्री! जिस धर्म की रक्षा के लिए हमने इतना कुछ खोया, वह धर्म अब कहाँ है? हमारे पूरे कुल के बलिदान के बाद, अब यह भूमि, यह मानवता, किस आधार पर खड़ी रहेगी? मुझे लगता है जैसे सब कुछ व्यर्थ हो गया है, जैसे हमारी विजय भी एक हार थी।"
अनिरुद्ध, पुत्र के कंधे पर हाथ रखते हुए, दृढ़ परन्तु शांत स्वर में, "वज्र! तुम्हारा विषाद स्वाभाविक है। हर महान युग-संधि एक बड़ी कीमत मांगती है। हमारे कुल का अंत हमें यही सिखाता है कि धर्म अब बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं रहेगा। तुमने युग का संधिकाल देखा है।
द्वापर का अंत और कलि का उदय। जिस क्षण हमारे परम आराध्य ने देह त्याग, उसी क्षण इस धरती पर कलियुग का प्रभाव शुरू हो गया था। अब धर्म को एक नए योद्धा की आवश्यकता है, जो शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धि और संयम से लड़ेगा। मैं तुम्हें उस समय की कथा सुनाता हूँ, जब धर्म के रक्षक राजा परीक्षित ने कलयुग के अधिष्ठाता कलि को चुनौती दी थी।"
अनिरुद्ध ने कथा सुनानी शुरू की, पांडवों के स्वर्गारोहण के पश्चात, उनके पौत्र, अभिमन्यु-पुत्र राजा परीक्षित ने धर्म की पताका थामी। वे एक प्रतापी, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय शासक थे। उनकी ख्याति ऐसी थी कि उनके राज्य में अधर्म, पाप या अन्याय का नामोनिशान नहीं था। परन्तु चाल चक्र को कौन टाल सकता है?
एक दिन जब राजा परीक्षित दिग्विजय यात्रा से लौट रहे थे, उन्होंने मार्ग में एक अद्भुत और भयावह दृश्य देखा। उन्होंने एक पुरुष को देखा जो धर्म के नियमों को तोड़ता हुआ, गाय पृथ्वी माता का प्रतीक और बैल धर्म का प्रतीक को बेरहमी से पीट रहा था। यह पुरुष और कोई नहीं, बल्कि कलि का साकार रूप था।
कलि का रूप अत्यंत ही मलिन और घिनौना था। उसका शरीर श्यामवर्ण था, मानो वह समस्त पृथ्वी के पापों का पुंज हो। उसकी आँखें लाल और क्रूरता से भरी थीं, जिनमें क्षणिक अहंकार और उपहास की चमक थी। उसके बाल बिखरे और उलझे हुए थे, जो अव्यवस्था और अराजकता का प्रतीक थे।
उसके मुख पर एक कुटिल मुस्कान थी, जो दर्शाती थी कि वह धर्म की शक्ति को तुच्छ समझता है। उसके हाथों में जुए के पासे, मदिरा से भरा पात्र, मांस-मछली और एक सोने का आभूषण था। ये सब कलयुग के प्रमुख पापों के चिह्न थे।
राजा परीक्षित का धर्मबल अत्यंत प्रबल था। जैसे ही उन्होंने यह घोर अपराध देखा, उनका खून खौल उठा। उन्होंने तत्काल अपना धनुष उठाया और कलि की ओर तीर तानते हुए गरजे।
राजा परीक्षित: "हे दुष्ट! क्षण भर में रुक जा! तुम कौन हो जो मेरे धर्मराज्य में धर्म के प्रतीक, इस बैल और गाय को सताने का दुस्साहस कर रहे हो? क्या तुमने नहीं सुना कि इस धरा पर अभी भी कुरूकुल का न्याय चलता है? मैं अभी तुम्हारे सिर को धड़ से अलग कर दूंगा, फिर चाहे तुम स्वयं काल ही क्यों न हो!"
कलि, जो उस समय धनुष की प्रत्यंचा की ध्वनि सुनकर भयभीत हो गया था, परन्तु जिसके हृदय में अहंकार छिपा था, हाथ जोड़कर, छल की विनम्रता से बोला।
कलि, "महाराज! शांत हो। मेरी क्षुद्रता को क्षमा करें, पर मैं आपकी महानता से परिचित हूँ। मैं कलि हूँ, और मैं इस धरा पर एक निश्चित उद्देश्य से आया हूँ। द्वापर युग समाप्त हो चुका है, और मेरा काल कलयुग प्रारम्भ हो गया है। आप मुझे मारकर प्रकृति के विधान को नहीं बदल सकते। मैं कालचक्र की अनिवार्य कड़ी हूँ, मैं वही हूँ जिसे स्वयं विधाता ने इस युग का अधिष्ठाता नियुक्त किया है। मुझे मारना केवल एक व्यर्थ का श्रम होगा, क्योंकि युग का स्वभाव मेरे बिना अधूरा है।"
राजा परीक्षित, क्रोध में और भी दृढ़ होते हुए, उनकी वाणी में वज्रपात जैसा कंपन था। "धर्म और न्याय का उल्लंघन काल का विधान नहीं हो सकता! तुम अधर्म के जनक हो! जब तक मैं जीवित हूँ, तुम यहाँ ठहर नहीं सकते। यह भूभाग अभी भी धर्म की शक्ति से शासित है।
यदि तुम काल के अधीन हो, तो अपनी मर्यादा जानो! तुम्हारा स्थान इस धर्मभूमि पर नहीं है। मैं तुम्हें जीवनदान देता हूँ, परन्तु तुम्हें अभी और इसी क्षण मेरे राज्य की सीमाओं को छोड़कर जाना होगा। अन्यथा, तुम मेरे धनुष से निकले बाणों से बच नहीं पाओगे।"
कलि ने देखा कि राजा परीक्षित का तेज और धर्मनिष्ठा अतुलनीय है, और बल से उन्हें हराना असंभव है। उसने तब चालाकी और कपट का सहारा लिया।
कलि, विनम्रता का ढोंग करते हुए। "हे धर्मात्मा नरेश! मैं आपके तेज और न्याय को प्रणाम करता हूँ। आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। मैं यह राज्य छोड़कर चला जाऊँगा, परंतु चूंकि मैं काल हूँ, और मुझे कहीं न कहीं निवास तो करना ही होगा।
इस पृथ्वी के सम्राट होने नाते, आप ही मुझे आश्रय दे सकते हैं। मैं आपसे याचना करता हूँ। आप मुझे इस धरा पर कुछ स्थान प्रदान करें, जहाँ मैं बिना किसी अवरोध के अपने स्वाभाविक रूप में निवास कर सकूँ।"
राजा परीक्षित, "ठीक है। मैं तुम्हें तुम्हारे स्वभाव के अनुकूल स्थान देता हूँ, जहाँ तुम अपने प्रभाव से धर्म को हानि नहीं पहुंचा सको।"
राजा परीक्षित ने गहन विचार किया और कलि को चार स्थान प्रदान किए, जो सीधे तौर पर अधर्म और पाप को बढ़ावा देते थे। द्यूत जुआ, जहां छल, लोभ और धोखा निवास करता है। पान, मदिरापान या नशा, जहाँ विवेक नष्ट होता है और मन अनियंत्रित हो जाता है। परस्त्रीगमन, अवैध व्यभिचार: जहाँ वासना और चारित्रिक पतन होता है। तथा हिंसा, जीव-हत्या/मांस भक्षण, जहाँ क्रूरता और निर्दयता वास करती है।
कलि इन स्थानों को पाकर प्रसन्न नहीं हुआ, क्योंकि ये स्थान समाज में सीमित और छिपे हुए थे। वह राजा से और अधिक विस्तार की मांग करने लगा।
कलि, "हे राजन! ये चार स्थान तो अधर्म के कोने मात्र हैं। मैं एक युग का अधिष्ठाता हूँ, मुझे एक ऐसी व्यापक जगह दें जहाँ इन चारों पापों का वास एक साथ हो, और जहाँ मेरा प्रभाव व्यापक रूप से फैल सके।"
राजा परीक्षित ने सोचा कि कलि को ऐसे स्थान पर रखना चाहिए जहां वह नियंत्रण में रहे, परन्तु धर्म के लिए आवश्यक भी हो। तब उन्होंने पाँचवाँ और सबसे घातक स्थान कलि को प्रदान किया, स्वर्ण सोना/धन: क्योंकि धन से मद, अहंकार, जुआ, नशा, और हिंसा की लालसा उत्पन्न होती है।
जैसे ही कलि को पांचवां स्थान मिला, वह तुरंत सोने के आभूषणों और धन में लिप्त होने चला गया। इस प्रकार, राजा परीक्षित ने अपनी तलवार से नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि और धर्मबल से कलि को नियंत्रित कर दिया।
अनिरुद्ध, "वज्र! तुमने देखा? यह कथा हमें सिखाती है कि कलि का प्रभाव केवल उन पाँच स्थानों तक सीमित नहीं रहा है। वह मानव व्यवहार को बड़े पैमाने पर प्रभावित कर रहा है। धर्म के चार स्तंभ सत्य, तपस्या, दया और दान अब क्षीण हो गए हैं।"
"कलयुग में मनुष्य का स्वभाव स्वार्थ-केन्द्रित हो गया है। वह तत्काल लाभ चाहता है और संतोष नामक गुण लगभग समाप्त हो गया है। इसलिए, हे मेरे पुत्र, तुम्हारी सबसे बड़ी चुनौती धर्म को बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर बचाना है। यह केवल तुम्हारे मन का संग्राम है।"
वज्र, आँखों में एक नई दृढ़ता के साथ, "पिताश्री! अब मैं समझा। युद्ध शस्त्रों का नहीं, सिद्धांतों का है। कलयुग के काल में यदुवंश का अवशेष होने का मेरा क्या कर्तव्य है?"
अनिरुद्ध, "नहीं, वज्र! यही कलयुग की सबसे बड़ी भ्रांति है। परीक्षित ने हमें सिखाया कि कलि को तलवार से नहीं, बल्कि बुद्धि और संयम से हराया जाता है। कलयुग में धर्म केवल एक चौथाई बल से खड़ा है, और वह है नाम-संकीर्तन अर्थात ईश्वर के नाम का निरंतर जप।
इस युग का सबसे बड़ा वरदान यही है कि केवल नाम-स्मरण से ही मुक्ति मिल सकती है। जहाँ भगवन्नाम का वास है, जहाँ सत्य और दया की भावना है, वहाँ कलि का प्रभाव स्वतः ही नष्ट हो जाता है। हमें स्वयं को उन पांच स्थानों जुआ, नशा, व्यभिचार, हिंसा, और अत्यधिक लोभ से बचाकर रखना होगा। मेरे पुत्र! युग-संधि का यह काल तुम्हें इस नए धर्म का ध्वजवाहक बनाता है।"
वज्र ने अपने गुरु और पिता के उपदेश को ग्रहण किया, और समझा कि अब बाहरी युद्ध समाप्त हो चुका है, अब धर्म का युद्ध प्रत्येक मनुष्य के भीतर लड़ा जाना है, और यदुवंश का अवशेष होने के नाते, यह उसका दैवीय कर्तव्य था।
मोह से मुक्ति
कई सप्ताह बाद। वे अब भारत के पश्चिमी तट से दूर, आंतरिक मार्गों पर हैं। उन्होंने अपने राजसी आभूषण और वस्त्र त्याग दिए हैं और साधारण यात्री बन गए हैं। एक जंगल के किनारे वे रात में विश्राम कर रहे हैं। अनागत लकड़ी जला रहा है।
अनिरुद्ध, जंगल की ओर देखते हुए, “मैंने कभी नहीं सोचा था कि मेरा जीवन महल की सुरक्षा से निकलकर जंगल की अनिश्चितता में बदल जाएगा। मैं अब एक राजा नहीं, एक रक्षक हूँ।”
ऊषा, आराम से, “और मैं अब एक रानी नहीं, एक साधिका हूँ। क्या आपको याद है, मैंने कुंडेश्वर में क्या प्रतिज्ञा ली थी? कि मेरा प्रेम शांत और अनंत होगा। इस यात्रा में मुझे वही शांति मिल रही है। यह कलियुग में मोक्ष का मार्ग है मोह का त्याग।”
अनिरुद्ध, “हमारा नया ठिकाना कहाँ होगा, ऊषा?” “हमें एक ऐसा स्थान चाहिए जहां हम वज्र को कलियुग के प्रभाव से दूर रख सकें। एक ऐसी जगह, जहाँ अधर्म का स्वर न पहुंच सके।”
ऊषा, आकाश की ओर देखते हुए, “कृष्ण ने हमेशा उत्तरांचल की पवित्रता की बात की थी। वह भूमि, जहां गंगा का उद्गम है, जहाँ केवल पहाड़ और साधना का वास है।”
अनिरुद्ध, समझते हुए, “हाँ! वह भूमि जहां देवता निवास करते थे। वह स्थान, जहाँ जनसंख्या कम है, जहाँ व्यापारिक लालच नहीं पहुंच सकता। हम एक ऐसा आश्रम स्थापित करेंगे, जो द्वारका के गणतांत्रिक सिद्धांतों और साधना के नियमों पर चलेगा।”
ऊषा, उत्साहित होकर, “उस स्थान पर, हम वज्र को केवल राजा नहीं, बल्कि ज्ञानी बनाएंगे। वह द्वारका के विवेक और कुंडेश्वर की भक्ति को मिलाकर धर्म का नया दीप प्रज्वलित करेगा। हमारा काम अब राज्य बनाना नहीं, मनुष्य बनाना होगा।”
वज्र, आग में लकड़ी डालते हुए, “पिताश्री, दादाश्री का उपदेश था: "तुम्हें भविष्य सौंपता हूँ।" मेरा भविष्य इन साधारण चीज़ों में है इस आग की गर्मी में, और आपके साथ।”
तीनों एक-दूसरे को देखते हैं। उनकी आँखों में अब बीते हुए वैभव का दुख नहीं, बल्कि भविष्य की अटूट आस्था है। द्वारका का युग समाप्त हो गया है, पर उनका धर्म अभी जीवित है।
नया आश्रम
पलायन के दो वर्ष बाद। उत्तरी भारत की पहाड़ियों में, गंगा के एक शांत उद्गम स्थल के पास, अनिरुद्ध, उषा और वज्र ने एक छोटा, साधारण आश्रम स्थापित किया है। आश्रम के चारों ओर घना जंगल है, और वातावरण में गहन शांति है। वज्र लगभग १४ वर्ष, एक लकड़ी की चौकी पर बैठकर अपने पिता से शिक्षा ले रहा है।
अनिरुद्ध, वज्र को एक ताड़पत्र पर लिखते हुए समझाते हुए, “वत्स। द्वारका का गणतांत्रिक सिद्धांत क्या था? 'शक्ति का संतुलन'। हमने द्वारका को इसलिए खोया क्योंकि यादवों ने भौतिक शक्ति को नैतिक विवेक से ऊपर रखा।”
वज्र, लिखते हुए, “ इसलिए, पिताश्री, हमारा आश्रम ज्ञान का केंद्र है जहां विवेक ही सर्वोच्च शक्ति है।”
अनिरुद्ध, “हाँ। लेकिन यहाँ हमारी परीक्षा कलियुग से है। कलियुग में लालच और असंतोष जंगल की आग की तरह फैलते हैं। हमारी शिक्षा का सबसे बड़ा पाठ यह है कि हम उस आंतरिक द्वारका को कैसे बचाएं, जो कृष्ण ने हमें दी।”
सुबह के सूर्य की पहली किरणें आश्रम में आती हैं। ऊषा, जो अभी-अभी अपनी दैनिक पूजा से लौटी है, अनिरुद्ध और वज्र के पास आती है। वह शारीरिक रूप से यहाँ है, पर उसका मन कहीं और है।
अनिरुद्ध, मुस्कुराते हुए, “ऊषा, तुम्हारी यह साधना मुझे हमेशा प्रेरित करती है। तुम इस दुर्गम यात्रा के बावजूद, रोज़ भोर में महादेव की आराधना के लिए समय निकाल लेती हो। मुझे पता है कि तुम्हारा हृदय कहाँ है।”
ऊषा, शांत लेकिन भावुक, “मेरा हृदय कुंडेश्वर में है, प्राणनाथ। इस नए जीवन में, यह मेरी सबसे बड़ी प्रतिज्ञा है। मैंने उन्हें वचन दिया था कि वह मेरे लिए केवल देवता नहीं, बल्कि हमारे प्रेम का साक्षी हैं।”
अनिरुद्ध, गहनता से, “तुम इस आश्रम से रोज़ इतनी दूर कैसे जाती हो, और क्यों?
ऊषा, “मैं किसी भौतिक दूरी की बात नहीं कर रही, अनिरुद्ध। वह वज्र को पास बुलाती है, मेरे लिए, यह आश्रम, यह गंगा तट... यह सब एक नया कुंडेश्वर है। यह कुंडेश्वर की भावना है, जिसे मैं यहाँ लेकर आई हूँ।
ऊषा, आँसू रोककर, कृतज्ञता से, “मैं वहाँ इसलिए जाती थी ताकि महादेव को धन्यवाद दे सकूँ कि उन्होंने तुम्हें मेरे जीवन में भेजा। और मैं आज यहाँ इसलिए पूजती हूँ कि उन्हें धन्यवाद दे सकूँ कि उन्होंने हमें कलियुग के विनाश से बचाकर इस शांति में भेजा। मेरा प्रेम, मेरा योद्धा-स्वभाव, और मेरा मातृत्व यह सब उस कुंडेश्वर से जुड़े हैं।”
वज्र, समझते हुए, “माँ, तो स्थान महत्वपूर्ण नहीं है। विश्वास महत्वपूर्ण है।”
ऊषा, वज्र का माथा चूमते हुए, “बिलकुल, मेरे पुत्र। कलियुग तुम्हें स्थान से भटका सकता है, पर विश्वास से नहीं। मेरा कुंडेश्वर अब मेरे हृदय में है।”
कुछ वर्ष और बीत गए। वज्र अब युवा हो रहा है उसकी शिक्षा पूर्ण होने को है। वह अब बलराम द्वारा सिखाए गए 'हल' कृषि और उद्धव द्वारा सिखाए गए 'शास्त्र' अर्थशास्त्र के बीच संतुलन बनाना सीख रहा है।
अनिरुद्ध, “अब तुम्हारी शिक्षा का अंतिम चरण है, वत्स। तुमने वृष्णि कूटनीति सीखी, यादवी साहस सीखा, और कुंडेश्वर की भक्ति सीखी। तुम्हें क्या लगता है कि इस नए युग में राजा कैसा होना चाहिए?”
वज्र, “पिताश्री, मुझे लगता है कि इस युग में राजा को राजा नहीं, बल्कि संस्थापक होना चाहिए। एक ऐसा व्यक्ति, जो सत्ता से नहीं, सिद्धांतों से शासन करे।”
अनिरुद्ध, गर्व से, “समझाओ।”
वज्र, “दादाश्री ने सिखाया कि कलियुग में स्वार्थ धर्म बनेगा। इसलिए, हमें ऐसा आश्रम बनाना होगा, जो समाज को व्यापारिक लालच से नहीं, बल्कि आध्यात्मिक विकास से जोड़े। मैं इस क्षेत्र में एक नई सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना चाहता हूँ।”
ऊषा, मुस्कुराते हुए, “तुम्हारा लक्ष्य क्या होगा, मेरे पुत्र?”
वज्र, “मेरा लक्ष्य होगा एक 'धर्म-संकाय' स्थापित करना। यह आश्रम ज्ञान, कृषि और शांति के सिद्धांतों पर चलेगा। यहां आने वाले हर व्यक्ति को अपनी ज़रूरतें सीमित करना सिखाया जाएगा, ताकि वे लालच के दलदल से दूर रहें।”
अनिरुद्ध, उत्सुकता से, “यह तो द्वारका से भी कठिन नियम है!”
वज्र, “हाँ। क्योंकि यह कलियुग है, पिताश्री। और कलियुग में सरल होना ही सबसे बड़ा विद्रोह है। यह मेरे दादाश्री का अंतिम उपदेश होगा।”
अनिरुद्ध और उषा, अपने पुत्र के इस गहन संकल्प को देखकर, संतुष्ट होते हैं। वे जानते हैं कि उन्होंने केवल एक पुत्र को जन्म नहीं दिया, बल्कि कलियुग में धर्म की एक नई आशा को जन्म दिया है। उनकी व्यक्तिगत प्रेम कहानी अब मानवता के संरक्षण के मिशन में बदल चुकी है।
धर्म-संकाय
समय अंतराल के कुछ और वर्ष बाद। वज्र अब एक युवा पुरुष है, जिसका व्यक्तित्व उसके माता-पिता और दादा-दादी के गुणों का अद्भुत मिश्रण है, ऊषा जैसा दृढ़, कृष्ण जैसा शांत। उत्तरांचल की पहाड़ियों में 'धर्म-संकाय' नामक आश्रम सफलतापूर्वक स्थापित हो चुका है। यह आश्रम साधना, निस्वार्थ कृषि, और ज्ञान के सिद्धांतों पर चलता है।
वज्र, आश्रम के शिष्यों को संबोधित करते हुए, “द्वारका हमें सिखा गई कि संपत्ति की अधिकता ही विनाश का कारण बनती है। हमारा धर्म-संकाय धन से नहीं, श्रम और संतोष से चलता है। हम कलियुग में धर्म का दीप जला रहे हैं!”
अनिरुद्ध और उषा दूर से उसे देखते हैं। उनकी आँखों में पुत्र के प्रति गर्व है।
अनिरुद्ध, उषा से फुसफुसाते हुए, “कृष्ण ने जो बीज बोया था, वह फलीभूत हो गया। वज्र की आवाज में यादवी शक्ति और दैवीय शांति दोनों हैं।”
ऊषा, शांत मुस्कान के साथ, “हाँ, प्राणनाथ। उसने केवल ग्रंथों से नहीं सीखा। उसने द्वारका के पतन और कुंडेश्वर की प्रतिज्ञा से सीखा है। उसकी नींव युद्ध पर नहीं, विवेक पर टिकी है।
कलियुग की चुनौती
एक दिन दोपहर में, आश्रम के द्वार पर कुछ बाहरी व्यक्ति आते हैं। वे कठोर, लालची चेहरे वाले व्यापारी हैं जो अब मैदानी इलाकों के राज्यों पर शासन कर रहे हैं कलियुग का प्रतिनिधित्व करते हुए। उनका मुखिया, रुद्रपाल, अत्यंत धूर्त है।
रुद्रपाल, वज्र से, व्यंग्य करते हुए, “राजकुमार वज्र! हमने सुना है कि आप यहाँ स्वर्ग बसा रहे हैं। लेकिन यह सारी उपजाऊ भूमि... यह तो अब हमारे राज्य के अधीन आती है। हमें इस पर भारी कर चाहिए।”
वज्र, शांत और स्थिर, “यह भूमि देवों की है, यह किसी राज्य के अधीन नहीं है। यह आश्रम केवल ज्ञान और सेवा का केंद्र है। हम आपको कर देने में असमर्थ हैं।”
रुद्रपाल, हंसते हुए, “ज्ञान? कलियुग में ज्ञान से पेट नहीं भरता, राजकुमार। हमें सोना चाहिए! यदि तुम कर नहीं देते, तो हम तुम्हारी सारी फसल जब्त कर लेंगे और तुम्हारे सरल शिष्यों को दास बना लेंगे।”
अनिरुद्ध और उषा पीछे खड़े हैं। अनिरुद्ध की आँखें क्रोध से लाल हैं वह अपनी तलवार निकालने के लिए बेचैन है।
अनिरुद्ध, दबी आवाज़ में, “मुझे इसकी गर्दन काटनी चाहिए, ऊषा! यह हमारी शांति को चुनौती दे रहा है!”
उषा, अनिरुद्ध का हाथ थाम कर, दृढ़ता से, “नहीं, प्राणनाथ! शांत रहिए! यह अनागत का युद्ध है। कृष्ण ने यही कहा था तलवार अंतिम उपाय है। इसे विवेक से लड़ने दीजिए।”
वज्र, रुद्रपाल की आंखों में देखते हुए, “महाराज रुद्रपाल। आप हमें कर मांग रहे हैं। लेकिन आप यह नहीं जानते कि इस आश्रम से आपका कितना लाभ होता है।”
रुद्रपाल, संदेह से, “क्या लाभ? यह गरीबी का आश्रम हमें क्या देगा?”
वज्र, धीरे से) यहाँ आने वाले यात्री बुंदेलखंड और अन्य क्षेत्रों से कुंडेश्वर जाने वाले तीर्थयात्री, यहां निस्वार्थ सेवा पाते हैं। जब वे वापस जाते हैं, तो वे आपके राज्यों में संतोष और शांति का विचार लेकर जाते हैं। जहाँ संतोष होता है, वहाँ विद्रोह कम होता है।”
वज्र, “मैं आपको कर नहीं दूँगा। लेकिन मैं आपको एक सौदा देता हूँ। हम आपके राज्य को हर वर्ष सर्वोत्तम बीज और औषधीय ज्ञान देंगे निःशुल्क। यह ज्ञान आपकी प्रजा को समृद्ध करेगा। जब आपकी प्रजा समृद्ध होगी, तो आपका कर-संग्रह अपने आप बढ़ेगा।”
रुद्रपाल, विचार करते हुए, “ज्ञान और बीज? क्या यह मुझे तुरंत धन देगा?”
वज्र, दार्शनिक रूप से, “रुद्रपाल। यह कलियुग है। कलियुग में तुरंत धन हमेशा तुरंत दुख लाता है। मैंने द्वारका को डूबते हुए देखा है। यह ज्ञान आपको दीर्घकालिक शक्ति देगा। आप यहाँ से कर ले जा सकते हैं, पर तब आप हमारे शत्रु होंगे। या आप यहाँ से ज्ञान ले जा सकते हैं, और हम आपके मित्र होंगे।”
रुद्रपाल असमंजस में पड़ जाता है। उसके लालची स्वभाव और अनागत के तार्किक विवेक के बीच द्वंद्व होता है। वह समझता है कि सैन्य बल से भी वज्र को जीतना संभव नहीं है, क्योंकि वज्र ने बिना लड़े ही उसे एक अधिक आकर्षक व्यापारिक प्रस्ताव दे दिया है।
रुद्रपाल, हार मानते हुए, “यह कैसा राजकुमार है... ठीक है। मैं तुम्हारे ज्ञान को स्वीकार करता हूँ। लेकिन यह मत भूलना, यह कलियुग है, और मैं जल्द ही और अधिक की मांग के साथ वापस आऊँगा।”
वज्र, मुस्कुराते हुए, “आप अवश्य आइएगा। हमारा आश्रम ज्ञान का भंडार है, और हम हमेशा देने के लिए तैयार रहते हैं।”
रुद्रपाल और उसके सैनिक भारी मन से चले जाते हैं। पीछे खड़े अनिरुद्ध, उषा और शिष्यों के चेहरे पर विजय का भाव है।
अनिरुद्ध, वज्र को गले लगाते हुए, “तुम जीत गए, मेरे पुत्र! तुमने विवेक से कलियुग की पहली लड़ाई जीती।”
ऊषा, प्रेम और गर्व से, “तुमने अपने दादाश्री का उपदेश और मेरे कुंडेश्वर महादेव की शांति, दोनों को सिद्ध कर दिया। तुमने द्वारका का धर्म बचा लिया।”
वज्र सूर्य की ओर देखता है। वह जानता है कि यह युद्ध समाप्त नहीं हुआ है, बल्कि यह कलियुग में धर्म की अनंत लड़ाई की शुरुआत है। वह अब केवल एक राजकुमार नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक का सारथी है, जो भविष्य में कृष्ण के दर्शन को आगे बढ़ाएगा। वह जनता है कि वह यादव वंश का अंतिम वारिस है जिसे कृष्ण की विरासत को बचाना है।
शाश्वत सत्य
स्थान: कुंडेश्वर महादेव मंदिर, टीकमगढ़, समय: शिवरात्रि की मध्यरात्रि, समय अंतराल के कुछ वर्ष और बीत चुके हैं। वज्र अब युवावस्था पार कर चुका है और 'धर्म-संकाय' का नेतृत्व सफलतापूर्वक कर रहा है। आश्रम अब उत्तराखंड की पहाड़ियों में शांति और ज्ञान का केंद्र बन चुका है।
ऊषा, अब राजमाता के बजाय एक साध्वी जैसी दिखती है, अनागत के साथ गुप्त यात्रा पर है। वे दोनों, साधारण वस्त्रों में, बुंदेलखंड के कुंडेश्वर शिव मंदिर के पास, जमड़ार नदी के तट पर खड़े हैं। मंदिर का वार्षिक उत्सव चल रहा है।
वज्र, उत्सुकता से, “माँ, लगभग दो दशक बाद हम यहाँ लौटे हैं। धर्म-संकाय में मेरा शासन सफलतापूर्वक चल रहा है क्योंकि हमने धन को नहीं, व्यक्तिगत संतोष को शक्ति बनाया है, ठीक वैसे ही जैसे दादाश्री कृष्ण ने सिखाया था। पर मुझे हमेशा आश्चर्य होता है, आप क्यों इस भौतिक यात्रा को जारी रखती हैं? आपका कुंडेश्वर तो अब आपके हृदय में है।”
ऊषा, कुंडेश्वर शिवलिंग की ओर देखते हुए, उनकी आँखों में गहरा प्रेम और शांति है, “मेरा कुंडेश्वर मेरे हृदय में है, पुत्र। पर मैं यहाँ उस शक्ति को धन्यवाद देने आई हूँ, जिसने मुझे प्रेम और तुम्हें जीवन दिया। यह यात्रा मेरे लिए ईमानदारी का पाठ है।”
“मैंने उनसे तुम्हारे पिता को माँगा था। आज मैं उनसे तुम्हारी सफलता के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारे विनम्र बने रहने के लिए प्रार्थना करती हूँ। क्योंकि कलियुग में सत्ता से अधिक विनम्रता कठिन है।”
वज्र, गहनता से, “मेरा विवेक मुझे द्वारका से मिला, पर मेरी निडरता और निष्ठा मुझे आपसे और इस स्थान से मिली है।
ऊषा, वज्र अनाग को पास बुलाकर, मंदिर की भीड़ की ओर इशारा करती है, “पुत्र। जब मैं छोटी थी, तब शिव केवल विध्वंसक थे, वह अहंकार का संहार करते थे। द्वापर युग में, देवता स्पष्ट थे। पर अब कलियुग आ गया है। इस युग में, तुम्हें शैव संप्रदाय के संक्रमण को समझना होगा।
वज्र, “मैं नहीं समझा, माँ। शिव का रूप इस युग में कैसे बदल गया है?”
ऊषा, “द्वापर में, शिव महायोगी थे। वह संसार से दूर रहते थे, और उनकी पूजा का अर्थ था दुनिया को त्यागना। लेकिन कलियुग में, दुनिया स्वयं ही एक जंगल बन गई है।”
ऊषा, आवाज़ में दार्शनिक गंभीरता, “कलियुग में, शिव नाशक नहीं रहे, वह स्वीकारक बन गए हैं। इस युग का सबसे बड़ा पाप लालच और असंतोष है। और शिव, जो विष को अपने गले में धारण कर लेते हैं, हमें सिखाते हैं कि बुराई को नष्ट मत करो, उसे स्वीकार करके रूपांतरित करो। शिव अब सरल किसान हैं, जो सब कुछ जानते हुए भी सबसे भोले बने रहते हैं।”
वज्र, कुंडेश्वर के स्वयंभू शिवलिंग को देखकर, “इसलिए इस मंदिर का शिवलिंग इतना भोला है। यहाँ कोई जटिल अनुष्ठान नहीं है, बस जल और बेलपत्र है।”
ऊषा, “बिलकुल। कलियुग में धर्म का सार केवल सरलता है। तुम्हारे धर्म-संकाय का नियम यही है कि तुम जटिलता को छोड़कर सरलता को अपनाओ। यह बुंदेलखंडी भोलापन ही तुम्हें कलियुग के षड्यंत्रों से बचाएगा।”
वे दोनों शिवलिंग पर जल चढ़ाते हैं। वज्र, अपनी माता की शिक्षा को आत्मसात कर लेता है।
वज्र, “माँ, आपने मुझे कृष्ण और महादेव के सिद्धांतों के बीच का सेतु दिखाया है। कृष्ण ने विवेक दिया कि हम राज्य को कैसे चलाएं, और शिव ने शक्ति दी कि हम स्वयं को कैसे चलाएं।”
ऊषा, वज्र के माथे को चूमती है, “तुम ही हमारा वज्र हो। द्वारका का अंत हो गया, पर धर्म का चक्र नहीं रुका। जाओ, पुत्र। अपने पिता के साथ मिलकर, उस शांत धर्म का नेतृत्व करो।”
वे दोनों नदी तट से वापस मुड़ते हैं। उनके पीछे, सदियों पुराना कुंडेश्वर मंदिर, अनिरुद्ध और ऊषा के प्रेम, और अनागत के ज्ञान का शाश्वत साक्षी बनकर खड़ा है। कलियुग आ चुका है, पर पहाड़ियों में जल रहा धर्म-संकाय का दीप, यह संदेश देता है कि प्रेम और विवेक की शक्ति कभी समाप्त नहीं होगी।
कुंडेश्वर महादेव के प्रांगण में शिवरात्रि की रात अलौकिक ऊर्जा से भरी हुई थी। मंदिर से लेकर दूर नदी के किनारे तक, हज़ारों-हज़ार दीपों की रोशनी में पूरा क्षेत्र जगमगा रहा था। आज रात शिवजी वर दूल्हा बने थे, और उनकी अद्भुत बारात धीरे-धीरे कुंडेश्वर धाम के मुख्य द्वार की ओर बढ़ रही थी, जहाँ उन्हें माता पार्वती से विवाह करना था और फिर इसी स्वयंभू, प्राकृतिक शिवलिंग के रूप में सदैव निवास करना था।
सड़क पर भक्तों का उन्माद चरम पर था। जहाँ-तहाँ ढोल-नगाड़े, मंजीरे और तुर्य रणसिंगे की ध्वनि गूँज रही थी, जिसे डमरू की थाप एक अनोखा, प्राचीन ताल दे रही थी।
नंदी के विशाल रूपधारी भक्त एक ओर भक्ति के आवेश में नाच रहे थे, तो दूसरी ओर भूत-पिशाच के वेश में आए शिवगणों का भयंकर और मनोरंजक नृत्य चल रहा था। यह शिव की बारात थी, जो किसी नियम में नहीं बँधती। हवा में भांग, धतूरे, चंदन और धूप की मिश्रित सुगंध तैर रही थी।
इसी भक्ति के सागर में, तीन परिचित चेहरे भी घुलमिल गए थे। उषा, जो अब अनिरुद्ध के प्रेम में पूरी तरह रंग चुकी थी, वह अपने राजकुमार अनिरुद्ध के साथ बारात का हिस्सा थी। उषा का चेहरा आज दिव्य आनंद से दमक रहा था; उसके लिए यह शिव-पार्वती का विवाह केवल कथा नहीं, बल्कि उसके स्वयं के प्रेम की सफलता का प्रतीक था।
अनिरुद्ध, जो अपनी आकर्षक मुस्कान और शालीनता के लिए जाने जाते थे, वे अपनी प्रियतमा उषा के साथ कदम मिला रहे थे। उनका पुत्र वज्र भी पास ही था, जो अपने बलशाली स्वभाव के विपरीत आज अत्यंत प्रसन्न थे और बारात में आगे बढ़कर नंदी के नर्तकों को उत्साहित कर रहे थे।
उषा ने अनिरुद्ध के कान में फुसफुसाया: "देखो, अनिरुद्ध! आज बाबा शिव वर बने हैं... जैसे मेरे स्वप्न में थे।"
अनिरुद्ध ने प्रेम से उषा का हाथ थाम लिया और कहा: "और तुम? तुम स्वयं गौरी पार्वती से कम नहीं लग रही हो, उषा। मुझे लगता है, यह विवाह हमारे लिए भी मंगलमय होगा।"
वज्र, जो यह सुनकर ज़ोर से हँसा, उसने कहा: "हाँ, हाँ! अब जल्दी चलो, मंडप पास आ रहा है! आज बाबा का विवाह होते ही हम सबका जीवन भी सुखमय हो जाएगा!"
जैसे ही बारात कुंडेश्वर मंदिर के मुख्य द्वार पर पहुँची, बाहर का शोर थम गया। भीतर गर्भ गृह के पास, जहां वह त्रिकोणीय, स्वयंभू शिवलिंग विराजमान था, वहाँ का दृश्य बदल गया। मुख्य पुजारी और अन्य विद्वान ब्राह्मणों ने शिव की आरती आरंभ कर दी थी। सैकड़ों दीपक एक साथ जल उठे, और शिवलिंग पर दूध, जल और बिल्वपत्रों की वर्षा हो रही थी।
संगीत अब मंत्रोच्चार में बदल चुका था। पुजारियों ने मिलकर एक लय में रुद्राष्टकम का पाठ आरंभ किया। यह वही क्षण था जब भक्ति अपने चरम पर पहुंचती है और ब्रह्मांड की सारी ऊर्जा उस पवित्र शिला में समाहित हो जाती है।
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं ।
विभुं व्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपम् ॥
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं ।
चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥
निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं ।
गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ॥
करालं महाकालकालं कृपालं ।
गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ॥
इस शक्तिशाली मंत्रोच्चार के साथ, उषा, अनिरुद्ध और वज्र ने मंदिर की सीढ़ियां चढ़ीं। शिव स्तोत्र की ध्वनि उनके कानों और आत्मा में गूंज रही थी। उन्हें महसूस हुआ, जैसे इस प्राकृतिक शिवलिंग में बैठी शक्ति उन्हें आशीर्वाद दे रही हो। शिव के विवाह का यह महान दृश्य, उनके प्रेम की कहानी का भी सुखद अंत था।
शिव-पार्वती का विवाह संपन्न हुआ, और वर-रूप में शिव कुंडेश्वर के उस प्राकृतिक शिवलिंग में सदा के लिए बस गए। भक्तों का उन्माद अब शांत और गहरी भक्ति में बदल चुका था, और उषा, अनिरुद्ध, और वज्र ने अपने जीवन की नई यात्रा के लिए मौन स्वीकृति और आशीर्वाद प्राप्त किया।
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