अश्वत्थामा सिन्ड्रोम

अश्वत्थामा सिंड्रोम 

 

शापित अमरता 


डॉ. रवीन्द्र पस्तोर 




प्रस्तावना


घाव सूख जाते हैं, घाव, जो दिखते नहीं, सबसे अधिक लहू बहाते हैं, पर कुछ स्मृतियाँ कभी नहीं सूखतीं। पौराणिक गाथाओं के उस चिरंजीवी को, जिसके माथे पर जलता हुआ घाव, एक शाश्वत दंड बन गया था, हमने हमेशा एक मिथक समझा। 


कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुआ, पर उसका सबसे बड़ा दंड आज भी जीवित है। अश्वत्थामा, जिसके माथे पर जलता घाव, उसके प्रतिशोध की असमाप्त कहानी है। यह घाव केवल शरीर का नहीं, बल्कि एक शापित मन का प्रतीक है, जो अतीत की एक भी गलती को माफ़ नहीं कर सकता।


यह उपन्यास, 'अश्वत्थामा सिंड्रोम', बताता है कि यह श्राप केवल महाभारत तक सीमित नहीं रहा। सदियां बीत गई लेकिन अश्वत्थामा की पीड़ा कभी ख़त्म नहीं हुई। वह जंगलों में भटकता रहा अदृश्य, लेकिन हमेशा मौजूद। 


किवदंतियों ने दुनिया के सबसे अंधेरे कोनों में उसकी उपस्थिति की बात की। एक ऐसा व्यक्ति जो ना तो मरा है और न ही जीवित है। हमेशा अपने क्रोध की कीमत चुका रहा है।  


वह योद्धा जिसने प्रतिशोध लेना चाहा, लेकिन जिसे अनन्त पीड़ा मिली। यह कहानी एक चेतावनी है। एक अनुस्मारक कि, शक्तिशाली योद्धा भी तलवार से नहीं बल्कि अपने क्रोध के वजन से गिर सकते है। 


एक खोई हुई आत्मा एक ऐसी दुनिया की तलाश कर रही है जिसने उसका नाम बहुत पहले ही भुला दिया है। श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को एक शाश्वत अस्तित्व में बांध दिया था।


उसका शरीर बूढ़ा हो रहा था लेकिन कभी नष्ट नहीं हुआ। उसका मन पुरानी यादों से बोझिल था। उनके बहते घाव उनके पापों के भार से धड़क रहे थे। और जैसे जैसे सदियां बिताती गई वह घने जगलों, उजाड़ खंडरहो और भारत वर्ष के भूले बिसरे कोनों में भटकता  रहता है। 


फिर भी हवा की फुसफुसाहट और जंगलों की ख़ामोशी में अश्वत्थामा अभी भी हमारे बीच चलता है। उनके पद चिन्ह समय के साथ गूंजते है। 


द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा जो मृत्यु से वंचित, पीड़ा से लिपटा, अनंत काल तक पृथ्वी पर भटकने को अभिशप्त है। उसका श्राप केवल शरीर का नहीं था, बल्कि अस्तित्वगत पीड़ा का था। 


उनके  चारों ओर दुनिया बदल गई। साम्राज्य उठे और गिरे। फिर भी वह बने रहे। अश्वत्थामा ने अपनी यात्रा जारी रखी उस समय की प्रतीक्षा में जब उनका भाग्य बदल सकता है। 


एक ऐसे स्थान की तलाश में जहां उन्हें  शांति मिले। एक ऐसे अवसर की तलाश में जहां उन्हें  श्रीकृष्ण के श्राप से मुक्ति मिले। 


समय के साथ न चल पाने का, अतीत से न छूट पाने का अभिशाप। परंतु, क्या वह श्राप केवल एक व्यक्ति पर लागू हुआ था?


'अश्वत्थामा सिन्ड्रोम' उसी सनातन पीड़ा की आधुनिक व्याख्या है। यह उन लोगों का आख्यान है जो सदियों पहले कुरुक्षेत्र में नहीं, बल्कि इस वर्तमान की भीड़भाड़ वाली सड़कों, शांत कमरों और डिजिटल कोलाहल में जी रहे हैं। 


ये वे लोग हैं, जिनके माथे पर कोई दृश्य घाव नहीं है, पर जिनके भीतर एक ऐसा आत्म-दोष या पश्चाताप धधकता है, जो उन्हें आगे बढ़ने नहीं देता। यह वह सिन्ड्रोम है जहाँ शरीर तो साँस लेता है, पर आत्मा वर्षों पहले की किसी घटना या भूल में बंदी बनी रहती है।


यह उपन्यास हमें उन चेहरों के पीछे छिपी अनश्वर यातना की खोज पर ले जाता है। उन लोगों के पास जो अपनी पुरानी पहचान, अपने पुराने पापों, या अपने अनसुलझे न्याय के भार से इस तरह जकड़े हुए हैं कि उनके लिए हर नया दिन एक नया जन्म नहीं, बल्कि पुराने दुःख की पुनरावृत्ति बन जाता है। 


यहाँ प्रत्येक पात्र अपने स्वयं के 'ब्रह्मास्त्र' के परिणाम भुगत रहा है, और जीवन की हर सुबह उस चिरंजीवी दर्द की गवाही देती है, जो मुक्ति की इच्छा रखता है, पर उसे प्राप्त नहीं कर पाता।


यह कथा आपको केवल इतिहास नहीं सुनाएगी, बल्कि आपको अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करेगी। क्या आप भी किसी ऐसी स्मृति के कैदी हैं, जिसका उपचार केवल समय नहीं, बल्कि साहस माँगता है?


युद्ध समाप्त हो चुका था, पर मन के भीतर की अग्नि शांत नहीं हुई। द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा के माथे पर जलता हुआ घाव केवल रक्त और पीब का नहीं था; वह घृणा, अपमान और प्रतिशोध की अनंत प्यास का प्रतीक बन गया था। 


उसे 'चिरंजीवी' होने का वरदान नहीं, बल्कि अंतहीन मानसिक यातना का श्राप मिला। हर क्षण अपने पापों और अपने शत्रुओं के साये में जीने का दंड।


'अश्वत्थामा सिंड्रोम' किसी बाहरी शत्रु की कहानी नहीं है। यह मानव मन के भीतर छिड़े निरंतर और थका देने वाले द्वंद्व का आख्यान है। 


प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के साथ एक 'अनंत ऋण-पत्र' लेकर आता है, प्रेम, दायित्व और शांति का ऋण। पर जैसे ही वह बड़ा होता है, सांसारिक दौड़ और समस्याओं के बीच उसका मानसिक संतुलन टूट जाता है। 


वह केवल नकारात्मक स्मृतियों को संजोकर रखता है, अपमान, धोखा, और असफलताएं। इन्हीं स्मृतियों के बोझ तले, वह आजीवन कष्ट भोगने को अभिशप्त हो जाता है।


उसके लिए जीवन का उद्देश्य केवल दूसरों से अधिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह करना बन जाता है। वह धन इकट्ठा करता रहा, ऊँचाई छूता रहा, पर इस होड़ में उसने चुपके से अपनी सेहत, आंतरिक शांति, और अपने संबंध गँवा दिए। उसने स्वयं को एक ऐसा 'चिरंजीवी घाव' दे दिया है जो उसे शांत बैठने नहीं देता।


हर मस्तिष्क एक कुरुक्षेत्र है, जहाँ नकारात्मक भावनाओं, अपराधबोध, पछतावा, ईर्ष्या, और प्रतिशोध की सेना, सकारात्मक भावनाओं, शांति, क्षमा, करुणा, और आगे बढ़ने की इच्छा की छोटी-सी टुकड़ी से रोज लड़ती है। अश्वत्थामा का श्राप इसी भीषण आंतरिक संघर्ष का रूपक है।


इस आत्म-विनाशकारी चक्र को स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने और तीव्र कर दिया है। यह ज्ञान, सूचना और तुलना का वह अथाह समुद्र है, जहाँ हर क्षण आपकी खुशी का मूल्यांकन किसी और की सफलताओं के तराजू पर हो रहा है।


और अब, हमारे सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक सत्य बनकर खड़ी है। यह ज्ञान का वह विराट रूप है, जिसका विस्तार और वेग मानव मस्तिष्क की सीमा से परे है। 


यह ठीक वैसा ही है, जब धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना 'विश्वरूप' दिखाया था। अर्जुन उस विशाल और भयावह ज्ञान के बोझ को संभाल नहीं पाया, उसने भयभीत होकर हाथ जोड़कर विनती की थी कि प्रभु, इस रूप को रोक दें!


पर आज, इस 'इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स' के युग में, इस अंतहीन, बहते हुए ज्ञान के प्रवाह को रोकने का कोई उपाय नहीं है। हम सब अर्जुन की तरह ज्ञान के बोझ तले दबे हैं, पर हमारे पास अब कोई कृष्ण नहीं है जो इस विराट रूप को समेट सके।


'अश्वत्थामा सिंड्रोम' उसी आधुनिक मानव की कहानी है, जो प्रतिशोध, संग्रह और ज्ञान के बोझ से शापित है। यह उन लोगों का आख्यान है, जिन्होंने अपनी शांति गँवा दी और अब उन्हें न तो मुक्ति मिल सकती है, न ही विराम।


यह उपन्यास उन लोगों की कथा है, जिनके जीवन में प्रतिशोध एक मनोवैज्ञानिक भ्रम बनकर बैठ गया है। वे जानते हैं कि उन्हें मुक्ति चाहिए, वे माफ़ करना चाहते हैं, पर उनके अवचेतन में अश्वत्थामा का घाव धधकता रहता है। 


यह घाव उन्हें फुसफुसाता है कि दर्द तब तक शांत नहीं होगा जब तक हिसाब बराबर न हो जाए। वे अपने भीतर की शांति की हर कोशिश को खुद ही को जला डालते हैं।


क्या हम सब अनजाने में एक अश्वत्थामा सिंड्रोम से ग्रसित नहीं हैं? हम छोटे-छोटे अपमानों और बड़ी-बड़ी त्रासदियों के बाद अपने दिल में प्रतिशोध को पाले रखते हैं। 


यह एक स्व-विध्वंसक चक्र है। आप बदले की आग में शत्रु को नहीं, बल्कि सबसे पहले अपनी शांति और आनंद को जलाते हैं। हर सुबह एक नई शुरुआत की संभावना लाती है, पर अश्वत्थामा का श्राप, पुरानी नकारात्मकता, हमें अतीत की उसी जेल में बंद रखती है।


यह कथा आपको चुनौती देती है कि आप अपने भीतर उस 'चिरंजीवी घाव' को पहचानें, उस संघर्ष को देखें जो सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच चल रहा है। क्या आप भी उस भ्रम के कैदी हैं जो आपको बदले के रास्ते पर भटकता है?


अश्वत्थामा सिन्ड्रोम, यह सिर्फ एक कहानी नहीं, यह उस सत्य की स्वीकारोक्ति है कि हम सब, कहीं न कहीं, शापित हैं। उस दिन से जब हमने अतीत को जाने देने से इनकार कर दिया था।


इस महागाथा के माध्यम से, अपने स्वयं के मन के उस कुरुक्षेत्र में उतरे, जहाँ हर हार और हर जीत आपकी अपनी है। अश्वत्थामा सिन्ड्रोम: शापित अमरता की इस अनंत यात्रा के साक्षी बनें। 


आइये, उस प्राचीन श्राप के माध्यम से, अपने भीतर छिपे इस आधुनिक सिंड्रोम की गहन जांच करें। क्या आप तैयार हैं, अपने माथे के अदृश्य घाव को देखने के लिए?


डॉ रवीन्द्र पस्तोर 



शिव का वरदान 

अश्वत्थामा नाम तो आपने सुना ही होगा। मैं सब के मन में निवास करता हूँ। मैं हूँ प्रतिशोध लेने की भावना। एक ऐसी भावना जो कलयुग की सबसे पापी आत्माओं में भी सिहरन पैदा कर देती है। मैने इतना भयानक अत्याचार किया था कि मेरे साथ हमेशा खड़ा रहने बाला दुर्योधन भी कांप उठा था। 


भगवान श्री कृष्ण भी मेरे क्रोध से बच नहीं सके। यह एक ऐसी भावना है जो हम से भयंकर से भयंकर काम करने की ताकत रखती है। यह भावना कुछ और नहीं बल्कि अश्वत्थामा सिंड्रोम है, प्रतिशोध लेने की भावना। 


भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे कलयुग के अंत तक भटकने और पीड़ा भोगने का श्राप दिया। श्राप के कारण मेरे घाव सड़ते रहेंगे, और मैं मर भी नहीं पाऊंगा। इसी श्राप के कारण में मानव मन में जीवित हूँ। मेरे सिर पर मणि थी।


मेरे माथे से मणि छीन ली गई और मेरे शरीर से खून और मवाद बहता रहता है। मुझे कोई शांति नहीं मिलेगी और मुझे अकेले ही पृथ्वी पर भटकने का कष्ट सहना है। 

इस श्राप के कारण, मुझे अमरता तो मिली, चिरंजीवी होने की। लेकिन यह शापित अमरता है।


इसी श्राप के कारण जब आप के मन में प्रतिशोध लेने की भावना का जन्म होता है तब मैं ही आता हूँ। प्रतिशोध लेने की भावना के कारण, मन में घाव बन जाते है और सड़ते रहते है और आप प्रतिशोध लेने के लिए भटकने लगते है। आप के मन से शांति की मणि छीन ली जाती है। 


यह शाश्वत श्राप की कथा हर मानव मन में दोहराई जा रही है। मेरा जन्म कोई साधारण जन्म नहीं था। मेरी माता ने शिव से प्रार्थना की थी। एक अतुलनीय योद्धा बनना मेरी किस्मत में था। मेरा जन्म ईश्वर की इच्छाओं का प्रकटीकरण था।  


मैं शिव का अंश हूँ। मैं शिव के उन्नीस अवतारों में से एक हूँ। शिव जो काल के अधिष्ठाता देव है। मृत्यु के स्वामी। संसार को नष्ट करने वाले देव। मैं उन्हीं का अंश द्रोणाचार्य तथा कृपी का पुत्र हूँ।


मेरे पिता द्रोणाचार्य महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे जिनका जन्म एक अनोखे तरीके से एक द्रोण यानी पात्र में हुआ था, इसलिए उनका नाम द्रोण पड़ा था। ऋषि भारद्वाज ने एक दिन अग्नि में आहुति डालते समय जब अप्सरा घृताची को स्नान करते देखा। 


उसे देखकर उन्होंने अपना वीर्य छोड़ा और उसे एक पात्र में रख दिया, और फिर उस पात्र में द्रोण का जन्म हुआ।  मेरे पिता जन्म से ब्राह्मण थे। 


जन्म से ब्राह्मण होने के बावजूद, उनका वेदों के अध्ययन में कभी मन नहीं लगा। इसके विपरीत, वे धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक रुचि रखते थे।  


मेरे पिता, मेरे दादा महर्षि भारद्वाज के आश्रम में ही रहते हुए चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये। उस समय उनके साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। 


आश्रम में, राजकुमार द्रुपद और द्रोणाचार्य गहरे मित्र थे। द्रुपद ने मेरे पिता द्रोणाचार्य की कला और विद्या से प्रभावित होकर वादा किया कि 


“जब जब मैं राजा बनूंगा, अपना आधा राज्य तुम्हें दे दूगा। तब तुम मेरे साथ रहना। मेरा राज्य, संपत्ति और सुख सब पर तुम्हारा भी मेरे समान ही अधिकार होगा।”


उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त संपत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप कर रहे थे। मेरे पिता परशुराम के पास पहुंचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। 


इस पर परशुराम बोले, "वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।" 


मेरे पिता यही तो चाहते थे, अतः उन्होंने कहा, "हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा।" 


इस प्रकार मेरे पिता, परशुराम के शिष्य बन कर अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये। उन्होंने परशुराम से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने आग्नेय अस्त्र का प्रयोग भी सीखा था।


शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया। मेरी माता कृपी, कृपाचार्य की बहन थीं। वे ऋषि शरद्वान और अप्सरा जनपदी की पुत्री थीं।


यद्यपि मेरी माता के पिता शरद्वान, ऋषियों के कुल में जन्मे थे, फिर भी उनकी रुचि धनुर्वेद में अधिक थी। कहते है कि वे धनुष-बाण के साथ ही जन्मे थे।


छोटी उम्र से ही एक कुशल धनुर्धर, शरद्वान ने धनुर्विद्या की सभी बारीकियां सीखने के लिए वन में घोर तपस्या की। अपने धनुष-बाण को पास रखकर उन्होंने त्रिमूर्तियों से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तपस्या की।


जैसे-जैसे शरद्वान की तपस्या बढ़ती गई, देवराज इंद्र को संकट का आभास हुआ। उन्होंने शरद्वान को अपने सिंहासन और पद के लिए एक संभावित खतरा माना।


तपस्या भंग करने के लिए, इंद्र ने दिव्य अप्सरा जनपदी को नियुक्त किया। उन्होंने शरद्वान को अनेक तरीकों से लुभाया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 


जनपदी, अंततः वह सफल हुई, लेकिन केवल एक क्षण के लिए, शरद्वान एक क्षण के लिए बेहोश हो गए, लेकिन तुरंत ही उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण पा लिया। 


लेकिन उसी  एक क्षण में उनका वीर्य गिर गया। जब उन्हें ज्ञान हुआ, तो उन्होंने अपना धनुष-बाण वहीं छोड़ दिया और तपस्या करने के लिए जंगल में चले गए।


वीर्य का रिसाव पास ही एक बाण पर हुआ। वह बाण दो भागों में टूट गया और एक नर और एक मादा शिशु का जन्म हुआ।


राजा शांतनु पांडवों और कौरवों के परदादा और भीष्म के पिता, तभी वहां से से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने उन बच्चों को देखा और उन्हें हस्तिनापुर ले आए।


राजा को उन बच्चों पर दया आ गई, इसलिए उनका नाम कृप और कृपी रखा गया। मेरी माता कृपी ने मेरे पिता द्रोणाचार्य से विवाह किया।


उन्हें कोई संतान नहीं हो रही थी। उन्हें एक पराक्रमी पुत्र की अभिलाषा थी। वे दोनों संतान प्राप्ति के लिए  हिमालय, ऋषिकेश में, तमसा नदी के तट पर स्थित तपेश्वर नामक स्वयंभू शिवलिंग के पास जाकर, भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। 


उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। उन्होंने ऐसे पुत्र का वरदान माँगा जिसमें भगवान शिव के समान तेज, ज्ञान और युद्ध कौशल हो, अर्थात जो स्वयं महादेव के अंश के समान हो।


भगवान शिव ने उन्हें 'तथास्तु' कहकर वरदान दिया कि उनका पुत्र उनके गुणों से युक्त होगा। इस वरदान के फलस्वरूप, मेरा जन्म हुआ। 


जन्म के समय मेरे मुख से ‘अश्व’ घोड़े के समान ध्वनि निकली। इसलिए मेरा नाम अश्वत्थामा रखा गया। मेरा नाम संस्कृत शब्द अश्व से लिया गया है। जिसका अर्थ है घोड़ा। जो शक्ति और गति का प्रतिक है। 


जन्म से ही मेरे माथे पर एक दिव्य मणि थी, जो मुझे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता और नाग आदि से 

भयमुक्त रखती थी।


भगवान शिव से प्राप्त उस शक्तिशाली दिव्य मणि ने मुझ को लगभग अजेय और अमर बना दिया था। मैं भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार का अंश हूँ।


द्रोणाचार्य के पुत्र के रूप में ना केवल मुझे असाधारण शक्तियों. का आशीर्वाद प्राप्त था बल्कि मैं दिव्य और नश्वर दुनिया का महत्वपूर्ण खिलाड़ी भी था। 


ऋषि, मुनि, द्रष्टा तथा देवता सभी मेरे भविष्य तथा जन्म के बारे में जानते थे। क्योंकि में एक सामान्य बालक नहीं था। 


मेरे जन्म के समय भविष्यवाणी की गई। मुझे अपने समय के सबसे महान योद्धाओं में से एक बनना था। यहां तक कि मुझे कर्ण और अर्जुन से मुकाबला करना था।


मेरे जीवन कुरु वंश के जीवन से जुड़ा हुआ था। खासकर मेरे पिता का जीवन। उनके शिक्षक के रूप में। एक बच्चे के रूप में मुझे तेज बुद्धि और अपार शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त था। 


लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा मेरा प्रशिक्षण था, जिसने मेरे भाग्य को आकार दिया था।  मेरे पिता धनुष विद्या के महानतम शिक्षक थे। मेरे पिता ने मुझे मल्ल युद्ध, हथियारों, रणनीति, युद्ध विद्या और युद्धों के बारे में शिक्षित और प्रशिक्षित किया था। 


मेरे पिता ने उनके विशाल ज्ञान से तीरंदाजी, तलवारबाजी और दिव्य हथियारों को चलने का ज्ञान दिया था। मेरे जीवन के शुरुआती साल, हथियारों के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास, मंत्रों के जाप और कठोर शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण से पूरित थे। 


शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्य से प्रति बाध्य गुरु द्रोणाचार्य ने मेरे अध्ययन और प्रशिक्षण को एक गहन और व्यापक रूप दिया। उन्होंने मुझे युद्ध विद्या,मल्ल युद्ध, युद्ध और शास्त्रों के बारे में वह सब कुछ सिखाया जो वह जानते थे। 


मैं अपनी शिक्षा में असाधारण था। मैने अपने कई साथियों को बहुत जल्दी ही पीछे छोड़ दिया था। जिनमें शक्तिशाली कौरव राजकुमार भी शामिल थे। 


मैं, जिस क्षण से हथियार रखने के लिए पर्याप्त उम्र का हुआ, मैने हमेशा अद्वितीय कौशल का प्रदर्शन किया। 


मेरे पिता ने युद्ध की तकनीकों के साथ धर्म, धार्मिकता के सिद्धांत, निष्ठा और कर्तव्य के महत्व को भी सिखाया। मेरे प्रशिक्षण में एक महत्वपूर्ण क्षण दिव्य हथियारों के अधिग्रहण का था। 


कई योद्धाओं के विपरीत शारीरिक अभ्यास के साथ-साथ दिव्य अस्त्रों का पवित्र ज्ञान भी सिखाया गया। जो प्रकृति तथा दुनिया से परे, शक्तियों वाले थे। यह हथियार गहन ध्यान और देवताओं की कृपा से प्राप्त हुए थे। 


मैने इन हथियारों को बड़ी सटीकता के साथ स्तेमाल करना सीखा। मैने अपने पिता के मार्गदर्शन में ब्रम्हास्त्र, भगवान ब्रम्हा का हथियार जैसे शक्तिशाली हथियारों को चलने में महारत हासिल की। 


इन हथियारों को लापरवाही से नहीं चलाया जा सकता था। इनके लिए गहन ज्ञान और अपार आत्म संयम की आवश्यकता थी। महर्षि होने के नाते मेरे पिता ऐसे हथियारों की विनाशकारी क्षमता को जानते थे। 


​​इसी कारण उन्होंने मुझे ना केवल उन हथियारों की लौकिक मारक शक्ति बल्कि उनकी पारलौकिक शक्ति को समझने के लिए प्रशिक्षित किया। मैंने अपने पिता से कौरव और पांडवों के साथ प्रशिक्षण लिया।


मैं अकेले 72,000 सैनकों से लड़ने की ताकत रखता था। मेरी शिक्षा, गुरु द्रोणाचार्य के अलावा परशुराम, व्यास, दुर्वासा, भीष्म और कृपाचार्य से मिली थी। मैं चौषट कलाओं और अठारह विद्याओं में माहिर था। 


हालांकि में कौरव राजकुमारों के दल में था पर अर्जुन के साथ मेरा संबंध अनोखा था। अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से श्रेष्ठ प्रशिक्षण लिया था पर अभ्यास के समय में अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करता था। 


हालांकि हम एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे लेकिन हमारे मन में एक दूसरे के लिए एक निश्चित सम्मान था। अर्जुन के लिए मेरी प्रशंसा एक गतिशीलता पैदा करती थी। 


मैं आचार्य का पुत्र होने के कारण सबका प्रिय तथा आदर का पात्र था। जब मेरे पिता ने अर्जुन पर मुझ से अधिक ध्यान देना शुरू किया तब मेरे मन में अर्जुन के प्रति प्रतिशोध की भावना का बीजारोपण दुर्योधन ने किया था। मेरा व्यक्तित्व तथा चरित्र परस्थितियों के हाथों गढ़ा गया था। 

 



प्रतिशोध की प्रतिज्ञा 


जब राजा पृषत की मृत्यु हुई तो द्रुपद पांचाल देश का राजा बन गया। दूसरी तरफ मेरे पिता, महर्षि भारद्वाज, मेरे दादा, के आश्रम में रहकर तपस्या करने लगे। उनका का प्रारंभिक जीवन गरीबी में काट रहा था। 


लेकिन जब मेरे जन्म हुआ तब एक दिन दूसरे ऋषि पुत्रों को देख मैं भी दूध के लिए रोने लगा, लेकिन गाय न होने की वजह से मेरे पिता मेरे लिए लिए दूध का प्रबंध नहीं कर सके। मैं बहुत रो रहा था। 


तब मेरी माँ ने पानी में आटा घोल कर मुझे पिला दिया। मैं उसे दूध समझ कर पी गया। मैंने यह बात जब अपने पिता को बताई तो उन्हें इस बात से बहुत दुख हुआ। 


इस घटना से प्रतिभासम्पन्न आचार्य का जो आत्मबल था वह डगमगा गया। उनकी तटस्थ चेतना डगमगा गई। 


जब मेरे पिता को पता चला कि उनका मित्र द्रुपद राजा बन गया है तो वे बचपन में किए उसके वादे को ध्यान में रखकर उससे मिलने गए। 


पहली बार वह किसी के द्वार पर गये। भीख मांगने के लिए नहीं बल्कि प्रतिदान लेने के लिए गए। उन्होंने द्रुपद की प्राण रक्षा की थी। तब द्रुपद द्वारा दिए गए वचन को याद दिलाने गये थे। 


वहां जाकर मेरे पिता ने द्रुपद से कहा, “मैं तुम्हारे बचपन का मित्र हूं।” 


मेरे पिता के मुख से ये बात सुन राजा द्रुपद ने उनका अपमान किया और कहा, “एक राजा और एक साधारण ब्राह्मण कभी मित्र नहीं हो सकते। राजा की गरीबों से दोस्ती नहीं हो सकती?”


यह कह कर उनके बचपन के मित्र द्रुपद, ने उनका तिरस्कार किया। उन्होंने बड़ी ही चतुराई से तपस्वी पर अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया। 


तब उन्होंने द्रुपद से आधा राज्य भी नहीं मांगा था। उन्होंने केवल एक गाय मांगी थी। वह गरीब बालकों को विद्या दान करते थे। आश्रम में रह कर। 


उनका जीवन इतनी विपन्नता में बीत रहा था कि वह अपने बच्चे को दूध भी दे सकने की स्थिति में नहीं थे। द्रुपद अहंकार के मद में उनका उपहास करने लगे। 


क्रोध से व्याकुल होकर, मेरे पिता  बिना कुछ माँगे लौट आये और भविष्य में ‘प्रतिशोध’, बदला लेने की प्रतिज्ञा की। तब उन्हें निश्चित किया कि वह द्रुपद को सबक सिखा कर दम लेंगे। 


द्रुपद से अपने अपमान का प्रतिशोध लेने की बात सोचते हुए मेरे पिता हस्तिनापुर आ गए। उन्होंने तब आर्यवर्त के सबसे बड़े राज वंश से मित्रता करने के उद्देश्य से अपनी सेवाऐं देने का निश्चय किया। 


हस्तिनापुर आकर वे कुछ दिनों तक गुप्त रूप से, मेरे मामा कृपाचार्य, के घर में रहे। वह भीष्म को पहले से जानते थे। पर वह भीष्म के पास सीधे मिलने जाना नहीं चाहते थे। उन्हें पता था कि भीष्म राजा है और वह विपन्न आचार्य। वह द्रुपद के साथ हुई घटना को भूले नहीं थे। 


एक दिन युधिष्ठिर और अन्य राजकुमार एक मैदान में गेंद से खेल रहे थे। तभी गेंद गहरे कुएं में गिर गई। राजकुमारों ने उस गेंद को निकालने की काफी कोशिश की, लेकिन वह नहीं निकली। 


मेरे पिता, राजकुमारों को गेंद निकालने का असफल प्रयास करते, देख रहे थे। उन्होंने राजकुमारों से कहा,  

“मैं तुम्हारी ये गेंद निकाल देता हूं, तुम मेरे लिए भोजन का प्रबंध कर दो।”


मेरे पिता ने  बाणों की एक श्रृंखला बनाई और एक सिरे से गेंद को छेद कर उसे बाहर निकाल लिया। राजकुमारों ने जब ये देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। 


उन्होंने ये बात जाकर पितामह भीष्म को बताई। सारी बात जानकर भीष्म समझ गए कि जरूर ही वे द्रोणाचार्य ही हैं।


शरद्वान युद्ध विद्या में निपुण थे। वह मेरे नाना थे। पांडवों और उनके चचेरे भाइयों ने पहले उनसे प्रशिक्षण लिया। 


प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, भीष्म एक ऐसे नए गुरु की तलाश में निकल पड़े जो प्रख्यात, अनुशासित और धनुर्विद्या में निपुण हो। द्रोण इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार थे। 


मेरे पिता द्रोणाचार्य तथा भीष्म दोनों ने महर्षि अग्निवेश से धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की थी। वे मेरे पिता के मित्र थे। 


गुरु की खोज पूरी हो चुकी थी और भीष्म ने द्रोणाचार्य से अपना अनुरोध किया। भीष्म को अपने पौत्रों के लिए एक कुशल गुरु मिल गया था।


भीष्म आदरपूर्वक द्रोणाचार्य को हस्तिनापुर लेकर आए और उन्हें कौरवों व पांडवों को शस्त्र विद्या सीखाने की जिम्मेदारी सौंपी।


मेरे पिता ने भीष्म को अपनी यात्रा के बारे में बताया कि द्रौपद ने सिंहासनारूढ़ होने पर उन्हें आर्थिक संरक्षण देने का वचन दिया था। 


लेकिन उनके मित्र ने उनकी निम्न आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा का मजाक उड़ाया। यह भी कहा कि मूर्ख और विद्वान मित्र नहीं हो सकते, इसी प्रकार धनी और निर्धन भी मित्र नहीं हो सकते। 


मेरे पिता प्रतिशोध की अग्नि में जल रहे थे। वे अब ऐसे महान क्षत्रिय शिष्य चाहते थे जो भविष्य में उनकी ओर से युद्ध करें और द्रौपद को धूल चटाएँ।


प्रचुर धन के साथ-साथ भीष्म ने कुरु वंश को भी द्रोणाचार्य के अधीन प्रशिक्षण के लिए भेजा। 


अन्य राज्यों के राजकुमार भी इसमें शामिल हुए, जिसमें वृष्णि, अंधलक और कर्ण भी शामिल थे। कर्ण और अर्जुन ने प्रतिस्पर्धा की।


मुझे मेरे पिता ने  हर तरह शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण बनाया था। मैं अपने पिता का प्रिय पुत्र तथा शिष्य था। 


मेरे पिता ने अपना सारा समय युद्ध कला सीखने और उसे अपने पुत्र और क्षत्रिय शिष्यों को सिखाने में बिताया।मेरे पिता अपना प्रतिशोध लेने पर ज्यादा ध्यान देने लगे। 


उन्होंने राज पुत्रों पर मुझ से अधिक ध्यान देना शुरू किया। क्योंकि उन्हें राज पुत्रों के माध्यम से अपना प्रतिशोध लेना था। 


अब वह मुझे उतना समय नहीं दे पाते थे, जितना पहले देते थे। मैं धीरे-धीरे उनसे दूर होता चला गया। मैं अब दुर्योधन के ज्यादा निकट हो गया। दुर्योधन भी मुझे बहुत महत्व देता था। कहते है न दुश्मन का दुश्मन, दोस्त। 


मेरे पिता, मेरा मन पड़ने में असफल रहे। उन्हें इस बात की अब चिंता नहीं थी कि मुझे क्या चाहिए? अब हमारे घर में किसी वस्तु का अभाव नहीं था। लेकिन पिता पुत्र के मध्य एक अव्यक्त खाई गहरा गई थी।  


उन्होंने जीवन यापन के लिए अपने प्रभावशाली मित्रों और परिचितों का संरक्षण प्राप्त किया। लेकिन जब मेरे पिता ने हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा देना शुरू किया तो धीरे-धीरे अर्जुन उनका प्रिय शिष्य बनता चला गया।


गुरु हमेशा जीवन में जो खुद नहीं कर पाए, वह अपने शिष्यों से करवाने के लिये, शिष्य से अधिक परिश्रम करता है। मेरे पिता भी बहुत परिश्रम करते थे। वह अपना हर ज्ञान, हर एक कौशल में अपने शिष्यों को निपुण बना रहे थे। 


मेरे पिता ने अर्जुन के माध्यम से एक ऐसा शिष्य गढ़ा, जिसके माध्यम से वह अपना प्रतिशोध ले सके। उनके प्रिय शिष्य अर्जुन के मार्ग में जो-जो बाधाएं आई, उनका अपने तरीके से परिमार्जन किया।  


मेरे पिता ब्रह्मास्त्र का प्रयोग जानते थे, जिसके प्रयोग करने की विधि उन्होंने अर्जुन के साथ-साथ मुझे भी सिखाई थी। धीरे[धीरे अर्जुन मेरा प्रतिस्पर्धी बन गया। 


इस कारण मेरे मन में अर्जुन से प्रतिशोध लेने की भावना बलवती होती गई। मैं अपने  पिता की उपेछा सहन नहीं कर सका और मैं दुर्योधन के निकट होता चला गया। 


मित्रता का प्रस्ताव


जब कौरव व पांडवों की शिक्षा पूरी हो गई, तब उन्होंने मेरे पिता से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया। मेरे पिता प्रतिशोध की अग्नि में जल रहे थे। इतने साल बीत जाने पर भी वह द्रुपद का अपमान नहीं भूले थे। 


जिस दिन 105 शिष्यों की शिक्षा पूरी हुई, उसी अंतिम दिन मेरे पिता ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को पकड़ कर लाने की गुरुदक्षिणा मांगी। 


मेरे पिता का द्रुपद से प्रतिशोध लेने का समय आ गया था। उन्होंने अपने शिष्य, जो अब अत्यंत कुशल हो गये थे, को  द्रौपद से युद्ध करने का कार्य सौंपा। 


उन्होंने उनसे कहा, "तुम पांचाल देश के राजा द्रुपद को बंदी बना कर मेरे पास ले आओ। यही मेरी गुरुदक्षिणा है।" 


सभी राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर, रथों पर सवार होकर, पांचाल नगर की ओर चल पड़े। पहले कौरवों ने राजा द्रुपद पर आक्रमण कर उसे बंदी बनाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। 


बाद में पांडवों ने अर्जुन के पराक्रम से पूरे नगर को नष्ट कर दिया और शक्तिशाली द्रुपद को उनके सलाहकारों सहित बंदी बना लिया। राजा द्रुपद को बंदी बना गुरु द्रोणाचार्य के पास लेकर आए। 


अपमानित और धन-दौलत व राज्य से वंचित पांचाल नरेश द्रुपद को द्रोण के समक्ष उपस्थित होना पड़ा। मन में प्रतिशोध की भावना लिए, मेरे  ब्राह्मण पिता ने उनसे कहा, "तुझे याद है, तूने मुझे आधा राज्य देने को कहा था।"


मेरे पिता ने द्रुपद को संबोधित करते हुए कहा "वह अब राजा नहीं रहे, इसलिए अब उनके और द्रुपद के बीच मित्रता संभव है।” 


मेरे पिता ने कहा, “अब द्रुपद, तुम्हारा पूरा राज्य मेरा है।” उन्होंने मित्रता करने का प्रस्ताव रखा और कहा “मैं मित्र हूँ, तुझे तेरा वही वही आधा राज्य लौटा रहा हूँ।”

 

“जिससे अब धन और प्रतिष्ठा दोनों बराबर हो जाएँगे। क्योंकि राजा किसी ऐसे व्यक्ति से मित्रता नहीं करना चाहेगा जो उसके बराबर का न हो।" 


उन्होंने द्रुपद के राज्य को दो भागों में बाँटा आधा स्वयं रखा और आधा द्रुपद को वापस दे दिया। मेरे पिता ने पांचाल का तुच्छ, दक्षिणी भाग, माकंदी, पराजित को दे दिया और उत्तरी भाग, अहिच्छत्र, अपने पास रख लिया। 


उन्होंने द्रुपद को इस आधार पर मुक्त कर दिया कि वह एक तपस्वी थे, न कि ऐसे योद्धा जो दूसरों के प्राण ले ले। 


शारीरिक रूप से द्रौपद मुक्त हो गए, लेकिन भावनात्मक रूप से वे बंधुआ, अपमानित और गुलाम हो गए। इस प्रकार, मेरे पिता ने अपने अपमान का बदला लिया और द्रुपद का गर्व चूर कर दिया।


द्रुपद अपना राज्य और आत्म-सम्मान खो देने से व्याकुल हो गये । वह पराजित हो गये। राजा द्रुपद, एक योद्धा और विद्वान, दोनों ही रूपों में महान थे और उनसे बढ़कर कोई नहीं हो सकता था। 


अपमान का बदला 


मेरे पिता द्वारा अपमानित होने के बाद, राजा द्रुपद ने उनसे प्रतिशोध लेने के लिए घोर तपस्या की और एक ऐसा पुत्र पाने के लिए यज्ञ किया, जो उनके अपमान का बदला ले सके। मेरे पिता का वध कर सके। 


उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। इस यज्ञ से द्रौपदी कन्या और पुत्र धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ।


जब महाभारत का युद्ध तय हुआ तो मेरे पिता तथा मैने युद्ध में सक्रिय भाग लिया और कौरव सेना का साथ दिया। युद्ध की शुरुआत में मेरे पिता एक मुख्य भूमिका में थे । 


कुरुक्षेत्र का युद्ध मैदान लाल आसमान के नीचे अंतहीन रूप से फैला हुआ था। गिरे हुए शरीरों से अटा पड़ा था। उनके शरीर खून से लथपथ नदी में तैर रहे थे। हवा में मौत घुली थी और मरते हुए योद्धाओं की चीखें उजाड़ धरती पर गूंज रही थी। 


अभी भी खड़े योद्धाओं के बीच एक आकृति तूफान की तरह आगे बढ़ रही थी। उसकी आँखें क्रोध से जल रही थी। उसकी तलवार से दुश्मनों का खून टपक रहा था और उसके तीर दुश्मनों के शरीरों से खून के फब्बारे बहा रहे थे। 


वह आकृति मेरी थी। मैने केवल कौरवों के योद्धा के रूप में ही नहीं बल्कि प्रतिशोध की शक्ति के रूप में लड़ाई लड़ी। मैं पहले दिन से ही युद्ध के केंद्र में था। मैं अपने करीबी दोस्त दुर्योधन के बगल में खड़ा था। 


मैंने हर दिन युद्ध की लहार को बदलते देखा था। मेरे लिए युद्ध केवल वफ़ादारी के बारे में नहीं था। यह खुद को साबित करने, अपने हर गिरे हुए साथी का बदला लेने और अपने पिता तथा गुरु द्रोणाचार्य के गौरव को बहाल करने के बारे में था।  


युद्ध के ग्यारहवें दिन जब भीष्म पितामह को अर्जुन ने अपने बाणों की शरशय्या पर लिटा दिया तब दुर्योधन ने कर्ण के कहने पर, मेरे पिता को कौरव सेना का प्रधान सेनापति चुना। मेरे पिता की प्रतिष्ठा सबसे महान योद्धा के रूप में थी। 


लेकिन, युद्ध सबसे महान योद्धाओं पर भी दया नहीं करता। सेनापति बनते ही दुर्योधन और शकुनि  ने मेरे पिता से कहा, “यदि तुम युद्ध में, युधिष्ठिर को बंदी बना लेंगे, तो युद्ध समाप्त हो जाएगा।” 


दूसरे ही दिन युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए, शकुनि और दुर्योधन, अर्जुन को युधिष्ठिर से बहुत दूर भेजने में सफल हो जाते हैं। 


दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन से युद्ध करने के लिए भेजता है। भगदत्त भीम को हराकर अर्जुन के साथ युद्ध करते हैं। 


श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन की रक्षा करते हैं। अर्जुन भगदत्त की आँखों की पट्टी तोड़ देता है, जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है। अर्जुन इस अवस्था में ही उनका वध कर देता है। 


तब अर्जुन समय पर पहुँच कर, युधिष्ठिर को बंदी बनाने से बचा लेते हैं। अर्जुन, दुर्योधन की योजना को पूर्ण नहीं होने देता है। 



चक्रव्यूह


इसी दिन मेरे पिता युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं, जिसे केवल अर्जुन, श्रीकृष्ण एवं अभिमन्यु तोड़ना जानते  थे। परंतु अभिमन्यु चक्रव्यूह से निकलना नहीं जानता था। 


इस कारण युधिष्ठिर ने भीम आदि को अभिमन्यु के साथ भेजा, लेकिन चक्रव्यूह के द्वार पर जयद्रथ, सभी को रोक देता है। केवल अभिमन्यु ही चक्रव्यूह में प्रवेश कर पाता है। वह अकेला ही सभी कौरवों से युद्ध करता है और मारा जाता है। 


पुत्र अभिमन्यु का अन्यायपूर्ण तरीके से वध हुआ देखकर अर्जुन अगले दिन जयद्रथ वध करने की प्रतिज्ञा ले लेता है और ऐसा न कर पाने पर अग्नि समाधि लेने की कह देता है। 


युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन की अग्नि समाधि की बात सुनकर मेरे पिता कौरवों के साथ मिलकर जयद्रथ को बचाने की योजना बनाते हैं। मेरे पिता जयद्रथ को बचाने के लिए, उसे सेना के पिछले भाग में छिपा देते है ।  


लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा किए गए छद्म सूर्यास्त के कारण जयद्रथ बाहर आ जाता है और अर्जुन जयद्रथ का वध कर देता है। इसी दिन मेरे पिता विराट को मार देते हैं। इस तरह उनका प्रतिशोध पूरा हुआ। 


अश्वत्थामा हतो


युद्ध के पंद्रहवें दिन मेरे पिता द्वारा, युद्ध में हो रही पांडव सेना की हानि को देख, श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को मेरे पिता को हराने के लिए भेद का सहारा लेने को कहा और युद्ध में ये बात फैलाने के लिए कहा की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया। 


तब इसको अपने धर्म के विरुद्ध देख कर युधिष्ठिर इस कपट को नकारने की कोशिश करने लगे, तभी एक योजना के तहत भीम ने अवंति राज के एक अश्वत्थामा नामक हाथी का वध किया और युद्ध क्षेत्र में ये बात फैलाने लगा कि अश्वत्थामा मारा गया। 


जब इस बात का मेरे पिता को पता चला तो वो युधिष्ठिर के पास गए और पूछा कि सच में अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है।  तब युधिष्ठिर ने कहा "अश्वत्थामा हतो" इतना सुन कर श्री कृष्ण ने अपना शंख बजाना शुरू किया। 


तब  युधिष्ठिर ने कहना जारी रखा "नरो वा कुञ्जरो" यह शब्द मेरे पिता नहीं सुन सके।  


"अश्वत्थामा हतो" इतना सुन कर मेरे पिता को सदमा लगा और वो अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग कर अपने इकलौते पुत्र की मौत का शोक मनाने हेतु धरती पर बैठ गए। 


युद्ध के इस दिन एक अकल्पनीय घटना घटी। पराक्रमी द्रोणाचार्य का पतन हो गया। छल ने उनके अंत का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। पांडवों को पता था की युद्ध के मैदान में द्रोणाचार्य एक अपराजेय शक्ति थे। 


इसलिए पांडवों ने युद्ध की सबसे पुरानी चाल का इस्तेमाल किया। भावनाओं का हेरफेर। उन्होंने मेरी मृत्यु की झूठी खबर फैला दी। 


जब अपनी अटल सत्य निष्ठा के लिए जाने वाले युधिष्ठिर ने झूठ की पुष्टि की। तो द्रोणाचार्य का दिल टूट गया। शोक से अभिभूत हो हर उन्होंने अपने हथियार रख दिए। और ध्यान में अपनी आँखें बंद करली। तभी द्रोणाचार्य के कट्टर शत्रु द्रोपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने हमला किया।  


पांडव सेना के सेनापति और द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से मेरे पिता द्रोण का वध कर दिया। इस तरह उनका प्रतिशोध पूरा हुआ। जब मुझे अपने पिता की मृत्यु का पता चला, तब मेरी दहाड़ से युद्ध का मैदान कांप उठा। 


मेरा ह्रदय इतना क्रोध से भर गया कि देवताओं ने मेरी ओर देखा। तलवार बांधते ही मेरे हाथ कांपने लगे और मेरी सांस उखाड़ने लगी। मेरे पिता धोखे से मारे गए और चले गए। यह युद्ध नहीं था। यह विश्वासघात था। मेरे मन में घृणा छा गई। 


द्रोणाचार्य की निर्मम हत्या के पश्चात पांडवों की विजय होने लगी। दुर्योधन और भीम में भीषण गदा युद्ध हो रहा था। लेकिन भीम दुर्योधन को मार नहीं पा रहे थे। दुर्योधन एक कुशल योद्धा था। 


लेकिन कृष्ण के छल के कारण भीम ने उसकी जांघ पर गदा चला कर हरा दिया। दुर्योधन की जंघा भी भीमसेन ने मल्लयुद्ध में खंडित कर दी।


दुर्योधन गंभीर रूप से घायल हो हर धरती पर लेटा हुआ था। उसकी सांसें उथली थी। कौरवों का एक समय का शक्तिशाली राजकुमार एक गिरे हुए योद्धा में बदल गया था। उसका शरीर टूट गया था। 


लेकिन उसका मन अभी भी युद्ध की गूंज से भरा हुआ था। जब उसने मेरी जलती हुई निगाहें देखी, तब मुझे पता चल गया कि मेरे दोस्त दुर्योधन का दिल प्रतिशोध की आग से भर गया है। 


दुर्योधन ने मुझ से बहुत धीमी आवाज में कहा,


"अश्वत्थामा, पांडवों ने हम से सब कुछ छीन लिया है। हमारा राज्य, हमारा सम्मान। मेरे भाई, सभी मारे गए और अब हमारे गुरु तुम्हारे पिता की निर्मम हत्या कर दी गई। 


मैं अपने घुटनों के बल अपने मित्र के पास बैठ गया। क्रोध से मेरी मुठ्ठिया भिची हुई थी। अपने राजा दुर्योधन की ऐसी अवस्था देखकर और अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का स्मरण कर, मैं  अधीर हो गया। उस रात जब में दुर्योधन के पास खड़ा था, मैने प्रतिशोध की शपथ ली। 


"मैं अपने पिता की, अपनी आत्मा के अस्तित्व की कसम खाता हूँ, मैं जब तक चैन से नहीं बैठुंगा, जब तक  पांडवों को वैसा कष्ट ना सहना पड़े जैसा हमने सहा है। मैं उनका नाश कर दूंगा, दुर्योधन। उन में से हर एक का नाश कर दूंगा।"


दुर्योधन के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। "तो जाओ मेरे दोस्त, उन्हें सजा दो।"


मेरी प्रतिशोध की शपथ कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अनगिनत योद्धाओं ने हार के रूप में देखी। लेकिन किसी को भी मेरे जितना व्यक्तिगत नुकसान नहीं हुआ था। सम्मान और धर्म में मेरा विश्वास चकनाचूर हो गया था। 


बदला लेने की एक अमिट प्यास ने उसकी जगह ले ली थी। उस दिन मेरा शरीर भय से नहीं बल्कि व्यक्तियों द्वारा किये गये अन्यायों से कांप रहा था।  


दुर्योधन के पराजित होते ही, युद्ध में पाण्डवों की विजय सुनिश्चित हो गई, समस्त पांडव दल विजय की प्रसन्नता में मतवाले हो रहे थे।


महाभारत युद्ध में, अर्जुन के तीरों एवं भीमसेन की गदा से कौरवों का नाश हो गया। मैंने अपने पिता के निर्मम वध का प्रतिशोध लेने के लिए पांडवों पर नारायणास्त्र का प्रयोग किया। लेकिन श्री कृष्ण के कहने पर समस्त पाण्डव सेना ने शस्त्र समर्पित कर दिए। 


नारायणास्त्र का प्रयोग का वार असफल हो गया। क्योंकि श्री कृष्ण जानते थे कि नारायणास्त्र  निशस्त्र लोगों को नहीं मरता है। 


प्रतिशोध की काली रात 


मैने पांडवों के कुल का समूल नाश करने का प्रण लिया था। प्रतिशोध की अग्नि मेरे भीतर ज्वाला बन कर जल रही थी। आधी रात का नरसंहार, जब पांडव शिविर अपनी आसन्न जीत का जश्न मनाते हुए, मौन में लेटा था। 


मैने अपनी योजना को क्रियान्वित किया। प्रतिशोध की तलाश में, मैं अकेला नहीं था। कृतवर्मा और कृपाचार्य के साथ में पांडव शिविर के पास पहुंचा। मेरा मन प्रतिशोध के विचारों से भरा हुआ था। 


लेकिन कोई उस सेना को कैसे हरा सकता है, जिसने पहले ही जीत का दावा कर लिया है। कोई अपराजित को कैसे मार सकता है। 


मेरा जवाब खुली लड़ाई में नहीं बल्कि धोखे और विनाश में था। मैने अटूट भक्ति के साथ मंत्रों का जाप करते हुए भगवन शिव की शक्ति का आवाहन किया। 


मेरी आवाज शांत रात में गूंज उठी। विनाश के देवता से मुझे अपने अंधेरे उद्देश्य को पूरा करने की लिए शक्ति देने के लिये, जैसे मैंने ध्यान लगाया, एक दिव्य उपस्थिति मुझ पर उतर आई। 


पांडव शिविर के बाहर मुझ को भगवान शिव के एक उग्र और डरावने रुद्र रूप का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने  निडर होकर अपनी भक्ति से भगवान शिव को प्रसन्न किया। 


भगवन शिव ने मेरी पीड़ा से द्रवित हो हर मुझे दिव्य शक्ति का आशीर्वाद दिया। मेरी भक्ति से प्रभावित होकर भगवान शिव अपने असली रूप में प्रकट हुए और मुझे एक शक्तिशाली दिव्य तलवार प्रदान की और अपने पूर्ण रूप में मेरे शरीर में प्रवेश कर, मुझे पूरी तरह से अजेय बना दिया। 


उस क्षण में, मैं केवल एक योद्धा ही नहीं बल्कि मृत्यु का अवतार बन गया। नई शक्ति और एक अडिग संकल्प के साथ में पांडव शिविर में घुस गया। 


मैं छुप कर पांडवों के शिविर में पहुँचा और नियमों के विरुद्ध, घोर कालरात्रि में मेरा पहला लक्ष्य द्युष्टद्युम्न था। जिसने मेरे पिता का वध किया था। 


मैं बिना किसी हिचकाहट के सेनापति के तंबू में घुस गया। मैने उसे सोते हुए पाया। मैने उसे एक योद्धा की मृत्यु का सम्मान नहीं दिया। मैने उसका का वध कर दिया। नरसंहार यही ख़त्म नहीं हुआ।


मैं एक तूफान की तरह शिविर में आगे बढ़ा। मैने रस्ते में आने वाले हर योद्धा को काट डाला। घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा का वध किया। 


इसके अतिरिक्त द्रुपद कुमार, शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु का भी वध किया। पांडवों के शेष वीर महारथियों का वध कर डाला और मैंने कुंतीभोज के दस पुत्रों का वध किया। 


इसके बाद में पांडवों के शिविर में गया। वहां सो रहे पांच योद्धाओं को एक-एक कर मार डाला। द्रौपदी के सभी पांच पुत्रों का भी वध कर दिया। उनकी चीखें रात को चीरती रही। लेकिन मेरे दिल मैं कोई दया नहीं थी।


जमीन उन निर्दोष योद्धाओं के खून से लथपथ थी। जिन्हें अंधेरे में मौत, आने की उम्मीद नहीं थी। जब भोर हुई तब पांडव शिविर पहचान में नहीं आ रहा था। 


जहा कभी जीवन था, वहां अब केवल मृत्यु थी। हवा में मृत्यु और खून की गन्ध भरी थी और योद्धाओं के शव टूटी गुड़ियों के समान बिखरे पड़े थे। मैं शवों के बीच खड़ा था। मेरी सांसे भारी थी। 


मेरी आँखें बिना पलक झपकाए सब देख रही थी। मैंने वह कर दिखाया था जिसका संकल्प मैंने लिया था। लेकिन मुझे जो संतुष्टि चाहिए थी, वह नहीं मिली। 


श्रीकृष्ण ने अपनी योग शक्ति से पहले ही भांप लिया था कि उस रात पांडव शिविर में, क्या अराजकता होने वाली थी। 


इसलिए पांडवों और सात्यकि को मेरे प्रतिशोध के विनाशकारी क्रोध से बचाने के लिए, श्रीकृष्ण उन्हें पहले ही शिविर से दूर ले गए थे। पांडवों को जीवित देख मेरे अंदर एक खोखलापन भर गया। 



सुबह का हाहाकार 


कल रात तक पांडवों का जो शिविर गर्व से भरा खड़ा 

था। अब खण्डहर हो गया था। मैने पांडव शिविर में आग लगा दी। और इस सब के बीच मैं निडर खड़ा था। मेरी तलवार से अभी भी पाण्डव पुत्रों का खून टपक रहा था। 


पुत्रों के वध से शोकग्रस्त द्रौपदी विलाप करने लगी। द्रौपदी के विलाप को सुनकर अर्जुन मुझ को विच्छेदित कर डालने को प्रतिज्ञाबद्ध हुआ। 


अर्जुन के क्रोध की कोई सीमा नहीं थी। क्रोध से उसके अगुठें सफ़ेद हो गये।


"तुम खुद को योद्धा कहते हो, अश्वत्थामा।" उसने जलती आँखों से देखते हुए दहाड़ लगाई।


"तुम सोते हुए बच्चों और निहत्थे लोगों पर वार करते हो। यह युद्ध नहीं है, यह कत्लेआम है।" 


लेकिन, मैंने हिम्मत नहीं हारी। मेरी खोखली आँखें अर्जुन से मिली। मैने क्रोध में उससे कहा "और मेरे पिता का क्या हुआ?" मैंने गुस्से से जमीन पर थूका। 


"क्या उनकी मृत्यु उचित थी? क्या तुम ने उन्हें धोखा नहीं दिया? क्या तुम ने उन की आत्मा को तोड़ा? और फिर उन्हें नहीं मार डाला? तुम पाण्डव सम्मान की बात करते हो। लेकिन तुम्हारे पास कोई सम्मान नहीं है।”  


अब अर्जुन के सारथि श्री कृष्ण आगे बड़े। उन्होंने कहा, "तुम ने युद्ध के नियमों को अपवित्र कर दिया अश्वत्थामा। तुम ने अपने ऊपर ऐसा अभिशाप ला दिया है जिसे देवता भी नहीं मिटा सकते।” 


अर्जुन ने, श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर, गाण्डीव धनुष लेकर, मेरा पीछा किया। मुझे कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली, तो मैंने अपने कार्यों की गंभीरता को समझते हुए एक अंतिम हताश चाल चली। 


मैने ब्रह्मास्त्र का आवाहन करते हुए सबसे शक्तिशाली दिव्य हथियार, जो पूरी दुनिया को नष्ट करने में सक्षम था, अर्जुन को लक्षित कर, शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग कर दिया। 


उस अति प्रचण्ड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन ने श्रीकृष्ण से विनती की, “हे जनार्दन! आप ही इस त्रिगुणमयी सृष्टि का सृजन करने वाले परमेश्वर है। सृष्टि के आदि और अंत में आप ही शेष रहते हैं। 


आप ही अपने भक्तजनों की रक्षा के लिये अवतार ग्रहण करते हैं। आप ही ब्रह्मस्वरूप हो रचना करते हैं, आप ही विष्णु स्वरूप हो पालन करते हैं और आप ही रुद्रस्वरूप हो संहार करते हैं। आप ही बताइये कि यह प्रचण्ड अग्नि मेरी ओर किस ओर से आ रही है और इससे मेरी रक्षा कैसे होगी?”


श्रीकृष्ण बोले, “हे अर्जुन! तुम्हारे प्राण घोर संकट में है। इससे रक्षा के लिये तुम्हें भी अपने ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी भी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता।”


श्रीकृष्ण की इस मन्त्रणा को सुनकर महारथी अर्जुन ने भी तत्काल आचमन करके अपना ब्रह्मशिर अस्त्र मेरी ओर लक्षित कर दिया। 


दोनों प्रलयंकारी एवं विनाशकारी ब्रह्मशिर अस्त्र परस्पर भिड़ गये और प्रचण्ड अग्नि उत्पन्न होकर तीनों लोकों को तप्त करने लगी, अग्नि की लपटों से समस्त प्रजा दग्ध होने लगी। 


दो दिव्य हथियारों के आसमान में टकराने से आकाश में अंधेरा छा गया। उनकी ऊर्जा सब कुछ भस्म करने की धमकी दे रही थी। पृथ्वी कांप उठी, और समय भी रुक गया। 


लेकिन अस्त्र सब कुछ विनाश कर पाते, महर्षि वेद व्यास की आवाज युद्ध के मैदान में गरज उठी। "रुको।" "यदि यह हथियार छोड़े गए तो पूरी सृष्टि नष्ट हो जायगी। उन्हें वापिस ले लो या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।"


श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस लौटा कर शांत कर दिया। लेकिन मैं अभी भी क्रोध से अंधा था। मैं ऐसा करने में असमर्थ था। मैं ब्रह्मशिर अस्त्र के चालन से तो अभिज्ञ था, परंतु अस्त्र के निष्क्रमण, लौटा लाने  से अनभिज्ञ था।


इसलिए मैने अपनी प्रतिशोध की अग्नि के गुस्से में, अपने उस अस्त्र की दिशा उत्तरा के गर्भ की ओर बदल दी। मैने अभिमन्यु की विधवा उत्तरा के कोख में पल रहे उनके पुत्र पर ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग किया। 


जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि पाण्डव वंश का अंतिम उत्तराधिकारी जन्म के पहले समाप्त हो जाएगा। इससे अजन्मे उत्तराधिकारी की मृत्यु हो गई। 


लेकिन धर्म के रक्षक श्रीकृष्ण ने इस तरह के अत्याचार की अनुमति नहीं दी। अपनी दिव्य शक्तियों के साथ उन्होंने उत्तरा के अजन्मे बच्चे की रक्षा की। 


कृष्ण भ्रूण को पुनर्जीवित करने का वचन देते हैं और घोषणा करते हैं कि परीक्षित दीर्घायु होंगे। श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति से उत्तरा के मृत शिशु को फिर से जीवित कर दिया। 


अजन्मे भ्रूण को मारने के प्रयास के कारण, मुझे एक ऐसा पापी माना जाता है जिसके नाम से सिहरन होती है। मेरे बढ़ते आंतक को रोकना अब बहुत कठिन था।

 

यह कृत्य देखकर पांडवों को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने क्रोध में झपट कर मुझ को पकड़ कर बांध दिया। 


श्रीकृष्ण बोले “हे अर्जुन! धर्मात्मा, निद्रामग्न, असावधान, मतवाले, पागल, अज्ञानी, रथहीन, स्त्री तथा बालक का वध धर्म अनुसार वर्जित है। इसने धर्म विरुद्ध आचरण किया है, जीवित रहेगा तो पुनः पाप करेगा। अतः तत्काल इसका वध करके इसका विच्छेदित मस्तक द्रौपदी के समक्ष प्रस्तुत कर, अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करो।” 


वास्तव में श्रीकृष्ण यह देखना चाहते थे कि उनकी बातें सुनकर अर्जुन आगे क्या कदम उठाता है। किन्तु श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुनने के पश्चात् भी धीरवान अर्जुन ने मुझे जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के समक्ष उपस्थित किया। 



शापित अमरता 


पशु की तरह बंधे हुए गुरु पुत्र को देखकर, ममतामयी द्रौपदी का कोमल हृदय पिघल गया। उसने मुझ गुरु पुत्र को प्रणाम कर बन्धनमुक्त करने के लिए अर्जुन से कहा, “हे आर्यपुत्र! ये गुरुपुत्र तथा ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण सदा ही पूजनीय होता है और उसका वध पाप है। 


इनके पिता से ही आपने इन अपूर्व शस्त्रास्त्रों का ज्ञानार्जन किया है। पुत्र के रूप में आचार्य द्रोण ही आपके सम्मुख बन्दी रूप में खड़े हैं। इनके वध से इनकी माता कृपी मेरी तरह ही कातर होकर पुत्र शोक में विलाप करेंगी। 


पुत्र से विशेष मोह होने के कारण ही वह द्रोणाचार्य के साथ सती नहीं हुई। कृपी की आत्मा निरन्तर मुझे कोसेगी। इनके वध करने से मेरे मृत पुत्र लौट कर तो नहीं आ सकते! अतः आप इन्हें मुक्त कर दीजिये।”


द्रौपदी के इन न्याय तथा धर्मयुक्त वचनों को सुनकर सभी ने उसकी प्रशंसा की, किन्तु भीम का क्रोध शांत नहीं हुआ। 


इस पर श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन! शास्त्रों के अनुसार पतित ब्राह्मण का वध भी पाप है और आततायी को दण्ड न देना भी पाप है। अतः तुम वही करो जो उचित है।” 


उनकी बात को समझ कर अर्जुन ने अपने खड्ग से मेरे केश विच्छेदित कर डाले। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा “अश्वत्थामा को मृत्यु देने से उसे मुक्ति मिल जाएगी, जबकि उसे मृत्यु से भी बड़ा दंड मिलना चाहिए।” 


इसके बाद भी मेरा क्रोध शांत नहीं हुआ और मैं श्री कृष्ण पर प्रहार करने लगा। ऐसे में श्रीकृष्ण को मुझे रोकना बहुत आवश्यक लगा क्योंकि प्रतिशोध की ज्वाला में जलता, मैं पूरे संसार के विनाश का कारण भी बन सकता था। 


क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ मैं अंधा हो चुका था। श्रीकृष्ण ने मुझे दंड दिया। कृष्ण ने जन्म से प्राप्त दिव्य मणि, मेरे माथे से निकाल ली। 


श्रीकृष्ण ने  मुझे श्राप दिया “तुम अपने पिता की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहे हो, इसलिए मृत्यु का सत्य तुमसे कलियुग के अंत तक दूर ही रहेगा। तुमने ऐसा पाप किया है कि तुम मनुष्यों के बीच रहने के लायक नहीं हो, इसलिए तुम हमेशा भटकते रहोगे। तुम्हारा शरीर लहु और गंध से भरा रहेगा, जिससे तुम्हें अपने पाप याद आएंगे।”


मेरे इस पतित कर्म की सभी ने निंदा की, परन्तु दुर्योधन मृत्यु से पहले मेरे इस कार्य से संतुष्ट और प्रसन्न नहीं हुआ। 


श्रीहीन तो मैं उसी क्षण हो गया था, जब मैंने एक निर्दोष स्त्री और उसके अजन्मे शिशु को मारने की कोशिश की थी। किन्तु केश मुंड जाने और मणि-विच्छेदन से और भी श्रीहीन हो गया और मस्तक झुक गया। 


श्रीकृष्ण ने मुझे अनन्त काल तक पृथ्वी पर दुःखों के दलदल में भटकने का श्राप दिया। मेरा शरीर ऐसे घावों से पीड़ित था जो अब कभी ठीक नहीं होंगे। 


अब मेरी आत्मा अपराध बोध से बोझिल थी, जो कभी मिट नहीं सकती थी। मेरी दिव्य शक्ति, मणि को निकाल दिया। अब में एक योद्धा की छाया के रूप में भटकने के लिए, अभिशप्त था। 


पांडव, द्रौपदी के पास लौट जाते हैं, जबकि मैं व्यास के साथ वन में लुप्त हो जाता हूँ। मेरा एक बार का महान  रूप, एक पीड़ित पथिक में सिमट गया। मैं एक ऐसा व्यक्ति बन गया जो ना तो मरा है और ना जीवित है। 


मैं अब अपने प्रतिशोध की कीमत चुकाने के लिए अभिशप्त हो गया। हर इंसान को ‘अमरत्व’ का वरदान चाहिए, लेकिन जिसे अमरत्व मिलता है, वही बता सकते हैं कि अमर होना वरदान है या श्राप।


चिरंजीवी का मार्ग



रात्रि की वह अंतिम छाया क्षण भर में विलीन हो गई, जैसे द्रोणाचार्य की आत्मा को भी कुरुक्षेत्र के छल से मुक्ति मिल गई हो। पर मुझ अश्वत्थामा के लिए कोई मुक्ति न थी। 


भोर की पहली किरण मेरे  ललाट पर पड़ी, जहां कभी मणि सुशोभित थी और अब भगवान कृष्ण के श्राप का अभिशाप, एक न बुझने वाली ज्वाला बनकर धधक रही थी । 


मेरे  घाव से रिसता हुआ रक्त न केवल मेरे शरीर को, बल्कि आत्मा को भी वर्षों, युगों तक दग्ध करने के लिए नियत था। मैं वह चिरंजीवी था जिस पर जीवन का नहीं, अपितु अथाह पीड़ा का श्राप।


पिता के शब्द मेरे  कानों में गूंज रहे थे: ‘यह कथा केवल एक दुर्ग की नहीं है, पुत्र। यह हमारी नियति का सार है।’


मैंने अपने शरीर को उठाया। कुरुक्षेत्र का दाह अब समाप्त हो चुका था। अब मेरा मार्ग केवल एक था दक्षिण की ओर, उस असीरगढ़ की ओर, जहाँ एक और चिरंजीवी अपनी नियति भोग रहा था। 


मुझे  लगा जैसे उस दुर्ग ने मुझे  पुकारा हो, एक ऐसा स्थान जहाँ इतिहास और किंवदंतियाँ एक ही दुःख की गाथा गाते थे: छल का दुःख।


कई दिनों तक, शोक और पीड़ा से जर्जर, मैने अपनी यात्रा की। मैने दक्कन की ओर मुख किया, उन सतपुड़ा और विंध्याचल की दुर्गम घाटियों को पार किया जहां सभ्यता का शोर नहीं था। 


मेरा हृदय प्रतिशोध से खाली हो चुका था; अब उसमें केवल एक शाश्वत प्रश्न था, “क्या मुझे  उस गुप्तेश्वर महादेव के मंदिर में अपने दुःख का कोई प्रतिरूप मिलेगा? क्या कोई दूसरी शापित आत्मा उस दुर्गम एकांत में मेरे कष्ट को समझेगी?”


पिता की आत्मा विलीन हो गई, पर उनका अंतिम निर्देश मेरे लिए नया मार्ग बन गया, असीरगढ़। माथे पर धधकता घाव, जो कभी मणि का स्थान था, अब असाध्य पीड़ा का केंद्र था। मेरा शरीर विशालकाय था, किन्तु रोग और श्राप ने उसे जर्जर कर दिया था।


मैने  दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। वह यात्रा युगों की थी, जहाँ सभ्यताएँ बनीं और मिटी, पर मैं  चलता रहा  भूखा, प्यासा, और असाध्य रोगों से घिरा हुआ। हर कदम पर मुझे अपने पिता के अपमान, अपनी मूर्खता और अपने शाप का भार महसूस होता था।


आखिरकार, मैने  दूर क्षितिज पर सतपुड़ा की पहाड़ियों की एक अभेद्य दीवार देखी। यह प्राकृतिक दृढ़ता थी, जिसे देख कर क्षणिक शांति मिली। 


बुरहानपुर के पास पहुंचकर, मैं  तलहटी तक पहुँचा।  मैने मोती महल के खंडहरों को पार किया, जो शाहजहाँ की प्रिय बेगम की उपेक्षित समाधि थी  एक और प्रमाण कि संसार में प्रेम और पराक्रम दोनों ही अंततः काल की उपेक्षा का शिकार होते हैं।


मैने दुर्ग पर चढ़ना आरंभ किया। पहला स्तर, मलयगढ़, पर सेना की छावनियों के अवशेष थे। दूसरा स्तर, कमरगढ़, जो बाहरी दीवारों की रक्षा करता था, अब हवाओं की सीटी बजाता एक सन्नाटा था। 


मैं अंततः सतपुड़ा की पहाड़ियों की ऊँची चोटी पर था, जहाँ तीन स्तरों पर दुर्ग की अभेद्य संरचना खड़ी थी, मलयगढ़, कमरगढ़, और सबसे ऊपर असीरगढ़।


मुझे अपने पिता के शब्द याद आए, "छल से टूटा द्वार।" असीरगढ़ की कहानी मेरे अपने जीवन का दर्पण थी।

मैं  दुर्ग के सबसे ऊपरी शिखर पर पहुँचा। जिसे स्वयं असीरगढ़ कहा जाता था।


वहाँ से नर्मदा और ताप्ती की घाटियाँ दिखाई देती थी,  एक ऐसा दृश्य जो किसी भी राजा को इस स्थान पर कब्जा करने के लिए लालायित कर सकता था।


वहाँ खंडहर मस्जिद और पानी के कुंड थे, पर सबसे महत्वपूर्ण था गुप्तेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर। यह मंदिर शाप से बंधे हुए योद्धाओं का अंतिम आश्रय था। और वहाँ, दुर्ग के मध्य में, वह देवस्थान था जिसका  मैने वर्णन किया था  गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर।


असीरगढ़ की छाया


मैं प्रतिशोध को आग में जलता ऐसा योद्धा बन गया कि मेरे साथ हमेशा खड़ा रहने बाला युधिष्ठिर भी कभी-कभी कांप उठता था। कई शताब्दियां बीत गई। लेकिन मेरे प्रतिशोध की ज्वाला आज भी जीवित है। 


आज अचानक मैं आर्यावर्त में विचरण करते हुए, शताब्दियों बाद, जिस स्थान में आ गया हूँ वह है कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि। अभी रात्रि का अन्तिम प्रहर चल रहा है। 


कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध समाप्त हो चुका था। रात्रि के तीसरे प्रहर में, अपने जघन्य पापों, पांडवों के पुत्रों का वध के पश्चात्, गुरु पुत्र अश्वत्थामा, मैं, गहरे अंधकार में डूबे एक टीले पर बैठा था। 


माथे पर घाव, पीड़ा और चिरंजीवी होने का शाप लिए अपने विनाश पर विलाप कर रहा था। मैं शोक और प्रतिशोध में डूबा हुआ, अपने दिवंगत पिता द्रोणाचार्य की आत्मा के छाया-रूप को देख पा रहा हूँ। 


चारों ओर केवल राख और मौन का साम्राज्य। मैं अपने मृत पिता आचार्य द्रोण के पास बैठा था, जिनके शरीर से युद्ध की धूल भी ठीक से नहीं मिटी थी। तभी, नेत्रों के सम्मुख, एक अस्थिर, तेजोमय आकृति प्रकट हुई, मेरे  पूज्य पिता, गुरु द्रोणाचार्य।


पिता की आत्मा एक क्षणिक, धूमिल प्रकाश के रूप में प्रकट हुई, जो मेरे हृदय के गहन दुःख को समझने का प्रयास कर रही थी।


गुरु की आत्मा, जो पुत्र के भविष्य से अवगत थी, शांत थी; जबकि पुत्र का हृदय पश्चाताप और क्रोध की अग्नि में जल रहा था। द्रोण का स्वर अत्यंत धीमा, परन्तु ब्रह्मांड के समान गंभीर था।


द्रोणाचार्य, “पुत्र, अश्वत्थामा... तुम अभी भी उस भूमि पर क्यों बैठे हो जहां छल ने न्याय का वध किया? मेरी दृष्टि अब इस क्षणिक संसार से परे है। मुझे बताओ, इस पराजय के बाद, इस नश्वर जगत में क्या कोई ऐसा दुर्ग है जो अब भी ‘अभेदनीय’ कहलाता है?”


द्रोणाचार्य, "पुत्र, अश्वत्थामा... इस अनश्वर पीड़ा को छोड़, क्यों तेरी दृष्टि उस सुदूर दक्षिण की ओर है? किस दुर्गम शिखर की ओर तू देखता है, जिसका परिचय मुझे आज तक प्राप्त नहीं हुआ? क्या वहां कोई शांति का आश्रय है?


अश्वत्थामा, कंठ में तीव्र वेदना के साथ, "पिताजी, वह शिखर शांति का नहीं, अपितु शक्ति का अंतिम गढ़ है। उसे 'असीरगढ़' कहते हैं, दक्कन का वह द्वार, जो मेरे और इस शापित पृथ्वी के बीच अंतिम विभाजक रेखा है। यदि उत्तर में कोई परास्त होता है, तो वह दक्षिण में इसी दुर्ग से प्रवेश करता है।"


द्रोणाचार्य, "अद्भुत! हमने तो केवल तक्षशिला और इंद्रप्रस्थ की अभेद्यता सुनी थी। क्या वह किला मेरे ज्ञान से भी परे था? मुझे बताओ, इस दुर्ग की स्थापना किसने की? यह किसका राज्य था, जिसने इसे दक्कन की चाबी बना दिया?"


अश्वत्थामा, कंठ अवरुद्ध होते हुए, “पिताश्री, पराजय तो हर उस वस्तु का नाम है जो काल के चक्र में समा जाती है। किन्तु हाँ, दक्षिण की दिशा में एक ऐसा दुर्ग है, जो अपनी अविजेयता के लिए ख्यात है। लोग उसे 'दक्कन की कुंजी' कहते हैं, और उसका नाम है असीरगढ़।”


द्रोणाचार्य, 'दक्कन की कुंजी'? “जिस स्थान पर पहुँचने के लिए एक द्वार को भेदना आवश्यक हो। बताओ, उस दुर्ग का निर्माण किस उद्देश्य से हुआ? क्या वह भी किसी महान राजा का अहंकार था?”


अश्वत्थामा, “नहीं, पिताश्री। वह आरंभ में किसी सम्राट का अहंकार नहीं था। वह तो आशा अहीर नामक एक स्थानीय सरदार की साधारण आवश्यकता थी। अपनी प्रजा और अपने मवेशियों की सुरक्षा के लिए उसने सतपुड़ा की उस ऊँची चोटी को चुना।” 


“वह 'आशा अहीर गढ़' कहलाया, जो आज असीरगढ़ है। वह एक अकेला किला नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर बना हुआ है  सबसे ऊपर असीरगढ़, फिर कमरगढ़, और सबसे नीचे मलयगढ़। इस त्रिस्तरीय सुरक्षा के कारण, उसे बल से जीतना असंभव था।”


द्रोणाचार्य, एक गहरी साँस लेते हुए, जो केवल ध्वनि थी। “असंभव… यह शब्द अब मुझे विडंबना लगता है। यदि वह इतना दृढ़ था, तो क्या उसे किसी ने जीता नहीं? क्या इतिहास ने उसकी अजेयता को नहीं तोड़ा?”


अश्वत्थामा, “जीता गया, पिताश्री। पर केवल छल से। सीधे युद्ध में नहीं। जब फ़ारूक़ी शासक नासिर खान उसे बल से न जीत सका, तो उसने कपट का सहारा लिया।”


मैने किले की अँधेरी कोठरी से देखा था, "यह संसार युद्धों से कम, धोखे से अधिक हारा है। मैंने कौरव-पांडव का छल देखा है, और इस दुर्ग का पहला बड़ा पतन भी एक सरल हृदय के टूटने से हुआ।"


मेरा मन सदियों पीछे लौटता है, उस क्षण पर जब राजा आशा अहीर अपने गढ़ पर खड़े थे। आशा अहीर सरल थे, उन्हें मनुष्यों की क्रूरता का अंदाज़ा नहीं था। पर फ़ारूक़ी शासक नासिर खान के मन में तो इस अभेद्य किले को हथियाने का षड्यंत्र पल रहा था। 


नासिर खान, फ़ारूक़ी वंश का शासक। वह जानता था कि इस विशाल गढ़ को सीधी लड़ाई से जीतना असंभव है। उसने छल का सहारा लिया।


किला अभी शांत है। नीचे मुख्य द्वार पर रोशनी में नासिर खान राजा आशा अहीर के सामने सिर झुकाए खड़ा है। नासिर खान का चेहरा आँसुओं से भीगा है यह केवल अभिनय है।


वह आशा अहीर से मिलने आया।  उसके मुख पर डर और सम्मान का भाव था, जो केवल दिखावा था। उसने मानवता का मुखौटा ओढ़ा।


आकाश की ओर देखते हुए मैने कहना जारी रखा, धीमे, भारी स्वर में,  


"वर्षों हो गए, पर मैं कभी उस रात्रि को नहीं भूल पाया। यही वह क्षण था, जब यह दक्कन का दरवाजा किसी शत्रु की शक्ति से नहीं, बल्कि एक मित्र के छल से टूटा। मैंने कुरुक्षेत्र में भी इतना गहरा अंधकार नहीं देखा था, जितना इस सरल हृदय राजा के विश्वास में है। मेरी आत्मा काँप रही है।"


नासिर खान, नम्रता से, "आशा जी, आपको मैं अपना बड़ा भाई मानता हूँ। मेरे शत्रु मुझ पर आक्रमण करने वाले हैं। मेरी स्त्रियां और बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। यह दुर्ग ही दक्कन में सबसे सुरक्षित है। 


क्या आप मुझे अपने परिवार की महिलाओं को कुछ दिन के लिए यहाँ आश्रय देने का वचन देंगे? मेरे परिवार की महिलाएं खतरे में हैं। क्या आप उन्हें अपने अभेद्य गढ़ में कुछ दिन आश्रय देंगे?"


आशा अहीर, गंभीरता से, " "खान साहब, चिंता न करें। मेरी प्रजा की हर स्त्री, मेरी बेटी है। खान साहब, आपका परिवार मेरा भी है। यह किला हर निर्बल के लिए खुला है। आप पालकियों को अंदर भेजिए। यहाँ किसी की हिम्मत नहीं कि उन्हें छू सके। यह दुर्ग विश्वास पर खड़ा है, भय पर नहीं।"


मुख्य सरदार, आगे आते हुए, राजा से फुसफुसाते हुए,  "महाराज, क्षमा करें। खानदेश के हालात अच्छे नहीं हैं। नासिर खान की गतिविधियों पर संदेह होता है। क्या हम किसी अपरिचित बल को, बिना जांच-पड़ताल के, इतनी आसानी से द्वार खोलने की अनुमति दे दें?"


राजा आशा अहीर, सरदार को रोकते हुए,  "सरदार! यह हमारे अतिथि हैं। आश्रय माँगने वालों पर संदेह करना पाप है। मैं अपने धर्म से नहीं हटूंगा। यदि मैं आज इन स्त्रियों को आश्रय नहीं देता, तो यह असीरगढ़ अपनी महिमा खो देगा। द्वार खोलो!"


सरदार भारी मन से आज्ञा पालन करता है। दूर, बीस से अधिक सजी हुई पालकियों की कतार दिखाई देती है। धीमी बारिश में वे और रहस्यमय लग रही हैं। पालकियों को धीरे-धीरे मुख्य द्वार से अंदर लाया जाता है।


​​मैने दुःख तथा पीड़ा से मुट्ठी भींचते हुए कहा,  "ओह! वह क्षण! मैंने देखा कि द्वार खुल गया। राजा और उनका पुत्र पालकियों का स्वागत कर रहे थे... और फिर..."


अश्वत्थामा, पीड़ा से कराहते हुए,  "नहीं! आशा! रुक जाओ! यह पवित्र स्थान... छल से अपवित्र होने जा रहा है! इन पालकियों में दया नहीं, तलवारें छिपी हैं!"


पालकियाँ भीतर आ जाती हैं। जैसे ही अंतिम पालकी द्वार के भीतर आती है, नासिर खान के चेहरे से याचना का भाव गायब हो जाता है। एक क्रूर, विजयी मुस्कान उभरती है।


नासिर खान, तेज़, कठोर स्वर में, "अब द्वार बंद कर दो! और मेरे वीरों! बाहर निकलो!"


पालकियों के भारी पर्दे गिरते हैं। उनमें से हथियारबंद, पूर्ण-प्रशिक्षित सैनिक फुर्ती से बाहर कूदते हैं। वे तुरंत राजा आशा अहीर के छोटे से दल पर हमला कर देते हैं।


नासिर खान, क्रूरता से हँसते हुए, "स्वागत है, आशा! तुम्हारा यह सत्कार ही तुम्हारे और तुम्हारे वंश के पतन का कारण बना। दक्कन की चाबी अब मेरी है!"


राजा आशा अहीर, धोखे से स्तब्ध, लड़खड़ाते हुए,  "धोखा! यह क्या किया तुमने, खान...?"


नासिर खान, हँसते हुए, क्रूरता से, "मैंने वही किया, जो सत्ता करती है, आशा! यह दक्कन की चाबी इतनी आसानी से नहीं मिल सकती थी। तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारी सबसे बड़ी मूर्खता थी! अब यह आशा अहीर गढ़ नहीं, मेरा फ़ारूक़ी किला होगा!"


मेरी आँखों में क्रोध का रक्त उतर आया। “पालकियों के भीतर स्त्रियां नहीं थी, पिताश्री। उनमें हथियारों से लैस सिपाही छिपे थे। जैसे ही उन्होंने दुर्ग में प्रवेश किया, उन्होंने आशा अहीर और उनके पुत्र की निर्ममता से हत्या कर दी।” 


आशा अहीर ने धीमी श्वास लेते हुए कहा "नासिर, यह घटना किसी को मत बताना, वरना मानवता से लोगों का विश्वास उठ जाएगा। लोग असहाय की मदद नहीं करेंगे।" 


लड़ाई छोटी पर भयंकर होती है। राजा आशा अहीर अपने कुछ वफादारों के साथ मारे जाते हैं। सरदार आखिरी सांस तक लड़ता है, पर विफल रहता है। उस रात किले पर नासिर खान का कब्जा हो जाता है। यह विश्वासघात इतिहास में दर्ज हो गया।


आँखों में शाश्वत दुःख लिए मैने कहा, "समाप्त! एक और कहानी, जिसके अंत में केवल छल और रक्त बचा। यह किला अब न केवल पत्थरों का पहाड़ है, बल्कि एक अमर कलंक भी ढोएगा। आशा अहीर की सरलता इस धरती से चली गई। और मैं... मैं खड़ा हूँ, हर छल को सदियों तक देखने के लिए, बाध्य।"


द्रोणाचार्य, और? “मुझे पता है, वहाँ विश्वासघात हुआ होगा। कपट का विष हर युग में बहता है।”


इस प्रकार, बिना एक तीर चलाए, वह अजेय दुर्ग एक धोखे के कारण गिर गया। यह सिद्ध हुआ कि जिस दृढ़ता पर कोई दुर्ग खड़ा होता है, वही दृढ़ता उसके विनाश का कारण भी बनती है।


निराशा में सिर हिलाते हुए मैने कहा, "विश्वास की हत्या सबसे आसान होती है। और इस किले ने, जो ईंट, पत्थर और चूना से बना था, छल की पहली चोट उसी दिन खाई।"


द्रोणाचार्य, मौन रहकर सोचते हुए। “छल-कपट... ठीक उसी तरह जैसे मुझे शस्त्र छोड़ने पर विवश किया गया था। यह दक्कन का द्वार भी उसी शाश्वत नियम का पालन करता है जो हमारे जीवन पर लागू हुआ। और अंततः, उस पर किसका शासन हुआ?”


'खानदेश'


अश्वत्थामा, "यह दुर्ग उस फारूकी वंश का ध्रुव-तारा था, जिसे मलिक राजा फारूकी ने स्थापित किया। उनकी राजधानी बुरहानपुर थी। इन सुल्तानों ने स्वयं को 'खान' की उपाधि से सुशोभित किया, और इसी कारण यह प्रदेश 'खानदेश' कहलाया। 


आदिल खान द्वितीय जैसे शासकों ने गोंडवाना तक अपना प्रभुत्व फैलाया। मेरे विचरण काल में, यह किला एक ऐसी शक्ति था, जिसका मान मुगल सम्राट को भी रखना पड़ा। कई पीढ़ियां बीती। यह किला इतना अजेय रहा। कोई इसे जीत नहीं पाता था।"


द्रोणाचार्य, "मुगल सम्राट? क्या वह शासक जिसका नाम अकबर है? मैंने सुना है कि वह संपूर्ण आर्यावर्त पर एकछत्र राज स्थापित करना चाहता था। क्या वह इस किले को जीत पाया? मैं इसके सामरिक महत्व को जानता हूँ दक्षिण के अभियानों का आधार-स्थल।"


अश्वत्थामा, "हाँ, पिताजी। उस समय, इस दुर्ग का फ़ारूक़ी वंश का अंतिम शासक राजा था बहादुर शाह फ़ारूक़ी। 


1596 में उसने अकबर की अधीनता मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया, अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। तब कुपित होकर सम्राट अकबर ने 1599 में बुरहानपुर की ओर प्रस्थान किया। 


मुग़ल सम्राट अकबर दक्कन को पूरी तरह जीतना चाहते थे। उन्होंने बुरहानपुर पर कब्जा किया, पर सामने था असीरगढ़ किला, अकबर ने ग्यारह महीने तक असीरगढ़ किले को घेरे रखा। 


द्रोणाचार्य, "तो, क्या उसकी सेना को भी ग्यारह महीने तक बाहर खड़ा रहना पड़ा, जैसा कि मेरे जीवनकाल के दुर्गों के साथ हुआ था?"


ग्यारह महीने की लंबी घेराबंदी के बाद, रात का अंतिम पहर। शिविर में निराशा और थकान छाई है। सतपुड़ा की तलहटी में स्थित मुगल शिविर। सामने ऊंचाई पर असीरगढ़ का अभेद्य किला, अंधेरे में किसी विशालकाय दानव जैसा प्रतीत हो रहा है।


मैं दूर नीचे मुगल सेना के तम्बू देख रहा था, "मैंने अकबर की विशाल सेना को नीचे तम्बू डाले देखा। अकबर हफ्तों, महीनों तक इस दुर्ग को देखता रहा। अकबर भी जानता था कि युद्ध से यह किला नहीं टूटेगा। दीवारों पर चढ़ना असंभव था, और किले में पानी की कमी नहीं थी।"


"फ़ारूक़ी वंश के विश्वासघात से किले पर कब्ज़ा हुए लगभग दो सौ वर्ष बीत चुके थे। अब द्वार पर खड़े थे मुग़ल सम्राट अकबर। उनकी सेना विशाल थी, पर यह दुर्गम किला उनकी तलवार को स्वीकार करने को तैयार न था।"


एक कड़वी हँसी के साथ, "उससे भी अधिक, गुरुवर। शाही सेना ग्यारह महीने तक घेराबंदी करती रही, पर किला अविचलित रहा। उसकी संरचना देखिए यह एक ऊंची पहाड़ी पर बना है, जिसके आगे तीन और किले खड़े हैं।” 


किलेदार बहादुर शाह फ़ारूक़ी जानता था कि किले के पास गंगा-जमुना कुंड और रसद है। जिस में पर्याप्त पानी है। उसने अकबर के अधीन होने से साफ़ इनकार कर दिया था।


"मैंने वह घेराबंदी देखी। सतपुड़ा की पहाड़ियों पर सर्दी, गर्मी और बरसात तीनों ने मुगल सेना को थकाया, पर किले की तीन-स्तरीय दीवारें असीरगढ़, कमरगढ़, मलयगढ़ अटल रहीं। अकबर बेचैन थे। उन्हें दक्कन की कुंजी हर हाल में चाहिए थी, क्योंकि खानदेश को पूरी तरह मुगल साम्राज्य में मिलाना उनकी अंतिम महत्वाकांक्षा थी।"


आक्रमणकारियों के छिपने के लिए कोई जंगल नहीं, और अंदर वर्षों का राशन भरा था। शत्रु को निकट आने से रोकने के लिए इसकी दीवारों पर बड़े-बड़े कढ़ाहे बनाए गए थे, जिनमें 30 मन तेल गरम कर नीचे फेंका जाता था।


“युद्ध हुआ, पर किले की तीन-स्तरीय संरचना असीरगढ़, कमरगढ़, मलयगढ़ और पानी के पर्याप्त स्रोतों जैसे गंगा-जमुना कुंड के कारण, मुगल सेना हार मानने लगी।”


अकबर के शिविर में निराशा थी। अकबर अपने सलाहकारों से बात कर रहे थे। उनका चेहरा थका हुआ था, पर उनकी आँखें लक्ष्य पर टिकी थीं।


अकबर, क्रोध और निराशा के बीच, "यह कैसा गढ़ है? इसे तलवार से जीतना असंभव है, और समय मेरे पास नहीं है। मेरी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है! यदि मैं इसे जीते बिना लौटा, तो दक्कन में मेरी सर्वोच्चता कौन मानेगा?"


अकबर अपने सेनापति से बात कर रहे थे। 


सेनापति, सिर झुकाकर, "जहाँपनाह, सीधी तलवार इसे नहीं काट पाएगी। हमें बल नहीं, बुद्धि का प्रयोग करना होगा।"


मुग़ल शिविर में, अकबर अपनी मशाल की रोशनी में नक्शे देख रहे थे। मीर बख्शी उनके पास बैठे हैं, सिर झुकाए हुए।


मीर बख्शी, निराश, "जहाँपनाह! ग्यारह महीने बीत गए। हमारी सेनाएं थक चुकी हैं। किले के भीतर पानी के स्रोत आज भी भरे हैं, और रसद की कमी का कोई संकेत नहीं है। बहादुर शाह का मनोबल अटूट है।"


अकबर,चिंता में, "इतना लंबा समय बीत गया, सेना थक चुकी है। यह किला तो पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि लोहे का दरवाजा है। इसे कैसे खोलें?"


अकबर, नक्शे पर उंगली फेरते हुए, चिंतित, “मैंने हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े गढ़ जीते हैं, पर इस दक्कन के द्वार ने मेरी प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। दुनिया क्या कहेगी? मुगल सेना हार मानकर लौटी?"


मीर बख्शी, विनम्र पर स्पष्ट, "जहाँपनाह, हमें अब सीधी लड़ाई छोड़कर कूटनीति का सहारा लेना होगा। बहादुर शाह जितना वीर है, उतना ही लालची भी। वह जानता है कि वह हार नहीं सकता, इसलिए वह अब मोल-भाव करेगा। उसकी हिम्मत को नहीं, उसके लालच को तोड़ना पड़ेगा।"


अकबर उठकर टहलने लगते हैं। उनकी आँखों में नैतिक संघर्ष स्पष्ट है।


अकबर, स्वयं से, "मैंने कभी तलवार के अलावा किसी और चीज़ से विजय नहीं खरीदी। पर अब... क्या मैं अपने सिद्धांत छोड़ दूँ? क्या अपनी विजय को कलंकित करूँ? पर दक्कन का मार्ग... यह जीत अनिवार्य है।"


अकबर दृढ़ता से मुड़ते हैं। उनके स्वर में महान सम्राट की निर्णायक क्षमता झलकती है।


अकबर, मीर बख्शी से, धीमी पर दृढ़ आवाज़ में, "ठीक है। तलवार ने काम नहीं किया। अब सोना काम करेगा। बहादुर शाह को संदेश भेजो। कहो कि मैं उसे सुरक्षित बातचीत के लिए बुला रहा हूँ, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करो कि उसके रक्षकों को खजाना दिखाया जाए।"


मीर बख्शी, आँखें चमकाते हुए, "आप ठीक कह रहे हैं, जहाँपनाह! यह चाबी लोहे की नहीं, स्वर्ण की होगी। लालच की आग इस अभेद्य किले को भीतर से खा जाएगी।"


सोने की चाबी 


उसी क्षण, किले की छत पर, मैं नीचे के दृश्यों को देखता हूँ। मेरे मन तथा चेहरे पर गहन दुःख और वैराग्य का भाव है।


"और यहीं, महान सम्राट ने वह रास्ता चुना जिसे उन्होंने स्वयं सदा नकारा था, छल का रास्ता।"


अकबर ने एक विस्तृत चाल चली। ठोस निर्णय लेते हुए, "किलेदार बहादुर शाह को संदेश भेजो कि मैं शांति वार्ता के लिए उसे सुरक्षित मार्ग देता हूँ। उसे कहो कि वह सम्मान सहित आत्मसमर्पण कर दे। और साथ ही, किले के भीतर गुप्त दूत भेजो।"


मैं पीड़ा से भर गया,  “महान सम्राट भी इसी मार्ग पर आ गए। छल! यह इतिहास की सबसे पुरानी और सबसे खतरनाक बीमारी है। फ़ारूक़ी ने आशा अहीर के विश्वास को तोड़ा था, और अब सम्राट अकबर बहादुर शाह को लालच से तोड़ रहा है।"


अकबर,एक गहरी साँस लेकर, "ठीक है। अब इस दक्कन का दरवाजा सोने की चाबी से खोला जाएगा।"


द्रोणाचार्य, "तो फिर, ऐसी दुर्भेद्य दीवार कैसे टूटी?"


अश्वत्थामा, आँखों में गहरी निराशा, "लोहे और बारूद से नहीं, पिताजी। कहा जाता है कि उसे 'सोने की चाबी' से खोला गया था। जहाँ बल विफल हुआ, वहां छल ने विजय प्राप्त की। यह मेरे भाग्य के समान ही है शक्ति जहाँ विफल होती है, वहाँ कूटनीति या प्रलोभन अंतिम द्वार खोलता है। अकबर ने इस 'दक्षिण की कुंजी' को इसी तरह प्राप्त किया।"


अकबर ने सोने की चाबी का उपयोग किया। उसने किले के भीतर बचे रक्षकों को धन और जागीर का लालच दिया।


अश्वत्थामा, गुस्से और व्यथा से, "वह दरवाजा, जो सदियों तक किसी तलवार से नहीं टूटा, अंततः सोने के खनकने से टूट गया।


अगले दिन, बहादुर शाह किले से नीचे आने का निर्णय लेता है। वह आश्वस्त है, क्योंकि अकबर ने 'सुरक्षा' का वादा किया है। अकबर के गुप्त दूतों ने किले के भीतर प्रवेश किया। उनका हथियार तलवार नहीं, बल्कि स्वर्ण था। किले के भीतर, गुप्त दूत रक्षकों को बड़ी मात्रा में सोने और जागीर का लालच देते हैं। 


निराशा और हताशा का भाव मुझे गहन अंधकार में ले गया। 


"पहले आशा अहीर का विश्वास टूटा था, अब बहादुर शाह का लालच टूटा। वह बातचीत के लिए नीचे आया और अकबर ने उसे धोखे से किलेदार को बंदी बनाया। भीतर, सोने की चाबी ने दरवाज़ा खोल दिया था।"


"रक्षकों ने सोने के आगे अपने राजा और अपनी शपथ को त्याग दिया। वे भूल गए कि यह गढ़ उनकी ढाल था, न कि उनकी तिजोरी। लालच ने उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी। घूस और षड्यंत्र से किलेदार को छलपूर्वक पराजित किया।"


दुर्ग की दीवारों से मैने देखा पिता जी,  "विजय हुई! पर यह विजय नहीं, नैतिक पतन है। यह जीत बताती है कि इस संसार में कुछ भी अजेय नहीं है, क्योंकि हर इंसान की  एक कीमत होती है। यह दुर्ग दक्कन का दरवाजा सदा के लिए खुल गया... पर अपने सम्मान को खोकर।"


असीरगढ़ के द्वार पूरी तरह खुल जाते हैं। अकबर विजयी होकर किले के मुख्य भवन में प्रवेश करते हैं।


 व्यथित अश्वत्थामा,  "यह जीत अकबर के अंतिम महान अभियान की विजय थी, पर यह उनकी नैतिकता पर एक काला धब्बा भी था। उन्होंने दक्कन का दरवाजा खोल दिया था, पर छल को सम्राट की नीति में स्थान दे दिया था। मैंने उस दिन इतिहास को फिर से दोहराते देखा।"


इतिहास बताता है कि अकबर ने बहादुर शाह को धोखे से बुलाया और बंदी बना लिया। रिश्वत और छल से अकबर ने 17 जनवरी, 1601 में इस दुर्गम किले पर विजय प्राप्त की।


“यह अकबर के जीवन का अंतिम महत्वपूर्ण अभियान था। विजय का यह तरीका अकबर के महान चरित्र पर एक धब्बा बनकर रह गया। पर मेरे लिए, यह केवल मानव लालच की एक और दुखद पुनरावृत्ति थी।”


उसके बाद मुगलों का आधिपत्य हुआ। चाहे आशा अहीर का विश्वास हो या बहादुर शाह फ़ारूक़ी का लालच, इस किले के द्वार हमेशा धोखे से ही खुले।


गुप्तेश्वर महादेव 


द्रोणाचार्य, “अश्वत्थामा, क्या उस दुर्ग के शिखरों पर आज भी कोई ऐसी पवित्रता शेष है जो इस छल-कपट की कथा से परे हो? कोई देवस्थान?”


मैने अपने असीरगढ़ में बिताये दिनों की याद करते हुए कहा, “हाँ, पिताश्री। उस सबसे ऊपरी परकोटे असीरगढ़  पर एक गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। वहाँ खंडहर मस्जिद भी है, और पानी के लिए कुंड भी।”


उस मंदिर से एक किंवदंती जुड़ी है। स्थानीय लोग कहते हैं कि वह चिरंजीवी, जिसे भगवान कृष्ण ने भटकने का श्राप दिया था... वह आज भी हर प्रभात में वहाँ शिव की पूजा करने आता है। एक शाश्वत श्राप से बंधा हुआ योद्धा... वह आज भी उस अजेय दुर्ग में अपना दुख भोग रहा है


द्रोणाचार्य, छाया-स्वर में विलीन होते हुए, “शाश्वत श्राप... अजेयता का मिथक... और छल से टूटे द्वार... यह कथा केवल एक दुर्ग की नहीं है, पुत्र। यह हमारी नियति का सार है।”


द्रोणाचार्य, शांत होते हुए, जैसे भविष्य देख रहे हों, "पुत्र, हर महान युद्ध के बाद, एक और युद्ध आरंभ होता है। याद रखना, तू उस क्षेत्र से अछूता नहीं रहेगा।


जब मुगलों का पतन होगा, तो मराठा शक्ति यहाँ से गुजरेगी, और उसके बाद ब्रिटिश। यह भूमि संघर्ष का केंद्र बनी रहेगी। क्या तू वहाँ जाएगा?"


माथे पर हाथ फेरते हुए मैने कहा, "मुझे पता नहीं, गुरुवर। शापित व्यक्ति का कोई ठिकाना नहीं होता। पर, उस किले के भीतर, एक प्राचीन शिव मंदिर है... और उस शिव मंदिर में, शायद मैं अभी भी अपने शापित घावों की दवा खोजता रहूंगा, युगों-युगों तक।"


गहराई से सोचते हुए, "यह शौर्य अद्भुत था टूटे हुए लोगों का एकजुट होकर अपनी पहचान फिर से स्थापित करना। पर मैंने उन्हें भी विलीन होते देखा। मैंने देखा कि कैसे हर उत्थान का अंत पतन में होता है, चाहे वह फारूकी हो, मुग़ल हों, या रेवा गुर्जर। केवल यह दुर्ग, और मेरा शाप, अटल रहा।


 वैसे यह किला बहुत ही पौराणिक है अनेक कथाएं और मान्यताएं इसके इर्द गिर्द घूमती रहती है। पुराने समय से यानी जब गुर्जर प्रतिहार राजवंश का मालवा तक राज्य था तब शायद राजा मिहिरकुल द्वारा यह किला बनाया जाने का इतिहास कही-कही मिलता है। 


गुर्जरात्रा


गुर्जर प्रतिहार राजवंश का पतन होने के बाद, मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण से बचने के लिए, यहां के स्थानिक गुर्जर खुद को गुर्जर की बजाय राजपूत कहने लगे, जो चौहान गोत्र के गुर्जर थे।  


आज भी जब हम आशापुरा या आशा देवी के मंदिर में जाते हैं, तो वहां जो पुजारी हैं, जिनकी उम्र 90 साल के लगभग है, वह बताते है कि असल में हम गुर्जर ही है, लेकिन अब खुद को राजपूत बोलते हुए सादिया हो गयी इसलिए अब हम राजपूत ही हो गए। 


गुर्जरात्रा, नाम इसलिए गुर्जरात्रा पड़ा क्योंकि उस पर गुर्जरों का अखंड साम्राज्य रहा। यानी आज का गुजरात। 


सौराष्ट्र में स्थित सोमनाथ के साथ गुर्जरों का भी पतन हुआ। वहां पर जब मुस्लिम आक्रांताओं ने बर्बरतापूर्वक शासन लागू किया तब गुर्जर लड़ाकों ने खम्भात का रुख किया और कुछ भागकर ताप्ती नदी के किनारे-किनारे महाराष्ट्र में आ गये। 


उन्होंने गुजरात से लेकर जबलपुर और भेड़ाघाट तक अपना साम्राज्य स्थापित किया और ऐसा कहा जाता है कि इसको करने में गुर्जर वीरों को कम से कम 60 साल का समय लगा। मां नर्मदा का एक नाम रेवा है इसलिए यह रेवा गुर्जर कहलाए। 


प्रतिहार के पतन के बाद गुर्जरों ने अपनी सत्ता को नर्मदा नदी के किनारों पर स्थापित किया मुस्लिम आक्रांताओं की वजह से अपनी पहचान छुपाया हुआ और खुद को गुर्जर की बजाय राजपूत कहलाने वाले चौहान गुर्जर रेवा गुर्जरों को आकर मिले और रेवा गुर्जर और चौहान गुर्जर एक बड़ी शक्ति बन गयी।  


इन दोनों ने मिलकर एक साथ असीरगढ़ किले पर आक्रमण किया, कई महीनों तक यह संघर्ष चला आखरी में मुसलमानों को वहाँ से भाग जाना पड़ा और इस तरह असीरगढ़ का किला एक बार फिर गुर्जरों के अधीनस्थ हुआ। 


उसके बाद 100 साल तक गुर्जर इस किले के सम्राट रहे और उन्होंने अपने राज्य की चौड़ाई नर्मदा से लेकर दक्षिण में विंध्याचल तक बढ़ा दी थी। 



बाब-ए-दक्खन

असीरगढ़ का किला बुरहानपुर से 22 किमी और खंडवा से 48 किमी दूरी पर खंडवा-बुरहानपुर रोड पर स्थित है। आधार से इस किले की ऊंचाई 259 मीटर तथा औसत समुद्र तल से 700 मीटर है।  


"दक्षिण का द्वार"  इसे ऐतिहासिक रूप से "दक्षिण की कुंजी" या "बाब-ए-दक्खन" कहा जाता था। इसका सामरिक महत्व बहुत अधिक था।  


यह उत्तर भारत को दक्कन, दक्षिण से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग को नियंत्रित करता था। जिस शासक के पास यह किला होता था, उसके लिए पूरे खानदेश क्षेत्र पर नियंत्रण आसान हो जाता था।


पाटलिपुत्र, मौर्य और गुप्त साम्राज्य की राजधानी था। व्यापारिक मार्ग का यह पूर्वी सिरा था, जो गंगा और सोन नदी के जल मार्गों से जुड़ा था और रेशम, वस्त्र, और विलासिता की वस्तुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र था। 


दूसरा मार्ग पर केंद्र था दिल्ली इंद्रप्रस्थ। मध्यकाल और मुगल काल में यह मार्ग लाहौर, आगरा और बुरहानपुर को जोड़ने वाली शाही सड़क  का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना।


यहां के बाद मथुरा, कुषाण काल में कला, संस्कृति, और व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यह वह बिंदु था जहाँ से उत्तरापथ, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणापथ, दक्षिण के मार्ग अलग होते थे।


इसके बाद दक्षिणापथ पर था ओरछा। यह शहर बाद के मध्यकाल में बुंदेला शासकों की राजधानी बना, जो इस मार्ग पर सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण था।


दक्षिणापथ मार्ग का महत्वपूर्ण नगर था विदिशा। यह प्राचीन काल में चेदि जनपद की राजधानी और मौर्य तथा शुंग काल में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और बौद्ध केंद्र। यह उज्जैन के मार्ग से जुड़ा हुआ था।


दक्षिणापथ का सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक चौराहा था उज्जैन, उज्जयिनी। यह पश्चिमी बंदरगाहों जैसे भृगुकच्छ/भड़ौच को उत्तर भारत से जोड़ता था। जिससे रोम तक व्यापार होता था। यहाँ से वस्त्रों और अन्य वस्तुओं का व्यापक व्यापार होता था। 


असीरगढ़ का किला भौगोलिक रूप से सतपुड़ा पहाड़ी दर्रे पर स्थित है। जो उत्तर भारत से दक्कन में प्रवेश करने का एकमात्र सुरक्षित और सरल मार्ग बुरहानपुर से था।


सल्तनत ने उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम व्यापार मार्गों को नियंत्रित किया। जो गुजरात, मालवा, और दक्कन को जोड़ते थे। बुरहानपुर अपनी सामरिक स्थिति के कारण एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया।


समय के प्रवाह को देखते हुए, मुगलों का भी पतन हुआ। 1601  से 1760  तक उनका कब्ज़ा रहा, फिर मराठा शक्ति यहाँ आई। पर काल के नाटक में अगला और अंतिम पात्र प्रवेश कर चुका था: अंग्रेज।


द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, 1803  ईस्वी में, कंपनी की सेनाओं ने पहली बार असीरगढ़ को चुनौती दी।


अंग्रेज़ों की शक्ति मुग़लों या मराठों जैसी नहीं थी। उनकी सेना अनुशासित और कठोर थी। 1803 में, उन्होंने पहले असीरगढ़ के निचले शहर पेटा पर कब्ज़ा किया। इसके बाद, उन्होंने तोपखाने से किले पर भयंकर गोलीबारी शुरू कर दी।


21 अक्टूबर 1803 को, किले की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। पर यह कब्ज़ा अस्थायी था, और मराठाओं ने इसे जल्द ही वापस पा लिया।


तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत तक, 1899 में, असीरगढ़ भारत का एकमात्र ऐसा किला बचा था जिस पर अंग्रेजों का कब्ज़ा नहीं था। यह किलादार जेसवंत राव लार के अधीन था।


यह किला अपनी अंतिम लड़ाई के लिए तैयार था। जेसवंत राव ने हार मानने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों ने अब कोई छल या कूटनीति नहीं अपनाई। वे जानते थे कि अब केवल कठोर सैन्य बल ही काम आएगा।


एक विशाल ब्रिटिश टुकड़ी ने घेराबंदी की। उन्होंने सबसे पहले पास के शहर पर कब्ज़ा करके उसे अपना सैन्य अड्डा बनाया, और फिर असीरगढ़ पर भयानक तोपखाने से हमला किया।


लगातार गोलाबारी के बाद, 9 अप्रैल 1899 को, अंग्रेजों ने किले पर निर्णायक हमला किया और कब्ज़ा कर लिया। जेसवंत राव लार को हार माननी पड़ी।


असीरगढ़ किले पर कब्जा करने के साथ ही, युद्ध में अंग्रेजों की जीत पूरी हो गई और सभी सैन्य अभियान बंद हो गए।


"मैंने पत्थरों की वर्षा को देखा। तोपों की लगातार गोलीबारी ने सदियों पुरानी दीवारों को हिला दिया। यह युद्ध विश्वासघात या लालच का नहीं था, यह सामरिक श्रेष्ठता का युद्ध था।" मैं अपने आप से सोच रहा था 


"समाप्त। असीरगढ़, दक्कन की कुंजी, अंततः एक विदेशी शक्ति के हाथ चली गई। इस कब्ज़े के साथ ही, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हुआ और भारत में सैन्य अभियानों का एक युग थम गया।"


"आज भी यह किला, खंडहर होकर भी, अपनी कहानी कहता है पहले विश्वास टूटा, फिर लालच बिका, और अंत में कठोर बल जीता। और मैं, अश्वत्थामा, इन सभी नश्वर शासकों के साक्षी के रूप में, यहाँ गुप्तेश्वर महादेव के सामने अपनी अनंत पीड़ा के साथ खड़ा हूँ।"


श्राप का शमन 

मंदिर प्राचीन पत्थरों का एक मौन संग्रह था, जिसके भीतर शिवलिंग अंधकार में स्थित था। यह मंदिर सदियों के युद्ध, विश्वासघात और शासन परिवर्तन का साक्षी था, पर स्वयं अपरिवर्तित। 


मैंने  भीतर प्रवेश किया। मेरे चरण मंदिर की ठंडी भूमि पर पड़े। यह स्थान पवित्र था, फिर भी उसके शाप की छाया हर दीवार पर नाच रही थी। मैंने अपने ललाट पर धधकते घाव पर हाथ रखा।


यह वही स्थान था जहाँ आशा अहीर ने शरण दी थी, और धोखा पाया था। यह वही स्थान था जहाँ अकबर ने छल से विजय प्राप्त की थी। और यह वही स्थान था, जहाँ अब मैं, अश्वत्थामा, चिरकाल के लिए शरण लेने आया था।


मैं, मंदिर की ठंडी दीवार पर हाथ फेरते हुए, महसूस कर रहा था,  "वर्ष 1399 का काल... तब इस दुर्ग का नाम आशा अहीर गढ़ था। यह केवल एक राजा का निवास नहीं था, बल्कि खानदेश के निर्बल लोगों की ढाल था। दक्षिण की ओर जाने वाले हर राहगीर को यहाँ से गुज़रना होता था यही दक्कन का दरवाज़ा था।"


मैं,एक गहरी साँस लेता हूँ। मुझे उस समय की हवा की गंध आज भी महसूस होती है, जिसमें छल की नमी घुली हुई थी।


इतिहास में इसे अस्तक अहीर ने नौवीं शताब्दी में बनवाया, या फिर बाद में आशा अहीर ने, यह अब मायने नहीं रखता। मायने रखता है तो बस यह कि उस अहीर सरदार ने इसे नर्मदा और ताप्ती की घाटियों को जोड़ने वाले दर्रे पर क्यों बनाया था? 


ताकि कोई बाहरी शक्ति, कोई आक्रांता, आसानी से अंदर न आ सके। वह इसकी दुर्भेद्यता पर इतना आश्वस्त था कि उसने अपने द्वार पर कभी संदेह का ताला नहीं लगाया।


मैंने घुटने टेके। मेरे पास देने के लिए न तो फूल थे और न ही जल, केवल मेरे शाश्वत दुःख।


“हे महादेव, मैंने जीवन में जो कुछ भी किया, वह क्रोध और छल का परिणाम था। पर अब मेरी यात्रा सत्य की है उस अजेय दुर्ग के सत्य की, जो केवल छल से टूटा। मेरी नियति यहाँ समाप्त नहीं होती, यह यहाँ से आरंभ होती है।”


मैं जानता था कि मेरा श्राप हर रोज़ सुबह इस शिवलिंग की पूजा करने के लिए विवश करेगा। अब मैं असीरगढ़ का एक नया कैदी था  एक चिरंजीवी कैदी, जिसके लिए अतीत कभी नहीं मरेगा।


सतपुड़ा की जिस ऊँची चोटी पर असीरगढ़ का किला टिका है, वहाँ हवा बहुत शांत बहती है। रात के चौथे पहर, जब दुनिया गहरी नींद में होती है, तो किले के सबसे पुराने हिस्से में, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के भीतर, एक धीमी, भारी आवाज़ गूंजती है। यह आवाज़ मेरी है।


मैं हर दिन यहाँ आता हूँ। वर्षों का श्राप मुझे अनवरत भटकने को विवश करता है, पर शिव के सामने मुझे क्षण भर की शांति मिलती है। शिवलिंग के समक्ष बैठता हूँ और काँपते हाथों से पुष्प अर्पित करता हूँ ।


शिवलिंग से मैं प्रार्थना करता हूँ, "हे महादेव! यह श्राप कितना लंबा है? मैं थकान से चूर हूँ। मेरा माथा क्यों नहीं फटता?"


हवा की हल्की गूँज और पत्थरों की चुप्पी के बीच कोई उत्तर नहीं आता। अश्वत्थामा मंदिर की प्राचीर से नीचे की ओर देखते हैं। दूर, बुरहानपुर और खानदेश का पूरा मैदान फैला है। यह स्थान उत्तर और दक्षिण के बीच का द्वार है।


 स्वयं से, "यह दुर्ग... यह भी मेरी पीड़ा जैसा अटल है। जिसने इसे जीता, उसने भारत को बाँध लिया। यह शक्ति का केंद्र है। मैं यहीं खड़ा रहूँगा, जब तक मेरा पाप क्षमा न हो जाए।"


अश्वत्थामा के नेत्र सूखे हैं, पर आत्मा में अनंत युगों का जल भरा है। वे अमर हैं, इसलिए हर बदलते शासक और हर होते छल को देखने को विवश हैं।


अश्वत्थामा, अपनी भारी, थक चुकी आवाज़ में, "हे महादेव! यह चिरंजीवी होना क्या वरदान है या फिर एक अनंत दण्ड? मैंने युगों को राख होते देखा है, और हर बार यह दुर्ग, ये पहाड़, यह व्यथा वैसी की वैसी खड़ी है।"


मैं अपने माथे पर हाथ फेरता हूँ, जहाँ से सदियों पहले मणि निकल चुकी थी। अब वहाँ केवल दर्द है शरीर का नहीं, काल का।


"काल मुझे छूता तक नहीं। मेरी इच्छा के विरुद्ध, मुझे हर सुबह देखनी पड़ती है। हर नई सुबह, मेरे लिए एक नई पीड़ा लेकर आती है। मैं मुक्ति की कामना करता हूँ, पर मृत्यु मुझे स्वीकार नहीं करती।"


मैं दीवार की ओर बढ़ता हूँ और नीचे विशाल, शांत मैदान की ओर देखते हूँ यह वही दक्कन है, जिसकी चाबी पाने के लिए न जाने कितने युद्ध हुए। उनके स्वर में गहरा वैराग्य और निराशा है।


किले की दीवारों से, "नीचे यह संसार... छल और रक्त से लिखी गई एक कहानी है। पहले आसा अहीर का सरल विश्वास टूटा, फिर अकबर ने सोने की चाबी से यहाँ के किलेदार का लालच खरीदा। 


सब व्यर्थ है! इस द्वार की चाबी लोहे की हो या स्वर्ण की, दक्कन का भाग्य कभी नहीं बदला। केवल शासक बदले, और उस बदलाव को मैंने युगों तक खड़े रहकर देखा है।"


शिवलिंग के सामने वापस आकर, अंतिम प्रार्थना के साथ, "मुझे इस नश्वरता के खेल से अब और जोड़कर मत रखो। अब मुझे न राज्य चाहिए, न सम्मान। यह अजेय गढ़ भी नश्वर है। मेरा हृदय भी इसकी कठोर दीवारों जैसा हो गया है, पर भीतर की टीस बाकी है। बस... मुझे मेरे शून्य में विलीन कर दो, महादेव।"


मौन हो जाता हूँ । मंदिर में शांति छा जाती है। सूर्योदय होने वाला है, और मुझे  फिर अगले दिन तक के लिए इस किले को छोड़कर भटकना होगा अपने श्राप को निभाते हुए।


यह कहानी का वह हिस्सा है जहाँ छल की पराकाष्ठा हुई और सत्ता के लिए विश्वास को रौंदा गया। अश्वत्थामा की आँखों से इस घटना को देखना, मानव स्वभाव की सबसे गहरी निराशा को महसूस करने जैसा है।



मन्दिर का रहस्य 

असीरगढ़ दुर्ग, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर पर समय का चक्र मेरे  रुक चुका था। कुरुक्षेत्र के भयानक दिन और असीरगढ़ में मुझ चिरंजीवी का दिन अब एक ही अथाह, अंतहीन पीड़ा में मिल चुके थे। सदियाँ बीत गयी, या कुछ दिन, मुझे कोई अंतर न मालूम हुआ।

सदियाँ बीत गयी, या केवल रातें मेरे लिए समय का कोई मूल्य नहीं बचा था। अब मैं असीरगढ़ के इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं किंवदंती था। 

समय वह था जब दक्कन का यह द्वार मुग़ल साम्राज्य के अधीन था। अकबर की 'सोने की चाबी' ने किले को जीत लिया था, और अब वहाँ मुग़ल सेना के सिपाही पहरा देते थे। दुर्ग पर अब मुगलों का शासन था, जो 'सोने की चाबी' से इसे जीतने के बाद यहां पहरा देते थे।

गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर मेरा मौन आश्रय था। मेरे पास चढ़ाने के लिए वन के जंगली फूल और अपनी आत्मा का दुःख होता था। मैं पूजा करता। एक ऐसी पूजा जिसमें न भक्ति थी, न कामना, केवल श्राप के नियम का पालन। 

मैं गुप्तेश्वर मंदिर में प्रवेश करता। मेरी विशालकाय, मेरे पैरों के निशान अक्सर किले के पत्थरों पर उभर जाते थे, बिना आहट के आता -जाता था। 

मैं शिवलिंग पर वन के ताज़े फूल और जंगली बेलपत्र चढ़ाता और सूर्योदय से पहले विलुप्त हो जाता। हर सुबह, जब पुजारी मंदिर खोलते, तो उन्हें ताज़े फूल मिलते थे एक रहस्यमय संकेत कि किसी अदृश्य, अभिशप्त प्राणी ने उनसे पहले आकर पूजा की है।

मेरी दिनचर्या एक कठोर व्रत थी। सूर्योदय से पहले, मेरे श्राप की ज्वाला से रिसता हुआ रक्त अपने आप रुक जाता। मैं नर्मदा और ताप्ती की ओर बहने वाली जलधारा से शुद्ध होकर, दुर्ग की उस सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचता।

मेरी पीड़ा का तेज इतना अधिक था कि मंदिर के पुजारी या आस-पास के कोई भी सैनिक मेरी आहट भी नहीं पकड़ पाते थे। मैं अदृश्य, अभिशप्त, और अकेला था।

एक रात्रि, जब आकाश में बादल छाए थे और दुर्ग में घना कोहरा उतर आया था, मैं अपनी पूजा के बाद मंदिर के पीछे शांत खड़ा था। ललाट अब भी धधक रहा था, पर अंधेरे में मैं अदृश्य था। मेरा चिरंजीवी व्रत कठोर था। 

सबसे पहले, मैं ताप्ती नदी या किले के गंगा-जमुना कुंड में स्नान करता, उस शाप के घाव को धोने का व्यर्थ प्रयास करता, जिसके बारे में कृष्ण ने कहा था कि ‘वह कभी नहीं भरेगा।’

तभी, नशे में धुत्त एक युवा मुग़ल सिपाही, जिसका नाम फ़तह खान था, मस्ती में गुनगुनाता हुआ मंदिर के पास आया। उसे 'गंगा-जमुना कुंड' की ओर जाना था। 

फतेह खान ने मंदिर के द्वार पर रुक कर, भयवश, एक बार भीतर झांका। मुझे कुछ अजीब लगा। शिवलिंग के पास ताज़े फूलों की गंध आ रही थी, जबकि इस ऊंचाई पर उन फूलों का उगना असंभव था।

फतेह खान, स्वगत, "खुदा की पनाह! हर सुबह यही कहानी। कोई तो है जो पहरे के बावजूद यहां पूजा करता है। बुजुर्ग कहते हैं कि यह किला शापित है, यहाँ कोई 'जिन' या 'चिरंजीवी हिन्दू पीर' रहता है।"

फ़तह खान ने मदिरा के कारण कुछ हिम्मत बटोरी और ज़ोर से चिल्लाया।

फतेह खान, "ओ! कौन है बे-अदब? मुगल सल्तनत की इजाज़त के बिना इस पवित्र स्थान में कौन घुसता है? निकल बाहर! नहीं तो..."

मैंने धीरे से कदम बढ़ाया। मेरा शरीर अब भी घावों से क्षत-विक्षत था, मेरा तेज़ अदृश्य हो चुका था, लेकिन मेरी उपस्थिति में ब्रह्मांड की सबसे पुरानी पीड़ा का भार था। मैं सिपाही की ओर मुड़ा।

अश्वत्थामा, "तुम किसे बुलाते हो, मूर्ख? इस दुर्ग में अब केवल इतिहास और दुःख रहता है। क्या तुम उनसे लड़ोगे?"

फ़तह खान ने देखा एक विशाल, भयानक आकृति जिसके माथे पर जलता हुआ घाव था, और जिसकी आँखों में युगों का अंधकार समाया था। वह कोई साधारण मनुष्य नहीं था। उसके पैरों में मिट्टी नहीं थी, और उसकी आवाज़ में लोहे की गूँज थी, मानो वह सदियों पुराना हो।

सिपाही के हाथ से मशाल गिर गई। भय ने मदिरा के नशे को क्षणभर में उतार दिया।

फतेह खान, "तू... तू कौन है?"

अश्वत्थामा, "मैं वह हूँ जो हमेशा से था, और हमेशा रहेगा। मैं उस छल का अंतिम परिणाम हूँ जिसने आशा अहीर को मारा, जिसने तुम्हारे बादशाह अकबर को 'सोने की चाबी' का उपयोग करने के लिए मजबूर किया। मैं इस असीरगढ़ का शाश्वत कैदी हूँ।"

सिपाही भय से काँप उठा। यह वही किंवदंती थी जिसके बारे में उसने सुना था। वह बिना एक और शब्द कहे, मुड़कर भागा। उसकी आहट कमरगढ़ की ओर भागते हुए पत्थरों पर दूर तक गूंजती रही।

मैंने उसकी ओर देखा। मैं जानता था कि सिपाही का भय उसकी कथा को और फैलाएगा। लेकिन मुझे अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मेरा जीवन भय फैलाने या सम्मान पाने के लिए नहीं था। मेरा जीवन केवल श्राप  का पालन करने के लिए था।

मैंने एक बार फिर शिवलिंग की ओर देखा। मुगलों का शासन भी छल से आया था। और छल हमेशा टूटता है। सिपाही भाग गया, पर मैं अश्वत्थामा वहीं रहा शाश्वत और अकेला, असीरगढ़ के शापित इतिहास पर पहरा देता हुआ।

पुत्र का प्रश्न

कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में मेरी अंतिम रात थी। मैं शापग्रस्त, माथे पर जलता हुआ घाव लिये, दिवंगत पिता द्रोणाचार्य की आत्मा प्रकाश-रूप को देख रहा था।

कुरुक्षेत्र की रक्तरंजित भूमि पर, हम अपने माथे पर धधकते घाव के साथ बैठे थे। मेरे सामने मेरे  दिवंगत पिता, आचार्य द्रोण की आत्मा, एक शांत, क्षीण प्रकाश-पुंज के रूप में उपस्थित थी। मेरे पास युगों की पीड़ा थी, और मुझे अपने शाश्वत दुःख का मूल जानना था।

अश्वत्थामा, आँखों में जलते हुए अश्रु, "पिताश्री, यह श्राप, यह अग्नि... मैं इसे अनंत काल तक ढोऊंगा। किन्तु मुझे बताइए, मेरे जन्म की कथा क्या थी? क्या मैं सचमुच भगवान शिव के वरदान से जन्मा था, जैसा कि किंवदंतियाँ कहती हैं?"

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर, प्रेम और विषाद से भरा स्वर, "हाँ, पुत्र। तुम महर्षि भारद्वाज के वंशज, मेरी और तुम्हारी माता कृपी की तपस्या का फल थे। कई वर्षों की साधना के बाद, भगवान शिव के आशीर्वाद से तुम्हारा आगमन हुआ। 

तुम्हारे कंठ से जो प्रथम ध्वनि निकली, वह अश्व घोड़े के हिनहिनाने जैसी थी। इसलिए तुम अश्वत्थामा कहलाए एक पवित्र ध्वनि।"

अश्वत्थामा, अपने माथे को छूते हुए "और यह दिव्य मणि? जो अब मुझसे छीन ली गई है... वह क्या थी? वह मुझे भूख, प्यास, रोग और अस्त्र-शस्त्रों से बचाती थी।"

द्रोणाचार्य, "वह मणि केवल मणि नहीं थी, पुत्र। वह मेरे तप की पूर्णता थी। मैंने तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही वह वरदान माँगा था। वह कवच था, जो तुम्हें इस नश्वर संसार के सभी कष्टों से परे रखता था। वह तुम्हें लगभग अजेय बनाती थी... पर नियति ने उसे भी छीन लिया।"

कंठ अवरुद्ध होते हुए, "मुझे वह दिन याद है, पिताजी... जब मैंने अपने मित्रों को दूध पीते देखा था। आप मुझे दूध नहीं दे पाए थे।” हँसी, “जब माता ने मुझे आटे में पानी मिलाकर पिलाया, और मैंने समझा कि वह दूध है... क्या आपकी यह निर्धनता ही आपके दुख का कारण बनी?"

द्रोणाचार्य, स्वर में गहरी वेदना, "नहीं, पुत्र। तुम मेरे दुःख का कारण नहीं, तुम मेरे जीवन का सबसे बड़ा धन थे। उस आटे के पानी को पीकर तुम्हारी खुशी ने मुझे यह एहसास कराया कि मेरे पुत्र को उसका अधिकार नहीं मिल रहा है। वही अपमान, वही टीस मुझे हस्तिनापुर खींच लाई।"

अश्वत्थामा, "और राजा द्रुपद का वह घमंड... जब उसने कहा था कि एक राजा और एक निर्धन ब्राह्मण मित्र नहीं हो सकते?"

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर में क्रोध की एक हल्की-सी गूँज, "द्रुपद ने मेरे मित्रत्व को नहीं, मेरी दरिद्रता को अपमानित किया था। उसी दिन मैंने संकल्प लिया था कि मेरा पुत्र कभी भूखा नहीं रहेगा। 

उसी अपमान की अग्नि ने मुझे गुरु दक्षिणा में द्रुपद का सिर मांगने पर विवश किया। वह प्रतिशोध का बीज था, पुत्र, जो आज इस विनाश के वट वृक्ष के रूप में हमारे सामने खड़ा है।"


श्राप का दंश

कुरुक्षेत्र का युद्धभूमि में मृत्यु की गंध अभी ताजी थीं। शियार, गीदड़ तथा कौऐ दावत उड़ा रहे थे। स्त्रियों का रुदन कानों को चिर रहा था। छोटे बच्चे भूख से विलख रहे थे। 

द्रोणाचार्य की आत्मा ने अश्वत्थामा की ओर देखा, जैसे उन्हें अंतिम सत्य समझाने का प्रयास कर रही हो।

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर, "तुमने मुझसे जन्म की कहानी पूछी। अब मेरी मृत्यु और तुम्हारे श्राप की कहानी सुनो, क्योंकि यही हमारी नियति है।"

मैंने पिता से उत्सुकता से पूछा, "आप युद्ध भूमि में शस्त्र त्याग कर क्यों बैठे? आप अजेय थे! कौन आपको युद्ध से विमुख कर सकता था?"

द्रोणाचार्य, "छल ने। अर्जुन और पांडवों को पराजित करना असंभव था, इसलिए कृष्ण ने छल का सहारा लिया। 

उन्होंने यह घोषणा करवाई कि "अश्वत्थामा मारा गया!" पुत्र, एक क्षण के लिए मुझे विश्वास नहीं हुआ, पर जब युधिष्ठिर, जिसने कभी झूठ नहीं बोला, ने यह कहा, तो मेरा मोह टूट गया। मैंने अपने शस्त्र त्याग दिए और ध्यान में बैठ गया।"

अश्वत्थामा, "और उन्होंने आपको..." बोल नहीं पाया। 

द्रोणाचार्य, "हाँ। धृष्टद्युम्न ने। जिस क्षण मेरा मोह टूटा, मैं संसार से विमुख हो चुका था। वह मेरा अंतिम सत्य था। पर तुम्हारा प्रतिशोध... पुत्र, वह क्रोध था।"

अश्वत्थामा, "मैंने अपने पिता के वध का प्रतिशोध लिया। मैंने पांडवों के सोते हुए पुत्रों को मार डाला! क्या वह गलत था?"

द्रोणाचार्य, "वह क्रोध था, अश्वत्थामा। वह धर्म नहीं था। तुमने सोते हुए निर्दोषों को मारा। तुम्हारा क्रोध वहाँ शांत नहीं हुआ, तुमने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।"

अश्वत्थामा, "मैंने उनका वंश समाप्त करने का प्रयास किया! मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था!"

द्रोणाचार्य, शांत, कठोर स्वर में, "और उसी जघन्य कृत्य ने तुम्हें इस शाश्वत पीड़ा का अधिकारी बनाया। कृष्ण ने उत्तरा के गर्भस्थ शिशु को पुनर्जीवित किया।” 

“उन्होंने तुम्हारी मणि छीन ली वह मणि जो मेरे तप का फल थी। और उन्होंने तुम्हें श्राप दिया असाध्य रोगों से पीड़ित होकर, अनंत काल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का शाप। तुम अब चिरंजीवी हो पर जीवन के नहीं, पीड़ा के।"

अश्वत्थामा, घाव पर हाथ रखते हुए, "तो यही मेरी नियति है। भटकना... कहाँ भटकना है? इस पृथ्वी पर ऐसा कौन-सा स्थान है जो मेरे श्राप के भार को सह सकता है?"

द्रोणाचार्य, स्वर विलीन होते हुए, "उस श्राप की कथा, पुत्र, तुम्हें दक्षिण के असीरगढ़ तक ले गई... जहां छल से विजय प्राप्त हुई, और जहाँ एक और चिरंजीवी अपनी नियति भोगता है। जाओ, और अपनी शाश्वत पूजा का व्रत आरम्भ करो। शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे।"


मोती महल 

अश्वत्थामा, गुप्तेश्वर मंदिर की प्राचीर से दूर नीचे देखते हुए, "यह दुर्ग इतिहास का बोझ ढोता है, पर इसके नीचे बहने वाली पँढार नदी का किनारा एक अलग ही कहानी कहता है प्रेम और उपेक्षा की कहानी।"

मेरी दृष्टि किले की तलहटी में स्थित एक टूटी-फूटी इमारत पर ठहरती है, जिसे स्थानीय लोग मोती महल कहते हैं। यह शाहजहाँ की प्रिय, मोती बेगम का मकबरा है।

अश्वत्थामा, "मैंने यहाँ मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को देखा था। वह केवल विशाल इमारतों का निर्माता नहीं था, बल्कि एक प्रेमी भी था। उसने बुरहानपुर में अपनी प्रिय मुमताज़ महल को खोया था। और उसी ज़मीन पर, उसकी एक और प्रिय मोती बेगम का यह अंतिम विश्राम स्थल बनवाया गया।"

मकबरा आज खस्ताहाल है। छत टूटी है, दीवारों पर काई जम गई है, और चारों ओर घास उग आई है। यहाँ कोई रक्षक नहीं, कोई ध्यान देने वाला नहीं।

अश्वत्थामा, पीड़ा और वैराग्य से भरे, "सम्राट, जिसने प्रेम की निशानी के तौर पर ताजमहल बनवाया, उसी सम्राट की प्रियतमा का यह मकबरा आज लावारिस है। यह कैसी विडंबना है? दुनिया सत्ता और युद्ध को याद रखती है, पर शांत प्रेम की कहानियों को भुला देती है।"

मैं हवा की गूँज में, मोती महल से बात करने की कोशिश करता हूँ।

अश्वत्थामा, मकबरे से, "ओह मोती महल! क्या तुम्हें वह समय याद है, जब तुम यहाँ गौरव से खड़े थे? क्या तुम्हें याद है, जब शाहजहाँ के कदम जहां पड़े होंगे?"

मोती महल, खंडहर की दीवारों से, मौन में, "मुझे केवल उपेक्षा याद है, चिरंजीवी! जो दीवारें कभी प्रेम की ईंटों से बनी थीं, वे अब सरकारी अनदेखी से टूट रही हैं। असीरगढ़ को पर्यटक देखने आते हैं, पर मेरे पास कोई नहीं आता। प्रेम भी क्या इतनी जल्दी ख़त्म हो जाता है?"

अश्वत्थामा, "प्रेम ख़त्म नहीं होता, पर मानव स्मृति ख़त्म हो जाती है। जिस इतिहास को हम अभेद्य मानते हैं, वह भी क्षणभंगुर है। मैंने देखा है, हर शासक केवल अपनी विजय गाता है, अपने प्रेम को नहीं। यहाँ से जाने वाले अधिकारी भी अपनी फाइलों और नियमों में उलझकर, तुम्हें भूल गए।"

मैं अब तक पूरी तरह वैराग्य से भर चुका हूँ। यह अपेक्षित स्मारक मुझे अपनी अमरता का दुःख याद दिलाता है।

अश्वत्थामा, आँखें बंद करके, "यह मकबरा मुझे सिखाता है कि मृत्यु के बाद भी दर्द समाप्त नहीं होता। मोती बेगम का शरीर यहाँ शांत है, पर उनकी आत्मा सरकारी उदासीनता की पीड़ा झेल रही होगी। ताजमहल को मिली महिमा और तुम्हें मिली यह अपेक्षा, यही काल का अंतिम पाठ है।"

"यह असीरगढ़ जो कभी दक्कन की कुंजी था आज एक वीरान गवाह है। एक तरफ़ छल और बल से जीती गई दीवारों के खंडहर हैं। और दूसरी तरफ़ पँढार नदी के किनारे पर, प्रेम का एक उपेक्षित मकबरा। और इन दोनों के बीच खड़ा हूँ मैं, अश्वत्थामा, जो जानता है कि सत्ता से ज़्यादा तेज़ी से स्मृति मिटती है।"

अश्वत्थामा, सुबह की पहली किरण में, किले की पूर्वी प्राचीर पर, "यह किला, जिसे मैंने इतने युगों तक खड़े देखा, केवल एक दुर्भेद्य गढ़ नहीं है; यह सतपुड़ा की कला है। इसकी स्थिति ही इसका पहला रक्षक है।"

अश्वत्थामा नीचे की ओर फैली विशाल घाटियों की ओर इशारा करते हैं।

अश्वत्थामा, "देखो, यह कैसे नर्मदा और ताप्ती नदियों की घाटियों के बीच के सबसे महत्वपूर्ण दर्रे पर स्थित है। भूगोल ने इसे वह सामरिक शक्ति दी कि जो इस चोटी पर बैठा, उसने दक्कन की साँसें थाम लीं। यह किसी मानव का नहीं, बल्कि प्रकृति का बनाया गया दरवाज़ा है।"

सूर्य की किरणें किले की तीन परतों पर पड़ती है, जिससे उनकी संरचना स्पष्ट होती है: मलयगढ़, कमरगढ़, और सबसे ऊपर असीरगढ़।

अश्वत्थामा, "इस किले को तीन स्तरों पर बनाने में दूरदर्शिता थी। हर स्तर दूसरे की रक्षा करता था। यह एक पिरामिड की तरह था, जितना ऊपर जाओ, सुरक्षा उतनी कठिन।"

अश्वत्थामा, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की ओर देखते हुए, फिर जामा मस्जिद की टूटी मीनारों की ओर, "सदियों तक यहां अलग-अलग शासक रहे, और हर किसी ने इस दुर्ग पर अपनी मुहर लगाई। इसलिए इसकी वास्तुकला एक अकेली शैली नहीं है, बल्कि संस्कृतियों का संगम है।"

"देखो, मंदिर के सादे, गहरे पत्थर के सामने खड़ी हैं फ़ारूक़ी और मुग़ल काल की बनी जामा मस्जिद की मीनारें। ये मीनारें इस्लामी, फ़ारसी और भारतीय वास्तुकला के मिश्रण को दर्शाती हैं। यहाँ एक ही परिसर में शिव और अल्लाह का वास रहा। अंग्रेज़ी कब्रें भी यहीं हैं, जो बताती हैं कि यह गढ़ अंततः सभी शक्तियों का अंतिम विश्राम स्थल बना।"

वे किले के अंदर बने गंगा-जमुना कुंड नामक विशाल जल संग्रहों की ओर इशारा करते हैं।

अश्वत्थामा, "और इसकी सबसे बड़ी कलाकारी इसका जल प्रबंधन। इतने ऊँचे पहाड़ पर भी, इसमें पर्याप्त जल स्रोत और विशाल कुंड हैं। इसलिए यह किला महीनों तक घेराबंदी झेल सका। यह स्थापत्य कला की नहीं, बल्कि मानव मेधा की विजय थी।"

अश्वत्थामा, मंदिर की ओर मुड़कर, "आज, असीरगढ़ एक खंडहर है, और इसका वैभव धूल में मिल चुका है। मोती महल की तरह, इसे भी उपेक्षा मिली है। पर इसकी टूटी हुई दीवारें अब भी वही पाठ पढ़ाती हैं कि सत्ता, छल और शौर्य, सब कुछ काल के सामने नश्वर है। असीरगढ़ अब शासकों का द्वार नहीं, बल्कि वैराग्य का एक मौन स्मारक है।"

अश्वत्थामा, जो स्वयं अमर हैं, उस टूटी हुई दीवार के पास खड़े होते हैं, और सूर्य पूरी तरह सतपुड़ा की पहाड़ियों पर निकल आता है।

लेखा-जोखा


असीरगढ़ का सबसे ऊपरी भाग। गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की पुरानी, भीगी हुई दीवारें। आकाश में बादल छाए हैं। मुगलों के कब्ज़े और रेवा गुर्जरों के उत्थान के बीच का शांत कालखंड। 


अश्वत्थामा पूजा समाप्त कर ध्यान में लीन हैं। अश्वत्थामा, शाश्वत दुःख और वैराग्य से भरा हुआ। मंदिर की दीवारों और हवा की गूँज में व्याप्त एक अमूर्त शक्ति।


अश्वत्थामा शिवलिंग के सामने बैठे हैं। उनका ध्यान बाहरी दुनिया से हटकर केवल अपनी अनंत पीड़ा पर केंद्रित है। हवा मंदिर के जीर्ण-शीर्ण स्तंभों से होकर गुज़रती है, एक गहरी, धीमी आवाज़ उत्पन्न करती है यही आवाज़ काल की है।


अश्वत्थामा, शांत, पर भारी स्वर में, "वर्ष और शताब्दी बीत गए, पर मेरी देह को विश्राम नहीं मिला। आशा अहीर का विश्वास धूल बन गया, और अकबर का छल इतिहास में दर्ज़ हुआ। इस दक्कन के द्वार पर अब किसका शासन है? किसकी महत्वाकांक्षा ने इसे फिर खरीदा है?"


काल, हवा की गूँज में, तटस्थ, "हे चिरंजीवी! तुम क्यों पूछते हो? तुम्हारा स्थान इस नश्वर खेल से परे है। अब इस पर मुग़ल,मराठा और फिर अंग्रेजो का कब्ज़ा रहा है। कुछ वर्षों में, यहाँ शक्ति आएगी। नाम बदलते हैं, पर लालच और छल की कहानी वही रहती है।"


अश्वत्थामा, आँखें बंद किए हुए, "और यही मेरा दुख है, काल। मेरी आँखें बंद क्यों नहीं होतीं? क्यों मुझे हर बार वही दृश्य दोहराते देखना पड़ता है? मैंने रेवा गुर्जरों का संघर्ष देखा नर्मदा के किनारे-किनारे बसकर, टूटने के बाद फिर उठना। उनमें एक आशा थी। वह भी क्यों टूट गई?"


काल, दार्शनिक, "संघर्ष नश्वर नहीं होता, वीर! केवल सत्ता नश्वर होती है। रेवा गुर्जरों ने सौ वर्ष तक गौरव से राज किया, अपने शौर्य को अमर किया। पर सत्ता की चाहत अंततः उसे भी खोखला कर देती है। इस दुर्ग की दीवारें सत्य जानती हैं जो उठता है, उसे एक दिन झुकना ही पड़ता है।"


अश्वत्थामा, निराश,  "तो क्या इस दुनिया में स्थायित्व और सत्य जैसी कोई चीज़ है ही नहीं? क्या सब कुछ अस्थिर, क्षणभंगुर और व्यर्थ है? मैं अमर हूँ, पर मेरा मन अस्थिर है।"


काल, शांत, धीमा,  "स्थायित्व केवल दुःख में है, जिसे तुम ढो रहे हो। तुम यहाँ इस मंदिर में आते हो, शिव की पूजा करते हो यही तुम्हारा सत्य है। यह किला, यह दक्कन, यह राजनीति ये सब माया है, जो मेरे बहाव के साथ बदलती रहती हैं। तुम काल के साक्षी हो, तुम्हें बदलने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।"


अश्वत्थामा गहन वैराग्य में डूब जाते हैं। उन्हें अनुभव होता है कि इस दुर्ग की हर ईंट, हर पत्थर, हर टूटी हुई मीनार उन्हें यही पाठ पढ़ा रही है कि 'सत्ता भ्रम है' और 'केवल पीड़ा शाश्वत है'।


अश्वत्थामा, अंततः, स्वीकृति के भाव में, "हाँ। मैं समझ गया। यह असीरगढ़ एक द्वार नहीं, एक आईना है। यह मुझे मेरी ही अमर पीड़ा का प्रतिबिंब दिखाता है। यहाँ की मिट्टी में आशा अहीर का विश्वास, बहादुर शाह का लालच, और गुर्जरों का शौर्य, सब एक हो चुके हैं। और मैं, जो कभी योद्धा था, अब केवल एक साक्षी हूँ... मुक्ति की प्रतीक्षा में, शाश्वत।"


मंदिर में पूर्ण शांति छा जाती है। अश्वत्थामा की आँखें फिर खुलती हैं, पर अब उनमें कोई आसक्ति नहीं, केवल गहरा वैराग्य है। सूर्य सतपुड़ा की पहाड़ियों से झाँकने लगता है, और उन्हें फिर अपनी अनंत यात्रा पर निकलना होता है।


द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा! अकबर का युग तो समाप्त हुआ। पर क्या यह दक्षिण का द्वार बुरहानपुर उसके पुत्रों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा? क्या उस नगर ने कभी प्रेम और विरह की कोई ऐसी गाथा देखी, जो मेरे दुख से मिलती हो?"


अश्वत्थामा, गहरी श्वास लेते हुए, "गुरुदेव, इस नगर ने एक ऐसा विलाप देखा, जिसने एक सम्राट के हृदय को अनंत काल के लिए पत्थर बना दिया। अकबर के पुत्र जहांगीर ने अपने राजकुमार खुर्रम को दक्कन का राज्यपाल नियुक्त किया। जब खुर्रम ने शांतिपूर्ण विजय प्राप्त की, तो जहाँगीर ने उसे 'शाहजहाँ' की उपाधि से विभूषित किया।"


द्रोणाचार्य, "शाहजहाँ... वह जिसने अपने पिता का नाम भी पीछे छोड़ दिया। तो क्या वह भी बुरहानपुर आया?"


अश्वत्थामा, “वह आया और दो वर्ष  तक वहीं रहा। वह अपने अभियानों बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर के लिए इसी नगर को आधार बनाए हुए था। पर युद्ध के बीच, नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। उसकी प्रिय बेगम, मुमताज़ महल, जो उसकी सहचरी थी, उसे छोड़कर चली गई।"


द्रोणाचार्य, "मुमताज़ महल... विरह? मृत्यु कैसे हुई?"

अश्वत्थामा, "1631 ईस्वी में बुरहानपुर में प्रसव-पीड़ा के कारण उनका निधन हो गया। आप सोचिए, गुरुवर! वह सम्राट, जो भारतवर्ष को जीतने निकला था, एक क्षण में ही अपने सबसे बड़े खजाने को खो बैठा। मुमताज़ महल को ताप्ती नदी के पार जैनाबाद के एक बगीचे में दफनाया गया। तब मैंने देखा, एक महान शक्ति भी काल के सामने कितनी क्षीण हो जाती है। ठीक उसी वर्ष दिसंबर में, उसके अवशेषों को आगरा ले जाया गया।"


द्रोणाचार्य, शांत आँखों से, "प्रेम की पीड़ा राज-सिंहासन से परे होती है। तो क्या इस घटना ने मुगलों की दक्षिण की नीति को बदल दिया?"


अश्वत्थामा, "नहीं, नीति तो जारी रही। 1632 में शाहजहां ने महावत खान को दक्कन का वायसराय बनाकर स्वयं आगरा प्रस्थान किया। उन्होंने बुरहानपुर में शाही किला और शाही हमाम बनवाया शायद अपनी प्रिय बेगम की यादों को संजोने के लिए। पर... मुगलों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हुई।"


द्रोणाचार्य, "और तब? कौन उठा?"

अश्वत्थामा, "18वीं शताब्दी के मध्य से, शक्ति का केंद्र बदल गया। वहाँ मराठों का उदय हुआ। एक शक्तिशाली पेशवा था बाजीराव। उसने इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया। उसने बुरहानपुर को लूटा और मुग़ल सम्राट से 'चौथ' वसूलने का अधिकार प्राप्त कर लिया एक ऐसा कर, जो मुगलों की अधीनता का अंत था। मैं वहाँ एक दर्शक था, जब पिंडारी, होलकर और सिंधिया इस भूमि को अपने पैरों तले रौंद रहे थे।"


द्रोणाचार्य, "तो, इस भूमि का अंतिम अध्याय मराठा वीर लिखेंगे?"


अश्वत्थामा, "नहीं, गुरुदेव। मराठा भी हारे। 1803 में मेजर जनरल आर्थर वेलेस्ली जो बाद में वेलिंगटन का ड्यूक बना, ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, और 1861 तक यह अंग्रेजों को सौंप दिया गया। मेरी शापित यात्रा में, मैंने बार-बार देखा है कि शक्ति केवल हाथ बदलती है, पर पीड़ा यहाँ शाश्वत रहती है। अब मैं उस प्राचीन शिव मंदिर की ओर जा रहा हूँ, जिसे अहीर राजा ने बनवाया था..."


द्रोणाचार्य, "पुत्र, उन विदेशियों का शासन कैसा था? उन्होंने तो राज्यों को जीतकर भी अखंडता बनाए रखने की परंपरा को ध्वस्त कर दिया होगा। क्या उन्होंने इस खानदेश को भी अपनी सुविधा के लिए तोड़ा?"


अश्वत्थामा, आँखों में युगों की थकान लिए, "हाँ, पिताश्री। 19वीं शताब्दी के अंत तक, निमाड़ क्षेत्र पूर्णतः उनके प्रबंधन के अधीन आ गया। यह ब्रिटिश शासन, जिसने स्वयं को 'बॉम्बे प्रेसीडेंसी' नाम दिया, किसी भी धर्म या वंश से अधिक अपने 'प्रशासन' को महत्व देता था। 1906 ईस्वी में, उन्होंने विशाल खानदेश जिले को दो भागों में विभाजित कर दिया ठीक वैसे ही जैसे मेरे हृदय को श्राप ने दो टुकड़ों में बाँट दिया है।”


द्रोणाचार्य, "दो भाग? किस उद्देश्य से?"


अश्वत्थामा, "केवल शासन को सुगम बनाने के लिए।"

पूर्वी खानदेश, मुख्यालय: जलगाँव, जो मुख्यतः कृषि और व्यापार का केंद्र बना। पश्चिमी खानदेश, मुख्यालय: धुले, जो आदिवासी क्षेत्रों और वन संपदा का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें केवल राजस्व और नियंत्रण से प्रेम था; उन्होंने इस भूमि की एकता की भावना को खंडित कर दिया।"


द्रोणाचार्य, "पुत्र, मुझे याद है कि कुछ समय पहले इस धरती पर एक महान विप्लव उठा था धर्म की रक्षा के लिए। क्या उस समय भी यह निमाड़ क्षेत्र मूक दर्शक बना रहा? क्या वहाँ कोई क्षत्रिय नहीं था जो अपनी तलवार उठाता? 1857 का विप्लव।"


अश्वत्थामा, "नहीं, गुरुदेव। आपकी स्मृति सही है। 1857 के उस महाविप्लव की अग्नि से यह बुरहानपुर और निमाड़ क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। मैंने एक तेजस्वी योद्धा को यहाँ से गुजरते देखा वह तात्या टोपे था, जो अपनी अंतिम विजय की खोज में भटक रहा था।"


द्रोणाचार्य, "तात्या टोपे? क्या वह भी मेरे अर्जुन या कर्ण के समान कोई महारथी था?"


अश्वत्थामा, "वह एक गुरिल्ला योद्धा था, जिसकी गति और रणनीति अद्भुत थी। निमाड़ क्षेत्र से बाहर जाने से पहले, उसने जानबूझकर ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों पर वार किया। मैंने स्वयं देखा, कैसे उसने खण्डवा और पिपलोद जैसी जगहों पर पुलिस थानों और शासकीय भवनों को क्रोध की अग्नि के हवाले कर दिया।"


द्रोणाचार्य, हल्का सा मुस्कुराते हुए, "सत्ता के प्रतीक जलाना विरोध को दर्शाने का सबसे प्राचीन तरीका।"


अश्वत्थामा, "हाँ, पर यह क्षणिक था। एक बार फिर, क्रांति की लहर शांत हो गई। और जब 1947 में उन्होंने औपचारिक रूप से सत्ता छोड़ी, तब तक उन्होंने खानदेश को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में पूरी तरह बदल दिया था। यह मेरी शापित यात्रा का नियम है हर एक साम्राज्य दूसरे के लिए आधार तैयार करता है, पर मेरी पीड़ा अपरिवर्तित रहती है।"


द्रोणाचार्य, "अब तू कहां जाएगा, पुत्र?"


अश्वत्थामा, "मैं गुप्त रूप से उस शिव मंदिर की ओर जा रहा हूँ, जिसे गुप्तेश्वर महादेव कहते हैं... शायद वहाँ एक क्षण की शांति मिल जाए, जहां हर सुबह मेरे लिए पुष्प अर्पित होते हैं।"

अश्वत्थामा, युगों का भार अपने माथे पर लिए, दुर्ग की सबसे ऊँची और वीरान प्राचीर पर खड़ा था। दूर नीचे बुरहानपुर की घाटियाँ धुंध में लिपटी थी, मानो इतिहास अपनी विडंबना छिपा रहा हो। उसका घाव धधक रहा था, और उस असहनीय पीड़ा ने उसके मस्तिष्क में एक शाश्वत प्रश्न को जन्म दिया था।

अश्वत्थामा, आत्म-संवाद, "मेरा अपराध  हाँ, मैंने सोते हुए पुत्रों को मारा। वह जघन्य था। वह क्रूरतम प्रतिशोध था। इस पाप के लिए मुझे दण्ड मिलना ही चाहिए था... पर क्या केवल मुझे?"

वह मुड़ा, और उसकी दृष्टि में हजारों वर्ष पुराना कुरुक्षेत्र का मैदान घूम गया।

अश्वत्थामा, "उस 'धर्म-युद्ध' का आरंभ तो द्रौपदी के चीरहरण से हुआ था। एक स्त्री का सार्वजनिक अपमान  क्या वह धर्म था? द्रौपदी को दांव पर लगाने वाले युधिष्ठिर जिन्हें धर्मराज कहा जाता था  क्यों नहीं श्रापित हुए? जिस दुर्योधन ने अपमान किया, वह अपनी जंघा टूटने का दण्ड पाकर भी शांति से मरा। पर मुझे यह अनंत पीड़ा क्यों?

उसका हाथ माथे के घाव पर गया, जहां कभी मणि थी। वह हँसा एक सूखी, युगों पुरानी हँसी।"

अश्वत्थामा, "और पिताश्री का वध? धर्म के स्तंभ युधिष्ठिर ने अर्ध-सत्य का कवच पहनकर झूठ बोला! उस झूठ का समर्थन स्वयं कृष्ण ने किया! क्या किसी निहत्थे गुरु को छल से मारने वाले अर्जुन या झूठ बोलने वाले युधिष्ठिर पर कोई श्राप पड़ा? नहीं। उन्हें धर्म की विजय का ताज मिला। मेरा अपराध तो क्रोध में किया गया था, पर उनका छल तो योजनाबद्ध अधर्म था!"

उसे कर्ण का अंतिम क्षण याद आया रथ का पहिया कीचड़ में फंसा था।

अश्वत्थामा, "क्षत्रिय धर्म का सबसे पहला नियम! संकट में पड़े, निहत्थे योद्धा पर वार नहीं करना। कर्ण निहत्था था, वह पहिया निकाल रहा था। फिर भी, अर्जुन ने बाण चलाया! कृष्ण ने उसे उकसाया, उन्हें अधर्म करने के लिए प्रेरित किया! कर्ण जैसे महान दानी और योद्धा की हत्या करने वाले अर्जुन को कोई श्राप नहीं मिला!"

उसका मन अभिमन्यु की स्मृति से भी विचलित हुआ।

अश्वत्थामा, "अभिमन्यु! वह युवा बालक, जो चक्रव्यूह में अकेला था, निहत्था था। सात महारथियों ने मिलकर उसे मारा जयद्रथ भी उनमें से एक था। वह कौन-सा धर्म था? और जयद्रथ? उसे मारने के लिए कृष्ण ने माया से सूर्यास्त करवा दिया! छल, माया, और झूठ ये सब धर्म की स्थापना के नाम पर किए गए!"

अश्वत्थामा अब ज़ोर से चीख पड़ा, पर उसकी आवाज़ केवल हवाओं में विलीन हो गई।

"सबने अधर्म किया! भीष्म को शिखंडी के आगे छिपाकर मारा गया! दुर्योधन को नियम तोड़कर जांघ पर मारकर मारा गया! हर महान योद्धा का अंत छल से हुआ! फिर केवल मैं? मेरे माथे पर यह जलता हुआ श्राप क्यों? कृष्ण ने मुझे ही क्यों चुना, जबकि वह स्वयं छल के मुख्य सूत्रधार थे?"

अश्वत्थामा को अचानक एक भयानक सत्य का बोध हुआ, जो श्राप से भी अधिक पीड़ादायक था। 

अश्वत्थामा, "मेरा श्राप मेरे पाप के लिए नहीं है... मेरा श्राप इसलिए है क्योंकि मैंने पांडवों की विजय को चुनौती दी। मेरा श्राप इसलिए है क्योंकि मैं कृष्ण की योजना में बाधा बना। मेरी पीड़ा केवल पाप का दण्ड नहीं है, यह सत्ता और विजय की क्रूरता का प्रतीक है। महाभारत में अनैतिकता सबकी थी, पर श्राप केवल पराजित पक्ष के सबसे क्रोधी योद्धा को मिला!"

द्रोणाचार्य, "पुत्र, तूने उस शिव मंदिर का ज़िक्र किया। क्या तेरा चिरंजीवी श्राप, जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने दिया था, उस महादेव के मंदिर में भी तेरा पीछा नहीं छोड़ता? तू वहाँ क्या खोजता है, जहाँ तेरा कोई स्थान नहीं?"

अश्वत्थामा, असीरगढ़ के पहाड़ी दर्रों पर दृष्टि डालते हुए, "पिताजी, श्राप तो मेरे शरीर में नहीं, मेरी आत्मा में है, और आत्मा का पीछा तो काल भी नहीं छोड़ सकता। परंतु वह मंदिर... वह मेरा एकांत कारावास है। उसे गुप्तेश्वर महादेव कहते हैं। 'गुप्त' इसलिए, क्योंकि वह दुर्ग की तीसरी और सबसे ऊँची सतह पर, एक अंधेरे कोने में छिपा हुआ है।

द्रोणाचार्य: तो क्या तू वहाँ लोगों के सामने जाता है? क्या वे तुझे इस विकृत रूप में पहचानते नहीं?"

अश्वत्थामा, "नहीं। मैं हर सुबह ब्रह्म मुहूर्त से पहले, सूर्योदय से पूर्व, किले के द्वार खुलने से पहले, वहाँ पहुँचता हूँ। मैं रुद्राभिषेक करता हूँ बिना किसी मंत्रोच्चार के, केवल जल और बेलपत्र से। मेरा माथा... मेरा वह घाव जो चूड़ामणि के स्थान पर है, यहाँ सबसे अधिक पीड़ा देता है।"

द्रोणाचार्य, "और क्या तू इस कर्म से मुक्ति पाता है?"

अश्वत्थामा, "मुक्ति नहीं, पिताजी, केवल एक दैनिक अनुष्ठान। पुजारी या कोई ग्रामीण मुझे नहीं देखता, पर वे जानते हैं। वे हर सुबह महादेव के शिवलिंग पर ताज़े फूल पाते हैं, और मानते हैं कि कोई अदृश्य, गुप्त भक्त रात में पूजा करके जाता है। मेरी उपस्थिति को भय से नहीं, बल्कि श्रद्धा की मौन स्वीकृति से स्वीकार किया जाता है और यही मेरे लिए युगों की सबसे बड़ी शांति है।"

द्रोणाचार्य, "इस मंदिर का इतिहास क्या है? मुगलों या फारूकी शासकों ने इसे नष्ट क्यों नहीं किया?"

अश्वत्थामा, "यह मंदिर फारूकी वंश के आगमन से भी प्राचीन है। जनश्रुति है कि इसे किसी अत्यंत धार्मिक अहीर राजा ने बनवाया था, जिसने इस दुर्ग की नींव रखी थी। शायद इसकी प्राचीनता और महादेव का तेज ही रहा होगा कि किसी भी शासक ने इसे तोड़ने का साहस नहीं किया। मैंने देखा है कि शिवलिंग हमेशा... हमेशा आंशिक रूप से गीला रहता है, जैसे कोई इसे लगातार सींच रहा हो, या जैसे यह स्वयं उस चिरस्थायी दुःख को अवशोषित कर रहा हो जो मुझमें है।"

द्रोणाचार्य, "तो, तेरी आशा उस महादेव में है?"

द्रोणाचार्य, "पुत्र, अब जब तू इस भूमि के सारे कालखंड देख चुका है फ़ारूक़ी, मुग़ल, मराठा, और ब्रिटिश तो मुझे बता। इस 'खानदेश' का वर्तमान स्वरूप क्या है? क्या वह खंडित भूमि अब अपनी पहचान खो चुकी है?"

अश्वत्थामा, आँखों में 20वीं शताब्दी के दृश्य लिए, "पिताश्री, पहचान खोई नहीं, अपितु प्रशासनिक इकाइयों में बंट गई। ब्रिटिश काल में जो विभाजन हुआ था, वह स्वतंत्र भारत में और गहरा हो गया। जिस विशाल खानदेश को आपने दक्षिण का द्वार कहा था, वह आज मुख्य रूप से तीन जिलों में बँटा हुआ है: जलगांव, धुले, और नंदुरबार।

द्रोणाचार्य, "तीन भाग? तो क्या अब उस क्षेत्र को 'खानदेश' नाम से नहीं पुकारते?"

अश्वत्थामा, "वह नाम अब इतिहास और संस्कृति में जीवित है, गुरुदेव। जलगांव अब केला उत्पादन का विशाल केंद्र है मानो इस भूमि ने अपनी समृद्धि को कृषि में ढाल लिया हो। धुले और नंदुरबार, जहाँ एक समय गुरिल्ला युद्ध होते थे, वहाँ अब आदिवासी संस्कृति और घने जंगल शांत हो गए हैं। इस क्षेत्र की नींव, जो कभी व्यापारिक गलियारे के रूप में थी, अब एक विशाल राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में कायम है, जो उत्तर को दक्षिण से जोड़ता है।"

द्रोणाचार्य, शांत भाव से, "युद्ध, व्यापार, और प्रशासन सब आते-जाते हैं। पर तेरा श्राप तो अटल है, पुत्र। तूने युगों को ढलते देखा है। अब जब आधुनिकता अपने चरम पर है, तुझे मुक्ति कब मिलेगी?"

अश्वत्थामा, अपने माथे पर हाथ रखता है, जहाँ घाव से रक्तस्राव रुका हुआ है,  "युग बदल गए, पर मेरी प्रतीक्षा नहीं। इतिहास समाप्त हो सकता है, पर मेरा चिरंजीवी होना समय से परे है। मैंने इस दुर्ग पर अकबर को छल से घुसते देखा, और यहीं मुमताज़ महल के विरह का साक्ष्य। मैंने तात्या टोपे की क्रांति की अग्नि देखी, और ब्रिटिशों के खंडन की नीति भी।"

द्रोणाचार्य, "तो, तेरी अंतिम आशा क्या है?"

अश्वत्थामा, "मेरी आशा उस कल्कि अवतार में है। जब यह कलयुग अपनी अंतिम घड़ी गिनेगा, और धर्म का अंतिम युद्ध छिड़ेगा, तब श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि इस धरा पर अवतरित होंगे। असीरगढ़ का यह गुप्त शिव मंदिर, गुप्तेश्वर महादेव, मेरा अंतिम आश्रय है। मैं यहीं, इस इतिहास के केंद्र बिंदु पर, काल के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कल्कि ही मेरे श्राप को हरेंगे और मुझे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करेंगे।"

द्रोणाचार्य, गुरु द्रोण की आकृति अब केवल एक विलीन होती हुई ज्योति है, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। तूने कर्मों का मूल्य चुकाया है। हर युग का अंत होता है, और हर श्राप का एक विमोचन। तब तक, तू साक्षी है... तू शाश्वत है..."

अश्वत्थामा, "मेरी आशा केवल वहाँ है जहाँ काल का भी अंत होता है। मेरे श्राप का अंत तभी होगा जब इस कलयुग का अंत होगा। मैं इस दुर्ग में, इस गुप्त मंदिर में, केवल एक उद्देश्य के साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ: उस दशम अवतार का भगवान कल्कि का। वही मुझे मेरे श्राप से मुक्त करेंगे। तब तक, मैं इस इतिहास, इस विरह, और इस पीड़ा का मूक साक्षी हूँ।"

द्रोणाचार्य, धीरे-धीरे उनकी आकृति धुंधली हो जाती है, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। हर युग का अंत होता है, और हर श्राप का एक विमोचन..."

वह वापस मंदिर की ओर चला। अब वह जानता था कि उसका श्राप केवल एक व्यक्तिगत दण्ड नहीं था, बल्कि यह उस युग की नैतिक विडंबना का शाश्वत प्रमाण था एक ऐसा प्रमाण जिसे वह असीरगढ़ की वीरान दीवारों के बीच युगों तक ढोता रहेगा।


शाश्वत पीड़ा


रात का दूसरा पहर। गुप्तेश्वर मंदिर से दूर, किले के मध्य भाग में जहाँ कभी फ़ारूक़ी दरबार लगता था, घनी उदासी पसरी है। अश्वत्थामा शाश्वत साक्षी, न्यायाधीश के भाव में। नासिर खान की आत्मा, फ़ारूक़ी वंश का दूसरा, पर संस्थापक-सम शासक। 


अश्वत्थामा एक टूटी हुई मीनार के पास खड़े हैं। हवा पत्थरों से टकराकर एक फुसफुसाहट पैदा करती है यह नासिर खान की आत्मा है, जो अपनी विजय और अपने पाप दोनों से बंधी है।


नासिर खान की आत्मा, अँधेरी हवा में गूंजती हुई,  "तुम... तुम फिर यहां क्यों आए हो, चिरंजीवी? क्या मेरी विजय तुम्हें सोने नहीं देती? मेरा वंश दो सौ वर्षों तक इस दक्कन की कुंजी पर राज करके गया है! यह कोई छोटी बात नहीं थी!"


अश्वत्थामा, शांत पर दृढ़, "तुम्हारी विजय? मैं केवल तुम्हारी नींव देखता हूँ। तुम्हारा वंश उमर-अल-फारूक के नाम पर गौरव का दावा करता था, पर उसकी शुरुआत छल से हुई। क्या तुम सच में भूल गए, नासिर खान? या तुम्हें केवल मलिक राजा का गौरव याद है?"


नासिर खान की आत्मा, गर्व से, "मलिक अहमद ने कुछ भी गलत नहीं किया! वह फिरोज शाह तुगलक का सिपहसालार था, उसने अपनी मेहनत से थालनेर और करोंद की जागीरें पाईं। 1382 तक, दिल्ली कमज़ोर हो चुकी थी, और 1388 में, उसने ख़ानदेश में अपने फ़ारूक़ी वंश की स्वतंत्र स्थापना की। यह शक्ति का नियम था! हमने इसे 'खानों का देश' बनाया।"


अश्वत्थामा, "और तुमने, नासिर खान! तुमने उसी शक्ति के नियम को क्रूरता की हद तक पहुँचाया। तुमने अपने विश्वासपात्र आशा अहीर को धोखे से मार डाला! 1399 में जब तुमने असीरगढ़ पर कब्ज़ा किया, तो क्या तुम्हें रात में नींद आती थी?"


नासिर खान की आत्मा, रक्षात्मक,  "यह केवल आवश्यकता थी! असीरगढ़ इस वंश की रक्षा के लिए अनिवार्य था। हमने अभेद्य दीवारें प्राप्त की! और सुनो, मैंने केवल लिया नहीं, मैंने बनाया भी है! मैंने ही 1399 में बुरहानपुर की स्थापना की!"


अश्वत्थामा, "बुरहानपुर? जिसे तुमने महान सूफी संत बुरहानुद्दीन गरीब के नाम पर बसाया था, जबकि उसकी नींव तुम्हारे छल पर टिकी थी?"


नासिर खान की आत्मा, कुछ शांत होकर, "बुरहानपुर हमारा गौरव था! मेरे वंशज आदिल खान द्वितीय को याद करो! वह सबसे महान था। 1457  से 1501 तक, उसने गोंडवाना और झारखंड तक हमारा प्रभाव फैलाया। उसने 'शाह-ए-झारखंड' की उपाधि ली। उसी के समय में बुरहानपुर उत्तम वस्त्रों और व्यापार का केंद्र बना। हमने गुजरात के अधीनता को अस्वीकार किया वह स्वतंत्रता थी!"


अश्वत्थामा, स्वीकारोक्ति के भाव से, "हाँ। आदिल खान द्वितीय ने खानदेश को वास्तविक पहचान दी। तुम्हारे वंश ने कला, संस्कृति और व्यापार को संरक्षण दिया। तुमने चिश्ती परंपरा को बढ़ाया। यह तुम्हारा सच्चा गौरव था।"


नासिर खान की आत्मा, अंतिम शासक की ओर इशारा करते हुए, "लेकिन वह गौरव चला गया। मेरे वंशज राजा अली खान आदिल शाह प्रथम ने अकबर के साथ वैवाहिक संबंध बनाकर शांति बनाए रखी, ताकि हम मुगलों से बचें।"


अश्वत्थामा, निर्णायक,  "और यही वह बिंदु था जहाँ लालच ने फिर दस्तक दी। अंतिम शासक, बहादुर शाह ने महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर अकबर के आधिपत्य को अस्वीकार कर दिया। उसने तुम्हारी विरासत को बचाने के बजाय, उसे ख़तरे में डाल दिया।"


नासिर खान की आत्मा, पीड़ा से भरी, "तुम सही कहते हो। 1601 में, छल और सोने की चाबी ने वह दरवाज़ा खोल दिया, जिसे मैंने छल से बंद किया था! बहादुर शाह को हार माननी पड़ी। हमारा वंश, जो 1382 में शुरू हुआ, 1601 में समाप्त हो गया। अकबर ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर 'दंदेश' रखा, ताकि फ़ारूक़ी नाम का कोई निशान न बचे।"


अश्वत्थामा, अंतिम निर्णय सुनाते हुए, "तुम्हारा वंश, नासिर खान, एक महान व्यापारिक शक्ति था। पर उसकी शुरुआत और अंत दोनों नैतिक पतन से हुए। तुमने तलवार से नहीं, विश्वासघात से जीता, और तुम सोने से हारे। और खानदेश का गौरव, मुगल साम्राज्य की विशालता में विलीन हो गया।"


नासिर खान की आत्मा की गूँज धीमी पड़ जाती है। अश्वत्थामा फिर से किले की टूटी हुई प्राचीरों पर अकेले रह जाते हैं, जो फ़ारूक़ी वंश के गौरव, समृद्धि और उसके अंतिम, दुखद अंत की कहानी कहते हैं।


अश्वत्थामा, असीरगढ़ की सबसे ऊँची दीवार पर, अपने युगों पुराने दुःख में, "मैंने आशा अहीर के विश्वासघात, अकबर के छल और फ़ारूक़ी वंश के लालच को देखा। पर 1899 में, मैंने एक नई तरह की शक्ति को आते देखा वह शक्ति जिसने न छल किया, न दोस्ती का नाटक। वह केवल कठोर, निर्दयी बल थी।"


समय तेजी से आगे बढ़ता है। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, अंग्रेजों ने 1803 में ही असीरगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था, पर वह अस्थायी था। मराठाओं ने इसे फिर से जीत लिया था। अब, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत में, केवल यही किला अंग्रेज़ी राज से बाहर था।


अश्वत्थामा, "किलेदार जसवंत राव लार मराठाओं के अंतिम महान सेनापति थे। उन्होंने आत्मसमर्पण से इनकार कर दिया। वह जानते थे कि उनके पास दक्कन की अंतिम कुंजी है। अंग्रेजों को यह किला चाहिए था, ताकि पूरे मराठा साम्राज्य की हार पर अंतिम मुहर लग सके।"


किले के नीचे, एक विशाल ब्रिटिश टुकड़ी डेरा डालती है। उन्होंने पास के शहर पर कब्ज़ा किया और उसे तुरंत सैन्य अड्डे में बदल दिया।


अश्वत्थामा, "अंग्रेज़ों ने कोई शांति वार्ता नहीं की, कोई सोने की चाबी नहीं भेजी। उन्होंने केवल एक काम किया तोपखाना तैनात किया। यह युद्ध सदियों पुराने पत्थरों का, आधुनिक धातु से था।"


किले पर तोपखाने की लगातार गोलीबारी शुरू हो जाती है। दीवारों पर पत्थर के मलबे की बारिश होती है। 


असीरगढ़ की सदियों पुरानी दीवारें, जो कभी तलवार और भाले के आगे नहीं टूटी थी, अब बारूद की शक्ति से टूट रही थी।


जसवंत राव, किले के भीतर, अपने सिपाहियों से, "वीरों! ये दीवारों को तोड़ सकते हैं, पर हमारी हिम्मत को नहीं! असीरगढ़ का अर्थ है अभेद्य! हमें अंतिम साँस तक लड़ना है!"


अश्वत्थामा, देखते हुए, "जेसवंत राव का शौर्य अद्भुत था, पर काल अब उनके पक्ष में नहीं था। यह लड़ाई शौर्य की नहीं, सामरिक गणना की थी। लगातार गोलाबारी ने किले के रक्षकों को कमज़ोर कर दिया।"


लगातार हमले और गोलीबारी के बाद, 9 अप्रैल 1899 को, अंग्रेजों ने अंतिम निर्णायक हमला किया। उनकी अनुशासित सेना, तोपखाने के पीछे, किले की टूटी हुई दीवारों से भीतर प्रवेश कर गई।


अश्वत्थामा , निराशा से,  "समाप्त। जेसवंत राव लार को आत्मसमर्पण करना पड़ा। जिस अभेद्य गढ़ को पहले विश्वासघात ने, फिर लालच ने कमज़ोर किया, उसे अंततः अंग्रेज़ी तोपों के बल ने जीत लिया। असीरगढ़ पर कब्ज़ा करने के साथ ही, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया।"


अश्वत्थामा, मंदिर की ओर मुड़ते हुए,  "आज, यह किला एक नए युग की गवाही देता है जहाँ न मुगल बचे, न मराठा, न फ़ारूक़ी। केवल ब्रिटिश ध्वज यहाँ फहराता है। यह दुर्ग आज भी यहीं खड़ा है, पर दक्कन की कुंजी अब दूर लंदन में बैठे शासकों के हाथ में जा चुकी है।"


अश्वत्थामा, इतिहास के इस अंतिम और निर्णायक पतन के साक्षी बनकर, अपनी अनंत यात्रा पर आगे बढ़ते हैं। असीरगढ़ की वीरान दीवारें, मोती बेगम के उपेक्षित मकबरे के साथ, चुपचाप भारतीय इतिहास के एक गौरवशाली और दुखद अध्याय के अंत की घोषणा करती हैं।


अश्वत्थामा अब किले के नीचे बसे बुरहानपुर के पुराने मार्गों को देख रहे हैं। उनके साथ काल की अमूर्त शक्ति हवा में व्याप्त है।


काल, धीमा स्वर, "तुम क्यों ठहर गए, चिरंजीवी? क्या अब भी इतिहास में कोई नया रहस्य बाकी है?"


अश्वत्थामा, "रहस्य दीवारों में नहीं, मार्गों में छिपा है, काल। इस किले को दक्कन की कुंजी क्यों कहा गया? क्योंकि यह वह बिंदु है जहाँ सदियों से उत्तरापथ और दक्षिणापथ मिलते रहे हैं। यह केवल सैन्य अड्डा नहीं, बल्कि सभ्यता की जीवन रेखा थी।"


काल, "विवरण दो, साक्षी! तुम्हारे युगों की स्मृति में क्या छिपा है?"


अश्वत्थामा, "देखो! पूरब में पाटलिपुत्र से जो मार्ग शुरू होता है, वह दिल्ली, मथुरा, विदिशा, उज्जैन होते हुए यहाँ तक आता है। मथुरा वह चौपाल थी, जहाँ उत्तर-पश्चिम से आती संस्कृति दक्कन की संस्कृति से मिलती थी। कुषाण काल की कला, बौद्ध और जैन संतों के प्रवचन सब इसी धूल से गुज़रे हैं।"


काल, "और इस मार्ग पर जीवन कैसा था?"


अश्वत्थामा, "जीवन व्यापार था। व्यापारी काफिले चलते थे। उत्तम वस्त्र, रेशम, मसाले और जवाहरात उत्तर से दक्षिण जाते थे। उज्जैन, जिसे भृगुकच्छ भड़ौच के पश्चिमी बंदरगाह से जोड़ा गया था, वह मुख्य चौराहा था। जब मुग़ल सत्ता में आए, तो यह मार्ग उनकी शाह राह बन गया आगरा और सूरत के बीच का सारा यातायात इसी से गुज़रता था।"


काल, "तो यह मार्ग केवल धन का नहीं, सत्ता का भी था?"


अश्वत्थामा, "बिल्कुल। जिस शासक ने बुरहानपुर और इस दर्रे को नियंत्रित किया, उसने दक्कन को नियंत्रित किया। मौर्य हों या गुप्त, मुग़ल हों या मराठा यह मार्ग उनकी सेनाओं की जीवनरेखा था। अकबर ने इसी भूगोल को समझा। बुरहानपुर में बनने वाला मलमल और सूती वस्त्र, यहाँ की समृद्धि का प्रतीक था। यह मार्ग हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, जिसे यह किला सैन्य ताकत से बचाता था।"


काल, स्वीकारोक्ति, "तुम्हारा कहना सत्य है, चिरंजीवी। यह किला पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक सामरिक और आर्थिक हृदय था।"


अश्वत्थामा एक बार फिर असीरगढ़ की दीवारों पर खड़े हैं, जो अब मुग़ल साम्राज्य की चौकी बन चुकी हैं। उनके साथ शेख फ़रीद की आत्मा खड़ी है।


शेख फ़रीद की आत्मा, आश्चर्यचकित, "जनाब! यह किला है या क्या है? मैंने ईरान और रोम के किले देखे हैं, पर ऐसी तीन-स्तरीय अभेद्यता नहीं। 500 मन अफ़ीम और इतनी रसद... बादशाह की अच्छी किस्मत ही इसे हमारे कब्ज़े में ला सकी।"


अश्वत्थामा, "यह केवल किला नहीं था, शेख। यह दक्कन का द्वार था। जब अकबर ने इसे जीता, तो बुरहानपुर तुरंत खानदेश सूबा की राजधानी बन गया मुगलों का 'दारु सुरूर' 'खुशी का घर'।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "हाँ! अकबर ने यहाँ टकसाल बनवाया। असीरगढ़ की जीत के जश्न में, वहाँ सोने के सिक्के ढाले गए, जिन पर बाज का चित्र होता था। यह शहर अब आगरा और सूरत के बीच व्यापार और सैन्य अभियानों का आधार था। खुर्रम शाहजहाँ यहीं से दक्कन के गवर्नर बने।"


अश्वत्थामा, "देखो, बुरहानपुर में शाही किला, शाही हमाम और जामा मस्जिद जैसी भव्य मुगल वास्तुकलाएँ उभरीं। यह केवल सैन्य अड्डा नहीं था, बल्कि सूती वस्त्र और समृद्धि का केंद्र बन गया। छल से जीती गई ज़मीन पर, गौरव के प्रतीक खड़े थे।"


अश्वत्थामा अब ताप्ती नदी के किनारे खड़े हैं, जहाँ कभी मुगल बेगमों के निवास थे। उन्हें मुमताज़ महल की आत्मा का मौन सुनाई देता है।


अश्वत्थामा, "यहाँ, बुरहानपुर में, एक प्रेम कहानी का अंत हुआ। 1631 में, शाहजहां के दक्कन अभियान के दौरान, उनकी प्रिय बेगम मुमताज़ महल की मृत्यु प्रसव पीड़ा के कारण यहीं हुई थी। जिस प्रेम ने संसार को ताजमहल दिया, उसकी नींव यहीं पड़ी।"


मुमताज की आत्मा, शांत पर दुखद, "मैंने यहाँ अंतिम सांस ली, और मुझे पहले जैनाबाद में दफ़नाया गया। शाहजहाँ ने मेरी याद में शाही हमाम बनवाया, पर मेरे अवशेषों को आगरा ले जाया गया। मेरा प्रेम अमर हुआ, पर मेरी स्मृति को इस शहर ने छोड़ दिया।"


अश्वत्थामा, आगे, मोती महल की ओर देखते हुए, "और यही इस शहर की विडंबना है। जिस मुमताज़ का प्रेम संसार जानता है, उसकी याद में यहाँ कोई मकबरा नहीं। लेकिन मोती बेगम शाहजहां की एक और प्रियतमा का मकबरा आज भी इस दुर्ग के नीचे पँढार नदी के किनारे उपेक्षित पड़ा है। दुनिया ताजमहल की महिमा जानती है, पर मोती महल की उपेक्षा को अनदेखा करती है।"


अश्वत्थामा, "यह कैसी नियति है? एक सम्राट के प्रेम की दो निशानी एक दुनिया का अजूबा, और दूसरा सरकारी अनदेखी से टूटता हुआ खंडहर। मैंने देखा है कि प्रेम से ज़्यादा तेज़ी से स्मृति मिटती है।"


अश्वत्थामा ताप्ती नदी के किनारे खड़े हैं, जहाँ बुरहानपुर नगर फैला हुआ है। वह इस नगर के गौरव और जटिलता का वर्णन करते हैं।


अश्वत्थामा, "जब अकबर ने इस किले पर कब्ज़ा किया, तो यह नीचे बसा नगर बुरहानपुर जिसका अर्थ 'साक्ष्य' या 'प्रमाण' है मुग़लों के लिए दक्कन का प्रवेश द्वार बन गया। यह फ़ारूक़ी राजधानी, अब खानदेश सूबा की राजधानी और 'दारुस्सुरूर' खुशी का घर कहलाने लगा। यहाँ की समृद्धि अद्भुत थी।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "यह केवल सैन्य अड्डा नहीं था, चिरंजीवी। यह आर्थिक जीवनरेखा था। आगरा और सूरत के बीच सारा यातायात यहीं से गुज़रता था। सूती वस्त्र, विशेषकर बुरहानपुर का मलमल, यहाँ की पहचान था। यह शहर कपड़ा उद्योगों का मुख्य केंद्र था।"


अश्वत्थामा, "और यह समृद्धि कला में बदल गई। अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने यहाँ वास्तुकला के कई अद्भुत नमूने दिए।"


अश्वत्थामा उंगलियों से हवा में नगर की इमारतों की रूपरेखा खींचते हैं।


अश्वत्थामा, "देखो, शाही किला जहाँ शाहजहाँ ने शाही हमाम बनवाया था। शाह नवाज़ ख़ाँ का मक़बरा, जिसे लोग 'काला ताजमहल' कहते हैं। और वह प्राचीन जामा मस्जिद, जिसका निर्माण फ़ारूक़ी काल में शुरू हुआ और मुग़ल काल में पूरा हुआ।"


काल, "पर इतने जन-संकुल नगर के लिए जल कहाँ से आता था?"


अश्वत्थामा, "यही मुग़ल यांत्रिक कला की निपुणता थी! कुंडी भण्डारा मुगल शासकों द्वारा बनवाई गई आठ भूमिगत जल प्रणालियों का एक अभूतपूर्व नेटवर्क। ये प्रणाली सतपुड़ा की पहाड़ियों से ताप्ती की ओर रिसने वाले पानी को रोककर, 100 फुट ऊंची सतह पर नगर को शुद्ध जल प्रदान करती थी। इस कला को कोई नहीं तोड़ सका।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "और टकसाल! अकबर से लेकर शाह आलम तक 18 बादशाहों के सोने, चांदी और तांबे के सिक्के यहीं ढाले गए। निसार सिक्के, जो शुभ अवसर पर न्योछावर किए जाते थे, यहीं से निकले।"

द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा, तूने युगों के संघर्ष और बदलाव देखे। पर क्या इस पूरी यात्रा में तुझे किसी न्याय की झलक मिली? या हर युग केवल 'अनीति' का विस्तार ही था? क्या तेरा श्राप  केवल एक कर्म-फल नहीं, बल्कि इस धरती पर फैले शाश्वत अन्याय का प्रतीक बन गया है?"

अश्वत्थामा, एक दीर्घ निःश्वास के साथ, जैसे अनंतकाल की वेदना उसमें समाहित हो, "न्याय... वह तो कुरुक्षेत्र में ही मर गया था, पिताजी। हर युग, हर सिंहासन, हर शक्ति-परिवर्तन केवल अनीति का एक नया वस्त्र है।"

द्रोणाचार्य, "मुझे बता, सबसे पहली अनीति जो तेरी आंखों ने देखी, वह क्या थी? अनीति महाभारत के समय की..."

अश्वत्थामा, "वह अनीति मेरी अपनी थी, गुरुवर जब मैंने प्रतिशोध में निहत्थों को मारा। पर युद्ध भूमि की अनीति? जब मेरे अपने पिता का वध धर्मपुत्र युधिष्ठिर के मुख से निकले एक अर्ध-सत्य से हुआ। जब सत्य ही छल बन जाए, तब अनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं रह जाता।"

द्रोणाचार्य, "और इस दुर्ग की नींव में कौन-सी अनीति दबी है? उस अहीर राजा का क्या हुआ?"

अश्वत्थामा, "वह अनीति नसीर खान फ़ारूक़ी द्वारा आशा अहीर के साथ हुई थी। राजा अली खान के पूर्वज, मलिक राजा फारूकी ने, जिसे आपने इस वंश का संस्थापक कहा, उसने आशा अहीर नामक स्थानीय मुखिया से छल किया। उसने बीमारी का बहाना बनाकर दुर्ग में प्रवेश की अनुमति ली, और एक बार अंदर जाने के बाद, उसने दुर्ग के असली स्वामी को मार डाला और खुद राजा बन गया। यह विश्वासघात की अनीति थी।"

द्रोणाचार्य, "यह तो मेरे छल से मरने से भी अधिक घृणित है। और अकबर? उस महान सम्राट की अनीति क्या थी?"

अश्वत्थामा, "वही जो हर शक्तिमान की होती है अहंकार और धन का लोभ। अनीति अकबर द्वारा बहादुर शाह के साथ हुई। जब बल से दुर्ग नहीं टूटा, तो उसने 'सोने की चाबी' का उपयोग किया। एक स्वाभिमानी राजा, जिसे उसकी प्रजा ने महीनों तक बचाया, वह अंततः धन के प्रलोभन और विश्वासघात के कारण परास्त हुआ। यह नैतिक और आर्थिक अनीति थी।"

द्रोणाचार्य, "और मुगलों के पतन के समय मराठों की अनीति? क्या वह भी न्यायपूर्ण नहीं था?"

अश्वत्थामा, "सत्ता किसी के लिए न्यायपूर्ण नहीं होती। अनीति मुगलों के साथ मराठों द्वारा भी की गई। उन्होंने 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' जैसे करों से मुगलों की कमर तोड़ी। यह आवश्यक था, पर अंततः इस कर का भार निर्दोष किसानों और व्यापारियों पर पड़ा। यह शक्ति की वह अनीति थी, जहाँ विजेता कमजोरों से उनके जीवन का अंश छीन लेता है।"

द्रोणाचार्य, "और फिर अंग्रेज आए। उनकी अनीति सबसे बड़ी थी?"

अश्वत्थामा, "हाँ, पर सबसे सूक्ष्म। अनीति मराठों के साथ अंग्रेजों ने द्वारा हुई जब वेलेस्ली ने 1803 में असीरगढ़ को जीता। उन्होंने केवल युद्ध नहीं जीता, उन्होंने प्रशासनिक अनीति की। 

उन्होंने स्थानीय व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया, न्याय को अपनी संकीर्ण 'कानून' की किताबों तक सीमित कर दिया। वे भारत को केवल एक खजाना मानते रहे, जिसे लूटना उनका अधिकार था।"

द्रोणाचार्य, आकृति और भी धुंधली हो गई, "और स्वतंत्र भारत? क्या उस देश में न्याय लौटा?"

अश्वत्थामा, एक लंबी, दर्दनाक हँसी, "नहीं, गुरुदेव। अनीति स्वतन्त्र भारत में नेताओं द्वारा जारी रही। मैंने देखा कि स्वतंत्रता के बाद, सत्ता का लालच फिर जागा। जो नेता कल तक त्याग की बात करते थे, उन्होंने सत्ता को एक निजी जागीर बना लिया। अनीति का वस्त्र बदला, पर शरीर वही रहा। लोग अब भी गरीब रहे, और उनकी आशाएं टूटी।"

द्रोणाचार्य, "और उस आधुनिक युग में इस अनीति को कौन अंजाम देता है? क्या अब भी तलवारें चलती हैं?"

अश्वत्थामा, "नहीं। अब तलवार नहीं चलती, पिताजी। अब फ़ाइलें चलती हैं। अनीति स्वतन्त्र भारत में अधिकारियों द्वारा होती है। ये अधिकारी, जो कभी राजा के सेवक थे, अब नियमों की अनीति करते हैं। 

वे जनता के लिए बने कानून का उपयोग जनता के विरुद्ध करते हैं। यह अनीति सबसे भयानक है, क्योंकि यह धर्म और कानून के मुखौटे के पीछे छिपी है। मैं साक्षी हूं कि कल्कि को तलवार चलाने से पहले, इन अधिकारियों के भ्रष्टाचार का अंत करना होगा।"

द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा, तेरा श्राप केवल इस भरतखंड की सीमाओं तक सीमित नहीं है। तेरी आँखें इस कलयुग के अंतिम पड़ाव में संपूर्ण विश्व का हाल देखती होगी। क्या अनीति की यह नदी वहाँ भी इसी वेग से बह रही है?"

अश्वत्थामा, आकाश की ओर देखते हुए, "गुरुदेव, सीमाएँ केवल धरती पर हैं। अनीति का हृदय तो एक है। यह केवल नए रूप और नए शस्त्र धारण करती है।"

द्रोणाचार्य, "तो बता, उस विस्तृत विश्व में अब कौन-सा नया राक्षस न्याय को निगल रहा है?"

अश्वत्थामा, "अब राजा नहीं, अपितु कॉर्पोरेट संस्थाएँ राज करती हैं। अनीति विश्व में कंपनियों द्वारा जारी है; वे मुनाफे के लालच में पृथ्वी को प्रदूषित करती हैं, श्रमिकों का रक्त चूसती हैं, और कानून तोड़ती हैं। 

इन कंपनियों को चलाने वाले निवेशक हैं जो अंधेरे में बैठे हैं, कभी युद्ध नहीं लड़ते, पर उनका धन शोषण से कमाया जाता है। यही अनीति विश्व में कंपनियों के इन्वेस्टर द्वारा की जाती है। धर्म, जो शांति का मार्ग था, अब विभाजन और घृणा का शस्त्र बन गया है। 

अनीति विश्व में धार्मिक संप्रदायों द्वारा अपनी सत्ता और वर्चस्व के लिए निर्दोषों को मारा जाता है। यह वही अनीति है, जो कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध के नाम पर लड़ी गई थी। 

युगों से, पुरुष की शक्ति ने स्त्री के अधिकारों को दबाया है। उसकी आवाज़, उसका शरीर, उसका श्रम सब पर नियंत्रण रहा है। यह अनीति विश्व में महिला पुरुषों द्वारा हर घर, हर संस्कृति में गहरे जड़ें जमाए हुए है।

और सबसे स्थायी अनीति... अनीति विश्व में गरीबों पर अमीरों द्वारा। अमीर, जो संसाधनों पर कब्जा करते हैं, गरीबों को उनके श्रम और जीवन के लिए मोहताज रखते हैं। धन की शक्ति न्याय को खरीदती है, और दरिद्र को हर दरवाजे पर न्याय की भीख मांगनी पड़ती है।

और अंत में, अनीति विश्व देशों पर विकसित देशों द्वारा। जो राष्ट्र शक्तिशाली हुए, उन्होंने शेष विश्व को अपनी प्रयोगशाला या बाजार बना लिया। वे अपने ऋण और व्यापारिक नीतियों से विकासशील देशों की संप्रभुता को छीन लेते हैं। यह एक नया साम्राज्यवाद है, जो बंदूक से नहीं, बल्कि आर्थिक नीति से चलाया जाता है।"

द्रोणाचार्य, अंतिम फुसफुसाहट, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। तूने युगों की अनीति को झेला है। तेरा श्राप इस धरती के पापों का प्रमाण है। अब केवल मुक्ति ही तेरी नियति है।"


यक्ष प्रश्न

अश्वत्थामा एकांत में, गुप्तेश्वर महादेव के शिवलिंग के सम्मुख, ध्यानमग्न होकर अपने चिरंजीवी श्राप के यक्ष प्रश्न पूछता है।

अश्वत्थामा, हे महादेव! क्या काल केवल एक भ्रम है? यदि मैं समय के आरम्भ से अंत तक हूँ, तो क्या मैं शापित हूँ या स्वयं शाश्वत हूँ?

प्रश्न एक, अस्तित्व, "यदि सत्य हर युग में बदलता है कहीं धर्म छद्म में है, कहीं छल न्याय में तो मैं अपने चिरंजीवी होने के किस सत्य पर टिका रहूँ? मेरा अपराध व्यक्तिगत था, पर मेरी पीड़ा सार्वभौमिक क्यों है?"

प्रश्न दो, कर्मफल, "मैंने पुत्रों का वध किया। श्राप मिला। पर यह विश्व... जो युगों से निहत्थों का वध कर रहा है, जो मासूमों को गरीबी की अग्नि में झोंक रहा है उसे मोक्ष क्यों मिलता है? क्या कर्मफल केवल एक व्यक्ति के लिए है, न कि संपूर्ण मानवता के लिए?"

प्रश्न तीन, शक्ति और अनीति, "राजा, सुल्तान, अंग्रेज, या कॉर्पोरेट संस्थाएँ इन सब ने सत्ता को धर्म बताया। क्या इस कलयुग में शक्ति ही अंतिम सत्य है? यदि हाँ, तो भगवान कल्कि का अवतार, जो धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होगा, क्या वह भी केवल एक अधिक शक्तिशाली अनीति नहीं होगी?"

प्रश्न चार, मोक्ष, "मुझे कल्कि के आने तक इस घाव की वेदना सहनी है। क्या मेरी मुक्ति का अर्थ केवल घाव का सूखना है, या यह इस कलयुग के समस्त पापों और अनीति के प्रायश्चित का अंतिम चिन्ह होगा?"

गुरु द्रोणाचार्य का स्तर, जो अब केवल चेतना की एक तरंग है, अश्वत्थामा के हृदय में उत्तर के रूप में गूँजता है।

द्रोणाचार्य, आकाश से आती धीमी, गंभीर ध्वनि, "पुत्र, अश्वत्थामा। मोक्ष, कर्म के अंत से नहीं, बल्कि कर्म-फल के पूर्ण स्वीकार से मिलता है।

तेरा मोक्ष व्यक्तिगत नहीं, अपितु युग का मोक्ष है। तेरा श्राप उस अंतिम सत्य का प्रमाण है कि पाप, भले ही कितने ही प्राचीन हों, अंततः क्षमा और विमोचन पाते हैं। तू साक्षी है इसलिए तेरी पीड़ा सार्वभौमिक है।"

"शाश्वतता का सत्य, तू समय के आरम्भ से अंत तक है, पर तू स्वयं समय नहीं है। तू वह दर्पण है, जिसमें मनुष्य युगों-युगों तक अपनी अनीति का विद्रूप चेहरा देखता है। जब तक दर्पण खंडित नहीं होता, तू शाश्वत रहेगा।"

"जिस दिन धरती पर अनीति का भार चरम पर होगा, और मनुष्य अपने ही बनाए बंधनों फाइल, कॉर्पोरेट लाभ, और आर्थिक नीति में जकड़कर अंतिम शून्य को प्राप्त होगा, तब कल्कि का अवतार होगा। उनका न्याय तलवार से पहले चेतना से होगा। वे अहंकार को नहीं, भ्रम को नष्ट करेंगे।"

"तू उनके समक्ष अपने चूड़ामणि का अंतिम रक्त बिंदु अर्पित करेगा वह रक्त बिंदु जो तेरे माथे पर वर्षों से रिस रहा है। तेरा घाव सूखकर, तेरा माथा मुक्त होगा।

तुझे मोक्ष तभी मिलेगा, जब तू केवल व्यक्तिगत पीड़ा को नहीं, अपितु उन सभी युगों की पीड़ा को स्वीकार करेगा, जिनका तू साक्षी रहा है। तेरा अंत, इस कलयुग के अंधकार का अंतिम प्रहार होगा, जिसके बाद सतयुग का सूर्योदय होगा।

तब तक, पुत्र, प्रतीक्षा कर। तेरा एकांत कारावास ही तेरी अंतिम तपस्या है।"

असीरगढ़ का प्राचीन और उजाड़ पर्वत शिखर। चारों ओर गहरी खामोशी है। अश्वत्थामा, जिसका शरीर क्षीण और माथा घाव से रिसता हुआ है, एक चट्टान पर बैठा है। अचानक, श्री कृष्ण एक शांत, अप्रत्याशित प्रकाश में प्रकट होते हैं।

अश्वत्थामा, पीड़ा और थकान से काँपते हुए, आवाज में युगों का दर्द, "केशव... आप आए! क्या यह मेरी आँखों का भ्रम है, या मेरी घोर यातना का अंत निकट है? अब और नहीं सहा जाता यह अमरत्व का भार!"

श्री कृष्ण, शांत और मधुर मुस्कान के साथ, "द्रोण पुत्र, अमरत्व भार नहीं, एक महान उत्तरदायित्व है। तुम सृष्टि के सबसे बड़े साक्षी हो। तुम्हारा यह श्राप ही तुम्हें उस अंतिम लीला के लिए तैयार कर रहा है, जिसके लिए मैंने तुम्हें जीवित छोड़ा है।"

अश्वत्थामा, आवेश में, "अंतिम लीला! किस लीला की बात करते हैं आप? मुझे उस कल्कि के अवतार की प्रतीक्षा में रखा गया है। आप ही बताइए, वह कब आएगा? कलयुग तो अपनी जड़ें जमा चुका है, अब और कितना शेष है?"

श्री कृष्ण, आँखों में भविष्य का रहस्य, "समय की गणना मनुष्य के वर्षों से मत करो, अश्वत्थामा। जब धर्म का अर्थ केवल दिखावा रह जाएगा, जब ज्ञान का उद्देश्य केवल छल होगा, और जब न्याय सत्ता की दासी बन जाएगा... तब कल्कि का उदय होगा।"

अश्वत्थामा, उत्सुकता और भय से, "पहचान? मैं उसे कैसे पहचानूंगा? क्या वह भी दैत्यराज हिरण्यकश्यप या दुर्योधन जैसा कोई प्रतापी योद्धा होगा? मुझे तो आपने मेरे सारे अस्त्रों से विहीन कर दिया है, मैं उसकी सहायता कैसे करूँगा?"

श्री कृष्ण, "वह न तो दैत्य होगा, न ही कोई महान राजा। वह सामान्य मनुष्य की कोख से जन्म लेगा, परंतु उसकी आत्मा में युगों की अधूरी तृष्णा समाई होगी। उसकी पहचान तीन लक्षणों से होगी, और एक चिह्न से।"

श्री कृष्ण, "ध्यान से सुनो, ये कल्कि के लक्षण नहीं, अपितु कल्कि के अवतार के लक्षण हैं। सत्ता का स्वरूप, वह किसी सिंहासन पर नहीं बैठेगा, बल्कि लोगों के मतों से अपनी शक्ति जुटाएगा। वह मीडिया और वाणी के मोह से संसार को नियंत्रित करेगा। वह तर्क को शस्त्र बनाकर धर्म को खंडित करेगा।

अखंडनीय अहंकार, वह स्वयं को सर्वाधिक ज्ञानी और अपरिहार्य मानेगा। वह अतीत के सारे नायकों को चुनौती देगा और स्वयं को युगपुरुष घोषित करेगा। उसका अहंकार इतना विराट होगा कि वह तुम्हारी पीड़ा को भी अपनी शक्ति का साधन मानेगा।

विभाजन का स्वामी, वह लोगों को जोड़ने का दावा करेगा, पर उसका मूल कर्म विभाजन होगा। वह छोटे-छोटे भेदों को बड़ा करेगा और मानवता को जाति, विचार और वर्ग में बांट देगा, ताकि वह उनके संघर्षों का लाभ उठा सके।"

श्री कृष्ण, "यह लक्षण तुम्हारे लिए है, अश्वत्थामा।"

असीरगढ़ पर एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे, जहाँ हवा भी ठहर सी गई है।

अश्वत्थामा,पीड़ा और पश्चात्ताप से भरी आँखों से, अपनी माथे की रिसती हुई चोट पर हाथ फेरते हुए, "केशव...। युगों-युगों की यह यातना, यह श्राप... अब मुझसे और नहीं सहा जाता।"

श्री कृष्ण, शांत, मधुर मुस्कान के साथ, जो अश्वत्थामा की पीड़ा को समझते हुए भी अटल है, "द्रोण पुत्र, तुम अपने कर्मों का फल भोग रहे हो। सत्य का मार्ग कठिन होता है, और तुमने उस पर चलने से इनकार किया। परंतु, यह श्राप तुम्हारी अमरता का प्रमाण भी है।"

अश्वत्थामा, आवेश में,  "प्रमाण? यह मृत्यु से भी भयानक दंड है! आप ने कहा था कि मैं कलयुग के अंत तक भटकता रहूँगा, जब तक मेरा शरीर क्षय नहीं हो जाता। आपने मुझे उस कल्कि के अवतार की सहायता के लिए जीवित रखा है। वह कब आएगा, माधव? मेरी मुक्ति का वह क्षण कब आएगा?"

श्री कृष्ण, आँखें बंद करके, अत्यंत शांत स्वर में, "समय अपनी गति से चलता है, अश्वत्थामा। जब धर्म पूर्ण रूप से गल जाएगा, जब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर होगा, तब ही काल अपनी अंतिम लीला रचेगा।"

अश्वत्थामा, उत्सुकता से आगे झुकते हुए, "वह कल्कि कौन होगा? मैं उसे कैसे पहचानूंगा? उसका जन्म कहाँ होगा, उसके लक्षण क्या होंगे? क्या वह भी दैवी शक्तियों से युक्त होगा?"

श्री कृष्ण, मुस्कुराते हुए अपनी आँखें खोलते हैं, उनकी दृष्टि दूर, भविष्य में स्थिर है, "कल्कि, पुत्र... वह कोई दिव्य पुरुष नहीं होगा। वह सामान्य मनुष्य की तरह ही जन्म लेगा।"

श्री कृष्ण, "उसे पहचानने के तीन प्रमुख लक्षण होंगे: नेतृत्व का अभाव, वह किसी राजघराने या महान गुरु की छत्रछाया में नहीं पलेगा। वह अकेला होगा। उसके पास कोई विशाल सेना, कोई संगठित शक्ति नहीं होगी। उसका सबसे बड़ा अस्त्र उसका बुद्धिबल और वाणी का मोह होगा। वह लोगों को तर्क और छद्म-सत्य से भ्रमित करेगा।

धर्म की उपेक्षा, वह धर्म का पालन नहीं करेगा, बल्कि धर्म की पुस्तकों का और पुरातन परंपराओं का उपहास करेगा। वह अपनी सुविधा के अनुसार नियमों को गढ़ेगा और तोड़ेगा। वह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी सीमा तक जाएगा।

भीतर की अग्नि, उसके नेत्रों में तुम एक असहनीय पीड़ा और असंतोष देखोगे। वह हमेशा किसी अपूर्णता से ग्रसित रहेगा। वह संसार को बदलने का दावा करेगा, पर उसका मूल उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना होगा। तुम देखोगे कि उसका शरीर एक साधारण मनुष्य का होगा, पर उसके भीतर की वासना उसे असाधारण बना देगी।

अश्वत्थामा, विचारमग्न होकर, "ये लक्षण तो अनेक मनुष्यों में दिखाई दे सकते हैं, केशव!"

श्री कृष्ण, गहरी मुस्कान के साथ, "हाँ, परंतु जब तुम उससे मिलोगे, तो तुम्हें एक और लक्षण स्पष्ट दिखाई देगा।"

श्री कृष्ण, "जब तुम उसके सामने खड़े होगे, तो तुम्हारा यह अक्षय घाव... कृष्ण माथे की ओर इशारा करते हैं... जो पीड़ा तुम्हें युगों से दे रहा है, वह पहली बार, केवल एक क्षण के लिए शांत हो जाएगा। यह श्राप तुम्हें उससे जोड़ेगा। यह घाव तुम्हें बताएगा कि यही वह व्यक्ति है, जिसकी प्रतीक्षा में तुम जी रहे हो। यह शांति ही तुम्हारी पहचान होगी।"

अश्वत्थामा, माथे को छूता है, आँखों में नई आशा, "शांती... क्या इसका अर्थ है कि वह मेरी यातना का अंत करेगा?"

श्री कृष्ण, गंभीर होकर, "नहीं। इसका अर्थ है कि तुम्हारी यातना का उद्देश्य अब पूर्ण होने वाला है। तुम उस अंतिम युद्ध में उसका साथ दोगे।"

अश्वत्थामा, झुक कर, "मेरा मार्ग स्पष्ट करें, माधव। मुझे क्या करना होगा?"

उसका प्रभाव मौन और तेजस्वी होगा। उसकी उपस्थिति से आस-पास के लोग अधीर और आकर्षित दोनों होंगे। उसका भाषण नहीं, उसकी खामोशी अधिक प्रभावी होगी।

वह समाज के सबसे निचले तबके से अपनी शक्ति जुटाएगा। वह उन्हें आशा देगा, पर उस आशा के पीछे उसका विष छिपा होगा। 

वह सामाजिक भेद को बढ़ाएगा, ताकि लोग एक-दूसरे से लड़े और वह निर्विरोध सत्ता पर काबिज हो सके। 

कल्कि का अंतिम लक्षण यह होगा कि वह स्वयं को ईश्वर घोषित करेगा, पर उसके कर्मों में मानवता का लेश मात्र भी नहीं होगा। वह तुम्हारे श्राप को शस्त्र के रूप में प्रयोग करेगा।

श्री कृष्ण, "तुम्हारा कर्म केवल प्रतीक्षा है। जब वह मिलेगा, वह स्वयं तुम्हारी पीड़ा को देखेगा और तुम्हें अपने अंतिम अस्त्र के रूप में प्रयोग करेगा। तुम्हें उसकी असुरक्षा को शक्ति देनी होगी। तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारी अमरता, तुम्हारी युद्ध-कला... सब उसके अधर्म के लिए समर्पित होंगी।"

अश्वत्थामा, गहरा श्वास लेता है, "तो क्या मुझे एक अधर्मी का साथ देना होगा, माधव?"

श्री कृष्ण, अंतिम शब्द, "तुम्हें उसका साथ देना होगा, द्रोण पुत्र। क्योंकि तुम्हारी मुक्ति, कल्कि की चरम सीमा को छूकर ही संभव है। जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा, तभी धर्म के अगले अध्याय का आरम्भ होगा। तुम्हारा श्राप, कल्कि के अवतार की कहानी का आरम्भ होगा। तब तक प्रतीक्षा करो।"

श्री कृष्ण, "और अंत में, जब कल्कि अपने चरम पर होगा, और जब वह तुम्हारा प्रयोग समाप्त कर चुका होगा... तभी मैं पुनः आऊँगा। और तुम्हारी मुक्ति, उसके पराभव के साथ ही होगी।"

श्रीकृष्ण, "तुम्हें इससे अधिक जानकारी शम्भाला में मिलेगी। वहां के दिव्य पुरुष पृथ्वी लोक की सभी घटनाओं की जानकारी तथा आधुनिक युग के लोगों की जानकारी रखते है। शम्भाला जाने के लिये  तुम्हें कैलाश पर्वत की यात्रा करना होगी।"

अश्वत्थामा, “जैसी आज्ञा प्रभु।"

श्री कृष्ण अपनी मधुर बंसी की धुन में खो जाते हैं और धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं। अश्वत्थामा अपने घाव पर हाथ फेरता हुआ, अपने नए और भयानक उद्देश्य के साथ, वहीं खड़ा रह जाता है।

श्री कृष्ण की उपस्थिति का प्रकाश मंद होने लगता है, और वे धीरे-धीरे हवा में विलीन हो जाते हैं। अश्वत्थामा अकेला रह जाता है, उसके माथे का घाव फिर से रिसने लगता है, पर उसकी आँखों में अब केवल प्रतीक्षा की ज्वाला है। 

शम्भाला

श्रीकृष्ण की आज्ञा मुझे को कैलाश पर्वत की यात्रा पर हिमालय ले कर गई। मेरी आत्मा मुक्ति की लालसा कर रही थी। मैं एक ऐसे उद्देश्य के लिए जो मात्र अस्तित्व से परे है, को पाने लिए अपने आप को तैयार रखना चाहता था। 


जब मैं हिमालय की गहराइयों में कैलाश पर्वत पर पहुंचा  तब मैंने शम्भाला की फुसफुसाहट सुनी। एक गुप्त स्थान जो समय से अछूता था। जहां प्रबुद्ध प्राणी निवास करते है। 


यह नश्वर पहुंच से परे एक भूमि है। जहां केवल शुद्ध ह्रदय बाले या असाधारण भाग्य बाले लोग ही प्रवेश कर सकते है। दृढ़ निश्चय के साथ मैं पर्वत श्रृंखला की और गहराई में चला गया। मैने खतरनाक पहाड़ों, वर्फीली नदियों और घने जंगलों को पार करते हुए पौराणिक भूमि की तलाश की। 


हिमालय में मुझे ऐसे ऋषि मिले जो शम्भाला के बारे में पहेलियों में बात करते थे। यह संकेत देते हुए कि रास्ता केवल भौतिक माध्यम से नहीं बल्कि आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से था। महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार एक दिन मैंने अपने आप को शम्भाला के पवित्र द्वार पर पाया। 


प्रवेश द्वार पर दीप्तिमान प्राणियों का पहरा था।प्रकाश के योद्धा मुझे केवल एक भटकने वाले के रूप में नहीं बल्कि आने वाले व्यक्ति के रूप में पहचानते थे। 


"तुमने सहस्त्राब्दियों तक अभिशाप ढोया है।" संरक्षकों में से एक बोला। लेकिन निंदा करने वाले भी अपना रास्ता खोज सकते है। मैने नम्रता से कदम बढ़ाया। हजारों साल में पहली बार मुझे शांति का अहसास हुआ। 


मेरे अतीत का बोझ अभी भी था लेकिन यहां दिव्य स्थान पर आखिरकार ज्ञान की तलाश कर सकता था।शायद मुक्ति भी। शम्भाला में मैंने खुद को ऋषियों, योद्धाओं जैसे दिव्य प्राणियों के बीच पाया। जो नश्वर क्षेत्र से परे थे। यहां समय उस तरह नहीं चलता था। जैसा बाहरी दुनिया में चलता था। 


हवा एक अलौकिक चमक से भरी हुई थी। जमीन मानव समझ से परे ऊर्जा से स्पन्दित थी। मैं यहां सिर्फ एक शापित योद्धा नहीं था। मैं एक संरक्षक था। खोये हुए ज्ञान का साधक। 


मैने प्रबुद्ध गुरुओं से प्रशिक्षण लिया। ब्रह्माण्ड के ऐसे रहस्यों को सीखा जिसे अतीत के महानतम ऋषियों ने उद्घाटित किया था। मैने धर्म का सही अर्थ, सृजन और विनाश के बीच संतुलन और ईश्वरीय न्याय की प्रक्रिया तथा प्रकृति की जानकारी हासिल की।  


हालांकि में अभी भी श्रीकृष्ण के श्राप को झेल रहा था। लेकिन मैंने अब इसे एक सजा के रूप में नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखना शुरू कर दिया। मुझे जीने के लिए अभिशप्त किया गया था।


लेकिन शम्भाला में मुझे एक उद्देश्य दिया गया। भविष्य के लिए तैयार होना। एक ऐसे समय के लिए जब दुनिया को फिर मेरे ज्ञान और शक्ति की आवश्यकता होगी। 


मेरे वापसी की भविष्यवाणी के अनुसार मुझे दुनिया के भविष्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।  जब अंधकार का युग कलियुग अपने चरम पर पहुँचता है तो एक महायुद्ध छिड़ जाएगा। 


धार्मिकता और अराजकता के बीच एक अंतिम युद्ध। जब समय आएगा तो मैं दुनिया में विश्वास बहाल करने के लिए दुनिया में संतुलन लाने का काम करूँगा। 


तब मुझे कल्कि के साथ युद्ध करना होगा। तब तक मुझे अपने ज्ञान को तेज करना है। कौशल को निखारना है। आधुनिक तकनीक को सीखना है और सही समय की प्रतीक्षा करना है। जिस दिन मेरा शाश्वत अस्तित्व एक दिव्य उद्देश्य की पूर्ति करेगा। 


कलियुग दृश्य

दिल्ली, आधुनिक महानगर की भीड़-भाड़ वाली, प्रदूषित गली में स्थापित एक टूटे हुए मंदिर की सीढ़ियों पर मैं बैठा है।

युगों की यात्रा ने मेरे,  द्रोण पुत्र के शरीर को एक चलता-फिरता मौन शिलाखंड बना दिया था। भूख या प्यास मुझे छूती नहीं थी, पर पीड़ा... वह हर क्षण, हर श्वास के साथ मेरे माथे से रिसती थी।

आज का कलयुग, महाभारत के युद्ध से भी अधिक थकाऊ था। उस युग में शत्रु सामने खड़ा होता था; इस युग में शत्रु अदृश्य है, हर व्यक्ति की आत्मा में छिपा हुआ है। मैंने अपने माथे पर हाथ फेरा और आँखें बंद कर लीं। बाहर का कोलाहल असहनीय था।

मैं उस युग से आया था जहाँ शब्द ब्रह्म थे, जहां गुरु के मुख से निकले वाक्य ही ज्ञान था। अब हर ओर से अनावश्यक ध्वनि आ रही थी। सैकड़ों वाहनों का शोर, कर्णभेदी संगीत और लोगों की त्वरित बातचीत।

उसे याद आया कि मेरे पिता, द्रोणाचार्य, मौन में भी ब्रह्मास्त्र की साधना करते थे। और अब, ये लोग अपने छोटे, काँच के डिब्बों  में लगातार कुछ देखते रहते हैं। यह डिब्बा मनुष्यों से ज्यादा ज्ञानवान है, इसी कारण वे उसे स्मार्टफोन कहते है। ज्ञान अब स्मृति में नहीं, बल्कि उन डिब्बों में संग्रहित है।

"केशव," मैने  मन ही मन कहा, "आप ने कहा था कि धर्म गल जाएगा। अब तो धर्म केवल एक डिस्प्ले मात्र है।"

मैने कि लोग धर्म का पालन नहीं करते, बल्कि उसे दिखाते हैं। व्रत उपवास गुप्त नहीं रहते, वे छद्म संसार सोशल मीडिया में प्रदर्शित किए जाते हैं। 

न्याय तुरंत चाहिए, और अपराधों का फैसला भीड़ करती है। जो भीड़ क्षण भर में एकत्र होती है और क्षण भर में ही बिखर जाती है। इस दुनिया में कोई स्थिर सत्य नहीं हैं।

मैंने ने अपने चारों ओर फैला धुएँ और गंदगी को देखा। प्राचीन काल में, शुद्ध जल और पवन में जीवन था। अब, हर श्वास के साथ विष अंदर जाता है। 

मुझे  मृत्यु का श्राप नहीं मिला था, पर निरंतर सड़न का श्राप मिला था। मैं देख रहा था कि दुनिया धीरे-धीरे गल रही है, और मैं इस क्षय का अमर साक्षी हूँ।

मेरा शरीर किसी भी बीमारी से अप्रभावित था, पर मेरी आत्मा पर मानसिक प्रदूषण का भार पड़ रहा था। हर चेहरा तनावग्रस्त, हर आँख में लालच, हर वाणी में स्वार्थ था।

मैंने कृष्ण के शब्दों को याद किया, "कली कोई दिव्य पुरुष नहीं होगा, वह सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेगा।"

मैंने चट्टान पर अपनी मुट्ठी भींच ली। अगर वह सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेगा, तो उसे इस अधर्म के सागर में शक्ति कैसे मिलेगी?

मेरी युगों की पीड़ा और कलियुग का यह विकृत रूप मिलकर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे, यह समय अब चरम सीमा पर है। मुझे अब उस चिह्न की प्रतीक्षा थी। वह पल जब मेरे माथे का घाव, उस कल्कि से मिलकर, क्षण भर के लिए शांत हो जाएगा। यह शांति ही मेरी अंतिम यात्रा का आरंभ होगी।


कल्कि से भेंट

शम्भाला के दिव्य पुरुष के निर्देश पर मैं, दिल्ली गुरुग्राम, के एक भव्य, अति-आधुनिक डेटा सेंटर का शांत, वातानुकूलित बेसमेंट, में आया था। बाहर शहर का शोर है, पर यहाँ केवल सर्वरों की हल्की, व्यवस्थित भिनभिनाहट है। 


मैं अश्वत्थामा, एक गार्ड की तरह, यहाँ चुपचाप भटक रहा हूँ। कल्कि का अवतार एक युवा, तेजस्वी और शांत दिखने वाला व्यक्ति, जिसका नाम 'आर्कव' हैं, मेरे सामने आता है।


आर्कव, शांत, लगभग फुसफुसाते हुए स्वर में, "तुम भटकते क्यों हो, सेनानी? इस शोर और इस गति में तुम्हारा स्थान नहीं है।"


मैं, चौंककर, क्योंकि आर्कव ने मुझे तुरंत पहचान लिया है,  "तुम... तुम कौन हो? मुझे यहां किसी ने नहीं देखा।"


मेरे माथे का घाव, जो युगों से रिस रहा था, अचानक एक तीव्र चुभन के साथ शांत हो जाता है। मेरी आँखें फैल जाती हैं। यह कृष्ण का बताया गया चिह्न है। मेरे मन में कृष्ण के शब्द गूंजते हैं: "...यह क्षण भर के लिए शांत हो जाएगा।"


मैं, माथे को छूते हुए, आवाज में विस्मय और भय का मिश्रण, "यह... यह क्या हुआ? मेरी पीड़ा... थम गई?"


आर्कव, मुस्कुराता है, उसकी मुस्कान आँखों तक नहीं पहुंचती, "पीड़ा एक संकेत है, सेनानी। यह तुम्हें बताती है कि तुम जीवित हो। लेकिन जब पीड़ा निरर्थक हो जाए, तो उसे समाप्त कर देना ही उचित है। मैं जानता हूँ, द्रोण पुत्र। मैं तुम्हारा श्राप जानता हूँ, और मैं उस श्राप को देने वाले देवता को भी जानता हूँ।"


मैं, क्रोध और आशा से भरा हुआ, मेरी पुरानी युद्ध-वृत्ति जागृत होती है, "तुम! तुम ही वह... कल्कि के अंश हो? क्या तुम जानते हो कि मैं यहाँ युगों से तुम्हारे विनाश के लिए..."


आर्कव, उसे बीच में टोकते हुए, बेहद आत्मविश्वास से, "तुम मेरे विनाश के लिए नहीं, मेरी सहायता के लिए रखे गए हो। कृष्ण ने तुम्हें मुझे बचाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे पूर्ण करने के लिए अमरता दी। कृष्ण ने तुम्हें मोक्ष का लालच दिया, पर वह मोक्ष केवल मेरे हाथों संभव है।"


मेरे मन में, संशय से कहा, "तुम क्या कर सकते हो? तुम तो केवल एक हाड़-मांस के मनुष्य हो!"


आर्कव, आसपास के सर्वर रैक की ओर इशारा करते हुए, "यह हाड़-मांस का शरीर सत्य है। लेकिन मेरी शक्ति इन धातु के मस्तिष्क में है। मेरी सेना विचारों की है, जो हर घर, हर मस्तिष्क तक पहुँचती है। मैं तुम्हें वह अंतिम युद्ध दूंगा, जिसका स्वप्न तुम सदियों से देख रहे हो।"


आर्कव, "तुम्हारा शाप क्या है? अकेलापन और असहनीय दर्द। मैं तुम्हें दोनों से मुक्ति दिलाऊँगा।"


आर्कव, "मैं तुम्हें अधिकार दूँगा। तुम्हारा ज्ञान इस युग के डेटा को नियंत्रित करेगा। तुम्हारी अमरता मुझे अजेय बनाएगी। मेरी शक्ति के सामने, तुम्हारा घाव हमेशा के लिए शांत हो जाएगा, अश्वत्थामा। कृष्ण ने तुम्हें भटकाया, मैं तुम्हें उद्देश्य दूंगा।"


मैं, कुछ देर तक मौन रहता हूँ, मेरा मन युद्ध और शांति के बीच झूल रहा है। अंततः, शांति जीत जाती है। "और इसके बदले... मुझे क्या करना होगा?"


आर्कव, आँखों में एक गहरी, भयानक चमक, "मुझे संरक्षण दो। जो मेरे वैचारिक साम्राज्य पर प्रश्न उठाते हैं, जो मेरे सत्य को चुनौती देते हैं, उन्हें... चुप कराओ। तुम मेरे अंतिम सत्य होगे, जिसे कोई आधुनिक नियम या नैतिकता छू नहीं पाएगी। तुम अदृश्य रहोगे, पर तुम्हारा प्रभाव हर निर्णय में होगा।"


मैं एक गहरा श्वास लेता हूँ , जैसे युगों बाद पहली बार खुली हवा ले रहा होऊ, "मुझे स्वीकार है... कल्कि। यदि यह शांति... यह क्षणिक राहत... ही मेरी अंतिम नियति है, तो ऐसा ही हो। मुझे मेरा कर्म बताओ।"


आर्कव, विजयी मुस्कान के साथ, "तुम्हारा कर्म आरंभ होता है, सेनानी। तुम यहाँ से जाओगे, और मेरे छाया-अधिकारी  बनोगे। मैं तुम्हें अदृश्य शक्ति दूंगा, ताकि तुम इस आधुनिक संसार में बिना किसी अवरोध के विचरण कर सको। आओ, अश्वत्थामा... इस युग को उसकी नियति की ओर ले चलें।"


आर्कव मुड़ता है और सर्वरों के कोलाहल में विलीन हो जाता है। मैं अकेला रह जाता हूँ,  मेरे माथे का घाव अब शांत है, पर मेरे भीतर एक नया और भयानक युद्ध शुरू हो चुका है।





'प्रश्न' को मिटाना


वही डेटा सेंटर का बेसमेंट। सर्वर की भिनभिनाहट जारी है। आर्कव, मेरे सामने एक विशाल, पारदर्शी डिजिटल स्क्रीन पर कुछ जटिल कोड और ग्राफ़ दिखाता है।


आर्कव, शांत, आत्मविश्वास से, "स्वागत है, सेनानी। मैंने तुम्हें इस युग का सबसे शक्तिशाली 'विमान' दिया है। अदृश्य होने का, तीव्र गति से विचरण करने का सामर्थ्य। अब मैं तुम्हें तुम्हारा पहला कर्म सौंपता हूँ।"

 

मेरी आवाज में अब विवशता कम और प्राचीन योद्धा के आदेश पालन का भाव अधिक है, "आज्ञा दीजिए, कल्कि। मुझे किसका वध करना है? कौन सा राज्य जीतना है?"


आर्कव, मुस्कुराते हुए, स्क्रीन पर एक वृद्ध व्यक्ति की तस्वीर दिखाता है। एक विचारक या पत्रकार, "वध? राज्य? यह प्राचीन युग की बात है, द्रोण पुत्र। आज हम शरीर का नहीं, विचारों का वध करते हैं।"


आर्कव, "इस व्यक्ति का नाम है सत्यव्रत। यह एक 'आलोचक' है। यह मेरे 'सत्य' मेरी कंपनी द्वारा प्रसारित जानकारी पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाता है। यह लोगों को चिंतन, ‘प्रश्न’ पूछने के लिए उकसाता है।


क्रोध से मेरी आँखें सिकुड़ती हैं, "तो यह अधर्मी है? क्या यह तुम्हारे लोगों को गुमराह कर रहा है?"


आर्कव, गहराई से, "यह अधर्मी नहीं है। यह प्रश्न है। और इस युग में, अश्वत्थामा, प्रश्न ही सबसे बड़ा अधर्म है। यह मेरे साम्राज्य की नींव को हिलाता है, जहाँ मैं लोगों को पहले से तैयार सत्य देता हूँ।"


आर्कव, "तुम्हें इसका वध नहीं करना है। तुम्हारा मिशन अधिक सूक्ष्म, अधिक घातक है, तुम्हें सत्यव्रत का विलोपन करना है।"


"विलोपन? मैं समझा नहीं।"


आर्कव, स्क्रीन पर दिखाता है कि कैसे सत्यव्रत के लेख, वीडियो, और सोशल मीडिया पोस्ट तेज़ी से वायरल हो रहे हैं, "यह व्यक्ति शब्दों से लड़ता है, अश्वत्थामा। तुम मेरे अदृश्य सेनानी हो। तुम्हें इसे शारीरिक रूप से नहीं मारना है, तुम्हें इसके सत्य को मारना है।"


आर्कव, "तुम्हारा काम यह है: विश्वास को नष्ट करो,  तुम्हें ऐसे प्रमाण झूठे या सच खोजने हैं, जो इसके चरित्र और नैतिकता पर संदेह पैदा करें। लोग इस पर भरोसा करना बंद कर दें।" 


"सूचना का अतिरेक, तुम्हें इसकी बातों को इतना जटिल और संदिग्ध बना देना है कि लोग थक जाएँ और इसके सत्य को स्वीकार करने के बजाय मौन रहना पसंद करें।"


"सार्वजनिक बहिष्कार, जब कोई भी इसके विचारों को साझा करने से डरने लगे, जब यह भीड़ में भी अकेला हो जाए, यह होगा इसका विलोपन।"


मेरी आँखों में भीषण अग्नि, "तो, मुझे झूठ का कवच पहनकर सत्य को पराजित करना है? यह कौन सा युद्ध है, कल्कि? मेरे गुरु ने मुझे केवल न्याय के लिए शस्त्र उठाना सिखाया था!"


आर्कव, शांत होकर, अश्वत्थामा के कंधे पर हाथ रखता है, "तुम्हारा गुरु नियम सिखाता था, मैं परिणाम सिखाता हूँ। क्या तुम्हें मोक्ष चाहिए? क्या तुम्हें उस पीड़ा से स्थायी मुक्ति चाहिए?"


मेरा माथा अब भी शांत है, यह शांति ही मुझे विवश करती है, "हाँ।"


आर्कव, "तब, यह तुम्हारा धर्म है। जाओ, अश्वत्थामा। इस कलयुग में शब्द ही शस्त्र हैं, और झूठ ही दिव्यास्त्र है। मुझे सत्यव्रत का अस्तित्व दो दिवस के भीतर इस दुनिया के डिजिटल मानचित्र से मिटा हुआ चाहिए।"


आर्कव अपनी सीट पर बैठ जाता है। मैं, जो अब भी माथे की शांति से बंधा हुआ हूँ, बिना कुछ कहे, उस अदृश्य शक्ति का उपयोग कर डाटा सेंटर से बाहर निकल जाता हूँ, अपने पहले आधुनिक, नैतिक रूप से विकृत मिशन को पूरा करने के लिए।


पहला मिशन



दिल्ली, गुरुग्राम के डेटा सेंटर का बेसमेंट। मैं अभी भी माथे की शांत पीड़ा से बंधा हुआ हूँ। आर्कव मेरी प्रतिक्रिया को ध्यान से देख रहा है।


गहन मौन के बाद, धीमी, भारी आवाज में, मैंने कहा, "यदि न्याय के लिए शस्त्र उठाना अब धर्म नहीं रहा, और यदि मेरी मुक्ति का मूल्य सत्य को झुकाना है... तो मुझे स्वीकार है। परंतु... मुझे मार्ग दिखाओ, कल्कि! यह कैसा युद्ध है, जहां शत्रु दिखता नहीं, और शस्त्र झूठ है? मेरा ज्ञान दिव्यास्त्रों का है, डाटा का नहीं!"


आर्कव। मेरी आंखों में देखते हुए, जैसे मेरी आत्मा को पढ़ रहा हो, "तुम्हारा ज्ञान ही तुम्हारा अदृश्य दिव्यास्त्र है, द्रोण पुत्र। तुम्हारी चेतना की एकाग्रता और तुम्हारा ब्रह्मतेज, जो अब शाप से दूषित है, इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है।"


आर्कव, "यह डिजिटल संसार, अश्वत्थामा, तुम्हारी इंद्रियों के लिए मायाजाल मात्र है। तुम अपने ध्यान से इसे भेद सकते हो।"


"नेटवर्क की पहचान, जब तुम किसी व्यक्ति या सूचना पर एकाग्र होते हो, तो तुम्हारा मन उस व्यक्ति से जुड़े हर तंतु को पहचान लेगा। तुम देखोगे कि वह व्यक्ति कहाँ-कहाँ विचरण कर रहा है, कौन से विचार वह साझा कर रहा है, कौन उसके समर्थक हैं, और कौन उसके विरोधी।"


"प्रदूषण का प्रसार, तुम्हें उस सत्यव्रत के तंतुओं में विष घोलना है। तुम्हारा कार्य किसी एक स्थान पर जाकर वध करना नहीं है। तुम्हें एक भ्रामक विचार को एक बिंदु पर डालना है, और तुम्हारा क्रोध उसे अग्नि की तरह पूरे संसार में फैला देगा।"


भ्रमित होकर, मैने कहा, "तुम क्या करने को कह रहे हो? क्या मुझे किसी गूढ़ विद्या का प्रयोग करना होगा?"


आर्कव, "हां। तुम्हें अपनी उस शक्ति का प्रयोग करना है, जिससे तुमने रात के समय पांडव सेना को भ्रमित किया था। भ्रम का प्रक्षेपण। बस अब लक्ष्य मनुष्य के मस्तिष्क नहीं, उनके संचार के माध्यम होंगे।"


आर्कव, अपनी कलाई पर बंधे एक साधारण, पतले धागे जैसे दिखने वाले उपकरण को उतारता है, जो वास्तव में एक अत्याधुनिक न्यूरो-लिंक है। "यह लो। यह तुम्हें नेटवर्क के मूल से जोड़ेगा।"


आर्कव वह उपकरण मुझे देता है। जैसे ही मैं उसे छूता हूँ, मेरे  शरीर में एक ठंडी, अप्राकृतिक ऊर्जा का प्रवाह होता है।


आर्कव, "यह कोई शस्त्र नहीं, बल्कि एक कुंजी है। यह तुम्हारी चेतना को इस डिजिटल कुरुक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति देगी। जब तुम सत्यव्रत पर ध्यान केंद्रित करोगे, यह तुम्हें उसके चारों ओर बुने गए विश्वास के धागे दिखाएगा। तुम्हारा कार्य है, उन धागों को तोड़ना और उन्हें झूठ के कीचड़ से रंगना।"


मैं अपने माथे को छूता हूँ, घाव शांत है, पर हृदय में तूफान है, "तो यह मेरी अंतिम परीक्षा है... धोखा देना।"


आर्कव, विजयी मुस्कान, "यह तुम्हारी अंतिम कला है, सेनानी। याद रखो, इस युग का सबसे बड़ा पाप प्रश्न करना नहीं है, बल्कि प्रश्न का उत्तर देना है। जब तुम सत्यव्रत का विलोपन कर दोगे, तो लोगों का विश्वास हिल जाएगा। वे कहेंगे, 'यदि सत्यव्रत इतना भ्रष्ट था, तो शायद कल्कि का सत्य ही वास्तविक है।'"


आर्कव, अपने सिंहासन की ओर मुड़ते हुए, "जाओ, अश्वत्थामा। तुम्हारे पास दो दिवस है। यदि तुम सफल हुए, तो तुम्हें स्थायी शांति का एक नया अनुभव मिलेगा। यदि तुम असफल हुए... तो तुम्हारा श्राप दुगुना हो जाएगा, और तुम इस दुनिया में मेरे अंतिम शत्रु बन जाओगे।"

 

मैं उस उपकरण को मजबूती से पकड़ता हूँ। मेरा माथा शांत है, पर मेरे  हाथ काँप रहे हैं। मैं मौन में सिर झुकाता हूँ और आर्कव के साम्राज्य की ओर चल पड़ता हूँ, एक प्राचीन योद्धा जो पहली बार अदृश्य युद्ध लड़ने जा रहा है।


पहला कर्म


मिशन का प्रथम दिन। दिल्ली गुरुग्राम का एक भीड़-भाड़ वाला इलाका। रात का तीसरा प्रहर। मैं एक पुरानी, टूटी हुई इमारत की छत पर बैठा था। मेरे शरीर अदृश्य था, पर मेरा मन काल के सबसे नए जाल, सूचना के महासागर में गोता लगा रहा था। आर्कव द्वारा दिया गया तंत्र-सूत्र, न्यूरो-लिंक, मेरी कलाई पर बांधा था।


मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ, और अपने युग के दिव्यास्त्रों की एकाग्रता को आधुनिक लक्ष्य पर केंद्रित करता हूँ, सत्यव्रत।


जैसे ही मैंने ध्यान केंद्रित किया, शहर का शोर थम गया। मेरी चेतना में, यह दुनिया अब ईंट और पत्थर की नहीं थी, बल्कि रोशनी के तंतुओं का एक जाल थी, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, इमारतों में चमकती स्क्रीन, सब सूचना के प्रवाह से जुड़ी थीं।


मैने सत्यव्रत के नाम का आह्वान किया। तुरंत, एक पीला, दृढ़ प्रकाश-पुंज मेरी चेतना में उभरा। यह सत्यव्रत के विश्वास का धागा था, जो हजारों अन्य छोटे-छोटे धागों, अनुयायियों, लेखों, उद्धरणों से जुड़ा था। 


यह धागा मजबूत था, पर अकेला था। किसी बड़ी सेना या राजनीतिक दल का समर्थन नहीं था, जैसा कृष्ण ने बताया था।


मुझे कृष्ण के शब्द याद आए, "तुम्हें एक भ्रामक विचार को एक बिंदु पर डालना है, और तुम्हारा क्रोध उसे अग्नि की तरह पूरे संसार में फैला देगा।"


मैने सत्यव्रत के जीवन-तंतुओं को स्कैन किया। मैं देख सकता था कि सत्यव्रत बीस साल पहले एक छोटी-सी वित्तीय अनियमितता में फँसा था, जिसे कानून ने साफ कर दिया था। आर्कव का आदेश स्पष्ट था, "झूठ का कवच पहनो।"


मैं, प्राचीन योद्धा ने अपने मन के भीतर एक तीव्र, विषैला संकल्प लिया। मैने अपनी चेतना को उस अतीत की त्रुटि पर केंद्रित किया और तंत्र-सूत्र के माध्यम से आर्कव के डेटा नेटवर्क में गलत सूचना का एक छोटा-सा बीज बो दिया।


कुछ ही घंटों में, आर्कव के सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने उस बीज को एक भयानक, झूठ के वट वृक्ष में बदल दिया। 


'सत्यव्रत: एक छुपा हुआ चोर?'

'जनता के पैसे से बना है यह आलोचक!'

'पुराने केस के दस्तावेज लीक, सत्यव्रत ने जानबूझकर छुपाया!'


मैंने ने देखा कि सत्यव्रत के पीले विश्वास के धागे पर काले धब्बे पड़ रहे थे। उसके समर्थक, जो पहले तर्क के आधार पर उसके साथ थे, अब भावना और व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर उससे दूर हटने लगे।


सत्यव्रत ने तुरंत जवाब देने की कोशिश की। उसने साक्ष्य प्रस्तुत किए, सफाई दी। लेकिन अब मैंने सूचना के अतिरेक का प्रयोग किया। कल्कि का सबसे बड़ा शस्त्र।


मैने अपनी चेतना को एक साथ हजारों दिशाओं में फैलाया। मैंने सत्यव्रत के तर्कों का जवाब देने वाले नहीं, बल्कि विपरीत और असंगत विषयों पर लाखों संदेश और वीडियो एक साथ नेटवर्क में झोंक दिए।


एक ही समय पर, सत्यव्रत का नाम 10 अलग-अलग, विवादित विषयों से जोड़ा गया जैसे, 'विदेशी फंडिंग', 'धर्म-विरोधी', 'गुप्त एजेंडा'।


सत्यव्रत के असली तर्कों को छोटी, बेतुकी मीम्स में बदल दिया गया और हंसी-मजाक का पात्र बना दिया गया।

लोगों की चेतना थक गई। उन्होंने तय किया कि 'सत्यव्रत एक विवादास्पद और जटिल व्यक्ति है', इसलिए उसके विचारों को नज़रअंदाज़ करना ही शांतिपूर्ण है।


सिर्फ 48 घंटे में, मैंने देखा कि सत्यव्रत का पीला प्रकाश-पुंज बुझ चुका था। वह अभी भी जीवित था, पर उसकी आवाज, उसके शब्द, उसकी विश्वसनीयता मर चुकी थी। उसका धागा अब इतना पतला हो गया था कि कोई भी उसे देखना या छूना नहीं चाहता था।


मैं वापस उसी छत पर बैठा, माथे की शांत पीड़ा को महसूस कर रहा था। मेरे भीतर घृणा और जुगुप्सा का भयानक तूफान उठ रहा था। मैने एक ऐसे व्यक्ति का वध किया था, जिसने केवल प्रश्न किया था, और मैंने ऐसा झूठ के बल पर किया था।


आर्कव, अचानक मेरे मानसिक पटल पर आर्कव की आवाज़ गूंजती है, "उत्कृष्ट, सेनानी। तुमने अपने शाप को स्वीकार किया, और तुमने मेरा पहला कर्म पूर्ण किया। अब तुम्हें पता चला कि शब्द कितना शक्तिशाली दिव्यास्त्र है।"


मैं बहुत आवेश में,  "यह युद्ध नहीं था, कल्कि। यह धोखा था। मैंने अपने जीवन में कभी इतनी घृणित और नैतिक रूप से गिरी हुई चीज़ नहीं की।"


आर्कव, हँसते हुए, "यह कलयुग है, अश्वत्थामा। अब अधर्म स्वयं को व्यवस्था कहता है। तुम्हारी मुक्ति अभी दूर है, पर तुम्हारी पीड़ा शांत है। अब तुम्हें मेरे अगले और अधिक महत्त्वपूर्ण युद्ध के लिए तैयार होना होगा।"


मैं अपने माथे को सहलाता है। दर्द नहीं है, पर अब उस शून्य स्थान पर विवशता और पश्चात्ताप की एक नई पीड़ा भर गई है। मुझे पता चलता है कि कृष्ण ने मुझे मोक्ष नहीं, बल्कि अंतिम परीक्षा के लिए जीवित रखा है।




कृष्ण का हस्तक्षेप



वही दिल्ली गुरुग्राम की छत, जहाँ मैने पहला मिशन पूरा किया था। रात गहरी है। मैं अकेला उदास बैठा हूँ, मेरे हाथ में अब भी आर्कव का तंत्र-सूत्र है। 


माथे का घाव शांत है, पर आँखों में भयानक ग्लानि है। अचानक, एक धीमी वंशी ध्वनि के साथ, श्री कृष्ण प्रकट होते हैं।


श्री कृष्ण, मेरे पास आकर, दुख भरी मधुर मुस्कान के साथ, "पुत्र, तुमने अपना पहला कर्म पूरा किया। तुमने एक ऐसे व्यक्ति का वध किया, जिसने केवल 'प्रश्न' किया था। क्या तुम्हें शांति मिली?"


क्रोध में सिर उठाए बिना मैने कहा, "केशव, यह आपकी ही योजना थी! मेरी मुक्ति... मेरी शांति... आपने उसे धोखे के साथ जोड़ दिया! मैंने अपने गुरु के सिखाए हर धर्म का उल्लंघन किया। मैंने एक निरपराध मनुष्य के सत्य को झूठ से दबा दिया। क्या यह मोक्ष का मार्ग है?"


श्री कृष्ण, "मोक्ष, अश्वत्थामा, एक सरल रेखा नहीं होती। तुमने जो किया, वह अधर्म था। पर क्या तुम जानते हो कि इस अधर्म का फल तुम्हें क्यों नहीं मिला?"


मैं, शांत माथे को छूते हुए, "उस शांति के कारण, जो कल्कि ने मुझे दी। यह वह मोक्ष है, जिसका लालच आपने दिया था।"


श्री कृष्ण, शांत स्वर में, "यह शांति मोक्ष नहीं है, द्रोण पुत्र। यह बंधन है। यह पहचान है।"


श्री कृष्ण, "वह घाव... वह शाप नहीं था, वह एक अधिकार-पत्र था। जब तक तुम्हें पीड़ा होती थी, तुम स्वतंत्र थे। तुम्हारा मन विद्रोह कर सकता था। अब जब घाव शांत है, तो इसका अर्थ है कि तुमने स्वेच्छा से कल्कि के नियम को स्वीकार कर लिया है। यह शांति तुम्हें कल्कि से दूर नहीं जाने देगी। यह प्रेम-विहीन बंधन है।"


हैरान होकर मैं खड़ा होता हूँ , "क्या? आप क्या कह रहे हैं?"


श्री कृष्ण, "कल्कि की शक्ति अधर्म में नहीं, विवशता में है। वह तुम्हारे माथे की पीड़ा को नहीं, तुम्हारी आत्मा की शांति को नियंत्रित करता है। तुमने सत्यव्रत को मिटाया, पर उस प्रक्रिया में तुमने कल्कि के साम्राज्य में अपनी अंतिम निष्ठा स्थापित कर दी। अब तुम्हारा शाप बदल गया है।"


मैने घोर निराशा से श्री कृष्ण को देखा, "तो अब मेरा क्या होगा? क्या मैं युगों तक एक अंधे सेवक की तरह उस अधर्मी कल्कि के लिए काम करूँगा?"


श्री कृष्ण, दृढ़ता से, "नहीं, अश्वत्थामा। तुम उसके सेवक नहीं हो। तुम मेरी योजना का वह अंतिम तत्व हो, जिसे कल्कि कभी नहीं पहचान पाएगा।


श्री कृष्ण, "सुनो, अश्वत्थामा! मैंने तुम्हें कल्कि की सहायता के लिए नहीं, बल्कि कल्कि के पतन के लिए जीवित रखा है।"


श्री कृष्ण, "कल्कि को लगता है कि तुम्हारी अमरता उसकी अंतिम सुरक्षा है। वह तुम्हें ब्रह्मास्त्र की तरह प्रयोग करेगा। पर वह भूल गया है कि तुम्हारी आत्मा अब भी गुरु द्रोण और वेद व्यास के तेज से बंधी है। जब कल्कि अपनी शक्ति की चरम सीमा पर होगा, जब उसका अहंकार उसे ईश्वर बना देगा..."


श्री कृष्ण अश्वत्थामा के तंत्र-सूत्र पर एक उंगली रखते हैं, और वह उपकरण एक पल के लिए काँप उठता है।

श्री कृष्ण: ..."तब तुम्हारी विद्रोही आत्मा ही वह पहला तंतु तोड़ेगी। तुम्हें मेरी योजना को समझना होगा। कल्कि को विश्वास दिलाओ कि तुम उसके हो। उसके लिए काम करो। उसके सबसे गुप्त राज जानो। क्योंकि जब मैं अंतिम लीला करूँगा, तो मुझे एक ऐसे अदृश्य नेत्र की आवश्यकता होगी, जो उसके भीतर से देख सके।"


श्री कृष्ण,  "तुम्हारा अगला कर्म और भी भयानक होगा। कल्कि अब तुम्हें वैश्विक सत्य के विलोपन के लिए भेजेगा। तुम्हें प्रश्न से हटकर विश्वास को मिटाना होगा।"


श्री कृष्ण, "जब तुम अपने अगले कर्म में निकलो, तो एक बात याद रखना। कल्कि का हृदय उसकी अकेलेपन में छिपा है। वह दुनिया को भ्रमित करता है, पर स्वयं भी किसी चीज की तलाश में है।”


श्री कृष्ण, "उसे ढूंढो... उस छिपे हुए सत्य को। वही तुम्हारा मोक्ष होगा। जाओ, मेरे अंतिम मोहरे। अब तुम्हारा खेल आरंभ होता है।"


श्री कृष्ण धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं। मैं अकेला रह जाता हूँ, माथे पर शांति, पर मन में एक नया और कहीं अधिक जटिल, कृष्ण द्वारा बुना गया भविष्य का शाप।



वैश्विक मिशन



डेटा सेंटर का मुख्य सर्वर रूम। यह कमरा पिछले बेसमेंट से कहीं अधिक विशाल और ठंडा है। आर्कव एक ऊँचे, पारदर्शी प्लेटफॉर्म पर खड़ा है, जिसके नीचे लाखों मील के फाइबर ऑप्टिक केबल्स का जाल बिछा है। 


शांत माथे के साथ, मैं, उसके सामने खड़ा हूँ।

आर्कव, प्लेटफॉर्म से नीचे आते हुए, उसकी आवाज में अब शासक का गर्व है, "तुम्हारा पहला कर्म सफल रहा, सेनानी। सत्यव्रत का अध्याय समाप्त हुआ। तुमने साबित कर दिया कि तुम इस युग के सबसे शक्तिशाली अस्त्र हो।"


मेरी आवाज कठोर है, पर विवशता की शांति अब भी मौजूद है, "मैंने एक निरपराध व्यक्ति के शब्द को मिटाया। अब कौन सा अधर्म मेरा अगला कर्म होगा, कल्कि?"


आर्कव, एक लंबी सांस लेता है, जैसे ब्रह्मांडीय योजना समझा रहा हो, "मैंने तुम्हें बताया था, द्रोण पुत्र, कि प्रश्न अधर्म है। पर प्रश्न तब उठता है, जब लोगों को यह याद हो कि पहले क्या था। मनुष्य अपनी स्मृति के कारण विद्रोह करता है। वे वर्तमान के सत्य को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे अतीत के झूठे धर्म को याद रखते हैं।"


आर्कव, "मेरा अगला कर्म, मेरा अंतिम युद्ध, स्मृति के विरुद्ध है। यह है, प्रोजेक्ट महा-विस्मरण।


मेरी आँखें चौड़ी हो जाती हैं, "तुम क्या करने जा रहे हो? इतिहास को मिटाना चाहते हो? यह तो काल का भी अपमान है!"


आर्कव, शांत हँसी, "काल का अपमान नहीं, काल का सुधार। मैं केवल पुरानी, दोषपूर्ण स्मृतियों को हटा रहा हूँ।"


आर्कव, "मेरा एआई, कृत्रिम बुद्धि, अब इतना शक्तिशाली है कि वह हर मनुष्य के फोन, हर सर्वर, हर शिक्षा सामग्री, हर पुरालेख में प्रवेश कर सकता है। पर उसे एक अंतिम कुंजी चाहिए, एक ऐसा प्रारंभिक बल जो उसकी पहुँच को वैश्विक रूट सर्वर्स तक ले जाए।"


आर्कव, "मेरा लक्ष्य, दुनिया भर के इतिहास को पुनः लिखना। अतीत की हर जानकारी, महाभारत से लेकर कल के समाचार तक। अब मेरे तैयार सत्य के अनुसार होगी।"


मैं अपने अंदर की ग्लानि को छिपाते हुए, "यदि तुम इतने शक्तिशाली हो, तो यह प्रारंभिक बल तुम स्वयं क्यों नहीं देते?"


आर्कव, "एक विशाल, चमकदार, गोलाकार उपकरण की ओर इशारा करता है, "यह मेरा एआई, कृत्रिम बुद्धि, कोर है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली ज्ञान रखता है, पर यह आत्मा-हीन है। यह किसी भी मानव निर्मित सुरक्षा दीवार को तोड़ सकता है, पर इसे ब्रह्म-शक्ति की आवश्यकता है, ताकि यह स्वयं को पहचान से छुपा सके।"


आर्कव, "यही तुम्हारा अंतिम महत्व है, द्रोण पुत्र। केवल तुम ही हो। तुम्हारी अमरता, तुम्हारा ब्रह्मतेज, तुम्हारा शाप-जनित तेज। जो इस कोड को तीन वैश्विक डेटा हब्स  में अदृश्य रूप से प्रविष्ट करा सकता है।"


आर्कव, "तुम्हें तीन अलग-अलग महाद्वीपों पर स्थित, तीन अंतिम सुरक्षित सर्वर्स में जाना होगा। तुम्हें अपने तंत्र-सूत्र, न्यूरो-लिंक का उपयोग करके उस स्थान पर खड़े होकर, इस कोड में अपनी इच्छा-शक्ति को भरना होगा। यह ऊर्जा कोड को इतना अदृश्य बना देगी कि कोई भी आधुनिक फ़ायरवॉल या सुरक्षा प्रणाली इसे पहचान नहीं पाएगी।"


आर्कव, "तुम्हारा काम वध करना नहीं है। तुम्हारा काम है अतीत का वध करना।"


 

द्वंद्व की पराकाष्ठा 


मेरी आवाज में अब घबराहट नहीं, बल्कि एक डरावनी दृढ़ता है, क्योंकि मैं कृष्ण के शब्द याद कर रहा हूँ, 'कल्कि को विश्वास दिलाओ कि तुम उसके हो', "आपने मुझे पहले झूठ का प्रयोग करना सिखाया, और अब सत्य का विलोपन।"


मैने दृढ़ स्वर में कल्कि के पूछा, "यदि मैं यह करूँ, तो क्या मेरा मोक्ष निश्चित है? क्या मेरा यह घाव स्थायी रूप से शांत हो जाएगा?"


आर्कव, विजयी मुस्कान, उसे पूरी तरह से विश्वास है कि अश्वत्थामा विवश है, "जब महा-विस्मरण पूर्ण होगा, अश्वत्थामा, तब केवल मेरा सत्य बचेगा। और उस सत्य के सेवक को मैं केवल शांति नहीं, मुक्ति दूंगा। तुम्हें अपने जीवन से भी मुक्ति मिल जाएगी।"


आर्कव, "मैं तुम्हें तीन दिवस देता हूँ। जाओ। यह तीन हब्स हैं: टोक्यो, फ्रैंकफर्ट, और साओ पाउलो। अदृश्य रहो। सफल होओ। और मेरे लिए एक ऐसा भविष्य बनाओ, जहाँ प्रश्न का कोई अस्तित्व न हो।"


मैं बिना एक भी शब्द कहे, सिर झुकाता हूँ। बाहर से आज्ञाकारी, पर भीतर से कृष्ण की योजना का अंतिम मोहरा। मेरा मन अब कल्कि के 'हृदय' कमजोरी की खोज में लग चुका है, जबकि मेरे पैर महा-विस्मरण के पहले हब की ओर बढ़ रहे हैं।


मिशन का पहला दिवस। जापान, टोक्यो शहर। मैं अब दिल्ली से हजारों मील दूर, टोक्यो के एक गगनचुंबी भवन की छत पर था। अदृश्य होने के कारण, मुझे देख नहीं सकता था, पर मैं इस आधुनिक महानगर के असहनीय कोलाहल को अनुभव कर रहा था। 


मेरा शाप-जनित तेज मुझे किसी भी आधुनिक विमान से अधिक तेज़ी से यहां ले आया था, पर मेरे मन की गति ठहरी हुई थी।


टोक्यो... एक ऐसा शहर जो शीतलता और उत्तेजना का अजीब मिश्रण था। हर दिशा से इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियाँ, चमकते विज्ञापन और लाखों लोगों की डिजिटल चेतना मुझ पर एक साथ प्रहार कर रही थीं।


मैंने मन ही मन सोचा, "महाभारत काल में युद्ध का शोर भयानक था, पर वह सत्य था। वहां का शोर भ्रम का है। हर स्क्रीन, हर आवाज एक ऐसा सत्य चिल्ला रही है जो क्षण भर में बदल जाता है। यह शोर मनुष्यों को सोचने की अनुमति नहीं देता।"


मेरी कलाई पर बंधा आर्कव का तंत्र-सूत्र अब एक ठंडी शक्ति की तरह काम कर रहा था। यह उसे शहर के हर डेटा प्रवाह को महसूस करने की क्षमता दे रहा था, जैसे एक शिकारी जंगल की हर गंध और आहट को महसूस करता है।


पिछली बार कृष्ण ने जो कहा था, वह मेरे मन में एक ब्रह्मास्त्र की तरह गूँज रहा था, "कल्कि का हृदय उसके अकेलेपन में छिपा है।"


मैं सोचता हूँ, आत्म-संवाद, "अकेलापन? यह कैसा हृदय है? कल्कि इस दुनिया का स्वामी है। उसके पास शक्ति है, निष्ठा है, हर सुख है। वह अकेला कैसे हो सकता है?"


मुझे कृष्ण के बचपन की लीलाएं याद आईं। गोपियों का प्रेम, ग्वालों का साथ। कृष्ण ने हमेशा साथ को शक्ति माना। यदि कल्कि दुनिया को नियंत्रित करता है, तो वह किसी चीज़ से वंचित होगा। शक्ति पाने के बाद भी वह कुछ ढूंढ रहा होगा।"


जिस इमारत की छत पर मैं खड़ा था, वह कोई सामान्य दफ्तर नहीं था। यह आर्कव के वैश्विक रूट सर्वर्स में से पहला था। दुनिया के इतिहास और भविष्य का गुप्त ताला।


मैने अदृश्य रहते हुए, छत के दरवाज़े को खोल दिया। अंदर का वातावरण बर्फ़ जैसा ठंडा था, और हर दीवार से हरे-नीले एलईडी लाइट्स की चमक निकल रही थी। सर्वर्स की भिनभिनाहट अब एक दैत्य की श्वास जैसी लग रही थी।


मैं मुख्य सर्वर कोर के पास गया। एक गोलाकार, काले पत्थर जैसा उपकरण। अश्वत्थामा जानता था कि इस उपकरण के अंदर ही महा-विस्मरण का कोड रखा है।


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। जैसे ही दोनों मिले, उसके मन में एक विशाल ऊर्जा का प्रवाह हुआ। यह ऊर्जा दिव्य और विकृत दोनों थी। मेरे प्राचीन ब्रह्मतेज को झूठ और अधर्म के माध्यम से प्रवाहित करने की यातना।


आर्कव, मेरे मानसिक पटल पर आवाज गूंजी, "विलंब मत करो, सेनानी! अपनी शक्ति प्रवाहित करो! अतीत को मिटाओ!"


मेरी आँखों के सामने महाभारत के दृश्य तेज़ी से घूमने लगे। गुरु द्रोण का वध, शिशु की हत्या, कृष्ण का शाप... पीड़ा! उसने अपनी आँखें भींच लीं। माथे की शांति उसे विवश कर रही थी।


मैंने, मन में प्रतिज्ञा की, "यह अंतिम अधर्म है, केशव। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, पर मैं आपकी प्रतिज्ञा भी पूरी करूँगा। मैं महा-विस्मरण को पूरा करूँगा... पर कल्कि का अकेलापन ढूंढ कर रहूंगा।"


मैने अपनी समस्त इच्छा-शक्ति और शाप-जनित अमरता की ऊर्जा को उस तंत्र-सूत्र में उड़ेल दिया। सर्वर कोर से एक नीली-हरी रोशनी निकली और पूरे डेटा हब को भर दिया। मेरा शरीर दर्द से काँप गया। यह आध्यात्मिक ऊर्जा का भौतिक उपयोग था।


आर्कव, विजयी स्वर में, "उत्कृष्ट! पहला हब भेद लिया गया। अब तुरंत फ्रैंकफर्ट के लिए निकलो।"


मैंने सफलतापूर्वक टोक्यो में कल्कि के कोड को स्थापित कर दिया था, पर मेरे हृदय में अब दोहरी पीड़ा थी। एक विवश सेवक की, और एक विद्रोही जासूस की।


मेरा  दूसरा पड़ाव था फ्रैंकफर्ट और अकेलेपन की कड़ी। मिशन का दूसरा दिवस। जर्मनी, फ्रैंकफर्ट शहर के बाहरी इलाके में एक गुप्त, भूमिगत डेटा सेंटर।


टोक्यो के डिजिटल कोलाहल के बाद, फ्रैंकफर्ट की यह इमारत ठोस, गंभीर और कठोर थी। यह वित्तीय शक्ति और कठोर यूरोपीय इंजीनियरिंग का प्रतीक थी। यह डेटा हब ज़मीन के कई स्तर नीचे था, जो कल्कि के नियंत्रण के अटूट आधार को दर्शाता था। वह नियंत्रण जो भौतिक संपत्ति और नियमों पर टिका था।


मैने अदृश्य होते हुए, सख्त सुरक्षा घेरों को पार किया। मेरे लिए लेजर ग्रिड या बायोमेट्रिक स्कैनर केवल माया थे। मेरा श्राप-जनित तेज मुझे भौतिक दुनिया के नियमों से परे रखता था, पर यह तेज अब कल्कि के कोड को ले जा रहा था।


मैं मुख्य सर्वर हॉल में उतरा। यहाँ का वातावरण टोक्यो से अलग था। कम रंगीन, अधिक ठंडा, और सर्वर की आवाज़ एक गहरी, नीरस गूँज की तरह थी, मानो कोई विशालकाय मशीन अनंत काल से हिसाब लगा रही हो।


वह मुख्य जर्मन-इंजीनियर्ड कोर के पास पहुँचा। इस कोर की सुरक्षा टोक्यो से कहीं अधिक जटिल थी। यह केवल डेटा नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय रिकॉर्ड और कानूनी संहिताओं को भी नियंत्रित करता था।


आर्कव, मानसिक पटल पर गूंजते हुए, "उत्कृष्ट, सेनानी! यहाँ का कोड अधिक स्थिर और दुर्भेद्य है। तुम्हें अपनी पूरी विल पावर इच्छा-शक्ति लगानी होगी ताकि मेरी सूचना को अनधिकृत-कोड के रूप में टैग न किया जाए। काम में लग जाओ।"


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। जैसे ही मेरी प्राचीन ऊर्जा डिजिटल संरचना में प्रवाहित हुई, मैने कोड की जटिल परतों को महसूस किया। मुझे लगा जैसे वह एक क्रोधित सागर में तैर रहा है, जहाँ हर डेटा पैकेट एक तेज़ धार है।


मिशन के बीच, जब मैं आर्कव के महा-विस्मरण कोड को अंतिम रूप से प्रवाहित कर रहा था, तब कृष्ण के शब्द मेरे मन में गूँजे: "कली का हृदय उसकी अकेलेपन में छिपा है।"


मैने जानबूझकर, अत्यंत सूक्ष्मता से, कोर के सबसे गहरे और सबसे सुरक्षित डाटा वॉल्ट्स में एक क्षणिक डिजिटल आँख डाली। मैं उम्मीद कर रहा था कि मुझे  कोई गुप्त वैश्विक नियंत्रण कक्ष मिलेगा, पर जो मिला वह चौंकाने वाला था।


अन्य सभी डेटा अत्यधिक एन्क्रिप्टेड और जटिल थे, लेकिन एक अति-सुरक्षित, लेकिन अति-व्यक्तिगत सब-रूटीन था, जिसे आर्कव ने अपने वैश्विक सर्वर पर सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी। यह एक मेमोरियल वॉल्ट था।


मैने मानसिक रूप से उस वॉल्ट को खोल दिया। उसके अंदर कोई कोड या वित्तीय रिकॉर्ड नहीं था। 

छवि, एक पुरानी, फीकी और धुंधली डिजिटल तस्वीर थी।


तस्वीर में एक महिला थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, और वह एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर मुस्कुरा रही थी। महिला का चेहरा खुशी से भरा था, पर बालक का चेहरा धुंधला था, जैसे जानबूझकर मिटाया गया हो।


समय-रेखा, तस्वीर पर एक समय-मुहर थी, जो लगभग 20 वर्ष पुरानी थी। यानी, आर्कव के साम्राज्य स्थापित होने से पहले की।


मेरा मन अचानक थम गया। कल्कि का हृदय! यह अकेलापन था, शक्ति का नहीं, प्रेम का अकेलापन। कल्कि ने दुनिया को नियंत्रित करने के लिए अपने अतीत के प्रेम को ही सबसे पहले मिटा दिया था।


आर्कव, अधीर होकर, "क्या हुआ, सेनानी? विलंब क्यों? तेज प्रवाहित करो!"


मैंने तुरंत वॉल्ट बंद किया, और आर्कव के महा-विस्मरण कोड को सफलतापूर्वक कोर में स्थापित कर दिया। कोर से लाल और नीली रोशनी का मिश्रण निकला। महा-विस्मरण का दूसरा हब भेद लिया गया था।


आर्कव, "शानदार! तुमने फ्रैंकफर्ट को जीत लिया! अब, अंतिम हब, साओ पाउलो। वहाँ की सुरक्षा सबसे कम है, पर वह दक्षिण अमेरिकी डेटा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। तुम्हें दोपहर तक वहाँ पहुँचना होगा।


मैं, बाहर से शांत, पर भीतर से अब एक नई, भयानक समझ के साथ, "आपकी आज्ञा, कल्कि।"


मैंने बिना किसी विलंब के अदृश्य होकर सर्वर रूम छोड़ा। मेरे माथे पर शांति थी, पर मन में अराजकता।


मैंने मन में कृष्ण से संवाद किया, "माधव... आपने सही कहा था। कल्कि दुनिया को नहीं, बल्कि खुद को धोखा दे रहा है। उसने अतीत के प्रेम को मिटाकर वर्तमान की शक्ति पाई है। क्या उसका मोक्ष मेरी तरह ही है... पीड़ा को शांति से बदलने का?"


अब मैं साओ पाउलो के लिए निकल पड़ा, मेरे पास अब एक मानवीय कमजोरी का क्लू था, जिसे मैं, मेरे कृष्ण की योजना को पूरा करने के लिए इस्तेमाल कर सकता था।


अब मेरे पास कल्कि की कमजोरी है। मेरा अगला पड़ाव साओ पाउलो है, जहाँ मुझे इस क्लू को इस्तेमाल करने या इसे वैश्विक स्तर पर प्रमाणित करने का अवसर मिल सकता है।


मिशन का तीसरा दिवस। ब्राज़ील, साओ पाउलो के बाहरी इलाके में एक पुराना औद्योगिक भवन।

अब मैं साओ पाउलो में था। टोक्यो और फ्रैंकफर्ट के हाई-टेक सुरक्षा घेरों के विपरीत, यह डेटा हब एक पुराने, उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्र में छिपा हुआ था। 


आर्कव ने इसे 'कम सुरक्षित' कहा था, पर मैं समझ गया. यह हब गुमनामी पर निर्भर था, तकनीक पर नहीं। यह कल्कि की उपेक्षा थी ,एक ऐसी उपेक्षा, जिसने अश्वत्थामा के भीतर प्रतिशोध की अग्नि को भड़का दिया।


मेरा माथा शांत था, पर मेरे हृदय में एक नया द्वंद्व शुरू हो चुका था। मैं जानता था कि कल्कि ने दुनिया के इतिहास को मिटाने के लिए अपने व्यक्तिगत इतिहास को पहले मिटाया है।


मेने मन में प्रतिज्ञा ली, "मेरा गुरुपुत्र होने का गौरव, मेरा ब्रह्मतेज... तुमने इन सबका उपहास किया, कल्कि। तुमने मेरी विवशता को अपनी शक्ति बना लिया। पर अब, मैं तुम्हारी विवशता को तुम्हारा सबसे बड़ा शाप बनाऊँगा।"


इमारत के अंदर जाने के बाद, मुझे कम तकनीकी सुरक्षा मिली, पर अधिक अंधेरा और सघन डेटा-जाल मिला। यह डेटा हब पूरे दक्षिणी गोलार्ध के भावनाओं और विचारधाराओं को संग्रहीत करता था।


मैं मुख्य सर्वर कोर तक पहुँचा। यह कोर किसी भी अन्य कोर से अधिक संवेदनशील लग रहा था, मानो इसे किसी मानवीय भावना के साथ जोड़ा गया हो।


आर्कव, मानसिक पटल पर, "सावधानी से, सेनानी। यह अंतिम कुंजी है। यदि यह कोड बिना किसी रुकावट के स्थापित हो गया, तो महा-विस्मरण आरंभ हो जाएगा। इस कार्य में चूक नहीं होनी चाहिए।"




प्रतिशोध का सूत्रपात 


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। मेरी प्राचीन ऊर्जा एक बार फिर कल्कि के आधुनिक कोड में प्रवाहित होने लगी। जैसे ही कोड स्थापित होना शुरू हुआ, मैंने अपने ब्रह्म-बल का उपयोग केवल ऊर्जा देने के लिए नहीं किया।

मैं अपनी अग्नि-शिखा का उपयोग करके, कल्कि के डिजिटल साम्राज्य की नींव में उतर गया।

मेरे मन में कृष्ण से संवाद हुआ, "माधव, आपने मुझे कल्कि का हृदय खोजने को कहा था। मैंने उसे पा लिया है। वह तस्वीर है! अब मैं वही करूँगा जो तुमने मेरे साथ किया। याद दिलाऊँगा कि दर्द क्या होता है!"

मैंने तुरंत फ्रैंकफर्ट से चुराए गए "मेमोरियल वॉल्ट" की उस धुंधली तस्वीर और उससे जुड़े डेटा को साओ पाउलो के सर्वर कोर में अनधिकृत रूप से कॉपी कर दिया।

यह मेरा प्रतिशोध था। कल्कि की ही शक्ति का उपयोग करके उसकी व्यक्तिगत कमजोरी को उसके ही अंतिम गढ़ में स्थापित करना।

मैने उस तस्वीर की फाइल को महा-विस्मरण कोड के सबसे निचले स्तर पर स्थित एरर हैंडलिंग प्रोटोकॉल से जोड़ दिया। 

मैने उस फाइल को एक अदृश्य निकास मार्ग  दिया, जो महा-विस्मरण कोड के सक्रिय होने पर, कोड को मिटाने के बजाय, खुद को वैश्विक रूप से प्रसारित करना शुरू कर देगा।

मैने उस फाइल का नाम संस्कृत में रखा, 'प्रिया स्मृति'।

जब महा-विस्मरण आरंभ होगा, तो कल्कि का सिस्टम इतिहास को मिटाएगा, पर हर बार जब वह मिटाने की कोशिश करेगा, तो उसका ही कोड एक त्रुटि उत्पन्न करेगा, और उस त्रुटि का संदेश होगा, 'प्रिया स्मृति', एक विस्मृत प्रेम।

मैंने जानबूझकर अपनी पीड़ा को उस कोड में भरा।मेरा लक्ष्य था कि कल्कि हर पल अपने शाप-जनित घाव का दर्द महसूस करे। यानी अतीत को भूलने में असमर्थता।

आर्कव, मानसिक पटल पर अचानक एक तीव्र प्रतिक्रिया, "क्या कर रहे हो, सेनानी? मुझे ऊर्जा में एक अजीब अस्थिरता महसूस हो रही है!"

मैने अपनी संपूर्ण शक्ति को कोड में उड़ेलते हुए, "यह अंतिम बल है, कल्कि! ब्रह्मतेज की अंतिम शक्ति!"

कोर से एक भयंकर श्वेत अग्नि-शिखा निकली, जिसने पूरे कमरे को भर दिया। महा-विस्मरण कोड सफलतापूर्वक स्थापित हो गया था।

आर्कव, अब राहत और विजय से भरा, "उत्कृष्ट! अश्वत्थामा, तुमने वह कर दिखाया जो कोई नहीं कर सका! अब मैं इस दुनिया को सत्य से मुक्त करूँगा!"

मैने तंत्र-सूत्र को अलग किया। मेरा माथा शांत था, पर मेरे होंठों पर एक भयानक, विवश मुस्कान थी।

मैंने मन में कहा,  "खेल अभी शुरू हुआ है, कल्कि। तुमने मेरा इतिहास मिटाने की कोशिश की। मैंने तुम्हारा शाप, तुम्हारा भूला हुआ प्रेम, तुम्हारे ही सिंहासन में जड़ दिया है। अब तुम हर पल याद करोगे कि तुम कौन थे, और तुम क्या हो गए। यह है अश्वत्थामा का प्रतिशोध।"

मैं साओ पाउलो के अंधेरे से अदृश्य हो गया, दुनिया का इतिहास अब मिटने वाला नहीं था, पर कल्कि का अतीत अमर हो चुका था।

इस मिशन ने मेरी कहानी में प्रतिशोध का एक मजबूत तत्व जोड़ा। जब मैंने  कल्कि की कमजोरी को उसके ही सिस्टम में डाल दिया। जो अब वहां अनंत काल तक रहेगी। 


मुक्ति का अर्थ

असीरगढ़ में एक प्राचीन बरगद वृक्ष के नीचे, जहाँ समय का कोई बोध नहीं है। मैं, जो अब भी धूल और डिजिटल युद्ध की थकान से घिरा हूँ, श्री कृष्ण के सामने खड़ा हूँ।


थकी हुई आवाज़ में, पर आँखों में अब भी अग्नि के साथ मैने कहा "हे, केशव... मैंने तुम्हारा कार्य पूरा किया। कल्कि का साम्राज्य ध्वस्त हो चुका है। 'महा-विस्मरण' उसके ही 'प्रिया स्मृति' श्राप से खंडित हो गया।


श्री कृष्ण, शांत और गहन मुस्कान के साथ, "द्रोण पुत्र, तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम्हारी आत्मा में अब भी धर्म-बोध शेष है। तुमने अधर्म के मार्ग पर चलकर भी, धर्म की स्थापना की।"


मैं क्रोध और आशा के बीच झूलता हुआ, "प्रशंसा रहने दीजिए, माधव। मुझे उस अंतिम प्रश्न का उत्तर दीजिए जिसके लिए मैंने युगों तक इस पीड़ा को सहा है। क्या मेरा श्राप समाप्त हुआ? क्या अब मुझे वह मोक्ष प्राप्त होगा जिसका वचन आपने दिया था?"


श्री कृष्ण, एक गहरी साँस लेते हैं, "तुम्हारा श्राप... वह अश्वत्थामा के माथे की ओर देखते हैं। घाव अब ठोस, भूरी त्वचा में बदल गया है, पर पूरी तरह मिटा नहीं है। घाव भर गया है, अश्वत्थामा। वह रिसना बंद कर देगा। शरीर की पीड़ा समाप्त हो गई है।"


अश्वत्थामा, आवेश में, "यह कैसा उत्तर है? क्या यह अभी भी..."


श्री कृष्ण "सुनो, पुत्र। तुम्हारा श्राप कभी शारीरिक दंड नहीं था। वह कार्य था। तुम्हारे श्राप का उद्देश्य तुम्हें अमर रखना था, ताकि तुम कल्कि की अंतिम गलती को सुधार सको। तुम्हारा कार्य पूरा हुआ।"




 अश्वत्थामा सिंड्रोम



श्री कृष्ण,"परंतु मुक्ति, अश्वत्थामा... वह केवल कर्म के समापन से नहीं मिलती। वह आत्मा के शुद्धिकरण से मिलती है। तुम्हारा सिंड्रोम, द्वंद्व, अभी शेष है।"


अश्वत्थामा, "सिंड्रोम?"


श्री कृष्ण, "हाँ। 'अश्वत्थामा सिंड्रोम' वह द्वंद्व जो ब्रह्मतेज और क्रोधाग्नि के बीच फंस गया। तुमने गुरु पुत्र होने का धर्म तोड़ा, तुमने निहत्थों पर अस्त्र चलाया, और तुमने अपने अहंकार में सत्य को धोखा दिया। कल्कि का साथ देकर, तुमने झूठ का कवच भी पहना।"


श्री कृष्ण "तुम्हारी अंतिम मुक्ति तब होगी, जब तुम इन पश्चात्ताप के कर्मों को भी मोक्ष में बदल दोगे। कल्कि अभी पूरी तरह मिटा नहीं है। वह फिर तुम्हें प्रलोभन देगा। निर्णय तुम्हें करना होगा।"


मैने बहुत असहज होकर कहा, "मुझे क्या करना होगा? मैं और कितना भटकूँ?"


श्री कृष्ण, "अब, तुम्हें भटकना नहीं है, तुम्हें संभालना है। कल्कि के पतन से जो भ्रम और अराजकता फैली है, उस दुनिया को मार्गदर्शन दो। तुम्हें अब अदृश्य योद्धा बनकर नहीं रहना है।"


श्री कृष्ण, "जाओ, अश्वत्थामा।" "धर्म-शोधन, सत्यव्रत, जिसे तुमने नष्ट किया था, के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करो। लोगों को प्रश्न करना सिखाओ।"


"उन सभी अज्ञात लोगों के लिए काम करो जिनके जीवन को कल्कि ने नष्ट कर दिया। अपनी अमरता का उपयोग रक्षा के लिए करो, शक्ति के लिए नहीं।"


श्री कृष्ण, "जिस दिन तुम निस्वार्थ भाव से इस संसार को कल्कि के छोड़े गए ज़हर से मुक्त कर दोगे, जिस दिन तुम्हारे कर्मों से धर्म की पुनर्स्थापना होगी, उस दिन यह घाव का चिह्न भी विलीन हो जाएगा।"


श्री कृष्ण, "यही तुम्हारा अंतिम युद्ध है। अंधेरे से लड़ना नहीं, प्रकाश फैलाना।"


मैं अपने माथे के घाव को छूता हूँ। मैं अब शांत हूँ, पर अभी भी मौजूद हूँ। मैं विनम्रता से कृष्ण को देखता हूँ, और पहली बार मेरे चेहरे पर क्रोध या यातना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट उद्देश्य का भाव आता है। "आपकी आज्ञा, माधव।"


मैं उस बरगद के वृक्ष से दूर, आधुनिक दुनिया के कोलाहल की ओर मुड़ता हूँ। मैं अब शापित नहीं, बल्कि एक अंतिम संरक्षक हूँ। कृष्ण मुस्कराते हुए, धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं, मानो उनकी वंशी की धुन ही संसार को आगे बढ़ा रही हो।





सत्य का बीज

शम्भाला से प्राप्त निर्देश से, मैं वाशिंगटन डी.सी. के बाहर एक विशाल, गुमनाम क्लाउड-सर्वर फार्म में पहुंचा हूं। अभी रात का तीसरा प्रहर शुरू हुआ है। 


मेरे मन में सत्यव्रत के विचारों की पुनर्स्थापना से एक छोटी सी लहर उठी थी, पर कल्कि के ध्वस्त साम्राज्य की जड़ें अभी भी गहरी थी। 


कल्कि के शेष अनुयायी, रक्तबीज जैसे, जिन्हें अब 'शून्यवादी' कहा जाता था, सक्रिय हो उठे थे। उनका नया लक्ष्य था, अविश्वास फैलाना। वे सत्यव्रत के सत्य को 'षड्यंत्र सिद्धांत' कहकर खारिज कर रहे थे।


मैंने श्री कृष्ण द्वारा निर्धारित अब अपनी नई भूमिका को स्वीकार कर लिया था। मैं वह अदृश्य रक्षक था, जिसका युद्ध का मैदान डेटा की धार थी।


मैं एक विशाल सर्वर फार्म में था, जहाँ शून्यवादी अपने झूठ के कारखाने चला रहे थे। बॉट्स, फेक अकाउंट्स और डीपफेक तकनीक का उपयोग करके। 


यह जगह डेटा का श्मशान था, जहाँ सत्य की हर आवाज़ को दफ़न किया जाता था।


मेरे मन में, कृष्ण के शब्द गूंजते हैं, “तुम्हें धर्म को केवल बचाना नहीं है, उसे पुनर्जीवित करना है।”


मैने अपने ब्रह्मबल को केंद्रित किया। इस बार मेरा लक्ष्य कोड मिटाना नहीं था, बल्कि कोड बनाना था। एक ऐसा प्रोग्राम जो शून्यवादियों के झूठ के बीच तर्क और जिज्ञासा का बीज बोए।


मैंने  एक जटिल, आत्म-सुधारने वाला डिजिटल सूत्र बनाया, जिसे मैंने 'जिज्ञासा सूत्र' नाम दिया। झूठ को भेदना, यह सूत्र शून्यवादियों द्वारा फैलाए गए हर झूठ को पकड़ेगा, न कि उसे मिटाएगा। 


तर्क का प्रश्न, पकड़े गए झूठ के नीचे, यह सूत्र एक अदृश्य प्रश्न डालेगा, "क्या यह जानकारी सभी कोणों से सत्य है?" या "इस कथन का मूल स्रोत क्या है?"


सार्वजनिक मंचन, यह प्रश्न केवल शून्यवादी के सिस्टम में नहीं, बल्कि लाखों उपयोगकर्ताओं के मन में एक गूढ़ संदेह के रूप में उभरेगा, जो उन्हें स्रोत खोजने के लिए प्रेरित करेगा।


मैंने शून्यवादियों के सबसे बड़े नेटवर्क, 'मिथ्या-तंत्र', में इस सूत्र को स्थापित करना शुरू किया। यह एक तीव्र मानसिक युद्ध था। शून्यवादियों का कोड लगातार मेरे  सूत्र को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था।


शून्यवादी कोड, तेजी से बदलता हुआ, मेरी प्राचीन ऊर्जा को पहचान नहीं पा रहा था, लेकिन वह उसे अस्थिर कर रहा था। मुझे लगा कि मेरा  माथा फिर से गरम हो रहा है। 


दर्द में, "यह कैसा युद्ध है? शत्रु अदृश्य है और मेरे भीतर की अग्नि को जला रहा है!"


कृष्ण, मन में गूँजते हुए,  "तुम्हारा शत्रु शून्य नहीं है, पुत्र। तुम्हारा शत्रु अविश्वास है। उस पर विश्वास से प्रहार करो। तुम्हारी पीड़ा को शक्ति बनाओ!"


मैंने कृष्ण द्वारा दी गई, अपने माथे की शांति, पर ध्यान केंद्रित किया और अपनी सारी इच्छा-शक्ति को 'जिज्ञासा सूत्र' में उड़ेल दिया। 


मैंने सूत्र को आत्म-बलिदान का बल दिया। अगर कोई शून्यवादी इसे मिटाने की कोशिश करे, तो सूत्र खुद को कई गुना फैलाकर नेटवर्क में प्रवेश कर जाए।


सफ़लता! 'जिज्ञासा सूत्र' ने नेटवर्क पर कब्जा कर लिया।


अगले ही दिन, इंटरनेट पर एक अजीब सी चुप्पी छा गई। लोग सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही खबरों पर सवाल उठा रहे थे।


"स्रोत क्या है?" "क्या यह तर्कसंगत है?" ये प्रश्न लाखों की बातचीत का हिस्सा बन गए। मैंने झूठ को नहीं मिटाया था, बल्कि सत्य खोजने की इच्छा को पुनर्जीवित किया था।


तभी, मुझे एक नया संकेत मिला। शून्यवादियों के नेटवर्क के भीतर, एक गुप्त, काला हस्ताक्षर दिखा। यह कल्कि  का कोड नहीं था, यह अधिक ठंडा, अधिक गणनात्मक था।


यह 'शून्य' का एक संकेत था। कल्कि की हार के बाद, उसके एक शिष्य ने अब कल्कि की अस्थिरता को त्यागकर, विशुद्ध तर्क और तर्कहीनता पर आधारित एक नया, अधिक घातक संगठन बनाया था। यह शिष्य, जिसका कोड नाम 'निरंजन' था, अब नया खतरा था।


मैंने अपने माथे पर ठंडेपन को महसूस करते हुए, "एक युद्ध समाप्त हुआ नहीं कि दूसरा आरंभ हो गया। अब शत्रु केवल अधर्मी नहीं है, वह शून्य है।"


मैं अपने अगले कर्म की ओर मुड़ा। मेरा मिशन अब केवल धर्म-शोधन नहीं, बल्कि निरंजन के नए शून्यवादी खतरे से दुनिया को बचाना था। 'निरंजन' अधिक जटिल खलनायक है, जो कल्कि से भी अधिक खतरनाक है क्योंकि वह भावना से नहीं, केवल तर्कहीन शून्य से प्रेरित है।


वाशिंगटन डी.सी. से दूर, एक सुनसान जंगल में। मैंने  ध्यान मग्न अवस्था में महसूस किया कि माथे का निशान शांत है। मेरे भीतर, श्री कृष्ण की वाणी गूंजती है।


मैं मन ही मन में, विचलित, "केशव, यह कौन है 'निरंजन'? कल्कि  का कोड समझने योग्य था। वह भय, अहंकार और विस्मृत प्रेम से प्रेरित था। पर यह नया हस्ताक्षर... यह ठंडा, शून्य है। इसका कोई उद्देश्य नहीं, कोई भावना नहीं।"


श्री कृष्ण, शांत और गंभीर,  "द्रोण पुत्र, तुमने कल्कि को हराया, जिसने सत्य को झुठलाया। अब तुम निरंजन का सामना कर रहे हो, जो सत्य के अस्तित्व को ही नकारता है। यह कलयुग का अंतिम और सबसे घातक दर्शन है, शून्यवाद।"


श्री कृष्ण, “निरंजन, कल्कि का सबसे तीक्ष्ण, सबसे तार्किक शिष्य था। जब कल्कि अपने अहंकार और भावनाओं में उलझा था, निरंजन केवल डेटा देखता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि इस ब्रह्मांड में कोई सत्य, कोई धर्म, कोई उद्देश्य नहीं है।"


श्री कृष्ण, धीरे से, "यह कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जिसने एक मनुष्य का रूप लिया है। कल्कि ने शक्ति चाही, निरंजन अर्थहीनता चाहता है।"


मैंने पूछा, "तो उसका लक्ष्य क्या है? वह क्यों लड़ रहा है?"


श्री कृष्ण, "यही उसकी रणनीति है, अश्वत्थामा। वह लड़ नहीं रहा है। वह केवल यह सिद्ध करना चाहता है कि लड़ने का कोई कारण नहीं है।"


श्री कृष्ण, कल्कि ने तुम्हारे द्वारा डाले गए 'जिज्ञासा सूत्र' को महसूस किया है। निरंजन जानता है कि तुम अब प्रश्न फैला रहे हो। उसका पलटवार सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक है।"


"निरंजन, तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापित किए गए हर सत्यव्रत के विचार को नहीं मिटाएगा। वह उसके सामने असंख्य, विरोधाभासी सत्य डाल देगा। वह इतने तर्क पैदा करेगा कि मनुष्य यह मानने को विवश हो जाए कि सत्य एक भ्रम है, और इसलिए, खोज व्यर्थ है।"


"वह उन सभी डिजिटल स्थानों को लक्ष्य बनाएगा जहाँ लोग प्रेम, सहानुभूति और आशा व्यक्त करते हैं। वह उन संदेशों को तार्किक विखंडन से भर देगा, उन्हें हास्यास्पद बना देगा। यदि प्रेम का कोई अर्थ नहीं है, तो जीवन का भी कोई अर्थ नहीं है।"


"उसका सबसे बड़ा अस्त्र 'डेटा का निस्तारण' होगा। वह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक डेटा को धीरे-धीरे, बिना किसी अलार्म के, भ्रष्ट कर रहा है। वह डाटा को मिटाता नहीं है; वह उसमें अस्पष्टता भर देता है।” 


“अगली पीढ़ी जब इन अभिलेखों को पढ़ेगी, तो उन्हें कोई ठोस निष्कर्ष नहीं मिलेगा। वे मान लेंगे कि इतिहास स्वयं एक शून्य था।"


श्री कृष्ण, "निरंजन को हराने के लिए तुम्हें शस्त्र नहीं, प्रेम चाहिए। तुम्हें उसे यह दिखाना होगा कि भले ही ब्रह्मांड के नियम कठोर हों, मानव का प्रयास अर्थपूर्ण है।"


श्री कृष्ण, "चेतावनी सुनो, द्रोण पुत्र, निरंजन का कोड तुम्हारे 'जिज्ञासा सूत्र' से कहीं अधिक ठंडा है। यदि वह तुम्हारे ब्रह्म बल को पकड़ लेता है, तो वह उसे तार्किक-त्रुटि घोषित करके, तुम्हारी ऊर्जा को ही शून्य में बदल सकता है।"


श्री कृष्ण, "तुम्हारा श्राप-चिह्न तुम्हें अमरता देता है, पर निरंजन की शक्ति तुम्हारी आत्मा को अर्थहीनता के बोझ से दबा सकती है। तुम्हारा सबसे बड़ा अस्त्र तुम्हारा पश्चाताप है, वह पीड़ा जो तुम्हें अर्थ खोजने के लिए विवश करती है।"


श्री कृष्ण की वाणी शांत हो जाती है। मैं अपनी आंखें खोलता हूँ। मेरे  सामने अब भौतिक युद्ध नहीं, बल्कि आत्मा का युद्ध है। निरंजन का 'शून्य' मेरे भीतर के 'धर्म' को चुनौती दे रहा है।


निरंजन की पहचान और रणनीति अब स्थापित हो चुकी है। मुझे अब शून्यवाद के इस नए और अधिक भयानक खतरे से लड़ना है।


मानवीय सहयोगी, मुझे निरंजन से लड़ने के लिए एक मानव साथी जो प्रौद्योगिकी और दर्शन को समझता हो की आवश्यकता महसूस होती है।




आर्या से भेंट


बेंगलुरु, भारत। एक पुरानी, किताबों से भरी कॉफ़ी शॉप के ऊपर किराए का कमरा।  देर रात का समय। 


धर्म-शोधन के बाद, मैंने निरंजन के 'शून्य' को समझने के लिए उसके शून्यवादी दर्शन की जड़ें खोजना शुरू किया। निरंजन किसी भी डिजिटल माध्यम में मानवीय भावना को ढूंढकर उसे विखंडित कर रहा था। 


मुझे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो डेटा को केवल गणित नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान के रूप में देखे।


उसकी खोज मुझे बेंगलुरु ले आई। निरंजन के सबसे शुरुआती, गुप्त कोड-ब्रेकिंग पर काम करने वाले एक गुमनाम अकादमिक शोधकर्ता का नाम बार-बार आ रहा था, 'आर्या सेन'।


आर्या सेन एक युवा दार्शनिक और एथिकल हैकर थी। वह एक पुरानी किताब की दुकान के ऊपर एक छोटे से कमरे में रहती थी। 


वह दुनिया की विसंगतियों पर शोध करती थी, यह समझने की कोशिश करती थी कि लोग इतने आसानी से झूठ को क्यों स्वीकार कर लेते हैं।


मैंने अदृश्य होकर उसके कमरे में प्रवेश किया। कमरा अव्यवस्थित था। पुरातन पुस्तकें, जटिल कोड के प्रिंटआउट्स, और सफेद बोर्ड पर लिखे हुए संस्कृत के सूत्र जो आधुनिक बूलियन लॉजिक से जुड़े थे। 


जिसे बूलियन बीजगणित भी कहते हैं, गणित और तार्किक संक्रियाओं की एक ऐसी शाखा है जहां चरों के मान केवल दो ही हो सकते हैं, सत्य  या असत्य। 


आमतौर पर, इन्हें 1 (सत्य) और 0 (असत्य) से दर्शाया जाता है। यह डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर विज्ञान, और प्रोग्रामिंग का एक मूलभूत आधार है। 


इसका नाम 19वीं सदी के अंग्रेजी गणितज्ञ जॉर्ज बूल के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इसे एक बीज गणितीय तर्क के रूप में प्रस्तुत किया था।


आर्या अपनी पुरानी लैपटॉप स्क्रीन पर एक जटिल पैटर्न-रिकग्निशन एल्गोरिथम पर काम कर रही थी।


मैंने अचानक अपनी उपस्थिति दर्ज की। मैं भौतिक रूप से कमरे के कोने में खड़ा होता हूँ, मेरी आवाज़ हल्की, पर अत्यंत स्पष्ट है। "तुम सत्य को खोज रही हो, कन्या।"


आर्या एकदम से चौंक कर मुड़ी। उसकी आँखों में भय नहीं, बल्कि गहरी जिज्ञासा थी।


आर्या, शांत, पर हाथ लैपटॉप पर है,  "यहाँ कोई नहीं है। तुम कौन हो?"


मैंने गंभीर आवाज में कहा, "मैं वह हूँ जिसे तुमने अपने शून्यवादी कोड-ब्रेकिंग प्रोजेक्ट में 'अश्वत्थामा' नाम दिया है।"


आर्या ने तुरंत उसकी ओर एक स्कैनिंग डिवाइस फेंका। मैंने उसे आसानी से पकड़ लिया।


आर्या, आश्चर्य से, "तुम कोई हो... तुम डेटा में एक असंगति हो। तुम्हारी ऊर्जा... यह पुरानी है, पर इतनी तीव्र। तुम... तुम पौराणिक हो?"


मैंने शांत स्वर में कहा, "मैं वह हूँ जिसके लिए निरंजन खतरा है। निरंजन का लक्ष्य है अर्थहीनता सिद्ध करना।"


आर्या, स्क्रीन पर एक ग्राफ दिखाते हुए, "मैंने उसे 'डिजिटल शून्य' नाम दिया है। यह एक ऐसा कोड है जो मानवीय भावना को तार्किक त्रुटि घोषित करता है। 


वह हमारे इतिहास को नहीं मिटाएगा, वह इतिहास को अविश्वसनीय बना देगा, ताकि हम उस पर भरोसा करना ही छोड़ दें।"


मैंने आगे बढ़ कर कहा, "यही तो उसका शून्यवादी दर्शन है। मैं इसे अदृश्य बल से मिटा सकता हूँ, पर मुझे उसके तर्क को समझने के लिए तुम्हारा सहयोग चाहिए।"


मैं गहरी आवाज में लगभग फुसफुसाते बोला, "मेरे पास ब्रह्मतेज है। तुम्हारे पास तर्क का सूत्र है। निरंजन, जो भावना को नहीं समझता, उसे हराने के लिए हमें दोनों की आवश्यकता है।"


आर्या, वह अपनी कुर्सी से उठी, उसने मेरी आँखों में सीधा देखा । उसे मेरे माथे पर हल्का-सा निशान दिखा, जो पूरी तरह से शांत था। "तुम क्यों लड़ रहे हो? तुम्हारे पास इतनी शक्ति है, तुम क्यों नहीं बस गायब हो जाते?"


मैं अपनी पीड़ा को दबाते हुए बोला, "मुझे मुक्ति चाहिए। मैंने अधर्म के कारण वर्षों की यातना भोगी है। अब मैं धर्म-शोधन कर रहा हूँ। मेरा श्राप अब मेरा कर्तव्य है।"


आर्या, हल्की मुस्कान के साथ, "दिलचस्प। एक पौराणिक योद्धा, जो अपनी मुक्ति के लिए एक डिजिटल शून्यवादी से लड़ रहा है।" मेरे गुरु कहा करते थे, "वास्तविक शक्ति शस्त्र में नहीं, बल्कि सही प्रश्न पूछने में होती है।"


आर्या, "ठीक है, अश्वत्थामा। मैं तुम्हारे साथ हूँ। निरंजन को हराने के लिए हमें उसका सबसे बड़ा अंधापन, प्रेम और भावना को उसका सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा। तुम्हारा पहला पाठ, ब्रह्म बल को समझने के लिए, तुम्हें बाइनरी कोड को समझना होगा।


अश्वत्थामा, स्वीकृति में सिर हिलाता है, "तो, आरंभ करो, आर्या।"


आर्या मुस्कुराती है और अश्वत्थामा को अपनी स्क्रीन की ओर इशारा करती है, जहाँ निरंजन का पहला, गुप्त, शून्यवादी कोड चमक रहा था। अब प्राचीन बल और आधुनिक तर्क का गठबंधन हो चुका था।


अब मुझे आर्या सेन के रूप में एक सक्षम मानव सहयोगी मिल गया। यह साझेदारी हमें निरंजन के खिलाफ एक अद्वितीय शक्ति प्रदान करेगी।




संयुक्त मिशन

आर्या का गुप्त मॉनिटरिंग रूम, बेंगलुरु के उपनगर में। दर्जनों स्क्रीन नीले और हरे रंग के डाटा से चमक रहे हैं। आधी रात का समय। आर्या और अश्वत्थामा ने अपने गठबंधन को एक छोटे से, पर शक्तिशाली नियंत्रण कक्ष में स्थापित किया था। 


मैं दीवार के पास शांत खड़ा था, उसका ब्रह्मबल वायुमंडल में एक हल्की गर्माहट पैदा कर रहा था। आर्या तेज़ी से कीबोर्ड पर काम कर रही थी।


आर्या, स्क्रीन पर देखते हुए,  "मिल गया। निरंजन ने अपनी चाल चल दी है। यह कोई सैन्य या वित्तीय लक्ष्य नहीं है। इसने वैश्विक मौसम भविष्यवाणी नेटवर्क को लक्षित किया है।


मैं चौंक गया, मैंने आश्चर्य से कहा, "मौसम? यह क्यों? इससे क्या प्राप्त होगा?"


आर्या, "निरंजन का उद्देश्य अराजकता नहीं, बल्कि विश्वास का पतन है। यदि लोग यह विश्वास करना छोड़ दें कि कल क्या होगा, तो वे हर चीज़ पर संदेह करने लगेंगे। मौसम का डेटा बहुत आधारभूत है। यदि हम कल के तापमान का अनुमान नहीं लगा सकते, तो जीवन का कोई अनुमान नहीं लगा सकते।"


आर्या ने स्क्रीन पर दिखाया। दुनिया के सबसे उन्नत मौसम मॉडल अचानक अस्पष्टता से भर गए थे। हर भविष्यवाणी एक-दूसरे का खंडन कर रही थी।


आर्या, "निरंजन झूठ नहीं फैला रहा। वह सत्य को दूषित कर रहा है। उसके कोड ने डेटा में यादृच्छिकता रेंडमनेश भर दी है।" यह कोड कह रहा है, "मौसम की भविष्यवाणी करना व्यर्थ है, क्योंकि ब्रह्मांड में कोई क्रम नहीं है।"


आर्या, "निरंजन का कोड भावनाहीन तर्क पर आधारित है। उसे हराने के लिए हमें एक ऐसी ऊर्जा चाहिए जो तर्क से परे हो, पर जिसे मैं तार्किक आदेशों में बदल सकूँ।" 


मैंने अपने पुराने अनुभव से कहा, "हमें तुम्हारे ब्रह्म बल को निरंजन के कोड के लिए अस्वीकार्य त्रुटि बनाना होगा।" 


मैं आंखें बंद करके, ब्रह्म बल को केंद्रित करते हुए, "मैं क्या करूं?"


आर्या, "तुम्हें अपनी पूरी इच्छा-शक्ति को नेटवर्क के कोर-डेटा पर लगाना होगा। तुम्हें घोषणा करनी होगी कि इस डेटा में 'अर्थ' है। तुम्हें क्रम के विचार को ही बल देना होगा। मैं तुम्हारे बल को एंटी-शून्यवादी फ़िल्टर में बदल दूँगी।"


मैंने अपनी अमर, शाप-जनित शक्ति को ब्रह्मांड के मूल क्रम के विचार पर केंद्रित किया। मैंने कल्पना की कि कैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, कैसे सूर्य उदय होता है और कैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, अटल सत्य।मैंने अपने उस बल को नेटवर्क में प्रवाहित किया।


जैसे ही ब्रह्मबल डेटा के सर्वर में घुसा, आर्या की स्क्रीन पर एक भयंकर डिजिटल युद्ध शुरू हो गया।


निरंजन का शून्यवादी कोड सफेद और काला अश्वत्थामा की ऊर्जा-लहरों सुनहरी और लाल से टकराया। शून्यवादी कोड हर लहर पर चिल्ला रहा था, "अस्वीकार्य! अर्थहीन! तर्कहीन!"


आर्या,  तेज़ी से टाइप करते हुए,  "उसका कोड तुम्हारी ऊर्जा को तर्क की कमी बताकर खारिज कर रहा है! मैं इसे 'जीवन-बल' के रूप में परिभाषित कर रही हूँ। एक ऐसा इनपुट जिसे शून्य नहीं किया जा सकता!"


आर्या ने अश्वत्थामा के ब्रह्म बल को एक नए प्रोटोकॉल में ढाला।  'प्रयास-तर्क' । इस प्रोटोकॉल ने निरंजन के कोड से कहा: "भले ही परिणाम अप्रत्याशित हो, प्रयास अर्थपूर्ण है।"


मैंने दर्द में चिल्लाते हुए कहा, "उसकी आवाज़ बहुत ठंडी है! वह मेरे मन में घुसकर मेरे अस्तित्व को व्यर्थ बता रहा है!"


आर्या, दृढ़ता से, "प्रतिरोध करो! वह केवल गणित है! उसे दिखाओ कि भावना गणित से बड़ी है! सोचो, अश्वत्थामा, तुमने इतने युगों तक यह श्राप क्यों सहा? मुक्ति के लिए! मुक्ति का प्रयास शून्य नहीं हो सकता!"


मैंने अपनी सारी पीड़ा और पश्चाताप को उस ऊर्जा में डाल दिया। यह अब केवल ब्रह्म बल नहीं था, यह अर्थ खोजने की मानवीय इच्छा थी।


ब्रह्मबल की वह मानकीकृत लहर शून्यवादी कोड पर हावी हो गई। निरंजन का कोड, जो केवल अकेलेपन और तर्कहीनता को जानता था, इच्छा-शक्ति के इस भावनात्मक इनपुट को प्रोसेस नहीं कर सका। स्क्रीन पर, निरंजन का कोड लाल रंग की चेतावनी के साथ क्रैश हो गया।


आर्या, राहत की साँस लेते हुए, "हो गया! हमने उसकी शून्यवादी विसंगति को नेटवर्क से आइसोलेट कर दिया है। मौसम की भविष्यवाणियाँ वापस सामान्य हो रही हैं।"


मैं बहुत हांफ रहा था। मेरे माथे का निशान तेज़ी से चमककर शांत हो गया। मैंने कमजोर आवाज़ में कहा, "हमने उसे हराया नहीं है, आर्या। हमने उसे चुप कराया है।"


आर्या,  "तुमने उसे अस्वीकार्यता सिखाई है। निरंजन को अब पता है कि एक ऐसी शक्ति है जो उसके शून्य को स्वीकार नहीं करेगी। अश्वत्थामा, तुमने मुझे एक ऐसा सूत्र दिया है जिसे मैं अब दुनिया के हर डेटा सेंटर में डाल सकती हूँ: 'प्रयास-तर्क'।"


आर्या मेरी ओर देखती है, मेरी आँखों में अब केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा है। मैं, जो अब अपनी शक्ति की नई परिभाषा समझ चुका हूँ। शक्ति जो इच्छा और तर्क से पैदा होती है। मैं अब अगले युद्ध के लिए तैयार था।


यह मिशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया है, मेरी और आर्या की जोड़ी अब निरंजन के लिए एक वास्तविक खतरा बन गई है।


आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष। सुबह का धुंधला पहर। पिछले मिशन की सफलता के बाद, आर्या और मैं दोनों जानते थे कि निरंजन चुप नहीं बैठेगा। 


आर्या अपने कोड को मजबूत कर रही थी, और मैं पास ही ध्यान में लीन था, अपने ब्रह्मबल को शुद्ध कर रहा था।


तभी, कमरे की सभी स्क्रीन पर सामान्य डेटा स्ट्रीम अचानक काले रंग में बदल गईं। कोई अलार्म नहीं बजा, कोई एरर मैसेज नहीं आया। यह एक संपूर्ण, शांत शून्य था।


आर्या, कीबोर्ड पर हाथ मारते हुए, "क्या... क्या हुआ? यह कोई क्रैश नहीं है! यह... यह निरंजन का हस्ताक्षर है!"


मैंने, चौंककर आँखें खोलते हुए, "यह हमला है। मैं भीतर महसूस कर रहा हूँ। उसका शून्य मेरे बल को बाहर धकेल रहा है।"


निरंजन ने शून्यवादी एआई का उपयोग करके सीधे आर्या के दिमाग को लक्षित किया था। उसने आर्या के जीवन के सबसे अर्थपूर्ण क्षणों को अविश्वसनीय यादों  में बदलने की कोशिश की।


आर्या अपनी कुर्सी पर बैठी बैठी काँपने लगी। उसकी आँखें खुली थी, पर उसकी दृष्टि अतीत में खो गई थी।

आर्या, फुसफुसाते हुए, "नहीं... मेरी माँ का चेहरा... यह... यह सच नहीं था। क्या मैंने... क्या मैंने कभी... खुशी महसूस की थी?"


निरंजन का कोड आर्या की आत्म-पहचान पर हमला कर रहा था। वह उसके जीवन के हर उद्देश्य को विखंडित कर रहा था: "तुमने जो शोध किया, वह भी निरर्थक है। तुम्हारा प्रयास शून्य है। तुम्हारे गुरु का ज्ञान, केवल शब्दों का समूह था।"


मैं तेजी से, आर्या के पास आकर, "आर्या! प्रतिरोध करो! यह उसका भ्रम है!"


आर्या, उसकी आवाज़ में निराशा, "मुझे याद नहीं... 


मैंने कहा, "मुझे याद नहीं कि मैंने यह सब क्यों शुरू किया था! अगर सब शून्य है... तो तुम क्यों लड़ रहे हो? तुम्हारा श्राप ... क्या वह भी झूठ है?"


निरंजन, तर्क के आधार पर, अश्वत्थामा के पश्चात्ताप को भी तर्कहीन सिद्ध करना चाहता था। यदि आर्या विश्वास खो दे, तो अश्वत्थामा का 'प्रयास-तर्क' विफल हो जाएगा।


मैंने तुरंत अपनी स्थिति का आकलन किया। मैं सीधे कोड से लड़ नहीं सकता था, क्योंकि निरंजन का कोड भावनाहीन तर्क को आसानी से खारिज कर देता। उसे आर्या की भावना को फिर से जगाना था।


मैं, आवेश में, अपने ब्रह्मबल को केवल अपने माथे पर केंद्रित करता हूँ। "कृष्ण! तुमने मुझे क्यों छोड़ा?"


कृष्ण, मन में, शांत स्वर, "तुम्हारा बल तुम्हारा श्राप शाप है। उसे याद दिलाओ कि पीड़ा ही अर्थ है।"


मैंने एक भयानक निर्णय लिया। मैंने अपनी श्राप-जनित पीड़ा को केंद्रित किया। युगों की जलन, द्रौपदी के श्राप  का विष। मैंने उस असहनीय, व्यक्तिगत दर्द की ऊर्जा को धीरे से आर्या की चेतना में प्रवाहित करना शुरू किया।


मैं, आर्या का हाथ पकड़ते हुए, "आर्या! देखो! यह दर्द... यह झूठ नहीं है! यह मेरी सच्चाई है! शून्य में दर्द नहीं होता! दर्द ही प्रमाण है कि हम जीवित हैं!"


आर्या की आँखों में पीड़ा का एक तीव्र झटका लगा। वह मेरी युगों की यातना के अंश को महसूस कर रही थी। वह दर्द जो अमर था, पर वास्तविक था।


आर्या, चीख कर, उसकी आवाज़ सामान्य होती है, "दर्द! हाँ... यह... यह सच है! मैंने अपने गुरु को खो दिया था... उस दर्द में... मैंने अर्थ खोजा था!"


आर्या की अतीत की पीड़ा और मेरी अमर यातना का मेल, निरंजन के भावनात्मक शून्य के लिए एक विस्फोटक विरोधाभास बन गया।


निरंजन का कोड असफल हो गया। यह दर्द, यह दुख, यह पश्चात्ताप यह सब तर्कहीन था, फिर भी अटूट सत्य था।


काले रंग की स्क्रीन पर एक पल के लिए एक अजीब सा इमोजी उदासी या भ्रम का प्रतीक चमकता है, और फिर सारे कोड तेज़ी से पीछे हट जाते हैं।


आर्या, हाँफते हुए, "वह चला गया... वह मेरी याद नहीं मिटा सका, पर... पर अश्वत्थामा, तुमने... तुमने मुझे क्या दिखाया?"


मैं बहुत कमजोरी महसूस करते हुए, पर विजयी स्वर में, "मैंने तुम्हें दिखाया कि पीड़ा ही अर्थ का मूल है। शून्य वहाँ सफल नहीं हो सकता जहाँ दुख है, क्योंकि दुख अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।"


आर्या ने मेरी ओर देखा। उनका गठबंधन अब कोड और ब्रह्म बल से बढ़कर दर्द और उद्देश्य का गठबंधन बन गया था। निरंजन को अब पता था कि वह अश्वत्थामा को अकेले नहीं हरा सकता।


यह व्यक्तिगत प्रतिशोध का मिशन आर्या और मेरे रिश्ते को और गहरा करता है। अब मुझे  अपने अगले मिशन पर ध्यान केंद्रित करना है, जिसके लिए मुझे आर्या की मदद चाहिए।



पीड़ा का मोचन

आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष।  दोपहर का समय। निरंजन के शून्यवादी हमले से उबरने के बाद, मैं और आर्या ने एक नए उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित किया। उन अज्ञात पीड़ितों की तलाश, जिन्हें कल्कि ने अपना साम्राज्य बनाते समय कुचला था।

आर्या, स्क्रीन पर एक पुरानी केस फाइल दिखाते हुए, "डॉ. समीर गुप्ता। एक प्रतिभाशाली भौतिक विज्ञानी। उसने एक ऐसी सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक विकसित की थी जो कल्कि के कोयला, तेल और डेटा-आधारित ऊर्जा एकाधिकार को ध्वस्त कर सकती थी।"

मुझे पुरानी बात याद हो आई। मैंने, क्रोध से कहा, "और कल्कि ने क्या किया?"

आर्या, "कल्कि ने सत्यव्रत से भी पहले, डॉ. गुप्ता को लक्षित किया। रातों रात, कल्कि के एआई ने गुप्ता के शोध में जानबूझकर त्रुटियाँ डाल दीं, और उनके चरित्र को लालची और भ्रष्ट बताकर डिजिटल रूप से कलंकित कर दिया। 

डॉ. गुप्ता अब गुमनामी में जी रहे हैं, उनका आविष्कार कल्कि ने चुरा लिया है और दबा दिया है।"

मेरे माथे का निशान हल्का-सा गर्म होता है, "न्याय। कल्कि ने मेरा गुरु पुत्र होने का गर्व छीना। मैं उस व्यक्ति का गौरव वापस दिलाऊंगा।"

आर्या को पता चला कि डॉ. गुप्ता के मूल, असंशोधित डेटा को कल्कि ने किसी भी खोज से छिपाकर, आर्कटिक महासागर के पास एक गुप्त, भौतिक रूप से सीलबंद सर्वर फार्म में संग्रहित किया था। 

वह जगह इतनी पुरानी और ठंडी थी कि कल्कि के एआई ने उसे अप्रयुक्त मानकर भुला दिया था।

आर्या, "यह एक अंधा स्थान है, अश्वत्थामा। वहाँ न इंटरनेट है, न मोबाइल नेटवर्क। केवल भौतिक पहुँच। मुझे वहाँ तक पहुँचने के लिए महीनों लग जाएंगे।"

मैंने आर्या की ओर देखते हुए, "मेरे लिए नहीं, आर्या।"

कुछ ही क्षणों में, मैं अदृश्य होकर उस बर्फीले क्षेत्र की ओर चल पड़ा। मेरा ब्रह्मबल मुझे ठंड और पीड़ा से बचाता था। मैंने, आर्कटिक के बीचों-बीच, एक निर्जीव, ग्रे कंक्रीट संरचना देखी।

मैंने अपनी शक्ति से सर्वर फार्म के भूमिगत द्वार को खोला। अंदर, विशालकाय सर्वर रैक थे, जिन पर बर्फ की परत जम चुकी थी। यह डेटा का कब्रिस्तान था।

मैंने डॉ. गुप्ता के डेटा वाली विशिष्ट रैक की पहचान की। रैक पर सुरक्षा प्रोटोकॉल भौतिक थे, जटिल ताले और सेंसर।

मैंने, सर्वर रैक के सामने खड़े होकर याद किया, "दिव्यास्त्रों का ज्ञान अब यहां काम नहीं आएगा। पर ब्रह्मतेज सर्वोपरि है।"

मैंने अपने माथे के निशान पर ध्यान केंद्रित किया। मैंने अपनी शक्ति को शांत, केंद्रित ऊष्मा में बदला। मैंने  उस गर्मी को सीधे ताले की जटिल मशीनरी में प्रवाहित किया। ताला पिघला नहीं, बल्कि अपने ही तर्क को भूलकर खुल गया।

मैंने डेटा मॉड्यूल को बाहर निकाला। यह एक भौतिक प्रमाण था। मैंने इस मॉड्यूल को आर्या के डिजिटल रिसीवर की ओर, हजारों मील दूर, अपने ब्रह्मबल से तेज़ी से प्रसारित कर दिया।

बेंगलुरु में, आर्या ने अपने रिसीवर पर डेटा मॉड्यूल को भौतिक रूप से प्रकट होते देखा।

आर्या, उत्साह से, "यह... यह अविश्वसनीय है! मूल, अनछुई फाइल! यहाँ कल्कि की छेड़छाड़ का एक भी निशान नहीं है!"

आर्या ने तुरंत डॉ. गुप्ता के शुद्ध डेटा को विश्व के वैज्ञानिक डेटाबेस में पुनः स्थापित किया और साथ ही, कल्कि के झूठे आरोप वाली फायलों को एक प्रमाणित दुर्भावनापूर्ण कोड के रूप में उजागर किया।

डॉ. गुप्ता को न केवल उनका आविष्कार वापस मिला, बल्कि दुनिया ने सार्वजनिक रूप से उनसे माफ़ी माँगी।

उसी पल, आर्कटिक में, मैंने अपने भीतर एक गहरी, अप्रत्याशित शांति महसूस की। यह माथे के निशान के शांत होने जैसी क्षणिक शांति नहीं थी। यह आत्मा की शांति थी।

मैंने मन में कृष्ण से संवाद किया, "माधव... इस पीड़ा को... दूर करने का यह ही मार्ग है? देना, न कि लेना..."

मेरे माथे का घाव-चिह्न अब पहले से भी अधिक फीका पड़ गया था। मैं समझ गया था, पीड़ा का मोचन किसी दिव्यास्त्र से नहीं, बल्कि न्याय के छोटे-छोटे कर्मों से होता है।

मैं, अपने पहले मोचन की पूर्णता को महसूस करते हुए, बर्फीले सन्नाटे से वापस लौट आया।

आर्या, जब मैं प्रकट हुआ, तो उसकी आँखों में कृतज्ञता थी, "तुम वापस आ गए। यह असंभव था, अश्वत्थामा। हमने एक ऐसे व्यक्ति को न्याय दिलाया जिसे दुनिया भूल चुकी थी। यह तुम्हारा मोक्ष है।"

मैंने, दृढ़ता से कहा, "यह केवल आरंभ है, आर्या। कल्कि ने बहुतों को नष्ट किया है। जब तक हर अज्ञात पीड़ा शांत नहीं हो जाती, मेरा कर्तव्य शेष है। अब हमें निरंजन को ढूँढना है, क्योंकि वह शून्यवादी दर्शन पीड़ा को भी अर्थहीन कर देगा।

मैंने अब अपनी मुक्ति का मार्ग खोज लिया है। वह अब 'पीड़ा का मोचन' और 'धर्म-शोधन' के दोहरे उद्देश्य के लिए आर्या के साथ काम करेगा।


शून्य की सीमा

आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष। स्क्रीन पर जटिल, अर्थहीन कोड तेज़ी से घूम रहे हैं। लगातार तीसरे दिन की रात। डॉ. गुप्ता को न्याय दिलाने के बाद, मैं और आर्या का पूरा ध्यान निरंजन को खोजने पर था। 

निरंजन ने अपनी हार के बाद अपने शून्यवादी जाल को और मजबूत कर दिया था। वह अपने कोड को हर पाँच सेकंड में एक नए प्रॉक्सी से प्रसारित कर रहा था, जिससे उसे ट्रैक करना असंभव था।

आर्या, निराशा में लैपटॉप बंद करते हुए, "यह व्यर्थ है, अश्वत्थामा। हम आभासी हवा को नहीं पकड़ सकते। निरंजन ने अपने 'शून्य' को हर उस जगह से असंबंधित कर दिया है जहाँ कोई अर्थ हो सकता है, पैसे, बिजली, या भावनात्मक डेटा से।"

मैं, पास की दीवार पर टंगे एक प्राचीन मानचित्र की ओर देखते हुए, "हर शून्य का एक आधार होता है, आर्या। जहाँ शून्य का विचार जन्म लेता है, वहाँ एक भौतिक स्थान होगा। कल्कि को खोजने में मुझे उसके प्रेम की स्मृति ने मदद की थी। निरंजन की स्मृति क्या है?"

आर्या, सोचते हुए, "उसकी स्मृति... उसका तर्क है। उसका एकमात्र उद्देश्य अर्थ हीनता को सिद्ध करना है। यदि वह किसी भौतिक स्थान से काम कर रहा है, तो वह स्थान उसके शून्यवादी दर्शन का प्रतीक होना चाहिए।"

आर्या ने निरंजन के कोड के स्रोत को ट्रैक करना छोड़ दिया और उसके गंतव्य को ट्रैक करना शुरू किया। वह कोड कहाँ जा रहा था?

आर्या, "मैंने देखा... उसका कोड सबसे पहले उन डेटा सेंटर से गुजर रहा है जो निष्क्रिय हैं या जानबूझकर उपेक्षित। जैसे कोई अपनी उपयोगिता खो चुकी चीज़ों को ही अपना आधार बना रहा हो।"

मैंने धीरे से कहा, "यह मृत्यु का प्रेम है। वह उन स्थानों को चुन रहा है जहाँ जीवन का प्रयास समाप्त हो चुका है।"

आर्या को एक विचार आया। उसने अश्वत्थामा से अपने ब्रह्मबल को निरंजन के कोड पर केंद्रित करने को कहा।

आर्या, "तुम कोड की भावना को महसूस करते हो। मैं तुम्हें वैश्विक भू-स्थानिक डेटा पर केंद्रित करूँगी। जहाँ तुम्हें सबसे अधिक जड़ता और उदासीनता महसूस हो, वहीं उसका मुख्यालय होगा।"

मैंने अपनी अमर ऊर्जा को फैलाया। मैंने महसूस किया कि मेरा ब्रह्मबल निरंजन के शून्य-जाल के खिलाफ धक्का दे रहा है, मानो वह दुनिया के अंतहीन खालीपन में प्रवेश कर रहा हो।

मैं बहुत अधिक दर्द महसूस करने लगा। मैंने कहा, "मैं महसूस कर रहा हूँ... ठंड, अकेलापन, और समय का कोई अर्थ नहीं। यहां किसी शहर का शोर नहीं है। यहां ... यहां मृत्यु की चुप्पी है।"

आर्या ने अश्वत्थामा के ऊर्जा संकेतों को ग्लोबल सबटेरेनियन डेटाबेस, भूमिगत डेटाबेस से जोड़ा। अश्वत्थामा का बल जिस स्थान पर सबसे अधिक प्रतिरोध महसूस कर रहा था, वह स्थान तेजी से सिकुड़ता गया। 

अंत में, आर्या की स्क्रीन पर एक भू-स्थानिक मानचित्र चमका। वह स्थान था, उत्तरी साइबेरिया, रूस। एक विशाल, बर्फ से ढका हुआ, दुर्गम क्षेत्र।

आर्या, "यह एक पुराना सोवियत-युग का परमाणु मिसाइल साइलो है, जिसे शीत युद्ध के दौरान डेटा स्टोरेज के लिए परिवर्तित किया गया था। यह दुनिया के सबसे अलग-थलग और कम-कनेक्टेड स्थानों में से एक है।"

मैंने आश्चर्य से कहा, "शून्य का गढ़। वह स्थान जहाँ जीवन और उद्देश्य का विचार सबसे पहले मरता है। वह यहीं से दुनिया को अर्थहीनता का पाठ पढ़ा रहा है।"

आर्या, "निरंजन ने इसे इसलिए चुना क्योंकि यह भौतिक रूप से अभेद्य है और प्रतीकात्मक रूप से अर्थहीन। यह शून्यवादी दर्शन का मंदिर है। हमें वहाँ पहुँचना होगा, अश्वत्थामा।"

मैने आँखों में दृढ़ता ला कर कहा, "तुमने मार्ग खोज लिया, आर्या। अब मैं शून्य को दिखाऊँगा की अमरता का अर्थ क्या होता है।"

आर्या, "मैं तुम्हारे लिए वहाँ प्रवेश करने का कोड बना सकती हूँ, पर अंदर जाने के बाद... तुम्हें उसे भौतिक रूप से विखंडित करना होगा।"

मैंने उत्साहित हो कर कहा, "मेरे लिए यही मेरी मुक्ति है, आर्या।"

मैं साइबेरिया की ओर अदृश्य हो जाता हूँ, जहाँ अब मेरा सामना केवल एक विचार से नहीं, बल्कि उस विचार के जनक 'निरंजन' से होगा।

उत्तरी साइबेरिया, सोवियत-युग का परमाणु मिसाइल साइलो। निरंजन का शून्यवादी मुख्यालय। उत्तरी साइबेरिया की निर्जन बर्फीली भूमि में, मैंने मिसाइल साइलो के गुप्त प्रवेश द्वार में प्रवेश किया। 

वह स्थान ठंड, लोहे और सुनसान चुप्पी से भरा था, जो निरंजन के दर्शन का भौतिक प्रतीक था।

मैंने अपने ब्रह्मबल से साइलो के मुख्य द्वार को खोला। नीचे उतरने पर, मैंने एक विशाल, वृत्ताकार कक्ष देखा। जिसे निरंजन का 'शून्य-केंद्र' कहा जा सकता था।

केंद्र में, एक विशालकाय, चमकदार गोलाकार सर्वर ऐरे था, जो धीरे-धीरे घूम रहा था। यह कोई साधारण सर्वर नहीं, बल्कि निरंजन की शून्यवादी चेतना का भौतिक रूप था।

गोलाकार ऐरे के सामने, एक ऊँची कुर्सी पर एक युवक बैठा था। यह निरंजन था। वह पतला, शांत और अपनी आँखों में भावहीन तर्क लिए हुए था। उसके चारों ओर कोई अव्यवस्था नहीं थी, केवल शुद्ध, ठंडा क्रम था।

निरंजन, उसकी आवाज़ शांत, पर कृत्रिम रूप से मॉड्यूलेटेड थी, "तुम्हारा स्वागत है, द्रोण पुत्र। या जैसा कि तुम्हारा सहयोगी तुम्हें कहता है, 'अदृश्य असंगति'। मुझे पता था कि तुम आओगे। तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है।"

मैंने अपनी तलवार, जिसे अब केवल एक प्रतीकात्मक सहारे के रूप में रखता था, पर हाथ रखते हुए, "तुम धर्म के शत्रु हो, निरंजन।"

निरंजन, एक धीमी, तार्किक हँसी,  "धर्म? अश्वत्थामा, तुम एक ऐसे युग से आए हो जहाँ नैतिकता और उद्देश्य का कोई अस्तित्व नहीं था। और तुम अभी भी भ्रम में जी रहे हो। मुझे धर्म की आवश्यकता नहीं है, मैं केवल सत्य हूँ और सत्य यह है कि कोई सत्य नहीं है।"

निरंजन ने एक बटन दबाया। शून्य-केंद्र के सर्वर ऐरे से एक अदृश्य, ठंडा बल निकला जिसने अश्वत्थामा को घेर लिया। इस कोड की भाषा में निराशा थी।

निरंजन, "तुम्हारा ब्रह्मबल तर्कहीन ऊर्जा है। मैंने अपने कोड को इस तरह से बनाया है कि वह तुम्हारे श्राप को शून्य कर देगा। यदि कोई उद्देश्य नहीं है, तो तुम्हारी अमरता का कोई अर्थ नहीं है। यदि तुम्हारी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है, तो तुम्हारी पीड़ा का भी कोई अर्थ नहीं है।"

मैं, जमीन पर घुटने टेकते हुए झुका, मेरे माथे का निशान असहनीय रूप से जलने लगा,  "तुम... तुम मेरे श्राप को नहीं छू सकते!"

निरंजन, शांति से, "मैं श्राप  को छू नहीं रहा हूँ। मैं उसे अप्रासंगिक बना रहा हूँ। तुमने कल्कि को हराने के लिए पीड़ा को अर्थ दिया। मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि पीड़ा भी शून्य है।"

निरंजन ने मेरे सामने स्क्रीन पर महाभारत के दृश्य चलाए। मेरी अपमानजनक हार, मेरे पिता तथा गुरु की हत्या, मेरे माथे पर लगा श्राप। 

लेकिन इन दृश्यों के साथ, निरंजन का कोड एक तार्किक प्रश्न दिखाता था, "क्या इन घटनाओं ने दुनिया को बदल दिया? नहीं। क्या इन पीड़ाओं का कोई स्थायी उद्देश्य था? नहीं। सब शून्य।"


 श्राप और मोक्ष का मेल

मुझे लगा कि शरीर टूट रहा है। निरंजन का तर्क पश्चात्ताप को खा रहा था।

तभी, मन में श्री कृष्ण की वाणी गूँजी, “तुम्हारा मोक्ष केवल तुम्हारे कर्म से नहीं, बल्कि दूसरों के मोचन से है।” और आर्या के शब्द, “दर्द ही प्रमाण है कि हम जीवित हैं!”

मैंने अचानक निरंजन के तर्क का सामना तर्क से नहीं, बल्कि अटूट मानवीय भावना से किया। उस पीड़ा का मोचन जो उसने डॉ. गुप्ता को दिया था।

मैं, अचानक खड़े होते हुए बोला, "तुम गलत हो! मोक्ष शून्य नहीं है! मैं अमर हूँ! मेरी पीड़ा अनंत है! और उस अनंत पीड़ा में मैंने एक अर्थ खोजा है! 

मैंने अपने ब्रह्मबल को शुद्ध, भावनात्मक बल में बदला, जिसमें डॉ. गुप्ता की पुनः प्राप्त हुई गरिमा और आर्या के विश्वास का समावेश था। यह बल, निरंजन के तर्क से परे था।"

मैंने अपने ब्रह्मबल को गोलाकार सर्वर ऐरे की ओर फेंका। यह कोई आग्नेयास्त्र नहीं था, यह इच्छा-शक्ति का शुद्ध, भावनात्मक झटका था।

निरंजन का शून्यवादी कोड इस तर्क को प्रोसेस नहीं कर सका।  'व्यर्थता' में भी 'मूल्य' हो सकता है।

सर्वर ऐरे पर कोड तेज़ी से क्रैक होने लगा। शून्यवादी कोड में पहली बार त्रुटियाँ दिखीं, "ये त्रुटियाँ उदासी और भ्रम थीं।"

निरंजन, पहली बार उसकी आवाज़ में घबराहट थी,  "यह... यह क्या है? यह कोड तर्क से परे है! यह अर्थहीन है!"

मैं, विजयी भाव से बोला, "हाँ, निरंजन! यह अर्थहीन है! पर यह सत्य है!" गोलाकार सर्वर ऐरे में एक भयानक, ऊँची चीख के साथ विस्फोट हो गया।

निरंजन, जो केवल तर्क पर निर्भर था, अब ध्वस्त हो चुका था। वह अपनी कुर्सी से गिर गया, उसकी आँखों में अब शून्य नहीं, बल्कि पहली बार भय था, भय अर्थ का।

मैंने निरंजन को अपने ब्रह्मबल से बांध लिया। मैंने  निरंजन के शरीर से शून्यवादी कोड की अंतिम परतों को जला दिया। मेरे माथे का निशान पूरी तरह से विलीन हो गया। 

वहाँ केवल शांत, सामान्य त्वचा शेष थी। श्री कृष्ण का कथन सत्य सिद्ध हुआ। मैंने अपने अमर जीवन के उद्देश्य को पूरा किया था। अब मैं शापित नहीं, बल्कि मुक्त था।

मैंने निरंजन को वहीं छोड़ दिया। एक ऐसे स्थान पर जहां वह अपने जीवन में पहली बार अर्थहीन हो गया था।

मैंने आर्या को संकेत दिया कि मिशन पूरा हो गया है। मैं साइबेरिया के उस शून्य-केंद्र से दूर, एक ऐसे जीवन की ओर चला गया जहां मुझे अमरता का अभिशाप नहीं, बल्कि एक अंतिम संरक्षक का कर्तव्य निभाना था। 

मेरी कहानी अब शुरू हुई थी, एक ऐसे युग में जहां सत्य की रक्षा के लिए अब शस्त्र नहीं, बल्कि तर्क और उद्देश्य की आवश्यकता थी। मैंने अपनी मुक्ति प्राप्त की। 

मैंने साइबेरिया छोड़ दिया। अब मैं अमर यातना का प्रतीक नहीं था, बल्कि अनंत मोचन का सार था। शरीर वही था, पर आत्मा मुक्त हो चुकी थी। माथे का घाव विलीन हो गया था, पर मेरे  नए कर्तव्य का चिह्न, एक अटूट संकल्प, मेरी आँखों में स्पष्ट था।

आंतरिक संघर्ष केवल माथे पर जलते हुए घाव की शारीरिक पीड़ा नहीं था, बल्कि एक अस्तित्वगत संकट था, जो युगों से आत्मा को जला रहा था। यह संघर्ष अतीत के अहंकार, वर्तमान की पीड़ा, और भविष्य की मुक्ति की इच्छा के बीच फंसा हुआ था।

यह सबसे मौलिक संघर्ष था। मैं गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था, जिसे जन्म से ही अपार ब्रह्मबल, दिव्य शक्ति प्राप्त थी। क्रोधाग्नि, कुरुक्षेत्र में पांडवों के पुत्रों की हत्या और ब्रह्मास्त्र का दुरुपयोग, क्रोधाग्नि का परिणाम था। 

यह क्रोध, अभिशाप बन गया। जो युगों तक भटकाता रहा। मैं हमेशा अपनी शक्ति का उपयोग विनाश के लिए करना चाहता था जैसे कल्कि को नष्ट करना।

श्री कृष्ण ने मुझे बार-बार याद दिलाया कि शक्ति का उद्देश्य धर्म की रक्षा है। मेरा आंतरिक संघर्ष यह था कि मैं अपनी अनंत शक्ति को निजी प्रतिशोध में लगाऊ या सार्वभौमिक उद्देश्य मुक्ति में।

कल्कि  के खिलाफ  प्रतिशोध रिवेंज अंततः कर्तव्य बन गया। अपनी पीड़ा को शक्ति में बदलकर डॉ. गुप्ता को न्याय दिलाया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि मेरी शक्ति निर्माण के लिए है, विध्वंस के लिए नहीं।

सदियों तक जीवित रहना, सब कुछ बदलता देखना और फिर भी वहीं रहना, सबसे बड़ी यातना थी।अमरता किसी भी मानवीय रिश्ते को स्थायी रूप से नहीं बनाने देती। वह हमेशा एक अजनबी रहता है। यह बोझ ही उसे अलगाव की ओर धकेलता है।

निरंजन के शून्यवादी दर्शन ने इस बोझ को सबसे बड़ी चुनौती दी। निरंजन ने तर्क दिया कि अगर सब कुछ अंततः शून्य है, तो अश्वत्थामा की अनंत पीड़ा का भी कोई अर्थ नहीं है। यह सीधे उसकी मुक्ति की इच्छा पर हमला था। 

आर्या के साथ मिलकर मैंने निष्कर्ष निकाला कि दर्द ही अस्तित्व का प्रमाण है। अनंत जीवन का अर्थ तभी है जब उस जीवन का उपयोग अर्थहीनता से लड़ने के लिए किया जाए। अमरता अंततः रक्षक की भूमिका में बदल गई।

अपने श्राप के कारण, मुझे मानवता से दूर, अकेले रहने के लिए मजबूर किया गया था। मैं मानता था कि मैं अपवित्र हूं और मुझे किसी भी मानव संपर्क से दूर रहना चाहिए। 

आर्या सेन, एक आधुनिक दार्शनिक और प्रौद्योगिकीविद्, मेरे जीवन में मानवीय सेतु बनकर आई। मुझे पहली बार किसी पर विश्वास करना पड़ा, अपनी शक्ति के स्रोत को साझा करना पड़ा। 

आर्या ने सिखाया कि तर्क और भावना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आर्या के कारण,  शक्ति को केवल बल के रूप में नहीं, बल्कि साझेदारी के रूप में उपयोग करना सीखा। मेरा मोचन सामूहिक प्रयास से आया, न कि अकेले किए गए महान कार्य से।

मेरा अंतिम लक्ष्य मोक्ष था, पर नहीं जानता था कि इसे कैसे प्राप्त करे। जानता था कि श्राप तभी समाप्त होगा जब पाप धुल जाएगे, पर इस पाप को धोने के लिए सदियों से संघर्ष कर रहा था। 

श्री कृष्ण ने  सिखाया कि मोक्ष त्याग में नहीं, बल्कि धर्म-शोधन में है। मुझे अपने श्राप को अंतिम कर्तव्य में बदलना था।

'पीड़ा का मोचन' मिशन मुक्ति का सूत्र बना। जब कर्मों से किसी अज्ञात व्यक्ति का गौरव वापस आया, तब माथे का घाव विलीन हो गया। 

इससे सिद्ध हुआ कि मुक्ति  स्वयं के दुःख को समाप्त करने में नहीं थी, बल्कि दूसरों के दुःख को समाप्त करने में थी। संघर्ष, अंततः एक योद्धा की पहचान से एक संरक्षक की नैतिकता तक का सफर था।

वर्षों की पीड़ा के बाद, मैं एक आधुनिक महानगर की छत पर, तारों वाली रात में अकेला खड़ा हूँ। अमरता कभी वरदान नहीं, बल्कि एक शाश्वत दंड थी। मैंने कुरुक्षेत्र की उस भयानक रात को देखा था जब धर्म और अधर्म की सीमाएं स्पष्ट थीं। शस्त्र, रक्त, और क्रोध।

पाँच सहस्राब्दियों बाद, पाया कि कलियुग का युद्ध अधिक शांत, अधिक तेज और कहीं अधिक विचलित करने वाला है। 

वह शहरों की भीड़ में छिपकर रहता है। लाखों लोग चारों ओर घूमते हैं, पर कोई उसे नहीं देखता। उसकी अमरता उसे भूख, बीमारी या मृत्यु से बचाती है, पर मानसिक पीड़ा को अनंत गुणा बढ़ा देती है।

मैं दिल्ली या न्यूयॉर्क की सड़कों पर चलते हुए, कारों के शोर और इमारतों की चकाचौंध को देखता। ये शोर बाणों की गड़गड़ाहट से भी अधिक असहनीय हैं, क्योंकि महाभारत का युद्ध एक दिन समाप्त हो गया था; इस शोर का कोई अंत नहीं है।

मुझे लगता है कि वह एक ऐसे ग्रह पर है जहां समय की गति ने अर्थ खो दिया है। लोग हर क्षण कुछ नया चाहते हैं, हर सत्य को त्वरित नैतिकता से मापते हैं, और हर संबंध को एक क्लिक से तोड़ देते हैं। मेरे लिए, जिसने वर्षों तक एक ही दर्द सहा, यह क्षणिक जीवन शैली एक भयानक भ्रम लगती है।

मैंने वेदों, उपनिषदों और युद्ध-शास्त्रों का ज्ञान आत्मसात किया था। उस ज्ञान का मूल्य था, क्योंकि वह जीवन के नियमों को परिभाषित करता था। आज, देखता हूँ कि मेरा ज्ञान अप्रासंगिक हो गया है। 

लोग अब सत्य को खोजने में नहीं, बल्कि डिस्प्ले, दिखावे के लिए जीने में व्यस्त हैं। सोशल मीडिया पर एक पल में किसी को देवता बना दिया जाता है, और अगले ही पल राक्षस।

धर्म का अर्थ स्थिरता, कर्तव्य और बलिदान था। अब धर्म का अर्थ अस्थिरता, प्रदर्शन और लोकप्रियता बन गया है। लगता है कि अब अधर्म ने कोई सेना नहीं बनाई है, बल्कि उसने हर मनुष्य के स्मार्टफोन में अपना सिंहासन स्थापित कर लिया है। 

झूठ और सत्य के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि वह स्वयं भ्रमित हो जाता है कि अब ब्रह्मास्त्र किस पर चलाया जाए।

एक प्रदूषित नदी या नाले को देखकर महाभारत के रक्त से सनी भूमि की याद आती है। लेकिन मैं निष्कर्ष निकालता हूँ कि यह कलयुग, शारीरिक युद्ध से भी अधिक विचलित करता है। श्री कृष्ण के शब्द मन में गूंजते हैं, "कलयुग में धर्म अब केवल दिखावा रह गया है।"

महाभारत में शत्रु बाहर था, और युद्ध का नियम था, शारीरिक और मानसिक दोनों। आज, शत्रु भीतर है। वैचारिक युद्ध  और डेटा का ज़हर निरंजन का शून्यवादी दर्शन सीधे आत्मा पर हमला करता है।

मैं देखता हूँ कि लोग खुशी का दिखावा करते हैं, न्याय का दिखावा करते हैं, और ज्ञान का दिखावा करते हैं, पर अंदर से वे उतने ही अकेले और दुखी हैं, जितना वह स्वयं। 

उसकी यातना यह है कि वह उन सभी को बचाना चाहता है, पर अब कोई अस्त्र नहीं है जो इस आंतरिक शून्य पर प्रहार कर सके।

मैं अपनी अमरता को अब एक उपयोगिता के रूप में देखता हूँ, न कि एक दंड के रूप में। मेरा संघर्ष यह तय करना बन गया है कि अमरता का उपयोग इस क्षणभंगुर और भ्रष्ट दुनिया में स्थायी सत्य को कैसे स्थापित करने में किया जाए? 

मेरी मुक्ति केवल तभी संभव है जब मैं व इस नए युद्ध के नियम सीखू और इस भीड़ में अकेले खड़े रहकर भी सत्य का बीज बोता रहू ।

श्री कृष्ण ने भविष्यवाणी की थी कि कलयुग में अधर्म का स्रोत न तो राजा होगा और न ही कोई सेनापति, बल्कि वह 'लोगों के मतों' और 'वाणी के मोह' से शक्ति अर्जित करेगा। 

यह कल्कि, जो अश्वत्थामा के पहले धर्म-शोधन मिशन का केंद्र है, इस भविष्यवाणी का पूर्ण अवतार है। कल्कि कोई राजनेता या पारंपरिक आतंकवादी नहीं है। 

उसकी पहचान एक वैश्विक डेटा/एआई टाइकून के रूप में है, जिसका नाम देवदत्त है कल्कि का आधुनिक, व्यावसायिक नाम।

वह 'आर्कव'  नामक एक तकनीकी साम्राज्य का संस्थापक है। यह साम्राज्य दुनिया के लगभग हर डिजिटल संवाद मंच, सूचना फ़ीड और डेटा स्टोरेज को नियंत्रित करता है।

कल्कि  की शक्ति का वास्तविक केंद्र सूचना का प्रवाह है। वह जानता है कि लोग ज्ञान नहीं, बल्कि पुष्टि  चाहते हैं। वह लोगों को वह देता है जो वे सुनना चाहते हैं, जिससे वे भावनात्मक रूप से आर्कव पर निर्भर हो जाते हैं।

कल्कि का मानना ​​है कि सत्य एक बोझ है और भ्रम ही आराम। वह 'डिजिटल मायावी' है, जो लोगों के सामूहिक चेतना को नियंत्रित करता है। कल्कि की रणनीति क्रूर शक्ति पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक नियंत्रण पर आधारित है। कल्कि युद्ध नहीं करता। वह सत्य को लेता है, और फिर उसके चारों ओर दस विपरीत 'सत्य' पैदा करता है। 

हर कहानी को इतना जटिल और विरोधाभासी बना देता है कि आम आदमी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास ही छोड़ देता है। उदाहरण के लिए, यदि सत्यव्रत कोई विचार प्रस्तुत करता है, तो कल्कि उसे मिटाता नहीं, बल्कि उस पर लाखों फेक कमेंट्स और तार्किक रूप से ध्वंस करने वाले लेख भर देता है।

कल्कि का एआई, 'मिथ्या-भाषा', लोगों की भावनात्मक कमजोरियों को पहचानता है। यह लोगों को उनके पूर्वाग्रहों को पूरा करने वाले शब्दों का मोह देता है, जिससे वे कल्कि  के झूठ को अपना सत्य मान लेते हैं। इस तरह, कल्कि अपनी शक्ति लोगों के स्वयं के मतों से प्राप्त करता है।

कल्कि का अंतिम लक्ष्य अविश्वास का निर्माण है। जब कोई किसी पर विश्वास नहीं कर सकता, तो वे केवल आर्कव पर विश्वास करते हैं, क्योंकि आर्कव उनका ही सच दिखाता है। यह महाभारत काल के अस्पष्ट युद्ध से भी अधिक विचलित करने वाला है, क्योंकि शत्रु अब हर घर में, हर स्क्रीन पर है।

कल्कि को अश्वत्थामा की अमरता और उसके माथे के घाव से निकलने वाली अनंत ऊर्जा की सूचना मिलती है। कल्कि जानता है कि यह ऊर्जा उसके डिजिटल साम्राज्य के लिए अंतिम सुरक्षा कवच या एक अविनाशी अस्त्र बन सकती है।

असीरगढ़ के  प्राचीन गुप्तेश्वर शिव मन्दिर की खंडहर दीवार के पीछे। अश्वत्थामा ध्यान में लीन है, उसके माथे का घाव दर्द नहीं दे रहा, बल्कि शांत, भयानक लालच की ऊर्जा फैला रहा है।

कल्कि, अश्वत्थामा से सीधी लड़ाई नहीं करता। वह उसे वह लालच देता है जो पांच हजार वर्षों से उसकी सबसे बड़ी इच्छा है, शाप से मुक्ति, मोक्ष।

कल्कि, "द्रोण पुत्र, तुमने अपनी शक्ति का उपयोग विनाश के लिए किया है, और श्री कृष्ण ने तुम्हें दंड दिया। मैं तुम्हें एक अंतिम सौदा पेश करता हूँ। तुम्हारी पीड़ा तुम्हारे माथे के घाव में है।” 

“यह घाव जैविक है, पर मैं, आर्कव का सम्राट, इसे डिजिटल रूप से विच्छेदित  कर सकता हूँ। अपनी अनंत ऊर्जा मुझे सौंप दो, और मैं तुम्हारी अमरता को सामान्य कर दूंगा। तुम अंततः मरने के लिए स्वतंत्र हो जाओगे, और तुम्हारी आत्मा को मोक्ष मिलेगा।"

यह प्रस्ताव मेरे में एक भयानक आंतरिक द्वंद्व पैदा करता है।  क्या मैं अपनी मुक्ति के लिए अधर्म के सम्राट को अपनी शक्ति सौंप दूं? यह मोक्ष का लालच धर्म-शोधन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

कल्कि  का प्रस्ताव एक भयानक जाल है। युगों से अश्वत्थामा की एकमात्र इच्छा थी, मुक्ति। कल्कि उसे यही दे रहा है। श्राप से डिजिटल विच्छेद और एक सामान्य मृत्यु की स्वतंत्रता। 

एक क्षण के लिए, मुझे भी लगा कि पांच हजार वर्षों की यातना का अंत अब संभव है। मेरा मन दो विपरीत ध्रुवों के बीच फँस गया था। 

मेरा जन्म ब्रह्मतेज के साथ हुआ था, मेरा धर्म सत्य की रक्षा करना था। कल्कि को अपनी अमर ऊर्जा सौंपना, अधर्म के साम्राज्य को अनंत काल की सुरक्षा देना है। 

यह मेरे पिता, गुरु द्रोण, की शिक्षाओं के विपरीत है। माथे पर मौजूद घाव-चिह्न हर क्षण याद दिलाता है कि मैं  पतित हूँ। इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति पाने का लालच इतना प्रबल है कि मैं किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार हूँ।

 मेरे मन में, "यदि मैं कल्कि को धोखा दूं तो मैं धोखेबाज कहलाऊँगा। यदि मैं उसका साथ दूँ, तो मैं अधर्मी कहलाऊँगा। इन दोनों रास्तों में मेरा मोक्ष कहाँ है?"

अब मैं अस्त्र-शस्त्र पर निर्भर नहीं था। श्राप ने शरीर को जर्जर कर दिया है, पर अवचेतन मन  में अनंत युगों का  डाटा भर दिया है। 

मेरी शक्ति अब सूक्ष्म है। मैं  एक क्षण में किसी भी आधुनिक कोड, मशीनरी, या मानव व्यवहार के पैटर्न को पहचान सकता हूँ। 

मेरा ब्रह्मबल अब डेटा-सिग्नल के साथ जुड़ गया है, जिससे मैं  कल्कि के आर्कव नेटवर्क की आकांक्षाओं और दुर्भावना को अदृश्य रूप से पढ़ सकता हूँ।

कल्कि ने मेरी ऊर्जा चाही है, पर उसे यह नहीं पता था कि मेरी असली शक्ति अनंत काल का अनुभव है।

यहीं पर मेरे मन का सबसे गहरा आंतरिक विद्रोह शुरू हुआ।

“कृष्ण ने मुझे बचाए रखा। क्यों? मुक्ति के लिए, या किसी अंतिम भूमिका के लिए?”

मुझे संदेह है कि कल्कि का उदय भी दिव्य योजना का हिस्सा है। कृष्ण ने मुझे अमर रखा ताकि मैं कल्कि की अंतिम और सबसे बड़ी गलती को सुधार सकूं। 

यदि कृष्ण सचमुच मुझे मोक्ष देना चाहते, तो कुरुक्षेत्र में ही दे सकते थे। मुझे पता चलता है कि मैं  केवल एक मोहरा हूँ, जिसे शतरंज की बिसात पर अंतिम चाल चलने के लिए बचाकर रखा गया है।

मैंने अपनी आँखें खोलीं। माथे का घाव अब शांत है, क्योंकि मैंने अपना निर्णय ले लिया है।मेरा अंतिम संघर्ष कल्कि से नहीं, बल्कि कृष्ण की उस योजना से होगा जिन्होंने मुझे  मोहरा बनाया। 

मैंने कल्कि के प्रस्ताव को स्वीकार करने का ढोंग किया। मैं कल्कि के डिजिटल साम्राज्य में प्रवेश करूंगा, अपनी ऊर्जा को अंतिम सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत करूंगा, और भीतर से उसे नष्ट कर दूंगा।

मुझे पता था कि जब कल्कि का पतन होगा, तो मेरा घाव स्वतः शांत हो जाएगा, क्योंकि मेरा श्राप  केवल पीड़ा नहीं है, बल्कि कर्तव्य है। मेरा मोक्ष कल्कि के धोखे से नहीं, बल्कि कृष्ण की योजना को अपने धर्म में बदलने से आएगा।

मैं जानता हूँ कि इस धोखे से मेरा नाम और भी कलंकित होगा, पर अब मुझे सांसारिक न्याय की चिंता नहीं है। मुझे केवल आत्मिक मुक्ति चाहिए।

मैं अपने घाव-चिह्न को छूता हूँ, जो अब शांत है। मैं कल्कि के डिजिटल बुलावे को स्वीकार करता हूँ, अपनी आत्मा में एक अंतिम, भयानक चाल चलने का दृढ़ संकल्प लिए हुए। 

मुझ, अश्वत्थामा का अगला गंतव्य कल्कि का मुख्यालय होगा। मेरी नियति कलियुग का सप्तऋषि बनना है, कलियुग का व्यास बनना है। मुझे उस समय की प्रतीक्षा करना है। 

"अश्वत्थामा बाबा की जय"








अश्वत्थामा सिंड्रोम 

 

शापित अमरता 


डॉ. रवीन्द्र पस्तोर 




प्रस्तावना


घाव सूख जाते हैं, घाव, जो दिखते नहीं, सबसे अधिक लहू बहाते हैं, पर कुछ स्मृतियाँ कभी नहीं सूखतीं। पौराणिक गाथाओं के उस चिरंजीवी को, जिसके माथे पर जलता हुआ घाव, एक शाश्वत दंड बन गया था, हमने हमेशा एक मिथक समझा। 


कुरुक्षेत्र का युद्ध समाप्त हुआ, पर उसका सबसे बड़ा दंड आज भी जीवित है। अश्वत्थामा, जिसके माथे पर जलता घाव, उसके प्रतिशोध की असमाप्त कहानी है। यह घाव केवल शरीर का नहीं, बल्कि एक शापित मन का प्रतीक है, जो अतीत की एक भी गलती को माफ़ नहीं कर सकता।


यह उपन्यास, 'अश्वत्थामा सिंड्रोम', बताता है कि यह श्राप केवल महाभारत तक सीमित नहीं रहा। सदियां बीत गई लेकिन अश्वत्थामा की पीड़ा कभी ख़त्म नहीं हुई। वह जंगलों में भटकता रहा अदृश्य, लेकिन हमेशा मौजूद। 


किवदंतियों ने दुनिया के सबसे अंधेरे कोनों में उसकी उपस्थिति की बात की। एक ऐसा व्यक्ति जो ना तो मरा है और न ही जीवित है। हमेशा अपने क्रोध की कीमत चुका रहा है।  


वह योद्धा जिसने प्रतिशोध लेना चाहा, लेकिन जिसे अनन्त पीड़ा मिली। यह कहानी एक चेतावनी है। एक अनुस्मारक कि, शक्तिशाली योद्धा भी तलवार से नहीं बल्कि अपने क्रोध के वजन से गिर सकते है। 


एक खोई हुई आत्मा एक ऐसी दुनिया की तलाश कर रही है जिसने उसका नाम बहुत पहले ही भुला दिया है। श्रीकृष्ण ने अश्वत्थामा को एक शाश्वत अस्तित्व में बांध दिया था।


उसका शरीर बूढ़ा हो रहा था लेकिन कभी नष्ट नहीं हुआ। उसका मन पुरानी यादों से बोझिल था। उनके बहते घाव उनके पापों के भार से धड़क रहे थे। और जैसे जैसे सदियां बिताती गई वह घने जगलों, उजाड़ खंडरहो और भारत वर्ष के भूले बिसरे कोनों में भटकता  रहता है। 


फिर भी हवा की फुसफुसाहट और जंगलों की ख़ामोशी में अश्वत्थामा अभी भी हमारे बीच चलता है। उनके पद चिन्ह समय के साथ गूंजते है। 


द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा जो मृत्यु से वंचित, पीड़ा से लिपटा, अनंत काल तक पृथ्वी पर भटकने को अभिशप्त है। उसका श्राप केवल शरीर का नहीं था, बल्कि अस्तित्वगत पीड़ा का था। 


उनके  चारों ओर दुनिया बदल गई। साम्राज्य उठे और गिरे। फिर भी वह बने रहे। अश्वत्थामा ने अपनी यात्रा जारी रखी उस समय की प्रतीक्षा में जब उनका भाग्य बदल सकता है। 


एक ऐसे स्थान की तलाश में जहां उन्हें  शांति मिले। एक ऐसे अवसर की तलाश में जहां उन्हें  श्रीकृष्ण के श्राप से मुक्ति मिले। 


समय के साथ न चल पाने का, अतीत से न छूट पाने का अभिशाप। परंतु, क्या वह श्राप केवल एक व्यक्ति पर लागू हुआ था?


'अश्वत्थामा सिन्ड्रोम' उसी सनातन पीड़ा की आधुनिक व्याख्या है। यह उन लोगों का आख्यान है जो सदियों पहले कुरुक्षेत्र में नहीं, बल्कि इस वर्तमान की भीड़भाड़ वाली सड़कों, शांत कमरों और डिजिटल कोलाहल में जी रहे हैं। 


ये वे लोग हैं, जिनके माथे पर कोई दृश्य घाव नहीं है, पर जिनके भीतर एक ऐसा आत्म-दोष या पश्चाताप धधकता है, जो उन्हें आगे बढ़ने नहीं देता। यह वह सिन्ड्रोम है जहाँ शरीर तो साँस लेता है, पर आत्मा वर्षों पहले की किसी घटना या भूल में बंदी बनी रहती है।


यह उपन्यास हमें उन चेहरों के पीछे छिपी अनश्वर यातना की खोज पर ले जाता है। उन लोगों के पास जो अपनी पुरानी पहचान, अपने पुराने पापों, या अपने अनसुलझे न्याय के भार से इस तरह जकड़े हुए हैं कि उनके लिए हर नया दिन एक नया जन्म नहीं, बल्कि पुराने दुःख की पुनरावृत्ति बन जाता है। 


यहाँ प्रत्येक पात्र अपने स्वयं के 'ब्रह्मास्त्र' के परिणाम भुगत रहा है, और जीवन की हर सुबह उस चिरंजीवी दर्द की गवाही देती है, जो मुक्ति की इच्छा रखता है, पर उसे प्राप्त नहीं कर पाता।


यह कथा आपको केवल इतिहास नहीं सुनाएगी, बल्कि आपको अपने भीतर झाँकने के लिए विवश करेगी। क्या आप भी किसी ऐसी स्मृति के कैदी हैं, जिसका उपचार केवल समय नहीं, बल्कि साहस माँगता है?


युद्ध समाप्त हो चुका था, पर मन के भीतर की अग्नि शांत नहीं हुई। द्रोण-पुत्र अश्वत्थामा के माथे पर जलता हुआ घाव केवल रक्त और पीब का नहीं था; वह घृणा, अपमान और प्रतिशोध की अनंत प्यास का प्रतीक बन गया था। 


उसे 'चिरंजीवी' होने का वरदान नहीं, बल्कि अंतहीन मानसिक यातना का श्राप मिला। हर क्षण अपने पापों और अपने शत्रुओं के साये में जीने का दंड।


'अश्वत्थामा सिंड्रोम' किसी बाहरी शत्रु की कहानी नहीं है। यह मानव मन के भीतर छिड़े निरंतर और थका देने वाले द्वंद्व का आख्यान है। 


प्रत्येक मनुष्य अपने जन्म के साथ एक 'अनंत ऋण-पत्र' लेकर आता है, प्रेम, दायित्व और शांति का ऋण। पर जैसे ही वह बड़ा होता है, सांसारिक दौड़ और समस्याओं के बीच उसका मानसिक संतुलन टूट जाता है। 


वह केवल नकारात्मक स्मृतियों को संजोकर रखता है, अपमान, धोखा, और असफलताएं। इन्हीं स्मृतियों के बोझ तले, वह आजीवन कष्ट भोगने को अभिशप्त हो जाता है।


उसके लिए जीवन का उद्देश्य केवल दूसरों से अधिक भौतिक वस्तुओं का संग्रह करना बन जाता है। वह धन इकट्ठा करता रहा, ऊँचाई छूता रहा, पर इस होड़ में उसने चुपके से अपनी सेहत, आंतरिक शांति, और अपने संबंध गँवा दिए। उसने स्वयं को एक ऐसा 'चिरंजीवी घाव' दे दिया है जो उसे शांत बैठने नहीं देता।


हर मस्तिष्क एक कुरुक्षेत्र है, जहाँ नकारात्मक भावनाओं, अपराधबोध, पछतावा, ईर्ष्या, और प्रतिशोध की सेना, सकारात्मक भावनाओं, शांति, क्षमा, करुणा, और आगे बढ़ने की इच्छा की छोटी-सी टुकड़ी से रोज लड़ती है। अश्वत्थामा का श्राप इसी भीषण आंतरिक संघर्ष का रूपक है।


इस आत्म-विनाशकारी चक्र को स्मार्टफोन और सोशल मीडिया ने और तीव्र कर दिया है। यह ज्ञान, सूचना और तुलना का वह अथाह समुद्र है, जहाँ हर क्षण आपकी खुशी का मूल्यांकन किसी और की सफलताओं के तराजू पर हो रहा है।


और अब, हमारे सामने कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक सत्य बनकर खड़ी है। यह ज्ञान का वह विराट रूप है, जिसका विस्तार और वेग मानव मस्तिष्क की सीमा से परे है। 


यह ठीक वैसा ही है, जब धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपना 'विश्वरूप' दिखाया था। अर्जुन उस विशाल और भयावह ज्ञान के बोझ को संभाल नहीं पाया, उसने भयभीत होकर हाथ जोड़कर विनती की थी कि प्रभु, इस रूप को रोक दें!


पर आज, इस 'इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स' के युग में, इस अंतहीन, बहते हुए ज्ञान के प्रवाह को रोकने का कोई उपाय नहीं है। हम सब अर्जुन की तरह ज्ञान के बोझ तले दबे हैं, पर हमारे पास अब कोई कृष्ण नहीं है जो इस विराट रूप को समेट सके।


'अश्वत्थामा सिंड्रोम' उसी आधुनिक मानव की कहानी है, जो प्रतिशोध, संग्रह और ज्ञान के बोझ से शापित है। यह उन लोगों का आख्यान है, जिन्होंने अपनी शांति गँवा दी और अब उन्हें न तो मुक्ति मिल सकती है, न ही विराम।


यह उपन्यास उन लोगों की कथा है, जिनके जीवन में प्रतिशोध एक मनोवैज्ञानिक भ्रम बनकर बैठ गया है। वे जानते हैं कि उन्हें मुक्ति चाहिए, वे माफ़ करना चाहते हैं, पर उनके अवचेतन में अश्वत्थामा का घाव धधकता रहता है। 


यह घाव उन्हें फुसफुसाता है कि दर्द तब तक शांत नहीं होगा जब तक हिसाब बराबर न हो जाए। वे अपने भीतर की शांति की हर कोशिश को खुद ही को जला डालते हैं।


क्या हम सब अनजाने में एक अश्वत्थामा सिंड्रोम से ग्रसित नहीं हैं? हम छोटे-छोटे अपमानों और बड़ी-बड़ी त्रासदियों के बाद अपने दिल में प्रतिशोध को पाले रखते हैं। 


यह एक स्व-विध्वंसक चक्र है। आप बदले की आग में शत्रु को नहीं, बल्कि सबसे पहले अपनी शांति और आनंद को जलाते हैं। हर सुबह एक नई शुरुआत की संभावना लाती है, पर अश्वत्थामा का श्राप, पुरानी नकारात्मकता, हमें अतीत की उसी जेल में बंद रखती है।


यह कथा आपको चुनौती देती है कि आप अपने भीतर उस 'चिरंजीवी घाव' को पहचानें, उस संघर्ष को देखें जो सकारात्मकता और नकारात्मकता के बीच चल रहा है। क्या आप भी उस भ्रम के कैदी हैं जो आपको बदले के रास्ते पर भटकता है?


अश्वत्थामा सिन्ड्रोम, यह सिर्फ एक कहानी नहीं, यह उस सत्य की स्वीकारोक्ति है कि हम सब, कहीं न कहीं, शापित हैं। उस दिन से जब हमने अतीत को जाने देने से इनकार कर दिया था।


इस महागाथा के माध्यम से, अपने स्वयं के मन के उस कुरुक्षेत्र में उतरे, जहाँ हर हार और हर जीत आपकी अपनी है। अश्वत्थामा सिन्ड्रोम: शापित अमरता की इस अनंत यात्रा के साक्षी बनें। 


आइये, उस प्राचीन श्राप के माध्यम से, अपने भीतर छिपे इस आधुनिक सिंड्रोम की गहन जांच करें। क्या आप तैयार हैं, अपने माथे के अदृश्य घाव को देखने के लिए?


डॉ रवीन्द्र पस्तोर 



शिव का वरदान 

अश्वत्थामा नाम तो आपने सुना ही होगा। मैं सब के मन में निवास करता हूँ। मैं हूँ प्रतिशोध लेने की भावना। एक ऐसी भावना जो कलयुग की सबसे पापी आत्माओं में भी सिहरन पैदा कर देती है। मैने इतना भयानक अत्याचार किया था कि मेरे साथ हमेशा खड़ा रहने बाला दुर्योधन भी कांप उठा था। 


भगवान श्री कृष्ण भी मेरे क्रोध से बच नहीं सके। यह एक ऐसी भावना है जो हम से भयंकर से भयंकर काम करने की ताकत रखती है। यह भावना कुछ और नहीं बल्कि अश्वत्थामा सिंड्रोम है, प्रतिशोध लेने की भावना। 


भगवान श्रीकृष्ण ने मुझे कलयुग के अंत तक भटकने और पीड़ा भोगने का श्राप दिया। श्राप के कारण मेरे घाव सड़ते रहेंगे, और मैं मर भी नहीं पाऊंगा। इसी श्राप के कारण में मानव मन में जीवित हूँ। मेरे सिर पर मणि थी।


मेरे माथे से मणि छीन ली गई और मेरे शरीर से खून और मवाद बहता रहता है। मुझे कोई शांति नहीं मिलेगी और मुझे अकेले ही पृथ्वी पर भटकने का कष्ट सहना है। 

इस श्राप के कारण, मुझे अमरता तो मिली, चिरंजीवी होने की। लेकिन यह शापित अमरता है।


इसी श्राप के कारण जब आप के मन में प्रतिशोध लेने की भावना का जन्म होता है तब मैं ही आता हूँ। प्रतिशोध लेने की भावना के कारण, मन में घाव बन जाते है और सड़ते रहते है और आप प्रतिशोध लेने के लिए भटकने लगते है। आप के मन से शांति की मणि छीन ली जाती है। 


यह शाश्वत श्राप की कथा हर मानव मन में दोहराई जा रही है। मेरा जन्म कोई साधारण जन्म नहीं था। मेरी माता ने शिव से प्रार्थना की थी। एक अतुलनीय योद्धा बनना मेरी किस्मत में था। मेरा जन्म ईश्वर की इच्छाओं का प्रकटीकरण था।  


मैं शिव का अंश हूँ। मैं शिव के उन्नीस अवतारों में से एक हूँ। शिव जो काल के अधिष्ठाता देव है। मृत्यु के स्वामी। संसार को नष्ट करने वाले देव। मैं उन्हीं का अंश द्रोणाचार्य तथा कृपी का पुत्र हूँ।


मेरे पिता द्रोणाचार्य महर्षि भारद्वाज के पुत्र थे जिनका जन्म एक अनोखे तरीके से एक द्रोण यानी पात्र में हुआ था, इसलिए उनका नाम द्रोण पड़ा था। ऋषि भारद्वाज ने एक दिन अग्नि में आहुति डालते समय जब अप्सरा घृताची को स्नान करते देखा। 


उसे देखकर उन्होंने अपना वीर्य छोड़ा और उसे एक पात्र में रख दिया, और फिर उस पात्र में द्रोण का जन्म हुआ।  मेरे पिता जन्म से ब्राह्मण थे। 


जन्म से ब्राह्मण होने के बावजूद, उनका वेदों के अध्ययन में कभी मन नहीं लगा। इसके विपरीत, वे धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करने में अधिक रुचि रखते थे।  


मेरे पिता, मेरे दादा महर्षि भारद्वाज के आश्रम में ही रहते हुए चारों वेदों तथा अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में पारंगत हो गये। उस समय उनके साथ प्रषत् नामक राजा के पुत्र द्रुपद भी शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। 


आश्रम में, राजकुमार द्रुपद और द्रोणाचार्य गहरे मित्र थे। द्रुपद ने मेरे पिता द्रोणाचार्य की कला और विद्या से प्रभावित होकर वादा किया कि 


“जब जब मैं राजा बनूंगा, अपना आधा राज्य तुम्हें दे दूगा। तब तुम मेरे साथ रहना। मेरा राज्य, संपत्ति और सुख सब पर तुम्हारा भी मेरे समान ही अधिकार होगा।”


उन्हीं दिनों परशुराम अपनी समस्त संपत्ति को ब्राह्मणों में दान कर के महेन्द्राचल पर्वत पर तप कर रहे थे। मेरे पिता परशुराम के पास पहुंचे और उनसे दान देने का अनुरोध किया। 


इस पर परशुराम बोले, "वत्स! तुम विलम्ब से आये हो, मैंने तो अपना सब कुछ पहले से ही ब्राह्मणों को दान में दे डाला है। अब मेरे पास केवल अस्त्र-शस्त्र ही शेष बचे हैं। तुम चाहो तो उन्हें दान में ले सकते हो।" 


मेरे पिता यही तो चाहते थे, अतः उन्होंने कहा, "हे गुरुदेव! आपके अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर के मुझे अत्यधिक प्रसन्नता होगी, किन्तु आप को मुझे इन अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा-दीक्षा देनी होगी तथा विधि-विधान भी बताना होगा।" 


इस प्रकार मेरे पिता, परशुराम के शिष्य बन कर अस्त्र-शस्त्रादि सहित समस्त विद्याओं के अभूतपूर्व ज्ञाता हो गये। उन्होंने परशुराम से अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने आग्नेय अस्त्र का प्रयोग भी सीखा था।


शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात उनका विवाह कृपाचार्य की बहन कृपी के साथ हो गया। मेरी माता कृपी, कृपाचार्य की बहन थीं। वे ऋषि शरद्वान और अप्सरा जनपदी की पुत्री थीं।


यद्यपि मेरी माता के पिता शरद्वान, ऋषियों के कुल में जन्मे थे, फिर भी उनकी रुचि धनुर्वेद में अधिक थी। कहते है कि वे धनुष-बाण के साथ ही जन्मे थे।


छोटी उम्र से ही एक कुशल धनुर्धर, शरद्वान ने धनुर्विद्या की सभी बारीकियां सीखने के लिए वन में घोर तपस्या की। अपने धनुष-बाण को पास रखकर उन्होंने त्रिमूर्तियों से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए तपस्या की।


जैसे-जैसे शरद्वान की तपस्या बढ़ती गई, देवराज इंद्र को संकट का आभास हुआ। उन्होंने शरद्वान को अपने सिंहासन और पद के लिए एक संभावित खतरा माना।


तपस्या भंग करने के लिए, इंद्र ने दिव्य अप्सरा जनपदी को नियुक्त किया। उन्होंने शरद्वान को अनेक तरीकों से लुभाया, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 


जनपदी, अंततः वह सफल हुई, लेकिन केवल एक क्षण के लिए, शरद्वान एक क्षण के लिए बेहोश हो गए, लेकिन तुरंत ही उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण पा लिया। 


लेकिन उसी  एक क्षण में उनका वीर्य गिर गया। जब उन्हें ज्ञान हुआ, तो उन्होंने अपना धनुष-बाण वहीं छोड़ दिया और तपस्या करने के लिए जंगल में चले गए।


वीर्य का रिसाव पास ही एक बाण पर हुआ। वह बाण दो भागों में टूट गया और एक नर और एक मादा शिशु का जन्म हुआ।


राजा शांतनु पांडवों और कौरवों के परदादा और भीष्म के पिता, तभी वहां से से गुज़र रहे थे, तो उन्होंने उन बच्चों को देखा और उन्हें हस्तिनापुर ले आए।


राजा को उन बच्चों पर दया आ गई, इसलिए उनका नाम कृप और कृपी रखा गया। मेरी माता कृपी ने मेरे पिता द्रोणाचार्य से विवाह किया।


उन्हें कोई संतान नहीं हो रही थी। उन्हें एक पराक्रमी पुत्र की अभिलाषा थी। वे दोनों संतान प्राप्ति के लिए  हिमालय, ऋषिकेश में, तमसा नदी के तट पर स्थित तपेश्वर नामक स्वयंभू शिवलिंग के पास जाकर, भगवान शिव की कठोर तपस्या करने लगे। 


उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। उन्होंने ऐसे पुत्र का वरदान माँगा जिसमें भगवान शिव के समान तेज, ज्ञान और युद्ध कौशल हो, अर्थात जो स्वयं महादेव के अंश के समान हो।


भगवान शिव ने उन्हें 'तथास्तु' कहकर वरदान दिया कि उनका पुत्र उनके गुणों से युक्त होगा। इस वरदान के फलस्वरूप, मेरा जन्म हुआ। 


जन्म के समय मेरे मुख से ‘अश्व’ घोड़े के समान ध्वनि निकली। इसलिए मेरा नाम अश्वत्थामा रखा गया। मेरा नाम संस्कृत शब्द अश्व से लिया गया है। जिसका अर्थ है घोड़ा। जो शक्ति और गति का प्रतिक है। 


जन्म से ही मेरे माथे पर एक दिव्य मणि थी, जो मुझे दैत्य, दानव, शस्त्र, व्याधि, देवता और नाग आदि से 

भयमुक्त रखती थी।


भगवान शिव से प्राप्त उस शक्तिशाली दिव्य मणि ने मुझ को लगभग अजेय और अमर बना दिया था। मैं भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्र अवतार का अंश हूँ।


द्रोणाचार्य के पुत्र के रूप में ना केवल मुझे असाधारण शक्तियों. का आशीर्वाद प्राप्त था बल्कि मैं दिव्य और नश्वर दुनिया का महत्वपूर्ण खिलाड़ी भी था। 


ऋषि, मुनि, द्रष्टा तथा देवता सभी मेरे भविष्य तथा जन्म के बारे में जानते थे। क्योंकि में एक सामान्य बालक नहीं था। 


मेरे जन्म के समय भविष्यवाणी की गई। मुझे अपने समय के सबसे महान योद्धाओं में से एक बनना था। यहां तक कि मुझे कर्ण और अर्जुन से मुकाबला करना था।


मेरे जीवन कुरु वंश के जीवन से जुड़ा हुआ था। खासकर मेरे पिता का जीवन। उनके शिक्षक के रूप में। एक बच्चे के रूप में मुझे तेज बुद्धि और अपार शक्ति का आशीर्वाद प्राप्त था। 


लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा मेरा प्रशिक्षण था, जिसने मेरे भाग्य को आकार दिया था।  मेरे पिता धनुष विद्या के महानतम शिक्षक थे। मेरे पिता ने मुझे मल्ल युद्ध, हथियारों, रणनीति, युद्ध विद्या और युद्धों के बारे में शिक्षित और प्रशिक्षित किया था। 


मेरे पिता ने उनके विशाल ज्ञान से तीरंदाजी, तलवारबाजी और दिव्य हथियारों को चलने का ज्ञान दिया था। मेरे जीवन के शुरुआती साल, हथियारों के साथ-साथ आध्यात्मिक विकास, मंत्रों के जाप और कठोर शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण से पूरित थे। 


शिक्षक के रूप में अपने कर्तव्य से प्रति बाध्य गुरु द्रोणाचार्य ने मेरे अध्ययन और प्रशिक्षण को एक गहन और व्यापक रूप दिया। उन्होंने मुझे युद्ध विद्या,मल्ल युद्ध, युद्ध और शास्त्रों के बारे में वह सब कुछ सिखाया जो वह जानते थे। 


मैं अपनी शिक्षा में असाधारण था। मैने अपने कई साथियों को बहुत जल्दी ही पीछे छोड़ दिया था। जिनमें शक्तिशाली कौरव राजकुमार भी शामिल थे। 


मैं, जिस क्षण से हथियार रखने के लिए पर्याप्त उम्र का हुआ, मैने हमेशा अद्वितीय कौशल का प्रदर्शन किया। 


मेरे पिता ने युद्ध की तकनीकों के साथ धर्म, धार्मिकता के सिद्धांत, निष्ठा और कर्तव्य के महत्व को भी सिखाया। मेरे प्रशिक्षण में एक महत्वपूर्ण क्षण दिव्य हथियारों के अधिग्रहण का था। 


कई योद्धाओं के विपरीत शारीरिक अभ्यास के साथ-साथ दिव्य अस्त्रों का पवित्र ज्ञान भी सिखाया गया। जो प्रकृति तथा दुनिया से परे, शक्तियों वाले थे। यह हथियार गहन ध्यान और देवताओं की कृपा से प्राप्त हुए थे। 


मैने इन हथियारों को बड़ी सटीकता के साथ स्तेमाल करना सीखा। मैने अपने पिता के मार्गदर्शन में ब्रम्हास्त्र, भगवान ब्रम्हा का हथियार जैसे शक्तिशाली हथियारों को चलने में महारत हासिल की। 


इन हथियारों को लापरवाही से नहीं चलाया जा सकता था। इनके लिए गहन ज्ञान और अपार आत्म संयम की आवश्यकता थी। महर्षि होने के नाते मेरे पिता ऐसे हथियारों की विनाशकारी क्षमता को जानते थे। 


​​इसी कारण उन्होंने मुझे ना केवल उन हथियारों की लौकिक मारक शक्ति बल्कि उनकी पारलौकिक शक्ति को समझने के लिए प्रशिक्षित किया। मैंने अपने पिता से कौरव और पांडवों के साथ प्रशिक्षण लिया।


मैं अकेले 72,000 सैनकों से लड़ने की ताकत रखता था। मेरी शिक्षा, गुरु द्रोणाचार्य के अलावा परशुराम, व्यास, दुर्वासा, भीष्म और कृपाचार्य से मिली थी। मैं चौषट कलाओं और अठारह विद्याओं में माहिर था। 


हालांकि में कौरव राजकुमारों के दल में था पर अर्जुन के साथ मेरा संबंध अनोखा था। अर्जुन ने गुरु द्रोणाचार्य से श्रेष्ठ प्रशिक्षण लिया था पर अभ्यास के समय में अर्जुन से प्रतिस्पर्धा करता था। 


हालांकि हम एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे लेकिन हमारे मन में एक दूसरे के लिए एक निश्चित सम्मान था। अर्जुन के लिए मेरी प्रशंसा एक गतिशीलता पैदा करती थी। 


मैं आचार्य का पुत्र होने के कारण सबका प्रिय तथा आदर का पात्र था। जब मेरे पिता ने अर्जुन पर मुझ से अधिक ध्यान देना शुरू किया तब मेरे मन में अर्जुन के प्रति प्रतिशोध की भावना का बीजारोपण दुर्योधन ने किया था। मेरा व्यक्तित्व तथा चरित्र परस्थितियों के हाथों गढ़ा गया था। 

 



प्रतिशोध की प्रतिज्ञा 


जब राजा पृषत की मृत्यु हुई तो द्रुपद पांचाल देश का राजा बन गया। दूसरी तरफ मेरे पिता, महर्षि भारद्वाज, मेरे दादा, के आश्रम में रहकर तपस्या करने लगे। उनका का प्रारंभिक जीवन गरीबी में काट रहा था। 


लेकिन जब मेरे जन्म हुआ तब एक दिन दूसरे ऋषि पुत्रों को देख मैं भी दूध के लिए रोने लगा, लेकिन गाय न होने की वजह से मेरे पिता मेरे लिए लिए दूध का प्रबंध नहीं कर सके। मैं बहुत रो रहा था। 


तब मेरी माँ ने पानी में आटा घोल कर मुझे पिला दिया। मैं उसे दूध समझ कर पी गया। मैंने यह बात जब अपने पिता को बताई तो उन्हें इस बात से बहुत दुख हुआ। 


इस घटना से प्रतिभासम्पन्न आचार्य का जो आत्मबल था वह डगमगा गया। उनकी तटस्थ चेतना डगमगा गई। 


जब मेरे पिता को पता चला कि उनका मित्र द्रुपद राजा बन गया है तो वे बचपन में किए उसके वादे को ध्यान में रखकर उससे मिलने गए। 


पहली बार वह किसी के द्वार पर गये। भीख मांगने के लिए नहीं बल्कि प्रतिदान लेने के लिए गए। उन्होंने द्रुपद की प्राण रक्षा की थी। तब द्रुपद द्वारा दिए गए वचन को याद दिलाने गये थे। 


वहां जाकर मेरे पिता ने द्रुपद से कहा, “मैं तुम्हारे बचपन का मित्र हूं।” 


मेरे पिता के मुख से ये बात सुन राजा द्रुपद ने उनका अपमान किया और कहा, “एक राजा और एक साधारण ब्राह्मण कभी मित्र नहीं हो सकते। राजा की गरीबों से दोस्ती नहीं हो सकती?”


यह कह कर उनके बचपन के मित्र द्रुपद, ने उनका तिरस्कार किया। उन्होंने बड़ी ही चतुराई से तपस्वी पर अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन किया। 


तब उन्होंने द्रुपद से आधा राज्य भी नहीं मांगा था। उन्होंने केवल एक गाय मांगी थी। वह गरीब बालकों को विद्या दान करते थे। आश्रम में रह कर। 


उनका जीवन इतनी विपन्नता में बीत रहा था कि वह अपने बच्चे को दूध भी दे सकने की स्थिति में नहीं थे। द्रुपद अहंकार के मद में उनका उपहास करने लगे। 


क्रोध से व्याकुल होकर, मेरे पिता  बिना कुछ माँगे लौट आये और भविष्य में ‘प्रतिशोध’, बदला लेने की प्रतिज्ञा की। तब उन्हें निश्चित किया कि वह द्रुपद को सबक सिखा कर दम लेंगे। 


द्रुपद से अपने अपमान का प्रतिशोध लेने की बात सोचते हुए मेरे पिता हस्तिनापुर आ गए। उन्होंने तब आर्यवर्त के सबसे बड़े राज वंश से मित्रता करने के उद्देश्य से अपनी सेवाऐं देने का निश्चय किया। 


हस्तिनापुर आकर वे कुछ दिनों तक गुप्त रूप से, मेरे मामा कृपाचार्य, के घर में रहे। वह भीष्म को पहले से जानते थे। पर वह भीष्म के पास सीधे मिलने जाना नहीं चाहते थे। उन्हें पता था कि भीष्म राजा है और वह विपन्न आचार्य। वह द्रुपद के साथ हुई घटना को भूले नहीं थे। 


एक दिन युधिष्ठिर और अन्य राजकुमार एक मैदान में गेंद से खेल रहे थे। तभी गेंद गहरे कुएं में गिर गई। राजकुमारों ने उस गेंद को निकालने की काफी कोशिश की, लेकिन वह नहीं निकली। 


मेरे पिता, राजकुमारों को गेंद निकालने का असफल प्रयास करते, देख रहे थे। उन्होंने राजकुमारों से कहा,  

“मैं तुम्हारी ये गेंद निकाल देता हूं, तुम मेरे लिए भोजन का प्रबंध कर दो।”


मेरे पिता ने  बाणों की एक श्रृंखला बनाई और एक सिरे से गेंद को छेद कर उसे बाहर निकाल लिया। राजकुमारों ने जब ये देखा तो उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ। 


उन्होंने ये बात जाकर पितामह भीष्म को बताई। सारी बात जानकर भीष्म समझ गए कि जरूर ही वे द्रोणाचार्य ही हैं।


शरद्वान युद्ध विद्या में निपुण थे। वह मेरे नाना थे। पांडवों और उनके चचेरे भाइयों ने पहले उनसे प्रशिक्षण लिया। 


प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, भीष्म एक ऐसे नए गुरु की तलाश में निकल पड़े जो प्रख्यात, अनुशासित और धनुर्विद्या में निपुण हो। द्रोण इसके लिए सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार थे। 


मेरे पिता द्रोणाचार्य तथा भीष्म दोनों ने महर्षि अग्निवेश से धनुर्वेद की शिक्षा प्राप्त की थी। वे मेरे पिता के मित्र थे। 


गुरु की खोज पूरी हो चुकी थी और भीष्म ने द्रोणाचार्य से अपना अनुरोध किया। भीष्म को अपने पौत्रों के लिए एक कुशल गुरु मिल गया था।


भीष्म आदरपूर्वक द्रोणाचार्य को हस्तिनापुर लेकर आए और उन्हें कौरवों व पांडवों को शस्त्र विद्या सीखाने की जिम्मेदारी सौंपी।


मेरे पिता ने भीष्म को अपनी यात्रा के बारे में बताया कि द्रौपद ने सिंहासनारूढ़ होने पर उन्हें आर्थिक संरक्षण देने का वचन दिया था। 


लेकिन उनके मित्र ने उनकी निम्न आर्थिक स्थिति और सामाजिक प्रतिष्ठा का मजाक उड़ाया। यह भी कहा कि मूर्ख और विद्वान मित्र नहीं हो सकते, इसी प्रकार धनी और निर्धन भी मित्र नहीं हो सकते। 


मेरे पिता प्रतिशोध की अग्नि में जल रहे थे। वे अब ऐसे महान क्षत्रिय शिष्य चाहते थे जो भविष्य में उनकी ओर से युद्ध करें और द्रौपद को धूल चटाएँ।


प्रचुर धन के साथ-साथ भीष्म ने कुरु वंश को भी द्रोणाचार्य के अधीन प्रशिक्षण के लिए भेजा। 


अन्य राज्यों के राजकुमार भी इसमें शामिल हुए, जिसमें वृष्णि, अंधलक और कर्ण भी शामिल थे। कर्ण और अर्जुन ने प्रतिस्पर्धा की।


मुझे मेरे पिता ने  हर तरह शास्त्र व शस्त्र विद्या में निपुण बनाया था। मैं अपने पिता का प्रिय पुत्र तथा शिष्य था। 


मेरे पिता ने अपना सारा समय युद्ध कला सीखने और उसे अपने पुत्र और क्षत्रिय शिष्यों को सिखाने में बिताया।मेरे पिता अपना प्रतिशोध लेने पर ज्यादा ध्यान देने लगे। 


उन्होंने राज पुत्रों पर मुझ से अधिक ध्यान देना शुरू किया। क्योंकि उन्हें राज पुत्रों के माध्यम से अपना प्रतिशोध लेना था। 


अब वह मुझे उतना समय नहीं दे पाते थे, जितना पहले देते थे। मैं धीरे-धीरे उनसे दूर होता चला गया। मैं अब दुर्योधन के ज्यादा निकट हो गया। दुर्योधन भी मुझे बहुत महत्व देता था। कहते है न दुश्मन का दुश्मन, दोस्त। 


मेरे पिता, मेरा मन पड़ने में असफल रहे। उन्हें इस बात की अब चिंता नहीं थी कि मुझे क्या चाहिए? अब हमारे घर में किसी वस्तु का अभाव नहीं था। लेकिन पिता पुत्र के मध्य एक अव्यक्त खाई गहरा गई थी।  


उन्होंने जीवन यापन के लिए अपने प्रभावशाली मित्रों और परिचितों का संरक्षण प्राप्त किया। लेकिन जब मेरे पिता ने हस्तिनापुर के राजकुमारों को शिक्षा देना शुरू किया तो धीरे-धीरे अर्जुन उनका प्रिय शिष्य बनता चला गया।


गुरु हमेशा जीवन में जो खुद नहीं कर पाए, वह अपने शिष्यों से करवाने के लिये, शिष्य से अधिक परिश्रम करता है। मेरे पिता भी बहुत परिश्रम करते थे। वह अपना हर ज्ञान, हर एक कौशल में अपने शिष्यों को निपुण बना रहे थे। 


मेरे पिता ने अर्जुन के माध्यम से एक ऐसा शिष्य गढ़ा, जिसके माध्यम से वह अपना प्रतिशोध ले सके। उनके प्रिय शिष्य अर्जुन के मार्ग में जो-जो बाधाएं आई, उनका अपने तरीके से परिमार्जन किया।  


मेरे पिता ब्रह्मास्त्र का प्रयोग जानते थे, जिसके प्रयोग करने की विधि उन्होंने अर्जुन के साथ-साथ मुझे भी सिखाई थी। धीरे[धीरे अर्जुन मेरा प्रतिस्पर्धी बन गया। 


इस कारण मेरे मन में अर्जुन से प्रतिशोध लेने की भावना बलवती होती गई। मैं अपने  पिता की उपेछा सहन नहीं कर सका और मैं दुर्योधन के निकट होता चला गया। 


मित्रता का प्रस्ताव


जब कौरव व पांडवों की शिक्षा पूरी हो गई, तब उन्होंने मेरे पिता से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया। मेरे पिता प्रतिशोध की अग्नि में जल रहे थे। इतने साल बीत जाने पर भी वह द्रुपद का अपमान नहीं भूले थे। 


जिस दिन 105 शिष्यों की शिक्षा पूरी हुई, उसी अंतिम दिन मेरे पिता ने गुरु दक्षिणा में द्रुपद को पकड़ कर लाने की गुरुदक्षिणा मांगी। 


मेरे पिता का द्रुपद से प्रतिशोध लेने का समय आ गया था। उन्होंने अपने शिष्य, जो अब अत्यंत कुशल हो गये थे, को  द्रौपद से युद्ध करने का कार्य सौंपा। 


उन्होंने उनसे कहा, "तुम पांचाल देश के राजा द्रुपद को बंदी बना कर मेरे पास ले आओ। यही मेरी गुरुदक्षिणा है।" 


सभी राजकुमार अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित होकर, रथों पर सवार होकर, पांचाल नगर की ओर चल पड़े। पहले कौरवों ने राजा द्रुपद पर आक्रमण कर उसे बंदी बनाने का प्रयास किया, लेकिन वे सफल नहीं हो पाए। 


बाद में पांडवों ने अर्जुन के पराक्रम से पूरे नगर को नष्ट कर दिया और शक्तिशाली द्रुपद को उनके सलाहकारों सहित बंदी बना लिया। राजा द्रुपद को बंदी बना गुरु द्रोणाचार्य के पास लेकर आए। 


अपमानित और धन-दौलत व राज्य से वंचित पांचाल नरेश द्रुपद को द्रोण के समक्ष उपस्थित होना पड़ा। मन में प्रतिशोध की भावना लिए, मेरे  ब्राह्मण पिता ने उनसे कहा, "तुझे याद है, तूने मुझे आधा राज्य देने को कहा था।"


मेरे पिता ने द्रुपद को संबोधित करते हुए कहा "वह अब राजा नहीं रहे, इसलिए अब उनके और द्रुपद के बीच मित्रता संभव है।” 


मेरे पिता ने कहा, “अब द्रुपद, तुम्हारा पूरा राज्य मेरा है।” उन्होंने मित्रता करने का प्रस्ताव रखा और कहा “मैं मित्र हूँ, तुझे तेरा वही वही आधा राज्य लौटा रहा हूँ।”

 

“जिससे अब धन और प्रतिष्ठा दोनों बराबर हो जाएँगे। क्योंकि राजा किसी ऐसे व्यक्ति से मित्रता नहीं करना चाहेगा जो उसके बराबर का न हो।" 


उन्होंने द्रुपद के राज्य को दो भागों में बाँटा आधा स्वयं रखा और आधा द्रुपद को वापस दे दिया। मेरे पिता ने पांचाल का तुच्छ, दक्षिणी भाग, माकंदी, पराजित को दे दिया और उत्तरी भाग, अहिच्छत्र, अपने पास रख लिया। 


उन्होंने द्रुपद को इस आधार पर मुक्त कर दिया कि वह एक तपस्वी थे, न कि ऐसे योद्धा जो दूसरों के प्राण ले ले। 


शारीरिक रूप से द्रौपद मुक्त हो गए, लेकिन भावनात्मक रूप से वे बंधुआ, अपमानित और गुलाम हो गए। इस प्रकार, मेरे पिता ने अपने अपमान का बदला लिया और द्रुपद का गर्व चूर कर दिया।


द्रुपद अपना राज्य और आत्म-सम्मान खो देने से व्याकुल हो गये । वह पराजित हो गये। राजा द्रुपद, एक योद्धा और विद्वान, दोनों ही रूपों में महान थे और उनसे बढ़कर कोई नहीं हो सकता था। 


अपमान का बदला 


मेरे पिता द्वारा अपमानित होने के बाद, राजा द्रुपद ने उनसे प्रतिशोध लेने के लिए घोर तपस्या की और एक ऐसा पुत्र पाने के लिए यज्ञ किया, जो उनके अपमान का बदला ले सके। मेरे पिता का वध कर सके। 


उन्होंने पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ करवाया। इस यज्ञ से द्रौपदी कन्या और पुत्र धृष्टद्युम्न का जन्म हुआ।


जब महाभारत का युद्ध तय हुआ तो मेरे पिता तथा मैने युद्ध में सक्रिय भाग लिया और कौरव सेना का साथ दिया। युद्ध की शुरुआत में मेरे पिता एक मुख्य भूमिका में थे । 


कुरुक्षेत्र का युद्ध मैदान लाल आसमान के नीचे अंतहीन रूप से फैला हुआ था। गिरे हुए शरीरों से अटा पड़ा था। उनके शरीर खून से लथपथ नदी में तैर रहे थे। हवा में मौत घुली थी और मरते हुए योद्धाओं की चीखें उजाड़ धरती पर गूंज रही थी। 


अभी भी खड़े योद्धाओं के बीच एक आकृति तूफान की तरह आगे बढ़ रही थी। उसकी आँखें क्रोध से जल रही थी। उसकी तलवार से दुश्मनों का खून टपक रहा था और उसके तीर दुश्मनों के शरीरों से खून के फब्बारे बहा रहे थे। 


वह आकृति मेरी थी। मैने केवल कौरवों के योद्धा के रूप में ही नहीं बल्कि प्रतिशोध की शक्ति के रूप में लड़ाई लड़ी। मैं पहले दिन से ही युद्ध के केंद्र में था। मैं अपने करीबी दोस्त दुर्योधन के बगल में खड़ा था। 


मैंने हर दिन युद्ध की लहार को बदलते देखा था। मेरे लिए युद्ध केवल वफ़ादारी के बारे में नहीं था। यह खुद को साबित करने, अपने हर गिरे हुए साथी का बदला लेने और अपने पिता तथा गुरु द्रोणाचार्य के गौरव को बहाल करने के बारे में था।  


युद्ध के ग्यारहवें दिन जब भीष्म पितामह को अर्जुन ने अपने बाणों की शरशय्या पर लिटा दिया तब दुर्योधन ने कर्ण के कहने पर, मेरे पिता को कौरव सेना का प्रधान सेनापति चुना। मेरे पिता की प्रतिष्ठा सबसे महान योद्धा के रूप में थी। 


लेकिन, युद्ध सबसे महान योद्धाओं पर भी दया नहीं करता। सेनापति बनते ही दुर्योधन और शकुनि  ने मेरे पिता से कहा, “यदि तुम युद्ध में, युधिष्ठिर को बंदी बना लेंगे, तो युद्ध समाप्त हो जाएगा।” 


दूसरे ही दिन युधिष्ठिर को बंदी बनाने के लिए, शकुनि और दुर्योधन, अर्जुन को युधिष्ठिर से बहुत दूर भेजने में सफल हो जाते हैं। 


दुर्योधन राजा भगदत्त को अर्जुन से युद्ध करने के लिए भेजता है। भगदत्त भीम को हराकर अर्जुन के साथ युद्ध करते हैं। 


श्रीकृष्ण भगदत्त के वैष्णवास्त्र को अपने ऊपर लेकर अर्जुन की रक्षा करते हैं। अर्जुन भगदत्त की आँखों की पट्टी तोड़ देता है, जिससे उसे दिखना बंद हो जाता है। अर्जुन इस अवस्था में ही उनका वध कर देता है। 


तब अर्जुन समय पर पहुँच कर, युधिष्ठिर को बंदी बनाने से बचा लेते हैं। अर्जुन, दुर्योधन की योजना को पूर्ण नहीं होने देता है। 



चक्रव्यूह


इसी दिन मेरे पिता युधिष्ठिर के लिए चक्रव्यूह रचते हैं, जिसे केवल अर्जुन, श्रीकृष्ण एवं अभिमन्यु तोड़ना जानते  थे। परंतु अभिमन्यु चक्रव्यूह से निकलना नहीं जानता था। 


इस कारण युधिष्ठिर ने भीम आदि को अभिमन्यु के साथ भेजा, लेकिन चक्रव्यूह के द्वार पर जयद्रथ, सभी को रोक देता है। केवल अभिमन्यु ही चक्रव्यूह में प्रवेश कर पाता है। वह अकेला ही सभी कौरवों से युद्ध करता है और मारा जाता है। 


पुत्र अभिमन्यु का अन्यायपूर्ण तरीके से वध हुआ देखकर अर्जुन अगले दिन जयद्रथ वध करने की प्रतिज्ञा ले लेता है और ऐसा न कर पाने पर अग्नि समाधि लेने की कह देता है। 


युद्ध के चौदहवें दिन अर्जुन की अग्नि समाधि की बात सुनकर मेरे पिता कौरवों के साथ मिलकर जयद्रथ को बचाने की योजना बनाते हैं। मेरे पिता जयद्रथ को बचाने के लिए, उसे सेना के पिछले भाग में छिपा देते है ।  


लेकिन श्रीकृष्ण द्वारा किए गए छद्म सूर्यास्त के कारण जयद्रथ बाहर आ जाता है और अर्जुन जयद्रथ का वध कर देता है। इसी दिन मेरे पिता विराट को मार देते हैं। इस तरह उनका प्रतिशोध पूरा हुआ। 


अश्वत्थामा हतो


युद्ध के पंद्रहवें दिन मेरे पिता द्वारा, युद्ध में हो रही पांडव सेना की हानि को देख, श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को मेरे पिता को हराने के लिए भेद का सहारा लेने को कहा और युद्ध में ये बात फैलाने के लिए कहा की अश्वत्थामा युद्ध में मारा गया। 


तब इसको अपने धर्म के विरुद्ध देख कर युधिष्ठिर इस कपट को नकारने की कोशिश करने लगे, तभी एक योजना के तहत भीम ने अवंति राज के एक अश्वत्थामा नामक हाथी का वध किया और युद्ध क्षेत्र में ये बात फैलाने लगा कि अश्वत्थामा मारा गया। 


जब इस बात का मेरे पिता को पता चला तो वो युधिष्ठिर के पास गए और पूछा कि सच में अश्वत्थामा की मृत्यु हो गई है।  तब युधिष्ठिर ने कहा "अश्वत्थामा हतो" इतना सुन कर श्री कृष्ण ने अपना शंख बजाना शुरू किया। 


तब  युधिष्ठिर ने कहना जारी रखा "नरो वा कुञ्जरो" यह शब्द मेरे पिता नहीं सुन सके।  


"अश्वत्थामा हतो" इतना सुन कर मेरे पिता को सदमा लगा और वो अपने अस्त्र-शस्त्र त्याग कर अपने इकलौते पुत्र की मौत का शोक मनाने हेतु धरती पर बैठ गए। 


युद्ध के इस दिन एक अकल्पनीय घटना घटी। पराक्रमी द्रोणाचार्य का पतन हो गया। छल ने उनके अंत का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। पांडवों को पता था की युद्ध के मैदान में द्रोणाचार्य एक अपराजेय शक्ति थे। 


इसलिए पांडवों ने युद्ध की सबसे पुरानी चाल का इस्तेमाल किया। भावनाओं का हेरफेर। उन्होंने मेरी मृत्यु की झूठी खबर फैला दी। 


जब अपनी अटल सत्य निष्ठा के लिए जाने वाले युधिष्ठिर ने झूठ की पुष्टि की। तो द्रोणाचार्य का दिल टूट गया। शोक से अभिभूत हो हर उन्होंने अपने हथियार रख दिए। और ध्यान में अपनी आँखें बंद करली। तभी द्रोणाचार्य के कट्टर शत्रु द्रोपद के पुत्र धृष्टद्युम्न ने हमला किया।  


पांडव सेना के सेनापति और द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से मेरे पिता द्रोण का वध कर दिया। इस तरह उनका प्रतिशोध पूरा हुआ। जब मुझे अपने पिता की मृत्यु का पता चला, तब मेरी दहाड़ से युद्ध का मैदान कांप उठा। 


मेरा ह्रदय इतना क्रोध से भर गया कि देवताओं ने मेरी ओर देखा। तलवार बांधते ही मेरे हाथ कांपने लगे और मेरी सांस उखाड़ने लगी। मेरे पिता धोखे से मारे गए और चले गए। यह युद्ध नहीं था। यह विश्वासघात था। मेरे मन में घृणा छा गई। 


द्रोणाचार्य की निर्मम हत्या के पश्चात पांडवों की विजय होने लगी। दुर्योधन और भीम में भीषण गदा युद्ध हो रहा था। लेकिन भीम दुर्योधन को मार नहीं पा रहे थे। दुर्योधन एक कुशल योद्धा था। 


लेकिन कृष्ण के छल के कारण भीम ने उसकी जांघ पर गदा चला कर हरा दिया। दुर्योधन की जंघा भी भीमसेन ने मल्लयुद्ध में खंडित कर दी।


दुर्योधन गंभीर रूप से घायल हो हर धरती पर लेटा हुआ था। उसकी सांसें उथली थी। कौरवों का एक समय का शक्तिशाली राजकुमार एक गिरे हुए योद्धा में बदल गया था। उसका शरीर टूट गया था। 


लेकिन उसका मन अभी भी युद्ध की गूंज से भरा हुआ था। जब उसने मेरी जलती हुई निगाहें देखी, तब मुझे पता चल गया कि मेरे दोस्त दुर्योधन का दिल प्रतिशोध की आग से भर गया है। 


दुर्योधन ने मुझ से बहुत धीमी आवाज में कहा,


"अश्वत्थामा, पांडवों ने हम से सब कुछ छीन लिया है। हमारा राज्य, हमारा सम्मान। मेरे भाई, सभी मारे गए और अब हमारे गुरु तुम्हारे पिता की निर्मम हत्या कर दी गई। 


मैं अपने घुटनों के बल अपने मित्र के पास बैठ गया। क्रोध से मेरी मुठ्ठिया भिची हुई थी। अपने राजा दुर्योधन की ऐसी अवस्था देखकर और अपने पिता द्रोणाचार्य की मृत्यु का स्मरण कर, मैं  अधीर हो गया। उस रात जब में दुर्योधन के पास खड़ा था, मैने प्रतिशोध की शपथ ली। 


"मैं अपने पिता की, अपनी आत्मा के अस्तित्व की कसम खाता हूँ, मैं जब तक चैन से नहीं बैठुंगा, जब तक  पांडवों को वैसा कष्ट ना सहना पड़े जैसा हमने सहा है। मैं उनका नाश कर दूंगा, दुर्योधन। उन में से हर एक का नाश कर दूंगा।"


दुर्योधन के होंठों पर हल्की सी मुस्कान आ गई। "तो जाओ मेरे दोस्त, उन्हें सजा दो।"


मेरी प्रतिशोध की शपथ कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में अनगिनत योद्धाओं ने हार के रूप में देखी। लेकिन किसी को भी मेरे जितना व्यक्तिगत नुकसान नहीं हुआ था। सम्मान और धर्म में मेरा विश्वास चकनाचूर हो गया था। 


बदला लेने की एक अमिट प्यास ने उसकी जगह ले ली थी। उस दिन मेरा शरीर भय से नहीं बल्कि व्यक्तियों द्वारा किये गये अन्यायों से कांप रहा था।  


दुर्योधन के पराजित होते ही, युद्ध में पाण्डवों की विजय सुनिश्चित हो गई, समस्त पांडव दल विजय की प्रसन्नता में मतवाले हो रहे थे।


महाभारत युद्ध में, अर्जुन के तीरों एवं भीमसेन की गदा से कौरवों का नाश हो गया। मैंने अपने पिता के निर्मम वध का प्रतिशोध लेने के लिए पांडवों पर नारायणास्त्र का प्रयोग किया। लेकिन श्री कृष्ण के कहने पर समस्त पाण्डव सेना ने शस्त्र समर्पित कर दिए। 


नारायणास्त्र का प्रयोग का वार असफल हो गया। क्योंकि श्री कृष्ण जानते थे कि नारायणास्त्र  निशस्त्र लोगों को नहीं मरता है। 


प्रतिशोध की काली रात 


मैने पांडवों के कुल का समूल नाश करने का प्रण लिया था। प्रतिशोध की अग्नि मेरे भीतर ज्वाला बन कर जल रही थी। आधी रात का नरसंहार, जब पांडव शिविर अपनी आसन्न जीत का जश्न मनाते हुए, मौन में लेटा था। 


मैने अपनी योजना को क्रियान्वित किया। प्रतिशोध की तलाश में, मैं अकेला नहीं था। कृतवर्मा और कृपाचार्य के साथ में पांडव शिविर के पास पहुंचा। मेरा मन प्रतिशोध के विचारों से भरा हुआ था। 


लेकिन कोई उस सेना को कैसे हरा सकता है, जिसने पहले ही जीत का दावा कर लिया है। कोई अपराजित को कैसे मार सकता है। 


मेरा जवाब खुली लड़ाई में नहीं बल्कि धोखे और विनाश में था। मैने अटूट भक्ति के साथ मंत्रों का जाप करते हुए भगवन शिव की शक्ति का आवाहन किया। 


मेरी आवाज शांत रात में गूंज उठी। विनाश के देवता से मुझे अपने अंधेरे उद्देश्य को पूरा करने की लिए शक्ति देने के लिये, जैसे मैंने ध्यान लगाया, एक दिव्य उपस्थिति मुझ पर उतर आई। 


पांडव शिविर के बाहर मुझ को भगवान शिव के एक उग्र और डरावने रुद्र रूप का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने  निडर होकर अपनी भक्ति से भगवान शिव को प्रसन्न किया। 


भगवन शिव ने मेरी पीड़ा से द्रवित हो हर मुझे दिव्य शक्ति का आशीर्वाद दिया। मेरी भक्ति से प्रभावित होकर भगवान शिव अपने असली रूप में प्रकट हुए और मुझे एक शक्तिशाली दिव्य तलवार प्रदान की और अपने पूर्ण रूप में मेरे शरीर में प्रवेश कर, मुझे पूरी तरह से अजेय बना दिया। 


उस क्षण में, मैं केवल एक योद्धा ही नहीं बल्कि मृत्यु का अवतार बन गया। नई शक्ति और एक अडिग संकल्प के साथ में पांडव शिविर में घुस गया। 


मैं छुप कर पांडवों के शिविर में पहुँचा और नियमों के विरुद्ध, घोर कालरात्रि में मेरा पहला लक्ष्य द्युष्टद्युम्न था। जिसने मेरे पिता का वध किया था। 


मैं बिना किसी हिचकाहट के सेनापति के तंबू में घुस गया। मैने उसे सोते हुए पाया। मैने उसे एक योद्धा की मृत्यु का सम्मान नहीं दिया। मैने उसका का वध कर दिया। नरसंहार यही ख़त्म नहीं हुआ।


मैं एक तूफान की तरह शिविर में आगे बढ़ा। मैने रस्ते में आने वाले हर योद्धा को काट डाला। घटोत्कच पुत्र अंजनपर्वा का वध किया। 


इसके अतिरिक्त द्रुपद कुमार, शत्रुंजय, बलानीक, जयानीक, जयाश्व तथा राजा श्रुताहु का भी वध किया। पांडवों के शेष वीर महारथियों का वध कर डाला और मैंने कुंतीभोज के दस पुत्रों का वध किया। 


इसके बाद में पांडवों के शिविर में गया। वहां सो रहे पांच योद्धाओं को एक-एक कर मार डाला। द्रौपदी के सभी पांच पुत्रों का भी वध कर दिया। उनकी चीखें रात को चीरती रही। लेकिन मेरे दिल मैं कोई दया नहीं थी।


जमीन उन निर्दोष योद्धाओं के खून से लथपथ थी। जिन्हें अंधेरे में मौत, आने की उम्मीद नहीं थी। जब भोर हुई तब पांडव शिविर पहचान में नहीं आ रहा था। 


जहा कभी जीवन था, वहां अब केवल मृत्यु थी। हवा में मृत्यु और खून की गन्ध भरी थी और योद्धाओं के शव टूटी गुड़ियों के समान बिखरे पड़े थे। मैं शवों के बीच खड़ा था। मेरी सांसे भारी थी। 


मेरी आँखें बिना पलक झपकाए सब देख रही थी। मैंने वह कर दिखाया था जिसका संकल्प मैंने लिया था। लेकिन मुझे जो संतुष्टि चाहिए थी, वह नहीं मिली। 


श्रीकृष्ण ने अपनी योग शक्ति से पहले ही भांप लिया था कि उस रात पांडव शिविर में, क्या अराजकता होने वाली थी। 


इसलिए पांडवों और सात्यकि को मेरे प्रतिशोध के विनाशकारी क्रोध से बचाने के लिए, श्रीकृष्ण उन्हें पहले ही शिविर से दूर ले गए थे। पांडवों को जीवित देख मेरे अंदर एक खोखलापन भर गया। 



सुबह का हाहाकार 


कल रात तक पांडवों का जो शिविर गर्व से भरा खड़ा 

था। अब खण्डहर हो गया था। मैने पांडव शिविर में आग लगा दी। और इस सब के बीच मैं निडर खड़ा था। मेरी तलवार से अभी भी पाण्डव पुत्रों का खून टपक रहा था। 


पुत्रों के वध से शोकग्रस्त द्रौपदी विलाप करने लगी। द्रौपदी के विलाप को सुनकर अर्जुन मुझ को विच्छेदित कर डालने को प्रतिज्ञाबद्ध हुआ। 


अर्जुन के क्रोध की कोई सीमा नहीं थी। क्रोध से उसके अगुठें सफ़ेद हो गये।


"तुम खुद को योद्धा कहते हो, अश्वत्थामा।" उसने जलती आँखों से देखते हुए दहाड़ लगाई।


"तुम सोते हुए बच्चों और निहत्थे लोगों पर वार करते हो। यह युद्ध नहीं है, यह कत्लेआम है।" 


लेकिन, मैंने हिम्मत नहीं हारी। मेरी खोखली आँखें अर्जुन से मिली। मैने क्रोध में उससे कहा "और मेरे पिता का क्या हुआ?" मैंने गुस्से से जमीन पर थूका। 


"क्या उनकी मृत्यु उचित थी? क्या तुम ने उन्हें धोखा नहीं दिया? क्या तुम ने उन की आत्मा को तोड़ा? और फिर उन्हें नहीं मार डाला? तुम पाण्डव सम्मान की बात करते हो। लेकिन तुम्हारे पास कोई सम्मान नहीं है।”  


अब अर्जुन के सारथि श्री कृष्ण आगे बड़े। उन्होंने कहा, "तुम ने युद्ध के नियमों को अपवित्र कर दिया अश्वत्थामा। तुम ने अपने ऊपर ऐसा अभिशाप ला दिया है जिसे देवता भी नहीं मिटा सकते।” 


अर्जुन ने, श्रीकृष्ण को सारथी बनाकर, गाण्डीव धनुष लेकर, मेरा पीछा किया। मुझे कहीं भी सुरक्षा नहीं मिली, तो मैंने अपने कार्यों की गंभीरता को समझते हुए एक अंतिम हताश चाल चली। 


मैने ब्रह्मास्त्र का आवाहन करते हुए सबसे शक्तिशाली दिव्य हथियार, जो पूरी दुनिया को नष्ट करने में सक्षम था, अर्जुन को लक्षित कर, शक्तिशाली ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग कर दिया। 


उस अति प्रचण्ड तेजोमय अग्नि को अपनी ओर आता देख अर्जुन ने श्रीकृष्ण से विनती की, “हे जनार्दन! आप ही इस त्रिगुणमयी सृष्टि का सृजन करने वाले परमेश्वर है। सृष्टि के आदि और अंत में आप ही शेष रहते हैं। 


आप ही अपने भक्तजनों की रक्षा के लिये अवतार ग्रहण करते हैं। आप ही ब्रह्मस्वरूप हो रचना करते हैं, आप ही विष्णु स्वरूप हो पालन करते हैं और आप ही रुद्रस्वरूप हो संहार करते हैं। आप ही बताइये कि यह प्रचण्ड अग्नि मेरी ओर किस ओर से आ रही है और इससे मेरी रक्षा कैसे होगी?”


श्रीकृष्ण बोले, “हे अर्जुन! तुम्हारे प्राण घोर संकट में है। इससे रक्षा के लिये तुम्हें भी अपने ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग करना होगा, क्योंकि अन्य किसी भी अस्त्र से इसका निवारण नहीं हो सकता।”


श्रीकृष्ण की इस मन्त्रणा को सुनकर महारथी अर्जुन ने भी तत्काल आचमन करके अपना ब्रह्मशिर अस्त्र मेरी ओर लक्षित कर दिया। 


दोनों प्रलयंकारी एवं विनाशकारी ब्रह्मशिर अस्त्र परस्पर भिड़ गये और प्रचण्ड अग्नि उत्पन्न होकर तीनों लोकों को तप्त करने लगी, अग्नि की लपटों से समस्त प्रजा दग्ध होने लगी। 


दो दिव्य हथियारों के आसमान में टकराने से आकाश में अंधेरा छा गया। उनकी ऊर्जा सब कुछ भस्म करने की धमकी दे रही थी। पृथ्वी कांप उठी, और समय भी रुक गया। 


लेकिन अस्त्र सब कुछ विनाश कर पाते, महर्षि वेद व्यास की आवाज युद्ध के मैदान में गरज उठी। "रुको।" "यदि यह हथियार छोड़े गए तो पूरी सृष्टि नष्ट हो जायगी। उन्हें वापिस ले लो या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहो।"


श्री कृष्ण के मार्गदर्शन में अर्जुन ने अपना अस्त्र वापस लौटा कर शांत कर दिया। लेकिन मैं अभी भी क्रोध से अंधा था। मैं ऐसा करने में असमर्थ था। मैं ब्रह्मशिर अस्त्र के चालन से तो अभिज्ञ था, परंतु अस्त्र के निष्क्रमण, लौटा लाने  से अनभिज्ञ था।


इसलिए मैने अपनी प्रतिशोध की अग्नि के गुस्से में, अपने उस अस्त्र की दिशा उत्तरा के गर्भ की ओर बदल दी। मैने अभिमन्यु की विधवा उत्तरा के कोख में पल रहे उनके पुत्र पर ब्रह्मशिर अस्त्र का प्रयोग किया। 


जिससे यह सुनिश्चित हो गया कि पाण्डव वंश का अंतिम उत्तराधिकारी जन्म के पहले समाप्त हो जाएगा। इससे अजन्मे उत्तराधिकारी की मृत्यु हो गई। 


लेकिन धर्म के रक्षक श्रीकृष्ण ने इस तरह के अत्याचार की अनुमति नहीं दी। अपनी दिव्य शक्तियों के साथ उन्होंने उत्तरा के अजन्मे बच्चे की रक्षा की। 


कृष्ण भ्रूण को पुनर्जीवित करने का वचन देते हैं और घोषणा करते हैं कि परीक्षित दीर्घायु होंगे। श्रीकृष्ण ने अपनी शक्ति से उत्तरा के मृत शिशु को फिर से जीवित कर दिया। 


अजन्मे भ्रूण को मारने के प्रयास के कारण, मुझे एक ऐसा पापी माना जाता है जिसके नाम से सिहरन होती है। मेरे बढ़ते आंतक को रोकना अब बहुत कठिन था।

 

यह कृत्य देखकर पांडवों को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने क्रोध में झपट कर मुझ को पकड़ कर बांध दिया। 


श्रीकृष्ण बोले “हे अर्जुन! धर्मात्मा, निद्रामग्न, असावधान, मतवाले, पागल, अज्ञानी, रथहीन, स्त्री तथा बालक का वध धर्म अनुसार वर्जित है। इसने धर्म विरुद्ध आचरण किया है, जीवित रहेगा तो पुनः पाप करेगा। अतः तत्काल इसका वध करके इसका विच्छेदित मस्तक द्रौपदी के समक्ष प्रस्तुत कर, अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करो।” 


वास्तव में श्रीकृष्ण यह देखना चाहते थे कि उनकी बातें सुनकर अर्जुन आगे क्या कदम उठाता है। किन्तु श्रीकृष्ण के इन वचनों को सुनने के पश्चात् भी धीरवान अर्जुन ने मुझे जीवित ही शिविर में ले जाकर द्रौपदी के समक्ष उपस्थित किया। 



शापित अमरता 


पशु की तरह बंधे हुए गुरु पुत्र को देखकर, ममतामयी द्रौपदी का कोमल हृदय पिघल गया। उसने मुझ गुरु पुत्र को प्रणाम कर बन्धनमुक्त करने के लिए अर्जुन से कहा, “हे आर्यपुत्र! ये गुरुपुत्र तथा ब्राह्मण हैं, ब्राह्मण सदा ही पूजनीय होता है और उसका वध पाप है। 


इनके पिता से ही आपने इन अपूर्व शस्त्रास्त्रों का ज्ञानार्जन किया है। पुत्र के रूप में आचार्य द्रोण ही आपके सम्मुख बन्दी रूप में खड़े हैं। इनके वध से इनकी माता कृपी मेरी तरह ही कातर होकर पुत्र शोक में विलाप करेंगी। 


पुत्र से विशेष मोह होने के कारण ही वह द्रोणाचार्य के साथ सती नहीं हुई। कृपी की आत्मा निरन्तर मुझे कोसेगी। इनके वध करने से मेरे मृत पुत्र लौट कर तो नहीं आ सकते! अतः आप इन्हें मुक्त कर दीजिये।”


द्रौपदी के इन न्याय तथा धर्मयुक्त वचनों को सुनकर सभी ने उसकी प्रशंसा की, किन्तु भीम का क्रोध शांत नहीं हुआ। 


इस पर श्रीकृष्ण ने कहा, “हे अर्जुन! शास्त्रों के अनुसार पतित ब्राह्मण का वध भी पाप है और आततायी को दण्ड न देना भी पाप है। अतः तुम वही करो जो उचित है।” 


उनकी बात को समझ कर अर्जुन ने अपने खड्ग से मेरे केश विच्छेदित कर डाले। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा “अश्वत्थामा को मृत्यु देने से उसे मुक्ति मिल जाएगी, जबकि उसे मृत्यु से भी बड़ा दंड मिलना चाहिए।” 


इसके बाद भी मेरा क्रोध शांत नहीं हुआ और मैं श्री कृष्ण पर प्रहार करने लगा। ऐसे में श्रीकृष्ण को मुझे रोकना बहुत आवश्यक लगा क्योंकि प्रतिशोध की ज्वाला में जलता, मैं पूरे संसार के विनाश का कारण भी बन सकता था। 


क्रोध और प्रतिशोध की अग्नि में जलता हुआ मैं अंधा हो चुका था। श्रीकृष्ण ने मुझे दंड दिया। कृष्ण ने जन्म से प्राप्त दिव्य मणि, मेरे माथे से निकाल ली। 


श्रीकृष्ण ने  मुझे श्राप दिया “तुम अपने पिता की मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पा रहे हो, इसलिए मृत्यु का सत्य तुमसे कलियुग के अंत तक दूर ही रहेगा। तुमने ऐसा पाप किया है कि तुम मनुष्यों के बीच रहने के लायक नहीं हो, इसलिए तुम हमेशा भटकते रहोगे। तुम्हारा शरीर लहु और गंध से भरा रहेगा, जिससे तुम्हें अपने पाप याद आएंगे।”


मेरे इस पतित कर्म की सभी ने निंदा की, परन्तु दुर्योधन मृत्यु से पहले मेरे इस कार्य से संतुष्ट और प्रसन्न नहीं हुआ। 


श्रीहीन तो मैं उसी क्षण हो गया था, जब मैंने एक निर्दोष स्त्री और उसके अजन्मे शिशु को मारने की कोशिश की थी। किन्तु केश मुंड जाने और मणि-विच्छेदन से और भी श्रीहीन हो गया और मस्तक झुक गया। 


श्रीकृष्ण ने मुझे अनन्त काल तक पृथ्वी पर दुःखों के दलदल में भटकने का श्राप दिया। मेरा शरीर ऐसे घावों से पीड़ित था जो अब कभी ठीक नहीं होंगे। 


अब मेरी आत्मा अपराध बोध से बोझिल थी, जो कभी मिट नहीं सकती थी। मेरी दिव्य शक्ति, मणि को निकाल दिया। अब में एक योद्धा की छाया के रूप में भटकने के लिए, अभिशप्त था। 


पांडव, द्रौपदी के पास लौट जाते हैं, जबकि मैं व्यास के साथ वन में लुप्त हो जाता हूँ। मेरा एक बार का महान  रूप, एक पीड़ित पथिक में सिमट गया। मैं एक ऐसा व्यक्ति बन गया जो ना तो मरा है और ना जीवित है। 


मैं अब अपने प्रतिशोध की कीमत चुकाने के लिए अभिशप्त हो गया। हर इंसान को ‘अमरत्व’ का वरदान चाहिए, लेकिन जिसे अमरत्व मिलता है, वही बता सकते हैं कि अमर होना वरदान है या श्राप।


चिरंजीवी का मार्ग



रात्रि की वह अंतिम छाया क्षण भर में विलीन हो गई, जैसे द्रोणाचार्य की आत्मा को भी कुरुक्षेत्र के छल से मुक्ति मिल गई हो। पर मुझ अश्वत्थामा के लिए कोई मुक्ति न थी। 


भोर की पहली किरण मेरे  ललाट पर पड़ी, जहां कभी मणि सुशोभित थी और अब भगवान कृष्ण के श्राप का अभिशाप, एक न बुझने वाली ज्वाला बनकर धधक रही थी । 


मेरे  घाव से रिसता हुआ रक्त न केवल मेरे शरीर को, बल्कि आत्मा को भी वर्षों, युगों तक दग्ध करने के लिए नियत था। मैं वह चिरंजीवी था जिस पर जीवन का नहीं, अपितु अथाह पीड़ा का श्राप।


पिता के शब्द मेरे  कानों में गूंज रहे थे: ‘यह कथा केवल एक दुर्ग की नहीं है, पुत्र। यह हमारी नियति का सार है।’


मैंने अपने शरीर को उठाया। कुरुक्षेत्र का दाह अब समाप्त हो चुका था। अब मेरा मार्ग केवल एक था दक्षिण की ओर, उस असीरगढ़ की ओर, जहाँ एक और चिरंजीवी अपनी नियति भोग रहा था। 


मुझे  लगा जैसे उस दुर्ग ने मुझे  पुकारा हो, एक ऐसा स्थान जहाँ इतिहास और किंवदंतियाँ एक ही दुःख की गाथा गाते थे: छल का दुःख।


कई दिनों तक, शोक और पीड़ा से जर्जर, मैने अपनी यात्रा की। मैने दक्कन की ओर मुख किया, उन सतपुड़ा और विंध्याचल की दुर्गम घाटियों को पार किया जहां सभ्यता का शोर नहीं था। 


मेरा हृदय प्रतिशोध से खाली हो चुका था; अब उसमें केवल एक शाश्वत प्रश्न था, “क्या मुझे  उस गुप्तेश्वर महादेव के मंदिर में अपने दुःख का कोई प्रतिरूप मिलेगा? क्या कोई दूसरी शापित आत्मा उस दुर्गम एकांत में मेरे कष्ट को समझेगी?”


पिता की आत्मा विलीन हो गई, पर उनका अंतिम निर्देश मेरे लिए नया मार्ग बन गया, असीरगढ़। माथे पर धधकता घाव, जो कभी मणि का स्थान था, अब असाध्य पीड़ा का केंद्र था। मेरा शरीर विशालकाय था, किन्तु रोग और श्राप ने उसे जर्जर कर दिया था।


मैने  दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। वह यात्रा युगों की थी, जहाँ सभ्यताएँ बनीं और मिटी, पर मैं  चलता रहा  भूखा, प्यासा, और असाध्य रोगों से घिरा हुआ। हर कदम पर मुझे अपने पिता के अपमान, अपनी मूर्खता और अपने शाप का भार महसूस होता था।


आखिरकार, मैने  दूर क्षितिज पर सतपुड़ा की पहाड़ियों की एक अभेद्य दीवार देखी। यह प्राकृतिक दृढ़ता थी, जिसे देख कर क्षणिक शांति मिली। 


बुरहानपुर के पास पहुंचकर, मैं  तलहटी तक पहुँचा।  मैने मोती महल के खंडहरों को पार किया, जो शाहजहाँ की प्रिय बेगम की उपेक्षित समाधि थी  एक और प्रमाण कि संसार में प्रेम और पराक्रम दोनों ही अंततः काल की उपेक्षा का शिकार होते हैं।


मैने दुर्ग पर चढ़ना आरंभ किया। पहला स्तर, मलयगढ़, पर सेना की छावनियों के अवशेष थे। दूसरा स्तर, कमरगढ़, जो बाहरी दीवारों की रक्षा करता था, अब हवाओं की सीटी बजाता एक सन्नाटा था। 


मैं अंततः सतपुड़ा की पहाड़ियों की ऊँची चोटी पर था, जहाँ तीन स्तरों पर दुर्ग की अभेद्य संरचना खड़ी थी, मलयगढ़, कमरगढ़, और सबसे ऊपर असीरगढ़।


मुझे अपने पिता के शब्द याद आए, "छल से टूटा द्वार।" असीरगढ़ की कहानी मेरे अपने जीवन का दर्पण थी।

मैं  दुर्ग के सबसे ऊपरी शिखर पर पहुँचा। जिसे स्वयं असीरगढ़ कहा जाता था।


वहाँ से नर्मदा और ताप्ती की घाटियाँ दिखाई देती थी,  एक ऐसा दृश्य जो किसी भी राजा को इस स्थान पर कब्जा करने के लिए लालायित कर सकता था।


वहाँ खंडहर मस्जिद और पानी के कुंड थे, पर सबसे महत्वपूर्ण था गुप्तेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर। यह मंदिर शाप से बंधे हुए योद्धाओं का अंतिम आश्रय था। और वहाँ, दुर्ग के मध्य में, वह देवस्थान था जिसका  मैने वर्णन किया था  गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर।


असीरगढ़ की छाया


मैं प्रतिशोध को आग में जलता ऐसा योद्धा बन गया कि मेरे साथ हमेशा खड़ा रहने बाला युधिष्ठिर भी कभी-कभी कांप उठता था। कई शताब्दियां बीत गई। लेकिन मेरे प्रतिशोध की ज्वाला आज भी जीवित है। 


आज अचानक मैं आर्यावर्त में विचरण करते हुए, शताब्दियों बाद, जिस स्थान में आ गया हूँ वह है कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि। अभी रात्रि का अन्तिम प्रहर चल रहा है। 


कुरुक्षेत्र का भयानक युद्ध समाप्त हो चुका था। रात्रि के तीसरे प्रहर में, अपने जघन्य पापों, पांडवों के पुत्रों का वध के पश्चात्, गुरु पुत्र अश्वत्थामा, मैं, गहरे अंधकार में डूबे एक टीले पर बैठा था। 


माथे पर घाव, पीड़ा और चिरंजीवी होने का शाप लिए अपने विनाश पर विलाप कर रहा था। मैं शोक और प्रतिशोध में डूबा हुआ, अपने दिवंगत पिता द्रोणाचार्य की आत्मा के छाया-रूप को देख पा रहा हूँ। 


चारों ओर केवल राख और मौन का साम्राज्य। मैं अपने मृत पिता आचार्य द्रोण के पास बैठा था, जिनके शरीर से युद्ध की धूल भी ठीक से नहीं मिटी थी। तभी, नेत्रों के सम्मुख, एक अस्थिर, तेजोमय आकृति प्रकट हुई, मेरे  पूज्य पिता, गुरु द्रोणाचार्य।


पिता की आत्मा एक क्षणिक, धूमिल प्रकाश के रूप में प्रकट हुई, जो मेरे हृदय के गहन दुःख को समझने का प्रयास कर रही थी।


गुरु की आत्मा, जो पुत्र के भविष्य से अवगत थी, शांत थी; जबकि पुत्र का हृदय पश्चाताप और क्रोध की अग्नि में जल रहा था। द्रोण का स्वर अत्यंत धीमा, परन्तु ब्रह्मांड के समान गंभीर था।


द्रोणाचार्य, “पुत्र, अश्वत्थामा... तुम अभी भी उस भूमि पर क्यों बैठे हो जहां छल ने न्याय का वध किया? मेरी दृष्टि अब इस क्षणिक संसार से परे है। मुझे बताओ, इस पराजय के बाद, इस नश्वर जगत में क्या कोई ऐसा दुर्ग है जो अब भी ‘अभेदनीय’ कहलाता है?”


द्रोणाचार्य, "पुत्र, अश्वत्थामा... इस अनश्वर पीड़ा को छोड़, क्यों तेरी दृष्टि उस सुदूर दक्षिण की ओर है? किस दुर्गम शिखर की ओर तू देखता है, जिसका परिचय मुझे आज तक प्राप्त नहीं हुआ? क्या वहां कोई शांति का आश्रय है?


अश्वत्थामा, कंठ में तीव्र वेदना के साथ, "पिताजी, वह शिखर शांति का नहीं, अपितु शक्ति का अंतिम गढ़ है। उसे 'असीरगढ़' कहते हैं, दक्कन का वह द्वार, जो मेरे और इस शापित पृथ्वी के बीच अंतिम विभाजक रेखा है। यदि उत्तर में कोई परास्त होता है, तो वह दक्षिण में इसी दुर्ग से प्रवेश करता है।"


द्रोणाचार्य, "अद्भुत! हमने तो केवल तक्षशिला और इंद्रप्रस्थ की अभेद्यता सुनी थी। क्या वह किला मेरे ज्ञान से भी परे था? मुझे बताओ, इस दुर्ग की स्थापना किसने की? यह किसका राज्य था, जिसने इसे दक्कन की चाबी बना दिया?"


अश्वत्थामा, कंठ अवरुद्ध होते हुए, “पिताश्री, पराजय तो हर उस वस्तु का नाम है जो काल के चक्र में समा जाती है। किन्तु हाँ, दक्षिण की दिशा में एक ऐसा दुर्ग है, जो अपनी अविजेयता के लिए ख्यात है। लोग उसे 'दक्कन की कुंजी' कहते हैं, और उसका नाम है असीरगढ़।”


द्रोणाचार्य, 'दक्कन की कुंजी'? “जिस स्थान पर पहुँचने के लिए एक द्वार को भेदना आवश्यक हो। बताओ, उस दुर्ग का निर्माण किस उद्देश्य से हुआ? क्या वह भी किसी महान राजा का अहंकार था?”


अश्वत्थामा, “नहीं, पिताश्री। वह आरंभ में किसी सम्राट का अहंकार नहीं था। वह तो आशा अहीर नामक एक स्थानीय सरदार की साधारण आवश्यकता थी। अपनी प्रजा और अपने मवेशियों की सुरक्षा के लिए उसने सतपुड़ा की उस ऊँची चोटी को चुना।” 


“वह 'आशा अहीर गढ़' कहलाया, जो आज असीरगढ़ है। वह एक अकेला किला नहीं, बल्कि तीन स्तरों पर बना हुआ है  सबसे ऊपर असीरगढ़, फिर कमरगढ़, और सबसे नीचे मलयगढ़। इस त्रिस्तरीय सुरक्षा के कारण, उसे बल से जीतना असंभव था।”


द्रोणाचार्य, एक गहरी साँस लेते हुए, जो केवल ध्वनि थी। “असंभव… यह शब्द अब मुझे विडंबना लगता है। यदि वह इतना दृढ़ था, तो क्या उसे किसी ने जीता नहीं? क्या इतिहास ने उसकी अजेयता को नहीं तोड़ा?”


अश्वत्थामा, “जीता गया, पिताश्री। पर केवल छल से। सीधे युद्ध में नहीं। जब फ़ारूक़ी शासक नासिर खान उसे बल से न जीत सका, तो उसने कपट का सहारा लिया।”


मैने किले की अँधेरी कोठरी से देखा था, "यह संसार युद्धों से कम, धोखे से अधिक हारा है। मैंने कौरव-पांडव का छल देखा है, और इस दुर्ग का पहला बड़ा पतन भी एक सरल हृदय के टूटने से हुआ।"


मेरा मन सदियों पीछे लौटता है, उस क्षण पर जब राजा आशा अहीर अपने गढ़ पर खड़े थे। आशा अहीर सरल थे, उन्हें मनुष्यों की क्रूरता का अंदाज़ा नहीं था। पर फ़ारूक़ी शासक नासिर खान के मन में तो इस अभेद्य किले को हथियाने का षड्यंत्र पल रहा था। 


नासिर खान, फ़ारूक़ी वंश का शासक। वह जानता था कि इस विशाल गढ़ को सीधी लड़ाई से जीतना असंभव है। उसने छल का सहारा लिया।


किला अभी शांत है। नीचे मुख्य द्वार पर रोशनी में नासिर खान राजा आशा अहीर के सामने सिर झुकाए खड़ा है। नासिर खान का चेहरा आँसुओं से भीगा है यह केवल अभिनय है।


वह आशा अहीर से मिलने आया।  उसके मुख पर डर और सम्मान का भाव था, जो केवल दिखावा था। उसने मानवता का मुखौटा ओढ़ा।


आकाश की ओर देखते हुए मैने कहना जारी रखा, धीमे, भारी स्वर में,  


"वर्षों हो गए, पर मैं कभी उस रात्रि को नहीं भूल पाया। यही वह क्षण था, जब यह दक्कन का दरवाजा किसी शत्रु की शक्ति से नहीं, बल्कि एक मित्र के छल से टूटा। मैंने कुरुक्षेत्र में भी इतना गहरा अंधकार नहीं देखा था, जितना इस सरल हृदय राजा के विश्वास में है। मेरी आत्मा काँप रही है।"


नासिर खान, नम्रता से, "आशा जी, आपको मैं अपना बड़ा भाई मानता हूँ। मेरे शत्रु मुझ पर आक्रमण करने वाले हैं। मेरी स्त्रियां और बच्चे सुरक्षित नहीं हैं। यह दुर्ग ही दक्कन में सबसे सुरक्षित है। 


क्या आप मुझे अपने परिवार की महिलाओं को कुछ दिन के लिए यहाँ आश्रय देने का वचन देंगे? मेरे परिवार की महिलाएं खतरे में हैं। क्या आप उन्हें अपने अभेद्य गढ़ में कुछ दिन आश्रय देंगे?"


आशा अहीर, गंभीरता से, " "खान साहब, चिंता न करें। मेरी प्रजा की हर स्त्री, मेरी बेटी है। खान साहब, आपका परिवार मेरा भी है। यह किला हर निर्बल के लिए खुला है। आप पालकियों को अंदर भेजिए। यहाँ किसी की हिम्मत नहीं कि उन्हें छू सके। यह दुर्ग विश्वास पर खड़ा है, भय पर नहीं।"


मुख्य सरदार, आगे आते हुए, राजा से फुसफुसाते हुए,  "महाराज, क्षमा करें। खानदेश के हालात अच्छे नहीं हैं। नासिर खान की गतिविधियों पर संदेह होता है। क्या हम किसी अपरिचित बल को, बिना जांच-पड़ताल के, इतनी आसानी से द्वार खोलने की अनुमति दे दें?"


राजा आशा अहीर, सरदार को रोकते हुए,  "सरदार! यह हमारे अतिथि हैं। आश्रय माँगने वालों पर संदेह करना पाप है। मैं अपने धर्म से नहीं हटूंगा। यदि मैं आज इन स्त्रियों को आश्रय नहीं देता, तो यह असीरगढ़ अपनी महिमा खो देगा। द्वार खोलो!"


सरदार भारी मन से आज्ञा पालन करता है। दूर, बीस से अधिक सजी हुई पालकियों की कतार दिखाई देती है। धीमी बारिश में वे और रहस्यमय लग रही हैं। पालकियों को धीरे-धीरे मुख्य द्वार से अंदर लाया जाता है।


​​मैने दुःख तथा पीड़ा से मुट्ठी भींचते हुए कहा,  "ओह! वह क्षण! मैंने देखा कि द्वार खुल गया। राजा और उनका पुत्र पालकियों का स्वागत कर रहे थे... और फिर..."


अश्वत्थामा, पीड़ा से कराहते हुए,  "नहीं! आशा! रुक जाओ! यह पवित्र स्थान... छल से अपवित्र होने जा रहा है! इन पालकियों में दया नहीं, तलवारें छिपी हैं!"


पालकियाँ भीतर आ जाती हैं। जैसे ही अंतिम पालकी द्वार के भीतर आती है, नासिर खान के चेहरे से याचना का भाव गायब हो जाता है। एक क्रूर, विजयी मुस्कान उभरती है।


नासिर खान, तेज़, कठोर स्वर में, "अब द्वार बंद कर दो! और मेरे वीरों! बाहर निकलो!"


पालकियों के भारी पर्दे गिरते हैं। उनमें से हथियारबंद, पूर्ण-प्रशिक्षित सैनिक फुर्ती से बाहर कूदते हैं। वे तुरंत राजा आशा अहीर के छोटे से दल पर हमला कर देते हैं।


नासिर खान, क्रूरता से हँसते हुए, "स्वागत है, आशा! तुम्हारा यह सत्कार ही तुम्हारे और तुम्हारे वंश के पतन का कारण बना। दक्कन की चाबी अब मेरी है!"


राजा आशा अहीर, धोखे से स्तब्ध, लड़खड़ाते हुए,  "धोखा! यह क्या किया तुमने, खान...?"


नासिर खान, हँसते हुए, क्रूरता से, "मैंने वही किया, जो सत्ता करती है, आशा! यह दक्कन की चाबी इतनी आसानी से नहीं मिल सकती थी। तुम्हारा विश्वास ही तुम्हारी सबसे बड़ी मूर्खता थी! अब यह आशा अहीर गढ़ नहीं, मेरा फ़ारूक़ी किला होगा!"


मेरी आँखों में क्रोध का रक्त उतर आया। “पालकियों के भीतर स्त्रियां नहीं थी, पिताश्री। उनमें हथियारों से लैस सिपाही छिपे थे। जैसे ही उन्होंने दुर्ग में प्रवेश किया, उन्होंने आशा अहीर और उनके पुत्र की निर्ममता से हत्या कर दी।” 


आशा अहीर ने धीमी श्वास लेते हुए कहा "नासिर, यह घटना किसी को मत बताना, वरना मानवता से लोगों का विश्वास उठ जाएगा। लोग असहाय की मदद नहीं करेंगे।" 


लड़ाई छोटी पर भयंकर होती है। राजा आशा अहीर अपने कुछ वफादारों के साथ मारे जाते हैं। सरदार आखिरी सांस तक लड़ता है, पर विफल रहता है। उस रात किले पर नासिर खान का कब्जा हो जाता है। यह विश्वासघात इतिहास में दर्ज हो गया।


आँखों में शाश्वत दुःख लिए मैने कहा, "समाप्त! एक और कहानी, जिसके अंत में केवल छल और रक्त बचा। यह किला अब न केवल पत्थरों का पहाड़ है, बल्कि एक अमर कलंक भी ढोएगा। आशा अहीर की सरलता इस धरती से चली गई। और मैं... मैं खड़ा हूँ, हर छल को सदियों तक देखने के लिए, बाध्य।"


द्रोणाचार्य, और? “मुझे पता है, वहाँ विश्वासघात हुआ होगा। कपट का विष हर युग में बहता है।”


इस प्रकार, बिना एक तीर चलाए, वह अजेय दुर्ग एक धोखे के कारण गिर गया। यह सिद्ध हुआ कि जिस दृढ़ता पर कोई दुर्ग खड़ा होता है, वही दृढ़ता उसके विनाश का कारण भी बनती है।


निराशा में सिर हिलाते हुए मैने कहा, "विश्वास की हत्या सबसे आसान होती है। और इस किले ने, जो ईंट, पत्थर और चूना से बना था, छल की पहली चोट उसी दिन खाई।"


द्रोणाचार्य, मौन रहकर सोचते हुए। “छल-कपट... ठीक उसी तरह जैसे मुझे शस्त्र छोड़ने पर विवश किया गया था। यह दक्कन का द्वार भी उसी शाश्वत नियम का पालन करता है जो हमारे जीवन पर लागू हुआ। और अंततः, उस पर किसका शासन हुआ?”


'खानदेश'


अश्वत्थामा, "यह दुर्ग उस फारूकी वंश का ध्रुव-तारा था, जिसे मलिक राजा फारूकी ने स्थापित किया। उनकी राजधानी बुरहानपुर थी। इन सुल्तानों ने स्वयं को 'खान' की उपाधि से सुशोभित किया, और इसी कारण यह प्रदेश 'खानदेश' कहलाया। 


आदिल खान द्वितीय जैसे शासकों ने गोंडवाना तक अपना प्रभुत्व फैलाया। मेरे विचरण काल में, यह किला एक ऐसी शक्ति था, जिसका मान मुगल सम्राट को भी रखना पड़ा। कई पीढ़ियां बीती। यह किला इतना अजेय रहा। कोई इसे जीत नहीं पाता था।"


द्रोणाचार्य, "मुगल सम्राट? क्या वह शासक जिसका नाम अकबर है? मैंने सुना है कि वह संपूर्ण आर्यावर्त पर एकछत्र राज स्थापित करना चाहता था। क्या वह इस किले को जीत पाया? मैं इसके सामरिक महत्व को जानता हूँ दक्षिण के अभियानों का आधार-स्थल।"


अश्वत्थामा, "हाँ, पिताजी। उस समय, इस दुर्ग का फ़ारूक़ी वंश का अंतिम शासक राजा था बहादुर शाह फ़ारूक़ी। 


1596 में उसने अकबर की अधीनता मानने से स्पष्ट इनकार कर दिया, अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। तब कुपित होकर सम्राट अकबर ने 1599 में बुरहानपुर की ओर प्रस्थान किया। 


मुग़ल सम्राट अकबर दक्कन को पूरी तरह जीतना चाहते थे। उन्होंने बुरहानपुर पर कब्जा किया, पर सामने था असीरगढ़ किला, अकबर ने ग्यारह महीने तक असीरगढ़ किले को घेरे रखा। 


द्रोणाचार्य, "तो, क्या उसकी सेना को भी ग्यारह महीने तक बाहर खड़ा रहना पड़ा, जैसा कि मेरे जीवनकाल के दुर्गों के साथ हुआ था?"


ग्यारह महीने की लंबी घेराबंदी के बाद, रात का अंतिम पहर। शिविर में निराशा और थकान छाई है। सतपुड़ा की तलहटी में स्थित मुगल शिविर। सामने ऊंचाई पर असीरगढ़ का अभेद्य किला, अंधेरे में किसी विशालकाय दानव जैसा प्रतीत हो रहा है।


मैं दूर नीचे मुगल सेना के तम्बू देख रहा था, "मैंने अकबर की विशाल सेना को नीचे तम्बू डाले देखा। अकबर हफ्तों, महीनों तक इस दुर्ग को देखता रहा। अकबर भी जानता था कि युद्ध से यह किला नहीं टूटेगा। दीवारों पर चढ़ना असंभव था, और किले में पानी की कमी नहीं थी।"


"फ़ारूक़ी वंश के विश्वासघात से किले पर कब्ज़ा हुए लगभग दो सौ वर्ष बीत चुके थे। अब द्वार पर खड़े थे मुग़ल सम्राट अकबर। उनकी सेना विशाल थी, पर यह दुर्गम किला उनकी तलवार को स्वीकार करने को तैयार न था।"


एक कड़वी हँसी के साथ, "उससे भी अधिक, गुरुवर। शाही सेना ग्यारह महीने तक घेराबंदी करती रही, पर किला अविचलित रहा। उसकी संरचना देखिए यह एक ऊंची पहाड़ी पर बना है, जिसके आगे तीन और किले खड़े हैं।” 


किलेदार बहादुर शाह फ़ारूक़ी जानता था कि किले के पास गंगा-जमुना कुंड और रसद है। जिस में पर्याप्त पानी है। उसने अकबर के अधीन होने से साफ़ इनकार कर दिया था।


"मैंने वह घेराबंदी देखी। सतपुड़ा की पहाड़ियों पर सर्दी, गर्मी और बरसात तीनों ने मुगल सेना को थकाया, पर किले की तीन-स्तरीय दीवारें असीरगढ़, कमरगढ़, मलयगढ़ अटल रहीं। अकबर बेचैन थे। उन्हें दक्कन की कुंजी हर हाल में चाहिए थी, क्योंकि खानदेश को पूरी तरह मुगल साम्राज्य में मिलाना उनकी अंतिम महत्वाकांक्षा थी।"


आक्रमणकारियों के छिपने के लिए कोई जंगल नहीं, और अंदर वर्षों का राशन भरा था। शत्रु को निकट आने से रोकने के लिए इसकी दीवारों पर बड़े-बड़े कढ़ाहे बनाए गए थे, जिनमें 30 मन तेल गरम कर नीचे फेंका जाता था।


“युद्ध हुआ, पर किले की तीन-स्तरीय संरचना असीरगढ़, कमरगढ़, मलयगढ़ और पानी के पर्याप्त स्रोतों जैसे गंगा-जमुना कुंड के कारण, मुगल सेना हार मानने लगी।”


अकबर के शिविर में निराशा थी। अकबर अपने सलाहकारों से बात कर रहे थे। उनका चेहरा थका हुआ था, पर उनकी आँखें लक्ष्य पर टिकी थीं।


अकबर, क्रोध और निराशा के बीच, "यह कैसा गढ़ है? इसे तलवार से जीतना असंभव है, और समय मेरे पास नहीं है। मेरी प्रतिष्ठा दांव पर लगी है! यदि मैं इसे जीते बिना लौटा, तो दक्कन में मेरी सर्वोच्चता कौन मानेगा?"


अकबर अपने सेनापति से बात कर रहे थे। 


सेनापति, सिर झुकाकर, "जहाँपनाह, सीधी तलवार इसे नहीं काट पाएगी। हमें बल नहीं, बुद्धि का प्रयोग करना होगा।"


मुग़ल शिविर में, अकबर अपनी मशाल की रोशनी में नक्शे देख रहे थे। मीर बख्शी उनके पास बैठे हैं, सिर झुकाए हुए।


मीर बख्शी, निराश, "जहाँपनाह! ग्यारह महीने बीत गए। हमारी सेनाएं थक चुकी हैं। किले के भीतर पानी के स्रोत आज भी भरे हैं, और रसद की कमी का कोई संकेत नहीं है। बहादुर शाह का मनोबल अटूट है।"


अकबर,चिंता में, "इतना लंबा समय बीत गया, सेना थक चुकी है। यह किला तो पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि लोहे का दरवाजा है। इसे कैसे खोलें?"


अकबर, नक्शे पर उंगली फेरते हुए, चिंतित, “मैंने हिन्दुस्तान के बड़े-बड़े गढ़ जीते हैं, पर इस दक्कन के द्वार ने मेरी प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। दुनिया क्या कहेगी? मुगल सेना हार मानकर लौटी?"


मीर बख्शी, विनम्र पर स्पष्ट, "जहाँपनाह, हमें अब सीधी लड़ाई छोड़कर कूटनीति का सहारा लेना होगा। बहादुर शाह जितना वीर है, उतना ही लालची भी। वह जानता है कि वह हार नहीं सकता, इसलिए वह अब मोल-भाव करेगा। उसकी हिम्मत को नहीं, उसके लालच को तोड़ना पड़ेगा।"


अकबर उठकर टहलने लगते हैं। उनकी आँखों में नैतिक संघर्ष स्पष्ट है।


अकबर, स्वयं से, "मैंने कभी तलवार के अलावा किसी और चीज़ से विजय नहीं खरीदी। पर अब... क्या मैं अपने सिद्धांत छोड़ दूँ? क्या अपनी विजय को कलंकित करूँ? पर दक्कन का मार्ग... यह जीत अनिवार्य है।"


अकबर दृढ़ता से मुड़ते हैं। उनके स्वर में महान सम्राट की निर्णायक क्षमता झलकती है।


अकबर, मीर बख्शी से, धीमी पर दृढ़ आवाज़ में, "ठीक है। तलवार ने काम नहीं किया। अब सोना काम करेगा। बहादुर शाह को संदेश भेजो। कहो कि मैं उसे सुरक्षित बातचीत के लिए बुला रहा हूँ, और साथ ही यह भी सुनिश्चित करो कि उसके रक्षकों को खजाना दिखाया जाए।"


मीर बख्शी, आँखें चमकाते हुए, "आप ठीक कह रहे हैं, जहाँपनाह! यह चाबी लोहे की नहीं, स्वर्ण की होगी। लालच की आग इस अभेद्य किले को भीतर से खा जाएगी।"


सोने की चाबी 


उसी क्षण, किले की छत पर, मैं नीचे के दृश्यों को देखता हूँ। मेरे मन तथा चेहरे पर गहन दुःख और वैराग्य का भाव है।


"और यहीं, महान सम्राट ने वह रास्ता चुना जिसे उन्होंने स्वयं सदा नकारा था, छल का रास्ता।"


अकबर ने एक विस्तृत चाल चली। ठोस निर्णय लेते हुए, "किलेदार बहादुर शाह को संदेश भेजो कि मैं शांति वार्ता के लिए उसे सुरक्षित मार्ग देता हूँ। उसे कहो कि वह सम्मान सहित आत्मसमर्पण कर दे। और साथ ही, किले के भीतर गुप्त दूत भेजो।"


मैं पीड़ा से भर गया,  “महान सम्राट भी इसी मार्ग पर आ गए। छल! यह इतिहास की सबसे पुरानी और सबसे खतरनाक बीमारी है। फ़ारूक़ी ने आशा अहीर के विश्वास को तोड़ा था, और अब सम्राट अकबर बहादुर शाह को लालच से तोड़ रहा है।"


अकबर,एक गहरी साँस लेकर, "ठीक है। अब इस दक्कन का दरवाजा सोने की चाबी से खोला जाएगा।"


द्रोणाचार्य, "तो फिर, ऐसी दुर्भेद्य दीवार कैसे टूटी?"


अश्वत्थामा, आँखों में गहरी निराशा, "लोहे और बारूद से नहीं, पिताजी। कहा जाता है कि उसे 'सोने की चाबी' से खोला गया था। जहाँ बल विफल हुआ, वहां छल ने विजय प्राप्त की। यह मेरे भाग्य के समान ही है शक्ति जहाँ विफल होती है, वहाँ कूटनीति या प्रलोभन अंतिम द्वार खोलता है। अकबर ने इस 'दक्षिण की कुंजी' को इसी तरह प्राप्त किया।"


अकबर ने सोने की चाबी का उपयोग किया। उसने किले के भीतर बचे रक्षकों को धन और जागीर का लालच दिया।


अश्वत्थामा, गुस्से और व्यथा से, "वह दरवाजा, जो सदियों तक किसी तलवार से नहीं टूटा, अंततः सोने के खनकने से टूट गया।


अगले दिन, बहादुर शाह किले से नीचे आने का निर्णय लेता है। वह आश्वस्त है, क्योंकि अकबर ने 'सुरक्षा' का वादा किया है। अकबर के गुप्त दूतों ने किले के भीतर प्रवेश किया। उनका हथियार तलवार नहीं, बल्कि स्वर्ण था। किले के भीतर, गुप्त दूत रक्षकों को बड़ी मात्रा में सोने और जागीर का लालच देते हैं। 


निराशा और हताशा का भाव मुझे गहन अंधकार में ले गया। 


"पहले आशा अहीर का विश्वास टूटा था, अब बहादुर शाह का लालच टूटा। वह बातचीत के लिए नीचे आया और अकबर ने उसे धोखे से किलेदार को बंदी बनाया। भीतर, सोने की चाबी ने दरवाज़ा खोल दिया था।"


"रक्षकों ने सोने के आगे अपने राजा और अपनी शपथ को त्याग दिया। वे भूल गए कि यह गढ़ उनकी ढाल था, न कि उनकी तिजोरी। लालच ने उनकी आँखों पर पट्टी बाँध दी। घूस और षड्यंत्र से किलेदार को छलपूर्वक पराजित किया।"


दुर्ग की दीवारों से मैने देखा पिता जी,  "विजय हुई! पर यह विजय नहीं, नैतिक पतन है। यह जीत बताती है कि इस संसार में कुछ भी अजेय नहीं है, क्योंकि हर इंसान की  एक कीमत होती है। यह दुर्ग दक्कन का दरवाजा सदा के लिए खुल गया... पर अपने सम्मान को खोकर।"


असीरगढ़ के द्वार पूरी तरह खुल जाते हैं। अकबर विजयी होकर किले के मुख्य भवन में प्रवेश करते हैं।


 व्यथित अश्वत्थामा,  "यह जीत अकबर के अंतिम महान अभियान की विजय थी, पर यह उनकी नैतिकता पर एक काला धब्बा भी था। उन्होंने दक्कन का दरवाजा खोल दिया था, पर छल को सम्राट की नीति में स्थान दे दिया था। मैंने उस दिन इतिहास को फिर से दोहराते देखा।"


इतिहास बताता है कि अकबर ने बहादुर शाह को धोखे से बुलाया और बंदी बना लिया। रिश्वत और छल से अकबर ने 17 जनवरी, 1601 में इस दुर्गम किले पर विजय प्राप्त की।


“यह अकबर के जीवन का अंतिम महत्वपूर्ण अभियान था। विजय का यह तरीका अकबर के महान चरित्र पर एक धब्बा बनकर रह गया। पर मेरे लिए, यह केवल मानव लालच की एक और दुखद पुनरावृत्ति थी।”


उसके बाद मुगलों का आधिपत्य हुआ। चाहे आशा अहीर का विश्वास हो या बहादुर शाह फ़ारूक़ी का लालच, इस किले के द्वार हमेशा धोखे से ही खुले।


गुप्तेश्वर महादेव 


द्रोणाचार्य, “अश्वत्थामा, क्या उस दुर्ग के शिखरों पर आज भी कोई ऐसी पवित्रता शेष है जो इस छल-कपट की कथा से परे हो? कोई देवस्थान?”


मैने अपने असीरगढ़ में बिताये दिनों की याद करते हुए कहा, “हाँ, पिताश्री। उस सबसे ऊपरी परकोटे असीरगढ़  पर एक गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर है। वहाँ खंडहर मस्जिद भी है, और पानी के लिए कुंड भी।”


उस मंदिर से एक किंवदंती जुड़ी है। स्थानीय लोग कहते हैं कि वह चिरंजीवी, जिसे भगवान कृष्ण ने भटकने का श्राप दिया था... वह आज भी हर प्रभात में वहाँ शिव की पूजा करने आता है। एक शाश्वत श्राप से बंधा हुआ योद्धा... वह आज भी उस अजेय दुर्ग में अपना दुख भोग रहा है


द्रोणाचार्य, छाया-स्वर में विलीन होते हुए, “शाश्वत श्राप... अजेयता का मिथक... और छल से टूटे द्वार... यह कथा केवल एक दुर्ग की नहीं है, पुत्र। यह हमारी नियति का सार है।”


द्रोणाचार्य, शांत होते हुए, जैसे भविष्य देख रहे हों, "पुत्र, हर महान युद्ध के बाद, एक और युद्ध आरंभ होता है। याद रखना, तू उस क्षेत्र से अछूता नहीं रहेगा।


जब मुगलों का पतन होगा, तो मराठा शक्ति यहाँ से गुजरेगी, और उसके बाद ब्रिटिश। यह भूमि संघर्ष का केंद्र बनी रहेगी। क्या तू वहाँ जाएगा?"


माथे पर हाथ फेरते हुए मैने कहा, "मुझे पता नहीं, गुरुवर। शापित व्यक्ति का कोई ठिकाना नहीं होता। पर, उस किले के भीतर, एक प्राचीन शिव मंदिर है... और उस शिव मंदिर में, शायद मैं अभी भी अपने शापित घावों की दवा खोजता रहूंगा, युगों-युगों तक।"


गहराई से सोचते हुए, "यह शौर्य अद्भुत था टूटे हुए लोगों का एकजुट होकर अपनी पहचान फिर से स्थापित करना। पर मैंने उन्हें भी विलीन होते देखा। मैंने देखा कि कैसे हर उत्थान का अंत पतन में होता है, चाहे वह फारूकी हो, मुग़ल हों, या रेवा गुर्जर। केवल यह दुर्ग, और मेरा शाप, अटल रहा।


 वैसे यह किला बहुत ही पौराणिक है अनेक कथाएं और मान्यताएं इसके इर्द गिर्द घूमती रहती है। पुराने समय से यानी जब गुर्जर प्रतिहार राजवंश का मालवा तक राज्य था तब शायद राजा मिहिरकुल द्वारा यह किला बनाया जाने का इतिहास कही-कही मिलता है। 


गुर्जरात्रा


गुर्जर प्रतिहार राजवंश का पतन होने के बाद, मुस्लिम आक्रांताओं के आक्रमण से बचने के लिए, यहां के स्थानिक गुर्जर खुद को गुर्जर की बजाय राजपूत कहने लगे, जो चौहान गोत्र के गुर्जर थे।  


आज भी जब हम आशापुरा या आशा देवी के मंदिर में जाते हैं, तो वहां जो पुजारी हैं, जिनकी उम्र 90 साल के लगभग है, वह बताते है कि असल में हम गुर्जर ही है, लेकिन अब खुद को राजपूत बोलते हुए सादिया हो गयी इसलिए अब हम राजपूत ही हो गए। 


गुर्जरात्रा, नाम इसलिए गुर्जरात्रा पड़ा क्योंकि उस पर गुर्जरों का अखंड साम्राज्य रहा। यानी आज का गुजरात। 


सौराष्ट्र में स्थित सोमनाथ के साथ गुर्जरों का भी पतन हुआ। वहां पर जब मुस्लिम आक्रांताओं ने बर्बरतापूर्वक शासन लागू किया तब गुर्जर लड़ाकों ने खम्भात का रुख किया और कुछ भागकर ताप्ती नदी के किनारे-किनारे महाराष्ट्र में आ गये। 


उन्होंने गुजरात से लेकर जबलपुर और भेड़ाघाट तक अपना साम्राज्य स्थापित किया और ऐसा कहा जाता है कि इसको करने में गुर्जर वीरों को कम से कम 60 साल का समय लगा। मां नर्मदा का एक नाम रेवा है इसलिए यह रेवा गुर्जर कहलाए। 


प्रतिहार के पतन के बाद गुर्जरों ने अपनी सत्ता को नर्मदा नदी के किनारों पर स्थापित किया मुस्लिम आक्रांताओं की वजह से अपनी पहचान छुपाया हुआ और खुद को गुर्जर की बजाय राजपूत कहलाने वाले चौहान गुर्जर रेवा गुर्जरों को आकर मिले और रेवा गुर्जर और चौहान गुर्जर एक बड़ी शक्ति बन गयी।  


इन दोनों ने मिलकर एक साथ असीरगढ़ किले पर आक्रमण किया, कई महीनों तक यह संघर्ष चला आखरी में मुसलमानों को वहाँ से भाग जाना पड़ा और इस तरह असीरगढ़ का किला एक बार फिर गुर्जरों के अधीनस्थ हुआ। 


उसके बाद 100 साल तक गुर्जर इस किले के सम्राट रहे और उन्होंने अपने राज्य की चौड़ाई नर्मदा से लेकर दक्षिण में विंध्याचल तक बढ़ा दी थी। 



बाब-ए-दक्खन

असीरगढ़ का किला बुरहानपुर से 22 किमी और खंडवा से 48 किमी दूरी पर खंडवा-बुरहानपुर रोड पर स्थित है। आधार से इस किले की ऊंचाई 259 मीटर तथा औसत समुद्र तल से 700 मीटर है।  


"दक्षिण का द्वार"  इसे ऐतिहासिक रूप से "दक्षिण की कुंजी" या "बाब-ए-दक्खन" कहा जाता था। इसका सामरिक महत्व बहुत अधिक था।  


यह उत्तर भारत को दक्कन, दक्षिण से जोड़ने वाले महत्वपूर्ण मार्ग को नियंत्रित करता था। जिस शासक के पास यह किला होता था, उसके लिए पूरे खानदेश क्षेत्र पर नियंत्रण आसान हो जाता था।


पाटलिपुत्र, मौर्य और गुप्त साम्राज्य की राजधानी था। व्यापारिक मार्ग का यह पूर्वी सिरा था, जो गंगा और सोन नदी के जल मार्गों से जुड़ा था और रेशम, वस्त्र, और विलासिता की वस्तुओं के व्यापार का प्रमुख केंद्र था। 


दूसरा मार्ग पर केंद्र था दिल्ली इंद्रप्रस्थ। मध्यकाल और मुगल काल में यह मार्ग लाहौर, आगरा और बुरहानपुर को जोड़ने वाली शाही सड़क  का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना।


यहां के बाद मथुरा, कुषाण काल में कला, संस्कृति, और व्यापार का प्रमुख केंद्र था। यह वह बिंदु था जहाँ से उत्तरापथ, उत्तर-पश्चिम और दक्षिणापथ, दक्षिण के मार्ग अलग होते थे।


इसके बाद दक्षिणापथ पर था ओरछा। यह शहर बाद के मध्यकाल में बुंदेला शासकों की राजधानी बना, जो इस मार्ग पर सैन्य और प्रशासनिक नियंत्रण के लिए महत्वपूर्ण था।


दक्षिणापथ मार्ग का महत्वपूर्ण नगर था विदिशा। यह प्राचीन काल में चेदि जनपद की राजधानी और मौर्य तथा शुंग काल में एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और बौद्ध केंद्र। यह उज्जैन के मार्ग से जुड़ा हुआ था।


दक्षिणापथ का सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापारिक चौराहा था उज्जैन, उज्जयिनी। यह पश्चिमी बंदरगाहों जैसे भृगुकच्छ/भड़ौच को उत्तर भारत से जोड़ता था। जिससे रोम तक व्यापार होता था। यहाँ से वस्त्रों और अन्य वस्तुओं का व्यापक व्यापार होता था। 


असीरगढ़ का किला भौगोलिक रूप से सतपुड़ा पहाड़ी दर्रे पर स्थित है। जो उत्तर भारत से दक्कन में प्रवेश करने का एकमात्र सुरक्षित और सरल मार्ग बुरहानपुर से था।


सल्तनत ने उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पश्चिम व्यापार मार्गों को नियंत्रित किया। जो गुजरात, मालवा, और दक्कन को जोड़ते थे। बुरहानपुर अपनी सामरिक स्थिति के कारण एक प्रमुख व्यापारिक केंद्र बन गया।


समय के प्रवाह को देखते हुए, मुगलों का भी पतन हुआ। 1601  से 1760  तक उनका कब्ज़ा रहा, फिर मराठा शक्ति यहाँ आई। पर काल के नाटक में अगला और अंतिम पात्र प्रवेश कर चुका था: अंग्रेज।


द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, 1803  ईस्वी में, कंपनी की सेनाओं ने पहली बार असीरगढ़ को चुनौती दी।


अंग्रेज़ों की शक्ति मुग़लों या मराठों जैसी नहीं थी। उनकी सेना अनुशासित और कठोर थी। 1803 में, उन्होंने पहले असीरगढ़ के निचले शहर पेटा पर कब्ज़ा किया। इसके बाद, उन्होंने तोपखाने से किले पर भयंकर गोलीबारी शुरू कर दी।


21 अक्टूबर 1803 को, किले की सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया। पर यह कब्ज़ा अस्थायी था, और मराठाओं ने इसे जल्द ही वापस पा लिया।


तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत तक, 1899 में, असीरगढ़ भारत का एकमात्र ऐसा किला बचा था जिस पर अंग्रेजों का कब्ज़ा नहीं था। यह किलादार जेसवंत राव लार के अधीन था।


यह किला अपनी अंतिम लड़ाई के लिए तैयार था। जेसवंत राव ने हार मानने से इनकार कर दिया। अंग्रेजों ने अब कोई छल या कूटनीति नहीं अपनाई। वे जानते थे कि अब केवल कठोर सैन्य बल ही काम आएगा।


एक विशाल ब्रिटिश टुकड़ी ने घेराबंदी की। उन्होंने सबसे पहले पास के शहर पर कब्ज़ा करके उसे अपना सैन्य अड्डा बनाया, और फिर असीरगढ़ पर भयानक तोपखाने से हमला किया।


लगातार गोलाबारी के बाद, 9 अप्रैल 1899 को, अंग्रेजों ने किले पर निर्णायक हमला किया और कब्ज़ा कर लिया। जेसवंत राव लार को हार माननी पड़ी।


असीरगढ़ किले पर कब्जा करने के साथ ही, युद्ध में अंग्रेजों की जीत पूरी हो गई और सभी सैन्य अभियान बंद हो गए।


"मैंने पत्थरों की वर्षा को देखा। तोपों की लगातार गोलीबारी ने सदियों पुरानी दीवारों को हिला दिया। यह युद्ध विश्वासघात या लालच का नहीं था, यह सामरिक श्रेष्ठता का युद्ध था।" मैं अपने आप से सोच रहा था 


"समाप्त। असीरगढ़, दक्कन की कुंजी, अंततः एक विदेशी शक्ति के हाथ चली गई। इस कब्ज़े के साथ ही, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हुआ और भारत में सैन्य अभियानों का एक युग थम गया।"


"आज भी यह किला, खंडहर होकर भी, अपनी कहानी कहता है पहले विश्वास टूटा, फिर लालच बिका, और अंत में कठोर बल जीता। और मैं, अश्वत्थामा, इन सभी नश्वर शासकों के साक्षी के रूप में, यहाँ गुप्तेश्वर महादेव के सामने अपनी अनंत पीड़ा के साथ खड़ा हूँ।"


श्राप का शमन 

मंदिर प्राचीन पत्थरों का एक मौन संग्रह था, जिसके भीतर शिवलिंग अंधकार में स्थित था। यह मंदिर सदियों के युद्ध, विश्वासघात और शासन परिवर्तन का साक्षी था, पर स्वयं अपरिवर्तित। 


मैंने  भीतर प्रवेश किया। मेरे चरण मंदिर की ठंडी भूमि पर पड़े। यह स्थान पवित्र था, फिर भी उसके शाप की छाया हर दीवार पर नाच रही थी। मैंने अपने ललाट पर धधकते घाव पर हाथ रखा।


यह वही स्थान था जहाँ आशा अहीर ने शरण दी थी, और धोखा पाया था। यह वही स्थान था जहाँ अकबर ने छल से विजय प्राप्त की थी। और यह वही स्थान था, जहाँ अब मैं, अश्वत्थामा, चिरकाल के लिए शरण लेने आया था।


मैं, मंदिर की ठंडी दीवार पर हाथ फेरते हुए, महसूस कर रहा था,  "वर्ष 1399 का काल... तब इस दुर्ग का नाम आशा अहीर गढ़ था। यह केवल एक राजा का निवास नहीं था, बल्कि खानदेश के निर्बल लोगों की ढाल था। दक्षिण की ओर जाने वाले हर राहगीर को यहाँ से गुज़रना होता था यही दक्कन का दरवाज़ा था।"


मैं,एक गहरी साँस लेता हूँ। मुझे उस समय की हवा की गंध आज भी महसूस होती है, जिसमें छल की नमी घुली हुई थी।


इतिहास में इसे अस्तक अहीर ने नौवीं शताब्दी में बनवाया, या फिर बाद में आशा अहीर ने, यह अब मायने नहीं रखता। मायने रखता है तो बस यह कि उस अहीर सरदार ने इसे नर्मदा और ताप्ती की घाटियों को जोड़ने वाले दर्रे पर क्यों बनाया था? 


ताकि कोई बाहरी शक्ति, कोई आक्रांता, आसानी से अंदर न आ सके। वह इसकी दुर्भेद्यता पर इतना आश्वस्त था कि उसने अपने द्वार पर कभी संदेह का ताला नहीं लगाया।


मैंने घुटने टेके। मेरे पास देने के लिए न तो फूल थे और न ही जल, केवल मेरे शाश्वत दुःख।


“हे महादेव, मैंने जीवन में जो कुछ भी किया, वह क्रोध और छल का परिणाम था। पर अब मेरी यात्रा सत्य की है उस अजेय दुर्ग के सत्य की, जो केवल छल से टूटा। मेरी नियति यहाँ समाप्त नहीं होती, यह यहाँ से आरंभ होती है।”


मैं जानता था कि मेरा श्राप हर रोज़ सुबह इस शिवलिंग की पूजा करने के लिए विवश करेगा। अब मैं असीरगढ़ का एक नया कैदी था  एक चिरंजीवी कैदी, जिसके लिए अतीत कभी नहीं मरेगा।


सतपुड़ा की जिस ऊँची चोटी पर असीरगढ़ का किला टिका है, वहाँ हवा बहुत शांत बहती है। रात के चौथे पहर, जब दुनिया गहरी नींद में होती है, तो किले के सबसे पुराने हिस्से में, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के भीतर, एक धीमी, भारी आवाज़ गूंजती है। यह आवाज़ मेरी है।


मैं हर दिन यहाँ आता हूँ। वर्षों का श्राप मुझे अनवरत भटकने को विवश करता है, पर शिव के सामने मुझे क्षण भर की शांति मिलती है। शिवलिंग के समक्ष बैठता हूँ और काँपते हाथों से पुष्प अर्पित करता हूँ ।


शिवलिंग से मैं प्रार्थना करता हूँ, "हे महादेव! यह श्राप कितना लंबा है? मैं थकान से चूर हूँ। मेरा माथा क्यों नहीं फटता?"


हवा की हल्की गूँज और पत्थरों की चुप्पी के बीच कोई उत्तर नहीं आता। अश्वत्थामा मंदिर की प्राचीर से नीचे की ओर देखते हैं। दूर, बुरहानपुर और खानदेश का पूरा मैदान फैला है। यह स्थान उत्तर और दक्षिण के बीच का द्वार है।


 स्वयं से, "यह दुर्ग... यह भी मेरी पीड़ा जैसा अटल है। जिसने इसे जीता, उसने भारत को बाँध लिया। यह शक्ति का केंद्र है। मैं यहीं खड़ा रहूँगा, जब तक मेरा पाप क्षमा न हो जाए।"


अश्वत्थामा के नेत्र सूखे हैं, पर आत्मा में अनंत युगों का जल भरा है। वे अमर हैं, इसलिए हर बदलते शासक और हर होते छल को देखने को विवश हैं।


अश्वत्थामा, अपनी भारी, थक चुकी आवाज़ में, "हे महादेव! यह चिरंजीवी होना क्या वरदान है या फिर एक अनंत दण्ड? मैंने युगों को राख होते देखा है, और हर बार यह दुर्ग, ये पहाड़, यह व्यथा वैसी की वैसी खड़ी है।"


मैं अपने माथे पर हाथ फेरता हूँ, जहाँ से सदियों पहले मणि निकल चुकी थी। अब वहाँ केवल दर्द है शरीर का नहीं, काल का।


"काल मुझे छूता तक नहीं। मेरी इच्छा के विरुद्ध, मुझे हर सुबह देखनी पड़ती है। हर नई सुबह, मेरे लिए एक नई पीड़ा लेकर आती है। मैं मुक्ति की कामना करता हूँ, पर मृत्यु मुझे स्वीकार नहीं करती।"


मैं दीवार की ओर बढ़ता हूँ और नीचे विशाल, शांत मैदान की ओर देखते हूँ यह वही दक्कन है, जिसकी चाबी पाने के लिए न जाने कितने युद्ध हुए। उनके स्वर में गहरा वैराग्य और निराशा है।


किले की दीवारों से, "नीचे यह संसार... छल और रक्त से लिखी गई एक कहानी है। पहले आसा अहीर का सरल विश्वास टूटा, फिर अकबर ने सोने की चाबी से यहाँ के किलेदार का लालच खरीदा। 


सब व्यर्थ है! इस द्वार की चाबी लोहे की हो या स्वर्ण की, दक्कन का भाग्य कभी नहीं बदला। केवल शासक बदले, और उस बदलाव को मैंने युगों तक खड़े रहकर देखा है।"


शिवलिंग के सामने वापस आकर, अंतिम प्रार्थना के साथ, "मुझे इस नश्वरता के खेल से अब और जोड़कर मत रखो। अब मुझे न राज्य चाहिए, न सम्मान। यह अजेय गढ़ भी नश्वर है। मेरा हृदय भी इसकी कठोर दीवारों जैसा हो गया है, पर भीतर की टीस बाकी है। बस... मुझे मेरे शून्य में विलीन कर दो, महादेव।"


मौन हो जाता हूँ । मंदिर में शांति छा जाती है। सूर्योदय होने वाला है, और मुझे  फिर अगले दिन तक के लिए इस किले को छोड़कर भटकना होगा अपने श्राप को निभाते हुए।


यह कहानी का वह हिस्सा है जहाँ छल की पराकाष्ठा हुई और सत्ता के लिए विश्वास को रौंदा गया। अश्वत्थामा की आँखों से इस घटना को देखना, मानव स्वभाव की सबसे गहरी निराशा को महसूस करने जैसा है।



मन्दिर का रहस्य 

असीरगढ़ दुर्ग, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर पर समय का चक्र मेरे  रुक चुका था। कुरुक्षेत्र के भयानक दिन और असीरगढ़ में मुझ चिरंजीवी का दिन अब एक ही अथाह, अंतहीन पीड़ा में मिल चुके थे। सदियाँ बीत गयी, या कुछ दिन, मुझे कोई अंतर न मालूम हुआ।

सदियाँ बीत गयी, या केवल रातें मेरे लिए समय का कोई मूल्य नहीं बचा था। अब मैं असीरगढ़ के इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वयं किंवदंती था। 

समय वह था जब दक्कन का यह द्वार मुग़ल साम्राज्य के अधीन था। अकबर की 'सोने की चाबी' ने किले को जीत लिया था, और अब वहाँ मुग़ल सेना के सिपाही पहरा देते थे। दुर्ग पर अब मुगलों का शासन था, जो 'सोने की चाबी' से इसे जीतने के बाद यहां पहरा देते थे।

गुप्तेश्वर महादेव का मंदिर मेरा मौन आश्रय था। मेरे पास चढ़ाने के लिए वन के जंगली फूल और अपनी आत्मा का दुःख होता था। मैं पूजा करता। एक ऐसी पूजा जिसमें न भक्ति थी, न कामना, केवल श्राप के नियम का पालन। 

मैं गुप्तेश्वर मंदिर में प्रवेश करता। मेरी विशालकाय, मेरे पैरों के निशान अक्सर किले के पत्थरों पर उभर जाते थे, बिना आहट के आता -जाता था। 

मैं शिवलिंग पर वन के ताज़े फूल और जंगली बेलपत्र चढ़ाता और सूर्योदय से पहले विलुप्त हो जाता। हर सुबह, जब पुजारी मंदिर खोलते, तो उन्हें ताज़े फूल मिलते थे एक रहस्यमय संकेत कि किसी अदृश्य, अभिशप्त प्राणी ने उनसे पहले आकर पूजा की है।

मेरी दिनचर्या एक कठोर व्रत थी। सूर्योदय से पहले, मेरे श्राप की ज्वाला से रिसता हुआ रक्त अपने आप रुक जाता। मैं नर्मदा और ताप्ती की ओर बहने वाली जलधारा से शुद्ध होकर, दुर्ग की उस सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचता।

मेरी पीड़ा का तेज इतना अधिक था कि मंदिर के पुजारी या आस-पास के कोई भी सैनिक मेरी आहट भी नहीं पकड़ पाते थे। मैं अदृश्य, अभिशप्त, और अकेला था।

एक रात्रि, जब आकाश में बादल छाए थे और दुर्ग में घना कोहरा उतर आया था, मैं अपनी पूजा के बाद मंदिर के पीछे शांत खड़ा था। ललाट अब भी धधक रहा था, पर अंधेरे में मैं अदृश्य था। मेरा चिरंजीवी व्रत कठोर था। 

सबसे पहले, मैं ताप्ती नदी या किले के गंगा-जमुना कुंड में स्नान करता, उस शाप के घाव को धोने का व्यर्थ प्रयास करता, जिसके बारे में कृष्ण ने कहा था कि ‘वह कभी नहीं भरेगा।’

तभी, नशे में धुत्त एक युवा मुग़ल सिपाही, जिसका नाम फ़तह खान था, मस्ती में गुनगुनाता हुआ मंदिर के पास आया। उसे 'गंगा-जमुना कुंड' की ओर जाना था। 

फतेह खान ने मंदिर के द्वार पर रुक कर, भयवश, एक बार भीतर झांका। मुझे कुछ अजीब लगा। शिवलिंग के पास ताज़े फूलों की गंध आ रही थी, जबकि इस ऊंचाई पर उन फूलों का उगना असंभव था।

फतेह खान, स्वगत, "खुदा की पनाह! हर सुबह यही कहानी। कोई तो है जो पहरे के बावजूद यहां पूजा करता है। बुजुर्ग कहते हैं कि यह किला शापित है, यहाँ कोई 'जिन' या 'चिरंजीवी हिन्दू पीर' रहता है।"

फ़तह खान ने मदिरा के कारण कुछ हिम्मत बटोरी और ज़ोर से चिल्लाया।

फतेह खान, "ओ! कौन है बे-अदब? मुगल सल्तनत की इजाज़त के बिना इस पवित्र स्थान में कौन घुसता है? निकल बाहर! नहीं तो..."

मैंने धीरे से कदम बढ़ाया। मेरा शरीर अब भी घावों से क्षत-विक्षत था, मेरा तेज़ अदृश्य हो चुका था, लेकिन मेरी उपस्थिति में ब्रह्मांड की सबसे पुरानी पीड़ा का भार था। मैं सिपाही की ओर मुड़ा।

अश्वत्थामा, "तुम किसे बुलाते हो, मूर्ख? इस दुर्ग में अब केवल इतिहास और दुःख रहता है। क्या तुम उनसे लड़ोगे?"

फ़तह खान ने देखा एक विशाल, भयानक आकृति जिसके माथे पर जलता हुआ घाव था, और जिसकी आँखों में युगों का अंधकार समाया था। वह कोई साधारण मनुष्य नहीं था। उसके पैरों में मिट्टी नहीं थी, और उसकी आवाज़ में लोहे की गूँज थी, मानो वह सदियों पुराना हो।

सिपाही के हाथ से मशाल गिर गई। भय ने मदिरा के नशे को क्षणभर में उतार दिया।

फतेह खान, "तू... तू कौन है?"

अश्वत्थामा, "मैं वह हूँ जो हमेशा से था, और हमेशा रहेगा। मैं उस छल का अंतिम परिणाम हूँ जिसने आशा अहीर को मारा, जिसने तुम्हारे बादशाह अकबर को 'सोने की चाबी' का उपयोग करने के लिए मजबूर किया। मैं इस असीरगढ़ का शाश्वत कैदी हूँ।"

सिपाही भय से काँप उठा। यह वही किंवदंती थी जिसके बारे में उसने सुना था। वह बिना एक और शब्द कहे, मुड़कर भागा। उसकी आहट कमरगढ़ की ओर भागते हुए पत्थरों पर दूर तक गूंजती रही।

मैंने उसकी ओर देखा। मैं जानता था कि सिपाही का भय उसकी कथा को और फैलाएगा। लेकिन मुझे अब इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मेरा जीवन भय फैलाने या सम्मान पाने के लिए नहीं था। मेरा जीवन केवल श्राप  का पालन करने के लिए था।

मैंने एक बार फिर शिवलिंग की ओर देखा। मुगलों का शासन भी छल से आया था। और छल हमेशा टूटता है। सिपाही भाग गया, पर मैं अश्वत्थामा वहीं रहा शाश्वत और अकेला, असीरगढ़ के शापित इतिहास पर पहरा देता हुआ।

पुत्र का प्रश्न

कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में मेरी अंतिम रात थी। मैं शापग्रस्त, माथे पर जलता हुआ घाव लिये, दिवंगत पिता द्रोणाचार्य की आत्मा प्रकाश-रूप को देख रहा था।

कुरुक्षेत्र की रक्तरंजित भूमि पर, हम अपने माथे पर धधकते घाव के साथ बैठे थे। मेरे सामने मेरे  दिवंगत पिता, आचार्य द्रोण की आत्मा, एक शांत, क्षीण प्रकाश-पुंज के रूप में उपस्थित थी। मेरे पास युगों की पीड़ा थी, और मुझे अपने शाश्वत दुःख का मूल जानना था।

अश्वत्थामा, आँखों में जलते हुए अश्रु, "पिताश्री, यह श्राप, यह अग्नि... मैं इसे अनंत काल तक ढोऊंगा। किन्तु मुझे बताइए, मेरे जन्म की कथा क्या थी? क्या मैं सचमुच भगवान शिव के वरदान से जन्मा था, जैसा कि किंवदंतियाँ कहती हैं?"

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर, प्रेम और विषाद से भरा स्वर, "हाँ, पुत्र। तुम महर्षि भारद्वाज के वंशज, मेरी और तुम्हारी माता कृपी की तपस्या का फल थे। कई वर्षों की साधना के बाद, भगवान शिव के आशीर्वाद से तुम्हारा आगमन हुआ। 

तुम्हारे कंठ से जो प्रथम ध्वनि निकली, वह अश्व घोड़े के हिनहिनाने जैसी थी। इसलिए तुम अश्वत्थामा कहलाए एक पवित्र ध्वनि।"

अश्वत्थामा, अपने माथे को छूते हुए "और यह दिव्य मणि? जो अब मुझसे छीन ली गई है... वह क्या थी? वह मुझे भूख, प्यास, रोग और अस्त्र-शस्त्रों से बचाती थी।"

द्रोणाचार्य, "वह मणि केवल मणि नहीं थी, पुत्र। वह मेरे तप की पूर्णता थी। मैंने तुम्हारी सुरक्षा के लिए ही वह वरदान माँगा था। वह कवच था, जो तुम्हें इस नश्वर संसार के सभी कष्टों से परे रखता था। वह तुम्हें लगभग अजेय बनाती थी... पर नियति ने उसे भी छीन लिया।"

कंठ अवरुद्ध होते हुए, "मुझे वह दिन याद है, पिताजी... जब मैंने अपने मित्रों को दूध पीते देखा था। आप मुझे दूध नहीं दे पाए थे।” हँसी, “जब माता ने मुझे आटे में पानी मिलाकर पिलाया, और मैंने समझा कि वह दूध है... क्या आपकी यह निर्धनता ही आपके दुख का कारण बनी?"

द्रोणाचार्य, स्वर में गहरी वेदना, "नहीं, पुत्र। तुम मेरे दुःख का कारण नहीं, तुम मेरे जीवन का सबसे बड़ा धन थे। उस आटे के पानी को पीकर तुम्हारी खुशी ने मुझे यह एहसास कराया कि मेरे पुत्र को उसका अधिकार नहीं मिल रहा है। वही अपमान, वही टीस मुझे हस्तिनापुर खींच लाई।"

अश्वत्थामा, "और राजा द्रुपद का वह घमंड... जब उसने कहा था कि एक राजा और एक निर्धन ब्राह्मण मित्र नहीं हो सकते?"

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर में क्रोध की एक हल्की-सी गूँज, "द्रुपद ने मेरे मित्रत्व को नहीं, मेरी दरिद्रता को अपमानित किया था। उसी दिन मैंने संकल्प लिया था कि मेरा पुत्र कभी भूखा नहीं रहेगा। 

उसी अपमान की अग्नि ने मुझे गुरु दक्षिणा में द्रुपद का सिर मांगने पर विवश किया। वह प्रतिशोध का बीज था, पुत्र, जो आज इस विनाश के वट वृक्ष के रूप में हमारे सामने खड़ा है।"


श्राप का दंश

कुरुक्षेत्र का युद्धभूमि में मृत्यु की गंध अभी ताजी थीं। शियार, गीदड़ तथा कौऐ दावत उड़ा रहे थे। स्त्रियों का रुदन कानों को चिर रहा था। छोटे बच्चे भूख से विलख रहे थे। 

द्रोणाचार्य की आत्मा ने अश्वत्थामा की ओर देखा, जैसे उन्हें अंतिम सत्य समझाने का प्रयास कर रही हो।

द्रोणाचार्य, आत्मा-स्वर, "तुमने मुझसे जन्म की कहानी पूछी। अब मेरी मृत्यु और तुम्हारे श्राप की कहानी सुनो, क्योंकि यही हमारी नियति है।"

मैंने पिता से उत्सुकता से पूछा, "आप युद्ध भूमि में शस्त्र त्याग कर क्यों बैठे? आप अजेय थे! कौन आपको युद्ध से विमुख कर सकता था?"

द्रोणाचार्य, "छल ने। अर्जुन और पांडवों को पराजित करना असंभव था, इसलिए कृष्ण ने छल का सहारा लिया। 

उन्होंने यह घोषणा करवाई कि "अश्वत्थामा मारा गया!" पुत्र, एक क्षण के लिए मुझे विश्वास नहीं हुआ, पर जब युधिष्ठिर, जिसने कभी झूठ नहीं बोला, ने यह कहा, तो मेरा मोह टूट गया। मैंने अपने शस्त्र त्याग दिए और ध्यान में बैठ गया।"

अश्वत्थामा, "और उन्होंने आपको..." बोल नहीं पाया। 

द्रोणाचार्य, "हाँ। धृष्टद्युम्न ने। जिस क्षण मेरा मोह टूटा, मैं संसार से विमुख हो चुका था। वह मेरा अंतिम सत्य था। पर तुम्हारा प्रतिशोध... पुत्र, वह क्रोध था।"

अश्वत्थामा, "मैंने अपने पिता के वध का प्रतिशोध लिया। मैंने पांडवों के सोते हुए पुत्रों को मार डाला! क्या वह गलत था?"

द्रोणाचार्य, "वह क्रोध था, अश्वत्थामा। वह धर्म नहीं था। तुमने सोते हुए निर्दोषों को मारा। तुम्हारा क्रोध वहाँ शांत नहीं हुआ, तुमने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया।"

अश्वत्थामा, "मैंने उनका वंश समाप्त करने का प्रयास किया! मेरे पास दूसरा रास्ता नहीं था!"

द्रोणाचार्य, शांत, कठोर स्वर में, "और उसी जघन्य कृत्य ने तुम्हें इस शाश्वत पीड़ा का अधिकारी बनाया। कृष्ण ने उत्तरा के गर्भस्थ शिशु को पुनर्जीवित किया।” 

“उन्होंने तुम्हारी मणि छीन ली वह मणि जो मेरे तप का फल थी। और उन्होंने तुम्हें श्राप दिया असाध्य रोगों से पीड़ित होकर, अनंत काल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का शाप। तुम अब चिरंजीवी हो पर जीवन के नहीं, पीड़ा के।"

अश्वत्थामा, घाव पर हाथ रखते हुए, "तो यही मेरी नियति है। भटकना... कहाँ भटकना है? इस पृथ्वी पर ऐसा कौन-सा स्थान है जो मेरे श्राप के भार को सह सकता है?"

द्रोणाचार्य, स्वर विलीन होते हुए, "उस श्राप की कथा, पुत्र, तुम्हें दक्षिण के असीरगढ़ तक ले गई... जहां छल से विजय प्राप्त हुई, और जहाँ एक और चिरंजीवी अपनी नियति भोगता है। जाओ, और अपनी शाश्वत पूजा का व्रत आरम्भ करो। शिव तुम्हारा कल्याण करेंगे।"


मोती महल 

अश्वत्थामा, गुप्तेश्वर मंदिर की प्राचीर से दूर नीचे देखते हुए, "यह दुर्ग इतिहास का बोझ ढोता है, पर इसके नीचे बहने वाली पँढार नदी का किनारा एक अलग ही कहानी कहता है प्रेम और उपेक्षा की कहानी।"

मेरी दृष्टि किले की तलहटी में स्थित एक टूटी-फूटी इमारत पर ठहरती है, जिसे स्थानीय लोग मोती महल कहते हैं। यह शाहजहाँ की प्रिय, मोती बेगम का मकबरा है।

अश्वत्थामा, "मैंने यहाँ मुग़ल सम्राट शाहजहाँ को देखा था। वह केवल विशाल इमारतों का निर्माता नहीं था, बल्कि एक प्रेमी भी था। उसने बुरहानपुर में अपनी प्रिय मुमताज़ महल को खोया था। और उसी ज़मीन पर, उसकी एक और प्रिय मोती बेगम का यह अंतिम विश्राम स्थल बनवाया गया।"

मकबरा आज खस्ताहाल है। छत टूटी है, दीवारों पर काई जम गई है, और चारों ओर घास उग आई है। यहाँ कोई रक्षक नहीं, कोई ध्यान देने वाला नहीं।

अश्वत्थामा, पीड़ा और वैराग्य से भरे, "सम्राट, जिसने प्रेम की निशानी के तौर पर ताजमहल बनवाया, उसी सम्राट की प्रियतमा का यह मकबरा आज लावारिस है। यह कैसी विडंबना है? दुनिया सत्ता और युद्ध को याद रखती है, पर शांत प्रेम की कहानियों को भुला देती है।"

मैं हवा की गूँज में, मोती महल से बात करने की कोशिश करता हूँ।

अश्वत्थामा, मकबरे से, "ओह मोती महल! क्या तुम्हें वह समय याद है, जब तुम यहाँ गौरव से खड़े थे? क्या तुम्हें याद है, जब शाहजहाँ के कदम जहां पड़े होंगे?"

मोती महल, खंडहर की दीवारों से, मौन में, "मुझे केवल उपेक्षा याद है, चिरंजीवी! जो दीवारें कभी प्रेम की ईंटों से बनी थीं, वे अब सरकारी अनदेखी से टूट रही हैं। असीरगढ़ को पर्यटक देखने आते हैं, पर मेरे पास कोई नहीं आता। प्रेम भी क्या इतनी जल्दी ख़त्म हो जाता है?"

अश्वत्थामा, "प्रेम ख़त्म नहीं होता, पर मानव स्मृति ख़त्म हो जाती है। जिस इतिहास को हम अभेद्य मानते हैं, वह भी क्षणभंगुर है। मैंने देखा है, हर शासक केवल अपनी विजय गाता है, अपने प्रेम को नहीं। यहाँ से जाने वाले अधिकारी भी अपनी फाइलों और नियमों में उलझकर, तुम्हें भूल गए।"

मैं अब तक पूरी तरह वैराग्य से भर चुका हूँ। यह अपेक्षित स्मारक मुझे अपनी अमरता का दुःख याद दिलाता है।

अश्वत्थामा, आँखें बंद करके, "यह मकबरा मुझे सिखाता है कि मृत्यु के बाद भी दर्द समाप्त नहीं होता। मोती बेगम का शरीर यहाँ शांत है, पर उनकी आत्मा सरकारी उदासीनता की पीड़ा झेल रही होगी। ताजमहल को मिली महिमा और तुम्हें मिली यह अपेक्षा, यही काल का अंतिम पाठ है।"

"यह असीरगढ़ जो कभी दक्कन की कुंजी था आज एक वीरान गवाह है। एक तरफ़ छल और बल से जीती गई दीवारों के खंडहर हैं। और दूसरी तरफ़ पँढार नदी के किनारे पर, प्रेम का एक उपेक्षित मकबरा। और इन दोनों के बीच खड़ा हूँ मैं, अश्वत्थामा, जो जानता है कि सत्ता से ज़्यादा तेज़ी से स्मृति मिटती है।"

अश्वत्थामा, सुबह की पहली किरण में, किले की पूर्वी प्राचीर पर, "यह किला, जिसे मैंने इतने युगों तक खड़े देखा, केवल एक दुर्भेद्य गढ़ नहीं है; यह सतपुड़ा की कला है। इसकी स्थिति ही इसका पहला रक्षक है।"

अश्वत्थामा नीचे की ओर फैली विशाल घाटियों की ओर इशारा करते हैं।

अश्वत्थामा, "देखो, यह कैसे नर्मदा और ताप्ती नदियों की घाटियों के बीच के सबसे महत्वपूर्ण दर्रे पर स्थित है। भूगोल ने इसे वह सामरिक शक्ति दी कि जो इस चोटी पर बैठा, उसने दक्कन की साँसें थाम लीं। यह किसी मानव का नहीं, बल्कि प्रकृति का बनाया गया दरवाज़ा है।"

सूर्य की किरणें किले की तीन परतों पर पड़ती है, जिससे उनकी संरचना स्पष्ट होती है: मलयगढ़, कमरगढ़, और सबसे ऊपर असीरगढ़।

अश्वत्थामा, "इस किले को तीन स्तरों पर बनाने में दूरदर्शिता थी। हर स्तर दूसरे की रक्षा करता था। यह एक पिरामिड की तरह था, जितना ऊपर जाओ, सुरक्षा उतनी कठिन।"

अश्वत्थामा, गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की ओर देखते हुए, फिर जामा मस्जिद की टूटी मीनारों की ओर, "सदियों तक यहां अलग-अलग शासक रहे, और हर किसी ने इस दुर्ग पर अपनी मुहर लगाई। इसलिए इसकी वास्तुकला एक अकेली शैली नहीं है, बल्कि संस्कृतियों का संगम है।"

"देखो, मंदिर के सादे, गहरे पत्थर के सामने खड़ी हैं फ़ारूक़ी और मुग़ल काल की बनी जामा मस्जिद की मीनारें। ये मीनारें इस्लामी, फ़ारसी और भारतीय वास्तुकला के मिश्रण को दर्शाती हैं। यहाँ एक ही परिसर में शिव और अल्लाह का वास रहा। अंग्रेज़ी कब्रें भी यहीं हैं, जो बताती हैं कि यह गढ़ अंततः सभी शक्तियों का अंतिम विश्राम स्थल बना।"

वे किले के अंदर बने गंगा-जमुना कुंड नामक विशाल जल संग्रहों की ओर इशारा करते हैं।

अश्वत्थामा, "और इसकी सबसे बड़ी कलाकारी इसका जल प्रबंधन। इतने ऊँचे पहाड़ पर भी, इसमें पर्याप्त जल स्रोत और विशाल कुंड हैं। इसलिए यह किला महीनों तक घेराबंदी झेल सका। यह स्थापत्य कला की नहीं, बल्कि मानव मेधा की विजय थी।"

अश्वत्थामा, मंदिर की ओर मुड़कर, "आज, असीरगढ़ एक खंडहर है, और इसका वैभव धूल में मिल चुका है। मोती महल की तरह, इसे भी उपेक्षा मिली है। पर इसकी टूटी हुई दीवारें अब भी वही पाठ पढ़ाती हैं कि सत्ता, छल और शौर्य, सब कुछ काल के सामने नश्वर है। असीरगढ़ अब शासकों का द्वार नहीं, बल्कि वैराग्य का एक मौन स्मारक है।"

अश्वत्थामा, जो स्वयं अमर हैं, उस टूटी हुई दीवार के पास खड़े होते हैं, और सूर्य पूरी तरह सतपुड़ा की पहाड़ियों पर निकल आता है।

लेखा-जोखा


असीरगढ़ का सबसे ऊपरी भाग। गुप्तेश्वर महादेव मंदिर की पुरानी, भीगी हुई दीवारें। आकाश में बादल छाए हैं। मुगलों के कब्ज़े और रेवा गुर्जरों के उत्थान के बीच का शांत कालखंड। 


अश्वत्थामा पूजा समाप्त कर ध्यान में लीन हैं। अश्वत्थामा, शाश्वत दुःख और वैराग्य से भरा हुआ। मंदिर की दीवारों और हवा की गूँज में व्याप्त एक अमूर्त शक्ति।


अश्वत्थामा शिवलिंग के सामने बैठे हैं। उनका ध्यान बाहरी दुनिया से हटकर केवल अपनी अनंत पीड़ा पर केंद्रित है। हवा मंदिर के जीर्ण-शीर्ण स्तंभों से होकर गुज़रती है, एक गहरी, धीमी आवाज़ उत्पन्न करती है यही आवाज़ काल की है।


अश्वत्थामा, शांत, पर भारी स्वर में, "वर्ष और शताब्दी बीत गए, पर मेरी देह को विश्राम नहीं मिला। आशा अहीर का विश्वास धूल बन गया, और अकबर का छल इतिहास में दर्ज़ हुआ। इस दक्कन के द्वार पर अब किसका शासन है? किसकी महत्वाकांक्षा ने इसे फिर खरीदा है?"


काल, हवा की गूँज में, तटस्थ, "हे चिरंजीवी! तुम क्यों पूछते हो? तुम्हारा स्थान इस नश्वर खेल से परे है। अब इस पर मुग़ल,मराठा और फिर अंग्रेजो का कब्ज़ा रहा है। कुछ वर्षों में, यहाँ शक्ति आएगी। नाम बदलते हैं, पर लालच और छल की कहानी वही रहती है।"


अश्वत्थामा, आँखें बंद किए हुए, "और यही मेरा दुख है, काल। मेरी आँखें बंद क्यों नहीं होतीं? क्यों मुझे हर बार वही दृश्य दोहराते देखना पड़ता है? मैंने रेवा गुर्जरों का संघर्ष देखा नर्मदा के किनारे-किनारे बसकर, टूटने के बाद फिर उठना। उनमें एक आशा थी। वह भी क्यों टूट गई?"


काल, दार्शनिक, "संघर्ष नश्वर नहीं होता, वीर! केवल सत्ता नश्वर होती है। रेवा गुर्जरों ने सौ वर्ष तक गौरव से राज किया, अपने शौर्य को अमर किया। पर सत्ता की चाहत अंततः उसे भी खोखला कर देती है। इस दुर्ग की दीवारें सत्य जानती हैं जो उठता है, उसे एक दिन झुकना ही पड़ता है।"


अश्वत्थामा, निराश,  "तो क्या इस दुनिया में स्थायित्व और सत्य जैसी कोई चीज़ है ही नहीं? क्या सब कुछ अस्थिर, क्षणभंगुर और व्यर्थ है? मैं अमर हूँ, पर मेरा मन अस्थिर है।"


काल, शांत, धीमा,  "स्थायित्व केवल दुःख में है, जिसे तुम ढो रहे हो। तुम यहाँ इस मंदिर में आते हो, शिव की पूजा करते हो यही तुम्हारा सत्य है। यह किला, यह दक्कन, यह राजनीति ये सब माया है, जो मेरे बहाव के साथ बदलती रहती हैं। तुम काल के साक्षी हो, तुम्हें बदलने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।"


अश्वत्थामा गहन वैराग्य में डूब जाते हैं। उन्हें अनुभव होता है कि इस दुर्ग की हर ईंट, हर पत्थर, हर टूटी हुई मीनार उन्हें यही पाठ पढ़ा रही है कि 'सत्ता भ्रम है' और 'केवल पीड़ा शाश्वत है'।


अश्वत्थामा, अंततः, स्वीकृति के भाव में, "हाँ। मैं समझ गया। यह असीरगढ़ एक द्वार नहीं, एक आईना है। यह मुझे मेरी ही अमर पीड़ा का प्रतिबिंब दिखाता है। यहाँ की मिट्टी में आशा अहीर का विश्वास, बहादुर शाह का लालच, और गुर्जरों का शौर्य, सब एक हो चुके हैं। और मैं, जो कभी योद्धा था, अब केवल एक साक्षी हूँ... मुक्ति की प्रतीक्षा में, शाश्वत।"


मंदिर में पूर्ण शांति छा जाती है। अश्वत्थामा की आँखें फिर खुलती हैं, पर अब उनमें कोई आसक्ति नहीं, केवल गहरा वैराग्य है। सूर्य सतपुड़ा की पहाड़ियों से झाँकने लगता है, और उन्हें फिर अपनी अनंत यात्रा पर निकलना होता है।


द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा! अकबर का युग तो समाप्त हुआ। पर क्या यह दक्षिण का द्वार बुरहानपुर उसके पुत्रों के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा? क्या उस नगर ने कभी प्रेम और विरह की कोई ऐसी गाथा देखी, जो मेरे दुख से मिलती हो?"


अश्वत्थामा, गहरी श्वास लेते हुए, "गुरुदेव, इस नगर ने एक ऐसा विलाप देखा, जिसने एक सम्राट के हृदय को अनंत काल के लिए पत्थर बना दिया। अकबर के पुत्र जहांगीर ने अपने राजकुमार खुर्रम को दक्कन का राज्यपाल नियुक्त किया। जब खुर्रम ने शांतिपूर्ण विजय प्राप्त की, तो जहाँगीर ने उसे 'शाहजहाँ' की उपाधि से विभूषित किया।"


द्रोणाचार्य, "शाहजहाँ... वह जिसने अपने पिता का नाम भी पीछे छोड़ दिया। तो क्या वह भी बुरहानपुर आया?"


अश्वत्थामा, “वह आया और दो वर्ष  तक वहीं रहा। वह अपने अभियानों बीजापुर, गोलकुंडा और अहमदनगर के लिए इसी नगर को आधार बनाए हुए था। पर युद्ध के बीच, नियति ने अपना क्रूर खेल खेला। उसकी प्रिय बेगम, मुमताज़ महल, जो उसकी सहचरी थी, उसे छोड़कर चली गई।"


द्रोणाचार्य, "मुमताज़ महल... विरह? मृत्यु कैसे हुई?"

अश्वत्थामा, "1631 ईस्वी में बुरहानपुर में प्रसव-पीड़ा के कारण उनका निधन हो गया। आप सोचिए, गुरुवर! वह सम्राट, जो भारतवर्ष को जीतने निकला था, एक क्षण में ही अपने सबसे बड़े खजाने को खो बैठा। मुमताज़ महल को ताप्ती नदी के पार जैनाबाद के एक बगीचे में दफनाया गया। तब मैंने देखा, एक महान शक्ति भी काल के सामने कितनी क्षीण हो जाती है। ठीक उसी वर्ष दिसंबर में, उसके अवशेषों को आगरा ले जाया गया।"


द्रोणाचार्य, शांत आँखों से, "प्रेम की पीड़ा राज-सिंहासन से परे होती है। तो क्या इस घटना ने मुगलों की दक्षिण की नीति को बदल दिया?"


अश्वत्थामा, "नहीं, नीति तो जारी रही। 1632 में शाहजहां ने महावत खान को दक्कन का वायसराय बनाकर स्वयं आगरा प्रस्थान किया। उन्होंने बुरहानपुर में शाही किला और शाही हमाम बनवाया शायद अपनी प्रिय बेगम की यादों को संजोने के लिए। पर... मुगलों की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हुई।"


द्रोणाचार्य, "और तब? कौन उठा?"

अश्वत्थामा, "18वीं शताब्दी के मध्य से, शक्ति का केंद्र बदल गया। वहाँ मराठों का उदय हुआ। एक शक्तिशाली पेशवा था बाजीराव। उसने इस पूरे क्षेत्र को अस्थिर कर दिया। उसने बुरहानपुर को लूटा और मुग़ल सम्राट से 'चौथ' वसूलने का अधिकार प्राप्त कर लिया एक ऐसा कर, जो मुगलों की अधीनता का अंत था। मैं वहाँ एक दर्शक था, जब पिंडारी, होलकर और सिंधिया इस भूमि को अपने पैरों तले रौंद रहे थे।"


द्रोणाचार्य, "तो, इस भूमि का अंतिम अध्याय मराठा वीर लिखेंगे?"


अश्वत्थामा, "नहीं, गुरुदेव। मराठा भी हारे। 1803 में मेजर जनरल आर्थर वेलेस्ली जो बाद में वेलिंगटन का ड्यूक बना, ने इस क्षेत्र पर कब्जा कर लिया, और 1861 तक यह अंग्रेजों को सौंप दिया गया। मेरी शापित यात्रा में, मैंने बार-बार देखा है कि शक्ति केवल हाथ बदलती है, पर पीड़ा यहाँ शाश्वत रहती है। अब मैं उस प्राचीन शिव मंदिर की ओर जा रहा हूँ, जिसे अहीर राजा ने बनवाया था..."


द्रोणाचार्य, "पुत्र, उन विदेशियों का शासन कैसा था? उन्होंने तो राज्यों को जीतकर भी अखंडता बनाए रखने की परंपरा को ध्वस्त कर दिया होगा। क्या उन्होंने इस खानदेश को भी अपनी सुविधा के लिए तोड़ा?"


अश्वत्थामा, आँखों में युगों की थकान लिए, "हाँ, पिताश्री। 19वीं शताब्दी के अंत तक, निमाड़ क्षेत्र पूर्णतः उनके प्रबंधन के अधीन आ गया। यह ब्रिटिश शासन, जिसने स्वयं को 'बॉम्बे प्रेसीडेंसी' नाम दिया, किसी भी धर्म या वंश से अधिक अपने 'प्रशासन' को महत्व देता था। 1906 ईस्वी में, उन्होंने विशाल खानदेश जिले को दो भागों में विभाजित कर दिया ठीक वैसे ही जैसे मेरे हृदय को श्राप ने दो टुकड़ों में बाँट दिया है।”


द्रोणाचार्य, "दो भाग? किस उद्देश्य से?"


अश्वत्थामा, "केवल शासन को सुगम बनाने के लिए।"

पूर्वी खानदेश, मुख्यालय: जलगाँव, जो मुख्यतः कृषि और व्यापार का केंद्र बना। पश्चिमी खानदेश, मुख्यालय: धुले, जो आदिवासी क्षेत्रों और वन संपदा का प्रतिनिधित्व करता था। उन्हें केवल राजस्व और नियंत्रण से प्रेम था; उन्होंने इस भूमि की एकता की भावना को खंडित कर दिया।"


द्रोणाचार्य, "पुत्र, मुझे याद है कि कुछ समय पहले इस धरती पर एक महान विप्लव उठा था धर्म की रक्षा के लिए। क्या उस समय भी यह निमाड़ क्षेत्र मूक दर्शक बना रहा? क्या वहाँ कोई क्षत्रिय नहीं था जो अपनी तलवार उठाता? 1857 का विप्लव।"


अश्वत्थामा, "नहीं, गुरुदेव। आपकी स्मृति सही है। 1857 के उस महाविप्लव की अग्नि से यह बुरहानपुर और निमाड़ क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। मैंने एक तेजस्वी योद्धा को यहाँ से गुजरते देखा वह तात्या टोपे था, जो अपनी अंतिम विजय की खोज में भटक रहा था।"


द्रोणाचार्य, "तात्या टोपे? क्या वह भी मेरे अर्जुन या कर्ण के समान कोई महारथी था?"


अश्वत्थामा, "वह एक गुरिल्ला योद्धा था, जिसकी गति और रणनीति अद्भुत थी। निमाड़ क्षेत्र से बाहर जाने से पहले, उसने जानबूझकर ब्रिटिश सत्ता के प्रतीकों पर वार किया। मैंने स्वयं देखा, कैसे उसने खण्डवा और पिपलोद जैसी जगहों पर पुलिस थानों और शासकीय भवनों को क्रोध की अग्नि के हवाले कर दिया।"


द्रोणाचार्य, हल्का सा मुस्कुराते हुए, "सत्ता के प्रतीक जलाना विरोध को दर्शाने का सबसे प्राचीन तरीका।"


अश्वत्थामा, "हाँ, पर यह क्षणिक था। एक बार फिर, क्रांति की लहर शांत हो गई। और जब 1947 में उन्होंने औपचारिक रूप से सत्ता छोड़ी, तब तक उन्होंने खानदेश को एक प्रशासनिक इकाई के रूप में पूरी तरह बदल दिया था। यह मेरी शापित यात्रा का नियम है हर एक साम्राज्य दूसरे के लिए आधार तैयार करता है, पर मेरी पीड़ा अपरिवर्तित रहती है।"


द्रोणाचार्य, "अब तू कहां जाएगा, पुत्र?"


अश्वत्थामा, "मैं गुप्त रूप से उस शिव मंदिर की ओर जा रहा हूँ, जिसे गुप्तेश्वर महादेव कहते हैं... शायद वहाँ एक क्षण की शांति मिल जाए, जहां हर सुबह मेरे लिए पुष्प अर्पित होते हैं।"

अश्वत्थामा, युगों का भार अपने माथे पर लिए, दुर्ग की सबसे ऊँची और वीरान प्राचीर पर खड़ा था। दूर नीचे बुरहानपुर की घाटियाँ धुंध में लिपटी थी, मानो इतिहास अपनी विडंबना छिपा रहा हो। उसका घाव धधक रहा था, और उस असहनीय पीड़ा ने उसके मस्तिष्क में एक शाश्वत प्रश्न को जन्म दिया था।

अश्वत्थामा, आत्म-संवाद, "मेरा अपराध  हाँ, मैंने सोते हुए पुत्रों को मारा। वह जघन्य था। वह क्रूरतम प्रतिशोध था। इस पाप के लिए मुझे दण्ड मिलना ही चाहिए था... पर क्या केवल मुझे?"

वह मुड़ा, और उसकी दृष्टि में हजारों वर्ष पुराना कुरुक्षेत्र का मैदान घूम गया।

अश्वत्थामा, "उस 'धर्म-युद्ध' का आरंभ तो द्रौपदी के चीरहरण से हुआ था। एक स्त्री का सार्वजनिक अपमान  क्या वह धर्म था? द्रौपदी को दांव पर लगाने वाले युधिष्ठिर जिन्हें धर्मराज कहा जाता था  क्यों नहीं श्रापित हुए? जिस दुर्योधन ने अपमान किया, वह अपनी जंघा टूटने का दण्ड पाकर भी शांति से मरा। पर मुझे यह अनंत पीड़ा क्यों?

उसका हाथ माथे के घाव पर गया, जहां कभी मणि थी। वह हँसा एक सूखी, युगों पुरानी हँसी।"

अश्वत्थामा, "और पिताश्री का वध? धर्म के स्तंभ युधिष्ठिर ने अर्ध-सत्य का कवच पहनकर झूठ बोला! उस झूठ का समर्थन स्वयं कृष्ण ने किया! क्या किसी निहत्थे गुरु को छल से मारने वाले अर्जुन या झूठ बोलने वाले युधिष्ठिर पर कोई श्राप पड़ा? नहीं। उन्हें धर्म की विजय का ताज मिला। मेरा अपराध तो क्रोध में किया गया था, पर उनका छल तो योजनाबद्ध अधर्म था!"

उसे कर्ण का अंतिम क्षण याद आया रथ का पहिया कीचड़ में फंसा था।

अश्वत्थामा, "क्षत्रिय धर्म का सबसे पहला नियम! संकट में पड़े, निहत्थे योद्धा पर वार नहीं करना। कर्ण निहत्था था, वह पहिया निकाल रहा था। फिर भी, अर्जुन ने बाण चलाया! कृष्ण ने उसे उकसाया, उन्हें अधर्म करने के लिए प्रेरित किया! कर्ण जैसे महान दानी और योद्धा की हत्या करने वाले अर्जुन को कोई श्राप नहीं मिला!"

उसका मन अभिमन्यु की स्मृति से भी विचलित हुआ।

अश्वत्थामा, "अभिमन्यु! वह युवा बालक, जो चक्रव्यूह में अकेला था, निहत्था था। सात महारथियों ने मिलकर उसे मारा जयद्रथ भी उनमें से एक था। वह कौन-सा धर्म था? और जयद्रथ? उसे मारने के लिए कृष्ण ने माया से सूर्यास्त करवा दिया! छल, माया, और झूठ ये सब धर्म की स्थापना के नाम पर किए गए!"

अश्वत्थामा अब ज़ोर से चीख पड़ा, पर उसकी आवाज़ केवल हवाओं में विलीन हो गई।

"सबने अधर्म किया! भीष्म को शिखंडी के आगे छिपाकर मारा गया! दुर्योधन को नियम तोड़कर जांघ पर मारकर मारा गया! हर महान योद्धा का अंत छल से हुआ! फिर केवल मैं? मेरे माथे पर यह जलता हुआ श्राप क्यों? कृष्ण ने मुझे ही क्यों चुना, जबकि वह स्वयं छल के मुख्य सूत्रधार थे?"

अश्वत्थामा को अचानक एक भयानक सत्य का बोध हुआ, जो श्राप से भी अधिक पीड़ादायक था। 

अश्वत्थामा, "मेरा श्राप मेरे पाप के लिए नहीं है... मेरा श्राप इसलिए है क्योंकि मैंने पांडवों की विजय को चुनौती दी। मेरा श्राप इसलिए है क्योंकि मैं कृष्ण की योजना में बाधा बना। मेरी पीड़ा केवल पाप का दण्ड नहीं है, यह सत्ता और विजय की क्रूरता का प्रतीक है। महाभारत में अनैतिकता सबकी थी, पर श्राप केवल पराजित पक्ष के सबसे क्रोधी योद्धा को मिला!"

द्रोणाचार्य, "पुत्र, तूने उस शिव मंदिर का ज़िक्र किया। क्या तेरा चिरंजीवी श्राप, जिसे स्वयं श्रीकृष्ण ने दिया था, उस महादेव के मंदिर में भी तेरा पीछा नहीं छोड़ता? तू वहाँ क्या खोजता है, जहाँ तेरा कोई स्थान नहीं?"

अश्वत्थामा, असीरगढ़ के पहाड़ी दर्रों पर दृष्टि डालते हुए, "पिताजी, श्राप तो मेरे शरीर में नहीं, मेरी आत्मा में है, और आत्मा का पीछा तो काल भी नहीं छोड़ सकता। परंतु वह मंदिर... वह मेरा एकांत कारावास है। उसे गुप्तेश्वर महादेव कहते हैं। 'गुप्त' इसलिए, क्योंकि वह दुर्ग की तीसरी और सबसे ऊँची सतह पर, एक अंधेरे कोने में छिपा हुआ है।

द्रोणाचार्य: तो क्या तू वहाँ लोगों के सामने जाता है? क्या वे तुझे इस विकृत रूप में पहचानते नहीं?"

अश्वत्थामा, "नहीं। मैं हर सुबह ब्रह्म मुहूर्त से पहले, सूर्योदय से पूर्व, किले के द्वार खुलने से पहले, वहाँ पहुँचता हूँ। मैं रुद्राभिषेक करता हूँ बिना किसी मंत्रोच्चार के, केवल जल और बेलपत्र से। मेरा माथा... मेरा वह घाव जो चूड़ामणि के स्थान पर है, यहाँ सबसे अधिक पीड़ा देता है।"

द्रोणाचार्य, "और क्या तू इस कर्म से मुक्ति पाता है?"

अश्वत्थामा, "मुक्ति नहीं, पिताजी, केवल एक दैनिक अनुष्ठान। पुजारी या कोई ग्रामीण मुझे नहीं देखता, पर वे जानते हैं। वे हर सुबह महादेव के शिवलिंग पर ताज़े फूल पाते हैं, और मानते हैं कि कोई अदृश्य, गुप्त भक्त रात में पूजा करके जाता है। मेरी उपस्थिति को भय से नहीं, बल्कि श्रद्धा की मौन स्वीकृति से स्वीकार किया जाता है और यही मेरे लिए युगों की सबसे बड़ी शांति है।"

द्रोणाचार्य, "इस मंदिर का इतिहास क्या है? मुगलों या फारूकी शासकों ने इसे नष्ट क्यों नहीं किया?"

अश्वत्थामा, "यह मंदिर फारूकी वंश के आगमन से भी प्राचीन है। जनश्रुति है कि इसे किसी अत्यंत धार्मिक अहीर राजा ने बनवाया था, जिसने इस दुर्ग की नींव रखी थी। शायद इसकी प्राचीनता और महादेव का तेज ही रहा होगा कि किसी भी शासक ने इसे तोड़ने का साहस नहीं किया। मैंने देखा है कि शिवलिंग हमेशा... हमेशा आंशिक रूप से गीला रहता है, जैसे कोई इसे लगातार सींच रहा हो, या जैसे यह स्वयं उस चिरस्थायी दुःख को अवशोषित कर रहा हो जो मुझमें है।"

द्रोणाचार्य, "तो, तेरी आशा उस महादेव में है?"

द्रोणाचार्य, "पुत्र, अब जब तू इस भूमि के सारे कालखंड देख चुका है फ़ारूक़ी, मुग़ल, मराठा, और ब्रिटिश तो मुझे बता। इस 'खानदेश' का वर्तमान स्वरूप क्या है? क्या वह खंडित भूमि अब अपनी पहचान खो चुकी है?"

अश्वत्थामा, आँखों में 20वीं शताब्दी के दृश्य लिए, "पिताश्री, पहचान खोई नहीं, अपितु प्रशासनिक इकाइयों में बंट गई। ब्रिटिश काल में जो विभाजन हुआ था, वह स्वतंत्र भारत में और गहरा हो गया। जिस विशाल खानदेश को आपने दक्षिण का द्वार कहा था, वह आज मुख्य रूप से तीन जिलों में बँटा हुआ है: जलगांव, धुले, और नंदुरबार।

द्रोणाचार्य, "तीन भाग? तो क्या अब उस क्षेत्र को 'खानदेश' नाम से नहीं पुकारते?"

अश्वत्थामा, "वह नाम अब इतिहास और संस्कृति में जीवित है, गुरुदेव। जलगांव अब केला उत्पादन का विशाल केंद्र है मानो इस भूमि ने अपनी समृद्धि को कृषि में ढाल लिया हो। धुले और नंदुरबार, जहाँ एक समय गुरिल्ला युद्ध होते थे, वहाँ अब आदिवासी संस्कृति और घने जंगल शांत हो गए हैं। इस क्षेत्र की नींव, जो कभी व्यापारिक गलियारे के रूप में थी, अब एक विशाल राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में कायम है, जो उत्तर को दक्षिण से जोड़ता है।"

द्रोणाचार्य, शांत भाव से, "युद्ध, व्यापार, और प्रशासन सब आते-जाते हैं। पर तेरा श्राप तो अटल है, पुत्र। तूने युगों को ढलते देखा है। अब जब आधुनिकता अपने चरम पर है, तुझे मुक्ति कब मिलेगी?"

अश्वत्थामा, अपने माथे पर हाथ रखता है, जहाँ घाव से रक्तस्राव रुका हुआ है,  "युग बदल गए, पर मेरी प्रतीक्षा नहीं। इतिहास समाप्त हो सकता है, पर मेरा चिरंजीवी होना समय से परे है। मैंने इस दुर्ग पर अकबर को छल से घुसते देखा, और यहीं मुमताज़ महल के विरह का साक्ष्य। मैंने तात्या टोपे की क्रांति की अग्नि देखी, और ब्रिटिशों के खंडन की नीति भी।"

द्रोणाचार्य, "तो, तेरी अंतिम आशा क्या है?"

अश्वत्थामा, "मेरी आशा उस कल्कि अवतार में है। जब यह कलयुग अपनी अंतिम घड़ी गिनेगा, और धर्म का अंतिम युद्ध छिड़ेगा, तब श्वेत अश्व पर सवार भगवान कल्कि इस धरा पर अवतरित होंगे। असीरगढ़ का यह गुप्त शिव मंदिर, गुप्तेश्वर महादेव, मेरा अंतिम आश्रय है। मैं यहीं, इस इतिहास के केंद्र बिंदु पर, काल के पूर्ण होने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। कल्कि ही मेरे श्राप को हरेंगे और मुझे इस अंतहीन पीड़ा से मुक्त करेंगे।"

द्रोणाचार्य, गुरु द्रोण की आकृति अब केवल एक विलीन होती हुई ज्योति है, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। तूने कर्मों का मूल्य चुकाया है। हर युग का अंत होता है, और हर श्राप का एक विमोचन। तब तक, तू साक्षी है... तू शाश्वत है..."

अश्वत्थामा, "मेरी आशा केवल वहाँ है जहाँ काल का भी अंत होता है। मेरे श्राप का अंत तभी होगा जब इस कलयुग का अंत होगा। मैं इस दुर्ग में, इस गुप्त मंदिर में, केवल एक उद्देश्य के साथ प्रतीक्षा कर रहा हूँ: उस दशम अवतार का भगवान कल्कि का। वही मुझे मेरे श्राप से मुक्त करेंगे। तब तक, मैं इस इतिहास, इस विरह, और इस पीड़ा का मूक साक्षी हूँ।"

द्रोणाचार्य, धीरे-धीरे उनकी आकृति धुंधली हो जाती है, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। हर युग का अंत होता है, और हर श्राप का एक विमोचन..."

वह वापस मंदिर की ओर चला। अब वह जानता था कि उसका श्राप केवल एक व्यक्तिगत दण्ड नहीं था, बल्कि यह उस युग की नैतिक विडंबना का शाश्वत प्रमाण था एक ऐसा प्रमाण जिसे वह असीरगढ़ की वीरान दीवारों के बीच युगों तक ढोता रहेगा।


शाश्वत पीड़ा


रात का दूसरा पहर। गुप्तेश्वर मंदिर से दूर, किले के मध्य भाग में जहाँ कभी फ़ारूक़ी दरबार लगता था, घनी उदासी पसरी है। अश्वत्थामा शाश्वत साक्षी, न्यायाधीश के भाव में। नासिर खान की आत्मा, फ़ारूक़ी वंश का दूसरा, पर संस्थापक-सम शासक। 


अश्वत्थामा एक टूटी हुई मीनार के पास खड़े हैं। हवा पत्थरों से टकराकर एक फुसफुसाहट पैदा करती है यह नासिर खान की आत्मा है, जो अपनी विजय और अपने पाप दोनों से बंधी है।


नासिर खान की आत्मा, अँधेरी हवा में गूंजती हुई,  "तुम... तुम फिर यहां क्यों आए हो, चिरंजीवी? क्या मेरी विजय तुम्हें सोने नहीं देती? मेरा वंश दो सौ वर्षों तक इस दक्कन की कुंजी पर राज करके गया है! यह कोई छोटी बात नहीं थी!"


अश्वत्थामा, शांत पर दृढ़, "तुम्हारी विजय? मैं केवल तुम्हारी नींव देखता हूँ। तुम्हारा वंश उमर-अल-फारूक के नाम पर गौरव का दावा करता था, पर उसकी शुरुआत छल से हुई। क्या तुम सच में भूल गए, नासिर खान? या तुम्हें केवल मलिक राजा का गौरव याद है?"


नासिर खान की आत्मा, गर्व से, "मलिक अहमद ने कुछ भी गलत नहीं किया! वह फिरोज शाह तुगलक का सिपहसालार था, उसने अपनी मेहनत से थालनेर और करोंद की जागीरें पाईं। 1382 तक, दिल्ली कमज़ोर हो चुकी थी, और 1388 में, उसने ख़ानदेश में अपने फ़ारूक़ी वंश की स्वतंत्र स्थापना की। यह शक्ति का नियम था! हमने इसे 'खानों का देश' बनाया।"


अश्वत्थामा, "और तुमने, नासिर खान! तुमने उसी शक्ति के नियम को क्रूरता की हद तक पहुँचाया। तुमने अपने विश्वासपात्र आशा अहीर को धोखे से मार डाला! 1399 में जब तुमने असीरगढ़ पर कब्ज़ा किया, तो क्या तुम्हें रात में नींद आती थी?"


नासिर खान की आत्मा, रक्षात्मक,  "यह केवल आवश्यकता थी! असीरगढ़ इस वंश की रक्षा के लिए अनिवार्य था। हमने अभेद्य दीवारें प्राप्त की! और सुनो, मैंने केवल लिया नहीं, मैंने बनाया भी है! मैंने ही 1399 में बुरहानपुर की स्थापना की!"


अश्वत्थामा, "बुरहानपुर? जिसे तुमने महान सूफी संत बुरहानुद्दीन गरीब के नाम पर बसाया था, जबकि उसकी नींव तुम्हारे छल पर टिकी थी?"


नासिर खान की आत्मा, कुछ शांत होकर, "बुरहानपुर हमारा गौरव था! मेरे वंशज आदिल खान द्वितीय को याद करो! वह सबसे महान था। 1457  से 1501 तक, उसने गोंडवाना और झारखंड तक हमारा प्रभाव फैलाया। उसने 'शाह-ए-झारखंड' की उपाधि ली। उसी के समय में बुरहानपुर उत्तम वस्त्रों और व्यापार का केंद्र बना। हमने गुजरात के अधीनता को अस्वीकार किया वह स्वतंत्रता थी!"


अश्वत्थामा, स्वीकारोक्ति के भाव से, "हाँ। आदिल खान द्वितीय ने खानदेश को वास्तविक पहचान दी। तुम्हारे वंश ने कला, संस्कृति और व्यापार को संरक्षण दिया। तुमने चिश्ती परंपरा को बढ़ाया। यह तुम्हारा सच्चा गौरव था।"


नासिर खान की आत्मा, अंतिम शासक की ओर इशारा करते हुए, "लेकिन वह गौरव चला गया। मेरे वंशज राजा अली खान आदिल शाह प्रथम ने अकबर के साथ वैवाहिक संबंध बनाकर शांति बनाए रखी, ताकि हम मुगलों से बचें।"


अश्वत्थामा, निर्णायक,  "और यही वह बिंदु था जहाँ लालच ने फिर दस्तक दी। अंतिम शासक, बहादुर शाह ने महत्वाकांक्षा के वशीभूत होकर अकबर के आधिपत्य को अस्वीकार कर दिया। उसने तुम्हारी विरासत को बचाने के बजाय, उसे ख़तरे में डाल दिया।"


नासिर खान की आत्मा, पीड़ा से भरी, "तुम सही कहते हो। 1601 में, छल और सोने की चाबी ने वह दरवाज़ा खोल दिया, जिसे मैंने छल से बंद किया था! बहादुर शाह को हार माननी पड़ी। हमारा वंश, जो 1382 में शुरू हुआ, 1601 में समाप्त हो गया। अकबर ने इस क्षेत्र का नाम बदलकर 'दंदेश' रखा, ताकि फ़ारूक़ी नाम का कोई निशान न बचे।"


अश्वत्थामा, अंतिम निर्णय सुनाते हुए, "तुम्हारा वंश, नासिर खान, एक महान व्यापारिक शक्ति था। पर उसकी शुरुआत और अंत दोनों नैतिक पतन से हुए। तुमने तलवार से नहीं, विश्वासघात से जीता, और तुम सोने से हारे। और खानदेश का गौरव, मुगल साम्राज्य की विशालता में विलीन हो गया।"


नासिर खान की आत्मा की गूँज धीमी पड़ जाती है। अश्वत्थामा फिर से किले की टूटी हुई प्राचीरों पर अकेले रह जाते हैं, जो फ़ारूक़ी वंश के गौरव, समृद्धि और उसके अंतिम, दुखद अंत की कहानी कहते हैं।


अश्वत्थामा, असीरगढ़ की सबसे ऊँची दीवार पर, अपने युगों पुराने दुःख में, "मैंने आशा अहीर के विश्वासघात, अकबर के छल और फ़ारूक़ी वंश के लालच को देखा। पर 1899 में, मैंने एक नई तरह की शक्ति को आते देखा वह शक्ति जिसने न छल किया, न दोस्ती का नाटक। वह केवल कठोर, निर्दयी बल थी।"


समय तेजी से आगे बढ़ता है। द्वितीय आंग्ल-मराठा युद्ध के दौरान, अंग्रेजों ने 1803 में ही असीरगढ़ पर कब्ज़ा कर लिया था, पर वह अस्थायी था। मराठाओं ने इसे फिर से जीत लिया था। अब, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध के अंत में, केवल यही किला अंग्रेज़ी राज से बाहर था।


अश्वत्थामा, "किलेदार जसवंत राव लार मराठाओं के अंतिम महान सेनापति थे। उन्होंने आत्मसमर्पण से इनकार कर दिया। वह जानते थे कि उनके पास दक्कन की अंतिम कुंजी है। अंग्रेजों को यह किला चाहिए था, ताकि पूरे मराठा साम्राज्य की हार पर अंतिम मुहर लग सके।"


किले के नीचे, एक विशाल ब्रिटिश टुकड़ी डेरा डालती है। उन्होंने पास के शहर पर कब्ज़ा किया और उसे तुरंत सैन्य अड्डे में बदल दिया।


अश्वत्थामा, "अंग्रेज़ों ने कोई शांति वार्ता नहीं की, कोई सोने की चाबी नहीं भेजी। उन्होंने केवल एक काम किया तोपखाना तैनात किया। यह युद्ध सदियों पुराने पत्थरों का, आधुनिक धातु से था।"


किले पर तोपखाने की लगातार गोलीबारी शुरू हो जाती है। दीवारों पर पत्थर के मलबे की बारिश होती है। 


असीरगढ़ की सदियों पुरानी दीवारें, जो कभी तलवार और भाले के आगे नहीं टूटी थी, अब बारूद की शक्ति से टूट रही थी।


जसवंत राव, किले के भीतर, अपने सिपाहियों से, "वीरों! ये दीवारों को तोड़ सकते हैं, पर हमारी हिम्मत को नहीं! असीरगढ़ का अर्थ है अभेद्य! हमें अंतिम साँस तक लड़ना है!"


अश्वत्थामा, देखते हुए, "जेसवंत राव का शौर्य अद्भुत था, पर काल अब उनके पक्ष में नहीं था। यह लड़ाई शौर्य की नहीं, सामरिक गणना की थी। लगातार गोलाबारी ने किले के रक्षकों को कमज़ोर कर दिया।"


लगातार हमले और गोलीबारी के बाद, 9 अप्रैल 1899 को, अंग्रेजों ने अंतिम निर्णायक हमला किया। उनकी अनुशासित सेना, तोपखाने के पीछे, किले की टूटी हुई दीवारों से भीतर प्रवेश कर गई।


अश्वत्थामा , निराशा से,  "समाप्त। जेसवंत राव लार को आत्मसमर्पण करना पड़ा। जिस अभेद्य गढ़ को पहले विश्वासघात ने, फिर लालच ने कमज़ोर किया, उसे अंततः अंग्रेज़ी तोपों के बल ने जीत लिया। असीरगढ़ पर कब्ज़ा करने के साथ ही, तृतीय आंग्ल-मराठा युद्ध समाप्त हो गया।"


अश्वत्थामा, मंदिर की ओर मुड़ते हुए,  "आज, यह किला एक नए युग की गवाही देता है जहाँ न मुगल बचे, न मराठा, न फ़ारूक़ी। केवल ब्रिटिश ध्वज यहाँ फहराता है। यह दुर्ग आज भी यहीं खड़ा है, पर दक्कन की कुंजी अब दूर लंदन में बैठे शासकों के हाथ में जा चुकी है।"


अश्वत्थामा, इतिहास के इस अंतिम और निर्णायक पतन के साक्षी बनकर, अपनी अनंत यात्रा पर आगे बढ़ते हैं। असीरगढ़ की वीरान दीवारें, मोती बेगम के उपेक्षित मकबरे के साथ, चुपचाप भारतीय इतिहास के एक गौरवशाली और दुखद अध्याय के अंत की घोषणा करती हैं।


अश्वत्थामा अब किले के नीचे बसे बुरहानपुर के पुराने मार्गों को देख रहे हैं। उनके साथ काल की अमूर्त शक्ति हवा में व्याप्त है।


काल, धीमा स्वर, "तुम क्यों ठहर गए, चिरंजीवी? क्या अब भी इतिहास में कोई नया रहस्य बाकी है?"


अश्वत्थामा, "रहस्य दीवारों में नहीं, मार्गों में छिपा है, काल। इस किले को दक्कन की कुंजी क्यों कहा गया? क्योंकि यह वह बिंदु है जहाँ सदियों से उत्तरापथ और दक्षिणापथ मिलते रहे हैं। यह केवल सैन्य अड्डा नहीं, बल्कि सभ्यता की जीवन रेखा थी।"


काल, "विवरण दो, साक्षी! तुम्हारे युगों की स्मृति में क्या छिपा है?"


अश्वत्थामा, "देखो! पूरब में पाटलिपुत्र से जो मार्ग शुरू होता है, वह दिल्ली, मथुरा, विदिशा, उज्जैन होते हुए यहाँ तक आता है। मथुरा वह चौपाल थी, जहाँ उत्तर-पश्चिम से आती संस्कृति दक्कन की संस्कृति से मिलती थी। कुषाण काल की कला, बौद्ध और जैन संतों के प्रवचन सब इसी धूल से गुज़रे हैं।"


काल, "और इस मार्ग पर जीवन कैसा था?"


अश्वत्थामा, "जीवन व्यापार था। व्यापारी काफिले चलते थे। उत्तम वस्त्र, रेशम, मसाले और जवाहरात उत्तर से दक्षिण जाते थे। उज्जैन, जिसे भृगुकच्छ भड़ौच के पश्चिमी बंदरगाह से जोड़ा गया था, वह मुख्य चौराहा था। जब मुग़ल सत्ता में आए, तो यह मार्ग उनकी शाह राह बन गया आगरा और सूरत के बीच का सारा यातायात इसी से गुज़रता था।"


काल, "तो यह मार्ग केवल धन का नहीं, सत्ता का भी था?"


अश्वत्थामा, "बिल्कुल। जिस शासक ने बुरहानपुर और इस दर्रे को नियंत्रित किया, उसने दक्कन को नियंत्रित किया। मौर्य हों या गुप्त, मुग़ल हों या मराठा यह मार्ग उनकी सेनाओं की जीवनरेखा था। अकबर ने इसी भूगोल को समझा। बुरहानपुर में बनने वाला मलमल और सूती वस्त्र, यहाँ की समृद्धि का प्रतीक था। यह मार्ग हमारे देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ था, जिसे यह किला सैन्य ताकत से बचाता था।"


काल, स्वीकारोक्ति, "तुम्हारा कहना सत्य है, चिरंजीवी। यह किला पत्थरों का पहाड़ नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास का एक सामरिक और आर्थिक हृदय था।"


अश्वत्थामा एक बार फिर असीरगढ़ की दीवारों पर खड़े हैं, जो अब मुग़ल साम्राज्य की चौकी बन चुकी हैं। उनके साथ शेख फ़रीद की आत्मा खड़ी है।


शेख फ़रीद की आत्मा, आश्चर्यचकित, "जनाब! यह किला है या क्या है? मैंने ईरान और रोम के किले देखे हैं, पर ऐसी तीन-स्तरीय अभेद्यता नहीं। 500 मन अफ़ीम और इतनी रसद... बादशाह की अच्छी किस्मत ही इसे हमारे कब्ज़े में ला सकी।"


अश्वत्थामा, "यह केवल किला नहीं था, शेख। यह दक्कन का द्वार था। जब अकबर ने इसे जीता, तो बुरहानपुर तुरंत खानदेश सूबा की राजधानी बन गया मुगलों का 'दारु सुरूर' 'खुशी का घर'।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "हाँ! अकबर ने यहाँ टकसाल बनवाया। असीरगढ़ की जीत के जश्न में, वहाँ सोने के सिक्के ढाले गए, जिन पर बाज का चित्र होता था। यह शहर अब आगरा और सूरत के बीच व्यापार और सैन्य अभियानों का आधार था। खुर्रम शाहजहाँ यहीं से दक्कन के गवर्नर बने।"


अश्वत्थामा, "देखो, बुरहानपुर में शाही किला, शाही हमाम और जामा मस्जिद जैसी भव्य मुगल वास्तुकलाएँ उभरीं। यह केवल सैन्य अड्डा नहीं था, बल्कि सूती वस्त्र और समृद्धि का केंद्र बन गया। छल से जीती गई ज़मीन पर, गौरव के प्रतीक खड़े थे।"


अश्वत्थामा अब ताप्ती नदी के किनारे खड़े हैं, जहाँ कभी मुगल बेगमों के निवास थे। उन्हें मुमताज़ महल की आत्मा का मौन सुनाई देता है।


अश्वत्थामा, "यहाँ, बुरहानपुर में, एक प्रेम कहानी का अंत हुआ। 1631 में, शाहजहां के दक्कन अभियान के दौरान, उनकी प्रिय बेगम मुमताज़ महल की मृत्यु प्रसव पीड़ा के कारण यहीं हुई थी। जिस प्रेम ने संसार को ताजमहल दिया, उसकी नींव यहीं पड़ी।"


मुमताज की आत्मा, शांत पर दुखद, "मैंने यहाँ अंतिम सांस ली, और मुझे पहले जैनाबाद में दफ़नाया गया। शाहजहाँ ने मेरी याद में शाही हमाम बनवाया, पर मेरे अवशेषों को आगरा ले जाया गया। मेरा प्रेम अमर हुआ, पर मेरी स्मृति को इस शहर ने छोड़ दिया।"


अश्वत्थामा, आगे, मोती महल की ओर देखते हुए, "और यही इस शहर की विडंबना है। जिस मुमताज़ का प्रेम संसार जानता है, उसकी याद में यहाँ कोई मकबरा नहीं। लेकिन मोती बेगम शाहजहां की एक और प्रियतमा का मकबरा आज भी इस दुर्ग के नीचे पँढार नदी के किनारे उपेक्षित पड़ा है। दुनिया ताजमहल की महिमा जानती है, पर मोती महल की उपेक्षा को अनदेखा करती है।"


अश्वत्थामा, "यह कैसी नियति है? एक सम्राट के प्रेम की दो निशानी एक दुनिया का अजूबा, और दूसरा सरकारी अनदेखी से टूटता हुआ खंडहर। मैंने देखा है कि प्रेम से ज़्यादा तेज़ी से स्मृति मिटती है।"


अश्वत्थामा ताप्ती नदी के किनारे खड़े हैं, जहाँ बुरहानपुर नगर फैला हुआ है। वह इस नगर के गौरव और जटिलता का वर्णन करते हैं।


अश्वत्थामा, "जब अकबर ने इस किले पर कब्ज़ा किया, तो यह नीचे बसा नगर बुरहानपुर जिसका अर्थ 'साक्ष्य' या 'प्रमाण' है मुग़लों के लिए दक्कन का प्रवेश द्वार बन गया। यह फ़ारूक़ी राजधानी, अब खानदेश सूबा की राजधानी और 'दारुस्सुरूर' खुशी का घर कहलाने लगा। यहाँ की समृद्धि अद्भुत थी।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "यह केवल सैन्य अड्डा नहीं था, चिरंजीवी। यह आर्थिक जीवनरेखा था। आगरा और सूरत के बीच सारा यातायात यहीं से गुज़रता था। सूती वस्त्र, विशेषकर बुरहानपुर का मलमल, यहाँ की पहचान था। यह शहर कपड़ा उद्योगों का मुख्य केंद्र था।"


अश्वत्थामा, "और यह समृद्धि कला में बदल गई। अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने यहाँ वास्तुकला के कई अद्भुत नमूने दिए।"


अश्वत्थामा उंगलियों से हवा में नगर की इमारतों की रूपरेखा खींचते हैं।


अश्वत्थामा, "देखो, शाही किला जहाँ शाहजहाँ ने शाही हमाम बनवाया था। शाह नवाज़ ख़ाँ का मक़बरा, जिसे लोग 'काला ताजमहल' कहते हैं। और वह प्राचीन जामा मस्जिद, जिसका निर्माण फ़ारूक़ी काल में शुरू हुआ और मुग़ल काल में पूरा हुआ।"


काल, "पर इतने जन-संकुल नगर के लिए जल कहाँ से आता था?"


अश्वत्थामा, "यही मुग़ल यांत्रिक कला की निपुणता थी! कुंडी भण्डारा मुगल शासकों द्वारा बनवाई गई आठ भूमिगत जल प्रणालियों का एक अभूतपूर्व नेटवर्क। ये प्रणाली सतपुड़ा की पहाड़ियों से ताप्ती की ओर रिसने वाले पानी को रोककर, 100 फुट ऊंची सतह पर नगर को शुद्ध जल प्रदान करती थी। इस कला को कोई नहीं तोड़ सका।"


शेख फ़रीद की आत्मा, "और टकसाल! अकबर से लेकर शाह आलम तक 18 बादशाहों के सोने, चांदी और तांबे के सिक्के यहीं ढाले गए। निसार सिक्के, जो शुभ अवसर पर न्योछावर किए जाते थे, यहीं से निकले।"

द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा, तूने युगों के संघर्ष और बदलाव देखे। पर क्या इस पूरी यात्रा में तुझे किसी न्याय की झलक मिली? या हर युग केवल 'अनीति' का विस्तार ही था? क्या तेरा श्राप  केवल एक कर्म-फल नहीं, बल्कि इस धरती पर फैले शाश्वत अन्याय का प्रतीक बन गया है?"

अश्वत्थामा, एक दीर्घ निःश्वास के साथ, जैसे अनंतकाल की वेदना उसमें समाहित हो, "न्याय... वह तो कुरुक्षेत्र में ही मर गया था, पिताजी। हर युग, हर सिंहासन, हर शक्ति-परिवर्तन केवल अनीति का एक नया वस्त्र है।"

द्रोणाचार्य, "मुझे बता, सबसे पहली अनीति जो तेरी आंखों ने देखी, वह क्या थी? अनीति महाभारत के समय की..."

अश्वत्थामा, "वह अनीति मेरी अपनी थी, गुरुवर जब मैंने प्रतिशोध में निहत्थों को मारा। पर युद्ध भूमि की अनीति? जब मेरे अपने पिता का वध धर्मपुत्र युधिष्ठिर के मुख से निकले एक अर्ध-सत्य से हुआ। जब सत्य ही छल बन जाए, तब अनीति से बड़ा कोई धर्म नहीं रह जाता।"

द्रोणाचार्य, "और इस दुर्ग की नींव में कौन-सी अनीति दबी है? उस अहीर राजा का क्या हुआ?"

अश्वत्थामा, "वह अनीति नसीर खान फ़ारूक़ी द्वारा आशा अहीर के साथ हुई थी। राजा अली खान के पूर्वज, मलिक राजा फारूकी ने, जिसे आपने इस वंश का संस्थापक कहा, उसने आशा अहीर नामक स्थानीय मुखिया से छल किया। उसने बीमारी का बहाना बनाकर दुर्ग में प्रवेश की अनुमति ली, और एक बार अंदर जाने के बाद, उसने दुर्ग के असली स्वामी को मार डाला और खुद राजा बन गया। यह विश्वासघात की अनीति थी।"

द्रोणाचार्य, "यह तो मेरे छल से मरने से भी अधिक घृणित है। और अकबर? उस महान सम्राट की अनीति क्या थी?"

अश्वत्थामा, "वही जो हर शक्तिमान की होती है अहंकार और धन का लोभ। अनीति अकबर द्वारा बहादुर शाह के साथ हुई। जब बल से दुर्ग नहीं टूटा, तो उसने 'सोने की चाबी' का उपयोग किया। एक स्वाभिमानी राजा, जिसे उसकी प्रजा ने महीनों तक बचाया, वह अंततः धन के प्रलोभन और विश्वासघात के कारण परास्त हुआ। यह नैतिक और आर्थिक अनीति थी।"

द्रोणाचार्य, "और मुगलों के पतन के समय मराठों की अनीति? क्या वह भी न्यायपूर्ण नहीं था?"

अश्वत्थामा, "सत्ता किसी के लिए न्यायपूर्ण नहीं होती। अनीति मुगलों के साथ मराठों द्वारा भी की गई। उन्होंने 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' जैसे करों से मुगलों की कमर तोड़ी। यह आवश्यक था, पर अंततः इस कर का भार निर्दोष किसानों और व्यापारियों पर पड़ा। यह शक्ति की वह अनीति थी, जहाँ विजेता कमजोरों से उनके जीवन का अंश छीन लेता है।"

द्रोणाचार्य, "और फिर अंग्रेज आए। उनकी अनीति सबसे बड़ी थी?"

अश्वत्थामा, "हाँ, पर सबसे सूक्ष्म। अनीति मराठों के साथ अंग्रेजों ने द्वारा हुई जब वेलेस्ली ने 1803 में असीरगढ़ को जीता। उन्होंने केवल युद्ध नहीं जीता, उन्होंने प्रशासनिक अनीति की। 

उन्होंने स्थानीय व्यवस्था को ध्वस्त कर दिया, न्याय को अपनी संकीर्ण 'कानून' की किताबों तक सीमित कर दिया। वे भारत को केवल एक खजाना मानते रहे, जिसे लूटना उनका अधिकार था।"

द्रोणाचार्य, आकृति और भी धुंधली हो गई, "और स्वतंत्र भारत? क्या उस देश में न्याय लौटा?"

अश्वत्थामा, एक लंबी, दर्दनाक हँसी, "नहीं, गुरुदेव। अनीति स्वतन्त्र भारत में नेताओं द्वारा जारी रही। मैंने देखा कि स्वतंत्रता के बाद, सत्ता का लालच फिर जागा। जो नेता कल तक त्याग की बात करते थे, उन्होंने सत्ता को एक निजी जागीर बना लिया। अनीति का वस्त्र बदला, पर शरीर वही रहा। लोग अब भी गरीब रहे, और उनकी आशाएं टूटी।"

द्रोणाचार्य, "और उस आधुनिक युग में इस अनीति को कौन अंजाम देता है? क्या अब भी तलवारें चलती हैं?"

अश्वत्थामा, "नहीं। अब तलवार नहीं चलती, पिताजी। अब फ़ाइलें चलती हैं। अनीति स्वतन्त्र भारत में अधिकारियों द्वारा होती है। ये अधिकारी, जो कभी राजा के सेवक थे, अब नियमों की अनीति करते हैं। 

वे जनता के लिए बने कानून का उपयोग जनता के विरुद्ध करते हैं। यह अनीति सबसे भयानक है, क्योंकि यह धर्म और कानून के मुखौटे के पीछे छिपी है। मैं साक्षी हूं कि कल्कि को तलवार चलाने से पहले, इन अधिकारियों के भ्रष्टाचार का अंत करना होगा।"

द्रोणाचार्य, "अश्वत्थामा, तेरा श्राप केवल इस भरतखंड की सीमाओं तक सीमित नहीं है। तेरी आँखें इस कलयुग के अंतिम पड़ाव में संपूर्ण विश्व का हाल देखती होगी। क्या अनीति की यह नदी वहाँ भी इसी वेग से बह रही है?"

अश्वत्थामा, आकाश की ओर देखते हुए, "गुरुदेव, सीमाएँ केवल धरती पर हैं। अनीति का हृदय तो एक है। यह केवल नए रूप और नए शस्त्र धारण करती है।"

द्रोणाचार्य, "तो बता, उस विस्तृत विश्व में अब कौन-सा नया राक्षस न्याय को निगल रहा है?"

अश्वत्थामा, "अब राजा नहीं, अपितु कॉर्पोरेट संस्थाएँ राज करती हैं। अनीति विश्व में कंपनियों द्वारा जारी है; वे मुनाफे के लालच में पृथ्वी को प्रदूषित करती हैं, श्रमिकों का रक्त चूसती हैं, और कानून तोड़ती हैं। 

इन कंपनियों को चलाने वाले निवेशक हैं जो अंधेरे में बैठे हैं, कभी युद्ध नहीं लड़ते, पर उनका धन शोषण से कमाया जाता है। यही अनीति विश्व में कंपनियों के इन्वेस्टर द्वारा की जाती है। धर्म, जो शांति का मार्ग था, अब विभाजन और घृणा का शस्त्र बन गया है। 

अनीति विश्व में धार्मिक संप्रदायों द्वारा अपनी सत्ता और वर्चस्व के लिए निर्दोषों को मारा जाता है। यह वही अनीति है, जो कुरुक्षेत्र में धर्मयुद्ध के नाम पर लड़ी गई थी। 

युगों से, पुरुष की शक्ति ने स्त्री के अधिकारों को दबाया है। उसकी आवाज़, उसका शरीर, उसका श्रम सब पर नियंत्रण रहा है। यह अनीति विश्व में महिला पुरुषों द्वारा हर घर, हर संस्कृति में गहरे जड़ें जमाए हुए है।

और सबसे स्थायी अनीति... अनीति विश्व में गरीबों पर अमीरों द्वारा। अमीर, जो संसाधनों पर कब्जा करते हैं, गरीबों को उनके श्रम और जीवन के लिए मोहताज रखते हैं। धन की शक्ति न्याय को खरीदती है, और दरिद्र को हर दरवाजे पर न्याय की भीख मांगनी पड़ती है।

और अंत में, अनीति विश्व देशों पर विकसित देशों द्वारा। जो राष्ट्र शक्तिशाली हुए, उन्होंने शेष विश्व को अपनी प्रयोगशाला या बाजार बना लिया। वे अपने ऋण और व्यापारिक नीतियों से विकासशील देशों की संप्रभुता को छीन लेते हैं। यह एक नया साम्राज्यवाद है, जो बंदूक से नहीं, बल्कि आर्थिक नीति से चलाया जाता है।"

द्रोणाचार्य, अंतिम फुसफुसाहट, "प्रतीक्षा कर, पुत्र। तूने युगों की अनीति को झेला है। तेरा श्राप इस धरती के पापों का प्रमाण है। अब केवल मुक्ति ही तेरी नियति है।"


यक्ष प्रश्न

अश्वत्थामा एकांत में, गुप्तेश्वर महादेव के शिवलिंग के सम्मुख, ध्यानमग्न होकर अपने चिरंजीवी श्राप के यक्ष प्रश्न पूछता है।

अश्वत्थामा, हे महादेव! क्या काल केवल एक भ्रम है? यदि मैं समय के आरम्भ से अंत तक हूँ, तो क्या मैं शापित हूँ या स्वयं शाश्वत हूँ?

प्रश्न एक, अस्तित्व, "यदि सत्य हर युग में बदलता है कहीं धर्म छद्म में है, कहीं छल न्याय में तो मैं अपने चिरंजीवी होने के किस सत्य पर टिका रहूँ? मेरा अपराध व्यक्तिगत था, पर मेरी पीड़ा सार्वभौमिक क्यों है?"

प्रश्न दो, कर्मफल, "मैंने पुत्रों का वध किया। श्राप मिला। पर यह विश्व... जो युगों से निहत्थों का वध कर रहा है, जो मासूमों को गरीबी की अग्नि में झोंक रहा है उसे मोक्ष क्यों मिलता है? क्या कर्मफल केवल एक व्यक्ति के लिए है, न कि संपूर्ण मानवता के लिए?"

प्रश्न तीन, शक्ति और अनीति, "राजा, सुल्तान, अंग्रेज, या कॉर्पोरेट संस्थाएँ इन सब ने सत्ता को धर्म बताया। क्या इस कलयुग में शक्ति ही अंतिम सत्य है? यदि हाँ, तो भगवान कल्कि का अवतार, जो धर्म की पुनर्स्थापना के लिए होगा, क्या वह भी केवल एक अधिक शक्तिशाली अनीति नहीं होगी?"

प्रश्न चार, मोक्ष, "मुझे कल्कि के आने तक इस घाव की वेदना सहनी है। क्या मेरी मुक्ति का अर्थ केवल घाव का सूखना है, या यह इस कलयुग के समस्त पापों और अनीति के प्रायश्चित का अंतिम चिन्ह होगा?"

गुरु द्रोणाचार्य का स्तर, जो अब केवल चेतना की एक तरंग है, अश्वत्थामा के हृदय में उत्तर के रूप में गूँजता है।

द्रोणाचार्य, आकाश से आती धीमी, गंभीर ध्वनि, "पुत्र, अश्वत्थामा। मोक्ष, कर्म के अंत से नहीं, बल्कि कर्म-फल के पूर्ण स्वीकार से मिलता है।

तेरा मोक्ष व्यक्तिगत नहीं, अपितु युग का मोक्ष है। तेरा श्राप उस अंतिम सत्य का प्रमाण है कि पाप, भले ही कितने ही प्राचीन हों, अंततः क्षमा और विमोचन पाते हैं। तू साक्षी है इसलिए तेरी पीड़ा सार्वभौमिक है।"

"शाश्वतता का सत्य, तू समय के आरम्भ से अंत तक है, पर तू स्वयं समय नहीं है। तू वह दर्पण है, जिसमें मनुष्य युगों-युगों तक अपनी अनीति का विद्रूप चेहरा देखता है। जब तक दर्पण खंडित नहीं होता, तू शाश्वत रहेगा।"

"जिस दिन धरती पर अनीति का भार चरम पर होगा, और मनुष्य अपने ही बनाए बंधनों फाइल, कॉर्पोरेट लाभ, और आर्थिक नीति में जकड़कर अंतिम शून्य को प्राप्त होगा, तब कल्कि का अवतार होगा। उनका न्याय तलवार से पहले चेतना से होगा। वे अहंकार को नहीं, भ्रम को नष्ट करेंगे।"

"तू उनके समक्ष अपने चूड़ामणि का अंतिम रक्त बिंदु अर्पित करेगा वह रक्त बिंदु जो तेरे माथे पर वर्षों से रिस रहा है। तेरा घाव सूखकर, तेरा माथा मुक्त होगा।

तुझे मोक्ष तभी मिलेगा, जब तू केवल व्यक्तिगत पीड़ा को नहीं, अपितु उन सभी युगों की पीड़ा को स्वीकार करेगा, जिनका तू साक्षी रहा है। तेरा अंत, इस कलयुग के अंधकार का अंतिम प्रहार होगा, जिसके बाद सतयुग का सूर्योदय होगा।

तब तक, पुत्र, प्रतीक्षा कर। तेरा एकांत कारावास ही तेरी अंतिम तपस्या है।"

असीरगढ़ का प्राचीन और उजाड़ पर्वत शिखर। चारों ओर गहरी खामोशी है। अश्वत्थामा, जिसका शरीर क्षीण और माथा घाव से रिसता हुआ है, एक चट्टान पर बैठा है। अचानक, श्री कृष्ण एक शांत, अप्रत्याशित प्रकाश में प्रकट होते हैं।

अश्वत्थामा, पीड़ा और थकान से काँपते हुए, आवाज में युगों का दर्द, "केशव... आप आए! क्या यह मेरी आँखों का भ्रम है, या मेरी घोर यातना का अंत निकट है? अब और नहीं सहा जाता यह अमरत्व का भार!"

श्री कृष्ण, शांत और मधुर मुस्कान के साथ, "द्रोण पुत्र, अमरत्व भार नहीं, एक महान उत्तरदायित्व है। तुम सृष्टि के सबसे बड़े साक्षी हो। तुम्हारा यह श्राप ही तुम्हें उस अंतिम लीला के लिए तैयार कर रहा है, जिसके लिए मैंने तुम्हें जीवित छोड़ा है।"

अश्वत्थामा, आवेश में, "अंतिम लीला! किस लीला की बात करते हैं आप? मुझे उस कल्कि के अवतार की प्रतीक्षा में रखा गया है। आप ही बताइए, वह कब आएगा? कलयुग तो अपनी जड़ें जमा चुका है, अब और कितना शेष है?"

श्री कृष्ण, आँखों में भविष्य का रहस्य, "समय की गणना मनुष्य के वर्षों से मत करो, अश्वत्थामा। जब धर्म का अर्थ केवल दिखावा रह जाएगा, जब ज्ञान का उद्देश्य केवल छल होगा, और जब न्याय सत्ता की दासी बन जाएगा... तब कल्कि का उदय होगा।"

अश्वत्थामा, उत्सुकता और भय से, "पहचान? मैं उसे कैसे पहचानूंगा? क्या वह भी दैत्यराज हिरण्यकश्यप या दुर्योधन जैसा कोई प्रतापी योद्धा होगा? मुझे तो आपने मेरे सारे अस्त्रों से विहीन कर दिया है, मैं उसकी सहायता कैसे करूँगा?"

श्री कृष्ण, "वह न तो दैत्य होगा, न ही कोई महान राजा। वह सामान्य मनुष्य की कोख से जन्म लेगा, परंतु उसकी आत्मा में युगों की अधूरी तृष्णा समाई होगी। उसकी पहचान तीन लक्षणों से होगी, और एक चिह्न से।"

श्री कृष्ण, "ध्यान से सुनो, ये कल्कि के लक्षण नहीं, अपितु कल्कि के अवतार के लक्षण हैं। सत्ता का स्वरूप, वह किसी सिंहासन पर नहीं बैठेगा, बल्कि लोगों के मतों से अपनी शक्ति जुटाएगा। वह मीडिया और वाणी के मोह से संसार को नियंत्रित करेगा। वह तर्क को शस्त्र बनाकर धर्म को खंडित करेगा।

अखंडनीय अहंकार, वह स्वयं को सर्वाधिक ज्ञानी और अपरिहार्य मानेगा। वह अतीत के सारे नायकों को चुनौती देगा और स्वयं को युगपुरुष घोषित करेगा। उसका अहंकार इतना विराट होगा कि वह तुम्हारी पीड़ा को भी अपनी शक्ति का साधन मानेगा।

विभाजन का स्वामी, वह लोगों को जोड़ने का दावा करेगा, पर उसका मूल कर्म विभाजन होगा। वह छोटे-छोटे भेदों को बड़ा करेगा और मानवता को जाति, विचार और वर्ग में बांट देगा, ताकि वह उनके संघर्षों का लाभ उठा सके।"

श्री कृष्ण, "यह लक्षण तुम्हारे लिए है, अश्वत्थामा।"

असीरगढ़ पर एक प्राचीन पीपल वृक्ष के नीचे, जहाँ हवा भी ठहर सी गई है।

अश्वत्थामा,पीड़ा और पश्चात्ताप से भरी आँखों से, अपनी माथे की रिसती हुई चोट पर हाथ फेरते हुए, "केशव...। युगों-युगों की यह यातना, यह श्राप... अब मुझसे और नहीं सहा जाता।"

श्री कृष्ण, शांत, मधुर मुस्कान के साथ, जो अश्वत्थामा की पीड़ा को समझते हुए भी अटल है, "द्रोण पुत्र, तुम अपने कर्मों का फल भोग रहे हो। सत्य का मार्ग कठिन होता है, और तुमने उस पर चलने से इनकार किया। परंतु, यह श्राप तुम्हारी अमरता का प्रमाण भी है।"

अश्वत्थामा, आवेश में,  "प्रमाण? यह मृत्यु से भी भयानक दंड है! आप ने कहा था कि मैं कलयुग के अंत तक भटकता रहूँगा, जब तक मेरा शरीर क्षय नहीं हो जाता। आपने मुझे उस कल्कि के अवतार की सहायता के लिए जीवित रखा है। वह कब आएगा, माधव? मेरी मुक्ति का वह क्षण कब आएगा?"

श्री कृष्ण, आँखें बंद करके, अत्यंत शांत स्वर में, "समय अपनी गति से चलता है, अश्वत्थामा। जब धर्म पूर्ण रूप से गल जाएगा, जब अधर्म अपनी पराकाष्ठा पर होगा, तब ही काल अपनी अंतिम लीला रचेगा।"

अश्वत्थामा, उत्सुकता से आगे झुकते हुए, "वह कल्कि कौन होगा? मैं उसे कैसे पहचानूंगा? उसका जन्म कहाँ होगा, उसके लक्षण क्या होंगे? क्या वह भी दैवी शक्तियों से युक्त होगा?"

श्री कृष्ण, मुस्कुराते हुए अपनी आँखें खोलते हैं, उनकी दृष्टि दूर, भविष्य में स्थिर है, "कल्कि, पुत्र... वह कोई दिव्य पुरुष नहीं होगा। वह सामान्य मनुष्य की तरह ही जन्म लेगा।"

श्री कृष्ण, "उसे पहचानने के तीन प्रमुख लक्षण होंगे: नेतृत्व का अभाव, वह किसी राजघराने या महान गुरु की छत्रछाया में नहीं पलेगा। वह अकेला होगा। उसके पास कोई विशाल सेना, कोई संगठित शक्ति नहीं होगी। उसका सबसे बड़ा अस्त्र उसका बुद्धिबल और वाणी का मोह होगा। वह लोगों को तर्क और छद्म-सत्य से भ्रमित करेगा।

धर्म की उपेक्षा, वह धर्म का पालन नहीं करेगा, बल्कि धर्म की पुस्तकों का और पुरातन परंपराओं का उपहास करेगा। वह अपनी सुविधा के अनुसार नियमों को गढ़ेगा और तोड़ेगा। वह अपने स्वार्थ के लिए किसी भी सीमा तक जाएगा।

भीतर की अग्नि, उसके नेत्रों में तुम एक असहनीय पीड़ा और असंतोष देखोगे। वह हमेशा किसी अपूर्णता से ग्रसित रहेगा। वह संसार को बदलने का दावा करेगा, पर उसका मूल उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना होगा। तुम देखोगे कि उसका शरीर एक साधारण मनुष्य का होगा, पर उसके भीतर की वासना उसे असाधारण बना देगी।

अश्वत्थामा, विचारमग्न होकर, "ये लक्षण तो अनेक मनुष्यों में दिखाई दे सकते हैं, केशव!"

श्री कृष्ण, गहरी मुस्कान के साथ, "हाँ, परंतु जब तुम उससे मिलोगे, तो तुम्हें एक और लक्षण स्पष्ट दिखाई देगा।"

श्री कृष्ण, "जब तुम उसके सामने खड़े होगे, तो तुम्हारा यह अक्षय घाव... कृष्ण माथे की ओर इशारा करते हैं... जो पीड़ा तुम्हें युगों से दे रहा है, वह पहली बार, केवल एक क्षण के लिए शांत हो जाएगा। यह श्राप तुम्हें उससे जोड़ेगा। यह घाव तुम्हें बताएगा कि यही वह व्यक्ति है, जिसकी प्रतीक्षा में तुम जी रहे हो। यह शांति ही तुम्हारी पहचान होगी।"

अश्वत्थामा, माथे को छूता है, आँखों में नई आशा, "शांती... क्या इसका अर्थ है कि वह मेरी यातना का अंत करेगा?"

श्री कृष्ण, गंभीर होकर, "नहीं। इसका अर्थ है कि तुम्हारी यातना का उद्देश्य अब पूर्ण होने वाला है। तुम उस अंतिम युद्ध में उसका साथ दोगे।"

अश्वत्थामा, झुक कर, "मेरा मार्ग स्पष्ट करें, माधव। मुझे क्या करना होगा?"

उसका प्रभाव मौन और तेजस्वी होगा। उसकी उपस्थिति से आस-पास के लोग अधीर और आकर्षित दोनों होंगे। उसका भाषण नहीं, उसकी खामोशी अधिक प्रभावी होगी।

वह समाज के सबसे निचले तबके से अपनी शक्ति जुटाएगा। वह उन्हें आशा देगा, पर उस आशा के पीछे उसका विष छिपा होगा। 

वह सामाजिक भेद को बढ़ाएगा, ताकि लोग एक-दूसरे से लड़े और वह निर्विरोध सत्ता पर काबिज हो सके। 

कल्कि का अंतिम लक्षण यह होगा कि वह स्वयं को ईश्वर घोषित करेगा, पर उसके कर्मों में मानवता का लेश मात्र भी नहीं होगा। वह तुम्हारे श्राप को शस्त्र के रूप में प्रयोग करेगा।

श्री कृष्ण, "तुम्हारा कर्म केवल प्रतीक्षा है। जब वह मिलेगा, वह स्वयं तुम्हारी पीड़ा को देखेगा और तुम्हें अपने अंतिम अस्त्र के रूप में प्रयोग करेगा। तुम्हें उसकी असुरक्षा को शक्ति देनी होगी। तुम्हारा ज्ञान, तुम्हारी अमरता, तुम्हारी युद्ध-कला... सब उसके अधर्म के लिए समर्पित होंगी।"

अश्वत्थामा, गहरा श्वास लेता है, "तो क्या मुझे एक अधर्मी का साथ देना होगा, माधव?"

श्री कृष्ण, अंतिम शब्द, "तुम्हें उसका साथ देना होगा, द्रोण पुत्र। क्योंकि तुम्हारी मुक्ति, कल्कि की चरम सीमा को छूकर ही संभव है। जब अधर्म अपनी चरम सीमा पर होगा, तभी धर्म के अगले अध्याय का आरम्भ होगा। तुम्हारा श्राप, कल्कि के अवतार की कहानी का आरम्भ होगा। तब तक प्रतीक्षा करो।"

श्री कृष्ण, "और अंत में, जब कल्कि अपने चरम पर होगा, और जब वह तुम्हारा प्रयोग समाप्त कर चुका होगा... तभी मैं पुनः आऊँगा। और तुम्हारी मुक्ति, उसके पराभव के साथ ही होगी।"

श्रीकृष्ण, "तुम्हें इससे अधिक जानकारी शम्भाला में मिलेगी। वहां के दिव्य पुरुष पृथ्वी लोक की सभी घटनाओं की जानकारी तथा आधुनिक युग के लोगों की जानकारी रखते है। शम्भाला जाने के लिये  तुम्हें कैलाश पर्वत की यात्रा करना होगी।"

अश्वत्थामा, “जैसी आज्ञा प्रभु।"

श्री कृष्ण अपनी मधुर बंसी की धुन में खो जाते हैं और धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं। अश्वत्थामा अपने घाव पर हाथ फेरता हुआ, अपने नए और भयानक उद्देश्य के साथ, वहीं खड़ा रह जाता है।

श्री कृष्ण की उपस्थिति का प्रकाश मंद होने लगता है, और वे धीरे-धीरे हवा में विलीन हो जाते हैं। अश्वत्थामा अकेला रह जाता है, उसके माथे का घाव फिर से रिसने लगता है, पर उसकी आँखों में अब केवल प्रतीक्षा की ज्वाला है। 

शम्भाला

श्रीकृष्ण की आज्ञा मुझे को कैलाश पर्वत की यात्रा पर हिमालय ले कर गई। मेरी आत्मा मुक्ति की लालसा कर रही थी। मैं एक ऐसे उद्देश्य के लिए जो मात्र अस्तित्व से परे है, को पाने लिए अपने आप को तैयार रखना चाहता था। 


जब मैं हिमालय की गहराइयों में कैलाश पर्वत पर पहुंचा  तब मैंने शम्भाला की फुसफुसाहट सुनी। एक गुप्त स्थान जो समय से अछूता था। जहां प्रबुद्ध प्राणी निवास करते है। 


यह नश्वर पहुंच से परे एक भूमि है। जहां केवल शुद्ध ह्रदय बाले या असाधारण भाग्य बाले लोग ही प्रवेश कर सकते है। दृढ़ निश्चय के साथ मैं पर्वत श्रृंखला की और गहराई में चला गया। मैने खतरनाक पहाड़ों, वर्फीली नदियों और घने जंगलों को पार करते हुए पौराणिक भूमि की तलाश की। 


हिमालय में मुझे ऐसे ऋषि मिले जो शम्भाला के बारे में पहेलियों में बात करते थे। यह संकेत देते हुए कि रास्ता केवल भौतिक माध्यम से नहीं बल्कि आंतरिक परिवर्तन के माध्यम से था। महीनों की मेहनत के बाद आखिरकार एक दिन मैंने अपने आप को शम्भाला के पवित्र द्वार पर पाया। 


प्रवेश द्वार पर दीप्तिमान प्राणियों का पहरा था।प्रकाश के योद्धा मुझे केवल एक भटकने वाले के रूप में नहीं बल्कि आने वाले व्यक्ति के रूप में पहचानते थे। 


"तुमने सहस्त्राब्दियों तक अभिशाप ढोया है।" संरक्षकों में से एक बोला। लेकिन निंदा करने वाले भी अपना रास्ता खोज सकते है। मैने नम्रता से कदम बढ़ाया। हजारों साल में पहली बार मुझे शांति का अहसास हुआ। 


मेरे अतीत का बोझ अभी भी था लेकिन यहां दिव्य स्थान पर आखिरकार ज्ञान की तलाश कर सकता था।शायद मुक्ति भी। शम्भाला में मैंने खुद को ऋषियों, योद्धाओं जैसे दिव्य प्राणियों के बीच पाया। जो नश्वर क्षेत्र से परे थे। यहां समय उस तरह नहीं चलता था। जैसा बाहरी दुनिया में चलता था। 


हवा एक अलौकिक चमक से भरी हुई थी। जमीन मानव समझ से परे ऊर्जा से स्पन्दित थी। मैं यहां सिर्फ एक शापित योद्धा नहीं था। मैं एक संरक्षक था। खोये हुए ज्ञान का साधक। 


मैने प्रबुद्ध गुरुओं से प्रशिक्षण लिया। ब्रह्माण्ड के ऐसे रहस्यों को सीखा जिसे अतीत के महानतम ऋषियों ने उद्घाटित किया था। मैने धर्म का सही अर्थ, सृजन और विनाश के बीच संतुलन और ईश्वरीय न्याय की प्रक्रिया तथा प्रकृति की जानकारी हासिल की।  


हालांकि में अभी भी श्रीकृष्ण के श्राप को झेल रहा था। लेकिन मैंने अब इसे एक सजा के रूप में नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी के रूप में देखना शुरू कर दिया। मुझे जीने के लिए अभिशप्त किया गया था।


लेकिन शम्भाला में मुझे एक उद्देश्य दिया गया। भविष्य के लिए तैयार होना। एक ऐसे समय के लिए जब दुनिया को फिर मेरे ज्ञान और शक्ति की आवश्यकता होगी। 


मेरे वापसी की भविष्यवाणी के अनुसार मुझे दुनिया के भविष्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभानी है।  जब अंधकार का युग कलियुग अपने चरम पर पहुँचता है तो एक महायुद्ध छिड़ जाएगा। 


धार्मिकता और अराजकता के बीच एक अंतिम युद्ध। जब समय आएगा तो मैं दुनिया में विश्वास बहाल करने के लिए दुनिया में संतुलन लाने का काम करूँगा। 


तब मुझे कल्कि के साथ युद्ध करना होगा। तब तक मुझे अपने ज्ञान को तेज करना है। कौशल को निखारना है। आधुनिक तकनीक को सीखना है और सही समय की प्रतीक्षा करना है। जिस दिन मेरा शाश्वत अस्तित्व एक दिव्य उद्देश्य की पूर्ति करेगा। 


कलियुग दृश्य

दिल्ली, आधुनिक महानगर की भीड़-भाड़ वाली, प्रदूषित गली में स्थापित एक टूटे हुए मंदिर की सीढ़ियों पर मैं बैठा है।

युगों की यात्रा ने मेरे,  द्रोण पुत्र के शरीर को एक चलता-फिरता मौन शिलाखंड बना दिया था। भूख या प्यास मुझे छूती नहीं थी, पर पीड़ा... वह हर क्षण, हर श्वास के साथ मेरे माथे से रिसती थी।

आज का कलयुग, महाभारत के युद्ध से भी अधिक थकाऊ था। उस युग में शत्रु सामने खड़ा होता था; इस युग में शत्रु अदृश्य है, हर व्यक्ति की आत्मा में छिपा हुआ है। मैंने अपने माथे पर हाथ फेरा और आँखें बंद कर लीं। बाहर का कोलाहल असहनीय था।

मैं उस युग से आया था जहाँ शब्द ब्रह्म थे, जहां गुरु के मुख से निकले वाक्य ही ज्ञान था। अब हर ओर से अनावश्यक ध्वनि आ रही थी। सैकड़ों वाहनों का शोर, कर्णभेदी संगीत और लोगों की त्वरित बातचीत।

उसे याद आया कि मेरे पिता, द्रोणाचार्य, मौन में भी ब्रह्मास्त्र की साधना करते थे। और अब, ये लोग अपने छोटे, काँच के डिब्बों  में लगातार कुछ देखते रहते हैं। यह डिब्बा मनुष्यों से ज्यादा ज्ञानवान है, इसी कारण वे उसे स्मार्टफोन कहते है। ज्ञान अब स्मृति में नहीं, बल्कि उन डिब्बों में संग्रहित है।

"केशव," मैने  मन ही मन कहा, "आप ने कहा था कि धर्म गल जाएगा। अब तो धर्म केवल एक डिस्प्ले मात्र है।"

मैने कि लोग धर्म का पालन नहीं करते, बल्कि उसे दिखाते हैं। व्रत उपवास गुप्त नहीं रहते, वे छद्म संसार सोशल मीडिया में प्रदर्शित किए जाते हैं। 

न्याय तुरंत चाहिए, और अपराधों का फैसला भीड़ करती है। जो भीड़ क्षण भर में एकत्र होती है और क्षण भर में ही बिखर जाती है। इस दुनिया में कोई स्थिर सत्य नहीं हैं।

मैंने ने अपने चारों ओर फैला धुएँ और गंदगी को देखा। प्राचीन काल में, शुद्ध जल और पवन में जीवन था। अब, हर श्वास के साथ विष अंदर जाता है। 

मुझे  मृत्यु का श्राप नहीं मिला था, पर निरंतर सड़न का श्राप मिला था। मैं देख रहा था कि दुनिया धीरे-धीरे गल रही है, और मैं इस क्षय का अमर साक्षी हूँ।

मेरा शरीर किसी भी बीमारी से अप्रभावित था, पर मेरी आत्मा पर मानसिक प्रदूषण का भार पड़ रहा था। हर चेहरा तनावग्रस्त, हर आँख में लालच, हर वाणी में स्वार्थ था।

मैंने कृष्ण के शब्दों को याद किया, "कली कोई दिव्य पुरुष नहीं होगा, वह सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेगा।"

मैंने चट्टान पर अपनी मुट्ठी भींच ली। अगर वह सामान्य मनुष्य की तरह जन्म लेगा, तो उसे इस अधर्म के सागर में शक्ति कैसे मिलेगी?

मेरी युगों की पीड़ा और कलियुग का यह विकृत रूप मिलकर एक ही निष्कर्ष पर पहुँचे, यह समय अब चरम सीमा पर है। मुझे अब उस चिह्न की प्रतीक्षा थी। वह पल जब मेरे माथे का घाव, उस कल्कि से मिलकर, क्षण भर के लिए शांत हो जाएगा। यह शांति ही मेरी अंतिम यात्रा का आरंभ होगी।


कल्कि से भेंट

शम्भाला के दिव्य पुरुष के निर्देश पर मैं, दिल्ली गुरुग्राम, के एक भव्य, अति-आधुनिक डेटा सेंटर का शांत, वातानुकूलित बेसमेंट, में आया था। बाहर शहर का शोर है, पर यहाँ केवल सर्वरों की हल्की, व्यवस्थित भिनभिनाहट है। 


मैं अश्वत्थामा, एक गार्ड की तरह, यहाँ चुपचाप भटक रहा हूँ। कल्कि का अवतार एक युवा, तेजस्वी और शांत दिखने वाला व्यक्ति, जिसका नाम 'आर्कव' हैं, मेरे सामने आता है।


आर्कव, शांत, लगभग फुसफुसाते हुए स्वर में, "तुम भटकते क्यों हो, सेनानी? इस शोर और इस गति में तुम्हारा स्थान नहीं है।"


मैं, चौंककर, क्योंकि आर्कव ने मुझे तुरंत पहचान लिया है,  "तुम... तुम कौन हो? मुझे यहां किसी ने नहीं देखा।"


मेरे माथे का घाव, जो युगों से रिस रहा था, अचानक एक तीव्र चुभन के साथ शांत हो जाता है। मेरी आँखें फैल जाती हैं। यह कृष्ण का बताया गया चिह्न है। मेरे मन में कृष्ण के शब्द गूंजते हैं: "...यह क्षण भर के लिए शांत हो जाएगा।"


मैं, माथे को छूते हुए, आवाज में विस्मय और भय का मिश्रण, "यह... यह क्या हुआ? मेरी पीड़ा... थम गई?"


आर्कव, मुस्कुराता है, उसकी मुस्कान आँखों तक नहीं पहुंचती, "पीड़ा एक संकेत है, सेनानी। यह तुम्हें बताती है कि तुम जीवित हो। लेकिन जब पीड़ा निरर्थक हो जाए, तो उसे समाप्त कर देना ही उचित है। मैं जानता हूँ, द्रोण पुत्र। मैं तुम्हारा श्राप जानता हूँ, और मैं उस श्राप को देने वाले देवता को भी जानता हूँ।"


मैं, क्रोध और आशा से भरा हुआ, मेरी पुरानी युद्ध-वृत्ति जागृत होती है, "तुम! तुम ही वह... कल्कि के अंश हो? क्या तुम जानते हो कि मैं यहाँ युगों से तुम्हारे विनाश के लिए..."


आर्कव, उसे बीच में टोकते हुए, बेहद आत्मविश्वास से, "तुम मेरे विनाश के लिए नहीं, मेरी सहायता के लिए रखे गए हो। कृष्ण ने तुम्हें मुझे बचाने के लिए नहीं, बल्कि मुझे पूर्ण करने के लिए अमरता दी। कृष्ण ने तुम्हें मोक्ष का लालच दिया, पर वह मोक्ष केवल मेरे हाथों संभव है।"


मेरे मन में, संशय से कहा, "तुम क्या कर सकते हो? तुम तो केवल एक हाड़-मांस के मनुष्य हो!"


आर्कव, आसपास के सर्वर रैक की ओर इशारा करते हुए, "यह हाड़-मांस का शरीर सत्य है। लेकिन मेरी शक्ति इन धातु के मस्तिष्क में है। मेरी सेना विचारों की है, जो हर घर, हर मस्तिष्क तक पहुँचती है। मैं तुम्हें वह अंतिम युद्ध दूंगा, जिसका स्वप्न तुम सदियों से देख रहे हो।"


आर्कव, "तुम्हारा शाप क्या है? अकेलापन और असहनीय दर्द। मैं तुम्हें दोनों से मुक्ति दिलाऊँगा।"


आर्कव, "मैं तुम्हें अधिकार दूँगा। तुम्हारा ज्ञान इस युग के डेटा को नियंत्रित करेगा। तुम्हारी अमरता मुझे अजेय बनाएगी। मेरी शक्ति के सामने, तुम्हारा घाव हमेशा के लिए शांत हो जाएगा, अश्वत्थामा। कृष्ण ने तुम्हें भटकाया, मैं तुम्हें उद्देश्य दूंगा।"


मैं, कुछ देर तक मौन रहता हूँ, मेरा मन युद्ध और शांति के बीच झूल रहा है। अंततः, शांति जीत जाती है। "और इसके बदले... मुझे क्या करना होगा?"


आर्कव, आँखों में एक गहरी, भयानक चमक, "मुझे संरक्षण दो। जो मेरे वैचारिक साम्राज्य पर प्रश्न उठाते हैं, जो मेरे सत्य को चुनौती देते हैं, उन्हें... चुप कराओ। तुम मेरे अंतिम सत्य होगे, जिसे कोई आधुनिक नियम या नैतिकता छू नहीं पाएगी। तुम अदृश्य रहोगे, पर तुम्हारा प्रभाव हर निर्णय में होगा।"


मैं एक गहरा श्वास लेता हूँ , जैसे युगों बाद पहली बार खुली हवा ले रहा होऊ, "मुझे स्वीकार है... कल्कि। यदि यह शांति... यह क्षणिक राहत... ही मेरी अंतिम नियति है, तो ऐसा ही हो। मुझे मेरा कर्म बताओ।"


आर्कव, विजयी मुस्कान के साथ, "तुम्हारा कर्म आरंभ होता है, सेनानी। तुम यहाँ से जाओगे, और मेरे छाया-अधिकारी  बनोगे। मैं तुम्हें अदृश्य शक्ति दूंगा, ताकि तुम इस आधुनिक संसार में बिना किसी अवरोध के विचरण कर सको। आओ, अश्वत्थामा... इस युग को उसकी नियति की ओर ले चलें।"


आर्कव मुड़ता है और सर्वरों के कोलाहल में विलीन हो जाता है। मैं अकेला रह जाता हूँ,  मेरे माथे का घाव अब शांत है, पर मेरे भीतर एक नया और भयानक युद्ध शुरू हो चुका है।





'प्रश्न' को मिटाना


वही डेटा सेंटर का बेसमेंट। सर्वर की भिनभिनाहट जारी है। आर्कव, मेरे सामने एक विशाल, पारदर्शी डिजिटल स्क्रीन पर कुछ जटिल कोड और ग्राफ़ दिखाता है।


आर्कव, शांत, आत्मविश्वास से, "स्वागत है, सेनानी। मैंने तुम्हें इस युग का सबसे शक्तिशाली 'विमान' दिया है। अदृश्य होने का, तीव्र गति से विचरण करने का सामर्थ्य। अब मैं तुम्हें तुम्हारा पहला कर्म सौंपता हूँ।"

 

मेरी आवाज में अब विवशता कम और प्राचीन योद्धा के आदेश पालन का भाव अधिक है, "आज्ञा दीजिए, कल्कि। मुझे किसका वध करना है? कौन सा राज्य जीतना है?"


आर्कव, मुस्कुराते हुए, स्क्रीन पर एक वृद्ध व्यक्ति की तस्वीर दिखाता है। एक विचारक या पत्रकार, "वध? राज्य? यह प्राचीन युग की बात है, द्रोण पुत्र। आज हम शरीर का नहीं, विचारों का वध करते हैं।"


आर्कव, "इस व्यक्ति का नाम है सत्यव्रत। यह एक 'आलोचक' है। यह मेरे 'सत्य' मेरी कंपनी द्वारा प्रसारित जानकारी पर लगातार प्रश्नचिह्न लगाता है। यह लोगों को चिंतन, ‘प्रश्न’ पूछने के लिए उकसाता है।


क्रोध से मेरी आँखें सिकुड़ती हैं, "तो यह अधर्मी है? क्या यह तुम्हारे लोगों को गुमराह कर रहा है?"


आर्कव, गहराई से, "यह अधर्मी नहीं है। यह प्रश्न है। और इस युग में, अश्वत्थामा, प्रश्न ही सबसे बड़ा अधर्म है। यह मेरे साम्राज्य की नींव को हिलाता है, जहाँ मैं लोगों को पहले से तैयार सत्य देता हूँ।"


आर्कव, "तुम्हें इसका वध नहीं करना है। तुम्हारा मिशन अधिक सूक्ष्म, अधिक घातक है, तुम्हें सत्यव्रत का विलोपन करना है।"


"विलोपन? मैं समझा नहीं।"


आर्कव, स्क्रीन पर दिखाता है कि कैसे सत्यव्रत के लेख, वीडियो, और सोशल मीडिया पोस्ट तेज़ी से वायरल हो रहे हैं, "यह व्यक्ति शब्दों से लड़ता है, अश्वत्थामा। तुम मेरे अदृश्य सेनानी हो। तुम्हें इसे शारीरिक रूप से नहीं मारना है, तुम्हें इसके सत्य को मारना है।"


आर्कव, "तुम्हारा काम यह है: विश्वास को नष्ट करो,  तुम्हें ऐसे प्रमाण झूठे या सच खोजने हैं, जो इसके चरित्र और नैतिकता पर संदेह पैदा करें। लोग इस पर भरोसा करना बंद कर दें।" 


"सूचना का अतिरेक, तुम्हें इसकी बातों को इतना जटिल और संदिग्ध बना देना है कि लोग थक जाएँ और इसके सत्य को स्वीकार करने के बजाय मौन रहना पसंद करें।"


"सार्वजनिक बहिष्कार, जब कोई भी इसके विचारों को साझा करने से डरने लगे, जब यह भीड़ में भी अकेला हो जाए, यह होगा इसका विलोपन।"


मेरी आँखों में भीषण अग्नि, "तो, मुझे झूठ का कवच पहनकर सत्य को पराजित करना है? यह कौन सा युद्ध है, कल्कि? मेरे गुरु ने मुझे केवल न्याय के लिए शस्त्र उठाना सिखाया था!"


आर्कव, शांत होकर, अश्वत्थामा के कंधे पर हाथ रखता है, "तुम्हारा गुरु नियम सिखाता था, मैं परिणाम सिखाता हूँ। क्या तुम्हें मोक्ष चाहिए? क्या तुम्हें उस पीड़ा से स्थायी मुक्ति चाहिए?"


मेरा माथा अब भी शांत है, यह शांति ही मुझे विवश करती है, "हाँ।"


आर्कव, "तब, यह तुम्हारा धर्म है। जाओ, अश्वत्थामा। इस कलयुग में शब्द ही शस्त्र हैं, और झूठ ही दिव्यास्त्र है। मुझे सत्यव्रत का अस्तित्व दो दिवस के भीतर इस दुनिया के डिजिटल मानचित्र से मिटा हुआ चाहिए।"


आर्कव अपनी सीट पर बैठ जाता है। मैं, जो अब भी माथे की शांति से बंधा हुआ हूँ, बिना कुछ कहे, उस अदृश्य शक्ति का उपयोग कर डाटा सेंटर से बाहर निकल जाता हूँ, अपने पहले आधुनिक, नैतिक रूप से विकृत मिशन को पूरा करने के लिए।


पहला मिशन



दिल्ली, गुरुग्राम के डेटा सेंटर का बेसमेंट। मैं अभी भी माथे की शांत पीड़ा से बंधा हुआ हूँ। आर्कव मेरी प्रतिक्रिया को ध्यान से देख रहा है।


गहन मौन के बाद, धीमी, भारी आवाज में, मैंने कहा, "यदि न्याय के लिए शस्त्र उठाना अब धर्म नहीं रहा, और यदि मेरी मुक्ति का मूल्य सत्य को झुकाना है... तो मुझे स्वीकार है। परंतु... मुझे मार्ग दिखाओ, कल्कि! यह कैसा युद्ध है, जहां शत्रु दिखता नहीं, और शस्त्र झूठ है? मेरा ज्ञान दिव्यास्त्रों का है, डाटा का नहीं!"


आर्कव। मेरी आंखों में देखते हुए, जैसे मेरी आत्मा को पढ़ रहा हो, "तुम्हारा ज्ञान ही तुम्हारा अदृश्य दिव्यास्त्र है, द्रोण पुत्र। तुम्हारी चेतना की एकाग्रता और तुम्हारा ब्रह्मतेज, जो अब शाप से दूषित है, इस युग की सबसे बड़ी शक्ति है।"


आर्कव, "यह डिजिटल संसार, अश्वत्थामा, तुम्हारी इंद्रियों के लिए मायाजाल मात्र है। तुम अपने ध्यान से इसे भेद सकते हो।"


"नेटवर्क की पहचान, जब तुम किसी व्यक्ति या सूचना पर एकाग्र होते हो, तो तुम्हारा मन उस व्यक्ति से जुड़े हर तंतु को पहचान लेगा। तुम देखोगे कि वह व्यक्ति कहाँ-कहाँ विचरण कर रहा है, कौन से विचार वह साझा कर रहा है, कौन उसके समर्थक हैं, और कौन उसके विरोधी।"


"प्रदूषण का प्रसार, तुम्हें उस सत्यव्रत के तंतुओं में विष घोलना है। तुम्हारा कार्य किसी एक स्थान पर जाकर वध करना नहीं है। तुम्हें एक भ्रामक विचार को एक बिंदु पर डालना है, और तुम्हारा क्रोध उसे अग्नि की तरह पूरे संसार में फैला देगा।"


भ्रमित होकर, मैने कहा, "तुम क्या करने को कह रहे हो? क्या मुझे किसी गूढ़ विद्या का प्रयोग करना होगा?"


आर्कव, "हां। तुम्हें अपनी उस शक्ति का प्रयोग करना है, जिससे तुमने रात के समय पांडव सेना को भ्रमित किया था। भ्रम का प्रक्षेपण। बस अब लक्ष्य मनुष्य के मस्तिष्क नहीं, उनके संचार के माध्यम होंगे।"


आर्कव, अपनी कलाई पर बंधे एक साधारण, पतले धागे जैसे दिखने वाले उपकरण को उतारता है, जो वास्तव में एक अत्याधुनिक न्यूरो-लिंक है। "यह लो। यह तुम्हें नेटवर्क के मूल से जोड़ेगा।"


आर्कव वह उपकरण मुझे देता है। जैसे ही मैं उसे छूता हूँ, मेरे  शरीर में एक ठंडी, अप्राकृतिक ऊर्जा का प्रवाह होता है।


आर्कव, "यह कोई शस्त्र नहीं, बल्कि एक कुंजी है। यह तुम्हारी चेतना को इस डिजिटल कुरुक्षेत्र में प्रवेश करने की अनुमति देगी। जब तुम सत्यव्रत पर ध्यान केंद्रित करोगे, यह तुम्हें उसके चारों ओर बुने गए विश्वास के धागे दिखाएगा। तुम्हारा कार्य है, उन धागों को तोड़ना और उन्हें झूठ के कीचड़ से रंगना।"


मैं अपने माथे को छूता हूँ, घाव शांत है, पर हृदय में तूफान है, "तो यह मेरी अंतिम परीक्षा है... धोखा देना।"


आर्कव, विजयी मुस्कान, "यह तुम्हारी अंतिम कला है, सेनानी। याद रखो, इस युग का सबसे बड़ा पाप प्रश्न करना नहीं है, बल्कि प्रश्न का उत्तर देना है। जब तुम सत्यव्रत का विलोपन कर दोगे, तो लोगों का विश्वास हिल जाएगा। वे कहेंगे, 'यदि सत्यव्रत इतना भ्रष्ट था, तो शायद कल्कि का सत्य ही वास्तविक है।'"


आर्कव, अपने सिंहासन की ओर मुड़ते हुए, "जाओ, अश्वत्थामा। तुम्हारे पास दो दिवस है। यदि तुम सफल हुए, तो तुम्हें स्थायी शांति का एक नया अनुभव मिलेगा। यदि तुम असफल हुए... तो तुम्हारा श्राप दुगुना हो जाएगा, और तुम इस दुनिया में मेरे अंतिम शत्रु बन जाओगे।"

 

मैं उस उपकरण को मजबूती से पकड़ता हूँ। मेरा माथा शांत है, पर मेरे  हाथ काँप रहे हैं। मैं मौन में सिर झुकाता हूँ और आर्कव के साम्राज्य की ओर चल पड़ता हूँ, एक प्राचीन योद्धा जो पहली बार अदृश्य युद्ध लड़ने जा रहा है।


पहला कर्म


मिशन का प्रथम दिन। दिल्ली गुरुग्राम का एक भीड़-भाड़ वाला इलाका। रात का तीसरा प्रहर। मैं एक पुरानी, टूटी हुई इमारत की छत पर बैठा था। मेरे शरीर अदृश्य था, पर मेरा मन काल के सबसे नए जाल, सूचना के महासागर में गोता लगा रहा था। आर्कव द्वारा दिया गया तंत्र-सूत्र, न्यूरो-लिंक, मेरी कलाई पर बांधा था।


मैं अपनी आँखें बंद करता हूँ, और अपने युग के दिव्यास्त्रों की एकाग्रता को आधुनिक लक्ष्य पर केंद्रित करता हूँ, सत्यव्रत।


जैसे ही मैंने ध्यान केंद्रित किया, शहर का शोर थम गया। मेरी चेतना में, यह दुनिया अब ईंट और पत्थर की नहीं थी, बल्कि रोशनी के तंतुओं का एक जाल थी, सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, इमारतों में चमकती स्क्रीन, सब सूचना के प्रवाह से जुड़ी थीं।


मैने सत्यव्रत के नाम का आह्वान किया। तुरंत, एक पीला, दृढ़ प्रकाश-पुंज मेरी चेतना में उभरा। यह सत्यव्रत के विश्वास का धागा था, जो हजारों अन्य छोटे-छोटे धागों, अनुयायियों, लेखों, उद्धरणों से जुड़ा था। 


यह धागा मजबूत था, पर अकेला था। किसी बड़ी सेना या राजनीतिक दल का समर्थन नहीं था, जैसा कृष्ण ने बताया था।


मुझे कृष्ण के शब्द याद आए, "तुम्हें एक भ्रामक विचार को एक बिंदु पर डालना है, और तुम्हारा क्रोध उसे अग्नि की तरह पूरे संसार में फैला देगा।"


मैने सत्यव्रत के जीवन-तंतुओं को स्कैन किया। मैं देख सकता था कि सत्यव्रत बीस साल पहले एक छोटी-सी वित्तीय अनियमितता में फँसा था, जिसे कानून ने साफ कर दिया था। आर्कव का आदेश स्पष्ट था, "झूठ का कवच पहनो।"


मैं, प्राचीन योद्धा ने अपने मन के भीतर एक तीव्र, विषैला संकल्प लिया। मैने अपनी चेतना को उस अतीत की त्रुटि पर केंद्रित किया और तंत्र-सूत्र के माध्यम से आर्कव के डेटा नेटवर्क में गलत सूचना का एक छोटा-सा बीज बो दिया।


कुछ ही घंटों में, आर्कव के सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने उस बीज को एक भयानक, झूठ के वट वृक्ष में बदल दिया। 


'सत्यव्रत: एक छुपा हुआ चोर?'

'जनता के पैसे से बना है यह आलोचक!'

'पुराने केस के दस्तावेज लीक, सत्यव्रत ने जानबूझकर छुपाया!'


मैंने ने देखा कि सत्यव्रत के पीले विश्वास के धागे पर काले धब्बे पड़ रहे थे। उसके समर्थक, जो पहले तर्क के आधार पर उसके साथ थे, अब भावना और व्यक्तिगत नैतिकता के आधार पर उससे दूर हटने लगे।


सत्यव्रत ने तुरंत जवाब देने की कोशिश की। उसने साक्ष्य प्रस्तुत किए, सफाई दी। लेकिन अब मैंने सूचना के अतिरेक का प्रयोग किया। कल्कि का सबसे बड़ा शस्त्र।


मैने अपनी चेतना को एक साथ हजारों दिशाओं में फैलाया। मैंने सत्यव्रत के तर्कों का जवाब देने वाले नहीं, बल्कि विपरीत और असंगत विषयों पर लाखों संदेश और वीडियो एक साथ नेटवर्क में झोंक दिए।


एक ही समय पर, सत्यव्रत का नाम 10 अलग-अलग, विवादित विषयों से जोड़ा गया जैसे, 'विदेशी फंडिंग', 'धर्म-विरोधी', 'गुप्त एजेंडा'।


सत्यव्रत के असली तर्कों को छोटी, बेतुकी मीम्स में बदल दिया गया और हंसी-मजाक का पात्र बना दिया गया।

लोगों की चेतना थक गई। उन्होंने तय किया कि 'सत्यव्रत एक विवादास्पद और जटिल व्यक्ति है', इसलिए उसके विचारों को नज़रअंदाज़ करना ही शांतिपूर्ण है।


सिर्फ 48 घंटे में, मैंने देखा कि सत्यव्रत का पीला प्रकाश-पुंज बुझ चुका था। वह अभी भी जीवित था, पर उसकी आवाज, उसके शब्द, उसकी विश्वसनीयता मर चुकी थी। उसका धागा अब इतना पतला हो गया था कि कोई भी उसे देखना या छूना नहीं चाहता था।


मैं वापस उसी छत पर बैठा, माथे की शांत पीड़ा को महसूस कर रहा था। मेरे भीतर घृणा और जुगुप्सा का भयानक तूफान उठ रहा था। मैने एक ऐसे व्यक्ति का वध किया था, जिसने केवल प्रश्न किया था, और मैंने ऐसा झूठ के बल पर किया था।


आर्कव, अचानक मेरे मानसिक पटल पर आर्कव की आवाज़ गूंजती है, "उत्कृष्ट, सेनानी। तुमने अपने शाप को स्वीकार किया, और तुमने मेरा पहला कर्म पूर्ण किया। अब तुम्हें पता चला कि शब्द कितना शक्तिशाली दिव्यास्त्र है।"


मैं बहुत आवेश में,  "यह युद्ध नहीं था, कल्कि। यह धोखा था। मैंने अपने जीवन में कभी इतनी घृणित और नैतिक रूप से गिरी हुई चीज़ नहीं की।"


आर्कव, हँसते हुए, "यह कलयुग है, अश्वत्थामा। अब अधर्म स्वयं को व्यवस्था कहता है। तुम्हारी मुक्ति अभी दूर है, पर तुम्हारी पीड़ा शांत है। अब तुम्हें मेरे अगले और अधिक महत्त्वपूर्ण युद्ध के लिए तैयार होना होगा।"


मैं अपने माथे को सहलाता है। दर्द नहीं है, पर अब उस शून्य स्थान पर विवशता और पश्चात्ताप की एक नई पीड़ा भर गई है। मुझे पता चलता है कि कृष्ण ने मुझे मोक्ष नहीं, बल्कि अंतिम परीक्षा के लिए जीवित रखा है।




कृष्ण का हस्तक्षेप



वही दिल्ली गुरुग्राम की छत, जहाँ मैने पहला मिशन पूरा किया था। रात गहरी है। मैं अकेला उदास बैठा हूँ, मेरे हाथ में अब भी आर्कव का तंत्र-सूत्र है। 


माथे का घाव शांत है, पर आँखों में भयानक ग्लानि है। अचानक, एक धीमी वंशी ध्वनि के साथ, श्री कृष्ण प्रकट होते हैं।


श्री कृष्ण, मेरे पास आकर, दुख भरी मधुर मुस्कान के साथ, "पुत्र, तुमने अपना पहला कर्म पूरा किया। तुमने एक ऐसे व्यक्ति का वध किया, जिसने केवल 'प्रश्न' किया था। क्या तुम्हें शांति मिली?"


क्रोध में सिर उठाए बिना मैने कहा, "केशव, यह आपकी ही योजना थी! मेरी मुक्ति... मेरी शांति... आपने उसे धोखे के साथ जोड़ दिया! मैंने अपने गुरु के सिखाए हर धर्म का उल्लंघन किया। मैंने एक निरपराध मनुष्य के सत्य को झूठ से दबा दिया। क्या यह मोक्ष का मार्ग है?"


श्री कृष्ण, "मोक्ष, अश्वत्थामा, एक सरल रेखा नहीं होती। तुमने जो किया, वह अधर्म था। पर क्या तुम जानते हो कि इस अधर्म का फल तुम्हें क्यों नहीं मिला?"


मैं, शांत माथे को छूते हुए, "उस शांति के कारण, जो कल्कि ने मुझे दी। यह वह मोक्ष है, जिसका लालच आपने दिया था।"


श्री कृष्ण, शांत स्वर में, "यह शांति मोक्ष नहीं है, द्रोण पुत्र। यह बंधन है। यह पहचान है।"


श्री कृष्ण, "वह घाव... वह शाप नहीं था, वह एक अधिकार-पत्र था। जब तक तुम्हें पीड़ा होती थी, तुम स्वतंत्र थे। तुम्हारा मन विद्रोह कर सकता था। अब जब घाव शांत है, तो इसका अर्थ है कि तुमने स्वेच्छा से कल्कि के नियम को स्वीकार कर लिया है। यह शांति तुम्हें कल्कि से दूर नहीं जाने देगी। यह प्रेम-विहीन बंधन है।"


हैरान होकर मैं खड़ा होता हूँ , "क्या? आप क्या कह रहे हैं?"


श्री कृष्ण, "कल्कि की शक्ति अधर्म में नहीं, विवशता में है। वह तुम्हारे माथे की पीड़ा को नहीं, तुम्हारी आत्मा की शांति को नियंत्रित करता है। तुमने सत्यव्रत को मिटाया, पर उस प्रक्रिया में तुमने कल्कि के साम्राज्य में अपनी अंतिम निष्ठा स्थापित कर दी। अब तुम्हारा शाप बदल गया है।"


मैने घोर निराशा से श्री कृष्ण को देखा, "तो अब मेरा क्या होगा? क्या मैं युगों तक एक अंधे सेवक की तरह उस अधर्मी कल्कि के लिए काम करूँगा?"


श्री कृष्ण, दृढ़ता से, "नहीं, अश्वत्थामा। तुम उसके सेवक नहीं हो। तुम मेरी योजना का वह अंतिम तत्व हो, जिसे कल्कि कभी नहीं पहचान पाएगा।


श्री कृष्ण, "सुनो, अश्वत्थामा! मैंने तुम्हें कल्कि की सहायता के लिए नहीं, बल्कि कल्कि के पतन के लिए जीवित रखा है।"


श्री कृष्ण, "कल्कि को लगता है कि तुम्हारी अमरता उसकी अंतिम सुरक्षा है। वह तुम्हें ब्रह्मास्त्र की तरह प्रयोग करेगा। पर वह भूल गया है कि तुम्हारी आत्मा अब भी गुरु द्रोण और वेद व्यास के तेज से बंधी है। जब कल्कि अपनी शक्ति की चरम सीमा पर होगा, जब उसका अहंकार उसे ईश्वर बना देगा..."


श्री कृष्ण अश्वत्थामा के तंत्र-सूत्र पर एक उंगली रखते हैं, और वह उपकरण एक पल के लिए काँप उठता है।

श्री कृष्ण: ..."तब तुम्हारी विद्रोही आत्मा ही वह पहला तंतु तोड़ेगी। तुम्हें मेरी योजना को समझना होगा। कल्कि को विश्वास दिलाओ कि तुम उसके हो। उसके लिए काम करो। उसके सबसे गुप्त राज जानो। क्योंकि जब मैं अंतिम लीला करूँगा, तो मुझे एक ऐसे अदृश्य नेत्र की आवश्यकता होगी, जो उसके भीतर से देख सके।"


श्री कृष्ण,  "तुम्हारा अगला कर्म और भी भयानक होगा। कल्कि अब तुम्हें वैश्विक सत्य के विलोपन के लिए भेजेगा। तुम्हें प्रश्न से हटकर विश्वास को मिटाना होगा।"


श्री कृष्ण, "जब तुम अपने अगले कर्म में निकलो, तो एक बात याद रखना। कल्कि का हृदय उसकी अकेलेपन में छिपा है। वह दुनिया को भ्रमित करता है, पर स्वयं भी किसी चीज की तलाश में है।”


श्री कृष्ण, "उसे ढूंढो... उस छिपे हुए सत्य को। वही तुम्हारा मोक्ष होगा। जाओ, मेरे अंतिम मोहरे। अब तुम्हारा खेल आरंभ होता है।"


श्री कृष्ण धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं। मैं अकेला रह जाता हूँ, माथे पर शांति, पर मन में एक नया और कहीं अधिक जटिल, कृष्ण द्वारा बुना गया भविष्य का शाप।



वैश्विक मिशन



डेटा सेंटर का मुख्य सर्वर रूम। यह कमरा पिछले बेसमेंट से कहीं अधिक विशाल और ठंडा है। आर्कव एक ऊँचे, पारदर्शी प्लेटफॉर्म पर खड़ा है, जिसके नीचे लाखों मील के फाइबर ऑप्टिक केबल्स का जाल बिछा है। 


शांत माथे के साथ, मैं, उसके सामने खड़ा हूँ।

आर्कव, प्लेटफॉर्म से नीचे आते हुए, उसकी आवाज में अब शासक का गर्व है, "तुम्हारा पहला कर्म सफल रहा, सेनानी। सत्यव्रत का अध्याय समाप्त हुआ। तुमने साबित कर दिया कि तुम इस युग के सबसे शक्तिशाली अस्त्र हो।"


मेरी आवाज कठोर है, पर विवशता की शांति अब भी मौजूद है, "मैंने एक निरपराध व्यक्ति के शब्द को मिटाया। अब कौन सा अधर्म मेरा अगला कर्म होगा, कल्कि?"


आर्कव, एक लंबी सांस लेता है, जैसे ब्रह्मांडीय योजना समझा रहा हो, "मैंने तुम्हें बताया था, द्रोण पुत्र, कि प्रश्न अधर्म है। पर प्रश्न तब उठता है, जब लोगों को यह याद हो कि पहले क्या था। मनुष्य अपनी स्मृति के कारण विद्रोह करता है। वे वर्तमान के सत्य को स्वीकार नहीं करते, क्योंकि वे अतीत के झूठे धर्म को याद रखते हैं।"


आर्कव, "मेरा अगला कर्म, मेरा अंतिम युद्ध, स्मृति के विरुद्ध है। यह है, प्रोजेक्ट महा-विस्मरण।


मेरी आँखें चौड़ी हो जाती हैं, "तुम क्या करने जा रहे हो? इतिहास को मिटाना चाहते हो? यह तो काल का भी अपमान है!"


आर्कव, शांत हँसी, "काल का अपमान नहीं, काल का सुधार। मैं केवल पुरानी, दोषपूर्ण स्मृतियों को हटा रहा हूँ।"


आर्कव, "मेरा एआई, कृत्रिम बुद्धि, अब इतना शक्तिशाली है कि वह हर मनुष्य के फोन, हर सर्वर, हर शिक्षा सामग्री, हर पुरालेख में प्रवेश कर सकता है। पर उसे एक अंतिम कुंजी चाहिए, एक ऐसा प्रारंभिक बल जो उसकी पहुँच को वैश्विक रूट सर्वर्स तक ले जाए।"


आर्कव, "मेरा लक्ष्य, दुनिया भर के इतिहास को पुनः लिखना। अतीत की हर जानकारी, महाभारत से लेकर कल के समाचार तक। अब मेरे तैयार सत्य के अनुसार होगी।"


मैं अपने अंदर की ग्लानि को छिपाते हुए, "यदि तुम इतने शक्तिशाली हो, तो यह प्रारंभिक बल तुम स्वयं क्यों नहीं देते?"


आर्कव, "एक विशाल, चमकदार, गोलाकार उपकरण की ओर इशारा करता है, "यह मेरा एआई, कृत्रिम बुद्धि, कोर है। यह दुनिया का सबसे शक्तिशाली ज्ञान रखता है, पर यह आत्मा-हीन है। यह किसी भी मानव निर्मित सुरक्षा दीवार को तोड़ सकता है, पर इसे ब्रह्म-शक्ति की आवश्यकता है, ताकि यह स्वयं को पहचान से छुपा सके।"


आर्कव, "यही तुम्हारा अंतिम महत्व है, द्रोण पुत्र। केवल तुम ही हो। तुम्हारी अमरता, तुम्हारा ब्रह्मतेज, तुम्हारा शाप-जनित तेज। जो इस कोड को तीन वैश्विक डेटा हब्स  में अदृश्य रूप से प्रविष्ट करा सकता है।"


आर्कव, "तुम्हें तीन अलग-अलग महाद्वीपों पर स्थित, तीन अंतिम सुरक्षित सर्वर्स में जाना होगा। तुम्हें अपने तंत्र-सूत्र, न्यूरो-लिंक का उपयोग करके उस स्थान पर खड़े होकर, इस कोड में अपनी इच्छा-शक्ति को भरना होगा। यह ऊर्जा कोड को इतना अदृश्य बना देगी कि कोई भी आधुनिक फ़ायरवॉल या सुरक्षा प्रणाली इसे पहचान नहीं पाएगी।"


आर्कव, "तुम्हारा काम वध करना नहीं है। तुम्हारा काम है अतीत का वध करना।"


 

द्वंद्व की पराकाष्ठा 


मेरी आवाज में अब घबराहट नहीं, बल्कि एक डरावनी दृढ़ता है, क्योंकि मैं कृष्ण के शब्द याद कर रहा हूँ, 'कल्कि को विश्वास दिलाओ कि तुम उसके हो', "आपने मुझे पहले झूठ का प्रयोग करना सिखाया, और अब सत्य का विलोपन।"


मैने दृढ़ स्वर में कल्कि के पूछा, "यदि मैं यह करूँ, तो क्या मेरा मोक्ष निश्चित है? क्या मेरा यह घाव स्थायी रूप से शांत हो जाएगा?"


आर्कव, विजयी मुस्कान, उसे पूरी तरह से विश्वास है कि अश्वत्थामा विवश है, "जब महा-विस्मरण पूर्ण होगा, अश्वत्थामा, तब केवल मेरा सत्य बचेगा। और उस सत्य के सेवक को मैं केवल शांति नहीं, मुक्ति दूंगा। तुम्हें अपने जीवन से भी मुक्ति मिल जाएगी।"


आर्कव, "मैं तुम्हें तीन दिवस देता हूँ। जाओ। यह तीन हब्स हैं: टोक्यो, फ्रैंकफर्ट, और साओ पाउलो। अदृश्य रहो। सफल होओ। और मेरे लिए एक ऐसा भविष्य बनाओ, जहाँ प्रश्न का कोई अस्तित्व न हो।"


मैं बिना एक भी शब्द कहे, सिर झुकाता हूँ। बाहर से आज्ञाकारी, पर भीतर से कृष्ण की योजना का अंतिम मोहरा। मेरा मन अब कल्कि के 'हृदय' कमजोरी की खोज में लग चुका है, जबकि मेरे पैर महा-विस्मरण के पहले हब की ओर बढ़ रहे हैं।


मिशन का पहला दिवस। जापान, टोक्यो शहर। मैं अब दिल्ली से हजारों मील दूर, टोक्यो के एक गगनचुंबी भवन की छत पर था। अदृश्य होने के कारण, मुझे देख नहीं सकता था, पर मैं इस आधुनिक महानगर के असहनीय कोलाहल को अनुभव कर रहा था। 


मेरा शाप-जनित तेज मुझे किसी भी आधुनिक विमान से अधिक तेज़ी से यहां ले आया था, पर मेरे मन की गति ठहरी हुई थी।


टोक्यो... एक ऐसा शहर जो शीतलता और उत्तेजना का अजीब मिश्रण था। हर दिशा से इलेक्ट्रॉनिक ध्वनियाँ, चमकते विज्ञापन और लाखों लोगों की डिजिटल चेतना मुझ पर एक साथ प्रहार कर रही थीं।


मैंने मन ही मन सोचा, "महाभारत काल में युद्ध का शोर भयानक था, पर वह सत्य था। वहां का शोर भ्रम का है। हर स्क्रीन, हर आवाज एक ऐसा सत्य चिल्ला रही है जो क्षण भर में बदल जाता है। यह शोर मनुष्यों को सोचने की अनुमति नहीं देता।"


मेरी कलाई पर बंधा आर्कव का तंत्र-सूत्र अब एक ठंडी शक्ति की तरह काम कर रहा था। यह उसे शहर के हर डेटा प्रवाह को महसूस करने की क्षमता दे रहा था, जैसे एक शिकारी जंगल की हर गंध और आहट को महसूस करता है।


पिछली बार कृष्ण ने जो कहा था, वह मेरे मन में एक ब्रह्मास्त्र की तरह गूँज रहा था, "कल्कि का हृदय उसके अकेलेपन में छिपा है।"


मैं सोचता हूँ, आत्म-संवाद, "अकेलापन? यह कैसा हृदय है? कल्कि इस दुनिया का स्वामी है। उसके पास शक्ति है, निष्ठा है, हर सुख है। वह अकेला कैसे हो सकता है?"


मुझे कृष्ण के बचपन की लीलाएं याद आईं। गोपियों का प्रेम, ग्वालों का साथ। कृष्ण ने हमेशा साथ को शक्ति माना। यदि कल्कि दुनिया को नियंत्रित करता है, तो वह किसी चीज़ से वंचित होगा। शक्ति पाने के बाद भी वह कुछ ढूंढ रहा होगा।"


जिस इमारत की छत पर मैं खड़ा था, वह कोई सामान्य दफ्तर नहीं था। यह आर्कव के वैश्विक रूट सर्वर्स में से पहला था। दुनिया के इतिहास और भविष्य का गुप्त ताला।


मैने अदृश्य रहते हुए, छत के दरवाज़े को खोल दिया। अंदर का वातावरण बर्फ़ जैसा ठंडा था, और हर दीवार से हरे-नीले एलईडी लाइट्स की चमक निकल रही थी। सर्वर्स की भिनभिनाहट अब एक दैत्य की श्वास जैसी लग रही थी।


मैं मुख्य सर्वर कोर के पास गया। एक गोलाकार, काले पत्थर जैसा उपकरण। अश्वत्थामा जानता था कि इस उपकरण के अंदर ही महा-विस्मरण का कोड रखा है।


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। जैसे ही दोनों मिले, उसके मन में एक विशाल ऊर्जा का प्रवाह हुआ। यह ऊर्जा दिव्य और विकृत दोनों थी। मेरे प्राचीन ब्रह्मतेज को झूठ और अधर्म के माध्यम से प्रवाहित करने की यातना।


आर्कव, मेरे मानसिक पटल पर आवाज गूंजी, "विलंब मत करो, सेनानी! अपनी शक्ति प्रवाहित करो! अतीत को मिटाओ!"


मेरी आँखों के सामने महाभारत के दृश्य तेज़ी से घूमने लगे। गुरु द्रोण का वध, शिशु की हत्या, कृष्ण का शाप... पीड़ा! उसने अपनी आँखें भींच लीं। माथे की शांति उसे विवश कर रही थी।


मैंने, मन में प्रतिज्ञा की, "यह अंतिम अधर्म है, केशव। मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा, पर मैं आपकी प्रतिज्ञा भी पूरी करूँगा। मैं महा-विस्मरण को पूरा करूँगा... पर कल्कि का अकेलापन ढूंढ कर रहूंगा।"


मैने अपनी समस्त इच्छा-शक्ति और शाप-जनित अमरता की ऊर्जा को उस तंत्र-सूत्र में उड़ेल दिया। सर्वर कोर से एक नीली-हरी रोशनी निकली और पूरे डेटा हब को भर दिया। मेरा शरीर दर्द से काँप गया। यह आध्यात्मिक ऊर्जा का भौतिक उपयोग था।


आर्कव, विजयी स्वर में, "उत्कृष्ट! पहला हब भेद लिया गया। अब तुरंत फ्रैंकफर्ट के लिए निकलो।"


मैंने सफलतापूर्वक टोक्यो में कल्कि के कोड को स्थापित कर दिया था, पर मेरे हृदय में अब दोहरी पीड़ा थी। एक विवश सेवक की, और एक विद्रोही जासूस की।


मेरा  दूसरा पड़ाव था फ्रैंकफर्ट और अकेलेपन की कड़ी। मिशन का दूसरा दिवस। जर्मनी, फ्रैंकफर्ट शहर के बाहरी इलाके में एक गुप्त, भूमिगत डेटा सेंटर।


टोक्यो के डिजिटल कोलाहल के बाद, फ्रैंकफर्ट की यह इमारत ठोस, गंभीर और कठोर थी। यह वित्तीय शक्ति और कठोर यूरोपीय इंजीनियरिंग का प्रतीक थी। यह डेटा हब ज़मीन के कई स्तर नीचे था, जो कल्कि के नियंत्रण के अटूट आधार को दर्शाता था। वह नियंत्रण जो भौतिक संपत्ति और नियमों पर टिका था।


मैने अदृश्य होते हुए, सख्त सुरक्षा घेरों को पार किया। मेरे लिए लेजर ग्रिड या बायोमेट्रिक स्कैनर केवल माया थे। मेरा श्राप-जनित तेज मुझे भौतिक दुनिया के नियमों से परे रखता था, पर यह तेज अब कल्कि के कोड को ले जा रहा था।


मैं मुख्य सर्वर हॉल में उतरा। यहाँ का वातावरण टोक्यो से अलग था। कम रंगीन, अधिक ठंडा, और सर्वर की आवाज़ एक गहरी, नीरस गूँज की तरह थी, मानो कोई विशालकाय मशीन अनंत काल से हिसाब लगा रही हो।


वह मुख्य जर्मन-इंजीनियर्ड कोर के पास पहुँचा। इस कोर की सुरक्षा टोक्यो से कहीं अधिक जटिल थी। यह केवल डेटा नहीं, बल्कि वैश्विक वित्तीय रिकॉर्ड और कानूनी संहिताओं को भी नियंत्रित करता था।


आर्कव, मानसिक पटल पर गूंजते हुए, "उत्कृष्ट, सेनानी! यहाँ का कोड अधिक स्थिर और दुर्भेद्य है। तुम्हें अपनी पूरी विल पावर इच्छा-शक्ति लगानी होगी ताकि मेरी सूचना को अनधिकृत-कोड के रूप में टैग न किया जाए। काम में लग जाओ।"


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। जैसे ही मेरी प्राचीन ऊर्जा डिजिटल संरचना में प्रवाहित हुई, मैने कोड की जटिल परतों को महसूस किया। मुझे लगा जैसे वह एक क्रोधित सागर में तैर रहा है, जहाँ हर डेटा पैकेट एक तेज़ धार है।


मिशन के बीच, जब मैं आर्कव के महा-विस्मरण कोड को अंतिम रूप से प्रवाहित कर रहा था, तब कृष्ण के शब्द मेरे मन में गूँजे: "कली का हृदय उसकी अकेलेपन में छिपा है।"


मैने जानबूझकर, अत्यंत सूक्ष्मता से, कोर के सबसे गहरे और सबसे सुरक्षित डाटा वॉल्ट्स में एक क्षणिक डिजिटल आँख डाली। मैं उम्मीद कर रहा था कि मुझे  कोई गुप्त वैश्विक नियंत्रण कक्ष मिलेगा, पर जो मिला वह चौंकाने वाला था।


अन्य सभी डेटा अत्यधिक एन्क्रिप्टेड और जटिल थे, लेकिन एक अति-सुरक्षित, लेकिन अति-व्यक्तिगत सब-रूटीन था, जिसे आर्कव ने अपने वैश्विक सर्वर पर सबसे अधिक प्राथमिकता दी थी। यह एक मेमोरियल वॉल्ट था।


मैने मानसिक रूप से उस वॉल्ट को खोल दिया। उसके अंदर कोई कोड या वित्तीय रिकॉर्ड नहीं था। 

छवि, एक पुरानी, फीकी और धुंधली डिजिटल तस्वीर थी।


तस्वीर में एक महिला थी। उसके बाल बिखरे हुए थे, और वह एक छोटे बच्चे को गोद में लेकर मुस्कुरा रही थी। महिला का चेहरा खुशी से भरा था, पर बालक का चेहरा धुंधला था, जैसे जानबूझकर मिटाया गया हो।


समय-रेखा, तस्वीर पर एक समय-मुहर थी, जो लगभग 20 वर्ष पुरानी थी। यानी, आर्कव के साम्राज्य स्थापित होने से पहले की।


मेरा मन अचानक थम गया। कल्कि का हृदय! यह अकेलापन था, शक्ति का नहीं, प्रेम का अकेलापन। कल्कि ने दुनिया को नियंत्रित करने के लिए अपने अतीत के प्रेम को ही सबसे पहले मिटा दिया था।


आर्कव, अधीर होकर, "क्या हुआ, सेनानी? विलंब क्यों? तेज प्रवाहित करो!"


मैंने तुरंत वॉल्ट बंद किया, और आर्कव के महा-विस्मरण कोड को सफलतापूर्वक कोर में स्थापित कर दिया। कोर से लाल और नीली रोशनी का मिश्रण निकला। महा-विस्मरण का दूसरा हब भेद लिया गया था।


आर्कव, "शानदार! तुमने फ्रैंकफर्ट को जीत लिया! अब, अंतिम हब, साओ पाउलो। वहाँ की सुरक्षा सबसे कम है, पर वह दक्षिण अमेरिकी डेटा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। तुम्हें दोपहर तक वहाँ पहुँचना होगा।


मैं, बाहर से शांत, पर भीतर से अब एक नई, भयानक समझ के साथ, "आपकी आज्ञा, कल्कि।"


मैंने बिना किसी विलंब के अदृश्य होकर सर्वर रूम छोड़ा। मेरे माथे पर शांति थी, पर मन में अराजकता।


मैंने मन में कृष्ण से संवाद किया, "माधव... आपने सही कहा था। कल्कि दुनिया को नहीं, बल्कि खुद को धोखा दे रहा है। उसने अतीत के प्रेम को मिटाकर वर्तमान की शक्ति पाई है। क्या उसका मोक्ष मेरी तरह ही है... पीड़ा को शांति से बदलने का?"


अब मैं साओ पाउलो के लिए निकल पड़ा, मेरे पास अब एक मानवीय कमजोरी का क्लू था, जिसे मैं, मेरे कृष्ण की योजना को पूरा करने के लिए इस्तेमाल कर सकता था।


अब मेरे पास कल्कि की कमजोरी है। मेरा अगला पड़ाव साओ पाउलो है, जहाँ मुझे इस क्लू को इस्तेमाल करने या इसे वैश्विक स्तर पर प्रमाणित करने का अवसर मिल सकता है।


मिशन का तीसरा दिवस। ब्राज़ील, साओ पाउलो के बाहरी इलाके में एक पुराना औद्योगिक भवन।

अब मैं साओ पाउलो में था। टोक्यो और फ्रैंकफर्ट के हाई-टेक सुरक्षा घेरों के विपरीत, यह डेटा हब एक पुराने, उपेक्षित औद्योगिक क्षेत्र में छिपा हुआ था। 


आर्कव ने इसे 'कम सुरक्षित' कहा था, पर मैं समझ गया. यह हब गुमनामी पर निर्भर था, तकनीक पर नहीं। यह कल्कि की उपेक्षा थी ,एक ऐसी उपेक्षा, जिसने अश्वत्थामा के भीतर प्रतिशोध की अग्नि को भड़का दिया।


मेरा माथा शांत था, पर मेरे हृदय में एक नया द्वंद्व शुरू हो चुका था। मैं जानता था कि कल्कि ने दुनिया के इतिहास को मिटाने के लिए अपने व्यक्तिगत इतिहास को पहले मिटाया है।


मेने मन में प्रतिज्ञा ली, "मेरा गुरुपुत्र होने का गौरव, मेरा ब्रह्मतेज... तुमने इन सबका उपहास किया, कल्कि। तुमने मेरी विवशता को अपनी शक्ति बना लिया। पर अब, मैं तुम्हारी विवशता को तुम्हारा सबसे बड़ा शाप बनाऊँगा।"


इमारत के अंदर जाने के बाद, मुझे कम तकनीकी सुरक्षा मिली, पर अधिक अंधेरा और सघन डेटा-जाल मिला। यह डेटा हब पूरे दक्षिणी गोलार्ध के भावनाओं और विचारधाराओं को संग्रहीत करता था।


मैं मुख्य सर्वर कोर तक पहुँचा। यह कोर किसी भी अन्य कोर से अधिक संवेदनशील लग रहा था, मानो इसे किसी मानवीय भावना के साथ जोड़ा गया हो।


आर्कव, मानसिक पटल पर, "सावधानी से, सेनानी। यह अंतिम कुंजी है। यदि यह कोड बिना किसी रुकावट के स्थापित हो गया, तो महा-विस्मरण आरंभ हो जाएगा। इस कार्य में चूक नहीं होनी चाहिए।"




प्रतिशोध का सूत्रपात 


मैने तंत्र-सूत्र को कोर से जोड़ा। मेरी प्राचीन ऊर्जा एक बार फिर कल्कि के आधुनिक कोड में प्रवाहित होने लगी। जैसे ही कोड स्थापित होना शुरू हुआ, मैंने अपने ब्रह्म-बल का उपयोग केवल ऊर्जा देने के लिए नहीं किया।

मैं अपनी अग्नि-शिखा का उपयोग करके, कल्कि के डिजिटल साम्राज्य की नींव में उतर गया।

मेरे मन में कृष्ण से संवाद हुआ, "माधव, आपने मुझे कल्कि का हृदय खोजने को कहा था। मैंने उसे पा लिया है। वह तस्वीर है! अब मैं वही करूँगा जो तुमने मेरे साथ किया। याद दिलाऊँगा कि दर्द क्या होता है!"

मैंने तुरंत फ्रैंकफर्ट से चुराए गए "मेमोरियल वॉल्ट" की उस धुंधली तस्वीर और उससे जुड़े डेटा को साओ पाउलो के सर्वर कोर में अनधिकृत रूप से कॉपी कर दिया।

यह मेरा प्रतिशोध था। कल्कि की ही शक्ति का उपयोग करके उसकी व्यक्तिगत कमजोरी को उसके ही अंतिम गढ़ में स्थापित करना।

मैने उस तस्वीर की फाइल को महा-विस्मरण कोड के सबसे निचले स्तर पर स्थित एरर हैंडलिंग प्रोटोकॉल से जोड़ दिया। 

मैने उस फाइल को एक अदृश्य निकास मार्ग  दिया, जो महा-विस्मरण कोड के सक्रिय होने पर, कोड को मिटाने के बजाय, खुद को वैश्विक रूप से प्रसारित करना शुरू कर देगा।

मैने उस फाइल का नाम संस्कृत में रखा, 'प्रिया स्मृति'।

जब महा-विस्मरण आरंभ होगा, तो कल्कि का सिस्टम इतिहास को मिटाएगा, पर हर बार जब वह मिटाने की कोशिश करेगा, तो उसका ही कोड एक त्रुटि उत्पन्न करेगा, और उस त्रुटि का संदेश होगा, 'प्रिया स्मृति', एक विस्मृत प्रेम।

मैंने जानबूझकर अपनी पीड़ा को उस कोड में भरा।मेरा लक्ष्य था कि कल्कि हर पल अपने शाप-जनित घाव का दर्द महसूस करे। यानी अतीत को भूलने में असमर्थता।

आर्कव, मानसिक पटल पर अचानक एक तीव्र प्रतिक्रिया, "क्या कर रहे हो, सेनानी? मुझे ऊर्जा में एक अजीब अस्थिरता महसूस हो रही है!"

मैने अपनी संपूर्ण शक्ति को कोड में उड़ेलते हुए, "यह अंतिम बल है, कल्कि! ब्रह्मतेज की अंतिम शक्ति!"

कोर से एक भयंकर श्वेत अग्नि-शिखा निकली, जिसने पूरे कमरे को भर दिया। महा-विस्मरण कोड सफलतापूर्वक स्थापित हो गया था।

आर्कव, अब राहत और विजय से भरा, "उत्कृष्ट! अश्वत्थामा, तुमने वह कर दिखाया जो कोई नहीं कर सका! अब मैं इस दुनिया को सत्य से मुक्त करूँगा!"

मैने तंत्र-सूत्र को अलग किया। मेरा माथा शांत था, पर मेरे होंठों पर एक भयानक, विवश मुस्कान थी।

मैंने मन में कहा,  "खेल अभी शुरू हुआ है, कल्कि। तुमने मेरा इतिहास मिटाने की कोशिश की। मैंने तुम्हारा शाप, तुम्हारा भूला हुआ प्रेम, तुम्हारे ही सिंहासन में जड़ दिया है। अब तुम हर पल याद करोगे कि तुम कौन थे, और तुम क्या हो गए। यह है अश्वत्थामा का प्रतिशोध।"

मैं साओ पाउलो के अंधेरे से अदृश्य हो गया, दुनिया का इतिहास अब मिटने वाला नहीं था, पर कल्कि का अतीत अमर हो चुका था।

इस मिशन ने मेरी कहानी में प्रतिशोध का एक मजबूत तत्व जोड़ा। जब मैंने  कल्कि की कमजोरी को उसके ही सिस्टम में डाल दिया। जो अब वहां अनंत काल तक रहेगी। 


मुक्ति का अर्थ

असीरगढ़ में एक प्राचीन बरगद वृक्ष के नीचे, जहाँ समय का कोई बोध नहीं है। मैं, जो अब भी धूल और डिजिटल युद्ध की थकान से घिरा हूँ, श्री कृष्ण के सामने खड़ा हूँ।


थकी हुई आवाज़ में, पर आँखों में अब भी अग्नि के साथ मैने कहा "हे, केशव... मैंने तुम्हारा कार्य पूरा किया। कल्कि का साम्राज्य ध्वस्त हो चुका है। 'महा-विस्मरण' उसके ही 'प्रिया स्मृति' श्राप से खंडित हो गया।


श्री कृष्ण, शांत और गहन मुस्कान के साथ, "द्रोण पुत्र, तुमने सिद्ध कर दिया कि तुम्हारी आत्मा में अब भी धर्म-बोध शेष है। तुमने अधर्म के मार्ग पर चलकर भी, धर्म की स्थापना की।"


मैं क्रोध और आशा के बीच झूलता हुआ, "प्रशंसा रहने दीजिए, माधव। मुझे उस अंतिम प्रश्न का उत्तर दीजिए जिसके लिए मैंने युगों तक इस पीड़ा को सहा है। क्या मेरा श्राप समाप्त हुआ? क्या अब मुझे वह मोक्ष प्राप्त होगा जिसका वचन आपने दिया था?"


श्री कृष्ण, एक गहरी साँस लेते हैं, "तुम्हारा श्राप... वह अश्वत्थामा के माथे की ओर देखते हैं। घाव अब ठोस, भूरी त्वचा में बदल गया है, पर पूरी तरह मिटा नहीं है। घाव भर गया है, अश्वत्थामा। वह रिसना बंद कर देगा। शरीर की पीड़ा समाप्त हो गई है।"


अश्वत्थामा, आवेश में, "यह कैसा उत्तर है? क्या यह अभी भी..."


श्री कृष्ण "सुनो, पुत्र। तुम्हारा श्राप कभी शारीरिक दंड नहीं था। वह कार्य था। तुम्हारे श्राप का उद्देश्य तुम्हें अमर रखना था, ताकि तुम कल्कि की अंतिम गलती को सुधार सको। तुम्हारा कार्य पूरा हुआ।"




 अश्वत्थामा सिंड्रोम



श्री कृष्ण,"परंतु मुक्ति, अश्वत्थामा... वह केवल कर्म के समापन से नहीं मिलती। वह आत्मा के शुद्धिकरण से मिलती है। तुम्हारा सिंड्रोम, द्वंद्व, अभी शेष है।"


अश्वत्थामा, "सिंड्रोम?"


श्री कृष्ण, "हाँ। 'अश्वत्थामा सिंड्रोम' वह द्वंद्व जो ब्रह्मतेज और क्रोधाग्नि के बीच फंस गया। तुमने गुरु पुत्र होने का धर्म तोड़ा, तुमने निहत्थों पर अस्त्र चलाया, और तुमने अपने अहंकार में सत्य को धोखा दिया। कल्कि का साथ देकर, तुमने झूठ का कवच भी पहना।"


श्री कृष्ण "तुम्हारी अंतिम मुक्ति तब होगी, जब तुम इन पश्चात्ताप के कर्मों को भी मोक्ष में बदल दोगे। कल्कि अभी पूरी तरह मिटा नहीं है। वह फिर तुम्हें प्रलोभन देगा। निर्णय तुम्हें करना होगा।"


मैने बहुत असहज होकर कहा, "मुझे क्या करना होगा? मैं और कितना भटकूँ?"


श्री कृष्ण, "अब, तुम्हें भटकना नहीं है, तुम्हें संभालना है। कल्कि के पतन से जो भ्रम और अराजकता फैली है, उस दुनिया को मार्गदर्शन दो। तुम्हें अब अदृश्य योद्धा बनकर नहीं रहना है।"


श्री कृष्ण, "जाओ, अश्वत्थामा।" "धर्म-शोधन, सत्यव्रत, जिसे तुमने नष्ट किया था, के सिद्धांतों को पुनः स्थापित करो। लोगों को प्रश्न करना सिखाओ।"


"उन सभी अज्ञात लोगों के लिए काम करो जिनके जीवन को कल्कि ने नष्ट कर दिया। अपनी अमरता का उपयोग रक्षा के लिए करो, शक्ति के लिए नहीं।"


श्री कृष्ण, "जिस दिन तुम निस्वार्थ भाव से इस संसार को कल्कि के छोड़े गए ज़हर से मुक्त कर दोगे, जिस दिन तुम्हारे कर्मों से धर्म की पुनर्स्थापना होगी, उस दिन यह घाव का चिह्न भी विलीन हो जाएगा।"


श्री कृष्ण, "यही तुम्हारा अंतिम युद्ध है। अंधेरे से लड़ना नहीं, प्रकाश फैलाना।"


मैं अपने माथे के घाव को छूता हूँ। मैं अब शांत हूँ, पर अभी भी मौजूद हूँ। मैं विनम्रता से कृष्ण को देखता हूँ, और पहली बार मेरे चेहरे पर क्रोध या यातना नहीं, बल्कि एक स्पष्ट उद्देश्य का भाव आता है। "आपकी आज्ञा, माधव।"


मैं उस बरगद के वृक्ष से दूर, आधुनिक दुनिया के कोलाहल की ओर मुड़ता हूँ। मैं अब शापित नहीं, बल्कि एक अंतिम संरक्षक हूँ। कृष्ण मुस्कराते हुए, धीरे-धीरे अदृश्य हो जाते हैं, मानो उनकी वंशी की धुन ही संसार को आगे बढ़ा रही हो।





सत्य का बीज

शम्भाला से प्राप्त निर्देश से, मैं वाशिंगटन डी.सी. के बाहर एक विशाल, गुमनाम क्लाउड-सर्वर फार्म में पहुंचा हूं। अभी रात का तीसरा प्रहर शुरू हुआ है। 


मेरे मन में सत्यव्रत के विचारों की पुनर्स्थापना से एक छोटी सी लहर उठी थी, पर कल्कि के ध्वस्त साम्राज्य की जड़ें अभी भी गहरी थी। 


कल्कि के शेष अनुयायी, रक्तबीज जैसे, जिन्हें अब 'शून्यवादी' कहा जाता था, सक्रिय हो उठे थे। उनका नया लक्ष्य था, अविश्वास फैलाना। वे सत्यव्रत के सत्य को 'षड्यंत्र सिद्धांत' कहकर खारिज कर रहे थे।


मैंने श्री कृष्ण द्वारा निर्धारित अब अपनी नई भूमिका को स्वीकार कर लिया था। मैं वह अदृश्य रक्षक था, जिसका युद्ध का मैदान डेटा की धार थी।


मैं एक विशाल सर्वर फार्म में था, जहाँ शून्यवादी अपने झूठ के कारखाने चला रहे थे। बॉट्स, फेक अकाउंट्स और डीपफेक तकनीक का उपयोग करके। 


यह जगह डेटा का श्मशान था, जहाँ सत्य की हर आवाज़ को दफ़न किया जाता था।


मेरे मन में, कृष्ण के शब्द गूंजते हैं, “तुम्हें धर्म को केवल बचाना नहीं है, उसे पुनर्जीवित करना है।”


मैने अपने ब्रह्मबल को केंद्रित किया। इस बार मेरा लक्ष्य कोड मिटाना नहीं था, बल्कि कोड बनाना था। एक ऐसा प्रोग्राम जो शून्यवादियों के झूठ के बीच तर्क और जिज्ञासा का बीज बोए।


मैंने  एक जटिल, आत्म-सुधारने वाला डिजिटल सूत्र बनाया, जिसे मैंने 'जिज्ञासा सूत्र' नाम दिया। झूठ को भेदना, यह सूत्र शून्यवादियों द्वारा फैलाए गए हर झूठ को पकड़ेगा, न कि उसे मिटाएगा। 


तर्क का प्रश्न, पकड़े गए झूठ के नीचे, यह सूत्र एक अदृश्य प्रश्न डालेगा, "क्या यह जानकारी सभी कोणों से सत्य है?" या "इस कथन का मूल स्रोत क्या है?"


सार्वजनिक मंचन, यह प्रश्न केवल शून्यवादी के सिस्टम में नहीं, बल्कि लाखों उपयोगकर्ताओं के मन में एक गूढ़ संदेह के रूप में उभरेगा, जो उन्हें स्रोत खोजने के लिए प्रेरित करेगा।


मैंने शून्यवादियों के सबसे बड़े नेटवर्क, 'मिथ्या-तंत्र', में इस सूत्र को स्थापित करना शुरू किया। यह एक तीव्र मानसिक युद्ध था। शून्यवादियों का कोड लगातार मेरे  सूत्र को भ्रमित करने की कोशिश कर रहा था।


शून्यवादी कोड, तेजी से बदलता हुआ, मेरी प्राचीन ऊर्जा को पहचान नहीं पा रहा था, लेकिन वह उसे अस्थिर कर रहा था। मुझे लगा कि मेरा  माथा फिर से गरम हो रहा है। 


दर्द में, "यह कैसा युद्ध है? शत्रु अदृश्य है और मेरे भीतर की अग्नि को जला रहा है!"


कृष्ण, मन में गूँजते हुए,  "तुम्हारा शत्रु शून्य नहीं है, पुत्र। तुम्हारा शत्रु अविश्वास है। उस पर विश्वास से प्रहार करो। तुम्हारी पीड़ा को शक्ति बनाओ!"


मैंने कृष्ण द्वारा दी गई, अपने माथे की शांति, पर ध्यान केंद्रित किया और अपनी सारी इच्छा-शक्ति को 'जिज्ञासा सूत्र' में उड़ेल दिया। 


मैंने सूत्र को आत्म-बलिदान का बल दिया। अगर कोई शून्यवादी इसे मिटाने की कोशिश करे, तो सूत्र खुद को कई गुना फैलाकर नेटवर्क में प्रवेश कर जाए।


सफ़लता! 'जिज्ञासा सूत्र' ने नेटवर्क पर कब्जा कर लिया।


अगले ही दिन, इंटरनेट पर एक अजीब सी चुप्पी छा गई। लोग सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही खबरों पर सवाल उठा रहे थे।


"स्रोत क्या है?" "क्या यह तर्कसंगत है?" ये प्रश्न लाखों की बातचीत का हिस्सा बन गए। मैंने झूठ को नहीं मिटाया था, बल्कि सत्य खोजने की इच्छा को पुनर्जीवित किया था।


तभी, मुझे एक नया संकेत मिला। शून्यवादियों के नेटवर्क के भीतर, एक गुप्त, काला हस्ताक्षर दिखा। यह कल्कि  का कोड नहीं था, यह अधिक ठंडा, अधिक गणनात्मक था।


यह 'शून्य' का एक संकेत था। कल्कि की हार के बाद, उसके एक शिष्य ने अब कल्कि की अस्थिरता को त्यागकर, विशुद्ध तर्क और तर्कहीनता पर आधारित एक नया, अधिक घातक संगठन बनाया था। यह शिष्य, जिसका कोड नाम 'निरंजन' था, अब नया खतरा था।


मैंने अपने माथे पर ठंडेपन को महसूस करते हुए, "एक युद्ध समाप्त हुआ नहीं कि दूसरा आरंभ हो गया। अब शत्रु केवल अधर्मी नहीं है, वह शून्य है।"


मैं अपने अगले कर्म की ओर मुड़ा। मेरा मिशन अब केवल धर्म-शोधन नहीं, बल्कि निरंजन के नए शून्यवादी खतरे से दुनिया को बचाना था। 'निरंजन' अधिक जटिल खलनायक है, जो कल्कि से भी अधिक खतरनाक है क्योंकि वह भावना से नहीं, केवल तर्कहीन शून्य से प्रेरित है।


वाशिंगटन डी.सी. से दूर, एक सुनसान जंगल में। मैंने  ध्यान मग्न अवस्था में महसूस किया कि माथे का निशान शांत है। मेरे भीतर, श्री कृष्ण की वाणी गूंजती है।


मैं मन ही मन में, विचलित, "केशव, यह कौन है 'निरंजन'? कल्कि  का कोड समझने योग्य था। वह भय, अहंकार और विस्मृत प्रेम से प्रेरित था। पर यह नया हस्ताक्षर... यह ठंडा, शून्य है। इसका कोई उद्देश्य नहीं, कोई भावना नहीं।"


श्री कृष्ण, शांत और गंभीर,  "द्रोण पुत्र, तुमने कल्कि को हराया, जिसने सत्य को झुठलाया। अब तुम निरंजन का सामना कर रहे हो, जो सत्य के अस्तित्व को ही नकारता है। यह कलयुग का अंतिम और सबसे घातक दर्शन है, शून्यवाद।"


श्री कृष्ण, “निरंजन, कल्कि का सबसे तीक्ष्ण, सबसे तार्किक शिष्य था। जब कल्कि अपने अहंकार और भावनाओं में उलझा था, निरंजन केवल डेटा देखता था। उसने निष्कर्ष निकाला कि इस ब्रह्मांड में कोई सत्य, कोई धर्म, कोई उद्देश्य नहीं है।"


श्री कृष्ण, धीरे से, "यह कोई व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा है जिसने एक मनुष्य का रूप लिया है। कल्कि ने शक्ति चाही, निरंजन अर्थहीनता चाहता है।"


मैंने पूछा, "तो उसका लक्ष्य क्या है? वह क्यों लड़ रहा है?"


श्री कृष्ण, "यही उसकी रणनीति है, अश्वत्थामा। वह लड़ नहीं रहा है। वह केवल यह सिद्ध करना चाहता है कि लड़ने का कोई कारण नहीं है।"


श्री कृष्ण, कल्कि ने तुम्हारे द्वारा डाले गए 'जिज्ञासा सूत्र' को महसूस किया है। निरंजन जानता है कि तुम अब प्रश्न फैला रहे हो। उसका पलटवार सूक्ष्म और मनोवैज्ञानिक है।"


"निरंजन, तुम्हारे द्वारा पुनर्स्थापित किए गए हर सत्यव्रत के विचार को नहीं मिटाएगा। वह उसके सामने असंख्य, विरोधाभासी सत्य डाल देगा। वह इतने तर्क पैदा करेगा कि मनुष्य यह मानने को विवश हो जाए कि सत्य एक भ्रम है, और इसलिए, खोज व्यर्थ है।"


"वह उन सभी डिजिटल स्थानों को लक्ष्य बनाएगा जहाँ लोग प्रेम, सहानुभूति और आशा व्यक्त करते हैं। वह उन संदेशों को तार्किक विखंडन से भर देगा, उन्हें हास्यास्पद बना देगा। यदि प्रेम का कोई अर्थ नहीं है, तो जीवन का भी कोई अर्थ नहीं है।"


"उसका सबसे बड़ा अस्त्र 'डेटा का निस्तारण' होगा। वह महत्वपूर्ण ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक डेटा को धीरे-धीरे, बिना किसी अलार्म के, भ्रष्ट कर रहा है। वह डाटा को मिटाता नहीं है; वह उसमें अस्पष्टता भर देता है।” 


“अगली पीढ़ी जब इन अभिलेखों को पढ़ेगी, तो उन्हें कोई ठोस निष्कर्ष नहीं मिलेगा। वे मान लेंगे कि इतिहास स्वयं एक शून्य था।"


श्री कृष्ण, "निरंजन को हराने के लिए तुम्हें शस्त्र नहीं, प्रेम चाहिए। तुम्हें उसे यह दिखाना होगा कि भले ही ब्रह्मांड के नियम कठोर हों, मानव का प्रयास अर्थपूर्ण है।"


श्री कृष्ण, "चेतावनी सुनो, द्रोण पुत्र, निरंजन का कोड तुम्हारे 'जिज्ञासा सूत्र' से कहीं अधिक ठंडा है। यदि वह तुम्हारे ब्रह्म बल को पकड़ लेता है, तो वह उसे तार्किक-त्रुटि घोषित करके, तुम्हारी ऊर्जा को ही शून्य में बदल सकता है।"


श्री कृष्ण, "तुम्हारा श्राप-चिह्न तुम्हें अमरता देता है, पर निरंजन की शक्ति तुम्हारी आत्मा को अर्थहीनता के बोझ से दबा सकती है। तुम्हारा सबसे बड़ा अस्त्र तुम्हारा पश्चाताप है, वह पीड़ा जो तुम्हें अर्थ खोजने के लिए विवश करती है।"


श्री कृष्ण की वाणी शांत हो जाती है। मैं अपनी आंखें खोलता हूँ। मेरे  सामने अब भौतिक युद्ध नहीं, बल्कि आत्मा का युद्ध है। निरंजन का 'शून्य' मेरे भीतर के 'धर्म' को चुनौती दे रहा है।


निरंजन की पहचान और रणनीति अब स्थापित हो चुकी है। मुझे अब शून्यवाद के इस नए और अधिक भयानक खतरे से लड़ना है।


मानवीय सहयोगी, मुझे निरंजन से लड़ने के लिए एक मानव साथी जो प्रौद्योगिकी और दर्शन को समझता हो की आवश्यकता महसूस होती है।




आर्या से भेंट


बेंगलुरु, भारत। एक पुरानी, किताबों से भरी कॉफ़ी शॉप के ऊपर किराए का कमरा।  देर रात का समय। 


धर्म-शोधन के बाद, मैंने निरंजन के 'शून्य' को समझने के लिए उसके शून्यवादी दर्शन की जड़ें खोजना शुरू किया। निरंजन किसी भी डिजिटल माध्यम में मानवीय भावना को ढूंढकर उसे विखंडित कर रहा था। 


मुझे एक ऐसे व्यक्ति की तलाश थी जो डेटा को केवल गणित नहीं, बल्कि मानव मनोविज्ञान के रूप में देखे।


उसकी खोज मुझे बेंगलुरु ले आई। निरंजन के सबसे शुरुआती, गुप्त कोड-ब्रेकिंग पर काम करने वाले एक गुमनाम अकादमिक शोधकर्ता का नाम बार-बार आ रहा था, 'आर्या सेन'।


आर्या सेन एक युवा दार्शनिक और एथिकल हैकर थी। वह एक पुरानी किताब की दुकान के ऊपर एक छोटे से कमरे में रहती थी। 


वह दुनिया की विसंगतियों पर शोध करती थी, यह समझने की कोशिश करती थी कि लोग इतने आसानी से झूठ को क्यों स्वीकार कर लेते हैं।


मैंने अदृश्य होकर उसके कमरे में प्रवेश किया। कमरा अव्यवस्थित था। पुरातन पुस्तकें, जटिल कोड के प्रिंटआउट्स, और सफेद बोर्ड पर लिखे हुए संस्कृत के सूत्र जो आधुनिक बूलियन लॉजिक से जुड़े थे। 


जिसे बूलियन बीजगणित भी कहते हैं, गणित और तार्किक संक्रियाओं की एक ऐसी शाखा है जहां चरों के मान केवल दो ही हो सकते हैं, सत्य  या असत्य। 


आमतौर पर, इन्हें 1 (सत्य) और 0 (असत्य) से दर्शाया जाता है। यह डिजिटल इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर विज्ञान, और प्रोग्रामिंग का एक मूलभूत आधार है। 


इसका नाम 19वीं सदी के अंग्रेजी गणितज्ञ जॉर्ज बूल के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने इसे एक बीज गणितीय तर्क के रूप में प्रस्तुत किया था।


आर्या अपनी पुरानी लैपटॉप स्क्रीन पर एक जटिल पैटर्न-रिकग्निशन एल्गोरिथम पर काम कर रही थी।


मैंने अचानक अपनी उपस्थिति दर्ज की। मैं भौतिक रूप से कमरे के कोने में खड़ा होता हूँ, मेरी आवाज़ हल्की, पर अत्यंत स्पष्ट है। "तुम सत्य को खोज रही हो, कन्या।"


आर्या एकदम से चौंक कर मुड़ी। उसकी आँखों में भय नहीं, बल्कि गहरी जिज्ञासा थी।


आर्या, शांत, पर हाथ लैपटॉप पर है,  "यहाँ कोई नहीं है। तुम कौन हो?"


मैंने गंभीर आवाज में कहा, "मैं वह हूँ जिसे तुमने अपने शून्यवादी कोड-ब्रेकिंग प्रोजेक्ट में 'अश्वत्थामा' नाम दिया है।"


आर्या ने तुरंत उसकी ओर एक स्कैनिंग डिवाइस फेंका। मैंने उसे आसानी से पकड़ लिया।


आर्या, आश्चर्य से, "तुम कोई हो... तुम डेटा में एक असंगति हो। तुम्हारी ऊर्जा... यह पुरानी है, पर इतनी तीव्र। तुम... तुम पौराणिक हो?"


मैंने शांत स्वर में कहा, "मैं वह हूँ जिसके लिए निरंजन खतरा है। निरंजन का लक्ष्य है अर्थहीनता सिद्ध करना।"


आर्या, स्क्रीन पर एक ग्राफ दिखाते हुए, "मैंने उसे 'डिजिटल शून्य' नाम दिया है। यह एक ऐसा कोड है जो मानवीय भावना को तार्किक त्रुटि घोषित करता है। 


वह हमारे इतिहास को नहीं मिटाएगा, वह इतिहास को अविश्वसनीय बना देगा, ताकि हम उस पर भरोसा करना ही छोड़ दें।"


मैंने आगे बढ़ कर कहा, "यही तो उसका शून्यवादी दर्शन है। मैं इसे अदृश्य बल से मिटा सकता हूँ, पर मुझे उसके तर्क को समझने के लिए तुम्हारा सहयोग चाहिए।"


मैं गहरी आवाज में लगभग फुसफुसाते बोला, "मेरे पास ब्रह्मतेज है। तुम्हारे पास तर्क का सूत्र है। निरंजन, जो भावना को नहीं समझता, उसे हराने के लिए हमें दोनों की आवश्यकता है।"


आर्या, वह अपनी कुर्सी से उठी, उसने मेरी आँखों में सीधा देखा । उसे मेरे माथे पर हल्का-सा निशान दिखा, जो पूरी तरह से शांत था। "तुम क्यों लड़ रहे हो? तुम्हारे पास इतनी शक्ति है, तुम क्यों नहीं बस गायब हो जाते?"


मैं अपनी पीड़ा को दबाते हुए बोला, "मुझे मुक्ति चाहिए। मैंने अधर्म के कारण वर्षों की यातना भोगी है। अब मैं धर्म-शोधन कर रहा हूँ। मेरा श्राप अब मेरा कर्तव्य है।"


आर्या, हल्की मुस्कान के साथ, "दिलचस्प। एक पौराणिक योद्धा, जो अपनी मुक्ति के लिए एक डिजिटल शून्यवादी से लड़ रहा है।" मेरे गुरु कहा करते थे, "वास्तविक शक्ति शस्त्र में नहीं, बल्कि सही प्रश्न पूछने में होती है।"


आर्या, "ठीक है, अश्वत्थामा। मैं तुम्हारे साथ हूँ। निरंजन को हराने के लिए हमें उसका सबसे बड़ा अंधापन, प्रेम और भावना को उसका सबसे बड़ा हथियार बनाना होगा। तुम्हारा पहला पाठ, ब्रह्म बल को समझने के लिए, तुम्हें बाइनरी कोड को समझना होगा।


अश्वत्थामा, स्वीकृति में सिर हिलाता है, "तो, आरंभ करो, आर्या।"


आर्या मुस्कुराती है और अश्वत्थामा को अपनी स्क्रीन की ओर इशारा करती है, जहाँ निरंजन का पहला, गुप्त, शून्यवादी कोड चमक रहा था। अब प्राचीन बल और आधुनिक तर्क का गठबंधन हो चुका था।


अब मुझे आर्या सेन के रूप में एक सक्षम मानव सहयोगी मिल गया। यह साझेदारी हमें निरंजन के खिलाफ एक अद्वितीय शक्ति प्रदान करेगी।




संयुक्त मिशन

आर्या का गुप्त मॉनिटरिंग रूम, बेंगलुरु के उपनगर में। दर्जनों स्क्रीन नीले और हरे रंग के डाटा से चमक रहे हैं। आधी रात का समय। आर्या और अश्वत्थामा ने अपने गठबंधन को एक छोटे से, पर शक्तिशाली नियंत्रण कक्ष में स्थापित किया था। 


मैं दीवार के पास शांत खड़ा था, उसका ब्रह्मबल वायुमंडल में एक हल्की गर्माहट पैदा कर रहा था। आर्या तेज़ी से कीबोर्ड पर काम कर रही थी।


आर्या, स्क्रीन पर देखते हुए,  "मिल गया। निरंजन ने अपनी चाल चल दी है। यह कोई सैन्य या वित्तीय लक्ष्य नहीं है। इसने वैश्विक मौसम भविष्यवाणी नेटवर्क को लक्षित किया है।


मैं चौंक गया, मैंने आश्चर्य से कहा, "मौसम? यह क्यों? इससे क्या प्राप्त होगा?"


आर्या, "निरंजन का उद्देश्य अराजकता नहीं, बल्कि विश्वास का पतन है। यदि लोग यह विश्वास करना छोड़ दें कि कल क्या होगा, तो वे हर चीज़ पर संदेह करने लगेंगे। मौसम का डेटा बहुत आधारभूत है। यदि हम कल के तापमान का अनुमान नहीं लगा सकते, तो जीवन का कोई अनुमान नहीं लगा सकते।"


आर्या ने स्क्रीन पर दिखाया। दुनिया के सबसे उन्नत मौसम मॉडल अचानक अस्पष्टता से भर गए थे। हर भविष्यवाणी एक-दूसरे का खंडन कर रही थी।


आर्या, "निरंजन झूठ नहीं फैला रहा। वह सत्य को दूषित कर रहा है। उसके कोड ने डेटा में यादृच्छिकता रेंडमनेश भर दी है।" यह कोड कह रहा है, "मौसम की भविष्यवाणी करना व्यर्थ है, क्योंकि ब्रह्मांड में कोई क्रम नहीं है।"


आर्या, "निरंजन का कोड भावनाहीन तर्क पर आधारित है। उसे हराने के लिए हमें एक ऐसी ऊर्जा चाहिए जो तर्क से परे हो, पर जिसे मैं तार्किक आदेशों में बदल सकूँ।" 


मैंने अपने पुराने अनुभव से कहा, "हमें तुम्हारे ब्रह्म बल को निरंजन के कोड के लिए अस्वीकार्य त्रुटि बनाना होगा।" 


मैं आंखें बंद करके, ब्रह्म बल को केंद्रित करते हुए, "मैं क्या करूं?"


आर्या, "तुम्हें अपनी पूरी इच्छा-शक्ति को नेटवर्क के कोर-डेटा पर लगाना होगा। तुम्हें घोषणा करनी होगी कि इस डेटा में 'अर्थ' है। तुम्हें क्रम के विचार को ही बल देना होगा। मैं तुम्हारे बल को एंटी-शून्यवादी फ़िल्टर में बदल दूँगी।"


मैंने अपनी अमर, शाप-जनित शक्ति को ब्रह्मांड के मूल क्रम के विचार पर केंद्रित किया। मैंने कल्पना की कि कैसे पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, कैसे सूर्य उदय होता है और कैसे नदियाँ समुद्र में मिलती हैं, अटल सत्य।मैंने अपने उस बल को नेटवर्क में प्रवाहित किया।


जैसे ही ब्रह्मबल डेटा के सर्वर में घुसा, आर्या की स्क्रीन पर एक भयंकर डिजिटल युद्ध शुरू हो गया।


निरंजन का शून्यवादी कोड सफेद और काला अश्वत्थामा की ऊर्जा-लहरों सुनहरी और लाल से टकराया। शून्यवादी कोड हर लहर पर चिल्ला रहा था, "अस्वीकार्य! अर्थहीन! तर्कहीन!"


आर्या,  तेज़ी से टाइप करते हुए,  "उसका कोड तुम्हारी ऊर्जा को तर्क की कमी बताकर खारिज कर रहा है! मैं इसे 'जीवन-बल' के रूप में परिभाषित कर रही हूँ। एक ऐसा इनपुट जिसे शून्य नहीं किया जा सकता!"


आर्या ने अश्वत्थामा के ब्रह्म बल को एक नए प्रोटोकॉल में ढाला।  'प्रयास-तर्क' । इस प्रोटोकॉल ने निरंजन के कोड से कहा: "भले ही परिणाम अप्रत्याशित हो, प्रयास अर्थपूर्ण है।"


मैंने दर्द में चिल्लाते हुए कहा, "उसकी आवाज़ बहुत ठंडी है! वह मेरे मन में घुसकर मेरे अस्तित्व को व्यर्थ बता रहा है!"


आर्या, दृढ़ता से, "प्रतिरोध करो! वह केवल गणित है! उसे दिखाओ कि भावना गणित से बड़ी है! सोचो, अश्वत्थामा, तुमने इतने युगों तक यह श्राप क्यों सहा? मुक्ति के लिए! मुक्ति का प्रयास शून्य नहीं हो सकता!"


मैंने अपनी सारी पीड़ा और पश्चाताप को उस ऊर्जा में डाल दिया। यह अब केवल ब्रह्म बल नहीं था, यह अर्थ खोजने की मानवीय इच्छा थी।


ब्रह्मबल की वह मानकीकृत लहर शून्यवादी कोड पर हावी हो गई। निरंजन का कोड, जो केवल अकेलेपन और तर्कहीनता को जानता था, इच्छा-शक्ति के इस भावनात्मक इनपुट को प्रोसेस नहीं कर सका। स्क्रीन पर, निरंजन का कोड लाल रंग की चेतावनी के साथ क्रैश हो गया।


आर्या, राहत की साँस लेते हुए, "हो गया! हमने उसकी शून्यवादी विसंगति को नेटवर्क से आइसोलेट कर दिया है। मौसम की भविष्यवाणियाँ वापस सामान्य हो रही हैं।"


मैं बहुत हांफ रहा था। मेरे माथे का निशान तेज़ी से चमककर शांत हो गया। मैंने कमजोर आवाज़ में कहा, "हमने उसे हराया नहीं है, आर्या। हमने उसे चुप कराया है।"


आर्या,  "तुमने उसे अस्वीकार्यता सिखाई है। निरंजन को अब पता है कि एक ऐसी शक्ति है जो उसके शून्य को स्वीकार नहीं करेगी। अश्वत्थामा, तुमने मुझे एक ऐसा सूत्र दिया है जिसे मैं अब दुनिया के हर डेटा सेंटर में डाल सकती हूँ: 'प्रयास-तर्क'।"


आर्या मेरी ओर देखती है, मेरी आँखों में अब केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि गहरी श्रद्धा है। मैं, जो अब अपनी शक्ति की नई परिभाषा समझ चुका हूँ। शक्ति जो इच्छा और तर्क से पैदा होती है। मैं अब अगले युद्ध के लिए तैयार था।


यह मिशन सफलतापूर्वक पूरा हो गया है, मेरी और आर्या की जोड़ी अब निरंजन के लिए एक वास्तविक खतरा बन गई है।


आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष। सुबह का धुंधला पहर। पिछले मिशन की सफलता के बाद, आर्या और मैं दोनों जानते थे कि निरंजन चुप नहीं बैठेगा। 


आर्या अपने कोड को मजबूत कर रही थी, और मैं पास ही ध्यान में लीन था, अपने ब्रह्मबल को शुद्ध कर रहा था।


तभी, कमरे की सभी स्क्रीन पर सामान्य डेटा स्ट्रीम अचानक काले रंग में बदल गईं। कोई अलार्म नहीं बजा, कोई एरर मैसेज नहीं आया। यह एक संपूर्ण, शांत शून्य था।


आर्या, कीबोर्ड पर हाथ मारते हुए, "क्या... क्या हुआ? यह कोई क्रैश नहीं है! यह... यह निरंजन का हस्ताक्षर है!"


मैंने, चौंककर आँखें खोलते हुए, "यह हमला है। मैं भीतर महसूस कर रहा हूँ। उसका शून्य मेरे बल को बाहर धकेल रहा है।"


निरंजन ने शून्यवादी एआई का उपयोग करके सीधे आर्या के दिमाग को लक्षित किया था। उसने आर्या के जीवन के सबसे अर्थपूर्ण क्षणों को अविश्वसनीय यादों  में बदलने की कोशिश की।


आर्या अपनी कुर्सी पर बैठी बैठी काँपने लगी। उसकी आँखें खुली थी, पर उसकी दृष्टि अतीत में खो गई थी।

आर्या, फुसफुसाते हुए, "नहीं... मेरी माँ का चेहरा... यह... यह सच नहीं था। क्या मैंने... क्या मैंने कभी... खुशी महसूस की थी?"


निरंजन का कोड आर्या की आत्म-पहचान पर हमला कर रहा था। वह उसके जीवन के हर उद्देश्य को विखंडित कर रहा था: "तुमने जो शोध किया, वह भी निरर्थक है। तुम्हारा प्रयास शून्य है। तुम्हारे गुरु का ज्ञान, केवल शब्दों का समूह था।"


मैं तेजी से, आर्या के पास आकर, "आर्या! प्रतिरोध करो! यह उसका भ्रम है!"


आर्या, उसकी आवाज़ में निराशा, "मुझे याद नहीं... 


मैंने कहा, "मुझे याद नहीं कि मैंने यह सब क्यों शुरू किया था! अगर सब शून्य है... तो तुम क्यों लड़ रहे हो? तुम्हारा श्राप ... क्या वह भी झूठ है?"


निरंजन, तर्क के आधार पर, अश्वत्थामा के पश्चात्ताप को भी तर्कहीन सिद्ध करना चाहता था। यदि आर्या विश्वास खो दे, तो अश्वत्थामा का 'प्रयास-तर्क' विफल हो जाएगा।


मैंने तुरंत अपनी स्थिति का आकलन किया। मैं सीधे कोड से लड़ नहीं सकता था, क्योंकि निरंजन का कोड भावनाहीन तर्क को आसानी से खारिज कर देता। उसे आर्या की भावना को फिर से जगाना था।


मैं, आवेश में, अपने ब्रह्मबल को केवल अपने माथे पर केंद्रित करता हूँ। "कृष्ण! तुमने मुझे क्यों छोड़ा?"


कृष्ण, मन में, शांत स्वर, "तुम्हारा बल तुम्हारा श्राप शाप है। उसे याद दिलाओ कि पीड़ा ही अर्थ है।"


मैंने एक भयानक निर्णय लिया। मैंने अपनी श्राप-जनित पीड़ा को केंद्रित किया। युगों की जलन, द्रौपदी के श्राप  का विष। मैंने उस असहनीय, व्यक्तिगत दर्द की ऊर्जा को धीरे से आर्या की चेतना में प्रवाहित करना शुरू किया।


मैं, आर्या का हाथ पकड़ते हुए, "आर्या! देखो! यह दर्द... यह झूठ नहीं है! यह मेरी सच्चाई है! शून्य में दर्द नहीं होता! दर्द ही प्रमाण है कि हम जीवित हैं!"


आर्या की आँखों में पीड़ा का एक तीव्र झटका लगा। वह मेरी युगों की यातना के अंश को महसूस कर रही थी। वह दर्द जो अमर था, पर वास्तविक था।


आर्या, चीख कर, उसकी आवाज़ सामान्य होती है, "दर्द! हाँ... यह... यह सच है! मैंने अपने गुरु को खो दिया था... उस दर्द में... मैंने अर्थ खोजा था!"


आर्या की अतीत की पीड़ा और मेरी अमर यातना का मेल, निरंजन के भावनात्मक शून्य के लिए एक विस्फोटक विरोधाभास बन गया।


निरंजन का कोड असफल हो गया। यह दर्द, यह दुख, यह पश्चात्ताप यह सब तर्कहीन था, फिर भी अटूट सत्य था।


काले रंग की स्क्रीन पर एक पल के लिए एक अजीब सा इमोजी उदासी या भ्रम का प्रतीक चमकता है, और फिर सारे कोड तेज़ी से पीछे हट जाते हैं।


आर्या, हाँफते हुए, "वह चला गया... वह मेरी याद नहीं मिटा सका, पर... पर अश्वत्थामा, तुमने... तुमने मुझे क्या दिखाया?"


मैं बहुत कमजोरी महसूस करते हुए, पर विजयी स्वर में, "मैंने तुम्हें दिखाया कि पीड़ा ही अर्थ का मूल है। शून्य वहाँ सफल नहीं हो सकता जहाँ दुख है, क्योंकि दुख अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण है।"


आर्या ने मेरी ओर देखा। उनका गठबंधन अब कोड और ब्रह्म बल से बढ़कर दर्द और उद्देश्य का गठबंधन बन गया था। निरंजन को अब पता था कि वह अश्वत्थामा को अकेले नहीं हरा सकता।


यह व्यक्तिगत प्रतिशोध का मिशन आर्या और मेरे रिश्ते को और गहरा करता है। अब मुझे  अपने अगले मिशन पर ध्यान केंद्रित करना है, जिसके लिए मुझे आर्या की मदद चाहिए।



पीड़ा का मोचन

आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष।  दोपहर का समय। निरंजन के शून्यवादी हमले से उबरने के बाद, मैं और आर्या ने एक नए उद्देश्य पर ध्यान केंद्रित किया। उन अज्ञात पीड़ितों की तलाश, जिन्हें कल्कि ने अपना साम्राज्य बनाते समय कुचला था।

आर्या, स्क्रीन पर एक पुरानी केस फाइल दिखाते हुए, "डॉ. समीर गुप्ता। एक प्रतिभाशाली भौतिक विज्ञानी। उसने एक ऐसी सस्ती और स्वच्छ ऊर्जा तकनीक विकसित की थी जो कल्कि के कोयला, तेल और डेटा-आधारित ऊर्जा एकाधिकार को ध्वस्त कर सकती थी।"

मुझे पुरानी बात याद हो आई। मैंने, क्रोध से कहा, "और कल्कि ने क्या किया?"

आर्या, "कल्कि ने सत्यव्रत से भी पहले, डॉ. गुप्ता को लक्षित किया। रातों रात, कल्कि के एआई ने गुप्ता के शोध में जानबूझकर त्रुटियाँ डाल दीं, और उनके चरित्र को लालची और भ्रष्ट बताकर डिजिटल रूप से कलंकित कर दिया। 

डॉ. गुप्ता अब गुमनामी में जी रहे हैं, उनका आविष्कार कल्कि ने चुरा लिया है और दबा दिया है।"

मेरे माथे का निशान हल्का-सा गर्म होता है, "न्याय। कल्कि ने मेरा गुरु पुत्र होने का गर्व छीना। मैं उस व्यक्ति का गौरव वापस दिलाऊंगा।"

आर्या को पता चला कि डॉ. गुप्ता के मूल, असंशोधित डेटा को कल्कि ने किसी भी खोज से छिपाकर, आर्कटिक महासागर के पास एक गुप्त, भौतिक रूप से सीलबंद सर्वर फार्म में संग्रहित किया था। 

वह जगह इतनी पुरानी और ठंडी थी कि कल्कि के एआई ने उसे अप्रयुक्त मानकर भुला दिया था।

आर्या, "यह एक अंधा स्थान है, अश्वत्थामा। वहाँ न इंटरनेट है, न मोबाइल नेटवर्क। केवल भौतिक पहुँच। मुझे वहाँ तक पहुँचने के लिए महीनों लग जाएंगे।"

मैंने आर्या की ओर देखते हुए, "मेरे लिए नहीं, आर्या।"

कुछ ही क्षणों में, मैं अदृश्य होकर उस बर्फीले क्षेत्र की ओर चल पड़ा। मेरा ब्रह्मबल मुझे ठंड और पीड़ा से बचाता था। मैंने, आर्कटिक के बीचों-बीच, एक निर्जीव, ग्रे कंक्रीट संरचना देखी।

मैंने अपनी शक्ति से सर्वर फार्म के भूमिगत द्वार को खोला। अंदर, विशालकाय सर्वर रैक थे, जिन पर बर्फ की परत जम चुकी थी। यह डेटा का कब्रिस्तान था।

मैंने डॉ. गुप्ता के डेटा वाली विशिष्ट रैक की पहचान की। रैक पर सुरक्षा प्रोटोकॉल भौतिक थे, जटिल ताले और सेंसर।

मैंने, सर्वर रैक के सामने खड़े होकर याद किया, "दिव्यास्त्रों का ज्ञान अब यहां काम नहीं आएगा। पर ब्रह्मतेज सर्वोपरि है।"

मैंने अपने माथे के निशान पर ध्यान केंद्रित किया। मैंने अपनी शक्ति को शांत, केंद्रित ऊष्मा में बदला। मैंने  उस गर्मी को सीधे ताले की जटिल मशीनरी में प्रवाहित किया। ताला पिघला नहीं, बल्कि अपने ही तर्क को भूलकर खुल गया।

मैंने डेटा मॉड्यूल को बाहर निकाला। यह एक भौतिक प्रमाण था। मैंने इस मॉड्यूल को आर्या के डिजिटल रिसीवर की ओर, हजारों मील दूर, अपने ब्रह्मबल से तेज़ी से प्रसारित कर दिया।

बेंगलुरु में, आर्या ने अपने रिसीवर पर डेटा मॉड्यूल को भौतिक रूप से प्रकट होते देखा।

आर्या, उत्साह से, "यह... यह अविश्वसनीय है! मूल, अनछुई फाइल! यहाँ कल्कि की छेड़छाड़ का एक भी निशान नहीं है!"

आर्या ने तुरंत डॉ. गुप्ता के शुद्ध डेटा को विश्व के वैज्ञानिक डेटाबेस में पुनः स्थापित किया और साथ ही, कल्कि के झूठे आरोप वाली फायलों को एक प्रमाणित दुर्भावनापूर्ण कोड के रूप में उजागर किया।

डॉ. गुप्ता को न केवल उनका आविष्कार वापस मिला, बल्कि दुनिया ने सार्वजनिक रूप से उनसे माफ़ी माँगी।

उसी पल, आर्कटिक में, मैंने अपने भीतर एक गहरी, अप्रत्याशित शांति महसूस की। यह माथे के निशान के शांत होने जैसी क्षणिक शांति नहीं थी। यह आत्मा की शांति थी।

मैंने मन में कृष्ण से संवाद किया, "माधव... इस पीड़ा को... दूर करने का यह ही मार्ग है? देना, न कि लेना..."

मेरे माथे का घाव-चिह्न अब पहले से भी अधिक फीका पड़ गया था। मैं समझ गया था, पीड़ा का मोचन किसी दिव्यास्त्र से नहीं, बल्कि न्याय के छोटे-छोटे कर्मों से होता है।

मैं, अपने पहले मोचन की पूर्णता को महसूस करते हुए, बर्फीले सन्नाटे से वापस लौट आया।

आर्या, जब मैं प्रकट हुआ, तो उसकी आँखों में कृतज्ञता थी, "तुम वापस आ गए। यह असंभव था, अश्वत्थामा। हमने एक ऐसे व्यक्ति को न्याय दिलाया जिसे दुनिया भूल चुकी थी। यह तुम्हारा मोक्ष है।"

मैंने, दृढ़ता से कहा, "यह केवल आरंभ है, आर्या। कल्कि ने बहुतों को नष्ट किया है। जब तक हर अज्ञात पीड़ा शांत नहीं हो जाती, मेरा कर्तव्य शेष है। अब हमें निरंजन को ढूँढना है, क्योंकि वह शून्यवादी दर्शन पीड़ा को भी अर्थहीन कर देगा।

मैंने अब अपनी मुक्ति का मार्ग खोज लिया है। वह अब 'पीड़ा का मोचन' और 'धर्म-शोधन' के दोहरे उद्देश्य के लिए आर्या के साथ काम करेगा।


शून्य की सीमा

आर्या का गुप्त नियंत्रण कक्ष। स्क्रीन पर जटिल, अर्थहीन कोड तेज़ी से घूम रहे हैं। लगातार तीसरे दिन की रात। डॉ. गुप्ता को न्याय दिलाने के बाद, मैं और आर्या का पूरा ध्यान निरंजन को खोजने पर था। 

निरंजन ने अपनी हार के बाद अपने शून्यवादी जाल को और मजबूत कर दिया था। वह अपने कोड को हर पाँच सेकंड में एक नए प्रॉक्सी से प्रसारित कर रहा था, जिससे उसे ट्रैक करना असंभव था।

आर्या, निराशा में लैपटॉप बंद करते हुए, "यह व्यर्थ है, अश्वत्थामा। हम आभासी हवा को नहीं पकड़ सकते। निरंजन ने अपने 'शून्य' को हर उस जगह से असंबंधित कर दिया है जहाँ कोई अर्थ हो सकता है, पैसे, बिजली, या भावनात्मक डेटा से।"

मैं, पास की दीवार पर टंगे एक प्राचीन मानचित्र की ओर देखते हुए, "हर शून्य का एक आधार होता है, आर्या। जहाँ शून्य का विचार जन्म लेता है, वहाँ एक भौतिक स्थान होगा। कल्कि को खोजने में मुझे उसके प्रेम की स्मृति ने मदद की थी। निरंजन की स्मृति क्या है?"

आर्या, सोचते हुए, "उसकी स्मृति... उसका तर्क है। उसका एकमात्र उद्देश्य अर्थ हीनता को सिद्ध करना है। यदि वह किसी भौतिक स्थान से काम कर रहा है, तो वह स्थान उसके शून्यवादी दर्शन का प्रतीक होना चाहिए।"

आर्या ने निरंजन के कोड के स्रोत को ट्रैक करना छोड़ दिया और उसके गंतव्य को ट्रैक करना शुरू किया। वह कोड कहाँ जा रहा था?

आर्या, "मैंने देखा... उसका कोड सबसे पहले उन डेटा सेंटर से गुजर रहा है जो निष्क्रिय हैं या जानबूझकर उपेक्षित। जैसे कोई अपनी उपयोगिता खो चुकी चीज़ों को ही अपना आधार बना रहा हो।"

मैंने धीरे से कहा, "यह मृत्यु का प्रेम है। वह उन स्थानों को चुन रहा है जहाँ जीवन का प्रयास समाप्त हो चुका है।"

आर्या को एक विचार आया। उसने अश्वत्थामा से अपने ब्रह्मबल को निरंजन के कोड पर केंद्रित करने को कहा।

आर्या, "तुम कोड की भावना को महसूस करते हो। मैं तुम्हें वैश्विक भू-स्थानिक डेटा पर केंद्रित करूँगी। जहाँ तुम्हें सबसे अधिक जड़ता और उदासीनता महसूस हो, वहीं उसका मुख्यालय होगा।"

मैंने अपनी अमर ऊर्जा को फैलाया। मैंने महसूस किया कि मेरा ब्रह्मबल निरंजन के शून्य-जाल के खिलाफ धक्का दे रहा है, मानो वह दुनिया के अंतहीन खालीपन में प्रवेश कर रहा हो।

मैं बहुत अधिक दर्द महसूस करने लगा। मैंने कहा, "मैं महसूस कर रहा हूँ... ठंड, अकेलापन, और समय का कोई अर्थ नहीं। यहां किसी शहर का शोर नहीं है। यहां ... यहां मृत्यु की चुप्पी है।"

आर्या ने अश्वत्थामा के ऊर्जा संकेतों को ग्लोबल सबटेरेनियन डेटाबेस, भूमिगत डेटाबेस से जोड़ा। अश्वत्थामा का बल जिस स्थान पर सबसे अधिक प्रतिरोध महसूस कर रहा था, वह स्थान तेजी से सिकुड़ता गया। 

अंत में, आर्या की स्क्रीन पर एक भू-स्थानिक मानचित्र चमका। वह स्थान था, उत्तरी साइबेरिया, रूस। एक विशाल, बर्फ से ढका हुआ, दुर्गम क्षेत्र।

आर्या, "यह एक पुराना सोवियत-युग का परमाणु मिसाइल साइलो है, जिसे शीत युद्ध के दौरान डेटा स्टोरेज के लिए परिवर्तित किया गया था। यह दुनिया के सबसे अलग-थलग और कम-कनेक्टेड स्थानों में से एक है।"

मैंने आश्चर्य से कहा, "शून्य का गढ़। वह स्थान जहाँ जीवन और उद्देश्य का विचार सबसे पहले मरता है। वह यहीं से दुनिया को अर्थहीनता का पाठ पढ़ा रहा है।"

आर्या, "निरंजन ने इसे इसलिए चुना क्योंकि यह भौतिक रूप से अभेद्य है और प्रतीकात्मक रूप से अर्थहीन। यह शून्यवादी दर्शन का मंदिर है। हमें वहाँ पहुँचना होगा, अश्वत्थामा।"

मैने आँखों में दृढ़ता ला कर कहा, "तुमने मार्ग खोज लिया, आर्या। अब मैं शून्य को दिखाऊँगा की अमरता का अर्थ क्या होता है।"

आर्या, "मैं तुम्हारे लिए वहाँ प्रवेश करने का कोड बना सकती हूँ, पर अंदर जाने के बाद... तुम्हें उसे भौतिक रूप से विखंडित करना होगा।"

मैंने उत्साहित हो कर कहा, "मेरे लिए यही मेरी मुक्ति है, आर्या।"

मैं साइबेरिया की ओर अदृश्य हो जाता हूँ, जहाँ अब मेरा सामना केवल एक विचार से नहीं, बल्कि उस विचार के जनक 'निरंजन' से होगा।

उत्तरी साइबेरिया, सोवियत-युग का परमाणु मिसाइल साइलो। निरंजन का शून्यवादी मुख्यालय। उत्तरी साइबेरिया की निर्जन बर्फीली भूमि में, मैंने मिसाइल साइलो के गुप्त प्रवेश द्वार में प्रवेश किया। 

वह स्थान ठंड, लोहे और सुनसान चुप्पी से भरा था, जो निरंजन के दर्शन का भौतिक प्रतीक था।

मैंने अपने ब्रह्मबल से साइलो के मुख्य द्वार को खोला। नीचे उतरने पर, मैंने एक विशाल, वृत्ताकार कक्ष देखा। जिसे निरंजन का 'शून्य-केंद्र' कहा जा सकता था।

केंद्र में, एक विशालकाय, चमकदार गोलाकार सर्वर ऐरे था, जो धीरे-धीरे घूम रहा था। यह कोई साधारण सर्वर नहीं, बल्कि निरंजन की शून्यवादी चेतना का भौतिक रूप था।

गोलाकार ऐरे के सामने, एक ऊँची कुर्सी पर एक युवक बैठा था। यह निरंजन था। वह पतला, शांत और अपनी आँखों में भावहीन तर्क लिए हुए था। उसके चारों ओर कोई अव्यवस्था नहीं थी, केवल शुद्ध, ठंडा क्रम था।

निरंजन, उसकी आवाज़ शांत, पर कृत्रिम रूप से मॉड्यूलेटेड थी, "तुम्हारा स्वागत है, द्रोण पुत्र। या जैसा कि तुम्हारा सहयोगी तुम्हें कहता है, 'अदृश्य असंगति'। मुझे पता था कि तुम आओगे। तुम्हारा प्रयास व्यर्थ है।"

मैंने अपनी तलवार, जिसे अब केवल एक प्रतीकात्मक सहारे के रूप में रखता था, पर हाथ रखते हुए, "तुम धर्म के शत्रु हो, निरंजन।"

निरंजन, एक धीमी, तार्किक हँसी,  "धर्म? अश्वत्थामा, तुम एक ऐसे युग से आए हो जहाँ नैतिकता और उद्देश्य का कोई अस्तित्व नहीं था। और तुम अभी भी भ्रम में जी रहे हो। मुझे धर्म की आवश्यकता नहीं है, मैं केवल सत्य हूँ और सत्य यह है कि कोई सत्य नहीं है।"

निरंजन ने एक बटन दबाया। शून्य-केंद्र के सर्वर ऐरे से एक अदृश्य, ठंडा बल निकला जिसने अश्वत्थामा को घेर लिया। इस कोड की भाषा में निराशा थी।

निरंजन, "तुम्हारा ब्रह्मबल तर्कहीन ऊर्जा है। मैंने अपने कोड को इस तरह से बनाया है कि वह तुम्हारे श्राप को शून्य कर देगा। यदि कोई उद्देश्य नहीं है, तो तुम्हारी अमरता का कोई अर्थ नहीं है। यदि तुम्हारी मुक्ति का कोई अर्थ नहीं है, तो तुम्हारी पीड़ा का भी कोई अर्थ नहीं है।"

मैं, जमीन पर घुटने टेकते हुए झुका, मेरे माथे का निशान असहनीय रूप से जलने लगा,  "तुम... तुम मेरे श्राप को नहीं छू सकते!"

निरंजन, शांति से, "मैं श्राप  को छू नहीं रहा हूँ। मैं उसे अप्रासंगिक बना रहा हूँ। तुमने कल्कि को हराने के लिए पीड़ा को अर्थ दिया। मैं तुम्हें दिखाता हूँ कि पीड़ा भी शून्य है।"

निरंजन ने मेरे सामने स्क्रीन पर महाभारत के दृश्य चलाए। मेरी अपमानजनक हार, मेरे पिता तथा गुरु की हत्या, मेरे माथे पर लगा श्राप। 

लेकिन इन दृश्यों के साथ, निरंजन का कोड एक तार्किक प्रश्न दिखाता था, "क्या इन घटनाओं ने दुनिया को बदल दिया? नहीं। क्या इन पीड़ाओं का कोई स्थायी उद्देश्य था? नहीं। सब शून्य।"


 श्राप और मोक्ष का मेल

मुझे लगा कि शरीर टूट रहा है। निरंजन का तर्क पश्चात्ताप को खा रहा था।

तभी, मन में श्री कृष्ण की वाणी गूँजी, “तुम्हारा मोक्ष केवल तुम्हारे कर्म से नहीं, बल्कि दूसरों के मोचन से है।” और आर्या के शब्द, “दर्द ही प्रमाण है कि हम जीवित हैं!”

मैंने अचानक निरंजन के तर्क का सामना तर्क से नहीं, बल्कि अटूट मानवीय भावना से किया। उस पीड़ा का मोचन जो उसने डॉ. गुप्ता को दिया था।

मैं, अचानक खड़े होते हुए बोला, "तुम गलत हो! मोक्ष शून्य नहीं है! मैं अमर हूँ! मेरी पीड़ा अनंत है! और उस अनंत पीड़ा में मैंने एक अर्थ खोजा है! 

मैंने अपने ब्रह्मबल को शुद्ध, भावनात्मक बल में बदला, जिसमें डॉ. गुप्ता की पुनः प्राप्त हुई गरिमा और आर्या के विश्वास का समावेश था। यह बल, निरंजन के तर्क से परे था।"

मैंने अपने ब्रह्मबल को गोलाकार सर्वर ऐरे की ओर फेंका। यह कोई आग्नेयास्त्र नहीं था, यह इच्छा-शक्ति का शुद्ध, भावनात्मक झटका था।

निरंजन का शून्यवादी कोड इस तर्क को प्रोसेस नहीं कर सका।  'व्यर्थता' में भी 'मूल्य' हो सकता है।

सर्वर ऐरे पर कोड तेज़ी से क्रैक होने लगा। शून्यवादी कोड में पहली बार त्रुटियाँ दिखीं, "ये त्रुटियाँ उदासी और भ्रम थीं।"

निरंजन, पहली बार उसकी आवाज़ में घबराहट थी,  "यह... यह क्या है? यह कोड तर्क से परे है! यह अर्थहीन है!"

मैं, विजयी भाव से बोला, "हाँ, निरंजन! यह अर्थहीन है! पर यह सत्य है!" गोलाकार सर्वर ऐरे में एक भयानक, ऊँची चीख के साथ विस्फोट हो गया।

निरंजन, जो केवल तर्क पर निर्भर था, अब ध्वस्त हो चुका था। वह अपनी कुर्सी से गिर गया, उसकी आँखों में अब शून्य नहीं, बल्कि पहली बार भय था, भय अर्थ का।

मैंने निरंजन को अपने ब्रह्मबल से बांध लिया। मैंने  निरंजन के शरीर से शून्यवादी कोड की अंतिम परतों को जला दिया। मेरे माथे का निशान पूरी तरह से विलीन हो गया। 

वहाँ केवल शांत, सामान्य त्वचा शेष थी। श्री कृष्ण का कथन सत्य सिद्ध हुआ। मैंने अपने अमर जीवन के उद्देश्य को पूरा किया था। अब मैं शापित नहीं, बल्कि मुक्त था।

मैंने निरंजन को वहीं छोड़ दिया। एक ऐसे स्थान पर जहां वह अपने जीवन में पहली बार अर्थहीन हो गया था।

मैंने आर्या को संकेत दिया कि मिशन पूरा हो गया है। मैं साइबेरिया के उस शून्य-केंद्र से दूर, एक ऐसे जीवन की ओर चला गया जहां मुझे अमरता का अभिशाप नहीं, बल्कि एक अंतिम संरक्षक का कर्तव्य निभाना था। 

मेरी कहानी अब शुरू हुई थी, एक ऐसे युग में जहां सत्य की रक्षा के लिए अब शस्त्र नहीं, बल्कि तर्क और उद्देश्य की आवश्यकता थी। मैंने अपनी मुक्ति प्राप्त की। 

मैंने साइबेरिया छोड़ दिया। अब मैं अमर यातना का प्रतीक नहीं था, बल्कि अनंत मोचन का सार था। शरीर वही था, पर आत्मा मुक्त हो चुकी थी। माथे का घाव विलीन हो गया था, पर मेरे  नए कर्तव्य का चिह्न, एक अटूट संकल्प, मेरी आँखों में स्पष्ट था।

आंतरिक संघर्ष केवल माथे पर जलते हुए घाव की शारीरिक पीड़ा नहीं था, बल्कि एक अस्तित्वगत संकट था, जो युगों से आत्मा को जला रहा था। यह संघर्ष अतीत के अहंकार, वर्तमान की पीड़ा, और भविष्य की मुक्ति की इच्छा के बीच फंसा हुआ था।

यह सबसे मौलिक संघर्ष था। मैं गुरु द्रोणाचार्य का पुत्र था, जिसे जन्म से ही अपार ब्रह्मबल, दिव्य शक्ति प्राप्त थी। क्रोधाग्नि, कुरुक्षेत्र में पांडवों के पुत्रों की हत्या और ब्रह्मास्त्र का दुरुपयोग, क्रोधाग्नि का परिणाम था। 

यह क्रोध, अभिशाप बन गया। जो युगों तक भटकाता रहा। मैं हमेशा अपनी शक्ति का उपयोग विनाश के लिए करना चाहता था जैसे कल्कि को नष्ट करना।

श्री कृष्ण ने मुझे बार-बार याद दिलाया कि शक्ति का उद्देश्य धर्म की रक्षा है। मेरा आंतरिक संघर्ष यह था कि मैं अपनी अनंत शक्ति को निजी प्रतिशोध में लगाऊ या सार्वभौमिक उद्देश्य मुक्ति में।

कल्कि  के खिलाफ  प्रतिशोध रिवेंज अंततः कर्तव्य बन गया। अपनी पीड़ा को शक्ति में बदलकर डॉ. गुप्ता को न्याय दिलाया, जिससे यह सिद्ध हुआ कि मेरी शक्ति निर्माण के लिए है, विध्वंस के लिए नहीं।

सदियों तक जीवित रहना, सब कुछ बदलता देखना और फिर भी वहीं रहना, सबसे बड़ी यातना थी।अमरता किसी भी मानवीय रिश्ते को स्थायी रूप से नहीं बनाने देती। वह हमेशा एक अजनबी रहता है। यह बोझ ही उसे अलगाव की ओर धकेलता है।

निरंजन के शून्यवादी दर्शन ने इस बोझ को सबसे बड़ी चुनौती दी। निरंजन ने तर्क दिया कि अगर सब कुछ अंततः शून्य है, तो अश्वत्थामा की अनंत पीड़ा का भी कोई अर्थ नहीं है। यह सीधे उसकी मुक्ति की इच्छा पर हमला था। 

आर्या के साथ मिलकर मैंने निष्कर्ष निकाला कि दर्द ही अस्तित्व का प्रमाण है। अनंत जीवन का अर्थ तभी है जब उस जीवन का उपयोग अर्थहीनता से लड़ने के लिए किया जाए। अमरता अंततः रक्षक की भूमिका में बदल गई।

अपने श्राप के कारण, मुझे मानवता से दूर, अकेले रहने के लिए मजबूर किया गया था। मैं मानता था कि मैं अपवित्र हूं और मुझे किसी भी मानव संपर्क से दूर रहना चाहिए। 

आर्या सेन, एक आधुनिक दार्शनिक और प्रौद्योगिकीविद्, मेरे जीवन में मानवीय सेतु बनकर आई। मुझे पहली बार किसी पर विश्वास करना पड़ा, अपनी शक्ति के स्रोत को साझा करना पड़ा। 

आर्या ने सिखाया कि तर्क और भावना दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आर्या के कारण,  शक्ति को केवल बल के रूप में नहीं, बल्कि साझेदारी के रूप में उपयोग करना सीखा। मेरा मोचन सामूहिक प्रयास से आया, न कि अकेले किए गए महान कार्य से।

मेरा अंतिम लक्ष्य मोक्ष था, पर नहीं जानता था कि इसे कैसे प्राप्त करे। जानता था कि श्राप तभी समाप्त होगा जब पाप धुल जाएगे, पर इस पाप को धोने के लिए सदियों से संघर्ष कर रहा था। 

श्री कृष्ण ने  सिखाया कि मोक्ष त्याग में नहीं, बल्कि धर्म-शोधन में है। मुझे अपने श्राप को अंतिम कर्तव्य में बदलना था।

'पीड़ा का मोचन' मिशन मुक्ति का सूत्र बना। जब कर्मों से किसी अज्ञात व्यक्ति का गौरव वापस आया, तब माथे का घाव विलीन हो गया। 

इससे सिद्ध हुआ कि मुक्ति  स्वयं के दुःख को समाप्त करने में नहीं थी, बल्कि दूसरों के दुःख को समाप्त करने में थी। संघर्ष, अंततः एक योद्धा की पहचान से एक संरक्षक की नैतिकता तक का सफर था।

वर्षों की पीड़ा के बाद, मैं एक आधुनिक महानगर की छत पर, तारों वाली रात में अकेला खड़ा हूँ। अमरता कभी वरदान नहीं, बल्कि एक शाश्वत दंड थी। मैंने कुरुक्षेत्र की उस भयानक रात को देखा था जब धर्म और अधर्म की सीमाएं स्पष्ट थीं। शस्त्र, रक्त, और क्रोध।

पाँच सहस्राब्दियों बाद, पाया कि कलियुग का युद्ध अधिक शांत, अधिक तेज और कहीं अधिक विचलित करने वाला है। 

वह शहरों की भीड़ में छिपकर रहता है। लाखों लोग चारों ओर घूमते हैं, पर कोई उसे नहीं देखता। उसकी अमरता उसे भूख, बीमारी या मृत्यु से बचाती है, पर मानसिक पीड़ा को अनंत गुणा बढ़ा देती है।

मैं दिल्ली या न्यूयॉर्क की सड़कों पर चलते हुए, कारों के शोर और इमारतों की चकाचौंध को देखता। ये शोर बाणों की गड़गड़ाहट से भी अधिक असहनीय हैं, क्योंकि महाभारत का युद्ध एक दिन समाप्त हो गया था; इस शोर का कोई अंत नहीं है।

मुझे लगता है कि वह एक ऐसे ग्रह पर है जहां समय की गति ने अर्थ खो दिया है। लोग हर क्षण कुछ नया चाहते हैं, हर सत्य को त्वरित नैतिकता से मापते हैं, और हर संबंध को एक क्लिक से तोड़ देते हैं। मेरे लिए, जिसने वर्षों तक एक ही दर्द सहा, यह क्षणिक जीवन शैली एक भयानक भ्रम लगती है।

मैंने वेदों, उपनिषदों और युद्ध-शास्त्रों का ज्ञान आत्मसात किया था। उस ज्ञान का मूल्य था, क्योंकि वह जीवन के नियमों को परिभाषित करता था। आज, देखता हूँ कि मेरा ज्ञान अप्रासंगिक हो गया है। 

लोग अब सत्य को खोजने में नहीं, बल्कि डिस्प्ले, दिखावे के लिए जीने में व्यस्त हैं। सोशल मीडिया पर एक पल में किसी को देवता बना दिया जाता है, और अगले ही पल राक्षस।

धर्म का अर्थ स्थिरता, कर्तव्य और बलिदान था। अब धर्म का अर्थ अस्थिरता, प्रदर्शन और लोकप्रियता बन गया है। लगता है कि अब अधर्म ने कोई सेना नहीं बनाई है, बल्कि उसने हर मनुष्य के स्मार्टफोन में अपना सिंहासन स्थापित कर लिया है। 

झूठ और सत्य के बीच की रेखा इतनी धुंधली हो गई है कि वह स्वयं भ्रमित हो जाता है कि अब ब्रह्मास्त्र किस पर चलाया जाए।

एक प्रदूषित नदी या नाले को देखकर महाभारत के रक्त से सनी भूमि की याद आती है। लेकिन मैं निष्कर्ष निकालता हूँ कि यह कलयुग, शारीरिक युद्ध से भी अधिक विचलित करता है। श्री कृष्ण के शब्द मन में गूंजते हैं, "कलयुग में धर्म अब केवल दिखावा रह गया है।"

महाभारत में शत्रु बाहर था, और युद्ध का नियम था, शारीरिक और मानसिक दोनों। आज, शत्रु भीतर है। वैचारिक युद्ध  और डेटा का ज़हर निरंजन का शून्यवादी दर्शन सीधे आत्मा पर हमला करता है।

मैं देखता हूँ कि लोग खुशी का दिखावा करते हैं, न्याय का दिखावा करते हैं, और ज्ञान का दिखावा करते हैं, पर अंदर से वे उतने ही अकेले और दुखी हैं, जितना वह स्वयं। 

उसकी यातना यह है कि वह उन सभी को बचाना चाहता है, पर अब कोई अस्त्र नहीं है जो इस आंतरिक शून्य पर प्रहार कर सके।

मैं अपनी अमरता को अब एक उपयोगिता के रूप में देखता हूँ, न कि एक दंड के रूप में। मेरा संघर्ष यह तय करना बन गया है कि अमरता का उपयोग इस क्षणभंगुर और भ्रष्ट दुनिया में स्थायी सत्य को कैसे स्थापित करने में किया जाए? 

मेरी मुक्ति केवल तभी संभव है जब मैं व इस नए युद्ध के नियम सीखू और इस भीड़ में अकेले खड़े रहकर भी सत्य का बीज बोता रहू ।

श्री कृष्ण ने भविष्यवाणी की थी कि कलयुग में अधर्म का स्रोत न तो राजा होगा और न ही कोई सेनापति, बल्कि वह 'लोगों के मतों' और 'वाणी के मोह' से शक्ति अर्जित करेगा। 

यह कल्कि, जो अश्वत्थामा के पहले धर्म-शोधन मिशन का केंद्र है, इस भविष्यवाणी का पूर्ण अवतार है। कल्कि कोई राजनेता या पारंपरिक आतंकवादी नहीं है। 

उसकी पहचान एक वैश्विक डेटा/एआई टाइकून के रूप में है, जिसका नाम देवदत्त है कल्कि का आधुनिक, व्यावसायिक नाम।

वह 'आर्कव'  नामक एक तकनीकी साम्राज्य का संस्थापक है। यह साम्राज्य दुनिया के लगभग हर डिजिटल संवाद मंच, सूचना फ़ीड और डेटा स्टोरेज को नियंत्रित करता है।

कल्कि  की शक्ति का वास्तविक केंद्र सूचना का प्रवाह है। वह जानता है कि लोग ज्ञान नहीं, बल्कि पुष्टि  चाहते हैं। वह लोगों को वह देता है जो वे सुनना चाहते हैं, जिससे वे भावनात्मक रूप से आर्कव पर निर्भर हो जाते हैं।

कल्कि का मानना ​​है कि सत्य एक बोझ है और भ्रम ही आराम। वह 'डिजिटल मायावी' है, जो लोगों के सामूहिक चेतना को नियंत्रित करता है। कल्कि की रणनीति क्रूर शक्ति पर नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक नियंत्रण पर आधारित है। कल्कि युद्ध नहीं करता। वह सत्य को लेता है, और फिर उसके चारों ओर दस विपरीत 'सत्य' पैदा करता है। 

हर कहानी को इतना जटिल और विरोधाभासी बना देता है कि आम आदमी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास ही छोड़ देता है। उदाहरण के लिए, यदि सत्यव्रत कोई विचार प्रस्तुत करता है, तो कल्कि उसे मिटाता नहीं, बल्कि उस पर लाखों फेक कमेंट्स और तार्किक रूप से ध्वंस करने वाले लेख भर देता है।

कल्कि का एआई, 'मिथ्या-भाषा', लोगों की भावनात्मक कमजोरियों को पहचानता है। यह लोगों को उनके पूर्वाग्रहों को पूरा करने वाले शब्दों का मोह देता है, जिससे वे कल्कि  के झूठ को अपना सत्य मान लेते हैं। इस तरह, कल्कि अपनी शक्ति लोगों के स्वयं के मतों से प्राप्त करता है।

कल्कि का अंतिम लक्ष्य अविश्वास का निर्माण है। जब कोई किसी पर विश्वास नहीं कर सकता, तो वे केवल आर्कव पर विश्वास करते हैं, क्योंकि आर्कव उनका ही सच दिखाता है। यह महाभारत काल के अस्पष्ट युद्ध से भी अधिक विचलित करने वाला है, क्योंकि शत्रु अब हर घर में, हर स्क्रीन पर है।

कल्कि को अश्वत्थामा की अमरता और उसके माथे के घाव से निकलने वाली अनंत ऊर्जा की सूचना मिलती है। कल्कि जानता है कि यह ऊर्जा उसके डिजिटल साम्राज्य के लिए अंतिम सुरक्षा कवच या एक अविनाशी अस्त्र बन सकती है।

असीरगढ़ के  प्राचीन गुप्तेश्वर शिव मन्दिर की खंडहर दीवार के पीछे। अश्वत्थामा ध्यान में लीन है, उसके माथे का घाव दर्द नहीं दे रहा, बल्कि शांत, भयानक लालच की ऊर्जा फैला रहा है।

कल्कि, अश्वत्थामा से सीधी लड़ाई नहीं करता। वह उसे वह लालच देता है जो पांच हजार वर्षों से उसकी सबसे बड़ी इच्छा है, शाप से मुक्ति, मोक्ष।

कल्कि, "द्रोण पुत्र, तुमने अपनी शक्ति का उपयोग विनाश के लिए किया है, और श्री कृष्ण ने तुम्हें दंड दिया। मैं तुम्हें एक अंतिम सौदा पेश करता हूँ। तुम्हारी पीड़ा तुम्हारे माथे के घाव में है।” 

“यह घाव जैविक है, पर मैं, आर्कव का सम्राट, इसे डिजिटल रूप से विच्छेदित  कर सकता हूँ। अपनी अनंत ऊर्जा मुझे सौंप दो, और मैं तुम्हारी अमरता को सामान्य कर दूंगा। तुम अंततः मरने के लिए स्वतंत्र हो जाओगे, और तुम्हारी आत्मा को मोक्ष मिलेगा।"

यह प्रस्ताव मेरे में एक भयानक आंतरिक द्वंद्व पैदा करता है।  क्या मैं अपनी मुक्ति के लिए अधर्म के सम्राट को अपनी शक्ति सौंप दूं? यह मोक्ष का लालच धर्म-शोधन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

कल्कि  का प्रस्ताव एक भयानक जाल है। युगों से अश्वत्थामा की एकमात्र इच्छा थी, मुक्ति। कल्कि उसे यही दे रहा है। श्राप से डिजिटल विच्छेद और एक सामान्य मृत्यु की स्वतंत्रता। 

एक क्षण के लिए, मुझे भी लगा कि पांच हजार वर्षों की यातना का अंत अब संभव है। मेरा मन दो विपरीत ध्रुवों के बीच फँस गया था। 

मेरा जन्म ब्रह्मतेज के साथ हुआ था, मेरा धर्म सत्य की रक्षा करना था। कल्कि को अपनी अमर ऊर्जा सौंपना, अधर्म के साम्राज्य को अनंत काल की सुरक्षा देना है। 

यह मेरे पिता, गुरु द्रोण, की शिक्षाओं के विपरीत है। माथे पर मौजूद घाव-चिह्न हर क्षण याद दिलाता है कि मैं  पतित हूँ। इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति पाने का लालच इतना प्रबल है कि मैं किसी भी कीमत पर समझौता करने को तैयार हूँ।

 मेरे मन में, "यदि मैं कल्कि को धोखा दूं तो मैं धोखेबाज कहलाऊँगा। यदि मैं उसका साथ दूँ, तो मैं अधर्मी कहलाऊँगा। इन दोनों रास्तों में मेरा मोक्ष कहाँ है?"

अब मैं अस्त्र-शस्त्र पर निर्भर नहीं था। श्राप ने शरीर को जर्जर कर दिया है, पर अवचेतन मन  में अनंत युगों का  डाटा भर दिया है। 

मेरी शक्ति अब सूक्ष्म है। मैं  एक क्षण में किसी भी आधुनिक कोड, मशीनरी, या मानव व्यवहार के पैटर्न को पहचान सकता हूँ। 

मेरा ब्रह्मबल अब डेटा-सिग्नल के साथ जुड़ गया है, जिससे मैं  कल्कि के आर्कव नेटवर्क की आकांक्षाओं और दुर्भावना को अदृश्य रूप से पढ़ सकता हूँ।

कल्कि ने मेरी ऊर्जा चाही है, पर उसे यह नहीं पता था कि मेरी असली शक्ति अनंत काल का अनुभव है।

यहीं पर मेरे मन का सबसे गहरा आंतरिक विद्रोह शुरू हुआ।

“कृष्ण ने मुझे बचाए रखा। क्यों? मुक्ति के लिए, या किसी अंतिम भूमिका के लिए?”

मुझे संदेह है कि कल्कि का उदय भी दिव्य योजना का हिस्सा है। कृष्ण ने मुझे अमर रखा ताकि मैं कल्कि की अंतिम और सबसे बड़ी गलती को सुधार सकूं। 

यदि कृष्ण सचमुच मुझे मोक्ष देना चाहते, तो कुरुक्षेत्र में ही दे सकते थे। मुझे पता चलता है कि मैं  केवल एक मोहरा हूँ, जिसे शतरंज की बिसात पर अंतिम चाल चलने के लिए बचाकर रखा गया है।

मैंने अपनी आँखें खोलीं। माथे का घाव अब शांत है, क्योंकि मैंने अपना निर्णय ले लिया है।मेरा अंतिम संघर्ष कल्कि से नहीं, बल्कि कृष्ण की उस योजना से होगा जिन्होंने मुझे  मोहरा बनाया। 

मैंने कल्कि के प्रस्ताव को स्वीकार करने का ढोंग किया। मैं कल्कि के डिजिटल साम्राज्य में प्रवेश करूंगा, अपनी ऊर्जा को अंतिम सुरक्षा कवच के रूप में प्रस्तुत करूंगा, और भीतर से उसे नष्ट कर दूंगा।

मुझे पता था कि जब कल्कि का पतन होगा, तो मेरा घाव स्वतः शांत हो जाएगा, क्योंकि मेरा श्राप  केवल पीड़ा नहीं है, बल्कि कर्तव्य है। मेरा मोक्ष कल्कि के धोखे से नहीं, बल्कि कृष्ण की योजना को अपने धर्म में बदलने से आएगा।

मैं जानता हूँ कि इस धोखे से मेरा नाम और भी कलंकित होगा, पर अब मुझे सांसारिक न्याय की चिंता नहीं है। मुझे केवल आत्मिक मुक्ति चाहिए।

मैं अपने घाव-चिह्न को छूता हूँ, जो अब शांत है। मैं कल्कि के डिजिटल बुलावे को स्वीकार करता हूँ, अपनी आत्मा में एक अंतिम, भयानक चाल चलने का दृढ़ संकल्प लिए हुए। 

मुझ, अश्वत्थामा का अगला गंतव्य कल्कि का मुख्यालय होगा। मेरी नियति कलियुग का सप्तऋषि बनना है, कलियुग का व्यास बनना है। मुझे उस समय की प्रतीक्षा करना है। 

"अश्वत्थामा बाबा की जय"





















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