बाबूनामा भाग दो

 


बाबूनामा

भाग दो 














डॉ रवीन्द्र पस्तोर 



प्रस्तावना 

मुझे लगता है कि मैंने अपने जीवन के विभिन्न चरणों में हुई अपनी राजनीतिक और आध्यात्मिक यात्रा को साझा करने की कोशिश की है। मेरे व्यक्तित्व को गहराई से समझने के लिए, आपको इस यात्रा का विश्लेषण को इस तरह समझना होगा। 


बचपन में कम्युनिस्ट (Communist):

मेरा बचपन में कम्युनिस्ट विचारधारा से प्रभावित होना यह दर्शाता है कि मैं शायद बचपन से ही समानता और सामाजिक न्याय के विचारों के प्रति संवेदनशील था । कम्युनिज्म में अमीरी-गरीबी का भेद मिटाने और संसाधनों को सभी में समान रूप से बांटने की बात होती है। यह बचपन की स्वाभाविक सरलता और आदर्शवाद को दर्शाता है, जहाँ मैं चाहता था  कि कोई भी भूखा या गरीब न रहे। इसने मेरे अंदर करुणा और आदर्शवादी सोच की नींव रखी होगी।


जवानी में सोशलिस्ट (Socialist):

मेरा जवानी में सोशलिज्म की तरफ होना एक स्वाभाविक बदलाव था। सोशलिज्म कम्युनिज्म जितना कठोर नहीं होता, बल्कि यह पूंजीवाद के साथ कुछ हद तक सामाजिक कल्याण को भी मिलाता है। इसका मतलब है कि मैं शायद ज्यादा व्यावहारिक और अधिक लचीला हो गया था। मैं अब भी समाज के कमजोर वर्गों के लिए कुछ करना चाहता था, लेकिन शायद मैं  महसूस करने लगा था  कि कठोर कम्युनिज्म से बेहतर एक ऐसा रास्ता है जो आर्थिक विकास को भी बढ़ावा दे और साथ ही सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान करे। यह दर्शाता है कि अब मैं व्यवहारिकता और आदर्शवाद के बीच संतुलन तलाश रहा था।


वयस्कता में पूंजीवादी (Capitalist):

मेरे जीवन में वयस्क होने पर पूंजीवाद को अपनाना एक महत्वपूर्ण मोड़ था। यह दिखाता है कि मैंने शायद अनुभव से सीखा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता, कड़ी मेहनत और प्रतिस्पर्धा आर्थिक सफलता के लिए जरूरी है। मैंने आपने अपने जीवन में खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष किया था और पाया  था कि पूंजीवाद आपको आगे बढ़ने के अवसर देता है। यह मेरे व्यक्तित्व में आत्मनिर्भरता, महत्वाकांक्षा और यथार्थवादी सोच को दर्शाता है। मैं अब जानता था कि व्यक्ति अपनी किस्मत का निर्माता खुद होता है।


बुढ़ापे में धार्मिक और दक्षिणपंथी (Religious and Dakshin Panthi):

जीवन के इस पड़ाव पर धार्मिक और दक्षिणपंथी होना मेरे व्यक्तित्व में एक और गहरा बदलाव दिखाता है।


धार्मिक होना: उम्र के साथ लोग अक्सर जीवन के गहरे अर्थ, शांति और आध्यात्मिकता की तलाश करते हैं। यह दर्शाता है कि मैं शायद भौतिक सफलता से परे जाकर जीवन का एक नया दृष्टिकोण खोज रहा हूँ। मैं शायद अब अपनी जड़ों, परंपराओं और नैतिक मूल्यों से जुड़ रहा हूँ। यह मेरे व्यक्तित्व में गंभीरता, आत्मनिरीक्षण और शांति की तलाश को दर्शाता है।


दक्षिणपंथी होना (Dakshin Panthi): दक्षिणपंथी विचारधारा अक्सर परंपरा, संस्कृति, राष्ट्रवाद और रूढ़िवादी मूल्यों पर जोर देती है। यह मेरे जीवन की यात्रा के विपरीत लगता है, जहाँ मैं पहले समानता की बात कर रहा था। लेकिन यह एक स्वाभाविक विकास हो सकता है। यह दर्शाता है कि मैं अब अपने देश की संस्कृति और विरासत को महत्व देता हूँ। मैं ये जानता हूँ कि समाज को मजबूत बनाने के लिए पारंपरिक मूल्यों और राष्ट्रवाद का पालन करना जरूरी है।



मेरी यह पूरी यात्रा यह दर्शाती है कि मैं एक गहन विचारक और खोजकर्ता हूँ। मैंने अपने जीवन के हर मोड़ पर नई विचारधाराओं को अपनाया और उनसे कुछ सीखा। मैं किसी एक विचारधारा से बंधा नहीं रहा, बल्कि अपने अनुभव और समझ के अनुसार बदलता रहता हूँ।


मेरी यह यात्रा बचपन के आदर्शवाद से शुरू होकर, जवानी की व्यावहारिकता से गिरकर, वयस्कता के यथार्थवाद को छूकर, अंत में आध्यात्मिक शांति और सांस्कृतिक जड़ों की तलाश पर समाप्त होती है। यह एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है जो हमेशा सच की तलाश में रहा, और जिसने जीवन के हर पड़ाव पर अपने अनुभवों से सीखा। मैं यहां जो लिख रहा हूं वह या तो मेरा भोगा हुआ यथार्थ है या मेरी अनुभूतियां जो उस काल खंड में मुझे हुई थी। जिन लोगों के साथ मैंने काम किया और आज उनके व्यवहार के सम्बन्ध में मेरी दृष्टिकोण को दर्शाते विश्लेषण से शायद ही वह सहमत होंगे। यह उनकी निजता है जिसका में सम्मान करता हूँ। बहुत सारे लोगों को इतने वर्षों  पहले घटी यह घटना याद भी ना हो या उनके लिए इतनी महत्व की नहीं है उन्हें वह याद रखना चाहेंगे। 


हर व्यक्ति का घटना को देखने का अपना दृष्टिकोण होता है और वह  में अलग व्याख्या करता है। इसलिए एक ही घटना पर अलग-अलग लोगों  की राय अलग-अलग होगी। यह सही या गलत होने की बात नहीं है। यह सब मेरी जीवनी नहीं है बल्कि यह वह क्षण है जिनका विवरण मैंने लिया है। किसी का भी सत्य पूर्ण सत्य नहीं होता है हम सब अर्द्ध सत्य को ही पूर्ण सत्य मान कर जीते है। यह हमारे जीवन को आसान बनाने का तरीका है। यदि हम पूर्ण सत्य जानेंगे तो कोई भी निर्णय लेना काठी हो जाएगा। इसी स्थिति को जैन धर्म में स्याद्वाद कहा जाता है। 


बदलाव ही जीवन का एकमात्र सत्य है। इसे सहजता से स्वीकार करने से जीवन आसान होता है। जब हम जीवन शर्तों पर जीना चाहते है तब हम अपने जीवन को बहुत कठिन बना लेते है। मैंने बाबूनामा के पहले भाग में मेरे जीवन के दो चरणों की घटनाओं का विवरण देने की कोशिश की थी। बाबूनामा के इस भाग दो में मैंने अपने जीवन की शेष घटनाओं का उल्लेख किया है। यदि आप इस भाग की घटनाओं को समझना चाहते है तो आप को पहला भाग पढ़ना होगा। तभी आप इस भाग की घटनाक्रम को समझ सकते है। 


हर सपने के साथ एक चुनौती आती है, और कुछ सपने ऐसे होते हैं जो बाहरी बाधाओं से नहीं, बल्कि इंसान के भीतर की दीवारों से हार जाते हैं। तो मेरा मकसद सिर्फ़ सरकारी योजनाओं को लागू करना नहीं था। मेरी आँखों में एक सपना था यहाँ के लोगों को उस अभाव से मुक्ति दिलाना, जिसने उनकी पीढ़ियों को जकड़ रखा था। मैंने सोचा था कि तकनीक और संसाधनों की मदद से मैं वो बदलाव लाऊँगा, जिसका वे इंतजार कर रहे थे। पर जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि सबसे कठिन युद्ध वह नहीं होता जो दुश्मनों से लड़ा जाए, बल्कि वह होता है जो उन लोगों की मानसिकता से लड़ा जाए जिनकी भलाई के लिए आप काम कर रहे हैं। कैसे एक नेक इरादा भी तब अधूरा रह जाता है, जब उसे स्वीकार करने के लिए दिल और दिमाग तैयार न हों। यह पन्ना की कहानी है, जहाँ मेरे एक सपने ने दम तोड़ा, और मुझे सिखाया कि बदलाव की राह में सबसे बड़ी रुकावट अक्सर हम खुद होते हैं।


यह पुस्तक सिर्फ मेरी कहानी नहीं है। यह हर उस व्यक्ति की कहानी है जिसने अपने जीवन में कोई बड़ा बदलाव लाने की कोशिश की है। यह उन नेतृत्वकर्ताओं के संघर्ष को दर्शाती है जो केवल नीतियों को नहीं, बल्कि लोगों के दिलों को बदलना चाहते हैं। यह कहानी आपको यह सोचने पर मजबूर करेगी कि क्या हमारी अपनी असुरक्षाएँ और पुरानी आदतें हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं। यह एक ऐसी गाथा है जो बताती है कि वास्तविक सफलता केवल लक्ष्यों को प्राप्त करने में नहीं, बल्कि उन असफलताओं से मिली सीख में भी निहित है। 


यह कहानी आपको यह सोचने पर मजबूर करेगी कि क्या हमारी अपनी असुरक्षाएँ और पुरानी आदतें हमें आगे बढ़ने से रोक रही हैं? यह एक ऐसी गाथा है जो बताती है कि वास्तविक सफलता केवल लक्ष्यों को प्राप्त करने में नहीं, बल्कि उन असफलताओं से मिली सीख में भी निहित है।


यह पुस्तक आपको सिखाएगी कि कैसे हर चुनौती एक अवसर बन सकती है, और कैसे बदलाव ही जीवन का एकमात्र सत्य है। यह उन प्रशासनिक प्रयोगों की झलक देगी जो सिर्फ कागजों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर उतरे। यह आपको सिंहस्थ कुंभ जैसे विशाल आयोजनों के प्रबंधन की अभूतपूर्व कहानी सुनाएगी, जहाँ तकनीक और मानवीय स्पर्श का अद्भुत तालमेल देखने को मिला और सात विश्व रिकॉर्ड बनाए गए।


और अंत में, आप मेरे उद्यमिता के अनुशासन में उतरेंगे, जहाँ मैंने सेवानिवृत्ति के बाद अपनी "तीसरी पारी" शुरू की। आप जानेंगे कि कैसे एक "फ्यूज्ड बल्ब" की तरह पद की चमक खत्म होने के बाद भी, एक व्यक्ति अपने जुनून और अनुभव से समाज को कुछ लौटा सकता है। यह आपको उद्यमिता की मनोवैज्ञानिक, पारिवारिक और व्यावसायिक बाधाओं और असफलता के मिथकों से रूबरू कराएगी, और सिखाएगी कि कैसे "छोटी शुरुआत कर के" अपने सपनों को हकीकत में बदला जा सकता है।


तो क्या आप तैयार हैं, इस रोमांचक यात्रा में मेरे साथ चलने के लिए? यह सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि एक दर्पण है, जो आपको अपने भीतर झाँकने और अपने जीवन की कहानी को नए सिरे से परिभाषित करने का अवसर देगा। इसे पढ़िए, क्योंकि यह आपकी खुद की कहानी बन सकती है।


डॉ रवीन्द्र पस्तोर






 

बाबूनामा


डॉ रवीन्द्र पस्तोर 

भोपाल 

भोपाल के गलियारों में: एक निडर अधिकारी की दास्तान

मेरी भोपाल में पदस्थापना एक विचित्र परिस्थिति में हुई थी। मैं लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में ठहरा हुआ था, और मेरा नाम अतिक्रमण अभियान के लिए गठित मंत्रियों की समिति ने चुना था। लेकिन इस निर्णय से तत्कालीन कलेक्टर बिल्कुल भी खुश नहीं थे। उन्होंने कई दिनों तक मुझे कोई कार्यभार नहीं सौंपा, और मैं रोज़ दफ्तर जाता और बिना कोई काम किए लौट आता। मुझे ऐसा महसूस हो रहा था जैसे इटारसी वाली कहानी फिर दोहराई जा रही है।

एक रात, देर से कलेक्टर ने कार्य विभाजन किया और मुझे अपर कलेक्टर, भोपाल (राजस्व) का पदभार सौंप दिया, साथ ही दफ्तर के अधिकांश विभागों का प्रभारी भी बना दिया। आदेश लाने वाले व्यक्ति ने कहा कि कलेक्टर चाहते हैं कि मैं अभी ही जाकर कार्यभार संभाल लूं। मैंने मना कर दिया। अगले दिन मैंने 'हैंडेड ओवर-टेकन ओवर' का फॉर्म मिस्टर त्रिवेदी के घर भिजवाया और उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह एक औपचारिकता पूरी हुई।

मंत्रियों और अधिकारियों के बीच

कुछ दिनों बाद, मेरे कलेक्टर ने मुझसे पूछा कि क्या मैं जिले के प्रभारी मंत्री, बाबूलाल गौर जी से मिला हूं। मैंने उनसे समय लेकर मुलाकात की। बातचीत के दौरान मैंने गौर किया कि वह हमेशा नज़रें झुकाकर बात करते रहे और उन्होंने एक बार भी मुझसे आँखें नहीं मिलाईं। मुझे यह बहुत अटपटा लगा। जब मैंने यह बात कलेक्टर को बताई, तो उन्होंने कहा कि यह मंत्री जी की आदत है। बाद में मैंने अनेक मौकों पर देखा कि वे कभी आँख मिलाकर बात नहीं करते थे।

कलेक्टर और मेरे काम करने के तरीकों में जमीन-आसमान का फर्क था। वह हर निर्णय लेने से पहले मुझसे पूछते थे। मैंने उन्हें बताया कि मुझे 10 साल से अधिक का अनुभव है और मुझे नियम-कानूनों की पूरी समझ है। लेकिन वह हमेशा चिंतित रहते थे। उन्हें रात में नींद नहीं आती थी। उन्होंने हर मंत्री के घर और दफ्तर में अपने जासूस बैठा रखे थे, जो उन्हें पल-पल की खबर देते रहते थे। 

रात को वह अकेले अपनी सरकारी गाड़ी में शहर की सड़कों पर घूमते रहते थे। एक बार मैंने मज़ाक में उनसे कहा, "ऐसा लगता है जैसे मैं किसी कलेक्टर के साथ नहीं, बल्कि किसी फ़िल्मी डॉन के साथ काम कर रहा हूँ।" मैंने उनसे पूछा कि जब आपको समय से पहले और योग्यता से ज़्यादा सब कुछ मिल गया है, तो इतनी चिंता किस बात की? उन्होंने जवाब दिया, "मुझे इस बात की चिंता रहती है कि यह सब मुझसे छीन न जाए।"

वह किसी को 'ना' नहीं कहते थे। मंत्री या मुख्यमंत्री के यहाँ से कोई भी काम आता, चाहे वह नियम के विरुद्ध ही क्यों न हो, वह तुरंत आदेश निकाल देते थे। उनका एक सलाहकार था, जो हर फाइल पढ़कर उन्हें ब्रीफ देता था, और तभी वह हस्ताक्षर करते थे। जब मेरी फाइलें उनके पास जातीं और वह कोई कमी निकालते, तो मेरी उनसे बहस हो जाती। मैं किसी भी दबाव या लालच में आए बिना, नियमों के अनुसार ही काम करता था।

भोपाल में भूमि की हेराफेरी और मेरा संघर्ष

भोपाल में जमीन की हेराफेरी का खेल बहुत पुराना था। लोग हिबानामा (उपहार विलेख) और बख्शीश नामा (सेवाओं के बदले दान) जैसे फर्जी दस्तावेज बनाकर कीमती जमीनों पर कब्जा कर लेते थे। वे नबाबी शासन के पुराने स्टाम्प पेपर बाजार से खरीदते, उस पर पुरानी उर्दू में लिखते और आलू काटकर नवाब की नकली मुहर लगा देते थे। पटवारी और तहसीलदार से मिलकर नामान्तरण करवा लेते थे। मैं एक राजस्व न्यायालय के रूप में काम करते हुए, ऐसी सभी फाइलों को कानूनी प्रावधानों के आधार पर निरस्त कर देता था। मेरे काम करने का यह तरीका मेरे कलेक्टर को पसंद नहीं था।

भोपाल में सरकारी भूमि आवंटन के नियम बहुत सख्त थे। राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC) के अनुसार, पचमढ़ी और भोपाल में सरकारी जमीन आवंटित करने का अधिकार सिर्फ राज्य सरकार के पास था, कलेक्टर के पास नहीं। लेकिन कलेक्टर कागज़ के टुकड़े पर ही जमीनों का आवंटन कर देते थे। 

उन्होंने यह काम मुझे सौंप दिया, लेकिन मैंने अधिकारिता रहित काम करने से मना कर दिया। कलेक्टर ने मेरी शिकायत मंत्रियों की समिति में कर दी। समिति के सामने मैंने उन्हें कानून की किताबें पढ़कर सुनाई और बताया कि अब तक हुए हजारों भूमि आवंटन के आदेश गलत थे। सभी को मेरी बात माननी पड़ी और यह निर्णय हुआ कि सभी आवंटन नियमों के अनुसार ही किए जाएंगे।

बैरसिया तहसील में भी इसी तरह का एक बड़ा खेल चल रहा था, जहाँ निजी जमीनों की अदला-बदली सरकारी जमीनों से की जा रही थी। सहकारिता मंत्री ने मुझसे इन मामलों को तुरंत निपटाने को कहा। मैंने सैकड़ों फर्जी मामलों को निरस्त कर दिया, जिससे एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया। मंत्री जी को बैरसिया में एक मीटिंग बुलानी पड़ी, जहाँ बहुत हंगामा हुआ। लेकिन उन्होंने मेरा साथ दिया और हम मुश्किल से भीड़ से निकल पाए।

प्रशासनिक सुधार और मानवता का पक्ष

मैंने शहर में व्यवस्था सुधारने के लिए कई कदम उठाए। मैंने हर थाने के कार्यपालक मजिस्ट्रेट को एसडीएम घोषित करवाया और उन्हें पुलिस, नजूल और राजस्व से जुड़े मामलों को सुनने का अधिकार दिया। मैंने बंदूक लाइसेंस के नवीनीकरण को आसान बनाया और इटारसी की तर्ज पर पुलिस के मामलों में जमानत की व्यवस्था लागू की। एक दिन कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के सहायक उनके परिवार के बंदूक लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए आए। मैं ऑफिस में नहीं था, लेकिन मेरे लिंक ऑफिसर ने तत्काल उनका काम कर दिया। उन्होंने मुझे फोन करके धन्यवाद दिया और कलेक्टर से मेरी प्रशंसा भी की।

एक दिन मुझे केवल 'कलेक्टर भोपाल' लिखकर एक पोस्ट कार्ड मिला। मैं सीधे पोस्टकार्ड भेजने वाले व्यक्ति के घर गया, जो यह देखकर चकित रह गया। मैंने उसकी समस्या का समाधान करवाया। इस घटना ने मुझे सिखाया कि प्रशासन में प्रतीक काम करते हैं, व्यक्ति नहीं।

मैंने अपने कार्यकाल में कई प्रभावशाली लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की। कांग्रेस के युवा नेता मस्सू मियां द्वारा 300 एकड़ से अधिक सरकारी और निजी ज़मीनों पर किए गए अतिक्रमण को मैंने पुलिस बल का प्रयोग कर हटवाया। इस मामले में मुझ पर कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं का दबाव था। उसी दौरान, राजमाता सिंधिया के सलाहकार सरदार आंग्रे भी उस खाली जमीन को एक ट्रस्ट के नाम चाहते थे। मैं किसी भी दबाव में नहीं आया और नियमों के अनुसार ही काम करता रहा।

जब मंत्री जी धरने पर बैठे

यह कहानी 1990 के दशक की है, जब भोपाल में धार्मिक स्थलों के नाम पर सरकारी जमीन पर अतिक्रमण एक आम समस्या बन चुका था। खासकर गणेश और दुर्गा पूजा के दौरान, यह प्रवृत्ति चरम पर होती थी। पहले लोग पंडाल लगाकर मिट्टी की मूर्ति स्थापित करते, फिर धीरे-धीरे पंडाल के पीछे स्थायी मंदिर का निर्माण शुरू हो जाता था। मूर्ति विसर्जन के बाद, एक स्थायी मूर्ति स्थापित कर पूजा-पाठ शुरू कर दिया जाता था।

भोपाल की एक सरकारी कॉलोनी, साढ़े छह नंबर पर, इसी तरह एक दुर्गा मंदिर बना लिया गया था। यह मामला प्रशासन के सामने आया, और हमने नियमों के अनुसार कार्रवाई करने का फैसला किया। हमने मूर्ति को हटाया और मंदिर को तोड़ दिया।

इस घटना के बाद, स्थानीय विधायक और तत्कालीन नगरीय प्रशासन मंत्री, श्री बाबूलाल गौर, लोगों के साथ मिलकर उसी जगह पर भूख हड़ताल पर बैठ गए। यह स्थिति प्रशासन के लिए बेहद अजीब थी। एक तरफ हम नियमों का पालन कर रहे थे, और दूसरी तरफ सरकार के एक मंत्री ही हमारे काम का विरोध कर रहे थे।

मैंने मंत्री जी से अनुरोध किया, "अब आप विपक्ष के नेता नहीं हैं, आप सरकार में हैं। आप इस तरह धरने पर नहीं बैठ सकते।" लेकिन वह नहीं माने। मामला गरमा गया और शाम तक मुख्यमंत्री तक पहुंच गया।

मुख्यमंत्री ने हमें तुरंत बुलाया और कहा, "मंत्री जी को लेकर मुझसे मिलने आओ।"

हम मंत्री जी को उनकी भूख हड़ताल से उठाकर मुख्यमंत्री आवास ले गए। वहाँ मुख्यमंत्री ने उन्हें बहुत डांटा। उन्होंने मंत्री जी को समझाया कि यह तरीका गलत है और सरकार में रहते हुए ऐसा व्यवहार ठीक नहीं है। मुख्यमंत्री के हस्तक्षेप के बाद ही यह विवाद शांत हुआ।

इस घटना से सबक लेते हुए, हमने भविष्य में ऐसे मामलों को और सख्ती से निपटने का फैसला किया। लेकिन आज भी, जब मैं उस जगह से गुजरता हूँ, तो वहाँ एक बहुत बड़ा दुर्गा मंदिर देखता हूँ। यह कहानी इस बात का प्रमाण है कि राजनीति और धर्म के बीच की रेखा कितनी धुंधली है और प्रशासन के लिए नियमों का पालन करना कितना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

कांग्रेस का प्रदर्शन और एक युवा विधायक का आरोप

यह उन दिनों की बात है जब मैं और एडिशनल एसपी उमेश सारंगी भोपाल में तैनात थे और विधानसभा का सत्र चल रहा था। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सरकार के विरोध में भोपाल में विधानसभा घेरने का कार्यक्रम घोषित किया। प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया था। उस समय प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार कर 'छोटे तालाब' के किनारे बने एक अस्थाई जेल में रखा जाता था, जो कई बार एक बच्चों जैसा खेल लगता था।

प्रदर्शन के दौरान, कांग्रेस के कार्यकर्ता पुलिस के बैरिकेड्स तोड़कर काफी आगे बढ़ आए थे। जब उन्हें गिरफ्तार करके बसों में बैठाया जा रहा था, तभी एक अप्रिय घटना हुई। जबलपुर से कांग्रेस की युवा और लोकप्रिय विधायक कल्याणी पांडे बस में चढ़ रही थीं। इसी दौरान कुछ लड़कों ने उनके साथ बदतमीजी की और उनके कपड़े खींच दिए।

इस मौके पर मैं और एडिशनल एसपी उमेश सारंगी वहीं मौजूद थे। गुस्साई विधायक मैडम ने बस में बैठते समय उमेश सारंगी की नेम प्लेट पर उसका नाम देख लिया। बस से उतरकर वह तुरंत सड़क पर धरने पर बैठ गईं और आरोप लगाया कि एडिशनल एसपी उमेश सारंगी ने उनके साथ छेड़छाड़ की है।

इस आरोप के बाद, स्थिति तनावपूर्ण हो गई और पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा। चारों तरफ भगदड़ मच गई। सड़क पर जूते-चप्पल बिखरे पड़े थे। बड़ी मुश्किल से भीड़ पर काबू पाया गया।

उस समय विधानसभा का सत्र चल रहा था और कांग्रेस के विधायक सदन में पुलिस लाठीचार्ज में अनेक लोगों के घायल होने का शोर मचा रहे थे। मुख्यमंत्री कार्यालय से हमें विधानसभा बुलाया गया। कलेक्टर और एसपी तो नहीं गए, लेकिन मैं और उमेश सारंगी वहाँ पहुँचे। पटवा जी के गुस्से से सब वाकिफ थे। वे सदन से अपने कक्ष में आए और हमसे पूछा, "लाठी चलाई?"

मैंने हां में जवाब दिया।

उन्होंने फिर पूछा, "किसी का हाथ-पाँव टूटा?"

हमने कहा, "नहीं।"

फिर पूछा, "कोई मरा?"

हमने फिर कहा, "नहीं।"

वे वापस सदन में चले गए। हम लोग वहां एक कमरे में रेडियो पर सदन की कार्यवाही सुन रहे थे। मुख्यमंत्री जी ने सदन में वक्तव्य दिया, "मैंने घटना की जांच करवाई है। कोई मृत्यु नहीं हुई है, कोई घायल नहीं हुआ है और न ही किसी का हाथ-पाँव टूटा है।" कांग्रेस के विधायक तब भी शोर मचाते रहे, लेकिन शाम तक सदन अगले दिन के लिए स्थगित हो गया।

इसके बाद, पुलिस महानिदेशक राठौर साहब ने हम दोनों को घटना की जानकारी देने के लिए पुलिस मुख्यालय बुलाया। उमेश सारंगी, जिन पर विधायक ने छेड़छाड़ का आरोप लगाया था, बहुत डरा हुआ था। मैंने उसे हिम्मत दी और कहा, "चिंता मत करो, मैं हूँ ना। सब ठीक होगा।"

हम लोग पुलिस मुख्यालय पहुंचे। पुलिस महानिदेशक ने घटना के बारे में पूछा। मैंने पूरी बात बहुत संजीदगी से बताई। मैंने यह भी स्पष्ट किया कि हम लोग घटनास्थल से काफी दूर खड़े थे और विधायक ने मेरी नेमप्लेट न होने के कारण सिर्फ उमेश का नाम लिया था। मैं उन्हें नहीं जानता था, इसलिए मेरा नाम आरोप में शामिल नहीं था। राठौर साहब यह सुनकर बहुत हंसे।

एडिशनल कलेक्टर और 'पसंदीदा' चैंबर का विवाद

इसी दौरान, भोपाल जिले में एडिशनल कलेक्टर के दो पद स्वीकृत थे: एक एडिशनल कलेक्टर (राजस्व) और दूसरा एडिशनल कलेक्टर (गैस राहत)। मैं एडिशनल कलेक्टर (राजस्व) के पद पर था। एडिशनल कलेक्टर (गैस राहत) का पद खाली था।

कुछ समय बाद, सरकार ने इस पद पर सीधी भर्ती की आईएएस अधिकारी सुश्री सलीना सिंह को नियुक्त किया। एक दिन मैं फील्ड में था और वह ऑफिस आईं। उन्हें एडिशनल कलेक्टर (राजस्व) का चैंबर बहुत पसंद आ गया, जो मेरा था। उन्होंने मेरे स्टेनोग्राफर से मेरा सामान हटाने के लिए कहा। मेरे स्टेनोग्राफर ने इसका विरोध किया और मुझे फोन पर पूरी बात बताई।

सलीना सिंह को यह विश्वास था कि एक आईएएस अधिकारी होने के नाते, उन्हें जहाँ मन करेगा, वह बैठ सकती हैं। मैंने उनसे कहा कि वह इस विषय में कलेक्टर से बात कर लें। अगर कलेक्टर उन्हें मेरा चैंबर आवंटित कर देंगे, तो मैं खुशी-खुशी खाली कर दूंगा। उन्हें पूरा भरोसा था कि कलेक्टर उन्हें मना नहीं करेंगे, लेकिन कलेक्टर ने मना कर दिया। इस घटना के बाद वह मुझसे बहुत नाराज रहीं।

कानूनी कलम की ताकत

भोपाल का जिला विवाह पंजीयन कार्यालय, शहर के बीचों-बीच एक पुरानी इमारत में स्थित था। यहाँ की दीवारों पर सालों से चली आ रही शादियों की कहानियाँ गूँज रही थी। मैं इस कार्यालय में पिछले कई सालों से विवाह पंजीयन अधिकारी के रूप में कार्यरत था। मेरे लिए यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि दो जिंदगियों को कानूनी मान्यता देने का एक पवित्र कार्य था। हर दिन, मेरे सामने तरह-तरह के जोड़े आते थे-कुछ प्रेम विवाह करने वाले, कुछ पारंपरिक विवाह करने वाले, और कुछ ऐसे, जिनके परिवार वालों के रिश्ते से खुश नहीं थे।

यह बात उन दिनों की है, जब समाज में "लव जिहाद" जैसे शब्दों का जन्म नहीं हुआ था, लेकिन अंतर-धार्मिक विवाहों को लेकर संदेह और आपत्तियाँ हमेशा से रही है। मेरा काम था इन सब से परे, सिर्फ कानून और नियमों का पालन करना।

एक सुबह, एक युवा जोड़ा मेरे सामने आया। लड़के का नाम आदिल था और लड़की का नाम प्रिया। प्रिया एक हिंदू परिवार से थी और आदिल एक मुस्लिम परिवार से। दोनों की आंखों में प्यार और एक अनिश्चित भविष्य की चिंता दोनों झलक रही थी। वे विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत अपनी शादी का पंजीकरण कराना चाहते थे।

मैंने उनके दस्तावेज जांचने शुरू किए। 'मध्यप्रदेश विवाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण नियम के अनुसार, मैंने उनके आयु प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र, और पहचान पत्र का बारीकी से सत्यापन किया। सब कुछ ठीक था। दोनों बालिग थे और अपनी मर्ज़ी से शादी कर रहे थे। मैंने उन्हें समझाया कि इस अधिनियम के तहत, हमें 30 दिनों के लिए विवाह के इरादे की सूचना को कार्यालय में सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित करना होगा, ताकि कोई भी वैध आपत्ति उठा सके। उन्होंने इस शर्त को स्वीकार कर लिया, और मैं समझ गया कि उनका यह फैसला दृढ़ है।

सूचना कार्यालय के नोटिस बोर्ड पर लगा दी गई। पहले दो हफ्ते सब ठीक रहा, लेकिन तीसरे हफ्ते, कुछ लोग कार्यालय में हंगामा करने आ गए। वे प्रिया और आदिल के विवाह पर आपत्ति जता रहे थे और उसे "समाज के खिलाफ" बता रहे थे। उनका आरोप था कि यह विवाह "धोखाधड़ी" और "जबरन धर्म परिवर्तन" के इरादे से किया जा रहा है।

यह मेरे लिए एक नाजुक स्थिति थी। एक तरफ सामाजिक दबाव था, और दूसरी तरफ मेरा कर्तव्य। मैंने उन्हें शांत किया और समझाया कि मेरा काम कानून के तहत आपत्तियों की जांच करना है, न कि किसी सामाजिक धारणा के आधार पर निर्णय लेना। मैंने उनसे कहा कि अगर उनके पास कोई ठोस सबूत है कि यह विवाह जबरन या धोखाधड़ी से किया जा रहा है, तो वे लिखित में आपत्ति दर्ज करा सकते हैं। बिना सबूत के मैं कोई कार्रवाई नहीं कर सकता।

उन लोगों के पास कोई सबूत नहीं था। मैं जानता था कि यह आपत्ति सिर्फ उनकी धार्मिक असहिष्णुता पर आधारित थी। मैंने कानून के दायरे में रहकर अपनी जांच जारी रखी। मैंने प्रिया और आदिल दोनों से अलग-अलग बात की, यह सुनिश्चित करने के लिए कि उन पर कोई दबाव तो नहीं है। दोनों ने ही स्पष्ट रूप से कहा कि वे अपनी मर्ज़ी से शादी कर रहे हैं और उनके रिश्ते में कोई जबरदस्ती नहीं है।

30 दिन की अवधि पूरी हो गई। कोई भी वैध आपत्ति सामने नहीं आई। उस दिन, मैंने अपने कर्तव्य का पालन करते हुए उनका विवाह पंजीकृत कर दिया और उन्हें उनका विवाह प्रमाण पत्र सौंपा। जब उन्होंने प्रमाण पत्र लिया, तो उनकी आँखों में खुशी और राहत के आँसू थे।

यह सिर्फ एक विवाह का पंजीकरण नहीं था; यह कानून की जीत थी, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत थी। मेरे लिए, यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों की रक्षा करने का एक अवसर था। एक विवाह पंजीयन अधिकारी के रूप में, मैंने सीखा कि सबसे बड़ी ताकत कानून की कलम में होती है, जो समाज के हर शोर को शांत कर सकती है और सच्चाई को सामने ला सकती है। पर मेरे कलेक्टर ने इस पर आपत्ति ली और कहा कि मैं भविष्य में बिना उनसे पूछे कोई पंजीयन ना करू। 

यह सब 6 दिसंबर 1992 से पहले की बातें थीं, जो भोपाल में तनाव बढ़ रहा था। मैंने धारा 144 लगाने का आदेश तैयार किया, लेकिन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने उसे जारी करने से मना कर दिया। अगले दिन, जब जहांगीराबाद के मुर्गी बाज़ार में बाबरी मस्जिद के टूटने की खबर फैली, तो पत्थरबाजी शुरू हो गई। हमने रोकने की कोशिश की, लेकिन हालात बेकाबू हो गए। मेरी जीप को भीड़ ने पलट दिया और उसके ड्राइवर को मारा-पीटा। यह भोपाल दंगों की शुरुआत थी। शहर में उठता काला धुआँ, मानवता की मौत और इंसान की हैवानियत का प्रतीक बन गया था।

भोपाल, 1992: जब शहर पर उतरा काले धुएं का साया

यह कहानी सिर्फ 1992 के भोपाल दंगों की नहीं, बल्कि एक सरकारी अधिकारी की आँखों देखी दास्तान है, जिसने उस काली रात की भयानक हकीकत को जिया और महसूस किया। एक ऐसे समय की कहानी, जब देश की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी थी, और भोपाल शहर की मिली-जुली संस्कृति पर हैवानियत का साया पड़ गया था।

तूफान से पहले की शांति

मैंने शनिवार को ए.डी.एम. का कार्यभार संभाला था। राम मंदिर विवाद अपने चरम पर था और भोपाल का माहौल बेहद तनावपूर्ण था। मैंने धारा 144 का आदेश तैयार करवाया, लेकिन कलेक्टर ने पुलिस अधीक्षक से बात करके उसे जारी करने से मना कर दिया। उन्होंने कहा, "अभी इसकी ज़रूरत नहीं है।" 6 दिसंबर, 1992 की रात, मैं और मेरे साथी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक उमेश सारंगी, शहर की सड़कों पर गश्त लगा रहे थे। शहर शांत था। यह तूफान से पहले की शांति थी। हमें पता था कि दंगे के कुछ पूर्व संकेत होते हैं जैसे कि लोग ज़्यादा मात्रा में आटा और सब्जियां खरीदने लगे, बच्चों को स्कूल न भेजें। लेकिन उस रात, सब कुछ सामान्य लग रहा था।

अगले दिन, 7 दिसंबर की सुबह, हम पुलिस कंट्रोल रूम पहुँचे। दिसंबर की ठंडी सुबह थी। जहांगीराबाद के मुर्गी बाज़ार में लोग चाय पी रहे थे और अखबार पढ़ रहे थे। खबरों में बाबरी मस्जिद के गुंबदों को तोड़ते हुए कारसेवकों की तस्वीरें छपी थीं। इन तस्वीरों ने लोगों की भावनाओं को भड़का दिया। अतिरिक्त एस.पी. ने लोगों को घरों के अंदर जाने का ऐलान किया, लेकिन लोग भड़क उठे। "आपने हमारी मस्जिद तोड़ दी और अब हमें घरों से बाहर भी नहीं बैठने दे रहे!" उन्होंने चिल्ला कर कहा।

भोपाल में दंगे की शुरुआत

एकाएक आसपास से पत्थर चलने लगे। पुलिस ने लाठीचार्ज किया और हम वापस कंट्रोल रूम आ गए। मैंने फिर से कलेक्टर से धारा 144 लगाने का अनुरोध किया, लेकिन उन्होंने इंकार कर दिया। कुछ देर बाद, फिर से मुर्गी बाज़ार से भीड़ के इकट्ठा होने की खबर आई। इस बार हम कुछ पुलिस जवानों के साथ पहुंचे। सामने से पत्थरबाजी शुरू हो गई। भीड़ ने हमें घेर लिया, और एक सब-इंस्पेक्टर की सर्विस रिवाल्वर छीन ली गई। पुलिस ने डंडे चलाकर लोगों को भगाया। हमारी पेट्रोल गाड़ी तो स्टार्ट हो गई, लेकिन मेरी डीजल जीप को स्टार्ट होने में समय लगा। जब हम वापस गए, तो देखा कि जीप को उल्टा पलट दिया गया था, ड्राइवर को पीटा गया था और टायर काट दिए गए थे।

यही भोपाल दंगों की शुरुआत थी। धीरे-धीरे पूरे शहर में पत्थरबाजी, आगजनी और दुकानों को जलाने की खबरें आने लगीं। जब हम ऊँची जगहों से देखते, तो शहर पर एक काला, डरावना धुआँ छाया हुआ था। ऐसा लग रहा था मानो मानवता मर चुकी है और मनुष्य की हैवानियत तांडव कर रही है।

एक निर्णायक पल

हमें शाहजहांनाबाद पुलिस स्टेशन से खबर आई कि भीड़ ने एक डॉक्टर के क्लिनिक को घेर लिया है और उसे आग लगाने की तैयारी कर रही है। हम तुरंत वहाँ पहुँचे। सामने उन्मादी भीड़ थी जो 'अल्लाह-हु-अकबर' और 'इस्लाम जिंदाबाद' जैसे नारे लगा रही थी। मैंने पुलिस को तीन राउंड गोली चलाने का आदेश दिया। दो लोग मर गए, लेकिन भीड़ रुकी नहीं। मैंने फिर से गोली चलाने का आदेश दिया। जब भीड़ का नेता गोली लगने से गिरा, तब जाकर भीड़ तितर-बितर हुई। हमने डॉक्टर और मरीजों को सुरक्षित निकाला। मैंने तुरंत कलेक्टर के पास जाकर कर्फ्यू लगाने का आदेश बनवाया, जिस पर बहुत बहस के बाद उन्होंने हस्ताक्षर किए।

प्रशासनिक बदलाव और व्यक्तिगत खतरे

दंगों के दौरान मुझे कई बार अपनी जान का खतरा महसूस हुआ। एक बार इंदिरा नगर में गश्त के दौरान छत से चली गोली ने मेरे सामने ही छह लोगों को मार डाला। एक और घटना में, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड की कॉलोनी में तलाशी के दौरान, एक व्यक्ति ने मेरे गार्ड पर गोली चला दी और वह मौके पर ही मर गया।

हालात इतने बिगड़ गए थे कि मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा को भी रात में शहर का दौरा करने से रोका गया, लेकिन वह नहीं मानते। उनके काफिले पर भी पत्थर चले। अंततः, 8 दिसंबर को सेना को बुलाने का फैसला लिया गया। उसी रात, कलेक्टर और एसपी. को बदल दिया गया। प्रवेश शर्मा को नया कलेक्टर और सुरेंद्र सिंह को नया एस.पी. नियुक्त किया गया।

दंगों के दौरान, आरिफ अकील जैसे निर्दलीय विधायक को भी गिरफ्तार कर सागर जेल भेज दिया गया था। मुझे एक रात उन्हें गिरफ्तार करने भेजा गया था, जहां उनके घर के बाहर और अंदर बहुत तनाव का माहौल था। मैंने उन्हें भरोसा दिलाया और वह मेरी गाड़ी में बैठकर थाने जाने को तैयार हो गए।

दंगों की "एनाटॉमी" और उसका राजनीतिक विश्लेषण

दंगों के बाद, हमने उनकी "एनाटॉमी" को समझने की कोशिश की। यह एक तीन-चरणीय प्रक्रिया है: तैयारी, सक्रियता और स्पष्टीकरण। हमने देखा कि कैसे झूठी खबरों और भड़काऊ भाषणों ने माहौल बनाया और कैसे बाबरी मस्जिद का विध्वंस एक चिंगारी बन गया। मेरे लिए यह "इनसाइड व्यू" था, जहाँ में हर घटना का हिस्सा था, जबकि बाहर की दुनिया के लिए यह केवल "आउटसाइड व्यू" था।

दंगों के बाद, सरकार ने एक न्यायिक जांच आयोग का गठन किया। हमें महीनों तक हर घटना का विस्तृत रिकॉर्ड तैयार करने में लग गए। यह एक मुश्किल काम था, जिसमें गोली चलाने से लेकर मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट तक सब कुछ शामिल था। पुलिस तथा मजिस्ट्रेटों के बीच बहुत विवाद भी हुए। आयोग की रिपोर्ट में प्रशासन पर कई सवाल उठाए गए, खासकर कर्फ्यू लगाने में देरी और पुलिस की कथित पक्षपात पूर्ण कार्रवाई पर।

भोपाल दंगा लगभग तीन महीने तक चला। उस दौरान मैं और मेरे साथी दिन-रात पुलिस कंट्रोल रूम में रहते थे। हमने न खाना खाया, न कपड़े बदले। बस एक ही जुनून था शहर में शांति बहाल करना। इस दौरान मैंने देखा कि कैसे सत्ता के गलियारों में लोग अपने फायदे के लिए राजनीति करते हैं, और कैसे एक अधिकारी को अपने विवेक और नियमों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। इस त्रासदी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया और मेरे जीवन का एक अविस्मरणीय हिस्सा बन गया।

भोपाल: दंगों की राख से राजनीतिक बदलाव तक

1992 के भोपाल दंगे सिर्फ हिंसा की घटना नहीं थे, बल्कि भारतीय राजनीति और समाज में आए एक बड़े बदलाव का प्रतीक थे। इस दौर में, मैंने एक अधिकारी के रूप में, दंगों की विभीषिका, प्रशासन की कमियां और राजनीतिक दाँव-पेंच को बहुत करीब से देखा।

एक अधिकारी का दृष्टिकोण

दंगों के शांत होने के बाद, हम इस त्रासदी की "एनाटॉमी" को समझने की कोशिश कर रहे थे। दंगे अचानक नहीं होते, बल्कि उनकी एक निश्चित प्रक्रिया होती है:

तैयारी: इस चरण में, 'फायर टेंडर' (तनाव बढ़ाने वाले लोग) भड़काऊ भाषणों और अफवाहों से समुदायों के बीच अविश्वास पैदा करते हैं।

सक्रियता: हिंसा की चिंगारी एक छोटी सी घटना या अफवाह से भड़कती है, और 'रूपांतरण विशेषज्ञ' भीड़ को उकसाते हैं।

स्पष्टीकरण: हिंसा के बाद, मीडिया और राजनेता अक्सर घटना को धार्मिक या सहज बताकर असली जिम्मेदार लोगों से ध्यान हटाते हैं।

इस पूरे घटनाक्रम में, मैंने एक 'इनसाइडर' (आंतरिक दृष्टिकोण) के रूप में काम किया। मैं उस स्थिति की बारीकियों, भावनाओं और निजी अनुभवों का हिस्सा था, जो किसी बाहरी व्यक्ति के लिए समझना मुश्किल था। यह दौर भारतीय राजनीति में एक बड़े बदलाव का समय था। दशकों तक चली कांग्रेस की सत्ता के बाद, राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की लहर जोर पकड़ रही थी। लालकृष्ण आडवाणी की 'राम रथ यात्रा' ने इस लहर को एक राष्ट्रीय आंदोलन बना दिया, जिसने बीजेपी को एक प्रमुख पार्टी के रूप में स्थापित किया।

दंगों के बाद राहत और पुनर्वास

दंगों के बाद, केंद्र सरकार ने मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा की बीजेपी सरकार को बर्खास्त कर दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। सत्ता की बागडोर राज्यपाल के हाथों में आ गई। मेरे जैसे अधिकारियों पर दंगा प्रभावित परिवारों के लिए राहत और पुनर्वास का जिम्मा था।

हमने दंगा पीड़ितों की मदद के लिए बीस टीमें बनाई। ये टीमें घर-घर जाकर नकदी, बांस-बल्ली और अन्य राहत सामग्री पहुँचाती थीं। राज्यपाल महोदय हर सप्ताह जनता दरबार लगाते थे, जहाँ वे व्यक्तिगत रूप से पीड़ितों से मिलते और सहायता देते थे। हमारा काम था इन सभी कार्यों का रिकॉर्ड रखना, ताकि भविष्य में कोई अनियमितता न हो। यह एक मुश्किल, लेकिन मानवीय कार्य था, जिसने मुझे प्रशासन के असली चेहरे से रूबरू कराया।

चुनाव और राजनीतिक ध्रुवीकरण

राष्ट्रपति शासन लगभग एक साल तक चला, जिसके बाद 1993 में विधानसभा चुनाव हुए। यह चुनाव एक तनावपूर्ण माहौल में हो रहा था। प्रशासन ने निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सभी तैयारियां की। इस दौरान, मैंने "साहू जी चले चुनाव कराने" नाम की एक फिल्म बनाई, जिसकी कहानी मैंने लिखी और मुख्य किरदार भी निभाया। यह फिल्म चुनाव कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए बनाई गई थी और इतनी लोकप्रिय हुई कि लोग मुझे 'साहू जी' के नाम से जानने लगे।

चुनावी परिणाम ने एक बड़ा राजनीतिक बदलाव दिखाया। भोपाल दंगों में बीजेपी सरकार की विफलता ने मतदाताओं को प्रभावित किया। कांग्रेस ने शानदार जीत हासिल की और दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में नई सरकार बनी। भोपाल उत्तर से कांग्रेस की पारंपरिक सीट पर आरिफ अकील की हार, उस समय के धार्मिक ध्रुवीकरण का सीधा सबूत थी।

भीड़तंत्र, एक अलग नजरिया

यह उन दिनों की बात है जब मैं एक युवा अधिकारी था और नेताओं के कार्यक्रमों को नजदीक से देख रहा था। एक आम प्रथा थी कि जब भी कोई बड़ा नेता भोपाल एयरपोर्ट या रेलवे स्टेशन पर बाहर से आता, उसके स्वागत के लिए पैसे देकर भीड़ जुटाई जाती थी। यह भाड़े की भीड़ ज़ोर-शोर से नारे लगाती, धक्का-मुक्की करती ताकि यह लगे कि नेता जी बहुत लोकप्रिय हैं।

एक बार मैंने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए एक रस्सी लगाकर लोगों को लाइन से खड़ा करवाया। तब एक कांग्रेस के बड़े नेता ने मुझे समझाया, "यह भीड़तंत्र है। हमारी पार्टी कैडर-बेस्ड नहीं है, यह एक विचारधारा है। इसलिए यहाँ कोई सीनियर-जूनियर नहीं होता, सब कार्यकर्ता हैं।" उस दिन मुझे 'भीड़ तंत्र' का असली मतलब समझ आया।

घोड़ा नक्कास पर दुर्गा विसर्जन और मेरी नींद

मुझे रात नौ से दस बजे के बीच सोने की आदत थी। एक बार भोपाल के घोड़ा नक्कास रोड पर दुर्गा विसर्जन का जुलूस निकल रहा था। मैं घूमते-घूमते वहाँ पहुँचा। चौराहे के बीच में पुलिस ने एक कुर्सी रखी थी। चारों तरफ तेज आवाज में डीजे बज रहे थे, झांकियां निकल रही थी और लोग नाच-गा रहे थे। तेज़ रोशनी में भी, पता नहीं कैसे, मैं उस कुर्सी पर बैठा-बैठा सो गया। जब कलेक्टर और एसपी वहाँ पहुँचे, तो मुझे चौराहे पर सोता देखकर वो चौंक गए।

भोपाल दंगे और डीआईजी की तकनीक

हमारे डीआईजी सुरजीत सिंह एक बहुत ही अनुभवी अधिकारी थे। भोपाल दंगे के दौरान उन्होंने मुझे बताया, "भीड़ को काबू में करना हो, तो एक डंडे से लोगों को मारना शुरू करो, वे भाग जाएँगे। उन्हें एक जगह रुकने मत दो, बस चलाते रहो।" उन्होंने इस तकनीक का कई बार सफलतापूर्वक इस्तेमाल किया था। उनकी यह बात मुझे आज भी याद है कि भीड़ को तितर-बितर करने का सबसे अच्छा तरीका उन्हें लगातार चलते रहने के लिए मजबूर करना है।

टिप के लिए झगड़ा और लालघाटी का सर्किट हाउस

एक बार चुनाव के दौरान, दिल्ली से कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भोपाल आए और उन्हें लालघाटी के सर्किट हाउस में ठहराया गया। एक दिन वहाँ के इंचार्ज का फोन आया। उन्होंने बताया कि रूम सर्विस को लेकर स्टाफ में ज़ोरदार झगड़ा हो रहा है। हर कर्मचारी नेताओं के कमरे में सर्विस देना चाहता था। मुझे यह बात अजीब लगी, क्योंकि ये कर्मचारी आमतौर पर काम से बचने के लिए बदनाम थे, तो फिर आज इतना झगड़ा क्यों?

मैं स्थिति समझने के लिए सर्किट हाउस गया। पूछताछ करने पर पता चला कि जो कर्मचारी नेताओं के कमरे में सर्विस देने जाता था, उसे अच्छी-खासी टिप मिलती थी। यह झगड़ा पैसों के लिए था। मैंने तुरंत उन मेहमान नेताओं से मुलाकात की और उनसे आग्रह किया कि यह एक सरकारी सर्किट हाउस है और यहाँ टिप देने की प्रथा नहीं है। जब टिप मिलना बंद हो गया, तो कर्मचारियों के बीच का झगड़ा भी अपने आप खत्म हो गया।

एक नया अध्याय: ग्रामीण विकास की ओर

कांग्रेस सरकार के गठन के एक साल बाद, मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मुझे बुलाया। उन्होंने बताया कि भोपाल के स्थानीय कांग्रेसी नेता मेरा तबादला चाहते हैं। उन्होंने मुझसे मेरी पसंद की पोस्टिंग पूछी। मैंने उन्हें ग्रामीण विकास विभाग में जाने की इच्छा जताई, जिसे उस समय प्रशासनिक सेवा में एक 'बेकार' विभाग माना जाता था। मेरे वरिष्ठ मित्र कोमल सिंह जी भी मेरे इस फैसले से नाराज हुए और उन्होंने मुझे आरटीओ या ड्रग कंट्रोलर बनने का सुझाव दिया। लेकिन मैंने अपने मन की सुनी और ग्रामीण विकास विभाग में जाने की जिद पर अड़ा रहा। आखिरकार, मेरा तबादला संयुक्त विकास आयुक्त के पद पर हो गया।

इस पूरे सफर में मुझे तीन अलग-अलग सरकारों  बीजेपी, राज्यपाल शासन और कांग्रेस  के साथ काम करने का मौका मिला। यह मेरे लिए सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के उतार-चढ़ाव, सामाजिक संघर्ष और प्रशासनिक चुनौतियों को समझने का एक अनमोल अनुभव था।

विकास आयुक्त कार्यालय 

जिला से राज्य स्तर तक का सफर: एक नया अनुभव

जिला स्तर पर मेरी सेवा का अनुभव काफी लंबा था, लेकिन राज्य स्तर के कार्यालय में काम करने का मुझे बिल्कुल भी अनुभव नहीं था। जिले में मैं कलेक्टर के बाद सबसे वरिष्ठ अधिकारी था, और वहाँ का माहौल और अधिकार बिल्कुल अलग थे। मध्य प्रदेश में पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के तहत विकास आयुक्त कार्यालय में जब मैं आया, तो यहाँ का संगठनात्मक ढाँचा मेरे लिए बिल्कुल नया था।

इस नई व्यवस्था में, मुख्यमंत्री जी और विभागीय मंत्री सर्वोच्च पद पर थे, और अधिकारियों का विवरण कुछ इस तरह था:

विकास आयुक्त (Development Commissioner): यह पद विभाग का सर्वोच्च प्रशासनिक पद था, जिसके पास ग्रामीण विकास की सभी योजनाओं के कार्यान्वयन का पर्यवेक्षण, समन्वय और बजट आवंटन की जिम्मेदारी थी।

संचालक, ग्रामीण रोजगार (Director, Rural Employment): इनके अधीन योजना का क्रियान्वयन, जॉब कार्ड जारी करना, और मजदूरी भुगतान जैसे कार्य थे।

मुख्य अभियंता, ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (Chief Engineer, Rural Engineering Service): ये ग्रामीण सड़कों, पुलों और अन्य ढांचे के निर्माण और रखरखाव का काम देखते थे।

संयुक्त आयुक्त (बजट) (Joint Commissioner, Budget): इनके पास विभाग के वार्षिक बजट, वित्तीय आवंटन और ऑडिट रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी थी।

संचालक, पंचायत राज (Director, Panchayati Raj): यह पद त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने और पंचायतों के चुनाव व प्रशिक्षण का प्रबंधन करता था।

मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत (Chief Executive Officer, Zila Panchayat): यह पद जिला स्तर पर योजनाओं का क्रियान्वयन करता था और राज्य व जिला स्तर के बीच सेतु का काम करता था।

मेरे लिए यह अनुभव बिल्कुल नया था, जहां मुझे जिले के सीधे कार्यान्वयन के बजाय राज्य स्तर पर नीतियों और बड़े फैसलों को समझने और उनका समन्वय करने का मौका मिला।

इस संगठनात्मक चार्ट को समझने के बाद मुझे यह एहसास हुआ कि संयुक्त आयुक्त का पद यहां बहुत जूनियर स्तर का था। इन कार्यालयों में वही लोग सम्मान पाते हैं जो बहुत वरिष्ठ होते हैं और जिनके पास लोगों को फायदा या नुकसान पहुँचाने की ताकत होती है। अगर आपके पास यह ताकत नहीं है, तो कोई आपको नमस्ते भी नहीं करता। यहां विभिन्न विभागों से लोग प्रतिनियुक्ति पर आकर काम करते थे, इसलिए जिला कलेक्ट्रेट जैसी पदानुक्रम (hierarchy) यहां नहीं था । आप किसी के बॉस नहीं थे। यह सब समझने में मुझे समय लगा, लेकिन सबने मिलकर बहुत जल्दी सिखा दिया।

शुरुआती दौर बहुत मुश्किल था। पहले तो मुझे एक सप्ताह तक बैठने के लिए कमरा नहीं दिया गया। फिर फर्नीचर, ए.सी., चपरासी और गाड़ी जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए भी लड़ना पड़ा। जिले में इन सबके लिए मुझे कभी संघर्ष नहीं करना पड़ा था, लेकिन इस कार्यालय में सब कुछ छीनकर लेना पड़ा। शुरू से ही लोगों से और अपने बॉस से भी लड़ना पड़ा। 

शुरुआत के दिन बहुत कठिन थे और मेरे अहंकार को रोज, बल्कि दिन में कई बार चोट लगती थी। मेरे पास अपनी खुद की गाड़ी नहीं थी क्योंकि मैंने स्कूटर बेच दिया था, इसलिए मैंने बस से ऑफिस आना शुरू किया। काम का विभाजन न होने के कारण मैं दिन भर खाली बैठा रहता था। 

जिले में जहाँ मैं इतना अधिक काम करता था, यहाँ मेरी कोई कीमत नहीं थी। जिले में योजनाओं का क्रियान्वयन होता है, जबकि राज्य स्तर पर योजनाएं बनाई जाती हैं। यहाँ आप बहुत मेहनत करके एक अच्छा पत्र बनाकर अपने बॉस को दे सकते हैं, लेकिन यह उनकी मर्जी पर निर्भर था कि वे उसे आगे भेजें या नहीं। 

मुख्य लेखाधिकारी नायर बाबू, जो केरल के रहने वाले थे, बहुत मीठा बोलते थे, लेकिन हिंदी में उनका हाथ तंग था। वह मेरी बॉस के खास चमचे थे। जब मैंने उनसे बैठने के लिए एक कमरा मांगा, तो उन्होंने कहा कि अभी कोई कमरा खाली नहीं है। उन्होंने मुझे बाबू लोगों के साथ बैठने की व्यवस्था देने की कोशिश की, पर मैं अकेला चैंबर चाहता था।

एक कमरे पर निरंजन साहब, जो कि संचालक पंचायत थे, का ताला लगा हुआ था। उनके पास पंचायत संचालनालय, सचिवालय और विकास आयुक्त कार्यालय में भी एक-एक कमरा था। मैंने नायर बाबू से उस कमरे को खोलने के लिए कहा, लेकिन उन्होंने मना कर दिया।

जब उन्होंने मेरी बात नहीं सुनी, तो मैंने उस कमरे का ताला तोड़ दिया। मैंने आस-पास के कमरों से फर्नीचर उठाया और एक कमरे से ए.सी. निकलवा कर अपने कमरे में लगवा लिया। नायर बाबू ने इसकी शिकायत मेरी बॉस से कर दी।

बॉस ने मुझे बुलाया और कहा, "तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए।"

मैंने जवाब दिया, "मैंने आपसे पूछकर यहाँ ज्वाइन किया था, और आपको मेरी बैठने की व्यवस्था देखनी चाहिए थी। मैं एक सप्ताह से नायर बाबू से अनुरोध कर रहा था, लेकिन मेरी कोई बात नहीं सुनी गई। जब कोई और रास्ता नहीं बचा, तो मुझे खुद व्यवस्था करनी पड़ी।"

विकास आयुक्त कार्यालय में मैंने अपनी जगह बनाना शुरू कर दिया था। मुझे पता था कि मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता। वहाँ जितने भी अधिकारी थे, वे सब जोड़-तोड़ में तो माहिर थे, पर लिखने-पढ़ने में बहुत कमजोर थे। मैं उनसे बिल्कुल उलट था। जोड़-तोड़ में मेरी कोई रुचि नहीं थी, मैं बस अपने काम से काम रखता था। अपना सारा समय ग्रामीण विकास की योजनाओं की थ्योरी पढ़ने में लगाता था। पढ़ने की आदत थी और योजनाओं के मोटे-मोटे दस्तावेज़ पढ़कर उन्हें सरल भाषा में लिखना मेरी आदत बन गई थी।

मैं भोपाल की ब्रिटिश लाइब्रेरी का सदस्य था। हर सप्ताह में मैनेजमेंट, मनोविज्ञान और धर्म पर आधारित फिक्शन और नॉन-फिक्शन किताबें पढ़ता था। हर रविवार अखबार के लिए एक आर्टिकल भी लिखता था। मैं भोपाल यूनिवर्सिटी के रीजनल प्लानिंग विभाग से पीएचडी कर रहा था, जिस कारण प्रोफेसर से मिलना-जुलना होता था और पॉलिसी पर खूब बहस होती थी। मैं प्रशासन अकादमी और बहुत सारे संस्थानों में तरह-तरह के विषयों पर ट्रेनिंग भी देता था। देश भर में सेमिनार और भ्रमण कार्यक्रमों में भाग लेने से मेरा अनुभव और ज्ञान बढ़ रहा था। मुझे रूटीन के काम करने की जगह कुछ अलग हटकर काम करने की आदत थी।

जल्दी ही मैं अपने बॉस के लिए बहुत ज़रूरी बन गया। उन्हें हर रोज़ लिखने-पढ़ने वाले व्यक्ति की ज़रूरत होती थी, और अब वे हर जगह मुझे साथ लेकर जाते थे। चाहे मंत्रिपरिषद की बैठक हो या कोई उच्च स्तरीय प्रशासनिक बैठक। कार्यालय में मैं स्थापना,  बजट, आईआरडीपी और ट्राइसेम योजना का प्रभारी था। स्थापना शाखा बहुत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि इस शाखा में विभाग के सभी अधिकारी और कर्मचारियों के ट्रांसफर, पोस्टिंग, प्रमोशन, विभागीय जांच और दंड देने के काम होते हैं।

कार्यालय के हर अधिकारी कर्मचारी का मैं चहेता व्यक्ति बन गया था।  बजट शाखा का प्रभारी हो जाने  कारण मिस्टर नायर का अब में बॉस था। लेकिन वह बहुत चुगलखोर था। मेरे बॉस के सभी व्यक्तिगत काम वह देखता था। इस कारण उनका मुंह लगा था। लेकिन उसने मेरा क्रोध देखा था इसलिए मुझसे बहुत डरता था। धीरे-धीरे मैं शासन स्तर पर काम करने  में अभ्यस्त हो गया। सारे देश और प्रदेश में मुझे टूर करना होते थे। इन दिनों कम्प्यूटर हमारे देश में आयात हो रहे थे। इंटरनेट का कनेक्शन मिलना शुरू हुआ था। भोपाल में पहले तीन व्यक्तियों में से एक था जिसके पास एप्पल का कंप्यूटर तथा इंटरनेट का कनेक्शन था।  

 भारत में एप्पल कंप्यूटर का शुरुआती सफर

एप्पल कंपनी की स्थापना 1976 में स्टीव जॉब्स और स्टीव वोजनियाक ने की थी, लेकिन भारत में इसके उत्पादों का सफर काफी देर से शुरू हुआ। 1990 के दशक में भारत में कंप्यूटर एक बहुत ही नई और दुर्लभ चीज़ थी। उस समय एप्पल के कंप्यूटर सिर्फ कुछ विशेष संस्थानों और गिने-चुने लोगों के पास ही थे, जो इन्हें सीधे विदेश से मँगवाते थे।

उस दौर में, भारतीय बाज़ार में एप्पल की सीधी पहुँच लगभग नहीं थी, और इसका मुख्य कारण उत्पादों की बहुत ज़्यादा कीमत थी। उस समय भारत में कंप्यूटर बाज़ार मुख्य रूप से पर्सनल कंप्यूटर (PC) पर केंद्रित था, जहाँ माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम वाले कंप्यूटरों का दबदबा था। मैक (Mac) कंप्यूटर अपने ग्राफ़िकल यूज़र इंटरफ़ेस (GUI) और बेहतर डिज़ाइन के लिए जाने जाते थे, लेकिन उनकी कीमत बहुत ज़्यादा होने के कारण वे आम भारतीय ग्राहक की पहुँच से बाहर थे।

आईफोन और आईपैड के आने से पहले, भारत में एप्पल के कंप्यूटरों का इस्तेमाल ज़्यादातर ग्राफिक डिज़ाइन, वीडियो संपादन और प्रकाशन जैसे पेशेवर कामों के लिए होता था। यह स्थिति 2000 के दशक के मध्य में आईफोन के लॉन्च के बाद ही पूरी तरह से बदलनी शुरू हुई।

भारत में इंटरनेट कनेक्शन का शुरुआती दौर

भारत में इंटरनेट का सफर भी एप्पल के कंप्यूटरों की तरह धीरे-धीरे शुरू हुआ। भारत में इंटरनेट की शुरुआत 1986 में हुई थी, लेकिन यह सुविधा सिर्फ शैक्षिक और अनुसंधान संस्थानों तक ही सीमित थी। इसे आम जनता के लिए उपलब्ध नहीं कराया गया था।

भारत में आम जनता के लिए इंटरनेट की उपलब्धता 15 अगस्त 1995 को विदेश संचार निगम लिमिटेड (VSNL) द्वारा शुरू की गई। यह एक ऐतिहासिक पल था, जिसने भारत में डिजिटल क्रांति की नींव रखी।

शुरुआती इंटरनेट कनेक्शन की कुछ खास बातें

डायल-अप कनेक्शन: इस समय इंटरनेट का इस्तेमाल करने के लिए टेलीफोन लाइन का उपयोग होता था। इसे "डायल-अप" कनेक्शन कहा जाता था। जब इंटरनेट चल रहा होता था, तो टेलीफोन लाइन व्यस्त हो जाती थी और आप कॉल नहीं कर सकते थे।

धीमी स्पीड: इंटरनेट की स्पीड बहुत धीमी थी। शुरुआती दिनों में स्पीड 9.6 Kbps या 14.4 Kbps हुआ करती थी। उस समय 1 MB की एक तस्वीर डाउनलोड करने में कई मिनट लग जाते थे।

महंगा और सीमित उपयोग: इंटरनेट बहुत महंगा था। कनेक्शन और इस्तेमाल के लिए भारी शुल्क लगता था। इस वजह से इसका उपयोग मुख्य रूप से व्यवसायों, समाचार पत्रों और कुछ खास लोगों द्वारा ही किया जाता था। साइबर कैफे उस समय बहुत लोकप्रिय हुए थे, जहाँ लोग प्रति घंटे के हिसाब से पैसे देकर इंटरनेट का इस्तेमाल करते थे।

कनेक्टिविटी के तरीके: शुरुआती दौर में इंटरनेट कनेक्शन टेलीफोन लाइनों के माध्यम से मिलता था। ब्रॉडबैंड और फाइबर जैसी आधुनिक तकनीक उस समय उपलब्ध नहीं थी।

जब भारत में एप्पल के शुरुआती कंप्यूटरों की बात होती है, तो उस समय इंटरनेट एक महंगी और धीमी गति की सेवा थी, जो कुछ ही लोगों तक उपलब्ध थी। दोनों का विकास एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था, और उन्होंने मिलकर ही भारत में आज के तकनीकी माहौल की नींव रखी।

एक समय था जब मैं कंप्यूटर सीखने के लिए एक ट्रेनिंग सेंटर जाया करता था, जिसे ज़ी कंपनी चलाती थी। यह सेंटर नेशनल इन्फॉर्मेटिक्स सेंटर (NIC) के साथ मिलकर काम करता था, जहाँ सरकारी योजनाओं के लिए सॉफ्टवेयर बनाए जाते थे। उस समय मेरे अंदर नई-नई टेक्नोलॉजी सीखने की एक अजीब सी भूख थी। मैं हमेशा कुछ नया जानने और समझने की कोशिश में लगा रहता था।

मेरी खुशकिस्मती थी कि मैं विकास आयुक्त के कार्यालय में काम करता था, जहाँ बजट की कोई कमी नहीं थी। अगर मुझे कोई नई टेक्नोलॉजी या उपकरण खरीदना होता, तो मेरे बॉस से अनुमति लेना बहुत आसान था। वह मुझे बहुत सम्मान देते थे, मेरे काम की सराहना करते थे और मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते थे।

मेरे बॉस का नाम अरुण गुप्ता था। वे दिल्ली के रहने वाले एक बेहद ही डैशिंग और प्रोग्रेसिव अधिकारी थे। उनकी सोच बहुत आधुनिक थी और मध्य प्रदेश में ग्रामीण विकास की नीतियों को बनाने में उनका बहुत बड़ा योगदान था। मुझे आज भी याद है कि कैसे उनके प्रोत्साहन ने मुझे न सिर्फ सीखने के लिए प्रेरित किया, बल्कि मुझे अपने काम में भी बहुत आगे बढ़ाया। उनका विश्वास और सम्मान ही मेरी सबसे बड़ी प्रेरणा थी। वह सिर्फ एक बॉस नहीं, बल्कि एक गुरु की तरह थे, जिन्होंने मुझे सही दिशा दिखाई।

विकास की अवधारणा 

यह कहानी है एक देश के दिल दहला देने वाले यथार्थ से एक उज्जवल भविष्य की ओर बढ़ने की। विकास की यह अवधारणा मानव सभ्यता के साथ-साथ चलती रही है, एक जटिल और सतत चलने वाली प्रक्रिया। यह कहना मुश्किल है कि इसकी शुरुआत कब और कहाँ हुई, लेकिन आर्थिक विकास के प्रयास हमेशा से चलते रहे हैं। एक समय था जब हमारे देश में अल्प विकास का यथार्थ था - गंदगी, बीमारी, भुखमरी, और उससे भी बढ़कर, एक गहरी निराशा। इसे केवल कुछ आँकड़ों से नहीं समझा जा सकता था, यह हर व्यक्ति के जीवन में महसूस किया जाता था।

विकास का असली मतलब केवल धन-दौलत बढ़ाना नहीं, बल्कि लोगों के जीवन स्तर में सुधार लाना था। द्वितीय  विश्व युद्ध के बाद, जब दुनिया में आर्थिक समृद्धि की बात होने लगी, तो यह समझा गया कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें किसी भी देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगातार वृद्धि होनी चाहिए। लेकिन अगर इस समृद्धि का लाभ केवल कुछ ही लोगों को मिलता है, तो इसे 'बिना विकास की समृद्धि' कहा जाता है। सच्चे आर्थिक विकास के लिए ज़रूरी है कि जनसंख्या में वृद्धि के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय भी बढ़े और गरीबी, असमानता तथा बेरोजगारी में लगातार कमी आए।

लेकिन दुखद सच्चाई यह है कि आधुनिक आर्थिक विकास के बावजूद, विकासशील देशों की लगभग चालीस प्रतिशत आबादी आज भी इस प्रगति के लाभ से वंचित है। इस विषमता की जड़ें बाजार की ताकतों के उस नियंत्रण में थी, जिसने पूंजीवादी अर्थव्यवस्था को जन्म दिया। 

पूंजीवाद ने एक ऐसा आर्थिक ढाँचा बनाया जहाँ निजी निवेश और लाभ को सबसे ऊपर रखा गया। इसी को देखते हुए, यह महसूस किया गया कि अर्थव्यवस्था को सही दिशा देने के लिए आर्थिक नियोजन की आवश्यकता है। यह ऐसा था, मानो एक बड़ा जहाज अपने आप चलने के बजाय, किसी अनुभवी कप्तान के मार्गदर्शन में चले।

इसी सोच के साथ, स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार ने 1950 में योजना आयोग की स्थापना की। यह एक ऐसा कदम था, जिसने देश को एक नई दिशा दी। इस आयोग का मुख्य काम देश के समग्र विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएँ लागू करना था।

स्वतंत्रता के बाद, हमारे देश की कहानी एक ऐसे घर की तरह थी, जहां जमीन तो बहुत थी, पर घर के चूल्हे में पर्याप्त अनाज नहीं था। हम एक कृषि प्रधान देश थे, लेकिन फिर भी अपनी जनता का पेट भरने के लिए खाद्यान्न आयात पर निर्भर थे। इसी चुनौती को देखकर, हमारे नेताओं ने पहला बड़ा संकल्प लिया। पहली पंचवर्षीय योजना का एकमात्र लक्ष्य था कृषि में आत्मनिर्भरता हासिल करना। यह ऐसा था मानो पूरा देश अपनी मिट्टी को एक बार फिर से उपजाऊ बनाने के मिशन पर निकल पड़ा हो।

जब हमारे अन्न भंडार भरने लगे, तो देश ने दूसरी दिशा में सोचना शुरू किया। दूसरी पंचवर्षीय योजना, जो 'महालनोबिस मॉडल' पर आधारित थी, ने गांव से निकलकर कारखानों की दुनिया में कदम रखा। इस योजना में औद्योगिक निवेश पर पूरा ज़ोर दिया गया, ताकि देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिले।

अगले कदम के रूप में, तीसरी योजना में देश ने अपनी सोच को और विस्तार किया। अब उद्देश्य सिर्फ बड़े उद्योग लगाना नहीं, बल्कि सहकारिता को बढ़ावा देना, छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों को सहारा देना और आर्थिक असमानताओं को कम करना था।

लेकिन धीरे-धीरे यह महसूस होने लगा कि हमारी ये बड़ी-बड़ी योजनाएं बहुत केंद्रीकृत हैं। वे दिल्ली से तो बहुत अच्छी लगती थीं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और थी। क्षेत्र और सामुदायिक विकास के कार्यक्रमों में टकराव होने लगा, और अमीरी-गरीबी की खाई और भी गहरी होती जा रही थी। इस बड़ी समस्या को पहचानते हुए, चौथी पंचवर्षीय योजना में एक बार फिर से आर्थिक असमानताओं को कम करने का लक्ष्य रखा गया।

फिर, पाँचवीं पंचवर्षीय योजना में एक नई सोच के साथ, विकेंद्रीकृत योजनाएँ बनाई गईं। अब स्थानीय शासन की संस्थाओं को यह अधिकार दिया गया कि वे अपनी जरूरतों के हिसाब से योजनाएं बताएं, ताकि गरीबी को सीधे उसके स्रोत पर खत्म किया जा सके। छठवीं पंचवर्षीय योजना में एक और प्रयास किया गया, जिसमें रोजगार और व्यक्तिगत आय बढ़ाने के कार्यक्रम चलाए गए। लेकिन दुर्भाग्य से, इन कार्यक्रमों ने गरीबों को गरीबी से बाहर निकालने के बजाय, उन्हें कर्ज के बोझ तले और दबा दिया। इस अनुभव से सबक लेते हुए, सातवीं पंचवर्षीय योजना में देश ने अपनी सारी ऊर्जा एक ही लक्ष्य पर केंद्रित कर दी: गरीबी हटाना। यह हमारे देश की एक लंबी और संघर्षपूर्ण यात्रा थी।

हमने विकास के लिये विदेशों में विकसित थ्योरी / सिद्धांतों को भी लागू किया जिसमें ट्रिकल-डाउन थ्योरी (नीचे की ओर टपकने का सिद्धांत) पहला था। इस सिद्धांत को अक्सर "गरीबी हटाओ" के नारे के विपरीत माना जाता है। 1970 के दशक में इंदिरा गांधी की सरकार ने इस नारे के साथ सीधे गरीबों को लक्षित करने का प्रयास किया। यह इस विचार का खंडन था कि आर्थिक विकास का लाभ अपने आप गरीबों तक पहुंच जाएगा। 

भारत में अनुभव यह रहा है कि बड़ी कंपनियों को दिए गए टैक्स लाभ हमेशा रोजगार सृजन या श्रमिकों के वेतन में वृद्धि का कारण नहीं बने। बल्कि, धन का एक बड़ा हिस्सा अक्सर कुछ ही हाथों में केंद्रित हो जाता था, जिससे आय असमानता बढ़ गई। 1991 के बाद की उदारीकरण की नीतियों में भी, जहां बड़े उद्योगों और विदेशी निवेश को बढ़ावा मिला, यह देखा गया कि संगठित क्षेत्र में रोजगार वृद्धि धीमी रही और अनौपचारिक क्षेत्र के श्रमिकों की स्थिति में खास सुधार नहीं हुआ। इस सिद्धांत की बजाय, भारत ने सीधा लाभ हस्तांतरण और लक्षित योजनाओं पर अधिक भरोसा किया है।

दूसरी विकास ध्रुव सिद्धांत (ग्रोथ पोल थ्योरी) था। आजादी के बाद, भारत की दूसरी और तीसरी पंचवर्षीय योजनाओं में इस सिद्धांत का गहरा प्रभाव था। बड़े स्टील प्लांट, बिजली परियोजनाएं और भारी उद्योग (जैसे भिलाई, राउरकेला और दुर्गापुर) इस सिद्धांत के प्रमुख उदाहरण थे। इन औद्योगिक केंद्रों की स्थापना का उद्देश्य था कि वे अपने आसपास के क्षेत्रों में सहायक उद्योगों, सेवाओं और नौकरियों को जन्म देंगे। इन 'विकास ध्रुवों' ने अपने-अपने क्षेत्रों में औद्योगिक और शहरी विकास को गति दी, जिससे रोजगार के अवसर पैदा हुए। 

हालाँकि, इसकी आलोचना यह रही है कि इन ध्रुवों का प्रभाव सीमित रहा और ये अपने आसपास के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में विकास को पूरी तरह से फैला नहीं पाए। इससे क्षेत्रीय असंतुलन भी बढ़ा, क्योंकि विकसित ध्रुवों और उनके पिछड़े hinterland के बीच एक बड़ी खाई बन गई।

तीसरी थ्योरी थी लक्षित क्षेत्र विकास (Target-oriented Area Development) की। 

यह सिद्धांत भारत के ग्रामीण विकास कार्यक्रमों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। भारत की भौगोलिक विविधता को देखते हुए, यह महसूस किया गया कि पूरे देश के लिए एक जैसी योजना कारगर नहीं हो सकती। इसलिए, सरकार ने विशिष्ट समस्याओं वाले क्षेत्रों को लक्षित किया। इसके प्रमुख उदाहरण हैं:

सूखा-प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP): सूखे की समस्या वाले क्षेत्रों में जल और मृदा संरक्षण के उपाय करना। मरुस्थल विकास कार्यक्रम (DDP): रेगिस्तानी क्षेत्रों में मरुस्थलीकरण को रोकना और वहाँ की आजीविका को बढ़ाना। पर्वतीय क्षेत्र विकास कार्यक्रम: पहाड़ी इलाकों की विशिष्ट चुनौतियों (जैसे भूस्खलन और कनेक्टिविटी) को संबोधित करना। ये योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि और आजीविका के लिए स्थायी समाधान प्रदान करती हैं और क्षेत्रीय विषमताओं को कम करने में मदद करती हैं।

चौथी थ्योरी  है बीपीएल परिवार केंद्रित विकास (BPL Families-oriented Development) कार्यक्रम लागू करना। 

यह सिद्धांत सीधे तौर पर भारत की गरीबी उन्मूलन नीतियों का सार है। 'गरीबी हटाओ' के बाद से, भारत ने उन परिवारों को सीधे लाभ पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया है जो गरीबी रेखा से नीचे हैं। भारत सरकार द्वारा कुल बारह पंचवर्षीय योजनाएँ लागू की गयी। इन योजनाओं का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि विकास की गाड़ी सही दिशा में चले। पहली योजना से लेकर बारहवीं योजना तक, देश ने कभी कृषि पर ध्यान दिया, तो कभी उद्योगों पर, तो कभी गरीबी कम करने पर। हर योजना एक नया सपना लेकर आती थी और पूरी कोशिश करती थी कि उसे पूरा किया जाए।

मगर समय के साथ, यह महसूस किया जाने लगा कि एक ही जगह बैठकर पूरे देश के लिए योजना बनाना थोड़ा मुश्किल है। हर गांव, हर राज्य की जरूरतें अलग थी। वह ऐसा था मानो राजा एक ही क़ानून पूरे राज्य में लागू कर रहा है, जबकि हर प्रांत की अपनी समस्याएं थीं। इसी सोच के साथ, 1 जनवरी 2015 को योजना आयोग की जगह एक नई संस्था का जन्म हुआ, जिसका नाम था नीति आयोग। यह एक ऐसा कदम था, जिसने केंद्रीकृत योजना के पुराने दौर को समाप्त कर दिया।

नीति आयोग ने एक नई कहानी लिखी। योजना आयोग जहाँ ऊपर से नीचे (टॉप-डाउन) की तरह काम करता था, वहीं नीति आयोग ने नीचे से ऊपर (बॉटम-अप) का दृष्टिकोण अपनाया। इसका मतलब था कि अब योजनाओं की शुरुआत गाँव और जिला स्तर से होगी, और केंद्र सरकार तथा राज्य सरकार में एक टीम की तरह मिलकर काम करेंगी। यह बदलाव एक पुरानी, लेकिन मजबूत नींव को हटाकर एक आधुनिक और गतिशील भवन बनाने जैसा था, जहाँ हर राज्य को अपनी आवाज़ रखने का मौका मिला और वे देश के विकास में सक्रिय भागीदार बन सके।

यह कहानी दिखाती है कि कैसे हमारा देश लगातार सीखता रहा, अपनी गलतियों को सुधारता रहा और हर चुनौती को एक नए अवसर में बदलता रहा। विकास की यह यात्रा अभी भी जारी है।

मध्य प्रदेश में गैर-सरकारी संगठनों शुरुआत में, कई बार सरकार और एनजीओ के बीच नीतियों और परियोजनाओं को लेकर टकराव देखने को मिला है। लेकिन, जन अभियान परिषद का उद्देश्य सरकारी योजनाओं में एनजीओ को एक भागीदार के रूप में शामिल करना है। यह परिषद एनजीओ को एक मंच प्रदान करती है ताकि वे सरकार के साथ मिलकर काम कर सकें, हालांकि कई स्वतंत्र एनजीओ अपनी स्वायत्तता बनाए रखना पसंद करते हैं और सरकारी नियंत्रण से दूर रहकर काम करना जारी रखते हैं।

मेरा कपार्ट से जुड़ाव

कपार्ट (Council for Advancement of People's Action and Rural Technology), जिसे हिंदी में लोक कार्यक्रम और ग्रामीण प्रौद्योगिकी विकास परिषद कहा जाता था, भारत में एक स्वायत्त संस्था थी। इसकी स्थापना 1986 में भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के तहत की गई थी। उन दिनों, इसका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण विकास के लिए काम कर रहे गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) और स्वयंसेवी संस्थाओं को वित्तीय सहायता और तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान करना था।

कपार्ट का गठन दो पुरानी संस्थाओं - 'Council for Advancement of Rural Technology (CART)' और 'People's Action for Development of India (PADI)' - को मिलाकर किया गया था। इस संस्था के साथ मेरे जुड़ाव के कारण, मुझे उसके उद्देश्यों और कार्यप्रणाली को करीब से समझने का मौका मिला।

कपार्ट के प्रमुख उद्देश्य:

  • वित्तीय सहायता: ग्रामीण विकास से जुड़ी परियोजनाओं के लिए एनजीओ को अनुदान (grants) देना।

  • तकनीकी सहयोग: ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त और नई तकनीकों को विकसित करना और उन्हें बढ़ावा देना।

  • जनभागीदारी को बढ़ावा: ग्रामीण क्षेत्रों में विकास कार्यक्रमों को लागू करने के लिए लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।

  • नेटवर्किंग: ग्रामीण विकास से जुड़े विभिन्न हितधारकों (stakeholders) के बीच समन्वय और सहयोग बढ़ाना।

  • क्षमता निर्माण: छोटे और जमीनी स्तर के एनजीओ की क्षमता को बढ़ाना और उन्हें सशक्त बनाना।

जब कपार्ट सक्रिय था, तब अनुदान के लिए आवेदन करने वाले एनजीओ को कुछ शर्तों को पूरा करना होता था। अनुदान के लिए पात्रता मानदंड (जब यह सक्रिय था) के अनुसार, संस्था को सोसायटी पंजीकरण अधिनियम, 1860 या किसी अन्य संबंधित अधिनियम के तहत पंजीकृत होना चाहिए। इसके अलावा, संस्था को ग्रामीण विकास के क्षेत्र में कम से कम 3 साल का अनुभव होना चाहिए और उसका वित्तीय रिकॉर्ड अच्छा और पारदर्शी होना चाहिए। इन मानदंडों के आधार पर ही पात्र एनजीओ का चयन किया जाता था। मेरे काम के दौरान, मैंने कई ऐसे संगठनों को कपार्ट से जुड़ने और ग्रामीण विकास में योगदान देने में मदद की।

संस्था को ग्रामीण क्षेत्रों में आय-सृजन, लघु सिंचाई, ग्रामीण शिल्प, या अन्य विकास परियोजनाओं में काम करने का ट्रैक रिकॉर्ड दिखाना होता था। लेकिन इस संस्था से अनुदान लेने की लिए अंग्रेजी भाषा में प्रपोजल बनाना होता था। इस संस्था के अहमदाबाद केंद्र के अधीन मध्य प्रदेश आता था। प्रदेश में बहुत छोटे छोटे गैर-सरकारी संगठनों काम कर रहे थे लेकिन वह यह अनुदान नहीं ले पाते थे। इस उद्देश्य से हम लोगों ने जन अभियान परिषद की स्थापना की थी। लेकिन श्री दिग्विजय सिंह के मंत्री इस तरह की संस्था बनाने के पक्ष में नहीं थे। इसलिए यह संस्था कुछ काम नहीं कर सकी। मैं इस संस्था के मुख्य कार्यपालन अधिकारी का काम देख रहा था। मैंने मध्य प्रदेश के गैर-सरकारी संगठनों की एक डायरेक्टरी पहली बार प्रकाशित की थी। जब बाद में सुश्री उमा भारती मुख्य मंत्री बानी और मैं उप सचिव के रूप में उनके साथ काम कर रहा था तब इसे पुनः सक्रिय किया गया। आज यह बहुत बड़ा संगठन है। 

मध्य प्रदेश जन अभियान परिषद (MP Jan Abhiyan Parishad)

जन अभियान परिषद की स्थापना मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 1997 में की गई थी। इसका मुख्य उद्देश्य शासन और समाज के बीच एक सेतु (bridge) के रूप में कार्य करना है। इसका गठन इस सोच पर आधारित था कि सरकार की नीतियां और योजनाएं तब तक सफल नहीं हो सकतीं, जब तक उनमें आम जनता की सक्रिय भागीदारी न हो।

प्रमुख उद्देश्य और कार्य:

जनभागीदारी: सरकारी योजनाओं, जैसे जल संरक्षण, पर्यावरण, स्वास्थ्य और शिक्षा, में जनता को शामिल करना।

नवांकुर संस्थाएं: यह परिषद राज्य के छोटे और नए गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को पंजीकृत करती है और उन्हें प्रशिक्षण व मार्गदर्शन देकर सशक्त बनाती है।

प्रस्फुटन समितियां: परिषद गांव और वार्ड स्तर पर "प्रस्फुटन समितियों" का गठन करती है, जिनमें स्थानीय युवा और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं। ये समितियां अपनी स्थानीय समस्याओं की पहचान कर उनके समाधान के लिए काम करती हैं।

CMCLDP: यह मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम (CMCLDP) जैसे कार्यक्रम चलाती है, जिसके तहत युवाओं को सामाजिक नेतृत्व का प्रशिक्षण दिया जाता है।

नोडल एजेंसी: हाल के वर्षों में, इस राज्य में कार्यरत सभी स्वैच्छिक संगठनों के लिए एक नोडल एजेंसी के रूप में घोषित किया गया है, जिसके तहत सभी एनजीओ को यहां अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य है।

यह एक सरकारी संस्था है जो सामाजिक संगठनों को सरकार से जोड़ने और उनकी क्षमताओं को बढ़ाने का काम करती है।

भारत देश का दिल तो दिल्ली में बसता था, जहां संसद और सरकार के बड़े-बड़े फैसले होते थे, लेकिन इसकी असली आत्मा इसके गाँव-गाँव में रहती थी। भारत के गाँवों में रहने वाले लोग चाहते थे कि उनकी भी आवाज़ सुनी जाए, और उन्हें भी अपने गाँव के विकास की ज़िम्मेदारी मिले। पर गाँव के लोग हमेशा बड़े शहरों और दूर-दराज़ के सरकारी दफ्तरों पर निर्भर रहते थे। उनके पास अपनी छोटी-मोटी समस्याएँ सुलझाने की पूरी शक्ति नहीं थी। लोकतंत्र की जड़ें तो बहुत मजबूत थीं, लेकिन वे सिर्फ ऊपर तक ही फैली थीं; नीचे, गाँव की ज़मीन में, वे अभी पूरी तरह से नहीं पहुँची थीं।

फिर एक नौजवान और दूरदर्शी नेता आया जिसका नाम था राजीव गांधी। उसने भारत की इस समस्या को समझा। उसने सोचा कि अगर हमें अपने लोकतंत्र को सचमुच मजबूत बनाना है, तो हमें उसकी जड़ों को सींचना होगा। गांव के लोगों को अपना शासन चलाने का अधिकार देना होगा। 

यह कहानी 1980 के दशक की है, जो भारत के युवा प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की बागडोर संभाली थी। उनके दिल में एक सपना था - भारत को इक्कीसवीं सदी में ले जाने को, आधुनिक बनाने का और आम आदमी तक विकास का लाभ पहुंचाने का। लेकिन इस सपने के रास्ते में एक बड़ी दीवार थी: भ्रष्टाचार और सरकारी योजनाओं में लीकेज।

राजीव गांधी अक्सर देश के अलग-अलग हिस्सों का दौरा करते थे, खासकर उन दूर-दराज के गांवों का, जहां विकास की किरण बहुत मुश्किल से पहुँचती थी। ऐसे ही एक दौरे पर, वे ओडिशा के सूखा प्रभावित कालाहांडी जिले में गए। वहाँ उन्होंने लोगों से सीधी बातचीत की, उनकी परेशानियां सुनीं और यह जानने की कोशिश की कि सरकार द्वारा भेजी गई मदद उन तक क्यों नहीं पहुंच रही है।

कालाहांडी की मिट्टी सूखी थी, लोगों की आँखें खाली थीं और उनके चेहरे पर गरीबी की गहरी लकीरें थीं। जब राजीव गांधी ने उनसे पूछा कि सरकार की तरफ से मिली मदद का क्या हुआ, तो उन्हें जो जवाब मिले, वे चौंकाने वाले थे। लोग बताते थे कि कागज़ों पर तो बड़ी-बड़ी योजनाएँ चल रही हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका कोई असर नहीं दिखता।

यहीं पर उन्हें यह कड़वी सच्चाई पता चली कि केंद्र सरकार द्वारा जो पैसा गरीबों के लिए भेजा जाता है, वह रास्ते में ही गायब हो जाता है। अधिकारियों, बिचौलियों और एक जटिल प्रशासनिक तंत्र के बीच वह पैसा कहीं खो जाता था।

इस अनुभव से आहत होकर, राजीव गांधी ने एक सार्वजनिक सभा में एक ऐतिहासिक बयान दिया। उन्होंने कहा, "जब दिल्ली से एक रुपया चलता है, तो गांव तक सिर्फ 15 पैसा पहुंचता है।" यह बयान सिर्फ एक अनुमान नहीं था, बल्कि भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की गहरी खुशियां और भ्रष्टाचार पर एक सीधा और कड़ा प्रहार था।

इस बयान के बाद देश में एक बड़ी बहस छिड़ गई। लोगों ने पहली बार सरकार के शीर्ष पद पर बैठे किसी व्यक्ति को इतनी ईमानदारी से व्यवस्था की कमियों को स्वीकार करते हुए सुना था। यह एक तरह से स्वीकारोक्ति थी कि देश का प्रशासनिक ढांचा आम लोगों तक लाभ पहुंचाने में विफल हो रहा था।

राजीव गांधी का यह बयान उनके सुधारवादी विचारों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। उन्होंने इस लीकेज को रोकने के लिए कई कदम उठाने शुरू किए। उनका मानना था कि अगर गांवों को सशक्त किया जाए, तो वे अपनी समस्याओं का समाधान खुद कर सकते हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने का बीड़ा उठाया।

उन्होंने 1989 में 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया, जिसका उद्देश्य पंचायतों को संवैधानिक दर्जा देना था ताकि वे सीधे केंद्र से आने वाले पैसे को प्राप्त कर सकें और अपनी योजनाओं को खुद लागू कर सकें।  हालांकि इसका यह प्रयास (64वाँ संविधान संशोधन बिल) उस समय सफल नहीं हो सका। लेकिन उसने एक ऐसी लहर शुरू कर दी थी, जिसकी गूंज पूरे देश में सुनाई देने लगी थी। यह विधेयक इस समय पास नहीं हो पाया, लेकिन उसने पंचायती राज की नींव रखी, जिसे बाद में 73वें और 74वें संविधान संशोधन के रूप में लागू किया गया।

राजीव गांधी का यह बयान आज भी याद किया जाता है। यह सिर्फ भ्रष्टाचार पर एक टिप्पणी नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसे भारत के लिए उनका दर्द था, जहाँ आम आदमी के हक का पैसा उस तक पहुँचने से पहले ही खो जाता था। इस बयान ने न केवल उस समय की समस्याओं को उजागर किया, बल्कि भविष्य में भ्रष्टाचार को कम करने और विकास को निचले स्तर तक पहुंचाने के लिए किए गए प्रयासों की प्रेरणा भी बना।

कुछ साल बाद, एक और नेता पी.वी. नरसिंह राव ने उसी सपने को पूरा करने का बीड़ा उठाया। उसने राजीव गांधी के अधूरे काम को पूरा करने की ठान ली। एक दिन, उसने भारत के संविधान में दो महत्वपूर्ण बदलाव किए 73वाँ और 74वाँ संविधान संशोधन। ये बदलाव सिर्फ कानून नहीं थे, बल्कि लोकतंत्र को गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए दो वरदान थे।

73वाँ संशोधन गाँव के लिए था, जिसे पंचायती राज व्यवस्था कहा गया। इस वरदान ने गाँव के लोगों को कुछ अद्भुत शक्तियां दी:

संवैधानिक दर्जा: सबसे पहले, पंचायती राज को संविधान में एक खास जगह मिल गई। अब कोई भी राज्य सरकार मनमर्जी से पंचायतों को खत्म नहीं कर सकती थी।

नियमित चुनाव: हर पाँच साल में गाँव के लोग अपने पंचों और सरपंचों को खुद चुन सकते थे। इससे गाँव की सत्ता कुछ गिने-चुने लोगों के हाथ में नहीं रहती थी।

महिलाओं का सम्मान: यह सबसे बड़ा वरदान था। इस संशोधन ने पंचायतों में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित कर दीं। इसका मतलब था कि अब गाँव की औरतें भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में बराबरी से भाग ले सकती थीं।

कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण: अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भी सीटें आरक्षित की गईं, ताकि समाज के हर वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल सके।

पैसों की ताकत: सरकार ने राज्य वित्त आयोग बनाया। इस आयोग का काम था गाँव के विकास के लिए पैसे का सही हिसाब लगाना, ताकि गाँव को शहरों पर निर्भर न रहना पड़े।

स्वतंत्र चुनाव आयोग: चुनाव में कोई धांधली न हो, इसलिए राज्य चुनाव आयोग बनाया गया, जो निष्पक्ष रूप से चुनाव करवाता था।

इस संशोधन के बाद, भारत की लोकतंत्र की जड़ें गाँव की मिट्टी में और गहरी हो गईं। गाँव के लोग अब अपने छोटे-मोटे झगड़े सुलझाने, अपनी गली-मोहल्ले की सड़कें बनवाने और अपने बच्चों की शिक्षा के लिए खुद फैसले ले सकते थे।

इस तरह, राजीव गांधी का शुरू किया गया सपना, नरसिंह राव के प्रयासों से पूरा हुआ। भारत अब सिर्फ बड़े-बड़े शहरों का देश नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गाँवों का भी एक मजबूत और आत्मनिर्भर लोकतंत्र बन गया था।

एक बार की बात है, जब पूरे भारत में 73वें संविधान संशोधन की गूंज सुनाई दे रही थी, तब भारत के बीचो-बीच बसा एक राज्य था मध्य प्रदेश। या राज्य अपनी घनी हरियाली, शांत नदियों और मेहनती लोगों के लिए जाना जाता था। यहाँ के लोगों ने सुना कि अब लोकतंत्र की शक्ति सिर्फ दिल्ली और भोपाल तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उनके गाँवों और चौपालों तक भी पहुंच जाएगी। इस खबर से उन्हें एक नई उम्मीद जगी।

पंचायती राज अधिनियम और एक यादगार यात्रा

जैसे ही भारतीय संविधान का 73वाँ संशोधन पारित हुआ, जिसने पंचायतों को संवैधानिक दर्जा दिया, मध्य प्रदेश ने इस दिशा में सबसे पहले पहल की। तत्कालीन सरकार ने तुरंत एक समिति का गठन किया, जिसकी अध्यक्षता पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री श्री हरवंश सिंह कर रहे थे। इस समिति में प्रमुख सचिव श्री अरुण गुप्ता और मुझे सदस्य के रूप में शामिल किया गया था, जबकि उप सचिव श्री सतीश मिश्रा के संयोजक सदस्य थे। हमारा लक्ष्य था कि अन्य राज्यों के अनुभवों का अध्ययन करके एक ऐसा पंचायती राज अधिनियम तैयार किया जाए जो मध्य प्रदेश के लिए सबसे उपयुक्त हो।

इसी सिलसिले में हमारी समिति ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों का दौरा करने का निर्णय लिया। हमारी यात्रा का पहला पड़ाव महाराष्ट्र था। मुंबई में हमें शासकीय गेस्ट हाउस 'सह्याद्री' में ठहराया गया। हालांकि, हमारे मंत्री जी ने ताज होटल में रुकने का फैसला किया।

हमारी यात्रा का अंतिम दिन था। हमें मुंबई से सुबह की फ्लाइट से बेंगलुरु के लिए रवाना होना था। सुबह-सुबह मंत्री जी ने मुझे बुलाया और कहा, "आप मेरा सामान होटल से एयरपोर्ट ले जाकर चेक-इन करवा दीजिए।" मैं उनके दो सूटकेस लेकर अपने प्रमुख सचिव के साथ एयरपोर्ट की ओर चल पड़ा।

जब मंत्री जी का सामान स्कैनिंग मशीन से गुजरा, तो हम सब चौंक गए। कपड़ों के नीचे भारी मात्रा में नकदी दिखाई दी। एयरपोर्ट पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने तत्काल एयरपोर्ट के इंचार्ज को बुला लिया।

मैंने उन्हें बताया कि यह सामान हमारे मंत्री जी का है और वे कुछ ही देर में पहुँच रहे हैं। मैंने यह भी कहा कि इस नकदी के बारे में केवल वही बता सकते हैं। मेरे प्रमुख सचिव ने मुझे एक तरफ बुलाया और बहुत ही संयमित स्वर में कहा, "आप उनका नाम मत लेना। इस मामले को आप ही संभालिए।" यह कहकर वे हमसे थोड़ी दूरी पर खड़े हो गए।

कुछ देर बाद, मंत्री जी भी वहाँ पहुँच गए। नकदी का मामला देखकर वे बहुत डर गए थे, क्योंकि उस समय महाराष्ट्र में विरोधी दल की सरकार थी और वे किसी भी तरह के विवाद से बचना चाहते थे। उन्होंने एयरपोर्ट इंचार्ज को बताया कि यह पैसा पार्टी फंड का है, जिसे उन्हें दिल्ली भेजना था।

एयरपोर्ट इंचार्ज एक समझदार व्यक्ति थे। उन्होंने मंत्री जी को सलाह दी कि इतनी बड़ी नकदी को हवाई जहाज से ले जाना सुरक्षित नहीं है। उन्होंने सुझाव दिया कि इसे ट्रेन से भेजा जाए। इस सलाह के बाद, मंत्री जी ने अपने सूटकेस से पैसे निकाले और उन्हें अपने सुरक्षा गार्ड के हाथों दिल्ली भेजने की व्यवस्था की। इस घटना के बाद, हम सब बेंगलुरु के लिए रवाना हो गए।

इस यात्रा के बाद, हमारी समिति ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल के पंचायती राज अधिनियमों और उनकी क्रियान्वयन व्यवस्थाओं का गहन अध्ययन किया। इन अनुभवों और संविधान के 73वें संशोधन के मूलभूत सिद्धांतों के आधार पर, हमने "मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1993" का एक मसौदा तैयार किया, जिसे बाद में सरकार को प्रस्तुत किया गया। यह अधिनियम आज भी मध्य प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था की नींव बना हुआ है।

उसने देरी नहीं की, बल्कि एक साहसी और प्रगतिशील राज्य की तरह "मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1993" पारित कर दिया। यह क़ानून सिर्फ कागज़ का टुकड़ा नहीं था, बल्कि गाँव की हर गली और खेत तक लोकतंत्र की किरण पहुँचाने का संकल्प था।

इस क़ानून ने राज्य में एक नई और मजबूत "त्रिशूल-व्यवस्था" स्थापित की।  इस त्रिशूल के तीन फल थे, जो गांव के लोगों को ताकत देने वाले थे:

ग्राम पंचायत: यह सबसे निचली और सबसे महत्वपूर्ण इकाई थी। यह गाँव की आत्मा थी, जहाँ गाँव के लोग एक साथ मिलकर अपने पंचों और सरपंच को चुनते थे। यही वो जगह थी जहां सबसे छोटे फैसले भी लोगों की मर्जी से होते थे।

जनपद पंचायत: गाँव से थोड़ा ऊपर, यह ब्लॉक या तहसील स्तर पर बनाई गई थी। इसका काम कई गाँवों की ग्राम पंचायतों के बीच समन्वय स्थापित करना और उनके विकास की बड़ी योजनाओं को देखना था।

ज़िला पंचायत: सबसे ऊपर ज़िला पंचायत थी, जो पूरे ज़िले के विकास की देखरेख करती थी। यह जनपद पंचायतों को दिशा देती थी और सुनिश्चित करती थी कि ज़िले का विकास एक योजनाबद्ध तरीके से हो।

इस नए क़ानून का एक और अद्भुत पहलू था आरक्षण। मध्य प्रदेश ने महिलाओं को सिर्फ एक-तिहाई नहीं, बल्कि 33% सीटों पर आरक्षण देकर पूरे देश को चौंका दिया। इसने गाँव की उन माताओं और बहनों को मौका दिया, जो हमेशा घर की दहलीज के भीतर रहती थीं। अब वे सरपंच और पंचायत सदस्य बनकर गाँव के लिए फैसले ले रही थीं। इसके साथ ही, अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए भी उनकी जनसंख्या के अनुसार सीटें आरक्षित की गईं, ताकि समाज का कोई भी वर्ग पीछे न छूटे।

फिर वो ऐतिहासिक दिन आया जब मध्य प्रदेश में पहली बार पंचायती राज के चुनाव हुए। यह सिर्फ वोट डालने का दिन नहीं था, बल्कि एक उत्सव था। गाँव की औरतें, किसान और मज़दूर अपनी मर्जी के उम्मीदवार चुन रहे थे। यह लोकतंत्र का सबसे अच्छा और सुंदर रूप था।

इस तरह, मध्य प्रदेश ने पूरे भारत के लिए एक मिसाल कायम की। इसने साबित कर दिया कि अगर सरकार में दूरदर्शिता और जनता में इच्छाशक्ति हो, तो लोकतंत्र को सचमुच ज़मीनी स्तर तक पहुँचाया जा सकता है। मध्य प्रदेश के पंचायती राज को सिर्फ लागू ही नहीं किया, बल्कि उसे अपने दिल और आत्मा में बसा लिया।

जब 73वें संविधान संशोधन की बात भारत की संसद में हो रही थी, तब मध्य प्रदेश की सत्ता की बागडोर एक युवा और ऊर्जावान नेता के हाथ में थी, जिसका नाम था श्री दिग्विजय सिंह। उन्होंने राजीव गांधी के सपने को बहुत करीब से देखा था और उन्हें यह यकीन था कि असली भारत गाँवों में बसता है। उन्होंने ठान लिया था कि वे मध्य प्रदेश को देश का पहला ऐसा राज्य बनाएंगे जहाँ पंचायती राज सिर्फ़ एक क़ानून नहीं, बल्कि एक हकीकत होगा।   

दूसरे राज्यों के सोचने और योजना बनाने से पहले ही, दिग्विजय सिंह ने अपने अधिकारियों और मंत्रियों के साथ मिलकर काम शुरू कर दिया। उनके नेतृत्व में मध्य प्रदेश ने "पंचायती राज अधिनियम, 1993" को तुरंत पारित किया, और वह ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बना। यह कोई साधारण क़ानून नहीं था; यह महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को साकार करने का एक मजबूत कदम था।

इस क़ानून को लागू करने में दिग्विजय सिंह का सबसे बड़ा योगदान यह था कि उन्होंने पंचायतों को केवल दिखावे के लिए अधिकार नहीं दिए, बल्कि उन्हें वास्तविक शक्तियाँ सौंपीं।   

शक्ति का विकेंद्रीकरण: उन्होंने सत्ता को ऊपर से नीचे की ओर बहाया। जहाँ पहले विकास की योजनाएँ भोपाल में बनती थीं, अब वे गाँवों में बनीं। उन्होंने 52,000 से अधिक ग्राम सभाओं की स्थापना की और उन्हें विकास परियोजनाओं को चुनने और लागू करने का अधिकार दिया। इसका सीधा मतलब था कि गाँव के लोग अब अपने ही गाँव के स्कूल, सड़क और पानी के लिए खुद फैसले ले सकते थे।   

महिलाओं को सशक्त बनाना: दिग्विजय सिंह ने महिलाओं को आरक्षण देने के मामले में भी एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। उन्होंने महिलाओं के लिए सीटों को 33% से बढ़ाकर 50% कर दिया। इस कदम ने रातों-रात लाखों महिलाओं को राजनीतिक नेतृत्व की भूमिका में ला खड़ा किया। गाँव की महिला, जो पहले कभी घर से बाहर नहीं निकलती थीं, अब सरपंच बनकर सरकारी योजनाओं को लागू कर रही थीं और गाँव के विकास में अपनी राय दे रही थीं।

जिला सरकार (District Government): यह एक और अनूठी पहल थी। उन्होंने हर जिले में 'जिला सरकार' का गठन किया। इस व्यवस्था के तहत, जिला कलेक्टर जैसे अधिकारी सीधे जनप्रतिनिधियों के प्रति जवाबदेह होते थे। इससे प्रशासन और जनता के बीच की दूरी कम हुई और फैसले लेना आसान हो गया।   

दिग्विजय सिंह के इन साहसी कदमों से मध्य प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था एक मॉडल के रूप में उभरी। गाँव के लोग अब सिर्फ़ वोट देने वाले नागरिक नहीं रहे, बल्कि अपने गाँव के भाग्य-निर्माता बन गए थे। इस तरह, दिग्विजय सिंह ने मध्य प्रदेश को पूरे देश में एक ऐसा राज्य बना दिया, जिसने लोकतंत्र को उसकी सही जगह पर पहुँचाया, यानी, गाँव की चौपालों और गलियों में।

मध्य प्रदेश में पंचायती राज: एक नए युग की शुरुआत

73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के बाद, संविधान में 11वीं अनुसूची जोड़ी गई, जिसमें 29 विषयों की सूची है। राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे इन विषयों से जुड़े विभागों और उनके कार्यों को पंचायतों को सौंपे। इन विषयों का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना था।

यहाँ उन 29 विषयों की सूची और उनसे जुड़ी कुछ प्रमुख शक्तियां दी गई है: कृषि (कृषि विस्तार सहित), भूमि सुधार, लघु सिंचाई, जल प्रबंधन और वाटरशेड विकास, पशुपालन, डेयरी और कुक्कुट पालन, मत्स्य उद्योग, सामाजिक वानिकी और फार्म वानिकी, लघु वनोपज, खादी, ग्राम एवं कुटीर उद्योग, लघु उद्योग (खाद्य प्रसंस्करण सहित), ग्रामीण आवास, पेयजल, ईंधन और चारा, सड़कें, पुल, पुलिया, जलमार्ग और अन्य संचार साधन, ग्रामीण विद्युतीकरण, गैर-पारंपरिक ऊर्जा स्रोत, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा (प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा सहित), तकनीकी प्रशिक्षण और व्यावसायिक शिक्षा, प्रौढ़ एवं अनौपचारिक शिक्षा, पुस्तकालय, सांस्कृतिक गतिविधियां, बाजार और मेले, स्वास्थ्य और स्वच्छता (अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और औषधालय सहित), परिवार कल्याण, महिला और बाल विकास, समाज कल्याण (विकलांग और मानसिक रूप से मंद व्यक्तियों का कल्याण सहित), कमजोर वर्गों का कल्याण (विशेषकर अनुसूचित जाति और जनजाति), सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सामुदायिक आस्तियों का रखरखाव।

शक्तियों के हस्तांतरण का सिद्धांत

मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1993 के तहत अधिकारों को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए "सहायता का सिद्धांत" (Subsidiarity) लागू किया गया। यह सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित था कि निर्णय लेने का अधिकार और जिम्मेदारी सबसे निचले स्तर पर होनी चाहिए जो उस कार्य को प्रभावी ढंग से कर सकता है। यह सिद्धांत शक्तियों के विकेंद्रीकरण को निम्न प्रकार से परिभाषित करता है:

जो काम ग्राम सभा कर सकती है, उस काम में ग्राम पंचायत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जो काम ग्राम पंचायत कर सकती है, उस काम में जनपद पंचायत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जो काम जनपद पंचायत कर सकती है, उस काम में जिला पंचायत या राज्य सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। यह सिद्धांत यह सुनिश्चित करता है कि स्थानीय समस्याओं का समाधान स्थानीय स्तर पर ही हो, जिससे निर्णय प्रक्रिया में तेजी आती है और जनता की भागीदारी बढ़ती है। यह पंचायती राज व्यवस्था की आत्मा है, जो ग्राम स्वराज की अवधारणा को मजबूत करती है।

मध्य प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं को संविधान की 11वीं अनुसूची में उल्लिखित 29 विषयों में से 27 विषयों से संबंधित कार्य और शक्तियां हस्तांतरित की गई है। यह हस्तांतरण 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के प्रावधानों के तहत किया गया है। मुख्य रूप से, दो विषय - लघु वनोपज और तकनीकी प्रशिक्षण तथा व्यावसायिक शिक्षा - अभी तक पूरी तरह से हस्तांतरित नहीं किए गए हैं। इन 27 विषयों में कृषि, भूमि सुधार, लघु सिंचाई, पशुपालन, मत्स्य पालन, सामाजिक वानिकी, पेयजल, सड़कें, ग्रामीण विद्युतीकरण, गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार कल्याण, महिला एवं बाल विकास, सामाजिक कल्याण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्र शामिल हैं। इन विषयों पर पंचायती राज संस्थाओं को आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय के लिए योजनाएं बनाने और उन्हें लागू करने का अधिकार दिया गया है।

ग्राम स्तर पर समितियों का गठन

मध्यप्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 के तहत ग्राम सभा को सशक्त बनाने और कार्यों को प्रभावी ढंग से संचालित करने के लिए शुरू में सात विभिन्न समितियों के गठन का प्रावधान था जिसे संशोधित कर दो कर दिया गया है। इन समितियों को ग्राम पंचायत के अभिकरण (एजेंसी) के रूप में कार्य करने की शक्तियां दी गई है, जो ग्राम सभा के पर्यवेक्षण और निर्देशों के अधीन काम करती हैं।

प्रमुख समितियां और उनकी शक्तियाँ:

ग्राम निर्माण समिति (Gram Nirman Samiti): यह समिति ग्राम पंचायत के लिए एक निर्माण अभिकरण के रूप में कार्य करती है। इसकी मुख्य शक्तियां और कार्य इस प्रकार हैं: यह ₹5 लाख तक के सभी निर्माण कार्यों का निष्पादन करती है, और ग्राम पंचायत और ग्राम सभा के पर्यवेक्षण में काम करती है। समिति को किए गए निर्माण कार्यों की नियमित प्रगति रिपोर्ट और मासिक खर्च का विवरण ग्राम सभा के समक्ष प्रस्तुत करना होता है।

ग्राम विकास समिति (Gram Vikas Samiti): यह समिति ग्राम के समग्र विकास से जुड़े कार्यों के लिए जिम्मेदार होती है। उनकी शक्तियां और कार्य क्षेत्र निम्नलिखित हैं: यह कृषि, लोक स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण अधोसंरचना (जैसे पेयजल और स्वच्छता) और साक्षरता जैसे विषयों पर काम करती है। यह ग्राम पंचायत द्वारा किए गए कार्यों की समीक्षा करती है और नीतिगत मामलों पर अपनी सिफारिशें ग्राम सभा को भेजती है।

इन समितियों के गठन का मुख्य उद्देश्य ग्राम स्वराज (ग्रामीण स्वशासन) की भावना को मजबूत करना है। इसके माध्यम से स्थानीय लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित होती है। यह व्यवस्था ग्राम सभा को न केवल एक निगरानी निकाय बनाती है, बल्कि उसे विकास कार्यों में सक्रिय रूप से शामिल होने का अधिकार भी देती है, जिससे पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहती है।

शक्ति हस्तांतरण का विशेष अभियान

इन विषयों का हस्तांतरण राज्यों की इच्छा पर निर्भर करता था। इसलिए मध्य प्रदेश राज्य में पंचायतों को दी गई शक्तियां देश में अन्य राज्यों की तुलना में सर्वाधिक थीं, जिनके कारण पंचायतों को सशक्त बनाने का संवैधानिक ढांचा प्रदान करने में मदद मिली। मुख्यमंत्री जी की संकल्प शक्ति के कारण यह चमत्कार हो पाया था। यह बहुत विशाल अभियान था। हमारी समिति ने विभागवार योजनाओं, प्रशासनिक तथा वित्तीय अधिकारों की सूची बनाइए। प्रत्येक विभाग के अधिकारियों तथा मंत्री के साथ अलग-अलग बैठक कर उनकी सहमति ली। 

कैबिनेट के लिए प्रस्ताव तैयार किए। कैबिनेट में बहस के बाद पुनः संशोधन प्रस्ताव बने। कैबिनेट से प्रस्ताव पास करवाए। विधान सभा से संशोधन पास हुए। यह अभियान कई दिन और रातों तक लगातार चला। इसमें जिन लोगों से अधिकार छीने जा रहे थे, उन्हें पास करवाने की चुनौती थी। उस समय हमारे मुख्य सचिव थे श्री शरदचंद्र बेहार। लोगों को सहमत करने की उनकी क्षमता के कारण मंत्री ने उन्हें हेड मास्टर साहब कहकर पुकारते थे। यह एक नए प्रशासनिक इतिहास बनाने में भागीदार होने का समय था।

जिला विकास योजना: सहभागी नियोजन का मॉडल

ग्राम, जनपद और जिला पंचायत स्तर पर सहभागी योजना प्रक्रिया, खासकर जीआईएस (Geographic Information System) सॉफ्टवेयर और मैप्स का उपयोग करके, ग्रामीण विकास के लिए एक बहुत ही प्रभावी तरीका है। यह प्रक्रिया 'सबकी योजना, सबका विकास' जैसे अभियानों का हिस्सा है, जिसमें लोगों की भागीदारी को सुनिश्चित किया जाता है। मैंने इस प्रक्रिया को हर स्तर पर विस्तार से लागू करने के लिए दिशा निर्देश तैयार किए। यह जल, जंगल, जमीन, जानवर और जन को सम्मिलित कर जिले का एकीकृत प्लानिंग करने की रणनीति थी। जिला कलेक्टर और जिला पंचायत मुख्य कार्यपालन अधिकारियों का प्रशिक्षण आयोजित किए गए।

ग्राम पंचायत स्तर पर सहभागी नियोजन (Participatory Planning at Gram Panchayat Level): ग्राम पंचायत विकास योजना (GPDP) में, सहभागी नियोजन का मुख्य उद्देश्य ग्राम सभा के माध्यम से ग्रामीणों की जरूरतों और प्राथमिकताओं को पहचानना है। "ग्राम मानचित्र" (Gram Manchitra) जैसे सरकारी ऐप्स का उपयोग करके, ग्राम पंचायत के कर्मचारी और स्वयंसेवक गाँव की सभी मौजूदा संपत्तियों को जियो-टैग करते हैं। 

यह सारा डेटा जीआईएस-आधारित प्लेटफॉर्म पर अपलोड हो जाता है, जिससे गांव का एक डिजिटल नक्शा तैयार होता है। इस नक्शे को ग्राम सभा की बैठक में प्रोजेक्टर या बड़े बोर्ड पर दिखाया जाता है। ग्रामीण इस नक्शे को देखकर आसानी से समझ पाते हैं कि उनके गांव में क्या-क्या संसाधन है और किन क्षेत्रों में विकास की ज्यादा जरूरत है।

जनपद पंचायत स्तर पर सहभागी नियोजन (Participatory Planning at Janpad Panchayat Level): जनपद पंचायत अपने अधिकार क्षेत्र की सभी ग्राम पंचायतों से प्राप्त जीडीपी (GPDP) का विश्लेषण करती है। जीआईएस मैप्स की मदद से, वे यह देख सकते हैं कि किस ग्राम पंचायत में किन चीजों की जरूरत है और कौन से संसाधन उपलब्ध हैं। यह जीआईएस डेटा के आधार पर योजनाओं को प्राथमिकता देने में मदद करता है।

जिला पंचायत स्तर पर सहभागी नियोजन (Participatory Planning at Zila Panchayat Level): जिला पंचायत, जिले के विकास के लिए सर्वोच्च निकाय है, जो सभी जनपद पंचायतों की योजनाओं को एकीकृत करती है। जीआईएस सॉफ्टवेयर का उपयोग करके जिला पंचायत पूरे जिले का एक एकीकृत नक्शा बनाती है। इस एकीकृत जीआईएस मैप पर, जिला पंचायत के अधिकारी बड़े पैमाने के प्रोजेक्ट्स की योजना बना सकते हैं। यह तकनीक अधिकारियों को डेटा-आधारित और तर्कसंगत निर्णय लेने में मदद करती है।

संक्षेप में, यह पूरी प्रक्रिया एक नीचे-से-ऊपर (bottom-up) दृष्टिकोण पर आधारित है, जहाँ ग्राम पंचायत से शुरू होकर जिला पंचायत की योजनाएं बनती है। जीआईएस तकनीक इस प्रक्रिया को डेटा-संचालित, पारदर्शी और लोगों की भागीदारी से भरपूर बनाती है।



सामाजिक अंकेक्षण: पारदर्शिता की गारंटी

शासकीय योजनाओं में पारदर्शिता लाने के लिए सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) की प्रक्रिया का विकास कर दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। सामाजिक अंकेक्षण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके तहत सरकारी योजनाओं के खर्च और उसके परिणामों का मूल्यांकन सीधे जनता द्वारा किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और जन भागीदारी को सुनिश्चित करना है। मध्यप्रदेश में इसे अनिवार्य बनाया गया है।

मध्य प्रदेश में सामाजिक अंकेक्षण की चरण-दर-चरण प्रक्रिया:

अंकेक्षण का कैलेंडर जारी करना: प्रक्रिया एक वार्षिक कैलेण्डर के साथ शुरू होती है, जिसे राज्य स्तरीय इकाई द्वारा तैयार किया जाता है।

ग्राम संसाधन व्यक्तियों (Gram Resource Persons) का चयन: निष्पक्षता बनाए रखने के लिए, गाँव के बाहर के व्यक्तियों का एक दल चुना जाता है। इनका मुख्य काम दस्तावेजों की जांच और ग्रामीणों से बातचीत करना होता है।

तैयारी का चरण: इस चरण में दस्तावेजों का संग्रह और जमीनी सत्यापन किया जाता है। जीआरपी का दल गाँव में जाकर कार्यों का भौतिक सत्यापन करता है।

ग्राम सभा में सार्वजनिक सुनवाई: तैयारी के बाद, एक विशेष ग्राम सभा का आयोजन किया जाता है, जिसमें अंकेक्षण के निष्कर्षों को सभी के सामने प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ अनियमितताओं पर चर्चा होती है और संबंधित अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है।

अंकेक्षण रिपोर्ट का अनुमोदन और कार्यवाही: ग्राम सभा की सुनवाई के बाद, एक अंतिम रिपोर्ट तैयार की जाती है, जिसे अनुमोदन के लिए जिला स्तर पर भेजा जाता है। अनियमितताओं के आधार पर दोषियों के खिलाफ कार्यवाही की जाती है।

यह पूरी प्रक्रिया यह सुनिश्चित करती है कि सरकारी फंड का उपयोग सही ढंग से हो रहा है और गाँव के लोगों को उनके अधिकारों की पूरी जानकारी मिल रही है।

स्वयं सहायता समूह की महिलाएं- एक जैसी ड्रेस 

यह कहानी है मध्य प्रदेश की, जहां एक साधारण से विचार ने हजारों ग्रामीण महिलाओं के जीवन में एक असाधारण बदलाव ला दिया। यह बदलाव था आत्मसम्मान, पहचान और एकता का, जो एक समान ड्रेस कोड के रूप में सामने आया।

पहले, स्वयं सहायता समूह (SHG) की महिलाएँ जब किसी सरकारी दफ्तर या बैंक में जाती थीं, तो उन्हें अक्सर अलग-थलग और अनजान समझा जाता था। उनकी आवाज़ उतनी प्रभावी नहीं थी, और उन्हें अपनी बात मनवाने में संघर्ष करना पड़ता था। उनकी पहचान सिर्फ उनके गाँव या परिवार तक सीमित थी।


लेकिन फिर एक क्रांतिकारी फैसला लिया गया: पूरे प्रदेश में स्वयं सहायता समूह की महिलाओं के लिए एक समान ड्रेस कोड लागू किया जाए। यह सिर्फ एक पोशाक नहीं थी, बल्कि एक आंदोलन था, जिसने उन्हें एक नई पहचान दी।

हर विकासखंड (development block) को एक अलग रंग दिया गया। किसी खंड की महिलाओं ने हरी साड़ी चुनी, तो किसी ने नीली या गुलाबी। अब जब ये महिलाएं समूह में बाहर निकलती थीं, तो उन्हें दूर से ही पहचाना जा सकता था। वे एक झुंड की तरह नहीं, बल्कि एक संगठित, अनुशासित और शक्तिशाली इकाई के रूप में दिखती थीं।

इस पहल ने कई जादुई बदलाव लाए:

समानता की भावना: अब कोई महिला अपनी पुरानी या साधारण पोशाक पर शर्मिंदा नहीं होती थी। चाहे वह गरीब हो या थोड़ी बेहतर स्थिति में, ड्रेस कोड ने सभी को एक ही पायदान पर ला खड़ा किया। यह समानता की भावना ने उनके बीच के बंधन को और भी मजबूत किया।

व्यवसायीकरण: जब ये महिलाएं एक जैसी ड्रेस में बैंक या सरकारी कार्यालय जाती थीं, तो उन्हें अधिक पेशेवर और गंभीर माना जाता था। उनके काम को अधिक गंभीरता से लिया गया, और अधिकारी भी उनके सम्मान के साथ पेश आते थे। यह ड्रेस कोड उनके सामूहिक ब्रांड का हिस्सा बन गया।

बढ़ा हुआ आत्मविश्वास: एक समान पोशाक पहनकर जब वे एक साथ चलती थीं, तो उनके आत्मविश्वास में एक नया संचार होता था। वे जानती थीं कि वे अकेली नहीं हैं, बल्कि हजारों महिलाओं के एक मजबूत नेटवर्क का हिस्सा हैं।

इस तरह, SHG ड्रेस कोड सिर्फ एक ड्रेस नहीं, बल्कि सशक्तिकरण, सम्मान और एकता का प्रतीक बन गया। इससे न सिर्फ ग्रामीण महिलाओं को एक पहचान दी, बल्कि उन्हें यह एहसास भी कराया कि वे मिलकर कुछ भी हासिल कर सकती हैं। यह एक ऐसी पहल थी, जो आज भी जारी है, और लाखों महिलाओं को प्रेरित कर रही है कि वे अपनी पहचान को सिर्फ अपने नाम से नहीं, बल्कि अपने समूह की शक्ति से भी बनाएं।

रोजगार मेले 

यह कहानी है मध्य प्रदेश की, उस धरती की जो अपने मेहनती और जुझारू नौजवानों के लिए जानी जाती है। एक ऐसी कहानी, जहां सिर्फ डिग्री और डिप्लोमा ही नहीं, बल्कि गांव की गलियों में पली-बढ़ी मेहनत और लगन को भी सम्मान मिलता है।

गाँव में रहने वाले पढ़े-लिखे युवाओं के लिए तो कैंपस प्लेसमेंट की व्यवस्था है। उनकी प्रतिभा को परखने के लिए कंपनियों की एक फौज कॉलेजों में आती है और उन्हें चुनकर ले जाती है। लेकिन, गांव के उन जवानों का क्या, जिनकी आँखों में सपने तो हैं, पर उनके पास बड़े कॉलेजों की डिग्री नहीं? वो हुनरमंद हाथ, जो खेती में अपना पसीना बहाते हैं, पर किसी कंपनी में काम करने का मौक़ा चाहते हैं?

पहले, उनके लिए राह बेहद मुश्किल थी। उन्हें नौकरी की तलाश में शहरों की गलियों में भटकना पड़ता था, जहाँ अक्सर उनकी मेहनत का सही मोल नहीं मिलता था। लेकिन फिर एक क्रांतिकारी योजना ने जन्म लिया। यह योजना, जिसने मध्य प्रदेश के रोजगार परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया।

अब, गाँव के हर उस नौजवान की एक लिस्ट बनाई जाती है, जो काम की तलाश में है। यह लिस्ट सिर्फ एक कागज का टुकड़ा नहीं, बल्कि लाखों सपनों का दस्तावेज है। इस लिस्ट को उन कंपनियों के साथ साझा किया जाता है, जिन्हें मेहनती और ईमानदार कामगारों की तलाश है। और फिर एक दिन, किसी छुट्टी के दिन, जब गाँव का हर शख्स अपने घर पर होता है, किसी सरकारी कॉलेज में एक भव्य रोजगार मेले का आयोजन होता है।

यह कोई साधारण मेला नहीं होता। यहाँ रंग-बिरंगी दुकानें नहीं, बल्कि कंपनियों के स्टॉल लगते हैं। यहाँ कोई खिलौने नहीं बेचता, बल्कि भविष्य के सुनहरे अवसर बांटे जाते हैं। गांव के नौजवान अपने मामूली कपड़ों में, अपनी आँखों में चमक लिए यहाँ आते हैं और सीधे वॉक-इन-इंटरव्यू में हिस्सा लेते हैं।

यहाँ कोई सिफारिश नहीं चलती, कोई पहचान नहीं मांगी जाती। सिर्फ हुनर और आत्मविश्वास की परख होती है। जो चुने जाते हैं, उन्हें सिर्फ एक नौकरी नहीं मिलती, बल्कि एक नया जीवन मिलता है। कंपनियां उन्हें अपने यहां ले जाकर ट्रेनिंग देती हैं, ताकि वे अपनी पूरी क्षमता से काम कर सकें।

यह कहानी सिर्फ एक सरकारी योजना की नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के मेहनती युवाओं की जीत की कहानी है। यह बताती है कि कैसे सही दिशा और समर्थन मिले, तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। अब, मध्य प्रदेश सिर्फ लेबर सरप्लस राज्य नहीं, बल्कि हुनरमंद और प्रशिक्षित नौजवानों का केंद्र बन गया है, जो न केवल अपने लिए बल्कि पूरे प्रदेश के विकास के लिए तैयार हैं।

बिरिक्स BRICS योजना: वसूली की एक नई पहल

यह उन दिनों की बात है जब मैं मध्य प्रदेश में कार्यरत था और हमें 'IRDP' (Integrated Rural Development Programme) योजना के तहत बनाए गए स्व-सहायता समूहों (Self Help Groups) की एक बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा था। इन समूहों को अपनी आर्थिक गतिविधियां शुरू करने के लिए विशेष शिविर लगाकर बैंकों से ऋण तो आसानी से मिल जाते थे, लेकिन इन ऋणों की वसूली एक बड़ी चुनौती थी।

बैंक अक्सर राज्य स्तरीय समन्वय समिति की बैठकों में इस बात की शिकायत करते थे कि ऋण वापस नहीं आ रहे हैं। बैंक ऋण वसूली के लिए RRC (Revenue Recovery Certificate) जारी करके तहसीलदार को भेज देते थे, लेकिन फिर भी वसूली का काम आगे नहीं बढ़ता था। अधिकारी भी इस काम में खास दिलचस्पी नहीं लेते थे, क्योंकि यह एक थकाने वाला और मुश्किल काम था, जिसमें कोई अतिरिक्त प्रोत्साहन नहीं था।

इस समस्या को हल करने के लिए मैंने एक नई और अनूठी योजना तैयार की, जिसे मैंने मजाकिया तौर पर "BRICS" (Bank Recovery Incentive Scheme) नाम दिया। इस योजना के तहत, हमने यह प्रावधान रखा कि जो भी बैंक ऋण की वसूली होगी, उसकी एक निश्चित राशि तहसीलदार और कलेक्टर को उनके कार्यालयीन खर्चों के लिए दी जाएगी।

इस योजना की सबसे खास बात यह थी कि तहसीलदार, जो सीधे वसूली के काम से जुड़े थे, उन्हें वसूली की कुल राशि का एक छोटा हिस्सा निजी प्रोत्साहन (Personal Incentive) के रूप में दिया जाता था।

यह एक क्रांतिकारी कदम था। जैसे ही यह योजना लागू हुई, वसूली का काम बहुत तेजी से होने लगा। तहसीलदार और उनके कर्मचारी अब इस काम को प्राथमिकता देने लगे। यह प्रोत्साहन राशि उन्हें कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करती थी।

इस नई योजना के कारण मध्य प्रदेश पूरे देश में ऐसा पहला राज्य बन गया, जिसने बैंक ऋण वसूली को प्रभावी बनाने के लिए अधिकारियों को वित्तीय प्रोत्साहन देने की पहल की थी। यह BRICS योजना न केवल बैंकों के लिए फायदेमंद साबित हुई, बल्कि इसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान की, क्योंकि अब नए समूहों को आसानी से ऋण मिल पा रहा था।

विकास आयुक्त कार्यालय में काम की चुनौती

विकास आयुक्त कार्यालय में काम करना मेरे लिए एक बड़ी चुनौती थी। यह सिर्फ प्रशासनिक बाधाओं की बात नहीं थी, बल्कि यह कर्मचारियों की दिनचर्या और जीवनशैली से जुड़ी एक जटिल समस्या थी। हमारे कार्यालय में महिला और पुरुष कर्मचारी थे, जिनमें से ज्यादातर पुरुष अपने निजी वाहनों से आते थे, जबकि अधिकांश महिलाएं सरकारी बसों पर निर्भर थी। इन बसों के आने-जाने का समय तय होता था, और इसी के अनुसार कर्मचारी अपने काम पर आते-जाते थे।

हमारे कार्यालय वल्लभ भवन, विंध्याचल और सतपुड़ा जैसे विशाल भवनों में स्थित थे, जहाँ हज़ारों कर्मचारी काम करते थे। इन इमारतों के सामने एक तरह का 'अतिक्रमण बाजार' लग गया था। यहाँ फल-सब्जी, किराना, कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और चाय-नाश्ते की दुकानें लगी रहती थी।

कर्मचारियों की दिनचर्या कुछ ऐसी थी: सुबह ऑफिस आकर हाजिरी लगाते, फिर सीधे नीचे लॉन में जाकर चाय-नाश्ता करते। इसके बाद कमरे में आकर मुश्किल से दो फाइलें देखते और आगे बढ़ते। दोपहर में लंच के लिए फिर से नीचे जाते और वापस आकर एक और फाइल पर काम करते। फिर शाम होते ही बस पकड़ने के लिए लाइन में लग जाते।

एक दिन, मैंने इस स्थिति को सुधारने के लिए कर्मचारियों के साथ एक बैठक की। मैं जानता था कि मैं उनसे बहुत कुछ नहीं कह सकता था, क्योंकि उनकी सेवाएं सचिवालय सेवा के अंतर्गत आती थी और उनकी मजदूर यूनियन भी थीं। हमारी तीन घंटे चली इस बैठक में, आखिरकार इस बात पर सहमति बनी कि सुबह के सत्र में दो और लंच के बाद दो फाइलें पटाई जाएगी।

जब मैंने इस व्यवस्था को और बेहतर बनाने की बात की, तो महिला कर्मचारियों ने अपनी दिनचर्या बताई, जिसे सुनकर मैं निशब्द रह गया। उन्होंने कहा, "सुबह चार बजे उठकर बच्चों, पति और खुद के लिए नाश्ता बनाओ। दोपहर के खाने का टिफिन तैयार करो। बच्चों को तैयार करके स्कूल बस में बताओ। घर की साफ-सफाई, बर्तन धोने जैसे काम निपटाओ। पति को नाश्ता दो और उनका टिफिन तैयार करो। फिर खुद नाश्ता करके बस स्टॉप पर जाकर लाइन में लगो और समय पर ऑफिस पहुँचो। शाम को बस पकड़कर वापस जाओ। रात का खाना बनाओ, बर्तन साफ करो, बच्चों को उनका होमवर्क कराओ, और फिर अलार्म लगाकर सोने जाओ।"

उन्होंने मुझसे पूछा, "यह क्रम हर दिन ऐसे ही चलता है। जो काम बच जाते हैं, वे रविवार और छुट्टियों में पूरे होते हैं। अब आप बताइए, हम इनमें से कौन सा काम न करें? अधिकारियों के घरों में तो नौकर-चाकर होते हैं, पत्नियाँ घर संभालती हैं, इसलिए उनके पास फुर्सत होती है तो नए-नए आइडिया आते रहते हैं।"

उनकी बात सुनकर मैं पूरी तरह से खामोश हो गया। मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उनकी समस्या सिर्फ काम की नहीं, बल्कि जीवन के संघर्ष की थी।


ट्रांसफर उद्योग' की कहानी

हमारे नए मंत्री जी, जो पहली बार धार जिले से चुनकर आए थे, एक सीधे-सादे और सज्जन आदिवासी नेता थे। एक दिन उन्होंने मेरे प्रमुख सचिव से कहा कि उन्हें ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामलों में मदद की ज़रूरत है। प्रमुख सचिव ने तुरंत आश्वासन दिया, "आप बस अपनी अनुशंसाएँ भेज दीजिए, मैं स्थापना शाखा से अपने देश तत्परता से निकलवा दूंगा।"

मैं उस समय ग्रामीण विकास विभाग में स्थापना का प्रभाव था, और इस विभाग के तहत मध्य प्रदेश ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (MP RES) काम करती है। यह सेवा ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों, भवनों, पुलों, जल परियोजनाओं और अन्य बुनियादी ढांचे के निर्माण और रखरखाव का काम करती है। इसमें अधीक्षण अभियंता (SE), कार्यपालक अभियंता (EE), सहायक अभियंता (AE) और उप अभियंता (Sub E) जैसे प्रमुख पद थे, जिनके तबादलों के लिए भारी दबाव था। इसी तरह जनपद पंचायतों के मुख्य कार्यपालन अधिकारियों (CEO) के तबादलों के लिए भी बहुत सिफारिशें आ रही थी।

जैसे ही बादलों पर से प्रतिबंध हटा, मंत्री जी की नोटशीट पर रोज दर्जनों नाम आने लगे। हमारा पूरा दिन सिर्फ इन्हीं देशों को निकालने में बीतता था। अगर हम कोई तकनीकी कारण बताया, जैसे कि पद खाली नहीं है या अधिकारी का गृह जिला है, और आदेश नहीं निकाल पाते, तो मंत्री जी के दफ्तर से बहुत हल्ला-गुल्ला मचा था।

एक दिन, प्रमुख सचिव महोदय ने हमें निर्देश दिया, "दिमाग मत लगाओ! जहाँ का आदेश आया है, वहाँ का आदेश निकाल दो, चाहे कुछ भी हो।"

हमने प्रमुख सचिव की बात मान ली। दिन भर हम धड़ाधड़ तबादले के आदेश निकाल और तुरंत नोटिस बोर्ड पर चिपका देते। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ही कर्मचारी के एक दिन में कई-कई तबादले या निरस्तीकरण के आदेश निकलने लगे। यह सिलसिला पूरे एक महीने तक चला।

दो महीने बाद, जब वेतन का समय आया, तो एक बड़ी समस्या सामने खड़ी हो गई। कई जगहों पर एक ही पद के लिए एक से ज़्यादा अधिकारी नियुक्त हो गए थे, जिससे किसी का भी वेतन जारी नहीं हो पा रहा था। जब परेशान कर्मचारी अपनी सैलरी के लिए हमारे पास आते, तो हम उन्हें बस इतना ही कहते, "यह तबादला आदेश तो आपकी अपनी ही रिक्वेस्ट पर निकाला गया था।"

धीरे-धीरे, लोगों का पैसा खत्म होने लगा और अब कोई भी सिफारिश लेकर हमारे पास नहीं आ रहा था। बादलों का वह "उद्योग" कुछ समय के लिए पूरी तरह से ठप हो गया था।

बस्तर की एक अनोखी विभागीय जांच

मेरे सामने एक विभागीय जांच की अपील आई थी, और उसका मामला इतना अजीब और अनोखा था कि मुझे लगा, यह किसी शातिर दिमाग की उपज है। यह फाइल बस्तर में तैनात एक विकास खंड अधिकारी की थी। उन पर आरोप था कि उन्होंने एक जनपद पंचायत की सभी पंचायतों के खातों से सरपंचों को समझा-बुझाकर पैसे निकाल लिए थे।

उन्होंने आदिवासी सरपंचों को यह कहकर अपने जाल में फँसाया, "आप सब आदिवासी सरपंच हैं और आपके बैंक खाते आपकी पंचायतों से बहुत दूर हैं। आप लोग योजनाओं का सारा पैसा निकालकर मेरे निजी खाते में जमा करवा दिए। जब भी आपको जरूरत होगी, मैं आपको पैसे दे दूंगा।" भोले-भाले सरपंच उनकी बातों में आ गए और उन्होंने अपनी मेहनत का पैसा निकाल कर अधिकारी के खाते में जमा करवा दिया।

इस पैसे को लेकर वह विकास खंड अधिकारी विशाखापट्टनम चले गए। वहाँ उन्होंने नीलामी में एक पुराना, बड़ा जहाज खरीदा। उन्होंने उस जहाज को डिस्मेंटल करवाया और उसका कबाड़ (scrap) बेच दिया। इस सौदे से उन्हें अच्छा-खासा मुनाफा हुआ।

सबसे चौंकाने वाली बात यह थी कि उसे मुनाफे को उन्होंने अपनी जेब में रख लिया और सरपंचों के सभी पंचायतों का पैसा उनके खातों में पूरा का पूरा वापस कर दिया।

इस घटना के बाद, बस्तर के कमिश्नर ने उन्हें दंडित किया था। इसी दंड के खिलाफ उन्होंने विकास आयुक्त के पास अपील की थी, जिसमें उन्होंने दंड माफ करने की गुहार लगाई थी।

अपील में उनका तर्क था कि सरपंचों ने खुद अपने बैंक खातों से पैसे निकाले थे और उनके खाते में जमा किए थे। सरपंचों को इस बात की जानकारी तब मिली जब उन्होंने अपनी बैंक पासबुक अपडेट करें (उस समय ऑनलाइन बैंकिंग की सुविधा नहीं थी)। जैसे ही सरपंचों को यह पता चला, अधिकारी ने बिना किसी देरी के पूरा पैसा हर पंचायत के खाते में जमा कर दिया। इस बात के प्रमाण के रूप में उन्होंने बैंक मैनेजर के बयान और बैंक लेनदेन के सभी सबूत भी पेश किए थे।

अधिकारी के पक्ष में एक और बात यह थी कि किसी भी सरपंच ने उनकी शिकायत नहीं की थी। बल्कि, सभी सरपंचों ने अधिकारी के हित में बयान दिए थे। इसके अलावा, जहाज खरीदकर बेचने के मामले में कोई भी दस्तावेजी सबूत नहीं मिला, जिससे यह साबित हो सके कि विकास खंड अधिकारी या उनके परिवार का कोई सदस्य इसमें लिप्त था।

यह मामला कानून की पेचीदगियों और इंसान की नैतिकता के बीच फँसा हुआ था, जहाँ एक अधिकारी ने भले ही नियमों का उल्लंघन किया हो, लेकिन अंत में किसी को नुकसान नहीं पहुँचाया था।

कोलंबो योजना 

कोलंबो योजना (Colombo Plan) एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसका उद्देश्य एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। भारत सरकार इस योजना के तहत अधिकारियों और अन्य पेशेवरों को विदेशी विश्वविद्यालयों और संस्थानों में विभिन्न प्रशिक्षण कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए भेजती है। यह कार्यक्रम भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग (Indian Technical and Economic Cooperation - ITEC) कार्यक्रम के तहत भी संचालित होता है।

कार्यक्रम का उद्देश्य

इस योजना का मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के अधिकारियों को उनके प्रशासनिक और तकनीकी कौशल को बढ़ाना है। प्रशिक्षण कार्यक्रम के माध्यम से प्रतिभागियों को विभिन्न क्षेत्रों में नवीनतम ज्ञान और तकनीक से अवगत कराया जाता है।

पात्रता और चयन प्रक्रिया

कोलंबो योजना के तहत प्रशिक्षण के लिए अधिकारियों का चयन उनकी विशेषताएं और कार्य अनुभव के आधार पर किया जाता है। आमतौर पर, ऐसे अधिकारियों को प्राथमिकता दी जाती है जिनके पास कम से कम पाँच साल का सेवा अनुभव हो और संबंधित क्षेत्र में कम से कम तीन साल का वास्तविक कार्य अनुभव हो।

प्रशिक्षण के क्षेत्र

प्रशिक्षण कार्यक्रम कई विषयों को कवर करते हैं, जिनमें शामिल हैं: लोक प्रशासन, चुनाव प्रबंधन, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) का विकास, ग्रामीण विकास, रक्षा प्रबंधन, समुद्री और वैमानिकी इंजीनियरिंग, कानून और वित्त इन परीक्षणों का उद्देश्य अधिकारियों को वैश्विक चुनौतियों के लिए तैयार करना है।

फंडिंग और लाभ

भारत सरकार इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए पूरी तरह से वित्तपोषण करती है। इसमें हवाई यात्रा, आवास, भोजन और रहने का भत्ता शामिल होता है। यह योजना प्रतिभागियों को न केवल पेशेवर कौशल प्रदान करती है, बल्कि विभिन्न देशों के अधिकारियों के बीच सांस्कृतिक और पेशेवर संबंधों को भी बढ़ावा देती है। मुझे इस योजना के तहत बर्मिंघम विश्वविद्यालय में ग्रामीण विकास के अध्ययन  कार्यक्रम में भाग लेने के लिए भेजा गया । 

नया सफर: भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति

इसी समय मेरी पदोन्नति भारतीय प्रशासनिक सेवा में हो गई। मेरी पदोन्नति की फाइल दिल्ली से आकर अनुमोदन के लिए मुख्यमंत्री महोदय को भेजी गई। लेकिन फाइल कई दिनों से लौटी नहीं थी। मुझे बेसब्री से आदेश का इंतजार था। मैं मुख्यमंत्री के सचिव श्री गोपाल कृष्ष्णनन से मिला। उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री महोदय यात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर में फाइल निपटाते हैं। तुम्हारी फाइल मेरे बेडरूम की अलमारी में रखी है। तुम लेकर आ जाओ। उन्होंने अपनी पत्नी को फोन कर दिया। मैं उनके घर गया। वह सामान्य प्रशासन की गोपनीय फाइल थी, फाइल खुली थी। मैंने पहली बार देखा कि उसमें लगी मेरी सभी गोपनीय वार्षिक रिपोर्ट आउटस्टैंडिंग थी। मैंने फाइल सामान्य प्रशासन शाखा में दे दी। मेरी पदोन्नति का आदेश जारी हो गया।

इसके बाद, लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासनिक अकादमी (LBSNAA) में पदोन्नत अधिकारियों के लिए विशेष प्रशिक्षण और 'भारत दर्शन' कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। यह कार्यक्रम अधिकारियों को अखिल भारतीय स्तर पर एक व्यापक परिप्रेक्ष्य विकसित करने में मदद करता है। यह प्रशिक्षण कार्यक्रम राज्य सेवा के अधिकारियों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जब वे भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में पदोन्नत होते हैं। इस प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों के दृष्टिकोण को व्यापक बनाना है ताकि वे अखिल भारतीय स्तर पर लोक प्रशासन और वृहद अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझ सकें।

इस प्रशिक्षण की अवधि आमतौर पर छह सप्ताह की होती है। इसमें चार सप्ताह के कक्षा सत्र और उसके बाद दो सप्ताह का 'भारत दर्शन' अध्ययन दौरा शामिल होता है। पाठ्यक्रम में अर्थशास्त्र, प्रबंधन, लोक प्रशासन और समसामयिक मामलों पर गहन इनपुट दिए जाते हैं। अधिकारियों के समृद्ध राज्य-विशिष्ट अनुभव का उपयोग सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने और सुशासन के उदाहरणों से सीखने के लिए किया जाता है।

'भारत दर्शन' प्रशिक्षण का एक अभिन्न हिस्सा है, जिसे विशेष रूप से पदोन्नत अधिकारियों के लिए तैयार किया गया है। इस दौरे का मुख्य लक्ष्य अधिकारियों को देश की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता और विरासत से परिचित कराना है। यह उन्हें विभिन्न राज्यों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य को करीब से समझने का अवसर देता है। 'भारत दर्शन' के दौरान, अधिकारियों को छोटे-छोटे समूहों में बाँटा जाता है और उन्हें विभिन्न राज्यों के महत्वपूर्ण हिस्सों का दौरा कराया जाता है। इस दौरान वे विभिन्न क्षेत्रों की सरकारी नीतियों, कार्यक्रमों और प्रशासनिक चुनौतियों को समझते हैं।

पदोन्नत अधिकारियों के लिए यह प्रशिक्षण और 'भारत दर्शन' कार्यक्रम उनके करियर में एक नए चरण की शुरुआत का प्रतीक है, जहाँ वे अपने अनुभव का लाभ उठाकर राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं। मैं यह प्रशिक्षण लेने चला गया।

नया युग, नई चुनौतियां: एक सीईओ की कहानी

मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1993 के लागू होने के बाद, जिला स्तर पर शासन और विकास को व्यवस्थित करने के लिए एक अद्वितीय प्रशासनिक ढांचा तैयार किया गया। इस व्यवस्था का मूल सिद्धांत शक्तियों का स्पष्ट विभाजन था, जिसमें नियामक (Regulatory) और विकासात्मक (Developmental) कार्यों को अलग-अलग अधिकारियों को सौंपा गया। यह नई व्यवस्था दो मुख्य प्रशासनिक स्तंभों पर आधारित थी।

नियामक/दंडाधिकारी शक्तियाँ जिला दण्डाधिकारी (DM) और सब-डिविजनल दण्डाधिकारी (SDM) के पास थी। इसका मुख्य कार्य प्रशासन का भय (fear of administration) बनाए रखना था, ताकि कानून-व्यवस्था, राजस्व और अन्य नियामक कार्यों का प्रभावी ढंग से पालन हो सके। अधिनियम के तहत उन्हें नियामक शक्तियाँ दी गई, जिससे ये न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच सेतु का काम कर सकें। उनकी भूमिका मुख्य रूप से निगरानी, प्रवर्तन और कानूनी अनुपालन सुनिश्चित करने तक सीमित थी।

दूसरी ओर, विकासात्मक शक्तियाँ मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) जिला पंचायत और मुख्य कार्यपालन अधिकारी (CEO) जनपद पंचायत को दी गई थी। इसका मुख्य कार्य विकास को प्रोत्साहन (persuasion for development) देना था। इन पदों का सृजन विशेष रूप से विकास योजनाओं, परियोजनाओं और बजट के प्रबंधन के लिए किया गया। इनकी जिम्मेदारी ग्राम पंचायतों, जनपद पंचायतों और जिला पंचायतों के बीच समन्वय स्थापित करना, विकास कार्यों की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना था कि सरकारी योजनाओं का लाभ सही ढंग से लाभार्थियों तक पहुँचे। 

मैं विकास आयुक्त कार्यालय में स्थापना शाखा तथा बजट शाखा का प्रभारी अधिकारी था। इस कारण इन कामों को करने का दायित्व मेरा था। यह मध्य प्रदेश के लिए अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी जो हमने विकसित की थी।

मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम, 1993 के लागू होने के बाद, स्थानीय स्वशासन की नींव को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए गए। इनमें सबसे प्रमुख था मध्य प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा पहली बार त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों का आयोजन। यह अधिनियम के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में सत्ता के विकेंद्रीकरण का पहला और सबसे महत्वपूर्ण चरण था। 73वें संविधान संशोधन के बाद, मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने राज्य निर्वाचन आयोग का गठन कर स्वतंत्र, निष्पक्ष और समयबद्ध चुनाव कराए। 

इन चुनावों ने पहली बार ग्रामीण क्षेत्रों के नागरिकों को प्रत्यक्ष रूप से अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार दिया। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से बड़ी संख्या में सरपंच, पंच, जनपद पंचायत सदस्य, और जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित होकर सामने आए, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और आरक्षित वर्गों के प्रतिनिधि शामिल थे। इस नई व्यवस्था ने ग्रामीण लोकतंत्र को एक नया आयाम दिया।

नव-निर्वाचित पदधारकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती थी कि वे अपने अधिकारों, कर्तव्यों और जिम्मेदारियों से परिचित नहीं थे। इस समस्या के समाधान के लिए विकास आयुक्त कार्यालय के मार्गदर्शन में बड़े पैमाने पर प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य न केवल उन्हें कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की जानकारी देना था, बल्कि उनकी क्षमता का निर्माण (Capacity Building) करना भी था। 1993 के मध्य प्रदेश पंचायती राज अधिनियम के लागू होने के बाद, 1994 में हुए पहले चुनावों में कुल 3.85 लाख से अधिक पदाधिकारी और सदस्य निर्वाचित हुए थे। यह संख्या ग्रामीण लोकतंत्र के लिए एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी।

यह अधिनियम देश का पहला अधिनियम था जिसने 73वें संविधान संशोधन के प्रावधानों को पूरी तरह से लागू किया था। इन चुनावों के माध्यम से त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था में निम्नलिखित संख्या में प्रतिनिधि चुने गए:

ग्राम पंचायत: 22,812 सरपंच और 3,54,651 पंच निर्वाचित हुए। जनपद पंचायत: 6,097 सदस्य और 313 अध्यक्ष निर्वाचित हुए। जिला पंचायत: 537 सदस्य (प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित) और 51 अध्यक्ष निर्वाचित हुए।

इन निर्वाचित प्रतिनिधियों में महिलाएं और अनुसूचित जाति/जनजाति के सदस्य बड़ी संख्या में शामिल थे, जो पंचायती राज संस्थाओं में पहली बार सामाजिक समावेशन और समावेशी शासन को दर्शाता है। यह संख्या मध्य प्रदेश में इस समय मौजूद कुल 51 जिलों, 313 जनपद पंचायतों और 22,812 ग्राम पंचायतों के आधार पर निर्धारित की गई थी। इन चुनावों के सफल आयोजन ने ग्रामीण स्तर पर शक्तियों के विकेन्द्रीकरण की प्रक्रिया को प्रभावी रूप से शुरू किया।

प्रशिक्षण के मुख्य बिंदु थे:

अधिनियम का परिचय: पंचायती राज अधिनियम के प्रावधानों, नियमों और उपनियमों की विस्तृत जानकारी।

वित्तीय प्रबंधन: बजट निर्माण, कर लगाने की शक्ति, सरकारी योजनाओं के लिए फंड का उपयोग, और लेखा-जोखा (Auditing) का ज्ञान।

समन्वय और टीम निर्माण: जिला, जनपद और ग्राम पंचायत के बीच समन्वय स्थापित करना और सामूहिक रूप से काम करने के लिए प्रेरित करना।

टीम निर्माण और समन्वय का महत्व इसलिए था क्योंकि पंचायती राज संस्थाओं की सफलता के लिए टीम भावना (Team Spirit) और आपसी समन्वय अत्यंत आवश्यक था। प्रशिक्षण कार्यक्रमों में इस बात पर जोर दिया गया कि पंचायत के सभी सदस्य, चाहे वे सरपंच हों या पंच, एक टीम के रूप में काम करें। यह महत्वपूर्ण था क्योंकि टीम के रूप में काम करने से प्रत्येक सदस्य अपने कर्तव्यों के प्रति अधिक जवाबदेह होता है, विकास कार्यों में तेजी आती है और आपसी टकराव को टाला जा सकता है। 

चूंकि पंचायतें एक-दूसरे की अधीनस्थ नहीं थी, उनके बीच संभावित टकराव को रोकने के लिए अधिकारों और कर्तव्यों का स्पष्ट विभाजन और आपसी सम्मान का भाव सिखाया गया। इस प्रकार, प्रशिक्षण ने न केवल पदधारियों को तकनीकी ज्ञान दिया, बल्कि उनमें नेतृत्व क्षमता, आपसी विश्वास और एक स्वस्थ लोकतांत्रिक कार्य संस्कृति विकसित करने में भी मदद की। यह एक नए प्रशासनिक युग की शुरुआत थी, जिसने मध्य प्रदेश में ग्राम स्वराज की अवधारणा को यथार्थ में बदला। यह बहुत बड़ा और लंबे समय तक चलने वाला आयोजन था। ग्रामीण विकास विभाग की ओर से मुझे समन्वय तथा ट्रेनिंग देने का काम करना पड़ा।

मध्य प्रदेश में जिला पंचायत अध्यक्ष और मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) के बीच टकराव एक सामान्य बात है। यह टकराव मूल रूप से राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक कार्यप्रणाली के बीच अंतर के कारण होता है। अध्यक्ष एक चुना हुआ राजनीतिक प्रतिनिधि होता है, जिसे राज्य मंत्री का स्टेटस दिया गया, जबकि सीईओ एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) या राज्य प्रशासनिक सेवा (SAS) का अधिकारी होता है, जिसे सरकार द्वारा नियुक्त किया जाता है। उनके बीच टकराव के कुछ प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं

अधिकारों का टकराव: अध्यक्ष अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं को लागू करना चाहता है, जबकि सीईओ नियमों और कानूनों के अनुसार कार्य करना चाहता है।

प्रोटोकॉल का मुद्दा: अध्यक्ष को राज्यमंत्री का दर्जा प्राप्त होता है, लेकिन कई बार सीईओ या अन्य अधिकारी इस प्रोटोकॉल का पूरी तरह से पालन नहीं करते, जिससे तनाव पैदा होता है।

कार्यशैली में अंतर: अध्यक्ष की कार्यशैली जनता से सीधे जुड़कर उनकी मांगों को पूरा करने की होती है, जबकि सीईओ की कार्यशैली नियमों और बजट के दायरे में रहकर काम करने की होती है।

भ्रष्टाचार के आरोप: कई बार अध्यक्ष और उनके समर्थक अनियमितताओं को अनदेखा करने के लिए दबाव डालते हैं, जिसका सीईओ विरोध करता है।

ऐसा ही एक उदाहरण तब सामने आया था जब जिला पंचायत भोपाल की बैठक में सीईओ के अनुपस्थित रहने पर अध्यक्ष और सदस्यों ने हंगामा किया था। उनका आरोप था कि सीईओ उनकी अनदेखी कर मनमानी कर रहे हैं। इस तरह के मामलों में, अध्यक्ष अधिकारियों के मनमाने रवैये और जनप्रतिनिधियों के काम में अड़चन डालने का आरोप लगाते हैं, जबकि अधिकारी अक्सर राजनीतिक दबाव और नियमों को ताक पर रखकर काम करने के लिए मजबूर करने का आरोप लगाते हैं। यह संघर्ष इतना बड़ा था कि पंचायती राज व्यवस्था में प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है।

भोपाल जिला पंचायत अध्यक्ष ने इस बात की शिकायत मुख्यमंत्री जी से की। मुख्यमंत्री जी भोपाल में कोई विवाद नहीं चाहते थे। उन्होंने एक बैठक में मुझे भोपाल जिला पंचायत का सीईओ बनाने के निर्देश जारी किए। उन्होंने मुझे कहा कि "तुम बहुत ज्ञान देते हो, इसे भोपाल में करके दिखाओ तो मानूँ।" मैंने उनकी इस चुनौती को स्वीकार किया। भोपाल में बहुत अल्प काल में बार-बार सीईओ बदले जा रहे थे, क्योंकि कोई भी अध्यक्ष के साथ सामंजस्य नहीं बना पा रहा था।

भोपाल जिला पंचायत में मेरे अनुभव

भोपाल जिला पंचायत मध्य प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था का शीर्ष स्तर है। इसकी संरचना मध्य प्रदेश पंचायत राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 के तहत निर्धारित होती है। यह अधिनियम भारत के संविधान के 73वें संशोधन के बाद लागू किया गया था। भोपाल जिला पंचायत में विभिन्न सदस्य होते हैं, जिनमें निर्वाचित सदस्य, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य पदेन सदस्य शामिल हैं। जिला पंचायत के सदस्य सीधे मतदाताओं द्वारा चुने जाते हैं। भोपाल जिले में दो जनपद पंचायत फंदा तथा बैरसिया हैं। 

भोपाल जिला पंचायत में 10 वार्ड हैं, जिनमें से सदस्य चुने जाते हैं। इन वार्डों में आरक्षण की प्रक्रिया भी लागू होती है, जिसमें ओबीसी, एससी और एसटी के लिए सीटें आरक्षित होती हैं, साथ ही महिलाओं के लिए भी आरक्षण होता है। लोकसभा, विधानसभा और राज्यसभा के सदस्य, जो भोपाल जिले का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिला पंचायत के पदेन सदस्य होते हैं। जिला पंचायत के निर्वाचित सदस्य अपने में से एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। 73वें संविधान संशोधन के बाद, मध्य प्रदेश में पंचायती राज संस्थाओं के पहले चुनाव 1994 में हुए थे। 

इन चुनावों में ही भोपाल जिला पंचायत के सदस्यों, अध्यक्षों और उपाध्यक्षों का चुनाव भी पहली बार नए अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार किया गया था। इस चुनाव ने पहली बार ग्रामीण स्तर पर सत्ता का विकेंद्रीकरण किया और समाज के सभी वर्गों, विशेषकर महिलाओं और पिछड़े वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित की।

नए चुनाव के बाद श्री मखमल सिंह मीना अध्यक्ष बने थे। मुझसे पहले वह व्ही एच निरंजन तथा दीप्ति गौड़ मुखर्जी को मुख्य कार्यपालन अधिकारी के पद से हटा चुके थे। मैं तीसरा मुख्य कार्यपालन अधिकारी था। भोपाल में जगह की कमी के कारण एक भवन में मुख्य कार्यपालन अधिकारी का कार्यालय था और सड़क के उस पार दूसरे भवन में अध्यक्ष का कार्यालय था। मैंने कार्यभार लेने के बाद अध्यक्ष जी से समय लेकर उनसे मिलने उनके कार्यालय में गया। वहाँ कमरे में बहुत लोग बैठे थे। मैंने अकेले में बात करने का अनुरोध अध्यक्ष जी से किया।

उन्होंने सबको बाहर जाने को कहा। कमरे में हम दोनों थे। मैंने उन्हें बताया कि मैं केवल कुछ समय के लिए यहाँ सरकार द्वारा पदस्थ किया गया हूँ। मुझे अपने राज्य स्तर पर काम करते देखा है। मैं खुद यहाँ रहने में रुचि नहीं रखता हूँ। बार-बार मुख्य कार्यपालन अधिकारी बदलने के कारण राजनीतिक हलकों में आपकी छवि खराब हो रही है। आप पहली बार अध्यक्ष बने हैं। यदि आपको राजनीति में भविष्य बनाना है तो छवि अच्छी होनी चाहिए।

मेरी तीन बातें हैं। पहला अनुरोध यह है कि हम दोनों सीधे बात करें। कभी किसी मध्यस्थ के माध्यम से बात न करें। इससे आपस में गलतफहमियां नहीं होती हैं। दूसरा अनुरोध है कि यदि आप मेरी इज्जत करोगे तो मैं आपकी करूँगा और तीसरा अनुरोध है कि मुझे काम करना आता है और यह दो विकासखंड की बहुत छोटी सी जिला पंचायत है। मुझे काम करने दें, मैं ईमानदारी तथा मेहनत से इसे आदर्श मॉडल बनाना चाहता हूँ। 

मैं तो ट्रांसफर होकर चला जाऊँगा पर लोग आपके समय हुए विकास को आगे याद रखेंगे। मुख्यमंत्री जी राजधानी की इस जिला पंचायत को आदर्श बनाना चाहते हैं। मैं पहली बार और आखिरी बार इस कार्यालय में आया हूँ, मिलकर काम करने का अनुरोध है। उन्होंने मेरी बातों से सहमति जताई। मैं अपने ऑफिस आ गया।

हमारे कलेक्टर थे श्री इकबाल सिंह बैंस। जब मैं उनसे मिला तो उन्होंने कहा, "ना मैं तुमसे तुम्हारे काम के बारे में कुछ कहूँगा ना तुम कहना। मिलने की जरूरत भी नहीं है।" फिर मैं उनसे इस पद पर रहते कभी नहीं मिला, नहीं बैठकों में गया। वह जिला पंचायत के झगड़े में नहीं पड़ना चाहते थे। मैं पहले भोपाल जिले का एडिशनल कलेक्टर और ए डी एम बहुत लंबे समय तक रह चुका था। जिले के सभी पार्टी पदाधिकारियों से मेरा अच्छा परिचय था। भोपाल जिले में कुल गाँवों की संख्या 614 है। इनमें से 611 राजस्व ग्राम और 3 वन ग्राम हैं। इसके अतिरिक्त, भोपाल जिले में 202 ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें बैरसिया में 110 और हुजूर में 92 ग्राम पंचायतें शामिल हैं। 

मैंने पाँच दिन का भ्रमण कार्यक्रम बताया। दो दिन ऑफिस में बैठने के लिए रखे। मैंने पंचायतवार, ग्राम वार सभी योजनाओं की जानकारी तथा फाइलें तैयार करवाईं। अग्रिम टूर प्रोग्राम निकाला। सभी को सूचित किया। जरूरत के अधिकारी-कर्मचारियों को मौके पर उनकी फाइलों के साथ उपस्थित रहने के निर्देश दिए। मैं अपने कार्यपालन यंत्री तथा मुख्य लेखाधिकारी को चेक बुक के साथ लेकर जाता। काम का निरीक्षण करता और मौके पर सरपंचों तथा हितग्राहियों को चेक काटकर दे देता। किसी को कार्यालय आने की जरूरत नहीं रही। जहाँ पहले चेक लेने के लिए अध्यक्ष तथा मेरे ऑफिस में भीड़ रहा करती, अब कोई नहीं आता। सन्नाटा पसरा रहता।

मेरे इस तरह भ्रमण करने से अन्य विभागीय अधिकारी भी भ्रमण कराए गए। कामों में गति आ गई। पेमेंट लेने में भ्रष्टाचार न होने से कामों की गुणवत्ता सुधर गई। सब बिचौलिए परेशान हो गए। मेरे साथ प्रेस के लोग जाते, वह भी कामों की रिपोर्टिंग करने लगे। शासन में जिला पंचायत की छवि सुधरने लगी। मैंने और अध्यक्ष जी ने अपना वादा निभाया।

भोपाल में एक तालाब है कलियासोत। बड़ा तालाब होने से मछली पकड़ने का ठेका जिला पंचायत नीलाम करती थी। नीलामी कैसे भी हो ठेका एक ही पार्टी को जाता। मैंने निश्चित किया मैं ऐसा नहीं होने दूंगा। मेरे पहले नीलामी हो चुकी थी। आयुक्त भोपाल के पास प्रकरण लंबित था। आयुक्त लकरा साहब थे। बहुत सीधे सादे ऑफिसर। मैं पहले से उन्हें जानता था। तालाब के बारे में मुझे जो बातें पता चली थी, वह उन्हें बताईं। उन्होंने फाइल आपत्ति लगाकर वापस कर दी। वह पार्टी हमेशा सांसद श्री सुरेश पचौरी जी का नाम लेती थी। मेरे अध्यक्ष भी उन्हीं के गुट के थे। मैं उन्हें जानता था। मैं समय लेकर उनसे मिला, मैंने पूरी बात समझाई। उन्होंने सबको बुलाकर बहुत डांटा। बात खत्म हो गई। पुनः ठीक से नीलामी हुई। जिला पंचायत की आय बहुत अच्छी हुई।

हर बार बैठक में एक सदस्य अपना इस्तीफा देने की धमकी देते। एक बैठक में मैंने कागज तथा पेन बुलाकर रखा। जैसे ही उन्होंने इस्तीफा देने की धमकी दी, मैंने कागज तथा पेन उनकी ओर बढ़ा दिया। वह समझ गए। मैं जब एजेंडा जारी करता तो बैकग्राउंड नोट हर बिंदु का बनाकर जारी करता। उसमें संबंधित कानून, नियम तथा सरकारी परिपत्र का हवाला देता। जरूरत हो तो कॉपी लगाता। बैठक में आधे घंटे केवल ब्रेनस्टॉर्मिंग करवाता। ताकि निर्णय के पहले सभी सदस्य विषय को समझ सकें। कानूनों, नियम तथा निर्धारित प्रक्रिया को समझ सकें। फिर बिंदुवार चर्चा होकर निर्णय होता। इस तरह मुझे जनप्रतिनिधियों के साथ काम करने में कभी दिक्कत नहीं हुई।

शासकीय विभागों में एक बात बहुत अच्छी है कि हर काम के लिए लिखित निर्देश आते हैं। केवल उन्हें अधिकारियों को पढ़ाना तथा उसकी भावना को समझना होता है। काम करते कभी गलती नहीं होती है। स्कूलों के लिए वर्ग एक तथा दो के शिक्षकों की नियुक्ति हमेशा विवाद का विषय रही है, लेकिन हमने उपरोक्त प्रक्रिया अपनाकर बिना विवाद के भर्ती पूरी करवाई। इसी तरह गाँव से शहर में ट्रांसफर बड़ा मुद्दा था। श्री आरिफ अकील अब हमारे प्रभारी मंत्री थे। मैंने भोपाल में दो बार चुनाव संपन्न करवाए। मैं गोविंदपुरा तथा बैरसिया का रिटर्निंग ऑफिसर होता था। श्री बाबूलाल गौर और श्री लक्ष्मी नारायण शर्मा भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी होते थे। भोपाल में एक ही बिल्डिंग के फर्स्ट फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर ट्रांसफर की सिफारिशें आती थी।

मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड 

मंडी बोर्ड का रण: एक अधिकारी की अनोखी चुनौती

यह कहानी है एक ऐसे कुरुक्षेत्र की, जहाँ तलवारें नहीं, बल्कि कुर्सियों की राजनीति और अहं की जंग लड़ी जा रही थी। कुरुक्षेत्र का नाम था मंडी बोर्ड कार्यालय, और मैं एक ऐसा सिपाही था जिसे अनचाहे ही इस युद्ध में धकेल दिया गया था।

मेरी नियुक्ति मंडी बोर्ड में अपर आयुक्त मंडी बोर्ड के पद पर हुई थी, लेकिन वहाँ का माहौल सामान्य सरकारी दफ्तर जैसा नहीं था। यह एक ऐसा राज्य था जहां मंत्री जी का राज चलता था, जो पद से तो अध्यक्ष थे, पर असल में इस "निजी लिमिटेड" कंपनी के सर्वे-सर्वा थे। यह मध्य प्रदेश के सबसे अमीर विभागों में से एक था, और इसका संचालन अपनी शर्तों पर होता था। मंत्री जी उस समय स्कूल शिक्षा विभाग और मध्य प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के भी अध्यक्ष थे। 2005 में बंद हो चुके परिवहन निगम से बड़ी संख्या में कर्मचारियों को मंडी बोर्ड में लाया गया था। ये सब मंत्री जी के प्रति इतने वफादार थे कि उनका इशारा ही उनके लिए कानून था।

मेरी शोहरत मुझसे पहले ही वहाँ पहुँच चुकी थी। पब्लिक लाइफ में काम करने वालों की दो छवियाँ होती हैं एक जो आप हैं, और दूसरी जो दुनिया आपको मानती है। मेरी प्रोजेक्टेड इमेज बड़ी थी, और इसी कारण मुझे उच्च अधिकारियों के आदमी के तौर पर देखा गया। मंत्री जी ठाकुर थे, और वहाँ एमडी से लेकर हर बड़े पद पर "सिंह" उपनाम वाले अधिकारी बैठे थे। मैं एक ब्राह्मण था। संयोग से, विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी जी के एक भतीजे, जो परिवहन निगम से यहाँ आए थे, उनसे मेरी दोस्ती हो गई। वे भी ब्राह्मण थे।

मुझे सिर्फ चुनाव कराने के लिए भेजा गया था, इसलिए किसी ने मुझे महत्व नहीं दिया। एक कमरा मिला, गाड़ी भी मिली, लेकिन काम करने के लिए कोई टीम नहीं दी गई। बोर्ड के अधिकारी मेरे साथ काम नहीं करना चाहते थे। बड़ी मुश्किल से, मुझे पांच ऐसे अधिकारियों-कर्मचारियों की एक टीम मिली, जो पूरे बोर्ड में कुख्यात थे। वे कभी ऑफिस नहीं आते थे, काम से उनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। वे सब अपनी मनमानी के लिए बदनाम थे।

मैंने अपनी जिंदगी में एक किताब पढ़ी थी "द आर्ट ऑफ वॉर" जिसके लेखक सुन त्ज़ू हैं। मैंने तय किया कि मैं इस किताब के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारूंगा। एक दिन मैंने उन पांचों को अपने कमरे में बुलाया। वे अपनी मर्जी से आए। मैंने उन्हें प्यार से समझाया। मैं जानता था कि ये शातिर लोग सामान्य से ज्यादा होशियार और बुद्धिमान होते हैं। बस उनकी नकारात्मक ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ने की जरूरत थी।

मैंने उनसे मिलने से पहले उनकी पूरी कुंडली निकाल ली थी। कहाँ काम किया, कब पकड़े गए, कौन-कौन से दंड मिले, कितनी विभागीय जाँचें चल रही है सब कुछ। मुझे उनके परिवार, बच्चों, और पत्नियों के बारे में भी पता था। मैंने उससे कहा, "धन तो तुम बहुत कमा चुके हो। अब नाम कमाने का मौका है। हम सिर्फ चुनाव नहीं करवाएँगे, बल्कि इतिहास रचेंगे।"

मैंने उनसे एक सवाल पूछा, "क्या तुम्हारी पत्नियां शिवरात्रि का व्रत करती हैं?" जब उन्होंने 'हाँ' कहा, तो मैंने उन्हें शिवरात्रि व्रत की एक ऐसी व्याख्या सुनाई जो उन्होंने कभी नहीं सुनी थी। मैंने कहा, "तुम्हारी पत्नी अगले जन्म में एक योग्य पति पाने के लिए व्रत कर रही है। वह तुम्हारे ही पैसों से तुम्हारा विकल्प ढूंढ रही है और तुम खुश हो?" यह सुनकर वे सब सन्न रह गए। उनका स्वाभिमान जाग उठा।

फिर मैंने उनकी रुचि के अनुसार उन्हें काम सौंपा। विनोद जैन लिखने-पढ़ने में होशियार थे, उन्हें चुनाव प्रक्रिया पर किताबें लिखने का काम दिया गया। जिन्हें भागदौड़ पसंद थी, उन्हें जिलों के साथ समन्वय का जिम्मा दिया। मैं रोज उन्हें आत्मविश्वास जगाने वाली मनोवैज्ञानिक कहानियाँ सुनाता था। मेरा यह अनूठा प्रयोग सफल हो रहा था। मेरी कुख्यात टीम, जो कभी कामचोर थी, अब एक समर्पित और ऊर्जावान इकाई में बदल रही थी। यह सिर्फ चुनाव की तैयारी नहीं थी, बल्कि एक नई शुरुआत थी एक इतिहास रचने की शुरुआत, जिसके नायक मैं और मेरी पाँचों वाल्मीकि-अंगुलिमाल जैसी टीम थे।

मंडी चुनाव की चुनौती

यह बात उस समय की है जब मध्य प्रदेश सरकार ने कृषि उपज मंडी अधिनियम, 1972 में एक बड़ा बदलाव किया था। सरकार का लक्ष्य किसानों को उनकी फसल का बेहतर दाम दिलाना और मंडी समितियों के काम में पारदर्शिता लाना था। इसी कड़ी में एक महत्वपूर्ण फैसला लिया गया मंडी समिति के अध्यक्ष का चुनाव सीधे किसानों द्वारा कराया जाएगा, न कि व्यापारियों या प्रतिनिधियों के द्वारा।

यह बदलाव अपने आप में क्रांतिकारी था। कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में इसका वादा किया था और मुख्यमंत्री इसे पूरा करने के लिए प्रतिबद्ध थे।  इस कदम से उम्मीद थी कि राजनीतिक हस्तक्षेप कम होगा और अध्यक्ष पर मनमाने ढंग से काम करने का दबाव नहीं रहेगा।

मगर इस नेक इरादे को हकीकत में बदलने की राह आसान नहीं थी। राज्य सरकार ने राष्ट्रीय और राज्य चुनाव आयोग से संपर्क साधा ताकि वे इन चुनावों का संचालन कर सकें। लेकिन दोनों आयोगों ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए चुनाव कराने में अपनी असमर्थता जता दी। वे सीधे तौर पर मंडी चुनावों को संवैधानिक बाध्यता के तहत नहीं मानते थे, इसलिए चुनाव कराने की विशेष शक्तियां उनके पास नहीं थी।

मुख्यमंत्री के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई: आखिर अब चुनाव कैसे कराए जाएँ?

उन्हें एक ऐसे सक्षम अधिकारी की तलाश थी जो इस पहली बार होने वाले चुनाव के लिए एक पुख्ता और विवाद-मुक्त प्रक्रिया तैयार कर सके। प्रशासन में अधिकारियों की खोज शुरू हुई, और आखिरकार मेरी पदस्थापना के साथ यह खोज पूरी हुई। मुझे राज्य मंडी बोर्ड में अपर आयुक्त के पद पर नियुक्त किया गया, जिसका मुख्य काम इन चुनावों को सफलतापूर्वक कराना था।

यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी। चुनाव आयोग के विपरीत, मेरे पास प्रशासनिक अमले को दंडित करने या उन पर पूरी तरह नियंत्रण रखने जैसी विशेष संवैधानिक शक्तियां नहीं थीं। यह पूरा चुनाव प्रशासनिक स्तर पर ही संचालित होना था। सरकार का मुझ पर विश्वास था कि मैं इस जटिल कार्य को बिना किसी कानूनी विवाद के पूरा करूँगा और लोकतंत्र की इस नई पहल को सफल बनाऊँगा। यह मेरे लिए सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक अवसर था

मंडी चुनाव का संग्राम: जब नियमों की रचना हुई

यह कहानी सिर्फ कागजी नियमों की नहीं है, बल्कि उस संघर्ष की है जिसने एक पूरे तंत्र को पहली बार लोकतंत्र के रास्ते पर चलना सिखाया। यह मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड के चुनाव का वो दौर था, जब सब कुछ नया था। मंडी समिति के चुनाव सीधे किसानों द्वारा कराए जाने का फैसला तो हो गया था, लेकिन इसके लिए कोई नियमावली नहीं थी। पूरे तंत्र को चलाने वाले कानून के अभाव में एक अराजक माहौल बन सकता था।

यह चुनौती हमारे सामने थी, और हमें इसे स्वीकार करना था। हमारा मिशन था - मंडी चुनाव के लिए पहली बार नियमावली और पुस्तिकाएं बनाना। यह काम वैसा ही था जैसे शून्य से किसी इमारत को खड़ा करना। मंडी बोर्ड के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) के मार्गदर्शन में, हमारी टीम ने दिन-रात एक करके इस असंभव से दिखने वाले काम को अंजाम देना शुरू किया।

हमारे सामने कई मुश्किलें थीं। एक तरफ वो लोग थे जो पुराने ढर्रे पर ही काम करना चाहते थे, और दूसरी तरफ वो जो इस बदलाव से डरे हुए थे। इन सब के बीच, हमने तय किया कि हम चुनाव प्रक्रिया का हर एक पहलू इतनी बारीकी से लिखेंगे कि कोई इसमें कमी न निकाल पाए।

हमने चुनाव प्रक्रिया के हर किरदार के लिए एक किताब लिखी:

  • पीठासीन अधिकारियों के लिए पुस्तिका: यह सिर्फ एक मैनुअल नहीं था, बल्कि उन अधिकारियों के लिए दिशा-निर्देश था जो चुनाव के दिन सबसे आगे होते हैं। इसमें मतदान की पूरी प्रक्रिया, ईवीएम का उपयोग और उनकी जिम्मेदारियां बहुत सरल भाषा में लिखी गईं।

  • रिटर्निंग अधिकारी (RO) के लिए नियमावली: यह रिटर्निंग अधिकारियों के लिए एक तरह से गीता थी, जिसमें नामांकन पत्र भरने से लेकर मतगणना तक के सभी कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं को बहुत स्पष्टता से समझाया गया था।

  • मतदान दल के लिए नियमावली: यह एक विशेष नियमावली थी जो मतदान टीमों को मतदान प्रक्रिया को कुशलतापूर्वक और बिना किसी गलती के संचालित करने में मदद करती थी।

इन किताबों के साथ-साथ, हमने चुनाव को निष्पक्ष बनाने के लिए कई नीतियां और दिशानिर्देश भी तैयार किए, जैसे:

  • आदर्श आचार संहिता: यह एक ऐसी ढाल थी जो चुनाव के दौरान राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकती थी।

  • अभ्यर्थियों के शपथ पत्र: यह सुनिश्चित करने के लिए कि उम्मीदवारों की जानकारी पारदर्शी हो।

  • चुनाव खर्च की सीमा और निगरानी: ताकि कोई भी उम्मीदवार पैसों की ताकत से चुनाव को प्रभावित न कर सके।

यह काम सिर्फ हमारी टीम का नहीं था, बल्कि यह एक मिशन था। हमने हर नियम, हर दिशानिर्देश को बहुत सोच-समझकर बनाया। जब हमारी टीम ने ये सभी दस्तावेज अनुमोदन के लिए सक्षम अधिकारियों के सामने रखे, तो उन्हें देखकर सब हैरान रह गए। यह सिर्फ नियमों का संग्रह नहीं था, बल्कि लोकतंत्र की एक नई सुबह का दस्तावेज था।

यह सब हमारी मेहनत का नतीजा था कि पहली बार हो रहे मंडी चुनाव बिना किसी बड़े कानूनी विवाद के पूरे हुए। हमने सिर्फ चुनाव नहीं कराए, बल्कि एक ऐसा रास्ता बनाया जिस पर भविष्य के मंडी चुनाव भी चल सके। हमारी टीम ने इतिहास रचा था, और यह हमारी सबसे बड़ी जीत थी।

एक यात्रा, एक सबक: मंडी चुनाव का सार

यह कहानी सिर्फ एक अधिकारी के दौरे की नहीं है, बल्कि एक ऐसे सफर की है जहाँ सड़कों की धूल में लोकतंत्र के बीज बोए जा रहे थे। जब मुझे मंडी चुनाव की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, तो मेरे सामने एक विशाल चुनौती थी। टीम तो बनानी थी, पर वो टीम सिर्फ मेरे कार्यालय की नहीं थी, बल्कि पूरे राज्य के जिला प्रशासन की थी। उस समय छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश का ही हिस्सा था, जिसका मतलब था कि भौगोलिक दूरी के साथ-साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और कार्यशैली की दीवारें भी खड़ी थी।

मैंने महसूस किया कि केवल कागजों पर आदेश भेजकर काम नहीं चलेगा। इस विशाल आर्केस्ट्रा को एक साथ बजाने के लिए मुझे खुद कंडक्टर बनना होगा। इसलिए मैंने एक अभूतपूर्व फैसला लिया: मैं पूरे राज्य का सड़क मार्ग से दौरा कर, सभी संभागीय आयुक्तों और कलेक्टरों को व्यक्तिगत रूप से प्रशिक्षित करूँगा। मेरा मकसद सिर्फ ट्रेनिंग देना नहीं था, बल्कि उनसे एक व्यक्तिगत संबंध स्थापित करना था, क्योंकि मैं जानता था कि जब आप लोगों को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, तो काम करना आसान हो जाता है।

यह यात्रा मेरे लिए एक मिशन थी। मैंने अपने दौरे की शुरुआत मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग के नक्शे से की। मैंने सिर्फ बैठकों में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि उन सभी पर्यटन स्थलों का भी भ्रमण किया जो रास्ते में आते थे। यह यात्रा मेरे लिए एक ज्ञानवर्धन का मौका बन गई। मैंने अपने कॉलेज के दिनों से सीखी हुई वक्ता की कला का भरपूर उपयोग किया। ट्रेनिंग के दौरान मैं कहानियों, चुटकुलों और कविताओं के माध्यम से अपनी बात रखता था। मैं खुद पर मजाक करता, ताकि सामने बैठे अधिकारी सहज महसूस करें। मेरा उद्देश्य उनकी कमियाँ निकालना नहीं, बल्कि उन्हें प्रेरित करना था।

मैं पूरे कमरे में घूम-घूम कर बोलता, आई-कॉन्टैक्ट बनाए रखता और अपनी आवाज़ में उतार-चढ़ाव लेकर उनकी एकाग्रता बनाए रखता था। मुझे पता था कि कम्युनिकेशन गैप को कैसे खत्म करना है और जानकारी का नुकसान कैसे रोकता है।

इस यात्रा का सबसे यादगार हिस्सा था बस्तर में होली मनाना। उस समय नक्सलवाद इतना हावी नहीं था। मैंने आदिवासियों की सरलता और उनकी जीवनशैली को करीब से देखा। यह एक ऐसा सबक था कि कम से कम चीजों में भी कितनी ज्यादा खुशी हो सकती है। घोटुल प्रथा और उनके शादी-तलाक के सरल नियम कितने आधुनिक थे, यह सुनकर मैं दंग रह गया। मुझे लगा कि यदि सरकार, साहूकार और ठेकेदारों को आदिवासी क्षेत्रों से दूर रखा जाए, तो उन्हें किसी बाहरी मदद की जरूरत नहीं है। उनका शोषण इन्हीं लोगों ने किया है।

इस थका देने वाली लेकिन बेहद जरूरी यात्रा के परिणाम बहुत सकारात्मक रहे। मेरे द्वारा दी गई व्यक्तिगत ट्रेनिंग ने जिला प्रशासन को चुनाव का महत्व समझाया। उन्होंने न केवल निष्पक्षता से काम करना सीखा, बल्कि यह दिखाया भी। यह एक ऐसी यात्रा थी जिसने मंडी चुनाव को सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक लोकतांत्रिक उत्सव बना दिया।

चुनाव की वोटर लिस्ट बनाना 


जब मंडी चुनाव की तैयारी हो रही थी, तो सबसे बड़ी चुनौती मतदाता सूची तैयार करना था। यह ऐसा काम था जो पहले कभी नहीं हुआ था। मंडी अधिनियम में प्रावधान तो थे, लेकिन उन्हें ज़मीन पर उतारना किसी जंग से कम नहीं था। सवाल था, कौन किसान है? कौन वोट देगा? किसका नाम सूची में होगा?



मतदाता सूची: एक कागज़ का संग्राम


मैंने और मेरी टीम ने सबसे पहले इस चुनौती को हाथ में लिया। हमें पता था कि अगर मतदाता सूची में कोई गड़बड़ी हुई, तो पूरा चुनाव विवादों के घेरे में आ जाएगा।


हमारा पहला कदम था मंडी क्षेत्र का सीमांकन। हमने राजस्व विभाग के अधिकारियों के साथ मिलकर हर मंडी का नक्शा बनाया। तय किया कि कौन सा गांव किस मंडी के तहत आएगा। यह सिर्फ नक्शा नहीं था, यह उस लोकतंत्र की नींव थी जो हम बनाने जा रहे थे।


इसके बाद असली लड़ाई शुरू हुई। किसानों के नाम खोजना। पटवारियों और राजस्व अधिकारियों के पास गए, खसरा-खतौनी के पुराने, धूल भरे कागज़ खंगाले। हर किसान के नाम, उनके पिता का नाम और उनके पते को एक-एक करके निकाला गया। यह सिर्फ एक डाटा एंट्री का काम नहीं था, यह हर उस किसान की पहचान को उजागर करने का काम था जिसे पहली बार मंडी चुनाव में अपना वोट देने का अधिकार मिलने वाला था।


जब प्रारंभिक मतदाता सूची तैयार हो गई, तो उसे सार्वजनिक किया गया। मंडी कार्यालयों, ग्राम पंचायतों और चौपालों पर सूचियाँ टाँग दी गईं। यह एक तरह का ड्रामा था, जहाँ हर किसान अपनी पहचान ढूँढ रहा था। कोई अपना नाम खोज रहा था, तो कोई अपने पड़ोसी का नाम देख रहा था। इस कदम ने एक तरह से पूरे ग्रामीण समाज को इस चुनाव से सीधे जोड़ दिया था।


आपत्तियों का तूफान और उसका निपटारा


प्रारंभिक सूची का प्रकाशन एक तूफान को दावत देने जैसा था। आपत्तियों आने लगीं किसी का नाम छूट गया था, किसी गलत व्यक्ति का नाम शामिल हो गया था। लोग शिकायत लेकर आए, गुस्सा भी दिखाया और उम्मीद भी जताई।


हमने रिटर्निंग ऑफिसर (RO) के नेतृत्व में एक टीम बनाई जो इन सभी आपत्तियों को सुनती। हर एक शिकायत पर सुनवाई होती। सबूतों की जांच की जाती। क्या खसरा-खतौनी में नाम है? क्या वह सच में किसान है? यह सब कुछ संविधान की तरह ही पारदर्शी था।


अंत में, सभी आपत्तियों का निपटारा होने के बाद, अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की गई। यह सिर्फ एक लिस्ट नहीं थी, यह उस मेहनत, ईमानदारी और पारदर्शिता की जीत थी, जिसने पहली बार मंडी चुनाव को एक नया रूप दिया।


आरक्षण का रण: जब सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ी गई


यह कहानी सिर्फ सीटों के बंटवारे की नहीं, बल्कि उस समय की है जब मंडी चुनाव के लिए सामाजिक न्याय की नींव रखी जा रही थी। मध्य प्रदेश कृषि उपज मंडी अधिनियम, 1972 में आरक्षण का प्रावधान तो था, लेकिन उसे पहली बार लागू करना किसी युद्ध से कम नहीं था। यह सिर्फ एक प्रशासनिक चुनौती नहीं, बल्कि एक सामाजिक क्रांति थी।

चुनौतियों का महासागर


हमारे सामने एक महासागर जैसी चुनौतियां थीं। सबसे पहले, जनसंख्या डेटा का भाव। हर मंडी क्षेत्र में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग की सटीक संख्या का पता लगाना असंभव सा लग रहा था। हमें जिला प्रशासन की मदद से विशेष सर्वेक्षण और गणना करानी पड़ी। यह डेटा सिर्फ संख्याएँ नहीं थीं, बल्कि उन लाखों लोगों की पहचान थी जिन्हें पहली बार अपनी आवाज़ उठाने का मौका मिलने वाला था।


इसके बाद, सीटों का आवंटन एक टेढ़ी खीर साबित हुआ। हमें चक्रानुक्रम (रोटेशन) का पालन करते हुए सीटों का निर्धारण करना था, ताकि हर वर्ग को मौका मिल सके। यह सुनिश्चित करना था कि आरक्षण का सिद्धांत लागू हो और किसी भी वर्ग के साथ अन्याय न हो।


लोगों ने भोपाल के रवीन्द्र भवन में सीटों के आरक्षण  की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिये कार्यक्रम रखा था। तब भोपाल में विधान सभा भी चल रही थी। सभी विधायकों की रूचि सीटों के आरक्षण में थी। आरक्षण के समय बहुत अधिक भीड़ थी। लोगों ने भोपाल के रवीन्द्र भवन में सीटों के आरक्षण  की प्रक्रिया पूर्ण करने के लिये कार्यक्रम रखा था। तब भोपाल में विधान सभा भी चल रही थी। सभी विधायकों की रूचि सीटों के आरक्षण में थी। आरक्षण के समय बहुत अधिक भीड़ थी। लेकिन असली तूफान तब आया जब कानूनी विवाद खड़े होने लगे। कुछ वर्गों ने आरक्षण के खिलाफ आपत्तियां उठाई। यह सिर्फ एक कानूनी लड़ाई नहीं थी, बल्कि वर्षों से चले आ रहे सामाजिक भेदभाव और विशेषाधिकार की लड़ाई थी। हमें नियमों, अधिनियमों और न्यायालय के निर्देशों का गहन अध्ययन करना पड़ा ताकि हम हर आपत्ति का ठोस जवाब दे सकें।


जागरूकता का दीपक जलाना


लोगों ने आरक्षण  की प्रक्रिया के विरूद्ध जबलपुर उच्च न्यायालय में प्रकरण दायक कर कोर्ट से स्थगन आदेश ले लिया। हम लोगों को आगे की चुनाव प्रक्रिया रोका देनी पड़ी। यह चुनाव शासन की प्राथमिकता थे इस कारण शासन की ओर से सर्वोच्च्य न्यायालय में अपील प्रकरण दायर किया गया। दिल्ली के बहुत बड़े वकील की सेवाऐं हायर की गई। वह मिनिट के हिसाब से फ़ीस लेते थे। उन्होंने बहस में केवल चार वाक्य बोले और हम जीत गए। लेकिन यह बहुत लम्बी लड़ाई थे। न्यायालय के स्थान के कारण लगभग एक वर्ष चुनाव नहीं हो सके। 


सबसे बड़ी चुनौती थी जागरूकता का अभाव। ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों और उम्मीदवारों को आरक्षण के प्रावधानों की जानकारी नहीं थी। हमारी टीम ने प्रशिक्षण शिविर और जागरूकता अभियान चलाए। हमने उन्हें समझाया कि यह आरक्षण सिर्फ राजनीतिक सुविधा नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का साधन है। यह उनके लिए अपनी आवाज़ उठाने और मंडी के फैसलों में हिस्सा लेने का मौका है।


इन तमाम चुनौतियों के बावजूद, हमारी मेहनत रंग लाई। हमने आरक्षण के प्रावधानों को सफलतापूर्वक लागू किया। मंडी चुनाव एक साधारण प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक समावेशी और लोकतांत्रिक महोत्सव बन गए। हमारी टीम ने बहुत मेहनत कर बिना किसी बाधा के मंडियों के चुनाव सम्पन्न कर लिए थे। चुनाव आयोग के बाहर पहली बार प्रशासनिक स्तर पर सीधे वोटर से मंडी जनप्रतिनिधि चुनकर आये थे। यह जीत सिर्फ हमारी नहीं, बल्कि उन सभी लोगों की थी जिन्हें पहली बार मंडी के फैसलों में समान अवसर मिला। यह एक ऐसा कदम था जिसने सामाजिक न्याय को मंडी के दरवाजे तक पहुँचाया।


 एक नया अध्याय

मध्य प्रदेश मंडी बोर्ड, जहाँ किसान अपनी उपज लेकर आते हैं, वहाँ की दीवारों के पीछे एक और ही कहानी चल रही थी। यह कहानी थी सत्ता की, प्रभाव की, और दशकों से चली आ रही तबादलों की एक अंतहीन जंग की। हर विधायक, हर सांसद, यहाँ तक कि हर छोटा-बड़ा राजनेता इस खेल का हिस्सा बनना चाहता था। एक कर्मचारी को कहाँ जगह मिलेगी, यह तय करने में उनकी अपनी गहरी दिलचस्पी होती थी। यह एक ऐसी व्यवस्था थी जिसमें परिवर्तन लाना लगभग असंभव माना जाता था।

और इसी असंभव को संभव बनाने का सपना देख रहे थे हमारे मुख्यमंत्री जी। वह जानते थे कि मंडी व्यवस्था में सुधार लाना कितना जरूरी है। उनकी इसी इच्छा ने हमारे नए प्रबंध संचालक को एक मुश्किल स्थिति में डाल दिया। न चाहते हुए भी, उन्हें सबसे अधिक संवेदनशील माने जाने वाले स्थापना शाखा का प्रभार मुझे सौंपना पड़ा। मुझे पता था कि यह ज़िम्मेदारी फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों भरी राह है। यह एक ऐसी लड़ाई थी, जिसकी शुरुआत ही हार से होती दिख रही थी।

मैंने जब इस बोर्ड की गहनता को समझा, तो पाया कि यह एक विशालकाय वटवृक्ष की तरह था, जिसकी जड़ें बहुत गहरी थी। 1973 में गठित इस बोर्ड का उद्देश्य भले ही किसानों की सेवा था, लेकिन इसकी संरचना में सत्ता के कई केंद्र बन चुके थे। भोपाल में मुख्यालय से लेकर प्रदेश के सात क्षेत्रीय कार्यालयों - भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, सागर, जबलपुर और रीवा तक, हर स्तर पर अपनी-अपनी दुनिया बसी हुई थी।

सबसे ज़्यादा रसूख और भ्रष्टाचार का केंद्र थीं "ए-ग्रेड" मंडियाँ। ये वो जगहें थीं जहाँ व्यापार का बड़ा खेल होता था, जहां पैसा और प्रभाव दोनों ही अपनी चरम पर थे। इन मंडियों में उन्नत शेड, इलेक्ट्रॉनिक तौल कांटे और किसानों के लिए विश्राम गृह जैसी सुविधाएं तो थीं, लेकिन इन सुविधाओं का लाभ अक्सर दलालों और भ्रष्ट अधिकारियों तक ही सीमित रहता था।

यह सब देखकर मैं समझ गया था कि सिर्फ़ तबादले करने से कुछ नहीं होगा। इस व्यवस्था को बदलने के लिए एक कठोर कदम उठाना होगा। मैंने एक ऐसा फैसला लिया जिसने सब को चौंका दिया। मैंने शासन से विशेष अनुमति ली और इन "ए-ग्रेड" मंडियों में राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को नियुक्त किया। यह एक ऐसा दाँव था जिसने रातों-रात पूरे खेल को पलट दिया। इन अधिकारियों का सीधा संबंध राज्य सरकार से था, जिससे स्थानीय राजनेताओं और मंडी माफियाओं का प्रभाव कम होने लगा।

यह एक शुरुआत थी। भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरी यह छोटी-सी लड़ाई शायद अभी पूरी नहीं हुई थी, पर इस एक कदम से किसानों में एक नई उम्मीद जगी थी। यह उम्मीद थी कि अब उन्हें भी अपनी मेहनत का सही फल मिलेगा, बिना किसी डर के, बिना किसी शोषण के। मंडी बोर्ड की पुरानी कहानी में अब एक नया, दिलचस्प अध्याय जुड़ चुका है।

मंडी की तकदीर: एक साहसिक फैसला

उस दिन विभागीय समीक्षा बैठक का माहौल हमेशा की तरह औपचारिक था, पर जब मुख्यमंत्री जी की नजर मुझ पर रुकी, तो लगा जैसे हवा थम गई हो। उनके शब्दों में एक आदेश नहीं, एक उम्मीद थी। उन्होंने सीधा मुझसे कहा, “रवीन्द्र, मैं चाहता हूँ कि मध्य प्रदेश की मंडियों सिर्फ़ व्यापार के केंद्र न रहें, वे हमारे किसानों की तकदीर बदलें। तुम इस व्यवस्था को सुधारो।” यह एक चुनौती थी, जिसे स्वीकार करना मेरे लिए अनिवार्य था।

मुख्यमंत्री जी के इन शब्दों ने मुझे एक नई यात्रा पर भेज दिया। मैंने देश की सबसे बड़ी और सबसे सफल मंडियों का अध्ययन करने का निर्णय लिया। मैंने पंजाब, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्यों का दौरा किया, वहाँ के नियमों को समझा, किसानों और व्यापारियों से बात की। मैंने देखा कि कहीं गल्ला और सब्जियों के लिए एक ही कानून था, तो कहीं दोनों को अलग-अलग नज़र से देखा जाता था।

इसी गहन अध्ययन के बाद मुझे एक बड़ी बात समझ में आई। दालें, गेहूं और चावल जैसे गल्ला की प्रकृति अलग होती है, जबकि टमाटर, प्याज और आलू जैसी सब्जियां तुरंत खराब हो जाती हैं। इन दोनों के लिए एक ही नियम और एक ही प्रक्रिया बनाना किसानों और व्यापारियों दोनों के साथ अन्याय था। इस समझ ने मुझे दो अलग-अलग उप-विधियाँ तैयार करने की प्रेरणा दी - एक गल्ले के लिए और दूसरी फल एवं सब्जियों के लिए। यह एक ऐसा मौलिक बदलाव था, जिसकी जरूरत वर्षों से थी।

लेकिन असली साहसिक फैसला तो अभी बाकी था। मंडियों को सुधारने के लिए पैसे की ज़रूरत थी। मैंने एक जोखिम भरा प्रस्ताव रखा: मंडी कर को एक रुपये से बढ़ाकर दो रुपये किया जाए। यह फैसला आसान नहीं था, लेकिन मैंने उसके पीछे एक पारदर्शी योजना रखी।

बढ़े हुए कर से मिलने वाले अतिरिक्त पैसे का आधा हिस्सा, यानी एक रुपया, मैंने सीधे ग्रामीण सड़कों के विकास के लिए सुरक्षित कर दिया। इस कदम से किसानों को अपनी उपज मंडी तक लाने में सुविधा मिलती, जिससे उन्हें उनकी मेहनत का बेहतर दाम मिल पाता। बाकी बचे पचास पैसे में से पच्चीस पैसे का उपयोग इनोवेशन फंड बनाने के लिए किया गया। यह फंड प्रोडक्शन कमिश्नर की अध्यक्षता में स्थापित किया गया, जिसका उद्देश्य मंडियों के काम करने के तरीके में बदलाव लाने वाले नए और इनोवेटिव विचारों को आर्थिक सहायता देना था। चाहे वह सरकारी हो या गैर-सरकारी, हर उस प्रोजेक्ट को मदद मिलेगी, जो मंडी व्यवस्था को आधुनिक और किसान-हितैषी बनाए।

इस फैसले के बाद, मंडी बोर्ड अब सिर्फ एक कर वसूलने वाली संस्था नहीं रह गया था। यह बदलाव और नवाचार का एक केंद्र बन रहा था। यह एक ऐसा परिवर्तन था, जो सिर्फ कागज़ों पर नहीं, बल्कि आने वाले समय में मध्य प्रदेश के हर किसान की जिंदगी में दिखाई देता।

सामाजिक परिवर्तन की गाथा

मैं अपनी आँखों से उस युग के पतन को देख रहा था, जब नैतिकता एक आदर्श हुआ करती थी। यह सिर्फ एक बदलाव नहीं था, बल्कि एक धीमी, खामोश क्रांति थी जो समाज की आत्मा को धीरे-धीरे छलनी कर रही थी। ईमानदारी और उसूलों की बात अब सिर्फ बूढ़ी दीवारों पर टंगी तस्वीरों या पुरानी किताबों में सुनाई देती थी।

रिश्वत का नया चेहरा: जब पाप का सौदा कला बन गया

रिश्वतखोरी ने अपना स्वरूप इतना बदल लिया था कि वह एक कला का रूप ले चुकी थी। अब नोटों की गड्डियाँ पुरानी बात हो गई थी। सत्ता के गलियारों में अब 'पाप का सौदा' नए अंदाज़ में होता था। यहां रिश्वत के बदले विंटेज शराब की बोतलें, जिनकी कीमत हज़ारों में होती थी, विदेशी यात्राओं के टिकट जो सपनों से भी महंगे थे, चमचमाती कारें और ब्रांडेड कपड़ों के ढेर किए जाते थे। और सबसे भयानक था, जब इस सौदे में इंसानियत को भी दाँव पर लगा दिया जाता था, जहाँ 'कॉल गर्ल्स' और 'सुविधाएं' एक नया और खतरनाक चलन बन गई थीं। यह सिर्फ लेन-देन नहीं था; यह एक ऐसा खेल था जहाँ हर खिलाड़ी अपनी आत्मा बेच रहा था।

सफलता का नया पैमाना: पैसा ही धर्म, पैसा ही कर्म

समाज में अब धन कमाना एक अच्छी बात नहीं, बल्कि एक पूजा बन गया था। पैसा ही अब एकमात्र देवता था, जिसकी हर कोई उपासना कर रहा था। सफलता का मापदंड सिर्फ पैसा था। यह कोई नहीं पूछता था कि यह पैसा कैसे कमाया गया है, क्योंकि अब सिर्फ मंजिल मायने रखती थी, रास्ता चाहे कितना भी काला क्यों न हो। आयातित वस्तुएं ही नहीं, बल्कि अब त्यौहार भी विदेश से उधार लिए जाने लगे थे। हमारी संस्कृति की पहचान माने जाने वाले पर्वों पर पश्चिमी उत्सवों, जैसे वैलेंटाइन डे, फादर्स डे, और मदर्स डे, की छाया पड़ने लगी थी। रिश्तों की गर्माहट ग्रीटिंग कार्ड्स की ठंडी चमक में खो गई थी।

टेक्नोलॉजी का आगमन: एक छोटा सा यंत्र, एक बड़ी सी दुनिया

और इन सब के बीच, एक नई क्रांति ने दस्तक दी। एक छोटा सा यंत्र, जो एक दिन हर किसी के हाथ में आने वाला था मोबाइल फोन। यह सिर्फ एक तकनीक नहीं थी, बल्कि एक नए युग का संकेत था। एक ऐसा युग जहाँ दूरियाँ तो घट रही थीं, लेकिन दिलों के बीच की दूरियाँ बढ़ रही थीं। मैंने अपनी आँखों से इस पूरे परिवर्तन को देखा, महसूस किया और जाना कि यह सिर्फ समाज का बदलना नहीं, बल्कि उसकी रूह का बदलता था।

मंडी की एक नाटकीय कहानी

एक तूफान उठ रहा था, खेतों की मिट्टी से नहीं, बल्कि किसानों के सपनों से। मध्य प्रदेश की धरती पर फसल का पैटर्न तेजी से बदल रहा था। जीविकोपार्जन की जगह अब 'कैश क्रॉप' यानी नकद फसलें बोई जा रही थीं। लेकिन इस नए दौर में, मंडी का पुराना ढांचा चरमरा रहा था। मैं अपनी आँखों से देख रहा था कि मंडी, जो किसानों को तीन मुख्य गारंटी देने के लिए बनी थी  सही दाम, सही तौल और समय पर भुगतान वह अपनी ही बनाई दीवारों में कैद होकर रह गई थी।

जब फसल सिर्फ एक मुट्ठी भर मिट्टी थी

किसान अपनी मेहनत की पूरी फसल को लेकर मंडी पहुँचता था, लेकिन उसकी फसल की कोई ग्रेडिंग नहीं होती थी। भारत या राज्य सरकार ने पहले सौदे के लिए कोई गुणवत्ता मानक (Fair Average Quality - FAQ) तय नहीं किए थे। इसका सीधा फायदा व्यापारियों को मिलता था। एक-दो दाने हाथ में लेकर, ज़रा-सी नमी भाँपकर, वे फसल की कीमत लगाते थे। यह बोली सिर्फ एक कीमत नहीं थी, बल्कि किसान के पूरे साल की मेहनत का मोल-भाव था। व्यापारी उसकी अध मिश्रित फसल को खरीदते, फिर उसकी ग्रेडिंग करते, और ऊँचे दामों पर बेचकर मोटा मुनाफा कमाते थे। यह देखकर मेरा मन बेचैन हो उठता था। मंडी की स्थापना का जो महान उद्देश्य था, वह सिर्फ कागजों की शोभा बनकर रह गया था।

एक क्रांतिकारी विचार और कड़वी हकीकत

मुझे लगा कि इस व्यवस्था को बदलना होगा। मैंने एक क्रांतिकारी विचार पर काम शुरू किया 'एडवांस ब्रेनलेस मंडी'। मेरा सपना था कि किसान को अपनी पूरी फसल मंडी तक लाने की ज़रूरत ही न पड़े। सिर्फ एक छोटा-सा सैंपल देखकर ही उसकी फसल की नीलामी हो जाए। जब अच्छे दाम मिले, तो वह सौदा करे और फसल सीधे व्यापारी के गोदाम तक जाए। इससे किसान को अपनी फसल मजबूरी में बेचने से मुक्ति मिल जाती।

लेकिन यह विचार राजनीतिक गलियारों में एक तूफान लेकर आया। राजनेताओं को यह व्यवस्था इतनी एडवांस लगी कि वे इसे लागू करने के पक्ष में नहीं थे। उन्होंने इस बदलाव को रोकने की हर संभव कोशिश की। मैं जानता था कि राजनीति और जमीन की हकीकत में बहुत फर्क होता है।

गेम चेंजर: 'सौदा पत्रक' का जन्म

जब मेरा सपना टूट रहा था, तब मैंने हार नहीं मानी। मैंने एक नया रास्ता निकाला— 'सौदा पत्रक' की व्यवस्था। यह एक ऐसी गेमचेंजर व्यवस्था थी, जिसके तहत कोई भी व्यापारी सीधे किसान के गाँव या खेत से फसल खरीद सकता था। इस प्रणाली ने प्राइवेट मंडियों के दरवाजे खोल दिए। मध्य प्रदेश देश का पहला राज्य बना जिसने इस व्यवस्था को लागू किया और यह व्यवस्था आज भी चल रही है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ITC जैसी कंपनियों का 'चौपाल सागर' जैसे खरीदी केंद्र खोलना, जो इसी व्यवस्था की देन थी।

होलोग्राम का वार: नकली पास का अंत

एक और बड़ी चुनौती थी नकली ट्रांजिट पास की। जब फसल एक मंडी से दूसरी मंडी या राज्य से बाहर जाती थी, तो व्यापारियों को मंडी से एक ट्रांजिट पास मिलता था। कुछ धूर्त व्यापारियों ने इसके नकली होलोग्राम वाले पास छपवा लिए थे, जिसमें भारी मात्रा में राजस्व का नुकसान हो रहा था। मैंने अपने मंत्री जी को इस समस्या से अवगत कराया और उन्हें होलोग्राम तकनीक का उपयोग करने के लिए राजी किया। मध्य प्रदेश फिर एक बार देश का पहला राज्य बना, जिसने इस तकनीक को अपनाया और नकली पास के कारोबार पर लगाम लगाई।

मेरे इस सफर में मैंने सीखा कि एक विचार को जमीन पर उतारना कितना मुश्किल हो सकता है, लेकिन अगर नियत साफ हो, तो हर बाधा पार की जा सकती है। यह सिर्फ नियम बदलने की कहानी नहीं थी, यह उस व्यवस्था को बदलने की कहानी थी, जिसमें किसान की मेहनत का असली मोल खो गया था।

मंडी की एक दर्दनाक दास्तान

मेरा बचपन खेतों की मिट्टी और फसलों की खुशबू में बीता था। मैं भी उन लाखों किसानों में से एक था, जो अपनी मेहनत का फल मंडी में बेचने जाते थे। मैंने अपनी आँखों से मंडी को सिर्फ एक बाज़ार नहीं, बल्कि एक युद्ध का मैदान बनते देखा था जहाँ किसान अपनी फसल के साथ नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान और उम्मीदों के साथ आता था।

मंडी का रंगमंच: नाटक, झूठ और लूट

मंडी के दरवाज़े पर ही लूट का खेल शुरू हो जाता था। सबसे पहले, एक छोटे-से मंदिर के नाम पर दान के रूप में एक कनस्तर अनाज छीन लिया जाता था। यह सिर्फ दान नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था में प्रवेश की पहली कीमत थी, जहाँ धर्म की आड़ में अधर्म का खेल खेला जाता था।

फिर किसान अपनी फसल का ढेर मंडी के चबूतरे पर लगाता था। यह ढेर उसके सपनों का ढेर था। लेकिन, सैकड़ों व्यापारी उस ढेर को हाथ में लेकर, उसकी क्वालिटी देखते, और बेतरतीब ढंग से जमीन पर गिरा देते। ये बिखरे हुए दाने उन महिलाओं के लिए रोज़गार बन जाते थे जो झाड़ू लगाकर उन्हें इकट्ठा करतीं और बदले में व्यापारियों के यहाँ दिहाड़ी पर काम करतीं। यह एक ऐसा चक्र था जहाँ हर कोई, यहाँ तक कि सबसे गरीब भी, किसान की मेहनत पर पल रहा था।

खुली नीलामी का ढोंग रचा जाता था। व्यापारी पहले से तय किए गए अंतिम दाम के हिसाब से बोली लगाते थे। यह नीलामी नहीं, बल्कि एक पूर्वनिर्धारित नाटक था। एक-एक क्विंटल माल तोलते समय, तोलने वाला हर बार 400 ग्राम का "झटका" देता था एक सूक्ष्म, लेकिन दर्दनाक चोरी जो किसान की जेब काटती थी। और अगर किसान को तुरंत पैसे चाहिए होते, तो दो प्रतिशत का "कैश डिस्काउंट" काट लिया जाता था। इस पूरे खेल में किसान के हाथ में जो पैसा आता था, वह उसकी मेहनत का नहीं, बल्कि लूट के बाद बचा हुआ टुकड़ा होता था।

दुष्चक्र: खेती का घाटा, किसान का टूटना

मैंने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एग्रीकल्चर, जयपुर के कार्यक्रमों में भाग लेकर समझा कि यह समस्या सिर्फ मंडी की नहीं, बल्कि एक गहरे दुष्चक्र की है। हमारे देश में उत्तराधिकार कानून के कारण ज़मीन लगातार बंट रही है। एक किसान की ज़मीन जब उसके बच्चों में बंटती है, तो खेती की ज़मीन छोटी होती जाती है।

एक तरफ, हमारे अनाज के अंतिम खरीदार बड़े व्होलसेलर, प्रोसेसर और एक्सपोर्टर को भारी मात्रा में, एक जैसी गुणवत्ता वाली फसल और कम दाम चाहिए। दूसरी तरफ, हमारा छोटा किसान ये तीनों शर्तें पूरी नहीं कर पाता। जब वह खाद-बीज खरीदने जाता है, तो उसे फैक्ट्री और खुद के बीच के चार लोगों को मुनाफा देना पड़ता है। और जब वह अपनी फसल बेचने जाता है, तो उसे सात लोगों का मुनाफा चुकाना पड़ता है, क्योंकि वह अपनी फसल का सौदा सीधे अंतिम ग्राहक से नहीं कर पाता। यह वही दुष्चक्र है जिसने खेती को एक घाटे का सौदा बना दिया है।

बदलता समाज: जब सम्मान का अंत हुआ

एक समय कहावत थी- "उत्तम खेती, मध्यम बान, अधम चाकरी भीख निदान।" यानी खेती सबसे उत्तम, व्यापार मध्यम और नौकरी सबसे निकृष्ट काम है। लेकिन आज यह कहावत पलट गई है। अब "अधम चाकरी" (नौकरी) ही सबसे बड़ा आकर्षण है। आज कोई भी युवा अपनी इच्छा से किसान नहीं बनना चाहता; जो खेती कर रहे हैं, वे मजबूरी में कर रहे हैं।

यह सिर्फ आर्थिक घाटे की बात नहीं थी, यह खेती के प्रति सम्मान के पतन की कहानी थी। इस सेक्टर में बदलाव की बहुत ज़रूरत है-एक ऐसा बदलाव जो इस दुष्चक्र को तोड़े, और किसान को उसकी मेहनत का सही दाम और उसका खोया हुआ सम्मान वापस दिलाए।

मंडी सुधारों का अधूरा सपना

मेरे मंडी सुधारों के कई सपने पूरे हुए थे, लेकिन 'ब्रेनलेस मंडी' का सपना आज भी अधूरा है। यह एक ऐसी टीस है जो मुझे बार-बार कचोटती है। मशहूर शायर गालिब का शेर याद आता है:

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले,

बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।

मेरे अरमान भी बहुत निकले, लेकिन खेती और किसान की हालत में जो क्रांतिकारी बदलाव मैं लाना चाहता था, वह अधूरा रह गया। मैं जानता हूँ कि किसी न किसी को तो इस बदलाव का वाहक बनना होगा। किसी के सीने में तो वो आग ज़रूर होगी जो इस व्यवस्था को पूरी तरह से बदल सके।

बाज़ार का दुष्चक्र और राजनीति का खेल

यदि हम वाकई खेती को बचाना चाहते हैं, तो बाज़ार की व्यवस्था को बदलना ही होगा। यह सिर्फ सरकार के बस की बात नहीं है; किसानों को भी खुद आगे आकर इस बदलाव का हिस्सा बनना होगा। यह एक ऐसा सेक्टर है जहां वोट बैंक की राजनीति के कारण कोई भी नेता दखल देना नहीं चाहता।

कुछ समय पहले, सरकार ने तीन नए कानून लागू किए थे, जिनमें मंडी व्यवस्था को बदलने का प्रयास किया गया था। लेकिन किसान आंदोलन के कारण सरकार को झुकना पड़ा और ये कानून वापस ले लिए गए। यह एक ऐसा मौका था जब एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती थी, लेकिन राजनीति और जनता के आक्रोश के आगे सब कुछ थम गया।

अधूरा काम और एक उम्मीद की किरण

सरकार की उस हार के बाद से इस सेक्टर में कोई नई पहल नहीं की गई है। ऐसा लगता है कि इस जटिल समस्या को सुलझाने का साहस अब किसी में नहीं है। 'ग्रेनलेस मंडी' का सपना आज भी मेरे ज़हन में ज़िंदा है किसान की मेहनत को सही कीमत दिलाने का सपना, उसे बिचौलियों के चंगुल से छुड़ाने का सपना। मुझे विश्वास है कि एक दिन यह सपना ज़रूर पूरा होगा, क्योंकि जब तक किसान की हालत नहीं सुधरेगी, तब तक हमारा देश पूरी तरह से तरक्की नहीं कर सकता। मंडी के भीतर, मेरे द्वारा किए गए सुधारों की गूँज हवा में गूंज रही थी, और इसने कुछ शक्तिशाली लोगों को बेचैन कर दिया था।

ये वो दौर था जब मध्य प्रदेश में कुल विपणन योग्य अधिशेष (marketable surplus) का केवल 55% ही मंडियों के माध्यम से आता था। बाकी का 45% व्यापार मंडी के बाहर, नियमों से दूर होता था। मेरा लक्ष्य स्पष्ट था: इस पूरे व्यापार को मंडी के भीतर लाना, जिससे किसानों को उनके उपज का सही दाम मिले और सरकार को भी राजस्व का लाभ हो।

मैंने ऐसे नियम लागू किए जो बिचौलियों की मनमानी पर लगाम लगा रहे थे। किसानों को उपज का सही वजन और उचित मूल्य मिल रहा था। लेकिन मेरे इस काम से इंदौर और कटनी के कुछ बड़े व्यापारी बुरी तरह तिलमिला गए थे। वे सालों से चले आ रहे अनौपचारिक तंत्र से मुनाफा कमा रहे थे, और मेरे सुधार उनके इस स्थापित साम्राज्य को हिला रहे थे। उनकी बेचैनी बढ़ती गई और जल्द ही, उन्होंने एक ही मांग को लेकर संगठित होना शुरू कर दिया 'मंडी बोर्ड से इस अधिकारी को हटाया जाए!'

मुझे याद है, उन दिनों हर दिन एक नई चुनौती सामने आती थी. व्यापारियों के प्रतिनिधिमंडल भोपाल तक अपनी शिकायतें पहुंचाते थे। वे मेरी छवि खराब करने की हर संभव कोशिश कर रहे थे। लेकिन मैं अपने इरादों पर अडिग था। मैं जानता था कि मैं सही काम कर रहा हूं, और यही मेरी सबसे बड़ी ताकत थी।

परंतु, यह सब ज्यादा दिनों तक नहीं चल सका. एक दिन, मेरे पास सरकार का आदेश आया मुझे मंडी बोर्ड से हटाकर कलेक्टर पन्ना के पद पर तैनात कर दिया गया। यह मेरे लिए आश्चर्य की बात थी, लेकिन मैं समझ गया था कि यह व्यापारियों के दबाव का ही नतीजा था। उनके संगठित विरोध ने आखिरकार अपना काम कर दिया था।

मेरी विदाई एक नए अध्याय की शुरुआत थी। मंडी बोर्ड में मेरा काम अधूरा रह गया था, लेकिन मैंने जो बदलाव शुरू किए थे, उनकी छाप वहां मौजूद थी। मैं जानता था कि यह केवल जगह का बदलाव है, मेरे काम करने के तरीके का नहीं। पन्ना में एक नई चुनौती मेरा इंतजार कर रही थी, और मैं उसके लिए पूरी तरह से तैयार था।

पन्ना कलेक्टर 

जब मेरा स्थानांतरण मंडी बोर्ड से हुआ और मैं पन्ना कलेक्टर के रूप में पदस्थ हुआ, तो मेरे मन में कई सवाल थे। मंडी में मेरे सुधारों ने व्यापारियों को बेचैन कर दिया था और शायद इसी का नतीजा था यह स्थानांतरण। मैं उस शहर के बारे में बहुत कुछ नहीं जानता था, सिवाय इसके कि यह हीरों की नगरी है। लेकिन जब मैंने पन्ना की धरती पर कदम रखा, तो एक बिल्कुल नई दुनिया मेरे सामने थी। यह सिर्फ एक ज़िला नहीं था, बल्कि कहानियों, इतिहास और प्रकृति का एक जीवंत संगम था।


पन्ना: हीरो से भरी हुई एक अनमोल कहानी


महाराजा छत्रसाल की शौर्य गाथाएं मेरे दिल में बस गई। जिस तरह उन्होंने मुगलों के खिलाफ संघर्ष कर बुंदेलखंड को एक स्वतंत्र राज्य के रूप में स्थापित किया और पन्ना को अपनी राजधानी बनाया, वह मुझे बहुत प्रेरित करता है। मैंने उन पुरानी इमारतों और मंदिरों को देखा जो उनकी दूरदर्शिता और वास्तुकला का प्रमाण है। लोगों ने मुझे बताया कि छत्रसाल को हीरों की खानों का पता चला था, जिससे उनके राज्य को आर्थिक मजबूती मिली। यह जानना अद्भुत था कि जिस शहर को मैं संभालने आया हूँ, उसकी नींव एक ऐसे महान योद्धा ने रखी थी, जिसे "बुंदेलखंड का शेर" कहा जाता है। पन्ना में एक कहावत चलती है "छत्ता तेरे राज में, धक-धक धरती होय। जित-जित घोड़ा पग धरे, तित-तित हीरा होय।"


जंगल की चुप्पी और फिर से गूँजती हुई दहाड़


कलेक्टर के रूप में मेरी एक बड़ी जिम्मेदारी पन्ना टाइगर रिजर्व को समझना था। मुझे उस कहानी ने बहुत प्रभावित किया, जब यहाँ एक भी बाघ नहीं बचा था। एक जंगल का वीरान हो जाना कितना दुखद होता है, यह मैंने महसूस किया।


फिर मैंने उस 'बाघ पुनर्स्थापना योजना' के बारे में जाना। बांधवगढ़, कान्हा और पेंच से लाई गई बाघिनों और बाघों ने इस जंगल को फिर से जीवन दिया। विशेष रूप से, बाघिन T-2 की कहानी, जिसने 21 शावकों को जन्म दिया, मुझे उम्मीद और संघर्ष का प्रतीक लगी। यह सिर्फ एक जानवर की कहानी नहीं थी, बल्कि प्रकृति की हार न मानने की भावना की कहानी थी। एक पर्यटक की तरह, मैं भी जंगल सफारी पर गया और मैंने महसूस किया कि यहाँ की हवा में सिर्फ शांति नहीं, बल्कि एक नए जीवन की ऊर्जा भी है। मुझे उन चीतलों के झुंड और सांभर के बच्चों की मासूमियत याद है, और हाँ, वह पल भी जब मैंने दूर से एक बाघिन को पानी पीते देखा। यह दृश्य मेरे दिल में हमेशा के लिए बस गया।


मंदिरों की दिव्यता और कला की विरासत


पन्ना की यात्रा धार्मिकता के बिना अधूरी है। यहाँ के मंदिरों में जो शांति और आध्यात्मिकता है, वह शब्दों में बयां नहीं की जा सकती।


जुगल किशोर जी मंदिर में श्री कृष्ण की मूर्ति में जड़े हीरों को देखकर मुझे इस शहर की असली पहचान का एहसास हुआ। यह मंदिर सिर्फ एक पूजा स्थल नहीं है, बल्कि बुंदेलखंड की आस्था का केंद्र है।बुन्देलखण्ड में एक लोक गीत गाया जाता है -‘पन्ना के जुगल किशोर मुरलिया में हीरा जड़े है' बहुत प्रसिद्ध है।  


बलदेव जी मंदिर की वास्तुकला ने मुझे बहुत हैरान किया। लंदन के सेंट पॉल कैथेड्रल की तर्ज पर बना यह मंदिर, भारतीय और पश्चिमी शैलियों का एक अद्भुत संगम है। यहाँ के 16 नंबर का रहस्य, जो भगवान कृष्ण की 16 कलाओं का प्रतीक है, मुझे मंत्रमुग्ध कर गया।


प्राणनाथ जी मंदिर की कहानी ने मेरे दिल को छू लिया। सभी धर्मों के बीच एकता का संदेश देने वाला यह मंदिर, सचमुच एक आध्यात्मिक केंद्र है। यहाँ के चमत्कारी 'कड़े' के बारे में सुनकर लोगों की आस्था का गहरा एहसास हुआ।


पद्मावती देवी मंदिर, जिसके नाम पर इस शहर का नाम पड़ा, यहाँ की शक्ति और इतिहास को दर्शाता है।


केन नदी: प्रकृति की कलम से लिखी गई कविता


मेरे कार्यकाल के दौरान केन नदी मेरे लिए सिर्फ एक नदी नहीं, बल्कि पन्ना की आत्मा बन गई। मैंने विंध्य की पहाड़ियों से निकलकर इसकी यात्रा को महसूस किया। पांडव जलप्रपात और रनेह फॉल्स की सुंदरता को देखकर लगा जैसे प्रकृति ने अपने हाथों से इस जगह को सजाया है। केन नदी घड़ियालों और बाघों का घर है। मुझे यह जानकर बहुत अच्छा लगा कि इस नदी के पानी से पत्थरों पर प्राकृतिक रूप से चित्रकारी होती है, जिन्हें शजर कहा जाता है, और ये दुनिया भर में प्रसिद्ध हैं।


पन्ना में मेरा पहला कदम, मंडी बोर्ड के काम से मिली निराशा के बाद उठा था। लेकिन इस शहर ने मुझे हीरों, बाघों, प्राचीन मंदिरों और एक नदी की कहानियों से भर दिया। यह केवल एक ज़िला नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास और संस्कृति का खजाना है। यहाँ का हर दिन एक नई कहानी सिखाता है। मुझे गर्व है कि मैं इस अविस्मरणीय शहर का हिस्सा हूँ।



पन्ना का ऐतिहासिक महल: कलेक्टर कार्यालय 


पन्ना जिले का कलेक्टर कार्यालय शहर के गौरवशाली इतिहास का एक अभिन्न अंग है, क्योंकि यह एक ऐतिहासिक महल में स्थित है। पन्ना का कलेक्टर कार्यालय (कलेक्ट्रेट) शहर के पुराने और भव्य राजमहल में स्थित है। यह महल ब्रिटिश काल में बनाया गया था और इसे अपनी शानदार वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह कोई आम सरकारी इमारत नहीं, बल्कि एक ऐसा भवन है जो पन्ना के राजसी अतीत को दर्शाता है। यह महल पन्ना शहर के केंद्र में, तहसील परिसर और पुलिस अधीक्षक कार्यालय के पास स्थित है।


वास्तुकला: महल की वास्तुकला में राजपूताना और ब्रिटिश शैलियों का मिश्रण देखने को मिलता है। इसमें बड़े-बड़े गलियारे, ऊँची छतें और मजबूत दीवारें हैं, जो उस समय के निर्माण की गुणवत्ता को दर्शाती हैं। महल के बाहर एक बड़ा मैदान और बगीचा भी है, जो उसकी सुंदरता को और बढ़ाता है।


ऐतिहासिक महत्व: यह महल कभी पन्ना रियासत के शासकों के शाही निवास और प्रशासनिक केंद्र के रूप में कार्य करता था। भारत की स्वतंत्रता के बाद, जब पन्ना रियासत का भारतीय संघ में विलय हुआ, तो इस महल को सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।


वर्तमान उपयोग: आज, इस ऐतिहासिक इमारत में जिले के मुख्य प्रशासनिक कार्यालय संचालित होते हैं। कलेक्टर, अतिरिक्त कलेक्टर, और अन्य महत्वपूर्ण प्रशासनिक अधिकारी यहीं से जिले के शासन-प्रशासन का कार्य संभालते हैं। इस प्रकार, यह भवन न केवल पन्ना के इतिहास का एक हिस्सा है, बल्कि वर्तमान में भी जिले के विकास और प्रबंधन का केंद्र बना हुआ है।


कलेक्टर कार्यालय का एक ऐतिहासिक महल में होना, पन्ना की समृद्ध विरासत का प्रमाण है, जहाँ इतिहास और आधुनिक शासन का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।



पन्ना कलेक्टर निवास: पहाड़ी पर बसे एक महल का अनुभव


जब मैं पहली बार पन्ना के कलेक्टर के रूप में कार्यभार संभालने आया, तो सबसे बड़ा आश्चर्य मुझे तब हुआ, जब मुझे बताया गया कि मेरा निवास एक ऊँची पहाड़ी पर बने ऐतिहासिक भवन में है। जैसे-जैसे मेरी गाड़ी पहाड़ पर चढ़ रही थी, मेरे दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं।


गाड़ी रुकी और मैं उस इमारत के सामने था, जो किसी महल से कम नहीं लग रही थी। यह कोई सामान्य सरकारी आवास नहीं था, बल्कि पन्ना के गौरवशाली इतिहास का एक हिस्सा था। मैं जैसे ही मुख्य द्वार से अंदर गया, मुझे चारों तरफ की शांति ने अचंभित कर दिया। हवा में एक अलग ही सुकून था, और सामने से दिखने वाला नज़ारा अविश्वसनीय था।


निवास के परिसर में प्रवेश करते ही, मेरी नज़रें एक विशाल पुराने बरगद के पेड़ पर टिक गईं।  इसकी जड़ें दूर-दूर तक फैली हुई थीं, और इसकी विशाल शाखाओं ने पूरे बगीचे को अपनी छाँव में ले रखा था। यह पेड़ सिर्फ एक पेड़ नहीं था, बल्कि पन्ना के इतिहास का एक मूक गवाह था। मुझे लगा जैसे यह बरगद का पेड़ मुझे और मेरे निवास को दशकों से देख रहा है। इसकी छाया में बैठना एक अलग ही अनुभव था, मानों वह मुझसे कोई पुरानी कहानी कहने की कोशिश कर रहा हो।


मेरे निवास की छत से, पूरा पन्ना शहर मेरे कदमों में सिमटा हुआ था। शाम का समय था, और दूर क्षितिज पर सूरज डूब रहा था।  सूरज की लालिमा पूरे शहर को एक सुनहरी चादर की तरह ढक रही थी। शहर की रोशनी धीरे-धीरे जगमगा रही थी, और मैं उस शानदार दृश्य को बस देखता रह गया। 


उस पहाड़ी की चोटी से एक और नज़ारा था, जिसने मेरा मन मोह लिया - वह थी पन्ना तालाब।  तालाब का शांत पानी, शहर की हलचल से दूर, एक आईने की तरह लग रहा था। उसमें सूरज की आखिरी किरणें अपनी परछाई बना रही थीं। मुझे बताया गया कि यह झील शहर के लिए बहुत महत्वपूर्ण है और इसका सौंदर्य रात में और भी बढ़ जाता है, जब इसकी सतह पर तारों और चंद्रमा का प्रतिबिंब बनता है। मैंने अपनी आँखों से देखा कि कैसे इतिहास और प्रकृति ने मिलकर इस जगह को एक अनूठी पहचान दी है।


मेरे निवास के चारों ओर घने पेड़ थे, और सुबह-सुबह पक्षियों की चहचहाहट से मेरी नींद खुलती थी। खिड़की से झाँकने पर, मैं दूर तक फैले जंगल को देख सकता था। यह एहसास अद्भुत था कि एक तरफ मैं आधुनिक प्रशासन चला रहा हूँ और दूसरी तरफ, प्रकृति और इतिहास की गोद में हूँ।


यह पहाड़ी पर स्थित निवास मेरे लिए सिर्फ एक घर नहीं था, बल्कि पन्ना की आत्मा को महसूस करने का एक जरिया था। यह मुझे हर दिन याद दिलाता था कि जिस शहर की मैं सेवा कर रहा हूँ, वह कितना खूबसूरत, ऐतिहासिक और प्रकृति से जुड़ा हुआ है। और उस विशाल बरगद के पेड़ की छाया में बैठकर, मुझे हमेशा यह प्रेरणा मिलती थी कि मुझे भी उसकी तरह ही स्थिरता और मजबूती के साथ अपने कर्तव्य का पालन करना है।


कलेक्टर पन्ना: बुंदेलखंड के संघर्ष और प्रशासन का तनाव


पन्ना में मेरा पहला साल, एक तूफान की तरह था। कलेक्टर की कुर्सी पर बैठकर मैंने महसूस किया कि यह सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि ज़िम्मेदारियों और चुनौतियों का पहाड़ है। हर सुबह एक नई समस्या लेकर आती थी।


रोजमर्रा की समस्याएँ और तनाव


बुंदेलखंड की गरीबी यहाँ की सबसे बड़ी सच्चाई थी। मैंने देखा कि गाँवों में लोग पानी और रोज़गार के लिए किस तरह संघर्ष कर रहे हैं। जब बारिश कम होती थी, तो गाँवों में पानी का संकट गहरा जाता था, और लोग मेरे दफ़्तर के बाहर जमा हो जाते थे।  हर व्यक्ति की अपनी कहानी थी, और हर कहानी मेरे लिए एक नई चुनौती थी। स्वास्थ्य सेवाएँ, शिक्षा की कमी और बिजली की किल्लत, ये सब मेरे रोज़मर्रा के काम का हिस्सा बन गए थे। मुझे अक्सर देर रात तक दफ़्तर में बैठकर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए योजनाएँ बनानी पड़ती थीं।


राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार


प्रशासन में काम करते हुए मुझे जल्द ही पता चला कि यहाँ की स्थानीय राजनीति कितनी गहरी है। हर फ़ैसले पर राजनीतिक दबाव रहता था। कोई नेता अपने समर्थक का काम करवाना चाहता था, तो कोई ठेकेदार अपने पक्ष में फ़ैसला चाहता था। मेरे लिए यह बहुत मुश्किल था कि मैं निष्पक्ष रहकर काम करूँ। कुछ भ्रष्ट तत्वों ने मुझे भी अपने जाल में फँसाने की कोशिश की, लेकिन मैं अपने सिद्धांतों पर अड़ा रहा। मैंने तय किया था कि मैं किसी भी तरह के दबाव में आकर गलत काम नहीं करूँगा।


लक्ष्य प्राप्ति और उम्मीद


इन चुनौतियों के बावजूद, काम करने का एक बड़ा कारण था लक्ष्य प्राप्ति। सरकार की योजनाएं, जैसे कि ग्रामीण विकास, रोजगार या प्रधानमंत्री आवास योजना, को जमीन पर उतारना मेरा मुख्य उद्देश्य था।  मुझे याद है, जब एक गाँव में हर घर को शौचालय मिला, तो लोगों के चेहरों पर जो ख़ुशी थी, वह मेरे लिए सबसे बड़ा पुरस्कार था। जब मैंने देखा कि एक किसान को  बीमा योजना से उसे नुकसान की भरपाई हुई, तो मुझे लगा कि मेरा काम सार्थक हो रहा है। ये छोटी-छोटी सफलताएँ ही थीं जो मुझे आगे बढ़ने की ताक़त देती थीं।


स्थानीय राजनीति और उम्मीदों का बोझ


स्थानीय राजनीति में जातिगत समीकरण और आपसी गुटबाजी बहुत हावी थी। मुझे अक्सर इन गुटों के बीच संतुलन बनाकर चलना पड़ता था। कभी-कभी लगता था कि मैं विकास के काम कर रहा हूँ या बस आग बुझाने वाला हूँ।


मैं कह सकता हूँ कि पन्ना में मेरा समय बहुत ही चुनौतीपूर्ण था, लेकिन संतोषजनक भी। यहाँ की मिट्टी, यहाँ के लोग और यहाँ का संघर्ष, सबने मुझे बहुत कुछ सिखाया। हर रात जब मैं पहाड़ी पर अपने निवास से नीचे शहर की जगमगाती रोशनी को देखता था, तो मुझे यह एहसास होता था कि ये सिर्फ़ रौशनी नहीं है, बल्कि उम्मीद की किरणें हैं, और मुझे इन उम्मीदों को पूरा करने के लिए लगातार काम करते रहना है।  


पन्ना: एक प्रशासनिक क्रांति की गाथा

पन्ना, जिसे सदियों से हीरे की खदानों के लिए जाना जाता था, अब एक नए तरह के चमकने के लिए तैयार था। यह चमक थी एक अभूतपूर्व प्रशासनिक क्रांति की, जिसकी शुरुआत एक साधारण से विचार से हुई थी: 

गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना और जनता को सशक्त बनाना।

यह कहानी है एक ऐसे दूरदर्शी प्रशासन की, जिसने भोपाल के वातानुकूलित कमरों में बनी योजनाओं को जमीन पर उतारने का बीड़ा उठाया। यह देखना था कि क्या बंद कमरों के कागजी घोड़े असल में दौड़ पाते हैं या नहीं। और यहीं से शुरू हुआ पन्ना जिले को एक मॉडल जिला बनाने का सफर, जिसे मध्य प्रदेश के इतिहास में पहली बार लागू किया जा रहा था।

बदलाव की शुरुआत: गांव की धड़कन को महसूस करना

पहला कदम था अधिकारियों को उनकी चारदीवारी से बाहर निकलना। यह फैसला किया गया कि अधिकारी ने सप्ताह में पांच दिन गांवों का भ्रमण करेंगे और रातें वहीं गुजारेंगे। यह सिर्फ एक दौरा नहीं था, बल्कि गांव की धड़कन को समझने, उनकी समस्याओं को firsthand जानने और ग्रामीणों के साथ एक रिश्ता कायम करने का एक प्रयास था।

अगला बड़ा कदम था जनसुनवाई को एक नया आयाम देना। यह सिर्फ शिकायतें सुनने का मंच नहीं था, बल्कि एक सार्वजनिक मंच था जहाँ जनता और अधिकारी आमने-सामने बैठते थे, अपनी बात रखते थे और वहीं पर फैसले किए जाते थे। यह पारदर्शिता और जवाबदेही की एक नई मिसाल थी, जिसने जनता का प्रशासन पर विश्वास बढ़ाया।

ग्राम स्वराज: प्रशासन में जनता की भागीदारी

इस क्रांति का सबसे क्रांतिकारी पहलू था ग्राम स्वराज समितियों को मजबूत करना। समिति के सदस्यों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में प्रशिक्षित किया गया, जिससे वे केवल नाम के सदस्य न होकर, प्रशासन के काम में भागीदार बन गए। अब स्थानीय स्तर के कर्मचारियों के आकस्मिक अवकाश, हितग्राहियों का चयन, योजनाओं का कार्यान्वयन और सत्यापन जैसे महत्वपूर्ण कार्य इन समितियों की निगरानी में होने लगे।

कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के लिए एक सख्त नियम बनाया गया: वेतन का भुगतान तभी होगा, जब कर्मचारी अपने मुख्यालय में निवास करेगा, नियमित भ्रमण करेगा और प्रगति के आंकड़ों का सत्यापन होगा। इससे काम में लापरवाही की गुंजाइश खत्म हो गई।

योजनाएं जमीन पर, बदलाव आंखों के सामने

विकास योजनाओं की सफलता का आकलन करने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया गया। विभिन्न योजनाओं के हितग्राहियों का सम्मेलन आयोजित किया गया, जहाँ उनसे सीधे योजनाओं की गुणवत्ता और लाभ के बारे में पूछा गया। यह एक तरह का सीधा फीडबैक सिस्टम था, जिसने योजनाओं में सुधार के लिए valuable insights दिए।

विकास को वैज्ञानिक तरीके से करने के लिए GIS सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया। इसकी मदद से जिले की एकीकृत विकास योजना का निर्माण हुआ, जिससे यह सुनिश्चित हो सका कि योजनाएं तर्कसंगत और गुणवत्तापूर्ण हों। इस प्रक्रिया में त्रिस्तरीय पंचायत राज संस्थाओं को भी शामिल किया गया, ताकि वे अपने क्षेत्र के विकास के लिए बेहतर निर्णय ले सकें।

एक और महत्वपूर्ण बदलाव था नकद राशि के स्थान पर सामग्री का वितरण। इससे भ्रष्टाचार पर लगाम लगी और यह सुनिश्चित हो सका कि लाभ सीधे जरूरतमंद तक पहुंचे।

सम्मान और सकारात्मकता: एक नई कार्य संस्कृति

किसी भी बदलाव को सफल बनाने के लिए यह जरूरी है कि इसमें शामिल लोगों को प्रेरित किया जाए। पन्ना में अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक तनाव मुक्त वातावरण बनाया गया, जहां वे पूरी क्षमता से काम कर सकें। उनकी उपलब्धियों को सार्वजनिक रूप से सराहा गया और उन्हें इसका श्रेय दिया गया। इससे उनमें एक सकारात्मक ऊर्जा का संचार हुआ और विभाग तथा आम जनता के बीच उनकी छवि बेहतर हुई।

एक प्रयोगशाला से राष्ट्रीय प्रेरणा तक

पन्ना अब केवल एक जिला नहीं, बल्कि प्रशासनिक प्रयोगों की एक प्रयोगशाला बन गया था। यहाँ लागू किए गए बदलाव पूरे प्रदेश के लिए एक उदाहरण बन गए थे। गाँव की सभाएं अब केवल सरकारी बैठकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि ग्रामीण उत्सवों में बदल गई थी। देश-विदेश से लोग इन ग्राम सभाओं को देखने आ रहे थे।

प्रशासनिक बदलावों के कारण जनभागीदारी बहुत बढ़ गई थी। अब निर्णय केवल अधिकारी नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि और अधिकारियों की समितियां मिलकर कर रही थी। यह एक सहयोगात्मक निर्णय-प्रक्रिया थी, जिसने पन्ना में एक ऊर्जावान और सकारात्मक माहौल बना दिया था। यह कहानी सिर्फ पन्ना की नहीं, बल्कि इस बात की है कि अगर सही सोच और दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो कोई भी बदलाव संभव है, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न लगे।

बेशक! प्रशासनिक बदलावों को लागू करना जितना सुनने में रोमांचक लगता है, जमीनी स्तर पर उतनी ही चुनौतियां भी आती हैं। आइए, कुछ प्रमुख चुनौतियों पर बात करते हैं:

1. प्रतिरोध और जड़ता (Resistance and Inertia)

सबसे बड़ी चुनौती अक्सर पुरानी व्यवस्था में काम कर रहे लोगों का प्रतिरोध होता है। जब कोई नई प्रणाली आती है, तो अधिकारी और कर्मचारी जो सालों से एक खास तरीके से काम कर रहे होते हैं, वे बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं करते। उन्हें लगता है कि इससे उनका काम बढ़ जाएगा या उनकी शक्ति कम हो जाएगी। यह जड़त्व (inertia) बदलाव की गति को धीमा कर देती है। कुछ लोग तो जानबूझकर भी नई नीतियों का विरोध करते हैं क्योंकि उन्हें अपनी सुविधा और प्रभाव में कमी का डर होता है।

2. राजनीतिक हस्तक्षेप और जन प्रतिनिधियों का असहयोग (Political Interference and Lack of Support)

भले ही योजनाएं जनता के हित में हों, लेकिन कई बार स्थानीय नेताओं या जन प्रतिनिधियों का सहयोग नहीं मिल पाता। वे बदलावों को अपनी राजनीतिक पकड़ के लिए खतरा मान सकते हैं। जैसे, जब नकद राशि के बजाय सामग्री वितरण की बात हुई, तो बिचौलिए और कुछ नेता इसका विरोध कर सकते हैं, क्योंकि इससे उनकी कमाई पर असर पड़ता है। प्रशासनिक बदलावों को सफल बनाने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और समर्थन बहुत जरूरी होता है।

3. संसाधनों की कमी और तकनीकी चुनौतियां (Lack of Resources and Technical Challenges)

GIS सॉफ्टवेयर जैसी तकनीक का इस्तेमाल करना बहुत अच्छा है, लेकिन कई बार आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर, प्रशिक्षण और वित्तीय संसाधनों की कमी होती है। गाँव में इंटरनेट कनेक्टिविटी, बिजली, या कर्मचारियों के पास कंप्यूटर चलाने का कौशल न हो, तो ये योजनाएं सिर्फ कागजों तक ही सीमित रह जाती हैं। तकनीक को लागू करने के लिए शुरुआती निवेश और लगातार रखरखाव की आवश्यकता होती है।

4. जनता की अपेक्षाओं का बोझ (The Burden of Public Expectations)

जब जनता देखती है कि प्रशासन सक्रिय हो गया है और उनकी शिकायतों पर तुरंत सुनवाई हो रही है, तो उनकी अपेक्षाएं बहुत बढ़ जाती हैं। हर समस्या का समाधान तुरंत हो जाए, ऐसी उम्मीद होने लगती है। यदि प्रशासन सभी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता, तो जनता का विश्वास डगमगा सकता है। इसलिए, उम्मीदों को सही तरीके से प्रबंधित करना एक बड़ी चुनौती होती है।

5. परिणामों को टिकाऊ बनाना (Making the Results Sustainable)

एक प्रशासक के कार्यकाल तक तो बदलाव दिखाई दे सकते हैं, लेकिन जब उनका तबादला हो जाता है, तो अक्सर नई व्यवस्था ध्वस्त हो जाती है। अगली सरकार का अगला अधिकारी इन नीतियों को जारी रखने में दिलचस्पी न ले, तो किए गए सारे प्रयास व्यर्थ हो सकते हैं। इसलिए, बदलावों को टिकाऊ बनाने के लिए उन्हें संस्थागत रूप देना (institutionalizing reforms) और कानूनों का हिस्सा बनाना जरूरी होता है।

ये चुनौतियां किसी भी बड़े बदलाव के साथ आती हैं, लेकिन अगर नेतृत्व मजबूत हो और जनता का समर्थन मिले, तो इन पर पार पाया जा सकता है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए कई नीतियां अपनाई जा सकती हैं, जो प्रशासनिक बदलावों को न केवल लागू करने में, बल्कि उन्हें टिकाऊ बनाने में भी मदद करती हैं।

1. संवाद और प्रशिक्षण

सबसे पहले, प्रतिरोध को खत्म करने के लिए संवाद और प्रशिक्षण बहुत ज़रूरी है। अधिकारियों और कर्मचारियों को यह बताना चाहिए कि नए बदलाव क्यों लाए जा रहे हैं और इससे उन्हें क्या फायदा होगा। उन्हें नई तकनीकों और प्रक्रियाओं का प्रशिक्षण देना चाहिए ताकि वे आत्मविश्वास के साथ काम कर सकें। इस प्रक्रिया में कर्मचारियों को भागीदार बनाना चाहिए, न कि केवल आदेशों का पालन करने वाला।

2. राजनीतिक नेतृत्व का समर्थन

प्रशासनिक बदलावों को सफल बनाने के लिए उच्च राजनीतिक नेतृत्व का समर्थन बहुत महत्वपूर्ण है। मुख्यमंत्री या कैबिनेट स्तर से इन बदलावों को समर्थन मिलना चाहिए। इससे निचले स्तर के अधिकारियों को एक स्पष्ट संकेत मिलता है कि ये सुधार गंभीर हैं। जनप्रतिनिधियों को भी इन बदलावों में शामिल करना चाहिए, उन्हें समझाना चाहिए कि ये उनके क्षेत्र के विकास के लिए कितने अहम हैं।

3. पारदर्शिता और जवाबदेही

जनसुनवाई और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाना चाहिए ताकि जनता सीधे प्रशासन से जुड़ सके। इससे पारदर्शिता बढ़ती है और भ्रष्टाचार पर लगाम लगती है। जब जनता को पता होता है कि क्या हो रहा है, तो वे भी बदलावों का समर्थन करने लगते हैं। अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के लिए सख्त नियम बनाए जाने चाहिए, ताकि वे अपने काम को गंभीरता से लें।

4. पुरस्कार और प्रोत्साहन

जो अधिकारी और कर्मचारी बेहतर काम करते हैं, उन्हें सार्वजनिक रूप से सम्मानित और पुरस्कृत किया जाना चाहिए। इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिलती है और एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा का माहौल बनता है। जब लोग देखते हैं कि अच्छा काम करने पर तारीफ मिलती है, तो वे भी पूरी लगन से काम करने लगते हैं।

5. संस्थागत सुधार (Institutional Reforms)

बदलावों को टिकाऊ बनाने के लिए उन्हें संस्थागत रूप देना जरूरी है। यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नए नियम और प्रक्रिया कानूनी ढांचे का हिस्सा बनें, ताकि किसी अधिकारी के तबादले के बाद भी वे जारी रखें। पंचायतों और स्थानीय निकायों को और अधिक अधिकार देकर उन्हें सशक्त बनाना चाहिए, ताकि वे अपनी जिम्मेदारी निभाते रहें।

1. संवाद और प्रशिक्षण की शक्ति

पन्ना में अधिकारियों और कर्मचारियों को भागीदार बनाया गया, न कि केवल आदेशों का पालन करने वाला। उन्हें ग्राम स्वराज समितियों के सदस्यों के साथ मिलकर काम करने के लिए प्रशिक्षित किया गया। जनसुनवाई के दौरान जब अधिकारी और नेता आमने-सामने होते थे, तो यह एक तरह से कर्मचारियों के लिए भी प्रशिक्षण का मौका होता था, जहां उन्हें जनता की समस्याओं को समझने और उनका समाधान करने की जिम्मेदारी दी जाती थी।

2. राजनीतिक समर्थन का आधार

पन्ना के कलेक्टर ने न सिर्फ स्थानीय विधायकों और सांसदों को इन सुधारों के बारे में बताया, बल्कि उन्हें ग्राम स्वराज समितियों और जनसुनवाई में भी शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया। जब जनप्रतिनिधि खुद इन बदलावों को समर्थन देते थे, तो इसका प्रभाव पूरे जिले में दिखाई देता था। निर्णय अकेले अधिकारी नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि और अधिकारियों की समितियां मिलकर लेती थीं, जिससे एक सहयोगात्मक माहौल बना।

3. पारदर्शिता और जवाबदेही के नए मानक

जनसुनवाई को एक सार्वजनिक मंच बनाने का मकसद ही पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ाना था। जब कोई फैसला सबके सामने होता था, तो उसमें मनमानी की गुंजाइश कम हो जाती थी। इसके अलावा, कर्मचारियों के वेतन को उनके काम से जोड़ना (जैसे मुख्यालय में निवास और भ्रमण का सत्यापन) एक सीधा और प्रभावी तरीका था, जिससे उनकी जवाबदेही तय हो सके।

4. पुरस्कार और सम्मान की संस्कृति

अधिकारियों और कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने की परंपरा शुरू की गई। उनके अच्छे कामों को सराहा गया और उनकी उपलब्धियों का श्रेय उन्हें दिया गया। इससे विभाग में एक सकारात्मक ऊर्जा और गर्व का भाव पैदा हुआ, और लोग अपनी पूरी क्षमता से काम करने के लिए प्रेरित हुए।

5. संस्थागत बदलाव

पन्ना में जो भी सुधार हुए, उन्हें सिर्फ एक प्रशासक के कार्यकाल तक सीमित नहीं रखा गया। ग्राम सभाओं को "ग्रामीण उत्सव" का रूप देना और ग्राम स्वराज समितियों को अधिकार देना, ये ऐसे कदम थे जिन्होंने बदलावों को संस्थागत बना दिया। जब देश-विदेश के लोग इन ग्राम सभाओं को देखने आने लगे, तो इन सुधारों की महत्ता और भी बढ़ गई, जिससे इन्हें भविष्य में भी जारी रखने का दबाव बना रहा।

इन रणनीतियों ने पन्ना को एक प्रयोगशाला बना दिया, जहाँ प्रशासनिक बदलावों को सफलतापूर्वक लागू करके दिखाया गया कि जनभागीदारी और सशक्त नेतृत्व से कोई भी चुनौती पार की जा सकती है।

 प्रशासन, संगीत और मनोविज्ञान 

पन्ना की धरती, जो कभी हीरों के लिए जानी जाती थी, अब एक और अनमोल चमक से रोशन हो रही थी - बदलाव की चमक। यह कहानी सिर्फ प्रशासनिक सुधारों की नहीं, बल्कि एक ऐसे प्रयोग की है जिसने सरकारी दफ्तरों की नीरस दीवारों को आशा, विश्वास और उत्साह के गीतों से भर दिया। यह उस दौर की कहानी है, जब पस्तोर डॉक्ट्रिन को पन्ना के प्रशासन ने अपनी आत्मा में उतार लिया।

गीत से शुरू हुई क्रांति: "हम होंगे कामयाब"

यह एक अनोखी शुरुआत थी। हर शासकीय बैठक की शुरुआत, किसी औपचारिक भाषण से नहीं, बल्कि एक गीत से होती थी - "हम होंगे कामयाब एक दिन।" सभी लोग खड़े होते, अपना दायाँ हाथ कंधे तक उठाकर शपथ लेते और एक सुर में गाते। यह सिर्फ एक गीत नहीं था, यह एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग तथा। प्रशासन का मानना था कि भावनाएँ गद्य में केवल कही जा सकती हैं, महसूस नहीं की जा सकतीं। लेकिन जब उन्हें पद्य और संगीत में ढाला जाता है, तो वे सीधे व्यक्ति के डी.एन.ए. का हिस्सा बन जाती हैं। प्रेम और धर्म की तरह, विश्वास और एकजुटता की भावना भी इसी तरह गहरे तक उतरती है।

इस गीत ने टीम पर जादू-सा असर किया। जहां पहले बहाने और समस्याओं का रोना था, वहाँ अब समाधान खोजने की एक सकारात्मक ऊर्जा थी। बैठकों में जब यह गीत गूंजता, तो सभी रोमांचित हो जाते। उनका मन, जो कल तक डर और निराशा से भरा था, अब "मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास" के साथ भर जाता था।

डांट नहीं, जोक सुनाने का तरीका

प्रशासन में एक और क्रांतिकारी बदलाव आया - डांट की जगह हास्य का प्रयोग। परंपरा के अनुसार, अगर कोई अधिकारी गलती करता, तो वह मानकर चलता था कि उसे कलेक्टर से एक स्तर की डांट तो सुननी ही होगी। वह मानसिक रूप से तैयार होकर बैठक में आता था।

पर पन्ना में यह परंपरा टूट गई। जब कोई अधिकारी गलती करता, तो उसे डांटने के बजाय, कलेक्टर एक मजेदार जोक सुना देते। पूरा कमरा ठहाकों से गूंज उठता, और वह अधिकारी भी दूसरों के साथ हंस देता। यह सार्वजनिक अपमान से बचने का एक तरीका था, लेकिन इसका असली मकसद कुछ और था। यह अप्रत्याशित व्यवहार उस अधिकारी को चौंका देता था। डांट सुनने की उम्मीद में आए व्यक्ति को जब हंसी मिलती, तो वह ढीठ या बेशर्म होने के बजाय, अपने व्यवहार और काम को सुधारने के लिए प्रेरित होता था। यह एक मनोवैज्ञानिक दांव था जो पूरी तरह से सफल रहा।

कार्यालयों का मेकओवर: सफाई और प्रशिक्षण की मुहिम

बदलाव सिर्फ मानसिकता में नहीं, बल्कि परिवेश में भी आया। हर कार्यालय में सफाई अभियान चलाया गया। पुराने और बेकार पड़े रिकॉर्ड को नियम के अनुसार नष्ट किया गया और हर दफ्तर में एक व्यवस्थित रिकॉर्ड रूम बनाया गया। टूटे फर्नीचर को ठीक करवाया गया और सरकारी भवनों को एक ही रंग से रंगा गया, ताकि वे दूर से ही अपनी पहचान बना सकें। यह छोटे-छोटे कदम थे, लेकिन इन्होंने कार्यालयों में एक सकारात्मक माहौल बनाने में बहुत मदद की।

इन सभी बदलावों की नींव थी प्रशिक्षण (Training)। प्रशासन का मानना था कि असली बदलाव फर्नीचर या कंप्यूटर से नहीं, बल्कि व्यक्ति से आता है, और प्रशिक्षण उसका एकमात्र विकल्प है। इसी सोच के साथ, ग्राम स्वराज संस्थान की स्थापना हुई। चित्रकूट विश्वविद्यालय की मदद से एक पुरानी सरकारी इमारत को इस संस्थान का रूप दिया गया। श्री श्याम बोहरे जी, एक जुनूनी और अनुभवी ट्रेनर, को इसका प्रभार दिया गया।

जिले के सभी विभागों का प्रशिक्षण बजट इकट्ठा करके इस संस्था को दिया गया। एक साल के अंदर, यह संस्थान 80 लोगों के रहने की व्यवस्था, मेस और 40 कंप्यूटरों से लैस हो गया। यह अपने संसाधनों से किया गया एक अद्भुत काम था। इस संस्थान में सिर्फ अधिकारियों और कर्मचारियों को ही नहीं, बल्कि ग्राम स्वराज की 7 समितियों के 84,000 सदस्यों को भी प्रशिक्षण दिया गया। यह एक अभूतपूर्व कदम था जिसने बदलाव को जमीनी स्तर तक पहुंचाया।

बदनाम से बेहतरीन तक का सफर

पन्ना, जो कभी निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम था, और जहाँ दंड स्वरूप अधिकारियों को भेजा जाता था, अब पूरी तरह से बदल रहा था। इन प्रयासों से जिले की छवि एक मॉडल और प्रेरणादायक जिले के रूप में उभर रही थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव अपनी हर बैठक में पन्ना के प्रशासन का उदाहरण देते थे, जो इन बदलावों की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण था।

यह कहानी दिखाती है कि जब एक प्रशासक अपनी सोच को संगीत, मनोविज्ञान और समर्पण के साथ मिला देता है, तो वह न केवल एक जिले की कार्यप्रणाली को बदल सकता है, बल्कि उसकी आत्मा को भी एक नई दिशा दे सकता है।

जब हीरों की धरती ने प्रशासनिक क्रांति का नया अध्याय 

सदियों से पन्ना का नाम सुनते ही लोग हीरों की चमक के बारे में सोचते थे। पर यह कहानी हीरों की नहीं, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा अनमोल चमक की है  बदलाव की चमक की। यह उस प्रशासक की दास्तान है, जिसने बंद कमरों में बनी योजनाओं को ज़मीन पर उतारने का बीड़ा उठाया और एक बदनाम जिले को पूरे देश के लिए एक प्रेरणादायक प्रयोगशाला में बदल दिया।

परिवर्तन की नींव: जब अधिकारी गांव की धड़कन समझने लगे

यह कहानी सिर्फ फ़ाइलों और बैठकों की नहीं, बल्कि सीधे लोगों से जुड़ने के एक अनूठे प्रयास से शुरू हुई। प्रशासक का पहला कदम था अधिकारियों को उनकी एयर कंडीशनिंग की दुनिया से बाहर निकालना। यह तय हुआ कि सभी अधिकारी सप्ताह में पाँच दिन गाँवों का भ्रमण करेंगे और वहीं रात गुजारेंगे। इसका मकसद सिर्फ़ निरीक्षण नहीं, बल्कि गाँव की धड़कन को महसूस करना था। यह एक सीधा संवाद था, जिसने जनता और प्रशासन के बीच की खाई को पाटना शुरू कर दिया।

इसी कड़ी में एक और ऐतिहासिक पहल हुई  जनसुनवाई को एक नया आयाम दिया गया। यह एक ऐसा सार्वजनिक मंच बन गया, जहां जनता और अधिकारी आमने-सामने बैठकर बात करते, समस्याओं पर बहस होती और वहां तत्काल फैसले लिए जाते थे। यह पारदर्शिता का एक ऐसा प्रयोग था, जिसने जनता का विश्वास जीता और प्रशासन को जवाबदेह बनाया।

इस बदलाव का सबसे क्रांतिकारी हिस्सा था ग्राम स्वराज समितियों को सशक्त करना। समितियों के सदस्यों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में प्रशिक्षित किया गया, जिससे वे केवल नाम के सदस्य न रहकर, प्रशासन के काम में सीधे भागीदार बन गए। अब स्थानीय स्तर के महत्वपूर्ण निर्णय, जैसे हितग्राहियों का चयन या योजनाओं का सत्यापन, इन्हीं समितियों के हाथ में आ गए थे। कर्मचारियों की जवाबदेही तय करने के लिए एक सख्त नियम बनाया गया: वेतन तभी मिलेगा, जब उनके गाँव में रहने और काम करने का सत्यापन हो जाता।

मनोवैज्ञानिक प्रयोग: गीत और हास्य से बदलाव की बयार

पन्ना की प्रशासनिक क्रांति का एक और अनोखा पहलू था उसका मनोवैज्ञानिक आधार। प्रशासन का मानना था कि भावनाएं गद्य में कही तो जा सकती हैं, पर महसूस नहीं की जा सकतीं। उन्हें महसूस करने के लिए पद्य और संगीत का सहारा लिया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ, हर शासकीय बैठक की शुरुआत एक गीत से होती थी। सभी अधिकारी खड़े होकर, शपथ की मुद्रा में अपना दायाँ हाथ कंधे तक उठाते और एक साथ गाते थे, "हम होंगे कामयाब एक दिन..."। यह गीत केवल एक संगीत नहीं था, बल्कि विश्वास का एक इंजेक्शन था जो हर अधिकारी के डी.एन.ए. में उतर रहा था।

इस गीत ने टीम पर जादू-सा असर किया। जहां पहले हर काम से बचने के बहाने बनाए जाते थे, वहाँ अब हर समस्या का समाधान खोजने की एक नई ऊर्जा थी। बैठक नीरज बैठकों से बदलकर जोश और उम्मीद से भरी हुई सभाओं में बदल गईं।

इस अनूठे प्रयोग का दूसरा हिस्सा था 'डांट नहीं, जोक सुनाने' का तरीका। परंपरा यह थी कि गलती करने वाले अधिकारी को कलेक्टर से डांट पड़ती थी। लेकिन पन्ना में, जब कोई अधिकारी गलती करता, तो उसे डांटने के बजाय एक मजेदार जोक सुनाया जाता था। यह अप्रत्याशित व्यवहार उसे सार्वजनिक अपमान से तो बचाता ही था, साथ ही उसे चौंका देता था। डांट की जगह मिली हंसी, उस अधिकारी को ढीठ बनने के बजाय, अपने काम और व्यवहार को सुधारने के लिए प्रेरित करती थी।

परिवेश का मेकओवर: ग्राम स्वराज संस्थान की स्थापना

बदलाव केवल मानसिकता तक सीमित नहीं था। हर कार्यालय में सफाई अभियान चलाया गया, पुराने रिकॉर्ड नष्ट किए गए और फाइलों को व्यवस्थित किया गया। सभी सरकारी भवनों को एक ही रंग से रंगा गया, जिससे उनमें एकरूपता और सकारात्मकता का भाव आया।

इस क्रांति की सबसे बड़ी इमारत थी ग्राम स्वराज संस्थान। प्रशासक का मानना था कि "बदलाव फर्नीचर या कंप्यूटर से नहीं आता। बदलाव हमेशा व्यक्ति से आता है।" इसी सोच के साथ, चित्रकूट विश्वविद्यालय की मदद से एक पुरानी और खराब पड़ी सरकारी बिल्डिंग को इस संस्थान का रूप दिया गया। जिले के सभी विभागों का प्रशिक्षण बजट इकट्ठा करके यहाँ लगाया गया।

इस संस्थान ने एक साल के भीतर ही 80 लोगों के रहने की व्यवस्था कर ली, मेस और 40 कंप्यूटरों के साथ प्रशिक्षण देना शुरू कर दिया। यह सिर्फ अधिकारियों के लिए नहीं था। इस संस्थान में ग्राम स्वराज समितियों के 84,000 सदस्यों को भी प्रशिक्षण दिया गया, जिसने गाँव-गाँव तक बदलाव की लौ जलाई।

एक बदनाम जिले से प्रेरणा स्रोत बनने तक

पन्ना, जो कभी निकम्मेपन और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम था, जहाँ दंड स्वरूप अधिकारियों को भेजा जाता था, अब पूरी तरह से बदल चुका था। इस अद्वितीय प्रयास को तत्कालीन मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव का पूरा समर्थन मिला। वे अपनी हर बैठक में पन्ना का उदाहरण देते थे, जिसने जिले की छवि को पूरी तरह से बदल दिया।

पन्ना में होने वाली ग्राम सभा "ग्रामीण उत्सवों" में बदल गईं, उन्हें देखने के लिए देश-विदेश से लोग आने लगे। यह सिर्फ एक प्रशासनिक प्रयोग नहीं, बल्कि जनभागीदारी, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा से भरी एक क्रांति थी। पन्ना ने साबित कर दिया कि सही नेतृत्व और दृढ़ इच्छाशक्ति से किसी भी समाज और व्यवस्था की आत्मा को बदला जा सकता है।

पन्ना: जब कल्दा पठार पर गूंजा जहांगीरी न्याय

पन्ना की प्रशासनिक क्रांति का आगाज़ किसी भव्य समारोह से नहीं, बल्कि बारिश से भीगी एक जिद्दी शाम से हुआ था। मानसून की मूसलाधार बारिश ने पूरे ज़िले को अपनी गिरफ्त में ले रखा था और ऐसे में, उस प्रशासक ने एक ऐसा फ़ैसला लिया, जिसने सबको चौंका दिया। उन्होंने अपना पहला भ्रमण कार्यक्रम पन्ना के सबसे दुर्गम और दुर्गम क्षेत्र, कल्दा पठार से शुरू करने का निश्चय किया।

हर तरफ़ से विरोध के स्वर उठे। "बरसात में वहाँ जाना नामुमकिन है!" "रास्ते बंद हैं!" "असंभव है!" यह सब सुनकर कलेक्टर मैंने एक सीधा और सरल सवाल पूछा: "क्या वहाँ लोग रहते हैं?" जवाब मिला, "हाँ।" फिर मैंने पूछा, "क्या वे लोग बाज़ार आते हैं?" जवाब आया, "हाँ, सलेहा बाज़ार।" उस पल उनका आत्मविश्वास गरज उठा, "तो फिर वे लोग सुपरमैन हैं जो आ-जा सकते हैं और हम कमज़ोर हैं जो नहीं जा सकते? अगर मुझे उन लोगों की समस्याओं को सही मायनों में समझना है, तो मुझे उनकी मुश्किलों को ख़ुद महसूस करना होगा।"

यह फ़ैसला सिर्फ़ एक यात्रा नहीं थी, बल्कि एक मानसिक घोषणापत्र था। उनके शब्दों से अधिकारी और कर्मचारी उत्साह से भर गए।

जब सड़कों ने साथ छोड़ा और इरादे अटल हो गए

नियत दिन से तीन दिन पहले से ही लगातार बारिश हो रही थी। हम लोग गाड़ियों में सलेहा गाँव तक गए, लेकिन आगे के रास्ते कीचड़ और पानी में बदल चुके थे। वहाँ से एक ट्रैक्टर पर सवार होकर आगे बढ़े, लेकिन कुछ दूर बाद वह भी जवाब दे गया। फिर जो हुआ, वह अभूतपूर्व था। कलेक्टर को पैदल चलते देख, उनके पीछे-पीछे सारे अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि भी पैदल चलने लगे। यह कोई साधारण जुलूस नहीं था, बल्कि ज़िद और संकल्प का एक लंबा कारवाँ था, जो कीचड़ और बारिश में रास्ता बनाता चला जा रहा था। लोगों ने समझ लिया था कि यह कोई साधारण इंसान नहीं है, जो किसी भी बाधा से हार मान ले।

दिन भर पानी बरसता रहा, लेकिन यह जलूस रुका नहीं। शाम होते-होते, हम कल्दा पठार के मुख्य गाँव पहुँचे। गाँववाले आश्चर्यचकित थे। जहाँ अच्छे मौसम में कोई झाँकने तक नहीं आता था, वहाँ मूसलाधार बारिश में यह 'पागल' कलेक्टर, अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की पूरी फौज लेकर आ पहुँचा था। रात में मुझे देखने के लिए आस-पास के गाँवों से भी भीड़ उमड़ पड़ी। वन विभाग के छोटे-से गेस्ट हाउस में हमने किसी तरह रात गुजारी, जबकि बाकी सभी को ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों में ठहराया और प्रेम से खाना खिलाया।

ग्राम सभा: जहाँ आशा की किरण जगी

अगले दिन, गाँव की एक खुली जगह में ग्राम सभा का आयोजन हुआ। मेरे सामने जो मंज़र था, वह दिल दहला देने वाला था। फटे-पुराने कपड़ों में मैले-कुचैले लोग, कुपोषित बच्चे... ऐसा लग रहा था कि हम किसी सब-सहारा अफ़्रीकी गाँव में हों। उनकी आँखों में उम्मीद की एक ऐसी किरण थी, जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था। कई अधिकारी इतनी मुश्किल यात्रा और खराब माहौल से बीमार पड़ चुके थे, क्योंकि उन्हें ऐसे हालात में रहने की आदत नहीं थी। पत्रकार और फ़ोटोग्राफ़र भी इस अद्भुत नज़ारे को देखकर चकित थे।

मैंने एक अनूठा तरीक़ा अपनाया। मैंने दो माइक लगवाए थे  एक आम जनता के लिए, ताकि वे अपनी समस्याएँ सीधे बता सकें, और दूसरा संबंधित विभाग के अधिकारी के लिए, ताकि वे तुरंत जवाब दे सकें। यह किसी ने न कभी देखा था और न कभी सुना था। शुरू में लोग डर रहे थे। कुछ नेता टाइप के लोगों ने दूसरों की समस्याएँ बतानी शुरू कीं। मैंने उन्हें रोककर सीधे उन लोगों को बुलाया, जिनकी वह समस्या थी। कोई नेता नहीं, कोई बिचौलिया नहीं।

रिश्वतखोरों का अंत : जहाँगीरी न्याय तुरंत 

फिर शुरू हुआ जहाँगीरी न्याय। एक शिकायत आई कि एक कर्मचारी ने किसी से दो सौ रुपये की रिश्वत ली है। कर्मचारी ने तुरंत इनकार कर दिया, "कोई गवाह नहीं है, मैं झूठ नहीं बोल रहा।" मेरा जवाब तुरंत आया, "अगर यह झूठ बोल रहा होता, तो दो सौ रुपये नहीं, दो हज़ार या दो लाख मांगता। या तो रिश्वत के पैसे वापस करो, या पुलिस केस बनेगा और निलंबन होगा।"

मुझे पता था कि यह क़ानून के ख़िलाफ़ था, लेकिन मेरा मकसद एक कड़ा संदेश देना था। शुरुआती विरोध के बाद, पैसा, गल्ला और सामान लोग अपनी शिकायतकर्ता को वापस लौटाने लगे। इस कठोर और तत्काल कार्रवाई ने एक डर का माहौल बना दिया, लेकिन यह डर अपराधियों के मन में था।

इस क्षेत्र में एक शर्मा परिवार का भारी दबदबा था। उनकी फ़ारसी पत्थर की खदानें थीं और उन्होंने जंगल के एक बड़े हिस्से को खोद डाला था। उनके ही लोग सरपंच और पंच थे। उन्हें पूरा भरोसा था कि डर के मारे कोई शिकायत नहीं करेगा। लेकिन माहौल बदल चुका था। लोग अपनी शिकायतों का ढेर लेकर आ गए। शर्मा परिवार को उस दिन लोगों को बहुत बड़ी राशि लौटानी पड़ी।

अगले दिन यह ख़बर पूरे ज़िले में और फिर पूरे प्रदेश में आग की तरह फैल गई। प्रेस भी आ गया। अधिकारी और जनप्रतिनिधि अंदर ही अंदर नाराज़ थे, लेकिन सार्वजनिक रूप से कोई कुछ नहीं कह रहा था। मुझे इसका एहसास था, पर मेरा भरोसा जनता पर था। मेरा मानना था कि अपराधी बाहर से कितना ही मज़बूत दिखे, अंदर से वह बहुत डरा हुआ होता है, और मैं उनके उसी डर का फ़ायदा उठा रहा था।

दो दिन चला यह कैंप पन्ना के प्रशासनिक इतिहास में एक मील का पत्थर बन गया। यह सिर्फ़ एक भ्रमण नहीं, बल्कि जनता और प्रशासन के बीच विश्वास की एक नई शुरुआत थी, जिसने यह साबित कर दिया कि असली ताकत लोगों के साथ होती है।

क्या आप जानना चाहेंगे कि इस घटना के बाद पन्ना में और क्या-क्या बदलाव आए?

ग्राम सभा की शक्ति: एक अभूतपूर्व प्रयास

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और कर्मचारियों की उपस्थिति को लेकर एक गंभीर समस्या सामने आई। अधिकांश कर्मचारी आस-पास के शहरों से गांव में आते थे, और लंबी यात्रा के कारण उनको काफी समय बर्बाद होता था। इसके परिणामस्वरूप, वे अपने कर्तव्यों का सही ढंग से पालन नहीं कर पा रहे थे। एक शिक्षक की कहानी इस समस्या को उजागर करती है: दो शिक्षक एक स्कूल में बारी-बारी से अनुपस्थित रहते थे। वे निरीक्षण के समय एक बिना तारीख वाला आवेदन पत्र दिखाया और बताया कि दूसरा साथी छुट्टी पर है। इस तरह, वे दोनों मिलकर महीने में 15 दिन स्कूल से गायब रहते थे।

इसके अलावा, सरकारी योजनाओं की प्रगति की रिपोर्टिंग में भी एक बड़ी कमी थी। जो कर्मचारी योजना लागू करते थे, वह उसकी प्रगति रिपोर्ट भी भेजते थे। इस तरह की प्रणाली से, बिना काम किए ही कागज़ों पर प्रगति दिखाई जा रही थी। इस समस्या को गंभीरता से लेते हुए, एक अनोखा समाधान खोजने की कोशिश की गई।

मध्यप्रदेश पंचायती राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 में समाधान

इस समस्या का समाधान मध्यप्रदेश पंचायती राज एवं ग्राम स्वराज अधिनियम, 1993 में पाया गया। इस अधिनियम में ग्राम सभा को ग्राम स्तर के कर्मचारियों पर नियंत्रण के अधिकार दिए गए हैं। हालांकि, सरकारी सेवा नियमों में शहरों और गांवों के कर्मचारियों के बीच कोई स्पष्ट वर्गीकरण नहीं था, बल्कि कर्मचारियों को उनकी श्रेणियों (प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ) के आधार पर वर्गीकृत किया गया था। इस चुनौती का सामना करते हुए, एक नई व्याख्या प्रस्तुत की गई: "जिस कर्मचारी का मुख्यालय किस जगह है, वह उस स्तर का कर्मचारी माना जाएगा।"

ग्राम सभा का सशक्तिकरण: एक नई व्यवस्था

इस व्याख्या के बाद, जिन कर्मचारियों का मुख्यालय पंचायत स्तर पर था, उन्हें ग्राम स्तरीय कर्मचारी माना गया। इस नई व्यवस्था के तहत, ग्राम सभा की संबंधित समिति को कुछ महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए: उपस्थिति और मुख्यालय: यह सुनिश्चित करना कि कर्मचारी अपने मुख्यालय में रहें। भौतिक सत्यापन: कर्मचारियों द्वारा किए गए काम का भौतिक सत्यापन करना। वेतन प्रमाण पत्र: काम के सत्यापन के बाद ही वेतन जारी करने का प्रमाण पत्र देना। आकस्मिक अवकाश: कर्मचारियों के आकस्मिक अवकाश को स्वीकृत करना।

इस क्रांतिकारी कदम से ग्राम स्तर पर प्रशासनिक तंत्र में कसावट आई और जनता की भागीदारी से कर्मचारियों के काम की गुणवत्ता में सुधार हुआ। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि फर्जी प्रगति के आंकड़ों को पकड़ने में मदद मिली। यह पहली बार किया गया एक ऐसा अभिनव प्रयोग था, जिसने ग्रामीण प्रशासन में एक नई जान फूंक दी।

नेम प्लेट का नाटक: एक बड़ा खुलासा

सरकारी कर्मचारियों को उनके घर पर नेम प्लेट लगाना अनिवार्य किया गया, लेकिन इस पहल का नतीजा उम्मीद से अलग निकला। लोगों ने अपने गाँव में जानवरों को बांधने वाली जगहों और छोटे-छोटे कमरों पर नेम प्लेट लगाई और उन्हें अपना आवास दिखाया। कुछ कर्मचारियों ने तो फर्जी किरायानामा भी बनवा लिए, ताकि वे कागज़ों पर गाँव के निवासी दिखे, जबकि असल में वे शहरों में ही रहते थे।

इस जालसाजी को पकड़ने के लिए, एक अनोखा तरीका अपनाया गया। मैं अपनी कलेक्टर की गाड़ी गांव के बाहर छोड़ देता और पैदल ही अंदर जाता था। शुरू में जब लोग मुझे पहचान नहीं पाते थे, तो वे बड़ी सहजता से बता देते थे कि कैसे फर्जी आंकड़े तैयार किए जाते हैं, और कैसे नकली छुट्टी लेकर काम से बचा जाता है।

जालसाजी पर लगाम और कर्तव्य बोध का उदय

धीरे-धीरे, इस चालबाजी पर लगाम लगनी शुरू हो गई। कर्मचारियों के मन में अपने कर्तव्य के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए मैंने उनकी बैठक लेनी शुरू की। इसके साथ ही, एक विभाग के आंकड़ों को दूसरे विभाग के आंकड़ों से मिलाया गया ताकि सच्चाई का पता लगाया जा सके।

  • आंगनबाड़ी और स्वास्थ्य: यह देखा गया कि अगर आंगनबाड़ी ठीक से काम कर रही है, तो कुपोषित बच्चों की संख्या कम होनी चाहिए। टीकाकरण सही ढंग से हो रहा है, तो संक्रामक बीमारियां नहीं फैलता चाहिए।

  • अस्पताल और टीकाकरण: जब अस्पतालों में आकस्मिक वार्ड के आंकड़ों की जांच की गई और वहाँ बड़ी संख्या में बीमारों के आने का पता चला, तो यह स्पष्ट हो गया कि टीकाकरण अभियान ठीक से नहीं चल रहा है।

  • मृत्यु दर और बीमा: लोगों की मृत्यु के आंकड़ों का मिलान सामूहिक बीमा योजनाओं के क्लेम से किया गया। अगर मृत्यु दर बढ़ रही है, तो बीमा क्लेम की संख्या भी बढ़नी चाहिए। इस मिलान से मृत्यु के सही आंकड़े सामने आए।

यह अनोखा तरीका एक ऐसी व्यवस्था की नींव बना, जिसमें कर्मचारी जवाबदेह और जनता सशक्त हुई। इस पहल से न केवल फर्जीवाड़े पर रोक लगी, बल्कि सरकारी कामकाज में भी ईमानदारी और पारदर्शिता बढ़ी।

सती की चिंगारी: एक गांव, एक त्रासदी

पन्ना जिले के शांत, हरे-भरे परिदृश्य में बसा था पटना तमोली गांव। गांव की सरलता, उनके रीति-रिवाजों और सदियों पुरानी परंपराओं की कहानियों में सिमटी थी। इसी गांव में एक दिन, एक भयानक त्रासदी ने दस्तक दी। जब कट्टू बाई के पति की मृत्यु हुई, तो उनके दुख से भरे घर में शोक की लहर नहीं, बल्कि एक अमानवीय और बर्बर प्रथा की काली छाया मंडराने लगी। एक ऐसी प्रथा, जिसमें कानून ने 1829 में लॉर्ड विलियम बेंटिंक ने सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम और बाद में 1987 के सती (रोकथाम) अधिनियम से हमेशा के लिए दफन कर दिया था, वह फिर से जीवित हो उठी थी। 

कट्टू बाई अपने पति की मृत्यु के बाद कथित तौर पर सती हो गई। कट्टु बाई की उम्र साठ साल बताई जा रही थी। वह अपने पति से अलग रह रही थी। मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के एक छोटे से गाँव की इस  दिल दहला देने वाली घटना के सामने आने पर पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। 

गाँव के कुछ लोग, पुरानी मान्यताओं के अंधकार में डूबे हुए, कट्टू बाई को पति की चिता पर "सती" स्थल बनाने के लिए उकसाने लगे। देखते ही देखते, गाँव में भीड़ जुटने लगी। यह एक दुखद अंतिम संस्कार कम, और एक भयावह धार्मिक आयोजन ज्यादा लग रहा था।

कलेक्टर की दौड़: कानून और मानवता की लड़ाई

जब यह खबर पन्ना मेरे  कानों तक पहुँची, तो मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मेरे सामने सिर्फ एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं थी, बल्कि एक महिला के जीवन और सदियों की प्रथा को चुनौती थी। हर पल मायने रखता था। एक तरफ, गाँव के लोग सदियों पुरानी परंपरा की दुहाई दे रहे थे, और दूसरी तरफ, कानून और मानवता की रक्षा करने का कर्तव्य था। मैंने एक्शन लिया। उन्होंने भीड़ को शांत करने और कट्टू बाई को सती के रूप में महिमा मंडित करने से रोका। उसकी चिता के स्थल पर पुलिस लगा कर बचाने के लिए मैं पुलिस अधीक्षक के साथ गाँव की ओर कूच किया। मुझे पता था कि अगर हम  देर करते हैं, तो एक सती के रूप में पूजा होने पर उसे रोकना कठिन होगा। 

जब मैं वहाँ पहुँचा, तो मंजर दिल दहला देने वाला था। चिता जल कर बुझ चुकी थी। कट्टू बाई, दुःख और अंधविश्वास के बोझ तले, चिता में कूद गई थी, और भीड़ "सती माता की जय" के नारे लगा रही थी। हवा में तनाव और अंधविश्वास की एक अजीब सी गंध थी। मैंने न केवल पुलिस बल का इस्तेमाल किया, बल्कि लोगों को समझाया कि सती प्रथा एक अमानवीय कृत्य है और यह हमारे कानून के खिलाफ है। मैंने  लोगों को राजा राम मोहन राय और सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम के बारे में बताया, और यह समझाया कि किसी भी महिला की घटना को इस तरह की क्रूर परंपरा के लिए महिमा मण्डित नहीं किया जा सकता।

शब्दों की तलवार: जब कलेक्टर ने ललकारा

मैंने सीधे भीड़ के बीच जाकर खड़े होने का फैसला किया। मेरी आवाज़ में न केवल एक अधिकारी की शक्ति थी, बल्कि एक इंसान का दर्द और न्याय का आग्रह भी था। "यह क्या कर रहे हो तुम लोग?" मैंने गरजते हुए कहा। "सती प्रथा एक अपराध है! यह हमारी संस्कृति नहीं, एक कलंक है!"

मैंने लोगों को समझाया कि कानून किसी भी महिला को आत्मदाह के लिए मजबूर करने की अनुमति नहीं देता। मैंने  उन्हें इतिहास याद दिलाया, जब राजा राममोहन राय ने इस प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी। मेरे  शब्दों  की दृढ़ता और  मानवता ने भीड़ को झकझोर दिया। एक पल के लिए, सन्नाटा छा गया। यह सन्नाटा अंधविश्वास की दीवार में पड़ी एक दरार जैसा था। उस सन्नाटे का फायदा उठाते हुए, पुलिस को उस स्थल को सुरक्षित करने के लिए कदम उठाए और कानूनी सुरक्षा प्रदान की।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया का तूफान

यह घटना केवल तमौली गाँव तक सीमित नहीं रही। इसकी खबर जंगल में आग की तरह फैली और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने उसे लपक लिया। एक-एक पल की रिपोर्टिंग की जाने लगी। जैसे ही यह घटना राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया तक पहुँची, टी.वी. चैनलों पर ब्रेकिंग न्यूज़ की बाढ़ आ गई।कुछ मीडिया चैनलों ने इसे एक धार्मिक घटना के रूप में पेश करने की कोशिश की, जिससे लोगों की भावनाएं भड़कें।

कुछ मीडिया संस्थानों ने इस घटना को "धर्म" और "परंपरा" के नाम पर महिमामंडित करने की कोशिश की, जबकि अन्य ने इसे एक सामाजिक बुराई के रूप में दिखाया। न्यूज़ चैनलों पर दिन-रात बहसें चलने लगीं, और हर तरफ से इस घटना की निंदा होने लगी। इस सनसनीखेज रिपोर्टिंग ने न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी सती प्रथा के मुद्दे को उजागर किया। इस घटना ने यह भी दिखाया कि कैसे कुछ मीडिया संस्थान अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए एक घटना को तोड़-मरोड़ कर पेश कर सकते हैं।

अन्य चैनलों ने इसे सामाजिक पिछड़ापन और कानून के उल्लंघन का उदाहरण बताया। पूरे देश में बहस छिड़ गई कि क्या भारत अभी भी ऐसी रूढ़ियों से उबर नहीं पाया है। विदेशी मीडिया ने भी इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी, जिससे भारत की छवि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। मीडिया ने इस घटना को सनसनीखेज बनाकर भले ही टीआरपी बटोरी हो, लेकिन उसने एक बड़ी सामाजिक बहस को जन्म दिया।

इस घटना ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया कि आज भी हमारे समाज में कई पुरानी और अमानवीय परंपराएं मौजूद हैं। इस घटना ने मेरी सूझबूझ और साहस को उजागर किया,  इस घटना को "धर्म" और "परंपरा" के नाम पर महिमा मंडित करने की कोशिश को रोक दिया। साथ ही, इसने मीडिया की भूमिका पर भी सवाल उठाए कि वे किसी भी घटना को किस तरह से पेश करते हैं।

लेकिन कुछ मीडिया हाउस ने मुझे टारगेट कर विशिष्ट आर्टिकल लिखे गये। मीडिया यह साबित करने पर टूल गया जैसे में कट्टु बाई को जनता था और उसे मेरे उकसाने पर यह कदम उठाया था। वह मेरे खिलाफ कार्यवाही करने तथा मेरे ट्रांसफर की मांग कर रहे थे। लेकिन जिले की जनता सब जानती थी उन्हें मुझ पर भरोसा था। उन्होंने मेरा साथ दिया। मुख्यमंत्री जी ने मेरे काम की तारीफ की तथा मेरा स्थानांतरण नहीं किया। 

अंततः मीडिया की कवरेज ने इस घटना को एक बड़ा सबक बना दिया। उसने यह दिखाया कि अंधविश्वास कितना भी गहरा हो, कानून और मानवता की मिसाल उसे हमेशा रौंद सकती है।

अक्षर अगरबत्ती: पटना तमोली की राख से निकली उम्मीद की खुशबू

पन्ना जिले पर गरीबी का स्याह साया दशकों से छाया हुआ था। यह वह जमीन थी जो बेशकीमती हीरे उगलती थी, फिर भी इसके लोग कुपोषण, अल्पविकसित कृषि और अवैध खनन के शोषण से जूझ रहे थे। हर सुबह एक संघर्ष थी और हर शाम एक नई निराशा।

इस दर्दनाक तस्वीर पर उस भयानक दिन एक और गहरा घाव लगा, जब तमौली गाँव में सती की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। उस त्रासदी की लपटें सिर्फ एक चिता तक सीमित नहीं थीं, बल्कि उन्होंने मेरे भीतर भी एक आग लगा दी। मुझे लगा कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, यह उस हताशा और खालीपन का परिणाम है जो हमारी महिलाओं को कमजोर और असहाय बना देता है। मैंने ठान लिया कि इन महिलाओं को आर्थिक रूप से इतना मजबूत करना है कि कोई भी कुप्रथा उनके जीवन को फिर से ना निकल पाए।

एक कठिन खोज और एक साधारण सा समाधान

शुरुआत में मैंने कई विकल्पों पर विचार किया। जिला पंचायत के माध्यम से आंवले का मुरब्बा बनाने का काम शुरू किया गया, लेकिन जल्द ही यह एहसास हुआ कि यह काम कुछ ही लोगों को रोजगार दे सकता है। मैं एक ऐसा समाधान ढूंढ रहा था जो हर घर तक पहुँच सके, जिसमें ज्यादा खर्च और जटिल तकनीक का उपयोग न हो।

विचारों और लोगों से चर्चा की लंबी रातों के बाद, एक साधारण-सा विचार मेरे मन में कौंध - अगरबत्ती! एक ऐसा उत्पाद जिसकी हर घर में, हर मंदिर में, साल भर माँग रहती है। इसे बनाने के लिए बहुत कम निवेश और जगह की आवश्यकता होती है, और सबसे महत्वपूर्ण, इसे महिलाएं अपने घर से ही आसानी से कर सकती थीं। यह एक ऐसा काम था जो उन्हें घर के कामकाज से समझौता किए बिना अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका देता।

'राजीव गांधी शिक्षा मिशन' के तहत एक नई सुबह

इस विचार को मूर्त रूप देने के लिए, हमने राजीव गांधी शिक्षा मिशन के सहयोग से 'अक्षर अगरबत्ती कार्यक्रम' की शुरुआत की। सबसे पहले, गरीब ग्रामीण महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को अगरबत्ती बनाने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें न सिर्फ अगरबत्ती बनाने की कला सिखाई गई, बल्कि उसकी पैकेजिंग और मार्केटिंग के गुर भी सिखाए गए। फिर, उन्हें कच्चा माल उपलब्ध कराया गया, जिससे वे बिना किसी प्रारंभिक लागत के अपना काम शुरू कर सकें।

शुरुआत में कुछ महिलाओं को हिचकिचाहट हुई, लेकिन जब उन्होंने पहली बार अपने हाथों से बनाई हुई अगरबत्तियों को बाजार में बिकते देखा और अपनी मेहनत का पैसा कमाया, तो उनकी आँखों में एक नई चमक थी। यह चमक सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि आत्म-सम्मान और स्वावलंबन की थी।

खुशियों की खुशबू और बदलाव की बयार

यह कार्यक्रम सिर्फ अगरबत्ती बनाने तक सीमित नहीं था। उसने महिलाओं के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। जहां पहले वे घर की चारदीवारी तक सीमित थी, वहीं अब वे आर्थिक निर्णय लेने में अपने पतियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी थीं। वे केवल कमा ही नहीं रही थीं, बल्कि समूह में मिलकर काम करने से उनमें एक-दूसरे का सहयोग करने की भावना भी विकसित हुई।

धीरे-धीरे, 'अक्षर अगरबत्ती कार्यक्रम' एक बड़े आंदोलन में बदल गया। उसने न केवल महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया, बल्कि उन्हें समाज में एक सम्मानजनक स्थान भी दिलाया। जिस गांव में सती की त्रासदी ने निराशा फैलाई थी, उसी गाँव से अब आत्मनिर्भरता और आत्मविश्वास की खुशबू आने लगी थी। यह साबित हो गया कि एक छोटा सा विचार, अगर सही नीयत से किया जाए, तो वह सबसे गहरी गरीबी और निराशा को भी खत्म कर सकता है।

भैया राजा

मेरी पोस्टिंग जब पन्ना के कलेक्टर के रूप में हुई, तो मुझे लगा कि मैं एक शांत, प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर जिले में आया हूँ, जहाँ की मिट्टी में हीरे मिलते हैं। पर जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि यहाँ की मिट्टी में सिर्फ हीरो ही नहीं, बल्कि सत्ता और खौफ की गहरी जड़ें भी हैं। जिले का राजनीतिक परिदृश्य 'भैया राजा' के नाम के इर्द-गिर्द घूमता था, एक ऐसा नाम जिससे हवा में एक अलग ही गूँज थी। कुंवर वीर विक्रम सिंह, 'भैया राजा' के नाम से मशहूर, एक बाहुबली नेता थे जिनकी कहानियां यहाँ के हर नुक्कड़ पर, दबी जुबान में सुनाई जाती थी।

यह मेरे शुरुआती दिन थे। मैं रेस्ट हाउस में अपने काम में व्यस्त था कि अचानक उनके आने की सूचना मिली। जब वह मेरे सामने आए, तो मैं उन्हें देखता ही रह गया। लगभग साढ़े छह फुट के कद के, सांवले रंग के और बड़ी-बड़ी मूछों वाले व्यक्ति। को सफेद कुर्ता-पायजामा और उनके चेहरे का तेज, उनके व्यक्तित्व को एक अभिजात्य और प्रभावशाली रूप दे रहा था। पर उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसमें एक स्तनधारी का अक्खड़पन साफ झलक रहा था।

उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में मेरा अभिवादन किया और मुझे बताया कि वे सिर्फ मुझसे मिलने आए हैं। कोई काम नहीं था, बस मेरे बारे में सुनकर उत्सुकता हुई। हमारी बातचीत बहुत साधारण थी, लेकिन मैं हर शब्द को तौल रहा था। यह एक नेता द्वारा कलेक्टर को परखने की कोशिश थी, और मेरी एक बाहुबली नेता को समझने की कोशिश। उन्होंने चाय पी, अपने क्षेत्र के बारे में संक्षेप में बताया और फिर चले गए। उनकी मौजूदगी में एक अजीब सा दबाव था, एक ऐसा दबाव जो सिर्फ सत्ता के आदी लोगों में होता है।

इसके बाद, जब भी वह पन्ना आते, मुझसे मिलने ज़रूर आते। हमारी यह मुलाकातें धीरे-धीरे एक आदत बन गईं। राजनीतिक चर्चाएँ कम होती थीं, पर उनकी कहानियाँ मुझे सुनने को मिलती थीं। वह बड़ी सरलता से अपने जीवन की घटनाओं को सुनाते, जैसे कि वे स्वयं कोई शिकार हों। इन्हीं मुलाकातों के दौरान मुझे पन्ना में उनके खौफ की कहानियाँ सुनने को मिलीं। 

लोग कहते थे कि उनके इलाके में किसी की शादी हो तो दुल्हन को पहली रात भैया राजा की कोठी पर बितानी होती थी। किसी मेले या बाजार में कोई खूबसूरत लड़की दिख जाए तो उसकी किस्मत पर ताला लग जाता। वह कोठी जिसके आँगन में एक मगरमच्छों वाला तालाब था, जहाँ कहा जाता था कि वे अपने विरोधियों को मार कर मगरमच्छों को खिला देते थे। इन कहानियों से पैदा हुआ खौफ उन्हें राजनीतिक फायदा मिलता था, और शायद इसलिए वे कभी इनका खंडन नहीं करते थे।

एक बार उन्होंने हँसते-हँसते मुझे छतरपुर की अपनी कोठी, जिसे 'जल महल' कहा जाता था, की कहानी सुनाई। उन्होंने माना कि वहाँ मगरमच्छ और अजगर पाले जाते थे, पर इस बात से इनकार किया कि वे लोगों को मारकर उन्हें खिलाते थे। देहरादून में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह के भतीजे की हत्या का मामला भी उन्होंने ऐसे ही सुनाया, जैसे वह कोई मामूली बात हो। उन्होंने कहा कि कुछ लड़के शराब पीकर बहुत शोर कर रहे थे, बहस हुई और उन्होंने उसे 'शांत' कर दिया। इस 'शांति' का मतलब मैं समझ गया था।

इतना सब होने के बाद भी उनका राजनीतिक करियर बहुत ऊंचा था। वह अपने किसी भी अपराध की घटना को इतनी सहजता से बोलते, जैसे वह कोई सामान्य घटना हो। उनका नारा 'मुहर लगेगी हाथी पर, नहीं तो गोली लगेगी छाती पर' उस समय बहुत चर्चित हुआ था, और उसने काम भी किया। जब वह जेल में थे, तब भी वह चुनाव जीत गए। जनता से किया अपना वादा पूरा करने के लिए, वह विधानसभा में विधायक पद की शपथ लेने हाथी पर बैठकर गए। 

यह उस समय की एक ऐतिहासिक और चर्चित घटना थी, जिसे प्रशासन अकादमी में केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जाता था। वह यह सब मुझे बहुत हंस-हंसकर बता रहे थे, और उनकी बातों में एक अजीब सी क्रूरता थी, जिसे समझना मेरे लिए बहुत मुश्किल था।

लेकिन फिर उसकी सत्ता और खौफ का अंत भी उतना ही भयानक हुआ। भोपाल में मिसरोद के पास रेलवे ट्रैक पर एक युवा लड़की, वसुंधरा उर्फ़ निशी, की लाश मिली, जिसके सिर में गोली लगी थी। पुलिस की जांच ने उसे सीधे भैया राजा के यशोदा परिसर नामक मकान से जोड़ा। पता चला कि निशी के साथ उनके संबंध थे और जब वह गर्भवती हुई, तो उसका गर्भपात भी कराया गया था। उनके ड्राइवर ने कबूल किया कि उसी ने लाश को ठिकाने लगाया था।

इस मामले ने पुराने, दबे हुए मामलों की परतें भी खोल दीं। पन्ना की एक महिला तिज्जी बाई की लाश, जो इसी मकान की छत पर जली हुई हालत में मिली थी, उस पर फिर से जांच हुई। भैया राजा पर बलात्कार और हत्या का आरोप लगा। उनकी पत्नी, पूर्व विधायक आशारानी, भी इस मामले में दोषी पाई गईं। एक वन विभाग की महिला अधिकारी के साथ बदसलूकी का प्रकरण भी उनकी लंबी आपराधिक सूची में शामिल हो गया।

भैया राजा ने हर आरोप से इनकार किया, लेकिन अदालत ने उन्हें वसुंधरा की हत्या का दोषी माना और आजीवन कारावास की सजा सुनाई। तिज्जी बाई के मामले में उनकी पत्नी को भी दस साल की सजा हुई।

एक साल बाद, जेल में रहते हुए, कुंवर वीर विक्रम सिंह, उर्फ़ 'भैया राजा' की तबीयत बिगड़ी। उन्हें हमीदिया अस्पताल, भोपाल में भर्ती कराया गया, जहां उनकी मृत्यु हो गई।

पन्ना का 'राजा', जिसने अपनी शर्तों पर जिंदगी जी, जिसका नाम सत्ता, खौफ और अपराध का पर्याय बन गया था, उसका अंत एक गुमनाम कैदी की तरह हुआ। यह एक ऐसी त्रासदी थी जिसने मुझे हमेशा के लिए बदल दिया। यह कहानी थी, एक ऐसी कहानी जिसका अंत पहले ही लिखा जा चुका था।

जब मुख्यमंत्री ने पन्ना को सराहा

पन्ना में मेरी पोस्टिंग को दो साल हो चुके थे। हीरे की चमक वाले इस जिले में, मैंने प्रशासन को एक नई पहचान दी थी। हमारा 'ग्राम स्वराज' मॉडल, जहाँ हर काम सीधे जनता के बीच होता था, पूरे प्रदेश के लिए एक मिसाल बन चुका था। बिचौलिए और ठेकेदार मुझसे अक्सर नाराज़ रहते थे, क्योंकि मैं कोई काम उनके माध्यम से नहीं करता था। लेकिन जनता के चेहरे पर मुस्कान मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि थी।

एक सुबह, हमेशा की तरह, मोबाइल की घंटी बहुत तड़के बजी। उन दिनों मोबाइल फोन का चलन नया था, और नोकिया के फोन भारत पर राज करते थे। फ़ोन पर मुख्यमंत्री जी थे। उनकी आवाज़ में एक अजीब सा उत्साह था। उन्होंने बताया कि इस वर्ष की छब्बीस जनवरी की परेड में वे पन्ना में झंडा फहराना चाहते हैं। मेरे लिए यह किसी आश्चर्य से कम नहीं था। मुख्यमंत्री हमेशा भोपाल या इंदौर जैसे बड़े शहरों में ही राष्ट्रीय पर्व मनाते थे। पन्ना के इतिहास में पहली बार कोई मुख्यमंत्री मुख्य अतिथि बनने जा रहा था।

मेरी खुशी के साथ ही, मेरे माथे पर चिंता की लकीरें भी उभर आईं। पन्ना के नेता, जिनमें ठाकुर और ब्राह्मण गुटों की खींचतान चलती थी, मुझसे हमेशा खार खाए रहते थे। ठाकुर नेताओं के नेता मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह जी थे और ब्राह्मणों के नेता विधानसभा अध्यक्ष श्रीनिवास तिवारी जी। मैं हमेशा गुटनिरपेक्ष रहने की कोशिश करता था, लेकिन मेरे काम करने का तरीका उन्हें रास नहीं आता था।

मैंने तय किया कि मुख्यमंत्री जी का यह दौरा सिर्फ एक राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि पन्ना की आत्मा को दर्शाने वाला एक अनूठा उत्सव होगा। हमारे पास संसाधन नहीं थे, लेकिन दिमाग तो था। मैंने अपने लोक कलाकारों और ग्राम सभा के सदस्यों के साथ बैठक की। हम एक ऐसा कार्यक्रम तैयार करने निकले, जो दिल से बुंदेलखंडी हो। 

मैंने खुद 'ग्राम स्वराज' पर एक लोकगीत लिखा, और हमारे कलाकारों ने उसे कोरियोग्राफ किया। ग्राम स्वराज संस्थान में कई दिनों तक रिहर्सल चली। स्कूल के बच्चों से लेकर गाँव के पुरुष और महिला, सबने अपनी भाषा और संस्कृति में कार्यक्रम तैयार किए। हमने सबसे सुंदर झांकियां भी बनाईं, जिससे हमारी स्थानीय परंपराओं की झलक थी।

छब्बीस जनवरी की पूर्व संध्या पर मुख्यमंत्री जी पन्ना आ गए। और जैसा कि मुझे डर था, पन्ना के नेताओं ने उनकी शिकायत करने के लिए यह मौका हाथ से जाने नहीं दिया। नेताओं का एक झुंड उनसे मिला और उन्होंने मेरी हर उस पहल की शिकायत की, जो जनता के हित में थी। "साहब, यह कलेक्टर इतना गाँव-गाँव क्यों घूमता है?" "यह जन सुनवाई के शिविर लगाकर हमारी राजनीति क्यों खराब कर रहा है?" "पैसों का भुगतान सबके सामने क्यों करवाता है?" "यह विभागों की सामग्री सार्वजनिक मंचों से क्यों बँटवाता है?" हर शिकायत का सार एक ही था - मैं अपनी पारदर्शिता से उनके काम में बाधा डाल रहा था।

मेरी धड़कनें तेज हो गई थी। मुझे पता था कि मुख्यमंत्री जी रोज़ भ्रष्टाचार और काम न होने की शिकायतें सुनते हैं, लेकिन आज पहली बार वे किसी कलेक्टर के 'ज्यादा काम करने' की शिकायतें सुन रहे थे। मैं चुप रहा और सोचता रहा कि क्या मेरी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।

अगले दिन, छब्बीस जनवरी की परेड के बाद, वह ऐतिहासिक पल आया। मंच पर मुख्यमंत्री जी बैठे थे और सामने हज़ारों की भीड़। जब लगभग पाँच सौ ग्रामीण महिला-पुरुष एक जैसी बुंदेलखंडी पोशाक में मंच पर आए और ग्राम स्वराज का लोकगीत गाने लगे, तो पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उनकी ऊर्जा, उनका उत्साह और उनका नृत्य देखकर मुख्यमंत्री जी सहित सभी लोग अभिभूत हो गए थे। ऐसा लगा जैसे हम कोई आधुनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सदियों पुराने राजाओं के दरबार में कोई उत्सव देख रहे हैं।

जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो मुख्यमंत्री जी ने अपना भाषण शुरू किया। उन्होंने अपने भाषण में नेताओं द्वारा की गई हर शिकायत का एक-एक कर नाम लिया। "मुझे बताया गया है कि यहां का कलेक्टर इतना काम करता है कि नेता परेशान हो गए हैं।" भीड़ में कुछ हलचल हुई। "मुझे बताया गया है कि ये जनसुनवाई करते हैं, गाँवों में रात रुकते हैं और पैसा जनता के सामने बाँटते हैं।" फिर उनकी आवाज़ में दृढ़ता आ गई, "मैं कहता हूँ कि मेरे पन्ना के कलेक्टर बधाई के पात्र हैं। मैं उन्हें साधुवाद देता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि वे इन सभी योजनाओं को पूरी ताकत से लागू करें।"

यह मेरे लिए सिर्फ एक भाषण नहीं था, बल्कि मेरी मेहनत का सार्वजनिक प्रमाण पत्र था। उन्होंने तुरंत प्रदेश के सभी कलेक्टरों और जिला पंचायत के सीईओ को पन्ना का 'ग्राम स्वराज मॉडल' देखने के लिए निर्देश दिए। उस दिन के बाद, मेरे विरोधियों की आवाज़ दब गई थी। मैंने महसूस किया कि सत्य और समर्पण की ताकत सत्ता की राजनीति से कहीं ज्यादा मजबूत होती है। उस दिन मुख्यमंत्री जी ने सिर्फ मेरा समर्थन नहीं किया, बल्कि मेरे सिद्धांतों का भी समर्थन किया।

कमिश्नर के फर्जी आँकड़े और मेरा 'स्ट्रेस-लेस' प्रशासन

प्रशासन में कुछ बातें मेरे लिए हमेशा 'नॉन-नेगोशिएबल' रही हैं। इनमें सबसे ऊपर था- झूठे आंकड़े पेश न करना। उन दिनों मुख्यमंत्री जी ने एक सिस्टम शुरू किया था, जिसमें जिलों की रैंकिंग होती थी। हमारी रैंकिंग, हमारी परफॉर्मेंस का आईना थी। पन्ना में मैंने जब काम संभाला, तो हमारा जिला न केवल सागर संभाग में सबसे नीचे था, बल्कि पूरे प्रदेश के सबसे निचले तीन जिलों में से एक था।

हमारे कमिश्नर थे श्री देव राज विरदी, एक बहुत ही काबिल और मेहनती अधिकारी। वह चाहते थे कि हमारे संभाग की रैंकिंग अच्छी हो, ताकि मेरा तबादला न हो जाए। उनके डिप्टी कमिश्नर ने मुझसे आकर कहा, "कलेक्टर साहब, कुछ आँकड़े बढ़ा-चढ़ा कर दिखा दीजिए। फिर हम उस काम को बाद में पूरा कर लेंगे।" लेकिन यह बात मुझे मंजूर नहीं थी। मेरे लिए बिना काम के आँकड़े सुधारना अपनी आत्मा को बेचने जैसा था। हर महीने की बैठक में मैं इस बात पर अड़ा रहता था। वहीं, दूसरे कलेक्टर सागर में बैठकर आंकड़े सुधार देते थे, और मैं उनसे असहमत रहता था।

यह मेरी जिद थी या मेरा विश्वास, मैं नहीं जानता। मैंने 'स्ट्रेस-लेस एडमिनिस्ट्रेशन' के सिद्धांत पर काम करना शुरू किया। और कुछ ही महीनों में, जब पन्ना जिला प्रदेश में पहले नंबर पर आया, तो न सिर्फ मेरे कमिश्नर, बल्कि प्रदेश के कई अधिकारियों को भी यकीन नहीं हुआ। उन्हें लगा कि मैं फर्जी आंकड़े भेज रहा हूँ। जो विभाग पहले अंतिम स्थान पर होते थे, वे अचानक पहले स्थान पर कैसे आ सकते हैं? स्वास्थ्य और कृषि विभाग ने तो विशेष टीमें बनाकर मेरे आंकड़ों का फिजिकल वेरिफिकेशन करवाया। टीमें आई, जांच की, और मेरे काम और आंकड़ों को शत-प्रतिशत सही पाया। यह मेरी ईमानदारी की सबसे बड़ी जीत थी।

फिर मेरे दूसरे कमिश्नर आए, श्री गोपाल नायडू। उनका नाम भी मैंने पहले सुना था। वह भी पन्ना में कलेक्टर रह चुके थे। वह अपनी पैदल यात्राओं और 'पानी रोको अभियान' के लिए मशहूर थे। उन्होंने इस अभियान को एक जन-आंदोलन बना दिया था। वह एक मृदुभाषी और शांत स्वभाव के व्यक्ति थे, लेकिन उनकी कार्यशैली बहुत दमदार थी। वह मेरी कार्यशैली से कई बातों पर सहमत होते, तो कई पर असहमत भी रहते थे।

मैंने उन्हें पन्ना आमंत्रित किया। वह तीन दिन तक मेरे साथ थे। मैंने उन्हें वही काम मौके पर दिखाएं जिन पर वह मुझसे असहमत थे। हमने घंटों तक तर्क-वितर्क किया, गांव में घूमकर काम देखा और समझा। आखिर में, मेरे काम की गहराई और पारदर्शिता को देखकर, वह मुझसे सहमत हुए।

उन्हीं तीन दिनों में मुझे उनके जीवन की कहानी भी सुनने को मिली, जो किसी प्रेरणा से कम नहीं थी। उनके पिता की बचपन में मृत्यु हो गई थी, जो पुलिस में थे। उन्हें पिता की जगह पुलिस में नौकरी मिल गई थी। एक दिन उन्होंने अपने एक अधिकारी को संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा की तैयारी करते देखा। उसी क्षण उन्हें भी परीक्षा देने की प्रेरणा मिली। उनके पास किताबें खरीदने के पैसे नहीं थे। वह जिस अधिकारी के गेट पर ड्यूटी देते थे, उसी से किताबें मांग कर पढ़ते और परीक्षा की तैयारी करते। और उसी मेहनत और लगन से उन्होंने आईएएस की परीक्षा पास की और एक अधिकारी बन गए।

यह कहानी सिर्फ एक अधिकारी की नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की थी जिसने जीवन के हर संघर्ष को अपनी ताकत बनाया। उनके जीवन की कहानी सुनकर मुझे लगा कि जो लोग ईमानदारी और मेहनत से अपना काम करते हैं, वे चाहे किसी भी पद पर हों, उनकी पहचान हमेशा बनी रहती है। उनके जैसे अधिकारी ही मुझे और मेरे जैसे प्रशासकों को सही रास्ते पर चलने की प्रेरणा देते हैं।

बुंदेलखंड: रेत, राजनीति और रक्त का खेल

बुंदेलखंड, अपनी चट्टानी भूमि और सदियों पुराने किलों के लिए जाना जाता है, लेकिन इसकी रगों में एक और कहानी बहती है। वह है माफिया राज की कहानी। यहाँ दशकों से, रेत, पत्थर और सरकारी योजनाओं के ज़रिए एक समानांतर सत्ता पनपी है। डाकुओं और बाहुबलियों ने पहले छोटे अपराधों से शुरुआत की, फिर अवैध खनन के ज़रिए अपनी तिजोरी भरी और अंत में राजनीति के गलियारों में प्रवेश कर गए।

ये लोग चुनाव लड़ते थे, जीतते थे और फिर उसी सत्ता का इस्तेमाल अपने अवैध धंधों को बचाने के लिए करते थे। पुलिस और प्रशासन उनके इशारों पर नाचते थे। जो अधिकारी ईमानदारी की राह पर चलता, उसका या तो तबादला हो जाता या फिर उसे झूठे आरोपों में फँसा दिया जाता। यह एक ऐसा दुष्चक्र था जिसमें आम जनता पिस रही थी। यह कहानी उसी दुष्चक्र को तोड़ने की है।

एक फ़ाइल और सत्ता के गलियारे से पहली दस्तक

पन्ना ज़िले में, मैं एक युवा अधिकारी अपनी ईमानदारी के लिए जाना जाता था । जब मेरे सामने एक शिक्षाकर्मी की भर्ती प्रकरण की भर्ती की शिकायत की अपील की फ़ाइल आई, तो मुझे उम्मीद नहीं थी कि यह मेरे जीवन का सबसे बड़ा इम्तिहान बन जाएगी। फ़ाइल के पन्ने पलटते ही मेरी की आँखें चौड़ी हो गईं यह सिर्फ़ भर्ती नहीं थी, बल्कि यह लाखों-करोड़ों रुपए के अवैध लेन-देन का खुला खेल था। योग्य उम्मीदवारों को दरकिनार कर, उन लोगों के नाम थे जिन्होंने पैसा दिया था। यह एक भयानक सच्चाई थी जो बताती थी कि बुंदेलखंड का माफिया किस तरह पंचायती राज व्यवस्था में भी घुसपैठ कर चुका था, जहाँ वे अपने प्रॉक्सी लोगों को चुनाव जिताकर परदे के पीछे से राज करते थे।

पहले मेरे जिले के प्रभारी मंत्री का फोन आया। वह मुझे तथा मेरे काम को जानते थे। उन्होंने पूरी बात सुनी कुछ नहीं बोले। 

मैंने फ़ाइल को अलग रख दिया। कुछ ही दिनों बाद, मेरे दफ्तर के लैंडलाइन पर एक फ़ोन आया।

"रवीद्र बोल रहे हो? मैं मुख्यमंत्री का भाई हूँ।"

आवाज़ में सिर्फ़ परिचय नहीं था, बल्कि सत्ता का रौब था। "यह भर्ती वाला मामला ख़त्म कर दो। सब ठीक है।"

मैंने पूरी विनम्रता से, लेकिन दृढ़ता से जवाब दिया, "सर, यह फ़ाइल नियमों के ख़िलाफ़ है। मैं इसे ख़ारिज नहीं कर सकता।"

फ़ोन कट गया। मुझे पता था कि यह तो बस शुरुआत है।

दबाव और धमकी: सत्ता का दूसरा वार

कुछ दिन बाद, फ़िर एक फ़ोन आया। इस बार आवाज़ थी तत्कालीन पंचायत मंत्री की। "रवींद्र, मुख्यमंत्री के भाई से बात हो गई है। यह काम क्यों अटका रहे हो? क्या तुम पद से हाथ धोना चाहते हो?"

मंत्री की आवाज़ में धमकी और साफ़ तौर पर निराशा थी। मैंने वही कहानी दोहराई कानून से बढ़कर कोई नहीं है। उन्होंने कहा, "मंत्री जी, मैं नियमों का पालन कर रहा हूँ। इसमें कोई समझौता नहीं हो सकता।"

मंत्री ने भी फ़ोन पटक दिया।

मैं बहुत तनाव में थे, लेकिन मेरा इरादा अटल था। मुझे मालूम था कि अब सीधे मुख्यमंत्री से बात होगी।

मुख्यमंत्री का फोन और एक निर्णायक पल

एक सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही मेरे घर का फ़ोन बजा। मैंने गहरी साँस ली और फ़ोन उठाया।

"हाँ, रवीद्र! सुना है, तुम बहुत ईमानदार हो?"

दूसरी तरफ़ से मुख्यमंत्री की आवाज़ थी। उनके शब्द खत्म होते ही एक ज़ोरदार ठहाका गूँजा, जिसने पूरे कमरे को भर दिया। वह हँसी सिर्फ़ एक हँसी नहीं थी- यह एक शक्तिशाली संकेत था कि वे इस मामले को कितना हल्का समझते हैं।

 मैंने बिना डरे, पूरी सच्चाई उन्हें बताई। उन्होंने विस्तार से समझाया कि कैसे नियमों का उल्लंघन हुआ है और कैसे यह गरीब उम्मीदवारों के हक़ का शोषण है। मेरी बात सुनकर मुख्यमंत्री का ठहाका थम गया। वहाँ कुछ पल की खामोशी थी, और फिर मुख्यमंत्री की गंभीर आवाज़ आई, "ठीक है, नियमों के अनुसार काम करो।"

यह एक वाक्य था, जो मेरे लिए किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं था।

पन्ना के इतिहास की सबसे बड़ी वापसी

मुख्यमंत्री के निर्देशों के बाद, मैंने तेज़ी से काम किया। भर्ती प्रकरण की अपील मेरे पास आई थी जिसे सुनवाई कर  बिना किसी दबाव के सभी ग़ैर-कानूनी भर्तियों को तत्काल रद्द कर दिया।

माफिया और उनके गुर्गे फिर से उनसे मिलने आए। इस बार उनका रवैया बदल चुका था। चेहरे पर डर था, और उनकी दबंगई पूरी तरह से गायब हो चुकी थी। मैंने उन्हें साफ़-साफ़ कह दिया, "या तो आप पूरा पैसा वापस करेंगे, वरना मैं पुलिस में एफआईआर दर्ज़ करवाऊँगा और आपको जेल भिजवाऊँगा।"

मेरी इस धमकी के आगे उनके पास झुकने के अलावा कोई और चारा नहीं था। उसी दिन, उसी गेस्ट हाउस में जहाँ यह अवैध खेल रचा गया था, एक रजिस्टर रखा गया। एक-एक करके उन सभी लोगों को बुलाया गया जिनसे पैसा लिया गया था। राजा की सख्त निगरानी में, सारा पैसा वापस लौटाया गया।

पन्ना के इतिहास में यह एक अविस्मरणीय दिन था। जब लाखों-करोड़ों रुपए की ‘श्री’ (लक्ष्मी) को वापस लौटाया गया। यह केवल पैसों की वापसी नहीं थी, बल्कि एक ईमानदार अफसर पर लोगों के भरोसे की जीत थी जिसने यह साबित कर दिया कि सत्ता और अपराध के ख़िलाफ़ भी न्याय की जीत हो सकती है।

पन्ना का सपना

पन्ना का कलेक्टर बनना सिर्फ एक नौकरी नहीं, मेरे लिए एक जुनून था। मैंने इस जिले की गरीबी देखी थी, इसकी हरियाली के पीछे छिपे अभाव को महसूस किया था। सबसे गहरा अभाव था स्वास्थ्य सुविधाओं का। यहाँ के लोगों को इलाज के लिए सतना या रीवा तक की लंबी, थका देने वाली यात्रा करनी पड़ती थी। रास्ते में ही दम तोड़ने वाले मरीजों की कहानियां सुनकर मेरा दिल बैठ जाता था। मैं एक ऐसा सपना देखता था, जहाँ पन्ना का हर व्यक्ति अपने ही घर के पास बेहतर इलाज पा सके।

इसी सपने को सच करने के लिए मैंने डॉ. संजय माहेश्वरी से संपर्क किया, जो सतना के प्रतिष्ठित एमपी बिड़ला अस्पताल के मुखिया थे। डॉ. माहेश्वरी सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि एक दूरदर्शी थे। उन्होंने अपनी विदेशी ट्रेनिंग छोड़कर 32 साल पहले मध्य प्रदेश के गांवों में सेवा करने का फैसला किया था। उनकी यह कहानी मुझे प्रेरणा दे रही थी। हमने मिलकर एक योजना बनाई "टेलीमेडिसिन परियोजना"। हमारा विचार था कि पन्ना के सरकारी अस्पतालों को बिड़ला अस्पताल से जोड़ा जाए, ताकि हमारे डॉक्टर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से वहाँ के विशेषज्ञों से सलाह ले सकें।

प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई, सब कुछ सही लग रहा था। यह एक आशा की किरण थी। मुझे लगा था कि अब पन्ना के लोगों का जीवन बदलेगा। पर, मुझे इस बात का जरा भी अंदाज़ा नहीं था कि सबसे बड़ी बाधा तकनीक नहीं, बल्कि मानसिकता होगी।

जब हमने पन्ना के डॉक्टरों को इस सुविधा का इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया, तो उनके चेहरे पर एक अजीब सा भाव था डर और असुरक्षा का भाव। एक युवा डॉक्टर ने धीरे से कहा, "सर, अगर हम फोन पर दूसरे डॉक्टर से सलाह लेंगे, तो मरीज क्या सोचेगा? वह सोचेगा कि हमें कुछ आता ही नहीं है और हम दूसरों से पूछकर इलाज कर रहे हैं। वो हम पर विश्वास करना बंद कर देगा।"

उस एक वाक्य ने मेरे सपने की नींव हिला दी। यह केवल एक डॉक्टर की बात नहीं थी, यह पन्ना के हर डॉक्टर के मन की बात थी। उनकी ईगो और असुरक्षा की भावना मेरे और डॉ. माहेश्वरी के देखे गए बड़े सपने से कहीं ज्यादा बड़ी थी। वे अपनी प्रतिष्ठा को बचाने के लिए उस तकनीक को अपनाने से डर रहे थे, जो सैकड़ों लोगों की जान बचा सकती थी। उन्हें लगा कि यह तकनीक उनकी योग्यता पर सवाल खड़ा कर देगी।

मैंने बहुत समझाने की कोशिश की, कहा कि यह सहयोग है, प्रतिस्पर्धा नहीं। यह मरीजों के लिए सबसे अच्छी सेवा सुनिश्चित करने का एक तरीका है। लेकिन उनका डर इतना गहरा था कि मेरी सारी बातें बेअसर रहीं।

और आखिरकार, मेरा सपना टूट गया। यह प्रोजेक्ट, जो लोगों के जीवन में बदलाव लाने वाला था, सफल नहीं हो पाया। एक कलेक्टर के रूप में, मैं हर तकनीकी और आर्थिक बाधा से लड़ सकता था, लेकिन उस दिन मुझे पता चला कि सबसे बड़ी चुनौती इंसानी सोच और उसकी आदतें होती हैं। आज भी, जब मैं पन्ना की सड़कों पर घूमता हूँ, तो मुझे हर बीमार चेहरे में उस टूटे हुए सपने की झलक मिलती है। यह सिर्फ एक प्रोजेक्ट की असफलता नहीं थी, यह एक ऐसी कहानी थी जिसमें एक अच्छी पहल, गलत सोच की वजह से दम तोड़ गई।

मेरा पहला कदम: मानव संसाधन में निवेश

मैंने इस ज़िले में एक अद्भुत क्षमता देखी। यहाँ एक तरफ़ खजुराहो की विश्व-प्रसिद्ध विरासत थी, और दूसरी तरफ़ पन्ना के घने जंगल, ऐतिहासिक किले और बहती हुई केन नदी। यह दोनों सिर्फ़ भौगोलिक रूप से ही नहीं, बल्कि पर्यटन की दृष्टि से भी एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। मैंने सोचा, क्यों न इस कनेक्शन का उपयोग करके यहाँ के युवाओं के लिए रोज़गार के नए दरवाज़े खोले जाएँ? मेरे सामने एक चुनौती थी कैसे इन बिखरे हुए मोतियों को एक माला में पिरोया जाए?

मैंने महसूस किया कि प्राकृतिक सुंदरता और इतिहास तो हमारे पास है, लेकिन पर्यटकों को बेहतरीन अनुभव देने के लिए प्रशिक्षित लोग नहीं हैं। मैंने तुरंत स्थानीय युवकों का एक समूह बनाया। इन युवाओं के पास उत्साह था, लेकिन कौशल की कमी थी। मैंने उन्हें भोपाल के एक प्रतिष्ठित होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग के लिए भेजा। मेरा लक्ष्य सिर्फ़ उन्हें नौकरी दिलाना नहीं था, बल्कि उन्हें उद्यमी बनाना था।

ट्रेनिंग में उन्हें न सिर्फ़ खाना बनाना और मेहमानों को भोजन परोसना सिखाया गया, बल्कि अंग्रेजी बोलना और मेहमानों से अच्छा व्यवहार करना भी सिखाया गया। यह सिर्फ़ एक ट्रेनिंग नहीं थी, बल्कि उनकी सोच को बदलने की एक कोशिश थी।

इंफ्रास्ट्रक्चर और उद्यमिता का विकास

ट्रेनिंग पूरी होने के बाद, मैंने युवाओं को बैंकों से बात करके लोन दिलवाए। मेरा सपना था कि वे खुद के मालिक बनें। इन लोन से उन्होंने अपनी जिप्सी सफारी गाड़ियाँ, नांव और गियर वाली साइकिलें खरीदीं। अब वे सिर्फ़ गाइड नहीं थे, बल्कि अपने व्यवसाय के मालिक थे।

शासन की मदद से, हमने झिरना कैंप साइट विकसित की। यह जगह तीन ओर से पहाड़ियों और एक ओर से केन नदी से घिरी थी। यहाँ 50 से ज़्यादा लोगों के रहने की सुविधा थी, और यह एडवेंचर प्रेमियों के लिए एक आदर्श स्थान बन गया। इस कैंप के उद्घाटन के लिए मैंने अपने तत्कालीन मुख्य सचिव को आमंत्रित किया, जिनकी एडवेंचर टूरिज्म में बहुत रुचि थी और जो खुद बुंदेलखंड के बांदा जिले से थे। उनके आने से इस परियोजना को एक बड़ी पहचान मिली।

विरासत से जोड़ना और जागरूकता फैलाना

पर्यटकों को यहां लाने के लिए मैंने एक स्मार्ट रणनीति अपनाई। मैंने खजुराहो के बड़े होटलों से संपर्क किया और उनके साथ प्रॉफिट-शेयरिंग का एग्रीमेंट किया। इससे खजुराहो आने वाले पर्यटक भी पन्ना की ओर आकर्षित होने लगे।

सबसे महत्वपूर्ण कदम था ‘जल, जंगल रजिस्टर’ का निर्माण। मध्य प्रदेश पर्यावरण बोर्ड की मदद से हमने जंगल के हर पेड़-पौधे, पशु-पक्षी और बीजों का एक विस्तृत रिकॉर्ड बनाया। हमने इको-गाइड्स को प्रशिक्षित किया, जो पर्यटकों को सिर्फ़ बाघ ही नहीं, बल्कि जंगल की पूरी जैव-विविधता से अवगत करा सकें।

इन सभी प्रयासों से पन्ना में एक नया बदलाव आया। पर्यटन को एक संगठित रूप मिला और सबसे ज़रूरी, स्थानीय युवाओं को रोज़गार के नए अवसर मिले। आज जब मैं देखता हूँ कि ये युवा आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों को अपनी जिप्सी में घुमाते हैं, तो मुझे अपनी मेहनत और सपने पर गर्व होता है। यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक परियोजना नहीं, बल्कि एक नए पन्ना का सपना था, जिसे हमने मिलकर साकार किया।

​​पन्ना का हीरा: इतिहास, संभावना और मेरा सपना

पन्ना की ज़मीन पर कदम रखते ही मुझे एक अजीब सी चमक का एहसास हुआ—यह सिर्फ़ यहाँ के हीरों की चमक नहीं थी, बल्कि यहाँ के लोगों की आँखों में छिपी उम्मीदों की चमक थी। एक कलेक्टर के तौर पर, मेरा काम सिर्फ़ प्रशासन चलाना नहीं, बल्कि उस उम्मीद को हकीकत में बदलना है। और इस हकीकत की बुनियाद पन्ना के सदियों पुराने हीरे के इतिहास पर रखी जाएगी।

हीरे का गौरवशाली इतिहास

यहाँ हीरे का खनन 17वीं सदी से हो रहा है। पन्ना, जिसे ‘हीरों की नगरी’ भी कहा जाता है, भारत का एकमात्र ज़िला है जहाँ हीरे पाए जाते हैं। मझगवां हीरा खदान, एशिया की एकमात्र मशीनीकृत खदान है। लेकिन, यहाँ की पहचान सिर्फ़ बड़ी खदानों से नहीं, बल्कि उन हज़ारों छोटे-छोटे खदानों से है, जहाँ हर आम नागरिक अपनी किस्मत आज़माने के लिए 8x8 मीटर का पट्टा लेकर खुदाई कर सकता है। यहाँ की मिट्टी में हीरे की खोज में हज़ारों लोगों की ज़िन्दगी बीत गई है, कई लोग रातों-रात लखपति बन गए, तो कईयों को सिर्फ़ पत्थर ही मिले।

मगर, इस गौरवशाली इतिहास के बावजूद, एक कड़वी सच्चाई यह भी है कि यहाँ से निकले हीरे बिना किसी मूल्य-संवर्धन (value addition) के मुंबई और सूरत भेज दिए जाते हैं। हमारे अपने कारीगर, जो हीरे के कारोबार की गहरी समझ रखते हैं, काम की तलाश में महानगरों में पलायन करने को मजबूर हैं। यह एक ऐसा घाव था, जिसका इलाज करना मेरे लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता बन गया।

पन्ना डायमंड पार्क: मेरा सपना और कार्ययोजना

मैंने एक ऐसी योजना बनाई है, जो पन्ना के कच्चे हीरों को यहीं पर तराशकर उन्हें एक नया जीवन देती और स्थानीय युवाओं के लिए अनगिनत अवसर पैदा करेगी। इस योजना को मैंने 'पन्ना डायमंड पार्क' का नाम दिया है।

1. युवाओं को प्रशिक्षण:

सबसे पहले, मैंने एक विस्तृत प्रशिक्षण कार्यक्रम का प्रस्ताव रखा है। इस कार्यक्रम के तहत, स्थानीय युवाओं को हीरे की कटाई, पॉलिशिंग और ग्रेडिंग की आधुनिक तकनीक सिखाई जाएगी। मेरा मानना है कि ये हीरे की ख़दानों के पास रहने वाले युवा अपने हुनर से इन पत्थरों में जान डाल सकते हैं।

2. मूल्य-संवर्धन और ब्रांडिंग:

पन्ना के हीरों को अब सिर्फ़ कच्चा माल नहीं रहने दिया जाएगा। डायमंड पार्क में इन हीरों को तराशा जाएगा और उन्हें ‘पन्ना ब्रांड’ के नाम से बाज़ार में उतारा जाएगा। यह ब्रांड हमारे ज़िले की पहचान होगा, जो न सिर्फ़ हीरों की गुणवत्ता बल्कि यहाँ के इतिहास और संस्कृति को भी दर्शाएगा।

3. पर्यटक अनुभव को बढ़ाना:

मैं चाहता हूँ कि पर्यटक यहाँ सिर्फ़ टाइगर रिज़र्व और मंदिरों के लिए नहीं, बल्कि हीरे के लिए भी आएं। इसके लिए मैंने दो अनूठी पहल की है:

ऑनलाइन खदान बुकिंग: पर्यटकों के लिए एक ऑनलाइन बुकिंग सिस्टम बनाया जाएगा, जहाँ वे निर्धारित शुल्क देकर एक दिन के लिए छोटे खदान के पट्टे की बुकिंग कर सकते हैं और हीरे की खोज का रोमांच खुद अनुभव कर सकते हैं।

प्रमाणित हीरों की बिक्री: पन्ना में निकलने वाले हीरों को कटाई और पॉलिशिंग के बाद एक सरकारी स्टोर पर बेचा जाएगा। पर्यटक इन प्रमाणित हीरों को उपहार या यादगार (souvenir) के रूप में खरीद सकेंगे। इससे एक ओर जहां पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा, वहीं दूसरी ओर हीरो के कारोबार में पारदर्शिता भी आएगी।

रोज़गार के नए अवसर

इस परियोजना से सिर्फ़ हीरे के कारोबार में ही नहीं, बल्कि कई अन्य क्षेत्रों में भी रोज़गार पैदा होंगे: डायमंड कटिंग और पॉलिशिंग यूनिट्स: प्रशिक्षित युवाओं को इन यूनिट्स में सीधे नौकरी मिलेगी। गाइड और टूरिज्म: पर्यटक जो हीरे की खदानों को देखने आएंगे, उनके लिए विशेष गाइडों को प्रशिक्षित किया जाएगा। हीरा व्यापार: स्थानीय स्तर पर ही हीरे का व्यापार और मूल्यांकन होगा, जिससे बिचौलियों की भूमिका कम होगी और कारीगरों को उनका सही हक़ मिलेगा।

मेरा मानना है कि पन्ना के हीरों में वह चमक है, जो पूरे ज़िले की तकदीर बदल सकती है। यह डायमंड पार्क सिर्फ़ एक इमारत नहीं, बल्कि यहाँ के लोगों की उम्मीदों का एक प्रतीक होगा।

भूमि वितरण: एक अधिकारी का संकल्प 

जब मैंने मध्य प्रदेश में भूमिहीन लोगों को सरकारी ज़मीनें आवंटित करने का बीड़ा उठाया, तो मेरे सामने एक विशालकाय चुनौती थी। यह सिर्फ कागज़ पर कुछ नाम लिखने का काम नहीं था, बल्कि उन बेसहारा लोगों के सपनों को ज़मीन पर उतारने का प्रयास था, जिन्हें पीढ़ियों से ठगा जा रहा था। इस योजना के कार्यान्वयन में सबसे बड़ी बाधा थी भ्रष्टाचार का दीमक, जो हर सरकारी तंत्र में फैला हुआ था।

मैंने तय किया कि गरीबों से एक भी पैसा नहीं लिया जाएगा। यह एक क्रांतिकारी निर्णय था, जिसे लागू करना आसान नहीं था। मैंने तत्काल सभी राजस्व अधिकारियों की एक बैठक बुलाई। उस बैठक का माहौल गंभीर था। अधिकारियों की आँखों में संदेह और बेरुखी थी, जैसे वे जानते हों कि यह मुहिम ज़्यादा दिन नहीं चलेगी। मैंने मेज पर एक कलश में गंगाजल रखवाया। एक-एक अधिकारी मेरे पास आया, उसने गंगाजल उठाया और कसम खाई कि वह इस नेक काम के लिए किसी भी भूमिहीन से एक पैसा नहीं लेगा। यह महज एक शपथ नहीं, बल्कि वर्षों के भ्रष्टाचार के खिलाफ मेरे अकेले के युद्ध का शंखनाद था।

इस योजना को ज़मीनी स्तर पर उतारने के लिए, मैंने हर विकासखंड में 'जन सुनवाई शिविर' आयोजित करने का आदेश दिया। हम खुद गाँव-गाँव जाकर उन लोगों से मिले, जिन्हें ज़मीनें मिल चुकी थीं। एक ऐसा ही शिविर आदिवासी बहुल कल्दा पठार पर आयोजित किया गया। यह पठार प्रकृति की गोद में छिपा हुआ, अपनी हरियाली और शांति के लिए मशहूर था।

एक ब्राह्मण का रहस्य

शिविर में चारों ओर आदिवासी समुदाय के लोग बैठे थे, उनके चेहरे पर उम्मीद की एक नई चमक थी। तभी मेरी नज़र भीड़ में बैठे एक अनोखे व्यक्ति पर पड़ी। वह सफेद कुर्ता-धोती पहने हुए थे, माथे पर तिलक और गले में रुद्राक्ष की माला थी। सिर पर उन्होंने एक चोटी रखी हुई थी, जो उन्हें भीड़ से अलग कर रही थी। उनकी सौम्य और शांत मुद्रा ने मुझे आकर्षित किया। मैंने उनसे पूछा, "आप क्या करते हैं?"

उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "मैं इन आदिवासियों के विवाह करवाता हूँ।"

मुझे आश्चर्य हुआ। एक ब्राह्मण, जो इन दूर-दराज़ इलाकों में आकर विवाह करवाता है! मैंने कौतूहल से पूछा, "तो विवाह का मंत्र क्या है?"

उन्होंने आंखें बंद की और एक मंत्र का सस्वर पाठ करने लगे।

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता, या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। या ब्रह्माच्युत शंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता, सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥ शुक्लां ब्रह्मविचार सार परमामाद्यां जगद्व्यापिनीं, वीणा-पुस्तक-धारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम्‌। हस्ते स्फटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थिताम्‌, वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम्‌॥

जैसे ही मैंने वह श्लोक सुना, मेरे कान खड़े हो गए। यह विवाह का मंत्र नहीं था! यह तो माँ सरस्वती की वंदना थी। यह वही श्लोक था, जिसके माध्यम से भक्त देवी सरस्वती को प्रसन्न करते हैं। इसका अर्थ था: 'जो विद्या की देवी माँ सरस्वती कुंद के फूल, चंद्रमा, हिमराशि और मोती के हार की तरह धवल वर्ण की हैं... वो हमारी रक्षा करें।'

मैं भ्रमित होकर बोला, "यह तो देवी सरस्वती की वंदना है, विवाह का मंत्र नहीं।"

उनकी आँखों में एक गहरी, शांत मुस्कान तैर गई। उन्होंने बेहद सहजता से कहा, "पिछले बीस साल से इसी मंत्र को पढ़कर मैं सैकड़ों शादियां करवा चुका हूँ। और आज तक, एक भी जोड़ा टूटा नहीं है। सभी सुखी दांपत्य जीवन जी रहे हैं।"

उनकी बात सुनकर मेरे भीतर एक गहरा बोध जागा। मुझे एहसास हुआ कि विवाह की सफलता किसी मंत्र या कुंडली पर निर्भर नहीं करती। ना ही यह इस बात पर निर्भर करती है कि वह प्रेम विवाह है या अरेंज मैरिज। विवाह की सफलता तो आपसी व्यवहार, समझ और सामंजस्य से चलती है। यह सिर्फ दो शरीरों का नहीं, दो आत्माओं और दो परिवारों का मिलन है, जिसमें धन और स्वार्थ के लिए कोई जगह नहीं होती।

मैंने मुड़कर कल्दा पठार को देखा। वहाँ, पहाड़ियों के बीच, वही आदिवासी बच्चे हँसी-खुशी से खेल रहे थे, जिनके माता-पिता की शादियाँ उस ब्राह्मण ने करवाई थीं। वे बच्चे इस बात के प्रतीक थे कि जब किसी काम की बुनियाद ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव पर रखी जाती है, तो उसके परिणाम हमेशा सुखद होते हैं। आज मैं भूमिहीन लोगों को ज़मीन देने आया था, लेकिन उस अनमोल मुलाकात ने मुझे जीवन का एक गहरा पाठ सिखा दिया था।

खजुराहो में मुख्यमंत्री का सच से सामना

खजुराहो के भव्य मंदिरों की प्राचीन दीवारों के साए में, राजनीति का आधुनिक नाटक खेला जा रहा था। सागर संभाग के अधिकारियों की बैठक खत्म हो चुकी थी, और मुख्यमंत्री जी एक पत्रकार वार्ता के लिए तैयार थे। बाहर का माहौल पत्रकारों के तीखे सवालों और कैमरों की चकाचौंध से भरा था। मैं, एक नौकरशाह, उस भीड़ से थोड़ा अलग, इस पूरे घटनाक्रम को करीब से देख रहा था।

जब पत्रकार वार्ता शुरू हुई, एक नौजवान पत्रकार ने साहस दिखाते हुए सीधा, चुभने वाला सवाल पूछा, "सर, प्रदेश में सड़कें जर्जर हैं, पीने का पानी नहीं है, और किसान बिजली के लिए तरस रहे हैं। ऐसे में, आप आगामी चुनाव कैसे जीतेंगे?" यह सवाल सिर्फ एक प्रश्न नहीं था, बल्कि लाखों लोगों के आक्रोश की प्रतिध्वनि थी। मुख्यमंत्री ने कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई। उनके चेहरे पर वह आत्मविश्वास था, जिसके दम पर उन्होंने वर्षों तक सत्ता संभाली थी। 

उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में जवाब दिया, "मेरे मित्र, चुनाव सड़क, बिजली या पानी से नहीं जीते जाते। चुनाव मैनेजमेंट से जीते जाते हैं। जिन लाखों परिवारों को हमने नौकरियाँ दी हैं, जिनको ज़मीनें दी हैं, ये सारे परिवार हमें वोट देंगे।" उनकी बात सुनकर पत्रकार शांत हो गए, और मैंने सोचा, क्या यह उनका विश्वास था, या सिर्फ एक राजनैतिक जवाब?

रात हो चुकी थी और हमें पन्ना के सर्किट हाउस जाना था। मुख्यमंत्री जी ने अपनी गाड़ी में मुझे बैठने का इशारा किया। यह एक दुर्लभ अवसर था। हम दोनों गाड़ी में अकेले थे। खजुराहो की प्राचीन विरासत पीछे छूट रही थी और पन्ना के अंधेरे रास्ते हमारे सामने थे। गाड़ी में चुप्पी छाई हुई थी। कुछ देर बाद, उन्होंने मेरी ओर मुड़कर पूछा, "बताओ, क्या हम चुनाव जीत जाएंगे?"

यह सवाल एक मुख्यमंत्री का नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान का सवाल था, जो अपने भविष्य को लेकर अनिश्चित था। मेरे मन में हलचल मच गई। मैंने सोचा, क्या मैं उन्हें वह जवाब दूँ, जो वे सुनना चाहते हैं, या वह जो सच है?

मैंने उनसे सीधे शब्दों में पूछा, "सर, आप सत्य सुनना चाहेंगे या एक अधिकारी वाला झूठ?"

उन्होंने मेरी आँखों में देखते हुए कहा, "सच बोलो।"

मेरा गला सूख गया। यह एक ऐसा पल था, जहाँ मैं अपनी नौकरी को दांव पर लगा रहा था। मैंने हिम्मत जुटाई और धीरे-धीरे बोलना शुरू किया, "सर, मेरे अनुमान के अनुसार, लोग आपकी पार्टी को वोट नहीं देंगे।"

उनके चेहरे पर आश्चर्य और थोड़ी उदासी छा गई। उन्होंने मुझे रोकना चाहा और अपने तर्क समझाने लगे। उन्होंने मुझे अल्पसंख्यक, हरिजन और आदिवासियों के लिए चलाई गई योजनाओं का पूरा गणित समझाया। कैसे इन योजनाओं से प्रदेश की लगभग चार प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर लाभान्वित हुई है। उनके आँकड़े बेजोड़ थे, उनकी रणनीति अचूक लग रही थी।

मैंने विनम्रता से उन्हें बीच में टोका, "सर, आपका गणित बिल्कुल सही है, लेकिन अगर इन योजनाओं का लाभ बिना किसी घूस के मिला होता, तो लोग सच में आपको वोट देते। पर जमीनी हकीकत कुछ और है।"

मेरी आवाज़ में दर्द था, क्योंकि मैं उन लोगों को जानता था। "सर, लोग आपकी इन योजनाओं से लाभान्वित नहीं हुए, बल्कि उन्होंने इन लाभों को ख़रीदा है। उन्हें कर्ज़ लेकर, अपने गहने-ज़मीन गिरवी रखकर, और अपने जेवर बेचकर रिश्वत देनी पड़ी है। उन्हें ये योजनाएं मुफ्त में नहीं मिलीं।"

उनके चेहरे का रंग उड़ गया। मैंने आगे कहा, "सर, जब कोई इंसान अपना सबकुछ बेचकर एक सरकारी सुविधा खरीदता है, तो उसके दिल में आपके प्रति निष्ठा नहीं, बल्कि कड़वाहट पैदा होती है। उसकी नज़र में, आपने उसे कुछ दिया नहीं, बल्कि एक और बोझ लाद दिया है।"

मैंने देखा कि वे गहरे सोच में डूब गए थे। मैंने अपनी बात जारी रखी। "आप नौकरशाहों से राय ले रहे हैं। सर, नौकरशाही वेश्या जैसे होते हैं। जो भी सत्ता में होता है, वे उसकी चापलूसी करते हैं, सच नहीं बोलते। आपकी पार्टी में भी खुलकर बहस नहीं होती। सच सामने नहीं आता। और सबसे बड़ी बात, आंकड़ों में आदमी सिर्फ एक नंबर बनकर रह जाता है। एक नंबर के साथ हमारी वह संवेदना नहीं होती, जो एक इंसान के दर्द के साथ होती है।"

"मैं ज़मीन पर बहुत नीचे का काम करता हूँ, और मुझे पता है कि लोग क्या महसूस करते हैं। आपने मुझ पर भरोसा करके पूछा था, और मेरा धर्म था कि मैं आपको सच बताऊँ। मेरा अनुमान यही है।"

गाड़ी पन्ना सर्किट हाउस पर रुकी। मुख्यमंत्री जी की आँखें उदास और भरी हुई थीं। उन्होंने मुझे बिना कुछ कहे देखा और उतर गए। मैंने उन्हें उनके एकांत में छोड़ दिया और अपने घर की ओर चल पड़ा। उस रात मैं जानता था कि मैंने एक ऐसे इंसान को सच से रूबरू कराया था, जिसे शायद पहली बार यह एहसास हुआ था कि उसका भव्य मैनेजमेंट का महल, लोगों के वास्तविक दर्द और आंसुओं के आगे सिर्फ एक रेत का किला था।

मध्य प्रदेश का चुनावी संग्राम

सन् 2003 के मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव भारतीय राजनीति के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है, जो सत्ता के अहंकार और जनता के दर्द के बीच की दूरी को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। एक दशक तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहे कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह, जिन्हें उनके विरोधी 'मिस्टर बंटाधार' कहकर संबोधित करते थे, के सामने भाजपा की फायरब्रांड नेता उमा भारती एक ऐसी चुनौती बनकर उभरीं, जिसने पूरे प्रदेश का सियासी नक्शा बदल दिया।

सत्ता का एकांत और 'बंटाधार' की छवि

जब 2003 के चुनाव की रणभेरी बजी, तो दिग्विजय सिंह के शासन को पूरे 10 साल हो चुके थे। उनका शासनकाल कई मायनों में अनूठा था। वे एक चतुर रणनीतिकार थे, जिन्होंने विकेन्द्रीकरण की नीति पर जोर दिया और कई तरह की योजनाएं शुरू कीं। लेकिन, दूसरी तरफ, राज्य में आधारभूत सुविधाओं की स्थिति बद से बदतर होती जा रही थी। मध्य प्रदेश के गांव और शहर बिजली की किल्लत से जूझ रहे थे। 

घंटों बिजली गुल रहना एक सामान्य बात थी। खेती-किसानी के लिए बिजली न मिलने से किसान परेशान थे। सड़कों का हाल ऐसा था कि उन्हें पहचानना मुश्किल था। गड्ढों वाली सड़कें, धूल और मिट्टी के ढेर, यातायात को दुश्वार बना रहे थे। पीने के पानी की समस्या भी विकराल रूप ले चुकी थी। इसी निराशा और आक्रोश के बीच, 'मिस्टर बंटाधार' का तमगा दिग्विजय सिंह के नाम के साथ जुड़ गया। यह शब्द सिर्फ एक उपनाम नहीं था, बल्कि जनता के गुस्से का प्रतीक बन गया था, जो उनकी सरकार को राज्य के पिछड़ेपन के लिए जिम्मेदार ठहराता था।

उमा भारती का 'बिजली, सड़क, पानी और रोजगार ' का संकल्प 

भाजपा ने इस चुनाव में अपनी रणनीति का केंद्र बिंदु 'बिजली, सड़क, पानी' जैसे बुनियादी मुद्दों को बनाया और इस मुहिम की कमान अपनी सबसे तेज-तर्रार नेता उमा भारती को सौंपी। उमा भारती की छवि एक साध्वी की थी, जो आध्यात्मिक ऊर्जा से भरी हुई थीं और उनके भाषणों में एक अलौकिक आकर्षण था। उन्होंने चुनावी मैदान में उतरते ही दिग्विजय सिंह पर सीधा, व्यक्तिगत हमला बोलना शुरू किया। उनके भाषणों में सिर्फ आरोप नहीं होते थे, बल्कि एक साध्वी का संकल्प भी झलकता था।

उन्होंने पूरे प्रदेश में पदयात्राएं कीं, गाँव-गाँव और शहर-शहर गईं। उनकी रैलियों में उमड़ी भीड़ एक संदेश दे रही थी कि जनता का धैर्य जवाब दे चुका है। उमा भारती ने बड़ी कुशलता से दिग्विजय सिंह के दस साल के शासन को 'अंधकार युग' के रूप में पेश किया। उन्होंने जनता से भावनात्मक अपील की, "अगर दस साल में कांग्रेस सरकार यह भी नहीं कर पाए, तो और क्या करेगी?" उन्होंने यह नारा दिया, "अब बस बहुत हो गया, कांग्रेस का बंटाधार।" इस नारे ने कांग्रेस के कुशासन के खिलाफ जनता के मन में पल रहे गुस्से को एक दिशा और एक नाम दे दिया।

कांग्रेस की हार का कड़वा सच

कांग्रेस इस लहर को समझ नहीं पाई। दिग्विजय सिंह आत्मविश्वास से भरे थे कि उनकी राजनीतिक चातुर्य और योजनाओं का गणित उन्हें जीत दिला देगा। शायद वे अपने ही बनाए गए तंत्र में इतने उलझे हुए थे कि वे जमीनी हकीकत से दूर हो गए थे। उन्हें नौकरशाहों और चापलूसों की 'सत्य-रहित' रिपोर्टें मिल रही थीं, जिनमें सब कुछ 'ठीक' दिखाया जा रहा था। जब मैंने एक बार उनसे इस बारे में बात की थी, तब उन्होंने माना था कि नौकरशाही और पार्टी के लोग हमेशा सच नहीं बताते। चुनाव के नतीजे उसी सत्य की कठोरता को दर्शाने वाले थे।

2003 के चुनावों में कांग्रेस की हार सिर्फ एक सामान्य हार नहीं थी, बल्कि एक ऐतिहासिक पराजय थी। भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ जीत हासिल की। चुनाव विश्लेषकों ने इस हार के कई कारण बताएं:

'बंटाधार' की छवि: यह कांग्रेस की हार का सबसे बड़ा कारण था। भाजपा ने इस शब्द को एक सफल चुनावी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। हर जगह खराब सड़क, बिजली की कटौती, और पानी की कमी को सीधे तौर पर दिग्विजय सिंह के शासन से जोड़ा गया।

उमा भारती की करिश्माई अपील: उमा भारती ने 'एक तपस्वी' की तरह प्रचार किया, जिससे जनता में एक अलग ही विश्वास जगा। उनके सीधे और आक्रामक भाषणों ने जनता के गुस्से को एक मुखर आवाज दी।

बुनियादी मुद्दों पर ध्यान: भाजपा ने बिना किसी तामझाम के, सीधे-सीधे जनता की सबसे बड़ी समस्याओं (बिजली, सड़क, पानी) पर अपना ध्यान केंद्रित किया। यह साधारण रणनीति बेहद प्रभावी साबित हुई।

संगठनात्मक ताकत: भाजपा का जमीनी स्तर का संगठन कांग्रेस से कहीं ज्यादा मजबूत था। बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं ने 'बंटाधार' के नारे को घर-घर तक पहुंचाया।

यह चुनाव मध्य प्रदेश में भाजपा के लिए एक नए युग की शुरुआत था। उमा भारती ने प्रचंड बहुमत के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, और कांग्रेस को एक लंबा वनवास मिला। यह चुनाव इस बात का प्रमाण था कि राजनीतिक गणित और चातुर्य तब तक काम नहीं आता, जब तक कि वह जनता की मूलभूत ज़रूरतों और भावनाओं से जुड़ा न हो। 'मिस्टर बंटाधार' की हार ने यह सबक सिखाया कि सत्ता के सिंहासन पर बैठकर जनता की आवाज को अनसुना करना कितना महंगा पड़ सकता है।

एक फोन और अधिकारी का द्वंद्व

पन्ना में मतगणना का दिन था। सुबह से ही भारतीय जनता पार्टी की बढ़त स्पष्ट थी, और यह बढ़त हर राउंड के साथ बढ़ती ही जा रही थी। जैसे-जैसे नतीजे आते गए, यह स्पष्ट हो गया कि पार्टी प्रचंड बहुमत से जीत रही है। टेलीविजन पर खबर आई कि सुश्री उमा भारती मध्य प्रदेश की नई मुख्यमंत्री होंगी। मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन मेरे मन में एक अजीब-सा एहसास हुआ कि पन्ना में मेरा समय अब पूरा हो चुका है। मुझे लगा, जैसे मैं भी उस राजनीतिक परिवर्तन का एक हिस्सा हूँ, जिसने मुझे खुद मुख्यमंत्री के साथ काम करने का एक दुर्लभ अवसर दिया था।

मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण के बाद, शासन में बदलाव की लहर तेजी से बहने लगी। सुश्री उमा भारती ने अब तक विपक्ष की राजनीति की थी धरना, प्रदर्शन, शासन का विरोध और गिरफ्तारी। यह पहली बार था जब उन्हें खुद अपनी एक प्रशासनिक टीम बनानी थी। वह कई अधिकारियों को जानती थीं, लेकिन प्रमुख पदों के लिए उन्हें विश्वसनीय लोगों की तलाश थी।

दिल्ली में उनके साथ काम कर चुके उनके एक पुराने सहयोगी, श्री अरुण गुप्ता, जो मध्य प्रदेश कैडर के वरिष्ठ अधिकारी थे, उसे उन्होंने मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव के पद के लिए किसी उपयुक्त अधिकारी का नाम सुझाने को कहा। श्री गुप्ता ने एक दिन का समय मांगा। उसी रात उनका फोन मेरे पास आया। मैंने बिना सोचे-समझे श्री आर. परशुराम का नाम सुझाया। मैंने उनके साथ ग्रामीण विकास और मंडी बोर्ड में काम किया था, और मैं उनकी कार्यशैली और ईमानदारी से अच्छी तरह वाकिफ था।

श्री गुप्ता ने उसी रात मुख्यमंत्री को मेरा सुझाव बताया, और अगली सुबह आदेश जारी हो गया। समय का चक्र बहुत तेजी से घूम रहा था। चारों ओर अफरा-तफरी का माहौल था। एक के बाद एक प्रशासनिक आदेश जारी हो रहे थे।

करीब एक हफ्ता बीत चुका था, जब एक सुबह मेरे मोबाइल पर श्री परशुराम सर का फोन आया। उन्होंने मुझसे पूछा, "रवीन्द्र, क्या हम फिर से साथ काम कर सकते हैं?"

मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा, "सर, अभी तक मेरा करियर किसी राजनीतिक दल से अछूता रहा है। मैं मुख्यमंत्री कार्यालय छोड़कर कहीं भी काम करने को तैयार हूँ, लेकिन इस पद पर नहीं।"

मैंने उन्हें समझाया कि अगर किसी अधिकारी का नाम किसी राजनीतिक दल से जुड़ जाता है, तो उसे फिर निष्पक्ष नहीं माना जाता। मैं अपनी ईमानदारी और निष्पक्षता को बिना किसी 'गॉडफादर' के बनाए रखने में सफल रहा था, और मैं इसे खोना नहीं चाहता था। श्री परशुराम सर मेरे तर्क से सहमत हो गए।

तीन दिन बाद, एक रविवार की सुबह मैं पन्ना टाइगर रिजर्व से लौट रहा था। मैंने ट्रैक सूट पहना था, दाढ़ी बढ़ी हुई थी, और बाल बिखरे हुए थे। अचानक मंडला थाने के टी.आई. ने मुझे रोका और टीकमगढ़ कलेक्टर का एक वायरलेस संदेश दिया। संदेश में था कि मुख्यमंत्री जी सुबह 9 बजे खजुराहो एयरपोर्ट पर मुझसे मिलना चाहती हैं। उस वक्त सुबह के 8:30 बज रहे थे, और मैं जंगल में था, जहां मेरे मोबाइल में नेटवर्क नहीं था।

मेरे पास कपड़े बदलने के लिए पन्ना जाने का समय नहीं था। मैं सोच में पड़ गया कि इस वेशभूषा में मुख्यमंत्री से मिलना कितना सही होगा। मैंने कभी सुश्री उमा भारती जी से मुलाकात नहीं की थी।

मैंने थाने में आकर किसी तरह हाथ-मुँह धोया, शीशे में बाल ठीक किए, और उसी वेशभूषा में खजुराहो के लिए निकल पड़ा। मैंने वायरलेस पर टीकमगढ़ कलेक्टर को खबर भिजवा दी। जब मैं एयरपोर्ट पहुँचा, तब तक बहुत देर हो चुकी थी। मुख्यमंत्री मेरे आने का आधे घंटे से ज़्यादा इंतजार करके भोपाल के लिए रवाना हो चुकी थीं।

घर पहुँचते ही मुख्य सचिव महोदय का फोन आया। वे बहुत नाराज़ थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं मुख्यमंत्री जी से मिलने क्यों नहीं गया। मैंने उन्हें पूरा घटनाक्रम बताया। उन्होंने गुस्से में कहा कि वे बहुत नाराज़ हैं और मुझे हर हालत में अगली सुबह भोपाल पहुँचना होगा। मैंने बिना देरी किए तैयारी की, रात की ट्रेन पकड़ी, और भोपाल के लिए रवाना हो गया। यह मेरे करियर का एक ऐसा मोड़ था, जहाँ मेरे मूल्यों और प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच एक गहरा द्वंद्व छिड़ा था।

मुख्यमंत्री से पहली मुलाकात: गुस्सा, ईमानदारी और विश्वास की परीक्षा

मैं झांसी से भोपाल की रात भर की यात्रा के बाद सुबह विधान सभा पहुँचा। श्री आर. परशुराम सर को मैंने रास्ते से ही फोन करके मुलाकात का समय और स्थान पूछ लिया था। उन्होंने मुझे सुबह 10 बजे मुख्यमंत्री कार्यालय में बुलाया था। मैं निर्धारित समय से पहले ही विधानसभा पहुँच गया। चारों ओर एक अजीब सी चहल-पहल और तनाव था, जो नई सरकार के आने के बाद स्वाभाविक था।

मैं सीधे मुख्यमंत्री कार्यालय में गया, जहां श्री परशुराम सर मेरा इंतज़ार कर रहे थे। मुझे देखकर उनके चेहरे पर एक मुस्कान आ गई। वह मुझे एक तरफ ले गए और फुसफुसाते हुए बताया कि मुख्यमंत्री जी ने पुलिस से मेरी व्यक्तिगत जानकारी माँगी थी, जो उन्हें मिल चुकी है। उन्हें अब पता था कि मैं टीकमगढ़ से हूँ, जहाँ से वह खुद भी थीं। यह मेरे लिए एक चौंकाने वाली खबर थी, क्योंकि मैं उनसे पहले कभी नहीं मिला था और मुझे नहीं पता था कि उनके पास मेरे बारे में इतनी जानकारी होगी।

कुछ देर बाद, मुख्यमंत्री जी अपने कार्यालय में आईं। उनका आना ही एक अलग तरह का माहौल बना गया। चारों ओर एक सन्नाटा और तनाव फैल गया। मुझे उनके सामने ले जाया गया। मैंने उन्हें नमस्कार किया। उन्होंने मुझे बहुत गुस्से में देखा और बैठने का इशारा किया। मैं उनकी कुर्सी के सामने एक कुर्सी पर बैठ गया, अपनी नज़रें नीचे झुका हुए। दूसरी तरफ श्री परशुराम सर भी बैठे थे।

उन्होंने पहला सवाल पूछा, "रवीन्द्र, क्या हम लोग पहले कभी मिले हैं?"

मैंने अपनी नज़रें नीचे किए ही जवाब दिया, "मैडम, हम पहले कभी नहीं मिले।"

जैसे ही मैंने अपना चेहरा ऊपर किया, मैंने देखा कि उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। मुझे लगा कि मैंने कुछ बहुत गलत कह दिया है। मैंने श्री परशुराम सर की ओर देखा। उन्होंने आँखों से इशारा किया। शायद वह मुझे यह समझाना चाह रहे थे कि मैं अपनी टीकमगढ़ की पहचान बताऊँ।

मैंने तुरंत अपनी बात को सुधारा, "मैडम, मैं पढ़ने के लिए रायपुर चला गया था, और फिर मेरी नौकरी लग गई। टीकमगढ़ आना-जाना कम होता था, इस वजह से मुलाकात नहीं हुई। मैंने आपके बारे में बहुत सुना था, और आज आपसे मिलकर मुझे बहुत ख़ुशी हो रही है।"

मेरे जवाब से उनके चेहरे का भाव पूरी तरह बदल गया। उनका गुस्सा शांत हो गया और एक सहजता आ गई। उन्होंने अगला सवाल पूछा, "तुम खजुराहो मुझसे मिलने क्यों नहीं आए?"

मैंने उन्हें बिना कुछ छिपा पूरी बात बताई, कैसे मैं जंगल में था और मुझे संदेश देरी से मिला। उन्होंने मेरी बात को शांति से सुना, फिर बोलीं, "क्या तुम कलेक्टर ही बने रहना चाहते हो?"

मुझे लगा कि वह मुझे किसी बड़े पद की जिम्मेदारी दे रही हैं। मैंने जवाब दिया, "ऐसी बात नहीं है, मैडम। आप मेरी पोस्टिंग जहाँ करेंगी, मैं वहाँ काम करूँगा।"

मेरे जवाब से वे संतुष्ट दिखीं। उन्होंने अपनी सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में बताया, "मेरी सरकार की चार प्राथमिकताएं हैं सड़क, बिजली, पानी और रोजगार।"

फिर उन्होंने श्री परशुराम सर की ओर देखा और कहा, "मुझे पहले तीन विषयों पर काम करने वाले अधिकारी मिल गए हैं, लेकिन मुख्य सचिव ने मुझे बताया है कि तुमने पन्ना में रोजगार सृजन के ऊपर बहुत काम किया है। मैं चाहती हूं कि तुम अब राज्य स्तर पर रोजगार सृजन का काम करो।"

मैंने हाँ कह दी। उन्होंने फिर पूछा, "कब से काम करोगे?"

मैंने बिना सोचे जवाब दिया, "आज से ही, मैडम। जैसे ही आदेश हो।"

उन्होंने श्री परशुराम सर की ओर देखा और कहा, "परशुराम, इन्हें विधानसभा का काम आज से ही दे दो।"

मैंने उन्हें नमस्कार किया और हम बाहर आ गए। उस दिन मैंने सीखा कि एक अधिकारी की ईमानदारी और निडरता, भले ही वह कुछ समय के लिए मुसीबत में डाले, लेकिन अंत में, वह विश्वास और सम्मान जीत सकती है।

उप सचिव मुख्यमंत्री कार्यालय 

भोपाल में एक अनिश्चित प्रवास

मैं पन्ना जिले के कलेक्टर के रूप में काम कर रहा था, लेकिन नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था।  मुख्यमंत्री सचिवालय से तुरंत भोपाल बुलाया गया। मैं बहुत ज्यादा सामान लेकर नहीं गया था, बस कुछ कपड़े और ज़रूरी कागज़ात। सोचा, दो-चार दिन का काम होगा, फिर वापस चला जाऊँगा।

लेकिन भोपाल की हवा में कुछ ख़ास था। मुख्यमंत्री कार्यालय का काम, उसकी गति और राजनीतिक बारीकियों को समझना मेरे लिए मुश्किल नहीं था। मेरे पास भोपाल में काम करने का पुराना अनुभव था, और विधान सभा की कार्यप्रणाली मेरी नस-नस में बसी थी। मैं काम की भँवर में ऐसा फंसा कि मुझे अपने वास्तविक पद का ख़्याल ही नहीं रहा। दिन हफ़्तों में बदल गए और मैं पन्ना का कलेक्टर होते हुए भी भोपाल में काम कर रहा था। मेरे दफ्तर में फाइलों के अंबार लग गए थे और मेरी पहचान अब ‘भोपाल में काम करने वाले कलेक्टर’ के तौर पर बन गई थी।

मुख्य सचिव का निर्णायक प्रस्ताव

एक हफ्ता बीत गया था और यह स्थिति अब अजीब लगने लगी थी। एक दिन, मुख्य सचिव ने मुझे अपने कक्ष में बुलाया। उनका कमरा शांत और गंभीर था, जैसे किसी बड़े फैसले से पहले की चुप्पी। उन्होंने मुझे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, "तो, उप सचिव, आप अपनी नई पोस्टिंग के बारे में क्या सोचते हैं? मुझे लगता है कि इस तरह काम करने में आपको असुविधा हो रही होगी।"

मैंने सम्मानपूर्वक कहा कि मैं कहीं भी काम करने के लिए तैयार हूँ। उन्होंने गहरी साँस ली और कहा, "अभी के सेटअप में आपके लिए कोई उपयुक्त पद खाली नहीं है। अगर हम नया पद सृजित करते हैं तो बहुत समय लगेगा। मुझे एक सुझाव आया है जबलपुर में 'संचालक, रोज़गार' का एक पद है। आप वहाँ का आदेश निकलवाकर काम यहाँ भोपाल में कर सकते हैं।"

उनके इस प्रस्ताव ने मुझे एक पल के लिए हिला दिया। दूर बैठे हुए किसी और जगह का काम करना मुझे एक जटिल और उलझी हुई समस्या की तरह लगा। मुझे लगा, यह तो नौकरशाही की भूल-भुलैया है, जिसमें घुसकर काम करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। मैं जीवन में और नौकरी में सीधी-सरल राह पसंद करता था, यह पेचीदगियां मेरे लिए नहीं थी।

एक साहसिक निर्णय और नई पहचान

मैंने एक पल सोचा। यह मेरे जीवन का एक निर्णायक क्षण था। मैंने नम्रता से पर दृढ़ता के साथ अपना अनुरोध रखा। "सर, मैं इन सब पेचीदगियों में नहीं पड़ना चाहता। अगर संभव हो तो मुझे उप सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय में ही पोस्टिंग दे दी जाए।"

मुख्य सचिव ने मेरी बात सुनी। उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आई, जैसे उन्हें मेरे सीधे और स्पष्ट जवाब की उम्मीद थी। उन्होंने तुरंत स्वीकृति दे दी। मेरी बात सुनते ही आदेश निकल गया और जल्द ही मुझे भोपाल के चार इमली इलाके में सरकारी मकान भी मिल गया।

पन्ना के कलेक्टर से मुख्यमंत्री कार्यालय के उप सचिव तक का यह सफ़र न केवल मेरे पद की ऊँचाई को दर्शाता था, बल्कि एक सीधी और स्पष्ट सोच की जीत भी थी। अब मेरी पहचान बदल चुकी थी। मुख्यमंत्री सचिवालय का हिस्सा बनने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह था कि मैं जहाँ भी जाता, मुझे और मेरे काम को प्राथमिकता मिलती थी। मेरी राह अब पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो गई थी।

नया पद, एक नया द्वंद्व

उप सचिव, मुख्यमंत्री कार्यालय यह पद कलेक्टर के पद से बिल्कुल अलग था। जहां पहले मैं लोगों की भलाई के लिए, पूरे जिले के लिए काम करता था, वहीं अब मेरा काम केवल एक व्यक्ति के लिए था: मुख्यमंत्री। मेरी जिम्मेदारी केवल यही थी कि मुख्यमंत्री के पास आने वाली फसलों को पढूँ, नियमों और कानूनों के हिसाब से उनकी जांच करूँ, एक संक्षिप्त नोट बनाऊँ और उस नोट के आधार पर मुख्यमंत्री निर्णय लें।

लेकिन यह काम इतना सीधा नहीं था। मुख्यमंत्री खुद फाइलों को पढ़ना पसंद नहीं करती थीं, और उनकी सबसे बड़ी समस्या थी अविश्वास। उन्हें हर किसी पर शक होता था कि लोग उनका गलत फ़ायदा उठा सकते हैं। इस आंतरिक द्वंद्व के कारण निर्णय लेने में बहुत समय लग जाता था, मानो सरकारी तंत्र की साँसें थम सी गई हों। काम रुक जाते थे और इसका सीधा असर लोगों पर पड़ रहा था। अभी हाल ही में चुनाव में बहुत बड़े-बड़े बदलाव के वादे किए गए थे, और लोगों की उम्मीदें आसमान छू रही थीं। यह स्थिति किसी ज्वालामुखी के मुहाने पर खड़े होने जैसी थी, जहाँ नीचे जनता का बढ़ता दबाव महसूस हो रहा था।

बंगले पर उमड़ता जनसैलाब

पुराने मुख्यमंत्री ने अभी सरकारी बंगला खाली नहीं किया था, इसलिए हमारा काम फिलहाल मैडम को आवंटित सांसद वाले बंगले से ही चल रहा था। मैं ज़्यादातर अपना काम वल्लभ भवन सचिवालय से करता था, लेकिन धीरे-धीरे बंगले पर लोगों की भीड़ उमड़ने लगी। हर कोई अपनी फरियाद लेकर मुख्यमंत्री से मिलना चाहता था। उनका यह जुनून और उनकी उम्मीदें देखकर दिल भर आता था।

परन्तु, बंगले में इन हज़ारों आवेदनों को संभालने की कोई व्यवस्था नहीं थी। मुख्यमंत्री इस अव्यवस्था से खुश नहीं थीं। वह लोगों के लिए कुछ करना चाहती थीं, उनकी मदद करना चाहती थीं। इसी बेचैनी में उन्होंने जनता दरबार लगाने का फैसला किया। जिस दिन जनता दरबार लगता, बंगले पर हज़ारों की भीड़ जुट जाती। उनकी आवाज़ें, उनकी शिकायतें, और उनकी उम्मीदें पूरे परिसर में गूँज उठती थीं।

एक दिन, उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, "मैं चाहती हूँ कि आप इन लोगों के आवेदनों को लें और विभागों से उन पर कार्यवाही कराएं।"

एक नया अध्याय और एक प्रभावी व्यवस्था

मैंने बंगला ऑफिस में काम करने से पहले ही मना किया था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरा काम अव्यवस्थित हो। लेकिन मैडम का आग्रह इतना सच्चा था कि मैं इनकार नहीं कर सका। उन्होंने कहा, "आप केवल जनता दरबार के दिन बंगले पर आ जाइए, बाकी दिनों में सचिवालय से ही काम कर सकते हैं।" मैंने बहुत सोचा। जब मैं मुख्यमंत्री सचिवालय में काम कर रहा हूँ, तो लोगों की मदद करने से बड़ा और क्या काम हो सकता है? यह जनता की सेवा का ही एक नया रूप था।

मैंने हाँ कर दी। और फिर मैंने उस काम को पूरी तरह से व्यवस्थित कर दिया। मैंने विभाग के अनुसार रजिस्टर बनाए ताकि हर आवेदन को सही जगह पर दर्ज किया जा सके। फिर मैंने निपटारा कार्ड व्यवस्था शुरू की। यह एक ऐसा कदम था जिसने विभागों को यह स्पष्ट संदेश दिया कि उन्हें इन आवेदनों पर कार्यवाही करनी होगी।

हर हफ्ते विभागों के साथ समीक्षा बैठक होती थी। यह व्यवस्था इतनी प्रभावी थी कि लोगों के काम होने लगे। मुख्यमंत्री को भी इससे बहुत संतोष मिला। जिस काम को वह दिल से करना चाहती थीं, उसे एक व्यवस्थित रूप मिल चुका था, और मैं फिर से लोगों की भलाई के लिए काम कर रहा था।

मुख्यमंत्री के साथ मेरा सफर: जब मैं सूर्य का उपग्रह बना

मुख्यमंत्री के साथ काम करना, मेरे लिए एक ऐसी चुनौती थी जिसकी कल्पना मैंने कभी नहीं की थी। यह एक ऐसा दायित्व था जहाँ हर कदम पर डर और अनिश्चितता का साया था। मैं एक सरकारी अधिकारी था, जिसे अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता बहुत प्यारी थी, लेकिन यहाँ मुझे एक ऐसे शक्तिशाली व्यक्तित्व की परछाई बनकर काम करना था, जो किसी को भी अपने सामने ठहरने नहीं देती थीं।

मुख्यमंत्री का कार्यालय: रात के अँधेरे में भटकता कार्यक्रम

हमारे साथी अनुराग सक्सेना, एक वन सेवा अधिकारी, मुख्यमंत्री के दैनिक कार्यक्रम (टूर प्रोग्राम) की जिम्मेदारी संभालते थे। उनका काम था मुख्यमंत्री के अनुमोदन से कार्यक्रम को एक दिन पहले रात 8 बजे तक जारी करें, ताकि सभी संबंधित अधिकारी और लोग उचित तैयारी कर सकें। लेकिन यह काम उतना सीधा नहीं था जितना लगता था। मुख्यमंत्री मैडम का अनुमोदन लेना तलवार की धार पर चलने जैसा था। उनका मिजाज पल-पल बदलता था। कई बार रात के 12 बज जाते थे, लेकिन अनुराग अनुमोदन नहीं ले पाते थे।

मजबूरी में, उन्हें बिना अनुमोदन के ही कार्यक्रम जारी करना पड़ता था। इसका नतीजा यह होता था कि एक ही समय में मैडम को दो अलग-अलग जगहों पर जाना दिखाया जाता था। इससे फील्ड में भयंकर कन्फ्यूजन फैल जाती थी और सबसे बड़ी बात, मैडम की छवि खराब हो रही थी। यह सब देखकर मैं अंदर ही अंदर बहुत बेचैन होता था।

एस. गुरुमूर्ति का आगमन: एक निर्णायक मोड़

एक दिन, मैडम के एक पुराने दोस्त, एस. गुरुमूर्ति उनसे मिलने आए। गुरुमूर्ति, जिन्हें स्वामीनाथन गुरुमूर्ति के नाम से भी जाना जाता है, स्वदेशी जागरण मंच के सह-संयोजक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक प्रमुख विचारक हैं। वे एक चार्टर्ड अकाउंटेंट, कॉर्पोरेट सलाहकार, और खोजी पत्रकार भी हैं। उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस के मालिक रामनाथ गोयनका के साथ काम करते हुए रिलायंस इंडस्ट्रीज के विस्तारवादी तरीकों को उजागर किया था। वे भारतीय आर्थिक मॉडल और स्वदेशी सिद्धांतों के प्रबल समर्थक हैं।

जब गुरुमूर्ति ने मैडम से मुलाकात की, तो उन्हें इस प्रशासनिक अराजकता के बारे में पता चला। उन्होंने मैडम से इस विषय पर चर्चा की। मैडम ने उन्हें अपनी परेशानी बताई कि उनके पास विश्वसनीय अधिकारियों की कमी है। गुरुमूर्ति ने कुछ नामों के बारे में पूछा तो मैडम ने मेयर का नाम लिया और बताया कि वह उनके बंगले पर काम नहीं करना चाहते।

मेरी नियति का नया अध्याय

गुरुमूर्ति ने मुझे बुलाया और बहुत समझाया। उन्होंने कहा कि यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी है और मुझे इसे स्वीकार करना चाहिए। उस दिन मेरी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया। मैं मुख्यमंत्री कार्यालय का प्रभारी बन गया। मेरा काम बहुत बढ़ गया। मैं दिन के लगभग 15-20 घंटे मुख्यमंत्री के बंगले पर ही रहता था।

मेरी भूमिका सिर्फ कार्यक्रम बनाने तक सीमित नहीं थी। मैं मैडम के साथ हर प्रशासनिक और राजनीतिक बैठक में जाता था। लोग मुझे बहुत शक्तिशाली समझने लगे थे। पर मैं जानता था कि यह सब मैडम के अनुमोदन के बिना एक पल भी टिक नहीं सकता। मैंने हमेशा स्वतंत्र रूप से काम किया था, अपने फैसले खुद किए थे, लेकिन अब मैं एक उपग्रह बन गया था, जो सिर्फ सूर्य के प्रकाश से ही चमकता था। जब मैडम का मूड अच्छा होता, हमारा दिन बहुत अच्छा बीतता, लेकिन जब उनका मूड खराब होता (जो अक्सर होता था), उसका सीधा असर हमारे काम पर पड़ा था।

तलवार की धार पर मेरा जीवन

मैंने बहुत मेहनत से मुख्यमंत्री के टूर प्रोग्राम को व्यवस्थित किया। मुझे उनके कार्यक्रम के लिए राष्ट्रीय कैलेंडर के साथ-साथ पंचांग भी देखना पड़ता था ताकि पता चले कि कौन सी तिथि पर कौन सा धार्मिक अनुष्ठान होगा। धीरे-धीरे, मैं उनके मिजाज, पसंद-नापसंद को समझने लगा। मैं उनके साथ टूर पर जाता था और वह मेरा बहुत सम्मान करती थी। मेरे खाने-पीने और सोने की व्यवस्था का उन्हें पूरा ख्याल रहता था। वह ममतामयी और सरल स्वभाव की थी और अपनी हर बात मुझसे साझा करती थीं। लेकिन मैं अपनी सीमाओं को कभी नहीं भूला। मैं सिर्फ उनका डिप्टी सेक्रेटरी था। मुझे बशीर बद्र का यह शेर हमेशा याद आता था:

“बड़े लोगों से मिलने में हमेशा फ़ासला रखना।

जहाँ दरिया समुंदर से मिला दरिया नहीं रहता।”

इस शेर का अर्थ मेरे काम में बहुत मददगार साबित हुआ। मुझे हमेशा यह याद रखना था कि प्रभावशाली लोगों के साथ संबंध बनाते समय एक सम्मानजनक दूरी बनाए रखना जरूरी है। उनकी महानता में अपनी पहचान को खोना नहीं चाहिए। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी थी, जो मैं निभा रहा था, और यह सचमुच तलवार की धार पर चलने जैसा था।

गोविंदाचार्य: एक विचारक के साथ सफर

मेरे लिए के.एन. गोविंदाचार्य का नाम सिर्फ एक राजनेता या विचारक का नाम नहीं था, बल्कि यह एक ऐसी पाठशाला का नाम था, जिसने मुझे जीवन, राजनीति और समाज को एक नए नजरिए से देखना सिखाया। जब वे हमारे पास आते, तो वह समय मेरे लिए किसी उत्सव से कम नहीं होता था। मैं उनके सामने बैठकर घंटों तक सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर बात करता। यह सिर्फ बातचीत नहीं थी, बल्कि एक गहरा ज्ञान प्राप्त करने का अवसर था।

वैचारिक मंथन: जीवन की नई दिशा

उनसे मैंने समझा कि संगठन कैसे बनते हैं, कैसे काम करते हैं, और कैसे एक विचार को जमीनी स्तर पर फैलाया जाता है। उन्होंने मुझे बताया कि किसी भी आंदोलन के लिए सिर्फ जोश ही नहीं, बल्कि सही रणनीति, बजट और फंड का प्रबंधन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

गोविंदाचार्य जी ने मुझे सिखाया कि राजनीति सिर्फ सत्ता पाने का खेल नहीं है, बल्कि यह समाज को बदलने का एक माध्यम है। उनकी 'समाज-केंद्रित राजनीति' की अवधारणा ने मेरे दिमाग को पूरी तरह से खोल दिया। उनका मानना था कि दल से बड़ा देश और व्यक्ति से बड़ा दल होता है। यह बात आज भी मेरे दिल में बसी हुई है।

उन्होंने मुझे बताया कि कैसे आर्थिक राष्ट्रवाद और स्वदेशी ही भारत को सही मायने में आत्मनिर्भर बना सकते हैं। वे कहते थे कि विदेशी निवेश और वैश्वीकरण की दौड़ में हमें अपनी पहचान नहीं खोनी चाहिए। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि भारत की प्रगति उसकी अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और परंपराओं में ही निहित है।

एक प्रचारक का जीवन: त्याग और सिद्धांत

गोविंदाचार्य का जीवन त्याग और समर्पण की मिसाल है। एक वैज्ञानिक के रूप में अपने उज्ज्वल करियर को छोड़कर, उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के लिए एक प्रचारक का जीवन चुना। वे 1988 से 2000 तक भाजपा के महासचिव रहे, लेकिन सत्ता और पद की चकाचौंध उन्हें कभी लुभा नहीं पाई।

2000 में, उन्होंने 'अध्ययन अवकाश' का बहाना बनाकर राजनीति से दूरी बना ली। यह कदम कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। लेकिन मैं जानता था कि यह उनका खुद के सिद्धांतों के प्रति समर्पण था। उनका मानना था कि जब राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता खत्म हो जाती है, तो वहां से हट जाना ही सही है।

वर्तमान में भी एक मशाल

आज भी, जब वे मुख्यधारा की राजनीति से दूर हैं, गोविंदाचार्य एक प्रखर विचारक के रूप में सक्रिय हैं। उन्होंने राष्ट्रीय स्वाभिमान आंदोलन और भारत विकास संगम जैसे मंचों के माध्यम से अपनी वैचारिक लड़ाई जारी रखी है। वे किसानों के मुद्दे, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक न्याय जैसे विषयों पर बेबाक राय रखते हैं।

गोविंदाचार्य मेरे लिए सिर्फ एक मार्गदर्शक नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसे व्यक्तित्व थे जिन्होंने मुझे सिखाया कि सिद्धांतों पर अडिग रहकर भी जीवन जिया जा सकता है। उनसे मिली सीख ने मेरे सोचने के तरीके को बदल दिया और मुझे यह समझाया कि एक बेहतर समाज बनाने के लिए हर व्यक्ति का योगदान कितना महत्वपूर्ण है।

जनता दरबार और मेरे राजनीतिक गुरु

जनता दरबार का आयोजन मेरे लिए सिर्फ एक प्रशासनिक कार्य नहीं था, बल्कि यह राजनीति की पाठशाला थी। यह वह जगह थी, जहां मैंने अपने राजनीतिक सहयोगियों और सलाहकारों से हर उस बारीकी को सीखा, जो एक आम आदमी की नजर से छिपी रहती है। यहाँ मेरे दो साथी थे, शैतान सिंह और मयंक चौबे, जो पार्टी के समर्पित कार्यकर्ता थे। उनके साथ बैठकर मैंने जनता के नब्ज को पढ़ना सीखा।

मैडम के राजनीतिक सलाहकार, श्री अनिल दवे, शैलेंद्र शर्मा और अनिल जैन, भी मेरे साथ ही बैठते थे। ये तीनों मेरे लिए राजनीतिक गुरु बन गए। उनसे मैंने सीखा कि कैसे किसी से बातचीत शुरू करनी है। एक छोटा सा रहस्य उन्होंने मुझे बताया, जो जिंदगी भर काम आया: जब आप किसी को नहीं जानते, तो उसे 'भाई साहब' कहकर संबोधित करें। अगर महिला हो, तो 'बहन जी' कहें। यह एक साधारण सा शिष्टाचार था, लेकिन यह हर मुश्किल स्थिति को आसान बना देता था।

दिग्गजों का सानिध्य: एक अनूठा अनुभव

यह वह समय था जब मुझे देश के कई बड़े नेताओं और संतों से मिलने का सौभाग्य मिला। मैंने अटल बिहारी वाजपेयी, लाल कृष्ण आडवाणी, वेंकैया नायडू, राजनाथ सिंह, अरुण जेटली, और सुषमा स्वराज जैसे कद्दावर नेताओं से मुलाकात की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारियों और देश के प्रमुख साधु-संतों जैसे अशोक सिंघल से भी मेरी मुलाकात हुई। मध्य प्रदेश के सभी मंत्री और विधायक अपने काम को लेकर मुझसे मिलते थे, क्योंकि उन्हें पता था कि मुख्यमंत्री तक पहुँचने का रास्ता मेरे पास से होकर गुजरता है।

मेरी जिम्मेदारी सिर्फ अपॉइंटमेंट देना नहीं थी। मुझे यह भी तय करना होता था कि कौन सी खबर मैडम तक पहुँचानी है और कौन सी नहीं। यह एक बहुत ही संवेदनशील काम था, जहाँ एक छोटी सी गलती बड़ी समस्या खड़ी कर सकती थी। मेरा यह कार्यकाल बहुत छोटा, लेकिन घटनाओं से भरा हुआ था।

योग्यता और इच्छा का संघर्ष

एक दिन, मैंने मैडम से साहस करके अनुरोध किया कि यह काम मेरी योग्यता और रुचि के अनुसार नहीं है। मैं कुछ और करना चाहता था, कुछ ऐसा जो समाज के लिए वास्तव में उपयोगी हो। मैंने उन्हें रोजगार के वादे की याद दिलाई। मेरे अनुरोध पर, उन्होंने न सिर्फ रोजगार निर्माण बोर्ड का गठन किया, बल्कि कई महत्वपूर्ण योजनाएं भी शुरू की।

पंच-ज कार्यक्रम की शुरुआत हुई। मध्यान्ह भोजन योजना को आधा भोजन से पूर्ण भोजन में बदला गया। लड़कियों को स्कूल जाने के लिए साइकिल देने की योजना भी इसी दौरान शुरू हुई। यह देखकर मुझे बहुत संतोष हुआ कि मेरी सलाह का असर हो रहा था।

नया सफर: पिंजरे से आजादी की उड़ान

आखिरकार, मेरे बार-बार अनुरोध का असर हुआ और मुझे वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्त पोषित डीपीआईपी (DPIP) कार्यक्रम के प्रोजेक्ट डायरेक्टर के पद पर तैनात कर दिया गया। यह मेरे लिए सिर्फ एक नई नौकरी नहीं थी, बल्कि यह 'तलवार की धार पर चलने' वाले जीवन से मिली मुक्ति थी। मैं उस ग्लैमरस, लेकिन खोखली दुनिया से बाहर निकल रहा था, जहाँ हर पल किसी और की मर्जी पर निर्भर रहना पड़ता था।

चमकती दुनिया के पीछे का अंधेरा

मेरे उस कार्यकाल के संस्मरण इतने हैं कि उन पर पूरी एक किताब लिखी जा सकती है। हर दिन, हर पल कुछ न कुछ होता था। सरकारी हेलीकॉप्टर और हवाई जहाज की यात्राएँ, हर तरह की सुख-सुविधा और मान-सम्मान था। लोग ऐसी पोस्टिंग पाने के लिए सालों तक मेहनत करते थे, लेकिन मैं जल्द से जल्द वहाँ से भाग जाना चाहता था।

मेरा मन उस दिखावे और खोखली बातों से संतुष्ट नहीं हो रहा था। दूसरों की इच्छा पर निर्भरता ने मेरी आत्मा को कैद कर लिया था। मुझे यह एहसास हो गया था कि सत्ता, पावर और प्रतिष्ठा मेरे जीवन के लक्ष्य नहीं है।

एक नई सुबह: आजादी का अहसास

मैंने बिना देर किए अपने नए पद का कार्यभार संभाला। यह एक छोटा सा प्रोजेक्ट था, जो मध्य प्रदेश के सिर्फ तेरह जिलों के तीन सौ गाँवों में एक प्रयोग के तौर पर चल रहा था। शुरुआती दिनों में मन थोड़ा उदास होता था, पुरानी बातें याद आती थी, लेकिन मैं जानता था कि यह मेरी अपनी राह है। मैडम समय-समय पर मुझे बुलाती थीं, क्योंकि इस प्रोजेक्ट की संचालन समिति की अध्यक्ष वे खुद थीं और उपाध्यक्ष ग्रामीण विकास मंत्री थे।

मैंने खुद को समझाया कि एक अच्छा अभिनेता वही होता है, जिसे पता हो कि कब स्टेज पर आना है और कब अपना रोल पूरा करके उतर जाना है। मैंने अपने पुराने रोल को भूलकर नए रोल पर पूरी गंभीरता से ध्यान देना शुरू किया। यहाँ मुझे निर्णय लेने की पूरी आजादी थी। मैं अपनी मर्जी से अपना काम कर रहा था। मुझे पहली बार खुले आकाश में उड़ते हुए पक्षी जैसा महसूस हो रहा था। राजनीति के षड्यंत्र, जोड़-तोड़ और लोगों का दोहरापन मुझे कभी रास नहीं आया था। अब मैं उन सब से दूर, अपने सिद्धांतों के साथ काम कर रहा था, और यह मेरे लिए सबसे बड़ा संतोष था।

प्रोजेक्ट डायरेक्टर डीपीआईपी

मेरा नया मिशन: जब मैं डीपीआईपी का प्रोजेक्ट डायरेक्टर बना मुख्यमंत्री कार्यालय की चकाचौंध से निकलकर, मैं एक नए और अनजाने सफर पर निकल पड़ा था। मेरी नई मंजिल थी, वर्ल्ड बैंक द्वारा वित्त पोषित जिला गरीबी उन्मूलन परियोजना (DPIP), और मेरा पद था प्रोजेक्ट डायरेक्टर। यह मेरे लिए सिर्फ एक पद नहीं था, बल्कि एक ऐसी आजादी थी जिसे मैंने खोखले ग्लैमर के बीच महसूस किया था। सत्ता के गलियारों में जो सुकून नहीं मिला, वह मुझे यहां मिला खुले आकाश में उड़ते पक्षी की तरह।

परियोजना की आत्मा: एक अनोखा मॉडल

जब मैंने परियोजना को समझना शुरू किया, तो मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं है। यह एक क्रांतिकारी प्रयोग था जो पारंपरिक 'टॉप-डाउन' (ऊपर से नीचे) दृष्टिकोण को चुनौती दे रहा था। हमारा मकसद था एक 'बॉटम-अप' (नीचे से ऊपर) मॉडल बनाना, जहाँ गरीब खुद अपनी किस्मत लिखें।

पहला कदम था सही लोगों तक पहुँचना। इसके लिए हमने एक अभिनव तरीका अपनाया, जिससे "धन रैंकिंग प्रणाली" कहते थे। मैंने देखा कि सरकारी बीपीएल कार्डों के बावजूद, कई सबसे गरीब परिवार छूट जाते थे। हमारी टीम ने गाँव के लोगों को इकट्ठा किया और उसे ही अपने गाँव के परिवारों को उनकी आर्थिक स्थिति के अनुसार श्रेणीबद्ध करने को कहा। यह एक अद्भुत प्रक्रिया थी पूरी पारदर्शिता के साथ, जहाँ लोग अपने स्थानीय ज्ञान का उपयोग करके तय करते थे कि कौन सबसे गरीब है, कौन गरीब है, और कौन अमीर। यह प्रणाली सरकारी सर्वेक्षणों से कहीं ज्यादा सटीक थी और उसने समुदाय में एक मजबूत स्वामित्व की भावना पैदा की।

अगला चरण था इन सबसे गरीब परिवारों को संगठित करना। हमने उन्हें सामुदायिक हित समूहों (Common Interest Groups - CIGs) में बाँटा। ये समूह किसी एक साझा समस्या या आर्थिक गतिविधि के आधार पर बने थे। जैसे, कुछ किसानों ने बेहतर सिंचाई के लिए, तो कुछ महिलाओं ने सिलाई-कढ़ाई के लिए समूह बनाए। यह SHG से अलग था क्योंकि हम उन्हें सीधे ₹20,000 की सिंगल पेमेंट दे रहे थे, जो उनकी चुनी हुई गतिविधियों को तुरंत शुरू करने के लिए था। यह 'डिमांड-ड्रिवेन' यानी मांग-आधारित मॉडल था, जिसने लोगों को सशक्त महसूस कराया।

सपनों को हकीकत में बदलना: टीम का गठन

इस महत्वाकांक्षी परियोजना को चलाने के लिए हमें एक खास टीम की जरूरत थी। मुझे पता था कि हमें सिर्फ डिग्री वाले लोग नहीं चाहिए, बल्कि ऐसे लोग चाहिए जो जमीन पर काम कर सकें, जिनके दिल में गरीबों के लिए सहानुभूति हो। हमने साइकोमेट्रिक परीक्षण जैसे औपचारिक तरीकों का उपयोग तो नहीं किया, लेकिन हमारी भर्ती प्रक्रिया 'समग्र प्रतिभा मूल्यांकन' (Holistic Talent Evaluation) पर आधारित थी।

हमने खुले बाजार से उम्मीदवारों का चयन किया। प्रारंभिक स्क्रीनिंग के बाद, उम्मीदवारों को समूह चर्चा और व्यक्तिगत साक्षात्कार से गुजरना पड़ता था। हम उनकी सहानुभूति, टीम वर्क और सामाजिक जुड़ाव का आकलन करते थे। इसी प्रक्रिया के माध्यम से हमने प्रोजेक्ट फैसिलिटेशन टीम (PFT) बनाई, जिन्हें हमने गाँव स्तर पर तैनात किया। ये लोग, जिन्हें अक्सर 'क्लस्टर टीम' भी कहा जाता था, परियोजना की रीढ़ थे।

NGOs और अन्य सलाहकार संगठनों ने भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 'एक्शन फॉर सोशल एडवांसमेंट' (ASA) जैसे संगठनों ने हमें किसानों के समूह बनाने और कृषि उत्पादक संगठनों (Farmer Producer Organizations - FPOs) के गठन में तकनीकी सहायता दी। ये संगठन एक सेतु की तरह काम कर रहे थे, जो सरकार और समुदाय के बीच विश्वास स्थापित कर रहे थे।

सफलता की गूँज और भविष्य की दिशा

परियोजना के परिणाम अद्भुत थे। वर्ल्ड बैंक की परियोजना मूल्यांकन रिपोर्ट (PAD) के अनुसार, CIGs से जुड़े परिवारों की औसत आय में 53% की वृद्धि हुई। गांव से शहरों की ओर होने वाले 'संकटग्रस्त प्रवासन' (distress migration) में भारी कमी आई।

इस सफलता से उत्साहित होकर, हमने दूसरे चरण (DPIP II) की तैयारी शुरू की। इस दौरान हमने कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए। हमने महसूस किया कि CIGs ने त्वरित परिणाम तो दिए, लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए हमें एक अलग मॉडल की जरूरत है। इसलिए, हमने स्वयं सहायता समूहों (SHGs) पर अधिक ध्यान केंद्रित किया। हमारा मानना था कि बचत और ऋण के नियमित चक्र के माध्यम से SHGs वित्तीय समावेशन और दीर्घकालिक सशक्तिकरण के लिए अधिक स्थायी मॉडल हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण और अन्य रिपोर्ट से यह स्पष्ट था कि हमारा मॉडल काम कर रहा था। मेरी टीम ने एक एक्टिविटी-बेस्ड फेडरेशन और मैक्स कोऑपरेटिव की अवधारणा भी विकसित की, जो समूहों को बड़े स्तर पर जोड़ सके। मेरे लिए यह सिर्फ एक नौकरी नहीं थी। यह एक मिशन था, जिसने मुझे दिखाया कि अगर सही दृष्टिकोण और सच्ची नीयत हो, तो हम सबसे बड़ी समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। यह मेरे जीवन का वह दौर था, जिसने मुझे सबसे अधिक संतोष और उद्देश्य की भावना दी।

गरीबी से जंग: एक अनकही दास्तान 

साल 2001. मध्य प्रदेश के कुछ सबसे पिछड़े और गुमनाम गाँवों पर गरीबी का घना अंधेरा छाया हुआ था। जहाँ उम्मीद की किरण तक नहीं पहुँचती थी, वहाँ जीवन सिर्फ एक संघर्ष था। भुखमरी, बेरोजगारी और पलायन एक कड़वी सच्चाई थी। सरकारी योजनाएं कागजों पर तो चलती थी, पर ज़मीन पर उनकी आहट तक नहीं सुनाई देती थी। ऐसे में, वर्ल्ड बैंक की एक महत्वाकांक्षी योजना ने दस्तक दी- जिला गरीबी उन्मूलन परियोजना (DPIP), जिसे देखकर लोग हैरान थे, क्योंकि यह योजना बाकी योजनाओं से बहुत अलग थी।

यह एक ऐसा प्रोजेक्ट था जिसने गांव की बदहाली की कहानी को हमेशा के लिए बदल दिया। यह कोई साधारण सरकारी योजना नहीं थी। यह एक क्रांति थी, जिसने यह साबित किया कि जब सत्ता और पैसा अधिकारियों के हाथों से निकलकर सीधे गरीबों के हाथों में पहुंचता है, तो भ्रष्टाचार की दीवारें ढह जाती हैं और विकास की एक नई इबारत लिखी जाती है।

जब भरोसा ही सबसे बड़ी दौलत बन गया

अधिकारियों के कंट्रोल में चलने वाली योजनाओं से गाँव के लोगों का भरोसा उठ चुका था। उन्हें लगता था कि उनका दुख सिर्फ कागजों पर दर्ज होता है, समाधान कभी नहीं होता। तब DPIP के प्रोजेक्ट डायरेक्टर ने एक साहसिक निर्णय लिया। उन्होंने कहा, "अगर हम वाकई में बदलाव चाहते हैं, तो हमें एक बार भरोसा करना होगा। हमें पैसा और जिम्मेदारी सीधे उन लोगों को देनी होगी, जिनके लिए योजना बनाई गई है।" यह एक क्रांतिकारी सोच थी। उन्होंने महसूस किया कि जब कोई व्यक्ति अपने काम और पैसे का मालिक होता है, तो वह उसे कभी खराब नहीं होने देता। यह एक गहरा मनोवैज्ञानिक तथ्य था, जिसे DPIP ने अपनी नींव बनाया।

यह योजना टॉप-डाउन (ऊपर से नीचे) मॉडल को छोड़कर बॉटम-अप (नीचे से ऊपर) मॉडल पर काम करती थी। यानी, गाँव के लोग खुद तय करते थे कि उन्हें क्या करना है और कैसे करना है।  सरकार और वर्ल्ड बैंक ने सिर्फ एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई।

धन रैंकिंग: जब गाँव ने गाँव को पहचाना

परियोजना का सबसे बड़ा चमत्कार था गाँव के सबसे गरीब परिवारों को चुनना। कैसे? किसी सरकारी सर्वे या बाबू की रिपोर्ट से नहीं, बल्कि गांव के लोगों ने खुद एक अनोखी "धन रैंकिंग" प्रणाली का इस्तेमाल किया।

गाँव के चौपाल में सभी लोग इकट्ठा होते थे। वहाँ कोई बाहरी अधिकारी नहीं, सिर्फ गाँव के लोग होते थे। वे अपने गाँव के हर परिवार का नाम एक पर्ची पर लिखते थे और फिर उन्हें तीन या चार श्रेणियों में बाँटते थे: सबसे गरीब, गरीब, मध्यम और अमीर। यह फैसला जमीन के मालिक, पशुओं की संख्या, घर की छत और यहाँ तक कि बच्चों के स्कूल जाने जैसी बातों पर आधारित होता था। यह पूरी प्रक्रिया सबकी आँखों के सामने होती थी। कोई आपत्ति उठाता, तो सब मिलकर उस पर चर्चा करते थे।

इस प्रक्रिया ने न केवल सही लोगों को चुना, बल्कि गाँव में एक नई सामाजिक एकजुटता पैदा की। लोगों ने पहली बार महसूस किया कि यह उनकी अपनी योजना है, उनका अपना फैसला है।

एकमुश्त पैसा: भरोसे की एक नई परिभाषा

इस प्रोजेक्ट में सबसे चौंकाने वाली बात थी पैसों का लेन-देन। आमतौर पर, सरकारी योजनाओं में पैसा टुकड़ों-टुकड़ों में आता है, और हर टुकड़े पर कई अधिकारियों की मुहर लगती है। लेकिन DPIP में ऐसा नहीं था। गरीब परिवारों के बनाए समूहों, जिन्हें सामुदायिक हित समूह (CIGs) कहते थे, के बैंक खाते में सीधे ₹20,000 की एकमुश्त अनुदान राशि ट्रांसफर कर दी जाती थी। उनकी चेक बुक और पासबुक उनके पास होती थी। परियोजना के स्टाफ के हाथ में कोई पैसा नहीं दिया गया था।

इस एकल भुगतान (Single Payment) ने भ्रष्टाचार की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया। यह सिर्फ एक वित्तीय लेन-देन नहीं था, यह एक संदेश था: हमें तुम पर पूरा भरोसा है! इस भरोसे के परिणाम अद्भुत थे। गांव वालों ने अपने पैसों का इतना सदुपयोग किया कि कल्पना करना मुश्किल था। साढ़े चार सौ से ज्यादा अलग-अलग आर्थिक गतिविधियां शुरू हुईं – कोई बकरी पालन कर रहा था, कोई मसाले पीस रहा था, तो कोई सिलाई का काम। यह मांग-आधारित (Demand-Driven) दृष्टिकोण था, जहां लोगों की अपनी जरूरतों और समझ से विकास का पहिया घूम रहा था।

SHGs बनाम CIGs: दो अलग-अलग कहानियाँ

परियोजना के पहले चरण में CIGs का मॉडल बहुत सफल रहा। ये समूह किसी खास आर्थिक गतिविधि के लिए बनाए गए थे। उनका उद्देश्य तुरंत आय बढ़ाता था, और उन्होंने यह कर दिखाया। वर्ल्ड बैंक के मूल्यांकन में यह सामने आया कि CIGs से जुड़े परिवारों की औसत आय में 53% की वृद्धि हुई और पलायन में भारी कमी आई।

लेकिन, लंबी अवधि की स्थिरता के लिए, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) का मॉडल बेहतर माना गया। SHGs मुख्य रूप से बचत और ऋण पर काम करते हैं। वे अपनी खुद की बचत से एक-दूसरे को छोटे ऋण देते हैं, जिससे एक आत्मनिर्भर चक्र चलता है। DPIP की सफलता से उत्साहित होकर, वर्ल्ड बैंक ने दूसरे चरण (DPIP II) में SHG मॉडल पर ज्यादा जोर दिया।

DPIP ने दिखा दिया कि CIGs तात्कालिक परिणाम देने में बहुत शक्तिशाली हैं, जबकि SHGs दीर्घकालीन वित्तीय स्थिरता और सामाजिक सशक्तिकरण के लिए अधिक प्रभावी हैं, खासकर महिलाओं के लिए।

जब अजनबी गांव में बस गए

गाँवों का चुनाव भी एक चुनौती थी। सबसे पिछड़े और दुर्गम गाँव चुने गए, जहाँ कोई भी सरकारी कर्मचारी नहीं रहना चाहता था। कुछ गांव तो अपनी आपराधिक गतिविधियों के लिए कुख्यात थे। ऐसे गाँवों में दिन में भी जाने से लोग डरते थे।

लेकिन इस प्रोजेक्ट की प्रोजेक्ट फैसिलिटेशन टीम (PFTs), जिसमें इंजीनियर, सोशल वर्कर, विषय विशेषज्ञ और अकाउंटेंट शामिल थे, ने इन चुनौतियों का सामना किया। ये लोग सिर्फ सरकारी कर्मचारी नहीं थे; ये वे लोग थे जो ग्रामीण विकास के प्रति जुनूनी थे। उन्हें सिर्फ योग्यता के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक संवेदनशीलता, टीम वर्क और जमीनी स्तर पर काम करने की इच्छा को परख कर चुना गया था। उन्होंने इन गांवों को अपनी कर्मभूमि बनाया और स्थानीय लोगों के साथ मिलकर काम किया।

इन अजनबियों ने गाँव के लोगों का दिल जीता और उनके साथ मिलकर एक नई कहानी लिखी। उन्होंने साबित किया कि ग्रामीण विकास सिर्फ योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों के साथ जुड़कर और उन पर विश्वास करके होता है।

DPIP की सफलता ने भारत और दुनिया को एक नया सबक सिखाया। यह सिर्फ गरीबी कम करने का प्रोजेक्ट नहीं था, यह भरोसा, भागीदारी और मानवीय गरिमा को बहाल करने का एक महाकाव्य था। यह कहानी है कि कैसे सरकारी मशीनरी और गैर-सरकारी संगठनों का सहयोग, और सबसे बढ़कर, ग्रामीण समुदाय के दृढ़ संकल्प ने एक असंभव दिखने वाले सपने को सच कर दिखाया।

ट्रेनिंग: जब दरिद्रता निवारण कथा ने गाँव को राह दिखाई

प्रोजेक्ट की सफलता सिर्फ कागज़ पर लिखे प्लान से नहीं आती, बल्कि उस टीम के जुनून और तैयारी से आती है जो इसे ज़मीन पर उतारती है। मेरा मानना था कि हमारी टीम की ट्रेनिंग उतनी ही ज़रूरी है जितनी किसी सैनिक या खिलाड़ी के लिए नियमित अभ्यास। यह सिर्फ क्लासरूम की पढ़ाई नहीं थी, यह "कर के सीखने" का अनुभव था।

इसी सोच के साथ, मैंने एक अनोखी कथा लिखी, जिसे हमारे प्रोजेक्ट के सदस्य गाँव-गाँव जाकर सुनाते थे। यह 'श्री दरिद्रता निवारण कथा' थी, जो सतयुग की नहीं, बल्कि इस कलयुग के गाँवों की, उनके संघर्षों की और उनकी जीत की कहानी थी।

पहला अध्याय: लक्ष्मी का वचन

भोजपाल (भोपाल) के तीर्थ में लाखों गरीब परिवारों ने सूत जी से पूछा, "हे प्रभु, इस कलियुग में गरीबी से हमारा उद्धार कैसे होगा? हमें ऐसा उपाय बताइए जिससे हम भी लक्ष्मी पा सकें।"

सूत जी मुस्कुराए और बोले, "हे प्राणियों! तुम सबने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं तुम्हें वही उपाय बताता हूँ जो स्वयं देवी लक्ष्मी ने नारद मुनि को बताया था।"

फिर उन्होंने कथा शुरू की। नारद मुनि ने पृथ्वी पर आकर देखा कि कैसे गाँव के लोग गरीबी के दुष्चक्र में फँसे हुए हैं। वे तुरंत विष्णुलोक पहुँचे और देवी लक्ष्मी से उनकी पीड़ा दूर करने का उपाय पूछा।

देवी लक्ष्मी ने कहा, "हे नारद! मनुष्यों ने अपने कर्मों से यह दशा पाई है। लेकिन एक ऐसा उपाय है जो उन्हें इस चक्र से बाहर निकाल सकता है  स्व-सहायता समूह! यदि वे एक साथ मिलकर, मेहनत और लगन से काम करें तो उनकी गरीबी अवश्य दूर होगी।"

नारद ने समूह बनाने का विधान पूछा। देवी लक्ष्मी ने विस्तार से समझाया कि कैसे 10-20 लोग मिलकर, एक जैसी सोच वाले परिवार, अपनी समस्याओं पर चर्चा करें और एक साथ काम करने का संकल्प लें। उन्होंने बताया कि समूह में नियमित बैठकें हों, छोटी-छोटी बचत की जाए, और पारदर्शिता से काम हो। इस तरह की कथा सुनकर समूह के लोग बहुत जल्दी समूह का संचालन सीख जाते थे।

दूसरा अध्याय: मजनी गाँव का मोक्ष

सूत जी बोले, "अब मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ, जिसने इस उपाय की शक्ति को साबित कर दिया।"

नरसिंहपुर का मजनी गाँव, जो उबड़-खाबड़ ज़मीन और डर के साए में जीता था। वहाँ के पुरुष चोरी और अवैध शराब के धंधे में लगे थे, और डर के कारण गाँव में कोई बाहरी व्यक्ति कदम रखने की हिम्मत नहीं करता था। शादी-ब्याह भी मुश्किल था।

लेकिन, जब DPIP टीम ने साल भर की हिम्मत के बाद इस गाँव में प्रवेश किया, तो वहाँ की महिलाओं और बुजुर्गों से उनकी सहज बातचीत ने माहौल बदल दिया। धीरे-धीरे, गांव के लोग उन पर विश्वास करने लगे। उन्होंने पहली बार अपनी समस्याओं पर खुलकर बात की।

गाँव वालों ने सामूहिक रूप से कसम खाई – न शराब बनाएँगे, न जुआ खेलेंगे और न पेड़ काटेंगे। फिर, परियोजना की मदद से उनकी बंजर ज़मीन को खेती योग्य बनाया गया। ट्यूबवेल लगे, स्प्रिंकलर से सिंचाई होने लगी। गाँव में पहली बार अरहर, चना और सब्जियाँ लहलहा उठीं। डबल सिंह, घासीराम और गोपी जैसे किसानों ने अपनी फसल देखकर अपने भाग्य को सराहा।

लक्ष्मी देवी की कृपा हुई और गाँव में समृद्धि लौट आई। मजनी गांव को गरीबी से मोक्ष मिल गया।

तीसरा अध्याय: जब महिलाओं ने कुएँ खोद दिए

सूत जी ने आगे कहा, "अब मैं तुम्हें टीकमगढ़ की उन वीरांगनाओं की कथा सुनाता हूँ, जिन्होंने खुद अपनी किस्मत लिखी।"

लक्ष्मणपुरा, सुनौनी और बैसाउगढ़ की महिलाओं ने जब DPIP के बारे में सुना तो वे खुद सहयोग दल के पास गई। "हमें भी यह उपाय बताइए," उन्होंने कहा।

सहयोग दल ने उन्हें समूह बनाने की पूरी विधि बताई। कैसे समूह में नियम बनाए जाते हैं, बैठकें होती हैं, और बैंक खाता खोला जाता है। उन्होंने बताया कि इस उपाय को करने से वे न केवल आर्थिक रूप से, बल्कि सामाजिक रूप से भी सशक्त होंगी।

इन महिलाओं ने घर जाकर अपने-अपने समूह बनाए। 110 महिलाओं ने मिलकर 25 से ज़्यादा कुएँ खोदे। उनकी देखादेखी, अन्य गाँवों में भी कुओं का निर्माण हुआ। जिन खेतों में सिर्फ मानसून की फसल होती थी, अब साल में दो फसलें होने लगीं।

दुर्गा सम हित समूह की दसूबाई, शांति सम हित समूह की बेटी बाई और अन्य महिलाओं अब अपने दम पर अपने परिवार को धन-धान्य से भर रही थी। काली माता समूह की लाड़कुवर बाई और विश्वकर्मा समूह की द्रोपदी बाई को लोग "कुएँ वाली बाई" के नाम से जानने लगे थे।

चौथा अध्याय: सुआ गांव का पुनर्जन्म

सूत जी बोले, "अब शाजापुर के सुआ गांव की कथा सुनो।"

राजस्थान की सीमा पर बसा यह गाँव बहुत पिछड़ा था। पथरीली ज़मीन और सूखे कुओं के कारण यहाँ के 98% परिवार मजदूरी के लिए गुजरात या इंदौर पलायन करते थे। साहूकार से लिया गया कर्ज उन्हें कभी नहीं छोड़ता था।

एक दिन, गाँव के कुछ लोग पास के बाज़ार में गए और वहाँ अपने गाँव वालों को खुशहाल देखकर हैरान हो गए। उन्होंने पूछा तो पता चला कि यह सब DPIP की वजह से हुआ है।

प्रोजेक्ट टीम सुआ गाँव पहुँची। उन्होंने वहाँ के लोगों से गाँव का नक्शा बनवाया, जिससे लोगों को समझ आया कि उनकी समस्याओं का समाधान उनके अपने गाँव में ही छिपा है। उन्होंने तय किया कि वे बारिश का पानी रोकेंगे।

श्रीराम, श्रीकृष्ण और साँवरिया जैसे समूहों ने मिलकर परकोलेशन टैंक और स्टॉप डेम बनाए। इस जल संरक्षण से कुओं का जलस्तर बढ़ा और गाँव में हरियाली लौट आई। अब गाँव में साल में तीन फसलें हो रही थीं। लोगों ने पलायन बंद कर दिया था। साहूकार के कर्ज उतर गए थे और गाँव में ट्रैक्टर-थ्रेशर आ गए थे।

पाँचवाँ अध्याय: मुर्गियों ने दिलाई साहूकार से मुक्ति

सूत जी ने कहा, "अब मैं सीधी जिले की उन महिलाओं की कहानी बताता हूँ, जिन्होंने अपनी सोसाइटी बनाकर सूदखोर साहूकार को मात दी।"

सीधी की उर्मिला बाई और उनकी सहेलियों ने हालात से समझौता करने से इनकार कर दिया। उन्होंने मुर्गी पालन का प्रशिक्षण लिया। शुरुआती मुश्किलें आयीं  मुर्गियों की गंध और उनकी देखभाल का कठिन काम। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। जब 40 दिन बाद पहली बार अपनी कमाई गिनी तो उनके मन में जो आत्मविश्वास आया, उसकी कोई कीमत नहीं थी।

आज सीधी के 14 गाँवों की महिलाएँ मुर्गी पालन कर रही हैं। बसंती बाई कहती हैं, "बिना समूह बनाए यह काम नहीं हो सकता।" उर्मिला बाई कहती हैं, "गरीबी से बड़ा कोई अभिशाप नहीं है, यह रोज़-रोज़ तिल-तिल कर मारती है।"

सूत जी ने अपनी कथा समाप्त करते हुए कहा, "जिस तरह इन लोगों ने विश्वास करके अपनी गरीबी दूर की, उसी तरह तुम सब भी इस उपाय को अपनाकर भय, भूख और अपमान से मुक्त हो सकते हो।"

इस कथा का वाचन प्रोजेक्ट के लोग समूह की महिलाओं के बीच करते थे। इस प्रयोग के बहुत सकारात्मक परिणाम आये। यह पांच वास्तविक सफलता की कहानियां थी जिन्हें सत्यनारायण की कथा की शैली में कथा का रूप दिया गया था। ग्रामीण महिला इन कथाओं को समझकर प्रेरणा लेती थी। 

एचआर पॉलिसी: जब जुनून ने नियम बनाए

मैं जानता था कि सरकारी नौकरी सामाजिक सुरक्षा है, क्षमता से काम करवाने का साधन नहीं। लेकिन इस प्रोजेक्ट में हमने यह सोच बदल दी। हमने सख्त एचआर पॉलिसी (HR Policy) बनाई। यदि कोई कर्मचारी अपने काम में खरा नहीं उतरा या गलत आचरण करता, तो उसे बिना किसी दबाव के बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता था।

मेरा यह मानना था कि टीम को काम करने के लिए तनाव मुक्त वातावरण मिलना चाहिए। इसके लिए मैंने कई बार अपने करियर को दाँव पर लगाया।

प्रोड्यूसर कंपनी: बाज़ार की तीन शर्तें

हमने यह सीखा कि बाज़ार की तीन मुख्य शर्तें होती हैं: बड़ी मात्रा, एक जैसी गुणवत्ता और प्रतिस्पर्धी मूल्य। एक गरीब किसान इन शर्तों को अकेला पूरा नहीं कर सकता। इसलिए, हमने एक्टिविटी-बेस्ड फेडरेशन बनाए, जिन्हें बाद में म्यूचुअल एडेड को-ऑपरेटिव सोसाइटीज़ (MACAS) और फिर प्रोड्यूसर कंपनियों में पंजीकृत किया गया।

ये कंपनियाँ किसानों के समूह द्वारा चलाई जाती थीं, जिससे वे सीधे बाज़ार से जुड़ सके और बिचौलियों को खत्म कर सकें। सिरोंज, विदिशा में हमारी पहली प्रोड्यूसर कंपनी का पंजीकरण हुआ, जो मध्य प्रदेश के लिए एक ऐतिहासिक पल था।

विश्वासघात: जब अपने ही दुश्मन बन गए

यह कहानी सिर्फ एक प्रोजेक्ट की नहीं, बल्कि एक इंसान के सबसे बड़े डर की है-  विश्वासघात की। यह कहानी है उस दर्दनाक पल की, जब मुझे पता चला कि जिस पर मैंने सबसे ज़्यादा भरोसा किया, वही मेरे खिलाफ साज़िश रच रहा था।

पहला वार: गुमनाम शिकायतों का तूफ़ान

एक दिन, मेरे ईमेल इनबॉक्स में विश्व बैंक से एक अजीब मेल आया। यह मेरे और प्रोजेक्ट के खिलाफ एक शिकायत थी, जिसमें पक्षपात और भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे। मेरे लिए यह चौंकाने वाला था, क्योंकि मैंने हमेशा पारदर्शिता से काम किया था। मैंने तुरंत अपने सबसे भरोसेमंद वरिष्ठ सहयोगी को यह मेल फ़ॉरवर्ड किया। वह शिकायतों के जवाब तैयार करने का काम करता था और मुझे उस पर पूरा विश्वास था। उसने जवाब तैयार किया, मैंने उसे शासन से अनुमोदित करवाया और भेज दिया।

मुझे लगा कि बात यहीं खत्म हो जाएगी। लेकिन, यह तो बस शुरुआत थी।

एक के बाद एक शिकायत आने लगीं। हर सप्ताह, भद्दी गालियों और झूठे आरोपों से भरी गुमनाम चिट्ठियाँ विश्व बैंक के अध्यक्ष, मुख्यमंत्री, मुख्य सचिव और लोकायुक्त तक भेजी जा रही थीं। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि यह सब क्यों हो रहा है। मेरी सारी फ़ाइलें, हर दस्तावेज़ सही था। मैंने कोई गलती नहीं की थी, फिर भी मुझ पर लगे आरोपों का बोझ मेरे मन को भारी कर रहा था।

मैं हर बार उसी सहयोगी से शिकायतों के जवाब बनवाता रहा। वह हमेशा की तरह कुशलता से जवाब तैयार करता। वह मेरे लिए न केवल एक सहयोगी था, बल्कि एक विश्वासपात्र भी था। मुझे यह जानकर हैरानी होती थी कि शिकायतों में लिखे पते, यहाँ तक कि भोपाल में किसी मकान का पता भी उसे कैसे पता होता था। लेकिन मेरे मन में कभी शक नहीं आया, क्योंकि मैं उस पर आँखें बंद करके भरोसा करता था।

दूसरा वार: सच की एक पतली सील

एक दिन, मैंने एक शिकायत वाले लिफाफे को ध्यान से देखा। उस पर पोस्ट ऑफ़िस की एक सील लगी थी। मेरे अंदर कुछ खटका। यह एक छोटी सी बात थी, लेकिन उसने मेरे दिमाग में एक चिंगारी पैदा कर दी। मैं अगले ही दिन उस पोस्ट ऑफ़िस पहुँचा और वहाँ के पोस्टमास्टर से पूछा, "यह रजिस्ट्री कौन भेजता है?"

उसने जिस आदमी का नाम लिया, वह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई – यह मेरे उसी वरिष्ठ सहयोगी का नाम था। मेरे कानों को यकीन नहीं हुआ। यह कैसे हो सकता है? मैंने तुरंत खुद को संभाला और और ज़्यादा पड़ताल करने का फैसला किया।

मैंने अपने ऑफ़िस के डाक विभाग के कंप्यूटर की जाँच की। वहाँ शिकायतों के लिफाफों पर चिपकाए गए पतों की स्लिप्स को देखा। वह स्लिप्स मेरे ही ऑफ़िस के कंप्यूटर से प्रिंट की गई थीं। उस पल, मेरे भीतर का भरोसा, जो एक मजबूत चट्टान की तरह था, चूर-चूर हो गया।

मैं मानसिक रूप से टूट चुका था। दो महीने से जिस मानसिक पीड़ा से मैं गुज़र रहा था, उसका कारण कोई बाहरी दुश्मन नहीं, बल्कि मेरे ही पास बैठा एक दोस्त था।

जब विश्वास की दीवार ढह गई

मैं वापस ऑफ़िस आया। मेरा मन एक तूफ़ान की तरह उथल-पुथल कर रहा था। मैंने अपने उस सहयोगी को अपने पास बुलाया और सीधे उससे पूछा।

पहले तो वह बहाने बनाता रहा और सब कुछ नकारता रहा। लेकिन जब मैंने उसे सबूत दिखाए, तो वह टूट गया। उसने स्वीकार किया, "हाँ, मैं ही यह सब कर रहा था।"

उसने बताया कि वह प्रोजेक्ट छोड़ना चाहता था, लेकिन मैंने उसे रोक लिया था। इस बात से वह मुझसे नाराज़ हो गया था। यह नाराजगी इतनी गहरी थी कि उसने मेरे खिलाफ यह षड्यंत्र रच डाला। यह जानकर मेरा दिल टूट गया कि वह लैपटॉप जो मैंने उसे खुद खरीद कर दिया था, उसी का इस्तेमाल वह मेरे खिलाफ साज़िश रचने के लिए कर रहा था। वह मेरे ऑफ़िस के डाक टिकटों का इस्तेमाल करता, और मैं उसी से शिकायतों का जवाब बनवाता था।

यह खेल लगभग दो महीने तक चला था। मेरे लिए यह सिर्फ एक धोखे की कहानी नहीं थी, यह एक ऐसा घाव था जिसने मेरे विश्वास को हमेशा के लिए बदल दिया। यह उस दर्द की कहानी है जब कोई अपना ही आपके पीठ में खंजर घोंप देता है, और आप लंबे समय तक उस सच्चाई से अनजान रहते हैं।

अंतिम अध्याय: जब सफर खत्म हुआ

प्रोजेक्ट को विश्व बैंक द्वारा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में सर्वश्रेष्ठ प्रोजेक्ट का पुरस्कार मिला। मेरे लिए यह एक बड़ी उपलब्धि थी। पाँच साल पूरे हो गए थे और दूसरे चरण के समझौते पर भी हस्ताक्षर हो चुके थे।

दिल्ली से लौटते हुए एयरपोर्ट पर मेरे मन में एक सवाल उठा: "क्या मुझे अब रुकना चाहिए या निकल जाना चाहिए?" मैं अपनी टीम को तो यह प्रोजेक्ट सौंप चुका था। एयरपोर्ट से मैं सीधे अपने बॉस, श्री इंद्रनील दानी, के पास गया। वह एक सुलझे हुए अधिकारी थे। मैंने उनसे पूछा, "सर, आप मेरी जगह होते तो क्या करते?"

उन्होंने बिना सोचे कहा, "मैं प्रोजेक्ट छोड़ देता। सरकार में एक ही पद पर लंबे समय तक रहना मुश्किलें बढ़ाता है।"

मुझे मेरा जवाब मिल गया था। मैंने तुरंत अपना निर्णय लिया और वल्लभ भवन की ओर चल दिया। मेरा मन था कि मैं अपने फैसले से मुकरूँ, इससे पहले मैं मुख्य सचिव महोदय को अपना निर्णय बता दू । मेरे लिए यह एक प्रोजेक्ट का अंत नहीं, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत थी।

संभागीय आयुक्त, रीवा

रीवा का वादा: जब मुख्यमंत्री ने एक अफसर पर भरोसा किया

मुख्य सचिव से मेरी दो मुलाकातें हो चुकी थीं, लेकिन मेरा स्थानांतरण आदेश (transfer order) नहीं निकल रहा था। मैं जानता था कि यह एक जटिल प्रक्रिया है, खासकर जब आप किसी बड़े और सफल प्रोजेक्ट से जुड़े हों। दूसरी बार जब मैं उनसे मिला, तो मैंने अपनी बात दोहराई। उन्होंने साफ कहा, "रविंद्र, तुम तो जानते हो कि किसी का ट्रांसफर आदेश निकालने की शक्ति अकेले मुख्य सचिव के पास नहीं है।"

मैंने उन्हें समझाया कि मुझे किसी खास जगह पर नहीं जाना है। मेरी कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं है, इसलिए उन्हें कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। इस बात पर उन्होंने सहमति जताई कि वे मुख्यमंत्री जी से बात करेंगे।

मुख्यमंत्री का सीधा फ़ोन

कुछ दिन बाद, मेरे फोन की घंटी बजी। दूसरी तरफ मुख्यमंत्री जी की आवाज़ थी।  उन्होंने सीधे मुद्दे पर बात की। "रविंद्र, मैं तुम्हारा ट्रांसफर करना चाहता हूँ।" फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कहाँ जाना चाहता हूँ। यह मेरे लिए एक असामान्य अनुभव था। एक मुख्यमंत्री सीधे किसी अफसर से उसकी पसंद पूछ रहे थे।

मैंने विनम्रता से कहा, "सर, मेरी कोई पसंद नहीं है। आप जहाँ चाहें, मेरा ट्रांसफर कर दें।"

शायद मेरी यह बेफिक्री और ईमानदारी उन्हें पसंद आई। उन्होंने तुरंत फैसला लिया और मुझे रीवा कमिश्नर के पद पर तैनात कर दिया।

रीवा: एक नई चुनौती

रीवा रवाना होने से पहले, मैं शिष्टाचारवश मुख्यमंत्री जी से मिलने गया। उन्होंने मुझे देखकर गहरी बात कही, जो मेरे दिल में उतर गई। मध्य प्रदेश का बघेलखंड क्षेत्र एक गौरवशाली इतिहास समेटे हुए है, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत काल में भी मिलता है। यह क्षेत्र सदियों तक विभिन्न राजवंशों के अधीन रहा, लेकिन बघेल राजपूतों का शासन सबसे प्रमुख रहा। 13वीं शताब्दी में बघेल वंश के शासकों ने इस क्षेत्र को अपनी राजधानी बनाया और इसका नामकरण किया।

बघेलखंड का इतिहास

बघेलखंड का नाम बघेल राजवंश के नाम पर पड़ा, उन्होंने 13वीं शताब्दी में इस क्षेत्र पर शासन स्थापित किया। इस वंश की स्थापना व्याघ्रदेव ने की थी। यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है।

प्राचीन काल: प्राचीन समय में इस क्षेत्र को "रेवोत्तर" या "रीवा खंड" के नाम से जाना जाता था। यहां पाषाण काल के अवशेष भी मिलते हैं, जो इसकी प्राचीनता को दर्शाते हैं।

मध्यकाल: मध्यकाल में यहाँ कलचुरियों का प्रभाव था, जिसके बाद बघेल वंश ने यहाँ सत्ता संभाली।

आधुनिक काल: 19वीं शताब्दी में यह क्षेत्र ब्रिटिश शासन के अधीन आ गया, लेकिन रीवा रियासत ने अपनी स्वायत्तता बनाए रखी। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, बघेलखंड की रियासतों को मिलाकर विंध्य प्रदेश का गठन किया गया, जिसकी राजधानी रीवा थी। 1956 में, विंध्य प्रदेश का मध्य प्रदेश में विलय हो गया।

रीवा का इतिहास

रीवा जिला, जिसे सफेद शेरों की भूमि के रूप में जाना जाता है, बघेलखंड का हृदय रहा है।

बघेल वंश की राजधानी: रीवा रियासत की स्थापना 1400 ईस्वी के आसपास बघेल राजपूतों द्वारा की गई थी। मुगल सम्राट अकबर द्वारा बांधवगढ़ को ध्वस्त किए जाने के बाद, 1597 ईस्वी में रीवा को बघेलखंड की राजधानी बनाया गया।

सफेद शेर: रीवा को दुनिया में सफेद शेरों के लिए जाना जाता है। 1951 में महाराजा मार्तंड सिंह ने गोविंदगढ़ के पास एक सफेद शावक को पकड़ा था, जिसका नाम 'मोहन' रखा गया। रीवा के सफेद शेर: "मोहन" की कहानी

रीवा को दुनिया भर में सफेद शेरों की भूमि के रूप में जाना जाता है। यहाँ का गौरवशाली इतिहास एक ऐसे अद्वितीय जीव से जुड़ा है जिसने रीवा के नाम को वैश्विक पहचान दिलाई। यह कहानी है उस ऐतिहासिक क्षण की जब एक दुर्लभ सफेद बाघ का जन्म हुआ और कैसे उसने दुनिया भर में सफेद बाघों के वंश को आगे बढ़ाया।

मोहन की खोज: एक ऐतिहासिक क्षण

यह कहानी शुरू होती है 27 मई 1951 को, जब रीवा के तत्कालीन महाराजा मार्तंड सिंह जूदेव अपने मित्र जोधपुर के महाराजा अजीत सिंह के साथ सीधी जिले के बरगड़ी के जंगल में शिकार खेलने गए थे। इसी दौरान उनकी नजर एक बाघिन और उसके चार शावकों पर पड़ी। महाराजा ने बाघिन और उसके दो पीले शावकों का शिकार किया, लेकिन एक शावक वहाँ से भागकर एक गुफा में छिप गया। यह शावक सफेद रंग का था, जिसकी नीली आंखें और गुलाबी नाक उसे बेहद खास बनाती थीं।

महाराजा मार्तंड सिंह इस दुर्लभ शावक को मारने के बजाय उसे पकड़ने का फैसला किया। उन्होंने जाल बिछाकर शावक को पकड़ा और अपने साथ गोविंदगढ़ महल ले आए। उन्होंने उस शावक का नाम "मोहन" रखा। उस समय मोहन की उम्र केवल 9 महीने थी।

मोहन का जीवन और राजकीय सम्मान

मोहन को गोविंदगढ़ किले में एक विशेष बाड़े में रखा गया। महाराजा मार्तंड सिंह को मोहन से गहरा लगाव था। वे अपना काफी समय मोहन के साथ बिताते थे, उनके साथ फुटबॉल खेलते थे और उसे प्यार से "मोहन जी" कहकर पुकारते थे। मोहन की एक और खास बात थी: वह रविवार को मांस नहीं खाता था, बल्कि केवल दूध पीता था।

मोहन को अकेलापन महसूस न हो, इसलिए महाराजा ने उसके साथ एक सामान्य रंग की बाघिन "बेगम" को रखा। बेगम और मोहन से कई शावक पैदा हुए, लेकिन वे सभी सामान्य रंग के थे। महाराजा ने हार नहीं मानी और विशेषज्ञों की सलाह पर मोहन का उसकी ही एक संतान, "रामबाई" नामक बाघिन के साथ प्रजनन करवाया। इस प्रयोग ने अद्भुत परिणाम दिए। 30 अक्टूबर 1956 को रामबाई ने चार सफेद शावकों को जन्म दिया, जिससे दुनिया भर में सफेद बाघों के वंश को बढ़ाने की शुरुआत हुई।

एक वंश का विस्तार

मोहन की संतानों को दुनिया के विभिन्न चिड़ियाघरों में भेजा गया। अमेरिका, इंग्लैंड और यूरोप के कई देशों में आज जितने भी सफेद बाघ पाए जाते हैं, वे सब मोहन के ही वंशज माने जाते हैं। इस तरह महाराजा मार्तंड सिंह ने एक अनोखे वन्य जीव को विलुप्त होने से बचाया और पूरी दुनिया में सफेद बाघों का एक स्वस्थ वंश स्थापित किया।

मोहन का निधन 18 सितंबर 1967 को हुआ। उसकी मृत्यु पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ शोक मनाया गया और उसे बंदूक की सलामी दी गई। मोहन की कब्र गोविंदगढ़ में बनाई गई है, और उसके सम्मान में डाक टिकट भी जारी किया गया।

सफेद शेरों का घर: मुकुंदपुर

रीवा में सफेद शेरों की विरासत को जीवित रखने के लिए महाराजा मार्तंड सिंह के नाम पर "महाराजा मार्तण्ड सिंह जू देव व्हाइट टाइगर सफारी और चिड़ियाघर" की स्थापना मुकुंदपुर में की गई है। यह दुनिया की एकमात्र सफेद शेरों की सफारी है, जहाँ पर्यटक इन दुर्लभ जीवों को उनके प्राकृतिक वातावरण में देख सकते हैं। यह सफारी रीवा के गौरवशाली इतिहास और महाराजा के वन्य जीव संरक्षण के प्रयासों का एक जीता-जागता प्रतीक है।

इस तरह, रीवा के सफेद शेरों की कहानी सिर्फ एक जानवर की नहीं, बल्कि एक महाराजा के दूरदर्शी दृष्टिकोण, वन्य जीव संरक्षण के प्रति उनके जुनून और एक ऐसे क्षेत्र के गौरव की है जिसने दुनिया को एक अनमोल उपहार दिया।

आधुनिक रीवा: 1956 में जब मध्य प्रदेश राज्य का गठन हुआ, तब रीवा विंध्य प्रदेश की राजधानी से मध्य प्रदेश का एक जिला बन गया।

सीधी का इतिहास

सीधी जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता, ऐतिहासिक महत्व और सांस्कृतिक विरासत के लिए प्रसिद्ध है।

प्राचीन काल: इस क्षेत्र में पुरातात्विक खुदाई में उच्च पुरापाषाण काल के औजार मिले हैं, जो यह दर्शाते हैं कि यहां 40,000 साल पहले भी मानव सभ्यता थी।

बघेल शासन: सीधी का अधिकांश हिस्सा पहले रीवा रियासत का हिस्सा था। 19वीं शताब्दी में, रीवा के बघेल राजपूतों ने पश्चिमी सीधी (चुरहट/रामपुर) पर शासन किया।

वर्तमान सीधी: 24 मई, 2008 को सीधी जिले से अलग करके सिंगरौली जिले का गठन किया गया, जिससे सीधी का क्षेत्र कम हो गया।

सतना का इतिहास

सतना जिला, जो रीवा संभाग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, अपने औद्योगिक और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।

नामकरण: सतना का नाम सतना नदी के नाम पर पड़ा है।

रियासतें: सतना जिला ऐतिहासिक रूप से बघेलखंड क्षेत्र का हिस्सा था और यहाँ रीवा रियासत के अधीन कई छोटी-छोटी रियासतें थीं, जैसे मैहर, नागौद, सोहावल और कोठी। मैहर और नागौद राज्य का इतिहास भी काफी पुराना है।

आधुनिक सतना: 1956 में मध्य प्रदेश के गठन के बाद, इन रियासतों को मिलाकर सतना जिले का निर्माण किया गया। आज, यह विंध्य क्षेत्र का एक प्रमुख औद्योगिक केंद्र है, जहाँ कई सीमेंट और केवल कारखाने हैं।

सिंगरौली का इतिहास

सिंगरौली, जिसे भारत की ऊर्जा राजधानी के रूप में जाना जाता है, अपनी कोयला खदानों और बिजली संयंत्रों के लिए प्रसिद्ध है।

सीधी से अलगाव: ऐतिहासिक रूप से सिंगरौली, रीवा रियासत और फिर सीधी जिले का एक हिस्सा था। 24 मई, 2008 को सिंगरौली को मध्य प्रदेश का 50वाँ जिला घोषित किया गया, जिसमें सीधी के पूर्वी भाग और उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के कुछ हिस्से शामिल किए गए।

औद्योगिक विकास: सिंगरौली का भूभाग कोयले के विशाल भंडार से भरा हुआ है, जिसके कारण यहाँ कई सुपर थर्मल पावर स्टेशन स्थापित किए गए हैं, जिनमें से विंध्याचल सुपर थर्मल पावर स्टेशन सबसे बड़ा है।

अवांछित कमिश्नर पद

कमिश्नर का पद अंग्रेजो के ज़माने में सृजित किया किए गया था। उस समय संचार संबाद के इतने साधन नहीं थे तब इस पद का बहुत महत्त्व था। अब जब सड़कों को जाल है तथा मोबाईल फ़ोन की सुविधा है तो मुख्य मंत्री तथा मुख्य सचिव या राज्य शासन के सचिव या विभागाध्यक्षय सीधे कलेक्टर से संवाद करते है। डिविशनल कमिशनर का पद अब अबांछनीय हो गया है। आज कमिशनर अपना बजूद बचने के लिए बहुत स्ट्रगल करना होता है। वह चाहता है कि कलेक्टर भी नाराज ना हो और काम चले। लेकिन कई बार कलेक्टर कमिश्नर को न्यूसेंस के तोर पर ही देखते है। कमिश्नर को ज़्यादातर नकारात्मक पॉवर है। वह लोगों की जाँच कर सकता है सस्पेंड कर सकता है। लेकिन सकारात्मक अधिकार बहुत काम होने से उससे लोग डरते ज्यादा है।  

संभागीय आयुक्त एक वरिष्ठ भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी होते हैं, जो राज्य और जिला प्रशासन के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में कार्य करते हैं। उनका मुख्य काम अपने अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी जिलों के प्रशासनिक कार्यों की निगरानी करना और यह सुनिश्चित करना है कि राज्य सरकार की नीतियां और योजनाएं प्रभावी ढंग से लागू हों। वे एक पूरे संभाग (डिवीजन) के प्रशासनिक प्रमुख होते हैं।

प्रमुख भूमिका और उत्तरदायित्व

संभागीय आयुक्त की भूमिका कई क्षेत्रों में फैली हुई है, जिसमें मुख्य रूप से प्रशासनिक, राजस्व, विकास और न्यायिक कार्य शामिल हैं।

1. प्रशासनिक कार्य

पर्यवेक्षण और समन्वय: संभागीय आयुक्त अपने संभाग के सभी जिला कलेक्टरों, पुलिस अधीक्षकों और अन्य विभागों के प्रमुखों के कामकाज का पर्यवेक्षण करते हैं। वे विभिन्न सरकारी विभागों के बीच समन्वय सुनिश्चित करते हैं ताकि सभी योजनाएं सुचारू रूप से चल सके।

कानून व्यवस्था: वे संभाग में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होते हैं। वे पुलिस अधीक्षक के साथ मिलकर काम करते हैं और आवश्यक निर्देश जारी करते हैं।

स्थापना और कार्मिक: वे अधीनस्थ अधिकारियों (जैसे तहसीलदार और नायब तहसीलदार) की नियुक्ति और स्थानांतरण से संबंधित मामलों को देखते हैं और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी कर सकते हैं।

निरीक्षण: वे संभाग के अंतर्गत आने वाले कार्यालयों का नियमित निरीक्षण करते हैं ताकि उनकी कार्यप्रणाली में सुधार किया जा सके।

2. राजस्व कार्य

राजस्व न्यायालय: संभागीय आयुक्त राजस्व न्यायालय के प्रमुख होते हैं। वे राजस्व से संबंधित अपीलीय मामलों और विवादों का निपटारा करते हैं, जो उनके नीचे के अधिकारियों (जैसे कलेक्टर) के फैसलों के खिलाफ दायर किए जाते हैं।

राजस्व प्रशासन: वे संभाग में भू-राजस्व के संग्रह और अन्य राजस्व से संबंधित कार्यों की निगरानी करते हैं।

भूमि रिकॉर्ड: वे भूमि रिकॉर्ड के रखरखाव और राजस्व से जुड़े मामलों में पारदर्शिता सुनिश्चित करते हैं।

3. विकास कार्य

योजनाओं का क्रियान्वयन: संभागीय आयुक्त राज्य सरकार और केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई विकास योजनाओं के क्रियान्वयन की निगरानी करते हैं।

विकास का मूल्यांकन: वे संभाग के समग्र विकास की समीक्षा करते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि सभी विकास कार्य समय पर पूरे हों।

जन शिकायत निवारण: वे आम जनता की शिकायतों को सुनते हैं और उनके निवारण के लिए आवश्यक कदम उठाते हैं।

शक्तियां

संभागीय आयुक्त के पास कई शक्तियां होती हैं जो उन्हें प्रभावी ढंग से काम करने में मदद करती हैं:

अपीलीय प्राधिकारी: वे कलेक्टरों और अन्य राजस्व अधिकारियों के फैसलों के खिलाफ अपीलीय प्राधिकरण के रूप में कार्य करते हैं।

नियंत्रण और मार्गदर्शन: उनके पास संभाग में सभी जिला स्तरीय अधिकारियों पर नियंत्रण और मार्गदर्शन की शक्ति होती है।

वित्तीय अधिकार: उन्हें अपने कार्यालय के खर्चों और संभाग में भवनों के रखरखाव के लिए वित्तीय आवंटन का उपयोग करने का अधिकार होता है।

संभागीय आयुक्त एक ऐसा पद है जो न केवल प्रशासनिक दक्षता, बल्कि दूरदर्शिता और नेतृत्व का भी प्रतीक है, जो एक बड़े क्षेत्र में सुशासन स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

रीवा की राजनीति: जब नकारात्मकता को सकारात्मकता में बदला गया

रीवा, एक ऐसा क्षेत्र जहाँ की हवा में ही राजनीति और जातिवाद घुला हुआ था। मैं जानता था कि यहाँ प्रशासन चलाना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। बघेलखंड, जो उत्तर प्रदेश और बिहार की सीमा से लगा हुआ था, वहाँ की राजनीति का असर यहाँ साफ दिखता था। यह सिर्फ कांग्रेस और बीजेपी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि बहुजन समाजवादी पार्टी (BSP) और कम्युनिस्ट पार्टी का भी अच्छा-खासा प्रभाव था और इन सबसे ऊपर था, जातिवाद।

राजनीति की जटिलता को समझना ज़रूरी था। कांग्रेस के शासन में, जब भोपाल में मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे, तब रीवा में श्रीनिवास तिवारी जी का वर्चस्व था। वे ब्राह्मण नेता थे और विधानसभा के अध्यक्ष थे, जिन्हें मुख्यमंत्री भी "रीवा का सफेद शेर" कहते थे। दूसरी ओर, कद्दावर नेता अर्जुन सिंह और उनके पुत्र अजय सिंह, जो विधायक और मंत्री रह चुके थे, का भी प्रभाव था। बीजेपी से राजेंद्र शुक्ला जैसे नेता उभर रहे थे, जो अब अपनी पकड़ मज़बूत कर रहे थे।

यह सब सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं था। यहाँ के लोग पढ़े-लिखे और कानून के जानकार थे। अधिकारियों की शिकायतें करना उनका मुख्य शगल था। वे जानते थे कि सरकारी दफ्तर में काम कैसे करवाया जाता है और कैसे अधिकारियों पर दबाव बनाया जाता है।

अफ़सरों की मानसिकता: "काम कम, शिकायतें कम"

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले अफ़सरों और कर्मचारियों की एक ख़ास मानसिकता थी। वे स्थानीय थे और बाहर नहीं जाना चाहते थे। उनकी पूरी नौकरी का लक्ष्य होता था कि उनका तबादला बघेलखंड से बाहर न हो। इसके लिए वे नेताओं से तालमेल बिठाते थे और कोई भी ऐसा काम नहीं करते थे जिससे कोई नाराज़ हो। उनकी रणनीति सीधी थी:

काम कम करना: ताकि कोई गलती न हो।

निर्णय कम लेना: ताकि कोई विवाद न हो।

शिकायतें कम होना: ताकि नेताओं का दबाव न पड़े।

इस सोच ने पूरे सिस्टम को पंगु बना दिया था। काम का जुनून, जो मैंने प्रोजेक्ट में देखा था, यहाँ पूरी तरह गायब था।

मेरी रणनीति: नकारात्मकता को ऊर्जा में बदलना

रीवा का कायापलट: "पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए"

रीवा की राजनीति और प्रशासनिक निष्क्रियता एक ऐसा पहाड़ बन चुकी थी, जिसे हिला पाना असंभव सा लगता था। लेकिन मेरे मन में दुष्यंत कुमार की कविता की आग जल रही थी:

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,

इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

यह सिर्फ हंगामा खड़ा करने की कोशिश नहीं थी, यह रीवा की तस्वीर बदलने का संकल्प था। मैंने तय कर लिया था कि मैं इसी कविता से प्रेरणा लेकर काम करूँगा।

97 योजनाओं की क्रांति: जब सरकार गाँव के द्वार पर आई

रीवा संभाग में प्रशासन का सामान्य काम भी पहाड़ जैसा था। जो काम प्रदेश के दूसरे जिलों में आसानी से हो जाते थे, वे यहाँ होते ही नहीं थे। मुझे पता था कि इस जड़ता को तोड़ने के लिए एक अभूतपूर्व प्रयास की ज़रूरत होगी।

मेरी रणनीति का पहला कदम था शासन की 97 योजनाओं की पहचान करना। ये वो योजनाएं थीं जो या तो सीधे लाभार्थियों को मिलती थीं (जैसे पेंशन, छात्रवृत्ति) या फिर अधिकार पर आधारित थीं (जैसे मनरेगा जॉब कार्ड)। हमने इन योजनाओं के लाभ लेने के लिए आवश्यक सभी दस्तावेज़ों की एक विस्तृत सूची बनाई।

अगला कदम और भी क्रांतिकारी था। हमने इन सभी दस्तावेज़ों के सेट छपवाए। फिर, ग्राम पंचायत-वार तीन-तीन कर्मचारियों की टीमें बनाई गईं। इन टीमों का काम था घर-घर जाकर सर्वे करना और पात्र लोगों के आवेदन पत्र भरना। यह कोई सामान्य कागज़ी कार्रवाई नहीं थी; यह था सरकार का सीधे जनता के पास पहुँचना।

जब आवेदन और दस्तावेज़ एकत्रित हो गए, तो हर विकासखंड में शिविरों का आयोजन किया गया। ये कोई साधारण शिविर नहीं थे, ये "गरीब सम्मेलन" थे। इन सम्मेलनों में संबंधित विभागों के अधिकारी खुद मौजूद होते थे। यहाँ आवेदनों की जांच होती थी, पात्र लोगों को तुरंत स्वीकृति दी जाती थी और कई बार तो मौके पर ही सामग्री भी वितरित की जाती थी।

इन शिविरों से राजनेताओं को दूर रखा गया था ताकि काम पूरी तरह निष्पक्षता से हो। लोगों ने ऐसा प्रशासन पहले कभी नहीं देखा था। यह सिर्फ़ योजना का लाभ देना नहीं था, यह जनता का प्रशासन पर विश्वास लौटाने का प्रयास था।

नेतृत्व का जुनून: जब मैं खुद मैदान में उतरा

इन विचारों की अपार सफलता का श्रेय पूरी प्रशासनिक टीम को जाता था, लेकिन मैं जानता था कि नेतृत्व का जोश बहुत मायने रखता है। हर जिले के कलेक्टर के नेतृत्व में यह काम चल रहा था और मैं खुद हर शिविर में मौजूद रहता था।

जब मैं मैदान में पहुँचता था, तो मेरे साथ संभागीय स्तर के अधिकारी, ज़िला अधिकारी और विकासखंड स्तर के अधिकारी भी फील्ड में होते थे। मेरी उपस्थिति ने पूरी टीम में एक नई ऊर्जा भर दी थी। उन्हें यह एहसास हुआ कि यह कोई सामान्य अभियान नहीं है, बल्कि एक मिशन है।

मीडिया में इन शिविरों की ख़ूब प्रशंसा हो रही थी। अखबारों में छप रहा था कि कैसे रीवा का प्रशासन पहली बार इतनी सक्रियता दिखा रहा है।

इस अभियान ने न केवल हजारों लोगों को योजनाओं का लाभ पहुंचाया, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण यह था कि उसने रीवा की प्रशासनिक संस्कृति को बदल दिया। निष्क्रियता के पहाड़ पिघल रहे थे और विकास की एक नई गंगा बह रही थी। यह साबित हो रहा था कि सही नेतृत्व और जुनून से "यह सूरत बदलनी चाहिए" का सपना सच हो सकता है।

रीवा का अंत्योदय मेला: जब जड़त्व को गति दी गई

मैंने रीवा की प्रशासनिक जड़ता को गतिमान करने के लिए अपना पूरा बल लगा दिया था। मैं जानता था कि न्यूटन का प्रथम नियम सिर्फ भौतिकी में नहीं, बल्कि प्रशासन में भी लागू होता है। एक बार गति पकड़ने के बाद, इस अभियान को रोकना मेरे लिए असहनीय था। लेकिन मेरे मन में एक द्वंद्व था- क्या मुख्यमंत्री की बार-बार बुलावा और नेताओं की शिकायतें मेरी इस गति को रोक देंगी?

मैंने ठान लिया था कि इस बारे में किसी भी अधिकारी से कोई बात नहीं करूँगा। मेरा मकसद अपने काम को बचाना था। मुझे पता था कि अगर मुझे अपनी बात से किसी को सहमत करना है, तो मुझे सिर्फ डेटा या रिपोर्ट नहीं, बल्कि कहानियां सुनानी होंगी। मार्केटिंग का नियम यहाँ भी लागू होता था- उत्पाद नहीं, कहानी बिकती है।

सचिवालय में एक कहानी का मंचन

मैंने कुछ उन गरीब लाभार्थियों की कहानियाँ इकट्ठा की, जिन्हें हमारे विचारों से लाभ मिला था। मैंने इन कहानियों के साथ 97 योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट और मेरे द्वारा जारी किए गए आदेशों की प्रतियां तैयार की। यह सब लेकर मैं भोपाल में मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण बैठक में गया, जिसकी अध्यक्षता मुख्यमंत्री कर रहे थे। मुख्य सचिव और सभी संबंधित विभागों के अधिकारी भी मौजूद थे।

मैंने अपना प्रस्तुतीकरण दिया, जिसमें सिर्फ आँकड़े नहीं थे, बल्कि लोगों के जीवन में आए बदलाव की सच्ची कहानियाँ थीं। कई सवाल पूछे गए, जिनका मैंने संतोषजनक जवाब दिया। अनेक विभागों के अधिकारी मेरी योजना से सहमत थे, क्योंकि उनके काम में अभूतपूर्व प्रगति दिख रही थी।

मुख्यमंत्री को यह योजना बहुत पसंद आई। उन्होंने तुरंत मुख्य सचिव को आदेश दिया कि इस योजना को पूरे राज्य में लागू किया जाए। अगले ही दिन, मैंने भोपाल में रुककर इस योजना के परिपत्र बनवाए और जारी करवा दिए। यह गरीबों के आशीर्वाद का ही परिणाम था कि नेताओं और कुछ विभागों के विरोध के बावजूद मेरी योजना बच गई थी। मैं वापस रीवा आ गया और मेरे अधिकारी दुगने जोश से काम में लग गए। अब यह सिर्फ कमिश्नर की योजना नहीं, बल्कि राज्य शासन की योजना बन गई थी।

एक नया नाम, एक नई चुनौती: अंत्योदय मेला

एक दिन, मुख्यमंत्री का फोन आया। उन्होंने कहा, "रवीन्द्र, 'गरीब' शब्द नकारात्मक लगता है। क्यों न इस योजना का नाम 'अंत्योदय मेला' कर दिया जाए?" मैंने तुरंत हाँ कर दी। नाम बदलने से उद्देश्य नहीं बदलता, और मेरा उद्देश्य लोगों को लाभ पहुँचाना था।

उन्होंने मुझसे कहा कि वे इस मेले का पहला बड़ा आयोजन रीवा में करना चाहते हैं और इसके लिए उन्होंने हाल ही में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने नितिन गडकरी जी को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया है। मैंने उन्हें एक लाख लोगों को लाभान्वित करने की योजना बताई, जिसे सुनकर वे बहुत खुश हुए।

लेकिन, तभी हरिद्वार में एक साध्वी द्वारा साड़ी वितरण के दौरान भगदड़ मचने से 12 महिलाओं की मौत हो गई। इस घटना ने मेरे कार्यक्रम पर सवाल खड़े कर दिए। पुलिस महानिदेशक ने मुख्य सचिव से मिलकर आपत्ति जताई कि इतने बड़े पैमाने पर सामग्री वितरित करने से भगदड़ मच सकती है।

मुख्य सचिव ने मुझे तुरंत फोन किया और डाँटा, "क्या नेतागिरी करते रहते हो? अधिकारी हो, अधिकारी की तरह आचरण करो।" उन्होंने कहा कि क्या तुम्हें सिर्फ़ सम्मेलन करने के अलावा कोई काम नहीं है? मैंने उनसे मुख्यमंत्री से बात करने को कहा। जब वे मुख्यमंत्री के पास गए, तो मुख्यमंत्री ने मुझे फोन किया। मैंने उनसे कहा कि आप सब मिलकर तय कर लें कि कितना बड़ा शिविर करना है, मैं व्यवस्था कर लूँगा।

मुख्यमंत्री बहुत नाराज़ हुए। "तुमने मुझसे वादा किया है। उसी स्तर का शिविर करो।"

एक अभूतपूर्व आयोजन: इतिहास की रचना

मैंने तुरंत पुलिस ग्राउंड रिजर्व का चयन किया। 25 छोटे और एक विशाल मुख्य मंच बनाए गए। हर विभाग के लिए अलग-अलग रंग के शामियाने लगाए गए। कुर्सियों पर नंबर डाले गए और उसी रंग के पास छपवाए गए। लाभार्थी अपनी आरक्षित कुर्सी पर बैठे। हर मंच के पीछे ट्रकों में सामग्री भरी हुई थी। विभागीय मंत्री अलग-अलग मंचों से सामग्री वितरित कर रहे थे, और मुख्य मंच पर गडकरी जी, मुख्यमंत्री जी और मुख्य सचिव बैठे थे।

मंच का संचालन मैंने किया। कार्यक्रम अद्भुत था। गडकरी जी ने ऐसा भव्य और सुव्यवस्थित आयोजन पहले कभी नहीं देखा था। एक लाख से ज़्यादा लाभार्थी शिविर में थे और चारों ओर उत्सव का माहौल था। शासकीय बसों से लोगों को लाया गया था, उन्हें नाश्ता, खाना और यात्रा बीमा भी दिया गया था। साल भर के विभागीय लक्ष्य इस एक दिन में पूरे हो गए थे।

कार्यक्रम बिना किसी बाधा के शाम 4 बजे समय पर समाप्त हो गया। मंच पर मुख्य सचिव ने मुझे गले लगा लिया। यह मेरे लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। सभी अतिथि, लाभार्थी और अधिकारी सकुशल अपने-अपने घर लौट गए।

मुख्यमंत्री बहुत अभिभूत थे। उन्होंने मुझे और मेरे साथी अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से फोन कर बधाई दी। इस सफलता के बाद, पूरे राज्य के जिलों में इससे भी बड़े अंत्योदय मेले आयोजित करने की होड़ लग गई। प्रशासन सियार के झुंड जैसा होता है - एक चिल्लाएगा, तो सभी चिल्लाने लगते हैं। यह कार्यक्रम अब सरकार के बजट से हर साल विकासखंड स्तर पर आयोजित होने लगा।

  


बीज समिति और  दूध समिति 

मध्य प्रदेश के गाँव-गाँव में, जहां खेत ही जीवन और खेती ही पहचान है, एक नई क्रांति की शुरुआत हुई। यह कहानी है बीज सहकारी समितियों की, जिसने न सिर्फ किसानों की तकदीर बदली, बल्कि उन्हें आत्मनिर्भरता की राह दिखाई।

पहले, किसानों को बीजों के लिए बड़े व्यापारियों या कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता था। कई बार उन्हें महंगे और नकली बीज मिलते, जिससे उनकी फसलें बर्बाद हो जाती थीं। उनका भविष्य इन कुछ मुट्ठी भर लोगों के हाथ में था। लेकिन, एक दूरदर्शी सोच ने इस समस्या का समाधान ढूंढ निकाला - सहकारिता

यह कोई छोटी-मोटी पहल नहीं थी, बल्कि एक महाअभियान था। गाँव-गाँव में, हर ग्राम पंचायत में, एक बीज समिति का गठन किया गया। इस अभियान के तहत, बारह हजार से अधिक समितियों का गठन हुआ, जो सिर्फ कागज पर नहीं, बल्कि हकीकत में किसानों की आवाज़ बन गईं।

यह समिति किसानों की ही थी, उनके द्वारा ही चलाई जाती थी। यहाँ कोई मालिक नहीं था, सब बराबर थे। समिति की सदस्यता किसानों के लिए ही थी, और वे लोकतांत्रिक तरीके से मिलकर सारे फैसले लेते थे।

लेकिन यह समितियां काम कैसे करती थीं?

समितियां किसानों से उच्च गुणवत्ता वाले बीज खरीदती थीं। छोटे किसान, जिनके पास बड़ी कंपनियों से जुड़ने का मौका नहीं था, वे इन समितियों के माध्यम से अपने बीज बेच सकते थे। फिर इन चीजों को ग्रेडिंग, प्रसंस्करण और भंडारण करके उसकी गुणवत्ता सुनिश्चित की जाती थी। हर चीज को एक प्रमाणित ब्रांड का दर्जा मिलता था, जिससे किसानों का विश्वास बढ़ता था।

यह सब सिर्फ गाँव तक ही सीमित नहीं था। ये समितियां राज्य स्तर पर मध्य प्रदेश राज्य सहकारी बीज उत्पादक एवं विपणन संघ मर्यादित से जुड़ी थीं, और यहाँ तक कि राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय बीज सहकारी समिति लिमिटेड (बीबीएसएसएल) की भी सदस्य थीं। इस मजबूत नेटवर्क ने यह सुनिश्चित किया कि किसानों को सही समय पर और सही दाम पर बीज मिलें, चाहे वह उन्नत किस्में हों या पारंपरिक।

सरकार ने भी इस मिशन को सफल बनाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। निष्क्रिय समितियों को फिर से जान दी गई, आधुनिक गोदाम और ग्रेडिंग प्लांट्स बनाए गए, और किसानों को खाद और बीज नकद में खरीदने की सुविधा दी गई, ताकि वे कर्ज के बोझ से दबकर न रह जाएँ।

इन समितियों का महत्व सिर्फ बीज तक सीमित नहीं था।

  • किसानों को लाभ: उनकी मेहनत का सही दाम मिला और उनकी आय बढ़ी।

  • आत्मनिर्भरता: बीजों के लिए अब उन्हें बाहर पर निर्भर नहीं रहना पड़ता था।

  • रोजगार: बीज उत्पादन और वितरण से गाँवों में नए रोजगार के अवसर खुले।

इस तरह, यह अभियान सिर्फ बीज बाँटने का नहीं, बल्कि विश्वास और आत्मनिर्भरता की एक नई फसल बोने का था। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'सहकार से समृद्धि' के सपने को सच करने का एक शानदार उदाहरण बन गया, जहाँ सहकारिता के दम पर किसानों ने न सिर्फ अपनी किस्मत बदली, बल्कि पूरे देश को एक नई राह दिखाई।

यह कहानी है एक ऐसे सपने की, जिसने मध्य प्रदेश की ग्रामीण महिलाओं को न सिर्फ आर्थिक रूप से सशक्त किया, बल्कि उन्हें सामाजिक पहचान और सम्मान भी दिलाया। यह कहानी है दुग्ध सहकारी समितियों के उस महाअभियान की, जिसने गाँव-गाँव में श्वेत क्रांति की एक नई लहर पैदा की।

एक समय था, जब गाँव की महिलाएं घर के कामकाज और पशुपालन में अपना पूरा दिन बिता देती थीं, लेकिन उनकी मेहनत का कोई खास मोल नहीं था। दूध बेचकर जो थोड़ी-बहुत कमाई होती थी, वह अक्सर बिचौलियों के हाथों चली जाती थी, और उन्हें अपनी मेहनत का सही दाम नहीं मिल पाता था। लेकिन फिर एक क्रांतिकारी विचार ने जन्म लिया: क्यों न महिलाओं की अपनी समितियां बनाई जाए?

इस विचार को हकीकत में बदलने के लिए एक बड़ा अभियान चलाया गया। इस अभियान के तहत, छह हजार से भी ज़्यादा महिला दुग्ध सहकारी समितियों का गठन हुआ। ये समितियां सिर्फ कागज़ पर नहीं, बल्कि हकीकत में गाँव की महिलाओं की अपनी थीं।

यह कैसे काम करता था?

हर सुबह, गाँव की महिलाएं अपने घरों से निकलकर अपनी समिति के केंद्र पर आती थी। वे अपने पशुओं का दूध लेकर आती, जहाँ दूध की गुणवत्ता (फैट और एसएनएफ) की जांच होती थी। यह प्रक्रिया इतनी पारदर्शी थी कि किसी को कोई शक नहीं रहता था। उन्हें अपने दूध का तुरंत और उचित मूल्य मिलता था। यह सिर्फ एक लेनदेन नहीं था, बल्कि उनकी मेहनत का सम्मान था।

यह अभियान सिर्फ दूध बेचने तक सीमित नहीं था। इन समितियों ने महिलाओं को कई तरह से मदद की:

  • नियमित आय का स्रोत: दूध बेचकर मिलने वाला पैसा महिलाओं के हाथों में आता था, जिससे उन्हें घर खर्च चलाने और बच्चों की पढ़ाई के लिए एक स्थायी आय मिल गई।

  • पशु स्वास्थ्य और सहायता: समिति में महिलाओं को पशुओं के टीकाकरण, कृमिनाशक दवाओं, और पशु बीमा जैसी सुविधाएं देती थीं। वे पशुओं की नस्ल सुधार के लिए कृत्रिम गर्भाधान की सुविधा भी देती थीं, जिससे दूध उत्पादन बढ़ा।

  • बाजार तक सीधी पहुंच: दूध इकट्ठा करने से लेकर उसे बड़े शहरों तक पहुंचा और उसे ब्रांडेड दूध (जैसे अमूल, सांची) के रूप में बेचने तक का पूरा काम समितियां करती थी। महिलाओं को बाजार की चिंता करने की ज़रूरत नहीं थी।

  • वित्तीय सहायता: समितियों ने महिलाओं को कम ब्याज पर ऋण भी दिया, जिससे वे और पशु खरीद सकें या अपने डेयरी फार्म को बेहतर बना सकें।

लेकिन इस कहानी का सबसे बड़ा पहलू सशक्तिकरण था। ये समितियां सिर्फ आर्थिक लाभ नहीं दे रही थीं, बल्कि महिलाओं को आत्मविश्वास और नेतृत्व भी दे रही थीं। वे अपनी समिति के फैसले खुद लेती थीं, समस्याओं पर चर्चा करती थी और समाधान निकलती थीं। यह एक ऐसी प्रक्रिया थी जिसने उन्हें सिर्फ एक माँ या पत्नी नहीं, बल्कि एक उद्यमी और लीडर के रूप में स्थापित किया।

इस तरह, दुग्ध सहकारी समितियों का यह अभियान केवल पशुपालन को बढ़ावा देने का नहीं था, बल्कि ग्रामीण भारत में महिला सशक्तिकरण की एक नई गाथा लिखने का था। उसने साबित कर दिया कि जब महिलाओं को मौका मिलता है, तो वे न सिर्फ अपनी, बल्कि पूरे परिवार और गाँव की तकदीर बदल सकती हैं।

ददुआ  गैंग 

मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा पर स्थित सतना जिले के बीहड़ों में, एक समय था जब ददुआ गिरोह का खौफ बोलता था। इस गिरोह का सरगना शिवकुमार पटेल उर्फ ददुआ था, जिसका नाम सुनते ही लोग कांप उठते थे। उसने तीन दशकों से अधिक समय तक इस क्षेत्र में आतंक मचाया।

ददुआ का उत्थान

शिवकुमार पटेल, जो बाद में ददुआ के नाम से कुख्यात हुआ, मूल रूप से चित्रकूट के रैपुरा थाना क्षेत्र के देवकली गांव का रहने वाला था। कहा जाता है कि उसके डकैत बनने के पीछे कई कारण थे। कुछ कहानियों के अनुसार, उसके पिता की हत्या दबंगों ने कर दी थी और उसे झूठे मुकदमों में फंसाया गया था। इन अन्याय से तंग आकर उसने हथियार उठा लिया और बागी बन गया।

शुरुआत में, वह गया कुर्मी के गिरोह में शामिल हुआ और बाद में 1983 में उसका खुद का गिरोह बन गया। ददुआ की क्रूरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसने एक बार में नौ लोगों का नरसंहार किया, जिसके बाद वह इस जंगल का बेताज बादशाह बन गया। उसके खिलाफ मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के थानों में 241 से अधिक आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें हत्या, डकैती और अपहरण जैसे गंभीर अपराध शामिल थे।

राजनीतिक प्रभाव

ददुआ सिर्फ एक खूंखार डकैत नहीं था, बल्कि वह राजनीति का भी एक माहिर खिलाड़ी बन गया था। बीहड़ के जंगलों से ही वह यह तय करता था कि कौन प्रधान, विधायक और सांसद बनेगा। उसका एक इशारा ही काफी होता था, और उसके समर्थक अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता देते थे। उसने अपने भाई बालकुमार पटेल को सांसद और बेटे वीर सिंह को विधायक भी बनवाया था। उसका प्रभाव इतना गहरा था कि कई राजनीतिक दल उससे समर्थन लेने के लिए संपर्क करते थे।

अंत

ददुआ का अंत 22 जुलाई 2007 को हुआ। उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (UP STF) की टीम ने चित्रकूट के घनघोर जंगल में एक मुठभेड़ के दौरान उसे मार गिराया। इस ऑपरेशन का नेतृत्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ यश कर रहे थे। ददुआ की मौत के साथ ही, बुंदेलखंड के बीहड़ों में कई दशकों से चला आ रहा उसका खौफ खत्म हो गया।

ददुआ की कहानी आज भी बुंदेलखंड के लोकगीतों और कहानियों में जिंदा है, जो दिखाती है कि कैसे एक व्यक्ति अन्याय के खिलाफ लड़ते-लड़ते अपराध की दुनिया का सबसे खूंखार चेहरा बन गया।

अध्यक्ष मेडिकल कॉलेज 

यह कहानी है एक ऐसे संस्थान की, जो सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि विंध्य क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण है। यह कहानी है रीवा के प्रतिष्ठित श्याम शाह मेडिकल कॉलेज की, जहां मैंने, एक आयुक्त के रूप में, पदेन अध्यक्ष के तौर पर काम करते हुए, चिकित्सा व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव लाने का प्रयास किया।

एक समय था, जब यह चिकित्सा महाविद्यालय अपनी गरिमा खोता जा रहा था। अस्पताल में मरीजों को इलाज के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता था, दवाइयाँ और उपकरण अक्सर अनुपलब्ध रहते थे, और विभागों के बीच तालमेल की कमी थी। पूरी व्यवस्था एक केंद्रीय नियंत्रण में फंसी हुई थी, जहां छोटे-छोटे फैसलों के लिए भी शीर्ष नेतृत्व की अनुमति का इंतजार करना पड़ता था।

यह स्थिति किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं थी। एक गहरी सोच-विचार के बाद, मैंने एक क्रांतिकारी कदम उठाने का फैसला किया: अधिकारों का विकेंद्रीकरण (decentralization of power)। मैंने हर विभाग को उसकी अपनी पहचान और शक्ति देने का निश्चय किया।

अधिकारों का हस्तांतरण: एक बड़ा बदलाव

मैंने एक नया सिस्टम लागू किया। इसके तहत, हर विभाग को उसका अपना बजट, मेडिसिन और स्टाफ आवंटित किया गया। यह सिर्फ एक प्रशासनिक बदलाव नहीं था, बल्कि एक मानसिकता में बदलाव था।

विभागवार बजट: अब हर विभाग के प्रमुख को पता था कि उनके पास अपने विभाग को चलाने के लिए कितना पैसा है। वे अपनी जरूरतों के हिसाब से उपकरण खरीद सकते थे और अपनी प्राथमिकताओं को तय कर सकते थे। इससे फिजूलखर्ची पर रोक लगी और काम में तेजी आई।

मेडिसिन और स्टाफ का बंटवारा: विभाग प्रमुखों को अपने हिसाब से दवाइयों और स्टाफ को मैनेज करने का अधिकार दिया गया। इससे मरीजों को समय पर दवाइयां मिलने लगीं और स्टाफ का सही इस्तेमाल सुनिश्चित हुआ।

इस बदलाव से विभागाध्यक्षों की शक्तियाँ कई गुना बढ़ गईं। वे अपने विभाग को चलाने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र थे। उन्हें बार-बार छोटे-छोटे कामों के लिए शीर्ष अधिकारियों के पास जाने की जरूरत नहीं रही। अब उनकी जिम्मेदारी थी कि वे अपने विभाग को बेहतरीन तरीके से चलाएं और मरीजों को सर्वोत्तम इलाज मुहैया कराएं।

नतीजा: एक नए युग की शुरुआत

इस नई व्यवस्था का असर जल्द ही दिखने लगा। विभागों में आत्मनिर्भरता और जवाबदेही की भावना पैदा हुई। हर विभाग अपनी प्रगति के लिए खुद जिम्मेदार था, जिससे एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का माहौल बना।मरीजों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हुआ।उपकरणों की खरीद और रखरखाव में तेजी आई। डॉक्टरों और कर्मचारियों का मनोबल बढ़ा।

यह पहल न केवल प्रशासनिक व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए थी, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए भी थी कि श्याम शाह मेडिकल कॉलेज अपनी गरिमा को फिर से हासिल करे। यह एक ऐसा कदम था जिसने इस ऐतिहासिक संस्थान को एक बार फिर से विंध्य क्षेत्र में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत स्तंभ बना दिया, जहाँ हर मरीज को उम्मीद और सम्मान के साथ इलाज मिले।

डायरेक्टर आर आर बी 

एन.पी.ए. का खेल

यह बात है नर्मदा झाबुआ ग्रामीण बैंक के उस दौर की, जब बैंक के हर कोने में एक खामोश संकट मंडरा रहा था  नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPA). लाखों-करोड़ों का कर्ज़, जो अब डूब चुका था, बैंक की बुनियाद को हिला रहा था। हर किसी के पास इसका हल था, लेकिन हर हल वही पुराना था - "कर्जदारों को समझाइए," "स्ट्रिक्ट हो जाइए ।"

इसी माहौल में एक बदलाव आया. बैंक के पदेन डायरेक्टर के रूप में जब मेरी  नियुक्ति हुई, मैंने सोचा कि अगर रोग की जड़ को समझना है, तो हमें खुद ही वो रोग बनना होगा।  मैंने एक अप्रत्याशित कदम उठाया। मैंने बैंक के सबसे काबिल मैनेजर और अधिकारियों के लिए एक स्पेशल ट्रेनिंग प्रोग्राम डिज़ाइन किया। उसका नाम था, "हाउ टू क्रिएट एनपीए" : जब एक डायरेक्टर ने बैंक को चौंका दिया।

पूरे बैंक में यह खबर आग की तरह फैल गई. लोग हैरान थे  "क्या हमारे डायरेक्टर पागल हो गए हैं? हम तो एनपीए से बचने की ट्रेनिंग देते हैं, ये उसे बनाने की ट्रेनिंग दे रहे हैं।"

ट्रेनिंग रूम में जब सब बैठे, तो माहौल में तनाव और जिज्ञासा दोनों थी।  मैंने  अपनी बात शुरू की। "आज हम देखेंगे कि कैसे एक कर्ज़ को बर्बाद किया जाता है।  कैसे एक अच्छी योजना को फेल किया जाता है। आज हम चोरों की तरह सोचेंगे।"

अगले कुछ घंटों तक, ट्रेनिंग में सब कुछ उल्टा हुआ। उन्हें सिखाया गया कि कैसे बिना जांच-पड़ताल के लोन पास करें, कैसे गलत डॉक्यूमेंट्स को नजरअंदाज करें, और कैसे कर्ज़दार को ट्रैक न करें। 

यह एक साइकोलॉजिकल एक्सपेरिमेंट था। जैसे-जैसे वे इन नकारात्मक कामों को करते और सीखते गए, उनके दिमाग में एक नई तस्वीर बनती गई. उन्हें साफ दिखने लगा कि कहाँ-कहाँ चूक होती है, कौन-कौन सी बारीकियाँ नजरअंदाज की जाती हैं, और कैसे एक छोटा सा फैसला एक बड़े नुकसान का कारण बन सकता है। 

यह ट्रेनिंग हँसी-मजाक से भरी थी, पर उसका असर गहरा था. जब आप किसी चीज़ को गलत तरीके से करते हैं, तो आपको सही तरीका खुद-ब-खुद समझ आ जाता है। यह नकारात्मक ट्रेनिंग एक आईने की तरह थी, जिसमें हर कोई अपनी गलतियों और कमजोरियों देख रहा था। 

इस अजीबोगरीब प्रयोग का नतीजा यह हुआ कि बैंक के अधिकारी अब एनपीए को सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया के रूप में समझने लगे थे। वे जानते थे कि एनपीए बनता कैसे है, और अगर इसे बनने से रोकना है, तो क्या करना होगा। 

इस ट्रेनिंग के बाद, बैंक के काम करने के तरीके में एक बड़ा बदलाव आया। लोन की जांच और मॉनिटरिंग में ज्यादा सख्ती बरती जाने लगे।  लोग पहले से ज्यादा सतर्क और जिम्मेदार हो गए। 

हालांकि, यह प्रयोग अपनी ऊंचाइयों पर था, तभी एक बड़ी खबर आई।  1 अप्रैल, 2019 को नर्मदा झाबुआ ग्रामीण बैंक का विलय सेंट्रल मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक के साथ हो गया। इस विलय के बाद, एक नए युग की शुरुआत हुई और बैंक का नाम मध्यप्रदेश ग्रामीण बैंक हो गया, जिसका मुख्यालय इंदौर में स्थापित हुआ।

लेकिन, बैंक के पुराने कर्मचारी आज भी उस डायरेक्टर और उनके अनोखे ट्रेनिंग प्रोग्राम को याद करते हैं. यह सिर्फ एक ट्रेनिंग नहीं थी, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक प्रयोग था जिसने सिखाया कि कभी-कभी अंधेरे को समझने के लिए, हमें खुद उस अँधेरे में झाँकना पड़ता है, ताकि हम रोशनी का रास्ता ढूंढ सके। यह एक अनोखी कहानी थी, जो बताती है कि जोखिम भरा, लेकिन नया तरीका, अक्सर पुराने और आजमाए हुए तरीकों से ज्यादा प्रभावी साबित होता है। 

 रीवा के छात्रों ने गाँव की पाठशाला में सीखा 'सच्ची' खेती

यह कहानी है उस दौर की, जब रीवा में जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय का कृषि महाविद्यालय अपनी पहचान बनाने में जुटा था। यहाँ के छात्र, किताबों में लिखे सिद्धांतों को रटते थे, पर असली जमीन और किसान के संघर्ष से दूर थे। उनके पास ज्ञान था, पर अनुभव की कमी थी।

इसी बीच, कॉलेज के डीन, डॉ. कोटेश्वर राव सुरपनेनी, ने एक क्रांतिकारी कदम उठाया। उन्होंने महसूस किया कि अगर इन छात्रों को भविष्य में सफल कृषि वैज्ञानिक या अधिकारी बनना है, तो उन्हें गाँव और खेत की मिट्टी से जुड़ना होगा। उन्होंने एक अनोखे कार्यक्रम की नींव रखी - RAWE (Rural Agriculture Work Experience)।

लेकिन यह सामान्य RAWE प्रोग्राम नहीं था। इसमें एक नया अध्याय जोड़ा गया और इस बदलाव के सूत्रधार थे एक ऐसे शख्स, जिन्होंने छात्रों को सीधे किसानों की दुनिया से जोड़ने का जिम्मा उठाया। उन्होंने मिस्टर राव के साथ मिलकर एक योजना बनाई, जो छात्रों के लिए किसी रोमांचक मिशन से कम नहीं थी।

छात्रों को दो समूहों में बाँटा गया। एक समूह को सीड कोऑपरेटिव (बीज सहकारी समितियों) के साथ काम करने का मौका दिया गया, जहाँ उन्हें यह समझना था कि अच्छी गुणवत्ता वाले बीज कैसे तैयार होते हैं, उनका विवरण कैसे होता है और छोटे किसान तक यह कैसे पहुंचते हैं। दूसरा समूह सीधे फार्मर्स प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशन (FPO) से जोड़ा गया, जहाँ उन्हें किसानों के समूह के साथ मिलकर अपनी उपज को बाजार तक पहुँचाने की चुनौती को समझना था।

यह छात्रों के लिए एक बड़ा बदलाव था। अब उनकी कक्षाएं खेतों में लगने लगी थीं, उनके शिक्षक किसान थे, और उनकी परीक्षाएं उन समस्याओं को हल करना था जिसका सामना हर दिन एक किसान करता है।

सीड कोऑपरेटिव में काम कर रहे छात्रों ने देखा कि सिर्फ अच्छे बीज पैदा करना ही काफी नहीं है। बीज की गुणवत्ता को प्रमाणित करना, उसकी मार्केटिंग करना और किसानों को यह समझना कि यह बीज उनके लिए क्यों फायदेमंद है, यह भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने किसानों को अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर समझाया, और जब किसानों ने उनकी बात मानी, तो छात्रों को अपनी मेहनत का फल मिला।

वहीं, FPO से जुड़े छात्रों का अनुभव और भी नाटकीय था। उन्हें गाँव-गाँव जाकर किसानों को संगठित करना पड़ा। उन्हें सिखाना पड़ा कि अगर वे अकेले अपनी फसल बेचते हैं, तो उन्हें कम कीमत मिलती है, लेकिन अगर वे एक होकर बेचेंगे तो बड़े व्यापारियों से मोलभाव कर सकते हैं। इस काम में उन्हें कई बार किसानों के संदेह और विरोध का सामना करना पड़ा। लेकिन जब उन्होंने किसानों के साथ मिलकर उनके उत्पादों को सीधे बाजार में बेचा और उन्हें अच्छा दाम मिला, तो किसानों का विश्वास जीत लिया।

यह सिर्फ एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक प्रयोग था। छात्रों ने किताबी ज्ञान को जमीनी हकीकत से जोड़ा। उन्होंने सीखा कि फसल को रोगों से कैसे बचाता है, अच्छी पैदावार कैसे लेनी है, और सबसे ज़रूरी, किसानों के साथ कैसे रिश्ते बनाने हैं।

जब यह कार्यक्रम पूरा हुआ, तो छात्र पहले से कहीं ज्यादा परिपक्व और आत्मविश्वासी थे। वे सिर्फ कृषि स्नातक नहीं थे, बल्कि ऐसे व्यावहारिक समाधानकर्ता थे जो गांव और किसान की असली समस्याओं को समझते थे। यह मिस्टर राव और उनके सहयोगी की दूरदर्शिता का परिणाम था, जिसने रीवा कॉलेज के छात्रों को एक ऐसी शिक्षा दी जो किताबों में नहीं मिल सकती थी  वह थी सच्ची खेती, असली अनुभव, और मिट्टी से जुड़ाव।

रामबन: एक सपने का गाँव

यह कहानी है एक ऐसे सपने की, जिसे सच करने के लिए कुछ अधिकारियों और गाँव के लोगों ने मिलकर एक नई इबारत लिखी। लंबे समय से ग्रामीण विकास के क्षेत्र में काम करने के बाद, एक विचार मन में घर कर गया था - क्यों न एक ऐसा आदर्श गाँव बनाया जाए, जहां सरकार की योजनाएं कागजों तक सीमित न रहें, बल्कि ज़मीन पर साकार हों। एक ऐसा गाँव, जहाँ हर योजना अपनी पूरी क्षमता से काम करें।

इस सपने को पूरा करने के लिए, सतना कलेक्टर ने एक गांव को चुना - रामवन। सतना-रीवा रोड पर सज्जनपुर के पास बसा यह गांव कोई साधारण गांव नहीं था। यदि आपने बॉलीवुड की फिल्में देखी हैं, तो 'वेल डन अब्बा' और 'वेलकम टू सज्जनपुर' जैसी कहानियाँ इसी मिट्टी से निकली है। रामबन के लोगों में वो सहजता और संघर्ष था, जो इस कहानी का नायक बनने के लिए ज़रूरी था।

जब हमने गाँव के लोगों को इस योजना के बारे में बताया, तो उनका उत्साह देखने लायक था। उन्होंने पूरी लगन के साथ हमारा साथ दिया। सबसे पहले, गाँव में बीज समिति और दूध समिति का गठन हुआ। यह एक छोटी शुरुआत थी, लेकिन इसने गांव को एक करने का काम किया। गाँव की हर महिला स्वयं सहायता समूह (Self-Help Group) से जुड़ी। यह सिर्फ महिलाओं का समूह नहीं था, बल्कि गाँव के विकास का इंजन बन गया था।

गाँव की अर्थव्यवस्था को आत्मनिर्भर बनाने के लिए कई छोटे-छोटे उद्योग शुरू किए गए। घरों में मसाला उद्योग, अगरबत्ती बनाना, डेयरी, आटा चक्की और तेल निकालने की मशीन जैसे घरेलू व्यवसाय फलने-फूलने लगे। हर घर में रोजगार की व्यवस्था हुई। गाँव की गलियों को चमकाने के लिए, सभी कच्ची सड़कों को पक्का किया गया, स्ट्रीट लाइटें लगाई गईं, और पानी की निकासी के लिए नालियां बनाई गईं।

लेकिन यह सिर्फ भौतिक विकास नहीं था। हमने गाँव की आत्मा को भी सशक्त बनाया। स्कूल की मरम्मत की गई, एक पुस्तकालय खोला गया, और हर घर में नल कनेक्शन पहुँचाया गया। पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए, हर घर में बायोगैस प्लांट स्थापित किए गए, जिससे न सिर्फ ऊर्जा मिली, बल्कि साफ-सफाई भी बढ़ी।

किसानों को उन्नत खेती के लिए प्रशिक्षित किया गया, और बेरोजगार युवाओं को रोजगार से जोड़ने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए गए।

जब गांव पूरी तरह से बदल गया, तो इस महान कार्य के उद्घाटन के लिए माननीय मुख्यमंत्री जी को आमंत्रित किया गया। वह दिन ऐतिहासिक था। मंच पर सिर्फ मुख्यमंत्री और उनकी पत्नी ही नहीं, बल्कि गांव के लोग भी थे। मुख्यमंत्री ने गाँव के लोगों के सम्मान में, हम सभी अधिकारियों के साथ ज़मीन पर बैठना पसंद किया।

कार्यक्रम का संचालन किसी पेशेवर ने नहीं, बल्कि गांव के ही लोगों ने किया। उन्होंने अपनी सरल भाषा में बताया कि कैसे उन्होंने अपनी समस्याओं का समाधान खुद ही निकाला। जब उन्होंने अपनी मेहनत और संघर्ष की कहानियां सुनाएं, तो पूरा माहौल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। सबकी आँखें नम थीं, और गर्व से भरी हुई थीं।

मुख्यमंत्री ने गाँव के लोगों के प्रयासों की दिल खोलकर सराहना की और उन्हें बधाई दी। यह सिर्फ एक सरकारी कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सपने के सच होने का पल था। इस अनुभव ने सिखाया कि जब अधिकारी और जनता मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी सपना असंभव नहीं होता। यह रामवन की कहानी है  जहां लोगों ने खुद अपनी तकदीर लिखी।

एक गाँव का पुनर्जन्म: चित्रकूट में नानाजी देशमुख का सपना

यह कहानी है एक ऐसे दूरदर्शी नेता की, जिसने शहरों की चकाचौंध को छोड़कर, गाँवों की धूल-भरी गलियों में एक सपना बोया। यह कहानी है नानाजी देशमुख और उनके द्वारा स्थापित दीन दयाल शोध संस्थान (डीआरआई) की, जिसने ग्रामीण विकास की परिभाषा को ही बदल दिया।

शुरुआत हुई थी 1972 में, जब नानाजी ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के 'एकात्म मानव दर्शन' को साकार करने का बीड़ा उठाया। उनका मानना था कि भारत का उत्थान गांव से ही संभव है, और इसी सोच के साथ उन्होंने सबसे पहले गोंडा, उत्तर प्रदेश के जयप्रभा ग्राम में एक सफल प्रयोग किया। यह प्रयोग सफल रहा और इस सफलता की गूँज दूर-दूर तक सुनाई दी।

लेकिन नानाजी की असली कर्मभूमि बनी चित्रकूट। यह वह भूमि थी जहाँ उन्होंने "ग्रामोदय से राष्ट्रोदय" (गांवों के उत्थान से राष्ट्र का उदय) का विचार जमीन पर उतारा। यहाँ उन्होंने सिर्फ सरकारी योजनाओं को लागू नहीं किया, बल्कि एक ऐसा मॉडल विकसित किया जो पूरी तरह से आत्मनिर्भरता पर आधारित था। इस मॉडल के चार आधार स्तंभ थे: शिक्षा, सदाचार, स्वावलंबन और स्वास्थ्य।

शिक्षा, सदाचार और स्वावलंबन की गाथा

चित्रकूट के 500 से अधिक गाँवों में एक बड़ा बदलाव आने लगा। डीआरआई ने गाँव के लोगों को सिर्फ लाभार्थी नहीं बनाया, बल्कि उन्हें अपने भाग्य का निर्माता बनने के लिए प्रेरित किया। गाँव के लोगों को संगठित किया गया। जिला और जनपद पंचायतों के प्रतिनिधियों को गाँव के विकास में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रशिक्षित किया गया। वहीं, गांव की महिला स्वयं सहायता समूहों में शामिल हुईं और उन्होंने अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा।

गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए, मसाला उद्योग, अगरबत्ती बनाना, डेयरी जैसे छोटे घरेलू उद्योग शुरू किए गए। यह सिर्फ रोजगार नहीं था, बल्कि ग्रामीणों में एक नया आत्मविश्वास जगा रहा था। बीज सहकारी समितियां और किसान उत्पादक संगठन (FPO) बनाए गए, जिससे किसानों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ी और उन्हें अपनी मेहनत का सही दाम मिलने लगा।

कृषि में क्रांति: जब खेत बने प्रयोगशाला

डीआरआई ने कृषि को सिर्फ एक आजीविका का साधन नहीं माना, बल्कि उसे विज्ञान और नवाचार से जोड़ दिया। कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) की स्थापना की गई। यह केंद्र बुंदेलखंड  और बघेलखंड जैसे सूखे और कम उपजाऊ क्षेत्र के किसानों के लिए एक वरदान साबित हुआ। यहां किसानों को उन्नत खेती, जैविक खेती और बागवानी का प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें सिखाया गया कि कम पानी में भी अच्छी फसल कैसे पैदा की जा सकती है, और कैसे मिट्टी की गुणवत्ता को सुधारा जा सकता है।

ग्रामीण शिक्षा का नया अध्याय

1991 में, नानाजी ने एक और ऐतिहासिक कदम उठाया। उन्होंने महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय की स्थापना की। यह भारत का पहला ऐसा ग्रामीण विश्वविद्यालय था, जिसका उद्देश्य गांवों की समस्याओं का समाधान करना और ग्रामीण युवाओं को व्यावहारिक और स्वरोजगार-उन्मुख शिक्षा प्रदान करना था। यहाँ की शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं देती थी, बल्कि छात्रों को अपने गाँव और समाज के लिए उपयोगी नागरिक बनाती थी।

डीआरआई का चित्रकूट मॉडल सिर्फ एक सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह एक दर्शन है जो बताता है कि ग्रामीण विकास सिर्फ सरकारी योजनाओं और फंडिंग से संभव नहीं है। यह तब संभव होता है जब लोग खुद अपनी किस्मत बदलने का फैसला करते हैं, और उन्हें सही दिशा दिखाने के लिए एक दूरदर्शी नेतृत्व मिलता है। यह नानाजी के उस सपने को दर्शाता है जहाँ गाँव की मिट्टी से ही एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र का उदय होता है।

दृष्टि का महादान: जब सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय 

यह कहानी है सेवा, समर्पण और एक अद्भुत साझेदारी की। यह कहानी है श्री सद्गुरु सेवा संघ ट्रस्ट के उस महान कार्य की, जिसने सतना के सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय को विंध्य क्षेत्र के लाखों लोगों के लिए एक वरदान बना दिया।

कहानी की शुरुआत एक आध्यात्मिक संकल्प से हुई। महाराज श्री रणछोड़दास जी, जिन्हें उनके भक्त 'गुरुदेव' के नाम से जानते हैं, ने चित्रकूट में एक नेत्रहीन बुजुर्ग को ठोकर खाते हुए देखा। इस घटना ने उनके हृदय को झकझोर दिया और उन्होंने "दृष्टिहीनों को दृष्टि" देने का संकल्प लिया। उनके इस सपने को साकार करने का बीड़ा उठाया प्रसिद्ध उद्योगपति श्री अरविंद मफतलाल ने। उनके दूरदर्शी नेतृत्व में, सतना में एक अस्पताल की नींव रखी गई, जो बाद में सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय के नाम से लाखों लोगों की आँखों की रोशनी का केंद्र बना।


सेवा का विस्तार: रीवा संभाग में एक नया अध्याय

मैं भी इस महाअभियान का हिस्सा बना। सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय के सीईओ डॉ बी के जैन के साथ मिलकर हमने रीवा संभाग में एक व्यापक नेत्र जांच अभियान चलाने की योजना बनाई। हमारा लक्ष्य था- हर गांव, हर घर तक पहुँचना, ताकि कोई भी व्यक्ति आँखों की बीमारी के कारण अपनी दृष्टि न खोए।

यह काम आसान नहीं था। रीवा संभाग के गाँव दूर-दराज और दुर्गम इलाकों में फैले हुए थे। लेकिन श्री जैन और उनकी टीम के उत्साह ने हर चुनौती को पार कर लिया। हमने गाँव-गाँव जाकर नेत्र जांच शिविर आयोजित किए। हमारी टीमें सुबह से शाम तक काम करतीं, लोगों की आँखों की जाँच करें, मुफ्त दवाइयां और चश्मे देतीं।

शिविरों में कई लोग ऐसे मिले, जिनकी आँखों में मोतियाबिंद पूरी तरह पक चुका था। वे कई सालों से ठीक से देख नहीं पा रहे थे और उनकी दुनिया अँधेरे में डूब चुकी थी। हमें ऐसे लोगों को देखकर बहुत दुख हुआ, लेकिन उनके लिए एक उम्मीद की किरण भी जगी। हमने उन सभी जरूरतमंद मरीजों को मुफ्त सर्जरी के लिए सतना के सद्गुरु नेत्र चिकित्सालय भेजा।

जीवन में रोशनी की वापसी

ऑपरेशन के बाद, जब ये मरीज अपनी पट्टी खोलते और दुनिया को फिर से साफ-साफ देखते, तो उनके चेहरे पर जो खुशी और कृतज्ञता होती थी, उसे शब्दों में बयाँ करना मुश्किल है। एक बुजुर्ग महिला ने तो मेरे पैर ही छू लिए और कहा, "बेटा, तुमने मेरी दुनिया लौटा दी।" यह मेरे जीवन का सबसे संतोषजनक पल था।

हमारा यह अभियान सिर्फ जांच और सर्जरी तक सीमित नहीं था, बल्कि यह लोगों में जागरूकता पैदा करने का भी काम कर रहा था। हमने उन्हें बताया कि आँखों की देखभाल कैसे करनी चाहिए और मोतियाबिंद का इलाज क्यों जरूरी है।

आज, जब मैं उस अनुभव को याद करता हूँ, तो मुझे गर्व महसूस होता है कि मैं उस महान कार्य का हिस्सा बन पाया, जिसे महाराज रणछोड़दास जी ने शुरू किया था और श्री अरविंद मफतलाल जी के नेतृत्व में डॉ बी के  जैन और उनकी टीम ने आगे बढ़ाया। यह सिर्फ एक अस्पताल की कहानी नहीं है, बल्कि एक दर्शन की कहानी है जो कहता है कि समाज सेवा ही सच्ची पूजा है और दूसरों के जीवन में रोशनी लाना ही सबसे बड़ा पुण्य है।

महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के कुलपति (VC) के रूप में डॉ. टी. करुणाकरन ने एक अभिनव प्रयोग किया। उन्होंने छात्रों को किताबी ज्ञान से परे, वास्तविक दुनिया की समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने के लिए प्रेरित किया।

छात्रों की भागीदारी: एक अनूठी पहल

डॉ. करुणाकरन ने महसूस किया कि सरकारी योजनाएं अक्सर अपने सही लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाती, क्योंकि सत्यापन की प्रक्रिया में कई कमियां होती हैं। उन्होंने इस समस्या को हल करने के लिए एक अनोखी योजना बनाई। उन्होंने विश्वविद्यालय के छात्रों को 'ग्राम प्रवास' कार्यक्रम के तहत गाँवों में भेजा।


सत्यापन का कार्य: छात्रों को सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं, जैसे- वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन, और विभिन्न आवास योजनाओं के लाभार्थियों का सत्यापन करने का काम सौंपा गया।

प्रशिक्षण: छात्रों को गाँवों में भेजने से पहले, उन्हें सरकारी योजनाओं, की पात्रता मानदंडों और सत्यापन प्रक्रिया के बारे में गहन प्रशिक्षण दिया गया। उन्हें सिखाया गया कि कैसे लाभार्थियों से बात करनी है, दस्तावेजों की जांच कैसे करनी है और प्राप्त जानकारी को कैसे दर्ज करना है।

जमीनी स्तर पर अनुभव: छात्रों ने गाँव-गाँव जाकर लाभार्थियों से सीधी मुलाकात की। उन्होंने न केवल उनके दस्तावेजों की जांच की, बल्कि उनकी वास्तविक स्थिति को भी समझा। इस अनुभव ने उन्हें ग्रामीण भारत की जटिलताओं और समस्याओं को करीब से जानने का मौका दिया।

रिपोर्ट और सुझाव: छात्रों ने अपने सत्यापन के अनुभव के आधार पर विस्तृत रिपोर्ट तैयार की। इन रिपोर्टों में उन्होंने न केवल लाभार्थियों का सही डाटा प्रस्तुत किया, बल्कि उन समस्याओं और कमियों को भी उजागर किया जो योजनाओं के क्रियान्वयन में आ रही थी। उन्होंने इन कमियों को दूर करने के लिए अपने सुझाव भी दिए।

परिणाम और प्रभाव

इस पहल का दोहरा लाभ हुआ। एक ओर, सरकार को योजनाओं के लाभार्थियों का सटीक डाटा मिला, जिससे सभी लोगों तक लाभ पहुंचाना आसान हुआ। वहीं दूसरी ओर, छात्रों को एक व्यावहारिक शिक्षा मिली। उन्होंने समझा कि सिर्फ डिग्री लेना ही काफी नहीं है, बल्कि उस ज्ञान का उपयोग समाज की भलाई के लिए करना भी ज़रूरी है। यह अनुभव उनके भविष्य के करियर के लिए बहुत मूल्यवान साबित हुआ।

डॉ. करुणाकरन का यह प्रयोग सिर्फ एक शैक्षणिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन था, जिसने यह साबित किया कि विश्वविद्यालय सिर्फ ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि समाज के लिए एक परिवर्तनकारी शक्ति भी हो सकते हैं।

वन क्षेत्रों में अगरबत्ती 

योजना तो बहुत अच्छी थी, लेकिन इसे सफल बनाना उतना आसान नहीं था। यह कहानी है उन लोगों की, जो जंगलों में रहते हैं और जिनका जीवन वनोपज पर निर्भर करता है। चित्रकूट के घने जंगलों के बीच, ये लोग बरसों से एक ही तरह की जिंदगी जी रहे थे। उनका मुख्य काम था जंगल से लकड़ी काटना और उसे शहर में बेचना। हर सुबह, वे सिर पर लकड़ियों के बोझ लिए कई किलोमीटर पैदल चलते, ताकि दो पैसे कमा सकें। यह काम बहुत थकाऊ था और इसमें कमाई भी बहुत कम होती थी।

लेकिन फिर एक नई उम्मीद जगी। सरकार और कुछ संगठनों ने मिलकर एक योजना बनाई, जिसका मकसद था इन लोगों के जीवन को बेहतर बनाना। इस योजना के तहत, लघु वनोपज समितियों का गठन किया गया। इन समितियों का उद्देश्य था इन परिवारों का मुख्य व्यवसाय बदलना। अधिकारियों ने देखा कि इन जंगलों में बांस बहुत है। उन्होंने सोचा, क्यों न इसी बांस का उपयोग करके इन लोगों को एक नया रोजगार दिया जाए?


विचार यह था कि बांस से अगरबत्ती की तीलियां बनाई जाएं, और फिर उन्हीं तीलियों से अगरबत्ती बनाकर बेची जाए। इससे न सिर्फ जंगल की कटाई रुकेगी, बल्कि इन लोगों को एक सम्मानजनक और स्थिर आय भी मिलेगी। प्रशिक्षण शिविर लगाए गए, मशीनों की व्यवस्था की गई और लोगों को अगरबत्ती बनाने का तरीका सिखाया गया। शुरुआत में, सब कुछ बहुत उत्साहजनक लग रहा था। लोगों ने भी इस नए काम में रुचि दिखाई।

लेकिन, जल्द ही इस काम में मुश्किलें आने लगीं। लकड़ी बेचने का काम तो आसान था, बस जंगल से लकड़ी काटो और बेच दी। लेकिन अगरबत्ती बनाने के काम में कई प्रक्रियाएं थी। बांस को सही तरीके से काटना, उसे मशीनों में डालना, तीलियां बनाना और फिर उन्हें सुखाना, ये सब काम काफी मेहनत वाले थे। इसके अलावा, जो अगरबत्ती बनाई जाती थी, उसे बाजार में बेचने के लिए भी एक अच्छी मार्केटिंग रणनीति की जरूरत थी।

लोगों ने मेहनत तो बहुत की, लेकिन यह प्रोजेक्ट उतना सफल नहीं हो सका, जितनी उम्मीद थी। आज भी चित्रकूट के जंगलों से रोज़ हजारों टन लकड़ी रेलगाड़ी से शहरों तक पहुँचती है। यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी बड़े बदलाव के लिए सिर्फ एक अच्छी योजना ही काफी नहीं होती, बल्कि उसे जमीनी स्तर पर सफलतापूर्वक लागू करना और लोगों की आदतों को बदलना भी बहुत जरूरी होता है।

 जन्मदिन की खुशियाँ अस्पताल के गलियारों तक पहुँची

सतना का जिला अस्पताल, जहाँ आमतौर पर बीमारियों और दर्द की कहानियाँ गूंजती हैं, वहाँ कुछ अलग ही होने लगा था। यह सब शुरू हुआ एक साधारण से विचार से, जिसे शहर के कुछ संवेदनशील लोगों ने मिलकर एक असाधारण पहल में बदल दिया।

बात कुछ महीने पहले की है। एक परिवार ने अपने बुजुर्ग सदस्य के जन्मदिन को एक यादगार तरीके से मनाने का फैसला किया। उन्होंने सोचा, क्यों न इस खुशी को उन लोगों के साथ बाँटा जाए, जिन्हें इसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत है? उन्होंने सतना के जिला अस्पताल में मरीजों और उनके परिजनों को खाना खिलाने का विचार किया। यह एक छोटा सा कदम था, जो जल्द ही एक बड़े आंदोलन में बदल गया।

पहले-पहल, यह एक अनौपचारिक कोशिश थी। लोग अपने घर से खाना बनाकर लाते और अस्पताल के बाहर लाइन में लगे लोगों को खिलाते थे। लेकिन जब यह खबर पूरे शहर में फैली, तो लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर कोई अपने किसी खास दिन जैसे जन्मदिन, शादी की सालगिरह, या किसी प्रियजन की बरसी को इस नेक काम के लिए बुक करने लगा।

इस बढ़ती मांग को देखकर, कुछ उत्साही लोगों ने मिलकर "सेवा समिति" का गठन किया। इस समिति ने इस नेक काम को एक व्यवस्थित रूप दिया। अब, अस्पताल में एक बुकिंग रजिस्टर बनाया गया, जहाँ लोग अपनी पसंद की तारीख बुक करा सकते थे। इस समिति के सदस्यों ने सुनिश्चित किया कि हर दिन, मरीजों और उनके परिजनों को पौष्टिक और स्वादिष्ट भोजन मिले।

यह पहल इतनी जबरदस्त थी कि उनकी गूँज सरकारी गलियारों तक भी पहुंची। सतना के तत्कालीन जिला कलेक्टर ने इस मानवीय प्रयास को देखकर न सिर्फ़ इसकी सराहना की, बल्कि इसे पूरा समर्थन भी दिया। उन्होंने अस्पताल परिसर के भीतर ही एक ख़ास जगह आवंटित की, जहाँ समुदाय के सहयोग से एक आधुनिक रसोईघर का निर्माण किया गया। इस रसोई में सभी ज़रूरी उपकरण थे ताकि बड़े पैमाने पर स्वच्छता और गुणवत्ता के साथ भोजन तैयार किया जा सके।

अब, यह सिर्फ खाना खिलाना नहीं रहा, बल्कि यह एक भावनात्मक अनुभव बन गया है। जब कोई परिवार अपने किसी प्रियजन की याद में अस्पताल आता है, तो वे न सिर्फ खाना परोसते हैं, बल्कि उन लोगों के साथ बातें भी करते हैं, उनका हालचाल पूछते हैं। उनके चेहरे पर आई मुस्कान देखकर, उन्हें लगता है कि उनका विशेष दिन सही मायने में सफल हो गया।

सतना की यह कहानी हमें सिखाती है कि समाज की थोड़ी सी भागीदारी और सरकारी सहयोग मिल जाए, तो बड़े से बड़े काम भी कितनी आसानी से पूरे हो सकते हैं। यह सिर्फ एक खाना परोसने का प्रकल्प नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का और मानवीय संवेदना को जगाने का एक सशक्त उदाहरण है।

जब सिंगरौली की धूल भरी ज़मीन पर उम्मीद के नए पौधे उगे

सिंगरौली, जिसे अक्सर 'ऊर्जा की राजधानी' कहा जाता है, वहाँ एक समय था जब उद्योगों की चहल-पहल तो थी, लेकिन स्थानीय युवाओं के पास हुनर की कमी थी। सरकारी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (ITI) की एक विशाल इमारत तो थी, पर वो खामोश-सी लगती थी। यहाँ सिर्फ कुछ गिने-चुने ट्रेड में ही ट्रेनिंग दी जाती थी, जो यहाँ के तेजी से बढ़ते उद्योगों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए काफी नहीं था।

यह सब इसलिए हो रहा था क्योंकि नए कोर्स शुरू करने के लिए बजट का अभाव था। युवा बाहर से आए कुशल कारीगरों को काम करते देखते, लेकिन खुद कुछ नहीं कर पाते थे। उनके सपनों को पंख नहीं मिल पा रहे थे।

लेकिन फिर एक निर्णायक मोड़ आया। जिले के कलेक्टर ने एक नई सोच के साथ इस समस्या को हल करने का बीड़ा उठाया। उन्होंने ITI में एक जनभागीदारी समिति का गठन किया और इसकी अध्यक्षता खुद संभाली। इस समिति में स्थानीय उद्योगों के मालिक, समाज के प्रमुख लोग और अधिकारी शामिल थे।

कलेक्टर ने सीधे उद्योगों से संपर्क किया। उन्होंने पूछा, "आपको किस तरह के कुशल कामगारों की जरूरत है?" जवाब में, उद्योगों ने अपनी ज़रूरतें बताएं इलेक्ट्रिकल, फिटर, वेल्डर, और मशीनिस्ट जैसे कई ट्रेड।

समिति ने एक साहसिक निर्णय लिया: उद्योगों की जरूरतों के हिसाब से नए ट्रेनिंग कोर्स शुरू किए जाएँ, और उनका खर्च सरकार नहीं, बल्कि उद्योग खुद उठाएंगे! यह एक क्रांतिकारी कदम था।

इसके बाद, एक और अद्भुत पहल हुई। ट्रेनिंग देने के लिए महंगे इंस्ट्रक्टरों को बुलाने की बजाय, समिति ने उन रिटायर्ड इंजीनियर और तकनीशियनों से संपर्क किया, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इन्हीं उद्योगों में काम करते हुए बिताया था। उनके पास अनुभव का खजाना था, और वे अपने ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए तैयार थे।

देखते ही देखते, ITI की शांति बिल्डिंग में हलचल शुरू हो गई। नए कोर्स शुरू हुए, रिटायर्ड विशेषज्ञ पढ़ाना शुरू किए, और स्थानीय युवाओं को हाथों-हाथ काम सिखाया गया। यह सिर्फ थ्योरी की पढ़ाई नहीं थी, बल्कि सीधा इंडस्ट्री की जरूरतों के हिसाब से प्रैक्टिकल ट्रेनिंग थी।

यह मॉडल इतना सफल हुआ कि कुछ ही महीनों में यहाँ से निकले 'वर्क-रेडी' युवा तुरंत उद्योगों में नौकरी पाने लगे। जहाँ एक तरफ उद्योगों को काम के लिए तैयार लोग मिल रहे थे, वहीं दूसरी तरफ स्थानीय युवाओं को अपने ही शहर में सम्मानजनक रोजगार मिल रहा था।

इस सफलता की खबर पूरे प्रदेश में फैल गई। मुख्यमंत्री महोदय को यह अनूठी जनभागीदारी वाली व्यवस्था इतनी पसंद आई कि उन्होंने तुरंत इसे पूरे प्रदेश में लागू करने का आदेश दिया। आज, हर जिले में, ITI में ऐसी ही समितियां काम कर रही हैं, जो स्थानीय उद्योगों और युवाओं के बीच एक मजबूत पुल का काम कर रही हैं। सिंगरौली का यह छोटा-सा प्रयोग आज पूरे प्रदेश के युवाओं के लिए उज्ज्वल भविष्य का आधार बन गया है।

संभागीय आयुक्त, जबलपुर 

ज़रा सोचिए, एक अधिकारी जिसने रीवा जैसे शहर में अपनी प्रशासनिक सूझबूझ से कलेक्टर और संभागीय आयुक्तों के बीच की खाई को पाट दिया, वह अब एक नए मोर्चे पर खड़ा था। मेरा तबादला हो चुका था। वह जगह थी जबलपुर, जो मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी तो थी, लेकिन अपनी ही समस्याओं के जाल में उलझी हुई थी।

रीवा में मेरी प्रशासनिक व्यवस्था, जिसे मुख्यमंत्री ने खूब सराहा और पूरे प्रदेश में लागू करने का आदेश दिया, एक बहुत बड़ी सफलता थी। मैंने वहाँ साबित किया था कि जब शीर्ष अधिकारी सहयोग करते हैं, तो विकास की राहें खुद-ब-खुद खुल जाती हैं। लेकिन, जबलपुर में आते ही मुझे एहसास हुआ कि यहाँ चुनौतियां सिर्फ नियमों और फाइलों तक सीमित नहीं थी।

यह शहर अपनी ही विरासत की छाया में जी रहा था एक तरफ भेड़ाघाट की संगमरमरी चट्टानें और रानी दुर्गावती की शौर्य गाथाएं, तो दूसरी तरफ़ दशकों से लंबित विकास परियोजनाएँ। यहाँ की नौकरशाही एक अजीब सी शिथिलता में थी। छोटे-छोटे काम भी महीनों तक अटके रहते थे। मेरी आँखों के सामने जबलपुर की विशेषता थी, लेकिन उसके दिल में ठहराव था।

मेरा काम सिर्फ़ प्रशासनिक नहीं, बल्कि यहाँ के लोगों की उम्मीदों को जगाना भी था। मुझे एक ऐसी नई सोच के साथ काम करना था जो इस शहर की ऐतिहासिक और औद्योगिक दोनों ही पहचानों को सम्मान दे सके। जबलपुर का इतिहास मुझे पुकार रहा था यह वही जमीन थी जहां ऋषि जाबालि ने तप किया था, जहाँ गोंड राजाओं ने अपने शौर्य का लोहा मनवाया था। अब मेरी बारी थी कि मैं इस शहर को एक नई दिशा दूं। मुझे पता था कि रीवा की सफलता यहाँ सिर्फ़ एक कहानी बनकर नहीं रह सकती, बल्कि उसे एक नए अध्याय की शुरुआत करनी थी।

इस शहर की जटिलता मुझे चुनौती दे रही थी। जबलपुर का विकास सिर्फ़ सड़कों और इमारतों को बनाने तक सीमित नहीं था, बल्कि यहाँ की आत्मा को फिर से जीवंत करने का था। और मैंने मन बना लिया था कि मैं इस चुनौती को स्वीकार करूंगा।

रीवा से जबलपुर तक प्रशासनिक व्यवस्था की सूरत बदली


मेरा तबादला रीवा से जबलपुर हो चुका था। रीवा में मैंने संभागीय आयुक्त के पद पर रहकर एक नई प्रशासनिक व्यवस्था स्थापित की थी, जहाँ कलेक्टर और संभागीय आयुक्त के बीच पारंपरिक प्रतिद्वंदिता खत्म होकर सहयोग का रिश्ता बन गया था। मेरे इस सफल मॉडल ने मुख्यमंत्री का ध्यान खींचा, उन्होंने एक बैठक में सभी संभागीय आयुक्तों को रीवा के इसी मॉडल को अपनाने का निर्देश दिया।


लेकिन, जबलपुर की जमीन अलग थी। यहाँ आते ही मुझे एहसास हुआ कि चुनौतियाँ सिर्फ प्रशासनिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी थीं। यहाँ के विकास के लिए एक नई सोच की ज़रूरत थी।


मेरी पहली बड़ी जिम्मेदारी थी जबलपुर विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बनना। यह पद मेरे लिए एक नया मोर्चा था, क्योंकि रीवा में मेरा काम मुख्यतः राजस्व और प्रशासनिक मामलों तक सीमित था। इसके साथ ही, मुझे जबलपुर मेडिकल कॉलेज का अध्यक्ष और मध्य प्रदेश विद्युत कंपनी का डायरेक्टर भी नियुक्त किया गया। ये सभी पद मेरी जिम्मेदारियों के दायरे को बढ़ा रहे थे।


जबलपुर में 'अपेरल पार्क' का सपना


जबलपुर की एक अनूठी पहचान थी। यह शहर हमारे देश के 50% से ज़्यादा सलवार सूट की सिलाई का केंद्र था। यहाँ के छोटे-बड़े कारीगरों के हुनर से ही देश के बाजार सजे रहते थे। सरकार यहाँ कपड़ा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए एक 'अपेरल पार्क' बनाना चाहती थी, लेकिन यह प्रोजेक्ट सालों से कागजों में अटका पड़ा था।


इस प्रोजेक्ट की धीमी गति का कारण था समन्वय की कमी और नौकरशाही की उलझनें। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को गति देने के लिए, संभागीय आयुक्त को इस पार्क का उपाध्यक्ष बनाया गया था। जब मैंने यह पदभार संभाला, तो मैंने इसे सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि जबलपुर के हजारों कारीगरों और उनके परिवारों के सपनों को पूरा करने का एक मौका माना।


मैंने तुरंत ही इस काम को अपनी प्राथमिकता में शामिल कर लिया। मैंने संबंधित विभागों, उद्योगपतियों और कारीगरों की बैठक बुलाई। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि यह सिर्फ एक सरकारी प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि एक ऐसा प्रयास है जो उनकी मेहनत को एक नई पहचान देगा। मैंने सभी बाधाओं को दूर किया, चाहे वह जमीन अधिग्रहण की समस्या हो, या फंड की कमी की।


हमारी टीम ने दिन-रात एक कर दिया। हमने सुनिश्चित किया कि पार्क में न सिर्फ सिलाई के लिए जगह हो, बल्कि आधुनिक मशीनें, ट्रेनिंग सेंटर और बाज़ार तक पहुँच की सुविधा भी हो। मैंने खुद कई बार साइट का दौरा किया और सुनिश्चित किया कि काम तेज़ी से और गुणवत्ता के साथ हो।


मेरी मेहनत रंग लाई। वह सपना जो सालों से सिर्फ कागज़ों पर था, अब हकीकत में बदलने लगा। अपेरल पार्क का निर्माण कार्य पूरा हुआ और यह जबलपुर के लिए एक नया मील का पत्थर साबित हुआ। इस पार्क से न सिर्फ स्थानीय लोगों को रोजगार मिला, बल्कि जबलपुर की पहचान एक बड़े कपड़ा उद्योग के केंद्र के रूप में भी मजबूत हुई।


रीवा का प्रशासनिक मॉडल हो या जबलपुर का अपेरल पार्क, मैंने हमेशा एक ही सिद्धांत पर काम किया: समस्याओं को सिर्फ नियमों की किताब से नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत को समझ कर सुलझाना चाहिए। और यही वह दृष्टिकोण था जिसने मुझे हर नई चुनौती को एक अवसर में बदलने की शक्ति दी।


जबलपुर की पहचान: जब घर ही बन गए वर्कशॉप


जबलपुर, जिसे अक्सर 'संस्कारधानी' कहा जाता है, वहाँ की महिलाओं ने एक नई आर्थिक क्रांति की शुरुआत की। यह सब अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी की एक महत्वाकांक्षी योजना के तहत हुआ, जिसका उद्देश्य था शहर की महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना। हज़ारों महिलाओं को सिलाई, कटाई और जैकार्ड का काम सिखाया गया। यह सिर्फ एक ट्रेनिंग प्रोग्राम नहीं था, बल्कि उनके जीवन को एक नई दिशा देने का प्रयास था।


प्रशिक्षण पूरा होने के बाद, सबसे बड़ी चुनौती थी उन्हें काम देना। सरकारी सहायता और बैंकों के सहयोग से उन्हें आसान शर्तों पर लोन लेकर सिलाई मशीन दिखाई गईं। लेकिन, असली कमाल तब हुआ जब इन महिलाओं को स्थानीय व्यापारियों से सीधे 'जॉब वर्क' मिलना शुरू हुआ। व्यापारियों ने कपड़े काटकर इन महिलाओं को दिए, और उन्होंने अपने घर में बैठकर उन कपड़ों को सिलना शुरू किया।


जबलपुर के शांत मोहल्लों में हर घर एक छोटी वर्कशॉप में बदल गया। दिन भर मशीनों की आवाजें गूंजती रहती थी, जो किसी संगीत से कम नहीं थी। इस व्यवस्था ने महिलाओं को अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए काम करने की आजादी दी। वे अपने बच्चों की देखभाल करते हुए, घर के काम निपटाते हुए कमाई कर सकती थीं। यह सिर्फ एक व्यवसाय नहीं था, बल्कि एक सामाजिक बदलाव था। देखते ही देखते, यह मॉडल इतना सफल हुआ कि जबलपुर सलवार-सूट उद्योग का एक बड़ा केंद्र बन गया। यह शहरी समूहों के लिए रोजगार का एक नया रोल मॉडल बन गया।


एक महिला की सोच ने हज़ारों जीवन बदले: पुष्पा वेरी और लिज्जत पापड़


इसी शहर में, एक और अद्भुत कहानी आकार ले रही थी। एक महिला थीं, पुष्पा वेरी जी। उन्होंने एक साधारण से विचार को एक बड़े आंदोलन में बदल दिया। पुष्पा जी ने देखा कि जबलपुर में बहुत सी महिलाएं घर पर रहती हैं, जिनके पास करने को कोई काम नहीं होता। उन्होंने फैसला किया कि क्यों न इन महिलाओं को 'लिज्जत पापड़' बनाने का काम सिखाया जाए, जो एक सहकारी आंदोलन के रूप में पूरे देश में प्रसिद्ध था।


यह एक जोखिम भरा काम था, क्योंकि यह एक संगठित काम था और इसके लिए बहुत मेहनत की जरूरत थी। पुष्पा जी ने कुछ महिलाओं के साथ मिलकर छोटे पैमाने पर यह काम शुरू किया। उन्होंने उन्हें पापड़ बनाने का सही तरीका, उसकी गुणवत्ता और मार्केटिंग के गुर सिखाए। उनके प्रयास से, धीरे-धीरे और भी महिलाएं इस काम से जुड़ने लगीं।


इस काम में महिलाओं को पापड़ बनाने के लिए ज़रूरी कच्चा माल दिया जाता था, और वे अपने घरों में बैठकर पापड़ बनाकर वापस करती थीं। इससे न सिर्फ उन्हें रोजगार मिला, बल्कि वे एक दूसरे से जुड़ी और एक मजबूत महिला समूह का निर्माण हुआ।


जब मुझे इस नेक प्रयास के बारे में पता चला, तो मैंने तुरंत पुष्पा वेरी जी से संपर्क किया। मुझे लगा कि ऐसे प्रयासों को प्रशासन का पूरा सहयोग मिलना चाहिए। मैंने उन्हें सरकारी योजनाओं और सब्सिडी के बारे में बताया, जिससे वे अपने काम को और बढ़ा सकें। मैंने सुनिश्चित किया कि उन्हें आवश्यक सरकारी अनुमति और जगह मिले, ताकि वे अपने काम को एक बड़े स्तर पर ले जा सके।


आज, जबलपुर में हज़ारों महिलाएं लिज्जत पापड़ बनाकर आत्मनिर्भर बनी हुई हैं, और यह सब पुष्पा वेरी जी की दूरदर्शिता और दृढ़ संकल्प का परिणाम है। ये दोनों कहानियाँ, चाहे वह सलवार-सूट का काम हो या लिज्जत पापड़ का, इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाओं को अवसर दिया जाता है, तो वे न सिर्फ़ अपने जीवन में बदलाव लाती हैं, बल्कि पूरे समाज को भी नई दिशा देते हैं।


जबलपुर दुग्ध संघ घाटे के अंधेरे से निकलकर मुनाफे की सुनहरी किरण 


जब मुझे राज्य सरकार द्वारा जबलपुर दुग्ध संघ का चेयरमैन नियुक्त किया गया, तो मुझे पता था कि यह सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि एक बड़ी चुनौती थी। दुग्ध संघ बरसों से घाटे में चल रहा था। किसान हताश थे, क्योंकि उन्हें अपने दूध का सही दाम नहीं मिल रहा था, और भुगतान भी अनियमित था। शहर में दूध की सप्लाई भी अक्सर बाधित रहती थी। यह एक ऐसा जाल था जिसमें हर कोई उलझा हुआ था।


मेरी पहली प्राथमिकता थी इस निराशा को आशा में बदलना। मैंने सबसे पहले उन पुरानी दुग्ध समितियों को फिर से जगाने का फैसला किया जो निष्क्रिय हो चुकी थी। मैं खुद गांव में गया, किसानों से मिला और उनकी समस्याओं को समझा। मैंने उन्हें विश्वास दिलाया कि अब हालात बदलेंगे।


इसके बाद, मैंने दूध कलेक्शन बढ़ाने के लिए एक साहसिक कदम उठाया। हमने न सिर्फ़ पुरानी समितियों को सशक्त किया, बल्कि नई समितियां भी बनाएं। सबसे बड़ा बदलाव था परिवहन व्यवस्था में। मैंने प्रति लीटर प्रति किलोमीटर के हिसाब से भुगतान की एक नई व्यवस्था शुरू की। इसका मतलब था कि किसान को अपने दूध का कलेक्शन सेंटर तक लाने का भी पैसा मिलेगा। यह एक ऐसा प्रोत्साहन था जिसने किसानों को तुरंत प्रभावित किया। अब उन्हें अपने दूध को दूर ले जाने में भी कोई झिझक नहीं थी।


कर्मचारियों का कायापलट और नए उत्पादों की शुरुआत

सिर्फ़ किसानों को ही नहीं, बल्कि दुग्ध संघ के कर्मचारियों को भी नई प्रेरणा दी गई। मैंने हर कलेक्शन सेंटर के मुनाफे में लाने का लक्ष्य रखा। इसके लिए, कर्मचारियों को दूध की गुणवत्ता जाँचने, रिकॉर्ड रखने और किसानों से बेहतर संवाद करने की विशेष ट्रेनिंग दी गई। उनकी मेहनत को पहचानने के लिए, हमने उन्हें अलग से प्रोत्साहन राशि देना शुरू किया। इससे उनमें एक नई ऊर्जा और गर्व का भाव आया। उन्हें लगा कि यह सिर्फ एक नौकरी नहीं, बल्कि एक मिशन है।


घाटे से उबरने के लिए हमें आय के नए रास्ते तलाशने थे। हमने शहर में दूध और उससे बने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने पर ध्यान दिया। नए बिक्री केंद्र खोले गए, जो पहले से ज़्यादा साफ़ और आकर्षक थे। हमने बाजार की मांग को समझा और नए उत्पाद लॉन्च किए, जैसे कि फ्लेवर्ड मिल्क, दही, और पनीर। ये उत्पाद न सिर्फ़ ताज़े थे, बल्कि इनकी गुणवत्ता भी बेहतरीन थी।


इन सभी प्रयासों का नतीजा चमत्कारी रहा। कुछ ही समय में, जबलपुर दुग्ध संघ घाटे से निकलकर मुनाफे में आ गया। किसानों के चेहरे पर मुस्कान थी, क्योंकि उन्हें उनके दूध का सही दाम और समय पर भुगतान मिल रहा था। कर्मचारियों में एक नया जोश था और शहर के लोग दुग्ध संघ के उत्पादों पर भरोसा करने लगे थे।


यह सिर्फ़ एक बिजनेस का सफल होना नहीं था, बल्कि एक विश्वास का पुनर्निर्माण था। यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी भी संस्था को अगर सही नेतृत्व, स्पष्ट सोच और कर्मचारियों व हितधारकों के बीच विश्वास का पुल मिल जाए, तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं होती


 जबलपुर की 'स्टैंड-अप मीटिंग' ने वर्षों से रुके काम को गति दी

जबलपुर शहर का विकास एक जटिल पहेली की तरह था, जिसके टुकड़े कभी एक साथ नहीं जुड़ पाते थे। शहर के बड़े हिस्से पर भारतीय सेना और रेलवे का अधिकार था, और ये विभाग अपने ही नियमों और प्रक्रियाओं से चलते थे। जब मैं जबलपुर विकास प्राधिकरण का चेयरमैन बना, तो मैंने महसूस किया कि यहाँ कई विकास परियोजनाओं सिर्फ़ और सिर्फ़ समन्वय की कमी के कारण अटकी पड़ी थीं। नगर निगम के अधिकारी हो, या कलेक्टर, हर कोई इस समस्या से जूझ रहा था।

सबसे बड़ी बाधा थी अहंकार की दीवार। कोई भी अधिकारी अपनी कुर्सी छोड़कर दूसरे के दफ्तर में जाकर मीटिंग करने को तैयार नहीं होता था। हर मीटिंग के लिए हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था, और जब होती भी थी तो सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई तक सीमित रहती थी।

मैंने इस समस्या का एक अनूठा हल निकाला, जो मैंने कहीं पढ़ा था सॉफ्टवेयर कंपनियों में होने वाले 'स्टैंड-अप मीटिंग'। मैंने फैसला किया कि मीटिंग अब दफ्तरों में नहीं, बल्कि सीधे मौके पर होंगी। यह एक क्रांतिकारी विचार था।

दफ्तर से निकलकर सड़क पर आए अधिकारी

मेरी पहली 'स्टैंड-अप मीटिंग' शहर के उस हिस्से में हुई जहां एक सड़क का निर्माण सालों से रुका पड़ा था। इस सड़क का एक हिस्सा सेना की जमीन से गुजरना था और दूसरा रेलवे की। मैंने सेना, रेलवे, नगर निगम और कलेक्टर के अधिकारियों को एक ही समय पर मौके पर बुलाया। शुरुआत में, वे थोड़े हैरान थे।

मीटिंग की जगह न्यूट्रल थी, किसी का दफ्तर नहीं था, जिससे अहंकार का सवाल ही नहीं रहा। हमने खड़े-खड़े, सीधे उस जगह को देखकर चर्चा की जहाँ समस्या थी। अधिकारियों ने अपनी आँखों से देखा कि कैसे उनका आपसी तालमेल न होने से जनता को परेशानी हो रही है। इस मौके पर, तर्क-वितर्क की गुंजाइश कम थी और समाधान निकालने का दबाव ज्यादा था।

इसका एक और बड़ा फायदा यह था कि मीडिया अक्सर ऐसे प्रोजेक्ट्स की कवरेज करती थी। कोई भी अधिकारी मीडिया के सामने अपनी अड़ियलता या असहमति नहीं दिखाना चाहता था। इस सामाजिक दबाव ने भी अधिकारियों को तुरंत निर्णय लेने के लिए मजबूर किया।

देखते ही देखते, यह तरीका जबलपुर के प्रशासन का एक हिस्सा बन गया। चाहे वह फ्लाईओवर का निर्माण हो, पार्कों का विकास हो या जल निकासी की समस्या, हर बड़े प्रोजेक्ट पर 'स्टैंड-अप मीटिंग' होने लगीं। वर्षों से अटके हुए प्रोजेक्ट्स पर तत्काल काम शुरू हो गया।

इस छोटे से प्रयोग ने न सिर्फ़ कागज़ी कार्रवाई को ख़त्म किया, बल्कि अधिकारियों के बीच सहयोग का एक नया पुल भी बनाया। जबलपुर का शहरी विकास अब रफ्तार पकड़ रहा था, और यह सब सिर्फ़ एक दफ्तर से निकलकर सड़क पर हुई 'स्टैंड-अप मीटिंग' का कमाल था।

जब जबलपुर में व्यापार के लिए जनसैलाब उमड़ पड़ा: महाकौशल व्यापार मेला 


जबलपुर, जिसे अक्सर सांस्कृतिक और प्रशासनिक केंद्र माना जाता था, वहाँ की औद्योगिक पहचान फीकी पड़ रही थी। यहाँ छोटे-बड़े उद्योग तो थे, लेकिन उन्हें एक मंच की जरूरत थी जहां वे अपने उत्पादों को प्रदर्शित कर सकें और नए बाज़ार तलाश सकें। इसी जरूरत को समझते हुए, एक क्रांतिकारी विचार सामने आया: महाकौशल व्यापार मेला।


इस विचार को जमीनी रूप देने का श्रेय जाता है जबलपुर के तत्कालीन कलेक्टर श्री गुलशन बामरा को। उन्होंने इस योजना में गहरी रुचि ली। यह सिर्फ एक सरकारी आयोजन नहीं, बल्कि पूरे महाकौशल क्षेत्र की आर्थिक शक्ति को एक साथ लाने का सपना था। सबसे बड़ी चुनौती थी बजट। सरकार ने कोई राशि आवंटित नहीं की थी, लेकिन कलेक्टर ने हार नहीं मानी। उन्होंने जनभागीदारी का मंत्र अपनाया।


शहर के प्रमुख उद्योगपतियों और व्यापारियों से चर्चा की गई। उन्होंने इस अनूठे प्रयास में सहयोग देने का वादा किया। यह सब एक साथ मिलकर चंदा जुटाने का एक अद्भुत उदाहरण था।


मुख्यमंत्री से चर्चा की गई और उन्होंने इस पहल की सराहना करते हुए मेले के उद्घाटन के लिए आने की सहमति दी। यह खबर सुनते ही लोगों का उत्साह और बढ़ गया।


महाकौशल के हुनर का प्रदर्शन


मेले के लिए सात प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों को चिन्हित किया गया: कटनी के मार्बल व्यापारी, जबलपुर के ऑटो पार्ट बनाने वाले, खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, कपड़ा व्यापारी और अन्य प्रमुख सेक्टर। इन सभी के लिए अलग-अलग सात विशाल डोम लगाए गए, जहाँ हर डोम में उस विशेष सेक्टर के उत्पाद प्रदर्शित किए गए।


जबलपुर में ऐसा व्यापार मेला पहली बार आयोजित हो रहा था। उद्घाटन के दिन से ही लोगों का जनसैलाब उमड़ पड़ा। यह सिर्फ एक प्रदर्शनी नहीं, बल्कि एक उत्सव बन गया था। मेला जो सात दिनों के लिए निर्धारित था, वह लोगों की भारी भीड़ और उत्साह को देखते हुए दस दिनों तक चला।


रोज़ाना, दिन में व्यापारिक बैठकें होती थीं जहाँ व्यापारी एक-दूसरे से सीधे संपर्क कर सकते थे। वहीं, हर रात सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता था। स्थानीय कलाकार, गायक और नर्तकी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे, जिससे मेले में और भी रौनक आ जाती थी।


महाकौशल व्यापार मेला सिर्फ़ एक व्यावसायिक सफलता नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि जब प्रशासन और जनता मिलकर काम करते हैं, तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं होता। बिना किसी सरकारी बजट के, सिर्फ जनभागीदारी से यह आयोजन न सिर्फ़ सफल हुआ, बल्कि एक मिसाल बन गया। उसने साबित कर दिया कि किसी भी क्षेत्र का विकास सिर्फ़ योजनाओं से नहीं, बल्कि लोगों की सहभागिता से होता है।


नर्मदा: सिर्फ एक नदी नहीं, जबलपुर की आत्मा है


जबलपुर के लिए नर्मदा सिर्फ़ एक नदी नहीं, बल्कि जीवनदायिनी माँ है। यहाँ के लोग हर संवाद की शुरुआत "नर्मदा हर" बोलकर करते हैं, जो उनके जीवन में इस नदी के गहरे आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है। नर्मदा के घाटों की उपेक्षा देखकर मुझे बहुत दुख हुआ। ये घाट जो हमारी संस्कृति और आस्था का केंद्र थे, वे अपनी चमक खो रहे थे। मैंने तय किया कि इन घाटों की पवित्रता को फिर से बहाल किया जाएगा।


यह काम सिर्फ़ सरकार के बस का नहीं था। इसके लिए मैंने जनभागीदारी का मंत्र अपनाया। मैंने शहर के नागरिकों, धार्मिक समूहों और स्थानीय समितियों को एक साथ बुलाया और नर्मदा के घाटों की सफाई का बीड़ा उठाया। यह एक बड़ा आंदोलन बन गया। हर सुबह, लोग स्वयंसेवक के रूप में फावड़ा और झाड़ू लेकर घाटों पर पहुँचते। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, हर कोई इस अभियान का हिस्सा बन गया।


इस प्रयास को और गति देने के लिए, हमने भेड़ाघाट में नर्मदा जयंती को बड़े पैमाने पर मनाने का फैसला किया। यह सिर्फ़ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक पर्यटन उत्सव बन गया। पूरे शहर को रंगीन रोशनी और झंडों से सजाया गया। शाम को घाटों पर महाआरती का आयोजन किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने हिस्सा लिया। नर्मदा जयंती का यह भव्य आयोजन न सिर्फ़ लोगों को आध्यात्मिकता से जोड़ रहा था, बल्कि भेड़ाघाट को एक विश्व स्तरीय पर्यटन स्थल के रूप में भी स्थापित कर रहा था।


इस दौरान, यहाँ के आश्रमों, मठों और मंदिरों का अभूतपूर्व सहयोग मिला, जिन्होंने इस पहल को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


जब जबलपुर ने विश्व को एक नई सोच दी


जबलपुर की पहचान सिर्फ़ इसके इतिहास और प्राकृतिक सौंदर्य से ही नहीं है, बल्कि उन महान व्यक्तित्वों से भी है उन्होंने यहाँ की मिट्टी से निकलकर पूरे विश्व पर अपनी छाप छोड़ी। एक समय था जब महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश (ओशो) और जादूगर आनंद जैसे नाम जबलपुर के पर्याय बन गए थे।


महर्षि महेश योगी, जिन्होंने ट्रांसेंडेंटल मेडिटेशन (TM) की शुरुआत की, जबलपुर में ही रहे और यहाँ से उनके आध्यात्मिक संदेश दुनिया भर में फैले। उनके दर्शन ने लाखों लोगों के जीवन को शांति और स्थिरता दी। इसी तरह, आचार्य रजनीश (ओशो), जिन्होंने जबलपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के रूप में कार्य किया, ने अपनी क्रांतिकारी सोच से पूरे विश्व को झकझोर दिया। उनके विचार आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करते हैं।


और फिर थे जादूगर आनंद, जिन्होंने अपने जादुई करतबों से लोगों का मनोरंजन किया और जबलपुर को मनोरंजन की दुनिया में एक अलग पहचान दिलाई। इन तीनों ने अपने-अपने क्षेत्रों में विश्व स्तर पर अपना प्रभाव छोड़ा, और वे इस बात का प्रमाण हैं कि जबलपुर सिर्फ़ एक शहर नहीं, बल्कि विचारों, आध्यात्मिकता और प्रतिभा का केंद्र रहा है।


नर्मदा: जब नदी ने जीवन की धारा बहाई


नर्मदा नदी सिर्फ़ एक जलधारा नहीं, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए जीवन रेखा है, जो उसके किनारे बसे हैं। लेकिन यहां के दूर-दराज के गांवों में रहने वाले लोगों के लिए स्वास्थ्य सेवाएँ हमेशा एक बड़ी चुनौती रही हैं। सड़कें नहीं थीं, और बीमार व्यक्ति को अस्पताल तक पहुंचाया एक मुश्किल भरा सफर था।


इसी समस्या को सुलझाने के लिए, श्री अनिल दवे, जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक प्रभावशाली व्यक्ति थे, ने एक अनोखी पहल की। उनकी संस्था 'नर्मदा समग्र' ने एक ऐसा विचार प्रस्तुत किया, जिसने पूरे देश का ध्यान खींचा नदी में चलने वाली एम्बुलेंस। यह सिर्फ़ एक एम्बुलेंस नहीं थी, बल्कि एक तैरता हुआ क्लिनिक था।


रिवर बोट एम्बुलेंस: एक अनूठा प्रयोग


इस परियोजना के तहत, पहली बार प्रदेश में रिवर बोट एम्बुलेंस का संचालन शुरू किया गया। यह नाव जबलपुर मंडला और डिंडोरी के उन दूर-दराज के गांवों तक पहुँचती थी, जहाँ सड़कें नहीं थीं। इस नाव पर डॉक्टर और चिकित्साकर्मी दवाओं और उपकरणों के साथ मौजूद रहते थे।


हर दिन, यह एम्बुलेंस नाव नदी के किनारे के गांवों का दौरा करती थी, जहाँ बीमार लोगों का इलाज किया जाता था और उन्हें मुफ्त दवाएं दी जाती थी। यह सिर्फ़ एक चिकित्सा सेवा नहीं थी, बल्कि यह लोगों में विश्वास जगा रही थी कि सरकार और समाज उनकी परवाह करते हैं।


इस अनोखे प्रयोग की सफलता ने सबको चौंका दिया। जो लोग पहले छोटी-मोटी बीमारियों के लिए भी शहर तक नहीं जा पाते थे, उन्हें अब उनके घर के नज़दीक ही इलाज मिल रहा था। इस पहल से न सिर्फ़ लोगों की जान बची, बल्कि स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता भी बढ़ी।


'नर्मदा समग्र' और उनकी गतिविधियाँ


'नर्मदा समग्र' एक ऐसी संस्था है जो नर्मदा नदी और उसके किनारे रहने वाले लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए समर्पित है। उनका काम सिर्फ़ चिकित्सा तक सीमित नहीं था। वे नर्मदा के संरक्षण, उसके किनारे वृक्षारोपण और जल प्रदूषण को रोकने के लिए भी काम करते हैं। वे गाँवों में जागरूकता शिविर लगाते हैं, जहां लोगों को नर्मदा की पवित्रता बनाए रखने का महत्व सिखाया जाता है।


यह संस्था एक अद्भुत उदाहरण है कि कैसे एक व्यक्ति की दूरदर्शिता और समर्पण से बड़े से बड़े सामाजिक बदलाव लाए जा सकते हैं। रिवर बोट एम्बुलेंस सिर्फ़ एक नाव नहीं थी, बल्कि एक उम्मीद की नाव थी, जो नर्मदा की शांत लहरों पर जीवन और स्वास्थ्य की नई धारा बहा रही थी।


जब एक फोन कॉल ने बदल दी मेरी दुनिया


जबलपुर में मेरा काम पूरे शबाब पर था। 'स्टैंड-अप मीटिंग' की मेरी अनूठी पहल से वर्षों से अटके हुए प्रोजेक्ट्स तेज़ी से पूरे हो रहे थे। शहर का प्रशासनिक तंत्र एक नई ऊर्जा और गति से काम कर रहा था। मैं अपने काम में पूरी तरह से डूबा हुआ था।


एक दिन, मैं कटनी जिले के गांवों का दौरा कर रहा था, जहाँ मैं विकास परियोजनाओं का जायजा ले रहा था। चारों तरफ धूल और मिट्टी थी, और मैं सीधे ज़मीन पर बैठकर ग्रामीणों से बातचीत कर रहा था। तभी, मेरे फोन की घंटी बजी। स्क्रीन पर 'मुख्य सचिव महोदय' का नाम चमक रहा था।


मैंने सोचा, शायद किसी प्रोजेक्ट के बारे में कोई जरूरी जानकारी देनी होगी। लेकिन, फ़ोन उठाते ही उनकी आवाज़ में एक अजीब सी गंभीरता थी। उन्होंने सीधे और संक्षिप्त शब्दों में कहा, "आपकी पोस्टिंग बदल दी गई है। आपको तुरंत भोपाल आना है और प्रबंध संचालक, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन का पदभार संभालना है।"


मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। मैं हक्का-बक्का रह गया। यह खबर मेरे लिए किसी झटके से कम नहीं थी। मैंने अभी-अभी जबलपुर में अपने काम की नींव रखी थी। कई महत्वाकांक्षी योजनाएं शुरू हो चुकी थी और मुझे उनमें बहुत उम्मीदें थीं।


यह एक ऐसा तबादला था जिसकी न मैंने कभी कल्पना की थी, और न ही जिसके लिए मैं मानसिक रूप से तैयार था। एक पल पहले मैं ग्रामीण विकास की धूल में सने किसानों के बीच था, और अगले ही पल मुझे प्रदेश की राजधानी में एक विशाल और जटिल मिशन का नेतृत्व करने का आदेश मिल गया था।


मुझे इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि मुख्यमंत्री जी ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के काम में सुधार लाने के लिए इतने उत्सुक थे कि उन्होंने इतनी तेज़ी से यह फैसला लिया। हालांकि मेरे दिल में एक टीस थी कि जबलपुर में मेरा काम अधूरा रह जाएगा, लेकिन एक सरकारी अधिकारी के रूप में मैं अपने कर्तव्य से बंधा था। मैंने बिना एक पल गंवाए अपना दौरा रद्द किया और तुरंत भोपाल के लिए रवाना हो गया।


स्थानांतरण का अघोषित युद्ध


जब मैं मुख्यमंत्री का उप-सचिव था, तो मैंने पहली बार सत्ता के गलियारों में छिपे इस अजीबोगरीब खेल को करीब से देखा। यह एक ऐसा शतरंज का खेल था, जहां मोहरे नहीं, इंसान अपनी जिंदगी दांव पर लगाते थे। मेरे सामने अधिकारियों के तबादले की फाइलें आती थी, और हर फाइल एक कहानी कहती थी, एक सपना तोड़ती थी।


मुझे याद है, जब किसी चपरासी या बाबू के स्थानांतरण पर विचार होता था, तो कितनी गहन चर्चा होती थीं। उसकी पारिवारिक स्थिति, बच्चों की शिक्षा, और काम की आवश्यकता - हर पहलू पर सोच-विचार किया जाता था। मानो, उसके जीवन का फैसला लेने से पहले हम एक संवेदनशील अदालत में बैठे हों।


परंतु, जब किसी भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारी के स्थानांतरण की बारी आती, तो सारे सिद्धांत हवा हो जाते। वहाँ न तो योग्यता देखी जाती थी, न ही अनुभव का कोई मोल था। उस अधिकारी की रुचि, उसकी मेहनत से शुरू किए गए प्रोजेक्ट, या उसके सपनों का कोई जिक्र तक नहीं होता था। यह सिर्फ एक कलम की नोक का खेल था, एक हस्ताक्षर की ताकत जो एक पूरे परिवार को जड़ से उखाड़ फेंकती थी।


व्यक्तिगत विस्थापन की त्रासदी


लोग समझते हैं कि एक अधिकारी का तबादला केवल उनका होता है। पर यह सच नहीं है। यह पूरे परिवार का विस्थापन होता है। स्कूल बदल जाते हैं, दोस्त छूट जाते हैं, और एक स्थापित ज़िंदगी की नींव हिल जाती है। उस समय, मैं खुद सोचता था कि हम बड़े-बड़े भाषणों में आदर्शवाद की बातें करते हैं, "योग्यता ही प्राथमिकता है" और "आवश्यकता के अनुसार नियुक्ति" जैसे वाक्य दोहराते हैं, लेकिन वास्तविकता से कोसों दूर थी।


मैंने खुद अपनी सेवा के हर पड़ाव पर इस व्यवस्था का दंश झेला है। जब आप दिल से किसी मिशन या लक्ष्य पर काम कर रहे हों, तो आपको लगता है कि सरकार आपका साथ देगी। लेकिन वहाँ कोई आपके लक्ष्य को नहीं समझता। वहाँ हर कोई अपनी सुविधा, अपनी राजनीतिक ज़रूरतें और अपने छोटे-मोटे स्वार्थ देखता है।


सिद्धांतों की कब्रगाह


शासन के ये गलियारे मानव संसाधन प्रबंधन (Human Resource Management) के सिद्धांतों की कब्रगाह हैं। यहाँ उन सिद्धांतों की बात करना पाप है, जो एक कर्मचारी की क्षमता को बढ़ाकर संगठन को मजबूत करने की बात करते हैं। यहाँ परंपरा और व्यक्तिगत स्वार्थ का राज चलता है, और बदलाव के लिए कोई जगह नहीं है। अधिकारीगण नए विचारों से दूर भागते हैं, क्योंकि नया करने में जोखिम है और पुराने ढर्रे पर चलना सुरक्षित है।


मेरे लिए यह सिर्फ कागज़ पर होने वाला बदलाव नहीं था, बल्कि एक गहरा भावनात्मक आघात था। यह समझना दर्दनाक था कि एक व्यक्ति की पूरी ज़िंदगी और उसके परिवार का भविष्य, कुछ ऐसे लोगों के फैसलों पर निर्भर करता है, जिन्हें उसकी परवाह नहीं है। यह सिर्फ़ एक तबादला नहीं था, बल्कि हर बार उम्मीदों का टूटना था।


वह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि हमारे प्रशासनिक तंत्र की एक कड़वी सच्चाई है। यह एक ऐसा विरोधाभास है, जहाँ सबसे योग्य अधिकारियों को सबसे कम सम्मान मिलता है।


इस कहानी में जो सबसे दर्दनाक पहलू उभरकर आता है, वह है मानव संसाधन सिद्धांतों की पूरी तरह से अनदेखी। यह देखकर हैरानी होती है कि एक चपरासी का तबादला करते समय भी उनके जीवन, परिवार और स्थिरता का ध्यान रखा जाता है, लेकिन जब एक IAS अधिकारी की बात आती है, तो ये सारे मानवीय पहलू अचानक बेमानी हो जाते हैं। उनकी योग्यता, उनके द्वारा शुरू किए गए प्रोजेक्ट, उनकी मेहनत और उनके सपनों का कोई मोल नहीं रह जाता। वे सिर्फ़ एक मोहरे बन कर रह जाते हैं, जिन्हें सत्ता की शतरंज की बिसात पर इधर-उधर सरकाया जाता है।


यह केवल एक व्यक्ति का विस्थापन नहीं है, बल्कि उसके पूरे परिवार का भावनात्मक और सामाजिक विस्थापन है। बच्चों की शिक्षा और दोस्तों से दूरी, जीवन की असुरक्षा, और हर बार नए सिरे से शुरुआत करने का तनाव, ये सब उस अधिकारी के लिए काम करने के माहौल को बहुत मुश्किल बना देते हैं। जब कोई अधिकारी दिल से किसी मिशन पर काम करना चाहता है, तो उसे लगता है कि सरकार उनके साथ है। लेकिन जब उसका तबादला सिर्फ़ राजनीतिक सुविधा के लिए कर दिया जाता है, तो यह उसके मनोबल को पूरी तरह से तोड़ देता है।


यह व्यवस्था केवल अधिकारियों को ही नहीं, बल्कि पूरी सरकार को नुकसान पहुँचाती है। जब अधिकारी बार-बार बदलते हैं, तो नीतियों और परियोजनाओं में निरंतरता नहीं रह पाती। एक अधिकारी एक जगह काम शुरू करता है, दिल लगा कर मेहनत करता है, और फिर अचानक उसे हटा दिया जाता है। इसका सीधा असर जनता पर पड़ता है, क्योंकि विकास कार्य धीमे हो जाते हैं या रुक जाते हैं।


यह तबादला मेरे लिए एक चुनौती और एक अवसर दोनों था चुनौती थी एक नए क्षेत्र में काम करने की, और अवसर था एक बड़े मिशन का हिस्सा बनने का।


एम डी ग्रामीण हेल्थ मिशन

 मध्य प्रदेश ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन: एक प्रशासक की कहानी

रात का गहरा सन्नाटा था। सिर्फ घड़ी की टिक-टिक और मेरे लैपटॉप से छनकर आती नीली रोशनी उस शांति को भंग कर रही थी। बाहर की दुनिया में सब आराम कर रहे थे, लेकिन मेरे भीतर एक तूफान उमड़ रहा था। मेरे कंधे पर मध्य प्रदेश के लाखों ग्रामीण लोगों के स्वास्थ्य का भारी बोझ था, और मैं जानता था कि इस लड़ाई को जीतने के लिए मुझे एक सैनिक से कहीं बढ़कर बनना होगा। मुझे ज्ञान का वह कवच और हथियार चाहिए था जो किसी सरकारी फ़ाइल में नहीं मिलता। यही कारण था कि मैं जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के ऑनलाइन पब्लिक हेल्थ कोर्स में रात-रात भर जागकर खुद को तैयार कर रहा था।

दिन में, मैं कमिश्नर और स्वास्थ्य सचिव के पद पर बैठा होता था। मेरे सामने कागजों का विशाल अंबार लगा रहता था, जिसमें सरकारी आदेश, बजट आवंटन और लक्ष्य प्राप्ति की रिपोर्ट होती थीं। हर दिन मैं देखता था कि कागजों पर लिखे वादे और जमीनी हकीकत में कितना फर्क है। आशा कार्यकर्ताओं पर्याप्त संसाधनों के बिना संघर्ष कर रही थीं, जननी सुरक्षा योजना का लाभ सही लोगों तक नहीं पहुंच पा रहा था, और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र केवल नाम के लिए खड़े थे। मुझे यह सब देखकर घोर निराशा होती थी। एक तरफ बड़े-बड़े लक्ष्य थे, दूसरी तरफ कमजोर व्यवस्था। मुझे लगता था, मैं बस एक नाव का नाविक हूँ, जिसके पास पतवार है, लेकिन उसे चलाने का सही तरीका पता नहीं।

और इसी फ़्रस्ट्रेशन ने मुझे रातों का साधक बना दिया। मेरी पत्नी चिंतित होकर पूछती थी, "आप इतना क्यों पढ़ते हैं? क्या आप अपनी नींद कुर्बान कर रहे हैं?" मैं मुस्कुराकर कहता था, "मैं नींद नहीं, अज्ञानता कुर्बान कर रहा हूँ। यह सिर्फ एक कोर्स नहीं, यह एक लड़ाई है, मेरी खुद की कमियों के खिलाफ और उन लोगों के लिए जो बेहतर जीवन के हकदार हैं।"

मैं पब्लिक हेल्थ के गहरे समुद्र में गोता लगा चुका था। मैंने महामारी विज्ञान के जटिल समीकरणों को सुलझाया, स्वास्थ्य अर्थशास्त्र की पेचीदगियों को समझा, और प्रबंधन की रणनीतियों को अपने दिमाग में बैठाया। हर लेक्चर, हर असाइनमेंट मेरे लिए एक नया हथियार बन रहा था। मैं सीख रहा था कि कैसे सिर्फ धन खर्च करने से नहीं, बल्कि सही जगह पर सही योजना लगाकर परिणाम हासिल किए जा सकते हैं। मैं अपनी दिन की प्रशासनिक जिम्मेदारियों के लिए रात में ज्ञान का एक नया किला बना रहा था।

धीरे-धीरे, मेरी रात की मेहनत मेरे दिन के काम में झलकने लगी। मेरे सहयोगियों ने बदलाव को महसूस किया। मैं अब सिर्फ कागज़ पर आदेश नहीं देता था, बल्कि डेटा और नए-नए तरीकों का उपयोग करके समस्या की जड़ तक पहुँचता था। मैंने स्वास्थ्य केंद्रों को स्वायत्तता दी और उन्हें अपने बजट का उपयोग करने का अधिकार दिया। मैंने आशा कार्यकर्ताओं के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करवाए, जिससे वे गाँवों में लोगों की पहली स्वास्थ्य सलाहकार बन सकें। मैंने ग्राम स्वास्थ्य एवं स्वच्छता समितियों को केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि गाँव के स्वास्थ्य की पूरी जिम्मेदारी सौंप कर उन्हें सशक्त बनाया।

यह सब रातों की उन नींदों का नतीजा था जो मैंने अपने लोगों के स्वास्थ्य के लिए कुर्बान की थी। आज जब मैं किसी गाँव में जाता हूँ और देखता हूँ कि एक गर्भवती महिला को सुरक्षित प्रसव के लिए समय पर अस्पताल ले जाया जा रहा है, या कोई बच्चा समय पर टीका लगवा रहा है, तो मुझे महसूस होता है कि मेरी वह रात की मेहनत व्यर्थ नहीं गई। मेरे लिए, सबसे बड़ा पुरस्कार उन लोगों के चेहरों पर दिख रही संतुष्टि और विश्वास की मुस्कान है। यह सिर्फ एक मिशन नहीं था, यह मेरे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था।

प्रशासक की गाथा: नैतिकता, संघर्ष और तबादला

जब मैंने मध्य प्रदेश के ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन की बागडोर संभाली, तो मेरी आँखों में लाखों लोगों के जीवन को बेहतर बनाने का सपना था। लेकिन जल्द ही, मैंने महसूस किया कि यह लड़ाई बाहर से कम, और भीतर से ज़्यादा थी। मैंने देखा कि पूरा सिस्टम एक विशाल, जटिल और केंद्रीकृत मकड़जाल में उलझा हुआ था। भोपाल में बैठे अधिकारियों के एक हस्ताक्षर के लिए, गाँवों की आशा कार्यकर्ताएँ हफ्तों तक ज़रूरी दवाइयों और पोषण किटों का इंतज़ार करती थीं। हर छोटे से छोटे सामान के लिए, फाइलें एक मेज से दूसरी मेज पर यात्रा करती थीं, और अक्सर उसकी डिलीवरी लागत सामग्री की कीमत से कहीं ज़्यादा हो जाती थी। यह सिर्फ एक प्रशासनिक समस्या नहीं थी; यह मानवीय त्रासदी थी, जो हर दिन अनगिनत मौतों को आमंत्रित कर रही थी।

मेरे भीतर की बेचैनी बढ़ती गई। मैंने इस गतिहीनता को तोड़ने का फैसला किया। मैंने एक विकेंद्रीकृत व्यवस्था लागू की, जिसमें जिला स्तर के अधिकारियों को निर्णय लेने और सामग्री खरीदने का अधिकार दिया गया। शुरुआत में, सिस्टम ने विरोध किया, जैसे शरीर किसी विदेशी तत्व को बाहर निकालने की कोशिश करता है। लेकिन जब पहले ही महीने में समय पर दवाओं और उपकरणों की उपलब्धता सुनिश्चित हुई, तो विरोध की आवाज़ें शांत होने लगीं। मुझे लगा कि मैं जीत रहा हूँ।

भ्रष्टाचार का दलदल और नैतिक दृढ़ता का इम्तिहान

मेरी जीत का यह एहसास क्षणिक था। मैंने जैसे ही दवाओं की खरीद और चलित अस्पतालों के कॉन्ट्रैक्ट की जाँच शुरू की, मुझे एक गहरा और काला दलदल दिखाई दिया। यह भ्रष्टाचार का दलदल था, जिसकी जड़ें सिस्टम में बहुत गहराई तक फैली हुई थी। फर्जी टेंडर, घटिया सामग्री और कागज़ों पर दौड़ती एंबुलेंस... यह सब देखकर मेरा दिल बैठ गया।

मैंने एक-एक कर उन फर्जी कॉन्ट्रैक्ट्स को खत्म करना शुरू किया। अचानक, हर तरफ से मेरे ऊपर दबाव आने लगा। मेरे फोन की घंटी लगातार बजती रहती थी। राजनीतिक धमकियों से लेकर निजी आग्रहों तक, हर तरह की कोशिश की गई कि मैं पीछे हट जाऊँ। लेकिन मैं अपने इरादों पर अटल रहा। मेरे पास मेरे मंत्री महोदय का समर्थन था, जो मेरी ईमानदारी पर आँख बंद करके भरोसा करते थे। उनका भरोसा मेरे लिए एक अभेद्य कवच की तरह था, जिसने मुझे हर हमले से बचाया। मैंने उन चलित अस्पतालों के कॉन्ट्रैक्ट खत्म किए और एक पारदर्शी टेंडर प्रक्रिया लागू की। मेरी जीत हो चुकी थी, पर यह आखिरी लड़ाई नहीं थी।

सम्मान पर वार और विदाई का फैसला

सबसे मुश्किल लड़ाई मुझे अपने ही प्रमुख सचिव से लड़नी पड़ी। वह एक तेज-तर्रार और महत्वाकांक्षी व्यक्ति थे, जिन्हें परिणाम की जल्दी थी, भले ही उसके लिए प्रक्रियाओं को तोड़ना पड़े। वह अकसर मुझसे ऐसी फाइलों पर हस्ताक्षर करने को कहते थे, जिनकी खरीद प्रक्रिया में मैं शामिल नहीं था। हर बार, जब वह मेरे सामने ऐसी फाइल रखते, मेरे अंतर्मन में एक आवाज़ चीखती थी, "यह गलत है!" मेरा स्वाभिमान और मेरे नैतिक मूल्य मुझे इसकी इजाजत नहीं देते थे।

एक दिन, तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया। उन्होंने एक ऐसी फाइल मेरे सामने रखी, जिस पर मैंने साफ-साफ हस्ताक्षर करने से मना कर दिया। मैंने उनसे कहा, "मैं उन कागज़ों पर दस्तखत नहीं करेगा, जहाँ मेरे काम की पारदर्शिता नहीं है।" उनका चेहरा गुस्से से तमतमा गया। उन्होंने अपनी कुर्सी से उठकर मुझे धमकाते हुए कहा कि वह मेरी शिकायत सीधे मुख्य सचिव से करेंगे।

मुझे पता था कि अब वापस लौटने का कोई रास्ता नहीं है। अगले ही दिन, मैं सीधे मुख्य सचिव से मिला और उन्हें पूरी बात बताई। मैंने उनके सामने अपना पक्ष रखा, लेकिन किसी की शिकायत नहीं की। इसके बाद मैं मुख्यमंत्री महोदय से मिला और उनसे कहा, "सर, मैं ऐसी जगह काम नहीं कर सकता जहाँ मुझे अपनी ईमानदारी से समझौता करना पड़े। मैं आपसे अनुरोध करता हूँ की मेरा तबादला कर दें।"

मेरी बात सुनी गई। कुछ ही दिनों में मेरा तबादला हो गया। यह एक हार की तरह लग सकता था, लेकिन मेरे लिए यह सबसे बड़ी जीत थी। मैंने अपना आत्म-सम्मान नहीं बेचा था। मैंने अपनी नैतिकता पर कोई दाग नहीं लगने दिया था। जब मैंने नए पद, कमिश्नर महात्मा गांधी रोजगार गारंटी योजना, को संभाला, तो मेरे मन में एक सुकून था। एक प्रशासक जो व्यवस्था को बदल सकता है, वह अपने सिद्धांतों पर भी अटल रह सकता है।

आयुक्त, मनरेगा 

प्रशासन की रणभूमि: मध्य प्रदेश में मनरेगा की महागाथा


विरासत में मिला संघर्ष, मैं कमिश्नर, मध्य प्रदेश रोजगार गारंटी परिषद का पदभार संभाल रहा हूँ। यह पद मेरे लिए सिर्फ एक सरकारी कुर्सी नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी थी। मेरे सामने एक विशालकाय चुनौती थी: एक करोड़ बीस लाख मजदूरों को रोजगार देना और उनका भुगतान सुनिश्चित करना। यह वो समय था जब मध्य प्रदेश में लगभग आठ लाख काम एक साथ चल रहे थे, और इन सबका भुगतान 42,000 बैंक खातों के माध्यम से होता था। लेकिन यह प्रक्रिया कागजी और धीमी थी। चेक से भुगतान की वजह से 1,100 चेक हमेशा बैंकों की पाइप लाइन में अटके रहते थे। हर साल 450 शिकायतें आती थी। यह कोई साधारण समस्या नहीं थी, यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था के दिल की धड़कन को रोक रही थी।


राज्य स्तर पर, मैं मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली रोजगार गारंटी परिषद का सचिव था, जहाँ नीतिगत निर्णय लिए जाते थे। लेकिन असली जंग तो मैदान में थी, जहाँ कागज़ की फाइलें और मजदूरों का पसीना एक-दूसरे से टकराते थे। मैं जानता था कि इस समस्या की जड़ में पारदर्शिता की कमी और पुरानी भुगतान प्रणाली है। यह एक ऐसा युद्ध था जिसमें मेरा सबसे बड़ा दुश्मन अदृश्य भ्रष्टाचार और अक्षमता थी।


क्रांति का बिगुल - ऑनलाइन भुगतान


मैंने एक असंभव सा सपना देखा: इस पूरी व्यवस्था को ऑनलाइन करना। मैं एक ऐसी प्रणाली चाहता था जहाँ एक मजदूर का पैसा बिना किसी बिचौलिए के सीधे उसके खाते में पहुँचे। यह एक क्रांतिकारी विचार था, लेकिन उसकी राह में पहाड़ जैसी बाधाएं थीं। मैंने ऑनलाइन भुगतान (E-Payment) और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) को लागू करने का प्रस्ताव रखा। इसका मतलब था:


काम के लिए आवेदन से लेकर मस्टर रोल तक, सब कुछ ऑनलाइन। काम का मूल्यांकन भी डिजिटल रूप से और सबसे महत्वपूर्ण, भुगतान सीधा मजदूरों के खातों में।


लेकिन इस क्रांति का विरोध हर तरफ से शुरू हो गया। पूरा प्रशासनिक तंत्र इसके खिलाफ था। अधिकारियों को डर था कि उनके अधिकार कम हो जाएंगे। ठेकेदारों को भय था कि उनके अवैध मुनाफे रुक जाएंगे। यहाँ तक कि राजनीतिक गलियारों में भी बेचैनी थी। मैं एक तूफान के बीच खड़ा था, लेकिन मुझे एक मजबूत कवच मिला  तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान का अटूट समर्थन। उन्होंने मेरी सोच पर भरोसा किया और मेरी टीम को इस मिशन को पूरा करने की हरी झंडी दी।


बाधाओं का महासागर


हमने इस चुनौती को स्वीकार किया। लेकिन यह आसान नहीं था।


टेक्नोलॉजी की कमी: उन दिनों, ग्राम पंचायतों में इंटरनेट कनेक्शन नहीं था, और 2G नेटवर्क ही उपलब्ध था।


बैंकों का प्रतिरोध: कई बैंक, खासकर ग्रामीण और सहकारी बैंक, ऑनलाइन प्रणाली से जुड़ने को तैयार नहीं थे। मजदूरों के खाते अलग-अलग बैंकों - राष्ट्रीयकृत, ग्रामीण, पोस्ट ऑफिस और कॉपरेटिव बैंकों में थे, उन्हें एक साथ लाना एक जटिल काम था।


डेटा की चुनौती: मजदूरों के नाम, खाता नंबर, IFSC कोड और मोबाइल नंबर को एक-एक करके सिस्टम में डालना एक विशालकाय कार्य था, जिसमें त्रुटियों की पूरी संभावना थी।


मेरी टीम ने दिन-रात काम किया। हम एक-एक करके हर बाधा को पार करते गए। हमने ग्राम पंचायतों के अधिकारियों को प्रशिक्षण दिया, बैंकों के साथ बैठकें की, और डेटा को सत्यापित करने के लिए एक मजबूत तंत्र स्थापित किया।


विजय और गौरव


और फिर वह दिन आया। मध्य प्रदेश ऑनलाइन भुगतान प्रणाली लागू करने वाला देश का पहला राज्य बना। यह एक ऐसा क्षण था जब मेरे दिल में गर्व और संतोष का सैलाब उमड़ पड़ा। हम प्रतिदिन पांच करोड़ रुपये से अधिक की राशि सीधे मजदूरों के खातों में हस्तांतरित करते थे। यह सिर्फ पैसों का हस्तांतरण नहीं था, यह ग्रामीण भारत में एक नई उम्मीद का संचार था।


जॉब कार्ड, जो कभी महज एक कागज का टुकड़ा था, अब एक मजदूर का स्वाभिमान बन गया था। यह सिर्फ़ एक प्रशासनिक सुधार नहीं था, यह एक सामाजिक क्रांति थी। यह कहानी मेरे और मेरी टीम के संघर्ष की है, जिसने विरोधों और बाधाओं के बावजूद पारदर्शिता और न्याय की मशाल को जलाए रखना। यह एक प्रशासक की कहानी है जिसने दिखाया कि अगर नियत साफ हो और इरादे मजबूत, तो सबसे बड़ी चुनौतियों को भी पार किया जा सकता है।

परिवर्तन का रण


यह सिर्फ एक नई ऑनलाइन भुगतान व्यवस्था नहीं थी; यह सदियों पुराने, जड़ जमाए हुए तंत्र पर एक सीधा हमला था। इस बदलाव के विरुद्ध हर ओर से प्रतिरोध की लहर उठ रही थी। मेरे साथी अधिकारियों के चेहरों पर क्रोध और घोर निराशा की परछाई थी। उनके लिए यह केवल काम का एक नया तरीका नहीं था, बल्कि उनकी वर्षों की सुविधा और अनकहे फायदे की समाप्ति थी। मुझे इस आक्रोश को शांत करने और इस व्यवस्था को जमीन पर उतारने का मुश्किल काम सौंपा गया था। मैंने एक युद्ध की तरह इसे लिया - पूरे प्रदेश की यात्रा, धूल भरे रास्तों पर, हर जिले और संभाग में जाकर खुद ट्रेनिंग दे रहा था। मेरा काम सिर्फ ज्ञान देना नहीं था, बल्कि उनके गुस्से को समझना और उनकी समस्याओं का समाधान ढूंढना था। मैं बैंकों के पिछले कमरों में घंटों बैठकर अटकी हुई पेमेंट्स को क्लियर करवाता, मानो मैं एक सैनिक हूँ जो मोर्चे पर फंसा हुआ है।


सागर संभाग की बैठक


सागर संभाग की बैठक थी। हॉल में सन्नाटा था, पर एक अजीब सी बेचैनी भरी हुई थी। मेरे वरिष्ठ अधिकारी और मैं बैठे थे, और सामने थे फील्ड के वे अधिकारी जो इस नई व्यवस्था से सबसे ज्यादा प्रभावित थे। उनके चेहरों पर थकी हुई झुंझलाहट और मेरे प्रति एक अनदेखी दुश्मनी साफ झलक रही थी। बैठक समाप्त हुई। भोजन के बाद, हम सब आराम से बातें कर रहे थे। तभी सागर के आयुक्त, जो मुझसे पद में काफी जूनियर थे, पर अपने अहंकारी स्वभाव के लिए कुख्यात थे, अचानक मेरे सामने खड़े हो गए। उनकी आँखों में अंगारे धधक रहे थे, और उनके होंठों से निकले शब्द किसी बिजली की तरह पूरे कमरे में फैल गए।


"रवीन्द्र! तुम्हें देखकर मेरी इच्छा हो रही है कि मैं तुम्हें जूते मारूं!"


कमरे में पल भर के लिए मौत का सन्नाटा छा गया। सबके हाथों से चम्मच गिर गए, आवाज़ें रुक गईं। यह एक सार्वजनिक अपमान था, एक ऐसी चोट जो सब के सामने दी गई थी। उनका चेहरा गुस्से से लाल था, मानो वह सच में जूता उठाकर मार देंगे।


मैंने पलक झपकाए बिना, एक धीमी, शांत मुस्कान के साथ जवाब दिया, "आप बहुत महान और दयालु हैं, सर। जिस व्यक्ति की रातोंरात इतनी आमदनी बंद हो जाए, वह तो गोली मार देगा। आप तो केवल जूता मारने की बात कर रहे हैं।"


मेरे शब्द किसी चुटकुले की तरह थे, पर उनका वार सीधा था। मेरा इशारा सब समझ गए - यह व्यवस्था जिन अनैतिक आय स्रोतों को बंद कर रही थी, उन पर था। पूरे कमरे में ठहाके गूंज उठे। उनका अहंकारी चेहरा शर्म से लाल हो गया, और वे अपनी कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। उस रात, उनकी तथाकथित प्रतिष्ठा धूल में मिल गई और मेरी मुस्कान एक छोटी सी विजय का प्रतीक बन गई।


मंत्री जी का दरबार


यह कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। एक महिला मंत्री लगातार इस व्यवस्था के विरुद्ध मुख्यमंत्री जी को नोटशीट लिख रही थी। यह स्थिति राजनीतिक रूप से संवेदनशील थी। मुख्यमंत्री जी ने मुझे उनसे चर्चा करने भेजा। मैं उनके आलीशान दफ्तर में पहुँचा। मंत्री जी इतनी नाराज़ थीं कि मेरे आते ही मानो ज्वालामुखी फट गया। वे लगातार मुझे भला-बुरा कहती रहीं, उनके शब्द गुस्से से भरे हुए थे।


मैंने उनके सामने सिर झुकाए, चुपचाप उनकी सारी बातें सुनीं। जब उनका गुस्सा थोड़ा ठंडा हुआ, तो मैंने मुस्कुराते हुए कहा, "मैडम, आप जो सारी बातें मुख्यमंत्री जी को कहना चाहती हैं, वो मुझे क्यों सुनाकर अपनी भड़ास निकाल रही हैं?"


मेरे इस मज़ाक पर वे रुक गई। पल भर की चुप्पी के बाद, उनकी नाराज़गी पिघल गई और वे हंस पड़ीं। "देखो, चुनाव सर पर आ गए हैं," उन्होंने कहा। "ऐसे में तुम लोगों ने भुगतान की व्यवस्था बदल दी है। अधिकारियों ने पैसा देना बंद कर दिया है। अब 'सेवा' का खर्च कहाँ से आएगा?"


उनकी बेबाक ईमानदारी ने मुझे चौंका दिया। यह सिर्फ़ एक नई प्रणाली का विरोध नहीं था, यह चुनाव की ज़मीनी हक़ीक़त थी। मैंने उनसे विनम्रतापूर्वक कहा, "मैडम, यह बात आपको सही मंच पर उठना चाहिए। हाँ, अगर इस नई योजना के क्रियान्वयन में कोई कठिनाई हो रही है, तो आप मुझे बताएं। मैं उसे दूर करने का हर संभव प्रयास करूँगा।"


यह बदलाव सबके लिए आसान नहीं होता। यह कई लोगों के लिए पीड़ादायक हो सकता है, यही वजह है कि वे इसका विरोध करते हैं। शासकीय अधिकारी अक्सर बदलाव के बहुत खिलाफ होते हैं। उन्हें नए विचारों पर काम करना असहज लगता है। पुराने, पारंपरिक तरीके सुकून भरे होते हैं। लेकिन समय के साथ, और सही मार्गदर्शन के साथ, लोग परिवर्तन को स्वीकार कर ही लेते हैं। इस घटना ने मुझे यह सिखाया कि हर बदलाव का एक युद्ध होता है, और उस युद्ध को जीतने के लिए सिर्फ़ नियम नहीं, बल्कि समझदारी, धैर्य और हास्य की भी जरूरत होती है।



संभागीय आयुक्त, उज्जैन  

सिंहस्थ की कहानी: एक महाप्रबंधक का सफर

एक सुबह, मेरे फ़ोन की घंटी बजी, और उस फ़ोन कॉल ने मेरी शांत, सेवानिवृत्ति की ओर बढ़ती हुई ज़िन्दगी में एक ज़ोरदार तूफ़ान ला दिया। दूसरी तरफ माननीय मुख्यमंत्री जी थे, और उनका एक ही वाक्य मेरे कानों में गूँज रहा था - “शासन और संगठन ने तय किया है कि 2016 के सिंहस्थ महाकुंभ को विश्व स्तरीय बनाया जाए, और इस आयोजन की कमान अब आप संभालेंगे। आपका तबादला उज्जैन के आयुक्त के पद पर किया जा रहा है।”

यह सुनते ही मेरे अंदर एक तूफ़ान सा उठ गया। मेरा रिटायरमेंट बस तीन साल दूर था, और मैंने मन में एक ख़ूबसूरत तस्वीर बना रखी थी- भोपाल में परिवार के साथ शांत, सुकून भरी ज़िन्दगी। मैंने विनम्रता से कहा, "सर, मैं अब भोपाल में ही रहना चाहता हूँ, कृपया मेरा तबादला न किया जाए।" मेरी बात सुनकर मुख्यमंत्री जी ने मुझे समझाने की जिम्मेदारी मुख्य सचिव को सौंपी।

अगले दो दिन तक मुख्य सचिव के साथ मेरी लंबी, गहन बैठकें हुईं। वे छिंदवाड़ा में मेरे कलेक्टर रह चुके थे, इसलिए हमारा रिश्ता सिर्फ एक अधिकारी का नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य जैसा था। उन्होंने मुझे इस आयोजन का असली महत्त्व समझाया। "यह सिर्फ एक मेला नहीं है," उन्होंने कहा, "यह लाखों लोगों की आस्था का महासागर है, और सरकार की साख का सवाल। इस पर देश और दुनिया की नज़र है।" उनकी बातों में एक ऐसा जादू था, जिसने मेरे सारे प्रतिरोध को पिघला दिया। मैंने उनका आदेश स्वीकार कर लिया, यह जानते हुए कि यह सिर्फ एक पदभार नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक जिम्मेदारी थी।

जब मैंने उज्जैन की कमान संभाली

जब मैंने उज्जैन में कदम रखा, तो मैंने एक ही संकल्प लिया यह आयोजन कागज़ों पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर होगा। मैंने तुरंत ही पारंपरिक पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन और वातानुकूलित कमरों की बैठकों को ख़त्म कर दिया। मेरा नया नियम था हर स्पॉट पर स्टैंड-अप मीटिंग।

इन बैठकों का नज़ारा ही कुछ और होता था। मैं हर उस जगह पर जाता था जहाँ कोई काम होना था नदी के घाट पर, संतों के शिविर में, शहर की सड़कों पर। मेरे साथ केवल अधिकारी नहीं होते थे, बल्कि आम जनता, स्थानीय पत्रकार, नेता, और सबसे ख़ास, साधु समाज के प्रतिनिधि भी होते थे। हर काम की योजना, उसकी बारीकियां और संभावित चुनौतियां सबके सामने खुली चर्चा में रखी जाती थीं। यह न केवल पारदर्शिता का एक नया अध्याय था, बल्कि इसने हर stakeholder को इस मिशन का हिस्सा बना दिया था। हर सुझाव पर गंभीरता से विचार होता, और ज़रूरी होने पर ही प्रस्ताव बनाकर शासन को भेजा जाता था।

काल और महाकाल का रहस्य

जैसे-जैसे मैं उज्जैन की गलियों और मंदिरों में उतरता गया, इस नगर का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक महत्व मेरे सामने खुलता गया। मैंने उज्जैन की भौगोलिक स्थिति, स्कंद पुराण में वर्णित अवंतिका खंड की कहानियों और विक्रम संवत के पंचांग की रचना को मिलाकर एक सरल कहानी तैयार की, जिसे मैंने "पस्तोर डॉटरिन" नाम दिया।

मैंने पाया कि उज्जैन सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित था। इसे मणिपुर चक्र या पृथ्वी की नाभि माना गया है। संस्कृत का 'काल' शब्द, जिसका अर्थ समय और मृत्यु दोनों है, शिव से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि उज्जैन में स्थित शिव मंदिर को महाकाल मंदिर कहा जाता है।

यहाँ 'युग्म' यानी युग का हर कल्प, 84 कल्पों से मिलकर बना है, जिसके प्रतीक के रूप में उज्जैन में 84 महादेव मंदिरों का निर्माण किया गया। जैसे पृथ्वी पर सात महासागर हैं, उसी तरह उज्जैन में सप्त सागर बनाए गए। यहाँ शिव का वास होने के कारण पार्वती, गणेश, कार्तिकेय, भैरव और नंदी जैसे शैव परिवार के देवताओं के मंदिर भी बनाए गए। सबसे रहस्यमयी बात यह थी कि महाकाल मंदिर का गर्भगृह दक्षिणमुखी है, क्योंकि यह कभी वाममार्गी कापालिकों की साधना स्थली था। यहाँ साधना करने से मोक्ष मिलता है, ऐसी मान्यता गंगा में स्नान करने जैसी ही पवित्र है। उज्जैन का प्राचीन नगर वास्तु सिद्धांतों पर आधारित था, और यहीं पर पहली बार 24 घंटे, सप्ताह के सात दिनों के नाम और 12 महीनों की अवधारणा पंचांग में दी गई थी।

समय की गणना का नया अध्याय: वैदिक घड़ी

ग्रीनविच मीन टाइम (GMT) की शुरुआत 1884 में वाशिंगटन में हुई थी, लेकिन हमारी वैदिक समय गणना इससे कहीं अधिक प्राचीन है। सूर्यमान और चंद्रमा कैलेंडर की अपनी अलग प्रणालियां हैं, जो सदियों से चली आ रही है। विक्रम संवत और शक संवत जैसे कैलेंडर अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं, लेकिन सभी का मूल वैदिक सिद्धांतों पर आधारित है।

और अब, उज्जैन में एक नई क्रांति हो रही थी - दुनिया की पहली वैदिक घड़ी की आधारशिला रखी गई। यह घड़ी सूर्योदय पर आधारित समय की गणना करती है, और इसका उपयोग ब्रह्म मुहूर्त व राहु काल जैसे शुभ मुहूर्तों के लिए किया जा सकता है। यह घड़ी सनातन सिंबोलॉजी पर आधारित है जैसे 1 से 12 संख्याओं के बजाय प्रतीकात्मक निरूपणों का उपयोग करती है: 12 के स्थान पर आदित्य, 1 के स्थान पर ब्रह्मा, 2 के स्थान पर अश्विनी, 3 के स्थान पर त्रिगुण, और ऐसे ही आगे।

मेरा सफर एक तबादले से शुरू हुआ था, लेकिन यह एक आत्म-खोज और ज्ञान का सफर बन गया। मैं सिर्फ एक अधिकारी नहीं था जो एक मेले का प्रबंधन कर रहा था; मैं एक विरासत का संरक्षक था, जो प्राचीन समय की गणना को आधुनिक दुनिया से जोड़ रहा था। मैंने पाया कि सच्ची योजना बंद कमरे में नहीं, बल्कि उन लोगों के बीच होती है जो उस योजना का हिस्सा बनने वाले हैं, और सच्ची सफलता तब मिलती है जब आप अपने काम को सिर्फ एक कर्तव्य नहीं, बल्कि एक गौरवशाली मिशन बना लेते हैं।

उज्जैन का संक्षिप्त इतिहास

उज्जैन, जिसे प्राचीन काल में उज्जयिनी या अवंतिका के नाम से जाना जाता था, भारत के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण शहरों में से एक है। इसका इतिहास लगभग 5000 वर्ष पुराना माना जाता है। यह शहर क्षिप्रा नदी के तट पर बसा है और इसे 'महाकाल की नगरी' भी कहा जाता है।

प्राचीन और पौराणिक काल

उज्जैन का उल्लेख पुराणों और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक, अवंती की राजधानी था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यहां भगवान शिव ने दूषण राक्षस का वध कर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्वयं को स्थापित किया। भगवान कृष्ण और बलराम ने भी अपनी शिक्षा यहीं सांदीपनि आश्रम में प्राप्त की थी।

सम्राट विक्रमादित्य और स्वर्ण युग

उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य की राजधानी के रूप में जाना जाता है, जिनके शासनकाल में यह कला, संस्कृति, शिक्षा और खगोल विज्ञान का एक प्रमुख केंद्र बन गया। उनके दरबार में महाकवि कालिदास सहित नौ विद्वान (नवरत्न) थे। ऐसा माना जाता है कि 57 ईसा पूर्व में, विक्रमादित्य ने शकों को हराकर विक्रम संवत की शुरुआत की।

मुस्लिम शासन और विध्वंस

इल्तुतमिश जैसे मुस्लिम आक्रमणकारियों ने 1235 ईस्वी में उज्जैन पर हमला किया और इसके कई मंदिरों, विशेषकर महाकालेश्वर मंदिर को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद, शहर का गौरव कई शताब्दियों तक फीका पड़ गया।

मराठा शासन और पुनरुत्थान

18वीं शताब्दी में मराठा शासन के आगमन के साथ उज्जैन का पुनरुत्थान हुआ। मराठा सेनापति राणोजी शिंदे ने महाकालेश्वर मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया और शहर को उसका पुराना वैभव लौटाया। इस दौरान, उज्जैन मालवा की राजधानी भी बना रहा।

आधुनिक काल

आज उज्जैन एक प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और शैक्षणिक केंद्र है। यह हर 12 साल में आयोजित होने वाले सिंहस्थ कुंभ मेले के लिए भी प्रसिद्ध है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। इसका भौगोलिक महत्व भी है, क्योंकि यह कर्क रेखा (Tropic of Cancer) पर स्थित है।

महाकाल मंदिर का संक्षिप्त इतिहास

उज्जैन स्थित श्री महाकालेश्वर मंदिर भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसका इतिहास बहुत प्राचीन है। यह मंदिर न केवल धार्मिक रूप से, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।

पौराणिक मान्यता

पौराणिक कथाओं के अनुसार, महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वयंभू (स्वयं प्रकट) है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में उज्जैन में दूषण नामक एक राक्षस का आतंक था। भक्तों के आग्रह पर, भगवान शिव ने महाकाल के रूप में प्रकट होकर उस राक्षस का वध किया और फिर अपने भक्तों की रक्षा के लिए उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में विराजमान हो गए।

इतिहास और पुनरुद्धार

प्राचीन काल: यह मंदिर अति प्राचीन माना जाता है और कई पुराणों में इसका उल्लेख मिलता है।

विध्वंस: 1235 ईस्वी में, दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश ने उज्जैन पर आक्रमण किया और इस प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर दिया। इसके बाद, लगभग 500 वर्षों तक मंदिर खंडहर की स्थिति में रहा।

मराठा शासन: 18वीं शताब्दी में, मराठा सेनापति राणोजी शिंदे ने इस मंदिर का पुनरुद्धार करवाया। उन्होंने एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया और ज्योतिर्लिंग को पुनः स्थापित किया। इसके बाद, मंदिर का विकास और रखरखाव ग्वालियर के सिंधिया राजवंश के शासकों द्वारा किया गया।

महत्वपूर्ण तथ्य

यह एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दक्षिण मुखी है, जिसका तांत्रिक और आध्यात्मिक महत्व बहुत अधिक है। महाकाल मंदिर को पृथ्वी का केंद्र बिंदु भी माना जाता है। यहाँ से ही काल (समय) की गणना होती है। यह मंदिर उज्जैन के गौरव और धार्मिक पहचान का प्रतीक है, और यहाँ हर बारह वर्ष में सिंहस्थ कुंभ मेले का आयोजन होता है।

महाकुंभ सिंहस्थ मेला 

उज्जैन सिंहस्थ कुंभ मेला: मोक्ष का महासागर

हर बारह साल बाद, जब देवगुरु बृहस्पति सिंह राशि में प्रवेश करते हैं, तब मध्य प्रदेश की पुण्य नगरी उज्जैन में शिप्रा नदी के तट पर एक अलौकिक समागम होता है – सिंहस्थ कुंभ मेला। यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि आस्था, संस्कृति और अध्यात्म का एक ऐसा महासागर है, जहां करोड़ों की संख्या में भक्तगण मोक्ष की तलाश में आते हैं। 2016 का सिंहस्थ, अपनी भव्यता और अद्भुत प्रबंधन के लिए इतिहास में दर्ज हो गया।

इतिहास और धार्मिक महत्व

पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश की रक्षा करते समय, उसकी बूँदें चार स्थानों पर गिरीं – हरिद्वार, प्रयाग, नासिक और उज्जैन। उज्जैन को वह सौभाग्य मिला कि अमृत की एक बूँद यहाँ की पवित्र शिप्रा नदी में समा गई। तभी से, हर बारह साल में जब ग्रह-नक्षत्रों का विशेष संयोग बनता है, उज्जैन में सिंहस्थ का आयोजन होता है। यह माना जाता है कि इस दौरान शिप्रा में डुबकी लगाने से व्यक्ति के सभी पाप धुल जाते हैं और उसे मोक्ष (जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति) की प्राप्ति होती है। यह सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही एक गहन आध्यात्मिक यात्रा है।

सिंहस्थ का अद्भुत प्रबंधन: तकनीक और मानवीय स्पर्श की कहानी

जब मैंने सिंहस्थ की कमान संभाली, तो मेरी सबसे बड़ी चुनौती थी इस ऐतिहासिक आयोजन को आधुनिक तकनीक और कुशल प्रबंधन के साथ जोड़ना। यह सिर्फ एक धार्मिक मेला नहीं, बल्कि एक विशाल, अस्थायी शहर था जिसे पूरी दुनिया की नज़रों के सामने बसाना था। मेरा मंत्र था - "कोई भी चुनौती, आकस्मिक नहीं होनी चाहिए।"

मैंने सबसे पहले उपलब्ध सभी नवीनतम तकनीकों को इस महान आयोजन के प्रबंधन में शामिल किया। पारंपरिक प्रेजेंटेशन को पीछे छोड़, हमने प्रीमॉर्टम एक्सरसाइज तकनीक का इस्तेमाल किया। इसका मतलब था कि किसी भी काम के शुरू होने से पहले ही उसकी असफलता के संभावित कारणों पर गहराई से विचार करना और उनके लिए पहले से ही 'प्लान ए, बी, सी और डी' तैयार रखना। यह ऐसा था, जैसे हम किसी भी आपदा से पहले ही उसकी रिहर्सल कर रहे हो। यह प्रबंधन तकनीक राज्य सरकार के किसी भी आयोजन में पहली बार इस्तेमाल की गई थी।

एक करोड़ लोगों का शहर: तकनीक का कमाल

सिंहस्थ 2016 सिर्फ एक मेला नहीं था, बल्कि एक करोड़ से अधिक लोगों को एक साथ रहने की व्यवस्था थी। हमने हर छोटी-बड़ी जरूरत का पहले से ही अनुमान लगाया। एक व्यक्ति को क्या-क्या चाहिए, उसकी कितनी मात्रा लगेगी, और कौन उसे उपलब्ध कराएगा  सब कुछ पहले से ही निर्धारित था।

इस मेगा इवेंट के प्रबंधन में जो तकनीक उपयोग में लाई गईं, वे कुछ इस प्रकार थी:

  • जीआईएस (GIS) मैपिंग: पूरे मेला क्षेत्र की सटीक मैपिंग के लिए जीआईएस का प्रयोग किया गया।

  • प्रोजेक्ट मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर: सभी कार्यों को समय पर पूरा करने के लिए इसका उपयोग किया गया।

  • बायोमेट्रिक अटेंडेंस: कर्मचारियों की उपस्थिति सुनिश्चित करने के लिए बायोमेट्रिक सिस्टम का प्रयोग किया गया।

  • जिओ फेंसिंग: सुरक्षा के लिए संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित करने के लिए इस तकनीक का प्रयोग हुआ।

  • सीसीटीवी कैमरा और फेस डिटेक्शन: भीड़ की निगरानी और संभावित खतरों को पहचानने के लिए इनका उपयोग हुआ।

  • गूगल मैप्स: श्रद्धालुओं को मेला क्षेत्र में रास्ता दिखाने के लिए गूगल मैप्स का सहयोग लिया गया।

इन तकनीकों ने मिलकर भीड़ प्रबंधन की सबसे बड़ी चुनौती को आसान बना दिया। साथ ही, श्रद्धालुओं के बार-बार पूछे जाने वाले प्रश्नों के लिए एक विस्तृत प्रश्न बैंक तैयार किया गया था, ताकि हर व्यक्ति को सही और तुरंत जवाब मिल सके।

हरित सिंहस्थ और सुरक्षा की गाथा

सिंहस्थ 2016 को केवल उसके कुशल प्रबंधन के लिए ही नहीं, बल्कि 'हरित सिंहस्थ' के रूप में भी याद किया जाता है। शिप्रा नदी की स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए एक अभूतपूर्व कदम उठाया गया नर्मदा नदी का जल शिप्रा में लाया गया। यह न केवल एक इंजीनियरिंग चमत्कार था, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम था।

सुरक्षा की दृष्टि से, 25,000 से अधिक सुरक्षाकर्मी और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया था। ड्रोन कैमरों से घाटों की लगातार निगरानी हो रही थी। शाही स्नान के दौरान भीड़ को नियंत्रित करने के लिए विशेष योजनाएं बनाई गईं, जिससे कोई भी अप्रिय घटना न हो।

लगभग 3,500 करोड़ रुपये के बजट के साथ, 3,062 हेक्टेयर भूमि पर एक विशाल अस्थायी शहर बसाया गया था। इस शहर में सड़कों, पुलों, और घाटों का निर्माण किया गया था, और हर सेक्टर में बिजली, पानी, और स्वच्छता की पूरी व्यवस्था की गई थी।

यह सिंहस्थ केवल आस्था का प्रतीक नहीं था, बल्कि यह इस बात का प्रमाण था कि अगर मानवीय स्पर्श और नवीनतम तकनीक का सही तालमेल हो, तो असंभव लगने वाले कार्य को भी अद्भुत तरीके से संपन्न किया जा सकता है।

सफलता की कहानी और उपलब्धियाँ

2016 का सिंहस्थ एक बड़ी सफलता थी। मेला निर्विघ्न संपन्न हुआ, और उसने कई नई मिसाल कायम की। इस मेले के कुशल प्रबंधन के कारण सात विश्व रिकॉर्ड बनाने का श्रेय मिला। 

रिकॉर्ड तोड़ उपस्थिति: अनुमान के अनुसार, 7 करोड़ से अधिक भक्तों ने पवित्र डुबकी लगाई। पहले शाही स्नान के दिन ही लगभग 80 लाख श्रद्धालुओं ने शिप्रा में स्नान किया, जो एक रिकॉर्ड था।

शाही स्नान की भव्यता: नागा साधुओं की पेशवाई और शाही स्नान ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। अखाड़ों ने अपने तय समय पर स्नान किया और व्यवस्था बनाए रखने में पूरा सहयोग दिया।

किन्नर अखाड़े की पेशवाई: यह पहली बार था जब किन्नर समुदाय ने सिंहस्थ में अपना अखाड़ा बनाकर शाही पेशवाई निकाली। उसने समावेशिता और सामाजिक स्वीकृति का एक नया अध्याय जोड़ा।

कला और संस्कृति का समागम: मेले में केवल धार्मिक गतिविधियां ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक कार्यक्रम, प्रवचन और आध्यात्मिक चर्चा भी हुईं, जिसने इसे एक संपूर्ण अनुभव बना दिया।

धार्मिक पहचान और मोक्ष की अवधारणा

उज्जैन, जिसे अवंतिका के नाम से भी जाना जाता है, भारत की सात मोक्षदायिनी पुरियों में से एक है। यहाँ महाकाल के रूप में स्वयं भगवान शिव विराजमान हैं, जो इस नगरी को शाश्वत सुरक्षा प्रदान करते हैं। सिंहस्थ कुंभ के दौरान, शिप्रा में स्नान करना और महाकाल के दर्शन करना एक असाधारण पुण्य माना जाता है। यह एक ऐसा समय होता है जब धरती पर स्वर्ग उतर आता है, और हर कण में दिव्य ऊर्जा महसूस होती है। लाखों लोग इस विश्वास के साथ उज्जैन आते हैं कि एक पवित्र डुबकी उन्हें जन्म और मृत्यु के बंधन से मुक्ति दिलाएगी, और उन्हें मोक्ष के द्वार तक ले जाएगी।

2016 का सिंहस्थ सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि मानवता की आस्था, दृढ़ता और सामूहिक शक्ति का एक जीता-जागता प्रमाण था। यह एक ऐसा अनुभव था जिसने न केवल मोक्ष की राह दिखाई, बल्कि यह भी साबित किया कि जब मानवता एक उद्देश्य के लिए एकजुट होती है, तो कुछ भी असंभव नहीं है।

मालवा फ्रेश ब्रांड: किसानों की नई पहचान

मेरे उज्जैन में आयुक्त रहने के दौरान, मुझे मालवा क्षेत्र की मिट्टी और किसानों की मेहनत में एक अनूठी क्षमता दिखी। इस उपजाऊ भूमि में पैदा होने वाले कृषि उत्पाद, विशेष रूप से संतरे, अपनी गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध थे, लेकिन उन्हें सही पहचान नहीं मिल रही थी। वहीं से 'मालवा फ्रेश' ब्रांड का विचार आया। मेरा उद्देश्य इन उत्पादों को एक पहचान देना था, ताकि किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सके।

हमने फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी के माध्यम से इस ब्रांड को लॉन्च करने की योजना बनाई। सबसे पहले हमने मालवा के रसीले संतरों को चुना। यह केवल एक ब्रांड नहीं, बल्कि मालवा के किसानों की कड़ी मेहनत और गौरव का प्रतीक बनने वाला था। हमने अर्नेस्ट एंड यंग कंपनी को सलाहकार के रूप में नियुक्त किया, ताकि इस परियोजना को पेशेवर तरीके से आगे बढ़ाया जा सके।

एक ऐतिहासिक पल

किसानों में इस ब्रांड को लेकर ज़बरदस्त उत्साह था। उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि उनकी उपज को एक नाम और पहचान मिलने वाली है। मैंने इस परियोजना को नव-निर्मित आगर-मालवा जिले से लॉन्च करने का फैसला किया। यह एक नए जिले के लिए भी एक गर्व का क्षण था।

मैंने माननीय मुख्यमंत्री महोदय को 26 जनवरी के गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। उन्होंने इस पहल की सराहना की और आने के लिए अपनी सहमति दे दी। वह दिन सचमुच ऐतिहासिक था।

26 जनवरी को, जब पूरा देश देश भक्ति के रंग में डूबा था, माननीय मुख्यमंत्री महोदय ने 'मालवा फ्रेश' के साथ पैक किए गए संतरों से भरे ट्रकों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया। यह दृश्य केवल ट्रकों की रवानगी नहीं था, बल्कि यह था ब्रांडिंग की शक्ति का प्रदर्शन। किसानों और व्यापारियों के चेहरे पर एक नई आशा और उत्साह था।

एक ब्रांड, एक विश्वास

यह पहला मौका था जब मालवा के कृषि उत्पादों को इस तरह से ब्रांडिंग करके बाज़ार में उतारा जा रहा था। इस पहल से किसानों का मनोबल बढ़ा, उन्हें लगा कि उनकी मेहनत को अब एक पहचान मिल रही है। 'मालवा फ्रेश' सिर्फ एक ब्रांड नाम नहीं रहा, बल्कि यह मालवा के किसानों की मेहनत, गुणवत्ता और भरोसे का प्रतीक बन गया।

यह गाथा सिर्फ एक कृषि ब्रांड की नहीं, बल्कि एक प्रशासनिक अधिकारी की दूरदर्शिता और किसानों के साथ मिलकर काम करने की कहानी है, जिसने एक छोटे से विचार को एक बड़े आंदोलन में बदल दिया।

मंडी में सैंपल ऑक्शन: एक क्रांतिकारी कदम

जब मैंने मंडी बोर्ड में कार्यभार संभाला, तो मेरा एक सपना था - भारत की मंडियों को पारंपरिक 'ग्रेन लेस' यानी 'अनाज रहित' बनाना। यह अवधारणा उस समय राजनीतिक कारणों से लागू नहीं हो पाई थी, लेकिन मैंने इसका प्रयोग करने का फैसला किया। मैंने सोचा कि क्यों न इसे उज्जैन संभाग की प्रमुख मंडियों - उज्जैन, रतलाम और देवास में शुरू किया जाए?

यह अवधारणा बहुत सीधी थी: किसानों को अपनी पूरी फसल मंडी तक लाने के बजाय, केवल एक छोटा सा नमूना (sample) लाना था। इस नमूने के आधार पर ही उनकी पूरी फसल की नीलामी हो जाती, और बाद में वे अपनी उपज सीधे खरीदार के गोदाम तक पहुंचा सकते थे।

विरोध और स्वीकार्यता

शुरुआत में, यह विचार न तो किसानों को और न ही व्यापारियों को समझ आया। वे सालों से चली आ रही पारंपरिक व्यवस्था के आदी थे। हर जगह विरोध हो रहा था और लोग इस बदलाव को अपनाने से हिचकिचा रहे थे। मेरी टीम पर भी इस 'अनाधिकृत' प्रयोग को लागू करने का दबाव था, क्योंकि यह शासन का औपचारिक आदेश नहीं था।

लेकिन मैं जानता था कि यह व्यवस्था किसानों और व्यापारियों दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगी। हमने इसके लिए ज़ोरदार प्रशिक्षण और प्रचार-प्रसार अभियान चलाया। धीरे-धीरे, किसानों और व्यापारियों ने इस व्यवस्था को अपनाना शुरू कर दिया। उन्हें समझ आने लगा कि इससे उनका समय, पैसा और मेहनत सब बच रहे हैं।

गलत नियत का विरोध

जब यह प्रयोग सफल होने लगा, तो कुछ गलत नियत वाले लोगों ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया। वे नहीं चाहते थे कि यह पारदर्शिता आए, क्योंकि इससे उनकी मनमानी और शोषण पर रोक लग रही थी।

लेकिन मेरे और मेरी टीम के दृढ़ संकल्प के कारण यह व्यवस्था सुचारु रूप से चलती रही। यह प्रयोग सिर्फ एक अवधारणा का परीक्षण नहीं था, बल्कि यह साबित कर रहा था कि अगर सही सोच और तकनीक का इस्तेमाल हो, तो दशकों पुरानी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है। यह एक ऐसी गाथा थी जिसने दिखाया कि कैसे एक छोटे से प्रयोग से एक बड़ा परिवर्तन लाया जा सकता है।

फसल बीमा योजना: एक भावनात्मक विदाई

मेरी सेवानिवृत्ति का दिन नज़दीक आ रहा था, और मेरे मन में एक हीT ख्वाहिश थी  प्रधान मंत्री फसल बीमा योजना की राशि एक बार किसानों तक पहुंचाना। करोड़ों रुपए प्रीमियम के रूप में लेने के बावजूद, आज तक किसी भी किसान को इस योजना का लाभ नहीं मिल पाया था। यह एक ऐसी टीस थी, जो मुझे सोने नहीं देती थी।

एक कलेक्टर मीटिंग में, मैंने अपने संभाग के सभी कलेक्टरों को बुलाया। मैंने उसे कोई आधिकारिक आदेश नहीं दिया, बल्कि एक भावनात्मक अपील की। मैंने कहा, "दोस्तों, मेरे रिटायरमेंट से पहले, मैं एक बार किसानों को फसल बीमा का लाभ दिलवाना चाहता हूँ। यह मेरा आखिरी सपना है।" मेरी बात सुनकर, सभी कलेक्टरों ने इस मिशन को अपना मान लिया।

जब प्रशासन ने दिल से काम किया

इसके बाद जो हुआ, वह अद्भुत था। मेरे सारे कलेक्टरों ने दिन-रात एक कर दिया। ढेरों क्लेम केस बनाए गए और उन्हें बीमा कंपनियों में जमा करवाया गया। मेरे अथक दबाव और उनके कड़े परिश्रम का नतीजा था कि एक-एक करके सारे क्लेम स्वीकृत होने लगे। यह सिर्फ कागज़ी कार्रवाई नहीं थी, यह किसानों के प्रति एक सच्ची प्रतिबद्धता थी।

इस ऐतिहासिक क्षण को यादगार बनाने के लिए, उज्जैन के दशहरा मैदान में एक विशाल किसान सम्मेलन आयोजित किया गया। माननीय मुख्यमंत्री जी ने इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आने की सहमति दी। वह हमेशा किसानों का भला करने के लिए तत्पर रहते थे, और इस आयोजन से उनकी भी उम्मीदें जुड़ी थीं।

पूरे प्रदेश में इस कार्यक्रम का विशेष प्रसारण करने की व्यवस्था की गई। हर मंडी में बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीन लगाई गईं, ताकि हर किसान इस ऐतिहासिक क्षण का गवाह बन सके। जिलों में प्रभारी मंत्रियों को भी उपस्थित रहने के निर्देश दिए गए।

करोड़ों की सौगात और एक मार्मिक भाषण

जिस दिन कार्यक्रम था, दशहरा मैदान में एक लाख से ज़्यादा किसान मौजूद थे। उनके चेहरे पर एक मिला-जुला भाव था - उम्मीद, उत्सुकता और थोड़ी-सी शंका। लेकिन जब करोड़ों रुपए के क्लेम चेक उन्हें दिए गए, तो उनके चेहरों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। माननीय मुख्यमंत्री जी ने लगभग एक घंटे से भी ज़्यादा समय तक भाषण दिया। उनका भाषण इतना मार्मिक और उत्साहजनक था कि हर किसान की आँख में चमक आ गई।

जब कार्यक्रम ख़त्म हुआ, तो मुख्यमंत्री जी ने मंच से उतरकर मुझे अपनी गाड़ी में बैठने को कहा। उस गाड़ी में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक श्री ऋषि शुक्ला जी भी थे। मुख्यमंत्री जी ने मुझसे पूछा, "भाषण कैसा था?"

मैंने बिना सोचे-समझे कहा, "माननीय, यदि इसका एक तिहाई भी लागू हो सके, तो किसानों की सारी समस्याएं निपट सकती हैं।" मेरे सीधे जवाब से वह चौंक गए। उन्होंने तुरंत पूछा, "यह कैसे होगा?"

एक पेशकश और एक सपना

मैं रिटायरमेंट के बाद अपना स्टार्टअप 'ई-फसल' बनाने का मन बना चुका था। मैंने अपनी कंपनी के लिए एक धुन भी तैयार की थी, जिसे मैंने अपने फोन की कॉलर ट्यून बना रखा था। मैंने वह धुन उन्हें सुनाई। धुन सुनते ही, मुख्यमंत्री जी की आँखें चमक उठीं। उन्होंने मुझे एक ऐसी पेशकश की, जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। "यह कंपनी मैं शासन में बनवाता हूँ। मैं आपको पर्याप्त राशि और एक नया पद भी दूँगा।"

मैंने विनम्रता से इनकार कर दिया। "सर, मैं अब शासन में काम नहीं करना चाहता। मुझे नहीं लगता कि सरकार में रहते हुए व्यवसाय करना संभव है।"

मेरी बात सुनकर वह थोड़े नाराज़ हो गए। उन्होंने कहा, "जब कोई अधिकारी रिटायर होता है, तो वह शासन से काम मांगता है। मैं तुम्हें खुद प्रस्ताव दे रहा हूँ और तुम मना कर रहे हो?"

मैंने उन्हें समझाया, "सर, यह मेरे जीवन का अगला पड़ाव है। यह मेरे लिए व्यापार नहीं, मेरा जुनून है। मैं समाज को कुछ लौटाना चाहता हूँ।"

उस दिन, मैंने यह तय कर लिया कि मेरे जीवन का अगला अध्याय भोपाल में बैठकर नहीं, बल्कि मेरे जुनून के साथ इंदौर से शुरू होगा। और मैंने वही किया। यह कहानी सिर्फ एक सेवानिवृत्ति या एक कार्यक्रम की नहीं, बल्कि एक सरकारी अधिकारी के एक नए जुनून और सपने को पूरा करने की कहानी है।

मेरी तीसरी पारी 

सेवानिवृत्ति की तैयारी: एक नई शुरुआत


मेरी सेवानिवृत्ति का दिन जब नज़दीक आने लगा, तो मुझे एहसास हुआ कि यह सिर्फ नौकरी से मुक्ति का क्षण नहीं है, बल्कि जीवन के एक नए अध्याय की शुरुआत है। और हर नई शुरुआत के लिए तैयारी ज़रूरी होती है।


मैंने सबसे पहले अपनी आर्थिक ज़िन्दगी को व्यवस्थित करना शुरू किया। मुझे लगा कि एक ही बैंक खाता रखना सबसे आसान होगा, इसलिए मैंने अपने सभी बैंक खाते बंद कर दिए और सिर्फ एक को चालू रखा। यह मेरे लिए वित्तीय प्रबंधन का एक पहला और सरल कदम था।


कागज़ी कार्यवाही का महत्व


मैंने अपने सभी लंबित क्लेम, चाहे वह पेंशन से जुड़े हों, जीपीएफ (जनरल प्रोविडेंट फंड) से या ग्रेच्युटी से, समय रहते पूरे किए। मेरे अनुभव ने मुझे सिखाया था कि अगर आप समय रहते कागज़ात पूरे नहीं करते, तो बाद में बहुत परेशानी होती है। मैंने सुनिश्चित किया कि मेरी पेंशन, जीपीएफ और ग्रेच्युटी की राशि समय पर स्वीकृत हो जाए, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद किसी भी तरह की आर्थिक समस्या का सामना न करना पड़े।


नए पते और पहचान की यात्रा


मेरी सबसे बड़ी प्राथमिकता थी इंदौर में एक नया घर बसाना। मैंने इंदौर में एक मकान खरीदा और एक गाड़ी ली। इसके बाद, मैंने अपने सभी महत्वपूर्ण दस्तावेजों पर नया पता अपडेट करवाया। मैंने अपना आधार कार्ड अपडेट करवाया, नया वोटर आईडी कार्ड बनवाया और बैंक रिकॉर्ड में भी नया पता डलवाया। यह सब करना ज़रूरी था, क्योंकि आज के डिजिटल युग में हर जगह केवाईसी (KYC) के लिए ये दस्तावेज़ माँगे जाते हैं।


मैंने अपने नए घर में गैस, बिजली, डीटीएच और वाई-फाई के कनेक्शन भी लगवाए। यह सब कदम यह सुनिश्चित करने के लिए थे कि मैं अपने नए जीवन में बिना किसी रुकावट के प्रवेश कर सकूँ। यह अनुभव मुझे सिखा गया कि सेवानिवृत्ति की कगार पर खड़े हर व्यक्ति के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपने सभी कागज़ात और दस्तावेज़ समय पर व्यवस्थित कर ले। यह सिर्फ एक कागज़ी कार्रवाई नहीं है, बल्कि एक सुखी और शांत भविष्य की नींव रखने जैसा है।


सेवानिवृत्ति का दर्शन: फ्यूज़ बल्ब की कहानी

जीवन में कुछ पड़ाव ऐसे होते हैं, जो हमें एक गहरी सच्चाई से रूबरू कराते हैं। मेरा मानना है कि कोई भी रिटायर्ड व्यक्ति, चाहे वह किसी भी पद पर रहा हो, अंततः एक फ्यूज़ बल्ब की तरह होता है। यह सिर्फ एक उपमा नहीं, बल्कि जीवन के एक कठोर सत्य का सार है।

जब तक एक बल्ब जलता है, तब तक उसका ब्रांड मायने रखता है। रोशनी देते हुए वह अपनी कंपनी का नाम रोशन करता है - चाहे वह किसी बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी का हो या किसी छोटी लोकल कंपनी का। लोग उसकी रोशनी की गुणवत्ता पर बात करते हैं, उसकी चमक की तारीफ करते हैं। लेकिन जैसे ही वह बल्ब फ्यूज़ हो जाता है, उसकी चमक ख़त्म हो जाती है। उस पल, उसकी कंपनी, उसकी कीमत, सब बेमानी हो जाते हैं। सारे बल्ब एक जैसे हो जाते हैं - एक साधारण सा कांच और धातु का टुकड़ा।

पद की चमक और उसके बाद का अँधेरा

यही बात हमारी सेवा के साथ भी होती है। जब तक आप पद पर होते हैं, आपकी शक्ति, आपका रुतबा, आपके निर्णय, सब कुछ मायने रखते हैं। आपका फ़ोन लगातार बजता है, लोग आपसे मिलने का समय मांगते हैं, सभाओं में आपकी उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। आप अपने पद की रोशनी में चमकते हैं। लेकिन जिस दिन आप सेवानिवृत्त हो जाते हैं, उस दिन यह मायने नहीं रखता कि आप किस पद से रिटायर हुए हैं। धीरे-धीरे वह चमक फीकी पड़ने लगती है। जो लोग कभी आपके एक इशारे पर हाज़िर होते थे, उनका आना-जाना कम हो जाता है। फ़ोन की घंटी बजना बंद हो जाती है। आपका दायरा धीरे-धीरे सिकुड़ता जाता है, और एक समय आता है जब वह आपके अपने शरीर और सोच तक ही सिमट कर रह जाता है।

सबसे बड़ी चुनौती: मानसिक बदलाव

यह भौतिक बदलाव, यानी कि पद से हटना और लोगों का दूर होना, बहुत आसान होता है। इसे स्वीकार करना हमारे लिए मजबूरी बन जाता है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती मानसिक बदलाव की होती है। एक ऐसा दिमाग जो दशकों तक व्यस्त रहा हो, महत्वपूर्ण निर्णय लेता रहा हो, और हर पल हजारों लोगों से घिरा रहा हो, अचानक खाली हो जाता है। यह ख़ालीपन और अकेलापन अंदर से तोड़कर रख देता है।

यह वह समय होता है जब आपको अपने ऊपर काम करने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यह स्वीकार करना कि अब आप उस पद पर नहीं हैं, अब लोग आपसे नहीं, बल्कि किसी और से मिलेंगे, एक बहुत ही कठिन मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। जितना जल्दी आप इस मानसिक बदलाव को स्वीकार कर लेते हैं, उतनी ही आसान आपकी आगे की जिंदगी हो जाती है।

अथ उद्यमिता अनुशासन: एक महागाथा

यह कहानी किसी ऐसे व्यक्ति की नहीं है जिसने जन्म से ही सफलता का स्वाद चखा हो। यह कहानी है एक साधारण, औसत दर्जे के छात्र की, जिसकी नींव गाँव की मिट्टी में रखी गई थी, और जिसकी नियति ने उसे खुद अपना रास्ता बनाने पर मजबूर कर दिया। मेरा जीवन, किसी शांत नदी की धारा की तरह थी, जो अपने प्राकृतिक स्वभाव से बहती चली गई, बिना किसी पूर्व-निर्धारित लक्ष्य के।

मेरा जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ, जहां पिता खुद एक शिक्षक थे। उन्होंने मेरे लिए बड़े सपने देखे थे। मेरी 'पाटी पूजा' भी उन्होंने मथुरा में गायत्री परिवार के गुरुजी की गोद में कराई थी, लेकिन शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था। उनके असमय निधन ने मेरे बचपन से ही मेरा हाथ छोड़ दिया। फिर मैं गांव के एक स्कूल में दाखिल हुआ। पिता के जाने के बाद, परिवार का सारा बोझ मेरे कंधों पर आ गया। खेती-किसानी का काम मुख्य था, जिसे नौकरों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता था। पढ़ाई के साथ-साथ, मुझे खेतों की निगरानी करनी पड़ती थी। यही वो दौर था जब मुझे किताबी ज्ञान के अलावा, जीवन का व्यावहारिक ज्ञान भी मिला।

कॉलेज के दिनों में, मेरे शिक्षकों ने मुझे एक मंत्र दिया जिसने मेरे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। उन्होंने कहा, "भीड़ का हिस्सा मत बनो, हमेशा काम को अलग तरीके से करो।" यह सिर्फ एक सलाह नहीं थी, यह मेरे जीवन को देखने की एक नई दृष्टि थी। इसके बाद से, मैंने हर काम को एक नए और अनूठे ढंग से करने का प्रयास किया।

जीवन का पहला 'अथ'

जीवन में ‘अथ' शब्द का आगमन तब होता है जब हम किसी चौराहे पर खड़े होते हैं और यह तय नहीं कर पाते कि हमें किस दिशा में जाना है। मेरे जीवन में पहला 'अथ' तब आया जब मुझे अपनी पढ़ाई के लिए विषय चुनने थे। दूसरा 'अथ' तब आया जब मैंने अपनी एमफिल. पूरी की और अपने करियर की शुरुआत करनी थी। इन दोनों मौकों पर, मैं खुद को एक नदी की तरह बहता हुआ महसूस करता रहा, और यह बहाव मुझे रिटायरमेंट तक ले आया।

मेरी नौकरी के दो अध्याय पूरे हो चुके थे। लेकिन मेरे भीतर कुछ अधूरापन था। रिटायरमेंट के बाद, मेरे सामने एक और 'अथ' खड़ा था। यह मेरी तीसरी पारी की शुरुआत थी। एक बात तय थी अब कोई नौकरी नहीं करनी थी। मेरा मन उद्यमिता की ओर आकर्षित हो रहा था। लेकिन यह आकर्षण सिर्फ लोगों की सफलता की कहानियों से आया था या वास्तव में मेरे भीतर वो मनोवैज्ञानिक तत्व थे जो एक उद्यमी के लिए ज़रूरी होते हैं? यह एक गहन आत्ममंथन का समय था।

कर्म और प्रकृति का सामंजस्य

मैंने इस प्रश्न का उत्तर अपनी सनातन संस्कृति और गीता में खोजा। अर्जुन ने श्रीकृष्ण से पूछा था, "स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के क्या लक्षण हैं? वह कैसे बोलता है, कैसे बैठता है और कैसे चलता है?" यही प्रश्न मेरे मन में भी था एक उद्यमशील व्यक्ति के क्या लक्षण होते हैं?

हमारे शास्त्रों के अनुसार, प्रकृति तीन गुणों सत्व, रज, और तम से बनी है। गीता में श्रीकृष्ण ने कहा है कि ये गुण ही चार वर्णों का निर्धारण करते हैं। सतोगुण वाला व्यक्ति ब्राह्मण, रजोगुण वाला क्षत्रिय, रज और तम के मिश्रण वाला वैश्य (उद्यमी), और तमोगुण वाला शूद्र बनता है। यह जाति-व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वभाव और कर्म का विभाजन है।

जो व्यक्ति अपनी प्रकृति के अनुरूप कर्म करता है, तो वह न केवल सफल होता है, बल्कि अपने जीवन से संतुष्ट भी रहता है। इसके विपरीत, जब प्रवृत्ति और वृत्ति में तालमेल नहीं होता, तो इंसान जीवन भर असंतुष्ट और दुखी रहता है। योग का अर्थ ही है, कुशलतापूर्वक कर्म करना। जब मन, बुद्धि और शरीर एक दिशा में काम करते हैं, तभी हम सहजता से सफल हो पाते हैं।

मैंने कई सफल लोगों की कहानियाँ पढ़ीं। धीरूभाई अंबानी ने क्लर्क से शुरुआत की, पर सफल एक उद्योगपति के रूप में हुए। महात्मा गांधी ने बैरिस्टर के रूप में करियर शुरू किया, पर सफलता राजनेता के रूप में मिली। ये सभी उदाहरण यही सिखाते हैं कि जब इंसान अपनी प्रकृति को पहचान लेता है, तभी वह सही मायने में सफल होता है।

दृढ़ संकल्प की शक्ति

संदेह की स्थिति में लिया गया कोई भी कदम विनाशकारी हो सकता है। श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है, "जिनकी बुद्धि निश्चयात्मक होती है, वे एक ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।" इसके विपरीत, संकल्प हीन व्यक्ति की बुद्धि अनेक शाखाओं में बँटी रहती है। अनेक असफल स्टार्टअप भी यही कहानी कहते हैं, जहाँ लोगों ने बिना अपनी प्रकृति को समझे उद्यमिता में कदम रखा। लेकिन अंकुश सचदेवा जैसे लोग, जो 17 बार असफल हुए और 18वीं बार में शेयरचैट बनाकर सफल हुए, यह साबित करते हैं कि दृढ़ संकल्प और एक ही मार्ग पर चलने की शक्ति क्या होती है।

मैंने अपने आप से बार-बार यही सवाल किया: क्या मुझ में अभी भी रजोगुण बाकी है, जो उद्यमिता के लिए आवश्यक है? क्या मुझे सरकारी नौकरी के अवसर छोड़कर इस नए रास्ते पर चलना चाहिए? हर बार जवाब था हाँ, उद्यमिता ही!

जब मेरे भीतर से यह आवाज़ आई, तो पीछे मुड़कर देखने का कोई सवाल ही नहीं था। मेरा तीसरा 'अथ' मेरे सामने था और मैं इसे स्वीकार करने के लिए पूरी तरह से तैयार था। अब मैं अपनी तीसरी पारी शुरू करने के लिए तत्पर था, क्योंकि यह सिर्फ एक करियर नहीं, बल्कि मेरी प्रकृति का अनुसरण करने का निर्णय था।

अब हम शुरू करते हैं "अथ उद्यमिता अनुशासन।"

उद्यमिता क्या है?

तो जब हमने यह दृढ़ निश्चय कर लिया कि हमें अपना स्टार्टअप शुरू कर एक उद्यमी बनना है, तो हमें उस रास्ते की हर मोड़, हर घाटी और हर चुनौती को जानना ज़रूरी था। यह यात्रा फूलों का बिछौना नहीं है, बल्कि कांटों भरी डगर है, जहाँ हर कदम पर अनिश्चितता का घना कोहरा छाया रहता है। उद्यमिता केवल किसी नए संगठन की शुरुआत करना नहीं है। यह एक जोखिम भरा जुआ है, जहाँ आप अपने भविष्य का दांव लगाते हैं। एक ऐसा खेल, जिसमें भरपूर मुनाफा कमाने की संभावना होती है, तो वहीं दूसरी ओर असफलता, अनिश्चितता और अनगिनत ख़तरों का भी सामना करना पड़ता है। याद रखिए, जिस व्यवसाय में लाभ का कोई मार्ग न हो, वह केवल एक शौक है, व्यवसाय नहीं।

लेकिन यहाँ एक अच्छी बात है: उद्यमी पैदा नहीं होते, बल्कि बनाए जाते हैं।

अगर आपके मन में यह संदेह है कि शायद आप में वे गुण नहीं हैं, तो घबराने की ज़रूरत नहीं। आप अपने मनोविज्ञान में बदलाव करके अपनी प्रकृति को बदल सकते हैं। आज भारत में सचिन बंसल से लेकर विजय शेखर शर्मा, फाल्गुनी नायर, और रितेश अग्रवाल तक ऐसे अनेकों सफल उद्यमी हैं, जो पहली पीढ़ी के व्यवसायी हैं और उन्होंने शून्य से शुरुआत की है। यह कहानी उनके लिए है जो अपने भीतर के उद्यमी को जगाना चाहते हैं।

उद्यमिता की बाधाएं: एक अकेला और अनिश्चित रास्ता

मैं अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि यह रास्ता बहुत अकेला और अनिश्चितताओं से भरा होता है। स्टार्टअप शुरू करना वैसा बिलकुल नहीं होता जैसा बड़ी-बड़ी कहानियों में दिखाया जाता है। यह एक 24 घंटे की तपस्या है, जहाँ आप खुद के बॉस नहीं होते, बल्कि आपका उद्यम ही आपका बॉस बन जाता है। इस यात्रा पर निकलने से पहले आपको उन बाधाओं से परिचित होना चाहिए, ताकि आप मानसिक रूप से उनका सामना करने के लिए तैयार रहें।

मनोवैज्ञानिक बाधाएं: भीतर का युद्ध

जो लोग ऐसे परिवारों से आते हैं, जहां पहले से कोई व्यवसाय नहीं होता, उनके लिए यह रास्ता और भी कठिन हो जाता है, क्योंकि उन्हें अपने ही भीतर कई युद्ध लड़ने पड़ते हैं:

असफलता का डर: यह सबसे बड़ी मानसिक बाधा है। हर उद्यमी को यह डर सताता है कि क्या होगा अगर सब कुछ हार गए? यही वह पल होता है जब आपको खुद से कहना पड़ता है, "डर के आगे जीत है।" यह भावना आपको निवेश, प्रतिष्ठा, और वित्तीय स्थिरता का जोखिम उठाने के लिए प्रेरित करती है। याद रखें, हर असफलता एक मूल्यवान सीख है, जो आपको सफलता के एक कदम और करीब ले जाती है।

आत्म-संदेह: क्या मैं यह कर सकता हूँ? क्या मेरा निर्णय सही है? क्या मैं इसके लायक हूँ? ये सवाल एक उद्यमी के मन को लगातार कुरेदते रहते हैं। इस आत्म-संदेह का सामना करने के लिए आपको एक गुरु (mentor), एक रोल मॉडल, और एक मजबूत नेटवर्क की जरूरत होती है, जहाँ आप अपने विचारों को परख सकें और दूसरों के अनुभवों से सीख सकें।

पूर्णतावादी होना: कोई भी उद्यम या उद्यमी पहले दिन से ही पूर्ण नहीं होता। यह एक सतत चलने वाली प्रक्रिया है। यदि आप सब कुछ एकदम सही होने का इंतज़ार करेंगे, तो शायद आप अपना व्यवसाय कभी शुरू ही नहीं कर पाएंगे। आपको बस पहला कदम उठाना है और समय के साथ प्रगति करनी है। पूर्णता निरंतर प्रयास और सुधार से आती है।

अस्वीकृति का डर: क्या होगा जब ग्राहक, निवेशक, या पार्टनर मुझे 'ना' कहेंगे? यह डर एक उद्यमी को आगे बढ़ने से रोकता है। लेकिन उद्यमिता के रास्ते में 99% अस्वीकृति ही मिलती है। हेनरी फोर्ड, जे.के. रोलिंग्स, स्टीव जॉब्स, और जैक मा जैसे दिग्गजों ने भी अनगिनत अस्वीकृतियों का सामना किया है। जैक मा को अनेक बार नौकरी देने से मना कर दिया गया और हार्वर्ड बिजनेस स्कूल ने उन्हें 10 बार अस्वीकार किया। अस्वीकृति उद्यमी की यात्रा का अनिवार्य हिस्सा है और हर 'ना' आपको सही रास्ता चुनने का अवसर देती है।

इम्पोस्टर सिंड्रोम: यह वह भावना है जहाँ उद्यमी को लगता है कि वह सफलता के लायक नहीं है और उसे यह सफलता धोखे से मिली है। भारत के 31% उद्यमी इस सिंड्रोम से पीड़ित हैं। फेसबुक की पूर्व सीईओ शेरिल सैंडबर्ग और मिशेल ओबामा जैसी महान हस्तियाँ भी इस भावना से जूझ चुकी हैं। यह आपके आत्मविश्वास को हिला देता है। इस पर काबू पाने के लिए अपनी काबिलियत को पहचानिए कर अपनी सफलता का श्रेय लेना सीखिए।

फोकस की कमी: एक उद्यमी के दिमाग में हमेशा विचारों का सैलाब उमड़ता रहता है, जो उसका ध्यान भटकता है। स्पष्ट लक्ष्य, प्राथमिकताएँ और समय प्रबंधन इस बाधा को दूर करने के लिए आवश्यक हैं। एक समय के बाद, आपको अपनी टीम को काम सौंपना सीखना चाहिए ताकि आप सबसे महत्वपूर्ण कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकें।

अकेलापन: उद्यमी का रास्ता बहुत अकेला होता है। जब आप अपनी टीम के साथ होते हैं, तब भी आप अपनी 'रैंक' के कारण खुद को अलग-थलग महसूस कर सकते हैं। यह अकेलापन आपके मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है।

अज्ञात का डर: जब आप अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं, तो कई अनजाने रास्ते आपके सामने आते हैं। इनमें से एक का चुनाव करना डरावना हो सकता है, क्योंकि एक गलत चुनाव पूरे व्यवसाय को दांव पर लगा सकता है। लेकिन अज्ञात के भय से उबरकर ही उद्यमी सफल हो सकता है।

पारिवारिक बाधाएं: रिश्तों की अग्निपरीक्षा

नया व्यवसाय शुरू करना रोमांटिक और रोमांचक तो लगता है, लेकिन यह परिवार के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाता है। खासकर उन परिवारों में, जहाँ व्यवसाय की परंपरा नहीं है। ऐसे परिवार नौकरी की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं, जबकि पारंपरिक व्यवसायी परिवार अपने बच्चे को स्थापित व्यवसाय को ही आगे बढ़ाने की सलाह देते हैं।

तनाव और स्वास्थ्य: एक उद्यमी लगातार तरह-तरह के तनावों से जूझता है। सफल होने के लिए तनाव जरूरी है, लेकिन लंबे समय तक यह उच्च रक्तचाप, हृदयाघात, और अवसाद जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकता है। हमारे देश में 49% उद्यमी तनाव से ग्रस्त हैं। इस अकेलेपन और संघर्ष से लड़ने के लिए परिवार का समर्थन सबसे बड़ा हथियार बन जाता है।

लचीलापन और भावनाएँ: परिवार एक उद्यमी को भावनात्मक रूप से एक सुरक्षित स्थान प्रदान करता है। यह लचीलापन देता है, जो असफलताओं से उबरने में मदद करता है, और भावनाओं पर नियंत्रण रखने में भी सहायक होता है। जैसा कि गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, "सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ" यानी सुख-दुःख, लाभ-हानि, और जय-पराजय को समान भाव से देखना।

कानूनी बाधाएँ: कागजात का जंजाल

नया उद्यम शुरू करना आसान नहीं होता। हमारे देश में, एक व्यवसाय शुरू करने के लिए इतने अधिक विभागों से लाइसेंस और अनुमतियाँ लेनी पड़ती है कि यह एक नए उद्यमी के लिए एक मुश्किल और समय लेने वाली प्रक्रिया बन जाती है। हालांकि भारत ने "ईज ऑफ डूइंग बिजनेस" में अपनी रैंकिंग सुधार ली है, फिर भी यह रास्ता काफी जटिल है।

लेकिन हाल के वर्षों में कई ऐसे स्टार्टअप सामने आए हैं, जिन्होंने पारंपरिक नियमों को चुनौती दी है। उबर के पास एक भी टैक्सी नहीं है, एयरबीएनबी के पास एक भी कमरा नहीं है, और ज़ोमैटो के पास एक भी रेस्तरां नहीं है। इन उद्यमियों का मानना है कि सरकार से अनुमति मांगने के बजाय, माफ़ी मांगना ज़्यादा आसान होता है। इस रणनीति पर कई सफल उद्यम शुरू हुए हैं।

व्यावसायिक बाधाएं: बाजार का रणक्षेत्र

एक नए उद्यमी को अपना कारोबार शुरू करने के लिए स्थापित औद्योगिक घरानों, बहुराष्ट्रीय कंपनियों और व्यापारिक संस्थानों के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। यह एक रणक्षेत्र है, जहां बड़ी कंपनियां तरह-तरह की बाधाएं पैदा करती हैं ताकि नई कंपनियां या तो विलय कर लें या बाजार से बाहर हो जाएँ।

यदि कोई उद्यमी सोचता है कि उसका कोई प्रतिद्वंदी नहीं है, तो यह उसकी सबसे बड़ी भूल है। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा जीतने के लिए, आपको खुद पर भरोसा रखना होगा, ग्राहक को भगवान मानना होगा, और अपने प्रतिस्पर्धियों से अलग बिजनेस मॉडल तैयार करना होगा। बड़ी कंपनियों को बदलाव लागू करने में समय लगता है, जबकि छोटी और नई कंपनियाँ बहुत लचीली होती हैं और यह ताकत उन्हें जीतने में मदद करती है। 1980 के दशक की 'कोला वॉर्स' या भारत में मैगी और पतंजलि नूडल्स की जंग ऐसे ही व्यावसायिक युद्धों के उदाहरण हैं, जो आज भी जारी है।

आज भारत में युवाओं में नौकरी के बजाय अपना व्यवसाय शुरू करने की समझ बढ़ रही है, और यही कारण है कि पिछले 9 वर्षों में भारत ने दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम खड़ा किया है।

उद्यम की सफलता का आधार

हमारी प्रजाति, होमो सेपियन्स, एक लाख साल पहले पृथ्वी पर मौजूद छह मानव प्रजातियों में से एक थी। आज, केवल हम ही बचे हैं। हम कैसे जीते? हमारे पूर्वजों ने कैसे एक साथ आकर शहर और साम्राज्य बनाए? हमने कैसे ईश्वर, राष्ट्रों, और मानव अधिकारों जैसे अमूर्त विचारों पर विश्वास करना शुरू किया? इसका एक ही जवाब है: साझा विश्वास।

यह सिद्धांत केवल हमारे इतिहास पर ही लागू नहीं होता, बल्कि आज के हर सफल उद्यम पर भी लागू होता है। कोई भी कंपनी तभी महान बन सकती है जब उसकी टीम और उसके ग्राहक उसकी कहानी पर विश्वास करें। कहानियाँ गढ़ी जाती हैं, लेकिन उन कहानियों पर लोगों का विश्वास कायम करना सबसे बड़ी चुनौती होती है। इसे ही 'काल्पनिक वास्तविकता' कहते हैं। एक छोटी कंपनी तभी बड़ी कंपनियों को पछाड़ सकती है जब वह इस काल्पनिक वास्तविकता को अधिक से अधिक लोगों तक फैलाए।

हम सभी एक गहरे भ्रम में जीते हैं आशा का भ्रम। नीत्शे ने ठीक ही कहा था कि इंसान बिना आत्म-वंचना के नहीं जी सकता; उसे सपने, भ्रम और झूठ चाहिए। सफल कंपनियां इसी मानवीय मनोविज्ञान को गहराई से समझती हैं। आज न्यूरो-मार्केटिंग का युग है, जहाँ उपभोक्ता के व्यवहार, भावनाओं और निर्णय लेने की प्रक्रिया को समझने के लिए मस्तिष्क विज्ञान का उपयोग किया जा रहा है। आई-ट्रैकिंग, रंग मनोविज्ञान, और निर्णय थकान जैसे अध्ययन इस बात पर केंद्रित हैं कि कैसे बिना उपभोक्ता को बताए उसके खरीदने के निर्णय को प्रभावित किया जाए।

डॉ. युवाल नोआ हरारी कहते हैं कि विकल्प चुनने की स्वतंत्रता एक मिथ्या अवधारणा है। आज कंपनियां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके हमारे व्यवहार का बिल्कुल सटीक अनुमान लगाती हैं। हम सोशल मीडिया पर एक फोटो डालते हैं, और तुरंत उससे जुड़े विज्ञापन आने लगते हैं। जब मैं यह लेख टाइप कर रहा हूँ, तो मेरा फोन मेरे मन को पढ़कर अगले शब्द का सुझाव दे रहा है। हमें पता भी नहीं चलता कि हमारे विचार और इच्छाएं पढ़ी जा रही हैं। यही कारण है कि आज की प्रतिस्पर्धा भौतिक नहीं, बल्कि आभासी दुनिया में है।

असफलता एक मिथक है?

व्यापार जगत में, असफलता को अक्सर एक आवश्यक संस्कार के रूप में पेश किया जाता है। "जल्दी असफल हो जाओ, बार-बार असफल हो जाओ," जैसी सलाहें हवा में तैरती रहती हैं। हमें सिखाया जाता है कि दस में से नौ स्टार्टअप असफल होते हैं, लेकिन यह एक भ्रामक तस्वीर है। दूसरों की असफलताएँ सिर्फ उनकी असफलताएँ हैं। अगर कोई अपने उत्पाद का सही से विपणन नहीं कर सकता, तो इसका आपसे कोई लेना-देना नहीं है। अगर कोई टीम नहीं बना सकता, तो वह उसकी समस्या है, आपकी नहीं।

गलतियों से सीखना इतना मूल्यवान नहीं है, जितना सफलताओं से सीखना।

जब आप असफल होते हैं, तो आपको बस इतना पता चलता है कि क्या नहीं करना है। लेकिन जब आप सफल होते हैं, तो आपको पता चलता है कि क्या काम आया, और आप इसे दोहरा सकते हैं। हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के एक अध्ययन में पाया गया कि जो उद्यमी पहले से सफल थे, उनको फिर से सफल होने की संभावना कहीं अधिक थी। इसके विपरीत, जो उद्यमी पहली बार में विफल हुए, उनकी सफलता दर उतनी ही थी जितनी उन लोगों की जिन्होंने कभी प्रयास ही नहीं किया।

सफलता ही वह अनुभव है जो मायने रखता है। विकास असफलताओं पर नहीं रुकता, यह हमेशा उसी पर आधारित होता है जो सफल रहा। आपको भी यही करना चाहिए।

किफायती और वास्तविक बने

आज के स्टार्टअप कल्चर में अक्सर लोग भव्यता और बड़े खर्चों के पीछे भागते हैं।क्या आपको वाकई दस लोगों की टीम की ज़रूरत है? शायद अभी के लिए दो या तीन ही काफ़ी हैं। क्या आपको वाकई लाखों के निवेश की ज़रूरत है? शायद हजारों से भी काम चल जाएगा। क्या आपको एक बड़े दफ्तर की ज़रूरत है? आप घर से या साझा कार्यक्षेत्र से काम कर सकते हैं। क्या आपको एक फैक्ट्री बनाने की ज़रूरत है? आप इसे किसी और से बनवा सकते हैं। महान कंपनियां हमेशा गैरेज में शुरू होती हैं। गूगल, एप्पल, और अमेजन जैसी कंपनियों भी छोटे से कमरों या गैरेज से ही शुरू हुई थी।

स्टार्टअप एक जादुई परी कथा की तरह लगता है जहाँ खर्च किसी और की समस्या है और लाभ की चिंता भविष्य के लिए छोड़ दी जाती है। लेकिन यह एक खतरनाक सोच है। हर व्यवसाय, नया हो या पुराना, बाज़ार की ताकतों और आर्थिक नियमों से चलता है। लाभ कमाएं, या खत्म हो जाए।

एक वास्तविक व्यवसाय शुरू करें, जो पहले दिन से ही लाभ कमाने के बारे में सोचता हो। एक वास्तविक व्यवसाय की तरह काम करें और आपके सफल होने की संभावना कहीं अधिक होगी। अब, जबकि आपने सफलता की नींव और चुनौतियों को समझ लिया है, क्या आप अपनी उद्यमी यात्रा का पहला ठोस कदम उठाने के लिए तैयार हैं?

कौन सा उद्यम, कैसे किया जाए?

हर महान कहानी का आरंभ एक विचार से होता है। एक ऐसा विचार जो मन की कोख में जन्म लेता है, पोषित होता है और फिर आकार लेता है। एक स्टार्टअप का जन्म भी ठीक इसी तरह होता है, और इसलिए हमें अपने उद्यम को अपना 'मानस पुत्र' मानना चाहिए। ब्रह्मांड की रचना से लेकर हर छोटे-बड़े आविष्कार तक, सब कुछ पहले मन के एक विचार से ही शुरू हुआ।

महर्षि पतंजलि ने योग सूत्र में मन के चार आयाम बताए हैं मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार। किसी भी विचार का जन्म सबसे पहले चित्त में होता है, जिसे वे 'चित्त वृत्ति' कहते हैं। एक उद्यमी को यह समझना चाहिए कि उसका विचार किस भाव दशा में और किस वृत्ति से उत्पन्न हुआ है। क्योंकि हर विचार एक बीज की तरह होता है, और उस बीज को बोने से पहले मिट्टी की प्रकृति को समझना ज़रूरी है।

समस्या नहीं, अवसर का रणक्षेत्र!

एक साधारण व्यक्ति और एक उद्यमी में यही सबसे बड़ा फर्क होता है। जहाँ साधारण व्यक्ति किसी समस्या को देखकर आँखें फेर लेता है और सोचता है कि इसका समाधान सरकार या कोई और करेगा, वहीं एक उद्यमी उस समस्या को एक अवसर के रणक्षेत्र के रूप में देखता है। यह कोई बाहरी कार्य नहीं, बल्कि एक आंतरिक स्वभाव है। एक सच्चा उद्यमी वह है जो छोटी से छोटी समस्या को भी देखकर उसके समाधान को खोजने और क्रियान्वित करने की सोचता है। यही रजोगुण की प्रधानता है, जो एक व्यक्ति को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है।

दुनिया के सबसे बड़े व्यवसाय ऐसे ही लोगों द्वारा खड़े किए गए हैं। क्या आपको लगता है कि एयरबीएनबी (Airbnb) का जन्म किसी भव्य कॉर्पोरेट मीटिंग में हुआ था? नहीं! यह सैन फ्रांसिस्को में रहने वाले दो दोस्तों की उस हताशा से पैदा हुआ था, जब वे अपने घर का किराया नहीं दे पा रहे थे। जब उन्होंने अपने एयर मैट्रेस को किराए पर देने का सोचा, तब उन्हें नहीं पता था कि यह छोटी-सी ज़रूरत एक दिन 30 बिलियन डॉलर की कंपनी बन जाएगी, जो 220 से ज्यादा देशों में काम करेगी।

इसी तरह, जब कोरोना काल में पूरी दुनिया के कारोबार डूब रहे थे, तब कैवल्य वोहरा और आदित्य पालीचा को 10 मिनट में सामान घर तक पहुंचाने का विचार आया। इस विचार ने ज़ेप्टो (Zepto) को जन्म दिया, जिसकी कीमत आज 140 करोड़ डॉलर से अधिक है। एक अखबार की खबर पढ़कर चोरियों से परेशान होकर अर्देशिर गोदरेज ने एक ताला बनाने का फैसला किया और गोदरेज (Godrej) जैसी कंपनी खड़ी कर दी।

यह कहानियाँ सिर्फ़ प्रेरणा नहीं हैं, बल्कि यह साबित करती हैं कि आपका अपना "भोग हुआ यथार्थ" आपकी अपनी व्यक्तिगत समस्या एक विशाल उद्यम का आधार बन सकती है। लेकिन इस विचार को हकीकत में बदलने के लिए आपको इन छह पवित्र कदमों पर चलना होगा:

पहले कदम: वास्तविक समस्या की पहचान

आपके उद्यम का विचार सिर्फ एक दिवास्वप्न नहीं होना चाहिए। यह एक ऐसी वास्तविक समस्या का समाधान होना चाहिए, जिसके लिए लोग भुगतान करने को तैयार हों। जब मेलीना पर्किन्स ने देखा कि उनके छात्रों को डिज़ाइन सॉफ्टवेयर सिखाना कितना मुश्किल और महंगा था, तब उनके मन में एक ऐसा सरल सॉफ्टवेयर बनाने का विचार आया, जो कोई भी इस्तेमाल कर सके। इस विचार से ही कैनवा (Canva) का जन्म हुआ।

लेकिन सावधान! पर्याप्त फंडिंग होने के बावजूद, भारत में 90% स्टार्टअप विफल हो जाते हैं। बायजूस, फूडपांडा, फ्रीचार्ज जैसी बड़ी कंपनियां भी इसी राह पर चली हैं। अमेरिका के निवेशक विल ग्रोस का कहना है कि स्टार्टअप की सफलता 42% सही समय पर, 32% टीम पर, 28% विचार पर और सिर्फ 14% फंडिंग पर निर्भर करती है। आपका विचार कितना भी अच्छा क्यों न हो, अगर वह सही समय पर सही समस्या का समाधान नहीं करता, तो विफल हो जाएगा।

दूसरे कदम: अपने 'गणित' को पहचानें

यदि आपके पास एक बेहतरीन विचार है, तो अगला कदम है अपने लक्षित ग्राहकों की पहचान करना। यह मानना कि हर कोई आपका ग्राहक होगा, एक बड़ी भूल है। 142 करोड़ की आबादी का आंकड़ा सिर्फ एक संख्या है। आपका उत्पाद वही खरीदेगा जो उसे वहन कर सकता है और जिसकी यह जरूरत पूरी करता है। आपको अपने "कुल बाजार" का आकार सही ढंग से आंकना होगा।

उदाहरण के लिए, 2030 तक भारत में मध्यम वर्ग की आबादी 46% होने का अनुमान है। यह एक विशाल बाजार है। लेकिन क्या आपका उत्पाद उनकी क्रय शक्ति के अनुरूप है? क्या वह उनकी धार्मिक या सामाजिक मान्यताओं के विपरीत तो नहीं? इन सवालों का जवाब दिए बिना आप अपने ग्राहकों को परिभाषित नहीं कर सकते।

तीसरे कदम: 'शत्रु' को समझें

जो यह मानता है कि उसका कोई प्रतिस्पर्धी नहीं है, वह सबसे बड़ी भूल करता है। अगर कोई समस्या है, तो उसका कोई न कोई समाधान पहले से मौजूद होगा, भले ही वह कितना भी अधूरा क्यों न हो। आप सिर्फ़ अपने प्रतिद्वंद्वी की नकल करके नहीं जीत सकते। आपको उनके व्यापार मॉडल को समझना होगा, उनके 'अंतरालों' (gaps) को पहचानना होगा, और उनसे बेहतर समाधान पेश करना होगा।

भारत के एग्रीटेक स्टार्टअप का उदाहरण लें। उन्होंने ई-कॉमर्स कंपनियों की नकल करके कृषि उत्पादों की सप्लाई चेन को तोड़ने की कोशिश की। लेकिन वे असफल रहे। क्यों? क्योंकि उन्होंने कृषि बाज़ार के गणित को नहीं समझा। इलेक्ट्रॉनिक्स या फैशन में जो मार्जिन मिलता है, वह कृषि उत्पादों में नहीं होता। यहाँ 85% छोटे और सीमांत किसान हैं जिनकी मात्रा और गुणवत्ता अलग-अलग होती है। यही वह अंधा अनुकरण है जो एक उद्यमी को ले डूबता है।

चौथे कदम: अवसर की "खोज"

जब आप अपने लक्षित बाजार के आकार का आकलन कर लेते हैं, तो अगला कदम है उन 'अर्ली अडॉप्टर्स' की पहचान करना जो आपके उत्पाद को सबसे पहले अपनाएंगे। ये वे ग्राहक होते हैं जो नए समाधानों को आजमाने के लिए उत्सुक होते हैं। पहले उन्हें लक्षित करें, फिर धीरे-धीरे बाजार में अपने अनुयायी बनाएं। अपने व्यापार मॉडल में डेटा विश्लेषण का उपयोग करें ताकि आप बाजार की नब्ज़ को पकड़ सकें।

पांचवें कदम: 'उत्पाद-बाज़ार तालमेल' की परीक्षा

शुरू में ही बड़ी लागत लगाने के बजाय, अपने विचार को छोटे स्तर पर 'टेस्ट' करें। कोविड के दौरान कई एडटेक और ई-कॉमर्स स्टार्टअप ने भारी निवेश उठाया, यह सोचकर कि वे ग्राहकों की आदतें बदल देंगे। लेकिन जैसे ही लॉकडाउन खत्म हुआ, ग्राहक अपनी पुरानी आदतों पर लौट आए। उत्पाद-बाजार तालमेल का मतलब सस्ते में बेचना नहीं, बल्कि यह साबित करना है कि आपका उत्पाद ग्राहकों की एक वास्तविक और गहरी जरूरत को पूरा करता है।

छठा कदम: परिवर्तन, परिवर्धन और पुनरावृत्ति का नृत्य

आज के डिजिटल युग में, बाजार की बुद्धिमत्ता और ग्राहकों की प्रतिक्रिया का विश्लेषण करना आसान है। एक उद्यमी को एक लचीले नर्तक की तरह होना चाहिए। बाजार में क्या चलेगा और क्या नहीं, इसका कोई निश्चित नियम नहीं है। यह परीक्षण और त्रुटियों का खेल है। अपने प्रतिद्वंद्वियों की रणनीतियों पर नज़र रखें और नई तकनीक को अपनाने के लिए हमेशा तैयार रहें।

यह यात्रा अनिश्चितताओं से भरी है, जहाँ रोज़ नई चुनौतियां आती हैं। एक सच्चा लीडर वह है जो टीम को उत्साहित रखता है और हर समस्या का समाधान निकलता है। असफलताओं को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा मानें और पैसों के नुकसान को शिक्षा की कीमत।

अगर सब कुछ करने के बाद भी आपका विचार सफल नहीं हो पा रहा है, तो साहिर लुधियानवी के गीत को याद करे: "वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा।"

भारत में भगवान विष्णु का एक चित्र हर घर में होता है, जिसमें वे क्षीर सागर में शेषनाग पर शांति से लेटे हैं। इसका अर्थ है कि एक स्टार्टअप संस्थापक को बाजार की उथल-पुथल और हज़ारों समस्याओं के बीच भी शांति से अपने काम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। तभी सफलता आपके कदम चूमेगी।

आप एक ऐसे उद्यमी बनें जो केवल व्यवसाय शुरू नहीं करता, बल्कि एक ऐसी विरासत बनाता है जो आपकी अनुपस्थिति में भी लाभप्रद ढंग से चलती रहे।

मन शांत रखने के साधन

उद्यमिता की यात्रा में सबसे बड़ी चुनौती बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक होती है अपने मन को शांत और केंद्रित रखना। यह इसी पर केंद्रित है, जिसमें हम मनोविज्ञान और गीता के सिद्धांतों को मिलाकर समझेंगे कि एक उद्यमी को अपने मन को कैसे संभालना चाहिए।

मन का नाश: बायजूस की कहानी

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मनुष्य के पतन की प्रक्रिया को बहुत स्पष्ट रूप से समझाया है: जब मनुष्य विषयों का बार-बार चिंतन करता है, तो उसमें आसक्ति पैदा होती है। इस आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से भ्रम, भ्रम से स्मृति का नाश, और अंततः बुद्धि का नाश होता है। जब विवेक मर जाता है, तब नाश निकट आ जाता है।

बायजू रविंद्रन की कहानी इस प्रक्रिया का एक ज्वलंत उदाहरण है। 2007 में ट्यूशन की सफलता से उत्साहित होकर उन्होंने थिंक एंड लर्न नाम का स्टार्टअप शुरू किया। 2020 तक, उनकी कंपनी, बायजूस, दुनिया का सबसे मूल्यवान एडटेक स्टार्टअप बन गई, जिसकी कीमत ₹85,000 करोड़ थी। लेकिन सफलता के शीर्ष पर उन्होंने विवेक खो दिया। उन्होंने कई कंपनियों को भारी कर्ज लेकर खरीदा, बिना यह सोचे कि उनकी मासिक आय केवल ₹30 करोड़ है, जबकि खर्च ₹150 करोड़ था।

जल्द ही, लोन का बोझ इतना बढ़ गया कि कंपनी की कीमत 22 बिलियन डॉलर से घटकर 5 बिलियन डॉलर रह गई। घाटा ₹4,589 करोड़ तक पहुंच गया। इसके बाद, वित्तीय गड़बड़ियों सामने आईं, मुकदमे दायर हुए, और प्रवर्तन निदेशालय ने छापा मारा। आज बायजू रविंद्रन की संपत्ति शून्य हो गई है। यह कहानी सिखाती है कि जब हम अनासक्ति का भाव खो देते हैं और मोह में पड़ जाते हैं, तो हमारा विवेक हमें छोड़ देता है।

अभ्यास और वैराग्य: मन को शांत करने का मार्ग

महर्षि पतंजलि कहते हैं: "अभ्यास-वैराग्य-अभ्यांतन्निरोधः"। इसका अर्थ है कि निरंतर अभ्यास और वैराग्य से मन को शांत किया जा सकता है। एक उद्यमी को यह समझना चाहिए कि वह अपने स्टार्टअप से अलग है। यह समझ उसे अनासक्ति का भाव देती है। वैराग्य का मतलब आलस्य नहीं, बल्कि मोह का त्याग है। जब आप अपने उद्यम से भावनात्मक रूप से अलग होते हैं, तो आप बेहतर निर्णय ले पाते हैं।

आपका चेतन मन यह जानता है, लेकिन अवचेतन मन को यह सिखाना पड़ता है। किसी भी विचार को अवचेतन मन का हिस्सा बनाने के लिए उसे बार-बार दोहराना पड़ता है। ठीक वैसे ही जैसे आप अपना नाम या मातृभाषा बिना सोचे-समझे बोल पाते हैं। इसलिए, एक उद्यमी को अपने मन को शांत करने के लिए नियमित अभ्यास करना चाहिए।

वास्तविक दुनिया का बहाना

जब आप किसी नए विचार के बारे में बताते हैं, तो लोग अक्सर कहते हैं, "यह वास्तविक दुनिया में कभी काम नहीं करेगा।" यह "वास्तविक दुनिया" कोई जगह नहीं, बल्कि एक बहाना है कोशिश न करने का एक तरीका। यह एक ऐसी मानसिकता है जो निराशावाद और हताशा से भरी है। लेकिन सफल उद्यमी इस जाल में नहीं फंसते। हमारी जैसी कंपनी ने बिना किसी सेल्सपर्सन या विज्ञापन के लाखों ग्राहक बनाए, और यह सब "वास्तविक दुनिया" के नियमों के विपरीत था।

यह बहाना छोड़ दें। आपकी दुनिया वही है जो आप बनाते हैं।

बाहरी फंडिंग: एक मीठा जहर

जब कोई अपना उद्यम शुरू करता है, तो सबसे पहला सवाल होता है, "पैसा कहां से आएगा?" बहुत से लोग सोचते हैं कि इसका जवाब है बाहरी फंडिंग। लेकिन यह एक बड़ा जाल हो सकता है। दूसरों का पैसा लेना अच्छा लग सकता है, लेकिन इसके साथ ही आप अपना नियंत्रण खो देते हैं। आप अपने निवेशकों के प्रति जवाबदेह हो जाते हैं, जो अक्सर कम समय में ही अपना पैसा वापस चाहते हैं। इससे दीर्घकालिक स्थिरता की योजना धरी रह जाती हैं।

दूसरों का पैसा खर्च करना एक लत है। जब आपके पास पैसा होता है, तो आप ग्राहकों के बजाय निवेशकों की पसंद का उत्पाद बनाते है। फंडिंग की तलाश में महीनों लग जाते हैं, जिससे आपका ध्यान भटकता है। यह सब इसके लायक नहीं है। अपनी यात्रा को कम से कम बाहरी नकदी के साथ शुरू करें। महान कंपनियां अक्सर गैरेज में शुरू होती हैं, न कि बड़े फंड से।

सफलता के चार स्तंभ

अभिप्रेरणा (motivation) आपको छलांग लगाने के लिए प्रेरित कर सकती है, लेकिन उड़ान भरने के लिए आदत की जरूरत होती है। 21 दिन का अभ्यास आपको प्रेरित कर सकता है, लेकिन 6 महीने तक लगातार उत्साह और श्रद्धा के साथ काम करना उसे आपकी आदत में बदल देता है।

किसी भी उद्यम को शुरू करने से पहले अपनी 'इकिगाई' (Ikigai) की जाँच करें, जो चार मापदंडों पर आधारित है:

जुनून और ऊर्जा: क्या आप इस विचार के लिए जुनूनी हैं?

लाभ: क्या यह एक लाभदायक व्यवसाय बन सकता है?

समस्या-समाधान: क्या यह किसी वास्तविक समस्या का समाधान करता है?

उद्देश्य: क्या इस व्यवसाय का कोई बड़ा उद्देश्य है?

जमीन पर उतरे, समस्याओं को खोजें और बेहतर समाधान दें। किसी और की नकल न करें बाजार में एक ही फ्लिपकार्ट या ओला है, आप अपना रास्ता खुद बनाएं। नीचे से शुरू करें और अनुभव के साथ ऊपर बढ़ें।

क्या सफलता की कोई समय सीमा है?

हर इंसान जीवन में सफल होना चाहता है, लेकिन सफलता को पाने का रास्ता क्या है? क्या सफलता की कोई समय सीमा होती है? क्या हम कह सकते हैं कि एक निश्चित समय के बाद ही सफलता मिलेगी?

डॉ. स्टीफन आर. कौवे ने अपनी किताब 'द 7 हैबिट्स ऑफ हाइली इफेक्टिव पीपल' में सफल लोगों की सात आदतें बताते हैं। ये आदतें हमें बताती हैं कि सफलता किसी समय सीमा पर नहीं, बल्कि हमारे विचारों और कर्मों पर निर्भर करती है। आइए उन आदतों को देखें:

सक्रिय बनिए (प्रोएक्टिव बनिए): आप अपनी परिस्थितियों के शिकार नहीं हैं, बल्कि उनके नियंत्रक हैं। अपनी सोच, चुनाव और निर्णयों से आप किसी भी हालात को बदल सकते हैं।

अंत को ध्यान में रखकर शुरुआत करें: कठोपनिषद के श्रेय और प्रेय मार्ग की तरह, हमेशा अपने अंतिम लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही कोई भी काम शुरू करें। यह एक लीडरशिप की आदत है, जो हमें भटकने से रोकती है।

प्राथमिक चीज़ों को महत्व दें: आपका समय सीमित है। इसलिए, अपनी प्राथमिकताओं को पहचानें और उन पर कठोरता से अनुशासित रहें ताकि आप हर दिन सबसे महत्वपूर्ण काम पूरा कर सकें।

फायदे का सौदा: विन-विन सोच: हमेशा ऐसी जीत के बारे में सोचें जो दोनों पक्षों के लिए फायदेमंद हो। यह सहयोग और भरोसे का निर्माण करता है।

पहले समझने की कोशिश करें, फिर समझाए जाने की: किसी को सलाह देने से पहले, उनके दृष्टिकोण को सुनें और समझें। संचार विशेषज्ञ कहते हैं कि 60% संवाद बॉडी लैंग्वेज से होता है, इसलिए सुनना सबसे महत्वपूर्ण है।

तालमेल बिठाएं: दूसरों के विचारों और मूल्यों को समझ कर उनके साथ तालमेल बिठाएँ। यह नई संभावनाओं और रचनात्मकता के दरवाजे खोलता है।

नज़र को तेज करें: खुद को शारीरिक, आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक रूप से लगातार बेहतर बनाएँ। यह सभी आदतों को एक साथ अभ्यास करने में मदद करता है।

समय की लंबाई नहीं, प्रयास की गहराई, राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने लिखा है:

"वसुधा का नेता कौन हुआ?

भूखण्ड-विजेता कौन हुआ?

जिसने न कभी आराम किया,

विघ्नों में रहकर नाम किया।"

सफलता का कोई शॉर्टकट नहीं होता। महर्षि पतंजलि के अनुसार, "सफलता उनके सबसे निकटतम होती है, जिनके प्रयास तीव्र, प्रगाढ़ और सच्चे होते हैं।" यह समय की लंबाई का सवाल नहीं है, बल्कि प्रयास की गहराई का है। आपकी मेहनत जितनी तीव्र होगी, सफलता उतनी ही जल्दी मिलेगी।

योग सूत्र में सफलता के चार स्तंभ हैं:

श्रद्धा (विश्वास): अपने काम और खुद पर गहरा विश्वास।

वीर्य (जोश): काम करने के लिए अदम्य ऊर्जा और जोश।

स्मृति (याददाश्त): अपने लक्ष्य और सीखने की प्रक्रिया को याद रखना।

प्रज्ञा (जागरूकता): हर पल सचेत और जागरूक रहना।

व्यावसायिक योजनाएं: कल्पना या हकीकत?

एक लंबी और विस्तृत व्यावसायिक योजना बनाना अक्सर एक कल्पना मात्र होती है। आप बाज़ार की स्थिति, प्रतिस्पर्धियों, और ग्राहकों जैसे उन कारकों को नियंत्रित नहीं कर सकते जो आपके हाथ में नहीं हैं। अपनी व्यावसायिक योजनाओं को "अनुमान" कहना शुरू करें। इससे आप उनके बारे में कम चिंतित होंगे।

योजनाएं अक्सर सुधार के रास्ते में रुकावट बन जाती हैं। वे हमें एक ही रास्ते पर आँख बंद करके चलने पर मजबूर करती हैं, भले ही नए अवसर सामने आ रहे हों। इसलिए, कल या अगले साल की योजना बनाने के बजाय, यह तय करें कि आप इस हफ्ते क्या करने जा रहे हैं। बिना सोचे-समझे निर्णय लेना ठीक है, क्योंकि आप सबसे अधिक जानकारी तब हासिल करते हैं, जब आप काम कर रहे होते हैं।

बाहर निकलने की रणनीति: एक गलत सोच

अक्सर लोग पूछते हैं, "आपकी बाहर निकलने की रणनीति क्या है?" यदि आप किसी उद्यम में उतरने से पहले ही बाहर निकलने के बारे में सोच रहे हैं, तो आपकी प्राथमिकताएँ गलत है। क्या आप तलाक की योजना बनाते हुए शादी में जाते हैं? नहीं, आप प्रतिबद्धता की रणनीति बनाते हैं।

एक व्यवसाय को अधिग्रहित करने की संभावना बहुत कम होती है शायद 10,000 में से 1। जब आप इस उद्देश्य से कंपनी बनाते हैं, तो आप ग्राहकों को खुश करने के बजाय निवेशकों को खुश करने पर ध्यान देते हैं। यह एक गलत रास्ता है। जो लोग अपना व्यवसाय बेचते हैं, वे अक्सर कुछ समय बाद वापस आ जाते हैं, क्योंकि वे उस संतुष्टि को याद करते हैं जो उन्हें अपने बनाए हुए काम से मिलती थी।

अच्छी चीजें बार-बार नहीं मिलती। अगर आप कोई अच्छी चीज बना लेते हैं, तो उसे जारी रखें और उसे अपने हाथों से जाने न दें।

सफलता में बाधाएं

जब कोई उद्यमी अपना स्टार्टअप शुरू करता है, तो वह एक जहाज के कप्तान की तरह होता है जो अकेले ही तूफानी समुद्र में निकलता है। शुरुआत में सब कुछ उसी पर निर्भर होता है। लक्ष्य बहुत दूर होता है, और रास्ता अनिश्चितताओं से भरा होता है। संसाधन सीमित होते हैं और चुनौतियों का अंबार लगा होता है। इसी अकेलेपन में संस्थापक का मन शांत नहीं रह पाता, और अगर मन पर से नियंत्रण हट जाए, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।

व्याधि (स्वास्थ्य): जब शरीर साथ छोड़ दे

उद्यमिता की दौड़ में अक्सर "वर्क-लाइफ बैलेंस" की बहस छिड़ जाती है। इंफोसिस के संस्थापक नारायण मूर्ति जैसे दिग्गज कहते हैं कि कड़ी मेहनत का कोई विकल्प नहीं, जबकि कर्मचारी हफ्ते में पाँच दिन की वकालत करते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि यह एक बहुत ही व्यक्तिगत मुद्दा है। अगर आपको अपने काम में आनंद आता है, तो शायद यही आपका संतुलन है।

हालांकि, स्टार्टअप संस्थापकों पर मानसिक स्वास्थ्य का गहरा प्रभाव पड़ता है। एक सर्वेक्षण के अनुसार, 72% संस्थापक मानसिक स्वास्थ्य से जूझते हैं, 54% तनाव में रहते हैं, और 10% को पैनिक अटैक आते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि 81% संस्थापक अपनी इन चुनौतियों को दूसरों से छिपाते हैं, यहाँ तक कि अपने सह-संस्थापकों से भी। लगभग 77% मदद लेने से इनकार करते हैं। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य और काम पर पड़ता है। यह दिखाता है कि सफल होने के लिए शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहना कितना जरूरी है।

स्त्यान (धैर्य की कमी): जब ऊर्जा कम हो जाए

जब एक उद्यमी का धैर्य जवाब देने लगता है, तो यह संकेत है कि उसकी प्राण ऊर्जा बहुत कम हो गई है। यह एक ऐसी ऊर्जा है जो हमारे शरीर में निरंतर प्रवाहित होती है। जब इसमें गड़बड़ी होती है, तो बेचैनी और अनिर्णय हावी हो जाते हैं। एक उद्यमी को अपनी ऊर्जा हमेशा ऊँची रखनी चाहिए ताकि वह सही निर्णय ले सके और अपनी टीम को प्रेरित कर सके। जब ऊर्जा कम होती है, तो व्यक्ति केवल बड़ी-बड़ी बातें करता है, लेकिन कुछ करके नहीं दिखा पाता। ऐसे में नकारात्मकता बढ़ने लगती है, जो असफलता को आमंत्रण देती है।

संशय (संदेह): जब विश्वास डगमगाए

जब एक उद्यमी संशय की स्थिति में होता है, तो वह अपने ही स्टार्टअप के प्रति संदेह करने लगता है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति अज्ञानी और श्रद्धाहीन होते हैं, वे संदेह करते हैं और उनका पतन होता है। ऐसे उद्यमी "एनालिसिस पैरालिसिस" (Analysis Paralysis) का शिकार हो जाते हैं यानी, बहुत ज़्यादा विश्लेषण करने के कारण वे कोई भी निर्णय नहीं ले पाते।

मनोवैज्ञानिक बैरी श्वार्ट्ज के अनुसार, जब लोगों को बहुत ज़्यादा विकल्प दिए जाते हैं, तो वे कुछ भी नहीं चुन पाते। इस स्थिति से बचने के लिए, बड़े लक्ष्यों को छोटे-छोटे हिस्सों में बाँटना, कामों की प्राथमिकता तय करना और टीम की राय लेना जरूरी है। संशय एक कुत्ते की तरह है अगर आप उस पर ध्यान न दें, तो वह खुद ही चला जाता है।

प्रमाद (असावधानी): जब सम्मोहन हावी हो

आज स्टार्टअप को इतना रोमांटिक ढंग से प्रचारित किया जा रहा है कि हर कोई 'सीईओ' या 'सह-संस्थापक' बनना चाहता है। लेकिन यह एक तरह का सम्मोहन है। जब कोई इस सम्मोहन में पड़कर स्टार्टअप शुरू करता है, तो शुरुआती चुनौतियां आने पर उसका उत्साह खत्म हो जाता है। मन में आलस्य बैठ जाता है, और काम में मन नहीं लगता। यह प्रमाद, जो कि असफलता की जड़ है, तब आता है जब उद्यमी की उत्सुकता और ऊर्जा खत्म हो जाती है।

अविरति (विषयासक्ति): जब नैतिक पतन हो

स्टार्टअप की दुनिया में विषयासक्ति एक बहुत बड़ी बाधा है। कई संस्थापक फर्जी अकाउंट बनाते हैं, झूठी ग्रोथ दिखाते हैं, और अय्याशी भरी जीवनशैली पर पैसा उड़ाते हैं। कुछ तो पैसों की हेराफेरी और अवैध संबंधों जैसे विवादों में भी फंस जाते हैं। गूगल के सह-संस्थापक की पत्नी निकोल शनाहन से जुड़ा विवाद, फ्लिपकार्ट के बिन्नी बंसल का इस्तीफा, और भारतपे के अशनीर ग्रोवर का विवाद इसके कुछ उदाहरण हैं। यह अविरति संस्थापक के साथ-साथ कर्मचारियों और पूरी कंपनी का भविष्य खतरे में डाल देती है।

भ्रान्तिदर्शन (मिथ्या ज्ञान): जब भ्रम हावी हो

कई बार संस्थापक अपने बिजनेस आइडिया, रणनीति और बाजार के बारे में भ्रम पाल लेते हैं। यह एक खुली आँख का सपना होता है जो वास्तविकता से दूर होता है। एक सर्वे के अनुसार, 64% टेक संस्थापकों ने माना कि उनकी कंपनी को संभावित विफलता का सामना करना पड़ा क्योंकि वे पर्याप्त रूप से तैयार नहीं थे। ऐसे भ्रम स्टार्टअप को अपूरणीय क्षति पहुँचा सकते हैं।

उपलब्धभूमितत्व और अनवस्थिततत्वानि: जब लक्ष्य से भटकाव हो

जब एक संस्थापक अपने लक्ष्य से भटक जाता है, तो उसकी टीम भी भटक जाती है। हर दिन नए आइडिया आना स्वाभाविक है, लेकिन अगर आप अपने 'प्रोडक्ट-मार्केट फिट' पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, तो आप भटक जाते हैं। इसी तरह, जब एक उद्यमी की नई सोच और समस्या-समाधान की भावना (अनवस्थिततत्वानि) खत्म हो जाती है, तो वह अपने स्टार्टअप की सफलता से दूर हो जाता है।

चित्त विक्षेप (चेतना में भटकाव): अंतिम बाधा

ये सभी बाधाएं बीमारी, आलस्य, संदेह, प्रमाद, विषयासक्ति मिलकर हमारे चित्त में विक्षोभ (भटकाव) पैदा करती हैं। यह विक्षोभ सफलता पाने की सबसे बड़ी रुकावट बन जाता है। एक उद्यमी को इन बाधाओं को पहचानना और उन पर लगातार नियंत्रण रखना सीखना चाहिए।

आपसी संव्यवहार के आधार

आज का युग गति का है। सोशल मीडिया और इंस्टेंट मैसेजिंग ने संवाद को तीव्र कर दिया है, लेकिन इसी गति ने हमारे धैर्य और समझ को छीन लिया है। हम बिना सोचे-समझे मैसेज फॉरवर्ड करते हैं और लाइक-डिसलाइक के खेल में उलझ जाते हैं। स्टार्टअप की दुनिया में तो यह और भी विकराल रूप ले लेता है, जहाँ अफवाहें और प्रतिस्पर्धी युद्ध आम बात हैं।

एक उद्यमी के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ़ बाज़ार या फंडिंग नहीं है, बल्कि आपसी संव्यवहार है। जैसे-जैसे टीम बड़ी होती है, विवाद भी बढ़ते हैं। सह-संस्थापकों के बीच पद, शेयर होल्डिंग्स, और शक्ति को लेकर अक्सर टकराव होता है। जब कंपनी में नुकसान होता है, तो दोषारोपण का सिलसिला शुरू हो जाता है, जो पूरे उद्यम को डुबो सकता है।

नोम वासरमैन ने अपनी किताब 'द फाउंडर्स डिलेमास' में लिखा है कि कई बार उद्यमी शुरू में ही गलत निर्णय ले लेते हैं, जो उनके पतन का कारण बनता है। क्या अकेले काम करें या टीम बनाएं? दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ काम करना कितना सही है? इक्विटी का बंटवारा कैसे करें? ये सभी निर्णय सिर्फ़ वित्तीय नहीं, बल्कि भावनात्मक होते हैं, जो रिश्तों को भी प्रभावित कर सकते हैं।

कंपनियों की असफलता का एक बड़ा कारण लोगों की समस्याएं होती हैं। यह सिर्फ आज की बात नहीं, बल्कि सदियों पुरानी समस्या है। महर्षि पतंजलि ने अपने योग सूत्र में इसका समाधान दिया है, जो आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

महर्षि पतंजलि का व्यावहारिक सूत्र

योग सूत्र के 33 वें श्लोक में महर्षि पतंजलि कहते हैं: “मैत्री-करुणा-मुदिता-उपेक्षाणां सुख-दुःख-पुण्य-अपुण्य-विषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्।” इसका अर्थ है कि मन को शांत करने के लिए हमें इन चार प्रकार के लोगों के साथ चार तरह का व्यवहार करना चाहिए:

आनंदित व्यक्ति के प्रति मैत्री (मित्रता) का भाव

जब आप किसी प्रतिद्वंद्वी स्टार्टअप की सफलता देखते हैं, तो स्वाभाविक रूप से जलन या ईर्ष्या होती है। हमारा अहंकार चोटिल होता है। लेकिन महर्षि पतंजलि कहते हैं कि आपको उनकी खुशी में अपनी खुशी देखनी चाहिए। यह ऊपरी दिखावा नहीं, बल्कि एक आंतरिक चुनाव है। जब आप दूसरे की सफलता में खुश होते हैं, तो आप स्वयं के लिए भी खुशी का द्वार खोलते हैं। यह आपको नकारात्मकता से मुक्त करता है और सकारात्मक संबंध बनाने में मदद करता है।

दुखी व्यक्ति के प्रति करुणा का भाव

जब कोई स्टार्टअप विफल होता है, तो हम अक्सर सहानुभूति दिखाते हैं, लेकिन भीतर ही भीतर एक तरह की खुशी महसूस करते हैं। यह मानवीय स्वभाव है। लेकिन करुणा बिलकुल अलग है। करुणा में हम न तो खुशी महसूस करते हैं और न ही दुख। हम सिर्फ़ मदद करते हैं, बिना किसी अहंकार के। जब आप किसी असफल उद्यमी की मदद करते हैं, तो यह आपकी करुणा होती है, जो आपको बड़ा बनाती है।

पुण्यवान के प्रति मुदिता (प्रसन्नता) का भाव

जब कोई हमसे बेहतर काम करता है, तो हम तुरंत उसकी आलोचना करने लगते हैं। यह हमारे अहंकार को चोट पहुंचाता है। हम यह मानने को तैयार नहीं होते कि कोई और हमसे बेहतर हो सकता है। लेकिन महर्षि पतंजलि कहते हैं कि हमें पुण्यवान के प्रति प्रसन्नता का भाव रखना चाहिए। जब आप सफल लोगों की प्रशंसा करते हैं, तो आप उनके साथ एक मजबूत नेटवर्क बनाते हैं, जो अंततः आपके व्यवसाय के लिए फायदेमंद साबित होता है।

पापी या बुरे के प्रति उपेक्षा का भाव

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बुरे लोगों की निंदा करने से बचें। सोशल मीडिया पर किसी भी स्टार्टअप की बुराई पर बिना सोचे-समझे टिप्पणी करना एक जाल है। जब हम किसी बुराई पर बहुत ज्यादा ध्यान देते हैं, तो हम उससे सम्मोहित हो जाते हैं। यह हमें खुद भी नकारात्मक बना देता है। महर्षि पतंजलि कहते हैं कि बुराई के प्रति तटस्थता का भाव रखें, इसका मतलब यह नहीं कि आप भावशून्य हो जाएँ, बल्कि यह कि आप मूल्यांकन न करें। जीवन इतना जटिल है कि बुराई को अच्छाई में बदल सकती है। इसलिए अनावश्यक बहसों से दूर रहें।

आपसी संबंधों में ये सिद्धांत केवल व्यवसाय में ही नहीं, बल्कि आपके निजी जीवन में भी सफलता ला सकते हैं। ये आपको आंतरिक शांति और स्थिरता देते हैं, जो एक उद्यमी के लिए सबसे बड़ी संपत्ति है

दुख के कारण

उद्यमिता की यात्रा एक रहस्यमय और जोखिम भरी यात्रा है। इसमें सफलता अनायास नहीं मिलती, बल्कि उसे अर्जित करना पड़ता है। एक उद्यमी को न केवल कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, बल्कि कई लोगों पर निर्भर भी रहना पड़ता है, जिससे रोज नए-नए विवाद और दुख पैदा होते हैं।

दुख एक नकारात्मक भाव है, जो अंधकार की तरह होता है। यह कोई बाहरी चीज नहीं, बल्कि हमारे चुनाव का परिणाम है। जब सह-संस्थापकों के बीच लड़ाई होती है, तो यह उनके दुख का परिणाम है। लेकिन जो उद्यमी सकारात्मक होते हैं, वे लड़ने की बजाय दुख के कारणों को खोजते हैं और उन्हें दूर करने का प्रयास करते हैं।

जोखिम और सुरक्षा: एक विरोधाभास

स्टार्टअप शुरू करना एक बड़े साहस का काम है। अधिकांश लोग जीवन में सुरक्षा को चुनते हैं, जिसके कारण वे कभी अपना व्यवसाय शुरू नहीं कर पाते। लेकिन विडंबना यह है कि जहाँ वे सुरक्षित महसूस करते हैं, वहाँ भी वे दुखी ही रहते हैं और अपनी परिस्थितियों के लिए दूसरों को दोष देते हैं। जीवन का सिद्धांत है: जो जितना जोखिम उठाएगा, उसके सफल होने के अवसर उतने ही अधिक होंगे।

बुद्ध ने भी अपने चार आर्य सत्यों में पहला सत्य यही बताया है कि "जीवन दुख है।" यह निराशावाद नहीं, बल्कि वास्तविकता है। एक उद्यमी की यात्रा का एकमात्र आधार आशा है। इसी आशा के सहारे वह सारे दुख सह जाता है, जैसा कि चीन के उद्यमी जैक मा कहते हैं, "आज कठिन है, कल और भी कठिन होगा, लेकिन परसों सुंदर होगा।" दुख का सामना करना ही उसे जानने का एकमात्र तरीका है। अगर आप उससे भागते हैं, तो वह और भी बड़ा और भयानक लगने लगता है।

काम के प्रति जुनून: एक खतरनाक आदत

हमारी संस्कृति में काम के प्रति जुनूनी लोगों का बहुत सम्मान होता है। हम सुनते हैं कि लोग रात-रात भर काम करते हैं, दफ्तर में सोते हैं, और खुद को प्रोजेक्ट्स के लिए खत्म कर देते हैं। लेकिन यह न केवल अनावश्यक है, बल्कि बेवकूफी भी है।

स्थायित्व की कमी: काम के प्रति जुनून लंबे समय तक टिक नहीं पाता। जब बर्नआउट आता है, तो यह और भी ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है।

अकुशलता: जुनूनी लोग कुशल होने के तरीके नहीं खोजते, क्योंकि उन्हें ज्यादा काम करना पसंद है। वे समस्याओं का समाधान करने के बजाय उन्हें और जटिल बना देते हैं।

अहंकार और अपराध बोध: वे उन लोगों को असहज महसूस कराते हैं जो उचित घंटों तक काम करते हैं, जिससे हर जगह अपराध बोध और खराब मनोबल पैदा होता है।

खराब निर्णय: जब आप थके होते हैं, तो आप सही निर्णय नहीं ले पाते। आपकी निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है।

असली हीरो वह है जो काम को जल्दी खत्म करने का तरीका खोज लेता है, न कि वह जो देर तक काम करता है।

कम भार का सिद्धांत

एक स्टार्टअप एक जहाज की तरह है। जितना कम भार होगा, उतनी ही तेजी से आप दिशा बदल पाएँगे। दीर्घकालिक अनुबंध, अतिरिक्त कर्मचारी, स्थायी निर्णय, और बेवजह की बैठक ये सभी भार हैं। जब आप छोटे होते हैं, तो आप सबसे तेज़ होते हैं। इस समय का उपयोग करें और इन भारों से बचें।

छोटी टीमें, सीमित संसाधन, और बाधाएं रचनात्मकता को जन्म देती हैं। शेक्सपियर ने सॉनेट्स की सीमाओं में अपनी कला को निखारा, और अर्नेस्ट हेमिंग्वे ने सरल भाषा से गहरा प्रभाव डाला। अपनी "कमी" को अपनी ताकत बनाये।

शाश्वत मूल्य: जो कभी नहीं बदलता

बहुत से स्टार्टअप नवीनतम रुझानों और तकनीक पर ध्यान केंद्रित करते हैं। लेकिन फैशन फीका पड़ जाता है। आपका व्यवसाय उन चीजों पर आधारित होना चाहिए जो कभी नहीं बदलेगी। अमेज़ॅन मुफ्त शिपिंग, बढ़िया चयन और सस्ती कीमतों पर ध्यान केंद्रित करता है। जापानी ऑटोमेकर विश्वसनीयता और व्यावहारिकता पर ध्यान देते हैं। ये ऐसे मूल्य हैं जिनकी मांग हमेशा रहेगी।

अपने आप से कुछ महत्वपूर्ण सवाल पूछें:

आप यह क्यों कर रहे हैं? क्या आप किसी और के कहने पर काम कर रहे हैं? आप कौन सी समस्या हल कर रहे हैं? क्या यह कोई वास्तविक समस्या है या सिर्फ़ एक कल्पना? क्या यह वास्तव में उपयोगी है? क्या आप जो बना रहे हैं वह ग्राहकों के लिए मूल्यवान है? क्या कोई आसान तरीका है? क्या आप किसी चीज़ को बहुत जटिल तो नहीं बना रहे हैं? क्या यह इसके लायक है? क्या यह मीटिंग, देर रात का काम, या किसी प्रतिस्पर्धी की चिंता करना वास्तव में लायक है?

इन सवालों के जवाब आपको सही रास्ते पर बनाए रखेंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि आप केवल काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि मूल्यवान काम कर रहे हैं।

उद्यमिता की शुरुआत

मित्रो! पिछले मेरे विचारों को पढ़कर आप यह समझ चुके होंगे कि एक सफल उद्यमी बनने के लिए कौन से गुण आवश्यक है। यह किसी सिंहासन पर बैठने जैसा है, जहाँ हर पुतली आपसे पूछती है कि क्या आप राजा बनने के योग्य हैं। ठीक उसी तरह, आपको भी अपनी उद्यमी यात्रा तभी शुरू करनी चाहिए, जब आप में वे शुरुआती गुण विकसित हो चुके हों। यदि आप अब तक इसे पढ़ते रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप अपने सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं।

तो चलिए, हम इस रोमांचक यात्रा के पहले कदम को समझते हैं: "छोटी शुरुआत करें।"

छोटी शुरुआत, बड़ा सपना

जब भी कोई नया उद्यमी मुझसे मिलता है, तो मैं देखता हूं कि वह अपने आइडिया से पूरे सेक्टर को बदलने का इरादा रखता है। उन्हें लगता है कि उनका विचार दुनिया में सबसे अनोखा है, और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। यह स्वाभाविक है। हम ऐसे समाज में रहते हैं जहां बड़ा और ज्यादा होना ही बेहतर माना जाता है। लेकिन, जैसा कि कहावत है: "थिंक ग्लोबल, एक्ट लोकल।" हमें सोच बड़ी रखनी चाहिए, पर शुरुआत छोटे से ही करनी चाहिए।

आज हम जिन बड़ी-बड़ी कंपनियों को देखते हैं, चाहे वह ज़ोमैटो हो या फेसबुक, उनकी शुरुआत एक छोटे से कमरे से हुई थी, न कि नोटों के पहाड़ से। रिलायंस, निरमा, पेटीएम, इंफोसिस जैसी कंपनियों की नींव भी बहुत छोटे स्तर पर रखी गई थी। एक अच्छे विचार को छोड़ देने की बजाय, उसे छोटे स्तर पर शुरू करना हमेशा सरल होता है।

"कुछ किए बिना ही जय-जयकार नहीं होती, कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।"

अपनी समस्या को खुद हल करें: हीरो की यात्रा

एक बेहतरीन उत्पाद या सेवा बनाने का सबसे सीधा तरीका है, कुछ ऐसा बनाना जिसे आप खुद इस्तेमाल करना चाहते हैं। जब आप अपनी समस्या का समाधान करते हैं, तो आपको पता होता है कि सही क्या है और गलत क्या। जेम्स डायसन ने अपने घर के वैक्यूम क्लीनर की समस्या को हल किया और दुनिया का पहला बैगलेस वैक्यूम क्लीनर बनाया। विक फ़र्थ ने आर्केस्ट्रा में बेहतर ड्रमस्टिक की जरूरत महसूस की और ड्रमस्टिक मार्केट का 62% हिस्सा अपने नाम कर लिया। बिल बोवरमैन ने अपनी टीम के लिए हल्के रनिंग शूज बनाए और नाइकी के प्रसिद्ध वफ़ल सोल का जन्म हुआ।

इन लोगों ने अपनी खुद की जरूरत को पूरा किया और एक बड़े बाजार को खोला। जब आप अपनी समस्या को हल करते हैं, तो आप अपने काम से प्यार करने लगते हैं। यह कोई विकल्प नहीं है, बल्कि सफलता का पहला मंत्र है।

सिर्फ़ विचार नहीं, कर्म मायने रखता है

आपकी सबसे बड़ी गलती यह हो सकती है कि आप सिर्फ़ एक विचार को लेकर बैठे रहे और सोचते हैं कि अगर आपने उस पर काम किया होता, तो आप अरबपति होते। विचारों का कोई मौद्रिक मूल्य नहीं होता।

दिग्गज फिल्म निर्माता स्टेनली कुब्रिक ने महत्वाकांक्षी फिल्म निर्माताओं से कहा था: "एक कैमरा और कुछ फिल्म लें और किसी भी तरह की फिल्म बनाएं।" उनका मतलब था, सिर्फ़ सोचना बंद करो और काम करना शुरू करो। सबसे महत्वपूर्ण बात है शुरू करना।

अगर आप सोचते हैं कि आपके पास पर्याप्त समय नहीं है, तो आप अपने सपनों से भाग रहे हैं। आपको अपनी नौकरी छोड़ने की ज़रूरत नहीं है। बस हर दिन टीवी देखने या सोशल मीडिया पर समय बिताने के बजाय, अपने विचार पर कुछ अतिरिक्त घंटे काम करें। अगर आप किसी चीज़ को सच में पाना चाहते हैं, तो आप उसके लिए समय निकाल ही लेते हैं। सही समय कभी नहीं आता।

गति और प्रेरणा: सफलता का ईंधन

गति प्रेरणा को बढ़ाती है। जब आप अपने काम को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटते हैं और छोटी-छोटी जीत हासिल करते हैं, तो यह आपको आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है। एक साल का लंबा प्रोजेक्ट बोरिंग हो सकता है, लेकिन हर दो हफ्ते में कुछ नया घोषित करना उत्साह और ऊर्जा भर देता है।

छोटे लक्ष्य: खुद से पूछें, "हम दो हफ्ते में क्या कर सकते हैं?" और फिर उसे पूरा करें।

तेज़ी से लॉन्च करें: जितनी जल्दी हो सके अपने उत्पाद को ग्राहकों के हाथों में पहुँचाएँ। उनका फीडबैक और उत्साह आपकी यात्रा को गति देगा।

हार मानने की हिम्मत और नकल से बचें

कई बार हीरो बनने से बेहतर हार मान लेना होता है। अगर कोई काम बहुत ज्यादा समय ले रहा है और आप उसमें फंसे हुए हैं, तो उसे छोड़ देना ही समझदारी है। खराब काम के बाद अच्छा समय बर्बाद न करें। एक उद्यमी के रूप में आपको यह सीखने की ज़रूरत है कि कब हार माननी है और कब आगे बढ़ना है।

नकल करना भी एक बड़ी गलती है। जब आप किसी और की नकल करते हैं, तो आप केवल बाहरी रूप की नकल करते हैं, आंतरिक समझ को खो देते हैं। आप हमेशा पीछे रहते हैं और कभी नेतृत्व नहीं कर पाते। प्रेरित हों, पर चोरी न करें।

यह यात्रा आसान नहीं है, लेकिन अगर आप इन सिद्धांतों का पालन करते हैं, तो आप सफलता की ओर बढ़ेंगे और अपनी एक अनूठी कहानी बनाएंगे। क्या आप इस साहसिक यात्रा के लिए तैयार हैं?

उद्यमिता की शुरुआत

दोस्तों, पिछले मेरे विचारों को पढ़कर आप यह तो समझ ही गए होंगे कि उद्यमी बनने के लिए केवल एक अच्छा विचार होना ही काफी नहीं है, बल्कि उसके लिए एक विशेष मानसिकता और गुण भी चाहिए। यह एक ऐसी यात्रा है जो हर किसी के लिए नहीं है, लेकिन अगर आपके भीतर वह चिंगारी है, जो आपको चैन से सोने नहीं देती, तो समझिए कि आपका इस दुनिया में स्वागत है।

ज्ञान का भ्रम

उद्यमिता की शुरुआत करने से पहले एक आम सवाल उठता है: "क्या मेरे पास पर्याप्त ज्ञान है?" इस सवाल का जवाब देने के लिए हमें उन लोगों की कहानियों को देखना होगा, जो आज सफल हो चुके हैं। लिंक्डइन की 2023 की टॉप-20 स्टार्टअप लिस्ट को देखें तो, पहले स्थान पर ज़ीप्टो के सह-संस्थापक आदित पालिचा हैं, जिन्होंने गणित और कंप्यूटर विज्ञान में डिप्लोमा किया। दूसरे पर ब्लूस्मार्ट के पुनीत गोयल, जिनके पास अंतर्राष्ट्रीय व्यापार और बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में डिग्री है। और तीसरे पर डिट्टो इंश्योरेंस के पवन कुमार राय, जिनकी पृष्ठभूमि विविध है।

यह दर्शाता है कि सफलता के लिए किसी विशेष ज्ञान या डिग्री की आवश्यकता नहीं है। यदि आपके पास एक विचार है जो आपको सोने नहीं देता, तो यही आपकी सबसे बड़ी योग्यता है।

स्टीव जॉब्स का मंत्र: "भूखे रहो, मूर्ख बने रहो" एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स ने अपनी जीवनी में कुछ ऐसे मंत्र दिए हैं, जो हर उद्यमी को प्रेरित करते हैं:

अपने काम से प्यार करो: "अगर आपका महान कार्य करने का सपना है तो एक ही तरीका है, जो भी काम करें उससे जी भर प्यार करे।"

अपना जीवन जियो: "आपके पास समय कम है, इसे किसी और की जिंदगी जी कर बर्बाद मत करो।"

हमेशा सीखते रहो: उनका प्रसिद्ध वाक्य था, "स्टे हंगरी, स्टे फूलिश।" इसका मतलब है, हमेशा सीखने के लिए भूखे रहो और नई चीजें जानने के लिए मूर्ख बने रहो।

अलग सोचो: उन्होंने हमेशा "थिंक डिफरेंट" पर जोर दिया, क्योंकि भीड़ से अलग सोचना ही नवाचार को जन्म देता है।

जोखिम और जिम्मेदारी

भारत आज अमेरिका और चीन के बाद स्टार्टअप का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है। लेकिन सफल होने के लिए सिर्फ एक विचार नहीं, बल्कि आत्मविश्वास और जोखिम उठाने की क्षमता चाहिए। लोग अक्सर सलाह देते हैं कि पहले किसी कंपनी में काम करके अनुभव लो, लेकिन यह रास्ता भी खतरों से भरा है। जब आप नौकरी करते हैं, तो जिम्मेदारियाँ बढ़ जाती हैं और फिर अपना काम शुरू करना और भी मुश्किल हो जाता है।

सफलता का कोई नक्शा या फॉर्मूला नहीं होता। हर उद्यमी की यात्रा अलग होती है, क्योंकि उनकी परिस्थितियाँ और लक्ष्य अलग होते हैं। आपको दूसरों के अनुभव और सलाह से सीखना चाहिए, लेकिन अंतिम निर्णय स्वयं लेना चाहिए। कोई भी जोखिम न उठाना ही सबसे बड़ा जोखिम होता है। इसलिए, अपनी अंतरात्मा की सुनो, जोखिम उठाओ और अपनी यात्रा शुरू करो।

स्टार्टअप की विफलता के कारण

हर उद्यमी का सपना होता है अपने स्टार्टअप को एक यूनिकॉर्न बनाना, लेकिन कड़वी सच्चाई यह है कि दस में से नौ स्टार्टअप तीन साल के भीतर विफल हो जाते हैं। विफलता कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है, बल्कि यह एक रिपल इफेक्ट है। यह तब शुरू होता है जब कंपनी की किसी एक प्रणाली में गड़बड़ी होती है, जो धीरे-धीरे फैलकर पूरे संगठन को प्रभावित करती है, और अंत में कंपनी के अस्तित्व पर ही संकट आ जाता है।

फॉर्च्यून पत्रिका के एक सर्वेक्षण के अनुसार, स्टार्टअप की विफलता के पीछे कई कारण होते हैं:

बाज़ार की ज़रूरत का अभाव (42%): कोई आपके उत्पाद या सेवा को खरीदना ही नहीं चाहता। पैसे की कमी (29%): नकदी खत्म हो जाती है, और बिना नकदी के कोई भी व्यवसाय नहीं चल सकता। टीम में तालमेल की कमी (23%): सह-संस्थापकों के बीच विवाद और मनमुटाव। कठिन प्रतिस्पर्धा (19%): बाज़ार में टिक नहीं पाना।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि विफलता किसी एक कारण से नहीं होती, बल्कि कई कारकों का एक खतरनाक मिश्रण होती है।

असफल स्टार्टअप की कहानियाँ

आइए, कुछ असफल स्टार्टअप्स की कहानियों पर एक नजर डालें, जो हमें दिखाती हैं कि कैसे ये कारण वास्तविक जीवन में काम करते हैं:

ग्रीनिक (Greenikk): यह एग्रीटेक स्टार्टअप इसलिए बंद हो गया क्योंकि यह उत्पाद-बाज़ार में अपनी जगह नहीं बना सका और बढ़ते घाटे के कारण कार्यशील पूंजी की समस्या से जूझने लगा।

ब्लू लर्न (Blue Learn): यह एडटेक प्लेटफॉर्म तेज विकास हासिल करने में असफल रहा, जिसके कारण अंततः बंद हो गया।

गोल्डपे (GoldPe): यह फिनटेक स्टार्टअप दोषपूर्ण बिजनेस मॉडल और नकदी संकट का शिकार हो गया।

कू (Koo): यह माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म फंड जुटाने में विफल रहा और बढ़ते घाटे के कारण बंद हो गया।

इन सभी कहानियों से यह स्पष्ट होता है कि सिर्फ़ फंडिंग होना ही सफलता की गारंटी नहीं है। बल्कि, ज्यादा फंडिंग के साथ ज्यादा बड़ी समस्याएँ भी आती हैं। जैक मा ने सही कहा था, "जब आपके पास एक मिलियन डॉलर है तो आप एक भाग्यशाली व्यक्ति हैं, लेकिन जब आपके पास दस मिलियन डॉलर है तो आप संकट में हैं, बहुत बड़ा सर दर्द।"

सीखने की कला

समाज में तीन तरह के लोग होते हैं:

वे जो दूसरों की गलतियों से सीखते हैं। वे जो खुद गलतियाँ करके सीखते हैं, और उन्हें दोहराते नहीं हैं। वे जो न दूसरों की गलतियों से सीखते हैं और न अपनी।

आप किस तरह के उद्यमी हैं? एक सफल उद्यमी हमेशा दूसरों की गलतियों से सीखता है, क्योंकि खुद गलतियां करके सीखने के लिए एक जीवन कम पड़ जाता है। यही कारण है कि दुनिया के सबसे सफल लोग, जैसे एलोन मस्क, बिल गेट्स, और वॉरेन बफे, किताबें पढ़ने पर जोर देते हैं।

एलोन मस्क ने कम उम्र में ही पूरा एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका पढ़ लिया था। बिल गेट्स हर साल लगभग 50 किताबें पढ़ते हैं। वॉरेन बफे हर दिन अनेकों पेज पढ़ते थे।

वे जानते हैं कि ज्ञान ही असली शक्ति है। आजकल एआई एप्स और टूल्स के कारण ज्ञान आपकी उंगलियों पर उपलब्ध है। आप परप्लेक्सिटी और चैटजीपीटी जैसे एआई टूल्स का उपयोग कर सकते हैं, जो आपके सवालों के सटीक और विश्वसनीय जवाब देते हैं।

अपना रास्ता खुद चुने

सफलता का कोई निश्चित फॉर्मूला नहीं होता। हर व्यक्ति की यात्रा अलग होती है, और उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपनी रणनीति खुद चुननी होती है। जोखिम न उठाना ही सबसे बड़ा जोखिम होता है। इसलिए, दूसरों की सलाह सुनें, उनसे सीखे, लेकिन अपने निर्णय स्वयं लें।

क्योंकि जैसा कि श्रीकृष्ण ने गीता में कहा था, "यथेच्छसि तथा कुरू" (जैसी तेरी इच्छा हो वैसा तुम करो)। यह उद्यमिता का सार है। अपनी यात्रा शुरू करें, और अपनी कहानी खुद लिखें। यह हर उद्यमी के लिए सबसे महत्वपूर्ण सलाह है। 

मानस पुत्र का बीजारोपण एवं जन्म

मित्रों, जब उद्यमिता का कीड़ा किसी के मन में प्रवेश करता है, तो फिर उसका जीवन पहले जैसा नहीं रहता। यह कोई सामान्य विचार नहीं, बल्कि एक जुनूनी, बेचैन करने वाली धुन है जो हर पल, हर जगह, आपके साथ रहती है। आप उठते-बैठते, सोते-जागते, दोस्तों के साथ बातचीत करते हुए भी चारों ओर स्टार्टअप के विचारों को तैरते हुए महसूस करते हैं। यह एक ऐसी अवस्था है जहाँ आप शारीरिक रूप से तो वहाँ मौजूद होते हैं, पर आपका मन किसी और ही दुनिया में खोया रहता है।

आप अपने मित्र से बात कर रहे होते हैं, और वह आपकी आँखों में शून्य भाव देखकर तुरंत समझ जाता है कि आप मानसिक रूप से कहीं और हैं। यह प्रतिक्रिया जानबूझकर नहीं होती, बल्कि अनजाने में ही चलती रहती है। आपका मन पर से नियंत्रण हट जाता है, और यही जुनून आपको एक उद्यमी बनाता है। यह वही जुनूनी कीड़ा है जो एक बार काट ले, तो आप इसके वश में हो जाते हैं। यह एक ऐसा स्वप्न है जो आपको सोने नहीं देता। और इसी विचारों के सागर से, आपको अपने मानस पुत्र का चयन करना होता है।

नामकरण संस्कार एवं पंजीकरण का यज्ञ

जब आप अपने मानस पुत्र (विचार) को चुन लेते हैं, तो उसकी आत्मा को भौतिक रूप देने का समय आता है। इस प्रक्रिया का पहला कदम है नामकरण। आप अपने मानस पुत्र के लिए एक ऐसा नाम चुनते हैं जो अद्वितीय हो, काम से जुड़ा हो, बोलने में सरल हो और सुनने में मधुर हो। यह नाम केवल एक शब्द नहीं, बल्कि आपके व्यवसाय की पहचान और उसके भविष्य का प्रतीक होता है। नाम तय करने के बाद, आप अपनी कंपनी सचिव के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करते हैं कि यह नाम डोमेन और कंपनी रजिस्ट्रेशन के लिए उपलब्ध है। जैसे मैंने अपने मानस पुत्र का नाम इलेक्ट्रॉनिक्स फार्मिंग सलूशन एसोसिएट्स [ई-फसल ] प्राइवेट लिमिटेड नाम रखा। 

पंजीकरण का यज्ञ

यह वह यज्ञ है जहाँ आपके मानस पुत्र को एक कानूनी पहचान मिलती है। भारत सरकार के कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (Ministry of Corporate Affairs) के साथ विभिन्न दस्तावेज जमा करके, आप अपने विचार को एक जीवित कानूनी इकाई का रूप देते हैं। यह प्रक्रिया स्टार्टअप को एक नई कानूनी पहचान प्रदान करती है, जिसे कानून के तहत एक व्यक्ति के रूप में मान्यता दी जाती है। मैने इलेक्ट्रॉनिक्स फार्मिंग सलूशन एसोसिएट्स [ई-फसल ] प्राइवेट लिमिटेड नाम रखा। इसे पंजीकृत करवाया तथा इस नाम का डोमेन लिया। 

स्टार्टअप इंडिया में मान्यता: सफलता का पहला मुकाम

आपके स्टार्टअप के पंजीकरण के बाद, अगला महत्वपूर्ण कदम है इसे स्टार्टअप इंडिया के साथ पंजीकृत करना। यह एक सरल ऑनलाइन प्रक्रिया है जो आपके स्टार्टअप को सरकार द्वारा दी जाने वाली विभिन्न योजनाओं और लाभों से जोड़ती है।

चरण 1: अपने व्यवसाय को निगमित करें: सबसे पहले, आपको अपने व्यवसाय को प्राइवेट लिमिटेड कंपनी, पार्टनरशिप फर्म या सीमित देयता भागीदारी (LLP) के रूप में पंजीकृत करना होगा।

चरण 2: स्टार्टअप इंडिया के साथ रजिस्टर करें: स्टार्टअप इंडिया की वेबसाइट पर जाएँ और अपनी प्रोफ़ाइल बनाएँ।

चरण 3: डीपीआईआईटी (DPIIT) से मान्यता प्राप्त करें: यह मान्यता आपके स्टार्टअप को कई लाभ देती है, जैसे:

टैक्स में छूट: लगातार 3 साल तक आयकर से छूट।

सरकारी खरीद में प्राथमिकता: सरकारी टेंडरों में छूट।

स्व-प्रमाणन: श्रम और पर्यावरण कानूनों के तहत स्व-प्रमाणन की सुविधा।

फंडिंग तक पहुँच: स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम जैसी योजनाओं का लाभ।

यह मान्यता प्रक्रिया आपके स्टार्टअप की विश्वसनीयता को बढ़ाती है और उसे विकास के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करती है।

व्यक्तित्व का निर्माण: लोगो और ब्रांड का जन्म

पंजीकरण के बाद, आपके स्टार्टअप के व्यक्तित्व का निर्माण होता है। यह सिर्फ एक नाम और एक कानूनी पहचान नहीं, बल्कि एक आत्मा है जिसे दुनिया पहचानती है। इस आत्मा को एक अद्वितीय पहचान देने के लिए, आप अपनी कंपनी के लोगों का पंजीकरण ट्रेडमार्क के तहत करते हैं।

ट्रेडमार्क की खोज: सबसे पहले यह सुनिश्चित करें कि आपका नाम, ब्रांड या लोगो पहले से पंजीकृत न हो।

आवेदन: ट्रेडमार्क कार्यालय में आवेदन जमा करें।

वैधता: आवेदन स्वीकार होने के बाद, आपके लोगो और ब्रांड को 10 साल की वैधता मिलती है।

आपका लोगो और ब्रांड आपकी कंपनी के चरित्र को दर्शाते हैं। शब्दों का चयन, रंगों का चयन और डिज़ाइन ये सभी मिलकर आपके स्टार्टअप की कहानी कहते हैं। यह वह पहचान है जो ग्राहक आपके उत्पाद और सेवाओं से जोड़ते हैं। एक साधारण, यादगार और आकर्षक लोगो ही आपके ब्रांड को भीड़ से अलग करता है। जब हम ई-फसल का लोगो डिजाइन कर रहे थे तब इन सब बातों का ध्यान रखा था। इसलिए जब आप ई-फसल का लोगो देखा कर कम्पनी की पर्सनालिटी का अन्दाज लगा सकते है।  

तो इस तरह, एक अमूर्त विचार आपके भीतर जन्म लेता है, एक जुनून बनकर बढ़ता है, और अंत में पंजीकरण के इस यज्ञ से गुजरकर एक ठोस, कानूनी और पहचान-युक्त इकाई बन जाता है। अब यह मानस पुत्र दुनिया का सामना करने और अपनी किस्मत खुद लिखने के लिए तैयार है।

अभी काम स्टार्ट करो

मित्रों, विचार और अनुभूतियाँ इस ब्रह्मांड में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगों की तरह हमेशा मौजूद रहती हैं। हमारा मस्तिष्क इन तरंगों को ग्रहण करता है और उन्हें एक विचार में बदल देता है। जिस विचार पर हमारी ऊर्जा लगती है, वह कर्म बन जाता है, और जो कर्म बार-बार किया जाता है, वह आदत बन जाता है। यही आदत हमारे संस्कारों का निर्माण करती है।

विचार को कर्म में बदलने के लिए प्रेरणा की आवश्यकता होती है, लेकिन प्रेरणा एक ताजे फूल की तरह है जिसकी एक समाप्ति तिथि होती है। अगर आप अपने स्टार्टअप के विचार पर तुरंत काम नहीं करते हैं, तो प्रेरणा कुछ दिनों बाद नष्ट हो जाएगी। जब कोई विचार आता है, तभी आपकी ऊर्जा अपने चरम पर होती है। प्रेरणा जादू की तरह है; यह आपको प्रेरित करती है और आपकी उत्पादकता को कई गुना बढ़ा देती है, लेकिन यह आपका इंतजार नहीं करती। इसे अभी पकड़ना होता है।

स्टार्टअप्स के लिए गुणवत्तापूर्ण साझेदार

स्टार्टअप की सफलता के लिए एक मजबूत साझेदारी बहुत महत्वपूर्ण है। कहावत है, "शुरुआत अच्छी हो तो सब अच्छा होता है," और यही नियम साझेदारी पर भी लागू होता है। अपने साझेदार का चयन करते समय भावुक न हों। क्षमता और अनुकूलता शैक्षणिक योग्यता से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है। ऐसे व्यक्ति को चुनें जिसके पास अनुभव हो, जिसके विचार आपसे मिलते हों, और जिस पर आप भरोसा कर सकें। बेहतर होगा कि आप रिश्तेदारों या दोस्तों के साथ साझेदारी से बचें, क्योंकि इससे निजी संबंध खराब हो सकते हैं। हमने अपने साझेदार बहुत सोच समझ कर चुने और जो ठीक नहीं लगे उन्हें साझेदारी से बाहर कर दिया। 

एक अकेले उद्यमी के लिए सब कुछ करना संभव नहीं है। आपको यह समझना होगा कि आपके पास क्या कौशल है और कौन से कौशल की आपको आवश्यकता है। फिर, उन भूमिकाओं के लिए ऐसे लोगों को आकर्षित करें जो आपके पूरक बन सकें। शुरुआत में आपके पास न तो संसाधन होंगे और न ही सफलता, इसलिए इस चरण में आपका सपना ही आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। इसे एक आकर्षक कहानी के रूप में पेश करें ताकि लोग आपके साथ जुड़ना चाहें।

स्टार्टअप का बिजनेस प्लान

एक बिजनेस प्लान आपके स्टार्टअप के लिए एक नक्शे की तरह होता है। यह एक ऐसा दस्तावेज है जो आपके लक्ष्यों, रणनीतियों और योजनाओं को स्पष्ट रूप से दर्शाता है। यह न केवल संभावित निवेशकों को आकर्षित करने में मदद करता है, बल्कि आपकी टीम को भी सही दिशा दिखाता है।

एक अच्छे बिजनेस प्लान में ये घटक होने चाहिए:

कार्यकारी सारांश: आपके व्यवसाय का संक्षिप्त विवरण, उसके उद्देश्य और लक्ष्यों के साथ।

बाजार विश्लेषण: आपके लक्षित बाजार, प्रतिस्पर्धियों और बाजार में आपकी स्थिति का विश्लेषण।

उत्पाद और सेवाएँ: आपके द्वारा प्रदान किए जाने वाले उत्पाद या सेवाओं का विवरण।

विपणन योजना: आपके उत्पाद को बढ़ावा देने और बेचने की रणनीति।

वित्त योजना: आपके व्यवसाय के लिए धन, आय और व्यय का अनुमान।

मार्केटिंग प्लान

आज के युग में, किसी भी स्टार्टअप की सफलता के लिए एक प्रभावी मार्केटिंग प्लान होना आवश्यक है। शुरुआत में आप सोशल मीडिया का उपयोग करके कम खर्च में मार्केटिंग कर सकते हैं।

मार्केटिंग प्लान बनाने के लिए:

लक्ष्य निर्धारित करें: तय करें कि आप मार्केटिंग से क्या हासिल करना चाहते हैं, जैसे ब्रांड जागरूकता बढ़ाना या बिक्री बढ़ाना।

लक्षित ग्राहक पहचानें: अपने लक्षित ग्राहकों की आयु, लिंग, आय और रुचियों को समझें।

रणनीति विकसित करें: सोशल मीडिया मार्केटिंग, ईमेल मार्केटिंग, और ऑनलाइन विज्ञापन जैसी रणनीतियों का उपयोग करें।

नियमित निगरानी: अपनी मार्केटिंग रणनीति की प्रगति को नियमित रूप से ट्रैक करें और आवश्यकतानुसार बदलाव करें।

एक मजबूत बिजनेस प्लान और मार्केटिंग प्लान के साथ, हम भी ई-फसल स्टार्टअप सफलता की राह पर चलने के लिए तैयार थे ।

स्टार्टअप की दुनिया के मिथक

स्टार्टअप की दुनिया में, जहाँ हर कोई सफलता का मंत्र बेचने को तैयार है, वहाँ सच्चाई और भ्रम के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। इंक्यूबेशन सेंटर, मेंटोर, और ढेरों ऑनलाइन कोर्स उपलब्ध हैं, लेकिन विडंबना यह है कि अक्सर "जो बिजनेस नहीं करता, वही बिजनेस सिखाता है"। यही कारण है कि स्टार्टअप की दुनिया में बहुत सारे मिथक फैल गए हैं।

आइये, कुछ सबसे बड़े मिथकों को तोड़ते हैं:

मिथक 1: आपको एक शानदार विचार की ज़रूरत है

बहुत से लोग सोचते हैं कि एक सफल स्टार्टअप के लिए एक ऐसा विचार चाहिए जो पहले कभी न सोचा गया हो। यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। सच्चाई तो यह है कि कई सफल स्टार्टअप किसी नए विचार पर आधारित नहीं होते, बल्कि किसी मौजूदा समस्या को बेहतर तरीके से हल करने पर आधारित होते हैं। गूगल से पहले भी वेब सर्च इंजन थे। एयरबीएनबी से पहले भी लोग काउच-सर्फिंग करते थे। एप्पल ने माउस, एमपी3 प्लेयर और स्मार्टफोन जैसे मौजूदा विचारों को लेकर उन्हें और भी बेहतर बनाया। जैसा कि एप्पल के डिजाइन लीड जोनाथन आइव ने कहा था, "अलग होना बहुत आसान है, लेकिन बेहतर होना बहुत मुश्किल है।"

मिथक 2: आपको एक बेहतरीन योजना की ज़रूरत है

एक स्टार्टअप अनिश्चितता के माहौल में काम करता है। ग्राहक की पसंद, बाज़ार की स्थिति, और प्रतिस्पर्धी ताकतें पल-पल बदलती रहती हैं। इसलिए, एक कठोर योजना पर टिके रहना आत्मघाती हो सकता है। आपको लचीला और अनुकूलन योग्य होने की ज़रूरत है। एक "लीन स्टार्टअप" पद्धति का पालन करें, जिसमें एक न्यूनतम व्यवहार्य उत्पाद (MVP) बनाकर बाजार में उसका परीक्षण करना और ग्राहकों की प्रतिक्रिया के आधार पर उसमें सुधार करना शामिल है।

मिथक 3: आपको बहुत सारा पैसा चाहिए

एक और आम गलतफहमी यह है कि स्टार्टअप के लिए ढेर सारी पूंजी की जरूरत होती है। जबकि कुछ व्यवसायों को पूंजी की आवश्यकता हो सकती है, कई अन्य अपने स्वयं के धन से (बूटस्ट्रैपिंग) भी सफल हो सकते हैं। आज, ऐसे कई बूटस्ट्रैप्ड स्टार्टअप हैं जो यूनिकॉर्न बन गए हैं, जबकि कई मिलियन डॉलर की फंडिंग वाले स्टार्टअप विफल हो गए। यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने उपलब्ध संसाधनों का प्रबंधन कैसे करते हैं।

मिथक 4: 24/7 काम करने से ही सफलता मिलती है

स्टार्टअप की दुनिया में यह धारणा प्रचलित है कि सफल होने के लिए दिन-रात काम करना पड़ता है। लेकिन यह सच नहीं है। अधिक काम करने से बर्नआउट, तनाव और थकान हो सकती है, जिससे आपकी उत्पादकता और रचनात्मकता कम हो जाती है। काम और जीवन के बीच संतुलन बनाना बहुत ज़रूरी है। एलोन मस्क जैसे सफल उद्यमी भी कड़ी मेहनत करते हैं, लेकिन वे अपने स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण को भी प्राथमिकता देते हैं।

मिथक 5: रातों-रात सफलता का सपना

यह सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक मिथक है। रातों-रात सफलता केवल एक सपना है। ट्विटर, ड्रॉपबॉक्स, इंस्टाग्राम, फ्लिपकार्ट, ज़ोमैटो और फेसबुक जैसे सफल व्यवसायों को आज की स्थिति तक पहुँचने में वर्षों लगे। सफलता कोई मंज़िल नहीं, बल्कि एक यात्रा है, जहाँ धीमा और स्थिर दृष्टिकोण अपनाना ही सबसे अच्छा तरीका है।

राम और पांडवों के उदाहरणों से पता चलता है कि एक सफल टीम बनाना कितना महत्वपूर्ण है। राम ने रावण से युद्ध के लिए लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण और जामवंत जैसे सहयोगियों की एक टीम बनाई। इसी तरह, पांडवों की टीम में कृष्ण मेंटोर थे, अर्जुन गोल अचीवर्स थे, भीम एचआर थे, युधिष्ठिर वित्त संभालते थे, और नकुल-सहदेव बिक्री और विपणन का काम करते थे।

उद्यमिता की यात्रा में, तीन कौशल सबसे महत्वपूर्ण है:

बिक्री और विपणन (Sales & Marketing): आपको अपने विचार को बेचना आना चाहिए।

नेटवर्किंग: आपको सही लोगों से जुड़ना आना चाहिए।

अध्ययन: आपको अपने क्षेत्र का गहरा ज्ञान होना चाहिए।

एक नेता पैदा नहीं होता, बल्कि बनता है। यह यात्रा 10,000 घंटे के विशेषज्ञ ज्ञान, सही टीम निर्माण, मजबूत सिस्टम और सबसे महत्वपूर्ण, धैर्य के साथ शुरू होती है।

​​ई-फसल: एक अधिकारी का सपना और एक उद्यमी की गाथा

मुख्यमंत्री जी का प्रस्ताव अस्वीकार करने के बाद, मेरे सामने एक ही रास्ता था अपने सपने को खुद साकार करना। यह मेरे लिए सिर्फ नौकरी बदलने का फैसला नहीं था, बल्कि जीवन के उस अगले पड़ाव की ओर कदम बढ़ाना था, जहाँ मेरा जुनून मेरी दिशा तय करने वाला था। मैंने कृषि क्षेत्र में एक स्टार्टअप बनाने का निश्चय किया।

एक नई दुनिया का विद्यार्थी

सरकारी सेवा की दुनिया से निकलकर मैं एक बिलकुल नए और अज्ञात क्षेत्र में कदम रख रहा था। मुझे एहसास था कि सफल होने के लिए मुझे एक विद्यार्थी की तरह सीखना होगा। मैंने स्टार्टअप के बारे में समझ विकसित करने के लिए हर संभव प्रयास किया। आयोजित होने वाले हर प्रोग्राम में हिस्सा लिया, हर सेमिनार और वर्कशॉप में पहुंचा। इस क्षेत्र के लोगों से जान-पहचान बढ़ाई और उनके अनुभवों से सीखा।

मेरा अध्ययन सिर्फ स्टार्टअप तक सीमित नहीं था। मैंने कृषि क्षेत्र के दिग्गजों, जैसे ITC, गोदरेज एग्रोवेट, इफको और कोरोमंडल, के व्यापार करने की रणनीतियों को समझने के लिए गहन भ्रमण किया। मैंने उनके अधिकारियों और कर्मचारियों से मुलाकात की और उनसे यह जानने की कोशिश की कि वे किसानों और व्यापारियों के साथ कैसे काम करते हैं। यह यात्रा मेरे लिए एक शोध से कम नहीं थी, जिसने मेरे बिज़नेस मॉडल की नींव रखी।

जब सपना एक बिजनेस मॉडल बना

इन सभी अनुभवों और ज्ञान को मिलाकर, मैंने धीरे-धीरे अपने 'ई-फसल' के बिजनेस मॉडल को आकार दिया। यह मॉडल एक ऐसी व्यवस्था बनाने के लिए था जो किसानों और बाज़ार के बीच सीधा और पारदर्शी संबंध स्थापित कर सके।

मेरे पास एक विचार था, लेकिन उसे वैधता की मुहर लगवाना बाकी था। मैं अपने मॉडल को लेकर आईआईटी मुंबई के इंक्यूबेशन सेंटर, 'साईन' में पहुंचा। वहाँ मैंने अपने मॉडल को विस्तार से प्रस्तुत किया। उन्होंने मेरे विज़न और बिजनेस मॉडल को समझा और उसे अनुमोदित किया। यह मेरे लिए एक बड़ा आत्मविश्वास था, जिसने मेरे सपने को हकीकत में बदलने की पहली आधिकारिक अनुमति दे दी।

हमने एक सरल और इंटरैक्टिव वेबसाइट के साथ अपनी यात्रा शुरू की। पहले चरण में, हमने कृषि उत्पादों की खरीद-बिक्री पर ध्यान केंद्रित किया। हमने संतरे, मूंग, मक्का, सोयाबीन, धनिया, मेथी, आलू, प्याज, कद्दू, और लहसुन जैसे उत्पादों का व्यापार शुरू किया। हम इन उत्पादों को सीधे थोक व्यापारियों, प्रोसेसर और एक्सपोर्टर्स को देते थे। दूसरे चरण में, हमने कृषि आदान (कृषि इनपुट) के लिए एक अनोखा फ्रेंचाइजी मॉडल तैयार किया, जो उस समय कृषि क्षेत्र में पहली बार लागू किया गया था।

हमारे अटूट सिद्धांत

हमारी कंपनी की नींव कुछ कठोर सिद्धांतों पर रखी गई थी, जिन्हें हम 'नॉन-नेगोशिएबल' कहते हैं। ये सिर्फ नियम नहीं थे, बल्कि हमारी पहचान थे:

हम केवल गुणवत्तापूर्ण माल बेचेंगे।

न हम उधार लेंगे, न उधार देंगे।

हर लेन-देन बिल के साथ होगा।

भुगतान केवल बैंक के माध्यम से होगा, नकद में कोई लेन-देन नहीं होगा।

ये नियम बाज़ार में नए थे और कई लोगों को अजीब लगे, लेकिन यही हमारी ईमानदारी और विश्वसनीयता का आधार बने। हमने अपनी यह यात्रा केवल दो लोगों के साथ शुरू की थी, और आज हमारे साथ एक बहुत बड़ी टीम काम कर रही है। इस दौरान, मैंने सिर्फ व्यापार के तरीके ही नहीं, बल्कि साझेदारी, लेन-देन और सरकारी लाइसेंस लेने की जटिलताओं को भी सीखा। हर दिन एक नई चुनौती थी, हर लेन-देन एक नई सीख। हर असफलता हमारे लिए सीखने की लागत थी, और हर सफलता एक जश्न।


पिछले आठ साल से मेरी यह यात्रा बिना रुके जारी है। हमारी कंपनी में अब एक मज़बूत वर्क कल्चर, टीम बिल्डिंग और प्रक्रियाएँ विकसित हो चुकी हैं। इसी कारण मैंने अब मार्केटिंग का काम छोड़ दिया है। अब मैं नए लोगों को प्रशिक्षण देता हूँ, विभिन्न संस्थानों में व्याख्यान देता हूँ, और अपनी पुरानी हॉबीज़ फोटोग्राफी और लेखन को समय देता हूँ।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे यह सब एक अद्भुत यात्रा लगती है। कितने लोग मिले, कुछ साथ चले और कुछ बिछड़ गए, रास्ते अलग हो गए। लेकिन कई लोग आज भी शुरुआत से मेरे साथ हैं। मुझे रवींद्रनाथ टैगोर की वो पंक्तियाँ याद आती हैं: "जदि तोर डाक शुने केउ ना आसे तबे एकला चलो रे।" यह कहानी सिर्फ एक व्यापार की नहीं, बल्कि एक अधिकारी के अपने जुनून को जीने और समाज को कुछ वापस देने की है।

यह एक नई शुरुआत है। आप अब पद की पहचान से मुक्त होकर अपनी असली पहचान की तलाश कर सकते हैं। यह जीवन का चौथा चरण है, जहाँ आप अपने लिए जीते हैं, अपनी हॉबी के लिए जीते हैं और अपने अनुभव से समाज को कुछ लौटाते हैं। मैं रोज रवीन्द्रनाथ टैगोर की कविता की इन पंक्तियों को गुनगुना कर दिन की शुरुआत करता हूँ-

जोदि तोर डाक शुने केउ ना आशे तौबे एकला चोलो रे।

ऐकला चलो, ऐकला चलो, ऐकला चलो, ऐकला चौलो रे!





















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