बाबूनामा Part One
बाबूनामा
डॉ रवीन्द्र पस्तोर
प्रकाशन विवरण
प्रकाशक:
करमासेतू संस्थान
डब्लू बी 09, साकार बिल्डिंग
स्कीम 94
इन्दौर – 452010
भारत
प्रथम संस्करण: सन् 2025
आवरण डिज़ाइन: मोहिनी नागरा
शब्द-संयोजन: डॉ. रवीन्द्र पस्तोर
प्रस्तावना
बाबूनामा की प्रस्तावना 4
उपन्यास 'बाबूनामा' के भाग एक का सारांश 289
प्रस्तावना
बाबूनामा की प्रस्तावना
आप सोच रहे होंगे कि मैंने इसका नाम "बाबूनामा" क्यों रखा। दरअसल, "बाबू" शब्द का एक दिलचस्प इतिहास है। यह शब्द कभी सम्मान सूचक था, फिर औपनिवेशिक काल में क्लर्कों के लिए इस्तेमाल हुआ और बाद में नौकरशाहों के लिए एक अपमानजनक शब्द बन गया। फिर भी, परिवार और दोस्तों के बीच इसका स्नेहपूर्ण उपयोग आज भी जारी है। "बाबूनामा" का मतलब है एक बाबू के जीवन का लिखित विवरण, जो इस शब्द के विरोधाभासी और समृद्ध इतिहास को पूरी तरह दर्शाता है।
यह किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि जीवन की उस बहती धारा का वर्णन है, जो अपने रास्ते खुद बनाती है। डॉ. रवींद्र पस्तोर के रूप में, मैंने 70 वर्षों का एक ऐसा सफ़र तय किया है, जो किसी पूर्वनिर्धारित नक्शे पर नहीं चला। लोग मुझे एक दूरदर्शी प्रशासक, सफल उद्यमी, प्रभावशाली वक्ता, संवेदनशील फ़ोटोग्राफ़र, और लेखक के रूप में जानते हैं, पर यह सब कुछ एक योजना का हिस्सा नहीं था, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव, घटनाओं, दुर्घटनाओं और मिले अवसरों का एक अद्भुत संगम था।
जीवन एक बीज की तरह होता है। जब उसे सही मिट्टी, हवा और पानी मिलता है, तो वह अंकुरित होता है। उसी तरह, हमारे कर्मों, इच्छाओं और वासनाओं के कारण हमारी आत्मा एक सही गर्भ का चयन करती है, और हम इस दुनिया में आते हैं। बचपन से लेकर अब तक, माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त, दुश्मन, शिक्षक और गुरु इन सभी ने हमारे व्यक्तित्व को आकार दिया है। यह सोचना ग़लत होगा कि मैं आज जो कुछ भी हूँ, वह सिर्फ़ मेरी अकेले की उपलब्धि है।
मैंने एक जीवन दर्शन विकसित किया। जो मेरे जीवन की उपलब्ध जानकारी तथा मेरे अनुभवों के अनुसार है। जिसे मैंने "पस्तोर डॉक्ट्रीन- जीवन दर्शन का सिद्धांत" [Pastor Doctrine] नाम दिया है। इस नाम जैसा कोई विशेष धार्मिक या दार्शनिक सिद्धांत मौजूद नहीं है। संभवतः यह मेरी जीवन-दृष्टि या उनके दर्शन के बारे में हैं। इसे किसी एक कठोर "सिद्धांत" के बजाय, एक जीवन-दर्शन के रूप में समझना ज़्यादा उचित होगा।
पस्तोर डॉक्ट्रीन का पहला सिद्धांत है बादलों की तरह जीने का दर्शन (Live like white cloud philosophy) यह एक गहरी और सुंदर सोच है। यह हमें जीवन को हल्के-फुल्के, स्वतंत्र और बिना किसी बोझ के जीने की प्रेरणा देता है।
बादलों की तरह जीने का क्या मतलब है-
निरंतर गति और बदलाव: बादल कभी एक जगह नहीं रुकते, वे हमेशा चलते रहते हैं। इसी तरह, हमें भी जीवन में बदलाव को स्वीकार करना चाहिए और आगे बढ़ते रहना चाहिए। जीवन की यात्रा में न तो सफलता पर बहुत ज्यादा उड़ना चाहिए और न ही असफलता से डरकर थम जाना चाहिए।
कोई बंधन नहीं: बादलों की कोई सीमा नहीं होती, वे हवा के साथ मुक्त होकर जहाँ चाहे चले जाते हैं। हमें भी अपने विचारों और जीवन को किसी अनावश्यक बंधन में नहीं बाँधना चाहिए। पुरानी बातों, कटु अनुभवों और नकारात्मक भावनाओं को पकड़ कर नहीं रखना चाहिए, बल्कि उन्हें छोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।
निस्वार्थता: बादल बिना किसी स्वार्थ के पानी बरसाते हैं, जिससे हरियाली आती है और जीवन खिल उठता है। इसी तरह, हमें भी निस्वार्थ भाव से दूसरों की मदद करनी चाहिए। जब हम बिना किसी अपेक्षा के देते हैं, तो हमारा जीवन भी अधिक समृद्ध और संतोषजनक होता है।
वर्तमान में जीना: बादल हर पल एक नए आकार में होते हैं और वर्तमान क्षण में जीते हैं। वे न तो बीते हुए कल की चिंता करते हैं और न ही आने वाले कल का भार उठाते हैं। यह हमें सिखाता है कि हमें भी हर पल का आनंद लेना चाहिए और वर्तमान में जीना सीखना चाहिए।
हल्कापन: बादल हल्के होते हैं, इसलिए वे आसमान में आसानी से तैरते हैं। जब हम अपने मन से ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और अन्य नकारात्मक भावनाओं का बोझ हटा देते हैं, तो हमारा जीवन भी बादलों की तरह हल्का और शांतिपूर्ण हो जाता है।
बदल आकाश में अपने पद चिन्ह नहीं छोड़ते है। यह दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन को पूरी तरह से जीना और हर पल का आनंद लेना कितना महत्वपूर्ण है। जब हम बादलों की तरह हल्के, स्वतंत्र और निस्वार्थ होकर जीते हैं, तो हमारा जीवन खुद और खूबसूरत यात्रा बन जाता है।
पस्तोर डॉक्ट्रीन का दूसरा सिद्धांत है जीवन को नदी की तरह जीने का दर्शन (Philosophy of Living Life like a River)
निश्चित रूप से "जीवन को नदी की तरह जीना" एक गहरा और आध्यात्मिक दर्शन है। यह हमें जीवन को सहजता, निरंतरता और लचीलेपन के साथ स्वीकार करने की प्रेरणा देता है। यह दर्शन बताता है कि हमें नदी की तरह बनना चाहिए, जो अपने प्रवाह में आने वाली हर बाधा को पार करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती रहती है। इस दर्शन के कुछ प्रमुख पहलू इस प्रकार हैं:
निरंतरता और गतिशीलता (Continuity and Dynamism)
नदी कभी एक जगह नहीं रुकती; वह हमेशा आगे बढ़ती रहती है। इसी तरह, हमें भी जीवन में रुकना नहीं चाहिए। चाहे परिस्थितियाँ कितनी भी कठिन क्यों न हों, हमें उनसे सीख लेकर आगे बढ़ते रहना चाहिए। यह हमें सिखाता है कि जीवन का सार ठहराव नहीं, बल्कि गति है।
लचीलापन और अनुकूलन (Flexibility and Adaptability)
नदी अपने रास्ते में आने वाली चट्टानों, पहाड़ों और मैदानों के अनुसार अपना मार्ग बदल लेती है। वह कठोरता से टकराकर नहीं रुकती, बल्कि खुद को ढाल लेती है। यह हमें सिखाता है कि हमें भी जीवन की चुनौतियों के सामने लचीला रहना चाहिए। जब परिस्थितियाँ बदलें, तो हमें अपने दृष्टिकोण और व्यवहार में बदलाव लाना चाहिए, न कि हठपूर्वक एक ही रास्ते पर अड़े रहना चाहिए।
निस्वार्थता और देना (Selflessness and Giving)
नदी बिना किसी अपेक्षा के दूसरों को जीवन देती है। वह खेतों को सींचती है, प्राणियों की प्यास को बुझाती है, और अपने किनारों पर जीवन का पोषण करती है। इसी तरह, हमें भी अपने ज्ञान, प्रेम और संसाधनों को दूसरों के साथ साझा करना चाहिए। जब हम निस्वार्थ भाव से देते हैं, तो हमारा जीवन अधिक समृद्ध और सार्थक बनता है।
निर्मलता और शुद्धता (Purity and Clarity)
नदी का जल स्वच्छ और निर्मल होता है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने मन को भी नकारात्मक विचारों, ईर्ष्या और क्रोध से मुक्त रखना चाहिए। जब हमारा मन निर्मल होता है, तो हम जीवन को अधिक स्पष्टता और शांति के साथ देख पाते हैं।
अंत में सागर से मिलना (Meeting the Ocean)
नदी का अंतिम लक्ष्य सागर से मिलना है। इसी तरह, जीवन की हमारी यात्रा का भी एक अंतिम लक्ष्य होता है, जिसे हम अपनी आंतरिक शांति या आध्यात्मिक मुक्ति कह सकते हैं। यह दर्शन हमें याद दिलाता है कि जीवन की सभी यात्राएँ और अनुभव हमें हमारे अंतिम लक्ष्य की ओर ले जाते हैं।
यह दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन एक यात्रा है, न कि एक दौड़। हमें इसे सहजता से जीना चाहिए, हर चुनौती को पार करते हुए आगे बढ़ना चाहिए, और अपने रास्ते में आने वाले सभी लोगों के लिए एक सकारात्मक शक्ति का स्रोत बनना चाहिए।
यह किताब उन सभी लोगों और अनुभवों को समर्पित है, जो मेरे जीवन में आए कुछ लेनदारियों के लिए तो कुछ देनदारियों के लिए, पर हर किसी ने मुझे कुछ न कुछ सिखाया। यह उन सबकी ऋणानुबंधन की कहानी है। यह संस्मरण किसी निर्णयात्मक दृष्टिकोण से नहीं लिखे गए हैं, बल्कि मेरे भोगा हुए यथार्थ का सीधा सा विवरण हैं। मैं उन सभी का आभारी हूँ, जिन्होंने मेरे जीवन के सफ़र में अपनी भूमिका निभाई।
हर इंसान को प्रकृति ने एक ख़ास शक्ति दी है- चयन करने की स्वतंत्रता। हम जो चुनते हैं, वही बन जाते हैं। हमारी ज़िंदगी हमारे कर्मों का कुल योग है। मेरा जीवन भी क्रमिक विकास का नतीजा है, जहाँ हर मोड़ पर भगवान ने मुझे अवसर दिए और मैंने अपनी समझ के अनुसार उनका उपयोग किया।
इन संस्मरणों को लिखने का विचार कई वर्षों से लोगों के आग्रह पर पनपा। वे चाहते थे कि मेरे अनुभवों की कहानियाँ एक किताब का रूप लें, ताकि आने वाली पीढ़ी मेरी ग़लतियों से सीख सके और जीवन में आगे बढ़ सके। यह किताब किसी आत्मकथा का दावा नहीं करती, बल्कि यह मेरे पेशेवर जीवन से जुड़े उन संस्मरणों का संग्रह है, जो मुझे याद रह गए।
मुझे उम्मीद है कि ये संस्मरण आपको अपने जीवन से जुड़े हुए लगेंगे। यह मेरे जीवन की एक गाड़ी के सफ़र जैसा है- कभी फस्ट गियर में, तो कभी टॉप गियर में, कभी ब्रेक लगाते हुए, और कभी बस रुककर-रुककर चलते हुए। इन सभी अनुभवों को मैं इस किताब के ज़रिए आप तक पहुँचा रहा हूँ।
डॉ. रवीद्र पस्तोर
प्रथम पारी
यदि आप यह सोचते हैं कि मैं आत्ममुग्धता से ग्रस्त प्राणी हूँ, तो मैं कहूंगा आप गलत नहीं हैं। मैं "नार्सिसिस्टिक सिंड्रोम", आत्ममुग्धता या आत्ममोही व्यक्तित्व का व्यक्ति हूँ। मुझे अपने महत्व का अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर बोध होता है। लगातार दूसरों से प्रशंसा और ध्यान की मुझे आवश्यकता होती है। यह शायद केवल अहंकार या स्वार्थ से कहीं बढ़कर है। अपनी क्षमताओं को मैं वास्तविकता से कहीं अधिक आँकता हूँ। अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता हूँ। खुद को दूसरों से बेहतर, अनोखा या खास मानता हूँ। मुझे लगता है कि मुझे केवल उन्हीं लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए जो मेरे जैसे ही "खास" या उच्च-स्थिति वाले हों।
मैं दूसरों के ध्यान के लिए हमेशा लालायित रहता हूँ। इसीलिए जब भी मैं कुछ भी करता हूँ तो सोशल मीडिया पर तत्काल शेयर करता हूँ। मैं हमेशा दूसरों की पीड़ा या भावनाओं के प्रति असंवेदनशील रहा हूँ। मैं अक्सर उम्मीद करता हूँ कि दूसरे मेरी इच्छाओं को बिना सवाल किए पूरा करेंगे। जब मेरी अपेक्षाएं पूरी नहीं होतीं तो मैं क्रोधित हो उठता हूँ।
मुझे दूसरों से ईर्ष्या भी होती है। मेरे व्यवहार में अभी भी अक्खड़पन और घमंड बहुत ज्यादा है। मैं अकसर दूसरों के प्रति कम श्रेष्ठता और तिरस्कार का रवैया प्रदर्शित करता हूँ। मुझमें दूसरों की बातचीत पर हावी होने की प्रवृत्ति है। अक्सर मेरा व्यवहार शोषणकारी हो जाता है। मुझमें दूसरों की भावनाओं के प्रति सहानुभूति और ज़रूरतों को पहचानने या समझने की बहुत कमी है। मैं हमेशा अपनी सफलता, शक्ति, सौंदर्य या आदर्श प्रेम की कल्पनाओं में डूबा रहता हूँ।
मुझे हमेशा लगता है कि मैं विशेष व्यवहार और विशेषाधिकार का हकदार हूँ। मैं अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए दूसरों का फायदा उठाता हूँ। मैं दूसरों के परिणामों की चिंता किए बिना अपने लाभ के लिए लोगों का उपयोग करता हूँ। जब कोई मेरे ऐसे व्यवहार से आपत्ति करता है तो मैं अपने आप को सही साबित करने के लिए तर्क या कहें कुतर्क का सहारा लेता रहा हूँ।
इस व्यवहार में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता। आत्ममुग्धता के इस मुखौटे के पीछे, अक्सर असुरक्षा, शर्मिंदगी, अपमान और असफलता के उजागर होने का डर जैसी छिपी हुई नाजुक भावनाओं को पाता हूँ। थोड़ी सी भी आलोचना या अस्वीकृति मुझे बहुत परेशान कर देती है, जिससे मैं क्रोधित या उदास हो जाता हूँ। मैंने कभी नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी को स्वीकार नहीं किया। आपसे अपने मन की गहराइयों को मैं पहली बार साझा कर रहा हूँ।
'पस्तोर' उपनाम और जेजाकभुक्ति की विरासत है।हाँ, यह बात बिलकुल सही है कि बुंदेलखंड का एक प्राचीन नाम "जेजाकभुक्ति" या "जिझौती" था। यह नाम चंदेल राजा जय शक्ति (जेजाक) के नाम पर पड़ा था। चंदेलों ने 9वीं से 14वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर शासन किया था। बुंदेलखंड में रहने के कारण यहाँ के ब्राह्मणों को जिझौतिया ब्राह्मण कहा जाता है। हमारा परिवार बुंदेलखंड के जिझौतिया ब्राह्मण के परिवार में से एक है।
ज्यादातर परिवार पाठक सरनेम लिखते हैं। हम कुछ परिवार पस्तोर सरनेम क्यों लिखते हैं, पता नहीं।
‘पस्तोर’ उपनाम के इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं है। हालांकि, कुछ स्रोतों से पता चलता है कि यह उपनाम भारत में, विशेष रूप से जिझौतिया ब्राह्मण समाज में पाया जाता है। उपनामों की उत्पत्ति अक्सर किसी स्थानीय, पेशे, पैतृक नाम, या किसी विशिष्ट विशेषता से होती है।
ब्राह्मणों में भी विभिन्न शाखाएँ (जैसे कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, सनाढ्य आदि) और गोत्र होते हैं। यह भी संभव है कि 'पस्तोर' किसी विशेष गोत्र, शाखा, या किसी विशिष्ट परंपरा से जुड़े ब्राह्मणों द्वारा ही अपनाया गया हो।
कई बार उपनाम किसी पूर्वज के नाम या किसी परिवार के विशिष्ट इतिहास से जुड़ा होता है। हो सकता है कि 'पस्तोर' किसी ऐसे प्रमुख व्यक्ति का नाम रहा हो जिससे कुछ ब्राह्मण परिवार संबंधित थे। कुछ उपनाम किसी व्यक्ति के व्यवसाय, पद या कार्य के आधार पर विकसित होते हैं।
'पस्तोर' शब्द का यदि किसी पुरानी स्थानीय भाषा या संस्कृत में कोई ऐसा अर्थ निकलता है जो किसी धार्मिक कार्य, प्रशासनिक भूमिका, या किसी विशेष प्रकार के कार्य से संबंधित हो, तो यह भी एक कारण हो सकता है।
कई उपनाम किसी स्थान विशेष से जुड़े होते हैं। यह संभव है कि 'पस्तोर' शब्द बुंदेलखंड में किसी गांव, कस्बे, या भौगोलिक विशेषता का नाम रहा हो, और वहाँ से आने वाले ब्राह्मण परिवारों ने इसे उपनाम के रूप में अपना लिया हो। मुझे 'पस्तोर' उपनाम के बारे में विशेष रूप से बुंदेलखंड के ब्राह्मणों द्वारा इसके उपयोग और इसके ऐतिहासिक संबंधों पर कोई विशिष्ट या व्यापक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
भारत में उपनामों की उत्पत्ति और क्षेत्रीय उपयोग अत्यंत जटिल और विविध होते हैं। ‘पस्तोर’ शब्द का मूल और अर्थ क्या है, ज्ञात नहीं है। पर मुझे इस सरनेम से हमेशा लाभ हुआ है।
गणेशगंज
मेरे जीवन का श्री गणेश: गाँव गणेशगंज
मैने बचपन से अपने जीवन को इसी तरह शुरू किया। मेरे माता-पिता को मुझसे पहले एक बालक हुआ था जो जन्म के साथ ही जीवित नहीं रहा। मैं अपने परिवार में बहुत मन्नतों के बाद पैदा हुआ बच्चा था। गोल-मटोल, गोरा-चिट्टा, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें माँ हमेशा काजल लगाती। माथे पर काजल का टीका जिसे हम लोग 'डथूला' कहते हैं।
गले में उल्लू के नाखूनों का ताबीज तथा पाटे की पुतरिया। हाथों में चांदी के कड़े। नाक और कान भी छिदवा कर जेवर पहनाए गये। तो परिवार ही नहीं गांव में सभी का प्यारा दुलारा बच्चा। विशेषकर मेरी दादी का।
आप मेरे बचपन के अत्यधिक लाड़-प्यार को नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी के विकास में योगदान मान सकते हैं। यहाँ से शायद यह आत्ममुग्धता मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है जो अभी और मजबूत हो गई है।
आत्ममुग्धता का मेरे रिश्तों और समग्र जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। मैं कोई भी काम असंभव नहीं मानता जो मैं न कर सकूँ। इसी कारण मैं इतने तरह के काम कर सका।
हमारी दो तरह की उम्र होती है, एक को में कहता हूँ जैविक उम्र जो शरीर की है। जैसे पेड़ उगता है, बड़ा होता है, फूल-फल देता है और सूख कर मर जाता है। उसी तरह का हमारा शरीर है जो पैदा होता, बच्चा, युवा, प्रौढ़, वयस्क, वृद्ध होता और मर जाता है।
दूसरी मानसिक उम्र होती है जिसे मेंटल ऐज भी कहते हैं। यह सीखने, करने, देखने और पढ़ने से बढ़ती है, जिसमें हमारी समझ का विकास होने पर चेतना का विकास होता है। बच्चा सात साल तक जीवन जीने लायक समझ विकसित कर लेता है।
अधिकांश लोगों की मानसिक उम्र इसी स्टेज पर रुक जाती है और वे जीवन भर कुछ नहीं सीखते। मेरे पास मेरी माँ के साथ बहुत छोटी उम्र से लेकर अभी तक की फोटोज हैं। जिसको मैंने एक फोल्डर में सोशल मीडिया पर शेयर किया था। फोल्डर का नाम दिया था 'फेसेस ऑफ़ फसलेस सोल'। जिसमें मेरे बदलते चेहरे की फोटोज हैं।
जीवन में सफल होने के लिये परीक्षा में मिले अंक निर्णायक नहीं होते, बल्कि आप के अनुभव, समझ तथा नए जोखिम उठाने की क्षमता काम आती है। अपने जीवन के प्रारम्भ में मैंने एक कहावत अपनी दादी से सुनी थी-
‘पहला सुख निरोगी काया,
दूजा सुख घर में हो माया।
तीजा सुख कुलवंती नारी,
चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी।
पंचम सुख स्वदेश में वासा,
छटवां सुख राज हो पासा।
सातवा सुख संतोषी जीवन,
ऐसा हो तो धन्य हो जीवन।’
मैंने अपने जीवन में उक्त सभी सात सुख पाने की कोशिश की है।
मेरे स्कूल में एक यात्री आये थे जो साइकिल पर भारत भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने हम बच्चों को स्वस्थ रहने के तरीकें तथा योग आसन बताये। वह आसनों के पोस्टर पच्चीस-पच्चीस पैसे में बेच रहे थे। उनके पास चार पोस्टर थे लेकिन मुझे केवल पचास पैसे जेब खर्च रोज मिलता था।
मैंने दो पोस्टरों को खरीद लिया। उन्हें अपने कमरे की दीवार पर चिपका लिया और रोज कसरत करने लगा। हमने अपने खेत में एक अखाड़ा बनाया था। उसमें खूब कसरत करते थे। यह जीवन भर की आदत बन गई।
गणेशगंज: मेरा गाँव, मेरा बचपन
हमारे पूर्वज टीकमगढ़ के राजा के यहां महत्त्वपूर्ण पद पर काम करते थे। पहले हमारा परिवार दिगोंड़ा के पास एक गांव में बसता था। वहां उन्हें डाकुओं ने लूट लिया तब राजा ने उन्हें ललितपुर रोड पर कुण्डेश्वर के पास गांव बसाने को जमीन दी थी। उन्होंने एक गांव बसाया और नाम दिया गणेशगंज।
इस गांव को बसाने के कारण पस्तोर परिवार को ‘बर्रु काट’ कहा जाता।
गणेशगंज गांव मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित है। गणेशगंज बुंदेलखंड के पठारी क्षेत्र में स्थित है। भूमि मिश्रित है- कहीं उपजाऊ तो कहीं पथरीली। गांव कृषि प्रधान है जहाँ के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती और पशुपालन पर निर्भर करती है। क्षेत्र में पानी की कमी एक प्रमुख चुनौती रही है, जिसका प्रभाव गणेशगंज पर भी पड़ता है। यहाँ के किसान मुख्य रूप से ज्वार, गेहूं और दालों जैसी फसलें उगाते हैं।
गणेशगंज में एक मजबूत सामुदायिक भावना देखी जाती थी। ग्रामीण जीवन में आपसी सहयोग और भाईचारा महत्वपूर्ण होता था। त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में पूरा गांव एक साथ मिलकर खुशियाँ मनाता। यहाँ की जीवनशैली सादगीपूर्ण थी। मिट्टी के घर, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय रीति-रिवाज जीवन का अभिन्न अंग थे।
शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच थी। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय था, और उच्च शिक्षा या बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोगों को पास के जिला मुख्यालय टीकमगढ़ पर निर्भर रहना पड़ता था।
जिले के अन्य गांवों की तरह, गणेशगंज भी बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जहाँ लोक कलाएं, लोकगीत और पारंपरिक त्योहार जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। गणेशगंज अपनी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, सामुदायिक जीवन और पारंपरिक मूल्यों के साथ-साथ विकास की चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।
मेरा जन्म 1957 के दशक में हुआ था। मेरे बचपन का शुरुआती जीवन बहुत साधारण था। जब भारत को आजादी मिले कुछ ही साल हुए थे, बुंदेलखंड जैसे ग्रामीण इलाकों में जीवन आज की तुलना में बहुत अलग था। गणेशगंज में बच्चों का बचपन सादगी, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक जीवन से भरा हुआ था।
बच्चों के दिन की शुरुआत सुबह जल्दी होती थी। वे अक्सर अपने माता-पिता के साथ खेतों में या घर के कामों में हाथ बंटाते। लड़कियों को पानी भरने, साफ-सफाई करने और छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने में मदद करनी होती, जबकि लड़कों को पशुओं को चराने या खेतों में छोटे-मोटे काम करने की जिम्मेदारी दी जाती थी।
उस समय शिक्षा का स्तर बहुत कम था। गाँव के प्राथमिक विद्यालय में जहाँ कुछ बच्चे ही जा पाते, शिक्षा तक पहुँच सीमित थी, खासकर लड़कियों के लिए। जो बच्चे स्कूल जाते थे, वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामों में भी मदद करते थे। हमारे प्राथमिक विद्यालय में एक कमरा और एक ही शिक्षक थे जिन्हें हम बच्चे दादाजी के नाम से बुलाते। कक्षा एक से पांच तक के विद्यार्थी एक साथ अलग-अलग ग्रुप में उसी कमरे में बैठते। बैठने के लिए फट्टी घर से ले कर आते।
दादाजी मास्टर साहब ही सभी को सभी विषय पढ़ाते। इसके लिए उन्होंने एक अनोखी विधि विकसित की। हर कक्षा से एक सबसे होशियार बच्चे का चयन कर उस कक्षा को पढ़ाने की जिम्मेदारी उस बच्चे को सौंप देते। कभी वह जोर से बोल-बोल कर पाठ पढ़ाता, कभी ईमला बोल कर नकल लिखवाता तो कभी जोर से गिनती या पहाड़े याद करवाता।
मैंने यह जिम्मेदारी पूरे पांच साल निभाई। कक्षा के सभी छात्रों को व्यस्त कर दादाजी खुद गांव में हमारे घर जाते, जहाँ उन्हें चाय, मट्ठा या दही की लस्सी पीने तथा कुछ खाने को मिलता। अब आप जरा कल्पना के घोड़े दौड़ा कर एक ऐसे छोटे कमरे की कल्पना करें और देखें जहाँ कक्षा एक से पाँच तक के एक साथ जोर-जोर से अलग-अलग पढ़ रहे बच्चे हों और शिक्षक कमरे में ना हो।
तो हमारी पढ़ाई ऐसे स्कूल में हुई। जब मास्टर साहब स्कुल में होते तो या तो अपनी कुर्सी पर बैठ कर ऊंघते या सो जाते या अपनी कॉपी में राम-राम लिखते रहते थे। कभी-कभी जब बच्चे उनकी बात नहीं मानते तब एक छड़ी से हथेली पर मार पड़ती।
हथेली लाल हो जाती और चार पांच दिन दर्द होता रहता था। सिलेट पर चाक से तथा कॉपी पर वर्रू या पेंसिल से लिखते। हम बच्चों की चीजें या तो छीन लेते या चुरा लेते। 1957 में यूनेस्को ने भारत में स्कूली बच्चों को दूध पाउडर उपलब्ध कराने की एक योजना में योगदान दिया था, जो बच्चों के पोषण और शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी।
हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यूनेस्को सीधे तौर पर बड़े पैमाने पर दूध पाउडर का "सप्लाई" करने वाला संगठन नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा था जिसमें विभिन्न संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां, जैसे कि यूनिसेफ और फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन, और अन्य अंतर्राष्ट्रीय दानदाता शामिल थे।
यूनेस्को का जोर शिक्षक और बच्चों के समग्र विकास पर रहा है, और पोषण कार्यक्रम अक्सर इस लक्ष्य का समर्थन करते थे। अमेरिका से मुख्य रूप से स्किम्ड मिल्क का पाउडर स्कूल में आता तो पानी में घोल कर बच्चे दूध बनाते और सबको एक-एक गिलास दूध पीना होता। जिसका स्वाद गाय के दूध से अलग होता और कुछ बच्चे उल्टी भी कर देते।
भोजन बहुत सुंदर होता। ज्वार की रोटी, दाल और स्थानीय सब्ज़ियाँ मुख्य आहार थीं। गेहूं उस समय ज्वार से महंगा होता था, इसलिए गेहूं चावल की जगह ज्वार तथा कोदों का अधिक सेवन किया जाता। उस समय राशन कार्ड पर गेहूं, चावल, शक्कर तथा मिट्टी का तेल लालटेन या चिमनी जलाने के लिए परिवार की सदस्य संख्या के आधार पर अलग-अलग मात्रा में हर माह मिलता था।
राशन कार्ड पर अमेरिका से आया लाल गेहूं कंट्रोल पर मिलता। दूध और दही घरों में पाले गए पशुओं से उपलब्ध होता। इस दशक में बच्चों के खेल प्रकृति और आसपास के वातावरण से जुड़े होते थे। मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर का तो कोई नामोनिशान नहीं था।
बच्चे गाँव के खुले मैदानों, गलियों और तालाबों के किनारे खेलते थे। खेल-कूद और मनोरंजन के रूप में गिल्ली-डंडा सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक था, जिसमें लकड़ी की एक छोटी गिल्ली और एक डंडे का इस्तेमाल होता।
खो-खो और कबड्डी टीम वाले खेल थे जो शारीरिक फुर्ती और रण नीति पर आधारित थे। छुपन-छुपाई (हाइड एंड सीक) यह एक और बच्चों का पसंदीदा खेल था। बच्चे कंचे खेलने में भी घंटों बिताते। पेड़ पर चढ़ना, तालाब में नहाना, यह सब हमारे जीवन का हिस्सा था।
सामूहिक मनोरंजन गांव में होता था। शाम को बच्चे और बड़े 'अथाई' चौपाल या किसी चबूतरे पर इकट्ठा होते। कहानियाँ सुनना, लोकगीत गाना, हारमोनियम, बेंजो तथा ढोलक बजाना और पौराणिक कथाएँ सुनना मनोरंजन का मुख्य साधन था। मेले और त्यौहार भी बच्चों के लिए बड़े आकर्षण का केंद्र होते थे, जब उन्हें नए कपड़े और मिठाइयाँ मिलती। रामलीला, रहस लीला, नाटक, राई तथा सर्कस देखने टीकमगढ़ जाते।
बुंदेलखंड उस समय भारत के सबसे गरीब और अशिक्षित क्षेत्रों में से एक था। बच्चों को अक्सर कम उम्र से ही परिवार की आजीविका में मदद करनी पड़ती थी। बुंदेलखंड में पानी की कमी एक गंभीर और पुरानी समस्या रही है। बच्चों को अक्सर दूर से पानी लाने में मदद करनी पड़ती थी। मौसमी बुखार, चेचक, टीबी, घाव लगना, हड्डी टूटना, सांप, बिच्छू, कुत्ता और जंगली जानवर का काटना मुख्य बीमारियां थी।
स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत सीमित थीं। छोटी-मोटी बीमारियों का इलाज घरेलू नुस्खों से किया जाता था, और गंभीर बीमारियों के लिए शहरों तक पहुंच थी। मौसम की मार हर तीन साल में झेलना होती थी। सूखा और बेमेल बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाऐं फसलों को बर्बाद कर देती थीं, जिससे बच्चों के परिवारों पर सीधा असर पड़ता था। गांव के लोग अलग-अलग समस्याओं के निवारण के लिए अलग-अलग देवता पूजते, अनुष्ठान करते, मन्नतें मानते या अखण्ड रामायण का पाठ, सत्यनारायण की कथा, भागवत कथा या शंकर जी बनवाने का अनुष्ठान करते थे।
गणेशगंज में तीज-त्यौहार बड़े उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाए जाते थे। गणेशगंज में तीज-त्यौहार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन भी था। यह परिवारों और समुदायों को एक साथ लाता था।
गणेशगंज में मनाए जाने वाले कुछ प्रमुख त्योहारों- दीपावली, होली, दशहरा, रक्षाबंधन, तीज (हरियाली तीज या हरतालिका तीज), मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, बसंत पंचमी, अक्षय तृतीया (आखातीज), नाग पंचमी, देवउठनी एकादशी और हरियाली अमावस प्रमुख थे। कुल मिलाकर, गणेशगंज में तीज-त्योहार भक्ति, परंपरा, प्रकृति प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का एक सुंदर संगम थे।
इसी गणेशगंज से मेरे जीवन का श्री गणेश हुआ। गांव में बच्चों का जीवन चुनौतियों भरा लेकिन प्रकृति और समुदाय से जुड़ा हुआ था। उनके खेल-कूद, शिक्षा और दिनचर्या आज के शहरी बच्चों से बहुत अलग थी, जहाँ सादगी और सामाजिक जीवन का महत्व अधिक था।
दादी का ज्ञान और गाँव की पंचायत
परिवार में नौकरी पेशा दो लोग थे: मेरे पिता जी तथा चाचा जी। मुख्य आय का साधन खेती थी। साहूकारी साइड बिजनेस था जिसमें रुपये तथा गल्ले का लेन-देन होता। मेरी दादी हालांकि बिलकुल भी शिक्षित नहीं थी। उनमें गजब का कॉमन सेन्स तथा आत्म विश्वास था। उन्हें केवल बीस तक गिनती आती थी। उनके लिए महीना दो भागों में बंटा होता- पूर्णिमा तथा अमावस्या, जिसे हम पखवाड़ा कहते हैं। लोग कहते "लिखा न पढ़ी जो ओरी कहे सो सही।" उन्हें लोग प्यार से 'ओरी' बुलाते थे।
वह आंगन की दीवालों पर गाय के गोबर से टिपकी लगा कर अपना हिसाब रखती थी। बहुत बाद में हमारे चाचा जब बैंक मैनेजर बन गए तब वह 'रुक्का' लिखने लगे थे। रुक्का मतलब उधारी की लिखा पढ़ी का कागज। लेकिन कमाल तो तब होता जब लिखे तथा मौखिक हिसाब में अंतर आता, तब जो 'ओरी' कहे वह सही माना जाता। उनकी 'जुबान' की बहुत कीमती थी।
दादी ने मुझे एक बार बताया था कि बहुत साल पहले टीकमगढ़ में बहुत भयानक सूखा पड़ा था। राजा ने आस पास के ऐसे लोगों को बुलाया था जिनके पास गल्ला रखा हो, राजा ने उनसे पूछा कि कितने लोगों को कितने दिन खिला सकते हैं। हमारी साहूकारी बारह गांव में थी। मेरे दादा जी की अल्प काल में मृत्यु हो जाने से मेरे पिता जी को राजा ने बुलबाया था। पिता जी उस सभा में सबसे छोटे बच्चे थे। जब राजा के मंत्री ने हमारे गांव का नाम पुकारा तो हमारे पिता जी खड़े हुए।
हमारे घर में कोदो की फसल होती थी। कोदो को जमीन में गाड़ कर रखा जाता था। उसे 'खोड़िया' कहते थे। जब राजा ने छोटे बच्चे को देखा तो उन्हें गोद में उठा लिया। उन्होंने राजा को बताया कि उनके घर में इतना कोदो है कि बारह गांव के लोग तीन माह तक खा सकते हैं।
एक हमारे दूसरे चाचा थे। उनके पिता जी के भाई गांव के थे 'लंबरदार'। लंबरदार, जिसे नंबरदार, ज़मीदार भी कहा जाता, ब्रिटिश राज के दौरान गांव में एक प्रमुख व्यक्ति होता था। लंबरदार की नियुक्ति कलेक्टर द्वारा की जाती थी और उसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता था, जिसे नवीनीकृत किया जा सकता था। उसे एक अच्छा चरित्र वाला और स्थानीय भाषा में पढ़ने-लिखने में सक्षम होना चाहिए।
जो राजस्व संग्रह करने और गांव के प्रशासनिक कार्यों में भूमिका निभाता। वह गांव का मुखिया होता, जो सरकारी अधिकारियों के साथ गांव का प्रतिनिधित्व करता और सरकार के साथ संवाद स्थापित करता। वह गांव के प्रशासनिक कार्यों में भी शामिल होता।
सभी प्रकार के विवादों का निपटारा करता जैसे कि व्यक्तिगत विवाद, मारपीट, चोरी-चकारी, तथा भूमि विवादों को सुलझाना और रिकॉर्ड रखना। उनके दरवाजे पर एक जामुन का पेड़ था और उसके नीचे एक चबूतरा, जिसे गांव की 'अथाई' कहा जाता। वह स्थान जहाँ गाँव के लोग इकट्ठे होकर बातचीत और पंचायत करते। गांव में जब विवाद होता तब पीड़ित गांव की पंचायत बुलाने के लिए लंबरदार से अनुरोध करता।
तब लंबरदार गांव की पंचायत बुलाते। पंचायत में गांव की हर जाति के मुखिया सदस्य होते थे। शुरू में गणेशगंज में लगभग चालीस पचास घर थे। रात को अथाई पर पंचायत लगती। मुखिया तथा पंच अथाई पर बैठते। गांव की महिलाएं तथा पुरुष नीचे बैठते।
तम्बाकू कूट कर चिलम में भरी जाती सभी बारी-बारी से पीते। लंबरदार का हुक्का था। वह हुक्का पीते थे। बच्चों का प्रवेश निषेध होता। पर हम बच्चे बहुत उत्सुक होते क्योंकि विवाद बहुत मजेदार होते थे। हम लोग आसपास छुप कर पंचायत की कार्यवाही देखते।
पहले पीड़ित व्यक्ति अपना पक्ष रखता फिर जिसके विरुद्ध शिकायत है वह उसका पक्ष रखता। यदि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह है तो गवाही होती। पंच आपस में विचार-विमर्श करते फिर निर्णय या तो सर्व सम्मति से या फिर बहुमत से होता। यदि अपराध गम्भ्भीर हो तो पांच गांव के पंच बुलाये जाते। सजा होती चमड़े के जूते से पिटाई, जिसे 'पनैयां' कहा जाता। जिससे एक बार से पांच बार या उससे अधिक अपराध की गंभीरता के अनुपात में मारा जाता। कई अपराधों की सजा अपनी जाति या सम्पूर्ण गांव के लोगों की ‘पंगत’ देना होती।
यदि पैसे का भुगतान कर क्षतिपूर्ति हो सकती तो दण्ड पैसे का होता। यदि कोई पाप हुआ है तो गंगा स्नान, गंगाजली पूजन, कथा तथा पंगत देना होती। न पुलिस में रिपोर्ट, न वकील, न कोर्ट कचहरी के चक्कर। त्वरित न्याय। पूर्ण पारदर्शिता।
'अथाई' का गांव में बहुत सम्मान होता था। कोई भी जूते पहन कर या साइकिल पर बैठ कर इस चबूतरे के सामने से नहीं गुजरता था। आल्हा, रामायण, महाभारत, भागवत तथा पुराण का पाठ यहीं होता। ठण्ड के समय कूड़ा लगता, जिसमें बकरी की लेड़ी, गोबर का कण्डा तथा सुखी लकड़ी जलाई जाती, जिससे आग सालभर चौबीसों घण्टे लोगों को मिले। तब माचिस का चलन नहीं था तथा माचिस महंगी होने से लोगों की क्रय शक्ति से बाहर होती थी।
हर घर में आग चौबीसों घण्टे 'गुरसी' में होती थी। 'गुरसी' शब्द का हिंदी में अर्थ "बोरसी" या "अंगीठी" होता है। यह एक प्रकार का चूल्हा होता है जिसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने या गर्मी प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि आग बुझ जाए तो पड़ोसी से आग मांग कर लाते थे। गांव में कहावत चलती: "कम खाना और गम खाना, न हाकिम के जाना न हकीम के जाना।"
मेरी माँ सुबह तड़के उठ कर चक्की पिसती तो लोकगीत गाती। मुझे आज भी कुछ गीत याद हैं। पिता जी शिक्षक और गायत्री परिवार के फाउंडर मेम्बर थे। हम सभी भाइयों के बचपन के सभी संस्कार मथुरा गायत्री परिवार मन्दिर में गुरूजी पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा सम्पन्न हुए।
हम बचपन से अपने भाई के साथ खेतों में काम करते। खेत पर ही रहते। लालटेन की रोशनी में पढ़ते। कॉलेज से लौट कर रहट हाकते और बैलों के पीछे-पीछे हाथ में किताब ले कर जोर-जोर से पढ़ते थे। हमारे साथ हमारा हलवारा जुज्जा होता जो कहानियां सुनाता तथा रात में तारे देख कर समय का अन्दाज लगाना बताता।
जब मन्दिर में अखण्ड रामायण का पाठ होता तो हम लोगों की पारी लगती तब रात भर रामायण पढ़ते। जब अखण्ड कीर्तन होता तो पारी आने पर भजन गाने जाते। गांव में नाटक करते, रामलीला करते और कथा पढ़ कर घर की महिलाओं को सुनाते। किताब रहल पर रख लालटेन की रोशनी में कथा होती।
कोई दुःखद प्रसंग आने पर बहुत सी महिलाएं रोने लगती थी। एक बच्चे के लिये यह बहुत मार्मिक दृश्य होता। चूल्हे पर लकड़ी कण्डे पर खाना बनता। सभी पांच भाई आँगन में एक साथ खाने को बैठते, होड़ लगा कर रोटी खाते, जो सबसे ज्यादा खाता वह जीतता।
मिट्टी के वर्तन, लकड़ी कण्डे की आग पर सिकी रोटी उस पर घर की गाय का देशी घी, घर के खेत की सब्जी, मट्ठे की कड़ी, कोदो के चावल और ज्वार की रोटी। जब त्यौहार और मेहमान आते तब गेहूं की रोटी, पूड़ी, चावल बनते। सर्दियों में कोदो के ‘पयार’ का बिछौना, सभी का एक साथ सोना और दादी की कहानियां, दोस्तों के साथ खेलना, पढ़ना, त्यौहार की मस्ती और स्वर्ग किसे कहते है, पता नहीं।
मेरी दादी रोज सुबह मुझे ऐसी कहावतें सिखाती। कहावतें, जिन्हें लोकोक्तियाँ भी कहा जाता, छोटे वाक्यांश या वाक्य होते हैं जो सामान्य ज्ञान, अनुभव, या सच्चाई को व्यक्त करते हैं। ये वाक्यांश अक्सर रूपक होते और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे होते हैं। गांव के लोग किसी भी जाति के हों लेकिन उन्हें उनके गांव के रिश्ते के नाम से ही सम्बोधित किया जाता था। हमारे चाचा ने बुश रेडियो ख़रीदा था। हम लोग विविध भारती प्रोग्राम सुनते थे। समाचार सुनाने के लिए बी बी सी सुनते । पुरे गांव में हमारा घर था जिस में साइकिल तथा रेडियो होता था।
गणेशगंज के दो गौरव: हनुमान बेग और शीश महल
गणेशगंज रोड पर जो पत्थर के घोड़े की मूर्ति लगी है, उसकी कहानी बेहद दिलचस्प और गौरवपूर्ण है। यह मूर्ति एक ऐसे घोड़े की याद में बनाई गई जिसने अपने समय में एक अविश्वसनीय कारनामा कर दिखाया था।
हनुमान बेग, वह घोड़ा था जिसने रेलगाड़ी को हराया। यह कहानी 1840 के दशक की है, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। एक किस्सा है कि अंग्रेज अफसरों ने टीकमगढ़ से रेल निकाले के प्रस्ताव रियासत के महाराजा प्रताप सिंह जूदेव को दिया। महाराज ने अपने सलाहकारों से सलाह ली। सलाहकारों ने बताया कि रेल आने से राज्य में चोर-उच्चके बढ़ जाएंगे, अपराध बढ़ेगे तो महाराजा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया।
जब अंग्रेज अफसरों ने महाराजा को समझाया कि रेल आने से क्षेत्र का विकास होगा। तब महाराजा ने कहा कि आप की रेल से ज्यादा तेज तो हमारा घोड़ा दौड़ता है। महाराजा के पास "हनुमान बेग" नाम का एक अद्भुत घोड़ा था। यह घोड़ा अपनी असाधारण गति और स्फूर्ति के लिए पूरे बुंदेलखंड में प्रसिद्ध था।
उसके बारे में कहा जाता था कि जब वह दौड़ता था, तो हवा से बातें करता था, मानो उसे पंख लग गए हों। हनुमान बेग की ख्याति जब अंग्रेज अफसरों तक पहुंची, तो वे उसकी काबिलियत से हैरान थे। उन्होंने महाराज प्रताप सिंह जूदेव से हनुमान बेग और एक रेलगाड़ी के बीच रेस करने की बात कही। महाराज ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। रेस ललितपुर रेलवे स्टेशन से शुरू हुई। जैसे ही हरी झंडी दिखाई गई, हनुमान बेग ने अपनी पूरी गति से दौड़ना शुरू किया।
अंग्रेज अफसर और अन्य दर्शक दांतों तले उंगलियां दबाकर इस अद्भुत दृश्य को देख रहे थे। हनुमान बेग ने अपनी गति से सभी को चकित कर दिया और रेलगाड़ी को पीछे छोड़ दिया। यह हनुमान बेग की अंतिम दौड़ अमरता के लिए साबित हुई। रेस जीतने के बाद जैसे ही महाराज ने उसकी लगाम खींची, हनुमान बेग वहीं शांत हो गया और उसकी मृत्यु हो गई।
माना जाता है कि उसने अपनी पूरी शक्ति इस दौड़ में लगा दी थी। लेकिन मरने से पहले, हनुमान बेग ने एक ऐसा कारनामा कर दिया था जिसने उसे अमर बना दिया। उसकी इस अविश्वसनीय उपलब्धि की याद में, महाराजा प्रताप सिंह जूदेव ने गणेशगंज रोड पर उसकी एक भव्य पत्थर की मूर्ति बनवाई।
आज भी, गणेशगंज के लोग हनुमान बेग को एक नायक के रूप में पूजते हैं और उनकी कहानी को पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह मूर्ति सिर्फ एक घोड़े की नहीं, बल्कि अदम्य साहस, गति और स्थानीय गौरव की प्रतीक है। यह कहानी टीकमगढ़ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और हनुमान बेग को आज भी एक किंवदंती के रूप में याद किया जाता है।
गणेशगंज गांव में स्थित शीश महल, जिसे 'बोतल हाउस' के नाम से भी जाना जाता है, अपनी अनोखी निर्माण शैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसकी कहानी भी उतनी ही अनोखी और दिलचस्प है। शीश महल एक्स रम की शराब की बोतलों से बना अनूठा भवन है।
गणेशगंज में स्थित यह शीश महल लगभग 150 साल पुराना बताया जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण शराब और बीयर की खाली बोतलों से किया गया है। यह अपनी तरह का सम्भवतः दुनिया का एकमात्र ऐसा महल है, जो इस तरह के असाधारण तरीके से बना है।
इस अनोखे महल के निर्माण के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं, लेकिन सबसे प्रमुख और विश्वसनीय जानकारी के अनुसार यह महाराजा वीर सिंह जूदेव की कल्पना थी। टीकमगढ़ रियासत के तत्कालीन महाराजा वीर सिंह जूदेव (जो 1930 के दशक तक महाराजा थे) को इस अनूठे महल को बनवाने का विचार आया था। यह महल मुख्य रूप से मेहमानों के स्वागत और उनके ठहरने के लिए बनाया गया था।
कहा जाता है कि इस महल को बनाने में ऑस्ट्रेलिया के सर विडवर्न इंजीनियर की भूमिका सबसे अहम थी। उनकी देखरेख में ही इसका निर्माण हुआ था। यह भी बताया जाता है कि सर विडवर्न खुद इसी महल में रहा करते थे। महल को बनाने के लिए हजारों की संख्या में एक्स रम की खाली शराब और बीयर की बोतलों को प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग करके एक-दूसरे से जोड़ा गया था।
राजशाही के जमाने में मेहमानों को परोसी गई शराब की बोतलों का ही इसमें इस्तेमाल किया गया था। इस महल में कुल छह कमरे, एक रसोई, सौंदर्य प्रसाधन गृह (बाथरूम) और अतिथियों के बैठने के लिए फर्नीचर भी था। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब कुछ शराब की बोतलों से ही बनाया गया था। शीश महल अद्वितीय स्थापत्य का नमूना है। महल की दीवारों में बोतले इस तरह से लगाई गई हैं कि वे धूप और रोशनी में चमकती हैं, जिससे यह शीशे जैसा प्रतीत होता है।
यही कारण है कि इसे 'शीश महल' कहा जाने लगा। बोतल और प्लास्टर ऑफ पेरिस का संयोजन ऐसा है कि यह महल गर्मियों में भी काफी ठंडा बना रहता है, जो उस समय की इंजीनियरिंग और कारीगरी का अद्भुत नमूना है। अपनी अनोखी बनावट के कारण यह महल दूर-दराज से पर्यटकों को आकर्षित करता है।
विदेशी पर्यटक भी उसकी कारीगरी देखकर मुरीद हो जाते हैं। वर्तमान स्थिति और संरक्षण का अभाव बहुत है। हालांकि इसकी सुंदरता आज भी बरकरार है, लेकिन देखरेख के अभाव में यह धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहा है। इसकी दीवारों में लगी काफी बोतले टूट रही हैं, जिससे इस अनूठी ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जाती है।
गणेशगंज का यह शीश महल टीकमगढ़ के इतिहास की एक अद्भुत कड़ी है, जो उस दौर के महाराजाओं की कलाप्रियता और नवाचार को दर्शाता है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक कहानी है जो स्थापत्य कला और रचनात्मकता की सीमाओं को चुनौती देती है।
गाँव का बदलता चेहरा: अतीत से वर्तमान तक
बुंदेलखंड के पिछड़ेपन का एक कारण राजनीतिक जागरूकता का आभाव भी है। कहते हैं कि जब देश में चुनाव हुए तब टीकमगढ़ से सांसद चुने गए कूरे माते। उन्हें तत्कालीन प्रधान मंत्री ने बुला कर पूछा "क्या तुम्हारे यहां ईख की खेती होती है?" उन्होंने ईख शब्द नहीं सुना था। मना कर दिया। वह पढ़े-लिखे नहीं थे। बाद में लोगों ने उन्हें बताया कि ईख मतलब 'बराई' होता है जो उस समय खूब होती थी। प्रधान मंत्री का यहां शुगर मिल लगाने का प्रस्ताव था। वह कहीं और लगाई गयी। रेल और उद्योगों का नहीं होने का क्षेत्र के विकास पर गहरा असर पड़ा। रेल बीसवीं शताब्दी में आ सकी और शुगर मिल न होने से लोगों ने गन्ना उगाना बंद कर दिया।
तब एक पैसा, दो पैसा, पांच पैसा का चलन था। चब्बनी, अठन्नी तथा रूपया बड़ी बात थी। गांव में पैसे की जगह वस्तु के बदले वस्तु बदलते थे। गल्ले के बदले सब्जियां, मिट्टी के वर्तन, बांस की टोकरियां, फल, कुल्फी और सब कुछ मिल जाता था। सामान फेरी वालों से ख़रीदा जाता। कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन के सामान, कांच की चूड़ियां, कंबल, चादर सभी कुछ फैरी वाले बेचते थे।
जिसे आजकल क्विक कॉमर्स कहा जा रहा है, गांव में यह व्यवस्था सदियों से थी। गांव में मैंने कभी बेरोजगार शब्द नहीं सुना था। सबके पास काम होता था। गांव के लोग लोक कलाओं में पारंगत होते। गांव की ज़रूरत के सामान गांव में ही बनाते। लोहे के औजार लुहार, मिट्टी के वर्तन कुम्हार, बांस के वर्तन बसोड़, चमड़े के जूते मोची, कपडे बुनकर, लकड़ी के औजार बड़ाई, सोने के गहने सुनार, तथा पंडित कर्मकाण्ड, हवन पूजन करवाते थे।
काछी सब्जियां उगाते, मछुआरे मछली पकड़ते, यादव जानवर पाल कर दूध, दही, मट्ठा और घी बनाते, किसान गल्ला, दाल उगाते, तेली तेल निकालते, दर्जी कपड़े सिलते, जैन दुकान तथा बिजनेस, व्यवसाय या कारोबार करते थे। सब एक दूसरे के परिपूरक परस्पर निर्भर, एक दूसरे पर आश्रित थे। इस आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण गांव में पैसा घुमाने की व्यवस्था थी।
इस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जब एक रुपया आता था तो वह दस से पंद्रह बार घूमता था, जिससे उतने लोगों को काम मिलता था तथा उसकी आय होने से आवश्यकताओं की पूर्ति हो जाती थी। तब गांव में पैसा कम था पर इस आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण गांव समृद्ध थे। आज यह आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र टूट गया है।
आज गांव में पैसा बहुत जा रहा है पर वह गांव की अर्थ व्यवस्था में ना घूम कर शहर आ जाता है। क्योंकि गांव के लोगों की आवश्यकताओं की सामग्री कारखानों में बनती है और शहरों में बिकती है। गांव के हुनरमन्द लोग पलायन कर शहरों में आ गए, पीछे रह गए बुजुर्ग, बीमार, महिलाएँ और बच्चे।
दूध, सब्जियां, गल्ला, पैसा सब शहर में। यह ब्रेन ड्रेन ही नहीं रिसोर्स ड्रेन भी है। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में झाड़ू लग गई है। कुशल कारीगर शहर में सस्ता मजदूर बन गया। गांव का मकान मालिक शहर में अतिक्रमण कर फुटपाथ पर सोता है। महिलाओं पर अत्याचार बढ़ गए। बच्चे 'गिग वर्कर' हैं जो डिलेवरी, चौकीदार तथा ड्राइवर बन गए हैं। पैसा तथा संसाधन कुछ लोगों के हाथ में है, जो समय ख़रीद रहे हैं और सब समय बेच रहे हैं। पिछले सात दशकों से मैं इस परिवर्तन का प्रत्यक्षदर्शी हूँ। मैंने अपना गांव बदलते देखा है।
कुण्डेश्वर
मेरे बचपन की परिक्रमा
बचपन में प्रतिदिन दौड़ लगा कर कुण्डेश्वर जाता और नदी में नहा कर दौड़ते वापिस आता था। हमारे गाँव से लगा कुण्डेश्वर का मंदिर है। यह सिर्फ एक मंदिर नहीं था, बल्कि मेरे जीवन का हिस्सा था, जिसकी हर कहानी मुझे मेरे बचपन से और भी जोड़ती थी।
किंवदंतियों में कुण्डेश्वर की उत्पत्ति
इस मंदिर की उत्पत्ति स्थानीय किंवदंतियों और प्राचीन मान्यताओं से जुड़ी हुई है। एक कथा धंतीबाई की कहानी के अनुसार है, धंतीबाई नामक एक महिला धान कूट रही थी। तभी अचानक, उसकी ओखली से रक्त निकलने लगा। यह देखकर वह डर गई और उसने ओखली को एक कूड़े (ढक्कन) से ढक दिया। जब वह यह बात गाँव वालों को बताने गई और वापस आकर कूड़ा हटाया, तो उसे वहाँ एक शिवलिंग प्रकट हुआ दिखा। यह चमत्कारी घटना ही इस मंदिर के उद्भव का कारण मानी जाती है। इस घटना के बाद, तत्कालीन महाराजा मदन वर्मन ने उसी स्थान पर कुण्डेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया, जहाँ शिवलिंग प्रकट हुआ था।
एक और प्राचीन कथा इस स्थान को दैत्यराज बाणासुर से जोड़ती है, जो भगवान शिव के प्रबल भक्त थे और जिनकी राजधानी बाणपुर थी। उनकी पुत्री, उषा देवी भी शिवलिंग की भक्त थीं और उन्होंने यहीं पर भगवान शिव की आराधना की थी। कहा जाता है कि उषा आज भी भोर में भगवान शिव को जल चढ़ाने आती हैं, और शिवलिंग पर चढ़ा हुआ जल मिलता है। यह भी माना जाता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें काल भैरव के रूप में दर्शन दिए थे।
यह भी माना जाता है कि शिवलिंग 'कुंडा' (एक पवित्र कुंड या कुएँ) से निकला था जो बगवार क्षत्रियों, एक राजपूत वंश, का था। कहा जाता है कि बगवार सूर्यवंशी, जिन्हें 'बघवा' (सिंह पर सवार) के नाम से जाना जाता है, बहुत पहले से जमड़ार नदी के घने जंगल में निवास करते थे। नंदी महादेव की मूर्ति के नीचे मिली एक पाद टिप्पणी में इसकी पुष्टि होती है। यह मंदिर सदियों से पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जिसे विभिन्न शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ।
शाही संरक्षण और स्थापत्य का गौरव
राजा वीर सिंह देव (1605-1627): ओरछा के एक प्रसिद्ध शासक, जो अपने सिद्धांतों और निर्माण के प्रति जुनून के लिए जाने जाते थे, ने कुण्डेश्वर मंदिर के निर्माण और विकास को बहुत संरक्षण दिया। उन्होंने एक ताम्रपत्र 'राजज्ञा' (शाही फरमान) के माध्यम से बगवार वंश को "पंडा" या "कुंडेश्वर महादेव के पांड्या" की उपाधि भी प्रदान की, जिससे उनकी राजपूत वंशावली को मान्यता मिली। राजा महेंद्र विक्रमादित्य और महाराजा महेंद्र सवाई प्रताप सिंह जू देव जैसे बाद के शासकों ने भी 1947 में भारत गणराज्य में राज्य के विलय होने तक मंदिर का संरक्षण जारी रखा।
अब मंदिर का प्रबंधन 1980 में स्थापित श्री आशुतोष अपर्णा धर्म सेतु लोक न्यास द्वारा किया जाता है। मंदिर की स्थापत्य शैली चंदेल वंश के मंदिरों से प्रभावित मानी जाती है, जो 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मध्य भारत पर शासन करते थे। पत्थरों पर बारीक और सुंदर नक्काशी उस समय की कला का अद्भुत नमूना पेश करती है। मंदिर के चारों ओर देवी-देवताओं की मूर्तियां पत्थरों पर उकेरी गई हैं।
मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह है कि गर्भगृह के अंदर एक भूमिगत जलधारा प्राकृतिक झरने से होकर गुजरती है, जिससे एक शांत और रहस्यमय वातावरण बनता है। भक्तों का मानना है कि इस जल में शुद्धिकरण और उपचार के गुण हैं।
कुण्डेश्वर का शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है, जिसका अर्थ है कि यह स्वयं प्रकट हुआ है। इसे "13वां सिद्ध शिवलिंग" भी कहा जाता है और यह देश-दुनिया में आस्था का केंद्र बना हुआ है। एक लोकप्रिय मान्यता यह भी है कि कुण्डेश्वर का शिवलिंग हर साल चावल के दाने के आकार के बराबर बढ़ता है। 1937 में, टीकमगढ़ रियासत के तत्कालीन महाराजा वीर सिंह जूदेव द्वितीय ने शिवलिंग के आस-पास खुदाई करवाई थी, और खुदाई में हर तीन फीट पर एक जलपरी मिली थी।
मेले, त्यौहार और बचपन की यादें
कुण्डेश्वर मंदिर भक्तों के लिए अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखता है। भगवान शिव को समर्पित वार्षिक त्योहार महाशिवरात्रि यहाँ बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। हजारों भक्त विशेष प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए एकत्रित होते हैं। कुंडेश्वर में सालाना तीन बड़े मेले लगते हैं।
एक महत्वपूर्ण मेला मकर संक्रांति के अवसर पर पौष/माघ (जनवरी) महीने में आयोजित होता है। दूसरा बसंत पंचमी पर और तीसरा कार्तिक एकादशी पर (अक्टूबर/नवंबर) आयोजित होता है। बरसात के मौसम की समाप्ति के दिन, महादेव को कुंड में जल विहार कराने का एक अनोखा "जल विहार महोत्सव" मनाया जाता है।
माना जाता है कि महादेव स्वयं कुंड में जल विहार लेकर तालाब के जल को शुद्ध करते हैं। मंदिर का जमड़ार नदी के किनारे स्थित होना इसके कार्य और आध्यात्मिक परिवेश को बढ़ाता है, पास में 'बारी घर' और 'उषा जलप्रपात' जैसे पिकनिक स्थल भी हैं।
मेले के अवसरों पर हम लोग गांव से झुण्ड बना कर जाते। कभी पैदल तो कभी बैलगाड़ी से। बैलों को खूब सजाते। रास्ते में अन्य बैलगाड़ियों से दौड़ लगते। साथी लोकगीत गाते। साथ में घर से खाना बना कर ले जाते थे। नदी की किनारे बैठ कर सभी साथ में खाना खाते।
मेले में सामान खरीदने को पैसा मिलता था तो घूम-घूम कर सामान खरीदते। सर्कस देखते। बड़े गोल झूलों पर झूलते। बड़ा मजा आता। मैंने कक्षा पाँच तक की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही की।
टीकमगढ़
यह एक कहानी है, उस शख्स की, जिसने अपने भीतर के समंदर को शब्दों की लहरों में ढाल दिया। यह कहानी है टीकमगढ़ की, एक शहर जिसने एक अंतर्मुखी लड़के को अपने गौरवशाली इतिहास का हिस्सा बनने का हौसला दिया। यह दास्तान है संघर्ष, प्रेरणा और खुद को फिर से गढ़ने की, जहाँ हर मोड़ पर नियति ने एक नया किरदार रचा।
इतिहास का साया और एक अंतर्मुखी छात्र
कक्षा छह की पढ़ाई के लिए जब मैंने शासकीय मिडिल स्कूल टीकमगढ़ में प्रवेश लिया, तो मुझे नहीं पता था कि यह शहर मेरे जीवन का सबसे बड़ा अध्याय लिखने वाला है। आठवीं तक की पढ़ाई, फिर हायर सेकेंडरी की शिक्षा, सब कुछ एक धुंधली सी याद की तरह था। मैं हमेशा पढ़ने में औसत विद्यार्थी रहा था। कभी फेल नहीं हुआ पर कभी फर्स्ट भी नहीं आया।
मेरे भीतर एक गहरा, शांत एकांत था, जिसने मुझे सबसे अलग कर रखा था। इन सालों में मैं बहुत इंट्रोवर्ट छात्र था। मेरे लिए दुनिया की हलचल से ज्यादा सुकून खेतों की खामोशी में था। इसीलिए मैं ज्यादातर समय खेत पर ही बिताता था, जहाँ धरती की गंध और हवा की सरसराहट ही मेरे दोस्त थे।
मेरे व्यक्तित्व के इस एकांत को भेदने का एकमात्र आकर्षण था, राष्ट्रीय कैडेट कोर। मैं केवल राष्ट्रीय कैडेट कोर का सदस्य था। मुझे ड्रेस हमेशा से आकर्षित करती रही।
शायद उस खाकी वर्दी में एक अनुशासन, एक पहचान थी, जो मेरे भीतर की उलझनों को एक दिशा दे सकती थी। लेकिन यह तो सिर्फ शुरुआत थी। मेरे भीतर एक और दुनिया थी, इतिहास की दुनिया। मेरी दिलचस्पी हमेशा इतिहास में रही है। टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर है। इसका इतिहास सदियों पुराना है और यह बुंदेला राजवंश के शौर्य, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रहा है।
टेहरी से टीकमगढ़ तक की दास्तान
इस भूमि पर न जाने कितने साम्राज्यों की पदचाप गूँजी थी। पश्चिमी बुंदेलखंड में प्राचीन काल में वाकाटक ब्राह्मणों का शासन था, जिनका मूल केंद्र बेतवा नदी के तट पर स्थित वाघाट था। ये प्रतापी राजा थे और मड़खेरा में उनके द्वारा बनवाया गया सूर्य मंदिर आज भी दर्शनीय है।
वाकाटक, गुप्त और नाग राजा समकालीन थे। प्राचीन काल में बुंदेलखंड तपस्वियों की तपोभूमि के रूप में विख्यात था। कालपी में व्यास ऋषि का आश्रम और चित्रकूट-कालिंजर के पास वाल्मीकि ऋषि का निवास माना जाता है। यह भूमि थी जहाँ इतिहास की हर परत के नीचे एक कहानी दफ़न थी।
कालांतर में यहाँ चेदी राजाओं का शासन रहा, जिसके बाद नागों का राज्य आया। उनकी राजधानी नागा भद्र (नागौद) थी। नाग राजा शैव भक्त थे और उनका राज्य कला व संस्कृति में उच्च कोटि का था। इनकी सत्ता सिंधु नदी के किनारे शिवपुरी क्षेत्र तक थी।
सिंधु के किनारे पर पवा इनकी दूसरी राजधानी थी। रामायण काल में यह क्षेत्र भगवान रामचंद्र जी के पुत्र कुश के अधीन था, जिसकी राजधानी कुशावती (वर्तमान में कालिंजर के पास लव पुरी, जो रामचंद्र जी के ज्येष्ठ पुत्र लव के अधीन थी) थी। महाभारत काल में यह क्षेत्र करुषपुरी के नाम से विख्यात था, जहाँ दलाकी-मलाकी राजाओं का राज्य था।
पर इस भूमि की सबसे गौरवशाली पहचान बने बुंदेला। बुंदेला राजवंश की उत्पत्ति 11वीं शताब्दी में मानी जाती है। कहा जाता है कि एक राजपूत राजकुमार ने विंध्यवासिनी देवी को अपना बलिदान दिया, और देवी ने उन्हें रोककर 'बुंदेला' (वह जिसने रक्त अर्पित किया) नाम दिया।
1531 ईस्वी में रुद्र प्रताप सिंह बुंदेला ने ओरछा राज्य की स्थापना की। उन्होंने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी बेतवा नदी के किनारे ओरछा में स्थानांतरित की और यहीं पर किले और महलों का निर्माण शुरू करवाया। ओरछा के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक राजा वीर सिंह जूदेव थे, जिन्होंने जहांगीर महल और सावन भादों महल जैसे कई सुंदर महलों का निर्माण कराया।
फिर आया वह दिन, जब टेहरी के इतिहास को नया नाम मिला। 1783 में, ओरछा राज्य के तत्कालीन शासक राजा विक्रमजीत सिंह बुंदेला के ओरछा से भागकर टेहरी को अपनी नई राजधानी बनाया। महाराजा वीर सिंह जूदेव एक कृष्ण भक्त थे। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के एक नाम 'टीकम शाह' के आधार पर टेहरी के किले और नगर का नाम 'टीकमगढ़' रख दिया। इस प्रकार, टेहरी को औपचारिक रूप से टीकमगढ़ के रूप में जाना जाने लगा।
टीकमगढ़ अपने विशाल किलों, महलों और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हुआ, जो बुंदेला वास्तुकला की भव्यता को दर्शाते हैं। यहाँ के शासकों ने कला, संस्कृति और धर्म को विशेष संरक्षण दिया। महाराजा प्रताप सिंह जूदेव (1874-1930) जैसे बाद के शासकों ने भी सिंचाई परियोजनाओं और इंजीनियरिंग कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गणेशगंज में निर्मित शीश महल (बोतल हाउस) और हनुमान बेग घोड़े की मूर्ति इसके उदाहरण हैं।
यह सब इतिहास की कहानियाँ थीं, पर मुझे लगता था कि मैं इन्हीं कहानियों का एक अदृश्य हिस्सा हूँ। लेकिन मेरी अंतर्मुखी दुनिया, मेरी व्यक्तिगत कहानी इन विशाल पन्नों में कहाँ फिट होती थी?
वह दिन जब एक अजनबी ने मेरी तकदीर लिख दी
कॉलेज में कदम रखते ही मैं एक नई दुनिया में आ गया था। मैंने उच्च शिक्षा स्नातक के लिये शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, टीकमगढ़ में एडमिशन लिया था। यह जिले का प्रमुख और सबसे पुराना सरकारी कॉलेज है। यह कॉलेज शुरुआत से ही डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से संबद्ध रहा है। बाद में मेरे समय अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा से संबद्ध रहा। फिर डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से संबद्ध हो गया।
कॉलेज का एक हिस्सा पुरानी ऐतिहासिक "ताल कोठी" इमारत में लगता था, जिसका संबंध ओरछा रियासत और क्षेत्र की शैक्षिक विरासत से रहा है। ताल कोठी का निर्माण ओरछा रियासत के राजा प्रताप सिंह ने करवाया था। इसे झील के किनारे बनाया गया था, इसलिए इसे "ताल कोठी" कहा जाने लगा।
1956 में जब मध्य प्रदेश का गठन हुआ, तो ताल कोठी को शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया गया। मेरे समय इस भवन में साइंस संकाय की कक्षाएं लगती थी। कला तथा वाणिज्य संकाय नए भवन में लगता था। ताल कोठी में ही "ओरछा स्टेट लाइब्रेरी" थी जिसकी सन् 1932 में तत्कालीन ओरछा नरेश महाराजा मधुकर शाह द्वितीय ने स्थापना की थी। यह ज्ञान का विशाल खजाना था।
मैं जब पहली बार अपनी कक्षा में गया तो वह पचास से अधिक लड़कों और लड़कियों की कक्षा थी। यह को-एड कॉलेज था। अभी तक की मेरी शिक्षा लड़कों के स्कूल में ही हुई थी। स्कूल के दिनों के हम तीन दोस्त थे। हम कक्षा की आखरी बेंच पर बैठते थे। बहुत शर्मीले, दब्बू तथा डरे हुए।
और फिर वह दिन आया, जिसने सब कुछ बदल दिया। मुझे अपनी एक मार्कशीट अटेस्ट करवानी थी। मैं किसी प्राध्यापक को नहीं जानता था। मैंने सोचा कि बाकी सभी विषयों की कक्षाओं में आखिरी बेंच पर बैठता हूँ तो वह प्राध्यापक मुझे नहीं पहचानते होंगे। मैं भूगोल की कक्षा में सामने की सीट पर बैठता था तो मुझे लगा कि भूगोल के प्राध्यापक मुझे जानते होंगे। उनका नाम था श्री रमेश चंद्र त्रिपाठी। वे भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष थे। मैं एक दिन हिम्मत करके उनके कमरे में गया।
त्रिपाठी जी ने कहा- "आओ रवीन्द्र बैठो।" जब उन्होंने मुझे नाम से बुलाया तो मुझे मन ही मन बहुत अच्छा लगा। मुझमें हिम्मत आ गई कि चलो इन्हें मेरा नाम तो पता है।
त्रिपाठी जी- "बताओ कैसे आए?"
मैंने गला साफ करते नज़ारे ऊपर उठा कर उन्हें देखा- "सर! मार्कशीट अटेस्ट करवानी थी।"
उन्होंने पैनी निगाहों से मुझे देखा "ठीक है।" मैं उन पैनी नजरों से सहम गया। मैंने नजरें नीचे कर लीं। वह मेरी असुविधा समझ गए।
बोले- "यह बताओ कॉलेज में इतने लोग हैं तुम उनके पास नहीं गए। मेरे ही पास क्यों आए?"
मैंने झूठ बोलना ठीक नहीं समझा।
मैंने कहा "सर! बाकी कक्षाओं में मैं पीछे बैठता हूँ। मुझे लगा कि वह लोग मुझे नहीं जानते होंगे। आप की कक्षा में सामने बैठता हूँ। मुझे लगा आप मुझे जानते होंगे।" उन्हें मेरा जवाब पसंद आया।
वह कुर्सी पर आगे खिसक कर बैठ गए। मुझे देख कर बोले- "लोग पाँच साल कॉलेज में कुत्ता, बिल्ली की तरह गुजारा कर निकल जाते हैं। कुछ करो कि लोग तुम्हें जानें।"
मैंने हिम्मत कर पूछा- "सर! क्या करें?"
त्रिपाठी जी- "लड़कियों को छेड़ो।"
"क्या?" मेरे मुँह से यकायक निकला। मुझे ऐसी सलाह की आशा नहीं थी शायद।
"हाँ! यह नहीं होगा?" त्रिपाठी जी ने कहा। "ठीक है तो प्राध्यापकों को मारो।" मेरा निस्तेज चेहरा देख कर उन्होंने कहा- "ठीक है तब चुनाव लड़ो।"
मेरी आँखों में उदासी देख कर बोले- "यह भी नहीं होगा। तो फिर पढ़ो, खूब पढ़ो सब तुम्हारी मार्कशीट देखते रह जाएँ। कुछ अलग करो। अगर चाहते हो कि लोग याद रखें तो लीक से हट कर काम करो।
काम खुद बोले। तुम्हें बोलने की ज़रूरत ना रहे। एक बहुत ही प्रसिद्ध शेर है, जिसके रचयिता अल्लामा इकबाल हैं। कहते हैं कि-
"खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तक़दीर से पहले"
"खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।"
यह शेर हमें पुरुषार्थ, आत्मविश्वास, और आत्मनिर्भरता का संदेश देता है। मेरी आँखों में चमक लौट आई। मैं कुर्सी पर सीधा बैठ गया।
उन्होंने कहा "मैं टूशन नहीं पढ़ाता। मैं तुम्हारी मदद करूँगा। पुस्तकालय से मेरे नाम जितनी चाहे किताबें लो, जब चाहे मेरे घर आकर प्रश्न पूछो। मैं विद्यार्थियों से घर के काम नहीं करवाता।" थोड़ा रुक कर बोले "यह कर सकते हो।"
मैंने पूर्ण आत्मविश्वास से कहा "सर! यह कर सकता हूँ।" यह मेरे जीवन का पहला मोड़ था।
उन्होंने कहा- "भूगोल के प्रैक्टिकल में मैं तुम्हें सबसे कम अंक दूँगा। तुम्हें बैसाखियों पर नहीं चलाना चाहता। नहीं तो लोग कहेंगे तुम प्रैक्टिकल के अंकों के कारण टॉप कर रहे हो।"
अंतर्मुखी से बहिर्मुखी का सफर
उस दिन से मेरा जीवन बदल गया। यह मेरे जीवन का पहला मोड़ था। मैं पढ़ाई में जुट गया। अल्लामा इकबाल का वह प्रसिद्ध शेर अपनी हर कॉपी के पहले पेज पर लिखता था ताकि मैं रोज अपने लक्ष्य को याद रख सकूँ।
त्रिपाठी सर मुझे पुस्तकालय ले कर गए। 'कुछ अलग करो' वाक्य मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। मेरी दिनचर्या थी सुबह आठ बजे घर से कॉलेज कक्षा में जाना उसके बाद पुस्तकालय जाना, फिर परेड करना, शाम को अंग्रेजी की ट्यूशन पढ़ना। त्रिपाठी सर के घर जाना फिर लौटना।
त्रिपाठी सर ने मुझे विवेकानंद सोसाइटी और अरविन्द सोसाइटी का सदस्य बनाया। शहर के हर कार्यक्रम में भाग लेने की प्रेरणा दी। इस सब से मेरे व्यक्तित्व में बहुत परिवर्तन आ गया। मैं अब इंट्रोवर्ट, अंतर्मुखी से एक्सट्रोवर्ट, बहिर्मुखी हो गया। मैं एक ऐसा व्यक्ति बन गया जो सामाजिक रूप से सक्रिय और उत्साही था। मुझे दूसरों के साथ बातचीत करने में आनंद आने लगा।
मैं अब पढ़ाई के साथ नाटक करता, तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में भाग लेता। राष्ट्रीय कैडेट कोर में सीनियर अंडर ऑफिसर बन गया। राष्ट्रीय सेवा योजना का संयोजक बन गया। कैम्प लगाने लगा। गाँव में प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र खोला। जब हमारा फर्स्ट ईयर की परीक्षा का रिजल्ट आया तो मैं कॉलेज की सभी फैकल्टी में सर्वाधिक नम्बर लाया।
मेरी कक्षा के लड़के और लड़कियाँ मुझे ढूँढने लगे। मैं फेमस हो गया था। मुझे भी मजा आ रहा था। मैंने सफलता का स्वाद चख लिया था। त्रिपाठी सर के कारण पढ़ाई से फोकस नहीं हटा। अगली साल मैंने अपने रिजल्ट को दुहराया।
पितृऋण और नियति का बंधन
मेरी शादी का किस्सा बहुत अनूठा है। जब मैं सातवीं कक्षा में था मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया। मेरे चाचा ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। लेकिन बैंक में मैनेजर होने के कारण वह घर से बाहर ही पोस्टिंग पर रहते। घर का काम दादी देखती थी। हम भाई क्या विषय ले रहे कहाँ एडमिशन ले रहे यह निर्णय खुद लेने की आजादी थी। गाँव में हमारा परिवार सबसे धनी, साधन सम्पन्न परिवार था।
जब मैं फर्स्ट ईयर का छात्र था, मेरी शादी की बात चलने लगी। बुंदेलखंड में उन दिनों लड़के की योग्यता न देख कर परिवार की हैसियत देख कर शादियाँ होती थी। परिवार के रिश्तेदारों के अलावा नाई तथा पंडित शादियों को तय करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।
तो कभी-कभी मुझे लड़की वाले देखने आते। मैं घर पर नहीं मिलता तो मेरे कॉलेज आते। मेरे टीचर क्लास में मेरा नाम बुलाकर कहते भैय्या बाहर तुम्हें लड़कीवाले देखने आये हैं। क्लास के सभी लड़के, लड़कियाँ हंसते मजाक बनाते थे। यह लगभग हर महीनें दुहराया जाने लगा।
मेरी दादी चाहती थी कि उनके मरने के पहले वह अपने पोते का मुँह देख कर मरे। मेरी शादी में मेरी कोई भूमिका नहीं थी। मुझे पितृऋण चुकाना था खानदान के वंश को चलाने में अपना योगदान देना था।
एक दिन दादी तथा चाचा जी में बहुत बहस हुई। दादी ने बहुत चुभती बात चाचा जी को कह दी कि इसका बाप नहीं है। इस कारण तुम इसकी शादी नहीं कर रहे हो। चाचा जी को यह बात बहुत बुरी लगी और उन्होंने कहा कि आज जो रिश्ता आयेगा वहां शादी निश्चित कर लेंगे। यह बहस सुबह हुई थी। दोपहर उस दिन टीकमगढ़ के चतुर्वेदी परिवार से रिश्ता आया और चाचा जी ने मेरी शादी तय कर दी। बहुत धूमधाम तथा बड़े अरमानों से उन्होंने मेरी शादी की। शादी की बारात टीकमगढ़ मेरे मोहल्ले में ही जाना थी। तीन दिन बारात लड़की के घर रुकी। मेरे पूरे गाँव के लोग तथा पूरे कॉलेज के सभी लड़के, लड़कियाँ बारात में आए। मेरी दादी का यह सबसे अच्छा निर्णय था। जब मैं एम ए प्रीवियस में था मेरा पहला लड़का पैदा हुआ।
मुझे याद है उस दिन मेरा पेपर था तो मेरे छोटे भाई ने पूरी व्यवस्था देखी। दादी खुश थी उनका पोता आ गया था। जब छोटे में शादी होती है तो पति-पत्नी में विवाद नहीं होते। दोनों एक ही परिवार में पलते बढ़ते हैं। उनकी आदतें, पसंद-नापसंद एक जैसी होती।
धर्म मान्यताएं समान होती। दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति एक जैसी होती। जल्दी बच्चा होने से जब आप जवान होते हैं तो बच्चे की जिम्मेदारी अच्छे से पूरी कर पाते हैं। मुझे इस का बहुत फायदा मिला। मेरे दोनों बच्चे समय पर सेटिल हो गए।
अग्निपरीक्षा का दौर
मेरे स्नातक के अंतिम वर्ष में देश में इमरजेंसी लागू हो गई। कॉलेज की छात्र यूनियन के चुनाव रोक दिए गए। मेरिट के आधार पर छात्र यूनियन गठित होने लगी। अंकों के आधार पर मुझे जनरल सेक्रेटरी नामांकित किया गया। अगले साल मैंने भूगोल से एम ए करने के लिये एडमिशन लिया। तब मुझे छात्र संघ का प्रेसीडेंट बनाया गया। यू
निवर्सिटी में बोर्ड ऑफ़ स्टडीज का सदस्य नियुक्त किया गया। जय प्रकाश आन्दोलन से जुड़ गया। सर्वोदय आंदोलन में काम करने लगा। एम ए अंतिम वर्ष में मुझे यूनिवर्सिटी के छात्र संघ का अध्यक्ष नामांकित किया गया। क्योंकि पूरी यूनिवर्सिटी की सभी फैकल्टी में मेरे सर्वाधिक अंक थे। मुझे गोल्ड मैडल दिया गया।
यह सब एक तरफ चल रहा था, और जीवन दूसरी तरफ अपनी क्रूरता दिखा रहा था। कॉलेज के वार्षिक समारोह के लिए छात्रों ने फ़िल्मी गीत गाने वाले ऑर्केस्ट्रा को बुलाने का सुझाव दिया। मैंने कहा कवि सम्मेलन आयोजित करेंगे। भारी विरोध के बाद मेरी बात इस शर्त पर मानी गई कि गोपाल दास नीरज जी को बुलाया जाए। मैंने हाँ कर दी।
उन्हें आमंत्रण भेजा गया। उन्होंने दो और कवयित्रियों को बुलाने की शर्त रखी। बजट कम था लेकिन दूसरे खर्च कम कर उन्हें भी आमंत्रण भेजा गया। सब ने लिखित सहमति भेज दी। कवि सम्मेलन के दिन नीरज जी नहीं आए। कैंपस में हंगामा हो गया। बड़ी मुश्किल से कार्यक्रम हो सका।
मेरे दोस्त के भाई तथा उनके दो साथियों ने शराब पीने के पैसे मांगे। मैंने बहुत मना किया पर उन्होंने बहुत जिद की। मुझे पैसे देने पड़े। वह शराब पीने दो मोटर साइकिलों पर गए। बस स्टैण्ड की दुकान पर शराब पी कर जब मोटरसाइकिलों से लौट रहे थे तो सड़क की ढलान पर स्पीड बहुत तेज थी।
दोनों आस-पास चल रहे थे। हिलने पर उनके हेंडिल भिड़ गए। दोनों मोटरसाइकिलें नीचे गिरी। सभी को चोट आई। लेकिन एक लड़के की रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसने अपनी पूरी जिंदगी बिस्तर पर गुजारी। नई-नई शादी हुई थी, परिवार की खुशियां हमेशा के लिए छिन गई।
इन्हीं दिनों मुझे यूनिवर्सिटी के काम से रीवा जाना पड़ता था। टीकमगढ़ से रात की बस रीवा जाती थी। रात भर बस की यात्रा बहुत थकान वाली होती थी। सुबह बस रीवा पहुँचती। रीवा बस स्टैण्ड पर एक धर्मशाला में ठहरता था। धर्मशाला के कमरे बहुत छोटे थे।
सबसे मजेदार था पाखाना। कमरों की लंबी लाइन। कमरे में पाखाने में बैठने की जगह। नीचे खुला गड्डा होता था। जहाँ सुअर रखे जाते। जब पैखाना गिरता सूअर उसे खा कर साफ करते थे। ऐसी व्यवस्था मैंने पहली बार देखी थी। उन दिनों सर पर मैला ढोने की प्रथा थी। जाति विशेष के लोग यह काम करते थे। मुख्यतः महिलाएँ। बाद में सरकार ने सर पर मैला ढोने की प्रथा को गैर कानूनी घोषित कर बंद करवाया।
यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक भवन में गया तो देखा गलियारों में बोरों में परीक्षा की कॉपियाँ बिखरी पड़ी हैं। लोग उन्हीं बंडलों पर से आना जाना कर रहे थे। मुझे परीक्षा की कॉपियों की ऐसी दशा देख कर बहुत बुरा लगा। मैंने पूछा कि अगर किसी की कॉपी खो जाए तो फिर क्या होता है। मुझे बताया गया कि यूनिवर्सिटी तब उस समय जो औसत अंक है वह विद्यार्थी को दे कर रिजल्ट घोषित कर देती है। मैं शायद किस्मत वाला था। मेरी कॉपी कभी नहीं खोई थी।
बोर्ड ऑफ़ स्टडीज की बैठकों में मुझे बघेलखंड बनाम बुंदेलखंड की प्रतिस्पर्धा का अहसास हुआ। बघेलखंड निवासी एक प्रोफेसर ने मुझसे कहा था कि तुम बुंदेलखंड के हो कर मेरिट में कैसे आ सकते हो। क्योंकि बघेलखंड के लोग कभी नहीं चाहते कि बुंदेलखंड के स्टूडेंट्स, रीवा, बघेलखंड की यूनिवर्सिटी में टॉप करें।
तब मैंने इस राजनीति को जाना। क्षेत्रवाद से यह मेरा पहला परिचय तथा अनुभव था। जो बघेलखंड रीवा का स्टूडेंट मेरा प्रतिद्वंदी था उसके मार्क्स मुझसे पंद्रह प्रतिशत कम थे। इसलिए बघेलखंड के लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर सके और मैं मेरिट में टॉप करता रहा।
जब मैंने स्नातकोत्तर डिग्री पूर्ण की तब अंतिम समय में इमरजेंसी समाप्त हो गई थी। तब कुछ छात्र परीक्षा बढ़ाने के लिए आंदोलन करने लगे। मैं परीक्षा समय पर करवाने का पक्षधर था। लेकिन छात्रों के दवाब के कारण मुझे छात्र आंदोलन में भाग लेना पड़ा। तब पुलिस ने हम लोगों को शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। उस समय लगा था कि भविष्य का कैरियर खतरे में हो गया।
लेकिन जीवन तो बस एक कहानी है। हर संघर्ष एक नया मोड़ देता है, और हर मोड़ पर एक नया सबक सिखाता है। मेरा सफर यहीं खत्म नहीं हुआ था। यह तो सिर्फ मेरे जीवन की शुरुआत थी, एक ऐसी कहानी जिसका हर शब्द मेरे अनुभव से तराशा गया था।
रायपुर
नियति की चौखट पर, रायपुर में
एमफिल में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के भूगोल विभाग में एडमिशन के लिए मुझे रायपुर जाना था। यह सिर्फ एक शहर की यात्रा नहीं थी, बल्कि एक अनजाने सफर की शुरुआत थी। मैं घर से कभी बाहर नहीं गया था। केवल एक बार छात्रवृत्ति के लिए ट्रेन से भोपाल गया था। परिवार के लोग चिंतित थे। यह चिंता वाजिब थी, क्योंकि मैं एक ऐसे सफ़र पर निकल रहा था जहाँ अनजान लोग और अनजान रास्ते मेरा इंतज़ार कर रहे थे।
अनपेक्षित सहायता और छात्रावास का अकेलापन
कुण्डेश्वर के दीक्षित परिवार के एक सदस्य, शर्मा जी, रायपुर बस स्टैण्ड पर क्लच प्लेट सुधारने की दुकान चलाते थे। उनके नाम दीक्षित जी ने मदद करने के लिए पत्र लिख दिया था। छत्तीसगढ़ की ट्रेन से सुबह रायपुर पहुँचा। रेलवे स्टेशन से रिक्शा लेकर बस स्टैंड आया।
दीक्षित जी का पत्र शर्मा जी को दिया। उन्होंने नाश्ता करवाया। मैंने अपना सामान उनकी दुकान पर रख दिया। उन्होंने बताया कि पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय भिलाई रोड पर आमा नाका के पास है। आमा नाका पर रोडवेज की बसों का डिपो था।
मैं बस स्टैण्ड से खाली बस में बैठकर आमा नाका आया। वहाँ से रिक्शा लेकर विश्वविद्यालय के कैम्पस में दाख़िल हुआ। तब तक लंच टाइम हो जाने से लोग बाहर टहल रहे थे। मैंने रिक्शे से उतर कर जिस आदमी से प्रशासनिक भवन के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि सामने का भवन ही प्रशासनिक भवन है।
उन्होंने ने पूछा मुझे किस विषय में एडमिशन लेना है तब मैंने एम फिल, भूगोल बताया। उन्होंने अपना परिचय दिया कि वह अग्रवाल बाबू हैं और भूगोल की लैब के प्रभारी हैं। यह किस्मत ही थी कि जिस पहले आदमी से मुलाकात हुई वह उसी "डिपार्टमेंट" का था। उन्होंने मेरी बहुत मदद की। एडमिशन फॉर्म लेकर भरवाया, फीस जमा करवाई, हॉस्टल का फार्म भरवाया तथा कमरा अलॉट कर दिया। स्कॉलरशिप का फॉर्म भरवा कर जमा करा दिया।
उनके स्कूटर से हॉस्टल आकर रूम की चाबी ले ली। उन्होंने कमरा साफ करवाया। मैं वापस शर्मा जी के पास आया और सामान उठाकर कमरे में रात को रुका। लगभग हॉस्टल खाली था। आमा नाका जाकर सरदार जी के ढाबे पर खाना खाया और घोड़ा बेच कर सो गया। वाह क्या जगह है।
धीरे-धीरे हॉस्टल में स्टूडेंट्स आते गए। मैंने देखा जब बच्चे पहली बार हॉस्टल की आजादी को महसूस करते तब जो बच्चे पजामा का नाड़ा ठीक से नहीं बाँध सकते वे सब तरह के नशे करते। एक तरह का नशा था गुड़ाखू। हर बच्चा करता। शुरू में मुझे लगा कि सब दिन में कई बार लाल दन्त मंजन करते हैं। मुझे लगा कि सब दाँतों की सफाई का ध्यान रखते हैं। पर मेरे एक नए बने मित्र पुलस्त्य ने बताया कि 'गुड़ाखू' तम्बाकू से बना नशा है।
तब मुझे पहली बार यह एहसास हुआ। 'गुड़ाखू' एक पेस्ट जैसा तम्बाकू है जिसका भारत के कई राज्यों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। उपयोग के दौरान इसे दाँतों और मसूड़ों पर उँगली की नोक से रगड़ा जाता है। तम्बाकू के अलावा, इसमें गुड़, चूना, लाल मिट्टी और पानी भी होता है।
पुलस्त्य हॉस्टल में विगत छह साल से रह रहे थे। उन्होंने अनेक विषयों में डिग्रियाँ पूरी कर ली थी और कई डिप्लोमा कोर्स किए थे। उनके पास हॉस्टल में दो रूम थे। एक रहने के लिए दूसरा कसरत के लिए। उनका शरीर बहुत बलिष्ठ था।
ज्ञान का सागर और एक असाधारण गुरु
सुबह डिपार्टमेंट गया। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर का भूगोल विभाग, विश्वविद्यालय के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण विभागों में से एक। भूगोल अध्ययन शाला स्कूल ऑफ स्टडीज इन ज्योग्राफी की स्थापना 1965 में हुई थी। भूगोल विभाग विश्वविद्यालय के पाँच सबसे पुराने विभागों (स्कूल ऑफ स्टडीज) में से एक है। एमफिल, पाठ्यक्रम की शुरुआत, यह विभाग उन गिने-चुने भूगोल विभागों में से एक है जिसने देश में एम.फिल. पाठ्यक्रम को सबसे पहले शुरू किया। विभाग के पहले विभागाध्यक्ष थे प्रो. डॉ. प्रेम चंद अग्रवाल।
विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. प्रेम चंद अग्रवाल से मिला। उन्होंने डॉ. शंकर राय, रीडर, को गाइड नियुक्त किया। डॉ. राय ने मुझे समझाया एम फिल दो साल का कोर्स है। एक साल क्लास और दूसरे साल थीसिस। अगर मेहनत करो तो एक साल में भी कर सकते हो।
थीसिस एक विस्तृत, औपचारिक शोध पत्र है जो किसी विशेष विषय पर गहन शोध और विश्लेषण के बाद लिखा जाता है। इसे एक स्वतंत्र विद्वान के रूप में, किसी विषय पर मौलिक शोध करने और अपने निष्कर्षों को प्रस्तुत करने की क्षमता का प्रमाण माना जाता है।
मैं एम ए में डिजर्टेशन लिख चुका था। डिजर्टेशन को हिंदी में शोध प्रबंध या शोध-निबंध कहते हैं। यह एक विस्तृत, औपचारिक, और लिखित दस्तावेज होता है जो किसी विशेष विषय पर गहन शोध और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आमतौर पर, यह मास्टर्स डिग्री के लिए आवश्यक था।
मैंने टीकमगढ़ जिले के भूमि उपयोग विषय पर त्रिपाठी सर के अधीन डिजर्टेशन लिखा था जो मैं साथ लाया था। डॉ. राय ने मुझे इसी विषय पर थीसिस करवाने की सहमति दे दी। मैंने एक साल में कोर्स पूरा करने का अनुरोध डॉ. राय से किया। उन्होंने मुझे रात को लैब में काम करने के लिए व्यवस्था कर दी।
पायल की झंकार और जीवन का संगीत
कैंपस में तरह-तरह की कहानियाँ सुनाई जाती थी। मेरे विभाग की लैब मेन गेट के पास थी और हॉस्टल वहाँ से लगभग एक किलोमीटर दूर कैंपस के अंत में। वहाँ एक बंजारी माता मंदिर था। हम सुबह माता जी को प्रणाम करने जाते। फिर क्लास होती। दोपहर का खाना मेस में। फिर पुस्तकालय। रात को थीसिस का काम।
भूगोल में आँकड़ों की गणना कर टेबिल बनाना फिर कार्टोग्राफी से ट्रेसिंग पेपर पर मानचित्र। बहुत टाइम लगता। तब आज की तरह ना तो कैलकुलेटर थे और ना कम्प्यूटर। सब काम हाथ से। आँकड़ों की गणना करने के लिए विभाग में एक फेसिट मशीन थी।
मानचित्र ट्रेसिंग टेबिल पर स्टेंशिल्स की मदद से बनाते। प्रिंटिंग में भिजवाने के पहले टाइप राइटर पर टाइप करवाना। प्रिंटिंग प्रेस में तब एक-एक अक्षर जमा कर प्रिंटिंग के लिए फर्मा बनता। हर स्टेज पर गलतियाँ सुधारने का मेहनत का काम। जरा सी गलती और पूरा पेज बेकार।
कैंपस में मेरे सीनियर चंद्राकर जी डॉ. शंकर राय के अधीन विगत तीन साल से पीएचडी रिसर्च कर रहे थे। धीरे-धीरे उनसे दोस्ती हो गई। उनके कमरे की हालत ऐसी थी कि महीनों में एक बार झाड़ू लगाते। चाय का वर्तन दो-तीन महीनों में धोते । पलंग के नीचे सब कुछ कपड़ा, किताबें, पुराने अखबार। चंद्राकर जी और मैं डॉ. शंकर राय के अधीन ही काम कर रहे थे।
अपने काम के साथ-साथ डॉ. शंकर राय के द्वारा बताए काम भी हम लोग करते थे। डॉ. शंकर राय बहुत दबंग, छह फुट लंबे, पहलवान जैसी पर्सनालिटी के मालिक थे। उनके पास बुलेट मोटरसाइकिल थी। उस पर जब चलते तो पूरे हीरो लगते। वह हमारे हॉस्टल के वॉर्डन भी थे।
उनकी एक बहुत सुन्दर पुत्री थी जो कभी-कभी किसी लड़के के साथ घर से भाग जाती थी। तब वह क्लास में घोषणा करते- "मेरी लड़की किसी लड़के के साथ भाग गई है। मैं उसे ढूँढने जा रहा हूँ। इसलिए आगे क्लास नहीं होगी।"
चंद्राकर जी ने एक कहानी सुनाई कि कैम्पस में एक लड़की ने प्यार में असफल होने पर आत्महत्या कर ली थी। अब रात में उसकी पायल की आवाज कैम्पस में गूँजती है। रोज रात को दो बजे काम करके लैब से हॉस्टल जाता तो हनुमान चालीसा का पाठ करता।
अब कह नहीं सकता कि हनुमान चालीसा का चमत्कार था या चंद्राकर जी की कहानी झूठी थी। न तो कभी पायल की झंकार सुनी ना वह मिली। साल ऐसे ही कट गया। मैंने सभी पेपर अच्छे मार्क्स से पास कर लिए थे। मेरी थीसिस का कुछ काम बचा था। इस कारण गर्मियों की छुट्टियों में घर नहीं गया। थीसिस का काम करता था। गर्मियों की छुट्टियों के कारण पूरा कैम्पस तथा हॉस्टल खाली था।
हम हर शनिवार को इंग्लिश मूवी देखने जाते जो ना हमें समझ आती ना सिनेमा हॉल वाले को। हम लोगों को स्टूडेंट आईडी कार्ड पर टिकिट सस्ते मिलते थे। एक बार हम लोग सिकंदर की मूवी देखने गए तो देखा कि पहले पार्ट में सिकंदर मर रहा था और दूसरे पार्ट में पैदा हो रहा था।
बाद में पता चला कि सिनेमा हॉल के लड़के से गलती हो गई थी उसने दूसरा पार्ट पहले दिखा दिया और पहला बाद में। मजेदार बात यह थी कि सिनेमा हॉल में किसी ने हल्ला नहीं मचाया। इसका मतलब था किसी को समझ नहीं आया था।
रायपुर में गणेश उत्सव और काली माता के उत्सव की बड़ी धूम होती थी। हम लोग रात भर झाँकियाँ देखते फिरते थे। दोस्तों के साथ मस्ती करते। हमारा एक दोस्त उड़ीसा से था। उसकी हैंडराइटिंग बहुत बढ़िया थी। वह बैगनी स्याही के पेन से लिखता था।
उसकी एक प्रेमिका थी जिसकी आवाज में उसके पास एक गाना था- "तेरा मेरा प्यार अमर, फिर न जाने क्यों लगता है डर" यह गीत "असली नकली" फिल्म का था। वह हमेशा गाता तथा सुनता था। उसके पास एक कैमरा था। खूब फोटो खींचता। रील डेवलप करने स्टूडियो में देता। मेरी उसने फोटो निकाली थी जो अभी भी मेरे पास है।
उस ने मुझे फोटो खींचना सिखाया। तब से मुझे फोटोग्राफी का शौक लग गया। मैंने बाद में एक कैमरा खरीदा और फोटोग्राफी करने लगा। तब यह हॉबी बहुत महँगी पड़ती थी। हॉस्टल में सब तरह के व्यसन चलते थे। लेकिन मेरे सभी दोस्त मेरे जैसे थे इसलिए मुझे किसी व्यसन की लत नहीं लगी।
एक नया लक्ष्य: लोक सेवा आयोग की परीक्षा
ऐसे ही गर्मियों के एक दिन मैं मेरे कमरे के सामने रहने वाले टेकाम के कमरे में गया। वह एक फॉर्म भर रहा था। मैंने उससे पूछा कि यह क्या फॉर्म है। तब उसने बताया कि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने बहुत से खाली पदों के लिए विज्ञापन निकाला है। वह उसी की परीक्षा का फॉर्म भर रहा है। उसने मुझे इस परीक्षा में बैठने की सलाह दी। मैंने इस दिन के पहले इस परीक्षा का नाम नहीं सुना था।
मैंने टेकाम को बताया- "मेरा पहला लक्ष्य सेना में जाने का था। मेरी दादी इस के बहुत खिलाफ थी। तब मैंने कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी करने की सोची थी। त्रिपाठी सर की भी यही सलाह थी। तब इस पद के लिए न्यूनतम योग्यता एम फिल या पीएचडी थी। इसी कारण मैं एम फिल कर रहा था।"
टेकाम ने पूछा- "क्या मैं किसी नौकरी के लिए पहले किसी परीक्षा में बैठा हूँ ?"
"नहीं मैं किसी परीक्षा में नहीं बैठा।" मैंने जवाब दिया।
टेकाम ने कहा कि "कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी के लिए भी मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ही परीक्षा लेता है, तो तुम इस परीक्षा में बैठकर अनुभव ले लो।"
मैंने उसकी बात मान ली। यह मेरे जीवन का दूसरा मोड़ था। मैंने टेकाम की सलाह पर कैम्पस के पोस्ट ऑफिस से मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का आवेदन फॉर्म खरीदा। मैंने अपने जीवन का पहला फॉर्म भरा था।
तो सोचा कि हमारे एक प्राध्यापक गुप्ता सर कैम्पस में अनुसूचित जाति, जन जाति के आवेदकों को राज्य शासन की ओर से संचालित सेंटर पर कोचिंग देते थे। मैंने सोचा उनसे फॉर्म चेक करवा लेता हूँ ताकि कोई गलती न हो।
मैं उनके घर फॉर्म की जाँच करवाने गया। उन्होंने देखा कि मैंने केवल तृतीय श्रेणी के पदों के लिए फॉर्म भरा था। उन्होंने पूछा तो मैंने बताया कि मैं केवल अनुभव के लिए बैठ रहा हूँ। तब उन्होंने कहा जब फेल हो कर अनुभव लेना है तो प्रथम तथा द्वितीय श्रेणियों के पदों की परीक्षा दे दो।
इन श्रेणियों में राज्य प्रशासनिक सेवा उप जिलाध्यक्ष / डिप्टी कलेक्टर, राज्य पुलिस सेवा उप पुलिस अधीक्षक / डीएसपी, राज्य लेखा सेवा, वाणिज्य कर अधिकारी तथा जिला आबकारी अधिकारी जैसे पद आते हैं।
पहले मैंने वैकल्पिक विषय में यूरोपियन हिस्ट्री विषय लिया था। अब इन कैटेगरी के लिए एक और विषय लेना था। मेरा गणित बहुत कमजोर था इस लिए अर्थशास्त्र विषय नहीं लिया। तब गुप्ता जी ने मेरे बी ए का हिन्दी विषय फॉर्म में लिख दिया तथा डीएसपी की जगह डिप्टी कलेक्टर को पहला प्रेफरेंस लिख दिया। उनके घर से निकल कर मैंने फॉर्म पोस्ट ऑफिस से रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया।
हॉस्टल में आकर मैंने पहली बार इन चयनित विषयों का सिलेबस देखने के लिए मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की निर्देश पुस्तिका ध्यान से पहली बार पढ़ी। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 118 (3) के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में निष्पक्ष और योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों की भर्ती करना था। इसका मुख्यालय इंदौर में स्थित है।
यूरोपियन हिस्ट्री का सबसे कम तथा हिन्दी का सबसे विस्तृत सिलेबस था। अगले दिन मैंने गुप्ता जी से शिकायत कि तो वह मुझे पुस्तकालय ले गए। उन्होंने वहाँ श्रीवास्तव पुस्तकालय इंचार्ज से मिलवा कर उनसे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पुराने प्रश्न पत्र तथा सभी किताबों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। श्रीवास्तव जी ने मुझे पिछले दस वर्षों के पुराने प्रश्न पत्र दिए तथा सभी सम्भव किताबें उपलब्ध करवा दी।
चोरी की रात और नियति का खेल
दो-तीन दिन मैंने कुछ नहीं किया। एक दोपहर मैं खाना खा कर कमरे में लेटा था। ना जाने कहाँ से मेरे मन में ख्याल आया
"पस्तोर जी तुम कभी फेल नहीं हुए यदि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में फेल हो जाते हो तो रिकॉर्ड खराब हो जायेगा।"
तब मैंने उठ कर टाइम टेबल बनाया। उसके हिसाब से नोट्स बनाना शुरू किए। खूब मेहनत की। जितनी किताबें हो सकती थी एकत्र की।
इस बीच श्रीवास्तव पुस्तकालय इंचार्ज से अच्छी दोस्ती हो गई थी। वह अपने घर गोरखपुर जा रहे थे। उनकी पत्नी को बच्चा हुआ था। उन्होंने अनुरोध किया कि जब वह पिछली बार घर गए थे तो उनके यहाँ चोरी हो गई थी। तो उन्होंने उनकी अनुपस्थिति में उनके घर में सोने का अनुरोध किया। मैं अकेला हॉस्टल के कमरे में सोता था तो मुझे कोई दिक्कत नहीं लगी। मैं उनके घर सोने लगा।
मैं हमेशा रात में नौ बजे सो जाता तथा चार बजे उठ जाता। जिस दिन श्रीवास्तव जी को आना था उसके एक दिन पहले की रात मैं बहुत गहरी नींद में सो रहा था। मैं अपने कपड़े खूँटी पर टाँग देता था। हाथ घड़ी पलंग के पीछे संदूक पर रख देता था। उस रात चोर आए। मेरे कपड़े, घड़ी, पैसा तथा जूते तक ले गए।
श्रीवास्तव जी के बड़े-बड़े संदूक मेरे सिरहाने से ले गए। चोरों ने दरवाजे की सटकनी गिलमिट से छेद कर निकाल दी थी। चोर इतना सब करते रहे और मैं सोता रहा। सुबह जब समय देखने हाथ पीछे किया तो घड़ी गायब थी। मुझे श्रीवास्तव जी के लौटने पर घर जाना था। मैंने बैंक से पूरा पैसा निकालकर पर्स में रखा था। सब गायब था। मैंने चादर लपेट कर पड़ोसियों को उठाया। उन्हें पूरी घटना बताई। हम लोग पुलिस थाने रिपोर्ट करने गए। उलटा पुलिस मुझ पर शक करने लगी। श्रीवास्तव जी ने मुझे पूरे घर की चाबियाँ दी थी। उनके संदूक चादर से ढके थे। मैंने नहीं देखे थे कितने थे।
अगले दिन श्रीवास्तव जी आ गए तब उन्होंने चोरी गए सामान का पूरा विवरण पुलिस को दिया। कुछ संदूक तथा कपड़े, कागज और अन्य सामान सामने के खेत से मिला। श्रीवास्तव जी ने मुझे किराये के पैसे दिए तब मैं टीकमगढ़ लौट सका।
एम फिल, भूगोल का रिजल्ट जब आया तो मैंने एक साल में ही यह कोर्स बहुत अच्छे मार्क्स से पास कर लिया था। मैंने यहाँ भी यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। डॉ. राय चाहते थे कि मैं उनके अंडर पी एचडी करूँ। मैंने पी एचडी के लिए रजिस्ट्रेशन करवा लिया। मुझे यू जी सी की स्कॉलरशिप मिल गई थी। लेकिन मुझे पी एचडी बीच में छोड़ कर टीकमगढ़ आना पड़ा।
ग्वालियर
अग्निपरीक्षा का द्वार और ग्वालियर का सफ़र
मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा जनवरी में थी, और टीकमगढ़ में सेंटर नहीं था। रायपुर और नहीं रुकना चाह रहा था, इसलिए परीक्षा फॉर्म में मेरे घर से सबसे नजदीक उपलब्ध ग्वालियर सेंटर भर दिया था। यह सिर्फ एक परीक्षा केंद्र का चयन नहीं था, बल्कि मेरे भीतर की बेचैनी और एक नए शहर में जाने की उत्सुकता का परिणाम था। टीकमगढ़ लौटकर मैं मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने ग्वालियर गया।
ग्वालियर में मेरे छोटे भाई की ससुराल है, मैं वहीँ रुका। ससुराल में खूब खातिरदारी हुई। मगर मेरे दिमाग में तो सिर्फ एक ही चीज़ चल रही थी- परीक्षा। महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में मेरा परीक्षा का सेंटर था।
महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्थित एक प्रतिष्ठित और शासकीय स्वशासी उत्कृष्ट संस्थान है। इसे अक्सर एमएलबी कॉलेज के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान अचलेश्वर मंदिर के पास, सनातन धर्म मंदिर रोड, लश्कर पर स्थित है।
मैंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पिछले दस वर्षों के पुराने प्रश्नों के आधार पर पाठ्यक्रम/सिलेबस के आधार पर चैप्टर/अध्याय वाइज उत्तर लिख डिटेल नोट्स बनाए थे।
खूब रिवीजन किया था। पॉकेट डायरी में महत्वपूर्ण पॉइंट लिख कर याद किया था। मैं हमेशा पूरा सिलेबस कवर करता था। यह आदत कालेज के दिनों से थी। इसलिए मैं हमेशा परीक्षा पेपर के सभी प्रश्न हल कर सकता था। मुझे कभी केवल इम्पोर्टेन्ट पढ़ने की जरूरत नहीं होती थी। मैंने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ी, नहीं कोचिंग ज्वाइन की। बाजार से गाइड या नोट्स खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। मेरी मेहनत मेरी अपनी थी, मेरी तैयारी मेरी अपनी तपस्या थी।
एक भयानक रात और सब कुछ का अंत
परीक्षा देने के बाद, एक भयानक रात मेरे जीवन में नया मोड़ लेकर आई। ग्वालियर से टीकमगढ़ के लिए रात में बस चलती थी। परीक्षा देकर मैं रात की बस से टीकमगढ़ आ रहा था। ठंड की रात थी। बस की सभी खिड़कियाँ बंद थी। रात में सभी यात्री कंबल ओढ़ कर सो रहे थे।
तभी यकायक बस में धुँआ भर गया। लोगों को साँस लेने में कठिनाई होने लगी। कुछ ने जैसे ही उनके पैर सीट के नीचे रखे, पैर जलने लगे। ड्राइवर ने बस रोक दी। मैं गहरी नींद में था। लोगों ने हिलाकर उठाया और बताया, “नीचे एसिड है।” मैंने अपनी किताबों के बैग जैसे ही उठाए उनमें से किताबें एसिड में फैल गईं। बैग कपड़े के थे, उनका कपड़ा एसिड से गल गया था।
मेरे पास ऐसे चार बैग थे, जिनमें पुस्तकालय की किताबें और मेरे नोट्स भरे थे। वह भी जल कर गल गए। सब बर्बाद हो गया था। मेरी किताबें और मेरे नोट्स नष्ट हो गए थे। अच्छी बात यह थी कि परीक्षा हो गई थी।
बाहर घुप अँधेरा था। सब लोग बस से बाहर आ कर खड़े हो गए। लोगों के पूछने पर ड्राइवर ने बताया कि बस में किसी सुनार के लिए ग्वालियर से सल्फ्यूरिक एसिड के तीन ड्रम बस के अंदर पीछे रखे थे। सल्फ्यूरिक एसिड का सुनार गहने बनाने में उपयोग करते थे। रास्ते में बस चलने पर ड्रम का ढक्कन खुलकर लुढ़क गया था, जिस कारण से बस में एसिड फैल गया था।
शुद्ध सल्फ्यूरिक एसिड गंधहीन होता है। यह रंगहीन और तैलीय तरल होता है। जब सल्फ्यूरिक एसिड को पतला किया जाता है या यह किसी धातु या हवा के साथ प्रतिक्रिया करता है, तो यह सल्फर डाइऑक्साइड गैस छोड़ता है।
सल्फर डाइऑक्साइड की गंध तीखी, घुटन भरी और अम्लीय होती है। इसकी गंध को जलती हुई माचिस की तीली या सड़े हुए अंडे जैसी होती है। सल्फर डाइऑक्साइड एक जहरीली गैस है। उस रात मेरी सारी मेहनत और सारे नोट्स गल गए, लेकिन मेरे दिमाग में जो ज्ञान था, वह कोई नहीं छीन सकता था।
शिक्षक से नायक बनने तक का सफ़र
इन्हीं दिनों टीकमगढ़ कॉलेज के भूगोल विभाग में एक एडहॉक प्राध्यापक की वेकेंसी निकली। मेरा उस पद पर चयन हो गया। जिस विभाग में मैंने अध्ययन किया था, अब उसी विभाग में मुझे पढ़ाने का अवसर मिल गया। मैं बहुत मेहनत से अपनी तैयारी कर फर्स्ट ईयर को पढ़ाता था। लेकिन छात्र बहुत रुचि नहीं लेते थे।
एक दो छात्र बहुत उजड्ड टाइप के थे। यह छात्र कक्षा शुरू होने के बाद आते, बहुत रौब के साथ। एक-दो बार मैंने उन्हें समझाना चाहा तो लड़ने को तैयार हो गए। मैंने एक बहुत बदतमीज छात्र को सबक सिखाने का निर्णय किया।
अगले दिन वह फिर लेट आकर कक्षा में घुसने लगा। मैंने उसे रोका तो उटपटांग बोलने लगा। मैंने एक लात जोर से मारी, वह बाहर बरामदे में गिर पड़ा। वह बाहर भाग गया। फिर कुछ नेता टाइप के लड़कों को लेकर आया।
मैं इस कॉलेज का तथा यूनिवर्सिटी का प्रेसीडेंट रह चुका था और उनमें से कुछ छात्र नेताओं के बड़े भाई मेरे साथी रह चुके थे। यह छात्र बाहर से पढ़ने नया-नया आया था और मेरे बारे में नहीं जनता था। उन छात्र नेताओं ने उसे मेरे बारे में बताया। तब उसने मेरी शिकायत कॉलेज के प्रिंसिपल से कर दी, उन्होंने मुझे बुला कर कहा कि "अब तुम छात्र नहीं हो, तुम अब प्राध्यापक हो, तो बच्चों को मार नहीं सकते।" बात खत्म हो गई।
मजा तो तब आया जब एक दिन एक लड़का मेरे भोपाल ऑफिस आया। मैं तब ग्रामीण विकास विभाग में अपर आयुक्त के पद पर था। उस लड़के ने मेरे पैर छुए। मैंने जब मना किया तो बोला "सर! अपने पहचाना नहीं। बहुत साल पहले कॉलेज में आपने मुझे एक लात मारी थी, उस कारण मैं आज पंचायत इंस्पेक्टर बन गया। यदि दो लात मार देते तो शायद डिप्टी कलेक्टर बन जाता।" कमरे में बैठे हम सब बहुत हँसे। पुरानी बातें याद आ गई।
सफलता का पहला स्वाद और राजनीति की कड़वाहट
1980 का दशक मध्य प्रदेश में प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती के लिए एक महत्वपूर्ण काल था। इस दौरान मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की कार्यप्रणाली भी विकसित हो रही थी। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा राज्य सेवा परीक्षा का आयोजन अपेक्षाकृत नियमित रूप से किया जाता था।
इन परीक्षाओं के माध्यम से डिप्टी कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर सीधी भर्ती की जाती थी। उस समय परीक्षा पैटर्न में मुख्य रूप से प्रारंभिक परीक्षा प्रीलिम्स, नहीं होते थे। सीधे मुख्य परीक्षा मेन्स और साक्षात्कार इंटरव्यू होते थे।
मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में लिखित परीक्षा और अंतिम चयन के बीच एक निश्चित अनुपात नहीं होता है, बल्कि यह एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है। अंतिम चयन के लिए मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों का विशिष्ट भार होता था। साक्षात्कार यह अंतिम चरण होता था। यह उम्मीदवार के व्यक्तित्व, संचार कौशल और प्रशासनिक भूमिकाओं के लिए आपकी उपयुक्तता का आकलन करता था।
आप इसे इस तरह समझ सकते हैं कि अंतिम चयन में लिखित परीक्षा मुख्य परीक्षा का लगभग 88.9% और साक्षात्कार का लगभग 11.1% का भार होता था। यह एक अनुपात नहीं, बल्कि अंकों का सीधा योग होता था। कट-ऑफ मार्क्स हर साल पदों की संख्या, परीक्षा के कठिनाई स्तर और उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर बदलते रहते थे।
एक दिन जब मैं क्लास ले रहा था, तब मेरा एक दोस्त अख़बार लेकर मेरे पास आया और बोला "तू यहां क्लास क्यों ले रहा है, तू तो मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा में फर्स्ट कैटेगरी के लिए पास हो गया है।"
मैंने जब अखबार देखा, रोल नंबर बार-बार मिलाया। भरोसा नहीं आया। पेपर लेकर घर गया, सब को बताया। सब बहुत खुश थे। मिठाई का भोग भगवान को लगा कर सब को प्रसाद दिया गया।
अगले दिन जब मैं कॉलेज गया, सब का व्यवहार मेरे प्रति बदल रहा था। टीचर कॉमन रूम में मेरी चर्चा हो रही थी। कुछ बहुत खुश थे, तो कुछ इस बात से दुखी थे कि मैंने फर्स्ट कैटेगरी के लिए क्यों भरा। उनका कहना था कि टीकमगढ़ जिले से आज तक फर्स्ट कैटेगरी में किसी का चयन नहीं हुआ था।
उन्हें डर था कि लिखित परीक्षा पास करने के बाद यदि इंटरव्यू में फेल हो गया या कम नंबर आए तो मेरा चयन नहीं होगा। कुछ शिक्षक मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में मिलने वाले तीनों अटेम्ट दे चुके थे। कुछ लिखित परीक्षा पास नहीं कर पाए थे तो कुछ इंटरव्यू में कम नंबर आने से रह गए थे। उनमें से अधिकांश मेरे शिक्षक रह चुके थे, इसलिए मेरी योग्यता पर उन्हें शक था।
उन सब की बातें मुझे रोज सुनना होती थी। मैं बहुत परेशान हो गया। घर पर भी लोग मिलने आते, अपने अनुभव बताते, दूसरों की असफलता के किस्से सुनाते। क्योंकि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा में जो बैठते उनकी संख्या बहुत होती है, पर बहुत कम का चयन होता, सफल बहुत कम होते। इसलिए असफलता की कहानियाँ अधिक थी।
मेरे पहले टीकमगढ़ के दो लोगों का चयन द्वितीय श्रेणी के पदों हुआ था। उनमें से एक बहुत बड़े सेठ का लड़का था। बहुत कहानियाँ थीं: लाखों की रिश्वत, मंत्रियों की सिफारिश, अधिकारियों से परिचय आदि। मेरे पास यह कुछ नहीं था। मैं उन दोनों से मिला, कोई सकारात्मक बातचीत नहीं।
आशा की किरणें और निराशा का अँधेरा
हमारा परिवार टीकमगढ़ के राज परिवार से जुड़ा रहा था। किसी ने सलाह दी, "नरेंद्र राजा से मिलो, वह शायद मदद करें।" मैं उनसे मिलने उनके फार्म पर गया। वह कुछ काम कर रहे थे। उनकी पत्नी ट्रैक्टर चला रही थीं। मैंने पहली बार किसी महिला को ट्रैक्टर चलाते देखा था।
नरेंद्र राजा गर्मजोशी से मिले। परिचय जानकर खुश हुए। बातों का सिलसिला चला। उन्होंने बताया कि किसी जमाने में वह आदिवासी विकास विभाग में विकास खंड अधिकारी के पद पर तामिया छिंदवाड़ा में काम कर चुके थे। उन्होंने अपने तीन-चार संदूक खोल कर दिखाए जिनमें सूट रखे थे।
बोले, "जितना वेतन था उस में मेरे सूट नहीं धुल पाते थे। रिश्वत लेता नहीं। गुजारा नहीं होता था।
नौकरी छोड़ दी। तब से खेती करता हूँ । चुनाव लड़ता हूँ । वर्तमान में ग्रामीण बैंक के चेयरमैन के पद पर हूँ।"
ग्रामीण बैंक का नया कॉन्सेप्ट शुरू हुआ था, ब्रांच मैनेजर के पद भरे जाना थे। उन्होंने सलाह दी कि अगर मैं ब्रांच मैनेजर के पद की लिखित परीक्षा पास कर लूँ तो वह मुझे इंटरव्यू में पास करवा कर ब्रांच मैनेजर बनवा देंगे। बहुत निराश हो कर घर लौटा।
इंटरव्यू की तिथि नजदीक आ रही थी। परिवार में सब परेशान। हमारे एक भाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह खबर लाए कि सतना से एक व्यक्ति मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य थे। उन्होंने सलाह दी, उनसे मिलाकर मदद मांग सकते हैं।
मेरे चाचा तथा बड़े भैया सतना गए। वह तो नहीं मिले। जिस दिन यह लोग बस से लौट रहे थे, उस दिन होली का त्यौहार था। दोनों बहुत परेशान होकर लौटे। मेरे चाचा ने मुझे बहुत डाँटा कि "अपना काम खुद क्यों नहीं कर सकते।"
मेरे पास कॉलेज में पढ़ाने की अस्थाई नौकरी थी। मुझे अपनी योग्यता पर भरोसा था। ज्यादा चिंता नहीं थी। इंटरव्यू ग्वालियर के रेस्ट हाउस में था। इंटरव्यू के नियत दिन के तीन दिन पहले मैं और मेरा छोटा भाई ग्वालियर गए। लोगों ने सलाह दी थी कि तीन दिन दूसरे लोगों के इंटरव्यू देखो। क्या पूछते हैं? इंटरव्यू की तैयारी कैसे करते हैं? कपड़े कैसे पहनते हैं? सवाल बहुत थे, जवाब देने वाला कोई नहीं। गाइड करने वाला कोई नहीं। भाई की ससुराल गए, वहाँ ऐसा माहौल कि मैं डिप्टी कलेक्टर बन ही गया हूँ। इससे पहले परिवार में किसी ने ऐसी परीक्षा कभी नहीं दी थी।
अंतिम युद्ध और एक असाधारण विजय
पहले दिन जब हम इंटरव्यू वाली जगह पहुँचे तो गजब का नजारा था। एक-एक कैंडिडेट के साथ कई लोग। कोई बड़ा नेता, कोई सेठ, कोई अधिकारी। कोई दो बार तो कोई तीसरी बार इंटरव्यू दे रहा था। मैं और मेरा छोटा भाई। इंटरव्यू शुरू हुए। जैसे कैंडिडेट बाहर आता उसको एक इंटरव्यू बाहर देना पड़ता। घेर लेते। साँस नहीं लेने देते। सवाल पर सवाल। इतना हल्ला कि कई बार कुछ सुनाई नहीं देता।
मैंने यह माहौल देखा तो मन में रात को सोचा, "अपना तो चांस है नहीं। हमने तो पहली बार कोई परीक्षा दी। वह भी एक्सपीरियंस के लिए। सो चिंता छोड़ो। मजे से इंटरव्यू दो।" मन से सारा दबाव उतर गया। मैं घोड़े बेच कर सो गया।
अगले दिन फिर इंटरव्यू देखने गए। एक लड़की बदहवास हालत में बाहर आई। लोगों ने उसे घेर लिया। उसने एक लड़के से कहा, "कुर्सी लाओ।" वह दौड़ कर कुर्सी लाया। उसने फिर कहा, "पानी लाओ।" दूसरा लड़का पानी की बॉटल लाया। उसने पानी पिया। फिर इत्मीनान से बोली, "जब मैं अंदर गई तो मैं बहुत घबड़ा गई। उन्होंने बैठने को कहा तो मुझे कुर्सी नहीं दिखी। एक सदस्य ने कुर्सी पर बैठाया। मैं बैठ गई। उन्होंने सवाल पूछने शुरू किए। मुझे कुछ समझ नहीं आया। मेरी घिग्घी बँध गई। अंत में हार कर उन्होंने मेरा नाम पूछा। वह भी मैं नहीं बता सकी।
उन्होंने मुझे जाने को कहा। जब मैं उठी तो मेरी साड़ी कुर्सी के पाये के नीचे बैठते समय दब गई थी। उठने पर कुर्सी धड़ाम से पीछे गिरी। मैंने पहली दफे साड़ी पहनी थी। मैं खुद सम्हलू या साड़ी संभालू, समझ नहीं आया।"
वह यकायक कुर्सी से उठी और अपने परिवार के साथ चली गई। लोग भौचक रह गए। गजब है भाई! मेरी हँसी छूट गई।
अगले दिन मेरा इंटरव्यू तीसरे नंबर पर था। मैं सोच रहा था, इंटरव्यू का तीसरा दिन और मेरा तीसरा नंबर। क्या संयोग था। जब मैं इंटरव्यू देने कमरे में गया तो वहाँ पाँच सदस्य बैठे थे। मैं निडर था।
मेरे पास मेरे सर्टिफिकेट के प्लास्टिक के तीन मोटे-मोटे फाइल फोल्डर थे, जिसमें हर पेज पर एक सर्टिफिकेट लगा था। मैंने सब को प्रणाम किया तथा अनुमति लेकर कुर्सी पर बैठा। मैं इत्मीनान से सीधा बैठा। सर्टिफिकेट के फोल्डर साइड में रख लिए। जो सदस्य मेरे बायें बैठे थे, उन्होंने एक फोल्डर उठा कर सर्टिफिकेट देखना शुरू किया। एक सर्टिफिकेट पर उनकी नजर रुक गई।
सदस्य- "तुमने एनसीसी में 'सी' सर्टिफिकेट किया है।"
"हाँ सर!" मैं उनकी ओर मुड़ा।
सदस्य- "तुम्हें बंदूक चलाना आता है।"
"हाँ सर!" मैंने गर्व के साथ कहा।
सदस्य- "कौन-कौन सी चलाई है?" उन्होंने रौबदार आवाज में पूछा।
मैंने सम्हल कर बैठते हुए उनकी आँखों में देखकर कहा- "थ्री नॉट थ्री सर।"
सदस्य- "बताओ गोली कैसे चलती है?" उन्होंने कहा।
मैंने पुरानी यादों के आधार पर पूरी प्रक्रिया दोहराई।
सदस्य- "गोली नहीं निकली।" मैंने फिर पूरी प्रक्रिया दोहराई।
सदस्य- "गोली फिर भी नहीं निकली।" उन्होंने फिर कहा।
मैंने आत्मविश्वास के साथ कहा- "सर गोली बातों से नहीं निकलेगी। थ्री नॉट थ्री मगवाएँ अभी चला कर दिखा सकता हूँ।"
वह मेरा आत्मविश्वास देखकर हँस दिए। उन्होंने कुछ कमांड पूछे। मैंने सही-सही जवाब दिए।
अब दूसरे सदस्य ने मध्य प्रदेश के नक्शे की ओर देखकर पूछा- "बैलाडीला क्या है?"
मैंने जवाब दिया- "सर यह लौह अयस्क की खदान है।"
"यह कहाँ है?" नक्शे की ओर इशारा किया।
वहाँ एक इंडिकेटर डंडा था। मैंने वह उठाकर नक्शे पर वह स्थान उन्हें दिखाया। वह खुश हुए। फिर पूछा- "इसका लोह अयस्क कहाँ जाता है?"
मैंने बताया- "सर जापान।"
उनका अगला सवाल था- "किस कंपनी के जहाज से?"
यह मैंने कहीं नहीं पढ़ा था। मैंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति से जवाब दिया- "सर! जापान शिपयार्ड कंपनी के जहाज से।" मैंने मन में सोचा भारत तो इतना विकसित है नहीं, तो जापान के जहाज से ही जाता होगा। उन्होंने कहा, "बहुत अच्छा।" मेरी जान में जान आई। फिर उन्होंने ग्रीनविच रेखा, समय निर्धारण, दिनों का अंतर जैसे अनेक भूगोल के सवाल पूछे। मैंने सभी जवाब सही-सही दिए।
अब बारी थी बीच में बैठे चेयरमैन सर की। उन्होंने टेबल पर रखी बहुत सारी पेपर कटिंग की ओर हाथ से इशारा कर पेपर कटिंग उठाने को कहा। लोगों ने बाहर बताया था कि बिना सेलेक्ट किए रेंडम कटिंग उठाना। अगर छाँट कर उठाओ तो कम मार्क्स मिल सकते हैं।
टेबल पर बहुत सारी पेपर कटिंग, कार्ड, और बहुत से कागज थे। लोगों ने बताया था कि उसमें गणित के सवाल भी हैं। मैं बहुत डर रहा था कि गणित का सवाल न उठा लूँ। मैंने मन ही मन माँ गायत्री को याद कर प्रणाम किया और मंत्र पढ़ा। फिर रेंडम एक कटिंग निकाल ली। यह जर्सी सांड का फोटो था।
चेयरमैन सर ने पूछा- "यह किस नस्ल का फोटो है?"
यह अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य के नाम का जर्सी सांड है। मैंने जवाब दिया।
"यह हमारे देश में क्या कर रहा है?" चेयरमैन सर ने पूछा।
इस के सीमन से देसी नस्ल की गायों को कृत्रिम गर्भाधान से गर्भ धारण करा कर ब्रीड को सुधारा जा रहा है, ताकि गाय अधिक दूध दे। मैंने धैर्य पूर्वक जवाब दिया।
"क्या यह कार्यक्रम सफल है?" उन्होंने पूछा।
हाँ! मैंने कहा।
"तुम ऐसा दावा कैसे कर सकते हो?" उन्होंने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा।
मैंने विनम्रता से कहा- "सर मेरे गाँव के पास कृषि विज्ञान केंद्र कुण्डेश्वर में यह सांड है और हमारे घर की कई गायों का सफलता पूर्वक कृत्रिम गर्भाधान से गर्भ धारण करा कर प्रसव करवाया गया है।"
वह मेरे उत्तर से प्रसन्न हो गए, उन्होंने मुझे जाने की अनुमति दी। मैं सब को प्रणाम कर बाहर आ गया। जब लोगों ने बाहर मेरा इंटरव्यू लिया तो मैंने पूरा विवरण शांति से सब को सुनाया। लोगों ने पूछा, "तुम्हें क्या लगता है?"
मैंने बताया, "इंटरव्यू देने का यह मेरा पहला अवसर था। मैंने अपनी ओर से सभी प्रश्नों के सही-सही उत्तर दिए। अब गेंद भगवान के पाले में। मेरे मन में सिलेक्शन होगा या नहीं, इसका कोई बोझ नहीं था।"
इसके बाद मैंने साइल टेस्टिंग ऑफिसर का इंटरव्यू नागपुर में दिया, जहाँ मुझसे पूछा गया, "कहाँ रहते हो?" मैंने बताया,
"रायपुर में।"
उन्होंने पूछा, "तुम टीवी देखते हो?"
मैंने बताया, "हाँ, हमारे हॉस्टल में टीवी है।"
उन्होंने पूछा, "तुमने मुझे टीवी पर देखा है?"
मैंने पूछा, "आप कौन से कार्यक्रम में आते हैं?" उन्होंने कहा, "कृषि दर्शन में।"
मैंने कहा, "सर, जब कृषि दर्शन शुरू होता है तो स्टूडेंट्स टीवी बंद कर देते हैं।"
वह बहुत दुखी तथा नाराज हुए। मुझे परीक्षा में फेल कर दिया। दूसरी परीक्षा मैंने ग्रामीण बैंक के मैनेजर की दी। इस परीक्षा में मैं बिना नरेंद्र राजा की मदद के पास हो गया।
मेरा अनुमान था कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में चार श्रेणी के प्रत्याशी भाग लेते हैं। पहली श्रेणी के प्रत्याशी वह होते हैं जो पूरा समय कंपटीशन की तैयारी में लगाते हैं। कोचिंग ज्वाइन करते हैं तथा ग्रुप में तैयारी करते हैं। दूसरी श्रेणी के प्रत्याशी पूरे समय घर में अकेले तैयारी करते हैं। तीसरी श्रेणी के प्रत्याशी कहीं नौकरी या कोई काम कर रहे होते हैं और चौथी श्रेणी के प्रत्याशी केवल फॉर्म भर देते हैं पर बहुत गंभीर नहीं होते हैं।
तो कंपटीशन केवल पहली तथा दूसरी श्रेणी के प्रत्याशियों में ही रहता है। दूसरी बात है कि जो सफल होते हैं उसका मतलब यह नहीं होता कि वह सबसे होशियार थे और असफल लोग गधे थे, बल्कि सफल लोगों को वह सवाल आते थे जो पूछे गए। असफल लोगों को उन पूछे सवालों के अलावा दूसरे सभी जवाब आते थे। फिर रिजर्वेशन एक बड़ा फैक्टर है।
द्वितीय पारी
एक साधारण से असाधारण की यात्रा
कॉलेज में एडहॉक पद पर मेरे कॉन्ट्रैक्ट की अवधि दूसरी साल के लिए रिन्यू हो गई थी। मैं पुनः पढ़ाने जाने लगा। वेतन मिलता था ग्यारह सौ रुपये मासिक। मैं घर में रहता था, कुछ खर्चा था नहीं, सो कुछ बचत हो गई थीं।
एक दिन मैं क्लास ले रहा था, जब अचानक मेरे दोस्तों का झुंड आया। उन्होंने मुझे कैंपस में लाकर गोल गोल धूमने लगे। एक दोस्त ने मुझे उसके कंधे पर उठा लिया। वह सब बहुत खुश थे। वह अखबार लेकर आए थे।
जिसमें मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा राज्य सेवा परीक्षा का रिजल्ट आया था। मेरा रोल नंबर राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों - डिप्टी कलेक्टर - के पद पर चयनित अभ्यर्थियों की सूची में था।
मेरे गाँव में पेपर नहीं आता था, इस कारण हमेशा मुझे रिजल्ट दूसरों से ही पता चलता था। मैं अपने परिवार का, कॉलेज का तथा जिले का पहला लड़का था जो राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित हुआ था।
यह मेरे जीवन का दूसरा मोड़ था। यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। अखबारों ने मेरा इंटरव्यू फोटो के साथ छापा। मैं यकायक लोगों की नजरों में साधारण से असाधारण बन गया था। न कुछ से कुछ बन गया था। मुझे खुद अपने आप पर भरोसा नहीं था।
फिर एक दिन मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग से मेरा नियुक्ति पत्र आ गया, जिसमें प्रदेश के राज्यपाल की ओर से मुझे डिप्टी कलेक्टर के पद पर मुरैना पोस्टिंग दी गई थी। परिवार, गाँव तथा शहर के लोग भी गौरवान्वित हुए थे। मेरे पहले मास्टर दादा जी अब कहने लगे थे कि उनका पढ़ाया लड़का डिप्टी कलेक्टर बन गया है।
ज्ञान का प्रकाश और अंतरात्मा का विकास
मेरे व्यक्तित्व के विकास में मेरे पिता जी का बड़ा योगदान था। हालाँकि उस समय मैं बहुत छोटा था, वह अक्सर बीमार रहते थे। कई बार कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ता था। तब मेडिकल सुविधाएँ बहुत कम थीं। हमारे घर में गायत्री परिवार की पत्रिका 'युग धर्म' और 'अखंड ज्योति' नियमित आती थीं। गीता प्रेस गोरखपुर की पत्रिका 'कल्याण' नियमित आती थी। इन सब से इंटेलिजेंट कोशिएंट के साथ स्प्रीचुअल कोशिएंट का विकास हुआ। पढ़ने के कारण इमोशनल कोशिएंट बहुत अच्छा हो गया।
मैं पहले जिला पुस्तकालय नियमित जाता था। वहाँ न्यूज़ पेपर्स, साथ में बच्चों की पत्रिकाएँ 'चंदा मामा', 'चंपक', 'पराग', बड़ों के लिए 'सरिता', 'कादंबिनी', 'दिनमान', 'गृह शोभा', 'सरिता', 'प्रतियोगिता दर्पण', 'इंडिया टुडे', 'मनोहर कहानियाँ', और 'सत्य कथा' खूब पढ़ता था। गर्मियों की छुट्टियों में खूब सिनेमा देखते थे।
'दैनिक जागरण', 'हिन्दुस्तान', 'अमर उजाला', 'दैनिक भास्कर', 'नवभारत टाइम्स' जैसे न्यूज़ पेपर पढ़ते थे। मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, और कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, फणीश्वर नाथ रेणु, धर्मवीर भारती, वृन्दावन लाला वर्मा, अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती को पढ़ते थे।
रवींद्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बंदोपाध्याय, ताराशंकर बंदोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, विमल मित्र और महाश्वेता देवी के उपन्यासों के हिंदी अनुवाद पढ़े।
विलियम शेक्सपियर, जेन ऑस्टिन, चार्ल्स डिकेंस, थॉमस हार्डी, जॉर्ज ऑरवेल, और अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास डिक्शनरी रखकर पढ़ते थे। 'इंडिया टुडे', 'आउटलुक', 'द वीक', 'फेमिना', 'वोग', 'फोर्ब्स इंडिया', 'इकोनॉमिक टाइम्स' और 'बिजनेस टुडे' पढ़कर अंग्रेजी सुधारता तथा जनरल नॉलेज बढ़ाता था।
किताबें मेरी हमेशा की साथी रही। जब मैं खेत पर रहता तो अकेला होता था, तब किताब अच्छे साथी की तरह साथ निभाती थी। पढ़ने की आदत आज भी है। आर.के. नारायण, मुल्क राज आनंद, खुशवंत सिंह, रस्किन बॉन्ड, मनोहर मालगोणकर, अरुंधति रॉय, अरविंद अडिगा, विक्रम सेठ, शशि थरूर, स्वामी विवेकानंद, ओशो, श्री प्रभुपाद, देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी और चेतन भगत जैसे कितने नाम हैं जिन्हें आज भी पढ़ता हूँ। गीता, अष्टावक्र गीता तथा पतंजलि का योग सूत्र मेरा मार्ग दर्शन करने के लिए ज्योति स्तंभ हैं।
एक नए सफर की शुरुआत
मुझे जनवरी में मुरैना जाकर ज्वाइन करना था। लोगों ने महूर्त देखकर शुभ घड़ी में ज्वाइन करने की सलाह दी। मेरी दादी कहा करती थी:
"तुलसी बिरवा बाग़ के सींचे से कुम्हलाय।
राम भरोसे जो रहे पर्वत पर हरियाय।"
यह उक्ति मेरे जीवन का मूलमंत्र बन चुकी थी। कुछ गरम सूट सिलवाए, गरम कपड़े लिए। पेंट शर्ट। तीन सूटकेस, सामान पैक किया और आ गए बस से ग्वालियर, ससुराल में। दादी कहती थीं:
"एक दिना को पवनों, दो दिना को पई और तीसरे दिन रहे सो बेशरम सही।"
सो अगले दिन सुबह की ट्रेन पकड़कर पहुँच गए मुरैना स्टेशन। मेरी पुरानी दुनिया छूट रही थी, और एक नई दुनिया की चौखट पर मैं कदम रख रहा था। यह मेरे जीवन की नई पारी थी, जहाँ एक नए संघर्ष, एक नई पहचान और एक नई जिम्मेदारी का इंतजार था।
मुरैना
मुरैना का अरण्य और एक नए दामाद की कहानी
मन में अभिलाषा थी कि स्टेशन पर भव्य स्वागत होगा। लेकिन जब ट्रेन प्लेटफार्म नंबर एक पर रुकी और मैंने मुरैना की धरती पर पहला कदम रखा तो स्टेशन पर किसी को न पाकर बहुत निराशा हुई। मेरा सामान ज्यादा था, इसलिए एक कुली से सामान बाहर लाकर सर्किट हाउस जाने के लिए रिक्शा लिया और हम सर्किट हाउस पहुँचे।
केयर टेकर को अपना परिचय दिया तो उसने बताया कि मेरे लिए कोई कमरा बुक नहीं था। और हो भी कैसे? जब मैंने किसी को बताया ही नहीं था, तब किसी को स्वप्न थोड़ी आएगा। वह बोले, “साहब, आपका सामान स्टोर रूम में रख देते हैं। आप जिला सत्कार अधिकारी से रूम अलॉट करवा लेना तो शाम को कमरा खोल देंगे।”
वहाँ रिक्शा मिलना कठिन था। रास्ता सीधा था, कुछ दूर पैदल चले। एक रिक्शा खाली आता दिखा, उसमें बैठकर पहुँचे कलेक्ट्रेट। टीकमगढ़ में मैंने वहाँ के डिप्टी कलेक्टर राम सुचित पांडे जी से मिलकर एक दिन जॉइनिंग की पूरी प्रक्रिया समझी थी। उन्होंने बताया था कि कार्यालय अधीक्षक के पास जाना, वह जॉइनिंग करवा देंगे।
मैं कार्यालय अधीक्षक के पास गया, उन्हें नमस्ते कर अपना परिचय दिया। उन्होंने स्थापना से बड़े बाबू को बुलवाया, मेरी जॉइनिंग की पूरी प्रक्रिया करवाई। सब बहुत आसानी से हो गया और मैं बन गया सरकारी दामाद।
मुझे एक फिल्मी गाना 'साला मैं तो साहब बन गया' याद आ गया। बड़े बाबू ने कलेक्टर के स्टेनो के पास भेज दिया। कलेक्टर थे शेखर दत्त। स्टेनो ने इंटरकॉम पर साहब से परमिशन ली और मुझे कलेक्टर के चैंबर में ले गए। उस समय कलेक्ट्रेट अंग्रेजों के ज़माने या शायद सिंधिया के ज़माने की बिल्डिंग में होती थी। बड़ा सा भव्य कमरा, बहुत बड़ी टेबल। सामने बैठे कलेक्टर। मैंने झुक कर प्रणाम किया। उन्होंने मुस्कुराकर मुझे बैठने को कहा। मैं पहली बार किसी कलेक्टर के इतने नजदीक बैठा था।
स्टेनो वापस चले गए। अब कमरे में हम दोनों थे। उन्होंने मेरे रहने की व्यवस्था के बारे में पूछा। मैंने सुबह सर्किट हाउस की घटना का विवरण उनको दिया। उन्होंने इंटरकॉम पर स्टेनो को व्यवस्था करने के निर्देश दिए। मुझे उनका सरल व्यवहार बहुत अच्छा लगा।
उन्होंने मेरे प्रशिक्षण के बारे में पूछा। मुझे तो कुछ भी पता नहीं था। तब उन्होंने कहा कि कल से तुम मेरे साथ बैठकर केवल देखो कि मैं कैसे लोगों से मिलता हूँ। मैं नमस्कार कर बाहर आया। उनके स्टेनो मुझे एडीएम साहब के पास ले गए। वही सर्किट हाउस में कमरा अलॉट करते थे। उनके बाबू ने केयर टेकर को फोन कर कमरा खोल देने का निर्देश दिया।
यह सब होते-होते शाम हो गई। मैं रिक्शा लेकर वापस सर्किट हाउस आ गया। जब केयर टेकर ने स्टोर रूम से मेरे सूटकेस निकाल कर मेरे कमरे में लाए तो मैंने देखा कि सूटकेस चूहों ने कुतर दिए थे। खोलकर देखा तो मेरे नए सिलाए दो सूट के कोट पैंट में बड़े-बड़े दो-दो छेद थे। मैंने सोचा बहुत अच्छा स्वागत गणेश जी के वाहन ने किया, विघ्न विनाशक गणेश जी की कृपा आगे रहेगी। खाना खाकर कमरे में आराम से सो गया।
सिविल लाइन का खोखलापन और एक दोस्ती की शुरुआत
दो-तीन दिन मैंने वहाँ के सभी अधिकारियों के पास जाकर परिचय किया। कुछ बहुत मिलनसार तो कुछ खड़ूस, बहुत रूखे, जैसे वह अपनी जिंदगी पूरी जी चुके हों। हारे थके, काम के बोझ के मारे। एक थे कोडे साहब। पटवारी से स्टेट मर्जर के समय महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश काडर लेकर डिप्टी कलेक्टर बन गए थे।
मुझसे बोले, “दारू पीते हो, नॉनवेज खाते हो और सिगरेट पीते हो?” तीनों के लिए मना करने पर उन्होंने सलाह दी कि अभी से शुरू कर दो, नहीं तो अच्छे अधिकारी नहीं बन सकते।
उनमें एक थे शर्मा जी। डिप्टी कलेक्टर, ग्वालियर के रहने वाले। उन्होंने बताया कि उन्हें एक सरकारी बंगला मिला है। उनका परिवार, बच्चे सब ग्वालियर में रहते हैं। वह शनिवार-रविवार ग्वालियर चले जाते हैं। अभी कोई सरकारी मकान खाली नहीं है, यदि मैं चाहूँ तो उनके साथ रह सकता हूँ। ‘अंधा क्या चाहे दो आँख’।
मैं सर्किट हाउस से शर्मा जी के साथ रहने लगा। बहुत भले आदमी। मुझे सरकारी कामकाज समझाते, किस्से कहानियाँ सुनाते। मुझसे खुद के बेटा जैसा व्यवहार करते। वह नायब तहसीलदार से नौकरी में भर्ती हुए थे। प्रमोशन हुआ तो ग्वालियर से मुरैना पोस्टिंग मिली। पुनः ग्वालियर ट्रांसफर की कोशिश कर रहे हैं, इसलिए परिवार नहीं लाए। उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो लड़के हैं। एक की पढ़ाई पूरी हो चुकी है, नौकरी पाने की तैयारी कर रहा है। दूसरा कॉलेज में पढ़ रहा है।
यह मुरैना की सिविल लाइन कॉलोनी थी। सभी सरकारी मकान, जिसमें सरकारी अधिकारी रहते थे। यह प्रथा अंग्रेजों ने इसलिए शुरू की थी जिससे अधिकारी वर्ग अन्य लोगों से अलग रहे। वे विशिष्ट लगें ताकि लोग उनकी इज्जत करें, बात मानें, उनका रुतबा हो। जन सामान्य से मेलजोल कम हो। विशिष्ट अभिजात वर्ग। सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण कारण था।
इस लिए प्रशासनिक अधिकारी समाज से कटे रहते। भारत के हर शहर तथा गाँव आज भी सरकारी लोगों के लिए अलग कॉलोनियाँ बनाई जाती हैं। अधिकारियों के परिवार जनों में भी यह विशिष्ट अभिजात वर्ग की भावना रहती है। उन्हें लगता है वह विशिष्ट हैं। आम नहीं, ख़ास हैं। यहीं से वीआईपी ‘वेरी इम्पोर्टेन्ट पर्सन’ की संस्कृति का जन्म हुआ।
सरकारी नौकरी में प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ग के अधिकारी तथा तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी होते हैं। केंद्र तथा राज्य सेवा के अलग-अलग वर्ग हैं। उनके रहने के आवास भी अलग-अलग प्रकार के, अलग-अलग जगह बनाए जाते हैं। यह वर्ग विभाजन प्रशासन करने तथा डिसिप्लिन मेंटेन करने में मददगार है।
हमारे समाज में बच्चे के सभी निर्णय परिवार के वरिष्ठ लेते हैं। बड़े होने पर सुपरवाइजर काम करवाते हैं। ऑफिस में बॉस का आदेश चलता है। व्यक्ति अपनी मर्जी से काम नहीं करते हैं। बचपन से आदत ही नहीं डाली जाती। पर्सनल स्पेस, पर्सनल डिसिशन जैसी कोई कंसेप्ट नहीं है। हम और शर्मा जी मजे से साथ रहते थे।
सिविल लाइन कॉलोनी में रहने के कारण मुझे सरकारी अधिकारियों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार, व्यवहार सीखने में बहुत मदद मिली। मैंने जल्दी जान लिया कि सिविल लाइन का जीवन कितना खोखला है। सब दोहरी बातें करते। यदि वह पूर्व जाने की सोचता तो बात पश्चिम की करता। सभी एक-दूसरे से तुलना करते: पद की, पत्नी की खूबसूरती की, बच्चों की होशियारी की, पढ़ाई-लिखाई की, गहने-जेवर, घर का फर्नीचर, कपड़े-लत्ते यहाँ तक कि कुत्ते की नस्ल और ऊपरी आमदनी की। सब अपने आप को हरिश्चंद्र की औलाद बताते और होते गब्बर सिंह।
हमारी कॉलोनी में एक जज साहब रहते थे। बहुत मजेदार व्यक्ति थे। वह चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पद पर थे। अकेले रहते, उनका परिवार ग्वालियर में रहता। उन्हें गार्डनिंग का बहुत शौक था। उनका बगीचा हमेशा महकता रहता, लॉन लश ग्रीन। एक दिन मैं उनके घर बैठा था।
मैंने कहा आपका बगीचा बहुत अच्छा है, लॉन कितना हरा भरा है। उन्होंने कहा, “तुम लोग अपनी बीवियों पर हाथ फेरते हो तो वो हरी भरी रहती हैं, मैं अपने लॉन पर हाथ फेरता हूँ तो वह हरा भरा है।”
बात सही और मजेदार थी। हमारे पड़ोसी एक और जज थे, गोस्वामी जी। वह जितने शांत और सीधे, उनकी पत्नी उतनी बातूनी और तेज। जब वह कुछ भी खरीदते तो हमें दिखाने जरूर बुलातीं। हमेशा गोस्वामी जी कहते, “सामान ससुराल से आया है।” मुझे लगता कि मेरी भी ससुराल इतनी धनी होती कि हर माह हजारों का सामान भेज पाते।
एक खनिज अधिकारी मिश्रा जी पास ही रहते थे। सत्य साईं बाबा के बड़े भक्त। उनके बहनोई डिप्टी कलेक्टर थे, वह भी वहीं रहते थे। उनका लड़का मिश्रा जी को मामा कहता, सो हम भी उन्हें मामा जी कहते। हर रविवार उनके घर भजन होते। शेष दिन मिश्रा जी साइकिल से खनिज ठेकेदारों से उनके घरों पर जाकर मिलते।
वह कहते, “ऐसा करने से संबंध अच्छे रहते हैं।” हर अधिकारी का अपना जीवन जीने तथा काम करने का तरीका अलग-अलग, बिल्कुल निराला। मेरे लिए यह माहौल अलग था, इस कारण मैं बहुत बारीकी से उनके तौर-तरीकों को देखता था।
कुछ दिन में शर्मा जी बहुत परेशान हो गए। दरअसल हुआ यूँ कि उन्हें उनके बड़े लड़के की शादी करना थी, तो जगह-जगह उसकी कुंडली भेजते। जहाँ-जहाँ कुंडली मिलती, वहाँ-वहाँ के लोग लड़का देखने मुरैना शर्मा जी के बंगले पर आते। रविवार को शर्मा जी ग्वालियर जाते। घर पर उन्हें मैं मिलता।
वह मुझे देखते, बातें करते और पूछते, “शर्मा जी कहाँ हैं?” तब मैं उन्हें शर्मा जी का ग्वालियर का पता दे देता। वह ग्वालियर जाकर शर्मा जी को कहते, “मैंने लड़का देख लिया, वह मुझे पसंद है, शादी पक्की करो।” दरअसल वह मुझे शर्मा जी का लड़का समझते।
मेरी उम्र तब बाईस साल ही थी। शर्मा जी का लड़का बेरोजगार, मुझ जैसी कद-काठी भी नहीं। शर्मा जी ने एक दिन मुझसे कहा कि यदि तुम यहाँ रहे तो मेरे लड़के की शादी नहीं होगी।
सरकारी मकान खाली थे नहीं। मेरी वेतन तब नौ सौ सत्तर रुपये ही थी। सरकारी मकान का किराया बहुत कम होता था। बाजार में निजी मकानों का किराया बहुत ज्यादा था। मेरी पत्नी तथा बच्चा भी घर पर थे। मैं उन्हें मुरैना लाना चाहता था।
अकेलेपन की अग्नि और चंबल का इतिहास
एक दिन मैं जिला मत्स्य अधिकारी के पास बैठा था। ऐसे ही रहने की बात निकली। उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने बताया कि मैं किराये का मकान ढूँढ रहा हूँ। उन्होंने बताया कि उनका मकान है जिसे वह किराए पर उठाना चाहते हैं। उन्होंने वह मकान रण्डी मुहल्ले में पुतली बाई डाकू के घर के पास नाले पर बनवाया था।
वहाँ कोई मकान डरकर किराए में नहीं लेता था। वह किराया कम लेकर मकान दे रहे थे। मैंने उसे किराए पर ले लिया। मैंने शर्मा जी के साथ न रहने में उनकी भलाई समझी और किराये के मकान में रहने आ गया। अभी अकेला ही था। ठंड के दिन थे, नाले से बहुत बदबू आती थी। एक दिन मैं अगरबत्ती लगाकर रजाई ओढ़कर सो गया। मेरे हिलने-डुलने से अगरबत्ती बिस्तर में गिर गई। आधी रजाई जल गई। कमरा धुएँ से भर गया। साँस न ले पाने के कारण मेरी नींद खुल गई। आग बुझाई। बड़ी दुर्घटना टल गई।
मैंने मुरैना जिले का गजेटियर पढ़ा, यहाँ का इतिहास जाना। मुरैना जिले का इतिहास काफी प्राचीन और समृद्ध है। इसे "मयूरवन" के नाम से भी जाना जाता था, जिसका संबंध महाभारत काल से है। माना जाता है कि यहाँ मोरों की अधिकता के कारण इसका नाम मुरैना पड़ा।
कुंतलपुर वर्तमान कुतवार में पांडवों की माता कुंती का मायका था, और यहीं पर कर्ण का जन्म हुआ था। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान पहाड़गढ़ की गुफाओं में भी समय बिताया था, जहाँ शैलचित्र भी पाए गए हैं। लिखित इतिहास में मुरैना का पहला जिक्र मौर्य युग में मिलता है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यहाँ मौर्यों का शासन था, जिसके प्रमाण गुर्जर अभिलेखों से मिलते हैं।
मौर्यों के बाद यहाँ नाग राजाओं का शासन रहा। इसके बाद गुप्त शासकों के सामंतों ने शासन किया, और इस दौरान कई मंदिरों का निर्माण हुआ, जैसे कि पड़ावली का मंदिर। गुप्तों के बाद गुर्जर-प्रतिहार और कच्छपघाट जैसे महान राजवंशों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। उन्होंने कई अद्भुत मंदिरों और स्मारकों का निर्माण किया, जिसमें सिहोनिया का ककनमठ मंदिर और मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर प्रमुख हैं। मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर तो इतना महत्वपूर्ण है कि इसे भारतीय संसद भवन के पुराने नक्शे का प्रेरणा स्रोत भी माना जाता है। मुगल काल के दौरान मुरैना क्षेत्र एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल सराय के रूप में जाना जाता था। 1761 को पानीपत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया घराने का कब्जा हो गया।
1948 में जब मध्य भारत का गठन हुआ, तो पूर्व ग्वालियर राज्य के श्योपुर जिले को इसमें शामिल किया गया, और बाद में यह मुरैना जिले का हिस्सा बना। 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के परिणामस्वरूप मुरैना एक अलग जिला बन गया।
पहाड़गढ़ की गुफाएँ, यहाँ प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र मिलते हैं, जो दर्शाते हैं कि यहाँ 30,000 साल पहले से ही मानव निवास करता था। ककनमठ मंदिर, सिहोनिया, यह कच्छपघाट वंश के राजा कीर्तिराज द्वारा निर्मित एक विशाल शिव मंदिर है।
चंबल घाटी, जिसमें मुरैना का क्षेत्र भी शामिल है, दशकों तक दस्यु गिरोहों के आतंक के लिए कुख्यात रही है। यह समस्या अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर आजादी के बाद के कई दशकों तक बनी रही। मुगल सम्राट बाबर के संस्मरणों में भी चंबल के लुटेरे दस्युओं का उल्लेख मिलता है। सिकंदर लोदी, शेरशाह और अकबर जैसे शासकों को भी चंबल घाटी के डकैतों का सामना करना पड़ा था।
आजादी के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई। सामाजिक असमानता, भूमि विवाद, जातीय संघर्ष, गरीबी और बेरोजगारी जैसे कारकों ने लोगों को "बागी" बनने पर मजबूर किया। सन 1970 और 80 के दशक में चंबल के बीहड़ों में कई खूंखार डकैतों का आतंक था, जिसके नाम से पूरा क्षेत्र थर्राता था। कई बार इन डकैतों को स्थानीय नेताओं से भी संरक्षण मिलता रहा, जिससे पुलिस को उनका सफाया करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। चुनाव के दौरान ये डकैत फरमान भेजकर गाँवों वालों को अपने पसंदीदा प्रत्याशी को वोट देने के लिए मजबूर करते थे।
आत्मसमर्पण की पहल: डकैत समस्या को हल करने के लिए कई प्रयास किए गए। विनोबा भावे और बाद में जयप्रकाश नारायण जैसे महान संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डकैतों को मुख्यधारा में लाने के लिए आत्मसमर्पण की पहल की। बड़े पैमाने पर डकैतों ने आत्मसमर्पण किया, जिससे इस क्षेत्र में शांति का माहौल बना।
चंबल नदी और उसके बीहड़, जो कभी खूंखार डकैतों की पनाहगाह थे, अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवन विशेषकर घड़ियालों और मगरमच्छों के लिए जाने जाते हैं। यह क्षेत्र अपनी अनूठी पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है, और डकैत समस्या का इतिहास अब बीहड़ सफारी और कहानियों का हिस्सा बन गया है।
मनमोहन कुमार तमन्ना एक जाने-माने लेखक थे, खासकर अपनी उन रचनाओं के लिए जो डाकुओं के जीवन और चंबल क्षेत्र पर आधारित थीं। वह मुरैना से थे और उन्होंने इन विषयों पर कई किताबें लिखीं, जिनमें से कुछ पर फिल्में भी बनीं। जिसकी वजह से उन्हें पहचान मिली।
वह पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। उन्होंने बताया कि चंबल के डाकुओं के ऊपर उनकी किताबों पर आधारित डाकू फिल्में बहुत प्रसिद्ध हुईं। उनका अंतिम समय मुरैना की पुरानी सब्जी मंडी स्थित उनके मकान में बीता था।
चंबल के कुछ प्रमुख डाकू और उनकी कहानियाँ मैं अक्सर उनसे सुनता था। उन्होंने मुख्य रूप से मुझे कुछ प्रसिद्ध डाकुओं की कहानियाँ सुनाईं:
डाकू मानसिंह: चंबल के सबसे प्रसिद्ध और बाहुबली डाकुओं में से एक। उन्हें "रॉबिन हुड" की तरह माना जाता था क्योंकि वह अक्सर अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करते थे। 1935 से 1955 के बीच मानसिंह और उसके गिरोह ने 1100 से अधिक डकैतियाँ और 182 हत्याएँ कीं, जिसमें 32 पुलिस अधिकारी भी शामिल थे।
उनका राज भारत की आजादी से लेकर उसके बाद तक कायम रहा। 1955 में सेना के जवानों ने एक मुठभेड़ में मानसिंह और उनके बेटे सूबेदार सिंह को मार गिराया। चंबल में आज भी उनके नाम पर एक मंदिर बना हुआ है।
डाकू मोहर सिंह गुर्जर: 70 के दशक में चंबल का सबसे खूंखार डाकू, जिसने फिरौती का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। उनके सिर पर 3 लाख का इनाम था और उनकी गैंग पर 12 लाख का। मोहर सिंह की कहानी भी चंबल के कई बागियों जैसी थी - रिश्तेदारों द्वारा जमीन हड़पना, पुलिस और अदालतों से न्याय न मिलना, जिसके बाद उन्होंने हथियार उठा लिए।
उन्होंने कई अपहरण किए और बड़ी-बड़ी फिरौती वसूली। 1972 में, गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) की पहल पर मोहर सिंह ने अपने गैंग के 200 से अधिक डाकुओं के साथ मुरैना के पास धरहरा गाँव में आत्मसमर्पण कर दिया था।
फूलन देवी: चंबल की सबसे कुख्यात महिला डाकुओं में से एक, जिन्हें "बैंडिट क्वीन" के नाम से जाना जाता था। फूलन देवी का जीवन अन्याय और बदला लेने की कहानी है। 16 साल की उम्र में सामूहिक बलात्कार का शिकार होने के बाद, उन्होंने हथियार उठाए और अपने साथ हुए अन्याय का बदला लिया।
उन्होंने राजपूत समाज के 22 लोगों की हत्या की, जिसे बेहमई कांड के नाम से जाना जाता है। 1983 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और जेल से छूटने के बाद राजनीति में भी कदम रखा। 2001 में उनकी हत्या कर दी गई।
पुतलीबाई: चंबल की पहली महिला डाकू, जिनका असली नाम गौहर बानो था और उनका जन्म मुरैना जिले के एक गाँव बरबई में हुआ था। वह एक नृत्यांगना थीं, वह अपने नृत्य कौशल के लिए जानी जाती थीं, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें डाकू बनने पर मजबूर कर दिया।
प्रसिद्ध डाकू सुल्तान से उनके संबंध और बाद में एक मुठभेड़ में उसका हाथ गँवाने की कहानी काफी मशहूर है। सुल्तान की मौत के बाद पुतली बाई ने अपने गिरोह का नेतृत्व किया और चंबल में अपना आतंक फैलाया। 1958 में पुलिस मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई। उनके जीवन पर कई फिल्में भी बनी हैं।
पान सिंह तोमर: भारतीय सेना के पूर्व जवान और एक प्रसिद्ध एथलीट, जिन्होंने स्टीपलचेज में सात बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। पान सिंह तोमर की कहानी भी जमीन विवाद से शुरू हुई। अपने परिवार पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए उन्होंने हथियार उठाए और डाकू बन गए। 1981 में एक पुलिस मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई। उनके जीवन पर एक समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म "पान सिंह तोमर" भी बनी है।
चंबल के बीहड़ों में डकैतों का इतिहास बेहद जटिल है, जिसमें सामाजिक असमानता, जातीय भेदभाव और पुलिस-प्रशासन की अनदेखी जैसे कई कारण शामिल थे, जिन्होंने लोगों को "बागी" बनने पर मजबूर किया।
आज चंबल घाटी काफी हद तक शांत है और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रही है, लेकिन इन डाकुओं की कहानियाँ अभी भी लोक कथाओं और फिल्मों के माध्यम से जीवित हैं। मनमोहन तमन्ना जी का कहानी सुनाने का अपना अंदाज़ था। वह कहानी के अंत तक बाँध कर रखते थे।
डॉ. एस.एन. सुब्बाराव, जिन्हें प्यार से "भाई जी" के नाम से जाना जाता था। इनका संबंध मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के जौरा से रहा है, जहाँ उन्होंने अपना प्रसिद्ध गांधी सेवा आश्रम स्थापित किया था। प्रख्यात गांधीवादी विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रीय एकता के दूत, युवाओं के प्रेरणा स्रोत, और चंबल के डाकुओं के आत्मसमर्पण कराने वाले "चंबल के गांधी"। उन्हें प्यार से "भाई जी" कहा जाता था।
सुब्बाराव का जन्म बेंगलुरु में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता एक प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही सुब्बाराव में देशभक्ति और सामाजिक सेवा की भावना कूट-कूट कर भरी थी। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने दीवारों पर "अंग्रेजों भारत छोड़ो" जैसे नारे लिखकर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। यहीं से वे महात्मा गांधी के आदर्शों और सर्वोदय विचारों से गहराई से प्रभावित हुए।
सुब्बाराव में युवाओं को प्रेरित करने और संगठित करने की अद्भुत क्षमता थी। वे कांग्रेस सेवा दल से भी जुड़े रहे और बाद में खालिस सर्वोदय कार्यकर्ता बन गए। वे भजन और भक्ति संगीत के माध्यम से समाज परिवर्तन के गाने गाते थे, जिससे युवा उनकी ओर आकर्षित होते थे।
डॉ. एस.एन. सुब्बाराव का जीवन और कार्य चंबल घाटी, विशेषकर मुरैना के जौरा से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। 1960 के दशक में चंबल के बीहड़ खूँखार डाकुओं के आतंक से थर्राते थे। सरकार और पुलिस इन डाकुओं को नियंत्रित करने में मुश्किलों का सामना कर रही थी।
जौरा में गांधी आश्रम की स्थापना: इसी दौर में, सुब्बाराव ने मुरैना के जौरा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम की नींव रखी। यह आश्रम बाद में डकैत-समर्पण अभियान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। सुब्बाराव ने एक अद्वितीय और साहसिक कदम उठाया।
वे स्वयं चंबल के बीहड़ों में गए, डाकुओं के बीच रहे, उनसे बातचीत की और उन्हें हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया। जब डाकू सीधे नहीं मानते थे, तो वे उनके परिवार वालों से मिलते और उन्हें डाकुओं को आत्मसमर्पण के लिए राजी करने को कहते।
उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप, 1972 में एक ऐतिहासिक घटना घटी जब 654 डाकुओं ने सामूहिक रूप से आत्मसमर्पण किया। इस घटना ने न केवल चंबल के इतिहास को बदला, बल्कि डॉ. सुब्बाराव को "चंबल के गांधी" के रूप में एक राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने इसके बाद भी कई बार डकैतों के आत्मसमर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मुझे उनसे अनेकों अवसरों पर मिलने का अवसर मिला। उनके व्यक्तित्व का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव रहा, जिस कारण भविष्य में मुझे ग्रामीण विकास की अनेक योजनाओं को बनाने में मदद मिली।
कलेक्टर का अजीब प्रशिक्षण और प्रशासन का असली चेहरा
उन दिनों मुरैना को भारत सरकार द्वारा सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था। लेकिन अभी कोई बजट इसके लिए जारी नहीं किया गया था। इस कारण इस शाखा का प्रभारी बनने में किसी की रुचि नहीं थी। मैं सबसे जूनियर था तो मुझे इस शाखा का प्रभार बना दिया गया।
समय-समय पर भारत सरकार से पत्र आते थे। जिले के सभी विभागों को यह पत्र भेजकर जानकारी बुलाकर जवाब भेजे जाते थे। मुझे बाबू ने एक दिन बहुत मोटी फाइल दी, जिसमें जिले के विभागों से जानकारी नहीं आ रही थी। भारत सरकार से संयुक्त सचिव का एक पत्र लंबित था। मैंने संयुक्त सचिव का पत्र पढ़ा, जो अंग्रेजी में था, जिसमें उन्होंने नए साल की शुभकामनाएँ दी थीं। कोई जानकारी नहीं माँगी गई थी।
जिला कार्यालय में बाबू को अंग्रेजी नहीं आती थी, उसने उस पत्र की साइक्लोस्टायल कॉपियाँ बनाकर सब को भेज दी थीं। उन दिनों फोटोकॉपी मशीन का आविष्कार नहीं हुआ था। मेरे द्वारा पढ़ी गई यह पहली फाइल थी। जिले के अधिकारी इस पत्र का जवाब नहीं दे रहे थे, रिमाइंडर पर रिमाइंडर भेजे गए थे।
सभी पत्र डिप्टी कलेक्टर तथा कुछ कलेक्टर के हस्ताक्षर से गए थे। मैंने पत्र अंग्रेजी की डिक्शनरी रखकर पढ़ा ताकि कोई गलती न हो। मैंने डरते-डरते एक दिन फाइल पर कलेक्टर साहब से चर्चा की। उन्हें बताया कि इस पत्र में कोई जानकारी नहीं माँगी गई, यह तो नए साल की शुभकामनाओं का पत्र था। तब वह खूब हँसे।
कार्यालय ने मेरा साल भर का ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार कर कलेक्टर से अनुमति लेकर जारी कर दिया। दिन में पहले सुबह में ट्रेनिंग प्रोग्राम के अनुसार अलग-अलग अधिकारियों से ट्रेनिंग लेता, शाम को जब कलेक्टर आम जनता से मिलते तब उनके साथ बैठता।
वह एक्स आर्मी ऑफिसर थे, स्ट्रेट फॉरवर्ड, निहायत ईमानदार, बंगाली आदमी। मेरी मेहनत से बहुत खुश रहते। तब महिंद्रा की जीप कलेक्टर को मिली थी, उनके पास एक जीप थी। जब उन्हें गुप्त अभियान पर जाना होता, गाड़ी मैं चलता था। मैंने अपने चाचा की बैंक की गाड़ी चलाकर सीखी थी और मेरे पास ड्राइवर का लाइसेंस था।
कभी शिकार खेलने तो कभी एसएएफ पुलिस लॉन में बैठकर बीयर पीने। वहाँ एक सन अम्ब्रेला लगा था। उसके नीचे हम लोग बैठते। टेबल पर बीयर और फाइलें। वह बीयर पीते और उनका नौकर एक-एक फाइल उनके सामने खोलकर रखता, वह बिना पढ़े साइन करते जाते।
कभी-कभी जब वह आम जनता से मिलते और भीड़ बहुत होती, तब वह बाहर जीप के बोनट पर बैठकर या खड़े होकर लोगों से मिलते थे। वह लोगों को ध्यान से सुनते, उन्हें संतुष्ट करने की भरसक कोशिश करते।
एक बार एक सरपंच आए। उनके गाँव के कुएँ में पानी सूख गया था। उन्होंने उस सरपंच को अंडरग्राउंड वॉटर का पूरा डायग्राम बनाकर समझाया। विभिन्न चट्टानों की संरचना बनाई। पानी कैसे दरारों से नीचे जाकर जमा होता है। सरपंच आधे घंटे समझता रहा।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस चित्र का उसके कुएँ से क्या संबंध है और पानी कैसे आएगा। वह तो केवल डीप ड्रिलिंग करवाना चाहता था। थककर बोला, “समझ गए साहब पानी की थ्योरी,” और फिर वह चला गया।
एक दिन हम लोग ऑफिस में बहुत देर तक काम कर रहे थे। वह ज़माना कंट्रोल का था। हर चीज राशन कार्ड पर मिलती थी। रात को जब ऑफिस से कलेक्टर साहब जाने वाले थे तभी एक आदमी आया। वह बिना पर्ची अंदर लोगों से मिलते थे।
उस आदमी ने नाम बताया इंग्लिश सिंह । मुरैना में तहसीलदार सिंह, कलेक्टर सिंह जैसे नामों का चलन है। इसी तरह वहाँ हर कोई नाम के साथ सिंह जरूर लगाता है, जैसे कुँवर जहर सिंह शर्मा।
कलेक्टर साहब ने उससे पूछा, “क्या दिक्कत है?” वह बोला, “उसके पास राशन कार्ड नहीं है, इस कारण उसे पंप चलाने के लिए डीजल नहीं मिल रहा है।” उन्होंने उसे बिठाया। मैंने कहा, “सर, मैं कल राशन कार्ड एसडीएम जौरा से दिलवा दूँगा।”
वह बोले, “नहीं रवींद्र, उसका कितना सुंदर नाम है- इंग्लिश सिंह, अभी राशन कार्ड लेकर एसडीएम को बुलाओ।” फोन किया गया। कार्ड आया। इस सब में दो घंटे से अधिक का समय लगा। उन्होंने कार्ड इंग्लिश सिंह को दिया, तब हम लोग घर गए।
शेखर दत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक सेवानिवृत्त अधिकारी थे, जिन्होंने भारत सरकार और विभिन्न राज्यों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनका निधन 2 जुलाई 2025 को 79 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में हुआ। शेखर दत्त का जन्म 20 दिसंबर 1945 को हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भारतीय सेना में एक शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी के रूप में की थी।
उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 218 मीडियम रेजिमेंट के साथ सेवा की और अपनी बहादुरी के लिए सेना पदक से सम्मानित किए गए। 1969 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी, शेखर दत्त ने अपने 38 साल के करियर में विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाईं।
उन्होंने आदिवासी और अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के प्रधान सचिव, स्कूल शिक्षा, खेल और युवा कल्याण विभाग के प्रधान सचिव सहित कई प्रमुख पदों पर कार्य किया।
वह रक्षा मंत्रालय में विभिन्न क्षमताओं में कार्यरत रहे, जिनमें रक्षा उत्पादन विभाग में संयुक्त सचिव और अंततः भारत के रक्षा सचिव थे। 2007 में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, उन्हें दो साल के लिए भारत के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया। यह एक नया बनाया गया पद था जो राजनीतिक और सुरक्षा-संबंधी मामलों से संबंधित था।
उन्होंने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग के सचिव के रूप में भी कार्य किया। भारत के खेल प्राधिकरण के महानिदेशक के रूप में, उन्होंने नवंबर 2003 में हैदराबाद में आयोजित एफ्रो-एशियाई खेलों की मेजबानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
23 जनवरी 2010 को, उन्होंने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का पदभार संभाला और 19 जून 2014 को अपने इस्तीफे तक इस पद पर रहे। शेखर दत्त को सार्वजनिक प्रशासन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए 2016 में पॉल एप्पलबी अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बोर्ड में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर और बाद में अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने "रिफ्लेक्शन ऑन कंटेम्परेरी इंडिया" और "इंडियाज डिफेंस एंड नेशनल सिक्योरिटी" नामक दो पुस्तकें भी लिखीं। शेखर दत्त एक बहुमुखी व्यक्तित्व थे, जिन्होंने सैन्य सेवा, सिविल सेवा और राजनीतिक मामलों में भारत के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।
एक दिन कलेक्टर जब कोर्ट में राजस्व के प्रकरण सुन रहे थे, उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, “आज रीडर का काम तुम करोगे।” मैं रीडर की कुर्सी पर बैठा। पहले मैंने रीडर को काम करते देखा था। अभी रीडर शाखा में ट्रेनिंग नहीं हुई थी। कोर्ट में जो बाबू फाइल रखता है, पढ़ता है तथा कोर्ट के काम में मदद करता है, उसे रीडर कहते हैं।
मैंने सुनवाई के लिए एक फाइल कलेक्टर के सामने रखी। दोनों पक्षों के वकील सामने खड़े थे। उन्होंने जवाब देने के लिए समय माँगा। कलेक्टर ने समय दे दिया। रीडर नोटशीट लिखकर कलेक्टर के सामने रखता, वह हस्ताक्षर करते, दोनों वकील हस्ताक्षर करते और आगामी सुनवाई की तारीख की सूचना पाते। मैंने जीवन में कभी नोटशीट नहीं लिखी थी, तो मैं सोच रहा था कोई गलती न हो। मैंने मदद के लिए कलेक्टर के रीडर की तरफ देखा। वह नोटशीट लिखने वाले थे।
कलेक्टर ने उनसे कहा, “नोटशीट रवीद्र को लिखने दो।” मैंने देखा की इस तारीख के पहले की नोटशीट में भी कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। केवल तारीख ली गई थी। मैंने उसकी नकल कर लिखा, “उभय पक्ष उपस्थित। जवाब देने के लिए समय चाहा गया। अगली तिथि दी गई।” लिखकर मैंने कलेक्टर के सामने फाइल रखी। उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। उन्होंने दोनों वकीलों के सामने वह फाइल रखी, उन दोनों ने हस्ताक्षर कर दिए। कोर्ट की कार्यवाही पूरी हो गई। यह मेरी लिखी पहली नोटशीट थी।
चंबल के बागी और कानून का मखौल
मुझे खनिज की खदान नीलाम करने का प्रभारी बनाया गया। ऑफिस में बड़ा सा पंडाल लगाया गया। बहुत ठेकेदार खदानें लेने आए। वहाँ मुख्य रूप से चंबल नदी में रेत की नीलामी होती थी। जब नीलामी शुरू हुई तो एक छह फुट लंबा-चौड़ा आदमी एक लठ लेकर आया। पंडाल के एक कोने में खड़ा हो गया। जब तक वह सिर नहीं हिलाता, कोई बोली नहीं लगाता था।
जब मैंने अपने स्टाफ से पूछा तो उन्होंने बताया कि वह सरेंडर डकैत है। बिना उसकी मर्जी के आप रेत निकालने का काम नहीं कर सकते। मैंने शराब के ठेकों की नीलामी भी करवाई, तब भी वही माहौल था। तब मैंने उन्हें अपने कमरे में बैठाकर बात की कि इस तरह शासकीय काम में बाधा नहीं डालें। वह वहाँ से चले गए। तब शांति से नीलामी हो सकी।
हमारी तहसील की ट्रेनिंग मुरैना तहसील में हुई। वहाँ एसडीएम थे एम.एम. श्रीवास्तव। बहुत कोमल, सौम्य, सरल हृदय व्यक्ति। उनके रीडर शर्मा जी। हमने निश्चित किया की सुनकर नहीं, काम करके ट्रेनिंग लेंगे। रीडर की ट्रेनिंग में शर्मा जी की जगह मैं बैठकर सुनवाई के लिए प्रकरण एसडीएम को देता। शर्मा जी बहुत मोटे व्यक्ति थे, हँसमुख। वह सफ़ेद कमीज पहनते। उनमें ऊपर बहुत बड़ी जेब बनवाते। वह अपना काम करते रहते। पक्षकार या वकील प्रकरण में तारीख लेने आते। शर्मा जी की जेब में सिद्धांतानुसार रुपये रखते जाते, न कभी शर्मा जी किसी से कुछ माँगते, न ऊपर मुँह उठाकर देखते। किसने कितना पैसा रखा। पर इतना आ जाता कि शाम तक जेब भर जाती।
जब मैं कुछ दिन उनकी जगह बैठा तो लोगों ने सोचा शर्मा जी का ट्रांसफर हो गया है और मैं नया रीडर हूँ। वह मेरी जेब में पैसा रखने लगे। जितना पैसा आया मैंने ईमानदारी से शर्मा जी को शाम को दे दिया। मुझे परीक्षा के समय पढ़ी प्रेमचंद की कहानी 'नमक का दरोगा' याद हो आई, जिसमें दरोगा का पिता कहता है ‘यह तो पीर का मजार है’।
मुरैना में लोगों के तीन शौक तब थे: पहला बंदूक रखना, दूसरा अच्छे बैल रखना और तीसरा घर में एक महिला खरीदकर लाना। बंदूक का लाइसेंस मिल जाना बहुत बड़ी बात होती। बंदूक सुरक्षा के लिए रखते थे। यदि ग्वालियर के बस स्टैंड में किसी बस में सबसे ज्यादा लोग बंदूक टाँगकर बस में बैठ रहे हों तो आप उस बस में बिना पूछे बैठ जाएँ, वह बस मुरैना ही जाएगी।
बंदूक का लाइसेंस बनाने के लिए ऑफिस में बाबू की पोस्टिंग बहुत सिफारिश से होती थी। वहाँ उस समय बाबू जी थे मातादीन भारद्वाज। बहुत लंबे-तगड़े, हँसमुख, मिलनसार व्यक्ति। उनके पास हर समस्या का हल था। मेरी शुरू-शुरू में बहुत मदद की। ट्रेनिंग तो दी ही, साथ में दोस्त बन गए। वह दोस्ती आज तक कायम है। उनके बच्चे भी मिलते रहते हैं।
मुरैना नगर पालिका के अध्यक्ष के खिलाफ सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव दिया। कलेक्टर ने मीटिंग की अध्यक्षता करने का प्रभार मुझे दिया। नियत दिन, समय मैं कार्यवाही शुरू करवाने नगर पालिका के ऑफिस गया। वहाँ बाहर बहुत सारे लोग बंदूक टाँगकर घूम रहे थे। मैंने ऐसा माहौल नहीं देखा था। चारों तरफ बहुत तनाव था।
मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन बहुत डरे हुए थे। उन्होंने पुलिस बुलाने का अनुरोध किया। मैंने थाने में फोन कर पुलिस फ़ोर्स को बुलाया। मुझे प्रस्ताव पढ़ना था और मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन को कार्यवाही की प्रोसीडिंग रजिस्टर में लिखना थी। मैंने सदस्यों से ध्यान देने को कहा और प्रस्ताव पढ़ा। अध्यक्ष के विरुद्ध लाए गए अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में जो हो वह सब हाथ खड़ा करें। सदस्यों ने हाथ खड़े किए, मैंने गिनकर बताया।
तभी एक सदस्य ने एक दूसरे सदस्य का हाथ पकड़कर नीचे कर दिया। मैंने अविश्वास प्रस्ताव के विपक्ष में जो सदस्य हो, हाथ खड़े करें, कहा तो जिसका हाथ नीचे किया था उसने फिर हाथ खड़ा कर दिया। वह रिजर्व सीट से सदस्य थे और पढ़े-लिखे नहीं थे। सदस्य आपस में लड़ने लगे। वह कह रहे थे कि लोग प्रस्ताव के पक्ष का मतलब अध्यक्ष के पक्ष में समझकर हाथ खड़े किए थे। केवल एक वोट का अंतर था। अविश्वास प्रस्ताव पास हो गया था। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन ने कार्यवाही की प्रोसेसिंग रजिस्टर में लिख दिए थे।
तभी सदस्यों में झगड़ा बहुत बढ़ गया। सदस्यों में मारपीट होने लगी, उन्होंने प्रोसीडिंग रजिस्टर मिस्टर जैन से छीनकर फाड़ दिया। मैं एक कोने में खड़ा था। सब एक-दूसरे को मार रहे थे। मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन डर के मारे टेबल के नीचे दुबक गए। सदस्य उन्हें खींचकर मारने लगे। मैंने जैसे ही पुलिस अंदर बुलाई, बाहर गोलियाँ चलने लगीं। अफरा-तफरी का माहौल हो गया। बैठक भंग हो गई।
किसी तरह मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन को फटा कार्यवाही की प्रोसीडिंग रजिस्टर लेकर मैं कलेक्टर के पास गया। उन्हें हम लोगों की रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय लेना था। मैंने अपनी रिपोर्ट बनाकर दे दी। पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी। मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन को उनके घर भेज दिया, वह बहुत डर गए थे।
जब कलेक्टर ने उनसे रिपोर्ट लिखित में माँगी कि उन्होंने प्रोसीडिंग रजिस्टर में क्या लिखा था, प्रस्ताव पास हुआ या नहीं। डर तथा दबाव में उन्होंने पहले पत्र में लिखा अविश्वास प्रस्ताव पास हुआ और दूसरे पत्र में लिखा अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं हुआ। जब उन्हें ऑफिस बुलाया गया तो वह रो रहे थे, डर के मारे काँप रहे थे। अंततः कलेक्टर ने मेरी रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया।
मेरी ट्रेनिंग मुरैना के पटवारी के साथ थी। मैं उनके साथ गाँव जाता, मौके पर खसरा नंबर, नक्शा, बटान, खतौनी, फसल गिरदावरी, नामांतरण, बी वन से बी सेवन तक के फॉर्म, सीमांकन, चांदा, जरीब, ऋण पुस्तिका जैसे कितने भूमि से जुड़े शब्द और उनके अर्थ समझे। पटवारी मैनुअल भाग एक से सात तक पढ़े। लेकिन किताब में लिखी बात एक होती है और जमीन पर काम होना दूसरी बात, जो परंपराओं से चलती है।
कहने को तो मध्य प्रदेश में कानून पूरे राज्य के लिए एक तरह के हैं। उन्हें लागू करने के नियम समान हैं। लेकिन धरातल पर आज का मध्य प्रदेश चंबल का मध्य भारत, भोपाल का भोपाल रियासत, सागर का बुंदेलखंड, रीवा का बघेलखंड, जबलपुर का महाकौशल, उज्जैन का मालवा, इंदौर का निमाड़, बालाघाट महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को मिलाकर बना प्रदेश है। यहाँ की परंपराएँ, रीत-रिवाज, मान्यताएँ तथा प्रशासन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। समाज कानून से नहीं परंपराओं से चलता है।
पटवारी जी ने बताया कि साहब लोग प्रतियोगी परीक्षा के समय इतना पढ़ लेते हैं कि वह लोग नौकरी में आते ही पढ़ना-लिखना बंद कर देते हैं। कानून पढ़ते नहीं, नियम जानते नहीं, यहाँ तक कि शासन से प्राप्त पत्र भी नहीं पढ़ते।
क्योंकि वह सोचते कि एक बार नौकरी पक्की हुई, फिर उन्हें कोई निकाल नहीं सकता। वह बेताल जैसे सिस्टम पर तब तक लदे रहते हैं जब तक मर नहीं जाएँ या रिटायर न हो जाएँ। वह जूनियर स्टाफ से पूछ-पूछ कर काम करते हैं। इस कारण परंपराओं से देश चल रहा है। जनता कानून जानती नहीं, सो वह भी परंपराओं को अपना सौभाग्य मानते हैं।
पटवारी प्रशासन की नींव का पत्थर है और पटवारी के रिकॉर्ड में लिखी बात पत्थर की लकीर। कोई काट नहीं सकता। इसका प्रत्यक्ष अनुभव मुझे तब हुआ जब कलेक्टर ने एक पटवारी की शिकायत की जाँच मुझे दी। तत्कालीन सांसद महोदय ने एक शिकायत की कि उनकी आगरा-बॉम्बे के हाईवे पर स्थित जमीन किसी सरेंडर डाकू के नाम पटवारी ने कर दी।
उन्होंने वह जमीन किसी और को बेची थी, लेकिन पटवारी ने दाखिल-खारिज का खर्चा माँगा, जो नहीं दिया तो पटवारी ने खसरा के खाना नंबर बारह में वक्त गिरदावरी सरेंडर डाकू का मौके पर कब्जा लिख दिया। खसरा पाँच साल के लिए बनता है। फिर पटवारी नया खसरा बनाता और पुराना तहसील में जमा कर देता था। लेकिन इस पटवारी के पास एक पुराना तथा एक चालू खसरा था। इसने पिछली तारीखों में सात साल की खाना बारह में सरेंडर डाकू का नाम एंट्री चढ़ा दी।
सरेंडर डाकू ने खेत में ट्रैक्टर चलाकर फसल बोना चाही। झगड़ा हुआ। पुलिस केस बना। सरेंडर डाकू ने पटवारी से खसरे की नकल लेकर सिविल कोर्ट में आवेदन देकर कब्जा न हटाने पर स्टे ले लिया। अब मौके पर कब्जा सरेंडर डाकू का था और सांसद एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी, एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय के चक्कर काट रहे थे।
पटवारी ने पत्थर पर स्याही की लकीर खींच दी थी। प्रधानमंत्री को शिकायत कर रहे थे। अब मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता में लिखा है कि 'जब तक अन्यथा सिद्ध न कर दिया जाए खसरे को सही माना जाएगा'। अब आप राज्य शासन के विरुद्ध राज्य शासन के राजस्व अधिकारी के कोर्ट में शासन के रिकॉर्ड को गलत साबित करो।
फिर तहसीलदार, एसडीओ, कलेक्टर, कमिश्नर और राजस्व न्यायालय में केस लड़ो। फिर सिविल कोर्ट में सिविल न्यायधीश, जिला न्यायधीश, उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्च न्यायालय में सिद्ध करो। यदि आप मर जाएँ तो आपके बच्चे, उनके बच्चे, बच्चों के बच्चे केस लड़ते रहें।
दो माह पश्चात मुझे भोपाल ट्रेनिंग करने का आदेश मिला। डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित अभ्यर्थियों को आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी, भोपाल में प्रशिक्षण दिया जाता है। यह अकादमी, राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है।
1980 के बैच के डिप्टी कलेक्टरों ने भी इसी अकादमी में प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया गया था। जब हम आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी, भोपाल पहुँचे तब वहाँ के हॉस्टल का एक भवन था और कुछ बन रहे थे। हमारे साथ 1979 वर्ष के यूनियन सर्विस कमीशन द्वारा चयनित सीधी भर्ती के बैच के लड़के-लड़कियाँ ट्रेनिंग के लिए आए थे।
इस तरह लगभग पैंतीस लोग थे। तब प्रशासन अकादमी का मेस भवन नहीं बना था। मेस नहीं चलता था। सबसे पास का बाजार बिट्टन मार्केट भी विकसित नहीं हुआ था। आस-पास कोई आवासीय कॉलोनी नहीं थी। आने-जाने का साधन नहीं मिलता था। ऐसे में प्रशासन अकादमी के डायरेक्टर/निर्देशक ने हम लोगों को मेस चलने का आदेश दिया।
मैस की रसोई और बचपन का कीड़ा
सबने मिलकर मुझे मैस सेक्रेटरी का जिम्मा सौंप दिया। यह कोई मामूली काम नहीं था, बल्कि एक चुनौती थी- एक ऐसी चुनौती जो मेरे अंदर पल रहे उस शरारती 'जुम्मन कीड़े' को शांत कर सकती थी, जो हमेशा कुछ अलग करने के लिए मचल रहा था। मेरा काम था सभी से महीने का भुगतान लेना, बाज़ार से राशन, सब्जियाँ, दूध, अंडे, ब्रेड जैसे सामान ख़रीदकर लाना, उन्हें स्टोर में सहेजकर रखना, और रोज़ सुबह रसोइए को तौलकर देना।
यह काम जितना सीधा लगता था, उतना ही पेचीदा था। सबसे कठिन काम था पैसा वसूलना। अक्सर लोगों का वेतन समय पर नहीं आता था, और तब सामान खरीदने के लिए अपनी जेब से पैसे लगाने पड़ते थे, जिससे बजट का हिसाब बिगड़ जाता था।
हमारे प्रशिक्षण केंद्र से दूर, भोपाल की पुरानी सब्जी मंडी में ही ताज़ी सब्जियाँ मिलती थीं। एकेडमी के डायरेक्टर ने हमारे लिए एक गाड़ी की व्यवस्था तो कर दी, लेकिन वह गाड़ी अक्सर उनके परिवार के काम में ही लगी रहती थी। गाड़ी समय पर मिलती नहीं थी, और मेरी दौड़-भाग बढ़ जाती।
मैस की व्यवस्था भी विचित्र थी। यहाँ अलग-अलग राज्यों के लोग थे, जिनकी पसंद अलग-अलग थी। किसी को कुरकुरी रोटी चाहिए थी, तो किसी को नरम। छोटी-छोटी बातों पर रोज़ झगड़े होते। रसोइए, बर्तन साफ़ करने वाले और सफाई कर्मचारियों के नख़रे भी अलग ही थे, जिन्हें संभालना मेरे लिए एक युद्ध से कम नहीं था।
मेरे कॉलेज के दिनों में एन सी सी और एन एस एस के कैंप लगाने का अनुभव यहाँ मेरे बहुत काम आया। मैं जानता था कि एक टीम को कैसे एकजुट रखा जाता है। एकेडमी के महा निदेशक फ़कीर चंद और निर्देशक श्री जैन थे। एक दिन, महा निदेशक महोदय वल्लभ भवन से आए और उन्होंने हम सब की एक बैठक बुलाई। जब कुछ लोगों ने मैस की अव्यवस्था की शिकायत की, तो उन्होंने सीधे मुझसे ही समस्या का कारण पूछा।
मैंने बिना सोचे-समझे, अपनी सारी निराशा को शब्दों में ढालकर, एकेडमी से गाड़ी समय पर न मिलने की समस्या बता दी। इसका नतीजा यह हुआ कि निर्देशक श्री जैन को सबके सामने डांट पड़ी। तब से वह मुझसे चिढ़ने लगे और मुझे परेशान करने के बहाने खोजने लगे। मुझे बाद में लगा कि मैंने यह शिकायत करके ठीक नहीं किया, पर तब मेरा बचपना बहुत था और मैंने इसका परिणाम नहीं सोचा था।
प्रशासन अकादमी में हर दिन दो बार हाजिरी के रजिस्टर पर दस्तखत करने होते थे। मैस के झमेलों के कारण मेरी अटेंडेंस अक्सर कम हो जाती। नतीजा, मुझे प्रशासन अकादमी से एक नोटिस मिला। एक दिन हम सब ने अकादमी के सामने वाली झील में नौका विहार करने का फ़ैसला किया।
शायद वह मेरे अंदर का 'जुम्मन कीड़ा' ही था, जो अचानक मचल उठा। मैंने दबे पाँव अटेंडेंस रजिस्टर को उठाया और बिना किसी को बताए, उसे झील की गहराइयों में फेंक दिया। जब मैंने नोटिस का जवाब दिया कि मैंने तो पूरे हस्ताक्षर किए हैं और सबूत के तौर पर अटेंडेंस रजिस्टर दिखाने की माँग की, तब एकेडमी के स्टाफ ने अटेंडेंस रजिस्टर बहुत ढूंढा पर वह मिला ही नहीं। मेरा नोटिस निरस्त हो गया।
प्रशासन अकादमी एक पत्रिका निकालने जा रही थी और हम सब से लेख माँगे गए। मैंने बहुत मेहनत करके नामांतरण पर एक विस्तृत लेख लिखा, जिसे पत्रिका में प्रमुखता से छापा गया। मुझे जब प्रशंसा मिल रही थी, तभी मुझे प्रशासन अकादमी से दूसरा नोटिस मिला।
आरोप था कि मैंने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता या निर्देशक श्री जैन के किसी लेख की नक़ल की है। मैंने अपने जवाब में बड़े आत्मविश्वास से लिखा कि भले ही भू-राजस्व संहिता द्विवेदी जी की किताब सभी पढ़ते हों, पर मैंने नहीं पढ़ी। यह प्रक्रिया की मेरी अपनी व्याख्या है, और मैंने श्री जैन का लेख न तो कभी देखा है, न ही नक़ल की है। मैंने अपने लेख का उनके लेख से मिलान करने का आग्रह किया, और मेरा नोटिस फिर से निरस्त कर दिया गया।
जब प्रशिक्षण समाप्त होने के बाद मैं मुरैना वापस चला गया, तो कई महीनों बाद मुझे प्रशासन अकादमी से तीसरा नोटिस मिला। इसमें किचन और खाने के बर्तनों, चम्मचों, कपों और प्लेटों की एक लंबी सूची थी, जो गायब थे। मुझसे उनकी कीमत वसूलने की माँग की गई थी।
मैंने तुरंत जवाब दिया कि मुझे केवल खाने की सामग्री लाने का काम मौखिक रूप से सौंपा गया था, जिसका पूरा हिसाब मेरे पास है। किचन और खाने के बर्तन तो प्रशासन अकादमी के स्टाफ के पास ही रहे थे। मैंने साफ़ कहा कि यदि मेरी कहीं भी प्राप्ति के हस्ताक्षर हों, तो मुझे वह रसीद दिखा दी जाए, तभी मैं अपनी ज़िम्मेदारी मानूंगा। और इस तरह वह नोटिस भी ख़ारिज हो गया। क्लास रूम के बाहर मिली यह असल ट्रेनिंग आगे नौकरी में मेरे बहुत काम आई।
वल्लभ भवन का अहंकार और गुपचुप बाबू
जब हम प्रशासन अकादमी में प्रशिक्षण ले रहे थे, तभी हमारी विभागीय परीक्षा का परिणाम आने वाला था। यह परिणाम हमेशा सरकारी गजट में छपता था। गजट, जिसे राजपत्र भी कहते हैं, सरकार का एक आधिकारिक कानूनी दस्तावेज होता है।
इसका उपयोग नए कानूनों, नियमों, विनियमों, संधियों और अन्य कानूनी सूचनाओं को प्रकाशित करने के लिए किया जाता है। "गजट" शब्द इतालवी शब्द "गजिटर" से आया है, जो 16वीं शताब्दी में वेनिस में प्रकाशित होने वाले एक अनौपचारिक समाचार पत्र का नाम था।
मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य के गठन के बाद, नए कानूनों और नियमों को लागू करने और जनता तक पहुंचाने के लिए राजपत्र का प्रकाशन शुरू किया गया। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे का एक अभिन्न अंग है और शासन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहते हैं और नए नियम और अधिनियम प्रकाशित किए जाते हैं। मध्य प्रदेश राजपत्र को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
साप्ताहिक राजपत्र: यह प्रत्येक सप्ताह प्रकाशित होता है और इसमें विभिन्न सरकारी विभागों के सामान्य आदेश, अधिसूचनाएं, और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी शामिल होती है।
असाधारण राजपत्र : यह तब प्रकाशित होता है जब किसी विशेष और तत्काल मामले पर सरकारी अधिसूचना की आवश्यकता होती है। इसमें नए अधिनियम, अध्यादेश, और अन्य महत्वपूर्ण घोषणाएं शामिल होती हैं।
राजपत्र को कई भागों, खंडों और उप-खंडों में विभाजित किया गया है, जिनमें विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रकाशित की जाती है। कुछ प्रमुख खंड इस प्रकार हैं:
भाग एक, खंड एक: राज्य सरकार के आदेश
भाग एक, खंड दो: विभाग प्रमुखों के आदेश
भाग एक, खंड तीन: उच्च न्यायालय के आदेश और अधिसूचनाएं
भाग एक, खंड चार: राज्य शासन के संकल्प
भाग दो, खंड एक: स्थानीय निकायों की अधिसूचनाएं
राजपत्र का प्रकाशन मध्य प्रदेश सरकार की मुद्रण एवं लेखन सामग्री मध्य प्रदेश राजपत्र, जिसे आमतौर पर 'गजट' कहा जाता है, राज्य सरकार का एक आधिकारिक कानूनी दस्तावेज है। इसका उपयोग नए कानूनों, नियमों, विनियमों, संधियों और अन्य कानूनी सूचनाओं को प्रकाशित करने के लिए किया जाता है।
मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य के गठन के बाद, नए कानूनों और नियमों को लागू करने और जनता तक पहुंचाने के लिए राजपत्र का प्रकाशन शुरू किया गया। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे का एक अभिन्न अंग है और शासन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहते हैं और नए नियम और अधिनियम प्रकाशित किए जाते हैं।
राजपत्र का प्रकाशन मध्य प्रदेश सरकार की मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग द्वारा किया जाता है। किसी भी नए कानून, नियम या अधिसूचना को राजपत्र में प्रकाशित करने से पहले, उससे संबंधित विभाग द्वारा अनुमोदित किया जाता है। राज्यपाल की अनुमति प्राप्त होने के बाद, इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। राजपत्र में प्रकाशन के बाद ही कोई कानून या नियम आधिकारिक रूप से प्रभावी माना जाता है।
मध्य प्रदेश राजपत्र का महत्व निम्नलिखित कारणों से है:
कानूनी मान्यता: राजपत्र में प्रकाशित होने वाली सभी जानकारी को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त होती है।
सार्वजनिक जानकारी: यह सरकार और जनता के बीच सूचना के आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।
पारदर्शिता: यह सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।
अधिसूचना और प्रभावशीलता: किसी भी कानून या नियम को लागू करने के लिए राजपत्र में उसकी अधिसूचना का प्रकाशन अनिवार्य है।
आप मध्य प्रदेश राजपत्र की जानकारी मध्य प्रदेश सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर देख सकते हैं। विभाग द्वारा किया जाता है। किसी भी नए कानून, नियम या अधिसूचना को राजपत्र में प्रकाशित करने से पहले, उससे संबंधित विभाग द्वारा अनुमोदित किया जाता है। राज्यपाल की अनुमति प्राप्त होने के बाद, इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। राजपत्र में प्रकाशन के बाद ही कोई कानून या नियम आधिकारिक रूप से प्रभावी माना जाता है।
हम कुछ दोस्तों ने तय किया कि हम मंत्रालय, जिसे वल्लभ भवन भी कहते हैं, जाकर गृह मंत्रालय में सीधे परिणाम पता करेंगे। हम पहली बार इस विशाल और भव्य इमारत में गए थे। मंत्रालय, जिसे 'वल्लभ भवन' के नाम से जाना जाता है, मध्य प्रदेश सरकार का सचिवालय है और राज्य के प्रशासनिक केंद्र का हृदय है। यह भोपाल में अरेरा हिल्स नामक एक शांत और सुरम्य पहाड़ी पर स्थित है, जो शहर के राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन का केंद्र है। मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य बनने के बाद, राजधानी भोपाल के लिए एक नए सचिवालय की आवश्यकता महसूस हुई। 1958 में, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वल्लभ भवन की आधारशिला रखी थी।
इस इमारत को बनने में लगभग 7 साल का समय लगा। जब यह बनकर तैयार हुई, तो यह 5 मंजिला, 100 फीट ऊंची इमारत भोपाल की सबसे ऊंची इमारतों में से एक थी। यह इमारत अरेरा हिल्स के एक निर्जन टीले पर बनाई गई थी, जिसे उन दिनों 'लक्ष्मी नारायण गिरी' कहा जाता था। अब यह क्षेत्र 'अरेरा हिल्स' के नाम से जाना जाता है।
इस सचिवालय का नाम 'वल्लभ भवन' तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के कहने पर रखा गया। द्वारका प्रसाद मिश्र, सरदार वल्लभ भाई पटेल से बहुत प्रभावित थे। वह 1947 से 1950 के बीच सीपी एंड बरार के गृह मंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे और इस दौरान उनका सरदार पटेल से गहरा संबंध रहा था। सरदार पटेल के प्रति उनके सम्मान के कारण ही इस भवन का नाम वल्लभ भवन रखा गया। वल्लभ भवन सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का एक साक्षी है, जो राज्य के विकास और इतिहास का प्रतीक है।
गेट पास बनाने की औपचारिकताएं पूरी कर हम लोग गृह मंत्रालय पहुंचे। हम पहलीबार इस भवन में गए थे। एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे बाबू के पास पूछते हुए, हम आख़िरकार उस बाबू के पास पहुँचे, जो रिजल्ट जारी करने का काम देखते थे। उनका नाम था गुपचुप बाबू, जैसा कि पिछले व्यक्ति ने हमें बताया था।
छोटा-नाटा क़द, काला रंग, उड़े हुए बाल, सफ़ेद कमीज़-पायजामा पहने बाबू को हमने नमस्ते किया। उन्होंने बिना नज़रें ऊपर उठाए, सिर्फ़ सर हिलाकर जवाब दिया। जब हमने अपना परिचय दिया कि हम डिप्टी कलेक्टर और आईएएस अधिकारी हैं और प्रशिक्षण ले रहे हैं, तो उन्होंने गर्दन नीचे किए ही जवाब दिया कि रिजल्ट बन चुका है।
उन्होंने एक फ़ाइल की ओर इशारा करते हुए कहा कि अभी यह गोपनीय है, जब गजट में छप जाएगा, तभी पता चलेगा। बहुत मिन्नतें करने के बाद भी वह टस से मस नहीं हुए। हम लोग मुँह लटकाकर वापस प्रशासन अकादमी आ गए। हमें अपनी औकात का पता चल गया था। हमारे अहंकार को बहुत चोट पहुँची थी।
बदलता प्रशासन और चंबल के तूफान
जब मैं मुरैना वापस पहुँचा, तो श्री दत्त साहब का तबादला हो चुका था। मेरे दूसरे कलेक्टर थे श्री एस. सी. वर्धन। वह बहुत सीधे और सौम्य व्यक्ति थे, जो उड़ीसा के निवासी थे। वह दो-तीन महीने ही थे, तभी कमला कांड हो गया। अश्विनी सरीन, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के एक पत्रकार थे, जिन्होंने एक 'देह व्यापार के बाज़ार' से कमला नामक एक महिला को ख़रीदा था। यह एक भयानक प्रथा थी, जहाँ महिलाओं को वेश्यावृत्ति या घरेलू दासों के रूप में बेचा जाता था।
सरीन का इरादा इस जघन्य मानव तस्करी को उजागर करना था। इस खुलासे ने पूरे भारत में भारी हंगामा खड़ा कर दिया। और फिर मुरैना में एक और महिला के साथ बदसलूकी की गई, जिसके परिणामस्वरूप मुरैना के कलेक्टर का तुरंत तबादला कर दिया गया।
फिर हमारे तीसरे कलेक्टर बने श्री संदीप खन्ना, जो दिल्ली के रहने वाले थे। तब तक मुझे एक सरकारी मकान मिल चुका था, मेरा परिवार भी मेरे साथ आ गया था, और मेरे चाचा ने मुझे अपनी 'राजदूत' मोटर साइकिल भी दे दी थी। मैंने अकेले ही टीकमगढ़ से मुरैना तक की 256 किलोमीटर की सड़क मार्ग से दूरी तय की थी।
मैंने एल.एल.बी. करने के लिए कॉलेज में दाखिला लिया और मुझे दिल्ली के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश सरकार के मुकदमों का प्रभारी भी बना दिया गया। इस कारण मुझे हर महीने दिल्ली जाना होता था। मैं रात को छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से दिल्ली जाता और सुबह निजामुद्दीन स्टेशन पहुँचता। वहाँ से पैदल ही पालिका बाज़ार जाता, फ्रेश होता और सुप्रीम कोर्ट पहुँच जाता।
शासकीय वकील गंभीर जी के चैंबर में बैठकर वकालतनामे पर हस्ताक्षर करता। सुप्रीम कोर्ट की कैंटीन में दोपहर का सस्ता खाना खाता और शाम तक पैदल दिल्ली की सड़कों पर घूमता रहता। फिर वापस स्टेशन आकर मुरैना के लिए रवाना हो जाता। मेरे पास ज़्यादा पैसे नहीं होते थे, इसलिए यह रूटीन मेरी ज़रूरत बन गई थी। इस तरह मैंने लगभग पूरी दिल्ली पैदल ही घूम कर देख ली थी।
एक बार मैं अपने कलेक्टर के साथ धौलपुर में फ़िल्म देखने गया। जब मैं टिकट खरीदने गया, तो खिड़की पर बैठे लड़के ने मुझे पहचान लिया। मैं चकित था, क्योंकि यह राजस्थान था। उसने बताया कि वह बोर्ड की परीक्षा देने मुरैना आया था और मैंने उसकी नक़ल पकड़ी थी। वाह, परिचय हो तो ऐसा! उसने हम दोनों को फ़्री में फ़िल्म दिखाई और इंटरवल में चाय-नाश्ता भी करवाया।
इस बीच बहुत मजेदार कोर्ट केसेस को जानने का मौका मिला। एक प्रकरण दिल्ली तीस हजारी कोर्ट में एक टेप रिकॉर्डर का चल रहा था। किसी समय एक टेप रिकॉर्डर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तहत गरीबी उन्मूलन, असमानता को कम करने और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए विकासखंड मुरैना को दिया गया था।
उस समय टेप रिकॉर्डर भारत में नहीं मिलते थे। विदेश से आयात होते थे। बहुत महगें थे। टेप रिकॉर्डर कलेक्टर ने ले लिया। कुछ दिन गाने सुने। जब ख़राब हुआ तो दिल्ली सुधाने के लिये भेजा गया। जिस दुकान में टेप रिकॉर्डर सुधारने दिया था वह किसी कारण बन्द हो गई। टेप रिकॉर्डर सुधार कर वापिस नहीं मिला।
कलेक्टर ने दुकानदार के विरुद्ध कोर्ट में प्रकरण दायर कर दिया। यह प्रकरण वर्षों से चल रहा था। दुकानदार ने आवेदन दिया कि वह टेप रिकॉर्डर की कीमत या दूसरा टेप रिकॉर्डर देने को सहमत था। लेकिन सरकार का कहना था कि वह पुराना टेप रिकॉर्डर मिलाना चाहिए। वह कम्पनी जिसने वह टेप रिकॉर्डर बनाया था बंद हो गई थी। गवाही देने तत्कालीन कलेक्टर मुरैना करि बार दिल्ली जा चुके थे। सरकार ने वकील तथा अधिकारियों के ऊपर टेप रिकॉर्डर की कीमत से कई गुना खर्च कर दिया था। लेकिन प्रकरण जारी था।
इस बीच हमारे कमिश्नर श्री व्ही जी निगम कलेक्टर कार्यालय का निरीक्षण करने आए। वह बहुत सख्त मिजाज ऑफिसर थे। उन्होंने सब अधिकारियों की बैठक बुलाई। उनकी टीम ने कई दिनों तक हर शाखा का निरीक्षण कर रिपोर्ट बनाई थी। उन दिनों कमिश्नर की टीम की खूब आवभगत हुई। लेकिन उन्हें भी अपनी सैलरी जस्टीफ़ाइड करना था तो कुछ साधारण कमियां निकाली थी। कमिश्नर ने सब को खूब डांटा।
जब मेरी बारी आई तो उन्होंने मेरी ट्रेनिंग के बारे में पूछा। मैंने जवाब दिये। उन्होंने पूछा नामांतरण के प्रकरण किस हैड में दर्ज होते है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत राजस्व न्यायालयों में प्रकरणों के पंजीयन के संबंध में, विभिन्न प्रकरणों के लिए विशिष्ट शीर्षक होते हैं। ये शीर्षक मामले की प्रकृति पर निर्भर करते हैं। प्रत्येक प्रकार के राजस्व मामले के लिए अलग-अलग शीर्षक होते है जैसे नामांतरण, बंटवारा,सीमाविवाद/सीमांकन,अतिक्रमण,व्यपवर्तनऔरआपत्ति/अपील/पुनरीक्षण/पुनरावलोकन आदि।
जब कोई आवेदन या प्रतिवेदन प्राप्त होता है, तो राजस्व न्यायालय उसका पंजीयन एक विशिष्ट प्रकरण संख्या के साथ करता है, जो प्रकरण के प्रकार और न्यायालय के अनुसार होता है। मुझे वह हैड याद नहीं था। तब उन्होंने कहा तुम ठीक से ट्रैनिंग नहीं ले रहे हो। तुम्हारे प्रोवेशन पीरियड को बढ़ाने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र लिखना पढ़ेगा। मैं डर गया। इसका मतलब था कि मेरी सर्विस तब तक कन्फर्म नहीं होती जब तक मैं दो साल का प्रोबेशन पीरियड पूरा करने के साथ विभागीय परीक्षा तथा ट्रैनिंग पूरी नहीं कर लेता। मैंने उनसे याद करने का समय मांगा जो उन्होंने बहुत कठिनाई से मुझे दिया।
एक दिन में बहुत सरे हैड याद कर उनके कमिश्नर ऑफिस गया। उन्होंने मुझसे वह हैड नहीं पूछे। उन्होंने पूछा कि मुरैना का अधिकतम तापमान क्या होता है। फिर मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं था। उन्होंने अपना ऑफिस बैग खोल कर बताया जब उन्हें किसी मीटिंग में जाना होता है तब वह अपने साथ कितनी जानकारी के जाते है। उन्होंने मुझे सिंधिया राज्य की एक पुस्तक 'दरबार पॉलिसी' पड़ने को दी। इस पुस्तक में वह विवरण दिये गए है जब आप महाराजा के सामने दरबार में कैसे कपड़े पहनेंगे, क्या-क्या जानकारी ले कर जायगे। कैसे व्यवहार करेंगे आदि।
धीरे-धीरे मैंने जाना कि जो अधिकारी जितना भ्रष्ट होता, उसे उतना ही एक्जुकेटिव अधिकारी माना जाता। एक दिन मेरे कलेक्टर ने कहा, "तुमने एक कहावत सुनी है, 'साहब की अगड़ी और घोड़े की पिछाड़ी नहीं पड़ना चाहिए'?"
मैंने तुरंत पूछा, "क्या अगल-बगल साथ-साथ नहीं चल सकते?"
उन्होंने मुस्कुराकर कहा, "कुछ बातें उम्र के साथ समझ आती हैं।"
वह बहुत सही थे। अगली बार जब हमारे कमिश्नर आए, तो उन्होंने मुझसे पूछा, "तुम नया काम क्या करोगे?" मुझे कुछ पता नहीं था, तो मैंने कहा, "जो कोई नहीं करेगा, वह मैं करूँगा।" उन्होंने मुझे कलेक्टर ऑफ़िस का पुस्तकालय व्यवस्थित करने का काम दिया। मैंने उस काम को बहुत लगन से किया और जब कमिश्नर ने उस लाइब्रेरी को देखा, तो उन्होंने मुझे और मेरे कलेक्टर को एक प्रशंसा पत्र भेजा। यह मेरी नौकरी का पहला प्रशंसा पत्र था, जो कुछ अलग करने का नतीजा था। जिस 'जुम्मन कीड़े' ने मुझे कॉलेज में काटा था, उसका असर आज भी था।
सबलगढ़ का बुलावा: एक नई राह का जन्म
प्रोबेशन काल में ही देश में चुनाव हुए और मुझे वोटों की गणना का प्रभारी बनाया गया। मतगणना के लिए जगह तलाशना अपने आप में एक चुनौती थी। आख़िरकार, सेंट्रल वेयरहाउस कारपोरेशन की एक निर्माणाधीन बिल्डिंग का चयन किया गया। जब मैंने चाबी माँगी, तो सब-इंजीनियर ने कहा कि ठेकेदार के पास है और ठेकेदार ने कहा कि सब-इंजीनियर के पास। दो दिन तक यही चलता रहा।
मेरा स्टाफ चाबी नहीं ला सका। एक दिन मैं अपनी जीप से सब-इंजीनियर को ढूंढ़ता हुआ जा रहा था। वह रास्ते में मिला। जब उसने चाबी होने से इनकार किया और अड़कर खड़ा हो गया, तो मेरे गुस्से का पारा चढ़ गया। उन दिनों मैं अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रख पाता था। मैंने उसे एक जोरदार थप्पड़ मारा, और उसने चुपचाप जेब से चाबी निकालकर दे दी।
एक बार मैंने रोड पर एक जले हुए मोबिल ऑयल का ट्रक पकड़ लिया, पर मुझे पता ही नहीं था कि इस पर कौन-सा क़ानून लगेगा। एक सप्ताह तक ट्रक थाने में खड़ा रहा। अंत में, पब्लिक प्रॉसिक्यूटर की मदद से पता चला कि जला हुआ मोबिल अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम के तहत आता है, और इसका परिवहन बिना अनुमति के एक अपराध है। इस तरह, ट्रक को राजसात किया गया।
मुरैना में कलेक्ट्रेट भवन की नई बिल्डिंग के लिये मेला ग्राउंड के पास जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था। एक दिन एक वकील ने एक आवेदन कलेक्टर को दिया कि उनके पक्षकार की जमीन पर उनके परिवार का प्राचीन शिव मंदिर बना है। अतः उस जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाए। कलेक्टर ने वह आवेदन स्थल निरीक्षण कर वस्तुस्थिति की रिपोर्ट देने के लिये मुझे दिया। एक दिन मैं स्थान देखने गया। गर्मियों के दिन थे। एक बाबू की मोटर साइकिल से मौके पर गया। वहां एक आदमी खेत में काम कर रहा था। वह भूमि स्वामी था। मैंने उसके बयान लिखे।
वहां एक चबूतरा बना कर एक पत्थर को पूजा करने के लिये शिवलिंग के रूप में रखा था। वह कोई पुराना मन्दिर नहीं था। मैं स्थल निरीक्षण के पश्चात अपने कक्ष में रिपोर्ट लिख रहा था। तभी एक नौजवान वकील आया। मैंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा। उसने मुझसे पूछा क्या मैं मौका देखने गया था। मैंने उसे बताया कि में अपनी रिपोर्ट लिख रहा हूँ। उसने कहा कि मैं उसे बिना सुने रिपोर्ट नहीं लिख सकता हूँ।
मैंने उसे बताया कि यह कार्यवाही महज एग्जीक्यूटिव रिपोर्ट के लिये है। उसे अपने पक्षकार का आवेदन सुनवाई के लिये भूमि अधिग्रहण अधिकारी हो देना चाहिए। उन्हें सुनवाई करने का अधिकार है। वह बहुत नाराज हो गया और मुझे धमकी देने लगा कि देखे बिना कैसे रिपोर्ट लिखते है। वह मेरी तवील पर बार-बार हाथ पटक रहा था। मैंने उसे कक्ष से बाहर जाने का कहा। वह मणि माना। बाहर नहीं गया। सुनवाई करने की लिये जिद्द करने लगा।
जब समझने पर नहीं माना तब मुझे बहुत गुस्सा आ गया। उन दिनों मुझे बहुत जल्दी बहुत ज्यादा गुस्सा आता था। तब मेरे व्यवहार पर मेरा नियंत्रण नियंत्रण नहीं रहता था। उन दिनों कमरे में गर्मी से बचने की लिये खस की चिक लगाई जाती थी। मैंने उसे एक लात मारी। वह बाहर जा गिरा। उसे कोई चोट नहीं आई। वह चिक से टकरा कर बाहर गिरा था। वह चला गया। अगले दिन वार एसोसिएशन ने मुझ पर माफ़ी मांगने तथा पुलिस केश दर्ज करने की मांग कर हड़ताल कर काम बंद कर दिया। दिन भर मेरे विरुद्ध वकील नारे लगते थे। सभी कोर्ट्स में काम बंद था।
वकीलों ने कलेक्टर को उनकी मांगो का ज्ञापन दिया। कलेक्टर ने मुझ से कहा ‘जब तुम्हारे हाथ में कलम है तो कलम चलाओ हाथ क्यों चलते हो।’ कार्यालय परिसर में पुलिस लगा दी गई। मुरैना में जरा-जरा सी बात पर लोग गोली चला देते है। मुझे सतर्क रहने की सलाह पुलिस अधीक्षक ने दी। यह हड़ताल चार दिन तक चली। चौथे दिन मुझे कमिश्नर ने बुलवाया। चम्बल डिवीजन में केवल दो जिले भिंड और मुरैना ही आते है। कमिश्नर मुरैना में ही रहते थे। उनके पास काम ज्यादा नहीं होता था। वकीलों ने उन्हें ज्ञापन दिया।
कमिश्नर ने अगले दिन मुझे बुलाया। मैं अपने कलेक्टर के साथ उनसे मिलने गया। उन्होंने पूरी घटना कलेक्टर से पूछी। कलेक्टर ने पूरी बात बताई। कमिश्नर ने तब पुलिस अधीक्षक को बुला लिया। मुझे बाहर बैठने को कहा। तीनों ने आपस में बात की। थोड़ी देर बाद मुझे अन्दर बुलाया। कमिश्नर ने कहा कि ‘रवीन्द्र ! तुम माफी मांग लो।’ हड़ताल समाप्त हो जाएगी। मुझे बहुत ख़राब लगा।
मैंने देखा कि मेरे सीनियर ही मेरा पक्ष नहीं ले रहे है। मैंने साहस कर कहा सर ! मैं अपने कमरे में था। मुझे वकील को सुनने का अधिकार नहीं है। मैं केवल वस्तुस्थिति की रिपोर्ट बना रहा था। उलटे शासकीय कार्य में बाधा डालने का केस पुलिस को वकील के विरुद्ध दर्ज करना चाहिए।
मैंने कहा चाहे जो हो जाए मैं माफ़ी नहीं मांगूंगा। मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। कमिश्नर ने कलेक्टर तथा पुलिस अधीक्षक को मुझे समझाने तथा ठंडे दिमाग से काम लेने की सलाह दी। हम लोग वापिस आ गये।कलेक्टर के रीडर शर्मा जी वार एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ रोज रात को खाते-पीते थे।
मैंने उनसे ट्रेनिंग ली थी वह मुझे अपने बच्चे जैसा प्यार करते थे। उन्होंने मुझे परेशान दिखा कर मेरे कमरे में आ कर कहा कि वह आज रात अध्यक्ष से हड़ताल समाप्त हारने के पत्र पर हस्ताक्षर ले लेंगे।
उन्होंने रात को वार एसोसिएशन के अध्यक्ष के लेटर पेड़ पर कलेक्टर ने नाम हड़ताल वापस लेने का पत्र हस्ताक्षर करवा कर ले लिया। मैंने वह पत्र कलेक्टर, कमिश्नर तथा पुलिस अधीक्षक को दिया। पत्र से वकीलों की गुटबाज़ी तथा फूट सामने आ गई और हड़ताल समाप्त हो गई। मुझे अपनी दादी की कही कहावत 'जान बची और लाखों पाये, लौट के बुद्धू घर को आये' याद आ गई। मैंने अपने कलेक्टर की सलाह ‘जब तुम्हारे हाथ में कलम है तो कलम चलाओ हाथ क्यों चलते हो’ भविष्य में मानने की निश्चय किया।
यह वह दिन थे जब राशन, डीजल, पेट्रोल, मिट्टी का तेल, शक्कर, गेहूं, चावल यहां तक कि स्कूल की कॉपियां कंट्रोल से मिलती थी। हम लोग दाल बना कर कभी इस बाजार कभी उस बाजार दुकानें चेक करते स्टॉक, कीमत देखते। गोदामों में छापे लगते। स्टॉक मिलान नहीं होने पर दुकान, गोदाम सील कर देते थे।
इस मामले में मैं बहुत बदनाम हो गया था। बहुत मेहनत ईमानदारी से काम करते। बाजार में जब मेरी गाड़ी रुकती तो दुकानें बंद हो जाती। एक दफे मेरी पत्नी ने बाजार जाने का कहा मैं उनके साथ जब बाजार में गाड़ी घुसी तो मेरी गाड़ी देख कर दुकानें बंद हो गई। रात को हम लोग आगरा बॉम्बे हाईवे पर ट्रक चेक करते थे। जब स्कूलों में परीक्षा होती तब नक़ल चेक करने जाते। लेवी में सरकार किसानों से गेहूं लेती थी तब गांव-गांव जा कर गेहूं एकत्र करवाते थे।
मुरैना में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल कराने का बहुत बड़ा उद्योग चलता था। स्कूलों में बोर्ड परीक्षा देने पुरे देश के बच्चे आते थे। निजी स्कूल जो बोर्ड परीक्षा के केंद्र होते खेतों में टेन्ट लगा कर परीक्षा करवाते थे। पास करवाने के ठेका दिया जाता था। निजी स्कूल में चार तरह के ऑफर उपलब्ध होते -पहला जिसमें स्टूडेंट को कुछ नहीं करना स्कूल उनकी तरफ से किसी अन्य से उसका पेपर सॉल्व कराते, दुसरे में स्कूल ब्लैक बोर्ड पर उत्तर लिखते नक़ल स्टूडेंट को करना होती, तीसरे में आप अपनी किताबें ले कर आये और नक़ल खुद करें तथा चौथे में स्टूडेंट अपनी नक़ल चुटकों पर ला कर उत्तर लिखें। चारों ऑफर्स की फ़ीस अलग-अलग होती थी। उसी के हिसाब से उन्हें रोल नम्बर मिलते तथा बैठक व्यवस्था अलग-अलग की जाती थी। यह परीक्ष केंद्र चम्बल की वादियों में बहुत दूर बनायें जाते जहां रास्ते नहीं होते थे।
किन्ही-किन्ही गांव में नहर का पानी छोड़ कर रास्ते बन्द कर दिये जाते। किन्ही-किन्ही गांव में बाहर पेड़ों पर लोग बैठे होते दूर से जब गांव में कोई जीप आती देखते तब कोई बाजा बजा कर स्कूल में सिग्नल भेजते। इस समय जीप या कार केबल सरकारी विभागों में ही होती थी। प्राइवेट वाहन लगभग नहीं थे। तब स्कूल की परीक्षा स्थल को व्यवस्थित कर दिया जाता। निरीक्षण के समय कोई नक़ल नहीं मिलती। हम लोग नक़ल पकड़ने की अलग-अलग रणनीतियां बनाते।
कई बार ऑफिस के बाहर चाय या नाश्ते की दुकान होती तो वह दुकानदार स्कूलों की 'मुखबिरी' करते। "मुखबिर" का हिंदी में अर्थ सूचना देने वाला या गुप्तचर होता है। यह शब्द आमतौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो किसी गुप्त या गोपनीय जानकारी को किसी अन्य व्यक्ति या संगठन को देता है। जब निरीक्षण दल बाहर जाते तो लैंड लाइन फोन इ कॉल कर स्कूलों को अलर्ट कर देते थे।
कभी-कभी हम लोग खाली हाथ आते। कभी-कभी बोरों में भर कर नक़ल लाते। इस रैकिट में नेता, जनप्रतिनिधि, बोर्ड अधिकारी और स्थानीय कर्मचारी मिले होते थे। मैंने पहला रिश्वत लेने का मामला एक प्राइवेट स्कूल के प्रिंसिपल को पुलिस के साथ ट्रैप कर शुरू किया था। जब पुलिस का दाल किसी को रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़ता है तब उस दाल में एक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट गवाह के तौर पर होना आवश्यक था।
एक बार मैं अपने कलेक्टर के साथ धौलपुर फिल्म देखने गया। जब मैं टिकिट खड़की पर टिकिट खरीदने गया तो खिड़की पर जो लड़का बैठा था उसने मुझे नमस्ते किया और अपने मैनेजर से मिलवाया। मैं चकित था क्योंकि धौलपुर राजस्थान में आता है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वहां कोई मुझे पहचानेगा। मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि वह बोर्ड की परीक्षा देने मुरैना आया था और मैंने उसकी नक़ल पकड़ी थी। वाह, परिचय हो तो ऐसा उसने हम दोनों को फ्री में फिल्म दिखाने की व्यवस्था की और इंटरवल में चाय नाश्ता करवाया।
जब मैं प्रोबेशनर था तब तत्कालीन कलेक्टर ने उनकी एक पुरानी महिंद्रा पैट्रोल जीप मुझे एलॉट कर दी और ड्रायवर था कलेक्टरों पुराना ड्रायवर बसंता। बहुत होशियार पर बड़ा बातूनी। हर कलेक्टर का इतिहास मौखिक याद। गाड़ी काम चलता पर निजी कहानियां खूब सुनाता। गाड़ी का पुर्जा-पुर्जा हिलता। चारों घिसें टायर। हम पीछे तीन पुराने टायर रखते स्टेपनी के रूप में। जब में घर से ऑफिस जाता करीब आधा किलो मीटर दूर गाड़ी झटके खाती और रुक जाती। में रिक्शा ले कर ऑफिस जाता थोड़ी देर में बसंता गाड़ी ले कर आ जाता। मैं कुछ समझा नहीं। एक गाड़ी चला रहा था तो ड्राइवर सीट के नीचे एक पाइप तथा एक केन एक लीटर की रखी थी। मैं समझ गया।
मेने बंसता से पूछा। उसने बताया कि जब में गाड़ी में चालीस लीटर पैट्रोल भरवाता वह हर बार एक लीटर निकाल लेता। मैंने उससे एक एग्रीमेंट किया और एक लीटर गाढ़ी में कम डलवाता। वह बसंता ले लेता। उसके बाद गाड़ी कभी नहीं रुकी।
एक दिन मैंने कलेक्टर से अनुरोध किया कि यह गाड़ी बहुत खराब हो चुकी है मेरे किसी काम की नहीं है। मैं इससे टूर भी नहीं कर पाता। उन दिनों कलेक्टर ऑफिस में गिनी चुनी गाड़िया ही थी। कलेक्टर ने कहा यह गाड़ी तुम चलाओ तो गाड़ी का पूरा मैकेनिज्म समझ जाओगे। मैंने छह माह वह गाड़ी चलाई।
मध्य प्रदेश में राज्य सिविल सेवा अधिकारियों के लिए विभागीय परीक्षा आयोजित की जाती हैं। ये परीक्षा अधिकारियों को सेवा काल के दौरान उनके पदोन्नति, स्थायीकरण, या विशिष्ट पदों पर चयन के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। डिप्टी कलेक्टर का पद मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा का हिस्सा है।
इन अधिकारियों को स्थायीकरण के लिए विभागीय परीक्षाएं "उच्च स्तर" से उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। इन परीक्षाओं का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों को राजस्व, प्रशासनिक, दाण्डिक, वित्तीय और लेखा संबंधी नियमों और प्रक्रियाओं से अवगत कराना तथा उनकी व्यावहारिक क्षमता का मूल्यांकन करना है। डिप्टी कलेक्टर पद पर स्थायीकरण के लिए इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। नवनियुक्त डिप्टी कलेक्टरों को परिवीक्षा अवधि प्रोबेशन पीरियड के दौरान इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना होता है।
प्रशासनिक, राजस्व एवं दाण्डिक विधि एवं प्रक्रिया: यह विषय प्रशासनिक, राजस्व और आपराधिक कानूनों तथा उनकी प्रक्रियाओं से संबंधित होता है। सिविल विधि एवं प्रक्रिया, वित्त एवं लेखा तथा स्थानीय शासन: इसमें नागरिक कानून, वित्तीय नियम, लेखा प्रक्रिया और स्थानीय स्वशासन के प्रावधान शामिल होते हैं। राजस्व विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन यह राजस्व संबंधी कानूनों और आदेशों को लिखने की क्षमता पर केंद्रित होता है।
दाण्डिक विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन यह आपराधिक कानूनों और आदेशों को लिखने की क्षमता पर केंद्रित होता है। मेरे द्वारा फर्स्ट अटेम्ट में सभी विषय "उच्च स्तर" से पास कर लिए गये। केवल राजस्व विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन में उच्च स्तर के नंबर नहीं आये। उसे दूसरे अटेम्ट में पास कर सका। मैंने परीक्षा मोती महल ग्वालियर में दी।
मैंने एलएलबी में लॉ करने के लिये एडमिशन लिया था। इस कारण परीक्षा नहीं दे सका। हमारे कलेक्टर ने हमें देख कर एडमिशन लिया और उन्होंने लॉ कर लिया। कलेक्टर साहब से मेरी दोस्ती थी हम दोनों लगभग हम उम्र थे। में अक्सर उनके साथ दिल्ली जाता और उनकी ससुराल में ठहरता। वह कहते देखों में कितना दयालु हूँ तुम्हें अपनी साली के कमरे में ठहरता हूँ। उनकी साली तब मिरांडा हाउस में पड़ती थी और होस्टल में रहती थी।
एक दफे जब हम लोग दिल्ली गए तो वह मुझे साउथ दिल्ली के रेस्टोरेंट में खाना खिलाने ले गये। तब नॉन वेज खाने पर मेरी बहुत बहस हो गई। उसके बाद उन्होंने कभी किसी बात के लिए जबरदस्ती नहीं की। हम लोग कभी-कभी ढाबा पर दाल रोटी खाते। फिल्म देखते और खूब घूमते थे।
उन दिनों मेरी फोटो तथा न्यूज खूब अखबारों में लगभग रोज छपता थी। मुझे इसका नशा हो गया था। पेपर की कटिंग फाइल बना कर रखता। इससे किक मिलता। एड्रेनल रिलीज होता। डोपामाइन रिलीज होता। अजीब नशा था। खूब काम करते थे। जब हम लोग को लोग साथ देखते तो लोग बहुत जलते थे। तरह-तरह की कहानियां। अफवाह प्रशासनिक गलियारों में तैरती रहती। मुझे इस सब का अनुभव नहीं था।
उनकी जिले की जानकारी लेने की अनोखी तरकीब थी। उनके पब्लिक रिलेशन अधिकारी पराशर जी रोज सुबह-सुबह बस स्टैंड जाते और जब चारों और से आने वाली सवारियां बसों से उतरती तब उनसे खबरें पूछते। फिर सीधे कलेक्टर बंगले जाते। कलेक्टर के साथ नाश्ता करते और ऐसी ख़बरें देते जी किसी अख़बार में नहीं छपी होती थी। तब संचार के इतने साधन भी नहीं होते थे। कलेक्टर सम्बंधित अधिकारियों से फोन कर जबाब तलब करते। उन्हें पता नहीं होता था। सब सोचते कलेक्टर का नेटवर्क बहुत तगड़ा है।
वह अधिकारियों के घर बिना बुलायें जाते। चाय पीने। पूरे घर में घूमते देखते कितना सामान है। अंदाज लगते अधिकारी ईमानदार है या नहीं। अधिकारियों की पत्नियों का क्लब था। अध्यक्ष थी कलेक्टर की पत्नी। जिस अधिकारी की पत्नी महेंगे कपड़े, गहने पहनती उन्हें रिपोर्ट मिल जाती।
मैंने समझा कलेक्टर राजा है और डिप्टी कलेक्टर उनकी रानियां और उनमें कोई एक पटरानी। एक चूहा दौड़ अधिकारियों में हमेशा चलती थी। मुझे लोग हमेशा मेरे अधिकारियों का 'ब्लू आइड बॉय' मानते रहे। मुझे भी लगता था कि हर किसी को ईमानदार, कार्यकुशल तथा मेहनती साथी ही चाहिए। ब्लू आइड बॉय' एक मुहावरा है जिसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे कोई अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पसंद करता है और उसका पक्ष लेता है, या जिसे विशेष रूप से अच्छा व्यवहार दिया जाता है। इसे "पसंदीदा" या "खास" व्यक्ति के रूप में समझा जाता है।
मुरैना में एक उप-मंडल था सबलगढ़। वहाँ के तत्कालीन विधायक ने मुख्यमंत्री को एक शिकायती पत्र लिखकर एसडीएम द्वारा शक्कर वितरण में गड़बड़ी करने का आरोप लगाया और उन्हें निलंबित कर जाँच की माँग की। एसडीएम को निलंबित कर तबादला कर दिया गया। एसडीएम का पद रिक्त हो गया, लेकिन कोई भी डिप्टी कलेक्टर वहाँ जाने को तैयार नहीं था। सब विधायक से डरते थे।
हमने मुरैना में ऑफ़िसर्स क्लब की बिल्डिंग बनवाई थी। उसके उद्घाटन के लिए कमिश्नर को मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया। डिनर करते समय, कमिश्नर ने कलेक्टर से पूछा, "सबलगढ़ का एसडीएम किसे बनाया?"
कलेक्टर ने कहा, "सर, कोई वहाँ जाना नहीं चाहता।" कमिश्नर ने मेरी ओर देखकर कहा, “मेक हिम एसडीएम!” खाने का कौर मेरे गले में अटक गया। मैंने कातर निगाहों से कलेक्टर की ओर देखा। उन्होंने आँख से इशारा किया और कहा, "जी सर।"
मैं अपनी शुरुआत सबलगढ़ से नहीं करना चाहता था। मैंने कलेक्टर से आग्रह किया कि मुझे वहां न भेजा जाए, लेकिन उन्होंने मुझे कमिश्नर से बात करने की सलाह दी। तीन दिन तक मैं अपनी मोटरसाइकिल से कमिश्नर बंगले के गेट तक जाता और वापस लौट आता। अंदर जाकर बात करने की हिम्मत ही नहीं हुई।
कलेक्टर ने आख़िरकार आदेश निकालकर मुझे तीन दिन में ज्वाइन करने को कहा। मैंने अपनी पत्नी से कहा कि तुम मुरैना में ही रुको। मैं सबलगढ़ जाकर ज्वाइन करता हूँ। विधायक जी से मेरी बनेगी नहीं, वह जल्दी ही मेरा तबादला करवा देंगे।
मैंने अपनी इस समझ को एक नाम दिया था- 'पस्तोर डॉक्ट्रिन'। इसके तहत मैं अक्सर चीज़ों, घटनाओं और लोगों पर अपनी व्याख्या बनाता था।
मैंने अधिकारियों को दो श्रेणियों में बाँटा था: एक थे ज्ञान मार्गी, जो नियमों और क़ानूनों के हिसाब से चलते थे, और दूसरे थे भक्ति मार्गी, जो अपने बॉस और सत्ता के इशारों पर चलते थे। अब यह आपकी मर्जी थी कि आप कौन से मार्ग पर चलकर अपना करियर बनाते हैं। और मैंने चुना था ज्ञान मार्गी पथ, क्योंकि मुझे तो अलग करने का वह 'जुम्मन कीड़ा' काट चुका था। मेरी दादी ने एक दोहा सुनाया था-
"लीक-लीक कायर चले, लीके-लीक कपूत।
लीक छोड़ तीनों चले शायर, सूर, सपूत।"
सबलगढ़
अज्ञात का अंदाज़
जब मेरी पोस्टिंग सबलगढ़ में हुई, तो यह एक बिल्कुल नई दुनिया थी। लोग मेरे सरनेम 'पस्तोर' को सुनकर अंदाज़ा लगाने लगे कि मेरी जाति और मेरा क्षेत्र क्या है। जातिवाद और क्षेत्रवाद, भारतीय समाज के वे स्याह धब्बे हैं जो कभी ख़त्म नहीं हो सकते। किसी ने अंदाज़ा लगाया कि मैं 'पास्टर' हूँ, यानी ईसाई। किसी ने मुझे पहाड़ी बताया, तो किसी ने अनुसूचित जाति या जनजाति का। लेकिन किसी को यह अंदाज़ नहीं हुआ कि मैं एक ब्राह्मण हूँ। मैंने अपने जीवन में कई बार देखा है कि कभी-कभी तटस्थ (न्यूट्रल) रहना कितना फ़ायदेमंद होता है।
उन दिनों सबलगढ़ समाजवादियों का गढ़ था और उसके बेताज बादशाह थे बहादुर सिंह धाकड़, जो पेशे से एक वकील भी थे। वे अपने ऑफ़िस के सामने रोज़ सुबह दो ब्लैकबोर्ड रखते थे और उन पर ताज़ी ख़बरें चाक से लिख दिया करते थे। उन्होंने मेरे बारे में बहुत खोजबीन की और मुरैना के लोगों से जितनी जानकारी मिल सकी, उससे मेरी विरुदावली (प्रशंसा) लिख दी। लोगों ने बड़े चटकारे लेकर इसे पढ़ा। बात मुझ तक पहुँची। कुछ पत्रकार मेरा इंटरव्यू लेने आए, लेकिन मैंने अपनी व्यक्तिगत जानकारी देने से साफ़ मना कर दिया। उन्होंने भी अपनी तरफ़ से खोजबीन की और जब ख़बरें छपीं, तो लोग इतना तो जान गए थे कि मैं ब्राह्मण हूँ।
सियासत की बिसात
जौरा के विधायक, मिश्रा जी, का उस समय अलग ही रुतबा था। वे अपने विधानसभा क्षेत्र में केवल ब्राह्मण अधिकारियों को ही पोस्ट करवाते थे। यह जान लीजिए कि आपकी पोस्टिंग सिर्फ़ आपकी योग्यता से नहीं होती। उनका तत्कालीन एस.डी.एम. मेरे साथी कोमल सिंह थे। जब विधायक जी को मेरे ब्राह्मण होने का पता चला, तो वे सीधे कलेक्टर से मिले और मेरी पोस्टिंग जौरा करने का अनुरोध किया। कलेक्टर, विधायक जी को नाराज़ नहीं करना चाहते थे। उन्होंने यह अंदाज़ा लगाया कि मैंने ही विधायक जी से यह कहलवाया होगा, जबकि मैं ना तो कभी उनसे मिला था, ना ही उन्हें जानता था। कलेक्टर ने मुझसे पूछा और मैंने उन्हें पूरी स्थिति बता दी। उन्होंने किसी तरह विधायक जी को यह कहकर शांत किया कि कुछ दिनों बाद वे मेरा तबादला कर देंगे, और विधायक जी मान गए।
सबलगढ़ की आत्मा
सबलगढ़, मध्य प्रदेश के कई शहरों से सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ था। यहाँ ग्वालियर, मुरैना, श्योपुर कलां, शिवपुरी, जयपुर और दिल्ली के लिए रोज़ बसें चलती थीं। सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन मुरैना था और सबसे प्रमुख शहर ग्वालियर। यहाँ का गौरव था सबलगढ़ का किला, जो एक पहाड़ी पर शान से खड़ा मध्यकालीन वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण था। इसका निर्माण करौली के राजा गोपाल सिंह ने करवाया था, लेकिन इसकी नींव गुर्जर सरदार सबल सिंह ने रखी थी, जिनके नाम पर इस शहर का नाम पड़ा।
इस किले ने मराठा और अंग्रेजों के शासनकाल सहित कई ऐतिहासिक लड़ाइयाँ देखी हैं। आज भले ही यह खंडहर हो, लेकिन इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व अब भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। कुछ लोककथाओं के अनुसार, यह किला भूतों की कहानियों के लिए भी जाना जाता है। किले के भीतर कई मंदिर, जैसे जगन्नाथ मंदिर, और नवल सिंह हवेली तथा कचहरी जैसी ऐतिहासिक संरचनाएँ भी स्थित थीं।
सबलगढ़ में अन्य कई आकर्षण थे, जैसे अलखिया खोह काली माता का एक प्रसिद्ध मंदिर, जहाँ हर साल नवरात्रि में नौ दिनों का मेला लगता था और रो घाट, एक और ख़ूबसूरत पर्यटन स्थल। शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर बहने वाली चंबल नदी, भारतीय डॉल्फ़िन जैसे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास थी और यहीं पर चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी था। कूनो नदी और चंबल राइट मैन कैनाल पर एशिया का सबसे बड़ा साइफ़न, जो सबलगढ़ से लगभग 50 किलोमीटर दूर था, एक इंजीनियरिंग का चमत्कार था।
सत्ता का टकराव
मैंने सबलगढ़ में अपना काम शुरू किया। सबसे मज़ेदार बात थी एस.डी.एम. का बंगला, जो विधायक जी के घर के ठीक सामने था। सड़क के इस पार एस.डी.एम. का घर और सड़क के उस पार विधायक जी का घर। मैं तब सिंचाई विभाग के रेस्ट हाउस में रह रहा था। एस.डी.एम. की सरकारी गाड़ी का उपयोग विधायक जी करते थे और लॉग बुक एस.डी.एम. भरते थे।
मैंने स्टाफ़ से कहकर गाड़ी बुलवा ली। पहले कंट्रोल के कोटा अलॉटमेंट का विवरण दुकान-वार विधायक जी देखते थे, फिर एस.डी.एम. जारी करते थे। यह देखकर मुझे अजीब लगा और मैंने फ़ाइल भेजने का सिस्टम बंद करने के निर्देश स्टाफ़ को दिए। यह बात तुरंत विधायक जी तक पहुँच गई। अगर आप कोई बात सब में फैलाना चाहें, तो ऑफ़िस में सबसे नज़दीक बैठने वाले को यह कहकर बता दो कि यह गोपनीय है और सिर्फ़ तुम्हें बता रहा हूँ, अपने तक ही रखना। वह बात अगले ही दिन सबको पता चल जाती थी।
मैं विधायक जी से मिलने उनके घर नहीं गया। कोई प्रोटोकॉल नहीं था, पर लोग जाते थे। एक हफ्ता शांति से गुज़र गया। जब आपकी पोस्टिंग किसी नई जगह होती है, तो यह अरेंज मैरिज जैसी होती है। आपकी मुलाक़ात सीधे सुहागरात में होती है। तब दोनों पक्ष ज़ोर लगाते हैं कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधेगा, क्योंकि माना जाता है कि जीवन भर उसी की चलेगी। उन दिनों एस.डी.एम. का कोई कार्यालय भवन नहीं था। जनपद कार्यालय के एक हॉल को ही एस.डी.एम. ऑफ़िस में बदल दिया गया था और उसका ख़र्च भी जनपद कार्यालय उठाता था।
बीस सूत्रीय कार्यक्रम और मर्यादा का उल्लंघन
उन दिनों भारत सरकार का 'बीस सूत्री कार्यक्रम' चल रहा था, जिसका उद्देश्य देश के सामाजिक-आर्थिक विकास और विशेष रूप से ग़रीब तथा वंचित वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाना था। इस कार्यक्रम की निगरानी केंद्र, राज्य, ज़िला और ब्लॉक स्तर पर होती थी। ब्लॉक स्तर की कमेटी का अध्यक्ष क्षेत्रीय विधायक और सचिव एस.डी.एम. होते थे। यह कार्यक्रम तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य ग़रीबी उन्मूलन, उत्पादकता बढ़ाना, आय असमानताओं को कम करना और सामाजिक तथा आर्थिक विषमताओं को दूर करना था। इस कार्यक्रम में कृषि, ग्रामीण विकास, रोज़गार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पर्यावरण संरक्षण, कमज़ोर वर्गों का सशक्तीकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे कई पहलू शामिल थे।
तब सबलगढ़ में तीन विकास खंड थे: सबलगढ़, कैलारस और विजयपुर। मेरी पहली बैठक कैलारस में हुई। यह पहली बार था जब मेरी मुलाक़ात विधायक जी से हुई। माहौल में एक अजीब सा तनाव था। अधिकारी परेशान थे और बैठक में आना उनकी मजबूरी थी, क्योंकि मैंने एजेंडा जारी किया था। बैठक में बहुत से अनाधिकृत लोग बैठे थे, जो विधायक जी के समर्थक थे।
मैंने इस पर आपत्ति जताई और कहा कि जो लोग समिति के सदस्य नहीं हैं, वे बाहर चले जाएँ। कुछ अधिकारियों के सहायक उठे और बाहर चले गए, लेकिन विधायक जी के समर्थक टस से मस नहीं हुए। तब मैंने विनम्रता से विधायक जी से अनुरोध किया। वे नियम जानते थे। न चाहते हुए भी, मन मारकर उन्हें अपने लोगों को बाहर जाने के लिए कहना पड़ा। उनका मिज़ाज बिगड़ गया, क्योंकि ऐसा पहली बार हुआ था। अधिकारियों के चेहरों पर संतोष की झलक थी। उन्हें लगा था कि कोई तो ऐसा अफ़सर है जो उनका पक्ष ले सकता है।
मर्यादा की जंग
मैंने एजेंडे के अनुसार बैठक की कार्यवाही शुरू की। अचानक विधायक जी ने एक कागज़ निकालकर बिजली विभाग के अधिकारी से जानना चाहा कि रामसुख कैलारस का इस महीने का बिजली का बिल कितना आया है। बिजली विभाग के डिवीज़नल इंजीनियर के पास यह जानकारी नहीं थी। विधायक जी उसे यह कहकर डाँटने लगे कि जब तुम्हारे पास जानकारी नहीं थी, तो तुम बैठक में क्यों आए? अधिकारी ने कहा कि हर व्यक्ति के बिल की जानकारी लाना संभव नहीं है।
विधायक जी चिल्लाने लगे और अधिकारी को गालियाँ देने लगे। यह मेरे जीवन की पहली बैठक थी और मुझे यह सब अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा, "यह कागज़ मुझे दे दीजिए, मैं अगली बैठक के एजेंडे में इसे जोड़ दूँगा, तब इसका जवाब आ जाएगा।"
वे मेरी तरफ़ मुड़े और बोले, "आप पहली दफ़ा एस.डी.एम. बने हैं। आपको परंपराएं पता नहीं हैं।"
मैंने बहुत शांति और विनम्रता से जवाब दिया, "आप भी तो पहली बार विधायक बने हैं।" उन्हें ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। उनका चेहरा लाल हो गया और वे गुस्से में बोले, "मैं तुम्हें देख लूँगा।"
अब मुझे भी गुस्सा आने लगा था। मैंने दृढ़ता से कहा, "ठीक है, आप कैसे देखेंगे?" मैंने कार्यवाही रोक दी और उनसे कहा, "चलिए, बाहर चलकर एक-दूसरे को देख लेते हैं। फिर बैठक कर लेंगे।" मैं खड़ा हो गया और अपनी कमीज़ की बाँहें मोड़ने लगा।
वे बोले, "मैं मुख्यमंत्री से कहकर तुम्हारा तबादला करवा दूँगा।" मैंने शांत होकर कहा, "ठीक है, आप मेरा तबादला आगरा करवा दीजिए।" वे बोले, "आप तो मध्य प्रदेश कैडर के अफ़सर हैं, उत्तर प्रदेश में कैसे तबादला होगा?"
मैंने और भी शांति से कहा, "मध्य प्रदेश कैडर मैंने स्वेच्छा से चुना है, इसलिए मेरा तबादला तो कहीं भी हो सकता है। इसमें देख लेने की क्या बात है? अगर ताक़त है, तो कुछ अलग करके दिखाइए।"
कुछ लोगों के हस्तक्षेप से विवाद शांत हुआ और बैठक हुई। इस घटना के बाद मेरी और विधायक जी की दोस्ती हो गई। मैं वहाँ लगभग तीन साल रहा। विधायक जी ने मेरे काम में कभी कोई हस्तक्षेप नहीं किया। सार्वजनिक कार्यक्रमों में जब वे मुख्य अतिथि होते, तो मैं अध्यक्षता करता और जब मैं मुख्य अतिथि होता, तो वे अध्यक्षता करते। आजीवन उनसे दोस्ती रही।
जुज्जा का सपना और 'निपटारा कार्ड' का जन्म
जब भी मैं कोई काम करता या कोई नीति बनाता, तो मेरे ज़हन में हमेशा मेरे हलवाहा जुज्जा की छवि रहती थी। मैं हमेशा सोचता था कि क्या यह योजना या कार्यक्रम उसे लाभ दे पाएगा? मेरे ऑफ़िस में दूर-दराज़ के गाँवों से बैलगाड़ी या बस से जो गरीब लोग आते थे, जिन्हें यह भी नहीं पता होता था कि मैं ऑफ़िस में मिलूँगा या नहीं, और जो अपनी रोटी, नमक तथा प्याज़ साथ लाते थे, उनके लिए मैंने कुछ छोटे बदलाव किए। मैंने उनके बैठने के लिए प्लास्टिक की कुर्सियाँ रखीं और जो कुर्सियों पर बैठना पसंद नहीं करते थे, उनके लिए फ़र्श बिछवाए। पानी पिलाने के लिए एक चपरासी की ड्यूटी लगाई।
मैंने अपना एक समय-सारणी (टाइम टेबल) बनाया, जिसके अनुसार मैं सोमवार और मंगलवार को ऑफ़िस में रहकर कोर्ट के मुक़दमे सुनता और लोगों से मिलता था। बाकी दिन मैं क्षेत्र में भ्रमण करता था। मैं हर महीने अपना टूर प्रोग्राम एडवांस में जारी करता था ताकि लोगों को पता रहे कि मैं कब उनके गाँव आऊँगा। अधिकांश सरकारी कर्मचारी और अधिकारी गांव में याम राज की तरह कभी भी जाते। ज्यादातर दिन में दोपहर में जाते। उस समय लोग काम करने खेत पर चले जाते। मिल नहीं पाते। काम पेंडिंग रहते लेकिन साहब का दौरा पूरा हो जाता था।
जब मैंने अपने कोर्ट में लंबित (पेंडिंग) भूमि विवाद के मुक़दमे देखे, तो मुझे लगा कि अगर इन्हें मौके पर ही निपटाया जाए, तो गवाहों, वकीलों आदि की ज़रूरत नहीं रहेगी। मैंने ऐसे मुक़दमों की सुनवाई गाँवों में करना शुरू किया। इसका वकीलों ने ज़बरदस्त विरोध किया। मैंने उन्हें समझाया कि मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता के अनुसार, राजस्व अधिकारी अपनी अधिकारिता क्षेत्र में कहीं भी सुनवाई कर सकता है। मैंने उन सभी अधिनियमों, नियमों, और शासन के परिपत्रों का एक बस्ता (फ़ाइल) बनाया और उसे अपने साथ रखता था।
उन दिनों मेरा बच्चा बहुत छोटा था, इसलिए बार-बार मुख्यालय ना आना पड़े, इस कारण मैं कई बार अपनी पत्नी के साथ टूर पर जाता था। एक बार मेरे कलेक्टर ने मज़ाक में कहा, "रवींद्र, अगर तुम्हारा हनीमून पूरा हो जाए, तो कुछ सरकारी काम भी कर लिया करो।"
मैं गाँव में ही रात रुकता और तीन-चार दिन बाद वापस लौटता था। गाँव के लोग बहुत प्यार देते थे। मुरैना में घर के बाहर एक परछी (गलियारा) बनाई जाती थी, जिसमें खाट डाली जाती थी। जब मैं उनके घर जाता, तो वे नया सोलापुरी चादर बिछाते, चाय, लस्सी, और सूखे मेवे सामने रखते। देर हो जाती, तो देसी घी की पूरी सब्ज़ी बनाकर खिलाते थे। यहाँ के लोगों को खाने-पीने का बहुत शौक था।
मैं योजनाबद्ध तरीक़े से कामों की सूची अपने साथ रखता था और जिन अधीनस्थ अधिकारी-कर्मचारियों की ज़रूरत होती, उन्हें मौके पर बुलाता था। मुझे लगा कि अगर लोग मेरे ऑफ़िस आएंगे, तो उन्हें एक दिन का काम और किराया का नुक़सान होगा। लेकिन अगर मैं गाँव जाऊँगा, तो मुझे टी.ए.-डी.ए. मिलेगा।
लोगों की सुविधा को देखते हुए मैंने खूब क्षेत्र भ्रमण किया। मुझे देखकर दूसरे अधिकारी भी ऐसा करने लगे। संभाग का प्रशासन अपने लक्ष्य पूरे करने लगा, शिकायतें कम होने लगीं, और काम की गुणवत्ता सुधरने लगी। मेरे काम से कलेक्टर और कमिश्नर बहुत खुश रहते थे। मुझे मेरी वार्षिक गोपनीय चरित्रावली में 'उत्कृष्ट' श्रेणी मिली और समय पर मेरा प्रोबेशन ख़त्म हो गया, और मेरी सेवा 'कन्फर्म' हो गई।
जब मैं भ्रमण करता था, तो लोग मुझे अलग-अलग विभागों से संबंधित आवेदन देते थे। मेरा स्टाफ़ उन्हें कार्यवाही के लिए भेज देता था। जब मैं दोबारा उसी गाँव में जाता, तो वही आदमी फिर वही आवेदन लेकर आ जाता और कहता, "पिछली बार आपको आवेदन दिया था, उस पर कुछ नहीं हुआ।"
मेरे पास यह जानने का कोई सिस्टम नहीं था कि उसने सच में आवेदन दिया था या नहीं, कब दिया था, किस काम के लिए दिया था, मैंने किस अधिकारी को भेजा और उस अधिकारी ने उसका क्या समाधान किया।
इन सब सवालों का जवाब पाने के लिए मैंने 'निपटारा कार्ड' डिज़ाइन किया। यह एक छोटा-सा कार्ड था, जो शर्ट की जेब में आ जाता था। इस पर पंजीयन क्रमांक, तारीख, आवेदक का नाम, आवेदन का विषय, निपटारे का समय, जिस अधिकारी को भेजा गया उसका नाम, और आवेदक उस अधिकारी से कब मिलेगा, यह सब लिखा होता था। यदि सुनवाई की अगली तारीख दी है, तो वह भी इस पर लिखी जाती थी। अंतिम समाधान, चाहे वह स्वीकृत हो या अस्वीकृत, कारण सहित लिखकर हस्ताक्षर और मुहर लगाकर आवेदक को उसका कार्ड लौटा दिया जाता था।
हर आवेदक को यह कार्ड मिलता था। अब आवेदक खुद अपने आवेदन पर नज़र रख सकता था। यदि समाधान नहीं होता था, तो हर जगह यह कार्ड दिखता था। कोई अधिकारी यह बहाना नहीं बना पाता था कि उसे आवेदन नहीं मिला। कई बार अख़बारों में ख़बरें छपती थीं कि 'एस.डी.एम. के कार्ड की कोई क़ीमत नहीं', और मुझे ख़ुशी होती थी क्योंकि जिस अधिकारी के पास प्रकरण लंबित होता था, वह तुरंत उसका समाधान कर देता था।
यह कार्ड आवेदक को सशक्त बनाने का एक हथियार था, जो किसी भूत की तरह पीछा करता था। लोगों की समस्याओं का समाधान हो रहा था और आवेदन आना कम हो गए थे। मैंने अपने पूरे कार्यकाल में इस कार्ड का उपयोग किया। जब मैं मुख्यमंत्री का उप सचिव बना, तो यह सिस्टम कंप्यूटर प्रोग्राम के माध्यम से चलने लगा, जिसे आज 'सीएम हेल्पलाइन' के नाम से जाना जाता है और यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू है।
पटवारी का बस्ता और सत्ता का खेल
मुझे शुरू से एक बात स्पष्ट थी कि प्रशासन की मूल इकाई जो आंकड़े एकत्र करती है, वही आगे चलकर योजनाओं का आधार बनते हैं। मैंने पटवारी के रिकॉर्ड की शुद्धता पर बहुत ज़ोर दिया। नक़्शे का ज़मीन पर मिलान, खसरा और खतौनी बी-वन का मिलान बहुत ज़रूरी था। जब नामांतरण या बटवारे का आदेश हो, तो खसरे में उसका पालन होना चाहिए, जबकि पटवारी पहले खतौनी बी-वन में एंट्री करते हैं। मैंने अपने टूर के दौरान हमेशा पटवारी के रिकॉर्ड चेक किए।
मैं हर तहसील जाकर नियमित रूप से पटवारियों की मीटिंग करता था। एक दिन सबलगढ़ की मीटिंग में एक पटवारी ने अपना काम पूरा नहीं किया था। वह चुपचाप मेरी डाँट सुनते रहे। बैठक समाप्त होने पर वह मेरे ऑफ़िस मिलने आए और बताया कि उनकी बस सर्विस कंपनी में कुछ समस्या चल रही थी, इसलिए काम लंबित हो गया, जिसे वे जल्द पूरा कर लेंगे।
मैंने उन्हें कुर्सी पर बैठने के लिए कहा, लेकिन वे हाथ जोड़कर खड़े रहे। उन्होंने सफ़ेद कमीज़ और पायजामा पहना था। मैं पटवारी और बस कंपनी के संबंध को समझ नहीं पाया। तब उन्होंने बताया कि उनकी बस कंपनी है और उनकी कंपनी में बहुत कर्मचारी काम करते हैं। मैंने उनसे पूछा, "तो फिर यह नौकरी क्यों नहीं छोड़ देते?" उन्होंने अपने बस्ते को प्रणाम किया और बोले, "सब इसी का दिया है। इसे नहीं छोड़ सकता।" अब चौंकने की बारी मेरी थी।
मेरे पूर्व कमिश्नर वी.जी. निगम का तबादला भोपाल में प्रमुख सचिव, सामान्य प्रशासन विभाग के पद पर हो गया था। नए कमिश्नर जी.एन. बुच आने वाले थे। वे अमेरिका से ट्रेनिंग लेकर लौटे थे और दिल्ली में उनके भाई एम.एन. बुच के घर पर रुके थे। उनकी भाभी निर्मला बुच थीं। सभी मध्य प्रदेश कैडर में आई.ए.एस. थे।
मैं सर्वोच्च न्यायालय के काम से दिल्ली जा रहा था। मेरे कलेक्टर ने मुझसे कहा कि बुच साहब से मिलकर उनके आने का प्रोग्राम पूछ कर आना। मैं एम.एन. बुच के घर गया। वे तब दिल्ली डेवलपमेंट बोर्ड में पदस्थ थे। मैंने दरवाज़े पर घंटी बजाई। एक रौबदार महिला बाहर आई और मुझसे पूछा, "महेश से मिलना है या गणेश से?"
मैं इस सवाल के लिए तैयार नहीं था। मैंने तुरंत अपना परिचय दिया और अंदाज़ा लगाकर कहा, "गणेश से।" वह निर्मला बुच थीं। उन्होंने मुझे कमरे में सोफ़े पर बैठाया और अंदर चली गईं। अंदर से दो सफ़ेद छोटे पोमेरेनियन कुत्ते आए और मेरे दोनों बाजू में खड़े हो गए। मैं डरकर चुपचाप बैठा रहा। उन दिनों अफ़सर के घर में टेलीफ़ोन, चपरासी और कुत्ते का होना अनिवार्य माना जाता था।
अंदर से छोटे कद के, दुबले-पतले, सफ़ेद कमीज़ और पायजामा पहने एक सज्जन आए। सबसे पहले उन्होंने दोनों कुत्तों को मुझसे दूर किया। कुत्ते दौड़कर उनके पास चले गए और मेरी जान में जान आई। मैं खड़ा हो गया। उन्होंने सज्जनता से धीमे स्वर में कहा, "मैं गणेश हूँ।" मैंने हाथ जोड़कर नमस्ते किया। वे मेरा परिचय जानकर बहुत खुश हुए। उन्होंने अपना कार्यक्रम बताया, मुरैना के बारे में पूछताछ की और मुझे नाश्ता करवाया। मैं उनसे विदा लेकर वापस आया और कलेक्टर को उनका कार्यक्रम बताया।
कुछ दिनों बाद संदीप खन्ना जी का तबादला हो गया और प्रशांत मेहता जी नए कलेक्टर बने। मेहता जी पहले मुरैना में ही प्रशासक, चंबल के पद पर थे। तब अधिकारी उन्हें ज़्यादा भाव नहीं देते थे। जब मैं ट्रेनिंग ले रहा था, तब वे कलेक्टर ऑफ़िस आते और मेरे कमरे में बैठकर कलेक्टर की प्रतीक्षा करते थे। धीरे-धीरे हम लोग घुल-मिल गए थे। जब वे पहली बार सबलगढ़ आए, तो उन्होंने मुझे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का निर्देश दिया।
मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक नया अधिनियम लागू किया गया था। एक दिन मैं कैलारस के एक गाँव में शिविर में था, जहाँ कुछ लोगों ने आकर "द मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना लिमिटेड", कैलारस में ब्रास ट्यूब की ख़रीद में हुई गड़बड़ी की शिकायत की। हमने तुरंत फ़ैक्ट्री जाकर जाँच की। यह एक बहुत बड़ा भ्रष्टाचार का मामला निकला, जिसमें फ़ैक्ट्री के एम.डी., चीफ़ इंजीनियर, चीफ़ फ़ाइनेंस ऑफ़िसर जैसे पाँच अधिकारियों पर पुलिस केस दर्ज किया गया और उन्हें गिरफ़्तार किया गया।
यह सहकारी शक्कर कारखाना था, जिसके चेयरमैन कमिश्नर मुरैना जी.एन. बुच थे। उन्होंने मेरे काम की बहुत तारीफ़ की और मुझे 'बॉस' कहकर बुलाते थे। वे एक निहायत ईमानदार अफ़सर थे और अकेले बहुत सादगी से रहते थे। उनके घर जाने पर वे पारले की चॉकलेट ज़रूर खिलाते थे। फ़ैक्ट्री के वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ़्तारी होने पर उन्होंने फ़ैक्ट्री चलाने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी, जिसे हम लोगों ने बहुत मेहनत से पूरा किया। यह मेरे लिए पहला केस था।
अराजकता का इम्तिहान: कॉलेज का संग्राम
मुझे हमेशा से ज़्यादा बोलने की आदत रही है, और इसी आदत की वजह से मैं कई बार मुसीबत में पड़ा हूँ। मुझे हमेशा इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी से बहुत लगाव रहा है। जब भी बाज़ार में कोई नया उत्पाद आता, मैं उसे ख़रीद लेता था। 80 के दशक में नए-नए टीवी और वीसीआर आने शुरू हुए थे। उस समय कलर टीवी जापान या कोरिया से आते थे। हमारे कलेक्टर प्रशांत मेहता को भी इन सब का शौक था। एक दिन हम बात कर रहे थे, तो उन्होंने एक टीवी-वीसीआर मंगवाने को कहा।
हमारे एक अतिरिक्त कलेक्टर सत्य प्रकाश थे, जो श्योपुर में तैनात थे। उन दिनों मुरैना में सिर्फ़ श्योपुर में जयपुर से प्रसारित होने वाले टीवी कार्यक्रम आते थे। मैं सबलगढ़ से हॉकी मैच का लाइव प्रसारण देखने के लिए श्योपुर जाता था। मैंने सत्य प्रकाश जी से कहा। वे आगरा के रहने वाले थे और उनका एक दोस्त टीवी-वीसीआर आयात करके बेचता था। मैंने उनसे कहकर एक टीवी-वीसीआर का सेट कलेक्टर मुरैना के बंगले पर लगवा दिया।
कलेक्टर के ससुर उन दिनों मध्य प्रदेश रोड कॉर्पोरेशन के प्रबंध संचालक थे। उनके माध्यम से कलेक्टर भोपाल से बस से मुरैना फ़िल्मों की कैसेट मंगवाकर फ़िल्में देखते थे। टीवी-वीसीआर का भुगतान आगरा भेजना था, लेकिन समस्या थी कि कलेक्टर से पैसा कौन माँगे? सत्य प्रकाश जी ने कहा, "तुम्हारे कहने पर मैंने टीवी-वीसीआर मंगवाया है, इसलिए तुम कलेक्टर से पैसे माँगो।" मैंने हिम्मत तो की, पर भुगतान नहीं हुआ। तब ज़िला ओलंपिक एसोसिएशन के फंड से कलेक्टर से भुगतान स्वीकृत करवाया गया।
उन दिनों नगरपालिका के नियमित चुनाव नहीं होते थे। नगरपालिका चलाने के लिए उप-विभागीय अधिकारी को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। मुझे सबलगढ़ नगरपालिका का प्रशासक नियुक्त किया गया था। नगरपालिका शहर की साफ़-सफ़ाई, बिजली, पानी जैसी नागरिक सेवाएँ प्रदान करने का काम करती थी।
नगरपालिका की आय के साधन बहुत सीमित थे और टैक्स वसूलना बहुत मुश्किल होता था। सबलगढ़ नगरपालिका एक कॉलेज भी संचालित कर रही थी, और नगरपालिका प्रशासक होने के नाते मैं उस कॉलेज का प्रशासक भी था। जब कॉलेज में परीक्षाएँ होती थीं, तो विद्यार्थी सुबह आकर अपना प्रश्न पत्र और कॉपी लेकर घर चले जाते और शाम चार बजे आकर वापस जमा कर देते थे।
हमने इस प्रथा को रोकने की कोशिश की और परीक्षा में पुलिस लगा दी। मेरे साथी एस.डी.ओ.पी. मेरे जैसे ही युवा अफ़सर थे। हम दोनों नए थे, बहुत उत्साहित थे। कॉलेज के प्राचार्य ने छात्रों को हमारे ख़िलाफ़ भड़का दिया। हर छात्र नकल कर रहा था। हम रोज़ सुबह कॉलेज जाते और नकल रोकते थे। उस समय हमारे क्षेत्र में रमेश सिकरवार नाम का एक बहुत बड़ा डाकू था। उसे पकड़ने के लिए रोज़ बड़ी संख्या में पुलिस जाती थी। परीक्षा के तीसरे दिन छात्रों ने हम लोगों को घेर लिया।
चारों ओर से पथराव शुरू हो गया और हमारी गाड़ी तोड़ दी गई। हमारे साथ सिर्फ़ तीन पुलिस के जवान थे। एस.डी.ओ.पी. जब कॉलेज आए थे, तो थाने पर कहकर आए थे कि अगर कहीं से पुलिस की गाड़ी लौटे तो उसे कॉलेज भेज देना। हमें अपनी जान बचाने के लिए कॉलेज की इमारत में छुपना पड़ा। बिल्डिंग की छत टिन की थी और उस पर जब पत्थर गिरते, तो बहुत आवाज़ होती थी। बहुत बड़ी भीड़ जमा हो गई थी, और यह कॉलेज शहर के बीच में था। चारों तरफ़ लोग छतों से हमें देख रहे थे।
मैंने गोली चलाने का आदेश दिया। पुलिस के जवान ने चिल्लाकर गोली चलाने की चेतावनी दी। यहाँ के लोग बंदूक की गोली से नहीं डरते थे और वे नहीं भागे। एक पुलिस वाले ने हवा में गोली चलाई, फिर दूसरे ने, और फिर तीसरे ने। यह पुरानी 303 राइफ़ल थी और पुलिस के जवानों को गोली चलाने का अभ्यास नहीं था। दो बंदूकों के बोल्ट फंस गए और गोली नहीं चली।
लोगों ने गाड़ियों में आग लगा दी और पत्थरबाज़ी तेज़ हो गई। तभी थाने से एक ख़ाली पुलिस का ट्रक आया। भीड़ ने समझा कि पुलिस फ़ोर्स आ गई है और वे भाग गए। तब हम लोग अपनी जान बचाकर निकल सके। यह मेरे जीवन का पहला गोली चलने का अनुभव था।
चंबल का खौफ़ और कानून का नया चेहरा
उस समय हमारे क्षेत्र में डाकू रमेश सिकरवार का बहुत आतंक था। वह मुख्य रूप से विजयपुर विकासखंड क्षेत्र में सक्रिय था। सरकार ने भारी पुलिस बल लगा रखा था। रमेश सिकरवार चंबल के बीहड़ों में एक ख़ूँख़ार डाकू के रूप में जाने जाते थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के श्योपुर ज़िले में हुआ था। उनके डाकू बनने के पीछे उनके चाचा द्वारा पुश्तैनी ज़मीन हड़पने की घटना बताई जाती है।
जब पुलिस ने उनकी मदद नहीं की और उन्हें अपमानित किया गया, तो उन्होंने बंदूक उठाकर डाकू का रास्ता अपना लिया। रमेश सिकरवार 1970 और 80 के दशक के बीच चंबल के बीहड़ों में सक्रिय थे। उनके गिरोह में लगभग 32 सदस्य थे और उन पर 250 से ज़्यादा डकैती और 70 से ज़्यादा हत्या के मामले दर्ज थे। एक घटना में उन्होंने एक ही दिन में 27 मारवाड़ियों की हत्या कर दी थी, क्योंकि उनमें से एक ने उनके गिरोह के बारे में पुलिस को सूचना दी थी।
चंबल में उनके नाम का इतना खौफ़ था कि लोग पुलिस से भी ज़्यादा उनसे डरते थे। वे बिना किसी हिचकिचाहट के हत्या और अपहरण जैसी वारदातों को अंजाम देते थे, जिससे पूरे इलाक़े में डर का माहौल बना रहता था।
चंबल के कई डाकू गिरोहों की तरह, रमेश सिकरवार का गिरोह भी अक्सर ज़मींदारों, साहूकारों और अमीर व्यापारियों को निशाना बनाता था। कभी-कभी वे गाँवों में न्याय करने वाले की भूमिका भी निभाते थे, जिसे 'डाकू पंचायत' कहा जाता था। उन्हें पकड़ने के लिए पुलिस ने चंबल के बीहड़ों में कई बड़े और सघन अभियान चलाए। उनके गिरोह की पुलिस के साथ कई मुठभेड़ें हुईं, जिनमें दोनों तरफ़ से जानें गईं। बीहड़ों की जटिल भौगोलिक स्थिति और स्थानीय समर्थन के कारण उन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल था।
पुलिस ने रमेश सिकरवार पर भारी ईनाम घोषित कर रखा था, जो उनकी गिरफ़्तारी के लिए पुलिस की बेचैनी को दर्शाता था। पुलिस ने गिरोह के सदस्यों और उनके रिश्तेदारों पर भी दबाव बनाया। अधिकारियों को आउट ऑफ़ टर्न प्रमोशन का आदेश था। कभी-कभी राजस्व अधिकारियों की ड्यूटी भी पुलिस के साथ लगाई जाती थी और मैंने पुलिस के साथ काम किया था।
रमेश सिकरवार जैसे बड़े डाकुओं को अक्सर कुछ हद तक राजनीतिक संरक्षण मिलता था। चंबल के बीहड़ों में डाकुओं का अपना एक प्रभाव क्षेत्र होता था। वे गाँवों में 'न्याय' करते थे और ग़रीबों की मदद भी करते थे, जिससे उन्हें ग्रामीण आबादी के बीच एक ख़ास तरह की लोकप्रियता मिल जाती थी। राजनीतिक दल और नेता इस प्रभाव को भुनाने की कोशिश करते थे।
डाकुओं के आत्मसमर्पण के समय भी देखा गया कि वे अक्सर अपने राजनीतिक आकाओं या मध्यस्थों के माध्यम से आत्मसमर्पण करते थे, जिससे आत्मसमर्पण को एक राजनीतिक घटना के रूप में पेश किया जा सके। कानून-व्यवस्था के अभाव और स्थानीय सत्ता की वजह से, चंबल जैसे दुर्गम इलाक़ों में पुलिस की पहुँच सीमित थी। ऐसे में, स्थानीय नेता या प्रभावशाली व्यक्ति डाकुओं के साथ एक अघोषित समझौता कर लेते थे ताकि उनके क्षेत्रों में शांति बनी रहे या उनके विरोधियों को निशाना बनाया जा सके। डाकू अक्सर स्थानीय राजनीति में भी हस्तक्षेप करते थे, चुनावों को प्रभावित करते थे और अपने पसंद के उम्मीदवारों को समर्थन देते थे। डाकुओं का खौफ़ इतना था कि नेता और पुलिसकर्मी भी सीधे टकराव से बचना चाहते थे।
मध्य प्रदेश में डकैती की समस्या से निपटने के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया गया था, जिसका नाम है "मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981", जिसे आमतौर पर 'एंटी-डकैती क़ानून' के नाम से जाना जाता है। यह अधिनियम विशेष रूप से उन क्षेत्रों में डकैती और अपहरण को रोकने, अपराधियों को दंडित करने और उनसे जुड़ी संपत्तियों को ज़ब्त करने के उद्देश्य से लाया गया था।
यह क़ानून चंबल क्षेत्र के सभी चार ज़िलों (भिंड, मुरैना, श्योपुर, दतिया) और ग्वालियर, शिवपुरी, पन्ना, रीवा, सतना जैसे ज़िलों में लागू रहा है। इस अधिनियम ने पुलिस को डकैतों से निपटने के लिए विशेष शक्तियाँ प्रदान कीं, जिसमें ज़मानत के प्रावधानों को सख़्त करना, सज़ा को बढ़ाना, और सबूत के बोझ को कम करना शामिल था। यह क़ानून डकैतों द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को ज़ब्त करने का अधिकार भी देता था।
यह पुलिस को सूचना देने वाले मुखबिरों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान भी करता था और उस समय मुखबिरों को सरकारी नौकरी भी दी जाती थी। हमारे अधिकार क्षेत्र के विजयपुर क्षेत्र को इस अधिनियम के तहत 'प्रभावित क्षेत्र' घोषित किया गया था। इस क्षेत्र में सहरिया जनजाति के लोग रहते थे। एक तरफ़ डाकू उन्हें परेशान करते थे, तो दूसरी तरफ़ पुलिस उन्हें इसी क़ानून के तहत गिरफ़्तार कर रही थी। इस वजह से परेशान होकर लोगों ने गाँव के गाँव ख़ाली कर दिए और तहसील कार्यालय में आ गए। इन लोगों के लिए तब विशेष शिविर लगाकर रहने की व्यवस्था की गई थी।
हमारे पड़ोसी एस.डी.ओ.पी. जैन एक बहुत उत्साही युवा पुलिस अधिकारी थे। उन्होंने अपने मुखबिरों की मदद से रमेश सिकरवार से कई मुलाक़ातें कीं और उसे आत्मसमर्पण करवाने का प्रयास किया। उन्हें उनके विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग भी मिल रहा था। लेकिन यह प्रयास असफल हो गया और रमेश सिकरवार ने एक बस से अपहरण कर चौदह लोगों को उतारकर गोली मार दी। तब उनके विभाग द्वारा इसी एक्ट के तहत उन्हें गिरफ़्तार करने की कार्यवाही शुरू की गई। वे भूमिगत (अंडरग्राउंड) रहे, उनका तबादला कर दिया गया और बहुत कठिनाइयों के बाद वे बच सके।
कानून का दुरुपयोग और मानवता की चीखें
हमारे एक नायब तहसीलदार को राजस्व वसूली में बहुत रुचि थी। उनके तहसील दफ़्तर ने मुझे बताया कि वे जितनी राशि वसूलते थे, उतनी सरकारी ख़ज़ाने में जमा नहीं करते थे। वे दशमलव का अनोखा प्रयोग करते थे। आप नहीं समझे। मैं भी नहीं समझा था।
तहसीलदार ने विस्तार से समझाया। वे सौ रुपये लेते थे और बिना कार्बन पेपर के किसान को सौ रुपये की रसीद दे देते थे। लेकिन बाद में कार्बन पेपर रखकर दशमलव लगाकर ऑफ़िस की कॉपी में उसे दस रुपये बना देते थे। इस तरह वे नब्बे रुपये अपनी जेब में रख लेते थे। यह बहुत ही अनोखा प्रयोग था।
सबलगढ़ में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 97 का भी एक अनोखा प्रयोग होता था। इस धारा में एक महत्वपूर्ण प्रावधान था कि यदि किसी व्यक्ति को ग़लत तरीक़े से बंधक बनाया गया हो, तो उप-विभागीय मजिस्ट्रेट उसकी तलाशी और रिहाई के लिए तलाशी वारंट जारी कर सकता था। आवेदन मिलने पर यदि मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण हो कि कोई व्यक्ति अवैध रूप से बंदी है, तो वह उसे ढूँढने के लिए तलाशी वारंट जारी करता था।
जिस पुलिस अधिकारी को यह वारंट मिलता था, वह उस व्यक्ति को ढूँढकर तुरंत मजिस्ट्रेट के सामने प्रस्तुत करता था। मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को सुनकर उचित आदेश पारित करता था, जैसे अगर व्यक्ति को ग़लत तरीक़े से बंधक बनाया गया हो, तो उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दिया जाता था। इस धारा का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना था।
लेकिन यहाँ के लोग इसका दुरुपयोग करते थे। उस समय इस क्षेत्र में भ्रूण हत्या के कारण लड़कियों का अनुपात बहुत कम था। अन्य राज्यों से लड़कियाँ ख़रीदकर लाई जाती थीं और लड़कों की शादी उनसे करवा दी जाती थी। इसके बाद उस महिला से एक आवेदन मजिस्ट्रेट को दिलवाया जाता कि उसे किसी अमुक आदमी ने अवैध रूप से बंधक बना रखा है।
मजिस्ट्रेट तलाशी वारंट जारी करते। पुलिस उस लड़की को पकड़कर लाती। वह मजिस्ट्रेट के सामने बयान देती कि वह बालिग है, कोई प्रमाण दिखाती और कहती कि वह अपनी इच्छा से अमुक व्यक्ति के साथ रहना चाहती है। मजिस्ट्रेट आदेश देते कि उसे पुलिस की सुरक्षा में उस व्यक्ति के पास भेजा जाए। वह चली जाती। आवेदक मजिस्ट्रेट के आदेश की नक़ल निकलवा लेता और वह कानूनी तरीक़े से उस व्यक्ति के साथ रहती थी। इस धारा का ऐसा अनोखा उपयोग आपने कहीं नहीं देखा होगा।
एक बार कैलारस थाने का एक थानेदार एक लड़की का बयान दर्ज करवाने मेरे घर आया। यह बयान मैं पहली बार ले रहा था। मैंने थानेदार को बाहर बैठाया और अपनी पत्नी की उपस्थिति में उस लड़की का बयान लिखा। वह बहुत ख़ूबसूरत बाईस साल की लड़की थी। उसने बहुत मेकअप किया था, डार्क लाल लिपस्टिक लगाई थी, और बहुत अच्छा सलवार-सूट पहना था। उसने कुछ गहने भी पहने थे।
मुझे कहीं से नहीं लगा कि उसका अपहरण कर उसे ज़बरन रखा गया होगा। मैं अकेले कमरे में उसके साथ नहीं होना चाहता था। मैंने उसका बयान लेकर, जहाँ वह जाना चाहती थी, आदेश कर दिया। क़रीब चार महीने बाद वही थानेदार उसी लड़की को लेकर फिर मेरे घर आया। मुझे शक हुआ। थानेदार ऑफ़िस क्यों नहीं आया? इतनी जल्दी इस लड़की का फिर अपहरण कैसे हो गया? मेरे मन में बहुत सवाल थे।
मेरे तहसीलदार गुरनानी एक अनुभवी व्यक्ति थे और मेरे पड़ोस में रहते थे। मैंने उन्हें बुलाया और अपनी शंका बताई। हम दोनों कमरे में थे। लड़की को अंदर बुलाया गया और थानेदार बाहर बैठे थे। गुरनानी जी ने उस लड़की से धीरे-धीरे बात की, उसे सहज किया, पानी और चाय दी। वह अचानक फूट-फूटकर रोने लगी। उसने बताया कि वह असम की रहने वाली है। पहले उसे कोई आदमी दिल्ली लाया, जहाँ उसे बेच दिया गया। उस आदमी ने उसे कैलारस के एक आदमी को बेचा। उस गाँव में किसी झगड़े के कारण पुलिस की तलाशी हुई। थानेदार ने मुझसे पूछताछ की, और मैंने पूरी बात बता दी। तब थानेदार मुझे अपने साथ ले गया और फिर मुझे बेचकर आपके सामने बयान दर्ज करवा दिए।
मैं डर के मारे कुछ नहीं बोली थी। जैसा उसने कहा, मैंने वैसा ही बयान दिया था। अब यह दोबारा मुझे दूसरे आदमी को बेचना चाह रहा है। मेरा यह पति मुझे बहुत अच्छे से रखता है। मैं उससे प्यार करती हूँ। मैं थक गई हूँ, नई जगह नहीं जाना चाहती। मुझे इस पति से दो महीने का गर्भ भी है। वह रो-रोकर अपनी बात बता रही थी। मैंने उसका बयान लिखा और अपने पड़ोसी एस.डी.ओ.पी. को बुलाकर इस प्रकरण में कार्यवाही करने का निर्देश दिया। बाद में वह थानेदार निलंबित हो गया।
सबलगढ़ में एक बार ताँबे के तार की चोरी हो गई। शुरू में टेलीफ़ोन के तार में ताँबा उपयोग में आता था। पुलिस ने एक गरीब लड़के को शक में पकड़कर थाने में बंद कर दिया। उस समय पुलिस रिकॉर्ड पर गिरफ़्तारी नहीं दिखाती थी। अगर गिरफ़्तारी दिखाते, तो मजिस्ट्रेट के सामने चौबीस घंटे के अंदर पेश करना होता था। उस लड़के से बहुत मारपीट हुई, लेकिन उसने चोरी क़बूल नहीं की।
हारकर थानेदार ने अपनी मोटर साइकिल का पेट्रोल निकालकर उस पर डाल दिया। उसने टेरीलीन की पैंट पहनी थी। थानेदार माचिस की तीली रगड़कर उसे आग लगाने की धमकी दे रहा था। अचानक तीली माचिस से रगड़ गई और उस लड़के की पैंट में आग लग गई। पहले आग बुझाने की कोशिश की गई, जब नहीं बुझी, तो पैंट खींचकर उतारने लगे। टेरीलीन की पैंट होने के कारण जलकर उसके पाँव से चिपक गई थी। जब ज़ोर से कई लोगों ने मिलकर पैंट खींची, तो दोनों पैरों की चमड़ी खिंचकर बाहर आ गई और नसें तथा हड्डियाँ दिखने लगीं।
उसे तुरंत अस्पताल में भर्ती करवाया गया, जहाँ उसकी मौत हो गई। पुलिस अभिरक्षा में मौत होने के कारण उसकी मजिस्ट्रेट जाँच मुझे करनी पड़ी। जब मैंने अस्पताल के मुर्दाघर में वह लाश देखी, तो मेरी रूह कांप गई। इतना वीभत्स दृश्य मैंने तब तक अपने जीवन में नहीं देखा था। कहते हैं कि अपराधियों के साथ व्यवहार करते-करते पुलिस के लोग भी उन्हीं जैसे हो जाते हैं।
सियासत का अंतिम दांव और तबादले का ब्रह्मास्त्र
सबलगढ़ सब-डिवीज़न में सबलगढ़, विजयपुर और कैलारस तीन तहसीलें आती थीं। हमारे तब दो विधायक होते थे, एक सबलगढ़ के और दूसरे विजयपुर के। सबलगढ़ के विधायक का क़िस्सा मैं बता चुका हूँ। विजयपुर के विधायक ग्वालियर में रहते थे। वे राजघराने से संबंधित थे और बहुत कम लोगों से मिलते थे। उस समय एस.डी.ओ. को अपने सब-डिवीज़न के अंदर पटवारियों के तबादले करने के अधिकार होते थे। समय-समय पर सरकार तबादलों पर लगा प्रतिबंध हटाती थी, तब तबादले हो सकते थे।
जब शासन ने तबादलों पर प्रतिबंध लगा दिया, तब विधायक जी एक पटवारी का तबादला विजयपुर से सबलगढ़ करवाना चाहते थे। मैंने उन्हें बताया कि अभी शासन ने तबादलों पर रोक लगा दी है और इस समय मुझे अधिकार नहीं है। केवल सरकार ही तबादला कर सकती है। लेकिन वे ज़िद करने लगे। जब मैंने तबादला नहीं किया, तो उन्होंने मेरी शिकायत तत्कालीन मुख्यमंत्री से कर दी।
मेरा तबादला करने का आदेश मुख्यमंत्री कार्यालय से सामान्य प्रशासन विभाग में पहुँचा। मेरे पूर्व कमिश्नर वी.जी. निगम वहाँ प्रमुख सचिव थे। उन्होंने कलेक्टर मुरैना के माध्यम से मुझे भोपाल बुलाया। मैं भोपाल जाकर उनसे मिला।
उन्होंने मुझसे पूछा, "तुम क्या कर रहे हो? तुम्हारी बहुत शिकायतें आ रही हैं।" तब मैं शिकायत का मतलब भ्रष्टाचार से संबंधित शिकायत ही समझता था। मैंने उनसे कहा कि मैंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है।
उन्होंने विजयपुर के विधायक का शिकायती पत्र मुझे दिखाया। इस पत्र में विधायक जी ने लिखा था कि मैं भारतीय जनता पार्टी का आदमी हूँ, इसलिए मेरा तबादला सबलगढ़ से किया जाए।
मुख्यमंत्री जी ने अपने हाथ से लिखा था, 'रवीद्र पस्तोर इमीडिएटली ट्रांसफर फ्रॉम सबलगढ़ टू एनीवेयर इन एम.पी.' उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी।
निगम साहब ने पूछा कि मैं अपना तबादला कहाँ चाहता हूँ। मेरी कोई पसंद नहीं थी। राजनेता मानते हैं कि अगर कोई अधिकारी किसी राजनीतिक पार्टी के प्रति सहानुभूति रखता है और यदि उनका तबादला किसी दूसरे ज़िले में कर दिया जाए, तो वह उनकी पार्टी से सहानुभूति रखने लगेगा। नौकरशाहों के बारे में राजनेताओं के मन में कितनी ग़लतफ़हमियाँ होती हैं। तबादले का उपयोग राजनेता एक ब्रह्मास्त्र की तरह करते हैं।
उस समय भारतीय जनता पार्टी का ज़मीन पर कोई बहुत बड़ा आधार नहीं था, और कांग्रेस शुरू से ही भारतीय जनता पार्टी से...। लेकिन मुझे सपने में भी ख़याल नहीं था कि कोई मुझ पर इस तरह का आरोप लग सकता है और तबादले का यह आधार हो सकता है। यह मेरे लिए पहला अनुभव था कि सरकार कैसे काम कराती है।
मुरैना प्रदेश के उत्तर में है और छिंदवाड़ा दक्षिण में। मैंने आसपास किसी भी ज़िले में तबादला करने का अनुरोध किया। उन्होंने छिंदवाड़ा ज़िले की बहुत तारीफ़ की और मेरा तबादला छिंदवाड़ा हो गया। मैं सबलगढ़ से कार्यमुक्त होकर छिंदवाड़ा जा रहा था।
जब मैं ग्वालियर पहुँचा, तो मुझे विधायक जी से मिलने का विचार आया। मैंने एक किलो मिठाई ख़रीदी और विधायक जी के घर गया। मैं पहली बार उनसे मिल रहा था। वे मुझे देखकर बहुत चौंके। मैंने उन्हें प्रणाम किया और मिठाई देकर मेरा तबादला करवाने के लिए धन्यवाद दिया।
मैंने उनसे कहा कि मेरे भाई जो कांग्रेस के विधायक हैं, उन्होंने बहुत प्रयास किए, पर तबादला नहीं हुआ। आपने करवा दिया। जब उन्होंने मेरी यह बात सुनी, तो उनके चेहरे से ख़ुशी ग़ायब हो गई। विजेता का भाव जाता रहा।
मैं छिंदवाड़ा सामान लेकर पहुँच गया। मुरैना से छिंदवाड़ा तक सड़क मार्ग से दूरी लगभग 628 किलोमीटर है। वहाँ कोई शासकीय मकान ख़ाली नहीं था, इस कारण मुझे अपने परिवार को अपने पैतृक निवास पर छोड़ना पड़ा।
यह कहानी में अपने मित्र सक्सेना जी को सुना रहा था। उन्होंने कहा यह कहानी आपके प्रशासनिक जीवन के शुरुआती संघर्षों, चुनौतियों और सीखने के अनुभवों को दर्शाती है। अब आप छिंदवाड़ा में एक नए अध्याय की शुरुआत करने जा रहे हैं। क्या आप अपने आगे के अनुभव साझा करना चाहेंगे?
हम ने उन्हें आगे की कहानी सुनाना जारी रखा। हम लोग एक रेस्ट हाउस के लॉन में बैठकर चाय पर चर्चा कर रहे थे।
छिंदवाड़ा
खजूर का शहर, सिंहद्वार का इतिहास
मुरैना से छिंदवाड़ा की लंबी यात्रा के बाद, मैं मध्य प्रदेश के सबसे बड़े ज़िले की दहलीज पर खड़ा था। यह ज़िला राज्य के दक्षिण-पश्चिमी सतपुड़ा पर्वत श्रेणी में बसा था। यहाँ की मिट्टी, यहाँ की हवा, सब कुछ मेरे बुंदेलखंडी अनुभव से अलग था। यह माना जाता है कि "छिंद" (खजूर) के पेड़ों की बहुतायत के कारण इसका नाम "छिंदवाड़ा" पड़ा। एक अन्य कहानी के अनुसार, यहाँ शेरों (सिंह) की आबादी अधिक होने के कारण इसे पहले "सिंहद्वार" कहा जाता था। यहाँ के इतिहास में भक्त बुलंद राजा का नाम गूँजता है, जिनका राज्य सतपुड़ा की पहाड़ियों में फैला था और माना जाता है कि उनका शासन तीसरी शताब्दी तक था।
नीलकंठ गाँव में राष्ट्रकूट वंश से संबंधित एक प्राचीन पट्टिका (शिलालेख) मिली है, जिसने 7वीं शताब्दी तक शासन किया। इसके बाद गोंडवाना वंश आया, जिसने देवगढ़ को अपनी राजधानी बनाकर इस क्षेत्र पर शासन किया। गोंड समुदाय के राजा जाटवा ने देवगढ़ किले का निर्माण करवाया था। बख्त बुलंद राजा इस वंश के सबसे शक्तिशाली शासक थे, जिन्होंने औरंगजेब के शासनकाल में मुस्लिम धर्म अपना लिया था।
बाद में कई शासकों ने यहाँ राज किया और अंततः 1803 में मराठा शासन समाप्त हो गया। 17 सितंबर 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रघुजी द्वितीय को हराकर इस राज्य पर क़ब्ज़ा कर लिया, जिससे ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई। स्वतंत्रता के बाद, पहले नागपुर को छिंदवाड़ा ज़िले की राजधानी बनाया गया था, और 1 नवंबर 1956 को इस ज़िले का पुनर्गठन हुआ, जिसमें छिंदवाड़ा को भोपाल राजधानी बनाकर मध्य प्रदेश में सम्मिलित किया गया।
छिंदवाड़ा शहर रेल और सड़क के महत्वपूर्ण जंक्शन पर बसा हुआ था। इसके आसपास के पठारी क्षेत्र में कोयला, मैंगनीज, जस्ता, बॉक्साइट और संगमरमर का खनन होता था। नगर की मुख्य गतिविधियाँ कपास का व्यापार और कोयले की ढुलाई थीं। कपास ओटाई और आरा मिलें यहाँ के मुख्य उद्योग थे। पठार में बड़े पैमाने पर पशुपालन होता था।
स्थानीय स्तर पर यह नगर मिट्टी के बर्तन और जस्ता, पीतल व काँसे के आभूषण तथा चमड़े की मशक के निर्माण के लिए विख्यात था। यह नगर स्थानीय व्यापार का केंद्र था और पशु, अनाज तथा इमारती लकड़ी की बिक्री के लिए यहाँ साप्ताहिक हाट लगती थी। पेंच टाइगर रिजर्व, जिसका कुछ हिस्सा छिंदवाड़ा ज़िले में भी आता है, 1983 में एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में स्थापित किया गया था। यह क्षेत्र अपने समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता था।
हॉस्टल में नई दोस्ती और प्रशासनिक संस्कृति का अंतर
राजनीतिक दृष्टि से यह समय छिंदवाड़ा के लिए बहुत महत्वपूर्ण था। कमलनाथ यहाँ से सांसद थे और वहाँ के छह विधायक मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। इन सबके बीच मैं एक कॉलेज के हॉस्टल में रहता था, जहाँ मेरे साथ दो और अधिकारी, अलोक सक्सेना (ज़िला विधिक सहायता अधिकारी) और पी. विश्वास (ज़िला पंजीयक), रहते थे। हॉस्टल में फ़र्निश्ड कमरे थे, जिनमें बिस्तर, अध्ययन मेज, कुर्सी और अलमारी जैसी बुनियादी चीज़ें थीं। मेस की सुविधा नहीं थी, इसलिए हम लोगों ने एक मराठी बुज़ुर्ग महिला को खाना बनाने के लिए रखा था। वह कुछ लँगड़ाकर चलती थी, पर खाना बहुत प्यार से बनाती और खिलाती थी। हॉस्टल में हाउसकीपिंग और रखरखाव की सुविधा थी और यह हॉस्टल सेंट जॉन्स ई.एल.सी. चर्च द्वारा संचालित था।
छिंदवाड़ा के चर्च अपनी धार्मिक सेवाओं के साथ-साथ विभिन्न सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते थे। यहाँ क्रिश्चियन आबादी के लिए सेंट मार्क चर्च, सेंट जॉन्स चर्च और सेंट फ़्रांसिस ज़ेवियर चर्च थे, जो बहुत सारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते थे, जिससे न केवल उनके अपने सदस्यों को आध्यात्मिक सहायता मिलती, बल्कि वे व्यापक समुदाय में भी सकारात्मक योगदान दे रहे थे। छिंदवाड़ा में ऐसे कॉन्वेंट स्कूल और कॉलेज थे, जो ईसाई मिशनरी या चर्च द्वारा संचालित थे।
हमारे कलेक्टर एन.पी. तिवारी जी थे, जो यहाँ विगत चार साल से कलेक्टर थे। वे एक कुशल प्रशासक, अनुभवी और राजनेताओं से अच्छे संबंध रखने वाले अफ़सर थे। लेकिन अपने अधीनस्थ अधिकारियों के लिए वे बहुत गुस्सैल, कठोर, गाली-गलौज और डाँट-डपट करने वाले थे। मुरैना में मेरा अनुभव दोस्ताना व्यवहार करने वाले अधिकारियों के साथ काम करने का रहा था, इसलिए इस तरह की कार्य संस्कृति मेरे लिए एकदम नई थी। शुरू में इस वजह से मुझे बहुत दिक्कत हुई।
प्रशासन में दो तरह के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते हैं: एक सीधी भर्ती वाले, जो संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा द्वारा चयनित होते हैं, और दूसरे राज्य प्रशासनिक सेवाओं के पदोन्नत (प्रमोटी) अधिकारी। तिवारी जी राज्य प्रशासनिक सेवा से पदोन्नत हुए अधिकारी थे। डिप्टी कलेक्टर से प्रमोशन पाकर कलेक्टर बने थे। किसी पदोन्नत अधिकारी के साथ काम करने का मेरा यह पहला अनुभव था।
सीधी भर्ती के अधिकारी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा को पास करके आई.ए.एस. बनते हैं। यह एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा है, जिसमें लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं। इस परीक्षा में तीन चरण होते हैं- प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार। शीर्ष रैंक पाने वाले उम्मीदवारों को आई.ए.एस. के लिए चुना जाता है। ये सीधे नव-नियुक्त अधिकारी के रूप में सेवा में प्रवेश करते हैं।
पदोन्नत आई.ए.एस. अधिकारी वे होते हैं, जो पहले राज्य सिविल सेवा के अधिकारी होते हैं। ये राज्य लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित परीक्षाओं को पास करके राज्य सेवाओं में शामिल होते हैं। एक निश्चित अवधि की सेवा (आमतौर पर 8-10 वर्ष या उससे अधिक) और उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद, राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों को आई.ए.एस. कैडर में पदोन्नत किया जाता है।
यह पदोन्नति एक चयन समिति द्वारा की जाती है, जिसमें संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ये अधिकारी पहले से ही राज्य प्रशासन में काम कर रहे होते हैं और अपनी सेवा के दौरान ही आई.ए.एस. बनते हैं।
आई.ए.एस. कैडर में सीधी भर्ती और पदोन्नति के लिए एक निश्चित कोटा निर्धारित है। मोटे तौर पर, लगभग 66% (2/3) पद सीधी भर्ती के लिए होते हैं, जबकि शेष लगभग 33% (1/3) पद पदोन्नति कोटा के लिए होते हैं। यह अनुपात समय-समय पर सरकार द्वारा संशोधित किया जा सकता है।
सीधी भर्ती के अधिकारियों को लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में एक लंबा और व्यापक आधारभूत प्रशिक्षण प्राप्त होता है, जिसके बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण और ज़िला प्रशिक्षण शामिल होता है। यह प्रशिक्षण उन्हें अखिल भारतीय सेवाओं के लिए तैयार करता है।
पदोन्नत अधिकारियों को भी लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी, मसूरी में 5 सप्ताह का आगमन प्रशिक्षण प्राप्त होता है, जो उन्हें आई.ए.एस. कैडर की भूमिकाओं और ज़िम्मेदारियों के लिए उन्मुख करता है। उनका अनुभव उन्हें पहले से ही कई व्यावहारिक पहलुओं से परिचित करा चुका होता है।
सीधी भर्ती के अधिकारी आमतौर पर कम उम्र में (21 से 32 वर्ष की आयु सीमा के भीतर) सेवा में प्रवेश करते हैं। उनके पास सेवा में लंबा करियर होता है। पदोन्नत आई.ए.एस. अधिकारी आमतौर पर बड़ी उम्र में (अक्सर 40 या 50 के दशक में) आई.ए.एस. बनते हैं, क्योंकि वे राज्य सेवाओं में पहले ही काफ़ी अनुभव प्राप्त कर चुके होते हैं।
सीधी भर्ती की करियर प्रगति आमतौर पर तेज़ होती है, ख़ासकर शुरुआती वर्षों में। वे जल्दी ही उच्च पदों तक पहुँच सकते हैं, जैसे उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, ज़िला मजिस्ट्रेट, सचिव आदि। उनकी वरिष्ठता उनके संघ लोक सेवा आयोग की रैंक और कैडर आवंटन पर आधारित होती है।
पदोन्नत आई.ए.एस. अधिकारी की करियर प्रगति राज्य सेवाओं में उनके अनुभव के आधार पर होती है, और आई.ए.एस. में पदोन्नति के बाद, उनकी वरिष्ठता सीधी भर्ती अधिकारियों से थोड़ी पीछे हो सकती है, ख़ासकर शुरुआती चरणों में। हालाँकि, वे भी उच्च पदों तक पहुँचते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर उतनी उच्च केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के अवसर नहीं मिलते, जितनी सीधी भर्ती वालों को मिल सकती है।
दोनों तरह के आई.ए.एस. समान होते हैं। एक बार जब कोई अधिकारी आई.ए.एस. कैडर में शामिल हो जाता है, चाहे वह सीधी भर्ती से आया हो या पदोन्नति से, तो उसे समान पदनाम, वेतनमान और शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। एक आई.ए.एस. अधिकारी के रूप में, वे ज़िला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, राज्य या केंद्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों के सचिव जैसे पदों पर काम करते हैं।
दोनों तरह के आई.ए.एस. अधिकारियों के अधिकार और कर्तव्य अधिकारी के रूप में समान होते हैं। वे सरकार की नीतियों को लागू करने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सेवाओं का प्रबंधन करने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।
यह मिश्रण आई.ए.एस. की ग्रेडेशन लिस्ट में तो बहुत आसानी से हो जाता है, लेकिन प्रशासनिक हलकों में उद्भव का यह अंतर कभी समाप्त नहीं होता है। यह व्यवस्था वर्णभेद, जाति प्रथा या रंगभेद की व्यवस्था जैसी ही है, जिसमें आप यदि कुछ कर सकते हैं, तो अपनी योग्यता, क्षमता, मेहनत तथा बुद्धि के सहारे अंतर को कम तो कर सकते हैं, लेकिन मिटा नहीं सकते।
यह ज़िंदगी के साथ भी और ज़िंदगी के बाद तक चलने वाली मानसिकता है। यह भेदभाव बहुत हद तक मनोवैज्ञानिक है, जो समाज के लोगों के मन में है, बाहर नहीं। धीरे-धीरे यह आपको मनोवैज्ञानिक स्तर पर कमज़ोर बना देती है। आप इसे रोज़ हर जगह महसूस करते हैं।
टॉर्चर चैंबर और एक नए कलेक्टर का सामना
कुछ सप्ताह हॉस्टल में रहने के दौरान हम सब भी फ़ोर्स बैचलर थे। उस समय छिंदवाड़ा के सिनेमा घरों में किसी कारणवश एक अनोखी हड़ताल चल रही थी। सभी टॉकिज़ों ने अपने टिकट की क़ीमत एक रुपया कर दी थी। हम तीनों रात का खाना खाकर लगभग रोज़ सेकंड शो देखने जाते थे।
इस समय तक मैं कलेक्टर से मिलने उनके घर नहीं गया था। मुझे शिष्टाचार भेंट (कर्टसी विज़िट) की आदत नहीं थी। मैं बिना बुलाए नहीं जाता था। इस वजह से कलेक्टर ने मुझे कोई काम नहीं दिया था। मैंने ऑफ़िसर्स क्लब की सदस्यता भी नहीं ली थी।
उन्होंने शुरू में मुझे कुछ हल्का-फुल्का काम दे रखा था। वह काम मैं करता था और फ़ुर्सत के समय किताबें पढ़ता था। कलेक्टर रोज़ सुबह 10:30 बजे अधिकारियों की मीटिंग लेते थे। आप उन्हें आता देखकर अपनी घड़ी मिला सकते थे। वे समय के बहुत पाबंद थे। उनका एक अजीब सिस्टम था। उनके पास रोज़ डाक आती, उसमें से वे कुछ पत्र मीटिंग में लाते थे। यह रोज़ अधिकारियों की लॉटरी निकलने जैसा था।
आज किसकी क़िस्मत में क्या निकलेगा, यह केवल वही जानते थे। यह एक तरह की मनोवैज्ञानिक तकनीक थी दूसरों के मन पर हावी होने की। उनके संबंध में जानकारी संबंधित अधिकारी से पूछते थे। उस अधिकारी को कुछ पता नहीं होता था, तो वह जानकारी नहीं दे पाता था। तब कलेक्टर उसे सार्वजनिक रूप से मीटिंग में डाँटते, भला-बुरा कहते। कभी-कभी वे गुस्से में इतना तमतमा जाते कि उनका चेहरा लाल हो जाता, उनकी बड़ी-बड़ी आँखें लाल हो जातीं और उन्हें ख़ुद पर नियंत्रण नहीं रहता। वे गालियाँ तक देने लगते थे।
रोज़ एक अधिकारी को वे निशाना बनाते थे। मुझे नहीं मालूम ऐसा वे जानबूझकर करते थे या अनजाने में, पर यह रोज़ होता था और उनकी मीटिंग एक टॉर्चर चैंबर में बदल जाती थी। जब उनका मन भर जाता, तब बैठक समाप्त हो जाती थी। सभी अधीनस्थ अधिकारी उनसे डरते थे। कोई कुछ नहीं कहता था।
लोगों ने मुझे बताया था कि एक खान डिप्टी कलेक्टर को उन्होंने इतना डाँटा-डपटा कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ा और कुछ दिनों में उनकी मृत्यु हो गई। कलेक्टर ने एक तांत्रिक अधिकारी की सलाह पर कलेक्टर बंगले के गेट पर दुर्गा माता का मंदिर बनवाकर प्रायश्चित किया, पर उनका व्यवहार नहीं बदला। वे उस तांत्रिक अधिकारी से पूछकर ही महत्वपूर्ण काम करते थे।
लेकिन कलेक्टर साहब का आदेश था, सो मैं क्लब का सदस्य बन गया। मैं बैडमिंटन खेलता था। कभी-कभी मुझे कलेक्टर साहब के साथ खेलने के लिए कहा जाता था। हालाँकि, मैं बहुत बचता था। उनके साथ खेलना मतलब हारना। यदि आप जीत गए, तो ऑफ़िस में वे आपसे बदला लेंगे।
उनका रीडर बाबू प्रकाश जैन था। कलेक्टर फ़ाइल पर हस्ताक्षर करने से पहले उसे जाँचने देते थे। वह कोई न कोई गलती निकालता था, चाहे वह मात्रा या व्याकरण की गलती ही क्यों न हो। मुझे कलेक्टर का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। अभी तक डाँट खाने की मेरी बारी नहीं आई थी।
हमारे साथ एक और डिप्टी कलेक्टर बी.एल. कुरील शामिल हुए थे। वे खनिज शाखा के प्रभारी थे। एक दिन कलेक्टर साहब ने मुझे बुलाया और कहा, "देखो क्या बिना पढ़े-लिखे धोबी मार्क/हस्ताक्षर कर देते हो।"
उन्होंने एक फ़ाइल मेरी तरफ बढ़ाई। मैंने देखा, वह मेरी नहीं थी। मुझे गुस्सा आया। मैंने कहा, "मैं बिना पढ़े हस्ताक्षर नहीं करता। यह फ़ाइल मेरी नहीं है।"
उन्होंने मुझे हस्ताक्षर दिखाए। मैंने पूछा, "आपको किसने बताया कि ये मेरे हस्ताक्षर हैं?" उन्होंने प्रकाश बाबू को बुलाया। तब प्रकाश ने कहा, "यह मेरे हस्ताक्षर हैं।" मैंने बताया कि ये मिस्टर कुरील के हस्ताक्षर हैं।
मैं गुस्से से लाल हो गया। मेरा नियंत्रण ख़ुद पर से चला गया। मैंने प्रकाश बाबू को भला-बुरा कहा, गालियाँ दीं और धक्का दिया। वे छोटे कद के व्यक्ति थे। मैंने कहा, "इतना मारूँगा कि जितने ऊपर हो उतना नीचे गाड़ दूँगा। कलेक्टर को ग़लत जानकारी देते हो।"
वह डर गया और माफ़ी माँगने लगा। कलेक्टर उठकर मुझे बिठाने लगे। मैं जितनी बातें कलेक्टर को बोलना चाहता था, वह सब मैंने प्रकाश बाबू को सुना दीं। उस दिन कलेक्टर ने मेरा गुस्सा देखा। तब से वे मुझसे अच्छे से व्यवहार करने लगे।
ब्रह्मास्त्र का अंत और नई शुरुआत
कलेक्टर ने कुछ दिन मेरे उनके घर पर मिलने जाने का इंतज़ार किया। मुझे इस रिवाज़ का पता नहीं था और न ही किसी ने कभी बताया था। मुरैना में भी ऐसी कोई प्रथा थी या नहीं, मुझे पता नहीं था। मैं उनके घर नहीं गया।
एक दिन मीटिंग के बाद जब मैं जाने लगा, तो उन्होंने मुझे रुकने को कहा। मुझे लगा कि शायद आज मुझे डाँटने वाले हैं। मैं बैठक में जाने से पहले रोज़ हनुमान चालीसा पढ़ता था। मुझे लगता था कि यदि वे ऐसा मुझसे व्यवहार करेंगे, तो मारपीट हो जाएगी। मेरी क्षमता इतना सुनने की नहीं थी।
उन्होंने मुझे शाम को छह बजे उनके बंगले पर मिलने के लिए बुलाया। जब शाम को मैं गया, तब वे छिंदवाड़ा के एस.डी.एम. डी.एस. राय को डाँट रहे थे। वे दोनों कमरे में अकेले थे। कुछ देर बाद मिस्टर राय बाहर आए। मुझे देखकर उन्होंने ज़बरन मुस्कुराने की कोशिश की और दौड़कर बाहर चले गए।
कलेक्टर का मूड ख़राब था। मैं बहुत असहज महसूस कर रहा था। कलेक्टर के चपरासी ने आकर बताया कि साहब मुझे अंदर बुला रहे हैं। अब हम दोनों पहली बार अकेले थे। उन्होंने एक सिगरेट निकाली, चपरासी से माचिस माँगी और पीने लगे।
मुझे याद आया, सिगरेट पीने वाले तीन तरह के होते हैं। जो नया-नया सिगरेट पीना सीखते हैं, वे सिगरेट और माचिस दोनों रखते हैं। जो कुछ अनुभवी होते हैं और गिनती की सिगरेट पीते हैं, वे दोनों में से एक चीज़ रखते हैं- या तो सिगरेट या माचिस। और जो चेन स्मोकर होता है, वह दोनों नहीं रखता है।
तिवारी जी ने मुझे बाहर चलकर घूमते-घूमते बात करने का आमंत्रण दिया। मुझे यह अच्छा लगा। कलेक्टर बंगला तब लगभग दो सौ एकड़ में होता था। बहुत बड़ा मैदान था, खूब पेड़, बगीचा और खेत थे। हम लोग बाहर आए। आकाश में शाम का सूरज डूबने को था।
आकाश लालिमा से भरा था और शाम की ठंडी हवा चल रही थी। तिवारी जी का मूड अच्छा हो गया। वे अपने बारे में बताने लगे। उन्होंने बताया कि जब वे डिप्टी कलेक्टर बने, तो उनके पहले कलेक्टर बैतूल में एम.एन. बुच थे। वे अपने अधीनस्थों से बहुत मेहनत से काम करवाते थे। उनकी ट्रेनिंग के कारण तिवारी जी का करियर बना।
समय पर प्रमोशन हुए और बहुत अच्छी-अच्छी पोस्टिंग काम करने के लिए मिलीं। वे मेरे जीवन यात्रा के बारे में पूछने लगे। मैं बता रहा था, फिर उन्होंने मेरे अनुभव के बारे में पूछा। मैंने शायद बहुत बुंदेलखंडी टोन में बताया कि कलेक्टरी छोड़कर सब काम किए हैं। मेरी टोन उन्हें खटक गई। मैं बुंदेलखंडी हूँ, वहाँ बहुत अलग तरह की टोन चलती है, जिसे दूसरी जगह घमंडी टोन माना जाता है।
उन्होंने कुछ कहा नहीं, पर मुझे उनका चेहरा देखकर लग गया। उनकी बातों में हल्का-सा परिवर्तन आया। फिर वे मुरैना के कलेक्टरों और कमिश्नरों के बारे में बात करने लगे। मैंने उनसे अपने दोस्ताना संबंध और व्यवहार के बारे में बताया। धीरे-धीरे वे फिर सहज हो गए। तब मैं उनसे मकान आवंटित करने का अनुरोध करने का सोचने लगा। मैंने हिम्मत करके मकान देने का अनुरोध किया।
उन्होंने आश्वासन दिया कि जो भी पहला घर ख़ाली होगा, वे मुझे दे देंगे। मैं नमस्ते कर वापस हॉस्टल आ गया। अगले दिन उन्होंने कलेक्टरी छोड़कर अधिकांश ऑफ़िस के काम मुझे दे दिए। शायद वे मेरी कार्यकुशलता देखना चाहते थे। मुझे घर मिल गया।
अब आप छिंदवाड़ा में अपने काम के नए अध्याय की शुरुआत कर रहे हैं। आपके लिए आगे कौन-कौन सी चुनौतियाँ और अनुभव इंतज़ार कर रहे थे? सक्सेना जी ने उत्सुकता से पूछा।
लेम्बरेटा का संघर्ष और चेतक का सपना
नया घर तो मिल गया, पर उसकी दीवारों के भीतर जीवन को गति देने के लिए एक वाहन की आवश्यकता थी। मेरे पास नगरपालिका का एक पुराना लेम्बरेटा स्कूटर था, जो किसी से टैक्स न देने पर कई साल पहले जब्त किया गया था और मालखाने में पड़ा था। मैंने उसे ठीक करवाया और चलाने लगा, पर उसका मिजाज़ मेरे मिजाज़ जैसा ही ज़िद्दी था। जब कहीं भी बंद हो जाता, तो मैं उसे सड़क पर खड़ा कर पैदल या रिक्शा कर घर आ जाता। नगरपालिका के हमारे सब इंजीनियर मिस्टर जोसेफ थे, जो उसे उठवाते, सुधरवाकर मेरे घर भेजते थे।
उन दिनों हर किसी अधिकारी का सपना होता था एक बजाज का चेतक स्कूटर लेना। पियाजियो वेस्पा की मूल कंपनी ने भारत में वेस्पा स्कूटर के उत्पादन का लाइसेंस बजाज ऑटो को दिया था। तो, आप सीधे बजाज ऑटो के डीलरों के माध्यम से ही बुकिंग कर सकते थे। लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण वेस्पा स्कूटर को खरीदने के लिए तीन से चार साल तक की लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। बजाज चेतक जैसे अन्य स्कूटरों के लिए तो यह प्रतीक्षा दस से बारह साल तक की भी हो सकती थी। यह दर्शाता था कि उस समय स्कूटर कितने लोकप्रिय थे और उनकी उपलब्धता कितनी कम थी।
यह मिडिल क्लास का स्टेटस सिंबल था। प्रीमियम और "ब्लैक मार्केट" में मांग इतनी ज़्यादा थी कि लोग स्कूटर जल्दी पाने के लिए प्रीमियम (अतिरिक्त पैसे) देने को भी तैयार रहते थे। बुकिंग सीधे अधिकृत डीलरों के पास होती थी। आपको एक आवेदन पत्र भरना होता था और एक अग्रिम राशि (एडवांस पेमेंट) भी जमा करनी पड़ती थी। मैंने तीन साल पहले बुकिंग ग्वालियर में की थी। अब वह स्कूटर मैंने लोन लेकर लिया था और फिर उसे चलाता था।
एक दिन शाम को मैं कलेक्टर बंगले गया। मेरे पास नजूल का प्रभार था। कलेक्टर बंगले में घास, इमली और वनोपज की नीलामी करवाने का काम नजूल अधिकारी करते थे। जो पैसा आता, वह कलेक्टर साहब की पत्नी ले लेती थीं। मैंने इमली की नीलामी करवाई थी और उन्हें नीलामी का पैसा कम लग रहा था, उसी पर बात करने के लिए बुलाया था। जब मैं कमरे में गया, तब वे चपरासी को कमरे में बीड़ी पीने पर डाँट रहे थे। उन्होंने मुझे अंदर बुला लिया, बैठाया और खुद सिगरेट सुलगा ली। मुझे हँसी आ गई। वे समझ गए, सिगरेट बुझा दी और बात करने लगे।
ग्रामीण विकास की नई राह
मुझे महिला एवं बाल विकास (DWCD) कार्यक्रम का काम दिया गया था, जो भारत सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए शुरू की गई एक महत्वपूर्ण योजना थी। इसके लिए मुझे एक गाड़ी भी दी गई। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाली महिलाओं और बच्चों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करना था।
उन्हें आय-सृजन गतिविधियों में शामिल होने के अवसर प्रदान करना, उत्पादक संपत्ति और ऋण तक उनकी पहुँच सुनिश्चित करना, उनके कौशल को बढ़ाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना, तथा बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में सुधार करना, इस योजना का मूल मंत्र था।
योजना के तहत ग्रामीण महिलाओं के 15-20 सदस्यों के समूह बनाए जाते थे। ये समूह स्व-सहायता समूह की अवधारणा पर आधारित थे। इन समूहों को आय-सृजन गतिविधियों (जैसे सिलाई, कढ़ाई, अचार बनाना, पापड़ बनाना, बेकरी उत्पाद, मोमबत्ती बनाना, साबुन बनाना, मुर्गी पालन, डेयरी, आदि) के लिए प्रोत्साहित किया जाता था। महिलाओं को उनकी चुनी हुई गतिविधियों में आवश्यक कौशल प्रशिक्षण प्रदान किया जाता था। समूहों को एक बार का रिवॉल्विंग फंड भी दिया जाता था, जिसका उपयोग कच्चे माल की खरीद, विपणन और समूह की अन्य जरूरतों के लिए किया जाता था।
बाल देखभाल गतिविधियों के तहत काम करने वाली महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच सेवाएँ और पोषण, टीकाकरण आदि की सुविधा प्रदान की जा सके। स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और पोषण जैसी बुनियादी सामाजिक सेवाओं तक महिलाओं और बच्चों की पहुँच में सुधार करना भी इसमें शामिल था। छिंदवाड़ा में मैंने इस कार्यक्रम का संचालन कर ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भारत में बीपीएल- गरीबी रेखा से नीचे की अवधारणा उन व्यक्तियों और परिवारों की पहचान करने के लिए एक आर्थिक मानदंड है, जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और जिन्हें सरकारी सहायता और योजनाओं की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य उन लोगों को लक्षित करना है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं। गरीबी रेखा को प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय या आय के न्यूनतम स्तर के आधार पर परिभाषित किया जाता रहा है।
इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति का उपभोग व्यय या आय एक निश्चित सीमा से कम है, तो उसे गरीब माना जाता है। भारतीय अर्थशास्त्री वी.एम. दांडेकर और नीलकांत रथ ने 1971 में भारत में गरीबी का एक महत्वपूर्ण और व्यवस्थित आकलन प्रस्तुत किया। उनका दृष्टिकोण भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण के शुरुआती और प्रभावशाली प्रयासों में से एक था। दांडेकर और रथ ने गरीबी रेखा को केवल आय के आधार पर नहीं, बल्कि न्यूनतम कैलोरी उपभोग के आधार पर परिभाषित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने तर्क दिया कि गरीबी रेखा उस उपभोग व्यय पर आधारित होनी चाहिए, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2250 कैलोरी की न्यूनतम आवश्यकता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। उनका मानना था कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीने के लिए एक निश्चित मात्रा में कैलोरी का सेवन आवश्यक है।
यह कैलोरी मानदंड पोषण विशेषज्ञ पी.वी. सुखात्मे के अनुमानों पर आधारित था। यह मॉडल मुख्य रूप से भोजन (कैलोरी) पर केंद्रित था और शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, परिवहन, और अन्य गैर-खाद्य वस्तुओं पर होने वाले आवश्यक खर्चों को पूरी तरह से शामिल नहीं करता था। इसके बावजूद, दांडेकर और रथ का कार्य भारतीय अर्थशास्त्र में गरीबी के अध्ययन में एक मील का पत्थर था, जिसने गरीबी की पहचान और उसके मापन के लिए एक ठोस आधार प्रदान किया।
भारत सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों में गरीबी कम करने के लिए कई योजनाओं को लागू किया गया है, जिनमें से एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम (IRDP) और स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण (TRYSEM) प्रमुख थे। ये योजनाएँ ग्रामीण गरीबों को सशक्त बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से लाई गई थीं।
मेरी रुचि ग्रामीण विकास, आजीविका और कृषि क्षेत्र में थी। वैसे तो प्रशासन कुर्सी से चलता है, उस पर कोई भी बैठा हो, लेकिन यदि बैठने वाला थोड़ा योग्य व्यक्ति हो तो वह हजारों लोगों के जीवन में बदलाव का कारण बन सकता है। सरकार बहुत बड़ी प्रशासनिक इकाई है।
फील्ड के अधिकारी नीतिगत निर्णय नहीं लेते हैं, लेकिन नीतियों तथा उनके तहत बनी शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन वे करते हैं। डिप्टी कलेक्टर का पद सामान्य प्रशासन विभाग के तहत आता है। उन्हें कभी किसी भी विभाग में पदस्थ किया जा सकता है। इस समय मैंने निर्णय लिया कि मैं कम से कम एक विषय में थ्योरी तथा प्रैक्टिकल में महारत हासिल करूँगा। मैंने ग्रामीण विकास विषय को चुना। इसलिए इस विभाग की योजनाओं को लागू करने के लिए मैंने आउट ऑफ़ द बॉक्स तरीक़े विकसित किए।
एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम और स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण के कार्यक्रम लागू करने के लिए मैंने क्लस्टर स्तर पर कैंप लगाना शुरू किया। ग्रामीण महिलाओं के 15-20 सदस्यों के समूह बनवाने के लिए संबंधित अधिकारियों के साथ मैं बहुत काम करता था। उन्हें बैंकों से जोड़कर लोन दिलवाता और गतिविधियों के प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलाता था।
उन दिनों परिवार नियोजन करवाने की ज़िम्मेदारी ज़िला प्रशासन की होती थी। हम लोगों को महिला तथा पुरुष नसबंदी के लिए लोगों को प्रेरित करते, डराते या कभी-कभी लालच देते थे। दिल्ली के पालिका बाज़ार से इलेक्ट्रॉनिक घड़ियाँ किलो से तौल कर लाते और नसबंदी करवाने वालों को ईनाम में देते थे। महिलाओं को बर्तनों का सेट दिया जाता था।
मैंने छिंदवाड़ा में उस समय देश का सबसे बड़ा नसबंदी कैंप आयोजित किया था। यह कैंप तीन दिन चला था। तीसरे दिन सुबह जब मैं हॉस्पिटल से घर आया, तो मेरे दरवाज़े पर कलेक्टर साहब ने प्रशंसा पत्र रखवाया था। यह प्रशंसा पत्र पाकर मुझे बहुत गर्व महसूस हुआ था।
प्रशासनिक रणभूमि: रिश्वत और विरोध
इन्हीं दिनों मैं पुलिस के साथ रंगे हाथों रिश्वत लेने वालों को पकड़ने के कारण अधिकारियों के बीच में बहुत मशहूर हो गया था। मुरैना में कई लोगों को पकड़ा था, और फिर छिंदवाड़ा में चार अधिकारियों को पकड़ चुका था। मुरैना की तुलना में छिंदवाड़ा बहुत शांत जगह थी। बहुत कम लोग कलेक्ट्रेट आते थे। मुरैना में बहुत उग्र स्वभाव के लोग थे।
वहाँ लोग मुँह पर बोलते थे, "काम तो करना पड़ेगा, या तो चाँदी का जूता खाकर करो या चमड़े का। चॉइस आपकी है।" वहाँ लोग यदि आपसे दोस्ती करेंगे तो अंतिम दम तक और दुश्मनी करेंगे तो भी अंतिम दम तक। घर का पूरा पैसा लगाकर आपको मिटा देंगे। इसके उलट, छिंदवाड़ा के लोग मीठा बोलते थे सामने और बुराई करते थे पीठ पीछे। यदि खाने पर बुलाएँगे तो एक रोटी के चार भाग करके परोसेंगे, छोटी-छोटी कटोरियों में दाल-सब्जी देंगे। बहुत अलग कल्चर था, मेरे लिए बिल्कुल नया। मैं ठहरा बुंदेलखंडी अधिकारी।
इन्हीं दिनों वन बंदोबस्त अधिकारी (Forest Settlement Officer) का एक महत्वपूर्ण पद मुझे सौंपा गया। यह पद मुख्य रूप से वन भूमि और वन अधिकारों से संबंधित विवादों को सुलझाने और उनका निपटान करने के लिए ज़िम्मेदार होता है। वन बंदोबस्त अधिकारी का कार्य वन भूमि पर सरकार के स्वामित्व को स्थापित करने और स्थानीय समुदायों के वैध अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना है। यह एक जटिल और संवेदनशील कार्य होता है, जिसके लिए कानूनी ज्ञान, प्रशासनिक कौशल और निष्पक्षता की आवश्यकता होती है। भारतीय वन अधिनियम और अन्य संबंधित कानूनों के तहत, उसके मुख्य कर्तव्य हैं:
अधिकारों का निर्धारण और रिकॉर्डिंग: किसी क्षेत्र को आरक्षित वन या संरक्षित वन घोषित करने से पहले, अधिकारी का मुख्य कार्य उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के मौजूदा अधिकारों (जैसे चराई के अधिकार, लकड़ी इकट्ठा करने के अधिकार, पानी के अधिकार, आदि) का पता लगाना और उन्हें दर्ज करना होता है। वे दावेदारों से आवेदन प्राप्त करते हैं और उनकी जाँच करते हैं।
दावों की जाँच और निपटान: वे प्राप्त सभी दावों की गहन जाँच करते हैं। इसमें संबंधित व्यक्तियों, ग्रामीणों और स्थानीय अधिकारियों से पूछताछ करना, राजस्व रिकॉर्ड की जाँच करना और स्थल पर जाकर सत्यापन करना शामिल है। यह सुनिश्चित करना कि सभी दावे वैध हैं और उनका कानूनी आधार है। दावों की जाँच के दौरान या उसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी आपत्ति या विवाद को सुनना और उनका निपटान करना। यह एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया होती है, जहाँ अधिकारी को साक्ष्यों पर विचार करना होता है और निष्पक्ष निर्णय देना होता है।
मुआवजे का निर्धारण: यदि किसी व्यक्ति के वैध अधिकार वन के गठन के कारण बाधित होते हैं, तो अधिकारी को मुआवजे (नक़दी या भूमि) का निर्धारण करना होता है, या वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे अन्य क्षेत्रों में चराई के अधिकार) का प्रस्ताव देना होता है।
वन भूमि का सीमांकन: वन भूमि की सीमाओं का सही ढंग से सीमांकन करवाना और उनके नक़्शे तैयार करवाना। यह भविष्य में अतिक्रमण और विवादों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है।
अधिसूचना और प्रकाशन: अपने निष्कर्षों और निर्णयों को सार्वजनिक सूचना के लिए अधिसूचित करना।
सरकार को रिपोर्ट: अपने सभी निष्कर्षों, निर्णयों और सिफ़ारिशों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट संबंधित राज्य सरकार को प्रस्तुत करना।
न्यायालयों में प्रतिनिधित्व: यदि बंदोबस्त अधिकारी के निर्णयों के खिलाफ अपील की जाती है, तो उन्हें उच्च न्यायालयों या अन्य न्यायिक मंचों पर सरकार का प्रतिनिधित्व करना पड़ सकता है।
अतिक्रमण हटाना: वन भूमि पर किसी भी प्रकार के अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना।
कुल मिलाकर, यह काम बहुत संवेदनशील है, इस कारण अधिकारी यह काम नहीं करना चाहते। कोई भी डिप्टी कलेक्टर यह कार्यभार लेने से बचता है। तिवारी जी ने मुझे छिंदवाड़ा का फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर बना दिया। फॉरेस्ट की दृष्टि से छिंदवाड़ा बहुत समृद्ध ज़िला था। वहाँ चार डिस्ट्रिक्ट फॉरेस्ट ऑफिसर तथा कंज़र्वेटर ऑफ़ फॉरेस्ट के कार्यालय थे।
मैं फॉरेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर का पदभार ग्रहण कर कंज़र्वेटर ऑफ़ फॉरेस्ट से मिलने उनके ऑफिस गया। उन्होंने खिड़की से मेरी गाड़ी उनके कार्यालय में आते देखी और वे बाहर आकर खड़े हो गए। जब मैंने उन्हें बताया कि मैं शिष्टाचार भेंट के लिए उनसे मिलने आया हूँ, तो उन्होंने राहत की साँस ली और मुझे अपने ऑफिस में ले गए। बोले, "भाई, आपकी गाड़ी देखकर डर लगा कि कहीं आप ट्रैप करने तो नहीं आए हैं।"
नगर पालिका का प्रशासक
उन दिनों नगरपालिकाओं के चुनाव समय पर नहीं होते थे। कलेक्टर साहब ने मुझे छिंदवाड़ा नगर पालिका का प्रशासक नियुक्त किया। मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम के तहत नगर पालिका प्रशासक के कर्तव्य और अधिकार तब लागू होते हैं, जब किसी नगरपालिका या नगर परिषद का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, या किसी अन्य कारण से निर्वाचित निकाय भंग हो जाता है।
ऐसे में राज्य सरकार द्वारा एक प्रशासक की नियुक्ति की जाती है, जो उस नगरीय निकाय के सभी कार्यों का संचालन करता है। कलेक्टर कार्यालय में केवल स्थापना शाखा छोड़कर सभी शाखाओं का प्रभार मेरे पास था। मेहनत बहुत थी, लेकिन काम सीखने को भी मिल रहा था। मेरे कलेक्टर मुझे आजमाना चाह रहे थे, पर मेरे लिए यह अनुभव बहुत काम आया। मैं सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक काम करता था।
कलेक्टर ऑफिस में बहुत कम लोग आते थे। ऑफिस के प्रांगण में नियमित सुबह एक गधा आता, दिन भर वहीं घूमता, रात को वापस जाता था। एक दिन हम लोग ऑफिस में मज़ाक कर रहे थे कि यह किसी पुराने कलेक्टर की आत्मा है जो अभी भी ऑफिस आने का मोह नहीं छोड़ सकी है और यह मेरी बात पीछे से आ रहे कलेक्टर ने सुन ली। वह बहुत हँसे और प्रांगण में खड़े उस गधे को देखकर बोले, "अरे, मैंने तो ध्यान ही नहीं दिया था।"
प्रशासक की भूमिका एक अंतरिम व्यवस्थापक की होती है, जो निर्वाचित निकाय के अभाव में नगरीय निकाय के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करता है। उसके पास वे सभी प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियाँ होती हैं, जो सामान्यतः निर्वाचित महापौर/अध्यक्ष और परिषद के पास होती हैं, ताकि शहर के विकास और नागरिकों को सेवाएँ प्रदान करने में कोई बाधा न आए।
प्रशासक उस अवधि के लिए, जब तक कि नया निर्वाचित निकाय कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेता, नगर पालिका/नगर परिषद के सभी कार्यों और कर्तव्यों का पालन करता है। वह उन सभी शक्तियों का प्रयोग करता है जो अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों और उप-विधियों द्वारा नगरपालिका या उसकी समितियों को प्रदान की गई हैं।
मेरे मुख्य कार्यों में नगर पालिका के वित्त का प्रबंधन करना शामिल था, जिसमें बजट तैयार करना, राजस्व संग्रह (जैसे संपत्ति कर, जल कर, सफ़ाई कर, शुल्क आदि), व्यय को नियंत्रित करना और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना शामिल है। सरकारी अनुदानों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना। विकास कार्य और योजनाएँ बनाना, शहर/कस्बे के विकास और सुधार के लिए योजनाओं को लागू करना। सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़कें, जल निकासी, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता, पार्कों का रखरखाव आदि से संबंधित कार्यों की निगरानी करना।
अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने और नागरिक अधोसंरचना के विकास से संबंधित कार्यों में शामिल होना। कर्मचारी प्रबंधन, नगर पालिका कर्मचारियों की भर्ती, पदोन्नति, स्थानांतरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित निर्णय लेना। कानूनी और नियामक अनुपालन, मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम और अन्य संबंधित कानूनों, नियमों और उप-विधियों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना। किसी भी कानूनी विवाद या मुक़दमे में नगर पालिका का प्रतिनिधित्व करना।
भवन अनुज्ञा जारी करने, अतिक्रमण हटाने और अवैध निर्माण को नियंत्रित करने संबंधी कानूनी प्रावधानों का पालन करना। सार्वजनिक सेवाओं का प्रावधान, नागरिकों को आवश्यक सेवाएँ (जैसे जन्म/मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह प्रमाण पत्र, जल आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि) समय पर और कुशलता से प्रदान करना। नागरिकों की शिकायतों का निवारण करना।
राज्य सरकार को रिपोर्ट, नगर पालिका की गतिविधियों, वित्तीय स्थिति और विकास कार्यों की नियमित रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करना। राज्य सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों और नीतियों का पालन करना। आपातकालीन शक्तियाँ, आपातकालीन स्थितियों में त्वरित निर्णय लेना और आवश्यक कार्रवाई करना।
नगर पालिका प्रशासक का पद अर्द्ध-राजनैतिक पद जैसा होता है। उस समय कमलनाथ जी सुपर मुख्यमंत्री होते थे और छिंदवाड़ा से पाँच मंत्री मध्य प्रदेश शासन में थे। इस सब का दखल नगर पालिका के दैनिक कामकाज में था। नगर पालिका की नियमित आय बहुत कम थी। राज्य सरकार ने ऑक्ट्रॉय टैक्स, जिसे चुंगी कर कहते थे, समाप्त कर दिया था।
पहले हर नगरपालिका को अधिकार था कि वह नगर के प्रवेश मार्गों पर बैरियर लगाकर शहर में आयात तथा निर्यात होने वाले माल पर ऑक्ट्रॉय टैक्स वसूलें। आने जाने वाले यात्री वाहनों से यातायात कर वसूलें। नगर पालिका की आय के ये मुख्य साधन थे, लेकिन राज्य शासन ने यह कर माफ़ कर दिए। आय कम हो गई और खर्चे बढ़ गए।
छिंदवाड़ा नगर पालिका में पैसे की कमी का मुझे एक उपाय सूझा कि यदि मैं नगर पालिका की जमीन पर बाजार के लिए दुकानें नीलाम कर बना दूँ, तो पगड़ी के रूप में एडवांस पैसा डिपॉज़िट में मिल सकता है और दुकान बनाने के लिए किश्तों में पैसा मिलने से दुकानें बन सकती हैं। दुकानों से प्रति माह किराया भी आएगा, जिससे कर्मचारियों का वेतन नियमित दिया जा सकता है। मैंने इस योजना को मूर्त रूप दिया और नीलामी में इतना रुपया आया कि टेबल क्लॉथ निकाल कर रुपया बांधकर बैंक में जमा करवाया। ऐसे दो बाज़ार उस समय बन गए।
शहर के मकानों पर संपत्ति कर लगता है, बिजली, पानी और सफ़ाई कर लगता है, लेकिन चुने हुए राजनेताओं को वोट लेना होता है, तो वे सख्ती से वसूली नहीं करवा पाते थे। मुझे तो वोट लेना नहीं था। मैंने बहुत सख्ती से वसूली कराना शुरू किया। बकायेदारों की संपत्ति कुर्क करना शुरू किया। नगर पालिका के कर्मचारियों-अधिकारियों को इस काम में बहुत दिक्कत हो रही थी। उनकी शिकायतें होतीं, जाँच होती और ट्रांसफर होता। सबसे ज़्यादा लोग ट्रांसफर से डरते थे।
सरकार में यदि आप ज़्यादा काम करेंगे तो ज़्यादा शिकायतें होती हैं, जाँच होती है, दंड मिलता है और ट्रांसफर होता है। इसीलिए सरकारी कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा कम काम किया जाता था, जिससे कम शिकायतें होती थीं, कम जाँच होती थी, कम दंड मिलता था और कम ट्रांसफर होता था। लोग कम नाराज़ होते थे। लोग ऐसे अधिकारी को "गऊ" कहते थे- "सीधा-सादा कथरी ओढ़के घी पीता और गोबर करता।" फर्जी प्रोग्रेस दिखाता था।
तो हुआ यह कि नगर पालिका के कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा आर्च बिशप का बंगला कुर्क कर ताला लगा दिया गया। चर्च की बिल्डिंग्स पर बहुत बड़ी राशि का संपत्ति कर बकाया था। उन्होंने कई सालों से टैक्स जमा नहीं किया था। लोग मेरे पास आए।
क्रिश्चियन समुदाय के लिए आर्च बिशप बहुत बड़ा सम्मानित व्यक्ति होता है। उन्होंने मुझसे ताला खुलवाने का अनुरोध किया। मैंने मना कर दिया और कहा कि पैसा जमा कर दो, ताला खोल देंगे। आर्च बिशप ने ताला खोलने के लिए राजनैतिक तथा मानसिक दबाव डाला। अधिकारियों और कर्मचारियों पर काम का दबाव बनाए रखने के लिए मैंने उनका पक्ष लिया। शुरू में मेरा सरनेम 'पस्तोर' देखकर लोगों को लगा कि मैं क्रिश्चियन समुदाय का हूँ, तो उन्होंने धार्मिक दबाव डाला। जब कई दिन तक कुछ नहीं हुआ, तो दबाव डालने के लिए क्रिश्चियन समुदाय ने हड़ताल कर दी।
कमलनाथ जी से शिकायत कर दी कि नगर पालिका के अधिकारियों और कर्मचारियों ने क्रिश्चियन समुदाय के धर्मगुरु आर्च बिशप का अपमान किया है। कमलनाथ जी ने 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से लोकसभा चुनाव जीता था। वे छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से बार-बार सांसद चुने गए, जो उन्हें सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले लोकसभा सदस्यों में से एक थे। केंद्रीय मंत्री के रूप में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही थी।
कमलनाथ जी ने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार सँभाला था। क्रिश्चियन समुदाय ने कमलनाथ जी से शिकायत कर दी। कमलनाथ जी ने मुझे तथा कलेक्टर को बुलाया। हम लोग गए। मैंने बहुत दृढ़ता से नगर पालिका का पक्ष रखा। मेरे कलेक्टर और कमलनाथ जी ने नगर पालिका की कार्यवाही को सही माना। वसूली हुई।
राजनीति के रंग और ब्यूरोक्रेसी के तंत्र
कमलनाथ जी ने जनता से प्राप्त पत्रों को उनकी अनुशंसा के साथ संबंधित विभाग को भेजने के लिए एक स्थानीय स्तर पर कार्यालय बनाया था, जहाँ प्राप्त पत्र को रजिस्टर कर संबंधित विभाग को भेजा जाता था और आवेदक को इस बात की सूचना जाती थी। कलेक्टर कार्यालय में शिकायत शाखा में मासिक प्रगति की समीक्षा होती थी। जब वे किसी गाँव में भ्रमण करते, तो उनका स्टाफ एक छोटा कार्ड बनाकर कमलनाथ जी को देता। वे उसे हथेली में छुपाकर उनमें से नाम लेकर कहते कि इस व्यक्ति ने मुझे पत्र लिखा था, उसका काम हो गया है। जब लोग उनका नाम सांसद के मुँह से उनके भाषण में सार्वजनिक रूप से सुनते, तो वे सांसद के दीवाने हो जाते थे।
जब कोई व्यक्ति दिल्ली जाता, तो जो बंगला उन्हें शासन से मिला था, उसमें रुक जाते थे। वे अपने निजी मकान में रहते थे। शासकीय बंगले को गेस्ट हाउस बना दिया गया था। वहाँ रुकने वाले को खाना भी फ़्री में मिलता था। यदि किसी को इलाज करवाना हो, तो दिल्ली के शासकीय हॉस्पिटल में भेजते थे। यदि किसी के पास रिटर्न टिकट के पैसे न हों, तो उनके सहायक मिगलानी जी उन्हें पैसा देते थे।
वे हमेशा पाँच-पाँच रुपये के नोट देते थे। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि बड़े नोट क्यों नहीं देते, तो उन्होंने बताया कि पाँच-पाँच रुपये के कम नोट भी गड्डी में बहुत दिखते हैं। लोग खुश हो जाते हैं। इसलिए पाँच-पाँच रुपये के नोटों को देते हैं। कई नेता उनके कुत्ते के साथ फ़ोटो खिंचवाकर सांसद से निकटता दिखाने के लिए साथ रखते थे। मुझे एक नेता ने बताया कि वह कमलनाथ जी का बहुत ख़ास है, तब उसने सबूत के तौर पर उनके पोमेरेनियन कुत्ते के साथ फ़ोटो मुझे दिखाया।
मैंने शहर में नागरिक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बहुत मेहनत की। शहर के हर वार्ड में समस्या निवारण सप्तम लगाना शुरू किया। नागरिकों के सहयोग से अनेक काम हाथ में लिए। रात में पैदल सड़कों पर चला, ताकि जान सकूँ कि स्ट्रीट लाइट पर्याप्त है या नहीं। मैंने जाना कि जब आप उसी सड़क पर अलग-अलग तरीक़े से चलते हैं, आपकी अनुभूति अलग-अलग होती है, जैसे पैदल, साइकिल, मोटरसाइकिल या कार से चलते हैं। जब पैदल चलोगे, तभी सड़क के गड्ढे और लाइट पर ध्यान जाता है। मैं रोज़ सुबह पाँच बजे सफ़ाई तथा पानी की सप्लाई देखने जाता था। इसका परिणाम यह हुआ कि लोग टैक्स भी आसानी से जमा करने लगे। जब काम होता है, तो काम बोलता है, लेकिन जब काम नहीं हो, तो आपको बोलना पड़ता है।
नगर पालिका की आर्थिक हालत के कारण इतने प्रभावशाली मंत्री और सांसद होने के बाद भी विकास के कोई काम नहीं हो पाते थे। विजय पाटनी जी सरकार में मंत्री थे। वे छिंदवाड़ा के रहने वाले थे। उनकी रुचि नगरपालिका के कामों में बहुत रहती थी। उन्होंने स्थानीय प्रशासन मंत्री शर्मा जी से कुछ विकास कार्यों के लिए राशि आवंटित करने का अनुरोध किया।
मंत्री जी ने मुझे प्रस्तावों के साथ बुलाया। मैं प्रस्ताव लेकर गया। जब मैं वल्लभ भवन मंत्रालय, भोपाल में शर्मा जी से मिलने गया, तो मंत्री जी ने अंदर कमरे में बुलाया। मैंने देखा वे धोती-कुर्ता पहनकर दोनों पैर ऊपर कुर्सी पर किए बैठे हैं। उनकी धोती घुटनों तक थी, आधे पाँव दिख रहे थे। माथे पर टीका लगाया था और आँखें बंद किए बैठे थे। वे छत्तीसगढ़ से आते थे। मैंने नमस्कार किया। उन्होंने बैठने का इशारा किया। मैं बैठ गया।
उन्होंने आँखें बंद किए ही मुझसे प्रस्तावों के बारे में पूछा। मैं बड़े उत्साह से चार-पाँच कामों के प्रस्ताव लेकर गया था, जो तीन करोड़ के थे। मंत्री जी ने आँखें बंद किए ही कहा, "पाँच लाख रुपया दे रहा हूँ। छिंदवाड़ा को चमन बना देना।" उन्होंने आँखें नहीं खोलीं। कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा। मैं कुछ नहीं बोला, वापस छिंदवाड़ा आ गया।
छिंदवाड़ा में हमारे एक सीनियर साथी थे, एम.एल. मित्तल, जो एडिशनल कलेक्टर थे। वे राजस्व अधिकारी की प्रतिमूर्ति थे। विभागीय जाँचों के कारण उनका प्रमोशन नहीं हो सका। उनके जूनियर आई.ए.एस. बन गए थे, इसलिए वे बहुत अधिक फ़्रस्ट्रेटेड रहते थे। वे कलेक्टर के समकक्ष सीनियर थे और कलेक्टर से उनकी बनती नहीं थी। शाम को शराब की महफ़िल जमती थी।
हमारे पास सरकारी गाड़ी थी, उन्हें नहीं मिली थी, इसलिए वे हमारे साथ भोपाल जाते थे। एक बार भोपाल में वे उस बाबू के घर मुझे लेकर गए, जो सामान्य प्रशासन विभाग में हम लोगों की स्थापना का काम देखता था। नाम था करीम बाबू। सरकारी मकान में रहते थे। मित्तल साहब के कई काम वही देखता था।
जब हम उनके घर में बैठे, मैंने देखा कि हर अधिकारी की पूरी कुंडली उन्हें मौखिक याद थी- नाम, पता, गृह ज़िला, पद, स्थान, कब से पदस्थ हैं, विभागीय जाँच आदि सभी जानकारियाँ। मैं पहली बार इस तरह के ज्ञानवान व्यक्ति से मिला था। करीम मियाँ ने कहा, "कभी कोई काम हो तो मुझसे मिलो।" मिस्टर मित्तल उन्हें उनके प्रकरणों में मदद करने के बदले हर माह कुछ पैसा देते थे। कितना, मुझे कभी बताया नहीं।
एक युग का अंत और नए युग की शुरुआत
इस बीच तिवारी जी, कलेक्टर साहब, का स्थानांतरण उज्जैन कलेक्टर के रूप में हो गया। राम सिंह नए कलेक्टर बनकर छिंदवाड़ा आ गए। नगर पालिका प्रशासक होने के नाते परंपरानुसार मैंने उनका फ़ेयरवेल नगर पालिका कार्यालय में रखा।
जब वे अपने संबोधन में कह रहे थे, "जब मैं यहाँ आया, तब मेरे पास कुछ नहीं था। अब आपका ढेर सारा प्यार लेकर जा रहा हूँ।" तभी पीछे से कोई धीरे से बोला, "और चार ट्रक सामान भी ले जा रहा हूँ।"
यह उन्होंने सुन लिया। उनका चेहरा लाल हो उठा। सच्ची बात हमेशा बहुत ज़ोर का तमाचा मारती है। नए कलेक्टर राम सिंह पहली बार कलेक्टर बने थे। बहुत समय दिल्ली में रहने के बाद वे मध्य प्रदेश लौटे थे।
यह तो केवल एक अध्याय का अंत था। क्या आप जानना चाहेंगे कि नए कलेक्टर राम सिंह के साथ मेरा अनुभव कैसा रहा? मैंने सक्सेना जी की ओर देखा। उन्होंने हां में सर हिलाया।
अमरवाड़ा का दोहरी मोर्चा
मैं इस समय एस.डी.एम. अमरवाड़ा था और नगर पालिका प्रशासक छिंदवाड़ा भी था। दोनों जगहों की दूरी चालीस किलोमीटर से अधिक थी। मैं अमरवाड़ा में रहता था। बच्चे बड़े हो रहे थे और अमरवाड़ा में कोई अच्छे स्कूल नहीं थे, इसलिए परिवार की चिंताएँ बढ़ रही थीं। उधर, नगर पालिका छिंदवाड़ा में हमेशा कोई न कोई इमरजेंसी बनी रहती थी। जैसे घर-गृहस्थी में हम एक घर की व्यवस्था देखते हैं, उसी तरह नगर पालिका के माध्यम से पूरे शहर की व्यवस्था देखनी होती थी। नए कलेक्टर की रेपुटेशन बहुत अच्छी नहीं थी, और उनका दबाव मेरे ऊपर साफ़ दिखाई देता था।
जब मैं मासिक बैठकों में जाता, कलेक्टर मुझे कहते, "तुम्हारी बहुत शिकायत आ रही है।"
मैं पूछता, "क्या हैं शिकायतें?" वे कभी नहीं बताते।
बैठकों में लगातार यह बात होती रही। मैं एक बहुत गरीब क्षेत्र में काम कर रहा था। मुझे श्रीलाल शुक्ल का उपन्यास 'राग दरबारी' और मोहन राकेश की कहानी 'परमात्मा का कुत्ता' याद आती। मैं बहुत मेहनत कर रहा था, पर कलेक्टर संतुष्ट नहीं थे। मैंने उन्हें अमरवाड़ा से हटाने को कहा, तो स्थानांतरण भी नहीं कर रहे थे।
उनका बहुत दबाव था। मेरे मित्र, फूड ऑफिसर पटेल जी थे। मैंने उनसे सलाह ली, "क्या करूँ? लगता है, एकाध दिन कलेक्टर से मारपीट हो जाएगी।"
उन्होंने कुछ पैसा कलेक्टर को देने का सुझाव दिया। मैंने कभी किसी कलेक्टर को इस तरह पैसा नहीं दिया था। उन्होंने बताया कि यह कलेक्टर तो दफ़्तर के बाबुओं से उनकी पोस्टिंग का पैसा ले लेता है, जबकि उनकी पत्नी भी इनकम टैक्स इंस्पेक्टर थीं।
कोई कमी न थी, पर लालच अपार था। वे बातें बहुत अच्छी करते थे। जो जितना भ्रष्ट होगा, वह उतनी ही ईमानदारी की बात करेगा यह मानव स्वभाव है।
मेरी आय के दो साधन थे एक वेतन और दूसरा टी.ए. (यात्रा भत्ता) डी.ए. (महंगाई भत्ता)। वेतन घर खर्च के लिए पत्नी को देता था। तभी मुझे दो महीने का टी.ए. डी.ए. मिला था।
पटेल जी ने राय दी कि शाम को कलेक्टर बंगले जाना। एक कागज़ के लिफाफे में रुपया रखकर दे देना। मैं शाम को ऐसा ही किया। उन्होंने नहीं पूछा कि मैं किस बात का पैसा दे रहा हूँ। हम दोनों कमरे में अकेले थे। मैंने काँपते हाथों से लिफाफा दिया। उन्होंने नज़रें नीची कर लिफाफा लेकर जेब में रख लिया।
मेरे लिए चाय बुलाई। मेरा मेहनत का पैसा जा रहा था। मैंने हिम्मत करके कहा, "सर, मेरी आय के दो साधन हैं एक वेतन और दूसरा टी.ए. डी.ए.। वेतन घर खर्च के लिए पत्नी को देता हूँ। टी.ए. डी.ए. का पैसा आपको दे दूँगा। आप अमरवाड़ा के लोगों से मिलते हैं, उनसे मेरे बारे में पूछ लेना कि मैं रिश्वत लेता हूँ या नहीं, पर आप बार-बार मीटिंग में शिकायत की बात करते हैं, मुझे बहुत बुरा लगता है।" उनका चेहरा लाल हो गया।
उन्होंने लिफाफा निकालकर मुझे लौटा दिया। बोले, "कोई बात नहीं।" मैंने उनसे अनुरोध किया कि या तो मुझे एस.डी.एम. अमरवाड़ा रखें या नगर पालिका प्रशासक छिंदवाड़ा। दो जगह का काम करना मुश्किल हो रहा है। छिंदवाड़ा के एस.डी.एम. मनीष श्रीवास्तव थे, उन्हें हटाना था। तो कुछ दिन बाद मुझे एस.डी.एम. छिंदवाड़ा और प्रशासक नगर पालिका छिंदवाड़ा पदस्थ कर दिया।
उन्होंने फिर कभी मुझसे पैसे की उम्मीद नहीं की। हमारी अच्छी दोस्ती हो गई। उनकी पत्नी की पोस्टिंग दिल्ली में थी। उनका परिवार वहीं था। वे अकेले रहते थे। अक्सर हम दोनों घंटों बातें करते थे।
मैं हमेशा उनसे उनके लालच की बात करता, पर उन्हें पैसे की लत लग गई थी। यह ज़रूरत नहीं थी, एडिक्शन था। नोटों की ख़ुशबू किक देती है। एड्रिनलीन हार्मोन ख़ुशी देता है।
एक दफ़े उन्होंने एक टेप रिकॉर्डर देखने के लिए कहीं से लाने को कहा। नगर पालिका का प्रशासक होने के कारण दुकानदारों से परिचय था। एक दुकानदार उन दिनों गानों तथा फ़िल्मों के कैसेट डुप्लीकेट करके बेचता था। उसके पास पैनासोनिक कंपनी का एक बड़ा, दो कैसेट वाला टेप रिकॉर्डर था। वह मैं लाकर उनके बंगले पर लगवा दिया।
दुकानदार से दो दिन के लिए माँगा था, लेकिन एक सप्ताह हो जाने के बाद भी कलेक्टर ने उसे वापस नहीं किया। एक दिन जब वे टूर पर बाहर गए थे, मैं कलेक्टर बंगला गया और वह टेप रिकॉर्डर उठाकर दुकानदार को वापस किया। उसके धंधे का नुकसान हो रहा था।
तभी जब आप उनके बारे में गूगल करेंगे, तो ऐसी जानकारी नेट पर उपलब्ध है:
"एक ख़बर में 'राम सिंह' नाम के एक आई.ए.एस. अधिकारी का उल्लेख है, जिन्हें 2014 में मध्य प्रदेश में सेवा से बर्ख़ास्त किया गया था। यह ख़बर बताती है कि राम सिंह (1972 बैच के आई.ए.एस. अधिकारी) को 22 साल पहले, जब वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली मिल्क सप्लाई के महाप्रबंधक के रूप में तैनात थे, रिश्वत लेते हुए सी.बी.आई. ने पकड़ा था। उन्हें बाद में पाँच साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई गई थी।"
सहकारिता चुनाव का पाप
ज़िला सहकारी बैंक के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होना था। बैठक की अध्यक्षता करने के लिए तत्कालीन कलेक्टर राम सिंह ने मुझे नियुक्त किया था। यह सहकारिता क्षेत्र के महत्वपूर्ण चुनावों में से एक होता है। यह चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत होता है, जिसमें विभिन्न स्तरों पर सदस्यों द्वारा प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है और अंतिम यही प्रतिनिधि अध्यक्ष का चुनाव करते हैं। प्राथमिक सहकारी समितियों के चुनाव सबसे पहले प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों के सदस्यों का चुनाव होता है।
ये समितियाँ ग्रामीण स्तर पर किसानों और अन्य लोगों को ऋण और अन्य सहकारी सेवाएँ प्रदान करती हैं। ज़िला सहकारी बैंक के निदेशक मंडल का चुनाव प्राथमिक सहकारी समितियों से चुने गए प्रतिनिधि, ज़िला सहकारी केंद्रीय बैंकों के निदेशक मंडल के सदस्यों का चुनाव करते हैं। ये निदेशक मंडल ही बैंक के संचालन और नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव अंत में, ज़िला सहकारी बैंक के निर्वाचित निदेशक मंडल के सदस्य ही मिलकर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। कई बार यह चुनाव निर्विरोध भी हो जाता है, ख़ासकर यदि किसी एक दल का बहुमत स्पष्ट हो। अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार को संबंधित सहकारी बैंक या प्राथमिक सहकारी समिति का सदस्य होना चाहिए। कुछ विशिष्ट अयोग्यताएँ भी होती हैं, जैसे कि यदि उम्मीदवार किसी अन्य सहकारी संस्था का चूककर्ता/डिफॉल्टर हो, या उस पर किसी प्रकार के वित्तीय दुर्विनियोग का आरोप हो। नामांकन पत्र दाख़िल करते समय प्रस्तावक और अनुमोदक का होना आवश्यक होता है, जो उसी निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित होते हैं।
नियमानुसार, अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए कुछ सीटें आरक्षित हो सकती हैं। ज़िला सहकारी बैंकों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये बैंक किसानों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय समुदायों को वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। इसलिए, इनके अध्यक्ष का चुनाव काफ़ी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि अध्यक्ष की भूमिका बैंक के समग्र विकास, वित्तीय सुदृढ़ता और सदस्यों के हितों की रक्षा में अहम होती है।
छिंदवाड़ा के एक और मंत्री थे, रेवनाथ चौरे। वे सौंसर तहसील के रहने वाले थे। साथ ही, छिंदवाड़ा ज़िले के प्रभारी मंत्री थे। जिस दिन चुनाव होने थे, उस रात लगभग एक बजे मुझे कलेक्टर का संदेश आया कि मंत्री जी सर्किट हाउस में बुला रहे हैं। जब मैं सर्किट हाउस पहुँचा, वहाँ मैंने देखा कि मंत्री जी अंदर खाना खा रहे हैं।
कलेक्टर तथा पुलिस एस.पी. बाहर लॉन में घूम रहे हैं। मुझे लेकर कलेक्टर एक कोने में गए। मेरे हाथ में एक सूची दी और बोले कि यदि ये लोग कल ज़िला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरें, तो निरस्त कर देना। मैं उनकी बात सुनकर चौंक गया। मैंने कहा, "यह ज़िला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद का चुनाव है। मैं बिना किसी गलती के नामांकन कैसे निरस्त कर सकता हूँ?" वे बहुत देर तक समझाते रहे। जब मैं नहीं माना, तो मुझे लेकर अंदर मंत्री जी के पास गए।
मंत्री जी से बोले, "यह बात नहीं मान रहा है।" मैंने अपनी बात दुहरा दी। मंत्री जी बोले, "यदि कोई गलती न भी हो, तो तुम नामांकन पेपर पर स्याही गिरा देना और फिर निरस्त कर देना।" मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मैंने साफ़ शब्दों में कहा, "मुझे चुनाव प्रभारी पद से हटा लें। नियमानुसार, कलेक्टर को ही बैठक की अध्यक्षता करना चाहिए। यदि कलेक्टर मंत्री जी की बात से सहमत हैं, तो वे स्वयं यह कर सकते हैं। नहीं तो किसी दूसरे डिप्टी कलेक्टर को नियुक्त कर दें।"
आख़िरकार रात दो बजे मुझे हटाकर एक दुबे जी, डिप्टी कलेक्टर, को प्रभारी बनाया गया। उन्होंने उन दोनों के मुताबिक चुनाव करवा दिया। कुछ महीनों बाद दुबे जी रिटायर हो गए। वे जबलपुर के रहने वाले थे। एक बार मैं उच्च न्यायालय के काम से जबलपुर गया। दुबे जी एक बेंच पर बैठे दिखे। मैं उनके पास गया, नमस्ते की। पूछा, "क्या हाल है?" वे बोले, "ज़िला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन निरस्त करने के प्रकरण में मुझे व्यक्तिगत पक्षकार बनाया है, उसी पाप की सज़ा भुगत रहा हूँ।"
मैं पाँच साल नगर पालिका प्रशासक छिंदवाड़ा के पद पर रहा। एक साल बाद चालीस किलोमीटर दूर अमरवाड़ा में एस.डी.एम. के पद पर पोस्टिंग कर दी। लेकिन छिंदवाड़ा की जनता ने मुझे प्रशासक पद से हटाने को लेकर हड़ताल कर दी, तब कलेक्टर ने मुझे प्रशासक छिंदवाड़ा और एस.डी.एम. अमरवाड़ा बनाया। इस सब-डिवीज़न में उस समय छिंदवाड़ा ज़िले के अमरवाड़ा, हर्रई और चौरई तहसीलें आती थीं। ये तीनों महत्वपूर्ण क्षेत्र थे जो अपनी भौगोलिक स्थिति, आदिवासी संस्कृति और कुछ विकास चुनौतियों के लिए जाने जाते थे। अमरवाड़ा छिंदवाड़ा ज़िले के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह क्षेत्र सघन आदिवासी आबादी वाला और काफ़ी हद तक पथरीला भूभाग है।
अमरवाड़ा एक नगर पालिका परिषद थी और एक विधानसभा क्षेत्र भी था। अमरवाड़ा और हर्रई के इलाके अक्सर पानी की समस्या से जूझते हैं, ख़ासकर गर्मियों में। इसका एक कारण पथरीली चट्टानें और तालाबों का कम निर्माण बताया जाता है। अमरवाड़ा के औद्योगिक हब बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे थे। यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण था।
हर्रई छिंदवाड़ा ज़िले का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो अमरवाड़ा के पास स्थित है। यह भी आदिवासी बहुल और पथरीला इलाका था। कुछ स्रोतों में हर्रई में एक क़िले का उल्लेख भी मिलता है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। चौरई छिंदवाड़ा ज़िले में स्थित एक नगर है। राष्ट्रीय राजमार्ग 347 यहाँ से होकर गुज़रता है। चौरई से छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा और सिवनी की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है।
यह एक विधानसभा क्षेत्र भी है। बिछुआ और चाँद तहसीलें भी चौरई विधानसभा क्षेत्र में शामिल हैं। ये तीनों ही क्षेत्र छिंदवाड़ा ज़िले के आदिवासी बहुल इलाकों में आते हैं, जहाँ गोंड और अन्य आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। मुख्य रूप से कृषि पर निर्भरता है, जिसमें मक्का, चावल और अन्य स्थानीय फ़सलें उगाई जाती थीं। पथरीले इलाकों के कारण भूजल स्तर में कमी और पेयजल संकट एक सामान्य समस्या थी।
उस समय यह क्षेत्र छिंदवाड़ा ज़िले के सबसे गरीब इलाके थे। अमरवाड़ा तहसील कार्यालय एक छोटी-सी पहाड़ी पर था। एस.डी.एम. तथा तहसीलदार के घर ऊपर ही बने थे। एक जैन साहब मेरे तहसीलदार थे, बहुत बुज़ुर्ग, अनुभवी तथा कम बोलने वाले थे। उस समय वहाँ नॉन-बैंकिंग ट्रेज़री थी।
नक़द रुपया तहसील के स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। प्रतिदिन डिनोमिनेशन वार नोटों की गिनती कर रखते थे। तहसीलदार उसके प्रभारी थे। साल में दो बार एस.डी.एम. को फ़िजिकल निरीक्षण करना होता था। जब मेरी टीम ने निरीक्षण किया, तो डबल लॉक में चालीस लाख रुपया कम था। अकाउंटेंट से पूछने पर उसने वह रसीद मुझे दिखाकर बताया कि रुपया तहसीलदार को फ़सल नुकसानी का मुआवज़ा किसानों को बाँटने के लिए नक़द दिया है।
मैंने जब उस रसीद को देखा, तो वह किसी पेज का फटा हुआ टुकड़ा था। अधिकारी कई बार जब किसी कागज़ पर हस्ताक्षर करते हैं, तो आधा पेज टाइप का होता है तथा बाबू सील बहुत नीचे लगाते हैं। बीच में कुछ हिस्सा ख़ाली होता है। यह रसीद इसी तरह का पेज फाड़कर बनाई थी।
आलस और विश्वास के कारण तहसीलदार रोज़ डबल लॉक में नोटों की गड्डियों की गिनती नहीं करते थे। कई-कई दिनों तक कैश बुक पर हस्ताक्षर नहीं करते थे। इसी का फ़ायदा अकाउंटेंट ने उठाया था। तहसीलदार ने बताया कि अभी बहुत महीनों से कोई मुआवज़ा नहीं बाँटना था। उन्होंने नक़द रुपया नहीं लिया। अक़्सर चालाक बाबू उस समय अधिकारी को फ़ाइल हस्ताक्षर के लिए लाते हैं, जब या तो वह किसी और उलझन में फँसे हों या गाड़ी में बैठकर कहीं जाने वाले हों।
तब अधिकारी बिना पढ़े हस्ताक्षर कर देता है और फँस जाता है। यह नहीं करना चाहिए। किसी पर भरोसा नहीं। सबको शक से देखो। पढ़कर हस्ताक्षर करो। यदि कोई अनायास अधिक झुककर नमस्ते करे, तारीफ़ करे या मुफ़्त का सामान दे, समझो यह ट्रैप है। मछली को पकड़ने का काँटा है। मानव स्वभाव को समझो। मुफ़्त में कुछ नहीं मिलता है। हमेशा सतर्क रहना चाहिए।
इस तरह की घटना की तत्काल रिपोर्ट करना आवश्यक होता है। मैंने कलेक्टर को रिपोर्ट भेजकर पुलिस बुला ली। पुलिस की पूछताछ में अकाउंटेंट ने बताया कि वह जुए में बहुत सारा पैसा हार गया था। उसने एक कागज़, जिस पर नीचे तहसीलदार के दस्तख़त थे, डबल लॉक में रखा था, जिस पर चालीस लाख रुपया नक़द तहसीलदार को देने की रसीद थी।
अकाउंटेंट के घर से दस लाख नक़द बरामद हुआ। पाँच लाख उधारी चुका दिया था, उससे बरामद हुआ। पाँच लाख घर में सामान लाने में ख़र्च किया था। वह पैसा तहसीलदार ने जमा किया, तब पुलिस प्रकरण नहीं बना। तहसीलदार सस्पेंड होने से बच गए। वे रिटायर होने वाले थे। यदि सस्पेंड हो जाते, तो पेंशन रुक जाती।
वकील का रहस्य और पी.डी.एस. का जाल
मेरा ऑफ़िस पहाड़ी के किनारे था। मेरी खिड़की से नीचे की सड़क दिखती थी। रोज़ मैं देखता, वकील नीचे से ऊपर ऑफ़िस में मोटी-मोटी क़ानून की किताबें अपने क्लाइंट के सिर पर लदवाकर ऊपर लाते। जब मैं कोर्ट में बहस सुनता, तब कभी-कभी किताब खोलकर कोई पूर्व का फ़ैसला रेफ़रेंस के लिए दिखाते। कभी-कभी बस्ता लाते और उसी व्यक्ति के सिर पर लदवाकर वापस ले जाते।
एक वकील साहब थे, नेमा जी। मेरी उनसे बातचीत होती थी। एक दिन मैंने पूछा कि आप लोग जब ज़रूरत नहीं होती, तो इतनी किताबें क्यों लदवाकर लाते हैं? उन्होंने मुझे वकालत का बिज़नेस सीक्रेट बताते हुए राज़ की बात बताई कि यहाँ लोग पढ़े-लिखे नहीं हैं, तो यहाँ के वकील उनकी फ़ीस किताबों की संख्या के आधार पर निश्चित करते हैं।
जब कोई केस लेकर वकील के पास आता, वह कहते, "कितनी किताबों की वकालत लगवानी है दो की, तीन की या चार से अधिक किताबों की?" व्यक्ति अपनी हैसियत से किताबों की संख्या बताता और वकील फ़ीस। इसलिए हम लोग उतनी किताबें लदवाकर लाते हैं। यदि किताबें लादकर व्यक्ति पहाड़ी नहीं चढ़े, तो उसे संतोष नहीं होगा और वकील को फ़ीस नहीं मिलेगी। ऐसी अनोखी व्यवस्था मुझे और कहीं देखने को नहीं मिली।
उन दिनों हर्रई का क्षेत्र इतना गरीब था कि सरकारी कर्मचारी रिश्वत में जानवर लेते थे। इन दिनों मैं लगातार पाँच दिन टूर करता। ऐसे-ऐसे दूरदराज़ के गाँवों में जाता, जहाँ सड़कें नहीं थीं, जंगल के कच्चे रास्ते थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सामान कोऑपरेटिव और प्राइवेट दुकानों में भेजने का ठेका मिस्टर बत्रा का था। वह ज़िला बीस-सूत्रीय समिति के सदस्य भी थे। उनके ट्रक जब फूड कॉरपोरेशन ऑफ़ इंडिया के छिंदवाड़ा गोदाम से शक्कर, गेंहू और चावल भरते, तो कुछ ट्रक तो हर्रई जाते और कुछ का सामान छिंदवाड़ा में ही व्यापारियों को कालाबाज़ारी में बेच देते थे।
जब मैं दुकान की जाँच करता, तो अधिकांश जगह दुकानें नौकर चला रहे होते थे, जिनके नाम दुकानें आवंटित थीं, वह कभी नहीं मिलते। मिस्टर बत्रा न जाने क्यों इस बात की शिकायत हर ज़िला बीस-सूत्रीय समिति की बैठक में ख़ुद करते।
मैंने बहुत दिनों तक जाँच की, तब पता चला कि गरीब आदिवासियों के नाम पूरी तहसील की प्राइवेट दुकानें आवंटित हैं, लेकिन वे सभी दुकानदार वास्तव में मिस्टर बत्रा के नौकर थे। इस तरह उन्होंने पूरी सप्लाई चेन हाईजैक की हुई थी। दुकानें मिस्टर बत्रा के नौकरों के नाम, परिवहन का ठेका मिस्टर बत्रा का, ट्रक मिस्टर बत्रा के और शिकायतकर्ता भी मिस्टर बत्रा! उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई इतने दुर्गम क्षेत्रों में जाकर इतनी गहराई से जाँच करेगा।
उस समय वहाँ के विधायक भी आदिवासी समुदाय से थे। उनका चुनाव का फ़ंडिंग भी मिस्टर बत्रा करते। मज़ा तो तब आया जब विधायक जी और मिस्टर बत्रा एस.डी.एम. की गाड़ी से हर ज़िला बीस-सूत्रीय समिति की बैठक में भाग लेने जाते। रास्ते में आते-जाते सबको नाश्ता एस.डी.एम. करवाते। एस.डी.एम. गाड़ी में पीछे बैठते, विधायक जी आगे। ज़िला बीस-सूत्रीय समिति की बैठक में शिकायत एस.डी.एम. की। कलेक्टर से डाँट खाते एस.डी.एम.। यह सिलसिला मेरी पोस्टिंग से पहले से चल रहा था। मैंने सबसे पहले उन सबको अमरवाड़ा से छिंदवाड़ा अपनी गाड़ी से ले जाना बंद किया। फिर जाँच कर सबके विरुद्ध अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम में पुलिस केस दर्ज़ करवाया। सभी निजी दुकानें निरस्त कीं तथा परिवहन का ठेका समाप्त किया।
अब यह पूरी लॉबी मेरी शिकायत करने लगी। मैं एक दिन विधायक जी से समय लेकर रेस्ट हाउस में उनसे मिला। विधायक जी पहले पटवारी थे, पटवारी पद से रिजाइन कर विधायक बने थे। मिस्टर बत्रा कालाबाज़ारी कर जो कमाते, उसका बहुत छोटा हिस्सा उन्हें मिलता था। वे मेरी बात समझ गए कि वे छोटे से लालच में अपने वोटर और अपने समुदाय के लोगों का अहित कर रहे हैं।
वे बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे। उन्होंने मेरी शिकायत करना बंद कर दी। अमरवाड़ा विधायक जी का नियम था कि वे अपने क्षेत्र के बच्चों के जन्मदिन पर जाते और उन्हें उपहार देते थे। क्षेत्र की जनता से जुड़ने का उनका यह तरीक़ा अनोखा था। यदि आप किसी को प्रभावित करना चाहते हो, तो उसके बच्चे से प्यार करो, तो बच्चे की माँ प्रसन्न होगी। यदि महिला खुश है, तो वह अपने पति को खुश होने के लिए मना लेगी। फ़ॉर्मूला बिलकुल सीधा था।
दया बाई और करामात शाह
मर्सी मैथ्यू, जिन्हें 'दया बाई' के नाम से जाना जाता है, केरल की एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपना जीवन मध्य भारत के आदिवासियों, विशेषकर मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में रहने वाले गोंड समुदाय के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया। वह छिंदवाड़ा ज़िले के बरुल गाँव में रहती हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में स्कूलों और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं को लाने के लिए संघर्ष किया है और अभियान चलाए हैं। वह गरीबी उन्मूलन के लिए स्वयं सहायता समूहों की स्थापना से भी जुड़ी रही हैं।
दया बाई ने सामाजिक न्याय के लिए अपनी लड़ाई में कई आंदोलनों में भाग लिया है, जिनमें नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल रहा। उन्होंने बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के निवासियों और ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करते हुए कई एकल संघर्ष भी किए। उन्होंने 1971 के युद्ध के दौरान बांग्लादेशी शरणार्थियों की सेवा भी की। उन्हें 2007 में वनिता वुमन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड और जनवरी 2012 में गुड समैरिटन नेशनल अवॉर्ड सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।
उनका काम मुख्य रूप से सामाजिक सक्रियता और आदिवासी समुदायों के कल्याण पर केंद्रित रहा। वह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले के अमरवाड़ा क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों और कल्याण के लिए लगातार काम करती रही हैं। जब मैं छिंदवाड़ा तथा अमरवाड़ा में पदस्थ था, वह अक्सर मुझसे मिलने आती थीं। मैंने उनसे सीखा कि यदि किसी समुदाय में विश्वास पाना हो, तो उनके साथ उन्हीं जैसे रहना होगा, तभी उनकी समस्याओं को अनुभव कर सकते हो।
मेरे कमिश्नर थे दुबे जी। वे जबलपुर से टूर पर छिंदवाड़ा आते। एक दिन उन्होंने पूछा, "किरामत शाह बाबा को जानते हो?" मैंने ऐसे किसी बाबा का नाम नहीं सुना था। उन्होंने उनसे मिलने को कहा। मेरा भरोसा बाबा लोगों में बिल्कुल भी नहीं है। मैं मिलने नहीं गया। जब वे दोबारा जबलपुर से टूर पर छिंदवाड़ा आए, तो उन्होंने फिर पूछा। मैंने बहाना बनाया कि काम की व्यस्तता के कारण नहीं जा सका, जल्दी मिल लूँगा। वे फिर जबलपुर से टूर पर छिंदवाड़ा आने वाले थे। मैंने अपने स्टाफ़ से पूछा। उन्होंने बताया कि मोहखेड़ में एक करामात शाह बाबा रहते हैं।
गर्मियों के दिन थे। मैंने बाबा को सवारी से मिलने की ख़बर भेजी। ऐसे लोग शासकीय अधिकारियों से अच्छे से मिलते हैं। हम मिलने गए। बाबा का बहुत बड़ा अहाता बना था। वे एक बहुत बड़े कमरे में टी.वी. पर वी.सी.आर. पर कलर फ़िल्म देख रहे थे। मिडिल ईस्ट के देशों में उनके बड़े भक्त थे। उन्होंने बताया कि यह कालीन, टी.वी., वी.सी.आर. सब उन्हीं लोगों ने भेंट में दिए हैं। उन दिनों यह लेटेस्ट उपकरण थे, बहुत महँगे इम्पोर्टेड होते थे।
बाबा लोगों की समस्या के समाधान बताते थे। उन्हें लगा कि मैं कोई समाधान पूछने आया हूँ। उन्होंने मुझसे पूछा कि आपकी क्या समस्या है, बताइए। मैंने कहा, "मेरी कोई समस्या नहीं है, मैं तो श्रद्धावश केवल मिलने आया हूँ।" बाबा के पास लोग तभी जाते हैं, जब उन्हें कोई समस्या का समाधान चाहिए होता है।
जब मैंने उनसे कहा, "आप अंतर्यामी हैं, सब जानते हैं, आप ही बता दें।" बोले कि, "देखो, एक स्लेट रखी है और चाक रखी है, जब तक कोई हाथ लिखेगा नहीं, अक्षर नहीं उभरेंगे।" मैंने कोई समस्या नहीं बताई। उन्होंने पकोड़े खिलाए, चाय पिलाई। हम जाने लगे। दोनों खड़े थे। उन्होंने अपना हाथ हवा में घुमाया। एक ताज़ा गुलाब का फूल उनके हाथ में हवा में से आ गया। उन्होंने वह मुझे दिया। मैं वापस आ गया।
हमारे साथ छिंदवाड़ा में एक दुबे जी, सुपरिंटेंडेंट इंजीनियर, बिजली विभाग में थे। उन्हें कर्ण पिशाचिनी सिद्ध थी। कर्णपिशाचिनी साधना एक गूढ़ और रहस्यमयी तांत्रिक प्रथा है, और इससे जुड़े साधक आमतौर पर सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान या प्रथाओं का प्रचार नहीं करते हैं। कर्णपिशाचिनी साधना भारतीय तंत्र-मंत्र की एक अत्यंत गूढ़ और विवादास्पद साधना मानी जाती है।
यह साधना गुप्त शक्तियों और भविष्य जानने की क्षमता प्राप्त करने से जुड़ी हुई है। "कर्ण" का अर्थ है कान, और "पिशाचिनी" का अर्थ है एक प्रकार की पिशाचिनी या भूतनी। इस साधना का लक्ष्य एक ऐसी अदृश्य शक्ति या आत्मा को सिद्ध करना होता है, जो साधक के कान में भविष्य की बातें या गुप्त जानकारी फुसफुसाकर बताती है। इस साधना का मुख्य उद्देश्य भविष्य का ज्ञान प्राप्त करना और छिपी हुई बातों को जानना माना जाता है।
कहा जाता है कि सिद्ध होने पर कर्ण पिशाचिनी साधक को किसी भी व्यक्ति के बारे में, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में जानकारी दे सकती है, या किसी घटना के बारे में गुप्त जानकारी प्रदान कर सकती है।
वे हमें कई दफ़े मिठाई हवा से निकालकर देते थे। एक दिन पटेल साहब, फ़ूड अफ़सर को एक विशेष तरह का पुखराज चाहिए था, जो बाज़ार में नहीं मिल रहा था। दुबे जी ने हवा में से पुखराज निकालकर उन्हें मेरे सामने ऑफ़िस में दिया था। ऐसे तंत्र-मंत्र, ज्योतिष, भविष्यवक्ता, कुंडली और हस्तरेखा देखने वाले शासकीय अधिकारियों तथा नेताओं में बहुत पॉपुलर होते हैं। जो जितना अनिश्चितता भरा काम करता है, अनैतिक काम करता है या अपनी योग्यता से अधिक पा जाता है, वह इस सब बातों में अटूट भरोसा करता है। जब किसी कर्मचारी या अधिकारी के विरुद्ध कोई जाँच शुरू हो, सस्पेंड हो जाए, ट्रांसफर हो या रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़ा जाए, तो वह अपनी गलती नहीं मानता। वह शनि, राहु और केतु की ख़राब दशा मानता है। वह अपने आपको न सुधारकर ग्रहों की दशा सुधारने में लग जाता है।
छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश में बाबा करामत अली शाह दरगाह काफ़ी प्रसिद्ध है। यह दरगाह छिंदवाड़ा के टांसरा माल इलाके में स्थित है और इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है। यह दरगाह एक पवित्र स्थान है, जहाँ लोग अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए आते हैं। यहाँ प्रार्थना की जाती हैं और मन्नतें माँगी जाती हैं। यह स्थान शांति और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यह छिंदवाड़ा के स्थानीय लोगों और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र है।
यह कहानी का दूसरा भाग है, जो प्रशासनिक जीवन की जटिलताओं और नैतिक संघर्षों को दर्शाता है। क्या आप कहानी को आगे बढ़ाना चाहेंगे? सक्सेना जी के पूछने पर मैंने आगे की कहानी सुनना शुरू किया।
अनुसुइया उइके से भेंट और प्रशासनिक चुनौतियाँ
अनुसुइया उइके का छिंदवाड़ा से गहरा नाता है। यह उनका गृह ज़िला है और उन्होंने यहीं से अपनी छात्र राजनीति और राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। अनुसुइया उइके ने अर्थशास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की है। राजनीति में आने से पहले, उन्होंने 1982 से 1985 तक शासकीय महाविद्यालय तामिया में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।
जब मैं छिंदवाड़ा में कार्यरत था, तब अनुसुइया उइके शासकीय महाविद्यालय तामिया में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य कर रही थीं। उस समय मेरी उनसे मुलाकात हुई। शुरुआत के दिनों में हम लोग आदिवासियों की समस्याओं पर बात करते थे। बाद में वह शासकीय महाविद्यालय तामिया के सहायक प्राध्यापक के पद को छोड़कर राजनीति में आ गईं। वह विधायक, मंत्री और बाद में छत्तीसगढ़ और मणिपुर का राज्यपाल नियुक्त की गईं।
मैं एस.डी.एम. छिंदवाड़ा का कार्यभार ग्रहण कर चुका था। परिवार को अमरवाड़ा से छिंदवाड़ा शिफ़्ट किया। बच्चों को स्कूल में एडमिशन करवा दिया। छिंदवाड़ा में बहुत अच्छे स्कूल थे। अब मेरे पास प्रशासक नगर पालिका तथा एस.डी.एम. छिंदवाड़ा का कार्यभार था। मैं बहुत मेहनत से दोनों काम कर पा रहा था, पर एक नई चुनौती मेरे सामने आ खड़ी हुई थी।
तामिया का सौंदर्य और विकास की विडंबना
छिंदवाड़ा ज़िले में "तामिया" एक बहुत ही ख़ूबसूरत और महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक गाँव और उसी नाम की तहसील का मुख्यालय है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। इसे अक्सर "मिनी पचमढ़ी" भी कहा जाता है। तामिया सतपुड़ा पर्वतमाला में स्थित है और घने जंगलों, गहरी घाटियों और पहाड़ों के लुभावने दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ से सूर्योदय और सूर्यास्त के नज़ारे बेहद मनमोहक होते हैं। मानसून के दौरान इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है, जब झरने पूरी तरह से बहते हैं और पूरा इलाका बादलों से ढका रहता है। तामिया के पास पातालकोट घाटी एक प्रमुख आकर्षण है। यह घोड़े की नाल के आकार की एक अनोखी भौगोलिक संरचना है, जिसकी गहराई 1200 से 1500 फ़ीट तक है। यह घाटी भारिया जनजाति का निवास स्थान भी है, जो अपनी विशिष्ट जीवन शैली और पारंपरिक ज्ञान के लिए जाने जाते हैं।
मुझे तामिया के इन आदिवासियों के लिए संचालित प्रोजेक्ट का कार्यभार दिया गया। भारत सरकार इन भारिया जनजाति लोगों के लिए खाना पकाने के लिए सोलर कुकर तथा पानी छानने के लिए वाटर फ़िल्टर देना चाह रही थी। मैंने बताया कि पातालकोट घाटी अपनी अनूठी भौगोलिक संरचना और भारिया जनजाति के निवास स्थान होने के कारण सभी लोग सुबह जल्दी उठकर खाना बनाकर साथ काम पर ले जाते हैं।
इस घाटी में गहरा गड्ढा होने के कारण सुबह सूर्य की किरणें देर से आती हैं। इस कारण सोलर कुकर पर खाना बनाना इनके लिए संभव नहीं है। लेकिन भारत सरकार ने भारिया जनजाति को मध्य प्रदेश में "विशेष पिछड़ी जनजाति" का दर्ज़ा दिया है। इनके समग्र विकास और उत्थान के लिए विभिन्न परियोजनाएँ और योजनाएँ चलाई जा रही हैं। पातालकोट के भारिया जनजाति के विकास का मुख्य उद्देश्य उन्हें मुख्यधारा में लाना, उनकी पारंपरिक संस्कृति और ज्ञान का संरक्षण करना, और उन्हें बेहतर जीवन-यापन के अवसर प्रदान करना है। इसमें कई आयाम शामिल हैं।
मध्य प्रदेश सरकार ने "हैबिटेट राइट्स" (Habitat Rights) के तहत भारिया जनजाति को पातालकोट का मालिक घोषित किया है। इसका मतलब है कि जल, जंगल, ज़मीन, पहाड़ और जलाशयों सहित प्राकृतिक संपदा पर अब भारिया समुदाय का हक़ होगा। यह निर्णय वन अधिकार अधिनियम के तहत आता है, जिसका उद्देश्य आदिवासियों को उनके पारंपरिक निवास स्थान और संसाधनों पर अधिकार दिलाना है। इससे भारिया समुदाय अपनी ज़रूरतों के लिए वनों का समुचित दोहन कर सकेगा और पातालकोट को संरक्षित रख पाएगा।
बुनियादी सुविधाओं के विकास के तहत स्वच्छ पेयजल: पातालकोट में स्वच्छ पेयजल की समस्या एक बड़ी चुनौती रही है। इस पर लगातार काम किया जा रहा है, हालाँकि दुर्गम भूभाग और चट्टानी संरचना के कारण यह कार्य चुनौतीपूर्ण है। भारत सरकार की ओर से सोलर कुकर तथा वाटर फ़िल्टर के कैंडल लगी प्लास्टिक की बाल्टी दे दी गई।
कुछ दिन बाद भारत सरकार के संयुक्त सचिव इस परियोजना की प्रगति का मूल्यांकन करने आए। जब उन्हें 1500 फ़ीट नीचे पैदल जाने के बारे में पता चला, तो उन्होंने नीचे जाने से मना कर दिया। मेरे बहुत ज़ोर देने पर वह पैदल चलकर जब नीचे पहुँचे, तब उन्हें बहुत भूख लग गई। आदिवासियों ने उन्हें सेम फ़ली के बीज उबालकर खाने को दिए।
जब उन्होंने महिलाओं से सोलर कुकर दिखाने को कहा, तो महिलाएँ अपना-अपना बक्सा ले आईं। उन्होंने उसके अंदर के डब्बों में मसाले रख लिए थे। सोलर पेटी में अपना शृंगार का सामान रखा था। और उसके शीशे को मुँह देखने के काम ला रही थीं। वाटर फ़िल्टर के कैंडल निकालकर फेंक दिए थे तथा प्लास्टिक की बाल्टी में डामर लगाकर पानी भर रहे थे। दिल्ली से बनाई विकास योजना की प्रगति उनके सामने थी। अब वह समझ गए थे कि आदिवासियों को सोलर कुकर की जगह सामान रखने का बक्सा तथा पानी भरने के लिए बाल्टी ज़्यादा ज़रूरी थी।
जान राव भाऊ और रत्नों का आकर्षण
छिंदवाड़ा के पास एक गाँव है लिंगा। लिंगा गाँव छिंदवाड़ा नागपुर हाईवे पर है। वहाँ एक तांत्रिक ज्योतिषी थे, जान राव भाऊ। एक दिन ऑफ़िस आए। बोले, "उन्होंने अभी तक सभी एस.डी.एम. को पहनने के लिए रत्न जड़ित अंगूठी ग्रह शांति के लिए पहनाई है।" वह एक अंगूठी मेरे लिए लाए। यह पुखराज की अंगूठी थी।
उन्होंने बताया कि पुखराज रत्न मुख्य रूप से गुरु ग्रह बृहस्पति से संबंधित होता है। ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को ज्ञान, बुद्धि, धन, विवाह, संतान, शिक्षा, मान-सम्मान और आध्यात्मिकता का कारक ग्रह माना जाता है।
पुखराज धारण करने के ज्योतिषीय लाभ यह है कि गुरु ग्रह को मज़बूत करता है। यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह कमज़ोर या पीड़ित हो, तो पुखराज धारण करने से उसे बल मिलता है और गुरु के शुभ प्रभाव प्राप्त होते हैं। शिक्षा और ज्ञान में वृद्धि: यह छात्रों, शिक्षकों और ज्ञान के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है।
यह एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। आर्थिक समृद्धि लाता है। पुखराज धन आगमन के नए मार्ग खोलता है, व्यापार में लाभ मिलता है और आर्थिक समस्याओं से निजात दिलाने में सहायक होता है। वैवाहिक सुख: विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और वैवाहिक जीवन में ख़ुशहाली लाने के लिए इसे शुभ माना जाता है। संतान सुख: जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, उनके लिए भी पुखराज लाभकारी हो सकता है।
मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि कर यह व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाता है। मानसिक शांति और सकारात्मकता पता है। यह तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को कम करने में मदद करता है और मन को शांति प्रदान करता है। आध्यात्मिक विकास में सहायक है। गुरु धर्म और आध्यात्मिकता का ग्रह है, इसलिए पुखराज पहनने से आध्यात्मिक प्रवृत्ति बढ़ती है।
किन राशियों और लग्न वालों के लिए लाभकारी काफी है। मुख्य रूप से धनु और मीन राशि के जातकों के लिए पुखराज बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी स्वयं बृहस्पति हैं। इसके अलावा, कुछ विशेष ज्योतिषीय स्थितियों में अन्य राशियों या लग्न वाले लोग भी ज्योतिषी की सलाह पर इसे धारण कर सकते हैं।
उन्होंने पुखराज धारण करने के नियम बताए। गुरुवार का दिन पुखराज धारण करने के लिए सबसे शुभ होता है। इसे सोने या पंचधातु में धारण करना चाहिए। पुरुषों को दाएँ हाथ की तर्जनी (इंडेक्स फ़िंगर) में और महिलाएँ किसी भी हाथ की तर्जनी उंगली में पहन सकती हैं। धारण करने से पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध में डुबोकर शुद्ध करना चाहिए। मंत्र जाप, "ॐ बृं बृहस्पतये नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने के बाद इसे धारण करना शुभ माना जाता है। उन्होंने बताया कि ज्योतिषी की सलाह बहुत महत्वपूर्ण है। किसी भी रत्न को धारण करने से पहले हमेशा एक योग्य ज्योतिषी से सलाह लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही रत्न का चुनाव करना चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के रत्न पहनना हानिकारक हो सकता है।
मैंने बहुत मना किया, लेकिन वह अंगूठी पहना दिए। तीन दिन मैंने वह अंगूठी धारण की। हमेशा उसी पर ध्यान रहने लगा। हमेशा कोई न कोई समस्या याद आने लगी। प्रशासन में समस्याओं की कमी नहीं होती। तीसरे दिन बाद वह फिर मेरे ऑफ़िस आए। मैंने उन्हें बताया कि इस अंगूठी के कारण मन बहुत चिंताग्रस्त रहने लगा है। मैं इसे नहीं पहन सकता। मैंने वह अंगूठी उन्हें वापस कर दी।
उन्होंने एक नवग्रह की अंगूठी निकाली और वह पहनने दी। भाऊ कहने लगे, "नवग्रह" शब्द "नौ ग्रह" से बना है और ज्योतिष शास्त्र में इन नौ ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव माना जाता है। नवग्रह रत्न अंगूठी इन्हीं नौ ग्रहों के शुभ प्रभावों को आकर्षित करने और उनके अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए पहनी जाती है। यह अंगूठी विशेष रूप से इन नौ रत्नों से बनी होती है, जिनमें प्रत्येक रत्न एक विशिष्ट ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है:
सूर्य: माणिक्य (Ruby), चंद्रमा: मोती (Pearl), मंगल: मूंगा (Red Coral), बुध: पन्ना (Emerald), बृहस्पति (गुरु): पुखराज (Yellow Sapphire), शुक्र: हीरा (Diamond), शनि: नीलम (Blue Sapphire),राहु: गोमेद (Hessonite Garnet), केतु: लहसुनिया (Cat's Eye)
नवग्रह अंगूठी के ज्योतिषीय लाभ भाऊ ने बताया कि नवग्रह अंगूठी धारण करने के कई ज्योतिषीय लाभ बताए गए हैं, क्योंकि यह सभी नौ ग्रहों को एक साथ प्रभावित करती है। समग्र ग्रह शांति: माना जाता है कि यह अंगूठी व्यक्ति की कुंडली में मौजूद सभी नौ ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को शांत करती है और उनके सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाती है।
सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि: इसे पहनने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे साहस, उत्साह और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।
आर्थिक समृद्धि: यह धन लाभ के मार्ग खोलता है, व्यापार में वृद्धि करती है और आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाने में सहायक होती है।
वैवाहिक सुख और संबंधों में मधुरता: वैवाहिक जीवन में सामंजस्य और प्रेम बढ़ाने में यह अंगूठी लाभकारी मानी जाती है।
स्वास्थ्य लाभ: ग्रहों के अशुभ प्रभाव से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से राहत दिलाने में भी यह सहायक हो सकती है। प्रत्येक रत्न का अपना एक विशिष्ट चिकित्सा गुण भी होता है। मानसिक शांति: यह तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को दूर कर मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करती है।
सौभाग्य और सफलता: जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सौभाग्य और सफलता प्राप्त करने में यह सहायक मानी जाती है।
वास्तु दोष निवारण: कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह वास्तु दोषों को दूर करने में भी मदद करती है। किन लोगों के लिए लाभकारी? नवग्रह अंगूठी उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी हो सकती है जिनकी कुंडली में एक से अधिक ग्रह कमज़ोर या पीड़ित हों, या जिन्हें सभी ग्रहों का संतुलित आशीर्वाद चाहिए हो। राजनीति, कला और व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी इसे धारण करने से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
धारण करने के नियम और महत्वपूर्ण बातें: नवग्रह अंगूठी धारण करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए।
धातु: यह आमतौर पर सोने या पंचधातु में पहनी जाती है।
शुद्धिकरण: धारण करने से पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करना चाहिए।
ज्योतिषी की सलाह: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी रत्न या नवग्रह अंगूठी को धारण करने से पहले एक योग्य ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें। ज्योतिषी आपकी कुंडली का विश्लेषण कर यह बता सकते हैं कि नवग्रह अंगूठी आपके लिए कितनी लाभकारी होगी और इसे किस विधि से धारण करना चाहिए। ग़लत रत्न या ग़लत विधि से धारण करने से लाभ के बजाय नुकसान भी हो सकता है।
रत्नों का वज़न: रत्न शास्त्र के अनुसार, नवग्रह अंगूठी में सभी नौ रत्न समान वज़न के होने चाहिए, ताकि सभी ग्रहों का संतुलन बना रहे। संक्षेप में, नवग्रह अंगूठी को ग्रहों के अशुभ प्रभावों को कम करने और जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि और शांति लाने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है, लेकिन इसे हमेशा उचित मार्गदर्शन और विधि-विधान के साथ ही धारण करना चाहिए।
मैं भाऊ की बातों से प्रभावित होकर वह अंगूठी धारण कर ली। लेकिन एक सप्ताह ही वह पहन पाया। मुझे बहुत असुविधा लगने लगी। ध्यान हमेशा उंगली पर रहता। मुझे अच्छा नहीं लगता। मैंने वह अंगूठी भी वापस कर दी। उसके बाद आज तक कभी कोई अंगूठी पहनने की आवश्यकता नहीं हुई। मैं इस विषय में बहुत ज़्यादा नहीं जानता, मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है।
मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा जी और एक अनचाहा प्रस्ताव
मोतीलाल वोरा जी मध्य प्रदेश के एक प्रमुख राजनेता थे, जिन्होंने दो बार राज्य के मुख्यमंत्री का पद सँभाला। उनका राजनीतिक जीवन काफ़ी लंबा और प्रभावशाली रहा। उनका पहला कार्यकाल 13 मार्च 1985 से 13 फ़रवरी 1988 तक था और दूसरा कार्यकाल 25 जनवरी 1989 से 9 दिसंबर 1989 तक रहा। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान मैं छिंदवाड़ा में संयुक्त कलेक्टर था तथा एस.डी.एम. तथा प्रशासक नगर पालिका छिंदवाड़ा के पद पर काम कर रहा था।
एक दिन मुख्यमंत्री के सचिव दुबे जी का फ़ोन आया। उन्होंने मुझे भोपाल बुलाया। मुख्यमंत्री जी मुझसे मिलना चाहते थे। मैं बहुत डर गया। पर मैंने कोई ग़लती नहीं की थी, मेरी कोई शिकायत भी नहीं थी। मैं कलेक्टर से अनुमति लेकर भोपाल आया।
वहाँ जब मैं मुख्यमंत्री जी से मिला, तो उन्होंने पूछा कि मैं कौन सा ब्राह्मण हूँ। मैंने बताया कि मैं जिझौतिया ब्राह्मण हूँ। उन्होंने मेरा गोत्र पूछा, मैंने अपना गोत्र कश्यप बताया।
उन्होंने कहा, "मैं दुबे जी से बात कर काम समझ लूँगा।" जब उन्होंने मेरा कुल-गोत्र पूछा, तो मुझे लगा कि शायद मेरी शादी की बात हो। मैंने दुबे जी को बताया कि मेरी शादी बहुत पहले हो चुकी है और मेरे दो बच्चे भी हैं।
तब दुबे जी ने बताया कि हम लोगों को मुख्य मंत्री कार्यालय में एक अंडर सेक्रेटरी की आवश्यकता है और मुख्य मंत्री जी को केवल ब्राह्मण कैंडिडेट चाहिए। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा दस नाम भेजे गए थे। उसमें से मेरा नाम सेलेक्ट हुआ था। जब दुबे जी मुझे काम समझा रहे थे, तभी वहाँ सीधी की विधायक जगबा देवी आईं।
उन्होंने देशी अंदाज़ में दुबे जी को गालियाँ दीं, काम बताया, और दुबे जी का लंच उनके बॉक्स से खाकर चली गईं। मैं उन्हें विधायक से डील करते देख रहा था। लेकिन जब तक मेरा ट्रांसफर आदेश निकलता, मुख्य मंत्री जी ने अपना पद छोड़ दिया। मैं भोपाल जाने से बच गया।
छिंदवाड़ा की राजनीतिक धाराएँ और एक नया संघ
इन दिनों भारतीय जनता पार्टी बहुत छोटा राजनीतिक दल था। धीरे-धीरे उसके सदस्य बढ़ रहे थे। छिंदवाड़ा कांग्रेस का गढ़ माना जाता था। सभी विधायक तथा सांसद कांग्रेस के थे। भारतीय जनता पार्टी के नेता थे प्रतुल चंद्र द्विवेदी। उनका अपना काम करने का अनोखा तरीक़ा था। वह केवल एक रुपया साल का चंदा लेते थे। होली के दिन बहुत बड़ा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन करवाते थे। नगर पालिका प्रशासक होने के नाते मैं उनकी बहुत मदद करता था।
मेरे घर पर हर रविवार हमारे साथी अधिकारी आते थे। हम लोग तीन पत्ती ताश खेलते थे। चाय नाश्ता होता। हालाँकि अधिकारियों को शराब, सिगरेट तथा नॉनवेज खाना फ़्री उपलब्ध थे, पर मेरी कभी इन चीज़ों में रुचि नहीं थी, इसलिए हमारे घर में यह नहीं चलता था। सादा खेल और खाना-पीना था।
उन दिनों भोपाल में देवी शरण, हीरा लाल त्रिवेदी, कवींद्र कियावत और बहुत सारे लोग राज्य प्रशासनिक सेवा संघ बना रहे थे। राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल का इतिहास सीधे तौर पर मध्य प्रदेश राज्य के गठन और राज्य प्रशासनिक सेवा के विकास से जुड़ा हुआ है।
मध्य प्रदेश राज्य का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। इस नए राज्य के गठन के साथ, विभिन्न घटक राज्यों (जैसे मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य और महाकौशल क्षेत्र) के प्रशासनिक अधिकारियों का एकीकरण हुआ। इन अधिकारियों के हितों की रक्षा, उनकी समस्याओं का निराकरण और उनकी सेवा शर्तों में सुधार के लिए एक संगठित मंच की आवश्यकता महसूस की गई। इसकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल का गठन किया गया।
हालाँकि, संघ की स्थापना की सटीक तिथि या वर्ष सार्वजनिक रूप से व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है, यह स्पष्ट है कि उसका जन्म मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन और राज्य प्रशासनिक सेवा के ढाँचे के साथ ही हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य प्रशासनिक सेवा (जो आमतौर पर डिप्टी कलेक्टर, संयुक्त कलेक्टर, अपर कलेक्टर जैसे पदों पर कार्यरत होते हैं) के अधिकारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करना और सरकार के समक्ष उनकी मांगों को प्रस्तुत करना है।
राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल, अपने गठन के बाद से ही निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों को लेकर कार्य करता रहा है:
अधिकारियों के हितों की रक्षा, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की सेवा शर्तों, पदोन्नति, वेतनमान, कार्यभार और अन्य संबंधित मुद्दों पर सरकार के साथ संवाद स्थापित करना।
समस्याओं का निराकरण, अधिकारियों को कार्यस्थल पर आने वाली समस्याओं को हल करने में मदद करना और उनके लिए बेहतर कामकाजी माहौल सुनिश्चित करना।
पदोन्नति और कैरियर विकास: भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाना और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के कैरियर विकास के लिए नीतियाँ बनाने में योगदान देना।
प्रशासनिक सुधारों में भागीदारी, राज्य के प्रशासनिक ढाँचे और नीतियों में सुधार के लिए अपने सुझाव देना।
सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियाँ, संघ अपने सदस्यों के बीच सौहार्द स्थापित करने और विभिन्न सामाजिक व सामुदायिक गतिविधियों में भी भाग लेता है।
पिछले कुछ दशकों में, संघ ने राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की विभिन्न मांगों को लेकर कई बार सरकार से संवाद किया है। इन मांगों में वेतन विसंगतियाँ दूर करना, पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाना, अतिरिक्त ज़िम्मेदारियों के लिए उचित मानदेय, और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।
संघ समय-समय पर अपनी नई कार्यकारिणी का गठन करता है और निर्वाचित सदस्य अधिकारियों की ओर से सरकार से बातचीत करते हैं। हाल ही में, ख़बरों में देखा गया है कि राज्य प्रशासनिक सेवा संघ की नई कार्यकारिणी ने मुख्यमंत्री सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाक़ात कर लंबित मांगों से अवगत कराया है। यह संघ राज्य प्रशासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह सीधे उन अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करता है जो राज्य के ज़मीनी स्तर पर नीतियों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल का इतिहास मध्य प्रदेश के प्रशासनिक ढाँचे के विकास और राज्य प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों व कल्याण की लड़ाई का इतिहास है। यह राज्य प्रशासन में एक महत्वपूर्ण हितधारक है, जो अपने सदस्यों के हितों की रक्षा और प्रशासन की बेहतरी के लिए लगातार प्रयासरत रहता है।
पहले डिप्टी कलेक्टर से सीधे भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति होती थी। डिप्टी कलेक्टर से संयुक्त कलेक्टर, अपर कलेक्टर जैसे पदों पर पदोन्नति का प्रावधान नहीं था। उत्तर प्रदेश संभवतः पहला राज्य था जहाँ त्रिस्तरीय पदोन्नति की सबसे पहले व्यवस्था हुई। मैं छिंदवाड़ा में संघ का प्रभारी था।
हम लोगों ने ज़िला इकाई का गठन किया था। राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल में राज्य स्तरीय कार्यकारिणी ने बहुत मेहनत की। त्रिस्तरीय पदोन्नति का प्रावधान राज्य शासन से करवाया और बहुत सारे निर्णय हुए। भोपाल में शासन से भवन बनाने के लिए ज़मीन अलॉट करवाई, जिस पर आज बहुत बढ़िया गेस्ट हाउस बना हुआ है।
विश्वासघात का कड़वा सच
हम हमेशा शासकीय काम से भोपाल आते थे। एक बार मैं भोपाल में छिंदवाड़ा में पदस्थ डी.एस. राय के घर मिलने गया। उस समय एन.पी. तिवारी कलेक्टर से पदोन्नत होकर उज्जैन में कमिश्नर पदस्थ थे। मैं और राय साहब दोनों तिवारी जी के व्यवहार की बुराई कर रहे थे, क्योंकि डी.एस. राय जब छिंदवाड़ा में एस.डी.एम. थे, तब उन्होंने एन.पी. तिवारी, कलेक्टर की बहुत सेवा की थी।
लेकिन कुछ मतभेदों के कारण एन.पी. तिवारी, कलेक्टर ने उन्हें एस.डी.एम. के पद से हटा दिया था, जिसका डी.एस. राय को बहुत बुरा लगा था। उन्हें अपमानित किया गया था, इसलिए उन्होंने अपना ट्रांसफर भोपाल करवा लिया था। सुबह का समय था। रविवार की छुट्टी थी। हम लोग चाय पी रहे थे। तभी वहाँ एन.पी. तिवारी, उज्जैन कमिश्नर आ गए। हम दोनों हक्का-बक्का रह गए।
मैंने सोचा, 'थिंक ऑफ़ डेविल एंड डेविल इज़ हियर' कहावत कितनी सही है! मैंने हाथ जोड़कर प्रणाम किया। डी.एस. राय ने आदत के मुताबिक उनके चरण छुए। वह बैठ गए।
एन.पी. तिवारी को पता था कि मुझे उनका व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने वह विषय निकालकर बात करना शुरू किया। डी.एस. राय ने एकाएक पलटा मारते हुए उनके व्यवहार की बहुत तारीफ़ करना शुरू कर दी। मैं भौचक होकर एक बार डी.एस. राय की ओर देखता, तो दूसरी बार एन.पी. तिवारी जी की तरफ।
मेरा मुँह खुला रह गया, आँखें फटी की फटी। मैं एकटक देख रहा था। डी.एस. राय कहने लगे, "सर, आपसे बहुत कुछ सीखा। आपके कारण ज़िंदगी बदल गई। आपकी डाँट आशीर्वाद था।" वग़ैरह-वग़ैरह। तिवारी जी ने मुझसे पूछा कि मुझे उनका व्यवहार कैसा लगा। मैंने हिम्मत कर कहा कि, "मुझे उनका व्यवहार कभी भी अच्छा नहीं लगा।"
एन.पी. तिवारी जी ने अपने प्रोबेशन काल के अनुभव सुनाए जब वह बैतूल में पदस्थ थे और उनके कलेक्टर एम.एन. बुच ने उन्हें डाँट-डाँटकर काम सिखाया था। तिवारी जी ने गर्व से कहा कि उसी डाँट का परिणाम था कि वह सबसे कम समय में डिप्टी कलेक्टर से कलेक्टर बन सके। मैं उनके तर्क से सहमत नहीं था। मैंने बड़ी विनम्रता से कहा, "हम सब अब वयस्क हैं, बिना डाँट खाए ज़्यादा सीख सकते हैं।"
तिवारी जी ने मुझे धमकाने के अंदाज़ में कहा कि उन्होंने मेरी वार्षिक गोपनीय चरित्रावली अभी नहीं लिखी है। मैंने अनुरोध किया कि, "मैंने अपने काम की रिपोर्ट फ़ॉर्म में भरकर भेज दी है। अब मर्ज़ी आपकी है कि आप मेरे काम का मूल्यांकन कैसे करते हैं।" कुछ देर बाद मुझे दूसरी जगह काम से जाना था, मैं उठकर उन दोनों को प्रणाम कर चला गया।
अमरवाड़ा में एक हायर सेकेंडरी के प्राध्यापक थे मिस्टर जैन। वह मुझसे मिलने आते थे। उन्होंने मुझे ओशो की कुछ किताबें पढ़ने को दीं। उन्हें पढ़कर तथा उनके कैसेट सुनकर मेरा जीवन-दर्शन बदल गया। तब से मैं नियमित ओशो को पढ़ता-सुनता रहा हूँ। हर व्याख्या अद्भुत है, जीवन को देखने का नया नज़रिया।
ओशो, जिन्हें मूल रूप से चंद्र मोहन जैन के नाम से जाना जाता था, 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरुओं और दार्शनिकों में से एक थे। उनका जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन ज़िले के कुचवाड़ा गाँव में हुआ था और उन्होंने 19 जनवरी 1990 को पुणे में अपना देह त्याग दिया।
चंद्र मोहन जैन का जन्म एक दिगंबर जैन परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता की ग्यारह संतानों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही वे बहुत ही जिज्ञासा और विद्रोही स्वभाव के थे। वे किसी भी स्थापित परंपरा या विश्वास को बिना परखे स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल में पूरी की। उन्होंने जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया और बाद में सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 21 वर्ष की आयु (21 मार्च 1953) में उन्हें जबलपुर में मौलश्री वृक्ष के नीचे 'संबोधि' (ज्ञानोदय) की प्राप्ति हुई, जिसे वे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ मानते थे।
प्राध्यापक और आचार्य रजनीश: एम.ए. करने के बाद, उन्होंने कुछ समय तक रायपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। हालाँकि, उनके अपरंपरागत विचारों और जीवनशैली के कारण उन्हें जल्द ही जबलपुर विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया।
1960 के दशक में, वे 'आचार्य रजनीश' के नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्होंने देश भर में यात्रा करके प्रवचन देने शुरू किए। वे पारंपरिक धर्मों, सामाजिक संरचनाओं और राजनीतिक प्रणालियों के कटु आलोचक थे।
भगवान श्री रजनीश और पुणे आश्रम: 1970 के दशक में, उन्होंने अपने शिष्यों को 'नव-संन्यासी' के रूप में दीक्षित करना शुरू किया, जो पारंपरिक संन्यास से अलग था और जिसमें जीवन को पूर्णता से जीने पर ज़ोर दिया जाता था।
1974 में, उन्हें पुणे, भारत में अपना अंतर्राष्ट्रीय ध्यान रिसॉर्ट (अब ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट) स्थापित किया। इस दौरान उन्हें 'भगवान श्री रजनीश' के नाम से जाना जाने लगा। उनके आश्रम में दुनियाभर से लोग ध्यान और आध्यात्मिक खोज के लिए आने लगे।
रजनीशपुरम और विवाद: 1980 के दशक की शुरुआत में, ओशो अपने कई अनुयायियों के साथ अमेरिका चले गए और ओरेगन में 'रजनीशपुरम' नामक एक समुदाय की स्थापना की। यह समुदाय एक स्व-पर्याप्त शहर के रूप में विकसित हुआ, लेकिन स्थानीय अधिकारियों और पड़ोसियों के साथ कई विवादों में उलझ गया, जिसमें प्रवासी, भूमि उपयोग और आपराधिक गतिविधियाँ शामिल थीं। 1985 में, ओशो को अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया और उन्हें 21 देशों में प्रवेश से वंचित कर दिया गया।
ओशो के रूप में वापसी और अंतिम वर्ष: अमेरिका से लौटने के बाद, वे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में घूमते रहे और अंततः पुणे लौट आए। 1989 में, उन्होंने अपना नाम 'ओशो' रख लिया, जिसका अर्थ है 'सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला' या 'राजहंस' (एक बौद्ध शब्द)। उन्होंने अपने अंतिम वर्ष पुणे आश्रम में ही बिताए, जहाँ वे प्रवचन देते रहे और ध्यान विधियों का विकास करते रहे। 19 जनवरी 1990 को उनका निधन हो गया।
ओशो का दर्शन (Philosophy of Osho): ओशो का दर्शन किसी एक परंपरा या धर्म से बंधा हुआ नहीं था। उन्होंने दुनिया भर के दर्शनों, धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं (जैसे ज़ेन बौद्ध धर्म, सूफीवाद, ताओवाद, तंत्र, योग, वेदांत, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, आदि) का गहन अध्ययन किया और उनसे प्रेरणा ली, लेकिन उन्हें अपनी अनूठी शैली में प्रस्तुत किया। उनके दर्शन के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:
वर्तमान में जीना (Living in the Present Moment): ओशो का मानना था कि अधिकांश लोग या तो अतीत की स्मृतियों में जीते हैं या भविष्य की चिंताओं में खोए रहते हैं। वे वर्तमान क्षण की शक्ति और सुंदरता को खो देते हैं। उनका ज़ोर 'यहीं और अभी' जीने पर था, क्योंकि केवल वर्तमान ही वास्तविक है।
सजगता और साक्षी भाव (Awareness and Witnessing): यह ओशो के दर्शन का केंद्रीय स्तंभ है। वे सिखाते थे कि हमें अपने विचारों, भावनाओं और कार्यों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन उससे जुड़ना नहीं चाहिए। बस एक साक्षी की तरह देखना, बिना निर्णय दिए। यह साक्षी भाव व्यक्ति को मन की गुलामी से मुक्त करता है और आंतरिक शांति प्रदान करता है।
ध्यान: ओशो ने ध्यान को जीवन जीने की कला के रूप में देखा। उन्होंने कई नई और अनूठी ध्यान विधियों का विकास किया, जैसे गतिशील ध्यान (Dynamic Meditation), कुंडलिनी ध्यान (Kundalini Meditation), नटराज ध्यान (Nataraj Meditation), आदि। ये विधियाँ शरीर की ऊर्जा को मुक्त करने और मन को शांत करने पर केंद्रित थीं। उनका मानना था कि ध्यान कोई क्रिया नहीं, बल्कि एक अवस्था है मन की शांति और जागरूकता की अवस्था।
प्रेम और यौनता: ओशो ने प्रेम और यौनता के प्रति एक बहुत ही खुले और स्वीकार्य दृष्टिकोण का प्रचार किया। उनका मानना था कि समाज ने यौनता को दबा दिया है, जिससे कई मनोवैज्ञानिक समस्याएँ पैदा हुईं। उन्होंने यौन ऊर्जा को एक रचनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में देखा, जिसे दबाने के बजाय समझना और रूपांतरित करना चाहिए। उनका प्रसिद्ध सूत्र था, "प्रेम एक फूल है, कामवासना उसकी जड़।"
अस्तित्ववाद और व्यक्तित्व: ओशो ने व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अद्वितीय अस्तित्व पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है और उसे किसी बाहरी सत्ता (भगवान, समाज, धर्म) द्वारा निर्धारित नियमों या विश्वास का पालन नहीं करना चाहिए। स्वयं को जानना और अपनी सच्चाई के अनुसार जीना ही सच्ची आध्यात्मिक यात्रा है।
धर्मों और परंपराओं की आलोचना: ओशो ने संगठित धर्मों, उनकी कट्टरता, पाखंड और मनुष्य को बाँधने वाली रूढ़ियों की कड़ी आलोचना की। उनका मानना था कि धर्मों ने मनुष्य को ईश्वर से दूर कर दिया है, जबकि ईश्वर भीतर ही है। उन्होंने किसी भी विशेष धर्म का प्रचार नहीं किया, बल्कि "धार्मिकता" (धर्म-भाव) पर ज़ोर दिया, जो कि व्यक्तिगत अनुभव और आंतरिक खोज पर आधारित है।
अहंकार का विसर्जन (Dissolution of Ego): ओशो के अनुसार, अहंकार ही मनुष्य के दुःखों का मूल कारण है। अहंकार एक झूठी पहचान है जो समाज और अनुभवों से बनती है। उन्होंने अहंकार को तोड़ने और "शून्य" होने की बात की, जहाँ व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को जान सके।
आनंद और उत्साह (Joy and Celebration): ओशो का मानना था कि जीवन एक उत्सव है और इसे पूरी तरह से आनंद के साथ जीना चाहिए। उन्होंने दुख और पीड़ा को स्वीकार करने और उनसे सीखने के लिए कहा, लेकिन उनमें फँसने के बजाय जीवन के हर पल का उत्सव मनाने पर ज़ोर दिया।
ओशो का दर्शन केवल बौद्धिक अवधारणाओं का संग्रह नहीं था, बल्कि यह एक अनुभवात्मक और परिवर्तनकारी मार्ग था। उन्होंने अपने शिष्यों को स्वयं प्रयोग करने और अपनी सच्चाई जानने के लिए प्रेरित किया, बजाय इसके कि वे किसी गुरु या शास्त्र पर आँख बंद करके विश्वास करें। उनकी शिक्षाएँ आज भी लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं, और उनके प्रवचनों की विशाल लाइब्रेरी विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध है।
पंडित श्री राम शर्मा आचार्य, गायत्री परिवार के बाद यह दूसरे व्यक्ति थे जिन्होंने मेरे ऊपर बहुत प्रभाव छोड़ा। छिंदवाड़ा में काम करते हुए पाँच साल हो गए थे। जीवन एक ढर्रे पर चल रहा था। मुझे लगने लगा था कि प्रशासनिक सुधार तथा सेवाओं को जिस ऊँचाई तक मैं ले जा सकता था, लेकर पहुँच चुका था। नया करने को कुछ दिख नहीं रहा था।
मुझे लगता था कि अंग्रेज़ों ने शासकीय सेवाओं में ट्रांसफर पॉलिसी शायद इसी लिए बनाई थी, जिसमें तीन साल में ट्रांसफर का प्रावधान होता था। एक साल अधिकारी क्षेत्र को समझे, दूसरी साल क्षेत्र के लोग अधिकारी को समझें और जब दोनों एक-दूसरे को समझ जाएँ, तो अधिकारी का ट्रांसफर हो जाए। कितनी सुंदर पॉलिसी! लेकिन आपको नहीं पता कि भगवान ने आपके लिए क्या सोचा है। तभी एक घटना ने मेरा जीवन बदल दिया।
सो हुआ यह कि छब्बीस जनवरी का दिन था। एस.डी.एम. और नगर पालिका प्रशासक होने के नाते मुझे नगर में कई जगह झंडा वंदन करने जाना होता था। इस दिन भी सुबह छह बजे से जाकर अलग-अलग जगह कार्यक्रम कर नौ बजे के पूर्व मुझे ज़िले के मुख्य कार्यक्रम स्थल, पुलिस ग्राउंड पर पहुँचना था।
एक जगह जब मैं झंडा फहरा रहा था, तब वहाँ बिना आमंत्रण के वहाँ की विधायक मैडम शुक्ला आ गईं। झंडा वंदन के बाद जब मैं अपनी गाड़ी में बैठ रहा था, तो मैडम ने उन्हें भी पुलिस ग्राउंड ले जाने का आग्रह किया। उन दिनों महिंद्रा जीप में आगे केवल ड्राइवर और एक व्यक्ति के बैठने को सीट होती थी। मैं पीछे नहीं बैठना चाहता था। मैडम शुक्ल आगे बैठ गईं।
मैंने ड्राइवर से पीछे बैठने को कहा और ख़ुद गाड़ी चलाने लगा। शहर की सड़क लोगों से भरी थी, गाड़ी बहुत धीमी चल रही थी। हम लोग समय पर मुख्य कार्यक्रम स्थल पुलिस ग्राउंड पर पहुँच गए। प्रभारी मंत्री महोदय ने झंडा फहराया। कार्यक्रम जब समाप्त हो रहा था, तभी एक पुलिस अधिकारी मेरे पास आए। उन्होंने कहा कि, "शहर में मैंने अपनी गाड़ी से एक एक्सीडेंट कर दिया है।"
उन्होंने बताया कि, "एक व्यक्ति आपके घर के सामने उनकी साइकिल पर एक छोटी लड़की को बैठाकर साइकिल स्टैंड पर खड़ी कर घर के अंदर कुछ लेने गए। तभी आपकी गाड़ी वहाँ से निकली, जिससे साइकिल टकराकर गिर गई। लड़की को सिर में चोट आई है। बाहर बहुत भीड़ जमा है। बाहर लोग हंगामा कर रहे हैं। वह भीड़ आपके विरुद्ध कार्यवाही की माँग कर रही है।"
मैंने उन्हें बताया कि, "गाड़ी मैं ही चला रहा था। उसमें विधायक तथा पीछे छह लोग और बैठे थे। हमारी गाड़ी बहुत धीमी चल रही थी। किसी से नहीं टकराई। आप सबसे पूछ लो।" लेकिन वह बोले कि, "आपके विरुद्ध माहौल बन रहा है, आप पीछे से घर चले जाओ।" मुझे बहुत बुरा लगा।
उन्होंने एक पुलिस गार्ड के साथ मुझे घर भेज दिया। शहर में हंगामा हो गया। अगले दिन शहर बंद रहा। अख़बारों में ख़बर छपी कि मैं बहुत तेज़ी से गाड़ी चला रहा था, नशे में चूर था, पद का घमंड और न जाने क्या-क्या छापा था। शहर में चार दिन से हड़ताल चल रही थी। थानेदार मेरी गाड़ी जाँच के लिए ज़ब्त कर ले गए। मेरे ऊपर पहला पुलिस केस दर्ज़ हुआ। जो अपराध कभी हुआ ही नहीं, वह भीड़तंत्र के कारण मुझ पर थोपा जा रहा था। कलेक्टर पुलिस एस.पी. का ज़ोर था कि शहर की हड़ताल किसी तरह समाप्त हो।
विधायक ने अपने बयान में बताया कि उन्हें नहीं पता कि साइकिल गाड़ी टकराने से गिरी या नहीं। साइकिल दूसरी तरफ़ गिरी थी, सड़क की तरह नहीं गिरी। ज़मीन पर पड़े एक छोटे से कंकड़ से लड़की के सिर पर हल्की चोट थी। डॉक्टर को कोई घाव नहीं मिला। वह भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा सोनी परिवार था। मैंने उस लड़की को नागपुर सिटी स्कैन करवाकर न्यूरो सर्जन को दिखवाया।
कोई चोट नहीं थी। पर लोग मानने को तैयार नहीं थे। साइकिल से गाड़ी छुई भी नहीं थी, किसी दुर्घटना का कोई निशान नहीं था। इन दिनों मैं घर में अकेला था। मुझसे मिलने कोई अधिकारी नहीं आया। मैंने सारे नेताओं, विधायक तथा सांसद जी को पूरी घटना बताई। किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। सब ने कहा कि उन्हें जनता का साथ देना होगा। आंदोलन कुछ गुंडों के हाथों में चला गया था। सभी पत्रकार लोकल थे। मेरे विरुद्ध बिना गवाह सबूत के आरोप पर आरोप लगा रहे थे। मीडिया का यह चेहरा मैंने पहली बार देखा था।
भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रतुल चंद्र द्विवेदी, जो मेरे मित्र होने का दावा रोज़ करते थे, सच का साथ देने को तैयार नहीं थे। भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की पार्टी थी, कांग्रेस की सरकार थी और मैं था सरकारी अधिकारी। जिस शहर को मैंने अपने जीवन के बेहतरीन पाँच साल दिए, रात-दिन ईमानदारी से मेहनत कर काम किया, उस जगह न एक अधिकारी, न ही एक नेता, जनता का कोई व्यक्ति मेरे साथ नहीं था।
हर रविवार जो मेरे घर में पार्टी करते, खाते-पीते, दोस्ती का दम भरते, लिंक दुःख-सुख में मैंने साथ दिया, सब कहाँ ग़ायब हो गए? अपने आप का मैंने आत्मवलोकन किया। मेरी गाड़ी पुलिस ने ज़ब्त कर ली। ज़मानती धाराओं में केस दर्ज़ किया। मैंने ज़मानत करवाई। शहर की हड़ताल समाप्त हो गई। बाहर पुराना रूटीन लौट आया, पर मेरे अंदर सब कुछ बदल गया। लोगों से मिलना-जुलना बंद कर दिया। पार्टी, खेलकूद, क्लब जाना बंद कर दिया। ओशो की अंतर्दृष्टि ने इस घटना को समझने में मदद की।
मैं बहिर्मुखी से अंतर्मुखी हो गया। अब न किसी को बुलाया, न किसी के घर जाता। निमंत्रण, शादी समारोह, होली-दीवाली मिलन सब बंद। किताबों से फिर दोस्ती हो गई। कुछ माह बाद मेरे होशंगाबाद के स्थानांतरण के आदेश आ गए। इस समय हमारे कलेक्टर थे अंटोनी डीसा साहब, बहुत भले और ईमानदार आदमी। एंटोनी डीसा, जिन्हें "टिनो" के नाम से भी जाना जाता है, मध्य प्रदेश कैडर के एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। वे अपनी प्रशासनिक सेवाओं के साथ-साथ एक लेखक और कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। जन्म 9 अक्टूबर 1956 को भुसावल, महाराष्ट्र में। उन्होंने भुसावल के सेंट अलॉयसियस स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। मुंबई विश्वविद्यालय से एम.ए. में गोल्ड मेडलिस्ट रहे। 1976 में कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ छात्र के लिए रोटरी पुरस्कार प्राप्त किया। पत्नी मालूशा डीसा।
करियर और प्रमुख पद, मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव, वे 2013 से लेकर 2017 में अपनी सेवानिवृत्ति तक मध्य प्रदेश राज्य के 29वें मुख्य सचिव रहे। उन्होंने आर. परशुराम का स्थान लिया और उनके बाद बसंत प्रताप सिंह ने यह पद सँभाला।
ज़िला कलेक्टर: उन्होंने छिंदवाड़ा ज़िले के ज़िला कलेक्टर के रूप में कार्य किया। प्रशासक: जबलपुर नगर निगम के प्रशासक रहे। आवास आयुक्त: मध्य प्रदेश के आवास आयुक्त के रूप में भी सेवाएँ दीं। केंद्रीय सरकार में भूमिकाएँ: उन्होंने केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियाँ सँभालीं:
निदेशक: पर्यावरण और वन मंत्रालय (भारत) में निदेशक। नियंत्रक (Controller): मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के नियंत्रक। संयुक्त सचिव: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (भारत) में संयुक्त सचिव, जहाँ उन्होंने विदेश व्यापार नीति और WTO में भारत की वार्ताओं का काम देखा।
अंतर्राष्ट्रीय अनुभव: उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में पाँच साल तक सेवा दी, जहाँ वे दक्षिण-दक्षिण औद्योगिक सहयोग के लिए UNIDO केंद्र के निदेशक रहे। सेवानिवृत्ति के बाद: सेवानिवृत्ति के बाद भी एंटोनी डीसा सक्रिय हैं। वे मध्य प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) के पहले अध्यक्ष रहे हैं। वर्तमान में, वे अपने गृहनगर गोवा में रहते हैं। उन्हें मापसा अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक (MUCB) के परिसमापक (Liquidator) के रूप में नियुक्त किया गया है।
एक लेखक और कवि के रूप में: एंटोनी डीसा एक चर्चित लेखक और कवि भी हैं। उनकी कई रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं और उन्हें साहित्यिक सम्मान भी मिले हैं: उनके कई लेख टाइम्स ऑफ़ इंडिया में प्रकाशित हुए हैं। उनकी कुछ कविताओं को पोएट्री सोसाइटी ऑफ़ इंडिया और पोएट्री द्वारा संकलित किया गया है। उनकी कहानी "टैमेरिंड (इमली)" को हाल ही में 'कॉमनवेल्थ शॉर्ट स्टोरी प्राइज 2025' के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है।
यह कहानी मध्य प्रदेश के ग्रामीण जीवन पर आधारित है। उन्होंने तीन अन्य किताबें भी लिखी हैं: बच्चों के लिए एक रहस्य कथा "The Curious Case of the Nandikote Nawab", जिसे सीबीएसई स्कूलों ने अपनी पठन सूची में शामिल किया है। उन्हें 2017 और 2019 में टाइम्स ऑफ़ इंडिया राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। ये दोनों कहानियाँ भी मध्य प्रदेश पर आधारित हैं। एंटोनी डीसा एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं, जिन्होंने एक कुशल प्रशासक के रूप में अपनी सेवाएँ दीं और अब एक सफल लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं।
वह नए-नए आए थे, मेरे काम से बहुत प्रभावित थे। वह मुझे कार्यमुक्त नहीं करना चाहते थे। वह मेरा ट्रांसफर निरस्त करवाना चाहते थे। उन्होंने मुझे बुलाकर पूछा कि, "तुम क्यों जाना चाहते हो?" मैंने कहा, "जहाँ अधिकारी को लोकल बच्चे अंकल कहने लगें, उसे चले जाना चाहिए।"
होशंगाबाद में एक नई शुरुआत
मेरे भीतर सब कुछ बदल चुका था। लोगों से मिलना-जुलना बंद हो चुका था, और मैं अपनी ही दुनिया में सिमट गया था। ऐसे में, होशंगाबाद में स्थानांतरण का आदेश मेरे लिए एक राहत की साँस जैसा था। लेकिन मेरे कलेक्टर अंटोनी डीसा साहब मुझे जाने नहीं देना चाहते थे। वह मेरे काम से बहुत प्रभावित थे, और उन्होंने मुझे कार्यमुक्त नहीं किया। वह मेरा ट्रांसफर निरस्त करवाना चाहते थे।
वह मेरी बात से सहमत नहीं थे, पर मेरे मन की व्यथा को समझ रहे थे। उन्होंने कहा, "तुम होशंगाबाद जाकर कलेक्टर से मिल आओ। जगह देख आओ, फिर निश्चित करो।" हालाँकि, मैं जाने का मन बना चुका था, पर उनकी बात नहीं टाल सका।
न्याय के गलियारों में अपमान
छिंदवाड़ा से भले ही मैं दूर आ गया था, लेकिन उस एक्सीडेंट की काली परछाई अभी भी मेरा पीछा कर रही थी। कुछ दिनों बाद, एक्सीडेंट का पुलिस केस तो कोर्ट से निरस्त हो गया था, लेकिन सोनी परिवार ने व्यक्तिगत केस कोर्ट में लगा दिया था। इस बार, यह लड़ाई सीधी नहीं थी, यह मेरे मान-सम्मान पर एक सीधा हमला था। मैंने मिस्टर भाटिया को वकील नियुक्त किया। वह केस बहुत दिनों तक चला, और उन दिनों होशंगाबाद से छिंदवाड़ा जाना, कोर्ट के गलियारों में बेंच पर बैठना, कोर्ट के चपरासी द्वारा नाम पुकारा जाना यह सब मेरे लिए बहुत अपमानजनक था। वह मानसिक कष्ट असहनीय था। मैं उस भीड़तंत्र का शिकार था, जिसने बिना किसी अपराध के मुझ पर एक धब्बा लगा दिया था।
भ्रष्टाचार की दो धाराएँ
इसी मानसिक उथल-पुथल के बीच मैंने अपनी भावनाओं को एक दिशा देने की कोशिश की। मैंने पिछले सालों से एक डायरी लिखना शुरू किया था, जिसमें मैं शासन में रिश्वतखोरी के तरीक़ों का हिसाब-किताब रखता था। मैंने देखा कि कार्यालयों में दो तरह के पैसों का भ्रष्टाचार किया जाता है।
पहली धारा थी सरकारी बजट का भ्रष्टाचार:
एक शासकीय बजट का पैसा और दूसरा निजी लोगों का पैसा। बजट, कुछ ख़रीदी करने या निर्माण के काम करने के लिए सरकार द्वारा ज़िलों के अधिकारियों को आबंटित किया जाता था। जिसका बिल बनाकर ट्रेज़री में लगाना होता था।
ज़िला ट्रेज़री ऑफ़िसर पैसा शासन के खाते से निकालकर विभाग के बैंक खाते में ट्रांसफ़र करते थे और अधिकारी पैसे चेक से निकालकर भुगतान करते थे। तो जब भी कोई भुगतान होता, काम करने वाला ठेकेदार या सामान का सप्लायर कुल राशि का दस प्रतिशत कमीशन ज़िला अधिकारी के अकाउंटेंट को रिश्वत में देता, जो अधिकारी से चपरासी तक के बीच बाँटा जाता था। इस बेईमानी के काम को बहुत ईमानदारी के साथ किया जाता। जब तक इस सप्लाई चेन का कोई स्टेकहोल्डर शिकायत न करे, बहुत ख़ामोशी से यह सिस्टम काम करता।
सभी निर्माण कार्य करने वाले विभाग ऐसे ही काम करते थे। इनकी शिकायत सबसे कम होती, चर्चा भी कम होती। यह सरकारी ख़ज़ाने की राशि में से रिश्वत ली जाती थी, इसलिए देने वाले को पहले से पता होता था कि उसे कुल भुगतान में से कितना प्रतिशत राशि रिश्वत में देनी होगी। उतनी राशि बढ़ाकर वह टेंडर में क़ीमत लिखता था। ठेकेदार की जेब से पैसा नहीं जाता, इसलिए वह इसकी बात नहीं करता था। यह एक निर्दोष और शातिर चक्र था, जो अनवरत चल रहा था।
दूसरी धारा थी निजी पैसों का भ्रष्टाचार:
दूसरी तरफ़, जैसे पुलिस, पटवारी, इंस्पेक्टर कोई जाँच करते, क़ानून तोड़ते किसी को पकड़ते, व्यापार करने के लिए लाइसेंस लेने हो या शासन की किसी विभाग से कोई अनुमति लेनी हो—इन सब के लिए रिश्वत माँगी जाती। इसका कोई फ़िक्स्ड रेट नहीं था। इस कारण कोई कुछ लेता, तो दूसरा कुछ और। यह राशि माँगने वाले और देने वाले के बीच मोलभाव से तय होती थी।
यह राशि व्यक्तिगत जेब से देनी होती थी, इसलिए देने वाला व्यक्ति रिश्वत देने से पहले अपने सर्किल में बात शुरू कर देता था। इस तरह की रिश्वत लेने का बहुत प्रचार होता था। कई बार रिश्वत की राशि को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता था। समाज में, अख़बारों में, मीडिया में, राजनेताओं में इस बात की ख़ूब चर्चा होती थी। यह निजी पैसे का भ्रष्टाचार था, जो शोर मचाता था, जबकि सरकारी बजट का भ्रष्टाचार चुपचाप पनप रहा था।
सामाजिक मूल्यों का पतन
इन अनुभवों ने मुझे समाज की बदलती सोच पर गहराई से सोचने पर मजबूर कर दिया। पहली पीढ़ी के नेता तथा अधिकारी सामाजिक बदनामी से बहुत डरते थे। सामाजिक दबाव में भ्रष्टाचार कम होता था। धीरे-धीरे, मैंने सामाजिक मूल्यों और मान्यताओं में बदलाव देखा है। अब यह मायने नहीं रखता कि आपने पैसा कैसे कमाया, अब समाज में यह देखा जाता है कि पैसा कितना कमाया।
सामाजिक मूल्य बदल जाने से मानसिकता में बदलाव आया है। अब कोई रिश्वत में पकड़ा जाना या छापा डलना या काली कमाई का ज़ब्त होना केवल सूचना के लिए एक ख़बर रह गई है। अब यह स्केल का सवाल है। जितने ज़्यादा आप पैसे कमा रहे हैं, समाज में उतना आदर पा रहे हैं।
धार्मिक आयोजन हो रहे हैं, मंदिर बन रहे हैं, सामाजिक कार्यक्रम में चंदा दे रहे हैं। अधिकारियों, राजनेताओं, ठेकेदारों और सप्लायरों के संगठन बन गए हैं। कंसलटेंट, सोशल इंफ़्लुएंसर, लॉबिस्ट जैसे पदनाम समाज में इज़्ज़त की निगाहों से देखे जाते हैं।
मैं अभी भी अपनी डायरी मेंटेन कर रहा हूँ, जिसमें समाज की इस बदलती तस्वीर को दर्ज़ कर रहा हूँ। यह सिर्फ़ एक डायरी नहीं, बल्कि एक युग के अंत और एक नए युग की शुरुआत का दस्तावेज़ है, जहाँ नैतिकता की परिभाषा बदल चुकी है।
पस्तोर डॉक्टराइन और एक अवांछित स्थानांतरण
छिंदवाड़ा से मैं मानसिक रूप से पूरी तरह टूट चुका था, पर मेरे कलेक्टर साहब ने मुझे जाने नहीं दिया। उन्होंने कहा, "तुम होशंगाबाद जाकर कलेक्टर से मिल आओ। जगह देख आओ, फिर निश्चित करो।" हालाँकि, मैं जाने का मन बना चुका था, पर उनकी बात नहीं टाल सका। मैंने छिंदवाड़ा से एक दिन होशंगाबाद आया। वहाँ मैडम अजीता बाजपेई पांडे कलेक्टर थीं। मैं उनसे मिला। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। वह बहुत अच्छे से मिलीं, पर उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी, जैसे वह मेरे आने का कारण पहले से ही जानती हों।
मैंने छिंदवाड़ा के मानसिक तनाव से उबरने के लिए यह स्थानांतरण चाहा था, लेकिन विडंबना यह थी कि मेरा छिंदवाड़ा का पुलिस केस कोर्ट से तो निरस्त हो गया था, पर सोनी परिवार ने व्यक्तिगत केस कोर्ट में लगा दिया था। मैं कोर्ट के गलियारों में अपमान और मानसिक कष्ट झेल रहा था।
उसी दौरान, मैंने एक व्यक्तिगत सिद्धांत गढ़ लिया था। मैं कार्यालय में दी जाने वाली फ़ेयरवेल पार्टी को 'तेरहवीं' मानता हूँ। जैसे मरने के बाद तेरहवीं परिवार को मजबूरी में, सामाजिक डर के कारण करनी होती है, उसी तरह कार्यालय में फ़ेयरवेल पार्टी के लिए चंदा देते हैं। यह एक अर्थदंड क्यों? मेरे ऐसे ही विचारों के कारण हर बात के लिए अपनी एक व्याख्या रखता हूँ और उसे मैंने 'पस्तोर डॉक्टराइन' नाम दिया है। सामान्यतः मेरी यह व्याख्या प्रचलित मान्यताओं से अलग हटकर या कभी-कभी विपरीत होती है। मैंने उधार की ज़िंदगी को कभी नहीं जीना चाहा। मैं किसी की कार्बन कॉपी नहीं बनना चाहता, चाहे वह कितनी ही ख़ूबसूरत क्यों न हो। मैं एक ओरिजिनल ज़िंदगी गढ़ने की कोशिश करता हूँ, चाहे वह कितनी भी कठिन, छोटी या बदसूरत ही क्यों न हो। तो अब आप समझ गए होंगे कि मैं कभी भी अपने ट्रांसफर पर फ़ेयरवेल पार्टी क्यों नहीं लेता था। यह मेरा अपना रास्ता था।
होशंगाबाद
होशंगाबाद का अतीत और मेरा एकांत
होशंगाबाद की धरती का इतिहास बहुत पुराना है। यहाँ स्थित आदमगढ़ पहाड़ियों पर पाए गए शैलचित्र और पाषाण उपकरण दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र पाषाण काल और मध्य पाषाण काल से ही मानव बस्तियों का केंद्र रहा है। ये शैलचित्र लगभग 20,000 साल पुराने माने जाते हैं और मानव जीवन की गतिविधियों, पशुओं के चित्रण, युद्ध और शिकार के दृश्यों को दर्शाते हैं। यहाँ जिराफ़ जैसे कुछ अनोखे चित्र भी मिले हैं, जो अन्य शैलचित्रों में दुर्लभ हैं।
शहर का नाम 15वीं शताब्दी में मालवा के दूसरे सुल्तान होशंगशाह गोरी के नाम पर "होशंगाबाद" पड़ा। होशंगशाह ने 1405 ई. में यहाँ एक छोटा किला बनवाया था, जैसा कि ऐतिहासिक अभिलेखों में पहली बार दर्ज किया गया है। नर्मदा के पार होशंगाबाद के उत्तर-पश्चिम में स्थित गिन्नौरगढ़ का किला गढ़ा-मंडला के गोंड साम्राज्य के अधीन रहा। बाद में, होशंगाबाद भी कुछ समय के लिए गिन्नौर शासकों के नियंत्रण में था।
1742 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव ने गंजाल नदी के पश्चिम में हंडिया की राजधानी सिरकर पर कब्ज़ा कर लिया। 1740 ई. से 1775 ई. के बीच, गंजाल के पूर्व में पड़ने वाले सिवनी मालवा, होशंगाबाद और सोहागपुर तहसील के शेष रियासतें धीरे-धीरे नागपुर के भोंसला राजा के कब्ज़े में आ गईं। भंवरगढ़ में उनके सूबेदार बेनीसिंह ने 1796 में होशंगाबाद किले पर कब्ज़ा कर लिया।
1802 से 1808 तक होशंगाबाद और सिवनी पर भोपाल नवाब का कब्ज़ा रहा, लेकिन 1808 में नागपुर के भोंसला राजा ने इसे फिर से हासिल कर लिया। 18वीं सदी के अंत तक यह क्षेत्र सिंधिया के हाथों में आ गया था। अंग्रेजों का नियंत्रण: 1817 के अंतिम एंग्लो-मराठा युद्ध में, होशंगाबाद पर अंग्रेजों का कब्ज़ा हो गया और 1818 में अप्पा साहिब भोंसला द्वारा किए गए अनंतिम समझौते के तहत इसे अंग्रेजों को सौंप दिया गया।
यह सब इतिहास मैं शहर के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घाट, सेठानी घाट पर बैठा हुआ सोचता रहता था। सेठानी घाट अपनी सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह नर्मदा जयंती जैसे त्योहारों पर विशेष आयोजनों का केंद्र होता है, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। यह घाट नर्मदा नदी में स्नान और पूजा-अर्चना के लिए एक पवित्र स्थान माना जाता है।
लेकिन इस ऐतिहासिक शहर में, मुझे कलेक्टर ने कोई ढंग का काम नहीं दिया। मुझे प्रांगण में बाहर एक कमरा बैठने के लिए दिया गया था। सामने नर्मदा होने से गर्मियों में वहाँ दिन में नदी की रेत इतनी गर्म हो जाती थी कि उस कमरे में बैठना मुश्किल हो जाता था। बिना काम के बैठना और भी कठिन था।
किसी ज़माने में मुरैना में मेरे एक नायब तहसीलदार थे मिस्टर पटेल, उन्हें कलेक्टर ने ए.डी.एम. बना रखा था। जबकि सीनियरिटी से उन्हें नहीं, मुझे ए.डी.एम. बनाना चाहिए था। वह चाहती थीं कि मैं उनसे उनके घर पर मिलकर यह पद माँगू, लेकिन मैंने यह करना उचित नहीं समझा। मेरे पास गाड़ी भी नहीं थी। मैं अपना स्कूटर बेच चुका था। मुझे वाहन लोन चुकाना था। मैं रेस्ट हाउस में रुका था। मैंने एक रिक्शावाले को रोज़ मुझे ले जाने तथा लाने के लिए लगा लिया था। कलेक्टर के जो चहेते ऑफ़िसर्स थे, उन्हें मकान, गाड़ी, चपरासी तथा अच्छे पद मिले हुए थे।
मैं रोज़ रिक्शे से सेठानी घाट जाता, पोहा, जलेबी तथा लस्सी का नाश्ता कर रिक्शे से ऑफ़िस आता। दिन भर कमरा बंद कर बैठता। किताबें पढ़ता। मैंने होशंगाबाद कॉलेज के पुस्तकालय की सदस्यता ले ली थी। कुछ फ़ाइलें आती थीं। मैंने अपने स्टाफ़ को कहा कि "दोपहर में किवाड़ खोलूँ तो पुरानी फ़ाइलें ले जाना और नई दे जाना।" दिन भर मैं दरवाज़ा बंद रखता। मेरे पास काम नहीं था, मैं कलेक्टर को चाहता नहीं था, तो न तो कोई मिलने आता, न बात करता।
कुछ दिन बुरा लगा, फिर मज़ा आने लगा। छिंदवाड़ा के मानसिक तनाव के बाद मुझे ज़रूरत भी थी बहुत आराम की, अपने मन के मनोविज्ञान को समझने की। मैं सोचता, "भगवान कितना दयालु है।" कुछ दिन बाद मुझे एक शासकीय मकान मिल गया। परिवार तथा सामान ले आया। बाज़ार जाकर सब्ज़ी-सामान लाने के लिए एक साइकिल ख़रीद ली। यहाँ मेरा कोई सोशल सर्किल नहीं था। और मुझे ओशो को पढ़कर एकांत और अकेलेपन का अर्थ समझ में आ गया था। हर सप्ताह मैं एक नया उपन्यास पढ़ लेता था।
न तो मुझे किसी मीटिंग में बुलाया जाता, न किसी कार्यक्रम में। वेतन पूरा, काम धेले का नहीं। मुझे 'शासकीय दामाद' का अर्थ समझ आया। मुझे कोई जल्दी नहीं थी। मैं अख़बारों में लेख लिखने लगा। हर सप्ताह एक लेख लिखता। गाँव, ग़रीबी और बेरोज़गारी मेरे प्रिय विषय थे। कलेक्टर बीच-बीच में उनके भरोसे के लोगों से मेरे बारे में पूछती रहती थीं। "मैं क्या करता हूँ? किससे मिलता हूँ?" मैं कार्यालय के टी क्लब भी नहीं जाता था। सबके लिए अजनबी, अजूबा था। किसी को मेरे बारे में कुछ पता नहीं। सब कलेक्टर को मेरी दिनचर्या बताते कि मैं ठीक समय पर रोज़ ऑफ़िस आता हूँ, कमरा बंद कर दिन भर बैठता हूँ और सही समय पर शाम को रिक्शे में बैठकर घर चला जाता हूँ। मुझे कभी न तो बुरा लगता, न किसी से बात करने की इच्छा होती।
महिला हठ और राजहठ
एक दिन शाम को मैं घर जाने के लिए निकल रहा था, तभी कलेक्टर का चपरासी दौड़ता हुआ आया। बोला, "मैडम बुला रही हैं।" मैं जैसा था, चला गया। उन्होंने बैठने को कहा। फिर मेरे बारे में बातें करने लगीं। पूछने लगीं कि मैं आजकल क्या करता हूँ। मैंने उन्हें सही-सही बताया और कहा कि, "बहुत सालों से कई उपन्यास पढ़ने की आकांक्षा थी, जो आपकी मेहरबानी से अब पूरी हो रही है।" उस समय मेरे हाथ में विमल राय की किताब 'कौड़ियों के मोल' थी, जो बहुत मोटी किताब है। वह उस किताब को देखकर हँस दीं।
अजिता वाजपेई के पिता भोपाल में बिरला के लाइज़न ऑफ़िसर थे। उनकी सरकार में बहुत पैठ थी। मैडम बहुत पढ़ी-लिखी तो थीं ही, ख़ूब ख़ूबसूरत भी थीं। अपने विद्यार्थी जीवन में यूथ कांग्रेस में महामंत्री भी रही थीं।
प्रदेश में कांग्रेस का शासन था, तो सभी उन्हें जानते थे। उनके बारे में यह सब बहुत-सी बातें उन्होंने ख़ुद बताई थीं। उन्होंने अमित पांडे जी से शादी की थी, इसलिए वह दो सरनेम अपने नाम के साथ लगाती थीं। हमारे यहाँ रिवाज रहा है कि जब लड़की की शादी होती है, तो वह पति के सरनेम का उपयोग करती है, लेकिन जब से नारी स्वतंत्रता का आंदोलन भारत में चला, तब से कुछ महिलाएँ पिता के साथ पति का सरनेम उपयोग में लाने लगी हैं। उन्हें अपने आप पर बहुत मान था, जिसे दूसरे घमंड कहते थे, और हो भी क्यों न। महिला हठ और राजहठ साथ-साथ थे।
उन्होंने यकायक मुझसे कहा कि वह मुझे इटारसी का एस.डी.एम. बना रही हैं और मुझे अभी रात को ही चार्ज लेना है। मैंने अनुरोध किया कि, "मैं इटारसी नहीं जाना चाहता। मेरे बच्चे होशंगाबाद में पढ़ रहे हैं और यदि बीच सत्र में स्कूल बदलेगा, तो उनको दिक़्क़त होगी।" मुझे पता था कि इटारसी के एस.डी.एम. का कोई शासन से पद स्वीकृत नहीं है, इसलिए न तो वहाँ इटारसी के एस.डी.एम. का कोई ऑफ़िस है, न गाड़ी और न ही घर।
वह मिस्टर सक्सेना, इटारसी के एस.डी.एम. थे, वह मेरे पूर्व परिचित थे। वहाँ की समस्या वह बताते रहते थे। रेलवे जंक्शन होने के कारण प्रोटोकॉल की ड्यूटी बहुत थी। भोपाल तक से अधिकारी ट्रेन लेने के लिए इटारसी आते थे, उनके टिकट, खाना और दूसरी व्यवस्थाएँ करनी होती थीं, जिसके लिए कोई बजट नहीं था। हर माह पटवारी, राजस्व निरीक्षक, नायब तहसीलदार तथा तहसीलदार चंदा देते थे।
पटवारी किसानों से रिश्वत लेते और प्रोटोकॉल फ़ंड में जमा करते। यह व्यवस्था वर्षों से चली आ रही है और अभी भी जारी है। राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार की एक जड़ यह चंदा है। शासन सभी अधिकारियों को टीए-डीए देती है, लेकिन जब वरिष्ठ अधिकारी भ्रमण पर आते हैं, तब गेस्ट हाउस या सर्किट हाउस का ख़र्च इसी फंड से होता है, जो तहसीलदार करते हैं। यह उनकी ड्यूटी का अभिन्न अंग है। राजस्व अधिकारी संघ, पटवारी संघ और राजस्व निरीक्षक संघ को कभी इस व्यवस्था का विरोध करते नहीं देखा, क्योंकि जो रुपया जनता से लिया जाता है, उसका छोटा हिस्सा इस फंड में जाता, शेष निजी फंड में।
मुझे समझ नहीं आया कि मिस्टर सक्सेना तो उनके ख़ास अधिकारी थे, अब उन्हें हटाकर मुझे क्यों भेज रही हैं? उन्होंने कहा, "तुम बच्चों को सेशन के अंत तक होशंगाबाद में ही रखो। तुम्हारा शासकीय घर रहेगा।"
फिर मैंने कहा, "मेरे पास गाड़ी नहीं है, रात को कैसे जाएँगे?" उन्होंने सिंचाई विभाग की एक गाड़ी मुझे दे दी। मेरा आदेश टाइप होकर आ गया। मैं एक बार फिर एक अनचाही और जटिल परिस्थिति में धकेल दिया गया था।
इटारसी
एक अनचाही रात
"त्रिया हठ" के सामने मेरे सारे तर्क परास्त हो चुके थे। उन्होंने तत्काल जाने को कहा। रात को चार्ज लेना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने सुबह जाने का अनुरोध किया। लेकिन मैडम का 'त्रिया हट' बीच में आ गया। मुझे अपने तर्कों के सब हथियार डालकर सरेंडर करना पड़ा। मैं रात दस बजे सक्सेना जी के पास पहुँचा। वह सोने जा रहे थे। वह एस.डी.एम. का पद किसी भी क़ीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने मैडम को ख़ुश रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। आदेश देखकर वह चौंक गए। उन्होंने चार्ज नहीं देने का मन बना लिया था।
उन्होंने दो-तीन नेताओं को फ़ोन लगाए। विधायक को फ़ोन लगाया। इटारसी से विजय दुबे 'काकू भाई' मंत्री थे, उन्हें फ़ोन लगाया। उस समय लैंडलाइन फ़ोन होते थे, जहाँ हम सक्सेना जी के घर में बैठे थे, उनका फ़ोन वहीं था। मैडम को फ़ोन लगाने की हिम्मत उनमें नहीं थी। अब मुझे एहसास हुआ कि वह क्यों मुझे रात को चार्ज लेने की ज़िद कर रही थीं। वह जानती थीं कि यदि सक्सेना को समय मिलेगा, तो वह उनके आदेश को निरस्त करवा लेंगे। आधी रात के बाद, लगभग एक बजे, उन्होंने हार मानकर चार्ज दे दिया।
रेलवे के पहियों पर बसा शहर
इटारसी जंक्शन रेलवे स्टेशन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले में स्थित एक बेहद महत्वपूर्ण और भारत के सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शनों में से एक है। यह भारतीय रेलवे नेटवर्क के पश्चिम मध्य रेलवे क्षेत्र के भोपाल मंडल के अंतर्गत आता है। इटारसी भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित है, और यह उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाले कई प्रमुख रेलवे मार्गों का केंद्र बिंदु है।
इसे "भारत का दिल" भी कहा जाता है, क्योंकि यह देश के विभिन्न हिस्सों से आने-जाने वाली ट्रेनों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह भारत का आठवाँ सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शन है। यहाँ से प्रतिदिन 300 से 420 से अधिक ट्रेनें गुज़रती हैं, जिसमें यात्री और मालगाड़ियाँ दोनों शामिल हैं। यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन और नागपुर जंक्शन के बाद सबसे महत्वपूर्ण जंक्शन स्टेशनों में से एक है।
इटारसी में एक बड़ा लोकोमोटिव शेड है, जहाँ डीज़ल और इलेक्ट्रिक इंजनों का रखरखाव किया जाता है। कई ट्रेनों का यहाँ लोकोमोटिव बदला जाता है, ख़ासकर जब वे एक इलेक्ट्रिक ट्रैक से डीज़ल ट्रैक या इसके विपरीत जाती हैं।
इटारसी का इतिहास मुख्य रूप से 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय रेलवे के विकास के साथ शुरू होता है। इससे पहले, यह एक छोटा-सा ग्रामीण क्षेत्र था। इटारसी नाम की उत्पत्ति के बारे में कई धारणाएँ हैं।
सबसे प्रचलित धारणा यह है कि यह दो शब्दों से बना है: 'ईंट', जिसका अर्थ है ईंट, और 'तारसी', एक प्रकार का पेड़। यह माना जाता है कि यहाँ ईंट भट्टे थे या ईंटों का व्यापार होता था, और "तारसी" नामक पेड़ों की बहुतायत थी, जिससे इसका नाम "ईंट-तारसी" से बदलकर इटारसी पड़ गया। 1866-1869 के आसपास ग्रेट इंडियन पेनिनसुलर रेलवे (GIPR) ने नागपुर से इटारसी तक और फिर इटारसी से जबलपुर तक रेल लाइन बिछाई, जिससे इटारसी एक महत्वपूर्ण रेलवे केंद्र बन गया।
1884 में भोपाल रियासत तक रेलवे लाइन का विस्तार हुआ, जिससे इटारसी की केंद्रीय भूमिका और भी मज़बूत हो गई। इटारसी शहर का इतिहास अविभाज्य रूप से भारतीय रेलवे के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह एक ऐसा शहर है, जो रेल के पहियों पर विकसित हुआ और आज भी अपनी पहचान और प्रगति के लिए अपने रेलवे जंक्शन पर बहुत अधिक निर्भर करता है।
प्रशासनिक भूलभुलैया और एक अहंकारी जंग
अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व, इटारसी एक उपखंड है, तो उपखंड का प्रमुख राजस्व अधिकारी होता है। वह भूमि अभिलेखों के रखरखाव, राजस्व वसूली, सीमांकन विवादों के निपटारे और विभिन्न राजस्व मामलों में अपील सुनने का कार्य करता है। क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने में भी उसकी भूमिका होती है। वह तहसीलदार और नायब तहसीलदार जैसे अधिकारियों के कार्यों का पर्यवेक्षण करता है।
तहसीलदार/नायब तहसीलदार, इटारसी तहसील में तहसीलदार प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है। वह अपने क्षेत्र में राजस्व संग्रह, भूमि अभिलेखों का प्रबंधन, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र जैसे विभिन्न प्रमाण पत्र जारी करने और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए ज़िम्मेदार होता है। नायब तहसीलदार तहसीलदार की सहायता करते हैं और छोटे प्रशासनिक कार्यों को संभालते हैं। पटवारी ग्राम स्तर पर भूमि अभिलेखों और राजस्व संबंधी कार्यों को देखते हैं, और वे तहसीलदार के अधीन कार्य करते हैं।
ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए इटारसी एक विकासखंड ब्लॉक भी है। यहाँ एक जनपद पंचायत है, जिसके निर्वाचित सदस्य ग्रामीण क्षेत्रों के विकास संबंधित निर्णयों में भाग लेते हैं। एक मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत का प्रशासनिक प्रमुख होता है, जो विभिन्न ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करता है।
अनुविभागीय अधिकारी पुलिस अनुविभाग स्तर पर क़ानून और व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी होता है। इटारसी में पुलिस थाने का नेतृत्व थाना प्रभारी करते हैं। वे अपने अधिकार क्षेत्र में क़ानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की जाँच करने और अपराधियों को पकड़ने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं।
इटारसी में एक नगर पालिका है, जो शहर के स्थानीय शासन और नागरिक सुविधाओं के लिए ज़िम्मेदार है। यह इटारसी शहर की स्थानीय स्वशासन इकाई है। इसमें वार्डों से सीधे चुने गए पार्षद होते हैं। एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव किया जाता है।
परिषद शहर के विकास और नागरिक सुविधाओं से संबंधित प्रस्तावों और नीतियों पर निर्णय लेती है। मुख्य नगर पालिका अधिकारी (सी.एम.ओ.) नगर पालिका का प्रशासनिक प्रमुख होता है। वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक अधिकारी होता है। वह परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने, नगर पालिका के कर्मचारियों का प्रबंधन करने, बजट तैयार करने और शहर की नागरिक सुविधाओं जैसे स्वच्छता, जल आपूर्ति, सड़क रखरखाव, स्ट्रीट लाइट, ड्रेनेज और जन्म-मृत्यु पंजीकरण आदि को सुनिश्चित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है। वह राज्य सरकार और नगर पालिका के बीच एक कड़ी के रूप में भी कार्य करता है।
जब मैंने वहाँ कार्यभार सँभाला, तब वहाँ की नगर पालिका भंग हो गई थी। मुझे प्रशासक नगर पालिका का चार्ज भी दिया गया। इटारसी शहर राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक शहर था, जहाँ स्थानीय प्रेस भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था। इटारसी में कई हिंदी समाचार पत्रों के स्थानीय संस्करण या रिपोर्टर सक्रिय रहते हैं।
ये समाचार पत्र शहर और आसपास के क्षेत्रों की स्थानीय ख़बरों, राजनीतिक गतिविधियों, अपराध, विकास कार्यों और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों को कवर करते हैं। कुछ प्रमुख दैनिक समाचार पत्र जिनके यहाँ ब्यूरो या रिपोर्टर हो सकते हैं, उनमें शामिल थे: दैनिक भास्कर, नई दुनिया। कुछ स्थानीय केबल नेटवर्क भी होते थे, जो इटारसी और नर्मदापुरम ज़िले की स्थानीय ख़बरें प्रसारित करते थे।
ये चैनल आमतौर पर छोटे स्तर पर संचालित होते थे और समुदाय-आधारित समाचारों पर ध्यान केंद्रित करते थे। आकाशवाणी के स्थानीय या क्षेत्रीय स्टेशन से भोपाल से इटारसी के लिए भी समाचार और कार्यक्रम प्रसारित होते थे।
नगर पालिका में हज़ारों समस्याएँ हमेशा खड़ी रहती थीं। मैंने रहने के लिए इटारसी विकास प्राधिकरण के भवन को चुना। मिस्टर सक्सेना किराये के घर में रहते थे। इस भवन में हमारा अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय था।
जिसे मैंने तहसील कार्यालय में स्थानांतरित करने का निर्णय लिया। मैंने अपने स्टाफ़ को अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय तहसील कार्यालय में स्थानांतरित करने का निर्देश देकर होशंगाबाद आ गया। अगले दिन रविवार था। नगर पालिका के लोगों ने अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व कार्यालय का सामान तहसील कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया। अगले दिन एक लोकल न्यूज़ पेपर ने ख़बर छापी कि "अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय चोरी हो गया है।"
मुझे कलेक्टर ने बुलाकर पूछा कि, "अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय क्यों हटाया? मुझसे क्यों नहीं पूछा?" मैंने उन्हें बताया कि, "उस भवन में मैं रहूँगा, इसलिए अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय तहसील कार्यालय में शिफ़्ट कर दिया है।" वह बोलीं कि, "इटारसी बहुत संवेदनशील शहर है, वहाँ मैं कोई भी काम उनसे बिना पूछे न करूँ।" उन्होंने कार्यालय दोबारा उसी बिल्डिंग में शिफ़्ट करने का निर्देश दिया। मैंने वह नहीं माना। वह बहुत नाराज़ हो गईं।
उन्होंने फिर बुलाकर अपनी बात दोहराई और कार्यालय को शिफ़्ट न करने को कहा। जब मैंने कारण जानना चाहा, तो उन्होंने मंत्री जी का नाम लिया। तब वहाँ विजय दुबे 'काकू भाई' विधायक तथा मंत्री थे। वह सरकार में सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री के पद पर थे। मैं इटारसी आकर उनसे मिला और उन्हें मैंने कार्यालय शिफ़्ट करने के अपने निर्णय से राज़ी कर लिया। कलेक्टर मैडम मेरे इस काम से ख़ुश नहीं हुईं। उन्होंने दोबारा कार्यालय पुराने भवन में शिफ़्ट करने को नहीं कहा। मैंने उस भवन को ठीक करवाकर अपना परिवार होशंगाबाद से इटारसी शिफ़्ट कर लिया।
पस्तोर डॉक्टराइन और मानवता की खोज
अब तक मुझे प्रशासन करने की कुछ समझ विकसित हो गई थी। मैंने 'पस्तोर डॉक्टराइन' के तहत शासकीय अधिकारियों-कर्मचारियों के व्यवहार को समझने की कोशिश की। मैं अक्सर सोचता कि आम आदमी के साथ शासकीय कार्यालयों के लोग हमेशा अच्छा बर्ताव क्यों नहीं करते? काम समय पर क्यों नहीं होते? हमेशा काम टालने, निर्णय न लेने की प्रवृत्ति क्यों होती है? ज़्यादातर लोग नेगेटिव क्यों सोचते हैं? योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी क्यों नहीं होता? लोग मजबूरी में सहायता न कर फ़ायदा क्यों उठाते हैं?
मैंने जब लोगों को बहुत बारीकी से देखना-समझना शुरू किया कि व्यक्ति का जो स्वभाव है, वह मजबूरी में किसी दूसरे तरह का काम कर रहा है। स्वभाव के अनुरूप काम न कर पाने के कारण वह रोज़ अपने अंदर लड़ रहा है, इसलिए बाहर उसका व्यवहार सकारात्मक नहीं होता।
दूसरे, हर व्यक्ति सोचता है कि जो उसकी योग्यता है, उसके अनुरूप उसे काम नहीं दिया गया है। चपरासी बाबू बनना चाहता है। बाबू बड़े बाबू बनना चाहता है। बड़े बाबू अधिकारी बनना चाहता है और कलेक्टर चीफ़ सेक्रेटरी बनना चाहता है। अपने वर्तमान जीवन से कोई संतुष्ट नहीं है।
यदि आप सरकारी दफ़्तर में जाएँ और बाबू बिलकुल ख़ाली बैठा होगा, लेकिन आप को देखकर वह अपने आप को बिज़ी दिखाने के लिए कभी इस फ़ाइल को उठाता है, कभी उस फ़ाइल को। कभी टेबल की दराज खोलकर कुछ निकालेगा।
लेकिन आप की तरफ़ नहीं देखेगा। वह 'नोबडी' से 'समबडी' बनने की कोशिश कर रहा है। वह आपको बताना चाहता है कि उसके पास बहुत ताक़त है। कार्यालय के प्रति उदासीनता दिखती है कि वह अंदर से संतुष्ट नहीं है। इसी कारण अधिकांश लोग बीमारियों के शिकार हैं। उन्हें हाइपरटेंशन, इनसोम्निया, ब्लड प्रेशर, हार्ट और कभी-कभी कैंसर जैसी बीमारियाँ पकड़ लेती हैं।
अब एक साधारण बात देखें: एक सरकारी आदमी अपने घर के ड्राइंग रूम में बमुश्किल एक घंटा भी नहीं बैठता, पर उसे सजाकर रखता है और दूसरी ओर कार्यालय की कुर्सी-टेबल पर आठ से दस घंटे अपने जीवन के व्यतीत करता है, उसे गंदा, धूल से भरा रखता है।
उसके पास कम से कम तीन साल पुराने कैलेंडर टँगे होते हैं। वह उन्हें उतारकर नहीं सकता। पुरानी फ़ाइलें अलमारियों में भरी पड़ी हैं और चालू फ़ाइलें बाहर धूल खा रही हैं। डस्टबिन महीनों से ख़ाली नहीं हुआ है। टेबल क्लॉथ फट रहा है। इन सब को वह अपना नहीं मानता, इसलिए ठीक नहीं करता। वह सोचता है कि यह सरकारी काम है, कोई और साफ़-सफ़ाई करेगा। जबकि फ़ाइलों पर जमी धूल और फफूंद उसके फेफड़ों को बीमार कर रहे हैं। चारों ओर बिखरी फ़ाइलें प्राणवायु को सोख रही हैं। वह शाम तक थक जाता है। उसे पर्याप्त प्राणवायु नहीं मिलती है।
मैं लोगों को इन बातों के प्रति जागरूक करने की कोशिश करता रहा हूँ और बहुत अच्छे परिणाम आए हैं। मैंने कार्यालय साफ़-सुथरा रखने का हर ऑफ़िस में अभियान चलाया। लोगों को बताया कि "तुम उनका काम करो या न करो, कम से कम व्यवहार तो आदमी जैसा करो। लोगों की समस्याओं को समझो, अपने अधिकारों को जानो और देखो क्या कुछ सकारात्मक कर सकते हो। क्या कल पर टालने की जगह आज कोई निर्णय ले सकते हो?"
मेरे हिसाब से नियम-क़ानून हमें एक स्पेस देते हैं, जो नदी के दो किनारों की तरह होते हैं, जिसे विवेक का अधिकार कहते हैं। कोई क़ानून हाँ या ना में नहीं होता है। अब यह हमारा चुनाव है कि हम नेगेटिव सोचकर निर्णय लें या सकारात्मक सोच के साथ। आपके देखने का नज़रिया है, आप की नज़रें हैं, वह क्या देख रही हैं। क़ानून की आप कैसे व्याख्या कर रहे हो। मैं आप को ग़लत काम करने या क़ानून तोड़ने, अधिकार क्षेत्र के बाहर जाकर काम करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ। मैं नज़रिया बदलने की बात कर रहा हूँ। यह बदलाव आपके जीवन को ख़ुशियों से भर देता है।
न्याय की नई परिभाषा
मैं आप को एक उदाहरण से समझाता हूँ। इटारसी रेलवे स्टेशन पर जब गाड़ी रुकती, तब लोग प्लेटफ़ॉर्म पर आते। रेलवे पुलिस ग़रीब लोगों को पकड़ लेती। उन पर उस समय के क़ानून दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 या 109 लगाते और उसके विरुद्ध प्रकरण बनाते कि अमुक व्यक्ति प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर अपराध करने की नीयत से अपनी उपस्थिति बाथरूम में घुसकर छुपा रहा था या अपनी पहचान सही नहीं बता रहा था।
पुलिस को अपराध रोकने के लिए हर माह टारगेट दिया जाता था कि कितने लोगों को गिरफ़्तार करना है। इस ग़रीब व्यक्ति का सामान उसके डिब्बे में ट्रेन के साथ चला गया। परिवार बिछड़ गया। उसके पास वकील लगाने को पैसा नहीं है। कई लोग हिंदी नहीं बोल पाते थे, ख़ासकर दक्षिण भारत के लोग। इन्होंने बस इतनी ग़लती की कि वह प्लेटफ़ॉर्म पर उतरे थे। उन्हें सामान्यतः जेल भेज दिया जाता था। महीनों तक उनके परिवार को पता नहीं होता कि आदमी कहाँ ग़ायब हो गया। वर्षों जेल में बिना किसी अपराध के बंद रहता।
अब भारतीय दंड संहिता में यह प्रावधान है कि यदि वह व्यक्ति ज़मानत या व्यक्तिगत मुचलका देकर यह लिख दे कि वह छह माह तक कोई अपराध नहीं करेगा, तो कार्यपालिक मजिस्ट्रेट उसे ज़मानत मुचलके पर छोड़ सकता है या उसे वचनबद्ध कर प्रकरण समाप्त कर सकता है। मैंने अपने रीडर से कहा कि, "ऐसे प्रकरणों में हम उससे लिखित में लें कि वह साल भर हमारे अधिकार क्षेत्र में कोई अपराध नहीं करेगा।
उसे उनके मुचलके पर छोड़ देंगे। मैं किसी बेकसूर आदमी को जेल नहीं भेजूँगा।" मैंने साइक्लोस्टाइल करवाकर काग़ज़ तैयार करवा दिए। जब कोई आदमी आता, उसे रिहा कर प्रकरण निपटा देता था। मुझे पता था कि पुलिस-वकील मेरे इस काम से ख़ुश नहीं होंगे। एक मासिक बैठक में पुलिस अधीक्षक ने कलेक्टर से मेरी शिकायत की। मैं अचूक सारे पुलिस केस लेकर गया था। पुलिस की समस्या यह है कि थाने के मुंशी बहुत पढ़े-लिखे नहीं होते। वह एक जैसे वाक्य बनाकर सभी प्रकरणों में एक जैसा लिखते थे। सब में यही लिखा था कि, "अमुक व्यक्ति प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन पर अपराध करने की नीयत से अपनी उपस्थिति बाथरूम में घुसकर छुपा रहा था या अपनी पहचान सही नहीं बता रहा था।"
मैंने पुलिस अधीक्षक को वह प्रकरण पढ़कर सुनाए कि, "रेलवे का बाथरूम एक कमरे का है, उसमें कोई व्यक्ति अपने को कैसे छुपा सकता है?" सब लोग मेरी बात समझ गए। मैंने अपना काम जारी रखा। किसी को जेल नहीं भेजा। सबको ज़मानत मुचलके पर छोड़ता रहा। किसी वकील की ज़रूरत नहीं रही। मेरा रीडर ही फ़ॉर्म भर देता, दस्तख़त कर देता, आदमी चला जाता था।
तेंदूपत्ता, टेंडर और तानाशाही
प्रशासन जब भी कोई कार्यक्रम या अभियान व्यापक स्तर पर चलाना चाहता है, तो उसको चलाने की जवाबदारी कलेक्टर की होती है। वह कार्यक्रम चाहे किसी भी विभाग से संबंधित हो। पहली बार मध्य प्रदेश में तेंदूपत्ता ख़रीदी नीति बनाई गई। मध्य प्रदेश तेंदूपत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1964 और इसके तहत बनाई गई नियमावली द्वारा तेंदूपत्ता के व्यापार में राज्य का एकाधिकार स्थापित करना और तेंदूपत्ता संग्राहकों के हितों की रक्षा करना था।
तेंदूपत्ता के व्यापार पर राज्य सरकार का एकाधिकार है। किसी अन्य व्यक्ति या ठेकेदार को तेंदूपत्ता का व्यापार करने की अनुमति नहीं थी। संग्रहण सहकारी समितियों के माध्यम से: तेंदूपत्ता का संग्रहण प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाना था। इन समितियों को संग्राहकों से सीधे तेंदूपत्ता ख़रीदना था। नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य तेंदूपत्ता संग्राहकों, विशेषकर जनजातीय समुदाय को आर्थिक लाभ पहुँचाना है।
राज्य सरकार तेंदूपत्ता संग्राहकों को उचित पारिश्रमिक देने के लिए संग्रहण दर में वृद्धि करना तथा तेंदूपत्ता के व्यापार से होने वाले शुद्ध लाभ का एक हिस्सा संग्राहकों के साथ बाँटा जाना था। बिचौलियों को ख़त्म करने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए, सरकार संग्राहकों को तेंदूपत्ता के बोनस की राशि सीधे उनके खाते में पहुँचाने का प्रयास करती थी।
मध्य प्रदेश में तेंदूपत्ता के व्यापार के लिए एक त्रिस्तरीय सहकारी संरचना बनाई गई: शीर्ष स्तर पर मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित (M.P. State Minor Forest Produce Federation), द्वितीय स्तर पर ज़िला वनोपज सहकारी संघ (District Forest Produce Cooperative Unions) तथा प्राथमिक स्तर पर प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियाँ (Primary Forest Produce Cooperative Societies)।
तेंदूपत्ता उगाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को, यदि उनके द्वारा उगाए गए पत्तों की मात्रा एक मानक बोरे से अधिक होने की संभावना हो, तो अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य था। तेंदूपत्ता व्यापार विनियमन अधिनियम का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और कारावास का प्रावधान है। सरकार तेंदूपत्ता ख़रीद प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और उसकी निगरानी करने पर ज़ोर दे रही थी, ताकि संग्राहकों को उनके हक़ का पूरा लाभ मिल सके। यह नीति मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, विशेषकर वनवासी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करती है।
इस योजना को शुरू करवाने में राजस्व अधिकारियों को वन विभाग के अधिकारियों को सहायता करना था। कलेक्टर ने तेंदूपत्ता संग्रहण का टारगेट हम लोगों को दिया था, जिसकी साप्ताहिक समीक्षा होती थी। मज़ा तो जब आया, जब कलेक्टर यह देखने लगीं कि किसने कितने लंबे तेंदूपत्ता का संग्रहण किया है। हम लोग लंबे से लंबा पत्ता ढूँढ़कर बैठक में ले जाते थे।
कमिश्नर, कोर्ट और एक हास्यास्पद बचाव
एस.डी.एम. को मध्य प्रदेश राज्य में राजस्व क़ानूनों के तहत "राजस्व न्यायालय" के रूप में शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। जब एस.डी.एम. इन राजस्व मामलों में न्यायिक या अर्ध-न्यायिक क्षेत्र में कार्य करता है, तो उसके द्वारा पारित आदेशों के ख़िलाफ़ उच्च राजस्व अधिकारियों (जैसे कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या राजस्व बोर्ड) के समक्ष अपील या पुनरीक्षण (रिविज़न) दायर किया जा सकता है।
उदाहरण के लिए, भूमि विवाद, नामांतरण (म्यूटेशन), सीमांकन, भूमि अभिलेखों से संबंधित मामले, अतिक्रमण हटाना आदि ऐसे मामले हैं, जहाँ एस.डी.एम. राजस्व न्यायालय के रूप में कार्य करता है। ऐसे मामलों में, उसके निर्णयों की समीक्षा या पुनरीक्षण उच्च राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जा सकता है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि एस.डी.एम. का न्यायालय पूर्ण सिविल न्यायालय नहीं है। सिविल न्यायालयों को संपत्ति के स्वामित्व, अधिकार और हित से संबंधित सभी प्रकार के दीवानी मामलों को तय करने का व्यापक अधिकार होता है। यदि कोई मामला विशुद्ध रूप से संपत्ति के स्वामित्व या अन्य सिविल अधिकारों से जुड़ा है, तो एस.डी.एम. अक्सर पक्षकारों को सिविल न्यायालय में जाने का निर्देश देता है। एस.डी.एम. केवल क़ब्ज़े से संबंधित विवादों (जैसे भारतीय दंड संहिता की धारा 145 के तहत) में अंतरिम आदेश दे सकता है, लेकिन स्वामित्व का अंतिम फ़ैसला सिविल कोर्ट ही करती है।
पुनरीक्षण बनाम अपील: जब किसी निर्णय से असंतुष्ट पक्ष उस निर्णय को उच्च प्राधिकारी के समक्ष चुनौती देता है, तो वह अपील कहलाती है। राजस्व मामलों में, एस.डी.एम. के आदेशों के ख़िलाफ़ कलेक्टर या उच्च अधिकारी के पास अपील दायर की जा सकती है। पुनरीक्षण एक ऐसी शक्ति है, जिसके तहत एक उच्च न्यायालय या प्राधिकारी निचली अदालत या प्राधिकारी के रिकॉर्ड को यह देखने के लिए माँग सकता है कि क्या कोई आदेश क़ानूनी रूप से सही था, या उसमें कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि थी।
राजस्व बोर्ड या संभागीय आयुक्त अक्सर एस.डी.एम. के आदेशों की वैधानिकता या औचित्य की जाँच के लिए पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हैं, ख़ासकर जब अपील का कोई प्रावधान न हो या विशिष्ट परिस्थितियों में।
प्रशासनिक और कार्यकारी कार्य: एस.डी.एम. के पास व्यापक प्रशासनिक और कार्यकारी शक्तियाँ भी होती हैं, जैसे क़ानून और व्यवस्था बनाए रखना, विभिन्न लाइसेंस जारी करना (जैसे हथियार लाइसेंस), विवाह पंजीकरण, चुनाव संबंधी कार्य आदि। इन कार्यों में "सिविल परीक्षण" की अवधारणा अलग होती है और आमतौर पर इसमें प्रशासनिक अपीलों या न्यायिक समीक्षा का मार्ग होता है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत परीक्षण।
एस.डी.एम. के पास सीधे तौर पर सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत व्यापक "सिविल पुनरीक्षण" अधिकार नहीं होते हैं, जैसे कि सिविल न्यायालयों या उच्च न्यायालयों के पास होते हैं। हालाँकि, जब वे राजस्व मामलों में न्यायिक या अर्ध-न्यायिक क्षमता में कार्य करते हैं, तो उनके निर्णयों की समीक्षा या अपील उच्च राजस्व अधिकारियों जैसे कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या राजस्व बोर्ड द्वारा की जा सकती है। यदि मामला विशुद्ध रूप से सिविल प्रकृति का है (जैसे संपत्ति के स्वामित्व का विवाद), तो एस.डी.एम. आमतौर पर पक्षकारों को संबंधित सिविल न्यायालय में जाने का निर्देश देगा।
मेरे कमिश्नर थे आदित्य विजय सिंह। वह बहुत ईमानदार, मिलनसार, हँसमुख तथा सरल अधिकारी थे। वह जब भी आते, कलेक्टर या तो टूर पर चली जाती या छुट्टी ले लेती थी। उन्हें अटेंड करने की ज़िम्मेदारी मेरी होती थी। बहुत कम मौक़े होते, जब कलेक्टर उनके साथ होती थी। वह अकसर तवा डैम के गेस्ट हाउस में रुकते थे। तवा बाँध नर्मदा नदी पर नहीं, बल्कि नर्मदा की एक प्रमुख सहायक नदी, तवा नदी पर बना हुआ है। तवा नदी सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला से निकलती है। यह मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले में स्थित है और इटारसी से इसकी दूरी लगभग 30-35 किलोमीटर है। तवा बाँध का निर्माण कार्य 1958 में शुरू हुआ था और यह 1978 में बनकर तैयार हुआ। इस बाँध का मुख्य उद्देश्य सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है।
यह नर्मदापुरम और हरदा ज़िलों में हज़ारों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करता है, जिससे किसानों को काफ़ी लाभ होता है। तवा बाँध एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है, ख़ासकर मानसून के मौसम में जब बाँध के गेट खोले जाते हैं। यहाँ का प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और आसपास की हरियाली पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहाँ नौकायन और अन्य जल-पर्यटन गतिविधियाँ भी उपलब्ध हैं। यह नर्मदा घाटी परियोजना का हिस्सा है तथा तवा बाँध नर्मदा घाटी परियोजना के तहत निर्मित बड़े बाँधों में से एक है। तवा जलाशय सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और बोरी वन्यजीव अभ्यारण्य की पश्चिमी सीमा बनाता है, जिससे इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलता है।
एक बार कमिश्नर की टीम हमारे कार्यालय का निरीक्षण करने आई। उन्होंने कुछ कोर्ट केसेज़ में कुछ छोटी-छोटी ग़लतियाँ निकालकर रिपोर्ट में लिखीं। जब कमिश्नर साहब आए, तो उन्होंने मुझे कहा कि, "मुझे तो शासन ने पढ़ने के लिए रीडर दिया है। राजस्व कोर्ट में जो बाबू काम करता है, उसे रीडर कहते हैं, तो वह पढ़ता है, क्या तुम पढ़ते हो?" मैं उनका मज़ाक़ समझ नहीं सका। मैंने कहा, "सर, मैं ख़ुद पढ़ता हूँ।" उन्होंने कहा कि, "फिर यह ग़लतियाँ क्यों हैं?" मैंने प्रत्युत्पन्नमति से जवाब दिया कि, "सर, कुछ छोटी-छोटी ग़लतियाँ मैंने जानबूझकर छोड़ दी हैं, ताकि कुछ केसेज़ की अपील आपके कोर्ट में हो सके। आख़िर ऊपर के कोर्ट के लोगों के भी तो बच्चे हैं।" वह मेरी बात पर ख़ूब हँसे।
प्रदान PRADAN, सुनील और राज नारायण का संघर्ष
इटारसी के पास कैसला जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में प्रदान PRADAN (Professional Assistance for Development Action) नामक ग़ैर-सरकारी संगठन का कार्य ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा है। प्रदान PRADAN एक प्रतिष्ठित भारतीय NGO है, जिसे 1983 में दीप जोशी, वेद आर्य और विजय महाजन जैसे दूरदर्शी व्यक्तियों द्वारा स्थापित किया गया था। दीप जोशी (जो आई.आई.टी. कानपुर और आई.आई.एम. अहमदाबाद के पूर्व छात्र थे) और विजय महाजन (आई.आई.टी. दिल्ली और आई.आई.एम. अहमदाबाद के पूर्व छात्र) दोनों ही देश के ग्रामीण इलाक़ों में ग़रीबी और पिछड़ेपन से गहराई से प्रभावित थे।
उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण ग़रीबों की मदद करने के लिए केवल धन या सरकारी योजनाएँ पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि उन्हें ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता है, जो सहानुभूति, ज्ञान और ज़मीनी स्तर पर काम करने की इच्छा रखते हों। इसी सोच के साथ, उन्होंने 1983 में प्रदान PRADAN की स्थापना की। प्रदान PRADAN का मूल दर्शन यह रहा है कि अच्छी तरह से शिक्षित और प्रेरित पेशेवर ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर काम करके उनकी आजीविका में सुधार ला सकते हैं। वे "प्रदान" (समाज को वापस देना) की भावना में विश्वास करते थे और इसे शिक्षित पुरुषों और महिलाओं के लिए एक पूर्ण और व्यवहार्य पेशा मानते थे।
प्रदान PRADAN ने मध्य प्रदेश में कई वर्षों से काम किया है, और इटारसी-कैसला क्षेत्र में उनका हस्तक्षेप इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण आजीविका को मज़बूत करना था। प्रदान PRADAN का काम हमेशा समुदाय को समझने और विश्वास बनाने से शुरू होता है। कैसला जैसे आदिवासी और ग्रामीण बहुल क्षेत्रों में, प्रदान PRADAN के प्रारंभिक कार्यकर्ताओं ने गाँव में रहकर स्थानीय आबादी की आजीविका के पैटर्न, सामाजिक संरचनाओं और सामना की जाने वाली विशिष्ट चुनौतियों का गहन अध्ययन किया होगा। उन्होंने देखा होगा कि कैसला में कृषि की अनिश्चितता, वन उत्पादों पर निर्भरता, पानी की कमी और महिलाओं के लिए सीमित अवसर प्रमुख मुद्दे थे।
प्रदान PRADAN के काम की मुख्य रणनीति महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन और उन्हें सशक्त बनाना है। कैसला में भी, उन्होंने स्थानीय महिलाओं को छोटे-छोटे समूहों में संगठित किया। इन समूहों को नियमित रूप से मिलने, छोटी बचत करने और सदस्यों को आपस में ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया गया। यह वित्तीय अनुशासन और सामूहिक निर्णय लेने की शुरुआत थी।
एस.एच.जी. (SHGs) के मज़बूत होने के बाद, प्रदान PRADAN ने महिलाओं की आजीविका बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया। उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए कौशल प्रशिक्षण दिया गया: कृषि में सुधार: बेहतर फ़सल पद्धतियाँ, जैविक खेती, सब्ज़ियों की खेती (जो अधिक आय देती है) और छोटे पैमाने पर पशुधन जैसे मुर्गी पालन या बकरी पालन। ग़ैर-कृषि आधारित कार्य: स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके हस्तशिल्प, सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण जैसी गतिविधियाँ। वित्तीय साक्षरता: महिलाओं को बैंक खातों का प्रबंधन करने, सरकारी योजनाओं के तहत ऋण प्राप्त करने और अपने छोटे व्यवसायों की योजना बनाने के लिए प्रशिक्षित किया गया। प्रदान PRADAN ने एस.एच.जी. को बैंकों से जोड़कर उन्हें संस्थागत ऋण प्राप्त करने में मदद की, जिससे वे अपनी आजीविका गतिविधियों का विस्तार कर सकें। उन्होंने महिलाओं को अपने उत्पादों को सीधे बाज़ार तक पहुँचाने में भी सहायता की, जिससे उन्हें बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और अपनी मेहनत का उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद मिली।
एस.एच.जी. केवल आर्थिक मंच नहीं थे; वे महिलाओं को सामाजिक मुद्दों पर सामूहिक रूप से आवाज़ उठाने के लिए भी सशक्त करते थे। कैसला में इन समूहों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और महिलाओं के अधिकारों जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने का काम किया होगा। उन्होंने घरेलू हिंसा, बाल विवाह और शराबबंदी जैसी समस्याओं के ख़िलाफ़ भी आवाज़ उठाई। कैसला में प्रदान PRADAN के दशकों के काम का एक गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा है। आय में वृद्धि: एस.एच.जी. से जुड़ी महिलाओं और उनके परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ। मैंने ग्रामीण विकास की रणनीति को इस संस्था का काम देखकर बहुत कुछ सीखा और उन्हें लागू किया।
इटारसी और उसके आसपास के गाँवों में, जहाँ कृषि और मज़दूरी जीवन का आधार हैं, सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ गहरी जड़ें जमाए हुए थीं। इन्हीं परिस्थितियों में, सुनील और राज नारायण नामक दो समर्पित व्यक्तियों ने समाजवाद और न्याय के आदर्शों से प्रेरित होकर एक महत्वपूर्ण यात्रा शुरू की। इसका उद्देश्य था हाशिये पर खड़े समुदायों को सशक्त करना और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक मज़बूत आवाज़ उठाना। सुनील और राज नारायण, दोनों ही डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहरे प्रभावित थे। लोहिया का "सप्त क्रांति" का सिद्धांत, जिसमें जाति, लिंग, संपत्ति, शास्त्र और रंग जैसी असमानताओं के ख़िलाफ़ संघर्ष शामिल था, उनके प्रेरणा स्रोत था।
उन्होंने महसूस किया कि इटारसी के गाँवों में व्याप्त शोषण और भ्रष्टाचार, लोहियावादी सिद्धांतों के सीधे ख़िलाफ़ हैं। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर किसानों और मज़दूरों के छोटे-छोटे समूह बनाए, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया। यह संगठन का सबसे शुरुआती और महत्वपूर्ण क़दम था, जिसमें राज नारायण की ज़मीनी पकड़ और सुनील की वैचारिक स्पष्टता ने अहम भूमिका निभाई। यह लोग हर माह अपने सदस्यों से संपर्क कर मात्र एक रुपये चंदे के रूप में लेते थे।
उनका उद्देश्य चंदा एकत्रित करना नहीं था। इस बहाने वह लोगों से मिलकर जानकारियाँ एकत्र करते थे। न्याय के लिए लड़ाई: छोटे-मोटे मामलों में, या किसी मज़दूर को पूरी मज़दूरी न मिलना, वे स्थानीय प्रशासन से सीधे बात करते और ज़रूरत पड़ने पर छोटे-मोटे धरने-प्रदर्शन भी करते।
इन वर्षों में, सुनील और राज नारायण की जोड़ी ने इटारसी के गाँव में एक विश्वसनीय नाम बना लिया था। राज नारायण अपनी बुलंद आवाज़ और निडरता के लिए जाने जाते थे, जबकि सुनील अपनी संगठनात्मक क्षमता और गहरी समझ के लिए। 'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण पैदल यात्रा इटारसी से भोपाल' तक निकली थी। छात्रों और स्थानीय लोहियावादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर, एक विशाल 'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण यात्रा' की योजना बनाई। यह यात्रा इटारसी से शुरू होकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल गई थी, जिसका मुख्य उद्देश्य राज्यव्यापी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ लोगों को एकजुट करना और सरकार पर दबाव बनाना था। यह 'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण यात्रा' मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ एक मज़बूत आवाज़ बनकर उभरी।
जब मेरी पोस्टिंग यहाँ हुई, तो मैंने उन्हें मिलने के लिए बुलाया। मैंने उनसे कहा कि, "यदि वह जनता के बीच काम करना चाहते हैं, तो पहले समस्या से मुझे सूचित करें। यदि मैं वह समस्या सुलझाने में कामयाब न हो सकूँ, तब वह आंदोलन करें।" वह इस बात पर सहमत हो गए। उनका सूचना तंत्र हमारे सूचना तंत्र से ज़्यादा कुशल था। मैं प्रशासन में सुधार लाने के लिए प्रतिबद्ध था।
भ्रष्टाचार पर धावा
इटारसी, मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) ज़िले में एक प्रमुख रेलवे जंक्शन और कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहाँ और इसके आसपास के ग्रामीण इलाक़ों में बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर हाई-टेंशन (उच्च वोल्टेज) बिजली लाइन बिछाई जा रही थी। यह हाई-टेंशन लाइनें खेतों के ऊपर से गुज़रती हैं, जिससे किसानों को अपनी कृषि गतिविधियों, जैसे ट्रैक्टर चलाना, फ़सल काटना या ऊँचे उपकरण इस्तेमाल करने में दिक़्क़त आती है।
कई बार तारों के नीचे फ़सल ख़राब हो जाती है या उसमें आग लगने का ख़तरा रहता है। किसानों को उनकी ज़मीन से गुज़रने वाली हाई-टेंशन लाइनों या टावरों के लिए उचित मुआवज़ा दिया जाना था। मैंने राजस्व की टीम बनाकर खेतों तथा पेड़ों का सर्वे करवाकर उचित मुआवज़ा देने के लिए किसानों के खातों में राशियाँ ट्रांसफ़र की थीं, जिससे किसानों में असंतोष न फैले।
एक दिन सुनील तथा राज नारायण ने मेरे कार्यालय आकर शिकायत की कि जो मुआवज़े की राशि बैंक खाते में जमा की गई थी, उसे तहसीलदार, बैंक ब्रांच ऑफ़िसर, राजस्व निरीक्षक, पटवारी तथा बिजली विभाग के अधिकारियों ने नक़द राशि निकालकर उसे छह नोटों से ढेर लगाकर आपस में बाँट ली है।
किसान को एक हिस्सा मिला है। अलग-अलग नोटों की बहुत सारी गड्डियाँ थीं, गिनने का समय नहीं था, इसलिए ढेर लगाकर बाँटा गया। मेरे लिए इस तरह रुपया बाँटने का यह नया मामला था। मैंने उनसे पूछा कि, "वह पुलिस कार्यवाही चाहते हैं या रुपया वापस करना?" उन्होंने कहा, "किसानों का पैसा वापस हो जाए तो अच्छा है। पुलिस कार्यवाही में कब पैसा मिलेगा या नहीं, यह निश्चित नहीं है।" मैंने कहा कि, "देखो, मैं प्रयास करता हूँ।"
सबसे पहले मैंने अपने आवास पर पटवारी को बुलाया। पहले उसने मना किया, फिर जब पुलिस तथा सस्पेंड करने का डर दिखाया, तो वह टूट गया। उसने पैसा लेना स्वीकार किया। मैंने अपनी गाड़ी से उसे उसके घर भेजकर रुपया मँगवा लिया। फिर एक-एक कर अधिकारियों को बुलाया और पहले उन्होंने मना किया, पर जब पटवारी से आमना-सामना करवाया, तब लोगों ने मान लिया। घटना दो दिन पहले की थी, अतः सभी राशि वसूल हो गई।
फिर सुनील तथा राज नारायण ने कहा कि, "इन्हीं अधिकारियों ने जैसे पैसा लिया है, वैसे ही गाँव में वापस किया जाए।" सब बहुत डरे थे कि कहीं लोग उन्हें मारें नहीं। मैंने पुलिस फ़ोर्स के साथ उन्हें गाँव भेजा और पहली बार लोगों ने इस तरह रिश्वत का पैसा वापस होते हुए देखा। यह अद्भुत सफल अभियान था।
अंत का आरंभ
इटारसी में तीन साल पूरे हो जाने पर मेरा स्थानांतरण सीहोर ज़िले में हो गया। यह एक नया अध्याय था, एक और शहर, एक और चुनौती। लेकिन इटारसी ने मुझे वह आत्मविश्वास दिया था, जो मुझे पहले कभी नहीं मिला था। मुझे अपने सिद्धांतों पर अडिग रहना सिखाया था, और यह भी कि अगर आप सही हैं, तो अंततः जीत आपकी ही होती है।
सीहोर
एक नया सफ़र, एक नए रास्ते की तलाश
इटारसी की उथल-पुथल भरी यात्रा के बाद, सीहोर की धरती पर मेरा आगमन हुआ। यह एक ऐसा शहर था, जिसकी पहचान अब खंडहर हो चुके सपनों की तरह दिखती थी। यहाँ हमारे कलेक्टर थे अजय सिंह, जिनके बारे में मैंने बहुत कुछ सुन रखा था। जब मैं उनसे मिला, तो मैंने पाया कि वह सचमुच बहुत सरल स्वभाव के अधिकारी थे। उनके चेहरे पर कोई तनाव नहीं था, कोई कृत्रिमता नहीं थी।
उन्होंने मुझसे सीधा सवाल किया, "तुम क्या काम करना चाहते हो?" मेरे वर्षों के प्रशासनिक अनुभव और हाल के संघर्षों ने मुझे यह सिखा दिया था कि अब अपनी पसंद से ज़्यादा, मुझे उस भूमिका को स्वीकार करना होगा, जो मुझे दी जाएगी। मैंने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया, "सर, यह आपका निर्णय होगा। जो भी आप काम देंगे, मैं बहुत मेहनत से करूँगा।"
अजय सिंह का व्यक्तित्व मेरे लिए एक खुली किताब की तरह था। वह 1983 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (आई.ए.एस.) के अधिकारी थे। उन्हें मध्य प्रदेश कैडर आवंटित किया गया था, और राज्य पुनर्गठन (वर्ष 2000 में) के बाद वह छत्तीसगढ़ कैडर में चले गए। उन्हें 11 जनवरी 2018 को छत्तीसगढ़ का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था।
मुख्य सचिव के पद पर रहने से पहले और उसके बाद भी, अजय सिंह ने छत्तीसगढ़ सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें कृषि आयुक्त और कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अपर मुख्य सचिव जैसे पद शामिल थे। जब वह कृषि आयुक्त थे, तो कई बार उन्होंने अधिकारियों को ट्रेनिंग देते मुझे बुलाया था। उनका व्यक्तित्व, उनका अनुभव, मेरे लिए किसी पाठशाला से कम नहीं था।
खंडहर हो चुकी चीनी मिल के साए में
सीहोर में मेरी शुरुआती पहचान एक ऐसे खंडहर से हुई, जो कभी इस शहर का गौरव था। सीहोर में स्थित शुगर मिल, जिसे पहले भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड के नाम से जाना जाता था, अब बंद हो चुकी है और एक खंडहर में तब्दील हो गई है। यह कभी सीहोर की पहचान थी और इस क्षेत्र के लिए रोज़गार का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी।
इस शुगर मिल की स्थापना 1938 में भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान ने की थी। यह उस समय की एक आधुनिक और महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाई थी। एक समय था जब सीहोर शुगर मिल द्वारा उत्पादित चीनी को गुणवत्ता के लिए जाना जाता था और उसके क्षेत्र को औद्योगिक पहचान दिलाई थी। यहाँ हज़ारों लोगों को रोज़गार मिलता था, जिससे आसपास के क्षेत्रों से भी लोग काम करने के लिए आते थे।
शुरू में मुझे इसी मिल के गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। यह भवन अब बहुत पुराना था, जिसकी दीवारों से एक टूटे हुए अतीत की ख़ामोशी झाँक रही थी। यह गेस्ट हाउस मेरे लिए केवल एक अस्थायी ठिकाना नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन गया था - एक प्रतीक उन सपनों का, जो कभी जीवित थे और अब केवल यादों में सिमट कर रह गए थे। इस खंडहर हो चुके वैभव के बीच रहते हुए, मैं अपने जीवन के नए पड़ाव के बारे में सोचता रहा। कुछ दिन बाद, मुझे आष्टा का एस.डी.एम. बना दिया गया।
आष्टा
अष्टावक्र की तपोभूमि में आगमन
इटारसी के प्रशासनिक युद्ध और सीहोर के खंडहरों की उदास छाया से निकलकर मैं आष्टा पहुँचा। आष्टा मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। यह इंदौर और भोपाल के लगभग बीच में, पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ है। आष्टा का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है और इसकी पहचान कई पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं से होती है। यह स्थान ऋषि अष्टावक्र की तपोभूमि था।
आष्टा शहर का नाम प्रसिद्ध ऋषि अष्टावक्र के नाम पर पड़ा है। मान्यता है कि यह स्थान उनकी तपोभूमि रहा है। ऋषि अष्टावक्र की तपोभूमि आष्टा शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर, आष्टा-शुजालपुर रोड पर एक पहाड़ी पर स्थित है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, आष्टा को माता पार्वती का पीहर (मायका) माना जाता है। शहर से निकली पार्वती नदी और उसके किनारे स्थित शिव मंदिर इस मान्यता को पुष्ट करते हैं। शहरवासी भगवान भोलेनाथ को अपना दामाद मानते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस पार्वती-शंकर मंदिर में लंकापति रावण भी भगवान शिव की स्तुति करने आता था।
कुछ मान्यताओं के अनुसार, 13वीं शताब्दी में विदर्भ के देवगिरी यादव राजाओं का राज्य यहाँ तक फैला हुआ था। कहा जाता है कि यादव राजा महादेव और रामचंद्र के मंत्री हिमाद्री ने यहाँ आठ मंदिरों का निर्माण कराया था, जिसके कारण शहर का नाम 'आष्टा' पड़ा। पार्वती नदी के किनारे स्थित शिव-पार्वती मंदिर का निर्माण कालांतर में मराठा शैली के अनुरूप पूर्व मुखी किया गया था। यह मंदिर अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। ब्रिटिश भारत के दौरान, यह क्षेत्र मिर्ज़ा अमजद बेग के अधिकार में था, जिन्हें वर्तमान आष्टा के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है।
उन्होंने न केवल शहर में परिवहन व्यवस्था लाई, बल्कि पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शिक्षा प्रणाली भी स्थापित की। आष्टा में एक पहाड़ी पर एक प्राचीन जैन मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग "किला" कहते हैं। इसमें भगवान नेमिनाथ जी की प्रमुख प्रतिमा स्थापित है। खेड़ापति हनुमान मंदिर, एक तालाब के पास हनुमान जी का मंदिर है जिसे खेड़ापति मंदिर के नाम से जाना जाता है। ईलाही माता मंदिर, यह भी आष्टा में स्थित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है।
भंवरा गाँव, आष्टा शहर से लगभग 15 किमी दूर भंवरा गाँव में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है। वर्तमान में आष्टा अपनी अनाज मंडी विशेषकर सोयाबीन और गेहूँ के लिए जाना जाता है, जो इस क्षेत्र के कृषि व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह शहर भोपाल-इंदौर राजमार्ग पर स्थित होने के कारण तेजी से विकास कर रहा है।
आष्टा के किला बिल्डिंग में उस समय तहसील तथा एस.डी.एम. कार्यालय लगते थे। ऊपरी मंजिल पर एस.डी.एम. का आवास था। यह एक पहाड़ी पर स्थित था। भवन बहुत जर्जर हालत में था। किसी तरह मरम्मत करवाकर ऑफ़िस तथा आवास मेंटेन किया जा रहा था।
'शर्मा जी' और एक अधिकारी का स्वाभिमान
हमारे एक रीडर थे शर्मा जी। शायद उन्हें मुझ पर भरोसा नहीं था कि मैं राजस्व प्रकरण सुनकर निर्णय ले सकता हूँ। जब भी मैं कोर्ट में केस सुनने बैठता, वह मेरे कान में कुछ कहने लगते। वहाँ वकील तथा पक्षकार भी होते थे। मैंने एक-दो बार उन्हें ऐसा नहीं करने को कहा, लेकिन वह आदत से मजबूर थे।
एक दिन वह मेरे कान में कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे, तब मैंने उन्हें पकड़कर ज़ोर से कहा, "शर्मा जी, आज तय कर लेते हैं कि केस कौन सुनेगा। यदि आपको लगता है कि मुझमें इतना ज्ञान नहीं है, तो मैं आपकी जगह बैठता हूँ और केस आप सुनें। और यदि आपको ऐसा लगे कि मैं केस सुन सकता हूँ, तो आप अपनी जगह बैठो।" उस दिन के बाद शर्मा जी ने मेरे कान में कुछ नहीं कहा। यह एक छोटी-सी घटना थी, पर इसने मेरे अधिकार और मेरी निर्णय लेने की क्षमता पर एक प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश की थी, जिसे मैंने सख्ती से हटा दिया।
बेईमानी का डी.एन.ए. और मेरी डायरी
मैं कई वर्षों से रिश्वत लेने के तरीक़े जब देखता, तब एक डायरी में लिखता था। तहसील कार्यालय के एक बाबू का पहले निधन हो गया था। एक दिन उसकी विधवा पत्नी ने आकर शिकायत की कि तहसील के नाज़िर बाबू ने उनकी ग्रेच्युटी के पैसे काटकर काम किया है। उन्होंने रिश्वत ली है। जब मैंने तहसीलदार के माध्यम से जाँच करवाई, तो शिकायत सही निकली। मृतक बाबू और नाज़िर बाबू दोनों अच्छे दोस्त थे, साथ का उठना-बैठना था। जब मैंने देखा कि एक बाबू अपने मरे दोस्त की पत्नी से रिश्वत ले सकता है, तो मुझे अब डायरी बनाने की ज़रूरत नहीं रही।
यह मेरे लिए एक गहन आघात था। मैंने अपनी वह डायरी पार्वती नदी के जल में प्रवाहित कर दी। मुझे पता चल चुका था कि हर सरकारी कर्मचारी, अधिकारी के हस्ताक्षर की क़ीमत है, जो देनी ही पड़ेगी। 'बाप बड़ा ना भैय्या, सबसे बड़ा रुपैय्या।' हर की क़ीमत है।
सभी बिकाऊ हैं। यह बेईमानी नहीं, नज़राना है, जो देना ही पड़ेगा। मैंने पस्तोर डॉक्टराइन के तहत एक पैरोडी बनाई थी-
‘रहिमन पैसा राखिये, बिन पैसा सब सून।
पैसा गए न उबरे मानुष मोती चून।’
मेरा मानना था कि हम भारतीयों के डी.एन.ए. में ही बेईमानी के जीन्स हैं। हम लोग बातें बहुत आध्यात्म की करते हैं। आत्मा-परमात्मा तथा सनातन में भरोसा दिखाते हैं। लेकिन ईमानदार केवल वही हैं, जिन्हें बेईमानी करने का अवसर नहीं मिला है। हमारे चरित्र की सच्ची परीक्षा तभी होती है, जब अवसर हो और हम सच्चरित्र बने रहें, बिना किसी डर के, बिना किसी लालच के, तो हम अच्छे चरित्र के व्यक्ति हैं। मेरा मानना है कि प्रशासन में एक स्तर ऐसा होना ही चाहिए, जहाँ व्यक्ति भरोसा कर सके कि उसके साथ न्याय होगा।
बाँध का विवाद और कलेक्टर की ज़िद
सीहोर के सिद्दीकीगंज में एक बाँध का निर्माण जल संसाधन विभाग द्वारा किया जा रहा था। एस.डी.ओ. राजस्व, आष्टा द्वारा ज़मीन तथा भवन और पेड़ आदि का सर्वे किया गया था। तत्समय लागू भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अनुसार, किसानों को उनकी भूमि के लिए उचित मुआवज़ा और पुनर्वास का आँकलन बनाकर भूमि अधिग्रहण अधिकारी, कलेक्टर को 'अवार्ड' पारित करने के लिए प्रस्ताव भेजा गया था। मुआवज़े की गणना में कई कारक शामिल होते हैं, जिनमें भूमि का बाज़ार मूल्य, उस क्षेत्र के आधार पर एक गुणक और पुनर्वास और पुनर्स्थापन लाभ आदि।
मुआवज़े की गणना में मुआवज़े का फ़ॉर्मूला था, जिसमें बाज़ार मूल्य को ग्रामीण क्षेत्रों में 4 गुना गुणा किया जा सकता है। इसमें क्षतिपूर्ति भी शामिल होती है, जो बाज़ार मूल्य का 100% होती है, साथ ही पुनर्वास और पुनर्स्थापन के लाभ भी दिए जाते हैं। बाज़ार मूल्य को निर्धारित करने के लिए, कलेक्टर उस क्षेत्र में हुई बिक्री के दस्तावेज़ों, स्टाम्प अधिनियम की दरों या आपसी सहमति से तय की गई राशि को आधार मानते थे।
मेरे द्वारा जो गणना की गई थी, उससे तत्कालीन मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग सहमत नहीं थे। उन्होंने कलेक्टर को इस बात के लिए सहमत किया कि वह मुझे समझाएँ और जो फ़ॉर्मूला वह प्रस्तावित कर रहे हैं, उससे गणना कर प्रस्ताव दें। हम लोगों ने सही गणना की थी।
हम ग़लत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्ताव देने के पक्ष में नहीं थे। मुझे आष्टा से बुलाकर कलेक्टर ने उनके बँगले पर लगभग पाँच घंटे तरह-तरह के दबाव बनाकर प्रस्ताव बदलने को कहा। जब मैं सहमत नहीं हुआ, तब मैंने कलेक्टर से कहा कि यदि वह विभाग के फ़ॉर्मूला से सहमत हैं, तो भूमि अधिग्रहण अधिकारी (कलेक्टर) की अधिकारिता से मेरे प्रस्ताव को बदल सकते हैं। लेकिन वह अंत तक ज़िद करते रहे। उन्होंने बताया कि भोपाल अपर कलेक्टर ने मुख्य अभियंता, जल संसाधन विभाग के सुझाव पर एक प्रकरण में मुआवज़ा बाँटा है।
उन्होंने मुझे भोपाल जाकर उनसे समझने की सलाह दी। मैं भोपाल गया, संबंधित अधिकारी से मैंने चर्चा की। उन्होंने चर्चा में माना कि उन्होंने ग़लती की है। उनका सुझाव था कि मैं वह ग़लती न दुहराऊँ। मैंने भोपाल से लौटकर कलेक्टर को यह बात बता दी। मैंने एक बार फिर अपनी ईमानदारी की अग्निपरीक्षा पास की थी।
एक नया बस स्टैंड और एक नई दिशा
आष्टा नगर पालिका के प्रशासक के रूप में काम करते हुए, जब नागरिकों से चर्चा की कि नगर की सबसे बड़ी समस्या है, तब उन्होंने बताया कि शहर का बस स्टैंड बहुत छोटा है। बसों की संख्या बढ़ जाने के कारण यात्रियों को बहुत असुविधा होती है। सुविधा न होने के कारण शहर का विकास रुक गया है। तब हम लोगों ने नया बस स्टैंड बनाया। छिंदवाड़ा की तरह दुकानें नीलाम कर पैसा जुटाया। नया बस स्टैंड बहुत सुविधाजनक था।
इसी बीच, मैंने रायपुर में अपनी पी.एच.डी. अधूरी छोड़ दी थी, उसे पूरा करने के लिए मैंने बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी, भोपाल के रीजनल प्लानिंग विभाग से माइक्रो लेवल प्लानिंग विषय पर काम करने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। पहले मेरे गाइड थे श्री हरी मोहन अवस्थी जी, जो टीकमगढ़ में मुझे भूगोल पढ़ाते थे। फिर मेरे को-गाइड श्री हनुमान सिंह यादव जो बरकतउल्ला यूनिवर्सिटी, भोपाल के रीजनल प्लानिंग विभाग के हेड थे। आष्टा के विशेष संदर्भ में मैंने यह डिग्री पूरी की। इसके लिए बहुत मेहनत की। आष्टा विकासखंड का ग्राउंड लेवल का डेटा जमा किया तथा डेवलपमेंट का एक मॉडल बनाया। जिसे बाद में सी.ई.ओ., जिला पंचायत तथा कलेक्टरों को जी.आई.एस. पैकिंग के माध्यम से तैयार करने का ट्रेनिंग प्रोग्राम बनाकर अधिकारियों को ट्रेंड किया। बहुत बाद में मध्य प्रदेश शासन द्वारा यह मॉडल 'पंच-जा' के नाम से लागू किया गया।
मेरा ऐसा मानना था कि स्वतंत्रता के समय सरकार एकमात्र सर्विस प्रोवाइडर थी। लेकिन बाद में प्राइवेट सेक्टर तथा एन.जी.ओ. भी सर्विस प्रोवाइडर बन गए। स्कूल, कॉलेज तथा अस्पताल प्राइवेट सेक्टर में खुल गए। बस सर्विस, टेलीफ़ोन जैसी सेवाएँ सरकार के साथ प्राइवेट सेक्टर देने लगा। तो पहले सरकारी विभाग जो सेवाएँ मोनोपॉली में देते थे, उनकी अब तुलना होने लगी।
जनता सरकारी कर्मचारियों से बेहतर सेवाएँ देने की माँग करने लगे। तब मुझे लगा कि एक अधिकारी के रूप में मुझे कम से कम एक सेक्टर में थ्योरी तथा प्रैक्टिकल कर अपनी काम करने की समझ को बढ़ाना चाहिए। तब मैंने ग्रामीण विकास, कृषि तथा रोज़गार सृजन को अपना पैशन बनाया। मैंने अपनी सेवा के चौदह साल अलग-अलग समय ग्रामीण विकास विभाग में अपनी स्वेच्छा से काम किया।
भारतीय प्रशासन में अधिकारी की पोस्टिंग किसी भी विभाग में काम करने के लिए होती है। जब अधिकारी कुर्सी पर बैठता है, तब कुर्सी के प्रभाव में नीचे की टीम काम कराती है। तब अधिकारी को ग़लतफ़हमी हो जाती है कि उसे इस विषय का बहुत ज्ञान है। वह बहुत अच्छा टीम लीडर है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में लीडर को टीम चुनने का अधिकार होता है। शासन में टीम विभाग से मिलती है।
प्राइवेट सेक्टर में लीडर को टारगेट दिया जाता है, संसाधन दिए जाते हैं कि निर्धारित समय सीमा में टारगेट प्राप्त करना है। लेकिन सरकार में क़ानून, नियम, गाइडलाइन होती है, उनकी निगरानी के लिए अलग-अलग एजेंसियाँ होती हैं। वह देखती है कि लक्ष्य प्राप्त करने में आपने इनका पालन किया या नहीं। सरकारी विभागों में ऑडिट, भ्रष्टाचार और प्रक्रियाओं की देखरेख के लिए ज़िम्मेदार कुछ प्रमुख एजेंसियाँ और विभाग निम्नलिखित हैं:
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG): यह भारत सरकार और राज्य सरकारों के खातों का ऑडिट करने वाली एक सर्वोच्च संस्था है।
आंतरिक लेखा परीक्षा निदेशालय: यह विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के आंतरिक खातों की जाँच करता है।
केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC): यह केंद्र सरकार के विभागों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक शीर्ष संस्था है।
केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI): यह भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर अपराधों की जाँच करता है।
लोकपाल और लोकायुक्त: ये सरकारी अधिकारियों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करते हैं।
प्रवर्तन निदेशालय (ED): यह मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी मुद्रा क़ानूनों के उल्लंघन की जाँच करता है।
कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय: यह सरकारी कर्मचारियों से संबंधित नीतियों, भर्ती, प्रशिक्षण और लोक शिकायतों का प्रबंधन करता है।
प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग: यह सरकारी प्रक्रियाओं में सुधार और नागरिकों की शिकायतों के निवारण पर काम करता है।
सरकारी विभागों में गुणवत्ता, ख़रीद और समय-सीमा की देखरेख करने वाली कुछ प्रमुख एजेंसियाँ और विभाग निम्नलिखित हैं:
भारतीय मानक ब्यूरो: यह भारत में वस्तुओं की गुणवत्ता के लिए मानक तय करता है और उन्हें प्रमाणित करता है।
केंद्रीय लोक निर्माण विभाग: यह सरकारी भवनों और बुनियादी ढाँचे के निर्माण में गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करता है।
राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड: यह सड़कों और राजमार्गों के निर्माण में गुणवत्ता की देखरेख करता है।
गुणवत्ता नियंत्रण परिषद: यह विभिन्न क्षेत्रों में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय निकाय है।
वित्त मंत्रालय: यह ख़रीद से संबंधित नीतियों और दिशा-निर्देशों को जारी करता है।
सरकारी ई-मार्केटप्लेस (GeM): यह सरकारी विभागों के लिए वस्तुओं और सेवाओं की ऑनलाइन ख़रीद के लिए एक मंच है।
रक्षा मंत्रालय: यह रक्षा ख़रीद से संबंधित नीतियों और प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।
भारतीय रेलवे: यह रेलवे से संबंधित ख़रीद की देखरेख करता है।
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय: यह विभिन्न सरकारी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है, जिसमें उनकी समय-सीमा भी शामिल है।
नीति आयोग: यह विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति और समय-सीमा की निगरानी और मूल्यांकन करता है।
संबंधित मंत्रालय और विभाग: प्रत्येक मंत्रालय और विभाग अपने-अपने कार्यक्रमों और परियोजनाओं की समय-सीमा की निगरानी के लिए ज़िम्मेदार होता है।
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन एजेंसियों की भूमिकाएँ आपस में जुड़ी हुई हैं और वे सरकारी कामकाज में दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करती हैं। सरकारी कर्मचारियों के लिए विभिन्न प्रकार के अधिनियमों और नियमों का एक सेट होता है, जो उनकी सेवा की शर्तों, आचरण, अवकाश और अन्य संबंधित मामलों को नियंत्रित करता है। ये नियम केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख अधिनियमों और नियमों के नाम दिए गए हैं:
मूलभूत नियम: ये नियम सरकारी कर्मचारियों की सेवा की सामान्य शर्तों, वेतन, भत्ते और अन्य मामलों को नियंत्रित करते हैं।
सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965: ये नियम सरकारी कर्मचारियों के वर्गीकरण, पदोन्नति, निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित हैं।
सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964: ये नियम सरकारी कर्मचारियों के आचरण और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, जिसमें उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन से संबंधित कुछ प्रतिबंध भी शामिल हैं।
सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972: ये नियम विभिन्न प्रकार के अवकाशों, जैसे अर्जित अवकाश, चिकित्सा अवकाश, मातृत्व अवकाश और पितृत्व अवकाश, और उनकी पात्रता और प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972: ये नियम सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद की पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों को नियंत्रित करते हैं।
प्रत्येक राज्य सरकार के अपने स्वयं के नियम और अधिनियम होते हैं, जो केंद्र सरकार के नियमों के समान हो सकते हैं या उनसे भिन्न हो सकते हैं। ये नियम सरकारी अधिकारियों को उनके कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों के बारे में मार्गदर्शन देते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि वे एक निर्धारित आचार संहिता का पालन करें।
राजकीय व्यवस्था में यह उसी तरह है कि आपको स्थान अ से स्थान ब पर जाने को कहा जाय और यह बताया जाय कि आप को एक घण्टे का समय है। केवल दाएं दिखते ही आपको चलना है। कौन से साधन से जाना है। कितनी स्पीड पर चलना है। कितना खर्च करना है। बजट कब तथा कितना मिलेगा। हिसाब कैसे रखना है। रिपोर्ट कब-कब कहां-कहां किस-किस को भेजना है आदि। आपकी निगरानी के लिए जगह-जगह चैक पोस्ट हो जो यह देखे कि आप निर्धारित पामदंडों का पालन कर रहे है या नहीं। यदि परिस्थितिवश भी आप निर्धारित नियम पालन नहीं करगे तो आप को दण्ड दिया जावेगा।
जबकि निजी क्षेत्र में आप को संसाधन दिए जाते है, टारगेट दिया जाता है और अधिकार दिए जाते है। आप को स्थान अ से स्थान ब पर जाने को कहा जायगा। रास्ता आप को चुनना है। वाहन आपको चलने की स्वतंत्रता है। स्पीड कब कितनी होगी यह आप निश्चित करें। कमपनी को टारगेट पूरा होने से मतलब है। कैसे किया गया इससे कोई मतलब नहीं है। लेकिन प्रशासन में सब कुछ पूर्व निर्धारित है। जो गति को बढ़ाने की जगह रोकने का काम ज्यादा करता है। क्रिएटिविटी को ख़त्म कर देता है। यह भय पर आधारित प्रशासन व्यवस्था है। जहां तनाव ऊपर से निचे निरंतर बहता रहता है।
एक अधिकारी की ए.सी.आर. और पदोन्नति का संघर्ष
सरकार में कर्मचारियों की वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ए.सी.आर.) से संबंधित नियम समय-समय पर जारी किए गए परिपत्रों और निर्देशों पर आधारित होते हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना और पदोन्नति, वेतन वृद्धि और अन्य सेवा-संबंधित निर्णयों में पारदर्शिता लाना है। ए.सी.आर. का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के काम, आचरण और समग्र प्रदर्शन का मूल्यांकन करना है।
यह मूल्यांकन पदोन्नति, समयमान वेतनमान और अन्य प्रशासनिक निर्णयों के लिए एक आधार प्रदान करता है। ए.सी.आर. की रिपोर्टिंग और समीक्षा के लिए एक निश्चित पदानुक्रम होता है। रिपोर्टिंग अधिकारी, कर्मचारी के प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है। समीक्षा अधिकारी, रिपोर्टिंग अधिकारी द्वारा दिए गए मूल्यांकन की समीक्षा करता है। अंत में, एक स्वीकारकर्ता प्राधिकारी भी हो सकता है, जो रिपोर्ट को अंतिम रूप देता है। ए.सी.आर. को एक निर्धारित समय-सीमा में लिखा जाना चाहिए।
इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा समय-समय पर परिपत्र जारी किए जाते हैं, जिसमें ए.सी.आर. लिखने की प्रक्रिया और समय-सीमा का उल्लेख होता है। सरकार ने ए.सी.आर. प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए इसे ऑनलाइन कर दिया है। अब ए.सी.आर. को ऑनलाइन माध्यम से लिखा, समीक्षा और स्वीकार किया जाता है।
यदि किसी कर्मचारी की ए.सी.आर. में कोई प्रतिकूल टिप्पणी होती है, तो उसे इसकी सूचना दी जाती है। कर्मचारी को इन प्रतिकूल प्रविष्टियों के ख़िलाफ़ अभ्यावेदन प्रस्तुत करने का अधिकार होता है। पदोन्नति के लिए ए.सी.आर. रिपोर्ट का बहुत महत्व होता है। पदोन्नति नीति के तहत, अधिकारियों/कर्मचारियों की ए.सी.आर. रिपोर्ट देखी जाती है।
उदाहरण के लिए, पदोन्नति के लिए पिछले कुछ वर्षों की ए.सी.आर. में कुछ निश्चित ग्रेडिंग (जैसे, 'उत्कृष्ट' या 'बहुत अच्छा') होना आवश्यक हो सकता है। क्लास वन अधिकारियों के लिए पिछले पाँच वर्षों की ए.सी.आर. का मूल्यांकन किया जाता है। यदि किसी कर्मचारी की ए.सी.आर. उपलब्ध नहीं है, तो उसे पदोन्नति के लिए पात्र नहीं माना जाता है। हर सरकारी कर्मचारी को इन नियमों को जानना तथा उनका पालन करना आवश्यक है।
मध्य प्रदेश सरकार में डिप्टी कलेक्टरों की पदोन्नति एक महत्वपूर्ण विषय था। बहुत माँग करने के बाद सरकार ने त्रिस्तरीय पदोन्नति करने का निर्णय लिया था। जिसके लिए सरकार ने "मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम" लागू किए थे। इन नियमों का उद्देश्य पदोन्नति प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध बनाना है, जो पिछले कई सालों से रुकी हुई थी। डिप्टी कलेक्टरों को आमतौर पर उनके सेवाकाल में तीन प्रमुख पदोन्नति दी गईं।
डिप्टी कलेक्टर से संयुक्त कलेक्टर: यह डिप्टी कलेक्टर के पद पर पहली पदोन्नति होती है।
संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर: यह दूसरी पदोन्नति होती है।
अपर कलेक्टर से कलेक्टर: यह तीसरी पदोन्नति होती है, जो सेवा के उच्च स्तर पर होती है।
इन पदोन्नतियों से संबंधित प्रमुख नियम और नीतियाँ, जो "मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम" में शामिल हैं: नए नियमों के अनुसार, प्रथम श्रेणी के पदों पर पदोन्नति 'योग्यता-सह-वरिष्ठता' के सिद्धांत पर आधारित होगी। इसका मतलब है कि केवल वरिष्ठता ही नहीं, बल्कि अधिकारी के प्रदर्शन और योग्यता को भी समान महत्व दिया जाएगा।
इसमें अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली का मूल्यांकन, सेवा रिकॉर्ड और अन्य प्रदर्शन मापदंड शामिल होंगे। पदोन्नति के लिए कर्मचारियों की ए.सी.आर. का मूल्यांकन अनिवार्य होगा। नियमों के अनुसार, पदोन्नति के लिए पिछले 5 वर्षों की ए.सी.आर. में न्यूनतम निर्धारित ग्रेडिंग (जैसे 'उत्कृष्ट' या 'बहुत अच्छा') प्राप्त करना आवश्यक होगा। यदि किसी कर्मचारी की ए.सी.आर. उपलब्ध नहीं है, तो उसे पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा।
पदोन्नति के लिए विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित होने वाली थी, जिसमें मेरा नाम था। मुझे संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर के पद पर पदोन्नत किया जाना था। समिति में मुख्य सचिव, कुछ सचिव और विभागाध्यक्ष शामिल थे, साथ ही सामान्य प्रशासन विभाग के उप-सचिव स्तर के अधिकारी भी सदस्य थे। डी.पी.सी. का मुख्य कार्य पात्र अधिकारियों की सूची तैयार करना और उनकी योग्यता का मूल्यांकन करना था। यदि किसी अधिकारी के ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है या कोई दंड प्रभावी है, तो उसे पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा।
मुझे सामान्य प्रशासन से बताया गया कि होशंगाबाद में पदस्थापना के दौरान की ए.सी.आर. उपलब्ध नहीं है। मैंने तत्कालीन कलेक्टर मैडम अजीता वाजपेयी से भोपाल जाकर संपर्क किया। उन्होंने बताया कि मेरा सेल्फ-असेसमेंट उपलब्ध नहीं है। मैंने उन्हें हाथोहाथ दूसरी कॉपी देकर ए.सी.आर. लिखने का अनुरोध किया।
कुछ दिन बाद फिर सामान्य प्रशासन से फ़ोन आया कि मेरी ए.सी.आर. अभी भी नहीं लिखी है। मैं फिर मैडम अजीता वाजपेयी से मिला। उस समय वह पशुपालन विभाग में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर पदस्थ थीं। उन्होंने बताया कि काम की अधिकता के कारण नहीं लिख सकीं। मुझे गुस्सा आ गया। इस पद पर कोई काम नहीं होता है। मैंने सोचा कि वह ऐसा क्यों कर रही हैं। मेरा कभी उनसे कोई विवाद नहीं हुआ। काम भी मैंने बहुत मेहनत से किया था।
मैंने गुस्से पर क़ाबू कर अनुरोध किया कि यदि वह समय पर नहीं भेजेंगी, तो मेरा प्रमोशन नहीं होगा। "आप केवल ए.सी.आर. लिख रही हैं, क़िस्मत नहीं।" उन्होंने मेरी ए.सी.आर. समय पर भेज दी और मुझे संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर पर यह दूसरी पदोन्नति मिल गई।
अतिक्रमण का युद्ध और 'बुलडोजर मंत्री' का प्रभाव
नया बस स्टैंड बन जाने के कारण, भोपाल-इंदौर रोड पर सड़क के किनारे विश्व हिंदू परिषद ने गायत्री मंदिर के पास सरकारी ज़मीन पर शमशान के सामने दुकानें बनाकर लोगों को किराये पर उठा दीं। एक व्यापारी थे अनोखी लाल खंडेलवाल, जो इस समिति के अध्यक्ष थे। वह चाहते थे कि दुकानों के किराए की आय से शमशान का रखरखाव किया जाएगा, लेकिन सरकार की नज़रों में यह अतिक्रमण था।
एक दिन सुबह तीन बजे रात को मैंने पुलिस तथा नगर पालिका की मदद से सभी दुकानें गिराकर मलबा हटवा दिया। सुबह लोगों ने देखा कि अतिक्रमण हटा दिया गया है। तब हिंदुओं ने बहुत बड़ा जुलूस निकाला। मुसलमान इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए। मैं प्रशासन का मुखिया था, तो मैं स्वाभाविक टारगेट हो गया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। मुख्यमंत्री थे सुंदर लाल पटवा जी। वह भोपाल में अतिक्रमण हटवाकर रोड चौड़ी करवा रहे थे। यह मुसलमानों के अतिक्रमण थे। वहाँ रोज़ आंदोलन हो रहा था।
चार दिन से आष्टा बंद था। मैंने नेताओं के प्रतिनिधियों को बुलाकर बात की, पर कोई समाधान नहीं निकला। धीरे-धीरे आंदोलन कमज़ोर होता गया और एक सप्ताह बाद समाप्त हो सका। मुरैना में ट्रेनिंग के दौरान वहाँ के एडिशनल कलेक्टर ने मुझे समझाया था कि जब जुलूस, प्रदर्शन हो, तो जल्दी बात करने के लिए नेताओं को नहीं बोलना चाहिए। उन्हें नारे लगाने दो, आंदोलन करने दो।
जब थक जाएँगे, तब ख़ुद बंद कर देंगे। एक बार जब मुरैना में जुलूस ऑफ़िस में आया, तो मेरी ड्यूटी उनका माँग पत्र लेने की थी। मैंने एडिशनल कलेक्टर से चलकर गेट पर ज्ञापन लेने का अनुरोध किया। उन्होंने दुकान से चाय मँगाई। जब हम लोग चाय पी रहे थे, आंदोलन करने वाले नेता माइक पर भाषण देने को लेकर लड़ पड़े और ज्ञापन दिए बिना वापस चले गए। आष्टा के आंदोलन में मैंने यहीं रणनीति अपनाई।
होली का त्यौहार और कानून व्यवस्था
आष्टा भोपाल रियासत का भाग रहा था। भोपाल ने नबाब होली के त्यौहार में भोपाल से होली खेलते सात दिन में आष्टा पहुंचते थे। इसलिए आष्टा में होली है त्यौहार सात से आठ दिन चलता। जब नबाब आष्टा में होते तब होली बहुत व्यापक स्वरूप में मनाई जाती थी। यह परम्परा अभी भी कायम है। होली के जलूस को बहुत सजाया जाता। जगह-जगह राज्य की और से तथा विभिन्न सामजिक संगठन तथा मोहल्ला समितियां गैर के रूप में टोलियां बना कर चलती थी। जगह-जगह रंग ड्रमों में घोल कर रखा जाता। गुलाल रखी जाती।
होली के जलूस के लोग आपस में तथा मकानों की छतों, छज्जों तथा खडकियों में बैठी महिलाओं, लड़कियों तथा लोगों पर नीचे से रंग और गुलाल फेंक कर उड़ाते थे। खूब अश्लील गाने गए जाते। नाचना, कूदना और करतब दिखाना जवान लड़कों का अपनी प्रेमकाओं को रिझानेँ के लिए किये जाने वाले प्रयत्न आकर्षण के केंद्र होते। राधा कृष्ण के भजन गए जाते। हुरयारें खूब भांग पीते। शराब की दुकानें बंद होती।
लेकिन शराब बराबर मिलती थी। भांग और गांजा का नशा बहुत प्रचलित था। यह अपनी दमित आदिम भावनाओं को बाहर निकालने त्यौहार था। मन का रेचन हो जाता। लोग चिल्ला कर कहते बुरा ना मानों होली है। इस त्यौहार को कोई कुछ भी करने को स्वतंत्र होता था। यह दुश्मनी भूल कर दोस्त बनाने का त्यौहार था।
भारत में धार्मिक त्योहारों का सांप्रदायिक हिंसा का रूप लेना कई कारणों से होता है, जिनमें राजनीतिक, सामाजिक और ऐतिहासिक कारक शामिल हैं। यह एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा है, जिसका ऐतिहासिक और वर्तमान संदर्भ दोनों हैं।
ब्रिटिश शासन की 'फूट डालो और राज करो' नीति: भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने में ब्रिटिश शासन की नीतियों ने एक बड़ी भूमिका निभाई। 1857 के विद्रोह के बाद, उन्होंने समुदायों को धर्म के आधार पर बांटना शुरू कर दिया। उन्होंने विभिन्न धार्मिक समूहों के बीच मतभेद पैदा किए, जिसका असर त्योहारों पर भी देखा गया। जुलूसों के रास्ते, लाउडस्पीकर का उपयोग और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों को लेकर विवाद अक्सर हिंसा में बदल जाते थे।
राष्ट्रवादी आंदोलनों में धर्म का उपयोग: कुछ राष्ट्रवादी आंदोलनों ने भी हिंदू धर्म और उसके प्रतीकों का उपयोग किया। इससे कुछ समुदायों में यह भावना पैदा हुई कि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल नहीं किया जा रहा है, जिससे विभाजन और गहरा हुआ। प्रमुख कारण जो त्योहारों को तनावपूर्ण बनाते हैं -
राजनीतिकरण: वोट बैंक की राजनीति: राजनीतिक दल अक्सर त्योहारों का उपयोग सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के लिए करते हैं। वे अपने राजनीतिक फायदे के लिए समुदायों के बीच मतभेद पैदा करते हैं।
शक्ति प्रदर्शन: कुछ मामलों में, धार्मिक जुलूसों को शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जाता है। ये जुलूस दूसरे समुदायों के इलाकों से जानबूझकर निकाले जाते हैं ताकि उन्हें उकसाया जा सके, जिससे तनाव और हिंसा की स्थिति पैदा होती है।
भड़काऊ भाषण: त्योहारों के दौरान नेताओं और अन्य लोगों द्वारा दिए जाने वाले भड़काऊ भाषण और बयान सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं।
सामाजिक कारक:
गलत सूचना और अफवाहें: सोशल मीडिया के इस दौर में अफवाहें और फेक न्यूज़ बहुत तेजी से फैलती हैं। एक छोटी सी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जिससे बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क सकती है।
परस्पर अविश्वास: समुदायों के बीच विश्वास की कमी भी एक बड़ा कारण है। किसी भी छोटी सी घटना को तुरंत एक सांप्रदायिक रंग दे दिया जाता है, और लोग बिना सच्चाई जाने एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हो जाते हैं।
आर्थिक और सामाजिक असमानता: आर्थिक रूप से कमजोर और बेरोजगार युवा अक्सर ऐसी हिंसा में आसानी से शामिल हो जाते हैं।
त्योहार और हिंसा का पैटर्न
जुलूसों का मार्ग: धार्मिक जुलूसों के रास्ते को लेकर अक्सर विवाद होता है। यदि कोई जुलूस पुराने या नए मार्ग से गुजरता है जहां दूसरे समुदाय के लोग रहते हैं, तो तनाव की स्थिति बन जाती है।
धार्मिक प्रतीकों का उपयोग: धार्मिक प्रतीकों और नारों का इस्तेमाल कभी-कभी दूसरे समुदाय को नीचा दिखाने या उकसाने के लिए किया जाता है।
पुलिस और प्रशासन की भूमिका: कई मामलों में पुलिस और प्रशासन की निष्क्रियता या पक्षपाती रवैया भी हिंसा को बढ़ावा देता है। यदि वे समय पर कार्रवाई नहीं करते, तो स्थिति बिगड़ जाती है।
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह हिंसा किसी धर्म की शिक्षा का परिणाम नहीं है, बल्कि धर्म का राजनीतिक और असामाजिक तत्वों द्वारा दुरुपयोग है।
आष्टा में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास बहुत स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। स्थानीय स्रोतों और पुरानी खबरों के अनुसार, 1970 से 1987 के बीच आष्टा में सांप्रदायिक तनाव और घटनाएं हुई थीं। यह अवधि शहर के लिए काफी संवेदनशील मानी जाती है। तनाव की अवधि: 1970 और 1987 के बीच का समय आष्टा में सांप्रदायिक रूप से काफी तनावपूर्ण रहा था। इस दौरान छोटे-मोटे विवाद अक्सर बड़े तनाव का कारण बन जाते थे।
वर्तमान स्थिति: स्थानीय निवासियों के अनुसार, 1987 के बाद से शहर में सांप्रदायिक शांति बनी हुई थी। दोनों समुदायों के लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं और उनके बीच सद्भाव कायम है। आष्टा की कुल आबादी में लगभग 65% हिंदू और 35% मुस्लिम हैं। दोनों समुदाय काफी समय से सौहार्दपूर्ण माहौल में रह रहे हैं।
हाल के वर्षों में कुछ छोटी-मोटी घटनाएं हुई हैं, जो मुख्य रूप से राजनीतिक या प्रशासनिक विवादों से जुड़ी थीं। उदाहरण के लिए में 'हिंदू राष्ट्र' लिखे एक बैनर को लेकर हिंदू संगठनों और प्रशासन के बीच बहस हुई थी, लेकिन यह घटना सांप्रदायिक हिंसा में नहीं बदली और प्रशासन की समझाइश के बाद मामला शांत हो गया।
इस तरह, आष्टा के इतिहास में सांप्रदायिक तनाव का दौर रहा है, लेकिन पिछले कई दशकों से यहां की सामाजिक संरचना शांति और सह-अस्तित्व पर आधारित है। हर त्यौहार पर प्रशासन को व्यापक इंतजाम करना होते थे। होली के दिन शहर की सभी प्रमुख मस्जिदें प्लास्टिक से ढक दी जाती थी ताकि गलती से भी होली का रंग मस्जिदों की दीवालों पर ना गिरे।
मस्जिदों के सामने गाने बजाना तथा संगीत वर्जित है। मस्जिद के सामने संगीत न बजाने की परंपरा का मुख्य कारण धार्मिक संवेदनशीलता और शांति का माहौल बनाए रखना है। इसका कोई एक ऐतिहासिक या धार्मिक कारण नहीं है, बल्कि यह समय के साथ विकसित हुआ एक सामाजिक और धार्मिक मुद्दा है।
इस्लामिक दृष्टिकोण-
नमाज़ में एकाग्रता: इस्लाम में नमाज़ (प्रार्थना) बहुत महत्वपूर्ण है। नमाज़ के दौरान मुस्लिम समुदाय के लोग अल्लाह के सामने पूरी तरह से समर्पित होते हैं। संगीत या किसी भी तरह का शोर नमाज़ में बाधा डाल सकता है, जिससे एकाग्रता भंग होती है।
इबादत का सम्मान: मस्जिद को इबादत (पूजा) का घर माना जाता है। इसलिए, यह उम्मीद की जाती है कि मस्जिद के आसपास एक शांत और सम्मानजनक माहौल हो। शोर-शराबा, संगीत और भीड़भाड़ इस पवित्रता को भंग कर सकते हैं।
कुछ धार्मिक विद्वानों की राय: कुछ इस्लामी विद्वान संगीत को इस्लाम में प्रतिबंधित (हराम) मानते हैं, खासकर जब वह धार्मिक समारोहों के साथ जुड़ा हो। हालांकि, इस पर भी अलग-अलग विचार हैं।
लेकिन हिन्दुओं के त्यौहार बिना संगीत के कल्पना करना कठिन है। मदिरों में नृत्य तथा संगीत आराधना का प्रभुख हिस्सा है। यहां तक कि सभी मुस्लिम गायक तथा संगीतकार अपनी साधना हिन्दू मन्दिरों में करते है। उनके संगीत, नृत्य और गायन के बड़ेबड़े आयोजन मंदिरों में त्योहारों पर किये जाने की परम्परा रही है। होली पर मस्जिदों के सामने संगीत रोकना प्रशासन की लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है।
दंगा फ़ैलाने बाले हमेशा इन बातों पर नजर रखते थे। जरा सी चूक भरी पड़ सकती थी। मुरैना तथा छिंदवाड़ा में इस तरह का सांप्रदायिक तनाव नहीं था जैसा मैने यहाँ देखा था। यह मेरे लिए नया अनुभव था। जहां धर्म की रक्षा का भार प्रशासन पर था।
भारतीय प्रशासन में शांति समिति की बैठकों की शुरुआत सांप्रदायिक हिंसा को रोकने और समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में हुई थी। इसका उद्देश्य किसी भी त्योहार से पहले संभावित तनाव को कम करना और सभी समुदायों के प्रमुखों को एक साथ लाना है ताकि वे आपसी सहमति से समस्याओं का समाधान कर सकें।
ब्रिटिश काल में शुरुआत: शांति समितियों की अवधारणा पूरी तरह से आधुनिक नहीं है। इसका मूल ब्रिटिश काल में देखा जा सकता है, जब धार्मिक जुलूसों और त्योहारों के दौरान होने वाले दंगों को नियंत्रित करने के लिए स्थानीय प्रशासन ने समुदायों के नेताओं के साथ बैठकें शुरू की थीं।
आजादी के बाद: 1947 के बाद भारत में सांप्रदायिक दंगे एक गंभीर समस्या बन गए थे। खासकर 1960 और 1980 के दशक में, जब कई बड़े सांप्रदायिक दंगे हुए। इन दंगों ने सरकार को एक स्थायी समाधान खोजने पर मजबूर किया।
पुलिस एक्ट और सीआरपीसी में प्रावधान: भारतीय पुलिस एक्ट और आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) में शांति बनाए रखने के लिए पुलिस और मजिस्ट्रेट को शक्तियां दी गई हैं। इन शक्तियों का उपयोग करके, प्रशासन ने शांति समितियों की बैठकों को एक औपचारिक रूप दिया।
समस्याओं का पूर्व-समाधान: त्योहार से पहले, प्रशासन (पुलिस और मजिस्ट्रेट) दोनों समुदायों के प्रमुखों, धार्मिक नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों के साथ बैठक करते हैं।
आपसी सहमति: इन बैठकों में, जुलूसों के रास्ते, लाउडस्पीकर के उपयोग, समय-सीमा और अन्य संवेदनशील मुद्दों पर चर्चा की जाती है और आपसी सहमति से निर्णय लिए जाते हैं।
अफवाहों को रोकना: शांति समिति के सदस्य अफवाहों को फैलने से रोकने में भी मदद करते हैं।
सूचना का आदान-प्रदान: यह बैठक प्रशासन को जमीन पर मौजूद तनाव और समस्याओं की जानकारी देती है, जिससे वे समय रहते आवश्यक कदम उठा सकें।
शांति समितियों की बैठकों ने न केवल सांप्रदायिक दंगों को रोकने में मदद की है, बल्कि इसने समुदायों के बीच संवाद और विश्वास का एक पुल भी बनाया है। यह एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहाँ लोग अपनी चिंताओं को सीधे प्रशासन और एक-दूसरे के सामने रख सकते हैं, जिससे एक सामंजस्यपूर्ण समाज का निर्माण होता है। हर त्यौहार के पहले हम लोग शांति समितियों की बैठकें हर नगर कस्बों तथा बड़े गांवों में आयोजित करबाते थे। यह प्रशासन के लिए अनिवार्य था।
भोपाल में अतिक्रमण हटाने का बहुत बड़ा अभियान प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा था। सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्री रहते हुए, भोपाल में अतिक्रमण के ख़िलाफ़ एक बड़ा अभियान चलाया गया था। यह अभियान उनकी दूसरी मुख्यमंत्री अवधि (5 मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992) के दौरान हुआ था। यह अभियान पटवा सरकार की एक महत्वपूर्ण कार्रवाई मानी जाती है, जिसने शहर को अतिक्रमण से मुक्त कराने का प्रयास किया।
इस अभियान के दौरान भोपाल में सड़कों पर हुए अतिक्रमण को हटाया गया था। इस अभियान के प्रभारी बाबूलाल गौर थे, जिन्हें इसी अभियान के बाद "बुलडोजर मंत्री" या "बुलडोजर लाल" कहा जाने लगा था। उन्होंने सख़्ती से कार्रवाई करते हुए कई अवैध अतिक्रमणों को हटवाया था। उस समय भोपाल के कलेक्टर एम.ए. ख़ान थे, जो विभागीय पदोन्नति से उद्योग विभाग से प्रमोट हुए थे। वहाँ अपर कलेक्टर के पद पर सुशील कुमार त्रिवेदी थे, जो पब्लिसिटी डिपार्टमेंट से अपर कलेक्टर प्रमोट हुए थे।
इन दोनों अधिकारियों का बैकग्राउंड राजस्व अधिकारी का नहीं होने से, वह भू-राजस्व संहिता के तहत कोई भी आदेश पारित करते, अपील कोर्ट कोई न कोई ग़लती निकालकर उनके आदेश पर स्थगन आदेश दे देते थे।
उस समय भोपाल में अतिक्रमण अभियान के लिए एक समिति थी, जिसमें बाबूलाल गौर, स्थानीय शासन मंत्री, लक्ष्मी नारायण शर्मा, सहकारिता मंत्री तथा लक्ष्मी नारायण गुप्ता, राजस्व मंत्री थे। नरेश नारद, प्रमुख सचिव, पर्यावरण समिति के संयोजक थे। इस समिति ने सामान्य प्रशासन विभाग से योग्य, ईमानदार तथा राजस्व मामलों के जानकार पाँच अपर कलेक्टरों के नाम माँगे थे, जिसमें से एक चयनित अधिकारी को अपर कलेक्टर, भोपाल, राजस्व पदस्थ किया जाना था। समिति ने मेरे नाम का चयन किया।
मेरी पदस्थापना अपर कलेक्टर, भोपाल, राजस्व, भोपाल के पद पर हो गई। जब से भोपाल ज़िला बना था, इस पद पर केवल आई.ए.एस. अधिकारी ही पदस्थ होते थे। मैं पहला अपर कलेक्टर, भोपाल, राजस्व था, जो राज्य प्रशासनिक सेवा का अधिकारी था। मुझे तत्काल पदभार ग्रहण करने का आदेश दिया गया। मैं आष्टा से भोपाल आ गया।
आपने आष्टा में जो अनुभव हासिल किए, वे आपके प्रशासनिक जीवन के 'बाबूनामा' का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। आपने भ्रष्टाचार के प्रति गहरी समझ विकसित की, न्याय के लिए संघर्ष किया और राजनीतिक दबावों का सामना करते हुए भी अपने सिद्धांतों पर क़ायम रहे। आपकी भोपाल की नई नियुक्ति आपके इन प्रयासों का परिणाम थी, जहाँ एक बड़ी और नई चुनौती आपका इंतज़ार कर रही थी।
कहानी का पहला भाग भोपाल में लेखक की नई और महत्वपूर्ण नियुक्ति के साथ समाप्त होता है। उन्हें अपर कलेक्टर, राजस्व, भोपाल के पद पर नियुक्त किया जाता है, जो एक ऐसा पद था जिस पर उस समय तक केवल आई.ए.एस. अधिकारी ही पदस्थ होते थे। यह नियुक्ति उनके ईमानदारी, योग्यता और राजस्व मामलों में गहरी समझ का प्रमाण थी।
यह आपके 'बाबूनामा' के पहले भाग का समापन है। क्या आप भोपाल में अपनी नई भूमिका के बारे में बताना चाहेंगे? हां, हम भाग दो मै अपनी कहानी जारी रखेंगे।
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