बाबूनामा


बाबूनामा


डॉ रवीन्द्र पस्तोर 



प्रस्तावना 

यदि आप मेरे बारे में इंटरनेट पर गूगल कर ए आई के माध्यम से सर्च करेंगे तो आपको इस तरह की जानकारी मिलेगी-

डॉ. रवीन्द्र पस्तोर  एक सच्चे पुनरुत्थान और पुनर्खोजी व्यक्ति रहे हैं, जो दूरदर्शी, सफल उद्यमी, जुनूनी फोटोग्राफर, वाक्पटु प्रेरक वक्ता, और उत्कृष्ट रूप से सफल आईएएस अधिकारी रहे हैं। उन्होंने सरकार में अपने छत्तीस वर्षों के उपलब्धि पूर्ण करियर के दौरान कई नवीनतम और प्रशंसनीय  प्रशासनिक नीतिगत परिवर्तनों का नेतृत्व किया। डॉ. रवीद्र पस्तोर  भारत में सामाजिक उद्यमिता और कृषि-उद्यमिता के क्षेत्र में एक प्रमुख व्यक्ति हैं। वह ग्रामीण आजीविका के लिए अभिनव और टिकाऊ समाधान विकसित करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता के लिए जाने जाते हैं।


उनके जीवन और कार्य के मुख्य अंश:

वर्तमान भूमिका: डॉ. रवीद्र पस्तोर इलेक्ट्रॉनिक्स फार्मिंग सॉल्यूशंस एसोसिएट्स प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष और सीईओ के रूप में कार्यरत हैं। विशेषज्ञता और ज्ञान: उनका काम मुख्य रूप से इन क्षेत्रों पर केंद्रित है: सामाजिक उद्यमिता और कृषि-उद्यमिता। ग्रामीण आजीविका के लिए तकनीक-उन्नत समाधानों को लागू करना। बाजार-संचालित कृषि समाधान विकसित करना। किसान उत्पादक कंपनियों और सहकारी समितियों जैसे गतिविधि-आधारित, सामुदायिक-स्वामित्व वाले संस्थानों की स्थापना करना। ग्रामीण विकास से संबंधित नीति विश्लेषण और अनुसंधान में संलग्न होना।


प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण और प्रेरक वक्ता: डॉ. रवीद्र पस्तोर, एक प्रभावशाली प्रेरक वक्ता के रूप में भी जाने जाते हैं। वह नियमित रूप से विभिन्न संस्थानों और संगठनों का दौरा करते हैं ताकि अपने ज्ञान और अनुभवों को साझा कर सकें और लोगों को प्रेरित कर सकें। इनमें शामिल हैं: 


प्रशिक्षण संस्थान: वे कौशल विकास और व्यक्तिगत उन्नति के लिए प्रशिक्षण संस्थानों में व्याख्यान देते हैं। 


सरकारी संगठन: सरकारी विभागों और निकायों में, वे नीतियों, ग्रामीण विकास और कुशल कार्यप्रणाली पर अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करते हैं। 


कॉलेज और विश्वविद्यालय: युवा पीढ़ी को प्रेरित करने और उन्हें उद्यमिता, नेतृत्व और सामाजिक जिम्मेदारी के महत्व को समझाने के लिए वे शैक्षणिक संस्थानों में जाते हैं।


निजी कंपनियां: कॉर्पोरेट जगत में, वे व्यवसाय विकास, क्षमता और टीम प्रेरणा पर बात करते हैं।


एक यूट्यूबर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर: डॉ. रवीद्र पस्तोर केवल पारंपरिक माध्यमों से ही नहीं, बल्कि डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी एक मजबूत उपस्थिति रखते हैं। वह एक यूट्यूबर हैं और विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में सक्रिय हैं। 


उनके लाखों फॉलोअर्स हैं, जो उनके विचारों, प्रेरणादायक संदेशों और विशेषज्ञता से लाभ उठाते हैं। यह डिजिटल उपस्थिति उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुँचने और अधिक लोगों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने में मदद करती है।


शौकीन फोटोग्राफर: डॉ. रवींद्र पस्तोर, एक पेशेवर रूप से प्रशिक्षित फोटोग्राफर हैं। फोटोग्राफी के प्रति उनका गहरा प्रेम उनके काम के साथ-साथ उनके रचनात्मक पक्ष को भी दर्शाता है। उन्हें विशेष रूप से विभिन्न शैलियों में तस्वीर लेना पसंद है: 


स्ट्रीट फोटोग्राफी: वे सड़कों पर जीवन के क्षणों, लोगों की गतिविधियों और शहरी दृश्यों को अपने कैमरे में कैद करना पसंद करते हैं। यह शैली उन्हें रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियों को बताने का अवसर देती है।


नेचर फोटोग्राफी: प्रकृति की सुंदरता, जैसे कि परिदृश्य, पेड़-पौधे और प्राकृतिक घटनाएँ, उनके लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। वे प्रकृति को शांत और भव्य दृश्य को कैप्चर करने में आनंद लेते हैं।


बर्ड फोटोग्राफी: पक्षियों की तस्वीरें लेना उनकी विशेष रुचि है। यह धैर्य और कौशल की मांग करती है, और वे पक्षियों के व्यवहार, उनके रंग और उनकी उड़ान के क्षणो को बखूबी पकड़ते हैं। 


एक्शन फोटोग्राफी: गतिमान विषयों, जैसे खेल, नृत्य या अन्य गतिशील घटनाओं की तस्वीरे लेना भी उन्हें पसंद है। यह शैली क्षणो को फ्रीज करने और ऊर्जा को व्यक्त करने की क्षमता रखती है। 


इवेंट्स फोटोग्राफी: विभिन्न आयोजनों और कार्यक्रमों में होने वाली गतिविधियों और भावनाओं को रिकॉर्ड करना भी उनके फोटोग्राफी कौशल का हिस्सा है। 


डॉ. रवीद्र पस्तोर  का यह फोटोग्राफी का जुनून उनके बहुमुखी व्यक्तित्व को दर्शाता है, जहाँ वे एक और ग्रामीण विकास के लिए काम करते हैं, वहीं दूसरी ओर कला के माध्यम से दुनिया को देखते और प्रस्तुत करते हैं।


लेखक: डॉ. पस्तोर अपने बहुरूपदर्शी अनुभवों, अन्वेषणों और प्रयोगों को आध्यात्मिक ज्ञान से परिपूर्ण एक उपन्यास लेखक के रूप में काम कर रहे है, जिसे उन्होंने अपने अत्यंत सक्रिय जीवन अनुभव के माध्यम से प्राप्त अनुभवों पर आधारित उनके उपन्यास पाठकों को लोक कथाओं, पौराणिक कथाओं और किंवदंतियों की एक अद्भुत रोमांचक दुनिया की यात्रा पर ले जाते है।


व्यवसाय विकास अंतर्दृष्टि: डॉ. पस्तोर को व्यवसाय विकास में अपनी विशेषज्ञता साझा करने के लिए भी जाना जाता है। उनकी अंतर्दृष्टि में शामिल हैं: बाजार विस्तार और नवाचार के लिए रणनीतियाँ। परिचालन दक्षता को अनुकूलित करने के तरीके। सरकार और निजी क्षेत्रों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने के दृष्टिकोण। स्थायी विकास प्राप्त करने के मॉडल।


भौगोलिक संबंध: इंदौर क्षेत्र, भारत में मुख्य रूप से सक्रिय होने के साथ-साथ, भोपाल में शासन प्रशासन से भी जुड़े रहे हैं, जहाँ उन्होंने अपनी व्यवसाय विकास अंतर्दृष्टि साझा करते है।


डॉ. रवीद्र पस्तोर  का कार्य अभिनव कृषि पद्धतियों और टिकाऊ व्यवसाय मॉडल के माध्यम से ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने पर जोर देता है। कुल मिलाकर, डॉ. रवीद्र पस्तोर एक बहुआयामी व्यक्तित्व हैं जो अपने पेशेवर कार्यों, कलात्मक जुनून और प्रेरक क्षमताओं के माध्यम से समाज में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।


एक जीवन को यहां तक पहुंचने में सत्तर साल लगे। आप सोचेंगे कि यह एक योजना के साथ जी गई जिन्दगी है तो ऐसा कतई नहीं है। यह बहती हुई नदी के सामान या आसमान में उड़ाते हुए सफ़ेद बादल के सामान यात्रा रही है। जिसमें पूर्व निर्धारित कुछ भी नहीं था। यह निरंतर होते बदलावों, घटनाओं, दुर्घटनाओं तथा उपलब्ध अवसरों के साहस पूर्वक उपयोग किये जाने का परिणाम है। 


​​जीवन एक पेड़ जैसा होता है जैसे पेड़ एक खास पर्यावरण में जन्म लेता है। मिट्टी के नीचे दबे बीज को जब उसके उपयुक्त पर्यावरण मिल जाता है तो वह अंकुरित होता है। इसी तरह जब हमारे संचित कर्मो, वासनाओं, इक्षाओं के कारण हमारी आत्मा अपने लिये सही गर्भ का चयन करती है। माता पिता के सयुंक्त बीज से एक परिवार में जन्म होता है। 


जैसे पेड़ के बीज को बाहर निकलने पर हवा, पानी , गर्मी तथा ठण्ड विकसित करते है हमें बचपन से हमारे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी, भाई-बहन, दोस्त-दुशमन, शिक्षक और गुरुजन हमारे विकास में सहायक होते है। समाज व्यक्तित्व का निर्माण करता है। आज आप सोचे की यह अकेले आप की उपलब्धि है ऐसा नहीं है। यह ऋणानुबन्धन के कारण कुछ लोग हमसे उनकी लेनदारियों के लिये तो कुछ लोग देनदारियों के लिए जीवन में आते है। 


जिनके साथ किया कामों, व्यवहारों या उनके व्यक्तित्व के मेरे ऊपर पड़े सकारत्मक या नकारात्मक प्रभावों का उल्लेख कर रहा हूँ उस समय में जजमेंटल नहीं होना चाहता बल्कि यह मेरा अनुभव है जैसा मैंने उन सब के बारे में सोचा, महसूस किया। यह भोगा हुआ यथार्थ का विवरण है। बहुत लोग पृथ्वी से जा चुके बहुत अभी भी जीवित है मैं उन सब का आभारी रहूगां कि वह मेरे जीवन में आये और अपना पार्ट अदा कर मुझे सीखा कर चले गए। यह बहुत खूबसूरत यात्रा रही जो अनगिनित लोगों की सहभगिता से चल रही है। मैं सब घटनाओं, सब किरदारों सब अनुभवों को आज ना तो याद कर पा रहा हूँ और ना ही उनके नामों का उल्लेख कर पा रहा हूँ इसका मतलब यह नहीं है कि उनका प्रभाव मेरे जीवन पर कम था या उनका महत्व कम था। मैं उन सब का कृतज्ञ हूँ। 


मेरा यह व्यक्तित्व एक दिन का नतीजा न हो कर जीवन के क्रमिक विकास का नतीजा है। जीवन के हर मोड़ पर आपको भगवान अवसर प्रदान करता है। यह आप पर निर्भर होता है कि उस अवसर का कैसा उपयोग करते है। प्रकृति में बाकि सब प्राणी उनके जीवन की प्रकृति से जीते है। अकेला मनुष्य ऐसा प्राणी है जिसे प्रकृति ने चयन करने का अधिकार दिया। मनुष्य वृत्ति से जीता है। 


चयन की स्वतंत्रता जिम्मेदारी के साथ आती है। हम जो चुनते है वही बन जाते है। अपनी किस्मत खुद लिखते है। जीवन संचित कर्मों का कुल योग है। संचित कर्म पूर्व जन्मों के कर्म होते है। इस जीवन में आप जिन संचित कर्मों को भोगते है वह आपका प्रारब्ध होता है। इस जीवन के कर्मों को क्रियमाण कर्म कहते है। 


जीवन में माता-पिता, भाई-बहिन, पति-पत्नी, बच्चे, रिश्तेदार, मित्र, सहयोगी और विरोधी  सभी ऋणानुबन्धन के कारण ही जुड़ते-बिछड़ते है। यह नदी नाव संयोग है। यदि हमारा व्यवहार सकारात्मक है तो दोस्त बनाते है यदि व्यवहार नकारत्मक है तो दुश्मन। भौतकी का नियम है कि प्रकृति में सभी गतियां वृताकार/ गोल होती है। 


यदि हम सकारात्मक ऊर्जा पैदा करेंगे तो हम तक सकारात्मक ऊर्जा आयेगी। यदि नकारात्मक ऊर्जा पैदा करेंगे तो नकारात्मक ऊर्जा आयेगी। प्रकृति में ऊर्जा नष्ट नहीं होती कई बार यह वृत छोटा होता है तो कई बार व्रत को पूरा होने में कई जन्म लेते है। 


विगत वर्षों में अनेक मौकों पर लोगों को जब भी मैंने बात-चीत में या प्रशिक्षण के दौरान जीवन के संस्मरण सुनाए, सब ने आग्रह किया कि इन संस्मरणों को एक पुस्तक के रूप में लिखो। ताकि लोगों को एक साधारण जीवन की असाधारण बातें पता चल सके। 


आगे आने वाली पीढ़ी कुछ सबक उन गलतियों से सीख सके जो मैने की, सीखा और आगे बड़ा। जिन्दगी नदी जैसी होती है वह अपना रास्ता खुद बनाती चलती है। यह सब मेरे अनुभव मैंने याददाश्त के आधार पर लिखे है जो मुझे याद रह गये। बहुत सारी  बातें मैं भूल गया। जो जब याद आयगी तब आगे के संस्करण में लिखी जायगी।


हम सड़क पर गाड़ी चलाते है अभी फर्स्ट गियर में तो कभी टॉप गियर में, कभी रिवर्स गियर में। कभी दायें, कभी बायें। कभी ब्रेक लगते तो कभी बंद कर गैरिज में रख देते। मेरा अनुभव जिन्दगी के साथ इसी तरह का रहा। तो लोगों के आग्रह को स्वीकार कर संस्मरणों की यह पुस्तक आपको सौप रहा हूँ। 


उम्मीद है आप या तो मेरी बातों से सहमत होंगे या असहमत मगर आप अपने जीवन से मुझे जुड़ा जरूर पायेगें। यह मेरी बायोग्राफी नहीं है। यह संस्मरण जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में मेरे कार्यकारी जीवन से जुड़े संस्मरण है। 


आप सोच रहे होंगे कि मैंने इस किताब का नाम यही क्यों चुना। तो आप को बताता हूँ कि "बाबू" शब्द में एक महत्वपूर्ण अर्थगत परिवर्तन आया है। पहले यह शब्द सम्मानजनक संबोधन/ स्नेह सूचक शब्द था। मूलरूप से औपनिवेशिक युग में अंग्रेज़ी-शिक्षित क्लर्कों के लिए एक तटस्थ शब्द सम्बोधन में प्रचलन में आया। 


मजाक में कहते है जब अंग्रेज़ भारत में ऑफिस का काम करने के लिए देशी पड़े लिखे नौजवान भर्ती करते तो वह बालों में बहुत सारा तेल लगा कर ऑफिस काम पर आते। उनसे एक तरह की बदबू आती, जिसे वह बू कहते। धीरे-धीरे बू शब्द बाबू शब्द में बदल गया। क्लर्कों और सतही अंग्रेज़ी बोलने वालों के लिए एक अपमानजनक शब्द। 


बाद में अखबारों के पत्रकारों द्वारा भारतीय प्रशासनिक सेवा के सरकारी नौकरशाहों के लिए यह शब्द व्यापक रूप से अपमानजनक संबोधन शब्द के रूप में उपयोग किया जाने लगा। साथ ही साथ यह शब्द अपने स्नेहपूर्ण प्रयोग विशेषकर पारिवारिक/क्षेत्रीय संदर्भों में आधुनिक युग में बरकरार रहा। 


यह शब्द "बाबू" समृद्ध और अक्सर विरोधाभासी इतिहास के कारण एक आकर्षक शब्द बन गया है। जो भारतीय समाज के विभिन्न स्तरों, उसके औपनिवेशिक अतीत और उसके विकसित होते भाषाई परिदृश्य को समाहित करता है। इसलिये मैंने अपने शासकीय जीवन के अनुभव लिखने की लिए इस किताब का नाम "बाबूनामा" रखा। जिसका अर्थ हुआ एक बाबू के जीवन का लिखित विवरण। है ना मजेदार। 


डॉ. रवीद्र पस्तोर


प्रथम पारी 

यदि आप यह सोचते है कि मैं आत्ममुग्धता से ग्रस्त प्राणी हूँ तो मैं कहूंगा आप गलत नहीं है। मैं "नार्सिसिस्टिक सिंड्रोम" जिसे आत्ममुग्धता या आत्ममोही व्यक्तित्व का व्यक्ति हूं। मुझे अपने महत्व का अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर बोध होता है। लगातार दूसरे से प्रशंसा और ध्यान की मुझे आवश्यकता होती है। 


यह शायद केवल अहंकार या स्वार्थ से कहीं बढ़कर है। अपनी क्षमताओं को मैं वास्तविकता से कहीं अधिक आकता हूँ। अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करता हूँ। खुद को दूसरों से बेहतर, अनोखा या खास मानता हूँ। मुझे लगता है कि मुझे केवल उन्हीं लोगों के साथ उठना-बैठना चाहिए जो मेरे जैसे ही "खास" या उच्च-स्थिति वाले हों। 


मैं दूसरों के ध्यान के लिये हमेशा लालायित रहता हूँ। इसलिये जब भी मैं कुछ भी करता हूँ तो सोशल मीडिया पर तत्काल शेयर करता हूँ। मैं हमेशा दूसरों की पीड़ा या भावनाओं के प्रति असंवेदनशील रहा हूँ। मैं अक्सर उम्मीद करता हैं कि दूसरे मेरी इच्छाओं को बिना सवाल किए पूरा करेंगे। जब मेरी अपेक्षाएं पूरी नहीं होती तो मैं क्रोधित हो उठता हूँ।


मुझे दूसरों से ईर्ष्या भी होती। मेरे व्यवहार में अभी भी अक्खड़पन और घमंड बहुत ज्यादा है। मैं अकसर  दूसरों के प्रति श्रेष्ठता और तिरस्कार का रवैया प्रदर्शित करता हूँ। मुझ में दूसरों की बातचीत पर हावी होने की प्रवृत्ति है। अक्सर मेरा व्यवहार शोषणकारी हो जाता है।  मुझमें दूसरों की भावनाओं के प्रति सहानुभूति और जरूरतों को पहचानने या समझने की बहुत कमी है। मैं हमेशा अपनी सफलता, शक्ति, सौंदर्य या आदर्श प्रेम की कल्पनाओं में डूबा रहता हूँ।


मुझे हमेशा लगता है कि मैं विशेष व्यवहार और विशेषाधिकार का हकदार हूँ। मैं अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए दूसरों का फायदा उठाता हूँ। मैं दूसरों के परिणामों की चिंता किए बिना अपने लाभ के लिए लोगों का उपयोग करता हूँ। जब कोई मेरे ऐसे व्यवहार से आपत्ति करता है तो मैं अपने आप को सही साबित करने के लिये तर्क या कहे कुतर्क का सहारा लेता रहा हूँ। इस व्यवहार में मुझे कुछ भी गलत नहीं लगता।


आत्ममुग्धता के इस मुखौटे के पीछे, अक्सर असुरक्षा, शर्मिंदगी, अपमान और असफलता के उजागर होने का डर जैसी छिपी हुई नाजुक भावनाओं को पाता हूँ। थोड़ी सी भी आलोचना या अस्वीकृति मुझे बहुत परेशान कर देती है। जिससे मैं क्रोधित या उदास हो जाता हूँ। मैने कभी नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी को स्वीकार नहीं किया। आप से अपने मन की गहराइयों को मैं पहली बार साझा कर रहा हूँ। 


हाँ, यह बात बिलकुल सही है कि बुंदेलखंड का एक प्राचीन नाम "जेजाकभुक्ति" या "जिझौती" था। यह नाम चंदेल राजा जय शक्ति (जेजाक) के नाम पर पड़ा था। चंदेलों ने 9वीं से 14 वीं शताब्दी तक इस क्षेत्र पर शासन किया था। बुंदेलखंड में रहने के कारण यहां के ब्राह्मणों को जिझौतिया ब्राह्मण कहा जाता है। हमारा परिवार बुन्देलखण्ड के जिझौतिया ब्राह्मण के परिवार में से एक है। 


ज्यादातर परिवार पाठक सरनेम लिखते है। हम कुछ परिवार पस्तोर सरनेम क्यो लिखते है, पता नहीं। ‘पस्तोर’ उपनाम के इतिहास के बारे में विस्तृत जानकारी आसानी से उपलब्ध नहीं है। हालांकि, कुछ स्रोतों से पता चलता है कि यह उपनाम भारत में, विशेष रूप से जिझौतिया ब्राह्मण समाज में पाया जाता है। 


उपनामों की उत्पत्ति अक्सर किसी स्थानीय, पेशे, पैतृक नाम, या किसी विशिष्ट विशेषता से होती है। ब्राह्मणों में भी विभिन्न शाखाएँ (जैसे कान्यकुब्ज, सरयूपारीण, सनाढ्य आदि) और गोत्र होते हैं। 


यह भी संभव है कि 'पस्तोर' किसी विशेष गोत्र, शाखा, या किसी विशिष्ट परंपरा से जुड़े ब्राह्मणों द्वारा ही अपनाया गया हो। कई बार उपनाम किसी पूर्वज के नाम या किसी परिवार के विशिष्ट इतिहास से जुड़ा होता है। हो सकता है कि 'पस्तोर' किसी ऐसे प्रमुख व्यक्ति का नाम रहा हो जिससे कुछ ब्राह्मण परिवार संबंधित थे। कुछ उपनाम किसी व्यक्ति के व्यवसाय, पद या कार्य के आधार पर विकसित होते हैं। 'पस्तोर' शब्द का यदि किसी पुरानी स्थानीय भाषा या संस्कृत में कोई ऐसा अर्थ निकलता है जो किसी धार्मिक कार्य, प्रशासनिक भूमिका, या किसी विशेष प्रकार के कार्य से संबंधित हो, तो यह भी एक कारण हो सकता है। 


कई उपनाम किसी स्थान विशेष से जुड़े होते हैं। यह संभव है कि 'पस्तोर' शब्द बुंदेलखंड में किसी गांव, कस्बे, या भौगोलिक विशेषता का नाम रहा हो, और वहाँ से आने वाले ब्राह्मण परिवारों ने इसे उपनाम के रूप में अपना लिया हो।


मुझे 'पस्तोर' उपनाम के बारे में विशेष रूप से बुंदेलखंड के ब्राह्मणों द्वारा इसके उपयोग और इसके ऐतिहासिक संबंधों पर कोई विशिष्ट या व्यापक जानकारी उपलब्ध नहीं है। भारत में उपनामों की उत्पत्ति और क्षेत्रीय उपयोग अत्यंत जटिल और विविध होते हैं। ‘पस्तोर’ शब्द का मूल और अर्थ क्या है ज्ञात नहीं है। पर मुझे इस सरनेम से हमेशा लाभ हुआ है। 


मैने बचपन से अपने जीवन को इसी तरह शुरू किया। मेरे माता पिता को मुझसे पहले  एक बालक हुआ था जो जन्म के साथ ही जीवित नहीं रहा। मैं अपने परिवार में बहुत मन्नतों के बाद पैदा हुआ बच्चा था। गोल मटोल, गोरा चिट्टा, बड़ी-बड़ी आँखें जिनमें माँ हमेशा काजल लगाती। माथे पर काजल का टीका जिसे हम लोग 'डथूला' कहते है। गले में उल्लू के नाखूनों का ताबीज तथा पाटे की पुतरिया। हाथों में चांदी के कड़े। नाक और कान भी छिदवा कर जेवर पहनाए गये। तो परिवार ही नहीं गांव में सभी का प्यारा दुलारा बच्चा। विशेषकर मेरी दादी का। 


आप मेरे बचपन के अत्यधिक लाड़-प्यार को नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी के विकास में योगदान मान सकते हैं। यहां से शायद यह आत्ममुग्धता मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा है जो अभी और मजबूत हो गई है। आत्ममुग्धता का मेरे रिश्तों और समग्र जीवन पर महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है।  मैं कोई भी काम असंभव नहीं मानता जो मैं न कर सकूँ। इसी कारण मैं इतने तरह के काम कर सका। 


हमारी दो तरह की उम्र होती है एक को में कहता हूँ जैविक उम्र जो शरीर की है। जैसे पेड़ उगता है बड़ा होता है फूल-फल देता हेउ और सुख कर मर जाता है। उसी तरह का हमारा शरीर है जो पैदा होता, बच्चा होता, युवा, प्रौढ़, वयस्य, बृद्ध होता और मर जाता है। 


दूसरी मानसिक उम्र होती है जैसे मेण्टल ऐज भी कहते है। यह सीखने, करने, देखने और पढ़ने से बढ़ती है। जिसमें हमारी समझ का विकास होने पर चेतना का विकास होता है। 


बच्चा सात साल तक जीवन जीने लायक समझ विकसित कर लेता है। अधिकांश लोगों की मानसिक उम्र इसी स्टेज पर रुक जाती है और वे जीवन भर कुछ नहीं सीखते।मेरे पास मेरी माँ के साथ बहुत छोटी उम्र से अभी तक की मेरी फोटोज है। जिसको मैंने एक फोल्डर में सोशल मीडिया पर शेयर किया था। फोल्डर का नाम दिया था ‘फेसेस ऑफ़ फसलेस सोल’। जिस में मेरे बदलते चेहरे की फोटोज है।  


जीवन में सफल होने के लिये परीक्षा में मिले अंक निर्णायक नहीं होते बल्कि आप के अनुभव, समझ तथा नये जोखिम उठाने की क्षमता काम आती है। 

अपने जीवन के प्रारम्भ में मैंने एक कहावत अपनी दादी से सुनी थी- 


‘पहला सुख निरोगी काया,

दूजा सुख घर में हो माया।

तीजा सुख कुलवंती नारी,

चौथा सुख पुत्र हो आज्ञाकारी।

पंचम सुख स्वदेश में वासा,

छठवा सुख राज हो पासा।

सातवा सुख संतोषी जीवन,

ऐसा हो तो धन्य हो जीवन।’ 

मैंने अपने जीवन में उक्त सभी सात सुख पाने की कोशिश की है। 


मेरे स्कूल में एक यात्री आये थे जो साइकिल पर भारत भ्रमण कर रहे थे। उन्होंने हम बच्चों को स्वस्थ रहने के तरीकें तथा योग आसन बताये। वह आसनों के पोस्टर पच्चीस-पच्चीस पैसे में बेच रहे थे। उनके पास चार पोस्टर थे लेकिन मुझे केवल पचास पैसे जेब खर्च रोज मिलता था। मैंने दो पोस्टरों  को खरीद लिया। उन्हें अपने कमरे की दिवार पर चिपका लिया और रोज कसरत करने लगा। हमने अपने खेत में एक अखाड़ा बनाया था। उसमें खूब कसरत करते थे। यह जीवन भर की आदत बन गई। 





गणेशगंज 

हमारे पूर्वज टीकमगढ़ के राजा के यहां महत्त्वपूर्ण पद पर काम करते थे। पहले हमारा परिवार दिगोंड़ा के पास एक गांव में बसता था। वहां उन्हें डाकुओं ने लूट लिया तब राजा ने उन्हें ललितपुर रोड पर कुण्डेश्वर के पास गांव बसाने को जमीन दी थी। उन्होंने एक गांव बसाया और नाम दिया गणेशगंज। इस गांव को बसाने के कारण पस्तोर परिवार को ‘बर्रु काट’ कहा जाता। गणेशगंज गांव मध्य प्रदेश के टीकमगढ़ जिले में स्थित है।


गणेशगंज बुंदेलखंड के पठारी क्षेत्र में स्थित है। भूमि मिश्रित है- कहीं उपजाऊ तो कहीं पथरीली। गांव कृषि प्रधान है। जहाँ के लोगों की आजीविका मुख्य रूप से खेती और पशुपालन पर निर्भर करती है। क्षेत्र में पानी की कमी एक प्रमुख चुनौती रही है, जिसका प्रभाव गणेशगंज पर भी पड़ता है। यहाँ के किसान मुख्य रूप से ज्वार, गेहूं और दालों जैसी फसलें उगाते हैं। 


गणेशगंज में एक मजबूत सामुदायिक भावना देखी जाती थी। ग्रामीण जीवन में आपसी सहयोग और भाईचारा महत्वपूर्ण होता था। त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में पूरा गांव एक साथ मिलकर खुशियाँ मनाता। यहाँ की जीवनशैली सादगीपूर्ण। मिट्टी के घर, पारंपरिक वेशभूषा और स्थानीय रीति-रिवाज जीवन का अभिन्न अंग। शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक सीमित पहुँच। गाँव में एक प्राथमिक विद्यालय है, और उच्च शिक्षा या बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए लोगों को पास के जिला मुख्यालय टीकमगढ़ पर निर्भर रहना पड़ता।


जिले के अन्य गांवों की तरह, गणेशगंज भी बुंदेलखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है। जहाँ लोक कलाएं, लोकगीत और पारंपरिक त्योहार जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। गणेशगंज अपनी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था, सामुदायिक जीवन और पारंपरिक मूल्यों के साथ-साथ विकास की चुनौतियों का भी सामना कर रहा है।


मेरा जन्म बुंदेलखंड के गणेशगंज में 1957 का दशक में हुआ था। मेरे बचपन का शुरुआती जीवन बहुत साधारण था। जब भारत को आजादी मिले कुछ ही साल हुए थे, बुंदेलखंड जैसे ग्रामीण इलाकों में जीवन आज की तुलना में बहुत अलग था। गणेशगंज में बच्चों का बचपन सादगी, प्रकृति से जुड़ाव और सामुदायिक जीवन से भरा हुआ था।


बच्चों के दिन की शुरुआत सुबह जल्दी होती। वे अक्सर अपने माता-पिता के साथ खेतों में या घर के कामों में हाथ बंटाते। लड़कियों को पानी भरने, साफ-सफाई करने और छोटे भाई-बहनों की देखभाल करने में मदद करनी होती। जबकि लड़कों को पशुओं को चराने या खेतों में छोटे-मोटे काम करने की जिम्मेदारी दी जाती थी।


उस समय शिक्षा का स्तर बहुत कम था। गाँव के प्राथमिक विद्यालय में जहां कुछ बच्चे ही जा पाते। शिक्षा तक पहुँच सीमित थी, खासकर लड़कियों के लिए। जो बच्चे स्कूल जाते थे, वे अपनी पढ़ाई के साथ-साथ घर के कामों में भी मदद करते थे। हमारे प्राथमिक विद्यालय में एक कमरा और एक ही शिक्षक थे जिन्हें हम बच्चे दादाजी के नाम से बुलाते। 

कक्षा एक से पांच तक के विद्यार्थी एक साथ अलग अलग ग्रुप में उसी कमरे में बैठते। बैठने के लिये फट्टी घर से ले कर आते। 


दादाजी मास्टर साहब ही सभी को सभी बिषय पढ़ाते। इस के लिये उन्होंने एक अनोखी विधि विकसित की। हर कक्षा से एक सबसे होशियार बच्चे का चयन कर उस कक्षा को पढ़ाने की जिम्मेदारी उस बच्चे को सौप देते। कभी वह जोर से बोल-बोल कर पाठ पढ़ाता, कभी ईमला बोल कर नक़ल लिखवाता तो कभी जोर से गिनती या पहाड़े याद करवाता। मैंने यह जिम्मेदारी पूरे पांच साल निभाई। कक्षा के सभीछात्रों को व्यस्त कर दादाजी खुद गांव में हमारे घर जाते, जहां उन्हें चाय, मट्ठा या दही की लस्सी पीने तथा कुछ खाने को मिलता। 


अब आप जरा कल्पना के घोड़े दौड़ा कर एक ऐसे छोटे कमरे की कल्पना करें और देखे जहां कक्षा एक से पांच तक के एक साथ जोर-जोर से अलग-अलग पढ़ रहे बच्चे हो और शिक्षक कमरे में ना हो। तो हमारी पढ़ाई ऐसे स्कूल में हुई। जब मास्टर साहब स्कुल में होते तो या तो अपनी कुर्सी पर बैठ कर ऊंघते या सो जाते या अपनी कॉपी में राम-राम लिखते रहते थे। कभी-कभी जब बच्चे उनकी बात नहीं मानते तब एक छड़ी से हथेली पर मार पड़ती। 


हथेली लाल हो जाती और चार पांच दिन दर्द होता रहता था। सिलेट पर चाक से लिखे तथा कॉपी पर वर्रू या पेंसिल से लिखते। बच्चों की चीजें या तो छीन लेते या चुरा लेते। 1957 में यूनेस्को ने भारत में स्कूली बच्चों को दूध पाउडर उपलब्ध कराने की एक योजना में योगदान दिया था, जो बच्चों के पोषण और शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से शुरू की गई थी। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि यूनेस्को सीधे तौर पर बड़े पैमाने पर दूध पाउडर का "सप्लाई" करने वाला संगठन नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रयास का हिस्सा था जिसमें विभिन्न संयुक्त राष्ट्र एजेंसियां, जैसे कि यूनिसेफ और फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन, और अन्य अंतर्राष्ट्रीय दानदाता शामिल थे। यूनेस्को का जोर शिक्षक और बच्चों के समग्र विकास पर रहा है, और पोषण कार्यक्रम अक्सर इस लक्ष्य का समर्थन करते थे। 


अमेरिका से मुख्य रूप से स्किम्ड मिल्क का पाउडर स्कूल में आता तो पानी में घोल कर बच्चे दूध बनाते और सब को एक-एक गिलास दूध पीना होगा। जिसका स्वाद गाय के दूध से अलग होता और कुछ बच्चे उल्टी भी कर देते। 


भोजन बहुत सुंदर होता। ज्वार की रोटी, दाल और स्थानीय सब्जियाँ मुख्य आहार थीं। गेहूं उस समय ज्वार से महंगा होता था, इसलिए गेहूं चावल की जगह ज्वार तथा कोदों का अधिक सेवन किया जाता। उस समय राशन कार्ड पर गेहूं, चावल तथा मिट्टी का तेल लालटेन या चिमनी जलाने के लिए परिवार की सदस्य संख्या के आधार पर अलग-अलग मात्रा में हर माह मिलता था। राशन कार्ड पर अमेरिका से आया लाल गेहूं कंट्रोल पर मिलता। दूध और दही घरों में पाले गए पशुओं से उपलब्ध होता।


इस दशक में बच्चों के खेल प्रकृति और आसपास के वातावरण से जुड़े होते थे। मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर का तो कोई नामोनिशान नहीं था। बच्चे गाँव के खुले मैदानों, गलियों और तालाबों के किनारे खेलते थे। खेल-कूद और मनोरंजन के रूप में गिल्ली-डंडा सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक था। जिसमें लकड़ी की एक छोटी गिल्ली और एक डंडे का इस्तेमाल होता। 


खो-खो और कबड्डी टीम वाले खेल थे जो शारीरिक फुर्ती और रण नीति पर आधारित थे। छुपन-छुपाई (हाइड एंड सीक) यह एक और पसंदीदा खेल था। बच्चे कंचे खेलने में भी घंटों बिताते। पेड़ पर चढ़ना, तालाब में नहाना। 


सामूहिक मनोरंजन गांव में होता था। शाम को बच्चे और बड़े 'अथाई' चौपाल या किसी चबूतरे पर इकट्ठा होते। कहानियाँ सुनना, लोकगीत गाना, हारमोनियम, बेंजो तथा ढोलक बजाना और पौराणिक कथाएँ सुनना मनोरंजन का मुख्य साधन था। मेले और त्यौहार भी बच्चों के लिए बड़े आकर्षण का केंद्र होते थे, जब उन्हें नए कपड़े और मिठाइयाँ मिलती। रामलीला, रहस लीला, नाटक, ​​राई तथा सर्कस देखने टीकमगढ़ जाते। 


बुंदेलखंड उस समय भारत के सबसे गरीब और अशिक्षित क्षेत्रों में से एक था। बच्चों को अक्सर कम उम्र से ही परिवार की आजीविका में मदद करनी पड़ती थी। पानी की कमी, बुंदेलखंड में पानी की कमी एक गंभीर और पुरानी समस्या रही है। बच्चों को अक्सर दूर से पानी लाने में मदद करनी पड़ती थी।


मौसमी बुखार, चेचक, टीबी, घाव लगाना, हड्डी टूटना, सांप, बिच्छू, कुत्ता और जंगली जानवर का काटना मुख्य बीमारियां थी। स्वास्थ्य सेवाएँ बहुत सीमित थीं। छोटे-मोटे बीमारियों का इलाज घरेलू नुस्खों से किया जाता था, और गंभीर बीमारियों के लिए शहरों तक पहुंच थी।


मौसम की मार हर तीन साल में झेलना होती थी। सूखा और बेमेल बारिश जैसी प्राकृतिक आपदाओं फसलों को बर्बाद कर देती थीं, जिससे बच्चों के परिवारों पर सीधा असर पड़ता था। गांव के लोग अलग-अलग समस्याओं के निवारण के लिए अलग-अलग देवता पूजते, अनुष्ठान करते, मन्यते मानते या अखण्ड रामायण का पाठ, सत्यनारायण की कथा, भागवत कथा या शंकर जी बनवाने का अनुष्ठान करते थे। 


गणेशगंज में तीज का त्यौहार बड़े उत्साह और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मनाये जाते थे। गणेशगंज में तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजन भी था। यह परिवारों और समुदायों को एक साथ लाता था। 


गणेशगंज में मनाए जाने वाले कुछ प्रमुख त्योहारों थे- दीपावली (दीपावली), होली, दशहरा, रक्षाबंधन, तीज (हरियाली तीज और हरतालिका तीज), मकर संक्रांति, महाशिवरात्रि, नवरात्रि, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, बसंत पंचमी, अक्षय तृतीया (आखातीज), नाग पंचमी, देवउठनी एकादशी और हरियाली अमावस प्रमुख थे। कुल मिलाकर, गणेशगंज में तीज का त्योहार भक्ति, परंपरा, प्रकृति प्रेम और पारिवारिक सौहार्द का एक सुंदर संगम था।


इसी गणेशगंज से मेरे जीवन का श्री गणेश हुआ। उन्नीस सौ पचास के दशक में गणेशगंज जैसे गांव में बच्चों का जीवन चुनौतियों भरा लेकिन प्रकृति और समुदाय से जुड़ा हुआ था। उनके खेल-कूद, शिक्षा और दिनचर्या आज के शहरी बच्चों से बहुत अलग थी, जहां सादगी और सामाजिक जीवन का महत्व अधिक था।


परिवार में नौकरी पेशा दो लोग थे मेरे पिता जी तथा चाचा जी। मुख्य आय का साधन खेती थी। साहूकारी साइड बिजनेस था जिस में रुपये तथा गल्ले का लेन-देन होता। मेरी दादी हालांकि बिलकुल भी शिक्षित नहीं थी। उनमें गजब का कॉमन सेन्स तथा आत्म विश्वास था। उन्हें केवल बीस तक गिनती आती थी। उनके लिये महीना दो भागों में बटा होता- पूर्णिमा तथा अमावस्या। जिसे हम पखवाड़ा कहते है। लोग कहते "लिखा न पढ़ी जो ओरी कहे सो सही।" उन्हें लोग  प्यार से 'ओरी' बुलाते थे। 


वह आंगन की दीवालों पर गाय के गोबर से टिपकी लगा कर अपना हिसाब रखती थी। बहुत बाद में हमारे चाचा जब बैंक मैनेजर बन गये तब वह 'रुक्का' लिखने लगे थे। रुक्का मतलब उधारी की लिखा पड़ी का कागज। लेकिन कमाल तो तब होता जब लिखे तथा मौखिक हिसाब में अंतर आता तब जो 'ओरी' कहे वह सही माना जाता। उनकी 'जुबान' की बहुत कीमती थी। 

 दादी ने मुझे एक बार बताया था कि बहुत साल पहले टीकमगढ़ में बहुत भयानक सूखा पड़ा था। राजा ने आस पास के ऐसे लोगों को बुआलया था जिनके पास गल्ला रखा हो तो वह बताये कि कितने लोगों को कितने दिन खिला सकते है। हमारी सहकारी बारह गांव में थी। मेरे दादा जी की अल्प काल में मृत्यु हो जाने से मेरे मिटा जी को राजा ने बुलबाया था। पिता जी उस सभा में सबसे छोटे बच्चे थे। जब राजा के मंत्री ने हमारे गांव का नाम पुकारा तो हमारे पिता जी खड़े हुए। हमारे घर में कोदो की फसल होती थी। कोदो को जमीं में गाड़ कर रखा जाता था। उसे 'खोड़िया' कहते थे। जब राजा ने छोटे बच्चे को देखा तो उन्हें गॉड में उठा लिया। उन्होंने राजा को बताया कि उनके घर में इतना कोदो है कि बारह गांव के लोग तीन माह तक खा सकते है। 


एक हमारे दूसरे चाचा थे। उनके पिता जी के भाई गांव के थे 'लंबरदार'। लंबरदार, जिसे नंबरदार, ज़मीदार भी कहा जाता, ब्रिटिश राज के दौरान गांव में एक प्रमुख व्यक्ति होता था। लंबरदार की नियुक्ति कलेक्टर द्वारा की जाती थी और उसका कार्यकाल 5 वर्ष का होता था। जिसे नवीनीकृत किया जा सकता था। उसे एक अच्छा चरित्र वाला और स्थानीय भाषा में पढ़ने-लिखने में सक्षम होना चाहिए। 


जो राजस्व संग्रह करने और गांव के प्रशासनिक कार्यों में भूमिका निभाता। वह गांव का मुखिया होता। जो सरकारी अधिकारियों के साथ गांव का प्रतिनिधित्व करता और सरकार के साथ संवाद स्थापित करता। वह गांव के प्रशासनिक कार्यों में भी शामिल होता। सभी प्रकार के विवादों का निपटारा करता जैसे कि व्यक्तिगत विवाद, मारपीट, चोरी-चकारी, तथा भूमि विवादों को सुलझाना और रिकॉर्ड रखना। 


उनके दरवाजे पर एक जामुन का पेड़ था और उसके नीचे एक चबूतरा। जिसे गांव की 'अथाई' कहा जाता। वह स्थान जहाँ गाँव के लोग इकट्ठे होकर बातचीत और पंचायत करते। गांव में जब विवाद होता तब पीड़ित गांव की पंचायत बुलाने के लिए लंबरदार से अनुरोध करता। तब लंबरदार गांव की पंचायत बुलाते। पंचायत में गांव की हर जाति के मुखिया  सदस्य होते थे। 


शुरू में गणेशगंज में लगभग चालीस पचास घर थे। रात को अथाई पर पंचायत लगाती। मुखिया तथा पंच अथाई पर बैठते। गांव की महिलाएं तथा पुरुष नीचे बैठते। तम्बाकू कूट कर चिलम में भरी जाती सभी बारी-बारी से पीते। लंबरदार का हुक्का था। वह हुक्का पीते थे। बच्चों का प्रवेश निषेध होता। पर हम बच्चे बहुत उत्सुक होते। क्योंकि विवाद बहुत मजेदार होते थे। हम लोग आसपास छुप कर पंचायत की कार्यवाही देखते। 


पहले पीड़ित व्यक्ति अपना पक्ष रखता फिर जिसके विरुद्ध शिकायत है वह उसका पक्ष रखता। यदि कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह है तो गवाही होती। पंच आपस में विचार-विमर्श करते फिर निर्णय या तो सर्व सम्मति से या फिर बहुमत से होता। यदि अपराध गम्भ्भीर हो तो पांच गांव के पंच बुलाये जाते। सजा होती चमड़े के जूते से पिटाई। जिसे ‘पनैयां’ कहा जाता। जिससे एक बार से पांच बार या उससे अधिक अपराध की गंभीरता के अनुपात में मारा जाता। 


कई अपराधों की सजा अपनी जाति या सम्पूर्ण गांव के लोगों की ‘पंगत’ देना होगा। यदि पैसे का भुगतान कर क्षतिपूर्ति हो सकती तो दण्ड पैसे का होता। यदि कोई पाप हुआ है तो गंगा स्नान, गंगाजली पूजन, कथा तथा पंगत देना होती। न पुलिस में रिपोर्ट, न वकील, न कोर्ट कचहरी के चक्कर। त्वरित न्याय। पूर्ण पारदर्शिता। 


'अथाई' का गांव में बहुत सम्मान होता था। कोई भी जुटे पैर कर या साइकिल पर बैठ कर इस चबूतरे के सामने से नहीं गुजरता था। आल्हा, रामायण, महाभारत, भागवत तथा पुराण का पाठ यहीं होता। ठण्ड के समय कूड़ा लगता। जिसमें बकरी की लड़ी, गोबर का कण्डा तथा सुखी लकड़ी जलाई जाती। जिससे आग सालभर चौबीसों घण्टे लोगों को मिले। तब माचिस का चलन नहीं था तथा माचिस महंगी होने से लोगों की क्रय शक्ति से बाहर होती थी। 


हर घर में आग चौबीसों घण्टे 'गुरसी' में होती थी। 'गुरसी' शब्द का हिंदी में अर्थ "बोरसी" या "अंगीठी" होता है। यह एक प्रकार का चूल्हा होता है जिसका उपयोग आमतौर पर खाना पकाने या गर्मी प्राप्त करने के लिए किया जाता है। यदि आग बुझ जाया तो पड़ोसी से आग मांग कर लाते थे। गांव में कहावत चलती: "कम खाना और गम खाना, न हाकिम के जाना न हकीम के जाना।"


मेरी माँ सुबह तड़के उठ कर चक्की पिसती तो लोकगीत गाती। मुझे आज भी कुछ गीत याद है। पिता जी शिक्षक और गायत्री परिवार के फाउंडर मेम्बर थे। हम सभी भाइयों के बचपन के सभी संस्कार मथुरा गायत्री परिवार मन्दिर में गुरूजी पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा सम्पन्न हुए। 


हम बचपन से अपने भाई के साथ खेतों में काम करते। खेत पर ही रहते। लालटेन की रोशनी में पढ़ते। कॉलेज से लौट कर रहट हाकते और बैलों के पीछे-पीछे हाथ में किताब ले कर जोर-जोर से पढ़ते थे। हमारे साथ हमारा हलवारा जुज्जा होता जो कहानियां सुनाता तथा रात में तारे देख कर समय का अन्दाज लगाना बताता। 


जब मन्दिर में अखण्ड रामायण का पाठ होता तो हम लोगों की पारी लगाती तब रात भर रामायण पढ़ते, जब अखण्ड कीर्तन होता तो पारी आने पर भजन गाने जाते। गांव में नाटक करते, रामलीला करते और कथा पढ़ कर घर की महिलाओं को सुनते। किताब रहल पर रख लालटेन की रोशनी में कथा होती। कोई दुःखद प्रसंग आने पर बहुत सी महिलाएं रोने लगाती थी। एक बच्चे के लिये यह बहुत मार्मिक दृश्य होता। 


चूल्हे पर लकड़ी कण्डे पर खाना बनता। सभी पांच भाई आँगन में एक साथ खाने को बैठते, होड़ लगा कर रोटी खाते, जो सबसे ज्यादा खाता वह जीतता। मिट्टी के वर्तन, लकड़ी कण्डे की आग पर सिकी रोटी उस पर घर की गाय का देशी घी, घर के खेत की सब्जी, मट्ठे की कड़ी, कोदो के चावल और ज्वार की रोटी। जब त्यौहार और मेहमान आते तब गेहूं की रोटी, पूरी, चावल बनाते। शर्दियों में कोदो के ‘पयार’ का बिछौना, सभी का एक साथ सोना और दादी की कहानियां, दोस्तों के साथ खेलना, पढ़ना, त्यौहार की मस्ती और स्वर्ग किसे कहते है पता नहीं। 


मेरी दादी रोज सुबह मुझे ऐसी कहावतें सिखाती। कहावतें, जिन्हें लोकोक्तियाँ भी कहा जाता, छोटे वाक्यांश या वाक्य होते जो सामान्य ज्ञान, अनुभव, या सच्चाई को व्यक्त करते हैं। ये वाक्यांश अक्सर रूपक होते और पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे होते हैं। गांव के लोग किसी भी जाति के हो लेकिन उन्हें उनके गांव के रिश्ते के नाम से ही सम्बोधित किया जाता था। 


हमारे चाचा के बुश रेडियो ख़रीदा था। हम लोग विविध भारती प्रोग्राम सुनते थे। समाचार सुनाने की लिए बी बी सी सुनते थे। पुरे गांव में हमारा घर था जिस में साइकिल तथा रेडियो होता था। 


गणेशगंज रोड पर जो पत्थर के घोड़े की मूर्ति लगी है, उसकी कहानी बेहद दिलचस्प और गौरवपूर्ण है। यह मूर्ति एक ऐसे घोड़े की याद में बनाई गई है जिसने अपने समय में एक अविश्वसनीय कारनामा कर दिखाया था। हनुमान बेग, वह घोड़ा था जिसने रेलगाड़ी को हराया। यह कहानी 1840 के दशक की है, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था। 


एक किस्सा है कि अंग्रेज अफसरों ने टीकमगढ़ से रेल निकाले के प्रस्ताव रियासत के महाराजा प्रताप सिंह जूदेव को दिया। महाराज ने अपने सलाहकारों से सलाह ली। सलाहकारों ने बताया कि रेल आने से राज्य में चोर-उच्चके बढ़ जायगे, अपराध बढ़ेगे तो महाराजा ने प्रस्ताव ठुकरा दिया। जब अंग्रेज अफसरों ने महराजा को समझाया कि रेल आने से क्षेत्र का विकास होगा। तब महाराजा ने कहा कि आप की रेल से ज्यादा तेज तो हमारा घोडा दौड़ता है। महाराजा के पास  "हनुमान बेग" नाम का एक अद्भुत घोड़ा था। यह घोड़ा अपनी असाधारण गति और स्फूर्ति के लिए पूरे बुंदेलखंड में प्रसिद्ध था। उसके बारे में कहा जाता था कि जब वह दौड़ता था, तो हवा से बातें करता था, मानो उसे पंख लग गए हों।


हनुमान बेग की ख्याति जब अंग्रेज अफसरों तक पहुंची, तो वे उसकी काबिलियत से हैरान थे। उन्होंने महाराज प्रताप सिंह जूदेव से हनुमान बेग और एक रेलगाड़ी के बीच रेस करने की बात कही। महाराज ने यह चुनौती स्वीकार कर ली। रेस ललितपुर रेलवे स्टेशन से शुरू हुई। जैसे ही हरी झंडी दिखाई गई, हनुमान बेग ने अपनी पूरी गति से दौड़ना शुरू किया। अंग्रेज अफसर और अन्य दर्शक दांतों तले उंगलियां दबाकर इस अद्भुत दृश्य को देख रहे थे। हनुमान बेग ने अपनी गति से सभी को चकित कर दिया और रेल गाड़ी को पीछे छोड़ दिया।


यह हनुमान बेग की अंतिम दौड़ अमरता के लिये साबित हुई। रेस जीतने के बाद जैसे ही महाराज ने उसकी लगाम खींची, हनुमान बेग वहीं शांत हो गया और उसकी मृत्यु हो गई। माना जाता है कि उसने अपनी पूरी शक्ति इस दौड़ में लगा दी थी।


लेकिन मरने से पहले, हनुमान बेग ने एक ऐसा कारनामा कर दिया था जिसने उसे अमर बना दिया। उसकी इस अविश्वसनीय उपलब्धि की याद में, महाराजा प्रताप सिंह जूदेव ने गणेशगंज रोड पर उसकी एक भव्य पत्थर की मूर्ति बनवाई। आज भी, गणेशगंज के लोग हनुमान बेग को एक नायक के रूप में पूजते हैं और उनकी कहानी को पीढ़ी दर पीढ़ी सुनकर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। यह मूर्ति सिर्फ एक घोड़े की नहीं, बल्कि अदम्य साहस, गति और स्थानीय गौरव की प्रतीक है। यह कहानी टीकमगढ़ के इतिहास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और हनुमान बेग को आज भी एक किंवदंती के रूप में याद किया जाता है।


गणेशगंज गांव में स्थित शीश महल, जिसे 'बोतल हाउस' के नाम से भी जाना जाता है, अपनी अनोखी निर्माण शैली के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। इसकी कहानी भी उतनी ही अनोखी और दिलचस्प है। शीश महल  एक्स रम की शराब की बोतलों से बना अनूठा भवन है। गणेशगंज में स्थित यह शीश महल लगभग 100 से 150 साल पुराना बताया जाता है। 


इसकी सबसे खास बात यह है कि इसका निर्माण शराब और बीयर की खाली बोतलों से किया गया है। यह अपनी तरह का संभवत दुनिया का एकमात्र ऐसा महल है, जो इस तरह के असाधारण तरीके से बना है। इस अनोखे महल के निर्माण के पीछे कई कहानियाँ प्रचलित हैं, लेकिन सबसे प्रमुख और विश्वसनीय जानकारी के अनुसार यह महाराजा वीर सिंह जूदेव की कल्पना थी। टीकमगढ़ रियासत के तत्कालीन महाराजा वीर सिंह जूदेव (जो 1930 के दशक तक महाराजा थे) को इस अनूठे महल को बनवाने का विचार आया था। यह महल मुख्य रूप से मेहमानों के स्वागत और उनके ठहरने के लिए बनाया गया था।


 कहा जाता है कि इस महल को बनाने में ऑस्ट्रेलिया के सर विडवर्न इंजीनियर की भूमिका सबसे अहम थी। उनकी देखरेख में ही इसका निर्माण हुआ था। यह भी बताया जाता है कि सर विडवर्न खुद इसी महल में रहा करते थे। महल को बनाने के लिए हजारों की संख्या में एक्स रम की खाली शराब और बीयर की बोतलों को प्लास्टर ऑफ पेरिस का उपयोग करके एक-दूसरे से जोड़ा गया था। राजशाही के जमाने में मेहमानों को परोसी गई शराब की बोतलों का ही इसमें इस्तेमाल किया गया था।


इस महल में कुल छह कमरे, एक रसोई, सौंदर्य प्रसाधन गृह (बाथरूम) और अतिथियों के बैठने के लिए फर्नीचर भी था। आश्चर्य की बात यह है कि यह सब कुछ शराब की बोतलों से ही बनाया गया था। शीश महल अद्वितीय स्थापत्य का नमूना है। महल की दीवारों में बोतले इस तरह से लगाई गई है कि वे धूप और रोशनी में चमकती है, जिससे यह शीशे जैसा प्रतीत होता है। यही कारण है कि इसे 'शीश महल' कहा जाने लगा। 


बोतल और प्लास्टर ऑफ पेरिस का संयोजन ऐसा है कि यह महल गर्मियों में भी काफी ठंडा बना रहता है, जो उस समय की इंजीनियरिंग और कारीगरी का अद्भुत नमूना है। अपनी अनोखी बनावट के कारण यह महल दूर-दराज से पर्यटकों को आकर्षित करता है। विदेशी पर्यटक भी उसकी कारीगरी देखकर मुरीद हो जाते हैं।


वर्तमान स्थिति और संरक्षण का अभाव बहुत अभाव है। हालांकि इसकी सुंदरता आज भी बरकरार है, लेकिन देखरेख के अभाव में यह धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त हो रहा है। इसकी दीवारों में लगी काफी बोतले टूट रही हैं, जिससे इस अनूठी ऐतिहासिक धरोहर के संरक्षण की आवश्यकता महसूस की जाती है।


गणेशगंज का यह शीश महल टीकमगढ़ के इतिहास की एक अद्भुत कड़ी है, जो उस दौर के महाराजाओं की कलाप्रियता और नवाचार को दर्शाता है। यह सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक कहानी है जो स्थापत्य कला और रचनात्मकता की सीमाओं को चुनौती देती है।


बुंदेलखंड के पिछड़े पन का एक कारण राजनीतिक जागरूकता का आभाव भी है। कहते है कि जब देश में चुनाव हुए तब टीकमगढ़ से सांसद चुने गए कूरे माते। उन्हें  तत्कालीन प्रधान मन्त्री ने बुला कर पूछा "क्या तुम्हारे यहां ईख की खेती होती है?" उन्होंने ईख शब्द नहीं उसे था। मना कर दिया। वह पड़े  लिखे नहीं थे। बाद में लोगों ने उन्हें बताया कि ईख मतलब 'बराई" होता है लो उस समय खूब होती थी। प्रधान मन्त्री का यहां शुगर मिल लगान का प्रस्ताव था। वह कहीं और लगा गयी। रेल और उद्योगों का नहीं होने का क्षेत्र के विकास पर गहरा असर पड़ा। रेल बीसवीं शताब्दी में आ सकी और शुगर मिल ना होने से लोगों ने गन्ना उगाना बंद कर दिया। 


तब एक पैसा, दो पैसा, पांच पैसा का चल था। चब्बनी, अठन्नी  तथा रूपया बड़ी बात थी। गांव में पैसे की जगह वस्तु के बदले वस्तु बदलते थे। गल्ले के बदले सब्जियां, मिट्टी के वर्तन, बांस की टोकरियां, फल, कुल्फी और सब कुछ मिल जाता था। सामान फेरी बालों से ख़रीदा जाता। कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन के सामान, कांच की चूड़ियां, कंबल, चादर सभी कुछ फैरी वाले बेचते थे। जिसे आज कल क्विक कॉमर्स कहा जा रहा है। गांव में यह व्यवस्था सदियों से थी। 


गांव में मैंने कभी बेरोजगार शब्द नहीं सुना था। सब के पास काम होता था। गांव के लोग लोक कलाओं में पारंगत होते। गांव की ज़रूरत के सामान गांव में ही बनाते।  लोहे के औजार लुहार, मिट्टी के वर्तन कुम्हार, बांस के वर्तन बसोड़, चमड़े के जूते मोची, कपडे बुनकर, लकड़ी के औजार बड़ाई, सोने के गहने सुनार, तथा पण्डित कर्मकाण्ड, हवन पूजन करवाते थे। कच्छी सब्जियां उगाते, मछुआरे मछली पकड़, यादव जानवर पाल कर दूध, दही, मट्ठा और घी बनाते, किसान गल्ला, दाल उगाते, तेली तेल निकालते, दर्जी कपड़े सिलते, जैन दुकान तथा बिजनेस, व्यवसाय या कारोबार करते थे। सब एक दूसरे के परिपूरक परस्पर निर्भर, एक दूसरे पर आश्रित थे। 


इस आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण गांव में पैसा घुमाने की व्यवस्था थी। इस से ग्रामीण अर्थव्यवस्था में जब एक रुपया आता था तो वह दस से पंद्रह बार घूमता था। जिससे उतने लोगों को काम मिलता था तथा उसकी आय होने से आवश्यकताओं की पूर्ति हो जताई थी। तब गांव में पैसा कम था पर इस आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण गांव समृद्ध थे। आज यह आर्थिक पारिस्थितिकी तंत्र टूट गया है। 


आज गांव में पैसा बहुत जा रहा है पर वह गांव की अर्थ व्यवस्था में ना घूम कर शहर आ जाता है। क्योंकि गांव के लोगों की आवश्यकताओं की सामग्री कारखानों में बनती है और शहरों में बिकती है। गांव के हुनरमन्द लोग पलायन कर शहरों में आ गए, पीछे रह गये बुज़ुर्ग, बीमार, महिलाऐं और बच्चे। दूध, सब्जियां, गल्ला, पैसा सब शहर में। यह ब्रेन ड्रेन ही नहीं रिसोर्स ड्रेन भी है। ग्रामीण अर्थ व्यवस्था में झाड़ू लग गई है।  


कुशल कारीगर शहर में सस्ता मजदूर बन गया। गांव का मकान मालिक शहर में अतिक्रमण कर फुटपाथ पर सोता है। महिलाओं पर  अत्याचार बढ़ गये। बच्चे ‘गिग वर्कर’ है जो डिलेवरी, चौकीदार तथा ड्राइवर है बन गये है। पैसा तथा संसाधन कुछ लोगों के हाथ में है। जो समय ख़रीद रहे है और सब समय बेच रहे है। पिछले सात दशकों से मैं इस परिवर्तन का प्रत्यक्षदर्शी हूँ। मैने अपना गांव बदलते देखा है। 



कुण्डेश्वर 

बचपन में प्रतिदिन दौड़ लगा कर कुंडेश्वर जाता और नदी में नहा कर दौड़ते वापिस आता था। हमारे गांव से लगा कुंडेश्वर का मंदिर है। इसकी  उत्पत्ति स्थानीय किंवदंतियों और प्राचीन मान्यताओं से जुड़ी हुई है। धंतीबाई की कहानी के अनुसार,, धंतीबाई नामक एक महिला धान कूट रही थी। तभी अचानक, उसकी ओखली से रक्त निकलने लगा। यह देखकर वह डर गई और उसने ओखली को एक कूड़े (ढक्कन) से ढक दिया। जब वह यह बात गांव वालों को बताने गई और वापस आकर कूड़ा हटाया, तो उसे वहां एक शिवलिंग प्रकट हुआ दिखा। यह चमत्कारी घटना ही इस मंदिर के उद्भव का कारण मानी जाती है। इस घटना के बाद, तत्कालीन महाराजा मदन वर्मन ने उसी स्थान पर कुंडेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया, जहाँ शिवलिंग प्रकट हुआ था।


एक और प्राचीन कथा इस स्थान को दैत्यराज बाणासुर से जोड़ती है, जो भगवान शिव के प्रबल भक्त थे और जिन की राजधानी बाणपुर थी। उनकी पुत्री, उषा देवी भी शिवलिंग की भक्त थीं और उन्होंने यहीं पर भगवान शिव की आराधना की थी। कहा जाता है कि उषा आज भी भोर में भगवान शिव को जल चढ़ाने आती हैं, और शिवलिंग पर चढ़ा हुआ जल मिलता है। यह भी माना जाता है कि उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें काल भैरव के रूप में दर्शन दिए थे।


यह भी माना जाता है कि शिवलिंग 'कुंडा' (एक पवित्र कुंड या कुएँ) से निकला था जो बगवार क्षत्रियों, एक राजपूत वंश, का था। कहा जाता है कि बगवार सूर्यवंशी, जिन्हें 'बघवा' (सिंह पर सवार) के नाम से जाना जाता है, बहुत पहले से जामदार नदी के घने जंगल में निवास करते थे। नंदी महादेव की मूर्ति के नीचे मिली एक पाद टिप्पणी में इसकी पुष्टि होती है। यह मंदिर सदियों से पूजा का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है, जिसे विभिन्न शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। 


राजा वीर सिंह देव (1605-1627): ओरछा के एक प्रसिद्ध शासक, राजा वीर सिंह देव, जो अपने सिद्धांतों और निर्माण के प्रति जुनून के लिए जाने जाते थे, ने कुंडेश्वर मंदिर के निर्माण और विकास को बहुत संरक्षण दिया। उन्होंने एक ताम्रपत्र 'राजज्ञा' (शाही फरमान) के माध्यम से बगवार वंश को "पंडा" या "कुंडेश्वर महादेव के पांड्या" की उपाधि भी प्रदान की, जिससे उनकी राजपूत वंशावली को मान्यता मिली। राजा महेंद्र विक्रमादित्य और महाराजा महेंद्र सवाई प्रताप सिंह जू देव जैसे बाद के शासकों ने भी 1947 में भारत गणराज्य में राज्य के विलय होने तक मंदिर का संरक्षण जारी रखा।


अब मंदिर का प्रबंधन 1980 में स्थापित श्री आशुतोष अपर्णा धर्म सेतु लोक न्यास द्वारा किया जाता है। मंदिर की स्थापत्य शैली चंदेल वंश के मंदिरों से प्रभावित मानी जाती है, जो 9वीं से 13वीं शताब्दी के बीच मध्य भारत पर शासन करते थे। पत्थरों पर बारीक और सुंदर नक्काशी उस समय की कला का अद्भुत नमूना पेश करती है। मंदिर के चारों ओर देवी-देवताओं की मूर्तियां पत्थरों पर उकेरी गई है।


मंदिर की एक अनूठी विशेषता यह है कि गर्भगृह के अंदर एक भूमिगत जलधारा प्राकृतिक झरने से होकर गुजरती है, जिससे एक शांत और रहस्यमय वातावरण बनता है। भक्तों का मानना है कि इस जल में शुद्धिकरण और उपचार के गुण हैं।


कुंडेश्वर का शिवलिंग स्वयंभू माना जाता है, जिसका अर्थ है कि यह स्वयं प्रकट हुआ है। इसे "13वां सिद्ध शिवलिंग" भी कहा जाता है और यह देश-दुनिया में आस्था का केंद्र बना हुआ है। एक लोकप्रिय मान्यता यह भी है कि कुंडेश्वर का शिवलिंग हर साल चावल के दाने के आकार के बराबर बढ़ता है। 1937 में, टीकमगढ़ रियासत के तत्कालीन महाराजा वीर सिंह जूदेव द्वितीय ने शिवलिंग के आस-पास खुदाई करवाई थी, और खुदाई में हर तीन फीट पर एक जलपरी मिली थी।


कुंडेश्वर मंदिर भक्तों के लिए अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखता है। भगवान शिव को समर्पित वार्षिक त्योहार महाशिवरात्रि यहां बड़े उत्साह के साथ मनाई जाती है। हजारों भक्त विशेष प्रार्थनाओं, अनुष्ठानों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए एकत्रित होते हैं। कुंडेश्वर में सालाना तीन बड़े मेले लगते हैं। 


एक महत्वपूर्ण मेला मकर संक्रांति के अवसर पर पौष/माघ (जनवरी) महीने में आयोजित होता है। दूसरा बसंत पंचमी पर और तीसरा कार्तिक एकादशी पर (अक्टूबर/नवंबर) आयोजित होता है। बरसात के मौसम की समाप्ति के दिन, महादेव को कुंड में जल विहार कराने का एक अनोखा "जल विहार महोत्सव" कब मनाया जाता है। माना जाता है कि महादेव स्वयं कुंड में जल विहार लेकर तालाब के जल को शुद्ध करते हैं। मंदिर का जमड़ार नदी के किनारे स्थित होना इसके कार्य और आध्यात्मिक परिवेश को बढ़ाता है, पास में 'बारी घर' और 'उषा जलप्रपात' जैसे पिकनिक स्थल भी हैं।


मेले के अवसरों पर हम लोग गांव से झुण्ड बना कर जाते। कभी पैदल तो कभी बैलगाड़ी से। बैलों को खूब सजाते। रास्ते में अन्य बैलगाड़ियों से दौड़ लगते। साथी लोकगीत गाते। साथ में घर से खाना बना कर ले जाते थे। नदी की किनारे बैठ कर सभी साथ में खाना खाते। मेले में सामान खरीदने को पैसा मिलता था तो घूम-घूम कर सामान खरीदते। सर्कस देखते। बड़े गोल झूलों पर झूलते। बड़ा मजा आता। मैने कक्षा पांच तक की पढ़ाई गांव के स्कूल में ही की। 


टीकमगढ़ 

कक्षा छह से पढ़ाई के लिया शासकीय मिडिल स्कूल टीकमगढ़, में प्रवेश लिया था। जहां से हमने आठवीं तक पढ़ाई की, ​​हायर सेकेंडरी की पढ़ाई हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की। मैं हमेशा पढ़ने में औसत विद्यार्थी रहा था। कभी फेल नहीं हुआ पर कभी फर्स्ट भी नहीं आया। इन सालो में मैं बहुत इन्ट्रोवर्ट छात्र था। केवल में राष्ट्रीय कैडेट कोर का सदस्य था। मुझे ड्रेस हमेशा से आकर्षित करती रही। मैं ज्यादातर समय खेत पर ही बिताता था। 


मेरी दिलचस्पी हमेशा इतिहास में रही है। टीकमगढ़, मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध शहर है। इसका इतिहास सदियों पुराना है और यह बुंदेला राजवंश के शौर्य, स्थापत्य कला और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक रहा है।


पश्चिमी बुंदेलखंड में प्राचीन काल में वाकाटक ब्राह्मणों का शासन था, जिनका मूल केंद्र बेतवा नदी के तट पर स्थित वाघाट था। ये प्रतापी राजा थे और मड़खेरा में उनके द्वारा बनवाया गया सूर्य मंदिर आज भी दर्शनीय है। वाकाटक, गुप्त और नाग राजा समकालीन थे।प्राचीन काल में बुंदेलखंड तपस्वियों की तपोभूमि के रूप में विख्यात था। कालपी में व्यास ऋषि का आश्रम और चित्रकूट-कालिंजर के पास वाल्मीकि ऋषि का निवास माना जाता है।


कालांतर में यहां चेदी राजाओं का शासन रहा, जिसके बाद नागों का राज्य आया। उनकी राजधानी नागा भद्र (नागौद) थी। नाग राजा शैव भक्त थे और उनका राज्य कला व संस्कृति में उच्च कोटि का था। इनकी सत्ता सिंधु नदी के किनारे शिवपुरी क्षेत्र तक थी। सिंधु के किनारे पर पवा इनकी दूसरी राजधानी थी। 


रामायण काल में यह क्षेत्र भगवान रामचंद्र जी के पुत्र कुश के अधीन था, जिसकी राजधानी कुशावती (वर्तमान में कालिंजर के पास लव पुरी, जो रामचंद्र जी के ज्येष्ठ पुत्र लव के अधीन थी) थी। महाभारत काल में यह क्षेत्र करुषपुरी के नाम से विख्यात था, जहां दलाकी-मलाकी राजाओं का राज्य था।


बुंदेला राजवंश का उदय (ओरछा रियासत) बुंदेला राजवंश की उत्पत्ति 11वीं शताब्दी में मानी जाती है। कहा जाता है कि एक राजपूत राजकुमार ने विंध्यवासिनी देवी को अपना बलिदान दिया, और देवी ने उन्हें रोककर 'बुंदेला' (वह जिसने रक्त अर्पित किया) नाम दिया।


ओरछा की स्थापना (16वीं शताब्दी): 1531 ईस्वी में रुद्र प्रताप सिंह बुंदेला ने ओरछा राज्य की स्थापना की। उन्होंने गढ़ कुंडार से अपनी राजधानी बेतवा नदी के किनारे ओरछा में स्थानांतरित की और यहीं पर किले और महलों का निर्माण शुरू करवाया। यह बुंदेला राजवंश का सबसे प्रमुख और पहला राज्य था।


वीर सिंह जूदेव (17वीं शताब्दी): ओरछा के सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक राजा वीर सिंह जूदेव थे, जिन्होंने जहांगीर महल और सावन भादों महल जैसे कई सुंदर महलों का निर्माण कराया। उनके शासनकाल में स्थापत्य कला अपने चरम पर थी।


1783 में, ओरछा राज्य के तत्कालीन शासक राजा विक्रमजीत सिंह बुंदेला के ओरछा से भागकर टेहरी को अपनी नई राजधानी बनाया।


महाराजा वीर सिंह जूदेव एक कृष्ण भक्त थे। उन्होंने भगवान श्री कृष्ण के एक नाम 'टीकम शाह' के आधार पर टेहरी के किले और नगर का नाम 'टीकमगढ़' रख दिया। इस प्रकार, टेहरी को औपचारिक रूप से टीकमगढ़ के रूप में जाना जाने लगा। टीकमगढ़ अपने विशाल किलों, महलों और मंदिरों के लिए प्रसिद्ध हुआ, जो बुंदेला वास्तुकला की भव्यता को दर्शाते हैं। यहां के शासकों ने कला, संस्कृति और धर्म को विशेष संरक्षण दिया।


महाराजा प्रताप सिंह जूदेव (1874-1930) जैसे बाद के शासकों ने भी सिंचाई परियोजनाओं और इंजीनियरिंग कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गणेशगंज में निर्मित शीश महल (बोतल हाउस) और हनुमान बेग घोड़े की मूर्ति इसके उदाहरण हैं। 1805 में ब्रिटिश हस्तक्षेप: 1811 में, ओरछा राज्य ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन बुंदेलखंड एजेंसी का हिस्सा बन गया।


1857 के सिपाही विद्रोह से 15 साल पहले, 1842 में बुंदेलखंड में एक बड़ा विद्रोह हुआ, जिसे 'बुंदेला विद्रोह' के नाम से जाना जाता है। सागर-नर्मदा क्षेत्रों के असंतुष्ट जमींदारों और सरदारों, विशेषकर चंद्रपुर के जवाहर सिंह और नरहट के मधुकर शाह बुंदेला ने ब्रिटिश कर नीतियों और अन्याय के खिलाफ विद्रोह किया। यह विद्रोह लगभग एक साल तक चला और इसे ब्रिटिश शासन के खिलाफ शुरुआती महत्वपूर्ण प्रतिरोधों में से एक माना जाता है, हालांकि इसे अंतिम दबा दिया गया।


1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान, ओरछा रियासत (टीकमगढ़) ने अंग्रेजों का साथ दिया था।टीकमगढ़ की लड़ाई रानी ने अंग्रेजों को समर्थन दिया, जबकि कई अन्य रियासतों ने विद्रोह में भाग लिया था। 1947 में भारत की स्वतंत्रता के बाद, ओरछा रियासत को 1 जनवरी 1950 को भारतीय संघ में मिला लिया गया। यह विंध्य प्रदेश राज्य का हिस्सा बना और फिर 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के साथ मध्य प्रदेश राज्य का हिस्सा बन गया।


टीकमगढ़ आज भी अपनी गौरवशाली विरासत और स्थापत्य चमत्कारों को संजोए हुए है। यहां के किले, मंदिर और झीलें बुंदेलखंड के समृद्ध इतिहास की गाथा कहती हैं। कुंडेश्वर मंदिर, ओरछा के महल और मंदिर, और जिले भर में फैली अन्य ऐतिहासिक इमारतें इसे पर्यटन और ऐतिहासिक अध्ययन का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाती हैं।


मैने उच्च शिक्षा स्नातक के लिये शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, टीकमगढ़ में एडमिशन लिया था। यह जिले का प्रमुख और सबसे पुराना सरकारी कॉलेज है। शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, टीकमगढ़ की स्थापना 1958 में हुई थी। यह कॉलेज उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक मील का पत्थर साबित हुआ, खासकर बुंदेलखंड के ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए। 


इसकी स्थापना का मुख्य उद्देश्य गरीब, वंचित और पिछड़े वर्ग के लोगों को शिक्षा प्रदान करना था। यह कॉलेज शुरुआत से ही डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से संबद्ध रहा है। बाद में मेरे समय अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा से संबद्ध रहा। फिर डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से संबद्ध हो गया। 


टीकमगढ़ में स्थित शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मेरे समय दो जगह लगता था।  एक पुरानी ऐतिहासिक "ताल कोठी" इमारत है, जिसका संबंध ओरछा रियासत और क्षेत्र की शैक्षिक विरासत से रहा है। यह इमारत अपने आप में कई कहानियां समेटे हुए है। 


ताल कोठी का निर्माण ओरछा रियासत के राजा प्रताप सिंह (संभवतः महाराजा वीर सिंह जूदेव के बाद के शासक) ने करवाया था।इसे झील के किनारे बनाया गया था, इसलिए इसे "ताल कोठी" कहा जाने लगा। यह उस समय के राजाओं की सौंदर्य और प्रकृति प्रेम को दर्शाता है, जहाँ वे विश्राम और चिंतन के लिए ऐसी जगहें बनवाते थे।


1956 में जब मध्य प्रदेश का गठन हुआ, तो ताल कोठी को शिक्षा के लिए समर्पित कर दिया गया। इसी परिसर में टीकमगढ़ का पहला पीजी कॉलेज (वर्तमान शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, टीकमगढ़) खुला। ताल कोठी का भवन ही कॉलेज का प्रशासनिक भवन बन गया। यह उस समय उच्च शिक्षा के विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। मेरे समय इस भवन में साइंस संकाय की कक्षाएं लगती थी। कला तथा वाणिज्य संकाय नये भवन में लगता था।


टीकमगढ़ का शासकीय देवेंद्र पुस्तकालय संभवतः देश के सबसे पुराने पुस्तकालयों में से एक है, जिसकी स्थापना राजशाही दौर में लोगों को साहित्य और शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए की गई थी।


ताल कोठी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है "ओरछा स्टेट लाइब्रेरी"  जिसकी सन् 1932 में तत्कालीन ओरछा नरेश महाराजा मधुकर शाह द्वितीय ने स्थापना की थी। यह लाइब्रेरी उस समय साहित्य और विचारों का एक प्रमुख केंद्र था। जिसमें हजारों की संख्या में किताबें और दुर्लभ पांडुलिपि (हस्तलिखित ग्रंथ) सजी हुई थी। 


यह ज्ञान का एक विशाल खजाना था, जिसमें सदियों पुराना साहित्य और शोध सामग्री मौजूद थी। राजा प्रताप सिंह ने इस भव्य कोठी को ज्ञान के प्रसार के लिए समर्पित किया था, जो उनकी दूरदर्शिता और शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को दर्शाता है।


मैं जब पहली बार अपनी कक्षा में गया तो वह पचास से अधिक लड़कों और लड़कियों की कक्षा थी। यह को -एड कालेज था। अभी तक की मेरी शिक्षा लड़कों के स्कूल में ही हुई थी। स्कूल के दिनों के हम तीन दोस्त थे। हम कक्षा की आखरी बेंच पर बैठते थे। बहुत शर्मीले, दब्बू तथा डरे हुए । 


एक दिन मुझे अपनी एक मार्कशीट अटेस्ट करवानी थी। मैं किसी प्राध्यापक को नहीं जानता था। मैंने सोचा कि बाकी सभी विषयों की कक्षाओं में आखिरी बेंच पर बैठता हूँ तो वह प्राध्यापक मुझे नहीं पहचानते होंगे। मैं भूगोल की कक्षा में सामने की सीट पर बैठा था तो मुझे लगा कि भूगोल के प्राध्यापक मुझे जानते होंगे। उनका नाम था रमेश चंद्र त्रिपाठी। वे भूगोल विभाग के विभागाध्यक्ष थे। मैं एक दिन हिम्मत करके उसके कमरे में गया। 


त्रिपाठी जी ने कहा- "आओ रवीन्द्र बैठो। " जब उन्होंने मुझे नाम से बुलाया तो मुझे मन ही मन बहुत अच्छा लगा। मुझमें हिम्मत आ गई कि चलो इन्हें मेरा नाम तो पता है। हालांकि कक्षा में रोज हाजिरी नाम बोलकर होती थी। 


त्रिपाठी जी- "बताओ कैसे आये?"


मैने गला साफ करते नज़ारे ऊपर उठा कर उन्हें देखा- "सर ! मार्कशीट अटेस्ट करवानी थी।"


उन्होंने पैनी निगाहों से मुझे देखा "ठीक है।" मैं उन पैनी नजरों से सहम गया। मैने नजरें नीचे कर ली। वह मेरी सुविधा समझ गये। 


बोले- "यह बताओं कालेज में इतने लोग है तुम उनके पास नहीं गए। मेरे ही पास क्यों आये?"

मैंने झूठ बोलना ठीक नहीं समझा। 


मैने कहा "सर! बाकी कक्षाओं में में पीछे बैठता हूँ। मुझे लगा कि वह लोग मुझे नहीं जानते होंगे। आप की कक्षा में सामने बैठता हूँ।  मुझे लगा आप मुझे जानते होंगे।” उन्हें मेरा जवाब पसंद आया।  


वह कुर्सी पर आगे खिसक कर बैठ गये। मुझे देख कर बोले- "लोग पांच साल कॉलेज में कुत्ता, बिल्ली की तरह गुजारा कर निकल जाते है। कुछ करो कि लोग तुम्हें जाने।"

मैने हिम्मत कर पूछा- सर ! क्या करें?"


त्रिपाठी जी- "लड़कियों को छेड़ो।"


"क्या?" मेरे मुंह से यकायक निकला। 


मुझे ऐसी सलाह की आशा नहीं थी शायद। 


"हाँ ! यह नहीं होगा?" त्रिपाठी जी ने कहा। 


"ठीक है तो प्राध्यापकों को मारो।" मेरा निस्तेज चेहरा देख कर उन्होंने कहा- "ठीक है तब चुनाव लड़ो।"


मेरी आंखों में उदासी देख कर बोले- "यह भी नहीं होगा। तो फिर पढ़ो, खूब पढ़ो सब तुम्हारी मार्कशीट देखते रह जाय। कुछ अलग करो। अगर चाहते हो कि लोग याद रखे तो लीक से हट कर काम करो। काम खुद बोले। तुम्हें बोलने की ज़रूरत ना रहे। एक बहुत ही प्रसिद्ध शेर है, जिसके रचयिता अल्लामा इकबाल हैं। कहते है कि-

"खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तक़दीर से पहले"

"खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।"


यह शेर हमें पुरुषार्थ, आत्मविश्वास, और आत्मनिर्भरता का संदेश देता है। यह बताता है कि हमें निष्क्रिय होकर भाग्य पर निर्भर नहीं रहना चाहिए, बल्कि अपनी क्षमताओं को पहचान कर, उन पर काम करके और कड़ी मेहनत करके अपने जीवन को उस दिशा में ले जाना चाहिए जो हम चाहते हैं।" मेरी आंखों में चमक लौट आई। मैं कुर्सी पर सीधा बैठ गया। 


उन्होंने कहा "मैं टूशन नहीं पड़ता। मैं तुम्हारी मदद करुंगा। पुस्तकालय से मेरे नाम जीतनी चाहे किताबें लो, जब चाहे मेरे घर आकर प्रश्न पूछो। मैं विद्यार्थियों से घर के काम नहीं करवाता।" थड़ा रुक कर बोले "यह कर सकते हो।"


"मैंने पूर्ण आत्मविश्वास से कहा "सर ! यह कर सकता हूँ।" यह मेरे जीवन का पहला मोड़ था। 


उन्होंने कहा- "भूगोल के प्रैक्टिकल में मैं तुम्हें सबसे कम अंक दूँगा। तुम्हें बैसाखियों पर नहीं चलाना चाहता। नहीं तो लोग कहेंगे तुम प्रैक्टिकल के अंकों के कारण टॉप कर रहे हो।"


उस दिन से मेरा जीवन बदल गया। यह मेरे जीवन का पहला मोड़ था। मैं पढ़ाई में जुट गया। अल्लामा इकबाल का वह प्रसिद्ध शेर अपनी हर कॉपी के पहले पेज पर लिखता था ताकि में रोज अपने लक्ष्य को याद रख सकू। सर मुझे पुस्तकालय ले कर गये। 'कुछ अलग करो' वाक्य मेरे जीवन का टर्निंग पॉइंट बन गया। मेरी दिनचर्या थी सुबह आठ बजे घर से कालेज कक्षा में जाना उसके बाद पुस्तकालय जाना, फिर परेड करना, शाम को अंग्रेजी की ट्यूशन पड़ना। त्रिपाठी सर के घर जाना फिर लौटना। 


त्रिपाठी सर ने मुझे विवेकानंद सोसाइटी, अरविन्द सोसाइटी का सदस्य बनाया। शहर के हर कार्यक्रम में भाग लेने की प्रेरणा दी। इस सब से मेरे व्यक्तित्व में बहुत परिवर्तन आ गया। मैं अब इंट्रोवर्ट,अंतर्मुखी से एक्सट्रोवर्ट, बहिर्मुखी हो गया। मैं एक ऐसा व्यक्ति बन गया जो सामाजिक रूप से सक्रिय और उत्साही था। मुझे दूसरों के साथ बातचीत करने में आनंद आने लगा। 


मैं अब पढ़ाई के साथ नाटक करता, तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता में भाग लेता। राष्ट्रीय कैडेट कोर में सीनियर अंडर ऑफिसर बन गया। राष्ट्रीय सेवा योजना का संयोजक बन गया। कैम्प लगाने लगा। गांव में प्राकृतिक चिकित्सा का केंद्र खोला। जब हमारा फर्स्ट ईयर की परीक्षा का रिजल्ट आया तो मैंने  कालेज की सभी फैकल्टी में सर्वाधिक नम्बर लाया। मेरी कक्षा के लड़के और लड़कियां मुझे ढूंढने लगी। 


हम लोग कॉलेज में वार्षिक उत्सव के समय नाटक करते थे। मैंने स्वर्ग में इतवार, पन्ना धाई, रीढ़ की हड्डी जैसे अनेक नाटक लिये। नाटक में लड़कों के साथ लड़कियां भी भाग लेती थी। नाटक की रिहर्सल कई दिन हमारे अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर के घर होती थी। वह नाटकों का निर्देशन करते थे। 


तात्कालिक भाषण प्रतियोगिता मेरी बहुत फेवरेट प्रतियोगिता थी। उसमें विषय अचानक पर्ची पर निकलता था। तत्काल आपको उस विषय के पक्ष या विपक्ष में बोलना होता था। मेरा मुकाबला मिस गोयल से होता था।  कभी वह फर्स्ट आती अभी मैं आता। इस प्रतियोगिता के कारण मुझे  बहुत सारे कुटेशन, कविताएं, गजल, गीत, मुहावरे तथा कहावतें, किस्से, कहानियां तथा चुटकुले याद हो गये थे। सार्वजनिक रूप से मंच पर बोलने का अच्छा अभ्यास हो गया था। 


मुझसे दोस्ती करना चाहते। मेरे नोट्स ले कर पड़ते। धीरे-धीरे सभी प्राध्यापक मुझे जानने लगे। मैं फेमस हो गया था। मुझे भी मजा आ रहा था। मैंने सफलता का स्वाद चख लिया था। त्रिपाठी सर के कारण पढ़ाई से फोकस नहीं हटा। अगली साल मैंने अपने रिजल्ट को दुहराया। 


मेरी शादी का किस्सा बहुत अनूठा है। जब में सातवीं कक्षा में था मेरे पिता जी का स्वर्गवास हो गया। मेरे चाचा ने परिवार की जिम्मेदारी संभाली। लेकिन बैंक में मैनेजर होने के कारण वह घर से बाहर ही पोस्टिंग पर रहते। कभी-कभी छुट्टियों में घर आते। घर का काम दादी देखती थी। 


हम भाई क्या विषय ले रहे कहां एडमिशन ले रहे यह निर्णय खुद लेने की आजादी थी। कोई रोकटोक नहीं थी। सब तरह की सुविधाऐं थी जैसी उस समय गांव के माध्यम वर्गीय परिवार में होती थी। गांव में हमारा परिवार सबसे धनी, साधन सम्पन्न परिवार था। पड़ोसियों से झगड़े होना आम बात थी। सभी पस्तोर परिवार के लोग थे। 


जब हम फर्स्ट ईयर का छात्र था मेरी शादी की बात चलने लगी। बुन्देलखण्ड में उन दिनों लड़के की योग्यता न देख कर परिवार की हैसियत देख कर शादियां होती थी। परिवार के रिश्तेदारों के अलावा नए तथा पण्डित शादियों को तय करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लड़का, लड़की देखी जाती। कुण्डली, कुल गौत्र का बहुत महत्त्व था। तो कभी-कभी मुझे लड़की वाले देखने आते। मैं घर पर नहीं मिलता तो मेरे कालेज आते। मेरे टीचर क्लास में मेरा नाम बुलाकर कहते भैय्या बाहर तुम्हें लड़कीवाले देखने आये है। क्लास के सभी लड़के, लड़किया हंसते मजाक बनाते थे। यह लगभग हर महीनें दुहराया जाने लगा। मेरी दादी चाहती थी कि उनके मरने के पहले वह अपने पोते का मुंह देख कर मरे। 


शादी का फैसला चाचा जी को करना था। वह अक्सर कोई न कोई कमी निकल कर रिश्ता तोड़ देते थे। उनके अपने मापदण्ड थे। उनका अरमान मेरी शादी धूमधाम से करने का था। मेरी दादी की चाचा जी से अक्सर बहस होती रहती थी। मेरी शादी में मेरी कोई भूमिका नहीं थी। मुझे पितृऋण चुकाना था खानदान के वंश को चलाने में अपना योगदान देना था। 


इस समय में पढ़ रहा था। एक दिन दादी तथा चाचा जी में बहुत बहस हुई। दादी ने बहुत चुभती बात चाचा जी को कह दी कि इसका बाप नहीं है। इस कारण तुम इसकी शादी नहीं कर रहे हो। चाचा जी को यह बात बहुत बुरी लगी और उन्होंने कहा कि आज जो रिश्ता आयेगा वह शादी निश्चित कर लेंगे। 


यह बहस सुबह हुई थी। दोपहर उस दिन टीकमगढ़ के चतुर्वेदी परिवार से रिश्ता आया और चाचा जी ने मेरी शादी तैं कर दी। बहुत धूमधाम तथा बड़े अरमानों से उन्होंने मेरी शादी की। शादी की बारात टीकमगढ़ मेरे मोहल्ले में ही जाना थी। तीन दिन बारात लड़की के घर रुकी। मेरे पूरे गांव के लोग तथा पूरे कॉलेज के सभी लड़के, लडकियां बारात में आये। मेरी दादी का यह सबसे अच्छा निर्णय था। जब में एम ए प्रीवियस में था मेरा पहला लड़का पैदा हुआ। 


मुझे याद है उस दिन मेरा पेपर था तो मेरे छोटे भाई ने पूरी व्यवस्था देखी। दादी खुश थी उनका पोता आ गया था। जब छोटे में शादी होती है तो पति-पत्नी में विवाद नहीं होते। दोनों एक ही परिवार में पलते बढ़ते है। उनकी आदतें, पसन्द-नापसन्द एक जैसी होती। घर्म मान्यतायें सामान होती। दोनों परिवारों की आर्थिक स्थिति एक जैसी होती। जल्दी बच्चा होने से जब आप जवान होते है तो बच्चे की जिम्मेदारी अच्छे से पूरी कर पाते थे। मुझे इस का बहुत फायदा मिला। मेरे दोनों बच्चे समय पर सेटिल हो गये।  


मेरे स्नातक के अंतिम वर्ष में देश में इमरजेंसी लागू हो गई। कालेज की छात्र यूनियन के चुनाव रोक दिये गए। मेरिट के आधार पर छात्र यूनियन गठित होने लगी। मुझे अंकों के आधार पर मुझे जनरल सेक्रेटरी नामांकित किया गया। अगले साल मैंने भूगोल से एम ए  करने के लिये एडमीशन लिया। तब मुझे छात्र संघ का प्रेसीडेंट बनाया गया। यूनिवर्सिटी में बोर्ड ऑफ़ स्टडीज का सदस्य नियुक्त किया गया। जय प्रकाश आन्दोलन से जुड़ गया। सर्वोदय आंदोलन में काम करने लगा। एम ए अन्तिम वर्ष में मुझे यूनिवर्सिटी के छात्र संघ का अध्यक्ष नामांकित किया गया। क्योंकि पूरी यूनिवर्सिटी की सभी फैकल्टी में मेरे सर्वाधिक अंक थे। मुझे गोल्ड मैडल दिया गया। 


जब में कॉलेज की यूनियन का प्रेसीडेंट था तो उस वर्ष मुझे अपने प्रिंसिपल से अनेकों बार मिलना होता था। उनकी पांच बेटियां थी। जब भी छात्रों की किसी समस्या पर उनसे बात करो तो वह हमेशा अपनी बेटियों की समस्या बताने लगते। कभी उनकी पढ़ाई तो कभी शादी। मैं परेशान हो गया था। तो एक दिन जब उन्होंने उनकी बेटियों की शादी की बात निकाली तो मैंने कहा सर ! आप प्रिंसिपल है। कॉलेज में सैकड़ों लड़के है यदि आप को एक पसंद न हो तो दो-दो से शादी कर सकते है। उस दिन से उन्होंने यह बात फिर नहीं उठाई।  


कॉलेज के वार्षिक समारोह का समय आने पर छात्रों ने फ़िल्मी गीत गाने बाले आर्केस्ट्रा को बुलाने का सुझाव दिया। मैंने कहा कवि सम्मेलन आयोजित करेंगे। भारी विरोध के बाद मेरी बात इस शर्त पर मानी गई कि गोपाल दास नीरज जी को बुलाया जाए। मैंने हाँ कर दी। उन्हें आमंत्रण भेजा गया। उन्होंने दो और कवयित्रियों को बुलाने की शर्त राखी।  बजट कम था लेकिन दूसरे खर्च कम कर उन्हें भी  आमंत्रण भेजा गया।  सब ने लिखित सहमति भेज दी। कवि सम्मेलन के दिन नीरज जी नहीं आये।  कैम्पस में हंगामा हो गया। बड़ी मुश्किल से कार्यक्रम हो सका। 


मेरे दोस्त के भाई तथा उनके दो साथियों ने शराब पीने के पैसे मांगे। उन्होंने हंगामा शांत करवाया था। मैंने बहुत मना किया पर उन्होंने बहुत जिद की। मुझे पैसे देने पड़े। वह शराब पीने दो मोटर साइकिलों पर गये। बाद स्टैण्ड की दुकान पर शराब पी कर जब मोटरसाइकिलों से लौट रहे थे तो सड़क की ढलान पर स्पीड बहुत तेज थी। दोनों आस-पास चल रहे थे। हिलने पर उनके हेंडिल भिड़ गये। दोनों मोटरसाइकिलों नीचे गिरी। सभी को चोट आई। लेकिन एक लड़के की रीढ़ की हड्डी टूट गई। उसने अपनी पूरी जिन्दगी बिस्तर पर गुजारी। नई-नई शादी हुई थी, परिवार की खुशियां हमेशा के लिये छिन गई। 


 'कुछ अलग करो' वाक्य के कारण  हर साल मुझे कालेज के वार्षिक उत्सव में बहुत प्रमाण पत्र तथा इनाम मिलते। मैंने राष्ट्रीय कैडेट कोर में "सी सर्टिफिकेट" हासिल किया। आर्मी अटैचमेंट किया तथा जूनियर कैडेट्स को पढ़ाया। राइफल शूटिंग में भाग लिया। यह सब डॉट्स जुड़ते गये जो मेरी जिंदगी में बहुत काम आये। 


जब में बोर्ड ऑफ़ स्टडीज का सदस्य था तब बैठकों में भाग लेने की लिये अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा जाना होता था। टीकमगढ़ से रात की बस रीवा जाती थी। उसी बस से यात्रा करना होती। रात भर बस की यात्रा बहुत थकान बाली होती थी। सुबह बस रीवा पहुंचती। रीवा बस स्टैण्ड पर एक धर्मशाला में ठहरता था। धर्मशाला के कमरे बहुत छोटे थे। सबसे मजेदार था पाखाना। कमरों की लम्बी लाइन। कमरे में पखाने में बैठने की जगह। नीचे खुला गड्डा होता था। जहां सुअर रखे जाते। जब पैखाना गिरता सूअर उसे खा कर साफ करते थे। ऐसी व्यवस्था मैंने पहली बार देखी थी। उन दिनों सर पर मैला ढोने की प्रथा थी। जाति विशेष के लोग यह काम करते थे। मुख्यतः महिलायें। 


बाद में सरकार ने सर पर मैला ढोने की प्रथा को गैर क़ानूनी घोषित कर बंद करवाया। बोर्ड ऑफ़ स्टडीज कमेटी का मुख्य काम था भूगोल विषय का सिलेबस /कोर्स निर्धारित करना। तो कमिटी में भूगोल विषय के प्राध्यापक सदस्य थे। बैठक की अध्यक्षता यूनिवर्सिटी के वाईस चांसलर करते थे। 


परीक्षा में सर्वाधिक मार्क्स लाने के कारन में अकेला स्टुडेंट्स का प्रितिनिधि था। जब पहलीबार यूनिवर्सिटी के प्रशासनिक भवन में गया तो देखा गलियारों में बोरों में परीक्षा की कापियां बिखरी पड़ी है। लोग उन्ही बंडलों पर से आना जाना कर रहे थे। यह बात जब की है तब रीवा यूनिवर्सिटी किराये के भवन में चलती थी जगह की कमी थी। 


मुझे परीक्षा की कॉपियों की ऐसी दशा देख कर बहुत बुरा लगा। कमेटी में भूगोल के रीवा के विभागाध्यक्ष डॉ. श्रीवास्तव थे। मैंने उनसे पूछा कि अगर किसी की कॉपी खो जाए तो फिर क्या होता है। उन्होंने बताया कि तब यूनिवर्सिटी उस समय जो औसत अंक है वह विद्यार्थी को दे कर रिजल्ट घोषित कर देती है। मैं शायद किस्मत वाला था। मेरी कॉपी कभी नहीं खोई थी। मैं हमेशा परीक्षा में बहुत तेजी से लिखता था और तीन सप्लीमेंट्री कॉपियां भर देता था। एक बैठक में वाइस चांसलर साहब ने मुझे चाय पीने को दी। उन दिनों चाय पीना अच्छा नहीं माना जाता था, खासकर स्टूडेंट्स के लिए। तब मैं चाय नहीं पीता था। वाइस चांसलर सिंह साहब ने मुझे मिठाई खाने के लिए पांच रुपये दिये। 


यूनिवर्सिटी के प्रोस्पेक्टस की बुकलेट में विषय के कोर्स के चैप्टर्स के साथ सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में ऐसी किताबों की सूची छपती थी जिन्हें स्टूडेंट्स को पड़ने की लिए यूनिवर्सिटी रिकमंड करती थी। इस सूचि में उनकी किताब का नाम जुड़वाने के लिए बहुत से सीनियर प्राध्यपक जिन्होंने किताबें लिखी थी मुझसे सम्पर्क करते थे। 


इस कारण धीरे-धीरे मैं भूगोल विषय के बहुत से सीनियर्स को जानने लगा था। बोर्ड ऑफ़ स्टडीज कमेटी ऐसे प्राध्यपकों की सूची भी निर्धारित करती थी जो दूसरे कालेज में जा कर वाह्य/एक्सटर्नल परीक्षक होंगे। यह परीक्षक वायवा /मौखिक परीक्षा लेते थे। जिस के अंक मुख्य रिलज्ट में जुड़े होने से स्टूडेंट्स की मैरिट लिस्ट बनती थी। मेरा नाम हमेशा मैरिट लिस्ट में रहा। 


युनिवर्सिटी की बोर्ड ऑफ़ स्टडीज कमेटी तथा बाद में युनिवर्सिटी की छात्र यूनियन का प्रेसिडेंटस होने के कारण मुझे बैठकों में भाग लेने की लिये रीवा जाना होता था। इस बैठकों में भाग लेने के कारण मुझे युनिवर्सिटी के प्रशासकीय काम काज को समझने तथा अंदर से देखने, जानने, समझने का मौका मिला। रीवा बघेलखण्ड में स्थित है और टीकमगढ़ बुन्देलखण्ड में स्थित है। बघेलखण्ड  बनाम बुन्देलखण्ड  की हमेशा प्रतिस्पर्धा रही है। 


एक बैठक के दौरान  बघेलखण्ड निवासी एक प्रोफ़ेसर ने मुझसे कहा था कि तुम बुन्देलखण्ड के हो कर मैरिट में कैसे आ सकते हो। क्योंकि बघेलखण्ड के लोग कभी नहीं चाहते कि बुन्देलखण्ड के स्टूडेंट्स, रीवा, बघेलखण्ड की यूनिवर्सिटी में टॉप करें। तब मैंने इस राजनीति को जाना। क्षेत्र बाद से यह मेरा पहला अनुभव था। जो बघेलखण्ड रीवा का स्टूडेंट मेरा प्रतिद्वन्दी था उसके मार्क्स मुझसे पन्द्रह प्रतिशत कम थे। इसलिये बघेलखण्ड के लोग चाह कर भी कुछ नहीं कर सके और मैं मेरिट में टॉप करता रहा। 


मुझे हमेशा छात्र वृति मिलती जिससे पढ़ाई का खर्च निकल जाता था। मैंने जब स्नातकोत्तर डग्री पूर्ण की  तब अंतिम समय में इमरजेंसी समाप्त हो गई थी। तब कुछ छात्र परीक्षा बढ़ाने के लिये आंदोलन करने लगे। मैं परीक्षा समय पर करवाने का पक्षधर था।  लेकिन छात्रों के दवाब के कारण मुझे छात्र आंदोलन में भाग लेना पड़ा। तब पुलिस ने हम लोगों को शांति भंग करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। उस समय लगा था कि भविष्य का कैरियर खतरे में हो गया। आखिरकार समय पर परीक्षा हुई और मैंने बहुत अच्छे मार्क्स से एम ए पास कर लिया। इस समय मेरी उम्र बीस वर्ष थी तब त्रिपाठी सर ने एम फिल करने की सलाह दी। 


 

रायपुर 

मुझे एमफिल में पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर के भूगोल विभाग में एडमिशन के लिये रायपुर जाना था। मैं घर से कभी बाहर नहीं गया था। केवल एक बार छात्रवृत्ति के लिये ट्रेन से भोपाल गया था। परिवार के लोग चिंतित थे। 


कुण्डेश्वर के दीक्षित परिवार के एक सदस्य शर्मा जी रायपुर बस स्टेण्ड पर क्लच गियर सुधारने की दुकान चलते थे।  उनके नाम दीक्षित जी ने मदद करने के लिये पत्र लिख दिया था। छत्तीसगढ़ ट्रैन से सुबह रायपुर पहुंचा। रेलवे स्टेशन से रिक्शा ले कर बस स्टैंड आया। दीक्षित जी का पत्र शर्मा जी को दिया। उन्होंने नाश्ता करवाया। मैंने अपना सामान उनकी दुकान पर रख दिया। उन्होंने बताया कि पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय भिलाई रोड पर आमा नाका के पास है। आमा नाका पर रोडवेज की बसों का डिपो था। 


मैं बस स्टैण्ड से खली बस में बैठ कर आमा नाका आया। वहां से रिक्शा ले कर विश्वविद्यालय के कैम्पस में दाख़िल हुआ। तब तक लंच टाइम हो जाने से लोग बाहर टहल रहे थे। मैंने रिक्शे से उतर कर जिस आदमी से प्रशासनिक भवन के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया की सामने का भवन ही प्रशासनिक भवन है। उन्होंने ने पूछा मुझे किस विषय में एडमिशन लेना है तब मैंने  एम फिल, भूगोल बताया। 


उन्होंने अपना परिचय दिया कि वह अग्रवाल बाबू है और भूगोल की लैब के प्रभारी है। किस्मत देखिये  जिस पहले आदमी से मुलाकात हुई वह उसी "डिपार्टमेंट" का था। उन्होंने मेरी बहुत मदद की।  एडमिशन फॉर्म ले कर भरवाया, फीस जमा करवाई, हॉस्टल का फार्म भरवाया था कमर अलॉट कर दिया। स्कॉलरशिप का फॉर्म भरवा कर जमा कर दिया। 


उनके स्कूटर से हॉस्टल आ कर रूम की चाबी मिल गई। उन्होंने कमरा साफ करवाया। मैं वापिस शर्मा जी के पास आया और सामान उठा कर कमरे में रात को रुका। लगभग हॉस्टल खाली था। आमा नाका जा कर सरदार जी के ढाबा पर खाना खाया और घोडा बेच कर सो गया। वाह क्या जगह है।


धीरे-धीरे होस्टल में स्टूडेंट्स आते गये। मैंने देखा जब बच्चे पहली बार होस्टल की आजादी को महसूस करते तब जो बच्चे पजामा का नाड़ा ठीक से नहीं बांध सकते वे सब तरह के नशे करते। एक तरह का नशा था गुड़ाखू।  हर बच्चा करता।  शुरू में मुझे लगा कि सब दिन में कई बार लाल दन्त मंजन करते है। मुझे लगा कि सब दांतों की सफाई का ध्यान रखते है। 


पर मेरे एक नये बने मित्र पुलस्त्य ने बताया कि 'गुड़ाखू'  तंबाकू से बना नशा है। तब मुझे पहली बार यह एहसास हुआ। 'गुड़ाखू' एक पेस्ट जैसा तम्बाकू है जिसका भारत के  कई राज्यों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है। उपयोग के दौरान इसे दांतों और मसूड़ों पर उंगली की नोक से रगड़ा जाता है। तम्बाकू के अलावा, इसमें गुड़, चूना, लाल मिट्टी और पानी भी होता है। पुलस्त्य होस्टल में विगत छह साल से रह रहे थे। उन्होंने अनेक विषयों में डिग्रियां पूरी कर ली थी और कई डिप्लोमा कोर्स किये थे। उनके पास होस्टल में दो रूम थे। एक रहने के लिये दूसरा कसरत के लिये। उनका शरीर बहुत बलिष्ठ था।  


सुबह डिपार्टमेंट गया। पंडित रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर का भूगोल विभाग, विश्वविद्यालय के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण विभागों में से एक है। भूगोल अध्ययन शाला स्कूल ऑफ स्टडीज इन ज्योग्राफी की स्थापना 1965 में हुई थी। भूगोल विभाग विश्वविद्यालय के पांच सबसे पुराने विभागों (स्कूल ऑफ स्टडीज) में से एक है। एमफिल, पाठ्यक्रम की शुरुआत, यह विभाग उन गिने-चुने भूगोल विभागों में से एक है जिसने देश में एम.फिल. पाठ्यक्रम को सबसे पहले शुरू किया। विभाग के पहले विभागाध्यक्ष थे प्रो. डॉ. प्रेम चंद अग्रवाल । 


विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. प्रेम चंद अग्रवाल से मिला। उन्होंने डॉ. शंकर राय, रीडर, को गाइड नियुक्त किया। डॉ. राय ने मुझे समझाया एम फिल दो साल का कोर्स है।  एक साल क्लास और दूसरे साल थीसिस। अगर मेहनत करो तो एक साल में भी कर सकते हो। थीसिस एक विस्तृत, औपचारिक शोध पत्र है जो किसी विशेष विषय पर गहन शोध और विश्लेषण के बाद लिखा जाता है। इसे एक स्वतंत्र विद्वान के रूप में, किसी विषय पर मौलिक शोध करने और अपने निष्कर्षों को प्रस्तुत करने की क्षमता का प्रमाण माना जाता है। 


मैं एम ए में डिजर्टेशन लिख चुका था। डिजर्टेशन को हिंदी में शोध प्रबंध या शोध-निबंध कहते हैं। यह एक विस्तृत, औपचारिक, और लिखित दस्तावेज होता है जो किसी विशेष विषय पर गहन शोध और विश्लेषण प्रस्तुत करता है। आमतौर पर, यह मास्टर्स डिग्री के लिए आवश्यक था। 


मैंने टीकमगढ़ जिले के भूमि उपयोग बिषय पर त्रिपाठी सर के अधीन डिजर्टेशन लिखा था जो मैं साथ लाया था।  डॉ. राय ने मुझे इसी बिषय पर थीसिस करवाने की सहमति दे दी। मैंने एक साल में कोर्स पूरा करने का अनुरोध डॉ. राय से किया। उन्होंने मुझे रात को लैब में काम करने के लिये व्यवस्था कर दी। 


कैंपस में तरह-तरह की कहानियां सुनाई जाती थी। मेरे विभाग की लैब मेन गेट के पास थी और होस्टल वहां से लगभग एक किलोमीटर दूर कैंपस के अंत में। वहां एक बंजारी माता मंदिर था। हम सुबह माता जी को प्रणाम करने जाते। फिर क्लास होती। दोपहर का खाना मेस में। फिर पुस्तकालय। रात को थीसिस का काम। भूगोल में आंकड़ों की गढ़ना कर टेबिल बनाना फिर कार्टोग्राफ़ी से ट्रेसिंग पेपर पर मानचित्र। बहुत टाईम लगता। 


तब आज की तरह ना तो कैलकुलेटर थे और ना कम्प्यूटर। सब काम हाथ से। आकड़ों की गाड़ना करने के लिए विभाग में एक फेसिट मशीन थी। मानचित्र ट्रेसिंग टेबिल पर स्टेंशिल्स की मदद से बनाते। प्रिंटिंग में भिजवाने के पहले टाइप राइटर पर टाइप करवाना। प्रिंटिंग प्रेस में तब एक-एक अक्षर जमा कर प्रिंटिंग के लिये फर्मा बनता। हर स्टेज पर गलतियां सुधाने का  मेहनत का काम। जरा सी गलती और पूरा पेज बेकार। 


कैंपस में मेरे सीनियर चन्द्राकर जी डॉ. शंकर राय के अधीन विगत तीन साल से पीएचडी रिसर्च कर रहे थे। धीरे-धीरे उनसे दोस्ती हो गई। उनके कमरे की हालत ऐसी थी कि महीनों में एक बार झाड़ू लगते। चाय का वर्तन दो-तीन महीनों में छोटे। पलंग के नीचे सब कुछ कपड़ा, किताबें, पुराने अखबार।


चन्द्राकर जी और मैं डॉ. शंकर राय के अधीन ही काम कर रहे थे। अपने काम के साथ-साथ डॉ. शंकर राय के द्वारा बताए काम भी हम लोग करते थे। डॉ. शंकर राय बहुत दबंग, छह फुट लम्बे, पहलवान जैसी पर्सनालिटी के मालिक थे। उनके पास बुलेट मोटरसाइकिल थी। उस पर जब चलते तो पूरे हीरो लगते। 


वह हमारे होस्टल के वॉर्डन भी थे। उनकी एक पुत्री थी जो कभी-कभी किसी लड़के के साथ घर से भाग जाती थी। तब वह क्लास में घोषणा करते- "मेरी लड़की किसी लड़के के साथ भाग गई है। मैं उसे ढूंढने जा रहा हूँ। इसलिये आगे क्लास नहीं होगी।"


चन्द्राकर जी ने एक कहानी सुनाई कि कैम्पस में एक लड़की ने प्यार में असफल होने पर आत्महत्या कर ली थी। अब रात में उसकी पायल की आबाज कैम्पस में गूंजती है। रोज रात को दो बजे काम करके लैब से होस्टल जाता तो हनुमान चालीसा का पाठ करता। अब कह नहीं सकता कि हनुमान चालीसा का चमत्कार था या चन्द्राकर जी की कहानी झूठी थी। 


न तो कभी पायल की झंकार सुनी ना वह मिली। साल ऐसे ही काट गया। मैंने सभी पेपर अच्छे मार्क्स से पास कर लिये थे। मेरी थीसिस का कुछ काम बचा था। इस कारण गर्मियों की छुट्टियों में घर नहीं गया। थीसिस का काम करता था।  गर्मियों की छुट्टियों कारण पूरा कैम्पस तथा होस्टल खाली था। 


हम हर शनिवार को इंग्लिश मूवी देखने जाते जो ना हमें समझ आती ना सिनेमा हॉल बाले को। हम लोगों को स्टूडेंट आईडी कार्ड पर टिकिट सस्ते मिलते थे। एक बार हम लोग सिकन्दर की मूवी देखने गये तो देखा कि पहले पार्ट में सिकंदर मर रहा था और दूसरे पार्ट में पैदा हो रहा था। बाद में पता चला कि सिनेमा हॉल के लड़के से गलती हो गई थी उसने दूसरा पार्ट पहले दिखा दिया और पहला बाद में। मजेदार बात यह थी कि सिनेमा हॉल में किसी ने हल्ला नहीं मचाया। इसका मतलब था किसी को समझ नहीं आया था। 


रायपुर में गणेश उत्सव, काली माता का उत्सव की बड़ी धूम होती थी। हम लोग रात भर झांकियां देखते फिरते थे। दोस्तों के साथ मस्ती करते। हमारा एक दोस्त उड़ीसा से था। उसकी हैंडराइटिंग बहुत बढ़िया थी। वह बैगनी स्याही के पेन से लिखता था। उसकी एक प्रेमिका थी जिसकी आवाज में उसके पास एक गाना था- "तेरा मेरा प्यार अमर, फिर न जाने क्यों लगता है डर" यह गीत "असली नकली" फिल्म का था। 


वह हमेशा गाता तथा सुनता था। पास एक कैमरा था। खूब फोटो खींचता। रील डेवलप करने स्टूडियो में देता। मेरी उसने फोटो निकाली थी जो अभी भी मेरे पास है। उस ने मुझे फोटो खींचना सिखाया। तब से मुझे फोटोग्राफी का शौक लग गया। मैंने बाद में एक कैमरा खरीदा और फोटोग्राफी करने लगा। तब यह हॉबी बहुत महगीं पड़ती थी। होस्टल में सब तरह के व्यसन चलते थे। लेकिन मेरे सभी दोस्त मेरे जैसे थे इसलिये मुझे किसी व्यसन की लत नहीं लगी। 


ऐसे ही गर्मियों के एक दिन में मेरे कमरे के सामने रहने वाले टेकाम के कमरे में गया। वह एक फॉर्म भर रहा था। मैंने उससे पूछा की यह क्या फॉर्म है। तब उसने बताया कि  मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग ने बहुत से खाली पदों के लिये विज्ञापन निकाला है।  वह उसी की परीक्षा का फॉर्म भर रहा है। उसने मुझे इस परीक्षा में बैठने की सलाह दी। मैंने इस दिन के पहले इस परीक्षा का नाम नहीं सुना था। 


मैंने टेकाम को बताया- "मेरा पहला लक्ष्य सेना में जाने का था। मेरी दादी इस के बहुत खिलाफ थी। तब मैंने कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी करने की सोची थी। त्रिपाठी सर की भी यही सलाह थी। तब इस पद के लिये न्यूनतम योग्यता एम फिल या पीएचडी थी।  इसी कारण मैं एम फिल कर रहा था।"


टेकाम ने पूछा- "क्या में किसी नौकरी के लिये पहले किसी परीक्षा में बैठा हूँ ?"


"नहीं मैं किसी परीक्षा में नहीं बैठा।" मैंने जवाब दिया।  


टेकाम ने कहा कि "कॉलेज में प्राध्यापक की नौकरी के लिये भी मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा लेता है, तो तुम इस परीक्षा में बैठ कर अनुभव ले लो।"


मैंने उस की बात मान ली। यह मेरे जीवन का दूसरा मोड़ था। मैंने टेकाम की सलाह पर कैम्पस के पोस्ट ऑफिस से मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का आवेदन फॉर्म ख़रीदा। मैंने अपने जीवन का पहला फ्रॉम भरा था। तो सोचा कि हमारे एक  प्राध्यापक गुप्ता सर कैम्पस में अनुसूचित जाति, जान जाति के आवेदकों को राज्य शासन की और से संचालित सेंटर पर कोचिंग देते थे। मैंने सोचा उनसे फॉर्म चैक करावा लेता हूँ ताकि कोई गलती न हो। 


मैं उनके घर फॉर्म की जांच करवाने गया। उन्होंने देखा कि मैंने केवल तृतीय श्रेणी के पदों के लिए फॉर्म भरा था। उन्होंने पूछा तो मैंने बताया कि मैं केवल अनुभव के लिए बैठ रहा हूँ। तब उन्होंने कहा जब फैल हो कर अनुभव लेना है तो प्रथम तथा द्वितीय श्रेणियों के पदों की परीक्षा दे दो। 


इन श्रेणियों में राज्य प्रशासनिक सेवा उप जिलाध्यक्ष / डिप्टी कलेक्टर, राज्य पुलिस सेवा उप पुलिस अधीक्षक / डीएसपी,  राज्य लेखा सेवा, वाणिज्य कर अधिकारी तथा जिला आबकारी अधिकारी जैसे पद आते है। पहले मैंने वैकल्पिक विषय में यूरोपियन हिस्ट्री विषय लिया था। अब इन कैटेगरी के लिये एक ओर विषय लेना था। मेरा गणित बहुत कमजोर था इस लिये अर्थशास्त्र विषय नहीं लिया। 


तब गुप्ता जी ने मेरे बी ए का हिन्दी विषय फॉर्म में लिख दिया तथा डीएसपी की जगह डिप्टी कलेक्टर को पहला प्रेफरेंस लिख दिया। उनके घर से निकल कर मैंने फॉर्म पोस्ट ऑफिस से रजिस्टर्ड डाक से भेज दिया। 


हॉस्टल में आ कर मैंने पहली बार इन चयनित विषयों का सिलेबस देखने के लिये मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की निर्देश पुस्तिका घ्यान से पहली बार पढ़ी। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग का गठन 1 नवंबर 1956 को राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 118 (3) के तहत राष्ट्रपति के आदेश द्वारा किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में निष्पक्ष और योग्यता-आधारित चयन प्रक्रिया के माध्यम से योग्य उम्मीदवारों की भर्ती करना था। इसका मुख्यालय इंदौर में स्थित है। 


यूरोपियन हिस्ट्री का सबसे कम तथा हिन्दी का सबसे विस्तृत सिलेबस था। अगले दिन मैंने गुप्ता जी से शिकायत कि तो वह मुझे पुस्तकालय ले गये। उन्होंने वहां श्रीवास्तव पुस्तकालय इंचार्ज से मिलवा कर उनसे मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पुराने प्रश्न पत्र तथा सभी किताबों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया। श्रीवास्तव जी ने मुझे पिछले दस वर्षों के पुराने प्रश्न पत्र दिये तथा सभी सम्भव किताबें उपलब्ध करवा दी।


दो-तीन दिन मैंने कुछ नहीं किया। एक दोपहर मैं खाना खा कर कमरे में लेटा था। ना जाने कहां से मेरे मन में ख्याल आया "पस्तोर जी तुम कभी फैल नहीं हुए यदि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में फैल हो जाते हो तो रिकॉर्ड ख़राब हो जायेगा।" तब मैंने उठ कर टाइम टेबल बनाया। उसके हिसाब से नोट्स बनाना शुरू किये। खूब मेहनत की। जितनी किताबें हो सकती थी एकत्र की। 


इस बीच श्रीवास्तव पुस्तकालय इंचार्ज से अच्छी दोस्ती हो गई थी। वह अपने घर गोरखपुर जा रहे थे। उनकी पत्नी को बच्चा हुआ था। उन्होंने अनुरोध किया कि जब वह पिछली बार घर गये थे तो उनके यहां चोरी हो गई थी। तो उन्होंने उनकी अनुपस्थिति में उनके घर में सोने का अनुरोध किया।  मैं अकेला होस्टल के कमरे में सोता था तो मुझे कोई दिक्कत नहीं लगी। में उनके घर सोने लगा। 


मैं हमेशा रात में नौ बजे सो जाता तथा चार बजे उठ जाता। जिस दिन श्रीवास्तव जी को आना था उसके एक दिन पहले की रात मैं बहुत गहरी नींद में सो रहा था। मैं अपने कपड़े खूंटी पर टांग देता था। हाथ घड़ी पलंग के पीछे सन्दूक पर रख देता था। 


उस रात चोर आये मेरे कपड़े, घड़ी, पैसा तथा जूते तक ले गये। श्रीवास्तव जी के बड़े-बड़े संदूक मेरे सिरहाने से ले गये। चोरों ने दरवाजे की सटकनी गिलमिट से छेद कर निकल दी थी। चोर इतना सब करते रहे और में सोता रहा। सुबह जब समय देखने हाथ पीछे किया तो घड़ी गायब थी। 


मुझे श्रीवास्तव जी के लौटने पर घर जाना था। मैंने बैक से पूरा पैसा निकाल कर पर्स में रखा था। सब गायब था। मैंने चादर लपेट कर पड़ोसियों को उठाया। उन्हें पूरी घटना बताई। हम लोग पुलिस थाने रिपोर्ट करने गये। उलटा पुलिस मुझ पर शक करने लगी। श्रीवास्तव जी ने मुझे पूरे घर की चाबियां दी थी। उनके संदूक चादर से ढके थे। मैंने नहीं देखे थे कितने थे। 


अगले दिन श्रीवास्तव जी आ गये तब उन्होंने  चोरी गये सामान का पूरा विवरण पुलिस को दिया। कुछ संदूक तथा कपड़े, कागज और अन्य सामान सामने के खेत से मिला। श्रीवास्तव जी ने मुझे किराये के पैसे दिये तब में टीकमगढ़ लौट सका। 


एम फिल, भूगोल का रिजल्ट जब आया तो मैंने एक साल में ही यह कोर्स बहुत अच्छे मार्क्स से पास कर लिया था। मैंने यहां भी यूनिवर्सिटी में टॉप किया था। डॉ. राय चाहते थे कि मैं उनके अंडर पी एचडी करू। मैने पी एचडी के लिये रजिस्ट्रेशन करावा लिया। मुझे यू जी सी की स्कॉलरशिप मिल गई थी। लेकिन मुझे पी एचडी बीच में छोड़ कर टीकमगढ़ आना पड़ा। 



ग्वालियर 

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा जनवरी में थी और टीकमगढ़ में सेंटर नहीं था। मैं रायपुर और नहीं रुकना चाह रहा था। तो परीक्षा फॉर्म में मेरे घर से सबसे नजदीक उपलब्ध ग्वालियर सेंटर भर दिया था। टीकमगढ़ लौट कर मैं मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा देने ग्वालियर गया। 


ग्वालियर में मेरे छोटे भाई की ससुराल है। मैं वही रुका। ससुराल में खूब खातिरदारी हुई। महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में मेरा परीक्षा का सेंटर था। महारानी लक्ष्मीबाई कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय ग्वालियर, मध्य प्रदेश में स्थित एक प्रतिष्ठित और शासकीय स्वशासी उत्कृष्ट संस्थान है। इसे अक्सर एमएलबी कॉलेज के नाम से भी जाना जाता है। यह स्थान अचलेश्वर मंदिर के पास, सनातन धर्म मंदिर रोड, लश्कर पर स्थित है। 


मैंने मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के पिछले दस वर्षों के पुराने प्रश्नों के आधार पर पाठ्यक्रम/सिलेबस के आधार पर चेपटर/अध्याय वाइज उत्तर लिख डिटेल नोट्स बनाये थे। खूब रिवीजन किया था। पॉकेट डायरी में महत्वपूर्ण पॉइंट लिख कर याद किया था। मैं हमेशा पूरा सिलेबस कवर करता था। यह आदत कालेज के दिनों से थी। इसलिये मैं हमेशा परीक्षा पेपर सभी प्रश्न हल कर सकता था। मुझे कभी केवल इम्पोर्टेन्ट पढ़ने की जरूरत नहीं होती थी। मैंने कभी ट्यूशन नहीं पढ़ी नहीं कोचिंग ज्वाइन की। बाजार से गाइड या नोट्स खरीदने की जरूरत नहीं पड़ी। 


टीकमगढ़ से ग्वालियर के लिये रात में बस चलती थी। परीक्षा दे कर में रात की बस से टीकमगढ़ आ रहा था। ठण्ड की रात थी। बस की सभी खिड़कियां बंद थी।रात में सभी यात्री कम्बल ओढ़ कर सो रहे थे। रात में यकायक धुआं भर गया। लोगों को सांस लेने में कठिनाई होने लगी। कुछ ने जैसे ही उनके पैर सीट के नीचे रखे पैर जलने लगे। 


ड्राइवर ने बस रोक दी। मैं गहरी नींद में था। लोगों ने हिलाकर उठाया। बताया नीचे एसिड है। मैंने अपनी किताबों के बैग जैसे ही उठाए उन में से किताबें एसिड में फ़ैल गई। बैग कपडे के थे। उनका कपड़ा एसिड से गल गया था। मेरे पास ऐसे चार बैग थे। जिनमें पुस्तकालय की किताबें और मेरे नोट्स भरे थे। वह भी जल कर गल गये। सब वर्बाद हो गया था। मेरी किताबें और मेरे नोट्स नष्ट हो गए थे। अच्छी बात यह थी कि परीक्षा हो गई थी। बाहर घुप अंधेरा था। सब लोग बस से बाहर आ कर खड़े हो गये। 


लोगों के पूछने पर ड्राइवर ने बताया कि बस में किसी सुनार के लिए ग्वालियर से सल्फ्यूरिक एसिड के तीन ड्रम बस के अन्दर पीछे रखे थे। सल्फ्यूरिक एसिड  का सुनार गहने बनाने में उपयोग करते थे। रास्ते में बस चलने पर ड्रम का ढक्कन खुल कर लुढ़क गया था। जिस  कारण से बस में एसिड फैल गया था। 


शुद्ध सल्फ्यूरिक एसिड गंधहीन होता है। यह रंगहीन और तैलीय तरल होता है। जब सल्फ्यूरिक एसिड को पतला किया जाता है या यह किसी धातु या हवा के साथ प्रतिक्रिया करता है, तो यह सल्फर डाइऑक्साइड गैस छोड़ता है। सल्फर डाइऑक्साइड की गंध तीखी, घुटन भरी और अम्लीय होती है। इसकी गंध को जलती हुई माचिस की तीली या सड़े हुए अंडे जैसी होती है। सल्फर डाइऑक्साइड एक जहरीली गैस है।



टीकमगढ़ कॉलेज 

इन्हीं दिनों टीकमगढ़ कालेज के भूगोल विभाग में एक एडहॉक प्राध्यापक की विकेन्सी निकली। मेरा उस पद पर चयन हो गया। जिस विभाग में मैंने अध्ययन किया था अब उसी विभाग में मुझे पढ़ाने का अवसर मिल गया। मैं बहुत मेहनत से अपनी तैयारी कर फर्स्ट इयर को पढ़ता था। लेकिन छात्र बहुत रुचि नहीं लेते थे। एक दो छात्र बहुत उजड्ड टाईप के थे। यह छात्र कक्षा शुरू होने के बाद आते। बहुत रौब के साथ। 


एक दो बार मैंने उन्हें समझाना चाहा तो लड़ने को तैयार हो गए। मैंने एक बहुत बदतमीज छात्र को सबक सीखने का निर्णय किया। अगले दिन वह फिर लेट आ कर कक्षा में घुसाने लगा। मैंने उसे रोका तो उटपटांग बोलने लगा। मैंने एक लात जोर से मारी वह बाहर बरामदा में गिर पड़ा। वह बाहर भाग गया। फिर कुछ नेता टाइप के लड़कों को ले कर आया। मैं इस कॉलेज का तथा यूनिवर्सिटी का प्रेसीडेंट रह चुका था और उन में से कुछ छात्र नेताओं के बड़े भाई मेरे साथी रह चुके थे। 


यह छात्र बाहर से पढ़ने नया-नया आया था और मेरे बारे में नहीं जनता था। उन छात्र नेताओं ने उसे मेरे बारे में बताया। जब उसने मेरी शिकायत कॉलेज के प्रिंसिपल से कर दी। उन्होंने मुझे बुला कर कहा कि अब तुम छात्र नहीं हो। तुम अब प्राध्यापक हो तो बच्चों को मार नहीं सकते। बात ख़त्म हो गई। 


मजा तो तब आया जब एक दिन एक लड़का मेरे ऑफिस भोपाल आया। मैं तब ग्रामीण विकास विभाग में आयुक्त के पद पर था। उस लड़के ने मेरे पैर छुए। मैंने जब मना किया तो बोला सर ! अपने पहचाना नहीं। बहुत साल पहले कॉलेज में आपने मुझे एक लात मारी थी, उस कारण मैं आज पंचायत इंस्पेक्टर बन गया। यदि दो लात मार देते तो शायद डिप्टी कलेक्टर बन जाता। कमरे में बैठे हम सब बहुत हँसे। पुरानी  बातें याद आ गई। 


1980 का दशक मध्य प्रदेश में प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती के लिए एक महत्वपूर्ण काल था। इस दौरान मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग  की कार्यप्रणाली भी विकसित हो रही थी। 1980 के दशक में मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा राज्य सेवा परीक्षा का आयोजन अपेक्षाकृत नियमित रूप से किया जाता था। इन परीक्षाओं के माध्यम से डिप्टी कलेक्टर जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर सीधी भर्ती की जाती थी। 


उस समय परीक्षा पैटर्न में मुख्य रूप से प्रारंभिक परीक्षा प्रीलिम्स, नहीं होते थे।  सीधे मुख्य परीक्षा मेन्स और साक्षात्कार इंटरव्यू होते थे। मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में लिखित परीक्षा और अंतिम चयन के बीच एक निश्चित अनुपात नहीं होता है। बल्कि यह एक बहु-चरणीय प्रक्रिया है। अंतिम चयन के लिए मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार के अंकों का विशिष्ट भार होता था। साक्षात्कार यह अंतिम चरण होता था। यह उम्मीदवार के व्यक्तित्व, संचार कौशल और प्रशासनिक भूमिकाओं के लिए आपकी उपयुक्तता का आकलन करता था। 


आप इसे इस तरह समझ सकते हैं कि अंतिम चयन में लिखित परीक्षा मुख्य परीक्षा का लगभग 88.9%  और साक्षात्कार का लगभग 11.1% का  भार होता था। यह एक अनुपात नहीं, बल्कि अंकों का सीधा योग होता था। कट-ऑफ मार्क्स हर साल पदों की संख्या, परीक्षा के कठिनाई स्तर और उम्मीदवारों के प्रदर्शन के आधार पर बदलते रहते थे।


एक दिन जब में क्लास ले रहा था तब मेरा एक दोस्त अख़बार ले कर मेरे पास आया और बोला तू यहां क्लास क्यों ले रहा है तू तो मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा में फर्स्ट कैटेगरी की लिये पास हो गया है। मैंने जब अख़बार देखा रोल नम्बर बार-बार मिलाया। भरोसा नहीं आया। पेपर ले कर घर गया सब को बताया। सब बहुत खुश थे। मिठाई का भोग भगवान को लगा कर सब को प्रसाद दिया गया। 


अगले दिन जब में कॉलेज गया सब का व्यवहार मेरे प्रति बदल रहा था। टीचर कॉमन रूम में मेरी चर्चा हो रहीं थी। कुछ बहुत खुश थे। तो कुछ इस बात से दुखी थे कि मैंने फर्स्ट कैटेगरी के लिये क्यों भरा। उनका कहना था कि टीकमगढ़ जिले से आज तक फर्स्ट कैटेगरी में किसी का चयन नहीं हुआ था। 


उन्हें डर था कि लिखित परीक्षा पास करने के बाद यदि इंटरव्यू में फेल हो गया या कम नम्बर आये तो मेरा चयन नहीं होगा। कुछ शिक्षक मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा में मिलने वाले तीनों अटेम्ट दे चुके थे। कुछ लिखित परीक्षा पास नहीं कर पाए थे तो कुछ इंटरव्यू में कम नम्बर आने से रह गये थे। उनमें से अधिकांश मेरे शिक्षक रह चुके थे, इसलिये मेरी योग्यता पर उन्हें शक था।


उन सब की बातें मुझे रोज सुनना होती थी। मैं बहुत परेशान हो गया। घर पर भी लोग मिलने आते अपने अनुभव बताते। दूसरों की असफलता के किस्से सुनाते। क्योंकि मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा में जो बैठते उन की संख्या बहुत होती है। पर बहुत कम का चयन होता, सफल बहुत कम होते। इसलिए असफलता की कहानियां अधिक थी। 


मेरे पहले टीकमगढ़ के दो लोगों का चयन द्वितीय श्रेणी के पदों हुआ था। उनमें से एक बहुत बड़े सेठ का लड़का था। बहुत कहानियां थी। लाखों की रिश्वत। मंत्रियों की सिफारिश। अधिकारियों से परिचय आदि। मेरे पास यह कुछ नहीं था। मैं उन दोनों से मिला कोई सकारात्मक बातचीत नहीं। 


हमारा परिवार टीकमगढ़ के राज परिवार से जुड़ा रहा था। किसी ने सलाह दी नरेन्द्र राजा से मिलों। वह शायद मदद करें। मैं उनसे मिलने उनके फार्म पर गया। वह कुछ काम कर रहे थे। उनकी पत्नी ट्रैक्टर चला रहीं थी। मैंने पहली वार किसी महिला को ट्रैक्टर चलाते देखा था। 


नरेन्द्र राजा गर्मजोशी से मिले। परिचय जान कर खुश हुए। बातों का सिलसिला चला। उन्होंने बताया कि किसी जमाने में वह आदिवासी विकास विभाग में विकास खण्ड अधिकारी के पद पर तामिया छिंदवाड़ा में काम कर चुके थे। उन्होंने अपने तीन चार सन्दूक खोल कर दिखाए जिन में शूट रखे थे। बोले जितना वेतन था उस में मेरे सूट नहीं धुल पाते थे। रिश्वत लेता नहीं।   


गुजारा नहीं होता था। नौकरी छोड़ दी। तब से खेती करते है। चुनाव लड़ते है। वर्तमान में ग्रामीण बैक के चेयरमैन के पद पर हूँ। ग्रामीण बैक का नया कॉन्सेप्ट शुरू हुआ था ब्रांच मैनेजर के पद भरे जाना थे। उन्होंने सलाह दी कि अगर मैं ब्रांच मैनेजर के पद की लिखित परीक्षा पास कर लू तो वह मुझे इंटरव्यू में पास करवा कर ब्रांच मैनेजर बनवा देंगे। बहुत निराश हो कर घर लौटा। 


इंटरव्यू की तिथि नजदीक आ रही थी। परिवार में सब परेशान। हमारे एक भाई स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वह खबर लाये कि सतना से एक व्यक्ति मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग के सदस्य थे। उन्होंने सलाह दी उनसे मिला कर मदद  मांग सकते है। मेरे चाचा तथा बड़े भैया सतना गए। वह तो नहीं मिले। जिस दिन यह लोग बस से लोट रहे थे उस दिन होली का त्यौहार था। दोनों बहुत परेशान हो कर लौटे। मेरे चाचा ने मुझे बहुत डाटा कि अपना काम खुद क्यों नहीं कर सकते। 


मेरे पास कॉलेज में पढ़ाने की अस्थाई नौकरी थी। मुझे अपनी योग्यता पर भरोसा था। ज्यादा चिन्ता नहीं थी। इंटरव्यू ग्वालियर के रेस्ट हाउस में था। इंटरव्यू के नियत दिन के तीन दिन पहले मैं और मेरा छोटा भाई ग्वालियर गये। लोगों ने सलाह दी थी कि तीन दिन दूसरे लोगों के इंटरव्यू देखो। क्या पूछते है? इंटरव्यू की तैयारी कैसे करते है? कपड़े कैसे पहनते है? सवाल बहुत थे। जवाब देने वाला कोई नहीं। गाइड करने वाला कोई नहीं। भाई की ससुराल गए वहां ऐसा माहौल कि मैं डिप्टी कलेक्टर बन ही गया हूँ। इससे पहले परिवार में किसी ने ऐसी परीक्षा कभी नहीं दी थी। 


पहले दिन दिन जब हम इंटरव्यू बाली जगह पहुंचे तो गजब का नजारा था। एक-एक कैंडिडेट के साथ कई लोग। कोई बड़ा नेता, कोई सेठ, कोई अधिकारी। कोई दो बार तो कोई तीसरी बार इंटरव्यू  दे रहा था मैं और मेरा छोटा भाई। इंटरव्यू शुरू हुए। 


जैसे कैंडिडेट बाहर आता उसको एक इंटरव्यू बाहर देना पड़ता। घेर लेते। सांस नहीं लेने देते। सवाल पर सवाल। इतना हल्ला कि कई बार कुछ सुनाई नहीं देता। मैंने यह माहौल देखा तो मन में रात को सोचा अपना तो चांस है नहीं। हमने तो पहली बार कोई परीक्षा दी। वह भी एक्सपीरियंस के लिये। सो चिंता छोड़ो। मजे से इंटरव्यू दो। मन से सारा दबाव उतर गया। मैं घोड़े बेच कर सो गया। 


अगले दिन फिर इंटरव्यू देखने गये। एक लड़की बदहवास हालत में बाहर आई। लोगों ने उसे घेर लिया। उसने एक लड़के से कहा कुर्सी लाओ। वह दौड़ कर कुर्सी लाया। उसने फिर कहा पानी लाओ दूसरा लड़का पानी की बॉटल लाया। उसने पानी पिया। फिर इत्मीनान से बोली जब में अन्दर गई तो में बहुत घबड़ा गई। उन्होंने बैठने को कहा तो मुझे कुर्सी नहीं दिखी। एक सदस्य ने कुर्सी पर बैठाया। मैं बैठ गई। 


उन्होंने सवाल पूछने शुरू किये। मुझे कुछ समझ नहीं आया। मेरी घिग्घी बंध गई। अंत में हार कर उन्होंने मेरा नाम पूछा। वह भी मैं नहीं बता सकी। उन्होंने मुझे जाने को कहा। जब मैं उठी तो मेरी साड़ी कुर्सी के पाये के नीचे बैठते समय दब गई थी। उठने पर कुर्सी धड़ाम से पीछे गिरी। मैंने पहली दफे साड़ी पहनी थी। मैं खुद सम्हलू या साड़ी सम्हालू। समझ नहीं आया। वह यकायक कुर्सी से उठी और अपने परिवार के साथ चली गई। लोग भौचक रह गये। गजब है भाई ! मेरी हंसी छूट गई।


अगले दिन मेरा इंटरव्यू तीसरे नम्बर पर था। मैं सोच रहा था इंटरव्यू का तीसरा दिन और मेरा तीसरा नंबर। क्या संयोग था। जब में इंटरव्यू देने कमरे में गया तो वहां पांच सदस्य बैठे थे। मैं निडर था। मेरे पास मेरे  सर्टिफिकेट के प्लास्टिक के तीन मोटे-मोटे फाइल फोल्डर थे। जिस में हर पेज पर एक सर्टिफिकेट लगा था। 


मैंने सब को प्रणाम किया तथा अनुमति ले कर कुर्सी पर बैठा। मैं इत्मीनान से सीधा बैठा। सर्टिफिकेट के फोल्डर साइड में रख लिया। जो सदस्य मेरे बायें बैठे थे उन्होंने एक फोल्डर उठा कर सर्टिफिकेट देखना शुरू किया। एक सर्टिफिकेट पर उनकी नजर रुक गई। 


सदस्य- "तुमने एनसीसी में ‘सी’ सर्टिफिकेट किया है।"


"हाँ सर !" मैं उनकी और मुड़ा। 


सदस्य- "तुम्हें बंदूक चलाना आता है।"


"हाँ सर !" मैंने गर्व के साथ कहा। 


सदस्य- "कौन-कौन सी चलाई है?" उन्होंने रौबदार आवाज में पूछा। 


मैंने सम्हल कर बैठते हुए उनकी आँखों में देख कर कहा- "थ्री नॉट थ्री सर।"


बताओ गोली कैसे चलती है?" उन्होंने कहा। 


मैंने पुरानी यादों के आधार पर पूरी प्रक्रिया दोहराई। 


उन्होंने कहा- "गोली नहीं निकली।"  मैंने फिर  पूरी प्रक्रिया दोहराई।


"गोली फिर भी नहीं निकली।" उन्होंने फिर कहा। 


मैंने आत्मविश्वास के साथ कहा- "सर गोली बातों से नहीं निकलेगी। थ्री नॉट थ्री मगवायें अभी चला कर दिखा सकता हूँ। वह मेरा आत्मविश्वास देख कर हंस दिये। उन्होंने कुछ कमांड पूछे।  मैंने सही-सही जबाब दिये। 


अब दूसरे सदस्य ने मध्य प्रदेश के नक्शे की ओर देख कर पूछा- "बैलाडीला क्या है ?"


मैंने जवाब दिया- "सर यह लौह अयस्क की खदान है।"


"यह कहां है?"  नक़्शे की ओर इशारा किया। 


वहां एक इंडीकेटर डंडा था। मैंने वह उठा कर नक़्शे पर वह स्थान उन्हें दिखाया। वह खुश हुए। फिर पूछा- "इस का लोह अयस्क कहां जाता है?"


मैंने बताया- "सर जापान।"


उनका अगला सवाल था- "किस कम्पनी  के जहाज से?"


यह मैंने कहीं नहीं पढ़ा था। मैंने अपनी प्रत्युत्पन्नमति से जवाब दिया- "सर ! जापान शिपयार्ड कम्पनी के जहाज से।" मैंने मन में सोचा भारत तो इतना विकसित  है नहीं, तो जापान के जहाज से ही जाता होगा। उन्होंने कहा बहुत अच्छा। मेरी जान में जान आई। फिर उन्होंने ग्रीनविच रेखा, समय निर्धारण, दिनों का अन्तर जैसे अनेक भूगोल के सवाल पूछे। मैंने सभी जबाब सही-सही दिये। 


अब बारी थी बीच में बैठे चेयरमैन सर की। उन्होंने टेबल पर रखी बहुत सारी पेपर कटिंग की ओर हाथ से इशारा कर पेपर कटिंग उठाने को कहा। लोगों ने बाहर बताया था कि बिना सेलेक्ट किये रेण्डम कटिंग उठाना। अगर छांट कर उठाओ तो कम मार्क्स मिल सकते है। 


टेबिल पर बहुत सारी पेपर कटिंग, कार्ड, और बहुत से कागज थे। लोगो ने बताया था कि उसमें गणित के सवाल भी है।  मैं बहुत डर रहा था कि गणित का सवाल न उठालू। मैंने मन ही मन माँ गयात्री को याद कर प्रणाम किया और मन्त्र पढ़ा। फिर रेण्डम एक कटिंग निकाल ली। यह जर्सी सांड का फोटो था। 


चेयरमैन सर ने पूछा- "यह किस नस्ल का फोटो है?"


यह अमेरिका के न्यू जर्सी राज्य के नाम का जर्सी सांड है।" मैंने जवाब दिया। 


"यह हमारे देश में क्या कर रहा है?" चेयरमैन सर ने पूछा। 


इस के सीमन दे देसी नस्ल की गायों को कृत्रिम गर्भाधान से गर्भ धारण करा कर ब्रीड को सुधारा जा रहा है। ताकि गाय  अधिक दूध दे।" मैंने धैर्य पूर्वक जवाब  दिया। 


"क्या यह कार्यक्रम सफल है?" उन्होंने पूछा।


हाँ ! मैंने कहा। 


"तुम ऐसा दावा कैसे कर सकते हो?" उन्होंने प्रश्नवाचक नजरों से मुझे देखा। 


मैंने विनम्रता से कहा- "सर मेरे गांव के पास कृषि विज्ञान केंद्र कुंडेश्वर में यह सांड है और हमारे घर की कई गायो का सफलता पूर्वक कृत्रिम गर्भाधान से गर्भ धारण करा कर प्रसव करवाया गया है।" 


वह मेरे उत्तर से प्रश्न हो गये, उन्होंने मुझे जाने की अनुमति दी। मैं सब को प्रणाम कर बाहर आ गया। जब लोगों ने बाहर मेरा इंटरव्यू लिया तो मैंने पूरा विवरण शांति से सब को सुनाया। लोगों ने पूछा तुम्हें क्या लगता है? 


मैंने बताया  इंटरव्यू देने का यह मेरा पहला अवसर था। मैंने अपनी ओर से सभी प्रश्नों के सही-सही उत्तर दिए। अब गेंद भगवान के पाले में। मेरे मन में सिलेक्शन होगा या नहीं इसका कोई बोझ नहीं था। 


इस के बाद मैंने साइल टेस्टिंग ऑफिसर का इंटरव्यू नागपुर में दिया। जहां मुझ से पूछा गया कहां रहते हो? मैंने बताया रायपुर में। उन्होंने पूछा तुम टीवी देखते हो। मैंने बताया हां। हमारे होस्टल में टीव्ही है। उन्होंने पूछा तुमने मुझे टीवी पर देखा है। मैंने पूछा आप कौन से कार्यक्रम में आते है। उन्होंने कहा कृषि दर्शन में। 


मैंने कहा सर जब कृषि दर्शन शुरू होता है तो स्टूडेंट्स टीव्ही बंद कर देते है। वह बहुत दुखी तथा नाराज हुए। मुझे परीक्षा में फेल कर दिया। दूसरी परीक्षा में ग्रामीण बैंक के मैनेजर की दी। इस परीक्षा में मैं बिना नरेन्द्र राजा की मदद के पास हो गया। 


मेरा अनुमान था कि किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में चार श्रेणी के प्रत्याशी भाग लेते है। पहली श्रेणी के प्रत्याशी वह होते है जो पूरा समय कम्पटीशन की तैयारी में लगी है। कोचिंग ज्वाइन करते है तथा ग्रुप में तैयारी करते है। दूसरी श्रेणी के प्रत्याशी पूरे समय घर में अकेले तैयारी करते है। तीसरी श्रेणी के प्रत्याशी कहीं नौकरी या कोई काम कर रहे होते है और चौथी श्रेणी के प्रत्याशी केवल फॉर्म भर देते है पर बहुत गंभीर नहीं होते है। 


तो कॉम्पटीशन केवल पहली तथा दूसरी श्रेणी के प्रत्याशियों में ही रहता है। देसरी बात है कि जो सफल होते है उसका मतलब यह नहीं होता कि वह सबसे होशियार थे और गधे थे। बल्कि सफल लोगों को वह सवाल आते थे जो पूछे गये। असफल लोगों को उन पूछे सवालों सवालों के अलावा दूसरे सभी जबाब आते थे। फिर रिजर्वेशन एक बड़ा फैक्टर है। 


 


    


 




द्वितीय पारी 

दूसरी साल कॉजेल में एडहॉक पद पर मेरा कॉन्ट्रेक्ट रिन्यू हो गया। मैं पुनः पढ़ाने जाने लगा। वेतन मिलता था ग्यारह सौ रुपये मासिक। मैं घर में रहता था। कुछ खर्चा था नहीं सो कुछ बचत हो गई थीं। एक दिन मैं क्लास ले रहा था। मेरे दोस्तों का झुण्ड आया और मुझे कैंपस में ला कर एक दोस्त ने कंधे पर उठा लिया। वह सब बहुत खुश थे। वह अखबार ले कर आये थे। 


जिसमें मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग द्वारा राज्य सेवा परीक्षा का रिजल्ट आया था मेरा रोलनम्बर राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों  डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित अभ्यर्थियों की सूचि में था। मेरे गांव में पेपर नहीं आता था। इस कारण हमेशा मुझे रिजल्ट दूसरों से ही पता चलता था। मैं अपने परिवार का, कॉलेज का तथा जिलें का पहला लड़का था। जो राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित  हुआ था। 


यह मेरे जीवन का दूसरा मोड़ था यह खबर जंगल में आग की तरह फैल गई। अखबारों ने मेरा इंटरव्यू मय फोटो के छापा। मैं यकायक लोगों की नजरों में साधारण से असाधारण बन गया था। ना कुछ से कुछ बन गया था। मुझे खुद अपने आप पर भोरसा नहीं था। फिर एक दिन मध्य प्रदेश सामान्य प्रशासन विभाग से मेरा न्युक्ति पत्र आ गया। जिस में प्रदेश के राजयपाल की ओर से मुझे डिप्टी कलेक्टर के पद पर मुरैना पोस्टिंग दी गई थी। परिवार, गांव तथा शहर के लोग भी गौरवान्वित हुए थे। मेरे पहले मास्टर दादा जी अब कहने लगे थे कि उनका पढ़ाया लड़का डिप्टी कलेक्टर बन गया है। 


मेरे व्यक्तित्व के विकास में मेरे पिता जी का बड़ा योगदान था। हालांकि उस समय में बहुत छोटा था। वह अक्सर बीमार रहते थे। कई बार कई दिनों तक उन्हें अस्पताल में रहना पड़ता था। तब मेडिकल सुविधाएं बहुत कम थी। हमारे घर में गायत्री परिवार की पत्रिका युग धर्म और अखण्ड ज्योति नियमित आती थी। गीता प्रेस गोरखपुर की पत्रिका कल्याण नियमित आती थी। 


इन सब से इंटेलीजेंट कोशीएंट के साथ स्प्रीचुअल कोशीएंट का विकास हुआ। पढ़ने के कारण इमोशनल कोशीएंट बहुत अच्छा हो गया। मैं पहले जिला पुस्तकालय नियमित जाता था। वहां न्यूज़ पेपर्स, साथ बच्चों की पत्रिकाऐं चंदा मामा, चंपक, पराग बड़ों के लिए सरिता, कादंबनी, दिनमान, गृह शोभा, सरिता, प्रतियोगिता दर्पण, इण्डिया टुडे, मनोहर कहानियां, और सत्य कथा खूब पढ़ते थे। 


गर्मियों की छुटियों में खूब सिनेमा देखते थे। दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर, नवभारत टाइम्स जैसे न्यूज पेपर पड़ते थे। मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, रामधारी सिंह दिनकर, हरिवंश राय बच्चन, और कबीरदास, तुलसीदास, सूरदास, फणीश्वर नाथ रेणु, धर्मवीर भारती, वृन्दावन लाला वर्मा, अमृता प्रीतम और कृष्णा सोबती को पढ़ते थे। रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, विभूतिभूषण बंदोपाध्याय, ताराशंकर बंदोपाध्याय, सुनील गंगोपाध्याय, विमल मित्र और महाश्वेता देवी के उपन्यासों के हिंदी अनुवाद पढ़े। 


विलियम शेक्सपियर, जेन ऑस्टिन, चार्ल्स डिकेंस, थॉमस हार्डी, जॉर्ज ऑरवेल, और अगाथा क्रिस्टी के उपन्यास डिक्शनरी रख कर पढ़ते थे। इंडिया टुडे, आउटलुक, द वीक, फेमिना, वोग, फोर्ब्स इंडिया, इकोनॉमिक टाइम्स और बिजनेस टुडे पद कर अंग्रेजी सुधरता तथा जरनल नॉलेज बढ़ाता था। किताबें मेरी हमेशा की साथी रही। जब में खेत पर रहता तो अकेला होता था। तब किताब अच्छे साथी की तरह साथ निभाती थी। 


पढ़ने की आदत आज भी है। आर.के. नारायण, मुल्क राज आनंद, खुशवंत सिंह, रस्किन बॉन्ड, मनोहर मालगोणकर, अरुंधति रॉय, अरविंद अडिगा,  विक्रम सेठ, शशि थरूर, स्वामी विवेकानंद, ओशो, श्री प्रभुपाद, देवदत्त पटनायक, अमीश त्रिपाठी और चेतन भगत जैसे कितने नाम है जिन्हें आज भी पढ़ता हूँ। गीता, अष्ट्रावक्र गीता तथा पतंजलि  का योग सूत्र मेरा मार्ग दर्शन करने के लिए ज्योति स्तम्भ है। 


मुझे जनवरी में मुरैना जा कर ज्वाइन करना था। लोगों ने महूर्त देख कर शुभ घड़ी में ज्वाइन करने की सलाह दी। मेरी दादी कहा करती थी-

"तुलसी विरवा बाग़ के सींचे से कुम्हलाय। 

राम भरोसे जो रहे पर्वत पर हरियाय।"


कुछ गरम सूट सिलवाये। गरम कपड़े लिये। पेन्ट शर्ट। तीन सूटकेस, सामान पैक किया और आ गये बस से ग्वालियर। ससुराल में । दादी कहती थी -"एक दिना को पवनों, दो दिना को पई और तीसरे दिन रहे सो बेशरम सही।" सो अगले दिन सुबह की ट्रैन पकड़ कर पहुंच गये मुरैना स्टेशन। 


मुरैना 

मन में अभिलाषा थी कि स्टेशन पर भव्य स्वागत होगा। लेकिन जब ट्रेन प्लेटफार्म नंबर एक पर रुकी और मैंने मुरैना की धरती पर पहला कदम रखा तो स्टेशन पर किसी को ना पाकर बहुत निराशा हुई। सामान था ज्यादा। कुली से सामान बाहर ला कर सर्किट हाउस जाने के लिये रिक्शा लिया और पहुंच गए सर्किट हाउस। 


केयर टेकर को अपना परिचय दिया तो उसने बताया कि मेरे लिये कोई कमरा बुक नहीं था। और हो भी कैसे मैंने किसी को जब बताया ही नहीं था तब किसी को स्वप्न थोड़ी आयेगा। वह बोले साहब आप का सामान स्टोर रूम में रख देते है। आप जिला सत्कार अधिकारी से रूम अलॉट करवा लेना तो शाम को कमरा खोल देंगे।


वहां रिक्शा मिलाना कठिन था। रास्ता सीधा था। कुछ दूर पैदल चले। एक रिक्शा खाली आता दिखा उस में बैठ कर पहुंच गये कलेक्ट्रट। टीकमगढ़ में मैंने वहां के डिप्टी कलेक्टर राम सुचित पाण्डे जी से मिल कर एक दिन जॉइनिंग की पूरी प्रक्रिया समझी थी। उन्होंने बताया था कि कार्यालय अधीक्षक के पास जाना वह जॉइनिंग करावा देंगे। मैं कार्यालय अधीक्षक के पास गया। उन्हें नमस्ते कर अपना परिचय दिया। उन्होंने स्थापना से बड़े बाबू को बुलवाया मेरी जॉइनिंग की पूरी प्रक्रिया करवाई। 


सब बहुत आसानी से हो गया और मैं बन गया सरकारी दामाद। मुझे एक फ़िल्मी गाना 'साला में तो साहब बन गया' याद आ गया। बड़े बाबू ने कलेक्टर के स्टोनों के पास भेज दिया। कलेक्टर थे शेखर दत्त। स्टेनो ने इण्टरकॉम पर साहब से परमीशन ली और मुझे कलेक्टर के चेंबर में ले गये। उस समय कलक्ट्रेट अग्रेजों के ज़माने या शायद सिंधिया के ज़माने की बिल्डिंग में होती थी। बड़ा सा भव्य कमरा। बहुत बड़ी टेबिल। सामने बैठे कलेक्टर। मैंने झुक कर प्रणाम किया। उन्होंने मुस्करा कर मुझे बैठने को कहा। मैं पहली बार किसी कलेक्टर के इतने नजदीक बैठा था। 


स्टेनो वापस चले गये। अब कमरे में हम दोनों थे। उन्होंने मेरे रहने की व्यवस्था के बारे में पूछा। मैंने सुबह सर्किट हाउस की घटना का विवरण उनको दिया। उन्होंने इंटरकॉम पर स्टेनो को व्यवस्था करने के निर्देश दिये। मुझे उन का सरल व्यवहार बहुत अच्छा लगा। 


उन्होंने मेरे प्रशिक्षण के बारे में पूछा। मुझे तो कुछ भी पता नहीं था। तब उन्होंने कहा कि कल से तुम मेरे साथ बैठ कर केवल देखो कि कैसे लोगों से मिलता हूँ। मैं नमस्कार कर बाहर आया। उन के स्टोनो मुझे ए डी एम साहब के पास ले गये। वही सर्किट हाउस में कमरा अलॉट करते थे। उनके बाबू ने केयर टेकर को फोन कर कमरा खोल देना का निर्देश दिया। 


यह सब होते-होते शाम हो गई। मैं रिक्शा ले कर वापिस सर्किट हाउस आ गया। जब केयर टेकर ने स्टोर रूम से मेरे सूटकेस निकाल कर मेरे कमरे में लाये तो मैंने देखा सूटकेस चूहों ने कुतर दिये थे। खोल कर देखा तो मेरे नये सिलाए दो सूट के कोट पेंट में बड़े-बड़े दो-दो छेद थे। मैंने  सोचा बहुत अच्छा स्वागत गणेश जी के बाहन ने किया, विघ्न विनाशक गणेश जी की कृपा आगे रहेगी। खाना खा कर कमरे में आराम से सो गया। 


दो-तीन दिन मैंने वहां के सभी अधिकारियों के पास जा कर परिचय किया। कुछ बहुत मिलनसार तो कुछ खड़ूस। बहुत रूखे। जैसे वह अपनी जिन्दगी पूरी जी चुके हो। हारे थके काम के बोझ के मारे। एक थे कोडे  साहब। पटवारी से स्टेट मर्जर के समय महाराष्ट्र से मध्य प्रदेश काडर ले कर डिप्टी कलेक्टर बन गये। मुझसे बोले दारू पीते हो, नानबेज खाते हो और सिगरेट पीते हो? तीनों के लिए मना करने पर उन्होंने सलाह दी कि अभी से शुरू कर दो। नहीं तो अच्छे अधिकारी नहीं बन सकते। 


उन में एक थे शर्मा जी। डिप्टी कलेक्टर। ग्वालियर के रहने वाले। उन्होंने बताया कि उन्हें एक सरकारी बंगला मिला है। उनका परिवार बच्चे सब ग्वालियर में रहते है। वह शनिवार रविवार ग्वालियर चले जाते है। अभी कोई सरकारी मकान खाली नहीं है यदि मैं चाहूं तो उनके साथ रह सकता हूँ। 'अंधा क्या चाहे दो आँख'। 


मैं सर्किट हाउस से शर्मा जी के साथ रहने लगा। बहुत भले आदमी। मुझे सरकारी काम काज समझते। किस्से कहानियां सुनाते। मुझे से खुद  के बेटा जैसा व्यवहार करते। वह नायब तहसीलदार से नौकरी में भर्ती हुए थे। प्रोमोशन हुआ तो ग्वालियर से मुरैना पोस्टिंग मिली। पुनः ग्वालियर ट्रांसफर की कोशिश कर रहे है इसलिये परिवार नहीं लाये। उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो लड़के है। एक की पढ़ाई पूरी हो चुकी है। नौकरी पाने की तैयारी कर रहा है। दूसरा कालेज में पढ़ रहा है। 


यह मुरैना की सिविल लाइन कॉलोनी थी। सभी सरकारी मकान। जिसमें सरकारी अधिकारी रहते थे। यह प्रथा अंग्रेजों ने इसलिए शुरू की थी जिससे अधिकारी वर्ग अन्य लोगों से अलग रहे। वे विशिष्ट लगे ताकि लोग उनकी इज्जत करे। बात माने। उनका रुतबा हो। जन सामान्य से मेलजोल कम हो। विशिष्ट अभित्याज वर्ग। सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण कारण था।  इस लिये प्रशासनिक अधिकारी समाज से कटे रहते। 


भारत के हर शहर तथा गांव आज भी सरकारी लोगों के लिये अलग कॉलोनियां बनाई जाती है। अधिकारियों के परिवार जनों में भी यह विशिष्ट अभित्याज वर्ग की भावना रहती है। उन्हें लगता है वह विशिष्ट है। .आम नहीं ख़ास है। यही से व्ही आई पी ‘वेरी इम्पोर्टेन्ट पर्सन’ की संस्कृति का जन्म हुआ। 


सरकारी नौकरी में प्रथम, द्वितीय, तृतीय वर्ग के अधिकारी तथा तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारी होते है। केंद्र तथा राज्य सेवा के अलग-अलग वर्ग है। उनके रहने के आवास भी अलग-अलग प्रकार के अलग-अलग जगह बनाये जाते है। यह वर्ग विभाजन प्रशासन करने तथा डिसिप्लिन मेंटेन करने में मददगार है। 


हमारे समाज में बच्चे के सभी निर्णय परिवार के वरिष्ठ लेते है। बड़े होने पर सुपरवाइजर काम करवाते है। ऑफिस में बॉस का आदेश चलता है। व्यक्ति अपनी मर्जी से काम नहीं करते है। बचपन से आदत ही नहीं डाली जाती। पर्शनल स्पेस, पर्शनल डिसीसीजन जैसी कोई कंसेप्ट नहीं है। हम और शर्मा जी मजे से साथ रहते थे। 


सिविल लाइन कॉलोनी में रहने के कारण मुझे सरकारी अधिकारियों के रीति-रिवाज, रहन-सहन, आचार, व्यवहार सीखने में बहुत मदद मिली। मैंने जल्दी जान लिया कि सिविल लाइन का जीवन कितना खोखला है। सब दोहरी बातें करते। यदि वह पूर्व जाने की सोचता तो बात पश्चिम की करता। 


सभी एक दूसरे से तुलना करते पद की, पत्नी की खूबसूरती की, बच्चों की होशियारी की, पढ़ाई-लिखाई की, गहने-जेबर, घर का फर्नीचर, कपड़े-लत्ते यहाँ तक कि कुत्ते की नशल और ऊपरी आमदानी की। सब अपने आप को हरिश्चन्द को औलाद बताते और होते गब्बर सिंह। 


हमारी कॉलोनी में एक जज साहब रहते थे। बहुत मजेदार व्यक्ति थे। वह चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के पद पर थे। अकेले रहते। उनका परिवार ग्वालियर में रहता। उन्हें गार्डनिंग का बहुत शौक था। उनका बगीचा हमेशा महकता रहता। लॉन लश ग्रीन। 


एक दिन मैं उनके घर बैठा था। मैंने कहा आपका बगीचा बहुत अच्छा है। लॉन क्या हरा भरा है। उन्होंने कहा तुम लोग अपनी बीवियों पर हाथ फेरते हो तो वो हरी भरी रहती है मैं अपने लॉन पर हाथ फिरता हूँ तो वह हरा भरा है। बात सही और मजेदार थी।  


हमारे पड़ोसी एक और जज थे गोस्वामी जी। वह जितने शांत और सीधे उनकी पत्नी उतनी बाततूनी और तेज। जब वह कुछ भी खरीदते तो हमें दिखाने जरूर बुलाती। हमेशा गोस्वामी जी कहते सामान ससुराल से आया है। मुझे लगता कि मेरी भी ससुराल इतनी धनी होती कि हर माह हजारों का सामान भेज पाते।  


एक खनिज अधिकारी मिश्रा जी पास ही रहते थे। सत्य साई बाबा के बड़े भक्त। उनके बहनोई डिप्टी कलेक्टर थे वह भी वहीँ रहते थे। उनका लड़का मिश्रा जी को मामा कहता सो हम भी उन्हें मामा जी कहते। हर रविवार उनके घर भजन होते। शेष दिन मिश्रा जी साइकिल से खनिज ठेकेदारों से उनके घरों पर जा कर मिलते। वह कहते ऐसा करने से सम्बन्ध अच्छे रहते है। 


हर अधिकारी का अपना जीवन जीने तथा काम करने का तरीका अलग-अलग बिलकुल निराला। मेरे लिये यह माहौल अलग था इस कारण में बहुत बारीकी से उनके तौर तरीकों को देखता था। कुछ दिन में शर्मा जी बहुत परेशान हो गये। दरअसल हुआ यूँ कि उन्हें उनके बड़े लड़के की शादी करना थी। तो जगह-जगह उसकी कुण्डली भेजते। जहां-जहां कुण्डली मिलती वहां-वहां के लोग लड़का देखने मुरैना शर्मा जी के बंगले पर आते। 


रविवार को शर्मा जी ग्वालियर जाते। घर पर उन्हें मैं मिलता। वह मुझे देखते। बातें करते और पूछते शर्मा जी कहां है तब मैं उन्हें शर्मा जी का ग्वालियर का पता दे देता। 


वह ग्वालियर जा कर शर्मा जी को कहते मैंने लड़का देख लिया वह मुझे पसन्द है शादी पक्की करो। दरअसल वह मुझे शर्मा जी का लड़का समझते। मेरी उम्र तब बाइस साल ही थी। शर्मा जी का लड़का बेरोजगार। मुझ जैसी कद काठी भी नहीं। शर्मा जी ने एक दिन मुझ से कहा कि यदि तुम यहां रहे तो मेरे लड़के की शादी नहीं होगी। 


सरकारी मकान खाली थे नहीं। मेरी वेतन तब नौ सौ सत्तर रुपये ही थी। सरकारी मकान का किराया बहुत कम होता था। बाजार में निजी मकानों का किराया बहुत ज्यादा था। मेरी पत्नी तथा बच्चा भी घर पर थे। मैं उन्हें मुरैना लाना चाहता था। 


एक दिन मैं जिला मत्स्य अधिकारी के पास बैठा था। ऐसे ही रहने की बात निकली। उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने बताया कि मैं किराये का मकान ढूंढ रहा हूँ। उन्होंने बताया कि उनका मकान है जिसे वह किराए पर उठाना चाहते है। उन्होंने वह मकान रण्डी मुहल्ले में पुतली बाई डाकू के घर के पास नाले पर बनवाया था। वहां कोई मकान डर कर किराये में नहीं लेता था। वह किराया कम ले कर मकान दे रहे थे। मैंने उसे किराए पर ले लिया। 


मैंने शर्मा जी के साथ ना रहने में उनकी भलाई समझी और किराये के मकान में रहने आ गया। अभी अकेला ही था। ठण्ड के दिन थे नाले से बहुत बदबू आती थी। एक दिन में अगरबत्ती लगा कर रजाई ओढ़कर सो गया। मेरे हिलने डुलने से अगरवत्ती बिस्तर में गिर गई। आधी रजाई जल गई। कमरा धुए से भर गया। सांस ना ले पाने के कारण मेरी नींद खुल गई। आग बुझाई। बड़ी दुर्घटना टल गई।  


मैंने मुरैना जिले का गजेटियर पढ़ा। यहां का इतिहास जाना। मुरैना जिले का इतिहास काफी प्राचीन और समृद्ध है। इसे "मयूरवन" के नाम से भी जाना जाता था। जिसका संबंध महाभारत काल से है। माना जाता है कि यहां मोरों की अधिकता के कारण इसका नाम मुरैना पड़ा। कुंतलपुर वर्तमान कुतवार में पांडवों की माता कुंती का मायका था, और यहीं पर कर्ण का जन्म हुआ था। पांडवों ने अज्ञातवास के दौरान पहाड़गढ़ की गुफाओं में भी समय बिताया था, जहाँ शैलचित्र भी पाए गए हैं।  


लिखित इतिहास में मुरैना का पहला जिक्र मौर्य युग में मिलता है। तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में यहां मौर्यों का शासन था, जिसके प्रमाण गुर्जर अभिलेखों से मिलते हैं। मौर्यों के बाद यहां नाग राजाओं का शासन रहा। इसके बाद गुप्त शासकों के सामंतों ने शासन किया, और इस दौरान कई मंदिरों का निर्माण हुआ, जैसे कि पड़ावली का मंदिर। गुप्तों के बाद गुर्जर-प्रतिहार और कच्छपघाट जैसे महान राजवंशों ने इस क्षेत्र पर शासन किया। 


उन्होंने कई अद्भुत मंदिरों और स्मारकों का निर्माण किया, जिसमें सिहोनिया का ककनमठ मंदिर और मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर प्रमुख हैं। मितावली का चौसठ योगिनी मंदिर तो इतना महत्वपूर्ण है कि इसे भारतीय संसद भवन के पुराने नक्शे का प्रेरणा स्रोत भी माना जाता है। मुगल काल के दौरान मुरैना क्षेत्र एक महत्वपूर्ण आश्रय स्थल सराय के रूप में जाना जाता था। 1761 को पानीपत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर सिंधिया घराने का कब्जा हो गया। 


1948 में जब मध्य भारत का गठन हुआ, तो पूर्व ग्वालियर राज्य के श्योपुर जिले को इसमें शामिल किया गया, और बाद में यह मुरैना जिले का हिस्सा बना। 1 नवंबर 1956 को राज्यों के पुनर्गठन के परिणामस्वरूप मुरैना एक अलग जिला बन गया। पहाड़गढ़ की गुफाएँ, यहां प्रागैतिहासिक काल के शैल चित्र मिलते हैं, जो दर्शाते हैं कि यहां 30,000 साल पहले से ही मानव निवास करता था। ककनमठ मंदिर, सिहोनिया, यह कच्छपघाट वंश के राजा कीर्तिराज द्वारा निर्मित एक विशाल शिव मंदिर है।


चंबल घाटी, जिसमें मुरैना का क्षेत्र भी शामिल है, दशकों तक दस्यु गिरोहों के आतंक के लिए कुख्यात रही है। यह समस्या अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर आजादी के बाद के कई दशकों तक बनी रही। मुगल सम्राट बाबर के संस्मरणों में भी चंबल के लुटेरे दस्युओं का उल्लेख मिलता है। सिकंदर लोदी, शेरशाह और अकबर जैसे शासकों को भी चंबल घाटी के डकैतों का सामना करना पड़ा था। आजादी के बाद यह समस्या और भी गंभीर हो गई। 


सामाजिक असमानता, भूमि विवाद, जातीय संघर्ष, गरीबी और बेरोजगारी जैसे कारकों ने लोगों को "बागी" बनने पर मजबूर किया। सन 1970 और 80 के दशक में चंबल के बीहड़ों में कई खूंखार डकैतों का आतंक था, जिसके नाम से पूरा क्षेत्र थर्राता था। कई बार इन डकैतों को स्थानीय नेताओं से भी संरक्षण मिलता रहा, जिससे पुलिस को उनका सफाया करने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ता था। चुनाव के दौरान ये डकैत फरमान भेजकर गांवों वालों को अपने पसंदीदा प्रत्याशी को वोट देने के लिए मजबूर करते थे।


आत्मसमर्पण की पहल, डकैत समस्या को हल करने के लिए कई प्रयास किए गए।  विनोबा भावे और बाद में जयप्रकाश नारायण जैसे महान संतों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने डकैतों को मुख्यधारा में लाने के लिए आत्मसमर्पण की पहल की।  बड़े पैमाने पर डकैतों ने आत्मसमर्पण किया, जिससे इस क्षेत्र में शांति का माहौल बना। चंबल नदी और उसके बीहड़, जो कभी खूंखार डकैतों की पनाहगाह थे, अब अपनी प्राकृतिक सुंदरता और वन्यजीवन विशेषकर घड़ियालों और मगरमच्छों के लिए जाने जाते हैं। यह क्षेत्र अपनी अनूठी पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है, और डकैत समस्या का इतिहास अब बीहड़ सफारी और कहानियों का हिस्सा बन गया है।


मनमोहन कुमार तमन्ना एक जाने-माने लेखक थे, खासकर अपनी उन रचनाओं के लिए जो डाकुओं के जीवन और चंबल क्षेत्र पर आधारित थीं। उन्होंने इन विषयों पर कई किताबें लिखी, जिनमें से कुछ पर फिल्में भी बनीं। उन्होंने डाकुओं पर कई महत्वपूर्ण किताबें लिखी, जिसकी वजह से उन्हें पहचान मिली। 


वह पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। उन्हें ने बताया कि चम्बल के डाकुओं के ऊपर उनकी किताबों पर आधारित डाकू फिल्में बहुत प्रसिद्ध हुई। वह मुरैना से थे और उनका अंतिम समय मुरैना की पुरानी सब्जी मंडी स्थित उनके मकान में बीता था।


चंबल के कुछ प्रमुख डाकू और उनकी कहानियां मैं अक्सर उन से सुनता था उन्होंने मुख्य रूप से मुझे कुछ प्रसिद्ध डाकुओं की कहानियां सुनाई थी। 


डाकू मानसिंह- चंबल के सबसे प्रसिद्ध और बाहुबली डाकुओं में से एक। उन्हें "रॉबिन हुड" की तरह माना जाता था क्योंकि वह अक्सर अमीरों को लूटकर गरीबों की मदद करते थे। 1935 से 1955 के बीच मानसिंह और उसके गिरोह ने 1100 से अधिक डकैतियां और 182 हत्या की, जिसमें 32 पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। उनका राज भारत की आजादी से लेकर उसके बाद तक कायम रहा। 1955 में सेना के जवानों ने एक मुठभेड़ में मानसिंह और उनके बेटे सूबेदार सिंह को मार गिराया। चंबल में आज भी उनके नाम पर एक मंदिर बना हुआ है।


डाकू मोहर सिंह गुर्जर- 70 के दशक में चंबल का सबसे खूंखार डाकू, जिसने फिरौती का रिकॉर्ड तोड़ दिया था। उनके सिर पर 3 लाख का इनाम था और उनकी गैंग पर 12 लाख का। मोहर सिंह की कहानी भी चंबल के कई बागियों जैसी थी - रिश्तेदारों द्वारा जमीन हड़पना, पुलिस और अदालतों से न्याय न मिलना, जिसके बाद उन्होंने हथियार उठा लिए। उन्होंने कई अपहरण किए और बड़ी-बड़ी फिरौती वसूली। 1972 में, गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (जेपी) की पहल पर मोहर सिंह ने अपने गैंग के 200 से अधिक डाकुओं के साथ मुरैना के पास धरहरा गांव में आत्मसमर्पण कर दिया था।


फूलन देवी- चंबल की सबसे कुख्यात महिला डाकुओं में से एक, जिन्हें "बैंडिट क्वीन" के नाम से जाना जाता था। फूलन देवी का जीवन अन्याय और बदला लेने की कहानी है। 16 साल की उम्र में सामूहिक बलात्कार का शिकार होने के बाद, उन्होंने हथियार उठाए और अपने साथ हुए अन्याय का बदला लिया। उन्होंने राजपूत समाज के 22 लोगों की हत्या की, जिसे बेहमई कांड के नाम से जाना जाता है। 1983 में उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया और जेल से छूटने के बाद राजनीति में भी कदम रखा। 2001 में उनकी हत्या कर दी गई।


 पुतलीबाई- चंबल की पहली महिला डाकू, जिनका असली नाम गौहर बानो था और उनका जन्म मुरैना जिले के एक गांव बरबई में हुआ था। वह एक नृत्यांगना थीं, वह अपने नृत्य कौशल के लिए जानी जाती थी, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें डाकू बनने पर मजबूर कर दिया। प्रसिद्ध डाकू सुल्तान से उनके संबंध और बाद में एक मुठभेड़ में उसका हाथ गंवाने की कहानी काफी मशहूर है। सुल्तान की मौत के बाद पुतली बाई ने अपने गिरोह का नेतृत्व किया और चंबल में अपना आतंक फैलाया। 1958 में पुलिस मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई। उनके जीवन पर कई फिल्में भी बनी है।


पान सिंह तोमर- भारतीय सेना के पूर्व जवान और एक प्रसिद्ध एथलीट, जिन्होंने स्टीपलचेज में सात बार राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया था। पान सिंह तोमर की कहानी भी जमीन विवाद से शुरू हुई। अपने परिवार पर हुए अत्याचारों का बदला लेने के लिए उन्होंने हथियार उठाए और डाकू बन गए। 1981 में एक पुलिस मुठभेड़ में उनकी मृत्यु हो गई। उनके जीवन पर एक समीक्षकों द्वारा प्रशंसित फिल्म "पान सिंह तोमर" भी बनी है।


चंबल के बीहड़ों में डकैतों का इतिहास बेहद जटिल है, जिसमें सामाजिक असमानता, जातीय भेदभाव और पुलिस-प्रशासन की अनदेखी जैसे कई कारण शामिल थे, जिन्होंने लोगों को "बागी" बनने पर मजबूर किया। आज चंबल घाटी काफी हद तक शांत है और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रही है, लेकिन इन डाकुओं की कहानियां अभी भी लोक कथाओं और फिल्मों के माध्यम से जीवित है। मन मोहन तमन्ना जी का कहानी सुनाने का अपना अन्दाज था। वह कहानी के अंत तक बांध कर रखते थे। 


डॉ. एस.एन. सुब्बाराव, जिन्हें प्यार से "भाई जी" के नाम से जाना जाता था। इनका संबंध मुख्य रूप से मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के जौरा से रहा है, जहां उन्होंने अपना प्रसिद्ध गांधी सेवा आश्रम स्थापित किया था। प्रख्यात गांधीवादी विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, राष्ट्रीय एकता के दूत, युवाओं के प्रेरणा स्रोत, और चंबल के डाकुओं के आत्मसमर्पण कराने वाले "चंबल के गांधी"। उन्हें प्यार से "भाई जी" कहा जाता था। सुब्बाराव का जन्म बेंगलुरु में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता एक प्रतिष्ठित वकील थे। बचपन से ही सुब्बाराव में देशभक्ति और सामाजिक सेवा की भावना कूट-कूट कर भरी थी। मात्र 13 वर्ष की आयु में ही वे भारत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने दीवारों पर "अंग्रेजों भारत छोड़ो" जैसे नारे लिखकर ब्रिटिश सरकार का विरोध किया और इसके लिए उन्हें जेल भी जाना पड़ा। यहीं से वे महात्मा गांधी के आदर्शों और सर्वोदय विचारों से गहराई से प्रभावित हुए।


सुब्बाराव में युवाओं को प्रेरित करने और संगठित करने की अद्भुत क्षमता थी। वे कांग्रेस सेवा दल से भी जुड़े रहे और बाद में खालिस सर्वोदय कार्यकर्ता बन गए। वे भजन और भक्ति संगीत के माध्यम से समाज परिवर्तन के गाने गाते थे, जिससे युवा उनकी ओर आकर्षित होते थे। डॉ. एस.एन. सुब्बाराव का जीवन और कार्य चंबल घाटी, विशेषकर मुरैना के जौरा से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है। 1960 के दशक में चंबल के बीहड़ खूंखार डाकुओं के आतंक से थर्राते थे। सरकार और पुलिस इन डाकुओं को नियंत्रित करने में मुश्किलों का सामना कर रही थी।


जौरा में गांधी आश्रम की स्थापना: इसी दौर में, सुब्बाराव ने मुरैना के जौरा में महात्मा गांधी सेवा आश्रम की नींव रखी। यह आश्रम बाद में डकैत-समर्पण अभियान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना। सुब्बाराव ने एक अद्वितीय और साहसिक कदम उठाया। वे स्वयं चंबल के बीहड़ों में गए, डाकुओं के बीच रहे, उनसे बातचीत की और उन्हें हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रेरित किया। जब डाकू सीधे नहीं मानते थे, तो वे उनके परिवार वालों से मिलते और उन्हें डाकुओं को आत्मसमर्पण के लिए राजी करने को कहते।


उनके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप, 1972 में एक ऐतिहासिक घटना घटी जब 654 डाकुओं ने सामूहिक रूप से आत्मसमर्पण किया। इस घटना ने न केवल चंबल के इतिहास को बदला, बल्कि डॉ. सुब्बाराव को "चंबल के गांधी" के रूप में एक राष्ट्रीय पहचान दिलाई। उन्होंने इसके बाद भी कई बार डकैतों के आत्मसमर्पण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे उनसे अनेकों अवसरों पर मिलने का अवसर मिला। उनके व्यक्तित्व का मेरे ऊपर बहुत प्रभाव रहा। जिस कारण भविष्य में मुझे ग्रामीण विकास के की अनेक योजनाओं को बनाने में मादा मिली। 


उन दिनों मुरैना को भारत सरकार द्वारा सूखाग्रस्त क्षेत्र घोषित किया गया था। लेकिन अभी कोई बजट इस के लिए जारी किया गया था। इस कारण इस शाखा का प्रभारी बनने मोए किसी की रुचि नहीं थी। मैं सबसे जूनियर था तो मुझे इस शाखा का प्रवाह बना दिया गया। समय समय पर भारत सरकार से पत्र आते थे। जिले के सभी विभागों को यह पत्र भेज कर जानकारी बुला कर जवाब भेजे जाते थे। 


मुझे बाबू ने एक दिन बहुत मोटी फाइल दी जिसमें जिले के विभागों से जानकारी नहीं आ रही थी। भारत सर्कार से सयुंक्त सचिव का एक पात्र लम्बित था। मैंने सयुक्त सचिव का पत्र पढ़ा। जो अंग्रेजी में था जिसमें उन्होंने नए साल की शुभकामनाऐ दी थी। कोई जानकारी नहीं मांगी गई थी। जिला कार्यालय में बाबू को अंग्रेजी नहीं आती थी। उसने उस पत्र की सीक्लोस्टायल कॉपियां बना कर सब को भिज दी थी। उन दिनों फोटो कॉपी मशीन का अबिष्कार नहीं हुआ था। मेरे द्वारा पड़ी गई यह पहली फाइल थी। जिले के अधिकारी इस पत्र का जवाब नहीं दे रहे थे। रिमांइडर पर रिमांइडर भेजे गए थे। सभी पत्र डिप्टी कलेक्टर तथा कुछ कलेक्टर के हस्ताक्षर से गए थे। मैंने पत्र अंग्रेजी की डिक्सनरी रख कर पड़ा ताकि कोई गलती ना हो। मैंने डरते-डरते एक दिल फाइल पर कलेक्टर साहब से चर्चा की। उन्हें बताया कि इस पत्र में कोई जानकरी नहीं मांगी गई। यह तो नए साल की शुभकामनाओं का पत्र था। तब वह खूब हंसे। 


कार्यालय ने मेरा साल भर का ट्रेनिंग प्रोग्राम तैयार कर कलेक्टर से अनुमति ले कर जारी कर दिया। दिन में पहले सुबह में  ट्रेनिंग प्रोग्राम के अनुसार अलग-अलग अधिकारियों से ट्रेनिंग लेते। शाम को जब कलेक्टर आम जनता से मिलते तब उनके साथ बैठता। वह एक्स आर्मी ऑफिसर थे। स्टेट फॉरवर्ड। निहायत ईमानदार। बंगाली आदमी। मेरी मेहनत से बहुत खुश रहते। तब महिंद्रा की जीप कलेक्टर को मिली थी। उसके पास एक जीप थी। 


जब उन्हें गुप्त अभियान पर जाना होता गाड़ी में चलता था।  मैंने अपने चाचा की बैंक की गाड़ी चला कर सीखी थी और मेरे पास ड्राइवर का लाइसेंस था। कभी शिकार खेलने तो कभी एस ए एफ पुलिस लाँन में बैठ कर बियर पीने। वहां एक सन अम्ब्रेला लगा था। उसके नीचे हम लोग बैठते। टेबिल पर बियर और फायलें। वह बियर पीते और उनका नौकर एक-एक फायल उनके सामने खोल कर रखता वह बिना पढ़े साइन करते जाते। 


कभी-कभी जब वह आम जनता से मिलते और भीड़ बहुत होती तब वह बाहर जीप के बोनट पर बैठ कर या खड़े हो कर लोगों से मिलते थे। वह लोगों को ध्यान से सुनते उन्हें संतुष्ट करने की भर सक कोशिश करते। एक बार  एक सरपंच आये। उनके गांव के कुँए में पानी सूख गया था। 


उन्होंने उस सरपंच को अंडरग्राउंड वॉटर का पूरा डायग्राम बनाकर समझाइए। विभिन्न चट्टानों की संरचना बनाई। पानी कैसे दरारों से नीचे जा कर जमा होता है। सरपंच आधे घंटे समझता रहा। उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस चित्र का उसके कुए से क्या सम्बन्ध है और पानी कैसे आएगा। वह तो केवल डीप ड्रिलिंग करवाना चाहता था। थक कर बोला समझ गये साहब पानी की थ्योरी और फिर वह चला गया। 


एक दिन हम लोग ऑफिस में बहुत देर तक काम कर रहे थे। वह जमाना कंट्रोल का था। हर चीज राशन कार्ड पर मिलती थी। रात को जब ऑफिस से कलेक्टर साहब जाने वाले थे तभी एक आदमी आया। वह बिना पर्ची अंदर लोगों से मिलते थे। उस आदमी ने इंग्लिश सिंह नाम बताया। मुरैना में तहसीलदार सिंह, कलेक्टर सिंह जैसे नामों का चलन है। इसी तरह वहां हर कोई नाम से साथ सिंह जरूर लगता है। जैसे कुंवर जहर सिंह शर्मा। 


कलेक्टर साहब ने उससे पूछा क्या दिक्कत है। वह बोला उसके पास राशन कार्ड नहीं है इस कारण उसे पंप चलाने के लिये डीजल नहीं मिल रहा है। उन्होंने उसे बिठाया। मैंने कहा सर मैं कल राशन कार्ड  एस डी एम जौरा से दिलवा दूंगा। वह बोले नहीं रवीन्द्र उसका कितना सुंदर नाम है- इंग्लिश सिंह, अभी राशन कार्ड लेकर एस डी एम को बुलाओ। फोन किया गया।  कार्ड आया। इस सब में दो घण्टे से अधिक का समय लगा। उन्होंने कार्ड इंग्लिश सिंह को दिया तब हम लोग घर गये। 


शेखर दत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा के एक सेवानिवृत्त अधिकारी थे, जिन्होंने भारत सरकार और विभिन्न राज्यों में महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया। उनका निधन 2 जुलाई 2025 को 79 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में हुआ। शेखर दत्त का जन्म 20 दिसंबर 1945 को हुआ था। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत भारतीय सेना में एक शॉर्ट सर्विस कमीशन अधिकारी के रूप में की थी।

उन्होंने 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में 218 मीडियम रेजिमेंट के साथ सेवा की और अपनी बहादुरी के लिए सेना पदक से सम्मानित किए गए। 1969 बैच के मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी, शेखर दत्त ने अपने 38 साल के करियर में विभिन्न मंत्रालयों में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाईं। उन्होंने आदिवासी और अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के प्रधान सचिव, स्कूल शिक्षा, खेल और युवा कल्याण विभाग के प्रधान सचिव सहित कई प्रमुख पदों पर कार्य किया।


वह रक्षा मंत्रालय में विभिन्न क्षमताओं में कार्यरत रहे, जिनमें रक्षा उत्पादन विभाग में संयुक्त सचिव और अंततः भारत के रक्षा सचिव थे।


2007 में अपनी सेवानिवृत्ति के बाद, उन्हें दो साल के लिए भारत के उप राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया। यह एक नया बनाया गया पद था जो राजनीतिक और सुरक्षा-संबंधी मामलों से संबंधित था। उन्होंने स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय में आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग के सचिव के रूप में भी कार्य किया। भारत के खेल प्राधिकरण के महानिदेशक के रूप में, उन्होंने नवंबर 2003 में हैदराबाद में आयोजित एफ्रो-एशियाई खेलों की मेजबानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


23 जनवरी 2010 को, उन्होंने छत्तीसगढ़ के राज्यपाल का पदभार संभाला और 19 जून 2014 को अपने इस्तीफे तक इस पद पर रहे। शेखर दत्त को सार्वजनिक प्रशासन के क्षेत्र में उत्कृष्ट सेवाओं के लिए 2016 में पॉल एप्पलबी अवार्ड से सम्मानित किया गया था। वह बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज के बोर्ड में पब्लिक इंटरेस्ट डायरेक्टर और बाद में अध्यक्ष भी रहे। उन्होंने "रिफ्लेक्शन ऑन कंटेम्पररी इंडिया" और "इंडियाज डिफेंस एंड नेशनल सिक्योरिटी" नामक दो पुस्तकें भी लिखी।

शेखर दत्त एक बहुमुखी व्यक्तित्व थे जिन्होंने सैन्य सेवा, सिविल सेवा और राजनीतिक मामलों में भारत के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया।


एक दिन कलेक्टर जब कोर्ट में राजस्व के प्रकरण सुन रहे थे उन्होंने मुझे बुलाया और कहा आज रीडर का काम तुम करोगे। मैं रीडर की कुर्सी पर बैठा पहले मैंने रीडर को काम करते देखा था। अभी रीडर शाखा में ट्रेनिंग नहीं हुई थी। कोर्ट में जो बाबू फाइल रखता है। पढ़ता है तथा कोर्ट के काम में मदद करता है उसे रीडर कहते है। 


मैंने सुनवाई के लिए एक फाइल कलेक्टर के सामने रखी। दोनों पक्षों के वकील सामने खड़े थे। उन्होंने जवाब देने के लिए समय माँगा। कलेक्टर ने समय दे दिया। रीडर नोटशीट लिख कर कलेक्टर के सामने रखता वह हस्ताक्षर करते दोनों वकील हस्ताक्षर करते और आगामी सुनवाई की तारीख की सूचना पाते। मैंने जीवन में कभी नोटशीट नहीं लिखी थी। तो मैं सोच रहा था कोई गलती ना हो। 


मैंने मदद के लिये कलेक्टर के रीडर की तरफ देखा। वह नोटशीट लिखने वाले थे। कलेक्टर ने उनसे कहा नोटशीट रवीन्द्र को लिखने दो। मैंने देखा की इस तारीख के पहले की नोटशीट में भी कोई कार्यवाही नहीं हुई थी। केवल तारीख ली गई थी। मैंने उसकी नक़ल कर लिखा उभय पक्ष उपस्थित। जवाब देने के लिए समय चाहा गया। अगली तिथि दी गई। लिख कर मेने कलेक्टर के सामने फाइल रखी। उन्होंने उस पर हस्ताक्षर कर  दिए। उन्होंने दोनों वकीलों के सामने वह फाइल रखी उन दोनों ने हस्ताक्षर कर  दिए। कोर्ट की कार्यवाही पूरी हो गई। यह मेरी लिखी पहली नोटशीट थी। 


मुझे खनिज की खदान नीलाम करने का प्रभारी बनाया गया। ऑफिस में बड़ासा पांडाल लगाया गया। बहुत ठेकेदार खदानें लेने आये। वहां मुख्यरूप से चम्बल नदी में रेत की नीलामी होती थी। जब नीलामी शुरू हुई तो एक छह फुट लम्बा छोड़ा आदमी एक लठ्ठ ले कर आया। पांडाल के एक कोने में खड़ा हो गया। जब तक वह नहीं सर हिलाता कोई बोली नहीं लगाता था। जब मैंने अपने स्टाफ से पूछा तो उन्होंने बताया कि वह सरेण्डर डकैत है। बिना उसकी मर्जी के आप रेत निकालने का काम नहीं कर सकते। मैंने शराब के ठेकों की नीलामी भी करवाई तब भी वहीं माहौल था। तब मैंने उन्हें अपने कमरे में बैठा कर बात कि की इस तरह शासकीय काम में बाधा नहीं डाले। वह वहां से चले गए। तब शांति से नीलामी हो सकी। 


हमारा तहसील की ट्रेनिंग मुरैना तहसील में हुई। वहां एसडीएम थे एम एम श्रीवास्तव। बहुत कोमल, सौम्य, सरल ह्रदय व्यक्ति। उनके रीडर शर्मा जी। हमने निश्चित किया की सुन कर नहीं काम कर कर ट्रेनिंग लेंगे। रीडर की ट्रेनिंग में शर्मा जी की जगह में बैठ कर सुनवाई के लिए प्रकरण एसडीएम को में देता। शर्मा जी बहुत मोटे व्यक्ति थे। हसमुख। वह सफ़ेद कमीज पहनते। उनमें ऊपर बहुत बड़ी जेब बनबाते। वह अपना काम करते रहते। पक्षकार या वकील प्रकरण में तारीख लेने आते। शर्मा जी की जेब में सिर्द्धानुसार रूपये रखते जाते ना कभी शर्मा जी किसी से कुछ मांगते ना ऊपर मुँह उठा कर देखते। 


किसने कितना पैसा रखा। पर इतना आ जाता कि शाम तक जेब भर जाती। जब मैं कुछ दिन उनकी जगह बैठा तो लोगों ने सोचा शर्मा जी का ट्रांसफर ही गया है और में नया रीडर हूँ। वह मेरी जेब मैं पैसा रखने लगे। जितना पैसा आया मैने ईमानदारी से शर्मा जी को शाम को दे दिया। मुझे परीक्षा के समय पढ़ी प्रेमचन्द की कहानी नमक का दरोगा याद हो आई। जिसमें दरोगा का पिता कहता है 'यह तो पीर का मजार है।’


मुरैना में लोगों के तीन शौक तब थे- पहला बन्दुक रखना। दूसरा अच्छे बैल रखना और तीसरे घर में एक महिला खरीद कर लाना। बन्दुक का लाइसेंस मिल जाना बहुत बड़ी बात होती। बन्दुक सुरक्षा के लिए रखते थे। यदि ग्वालियर के बस स्टैंड में किसी बस में सबसे ज्यादा लोग बंदूक टांग कर बस में बैठ रहे हो तो आप उस बाद में बिना पूछे बैठ जाये वह बाद मुरैना ही जायगी। 


बंदूक का लाइसेंस बनाने के लिये ऑफिस में बाबू की पोस्टिंग बहुत सिफारिस से होती थी। वहां उस समय बाबू जी थे मातादीन भारद्वाज। बहुत लम्बे तगड़े हंसमुख मिलनसार व्यक्ति। उनके पास हर समस्या का हल था। मेरी शुरू-शुरू में बहुत मदद की। ट्रेनिंग तो दी ही साथ में दोस्त बन गये। वह दोस्ती आज तक कायम है। उनके बच्चे भी मिलते रहते है। 


मुरैना नगर पालिका के अध्यक्ष के खिलाफ सदस्यों ने अविश्वास प्रस्ताव दिया। कलेक्टर ने मीटिंग की अध्यक्षता करने का प्रभार मुझे दिया। नियत दिन, समय मैं कारवाही शुरू करवाने अनगा पालिका के ऑफिस गया। वहा बहार बहुत सरे लोग बन्दूक टांग कर घूम रहे थे। मैंने ऐसा माहौल नहीं देखा था। चारो तरह बहुत तनाव था। मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन बहुत डरे हुए थे। उन्होंने पुलिस बुलाने का अनुरोध किया। मैंने थाने में फोन कर पुलिस फ़ोर्स को बुलाया। मुझे प्रस्ताव पढ़ना था और मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन को कार्यबाही की प्रोसीडिंग रजिस्टर में लिखना थी। मैंने सदस्यों से ध्यान देने को कहा और प्रस्ताव पढ़ा।


​​अध्यक्ष के विरुद्ध लाये गए अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में जो हो वह सब हाथ खड़ा करें। सदस्यों ने हाथ खड़े किये मैंने गईं कर बताया तभी एक सदस्य ने एक दूसरे सदस्य का हाथ पकड़ कर नीचे कर दिया। मैंने अविश्वास प्रस्ताव के विपक्ष में जो सदस्य हो हाथ खड़े करें कहा तो जिसका हाथ नीचे किया था उसने फिर हाथ खड़ा कर दिया। वह रिजर्व सीट से सदस्य थे और पढ़े लिखे नहीं था। सदस्य आपस में लड़ने लगे। वः कर रहे थे कि लोग प्रस्ताव के पक्ष का मतलब अध्यक्ष के पक्ष में समझ कर हाथ खड़े किये थे। केवल एक वोट का अन्तर था। अविश्वास प्रस्ताव पास हो गया था। अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जी कार्यवाही की प्रोसेसिंग रजिस्टर में लिख दिये थे। 


तभी सदस्यों में झगड़ा बहुत बाद गया। सदस्यों में मार पीट होने लगी उन्होंने प्रोसीडिंग रजिस्टर मिस्टर जैन से छीन कर फाड़ दिया। मैं एक कोने में खड़ा था। सब एक दूसरे को मार रहे थे। मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन दर के मारे टेबिल के निचे दुबक गये। सदस्य उन्हें खींच कर मारने लगे। मैंने जैसे पुलिस अन्दर बुलाई बाहर गोलियां चलने लगी। अफरा-तफरी का माहौल हो गया। 


बैठक भंग हो गई। किसी तरह मुख्य नगरपालिका अधिकारी मिस्टर जैन को फटा कार्यवाही की प्रोसीडिंग रजिस्टर ले कर मैं कलेक्टर के पास गया। उन्हें हम लोगों की रिपोर्ट पर अंतिम निर्णय लेना था। मैंने अपनी रिपोर्ट बना कर दे दी। पुलिस में रिपोर्ट लिखा दी। मुख्य नगरपालिका अधिकारी मास्टर जैन को उनके घर भेज दिया ,वह बहुत डर गए थे। जब कलेक्टर ने उन से रिपोर्ट लिखित में मांग की उन्होंने प्रोसिडिंग रजिस्टर में क्या लिखा था। प्रस्ताव पास हुआ या नहीं। डर तथा दबाव में उन्होंने पहले पत्र में लिखा अविश्वास प्रस्ताव पास हुआ और दूसरे पत्र में लिखा अविश्वास प्रस्ताव पास नहीं हुआ। जब उन्हें ऑफिस बुलाया गया तो वह रो रहे थे। डर के मारे कांप रहे थे। अन्ततः कलेक्टर ने मेरी रिपोर्ट के आधार पर निर्णय लिया।  


मेरी ट्रेनिंग मुरैना के पटवारी के साथ थी। मैं उनके साथ गांव जाता मौके पर खसरा नम्बर, नक्शा, बटान , खतौनी, फसल गिरदावरी, नामान्तरण , बी वन से बी सेवन तक के फॉर्म, सीमांकन, चांदा, जरीब, ऋण पुस्तिका जैसे कितने भूमि से जुड़े शब्द और उनके अर्थ समझे। पटवारी मेन्युल भाग एक से सात तक पढ़े। लेकिन किताब में लिखी बात एक होती है और जमीन पर काम होना दूसरी बात। जो परम्परोओं से चलती है। 


कहने को तो मध्य प्रदेश में कानून पूरे राज्य के लिए एक तरह के है। उन्हें लागु करने की नियम सामान है। लेकिन धरातल पर आज का मध्य प्रदेश चम्बल का मध्य भारत, भोपाल को भोपाल रियासत, सागर का बुन्देलखण्ड, रीवा बघेलखण्ड, जबलपुर महाकौशल, उज्जैन मालवा , इंदौर निमाड़, बालाघाट महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को मिला कर बना प्रदेश है। यहां को परम्पराए, रीतरिवाज, मान्यताए तथा प्रशासन के प्रति दृष्टिकोण अलग-अलग है। समाज कानून से नहीं परम्पराओं से चलता है। 


पटवारी जी ने बताया कि साहब लोग प्रतियोगी परीक्षा के समय इतना पद लेते है कि वह लोग नौकरी में आते ही पढ़ना-लिखना बंद कर देते है। कानून पड़ते नहीं, नियम जानते नहीं यहां तक कि शासन से प्राप्त पत्र भी नहीं पड़ते। क्योकि वह सोचते कि एकवार नौकरी पक्की हुई फिर उन्हें कोई निकाल नहीं सकता। 


वह बेताल जैसे सिस्टम पर तब तक लदे रहते है जब तक मर नहीं जाए या रिटायर ना हो जाए। वह जूनियर स्टाफ से पूछ-पूछ कर काम करते है। इस कारण परम्पराओं से देश चल रहा है। जनता कानून जानती नहीं सो वह भी परम्पराओं को अपना सौभाग्य मानते है। 


पटवारी प्रशासन की नींव का पत्थर है और पटवारी के रिकार्ड में लिखी बात पत्थर की लकीर। कोई काट नहीं सकता। इस का प्रत्यक्ष अनुभव मुझे तब हुआ जब कलेक्टर ने एक पटवारी की शिकायत की जांच मुझे दी। तत्कालीन सांसद महोदय ने एक शिकायत कि की उनकी आगरा बॉम्बे के हाई पर स्थित जमीन किसी सरेंडर डाकू के नाम पटवारी ने कर दी। उन्होंने वह जमीन किसी और को बेचीं थी लेकिन पटवारी ने दाखिल ख़ारजी का खर्चा मांगा। जो नहीं दिया तो पटवारी ने खसरा के खाना नबम्वर बारह में वक्त गिरदावरी सरेंडर डाकू का मौके पर कब्ज़ा लिख दिया। 


खसरा पांच साल के लिये बनता है। फिर पटवारी नया खसरा बनाता और पुराना तहसील में जमा कर देता था। लेकिन इस पटवारी के पास एक पुराना तथा एक चालू खसरा था। इसने पिछली तारीखों में सात साल की खाना बारह में सरेंडर डाकू का नाम इन्ट्री चढ़ा दी। सरेंडर डाकू ने खेत में ट्रैक्टर चला कर फसल बोना चाही। झगड़ा हुआ। पुलिस केस बना। सरेंडर डाकू ने पटवारी से खसरे की नक़ल ले कर सिविल कोर्ट में आवेदन दे कर कब्ज़ा न हटाने पर स्टे ले लिया। 


अब मौके पर कब्ज़ा सरेंडर डाकू का था और सांसद एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी, एक न्यायालय से दूसरे न्यायालय के चक्कर काट रहे थे। पटवारी ने पत्थर की लकीर खींच दी थी। प्रधान मंत्री को शिकायत कर रहे थे। अब मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता में लिखा है कि 'जब तक अन्यथा सिद्ध ना कर दिया जाय खसरे को सही माना जायगा।' 


अब आप राज्य शासन के विरुद्ध राज्य शासन के राजस्व अधिकारी के कोर्ट में शासन के रिकार्ड को गलत साबित करो। फिर तहसीलदार, एस डी ओ, कलेक्टर, कमिश्नर और राजस्व न्यायालय में केस लड़ों फिर सिविल कोर्ट में सिविल न्यायधीश, जिला न्यायधीश, उच्च न्यायालय तथा सर्वोच्य न्यायालय में सिद्ध करो। यदि आप मर जाय तो आपके बच्चे, उनके बच्चे, बच्चों के बच्चे केस लड़ते रहे। 


दो माह पश्चात मुझे भोपाल ट्रेनिंग करने का आदेश मिला। डिप्टी कलेक्टर के पद पर चयनित अभ्यर्थियों को आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी, भोपाल में प्रशिक्षण दिया जाता है। यह अकादमी, राज्य के प्रशासनिक अधिकारियों को प्रशिक्षित करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान है। 1980 के बैच के डिप्टी कलेक्टरों ने भी इसी अकादमी में प्रारंभिक प्रशिक्षण दिया गया था। 


जब हम आर.सी.वी.पी. नरोन्हा प्रशासन एवं प्रबंधकीय अकादमी, भोपाल पहुंचे तब वहां के होस्टल का एक भवन था और कुछ बन रहे थे। हमारे साथ 1979 वर्ष के यूनियन सर्विस कमीशन द्वारा चयनित सीधी भर्ती के बैच के लड़के लड़कियां ट्रेनिंग के लिये आये थे। इस तरह लगभग पैतीस लोग थे। तब प्रशासन अकादमी का मैस भवन नहीं बना था। मैस नहीं चलता था। सबसे पास का बाजार विट्टन मार्केट भी विकसित नहीं हुआ था। आस-पास कोई आवासीय कॉलोनी नहीं थी। आने-जाने का साधन नहीं मिलता था। 


ऐसे में प्रशासन अकादमी के डायरेक्टर/निर्देशक ने हम लोगों को मैस चलने का आदेश दिया। सबने मिल कर मुझे मैस सेक्रेटरी बना दिया। मेरा काम था सभी से मासिक पेमेंट लेना, बाजार से किराना, सब्जी, दूध, अंडा, ब्रेड आदि सामान खरीद कर लाना। स्टोर में रखना तहा रोज सुबह रसोइये को तोल कर सामान देना। 


यह बहुत मेहनत का काम था पर मुझे तो अलग करने के लिये जुम्मन कीड़े ने कटा था। तो यह काम तो करना ही था। सबसे कठिन काम था पैसा बसूलना। समय पर लोगों का वेतन नहीं आता था। तब सामान खरीदने के लिये पैसे की व्यवस्था करनी होती थी। वहां से बीस किलोमीटर से आगे सब्जी मण्डी थी। इसके लिए प्रशासन अकादमी के डायरेक्टर ने हम लोगों को एक गाड़ी की व्यवस्था की। 


यह गाड़ी उनके परिवार के उपयोग में भी आती थी तो कई बार गाड़ी मिलने में दिक्कत होती थी। किसी को कड़क रोटी चाहिये तो किसी तो नरम। यहां अलग-अलग  राज्यों से लोग थे सब की पसन्द अलग। रोज झगड़ा होता। प्रशासन अकादमी के रसोइये, वर्तन साफ करने वाले, सफाई वाले स्टाफ के नखरे अलग। 


कालेज के समय एन सी सी तथा एन एस एस के कैम्प लगाने का अनुभव यहां काम आया। एकेडमी के महा निर्देशक थे फ़क़ीर चंद और निर्देशक थे श्री जैन। एक दिन महानिर्देशक महोदय बल्लभ भवन राज्य सचिवालय से आये। उन्होंने हम लगों की मीटिंग की। कुछ ने मैस की व्यवस्था की शिकायत की। मुझसे उन्होंने समस्या पूछी। 


मैने एकेडमी से समय पर गाड़ी न मिलाने की समस्या बतादी। निर्देशक थे श्री जैन को डांट पद गई। तब से वह मुझसे चिढ़ने लगे। मुझे परेशान करने के बहाने खोजने लगे। मुझे बाद में लगा कि  गाड़ी न मिलाने की समस्या की शिकायत नहीं करना था। पर बचपना बहुत था। 


प्रशासन अकादमी में दो बार अटेंडेंस के रजिस्टर पर हस्ताक्षर करना होगा। मैस के झमेलों के कारण मेरी अटेंडेंस कम हो जाती। तब प्रशासन अकादमी से नोटिस मिला। एक दिन हम लोग प्रशासन अकादमी के सामने झील में बोटिंग करने गये। अटेंडेंस के रजिस्टर के रजिस्टर को झील में फेंक दिया। मैंने नोटिस का जवाब दिया कि मैंने पूरे हस्ताक्षर किये है। सबूत के तौर पर अटेंडेंस के रजिस्टर को दिखाने की मांग की। अटेंडेंस के रजिस्टर को प्रशासन अकादमी के स्टाफ ने खूब खोजा नहीं मिला। तब मेरा नोटिस निरस्त हुआ। 


प्रशासन अकादमी एक पत्रिका निकाने जा रही थी। हम लोगों से लेख मांगे गये। मैंने मेहनत करके नामांतरण पर लिख लिखा जिसे पत्रिका में प्रमुखता से छापा गया। मुझे जब प्रशंसा मिल रही थी तभी मुझे प्रशासन अकादमी से दूसरा नोटिस मिला कि मैंने मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता से तथा श्री जैन निर्देशक, प्रशासन अकादमी के किसी लेख की नक़ल की है। 


मैंने जवाब में लिखा कि मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता द्विवेदी जी की किताब सभी लोग पढ़ते है। मैंने नहीं पढ़ी है। पर प्रक्रिया की व्यख्या मेरी है। मैंने कभी श्री जैन का लेख ना तो देखा है न ही नक़ल की है। मेरे लेख का मिलान कर लिया जाय। तब यह नोटिस निरस्त किया गया। 


जब हम लोग यह प्रशिक्षण समाप्त कर वापिस मुरैना चला गया। कई महीनों बाद तीसरा नोटिस प्रशासन अकादमी से आया जिसमें किचन तथा खाने के बर्तन, चम्मच, कप, प्लेट आदि की एक लम्बी सूची थी जो गायब सामान था उसकी कीमत वसूली की राशि सूची अनुसार जमा करने की मांग की गई थी। मैंने उसका जवाब दिया कि मुझे केवल खाने की सामग्री लाने का काम मौखिक दिया गया था। 


जिसका पूरा हिसाब मेरे पास है। किचिन तथा खाने के वर्तन मुझे कभी नहीं सोपे गये। वह  प्रशासन अकादमी के स्टाफ के पास ही रहे। मेरे कही प्राप्ति के हस्ताक्षर हो तो मुझे वह रसीद दिखा दी जाय तो मेरी जिम्मेदारी बनेगी। जब वह सामग्री कभी मेरे प्रभार में दी नहीं गई तो राशि जमा करने का नोटिस निरस्त किया जाय। तब जा कर यह नोटिस ख़ारिज हुआ। क्लास रूम के बाहर मिली यह असल ट्रेनिंग आगे नौकरी में बहुत काम आई। 


जब हम प्रशासन अकादमी में ट्रेनिंग ले रहे थे तभी हमारी विभागीय परीक्षा का रिजल्ट आने वाला था। यह रिजल्ट हमेशा सरकारी गजट में छपता। मध्य प्रदेश राजपत्र, जिसे आमतौर पर 'गजट' कहा जाता है, राज्य सरकार का एक आधिकारिक कानूनी दस्तावेज है। इसका उपयोग नए कानूनों, नियमों, विनियमों, संधियों और अन्य कानूनी सूचनाओं को प्रकाशित करने के लिए किया जाता है। "गजट" शब्द इतालवी शब्द "गजिटर" से आया है, जो 16वीं शताब्दी में वेनिस में प्रकाशित होने वाले एक अनौपचारिक समाचार पत्र का नाम था।


मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य के गठन के बाद, नए कानूनों और नियमों को लागू करने और जनता तक पहुंचाने के लिए राजपत्र का प्रकाशन शुरू किया गया। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे का एक अभिन्न अंग है और शासन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहते हैं और नए नियम और अधिनियम प्रकाशित किए जाते हैं। मध्य प्रदेश राजपत्र को दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है:


साप्ताहिक राजपत्र: यह प्रत्येक सप्ताह प्रकाशित होता है और इसमें विभिन्न सरकारी विभागों के सामान्य आदेश, अधिसूचनाएं, और अन्य महत्वपूर्ण जानकारी शामिल होती है।


असाधारण राजपत्र : यह तब प्रकाशित होता है जब किसी विशेष और तत्काल मामले पर सरकारी अधिसूचना की आवश्यकता होती है। इसमें नए अधिनियम, अध्यादेश, और अन्य महत्वपूर्ण घोषणाएं शामिल होती हैं।


राजपत्र को कई भागों, खंडों और उप-खंडों में विभाजित किया गया है, जिनमें विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रकाशित की जाती है। कुछ प्रमुख खंड इस प्रकार हैं:


भाग एक, खंड एक: राज्य सरकार के आदेश


भाग एक, खंड दो: विभाग प्रमुखों के आदेश


भाग एक, खंड तीन: उच्च न्यायालय के आदेश और अधिसूचनाएं


भाग एक, खंड चार: राज्य शासन के संकल्प


भाग दो, खंड एक: स्थानीय निकायों की अधिसूचनाएं


राजपत्र का प्रकाशन मध्य प्रदेश सरकार की मुद्रण एवं लेखन सामग्री मध्य प्रदेश राजपत्र, जिसे आमतौर पर 'गजट' कहा जाता है, राज्य सरकार का एक आधिकारिक कानूनी दस्तावेज है। इसका उपयोग नए कानूनों, नियमों, विनियमों, संधियों और अन्य कानूनी सूचनाओं को प्रकाशित करने के लिए किया जाता है।


मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य के गठन के बाद, नए कानूनों और नियमों को लागू करने और जनता तक पहुंचाने के लिए राजपत्र का प्रकाशन शुरू किया गया। यह राज्य के प्रशासनिक ढांचे का एक अभिन्न अंग है और शासन की पारदर्शिता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समय-समय पर इसमें संशोधन होते रहते हैं और नए नियम और अधिनियम प्रकाशित किए जाते हैं।


राजपत्र का प्रकाशन मध्य प्रदेश सरकार की मुद्रण एवं लेखन सामग्री विभाग द्वारा किया जाता है। किसी भी नए कानून, नियम या अधिसूचना को राजपत्र में प्रकाशित करने से पहले, उससे संबंधित विभाग द्वारा अनुमोदित किया जाता है। राज्यपाल की अनुमति प्राप्त होने के बाद, इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। राजपत्र में प्रकाशन के बाद ही कोई कानून या नियम आधिकारिक रूप से प्रभावी माना जाता है।


मध्य प्रदेश राजपत्र का महत्व निम्नलिखित कारणों से है:


कानूनी मान्यता: राजपत्र में प्रकाशित होने वाली सभी जानकारी को कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त होती है।


सार्वजनिक जानकारी: यह सरकार और जनता के बीच सूचना के आदान-प्रदान का एक महत्वपूर्ण माध्यम है।


पारदर्शिता: यह सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करता है।


अधिसूचना और प्रभावशीलता: किसी भी कानून या नियम को लागू करने के लिए राजपत्र में उसकी अधिसूचना का प्रकाशन अनिवार्य है।


आप मध्य प्रदेश राजपत्र की जानकारी मध्य प्रदेश सरकार की आधिकारिक वेबसाइट पर देख सकते हैं। विभाग द्वारा किया जाता है। किसी भी नए कानून, नियम या अधिसूचना को राजपत्र में प्रकाशित करने से पहले, उससे संबंधित विभाग द्वारा अनुमोदित किया जाता है। राज्यपाल की अनुमति प्राप्त होने के बाद, इसे राजपत्र में प्रकाशित किया जाता है। राजपत्र में प्रकाशन के बाद ही कोई कानून या नियम आधिकारिक रूप से प्रभावी माना जाता है।


हम कुछ दोस्तों ने निश्चित किया कि हम लोग मंत्रालय वल्लभ भवन जा कर गृह मंत्रालय में रिजल्ट पता करेंगे। मंत्रालय, जिसे 'वल्लभ भवन' के नाम से जाना जाता है, मध्य प्रदेश सरकार का सचिवालय है और राज्य के प्रशासनिक केंद्र का हृदय है। यह भोपाल में अरेरा हिल्स नामक एक शांत और सुरम्य पहाड़ी पर स्थित है, जो शहर के राजनीतिक और प्रशासनिक जीवन का केंद्र है। मध्य प्रदेश का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। राज्य बनने के बाद, राजधानी भोपाल के लिए एक नए सचिवालय की आवश्यकता महसूस हुई। 1958 में, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने वल्लभ भवन की आधारशिला रखी थी।


इस इमारत को बनने में लगभग 7 साल का समय लगा। जब यह बनकर तैयार हुई, तो यह 5 मंजिला, 100 फीट ऊंची इमारत भोपाल की सबसे ऊंची इमारतों में से एक थी। यह इमारत अरेरा हिल्स के एक निर्जन टीले पर बनाई गई थी, जिसे उन दिनों 'लक्ष्मी नारायण गिरी' कहा जाता था। अब यह क्षेत्र 'अरेरा हिल्स' के नाम से जाना जाता है। इस सचिवालय का नाम 'वल्लभ भवन' तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के कहने पर रखा गया। द्वारका प्रसाद मिश्र, सरदार वल्लभ भाई पटेल से बहुत प्रभावित थे। वह 1947 से 1950 के बीच सीपी एंड बरार के गृह मंत्री के रूप में कार्य कर चुके थे और इस दौरान उनका सरदार पटेल से गहरा संबंध रहा था। सरदार पटेल के प्रति उनके सम्मान के कारण ही इस भवन का नाम वल्लभ भवन रखा गया। वल्लभ भवन सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश की राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों का एक साक्षी है, जो राज्य के विकास और इतिहास का प्रतीक है।

गेट पास बनाने की औपचारिकताएं पूरी कर हम लोग गृह मंत्रालय पहुंचे। हम पहलीबार इस भवन में गए थे। एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे बाबू के पूछते आखिरकार पहुंचे उस बाबू के पास जो रिजल्ट जारी करने का काम देखता था। वह किसी फायल पर कुछ लिख रहे थे। नाम था गुपचुप बाबू। जो पिछले व्यक्ति ने बताया था। छोटा नाटा कद। काला रंग। बाल उड़े हुए। सफ़ेद कमीज पायजामा पहने बाबू को नमस्ते किया। उन्होंने नजरें ऊपर उठाए बिना सर हिला कर नमस्ते का जबाब दिया। हमने अपना परिचय दिया कि हम लोग डिप्टी कलेक्टर तथा आई ए एस अधिकारी ट्रैनिंग ले रहे है। हम लोगों ने विभागीय परीक्षा दी है। रिजल्ट पता करने आये है। उन्होंने गर्दन नीचे किये ही जबाब दिया रिजल्ट बन गया है। उन्होंने एक फायल की ओर इसारा कर बताया। अभी गोपनीय है जब गजट में छप जाएगा तब पता चलेगा। में अभी नहीं बता सकता। बहुत मिन्नतें करने के बाद भी वह टस से मस नहीं हुए। हम लोग मुंह लटकाकर वापिस प्रशासन अकादमी में आ गए। हमें अपनी औकात का पता चल गया था। अहंकार को बहुत चोट पहुंची थी। हम से सीनियर अधिकारीयों से साथ गुपचुप बाबू काम करते थे। उन्होंने यथा नाम तथा गन दिखा कर हम लोगों की औकात समझा दी थी। मुझे आज तक नहीं पता कि यह उनका सही नाम था या चुप रहने के कारण साथी इस नाम से पुकारते थे। 


जब मैं मुरैना वापिस पंहुचा तो श्री दत्त साहब का स्थानांतरण हो गया था। मेरे दूसरे कलेक्टर थे श्री एस सी वर्धन। यह बहुत सीधे तथा सौम्य व्यक्ति उड़ीसा के निवासी थे। वह दो-तीन महीनें ही थे। तभी कमला कांड हो गया। अश्विनी सरीन, द इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार थे, ने  एक "देह व्यापार के बाजार" से "कमला" नामक एक महिला को खरीदा था। ऐसी प्रथाओं के लिए बदनाम जगह थी जहाँ महिलाओं को वेश्यावृत्ति या घरेलू दासों के रूप में बेचा जाता था। 


उन्होंने उसे 1981 में कथित तौर पर 2,300 रुपये में खरीदा था। सरीन का इरादा भारत के कुछ हिस्सों में बेरोकटोक चल रहे मानव तस्करी और महिलाओं की खरीद-फरोख्त की भयानक प्रथा को उजागर करना था। उन्होंने फिर द इंडियन एक्सप्रेस में अपने अनुभव और इस व्यापार की वास्तविकता का विस्तार से वर्णन करते हुए लेखो की एक श्रृंखला प्रकाशित की। इस खुलासे ने पूरे भारत में भारी हंगामा खड़ा कर दिया। अभी मुरैना में एक और महिला के साथ बदसलूकी की गई, इसके परिणामस्वरूप मुरैना कलेक्टर का स्थानांतरण कर दिया गया। 


फिर हमारे तीसरे कलेक्टर थे श्री सन्दीप खन्ना। वह दिल्ली के निवासी थे। तब तक मुझे सरकारी मकान मिल गया था। मेरा परिवार आ गया था। मेरे चाचा ने उनकी राजदूत मोटर साइकल मुझे दे दी थी। टीकमगढ़ से मुरैना की सड़क मार्ग से दूरी लगभग 256 किलोमीटर मैंने अकेले तय की थी। मैंने एल एल बी करने की लिये कॉलेज में एडमिशन लिया। मुझे दिल्ली के हाइ कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश सरकार के प्रकरणों में प्रभारी बनाया गया था। इस कारण हर माह मुझे दिल्ली जाना होता था। में रात को छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से दिल्ली जाता। 


ट्रेन सुबह निजामुद्दीन स्टेशन पर पहुंचती। मैं पैदल पालिका बाजार जाता। वहां नया अंडरग्राउण्ड बाजार बना था। वहां अच्छे से फ्रेश होता। फिर सुप्रीम कोर्ट जाता। मध्य प्रदेश शासन द्वारा नियुक्त एडवोकेट गम्भीर जी के चेंबर जाता। वकालतनामा पर हस्ताक्षर करता। सुप्रीम कोर्ट की केंटीन में दोपहर का खाना खाता। बहुत अच्छा सस्ता खाना होता। मैंने दिल्ली का एक रोड मैप लिया था। पैदल एक सड़क पर जब तक चलता जब तक पांच ना बज जाय। फिर थ्रीव्हीलर ले कर निजामुद्दीन स्टेशन आता। छत्तीसगढ़ एक्सप्रेस से मुरैना सुबह वापिस आता था। 


उन दिनों ट्रैवल तथा कहते का भत्ता बहुत कम था। पास में बहुत पैसे होते नहीं थे। यह रूटीन इसी जरूरत का नतीजा था। इस तरह लगभग पूरी दिल्ली का हर बाजार, हर रोड तथा हर टूरिस्ट प्लेस मैंने पैदल धूम कर देख ली थी। इस बीच बहुत मजेदार कोर्ट केसेस को जानने का मौका मिला। एक प्रकरण दिल्ली तीस हजारी कोर्ट में एक टेप रिकॉर्डर का चल रहा था। किसी समय एक टेप रिकॉर्डर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के तहत गरीबी उन्मूलन, असमानता को कम करने और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए विकासखंड मुरैना को दिया गया था। 


उस समय टेप रिकॉर्डर भारत में नहीं मिलते थे। विदेश से आयात होते थे। बहुत महगें थे। टेप रिकॉर्डर कलेक्टर ने ले लिया। कुछ दिन गाने सुने। जब ख़राब हुआ तो दिल्ली सुधाने के लिये भेजा गया। जिस दुकान में टेप रिकॉर्डर सुधारने दिया था वह किसी कारण बन्द हो गई। टेप रिकॉर्डर सुधार कर वापिस नहीं मिला। 


कलेक्टर ने दुकानदार के विरुद्ध कोर्ट में प्रकरण दायर कर दिया। यह प्रकरण वर्षों से चल रहा था। दुकानदार ने आवेदन दिया कि वह टेप रिकॉर्डर की कीमत या दूसरा टेप रिकॉर्डर देने को सहमत था। लेकिन सरकार का कहना था कि वह पुराना टेप रिकॉर्डर मिलाना चाहिए। वह कम्पनी जिसने वह टेप रिकॉर्डर बनाया था बंद हो गई थी। गवाही देने तत्कालीन कलेक्टर मुरैना करि बार दिल्ली जा चुके थे। सरकार ने वकील तथा अधिकारियों के ऊपर टेप रिकॉर्डर की कीमत से कई गुना खर्च कर दिया था। लेकिन प्रकरण जारी था। 


इस बीच हमारे कमिश्नर श्री व्ही जी निगम कलेक्टर कार्यालय का निरीक्षण करने आए। वह बहुत सख्त मिजाज ऑफिसर थे। उन्होंने सब अधिकारियों की बैठक बुलाई। उनकी टीम ने कई दिनों तक हर शाखा का निरीक्षण कर रिपोर्ट बनाई थी। उन दिनों कमिश्नर की टीम की खूब आवभगत हुई। लेकिन उन्हें भी अपनी सैलरी जस्टीफ़ाइड करना था तो कुछ साधारण कमियां निकाली थी। कमिश्नर ने सब को खूब डांटा। 


जब मेरी बारी आई तो उन्होंने मेरी ट्रेनिंग के बारे में पूछा। मैंने जवाब दिये। उन्होंने पूछा नामांतरण के प्रकरण किस हैड में दर्ज होते है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता के तहत राजस्व न्यायालयों में प्रकरणों के पंजीयन के संबंध में, विभिन्न प्रकरणों के लिए विशिष्ट शीर्षक होते हैं। ये शीर्षक मामले की प्रकृति पर निर्भर करते हैं। प्रत्येक प्रकार के राजस्व मामले के लिए अलग-अलग शीर्षक होते है जैसे नामांतरण, बंटवारा, सीमा विवाद/सीमांकन,अतिक्रमण,व्यपवर्तनऔरआपत्ति/अपील/पुनरीक्षण/

पुनरावलोकन आदि। 


जब कोई आवेदन या प्रतिवेदन प्राप्त होता है, तो राजस्व न्यायालय उसका पंजीयन एक विशिष्ट प्रकरण संख्या के साथ करता है, जो प्रकरण के प्रकार और न्यायालय के अनुसार होता है। मुझे वह हैड याद नहीं था। तब उन्होंने कहा तुम ठीक से ट्रैनिंग नहीं ले रहे हो। तुम्हारे प्रोवेशन पीरियड को बढ़ाने के लिए सामान्य प्रशासन विभाग को पत्र लिखना पढ़ेगा। मैं डर गया। इसका मतलब था कि मेरी सर्विस तब तक कन्फर्म नहीं होती जब तक मैं दो साल का प्रोबेशन पीरियड पूरा करने के साथ विभागीय परीक्षा तथा ट्रैनिंग पूरी नहीं कर लेता। मैंने उनसे याद करने का समय मांगा जो उन्होंने बहुत कठिनाई से मुझे दिया। 


एक दिन में बहुत सरे हैड याद कर उनके कमिश्नर ऑफिस गया। उन्होंने मुझसे वह हैड नहीं पूछे। उन्होंने पूछा कि मुरैना का अधिकतम तापमान क्या होता है। फिर मेरे पास इस सवाल का जवाब नहीं था। उन्होंने अपना ऑफिस बैग खोल कर बताया जब उन्हें किसी मीटिंग में जाना होता है तब वह अपने साथ कितनी जानकारी के जाते है। उन्होंने मुझे सिंधिया राज्य की एक पुस्तक 'दरबार पॉलिसी' पड़ने को दी। इस पुस्तक में वह विवरण दिये गए है जब आप महाराजा के सामने  दरबार में कैसे कपड़े पहनेंगे, क्या-क्या जानकारी ले कर जायगे। कैसे व्यवहार करेंगे आदि। 


धीरे-धीरे मैंने जाना कि जो अधिकारी जितना करप्ट होगा उसे उतना एग्जीक्यूटिव ऑफिसर माना जाता। एक दिन मेरे कलेक्टर ने कहा तुमने एक कहावत सुनी है 'साहब की अगड़ी और घोड़े की पछाडी' नहीं पड़ना चाहिये। मैंने तत्काल पूछा क्या आजू-बाजू साथ-साथ नहीं चल सकते। उन्होंने मुस्करा कर कहा 'कुछ बातें उम्र के साथ समझ आती है।' वह बहुत सही थे। 


अगली दफे जब हमारे कमिश्नर फिर आये उन्होंने सब की मीटिंग बुलाई। मुझसे पूछा तुम नया काम क्या करोगे? मुझे कुछ पता नहीं था। मैंने कहा- जो कोई नहीं करेगा वह मैं करूंगा। उन्होंने कलेक्टर ऑफिस का पुस्तकालय व्यवस्थित करने का काम मुझे दिया। मैने उस की सभी किताबें, फॉर्म, कागज बाहर निकलवाया। सफाई पुताई करवाई। सभी को बहुत व्यवस्थित जमाया जैसे कॉलेज के पुस्तकालय में देखा था। लिस्टिंग, इंडेक्सिंग अधिनियम तथा नियमों के आधार पर फॉर्म जमा कर करवाई। 


नया बोर्ड लगवाया। हर रैक पर विषय सूची लगाई। कमिश्नर को कलेक्टर के माध्यम से आमंत्रित किया। उन्होंने देखा। मैंने बहुत गर्व से उन्हें दिखाया। उन्होंने अगले दिन मुझे तथा मेरे कलेक्टर को प्रशंसा पत्र भेजा। वह मेरी नौकरी में पहला प्रशंसा पत्र था। यह नतीजा था अलग हट कर कुछ करने का। जिस कीड़े ने मुझे कॉलेज में काटा था उसका असर आज भी है। 


 प्रोबेशन काल में देश में चुनाव हुई। मुझे वोटों की गणना का प्रभारी बनाया गया। वोटों की गणना के लिये मैंने अनेक शासकीय भवन देखे। कोई इतना बड़ा नहीं था कि सभी विधानसभाओं के गणना अधिकारी, कर्मचारी एक साथ बैठ सके। जहां मत पेटियां सुरक्षित रखने के लिये स्ट्रंग रूम निर्वाचन आयोग के मापदंडों पर बनाया जा सके। अंत में सेन्ट्रल वेयरहाउस कारपोरेशन का एक निर्माणाधीन का चयन किया गया। 


उसकी चाबी सेन्ट्रल वेयरहाउसिंग कारपोरेशन के सब इंजीनियर से मांगी तो बोला ठेकेदार के पास है। ठेकेदार से मांगी तो बोला सब इंजीनियर के पास है। ऐसा करते दो दिन निकल गए। मेरा स्टाफ चाबी नहीं जा सका। काम करने के लिए दिन कम थे। मैंने अपने ऑफिस बुलाया तो मना कर दिया। तब मैं अपनी जीप से उसे खोज कर चाबी ले गया। वह वेयरहाउस के रास्ते में मिल गया। 


उसे रोका वह मोटर साइकिल पर पाव नीचे कर मेरी गाड़ी के पास खड़ा था। मेरे स्टाफ ने चाबी मांगी तो बोला उसके पास नहीं है  ठेकेदार के पास है। जब उसे बताया कि ठेकेदार से मांगी कहता है सब इंजीनियर के पास है सही क्या है ? वह अकड़ कर बोला पता नहीं है। 


मैंने एक झापड़ उसे मारा तो नीचे गिर पड़ा। चुपचाप जेब से चाबी निकाल कर दे दी। उन दिनों कागज के मत पत्र पर मुहर लगा कर वोटिंग होती थी। वोट गिनने में दो दिन लग जाते थे। हर विधान सभा के लिये चौदह गणना टेबल होती थी। हर टेबल पर तीन कर्मचारी होते थे। सभी चुनाव लड़ रहे प्रत्याशियों के प्रतिनिधि होते थे। 


मत पेटियां स्ट्रांग रूम से  एक एक कर टेबल पर आती। एक बार में चौदह पेटियां खोली जाती। मतपत्र निकाल कर गिने जाते। फिर पचास-पचास की गड्डियां बनाई जाती। एक ड्रम में सभी गड्डियां मिलाई जाती। फिर गिनती होती थी। ऐसे राउण्ड तब तक चलते जब तक सब वोटों की गिनती नहीं हो जाती। डाक से प्राप्त मतपत्रों की गणना अलग होती। सब का टोटल कर विजयी उम्मीदवार/ प्रत्याशी की घोषणा निर्वाचन अधिकारी द्वारा की जाती थी। 


यदि कोई उम्मीदवार/ प्रत्याशी पुनः मत गढ़ना की मांग करता तब पूरी प्रक्रिया पुनः दुहराई जाती थी। यह बहुत समय लेने बाला मेहनत का काम होता था। सभी लोगों को खाना, पीना तथा आराम की व्यवस्था करना होती थी। सम्पूर्ण गणना होने के बाद ही घर जाने की अनुमति होती थी। मैंने बहुत अच्छी व्यवस्था करवाई थी। मेरा कॉलेज के दिनों का अनुभव बहुत काम आया। 


मुरैना में कलेक्ट्रेट भवन की नई बिल्डिंग के लिये मेला ग्राउंड के पास जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा था। एक दिन एक वकील ने एक आवेदन कलेक्टर को दिया कि उनके पक्षकार की जमीन पर उनके परिवार का प्राचीन शिव मंदिर बना है। अतः उस जमीन का अधिग्रहण नहीं किया जाए। कलेक्टर ने वह आवेदन स्थल निरीक्षण कर वस्तुस्थिति की रिपोर्ट देने के लिये मुझे दिया। एक दिन मैं स्थान देखने गया। गर्मियों के दिन थे। एक बाबू की मोटर साइकिल से मौके पर गया। वहां एक आदमी खेत में काम कर रहा था। वह भूमि स्वामी था। मैंने उसके बयान लिखे। 


वहां एक चबूतरा बना कर एक पत्थर को पूजा करने के लिये शिवलिंग के रूप में रखा था। वह कोई पुराना मन्दिर नहीं था। मैं स्थल निरीक्षण के पश्चात अपने कक्ष में रिपोर्ट लिख रहा था। तभी एक नौजवान वकील आया। मैंने उसे कुर्सी पर बैठने को कहा। उसने मुझसे पूछा क्या मैं मौका देखने गया था। मैंने उसे बताया कि में अपनी रिपोर्ट लिख रहा हूँ। उसने कहा कि मैं उसे बिना सुने रिपोर्ट नहीं लिख सकता हूँ। 


मैंने उसे बताया कि यह कार्यवाही महज एग्जीक्यूटिव रिपोर्ट के लिये है। उसे अपने पक्षकार का आवेदन सुनवाई के लिये भूमि अधिग्रहण अधिकारी हो देना चाहिए। उन्हें सुनवाई करने का अधिकार है। वह बहुत नाराज हो गया और मुझे धमकी देने लगा कि देखे बिना कैसे रिपोर्ट लिखते है। वह मेरी तवील पर बार-बार हाथ पटक रहा था। मैंने उसे कक्ष से बाहर जाने का कहा। वह मणि माना। बाहर नहीं गया। सुनवाई करने की लिये जिद्द करने लगा। 


जब समझने पर नहीं माना तब मुझे बहुत गुस्सा आ गया। उन दिनों मुझे बहुत जल्दी बहुत ज्यादा गुस्सा आता था। तब मेरे व्यवहार पर मेरा नियंत्रण नियंत्रण नहीं रहता था। उन दिनों कमरे में गर्मी से बचने की लिये खस की चिक लगाई जाती थी। मैंने उसे एक लात मारी। वह बाहर जा गिरा। उसे कोई चोट नहीं आई। वह चिक से टकरा कर बाहर गिरा था। वह चला गया। अगले दिन वार एसोसिएशन ने मुझ पर माफ़ी मांगने तथा पुलिस केश दर्ज करने की मांग कर हड़ताल कर काम बंद कर दिया। दिन भर मेरे विरुद्ध वकील नारे लगते थे। सभी कोर्ट्स में काम बंद था। 


वकीलों ने कलेक्टर को उनकी मांगो का ज्ञापन दिया। कलेक्टर ने मुझ से कहा ‘जब तुम्हारे हाथ में कलम है तो कलम चलाओ हाथ क्यों चलते हो।’ कार्यालय परिसर में पुलिस लगा दी गई। मुरैना में जरा-जरा सी बात पर लोग गोली चला देते है। मुझे सतर्क रहने की सलाह पुलिस अधीक्षक ने दी। यह हड़ताल चार दिन तक चली। चौथे दिन मुझे कमिश्नर ने बुलवाया। चम्बल डिवीजन में केवल दो जिले भिंड और मुरैना ही आते है। कमिश्नर मुरैना में ही रहते थे। उनके पास काम ज्यादा नहीं होता था। वकीलों ने उन्हें ज्ञापन दिया। 


कमिश्नर ने अगले दिन मुझे बुलाया। मैं अपने कलेक्टर के साथ उनसे मिलने गया। उन्होंने पूरी घटना कलेक्टर से पूछी। कलेक्टर  ने पूरी बात बताई। कमिश्नर ने तब पुलिस अधीक्षक को बुला लिया। मुझे बाहर बैठने को कहा। तीनों ने आपस में बात की। थोड़ी देर बाद मुझे अन्दर बुलाया। कमिश्नर ने कहा कि ‘रवीन्द्र ! तुम माफी मांग लो।’ हड़ताल समाप्त हो जाएगी। मुझे बहुत ख़राब लगा। 


मैंने देखा कि मेरे सीनियर ही मेरा पक्ष नहीं ले रहे है। मैंने साहस कर कहा सर ! मैं अपने कमरे में था। मुझे वकील को सुनने का अधिकार नहीं है। मैं केवल वस्तुस्थिति की रिपोर्ट बना रहा था। उलटे शासकीय कार्य में बाधा डालने का केस पुलिस को वकील के विरुद्ध दर्ज करना चाहिए। 


मैंने कहा चाहे जो हो जाए मैं माफ़ी नहीं मांगूंगा। मैं बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। कमिश्नर ने कलेक्टर तथा पुलिस अधीक्षक को मुझे समझाने तथा ठंडे  दिमाग से काम लेने की सलाह दी। हम लोग वापिस आ गये।कलेक्टर के रीडर शर्मा जी वार एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ रोज रात को खाते-पीते थे। 


मैंने उनसे ट्रेनिंग ली थी वह मुझे अपने बच्चे जैसा प्यार करते थे। उन्होंने मुझे परेशान दिखा कर मेरे कमरे में आ कर कहा कि वह आज रात अध्यक्ष से हड़ताल समाप्त हारने के पत्र पर हस्ताक्षर ले लेंगे। 


उन्होंने रात को वार एसोसिएशन के अध्यक्ष के लेटर पेड़ पर कलेक्टर ने नाम हड़ताल वापस लेने का पत्र हस्ताक्षर करवा कर ले लिया। मैंने वह पत्र कलेक्टर, कमिश्नर तथा पुलिस अधीक्षक को दिया। पत्र से वकीलों की गुटबाज़ी तथा फूट सामने आ गई और हड़ताल समाप्त हो गई। मुझे अपनी दादी की कही कहावत 'जान बची और लाखों पाये, लौट के बुद्धू घर को आये' याद आ गई। मैंने अपने कलेक्टर की  सलाह ‘जब तुम्हारे हाथ में कलम है तो कलम चलाओ हाथ क्यों चलते हो’ भविष्य में मानने की निश्चय किया। 


यह वह दिन थे जब राशन, डीजल, पेट्रोल, मिट्टी का तेल, शक्कर, गेहूं, चावल यहां तक कि स्कूल की कॉपियां कंट्रोल से मिलती थी। हम लोग दाल बना कर कभी इस बाजार कभी उस बाजार दुकानें चेक करते स्टॉक, कीमत देखते। गोदामों में छापे लगते।  स्टॉक मिलान नहीं होने पर दुकान, गोदाम सील कर देते थे। 


इस मामले में मैं बहुत बदनाम हो गया था। बहुत मेहनत ईमानदारी से काम करते। बाजार में जब मेरी गाड़ी रुकती तो दुकानें बंद हो जाती। एक दफे मेरी पत्नी ने बाजार जाने का कहा मैं उनके साथ जब बाजार में गाड़ी घुसी तो मेरी गाड़ी देख कर दुकानें बंद हो गई। रात को हम लोग आगरा बॉम्बे हाईवे पर ट्रक चेक करते थे। जब स्कूलों में परीक्षा होती तब नक़ल चेक करने जाते। लेवी में सरकार किसानों से गेहूं लेती थी तब गांव-गांव जा कर गेहूं एकत्र करवाते थे। 


मुरैना में बोर्ड परीक्षाओं में नक़ल कराने का बहुत बड़ा उद्योग चलता था। स्कूलों में बोर्ड परीक्षा देने पुरे देश के बच्चे आते थे। निजी स्कूल जो बोर्ड परीक्षा के केंद्र होते खेतों में टेन्ट लगा कर परीक्षा करवाते थे। पास करवाने के ठेका दिया जाता था। निजी स्कूल में चार तरह के ऑफर उपलब्ध होते -पहला जिसमें स्टूडेंट को कुछ नहीं करना स्कूल उनकी तरफ से किसी अन्य से उसका पेपर सॉल्व कराते, दुसरे में स्कूल ब्लैक बोर्ड पर उत्तर लिखते नक़ल स्टूडेंट को करना होती, तीसरे में आप अपनी किताबें ले कर आये और नक़ल खुद करें तथा चौथे में स्टूडेंट अपनी नक़ल चुटकों पर ला कर उत्तर लिखें। चारों ऑफर्स की फ़ीस अलग-अलग होती थी। उसी के हिसाब से उन्हें रोल नम्बर मिलते तथा बैठक व्यवस्था अलग-अलग की जाती थी। यह परीक्ष केंद्र चम्बल की वादियों में बहुत दूर बनायें जाते जहां रास्ते नहीं होते थे। 


किन्ही-किन्ही गांव में नहर का पानी छोड़ कर रास्ते बन्द कर दिये जाते। किन्ही-किन्ही गांव में बाहर पेड़ों पर लोग बैठे होते दूर से जब गांव में कोई जीप आती देखते तब कोई बाजा बजा कर स्कूल में सिग्नल भेजते। इस समय जीप या कार केबल सरकारी विभागों में ही होती थी। प्राइवेट वाहन लगभग नहीं थे। तब स्कूल की परीक्षा स्थल को व्यवस्थित कर दिया जाता। निरीक्षण के समय कोई नक़ल नहीं मिलती। हम लोग नक़ल पकड़ने की अलग-अलग रणनीतियां बनाते। 


कई बार ऑफिस के बाहर चाय या नाश्ते की दुकान होती तो वह दुकानदार स्कूलों की 'मुखबिरी' करते। "मुखबिर" का हिंदी में अर्थ सूचना देने वाला या गुप्तचर होता है। यह शब्द आमतौर पर उस व्यक्ति के लिए प्रयोग किया जाता है जो किसी गुप्त या गोपनीय जानकारी को किसी अन्य व्यक्ति या संगठन को देता है। जब निरीक्षण दल बाहर जाते तो लैंड लाइन फोन इ कॉल कर स्कूलों को अलर्ट कर देते थे।


कभी-कभी हम लोग खाली हाथ आते। कभी-कभी बोरों में भर कर नक़ल लाते। इस रैकिट में नेता, जनप्रतिनिधि, बोर्ड अधिकारी और स्थानीय कर्मचारी मिले होते थे। मैंने पहला रिश्वत लेने का मामला एक प्राइवेट स्कूल के प्रिंसिपल को पुलिस के साथ ट्रैप कर शुरू किया था। जब पुलिस का दाल किसी को रंगे हाथ रिश्वत लेते पकड़ता है तब उस दाल में एक एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट गवाह के तौर पर होना आवश्यक था।


एक बार मैं अपने कलेक्टर के साथ धौलपुर फिल्म देखने गया। जब मैं टिकिट खड़की पर टिकिट खरीदने गया तो खिड़की पर जो लड़का बैठा था उसने मुझे नमस्ते किया और अपने मैनेजर से मिलवाया।  मैं चकित था क्योंकि धौलपुर राजस्थान में आता है। मुझे उम्मीद नहीं थी कि वहां कोई मुझे पहचानेगा। मैंने उससे पूछा तो उसने बताया कि वह बोर्ड की परीक्षा देने मुरैना आया था और मैंने उसकी नक़ल पकड़ी थी। वाह, परिचय हो तो ऐसा उसने हम दोनों को फ्री में फिल्म दिखाने की व्यवस्था की और इंटरवल में चाय नाश्ता करवाया।  


जब मैं प्रोबेशनर था तब तत्कालीन कलेक्टर ने उनकी एक पुरानी महिंद्रा पैट्रोल जीप मुझे एलॉट कर दी और ड्रायवर था कलेक्टरों  पुराना  ड्रायवर बसंता। बहुत होशियार पर बड़ा बातूनी। हर कलेक्टर का इतिहास मौखिक याद। गाड़ी काम चलता पर निजी कहानियां खूब सुनाता। गाड़ी का पुर्जा-पुर्जा हिलता। चारों घिसें टायर। हम पीछे तीन पुराने टायर रखते स्टेपनी के रूप में। जब में घर से ऑफिस जाता करीब आधा किलो मीटर दूर गाड़ी झटके खाती और रुक जाती। में रिक्शा ले कर ऑफिस जाता थोड़ी देर में बसंता गाड़ी ले कर आ जाता। मैं कुछ समझा नहीं। एक  गाड़ी चला रहा था तो ड्राइवर सीट के नीचे एक पाइप तथा एक केन एक लीटर की रखी थी। मैं समझ गया। 


मेने बंसता से पूछा। उसने बताया कि जब में गाड़ी में चालीस लीटर पैट्रोल भरवाता वह हर बार एक लीटर निकाल लेता।  मैंने उससे एक एग्रीमेंट किया और एक लीटर गाढ़ी में कम डलवाता। वह बसंता ले लेता। उसके बाद गाड़ी कभी नहीं रुकी। एक दिन मैंने कलेक्टर से अनुरोध किया कि यह गाड़ी बहुत खराब हो चुकी है मेरे किसी काम की नहीं है। मैं इससे टूर भी नहीं कर पाता। उन दिनों कलेक्टर ऑफिस में गिनी चुनी गाड़िया ही थी। कलेक्टर ने कहा यह गाड़ी तुम चलाओ तो गाड़ी का पूरा मैकेनिज्म समझ जाओगे। मैंने छह माह वह गाड़ी चलाई। 


हमारे देश में इतने कानून है कि आप कुछ भी करों वह किसी ना किसी कानून में अपराध हो होगा। मजेदार बात यह है कि जिन अधिकारियों को इन कानूनों में कार्यवाही करने का अधिकार होता है उन्हें पता भी नहीं होता। एक बार हम लोगों ने जांच के दौरान रोड पर एक जले हुए मोबिल आयल का ट्रक पकड़ लिया। ट्रक ठाणे पर खड़ा कर दिया। पता ही नहीं था कि जले हुए मोबिल आयल को ट्रक से ले जाने में कौन सा अपराध था। एक सप्ताह ट्रक थाने पर खड़ा रहा। ट्रक मालिक ने कहा या तो ट्रक छोड़ दीजिये या कोर्ट में पेश कर दीजिये। हमने पुलिस पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के मदद मांगी। उन्होंने कहा कि एक दिन का वक्त दे वह खोज लेंगे कि क्या अपराध बनता है। अगले दिन वह मेरे ऑफिस आये। तीन-चार किताबों के साथ। 


उन्होंने एक माइनर एक्ट में बताया कि जला हुआ मोबिल अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम में कण्ट्रोल आइटम है। इस का परिवहन कलेक्टर के अलॉटमेंट के बाद किया जा सकता है। इस ट्रक में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई अतः ट्रक को राजसात किया जा सकता है। "राजसात" का मतलब है सरकार द्वारा जब्त कर लेना, विशेष रूप से किसी संपत्ति को, जैसे कि वाहन या भूमि, कानूनी कार्यवाही के बाद। यह कार्यवाही पुलिस द्वारा की गई। 


मध्य प्रदेश में राज्य सिविल सेवा अधिकारियों के लिए विभागीय परीक्षा आयोजित की जाती हैं। ये परीक्षा अधिकारियों को सेवा काल के दौरान उनके पदोन्नति, स्थायीकरण, या विशिष्ट पदों पर चयन के लिए महत्वपूर्ण होती हैं। डिप्टी कलेक्टर का पद मध्य प्रदेश राज्य प्रशासनिक सेवा का हिस्सा है। इन अधिकारियों को स्थायीकरण के लिए विभागीय परीक्षाएं "उच्च स्तर" से उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। इन परीक्षाओं का मुख्य उद्देश्य अधिकारियों को राजस्व, प्रशासनिक, दाण्डिक, वित्तीय और लेखा संबंधी नियमों और प्रक्रियाओं से अवगत कराना तथा उनकी व्यावहारिक क्षमता का मूल्यांकन करना है। डिप्टी कलेक्टर पद पर स्थायीकरण के लिए इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना आवश्यक होता है। नवनियुक्त डिप्टी कलेक्टरों को परिवीक्षा अवधि प्रोबेशन पीरियड के दौरान इन परीक्षाओं को उत्तीर्ण करना होता है। 


प्रशासनिक, राजस्व एवं दाण्डिक विधि एवं प्रक्रिया: यह विषय प्रशासनिक, राजस्व और आपराधिक कानूनों तथा उनकी प्रक्रियाओं से संबंधित होता है। सिविल विधि एवं प्रक्रिया, वित्त एवं लेखा तथा स्थानीय शासन: इसमें नागरिक कानून, वित्तीय नियम, लेखा प्रक्रिया और स्थानीय स्वशासन के प्रावधान शामिल होते हैं। राजस्व विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन  यह राजस्व संबंधी कानूनों और आदेशों को लिखने की क्षमता पर केंद्रित होता है। 


दाण्डिक विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन यह आपराधिक कानूनों और आदेशों को लिखने की क्षमता पर केंद्रित होता है। मेरे द्वारा फर्स्ट अटेम्ट में सभी विषय "उच्च स्तर" से पास कर लिए गये। केवल राजस्व विधि एवं प्रक्रिया आदेश लेखन में उच्च स्तर के नंबर नहीं आये। उसे दूसरे अटेम्ट में पास कर सका। मैंने परीक्षा मोती महल ग्वालियर में दी। 


मैंने एलएलबी में लॉ करने के लिये एडमिशन लिया था। इस कारण परीक्षा नहीं दे सका। हमारे कलेक्टर ने हमें देख कर एडमिशन लिया और उन्होंने लॉ कर लिया। कलेक्टर साहब से मेरी दोस्ती थी हम दोनों लगभग हम उम्र थे। में अक्सर उनके साथ दिल्ली जाता और उनकी ससुराल में ठहरता। वह कहते देखों में कितना दयालु हूँ तुम्हें अपनी साली के कमरे में ठहरता हूँ। उनकी साली तब मिरांडा हाउस में पड़ती थी और होस्टल में रहती थी। 


एक दफे जब हम लोग दिल्ली गए तो वह मुझे साउथ दिल्ली के रेस्टोरेंट में खाना खिलाने ले गये। तब नॉन वेज खाने पर मेरी बहुत बहस हो गई। उसके बाद उन्होंने कभी किसी बात के लिए जबरदस्ती नहीं की। हम लोग कभी-कभी ढाबा पर दाल रोटी खाते। फिल्म देखते और खूब घूमते थे। 


उन दिनों मेरी फोटो तथा न्यूज खूब अखबारों में लगभग रोज छपता थी। मुझे इसका नशा हो गया था। पेपर की कटिंग फाइल बना कर रखता। इससे किक मिलता। एड्रेनल रिलीज होता। डोपामाइन रिलीज होता। अजीब नशा था। खूब काम करते थे। जब हम लोग को लोग साथ देखते तो लोग बहुत जलते थे। तरह-तरह की कहानियां। अफवाह प्रशासनिक गलियारों में तैरती रहती। मुझे इस सब का अनुभव नहीं था। 


उनकी जिले की जानकारी लेने की अनोखी तरकीब थी। उनके पब्लिक रिलेशन अधिकारी पराशर जी रोज सुबह-सुबह बस स्टैंड जाते और जब चारों और से आने वाली सवारियां बसों से उतरती तब उनसे खबरें पूछते। फिर सीधे कलेक्टर बंगले जाते। कलेक्टर के साथ नाश्ता करते और ऐसी ख़बरें देते जी किसी अख़बार में नहीं छपी होती थी। तब संचार के इतने साधन भी नहीं होते थे। कलेक्टर सम्बंधित अधिकारियों से फोन कर जबाब तलब करते। उन्हें पता नहीं होता था। सब सोचते कलेक्टर का नेटवर्क बहुत तगड़ा है। 


वह अधिकारियों के घर बिना बुलायें जाते। चाय पीने। पूरे घर में घूमते देखते कितना सामान है। अंदाज लगते अधिकारी ईमानदार है या नहीं। अधिकारियों की पत्नियों का क्लब था। अध्यक्ष थी कलेक्टर की पत्नी। जिस अधिकारी की पत्नी महेंगे कपड़े, गहने पहनती उन्हें रिपोर्ट मिल जाती। 


मैंने समझा कलेक्टर राजा है और डिप्टी कलेक्टर उनकी रानियां और उनमें कोई एक पटरानी। एक चूहा दौड़ अधिकारियों में हमेशा चलती थी। मुझे लोग हमेशा मेरे अधिकारियों का 'ब्लू आइड बॉय' मानते रहे। मुझे भी लगता था कि हर किसी को ईमानदार, कार्यकुशल तथा मेहनती साथी ही चाहिए। ब्लू आइड बॉय' एक मुहावरा है जिसका इस्तेमाल किसी ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है जिसे कोई अधिकारी या प्रभावशाली व्यक्ति पसंद करता है और उसका पक्ष लेता है, या जिसे विशेष रूप से अच्छा व्यवहार दिया जाता है। इसे "पसंदीदा" या "खास" व्यक्ति के रूप में समझा जाता है। 

मुरैना जिले में एक सब-डिवीजन है सबलगढ़। वहां के तत्कालीन विधायक जी द्वारा प्रदेश के मुख्यमंत्री को शिकायती पत्र लिखा गया कर ज्ञापन दिया गया तथा अनुरोध किया गया कि एसडीएम द्वारा कण्ट्रोल की शक्कर वितरण में गड़बड़ी की है अतः उन्हें निलंबित कर जांच कर करवाई की जाए।  एसडीएम को शासन ने निलंबित कर स्थानान्तरण कर दिया गया। एसडीएम का पद रिक्त हो गया। कोई भी डिप्टी कलेक्टर वहां जाने को तैयार नहीं था। कलेक्टर ने सब से पूछा। हम लोगों ने मुरैना में ऑफिसर्स क्लब की बिल्डिंग बनवाई थी।  


इसके उद्घाटन के लिए  कमिश्नर को मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया। कलेक्टर क्लब के अध्यक्ष थे और मैं सचिव। उद्घाटन के बाद हम लोग डिनर करने बैठे। एक टेबल पर कमिश्नर, कलेक्टर और मैं बैठा था। कमिश्नर ने खाना खाते समय  कलेक्टर से पूछा सबलगढ़ का एसडीएम किस को बनाया। 


कलेक्टर ने बताया सर ! कोई वहां नहीं जाना चाहते है। सभी विधायक से डरते है। कमिश्नर ने मेरी ओर देख कर कहा 'मेक हिम एसडीएम' मेरा खाने का कौर मेरे गले में अटक गया। मैंने कहा सर ! अभी मेरा प्रोबेशन पीरियड चल रहा है। वह कड़क कर बोले कुछ नहीं ! तुमने विभागीय परीक्षा पास कर ली है। मैंने कातर निगाहों से कलेक्टर की ओर देखा। उन्होंने मुझे आंख से इशारा किया और कहा जी सर। बात खत्म हो गई। 


मैं अपनी शुरुआत सबलगढ़ से नहीं करना चाहता था। मैंने कलेक्टर से अनुरोध किया। उन्होंने सलाह दी कि में कमिश्नर से मिल कर बात करूँ। मैं तीन दिन अपनी मोटर साइकिल से कमिश्नर बंगले के गेट तक जा कर लौट आता अन्दर जा कर बात करने की हिम्मत नहीं हुई। कलेक्टर ने आदेश निकाल कर मुझे तीन दिन में ज्वाइन करने को कहा। मैंने अपनी पत्नी से कहा तुम मुरैना में ही रहो। मैं सबलगढ़ जा कर ज्वाइन करता हूँ। विधयक जी से मेरी बनेंगी नहीं वह जल्दी ही मेरा  ट्रांसफर करवा देंगे। 


मैंने अपनी समझ को नाम दिया -'पस्तोर डॉक्ट्रिन' 'पस्तोर सिद्धांत' जिस के तहत मैं अक्सर चीजों, घटनाओं, और लोगों पर अपनी व्याख्या बनाता। अधिकारियों को मैंने दो श्रेणियों में बाटा था एक थे ज्ञान मार्गी और दूसरे भक्ति मार्गी। आपकी मर्जी आप कौन से मार्ग पर चल कर अपना कैरिअर बनाते है और मेने चुना था ज्ञान मार्गी पथ। क्योंकि मुझे तो अलग करने का जुम्मन कीड़ा काटता था। मेरी दादी ने एक दोहा सुनाया था- 


"लीक-लीक कायर चले, लीके-लीक कपूत। 

लीक छोड़ तीनों चले शायर, सूर, सपूत।"


सबलगढ़ 

सार्वजनिक जीवन में जो लोग काम करते है उनकी दो इमेज होती है एक वह जो वह है और बहुत नजदीक के लोग उन्हें जैसा जानते है। दूसरी इमेज प्रोजेक्टिड होती है जो लोग आपके बारे में दुसरो से सुनते है, अखबारों में पड़ते है या आजकल सोशल मिडिया, डिजिटल मिडिया पर दिखाई जाती है। यह प्रोजेक्टेड इमेज लार्जर थें लाइफ यानी आपके वास्तविक जीवन से बहुत बड़ी होती है। 

लोग जब सीधे नहीं जानते तो अन्दाज लगते है। मैं बात कर रहा हूँ अस्सी के दशक की। तब अखबार बहुत सीमित थे। खबरे बहुत धमी गति से चलती थी। तो हुआ यो कि जब मेरी पोस्टिंग सबलगढ़ हुई तो लोगों ने अन्दाज लगाया कि 'पस्तोर' सरनेम किस जाती का है। 


कौन से क्षेत्र का है। हम कुछ भी करले जातिवाद और क्षेत्रवाद भारतीय समाज से कभी खत्म नहीं हो सकता है। सो लोगों ने अंदाज लगाया कि पास्टर क्रिश्चियन होते है। किसी ने पहाड़ी बताया। तो किसी ने अनुसूचित जाति या जन जाति का। लेकिन किसी को अन्दाज नहीं लगा कि में ब्राम्हण हूँ।  


कभी- कभी न्यूट्रल होना कितना फायदे मन्द होता है। यह मैंने अपने जीवन में अनेकवार देखा है। उन दिनों सबलगढ़ में समाजवादियों का गढ़ था और उसके नेता थे बहादुर सिंह धाकड़।वह वकील भी थे। वह सबलगढ़ के बाजार में अपने ऑफिस के सामने दो ब्लैक बोर्ड रखते थे। उन पर रोज की ताजा खबर चाक से सुबह-सुबह लिख देते थे। 


उन्होंने मेरे सम्बन्ध में काफी खोजबीन की और जितना मुरैना के लोगों से जान्सके थे मेरी विरुदावली लिख दी। लोगों ने चटकारे ले कर पड़ी। बात मुझ तक पहुंची। कुछ पत्रकार इंटरव्यू लेने आये। मैंने व्यक्तिगत जानकारियां देने से मना कर दिया। उन्होंने भी खोजबीन की और न्यूज छपी। तो लोग इतना तो जान गये कि में ब्राम्हण हूँ। 


तब जौरा के विधायक थे मिश्रा जी। वह उनके विधानसभा क्षेत्र में ब्राह्मण अधिकारी ही पोस्ट करते थे। वह आप जान लो आप की पोस्टिंग अकेली योग्यता से नहीं होती है। उनके तत्कालीन एस डी एम एक हमारे साथी कोमल सिंह थे। विधायक जी को जब मेरे ब्राह्मण होने का पता चला तब वह कलेक्टर से मिले और मेरी पोस्टिंग जौरा करने का अनुरोध किया। 


कलेक्टर विधायक जी को नाराज नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अंदाज लगाया कि मैंने विधायक जी से कहलवाया है। जबकि में ना तो कभी विधायक जी से मिला ना उन्हें जानता था। कलेक्टर ने मुझ से पूछा। मैंने वस्तुस्थिति बता दी। उन्होंने किसी तरह विधायक को कहा कि कुछ दिन बाद ट्रांसफर कर देंगे। विधायक जी मान गये। 



सबलगढ़ मध्य प्रदेश के कई शहरों से सड़क मार्ग से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। ग्वालियर, मुरैना, श्योपुर कलां, शिवपुरी, जयपुर और दिल्ली के लिए दैनिक बसें उपलब्ध हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन मुरैना है और निकटतम प्रमुख शहर ग्वालियर है। 


सबलगढ़ का किला शहर का सबसे प्रमुख आकर्षण है। यह एक पहाड़ी पर स्थित है और मध्यकालीन वास्तुकला का एक बेहतरीन उदाहरण है। इसका निर्माण करौली के राजा गोपाल सिंह ने करवाया था, हालांकि इसकी नींव गुर्जर सरदार सबल सिंह ने रखी थी, जिनके नाम पर शहर का नाम पड़ा। किले ने विभिन्न शासकों के अधीन कई ऐतिहासिक लड़ाइयाँ देखे हैं, जिनमें मराठा और अंग्रेजों का शासन भी शामिल है।


किला अब खंडहर की स्थिति में है, लेकिन इसकी भव्यता और ऐतिहासिक महत्व अभी भी पर्यटकों को आकर्षित करता है। कुछ लोक कथाओं के अनुसार, यह किला भूतिया कहानियों के लिए भी जाना जाता है। किले के भीतर कई मंदिर, जैसे जगन्नाथ मंदिर, और अन्य ऐतिहासिक संरचनाएं, जैसे नवल सिंह हवेली और कचहरी (शाही दरबार) स्थित हैं।


सबलगढ़ के अन्य प्रमुख आकर्षणों में- अलखिया खोह: यह सबलगढ़ के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है, जो देवी काली माता को समर्पित है। नवरात्रि के अवसर पर हर साल यहां नौ दिनों का मेला लगता है। रो घाट: यह सबलगढ़ में एक और सुंदर पर्यटन स्थल है। 


चंबल नदी, शहर से लगभग 20 किमी दूर स्थित चंबल नदी, भारतीय डॉल्फिन सहित वन्यजीवों के लिए एक प्राकृतिक आवास है। यहाँ चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य भी है। कूनो नदी और चंबल राइट मैन कैनाल पर एशिया का सबसे बड़ा साइफन: यह सबलगढ़ से लगभग 50 किमी दूर स्थित एक इंजीनियरिंग चमत्कार है।


कैलारस शुगर मिल मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित है। यह मिल "द मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना लिमिटेड" के नाम से भी जानी जाती है। इस मिल को 1965 में लाइसेंस मिला था और 1971-72 के सीजन में इसका उत्पादन शुरू हुआ। यह राज्य की पहली सहकारी चीनी मिल थी। यह मिल मुरैना और आसपास के क्षेत्रों के किसानों के लिए जीवन रेखा थी। 


मैंने सबलगढ़ में काम शुरू किया। मजेदार बात थी एस डी एम का बंगला। वह विधायक जी के घर के ठीक सामने थे। सड़क के इस पार एस डी एम का घर और सड़क के उस पार विधायक जी का घर। में तब सिंचाई विभाग के रेस्ट हाउस में रह रहा था। एस डी एम की गाड़ी का उपयोग विधायक जी करते थे। लांग बुक एस डी एम भरते थे। 


मैंने स्टाफ से कह कर गाड़ी बुलवा ली। पहले कण्ट्रोल के कोटा अलॉटमेंट का विवरण दुकानवार विधायक जी देखते फिर एस डी एम जारी करते। मुझे अजीब लगा। मैंने फायल भेजने का सिस्टम बंद करने के निर्देश स्टाफ की दिए। बात विधायक जी तक पहुंच गई। यदि आप कोई बात सबमें फैलाना चाहो तो ऑफिस में सबसे नजदीक लगाने बाले को यह कह कर बता दो कि यह बात गोपनीय है केवल तुम्हें बता रहा हूँ। अपने तक ही रखना। वह बात अगले दिन सबको पता होती। 


मैं विधायक जी से मिलने उनके घर नहीं गया। कोई प्रोटोकॉल नहीं था। पर लोग जाते थे। एक सप्ताह शांति से गुजर गया। जब आपकी पोस्टिंग किसी जगह होती है तो यह अरेंज मैरिज कैसी होती हैं। आपकी बीवी से मुलाकात सीधे सुहागरात में होती है। तब दोनों जोर लगाते है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधता है। माना जाता है कि जीवन भर उसी की चलेंगी। उन दिनों एस डी एम का कोई कार्यालय भवन नहीं था। जनपद कार्यालय के एक हाल को एस डी एम में बदल दिया गया था। कार्यालय का व्यय जनपद कार्यालय द्वारा उठाया जाता था। 


उन दिनों भारत सरकार द्वारा कार्यान्वित 'बीस सूत्री कार्यक्रम' देश के सामाजिक-आर्थिक विकास और विशेष रूप से गरीब और वंचित वर्गों के जीवन स्तर में सुधार लाने के उद्देश्य से शुरू किया था। बीस सूत्री कार्यक्रम के कार्यान्वयन की निगरानी केंद्र, राज्य, जिला और ब्लॉक स्तरों पर की जाती थी। ब्लॉक स्तर कमेटी का अध्यक्ष क्षेत्रीय विधायक और सचिव एस डी एम होते थे । 


इस कार्यक्रम को पहली तत्कालीन प्रधानमंत्री  द्वारा शुरू किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य गरीबी उन्मूलन, उत्पादकता बढ़ाना, आय असमानताओं को कम करना और सामाजिक एवं आर्थिक विषमताओं को दूर करना था। बीस सूत्री कार्यक्रम में कृषि, ग्रामीण विकास, रोजगार सृजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, पर्यावरण संरक्षण, कमजोर वर्गों का सशक्तिकरण और सार्वजनिक वितरण प्रणाली सहित विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पहलुओं को शामिल किया गया था।


तब सबलगढ़ में तीन विकास खण्ड सबलगढ़, कैलारस तथा विजयपुर होते थे। मेरी पहली बैठक कैलारस में हुई। मेरी पहली मुलाकात विधायक जी से बैठक मेउ हुई। माहौल में बहुत तनाव था। अधिकारी उस समय बहुत परेशान थे। बैठक में आना उनकी मज़बूरी थी। मैंने बैठक का एजेंडा जारी किया था। बैठक में बहुत सारे अनाधिकृत लोग बैठे थे। वह सब विधयाक जी के सार्थक थे। मेरे द्वारा इस पर आपत्ति ली गई। मैंने कहा कि जी लोग समिति के सदस्य नहीं है बाहर चले जाय। कुछ अधिकारियों के सहायक वहां थे वह सब उठ कर बाहर चले गये। 


विधायक जी के साथी नहीं गए। तब मैंने विधयाक जी से अनुरोध किया। वह नियम जानते थे। ना चाह कर भी मन मार कर उन्हें अपने लोगों को बाहर जाने के लिये कहना पड़ा। उनका मूड बिगड़ गया। ऐसा पहलीवार हुआ था। अधिकारियों के चेहरों पर सन्तोष की झकल थी। उन्हें लगा था कि कोई उनका पक्ष लेने बाला अधिकारी भी है। 


बैठक की कार्यवाही एजेंडा के अनुसार मैंने शुरू की। विधायक जी ने एक कागज निकाल कर बिजली विभाग के अधिकारियों से जानना चाहा कि राम सुख कैलारस का इस माह का बिजली बिल कितना आया है। बिजली विभाग के डिवीज़नल इंजीनियर के पास जानकारी नहीं थी। 


विधायक जी उसे डांटने लगे कि बिना जानकारी के बैठक में क्यों आये। उसने कहा कि एक-एक व्यक्ति के बिल की जानकारी लाना सम्भव नहीं है। वह चिल्लाने लगे। अधिकारी को गाली देने लगे। मेरे जीवन की यह पहली बैठक थी। मुझे अच्छा नहीं लगा। मैंने कहा यह कागज मुझे दे दे में अगली बैठक के एजेंडे में जोड़ दूंगा तब जवाब आ जायगा। 


वह मेरी तरफ मुड़े और बोले "आप पहली दफे एस डी एम  बने हैं। आपको परम्पराए पता नहीं है।" 


मैंने बहुत शांति तथा विनम्रता से कहा "आप भी तो पहली बार विधायक बने है।" उन्हें ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। गुस्से में बोले "मैं तुम्हें देखा लूँगा।"  


अब मुझे भी गुस्सा आने लगा था। मैंने दृढ़ता से कहा "ठीक हैं !आप कैसे देखेंगे?" मैंने कार्यवाही रोक दी। उनसे कहा चलो बाहर एक दूसरे को देख लेते है। फिर बैठक कर लगे। मैं खड़ा हो गया। अपनी कमीज की बाहें मोड़ने लगा। 


वह बोले "मैं मुख्यमंत्री से कह कर तुम्हारा ट्रांसफर करवा दूंगा।" मैंने कहा "ठीक है आप मेरा ट्रांसफर आगरा करवा दे।" वह बोले "आप तो मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी है उत्तर प्रदेश में कैसे ट्रांसफर होगा।" मैंने शांति से कहा 


"मध्य प्रदेश काडर मैंने स्वेक्षा से चुना है। तो मेरा ट्रांसफर तो कही भी हो सकता है। इस में देख लेने की बात कहां है। यदि ताकत है तो कुछ अलग करिये।"  कुछ लोगों के हस्तक्षेप से विवाद शांत हुआ। बैठक हुई। 


इस के बाद मेरी विधायक जी से दोस्ती हो गई और मैं वहां लगभग तीन साल रहा। कभी विधायक जी ने काम में हस्तक्षेप नहीं किया। सार्वजनिक कार्यक्रमों में कभी वह मुख्य अतिथि होते तो मैं अध्यक्षता करता। कभी मैं मुख्य अतिथि होता तो वह अध्यक्षता करते। आजीवन उनसे दोस्ती रही। 


मैं जब भी कोई काम करता या पॉलिसी बनता तो मेरे ज़ेहन में हमेशा मेरा हलवाहा जुज्जा रहता था। मैं हमेशा सोचता क्या वह इस योजना या कार्यक्रम का लाभ ले सकता है। यदि जवाब होता हां, तो मैं वह करता ही था। मैं जब अपने आफिस में बैठता तब दूर-दूर गांव से बहुत गरीब आते। कुछ बस से तो कुछ बैलगाड़ी या बस से आते थे। सब लोग अपनी रोटी, नमक तथा प्याज साथ लाते। 


उन्हें पता भी नहीं होता कि मैं ऑफिस में मिलूगा या नहीं या कितने बजे। लोग दिन भर इंतज़ार करते। फिर वापिस चले जाते। तब मैंने अपने ऑफिस में कुछ छोटे-छोटे परिवर्तन किए। लोगों के बैठने की लिए प्लास्टिक की कुर्सियां रखी। पानी पिलाने के लिए एक प्यून की ड्यूटी लगाई। सब को कुर्सियों पर बैठने की आदत नहीं थी। उनके लिए फर्श बिछाने। 


मैंने अपना एक टाइम टेबल बनाया। जिसके अनुसार मैं सोमवार था मंगलवार ऑफिस में रहता। कोर्ट केस सुनाता। मीटिंग करता था लोगों से मिलता। शेष दिन क्षेत्र में भ्रमण करता था। मैं हर माह एडवांस में टूर प्रोग्राम जारी करता ताकि लोगों को पता रहे कि मैं कब उनके गांव आऊंगा। जब मैंने अपने कोर्ट में पेंडिंग प्रकरण देखें जिनमें ज्यादातर भूमि विवाद थे। यदि उन्हें मौके पर देख कर निपटाया जाये तो गवाह, वकील आदि की जरूरत नहीं रहेगी। 


ऐसे प्रकरणों की सुनवाई गांव में करना शुरू किया तब वकीलों ने भारी विरोध किया। मैंने उन्हें बताया कि मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता में राजस्व अधिकारी अपनी अधिकारिता क्षेत्र में कहीं भी सुनवाई कर सकता है। मैंने उन किताबों का एक बस्ता बनाया जिन में मुझे कार्यवाही के अधिकार था। ऐसे सभी अधिनियम, नियम, शासन के परिपत्र साथ लेकर चलता था। शासन के निर्देश तथा राजपत्र की कटिंग से सब किताबों को अपडेट करके रखा था। 


तब मेरा बच्चा बहुत छोटा था तो मैंने सोचा बार-बार मुख्यालय ना आना पड़े तो में अनेक बार पत्नी के साथ टूर करता था। एक बार मेरे कलेक्टर ने एक मीटिंग में मजाक में कहा कि रवीन्द्र यदि तुम्हारा हनीमून पूरा हो जाए तो कुछ सरकारी काम भी कर लिया करो। मैं क्षेत्र में ही रात्रि विश्राम करता। तीन-चार दिन बाद लोटता था। 


गांव के लोग खूब प्यार देते। मुरैना में घर के बाहर एक परछी बनाई जाती थी। जिसमें खाट दाल कर रखते थे। जब आप उनके घर जाय तो नया सोलापुरी चादर बिछाते। चाय, लस्सी तथा ड्राय फ्रूट्स सामने रखते। देर हो तो देशी घी की पूड़ी सब्जी बना कर खिलाते थे। खाने-पीने का खूब शौक यहां के लोगों को था। 


मैं योजना वार कामों की सूची साथ रखता। जिन अधीनस्थ अधिकारी कर्मचारियों की जरूरत होती उन्हें मौके पर बुलाया था। मैंने सोचा कि यदि लोग मेरे ऑफिस आएंगे तो उनको एक दिन के काम का नुकसान होगा। किराया खर्चा लगेगा और अगर मैं गांव जाऊंगा तो मुझे टीए डीए मिलेगा। 


लोगों की सुविधा देख मैंने खूब क्षेत्र भ्रमण किया। मेरे देखा देखी दूसरे अधिकारी भ्रमण करने लगे। संभाग का प्रशासन अपने लक्ष्य पुरे करता। शिकायतें काम होती तथा काम की गुणवत्ता सुधरने लगी। कलेक्टर और कमिश्नर मेरे काम से खुश रहते। मुझे वार्षिक  गोपनीय चरित्रावली में उत्कृष्ट श्रेणी मिलती थी। समय पर प्रोबेशन ख़त्म हुआ।मेरी सर्विस "कन्फर्म हो गयी। 


जब मैं भ्रमण करता था लोग मुझे आवेदन देते थे। यह आवेदन विभिन्न विभागों के अधिकारियों से सम्बन्धित होते थे। मेरा स्टाफ उनको कार्यवाही के लिए भेज देता था। जब मैं दोबारा गांव जाता तो वह आदमी पुनः वही आवेदन ले कर आता। कहता पिछली बार आप को आवेदन दिया था उस पर कुछ नहीं हुआ। मेरे पास यह जानने का कोई सिस्टम नहीं था कि वास्तव में उसने आवेदन दिया था। कब दिया था। किस काम के लिए दिया था। मैंने किस अधिकारी को भेजा। उस अधिकारी ने उस आवेदन का क्या निराकरण किया। आवेदक की पात्रता है या नहीं। 


इन सब सवालों के जवाब पाने के लिए मैंने ‘निपटारा कार्ड’ डिजाइन किया। यह एक छोटा शर्ट की जेब में आ सकने वाला कार्ड था। जिस पर पंजीयन क्रमांक, दिनांक, आवेदक का नाम, आवेदन का विषय, निपटारे का समय, जिस अधिकारी को भेजा गया उसका नाम, आवेदक उस अधिकारी से किस दिनांक को कितने बजे मिलेगा उसका विवरण। यदि सुनवाई की अगली तारीख दी है तो वह दिनांक, अंतिम निराकरण आदेश कारण सहित स्वीकृत या अस्वीकृत, हस्ताक्षर, सील और दिनांक लिख कर आवेदक को उसका कार्ड लौटना। 


हर आवेदक जो मुझे आवेदन देता उसे यह कार्ड मिलता था। अब आवेदक खुद अपने आवेदन की मॉनिटरिंग कर सकता था। यदि निराकण नहीं होता तो हर जगह कार्ड दिखता। कोई अधिकारी मना नहीं कर पता कि उन्हें आवेदन नहीं मिला। अनेक दफे अखबरों में खबर छपती कि एस डी एम के कार्ड की कोई कीमत नहीं। मुझे ख़ुशी होती क्योंकि इस अधिकारी के पास प्रकरण लम्बित होता वह निराकरण कर देता था। 


निपटारा कार्ड आवेदक को सशक्त बनाने का अस्त्र था। कार्ड भूत की तरह पीछा करता। लोगों की समस्याओं का निदान हो रहा था। आवेदन आना काम हो गए थे। मैंने अपने संपूर्ण कार्यकाल में इस कार्ड का उपयोग किया। जब में मुख्य मंत्री का उप सचिव बना तब यह सिस्टम कम्प्यूटर प्रोग्राम के माध्यम से चलने लगा। जिसे आज 'सीएम हेल्पलाइन' कहते है। यह व्यवस्था पूरे प्रदेश में लागू है। 


मुझे शुरू से एक बात स्पष्ट थी कि प्रशासन की मूल इकाई जो आंकड़े एकत्र करती है वही आंकड़े आगे चल कर योजनाओं के आधार बनते है। मैंने पटवारी के "रिकॉर्ड" की शुद्धता पर बहुत जोर दिया। नक़्शे का मिलान धरातल पर, खसरा तथा खतौनी बी-वन का मिलान होना जरूरी है। जब नामांतरण या बटवारे का आदेश हो तो खसरे में उसका पालन करना चाहिए। जबकि पटवारी पहले खतौनी बी-वन में एंट्री करते है। जबकि भू राजस्व का मूल रिकॉर्ड खसरा है। जब मैं टूर करता तब पटवारी का रिकॉर्ड अवश्य चेक करता था। 


हर तहसील जाकर मैं नियमित पटवारियों की मीटिंग करता था। एक दिन सबलगढ़ की मीटिंग में एक पटवारी ने अपना काम पूरा नहीं किया था। वह चुपचाप मेरी डांट सुनते रहे। बैठक समाप्त होने पर वह मेरे ऑफिस मिलने आये। तब उन्होंने बताया कि उनकी बस सर्विस कम्पनी में कुछ समस्या चल रही थी। इस कारण काम पेंडिंग हो गया जिसे जल्दी पूरा कर लेंगे। मैंने उन्हें कुर्सी पर बैठने के लिए कहा लेकिन वह नहीं बैठे। हाथ जोड़ कर खड़े रहे। उन्होंने सफ़ेद कमीज तथा पायजामा पहना था। 


मैं पटवारी और बस कम्पनी में सम्बन्ध नहीं समझ पाया। तब उन्होंने बताया कि उनकी बस कम्पनी है। जिस में वह बसें चलते है। उनकी कम्पनी में बहुत कर्मचारी काम करते है। मैंने कहा नौकरी क्यों नहीं छोड़ देते। वह उनके बस्ते को प्रणाम कर बोले सब इसी का दिया है। इसे नहीं छोड़ सकता। पटवारी अपना रिकार्ड जिस कपड़े में बांध कर रखते है उसे बस्ता कहा जाता है। अब चौकने की बारी मेरी थी। 


हमारे कमिश्नर व्ही जी निगम का स्थानांतरण भोपाल प्रमुख सचिव सामान्य प्रशासन विभाग के पद पर हो गया था। नये कमिश्नर जी एन बुच आने वाले थे। वह अमेरिका से ट्रेनिंग लेकर लौटे थे तथा दिल्ली में उनके भाई एम एन बुच के घर पर रुके थे। उनकी भाभी निर्मला"बुच" थी। सभी मध्य प्रदेश काडर में आई ए एस थे। 


मैं सर्वोच्च न्यायालय/ सुप्रीम कोर्ट के काम से दिल्ली जा रहा था। मेरे कलेक्टर ने कहा कि बुच साहब से मिल कर उनके आने का प्रोग्राम पूछ कर आना। मैं एम एन बुच के घर गया। वह तब दिल्ली डेवलपमेंट बोर्ड में पदस्थ थे। मैंने दरवाजे पर घंटी बजाई एक रौबदार महिला बाहर आई। मुझसे पूछा किससे मिलना महेश से या गणेश से। मैं इस प्रश्न के लिए तैयार नहीं था।  मैंने झट से अपना परिचय दिया। 


अन्दाज लगाया और कहा गणेश से। वह निर्मला बुच थी। उन्होंने मुझे कमरे में सोफे पर बैठाया और अन्दर चली गई। अन्दर से दो सफ़ेद छोटे-छोटे पोमेरेनियन कुत्ते आये। मेरी दोनों बाजू खड़े हो गये। मैं डर कर चुपचाप बैठा रहा। उन दिनों घर में टेलीफोन, प्यून और कुत्ता अधिकारी के घर में होना अनिवार्य था। 


अन्दर से छोटे कद के दुबले-पतले सफ़ेद कमीज और पजामा पहिने एक सज्जन आये। सबसे पहले उन्होंने दोनों कुत्तों को मुझसे दूर किया। दोनों कुत्ते दौड़ कर उनके पास चले गए। मेरी जान में जान आई। मैं खड़ा हो गया। उन्होंने सज्जनता से धीमे स्वर में कहा "मैं गणेश हूँ।" मेने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया। 


वह मेरा परिचय जान कर बहुत खुश हुए। उन्होंने अपना कार्यक्रम बताया। मुरैना के बारे में पूछताछ की। मुझे नाश्ता करवाया। मैं उनसे बिदा ले कर वापिस आ कर कलेक्टर को कार्यक्रम बताया। 


कुछ दिन में संदीप खन्ना जी का स्थानांतरण हो गया। नये कलेक्टर पोस्ट हुए प्रशान्त मेहता जी। मेहता जी मुरैना में ही प्रशासक चम्बल के पद पर पदस्थ थे। तब अधिकारी उनको ज्यादा भाव नहीं देते थे। मैं जब ट्रेनिंग ले रहा था। तब वह कलेक्टर ऑफिस आते मेरे कक्ष में बैठ कर कलेक्टर की प्रतीक्षा करते थे। धीरे-धीरे हम लोग हिल-मिल गए थे। वह जब पहली बार सबलगढ़  विजिट पर आए तब उन्होंने मुझे करप्शन पर लगाम लगाने का निर्देश दिया। 


मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा भ्रस्ट्राचार रोकने की लिए एक नया अधिनियम लागु किया गया था। एक दिन मैं कैलारस के एक गांव में शिविर आयोजित किया था वहां कुछ लोगो ने आ कर "द मुरैना मंडल सहकारी शक्कर कारखाना लिमिटेड" कैलारस में ब्रॉस ट्यूब खरीदी में गड़बड़ी की शिकायत जी। 


हमने तत्काल फैक्ट्री जा कर जांच की। वह बहुत बड़ा भ्रस्ट्राचार का प्रकरण बना। जिस में फैक्ट्री के एम डी, चीफ इंजीनियर, चीफ फाइनेंस ऑफिसर जैसे पांच अधिकारियों पर पुलिस केस दर्ज किया गया। वह सभी गिरफ्तार किये गये। यह सहकारी शक्कर कारखाना था जिसके चेयरमैन कमिशनर मुरैना जी एन बुच थे। 


उन्होंने मेरी बहुत तारीफ की। वह मुझे 'बॉस' कह कर बुलाते थे। निहायत ईमानदार ऑफिसर थे। उन्होंने शादी नहीं की थी। अकेले बहुत शादगी से रहते थे। उनके घर जाने पर पारले की चॉकलेट जरूर खिलाते थे। फैक्ट्री के वरिष्ठ अधिकारियों की गिरफ़्तारी होने पर वह फैक्ट्री चलने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंपी जिसे हम लोगों ने बहुत मेहनत से पूरा किया। यह केश मेरे लिए पहला केश था। 


मुझे हमेशा से अधिक बोलने की आदत रही है। इस आदत के कारण में अनेकवार परेशानी में पद गया हूँ। मुझे हमेशा से इलेक्ट्रॉनिक टेक्नोलॉजी से बहुत लगाव रहा है। मार्केट में जब कोई नया प्रोडक्ट आता में खरीद लेता था। अस्सी के दशक में नया-नया टीवी वीसीआर आने शुरू हुए थे। उस समय कलर टीवी जापान या कोरिया से आते थे। हमारे कलेक्टर प्रशान्त मेहता को भी इन सब का शौक था। एक दिन हम लोग बात कर रहे थे। उन्होंने एक टीवी वीसीआर मगवाने को कहा। हमारे एक एडिशनल कलेक्टर थे सत्य प्रकाश। वह श्योपुर में पदस्थ थे। उन दिनों मुरैना में केवल श्योपुर में जयपुर से प्रसारित होने बाले टीवी कार्यक्रम आते थे। हम सबलगढ़ से हॉकी मैच का लाइव प्रसारण देखने श्योपुर जाता था। मैंने सत्य प्रकाश जी से कहा। वह आगरा के रहने वाले थे। उनका एक दोस्त टीवी वीसीआर  इम्पोर्ट करके बेचता था। उससे कह कर एक सेट टीवी वीसीआर का कलेक्टर मुरैना के बंगले पर लगवा दिया। उनके ससुर उन दिनों मध्य प्रदेश रोड कारपोरेशन के प्रबन्ध संचालक थे। उनके माध्यम से कलेक्टर मुरैना भोपाल से बस से फिल्मों के केसिट मगवा कर फिल्में देखते थे। टीवी वीसीआर का भुगतान आगरा भेजना था। समस्या थी कि कलेक्टर से पैसा कौन मांगे। सत्य प्रकाश जी ने कहा तुम्हारे कहने से मैंने टीवी वीसीआर मगवाया है तो तुम कलेक्टर से पैसा मांगों। मैंने हिम्मत की पर भुगतान नहीं हुआ। तब जिला ओलम्पिक एसोसिएशन के फण्ड से कलेक्टर से भुगतान स्वीकृत करवाया। 

उन दिनों नगरपालिका की नियमित चुनाव नहीं होते थे। नगरपालिका संचालित करने की लिये सब डिविशनल ऑफिसर को प्रशासक नियुक्त किया जाता था। मुझे सबलगढ़ नगरपालिका का प्रशासक नियुक्त किया गया था। शहर की फास सफाई, बिजली, पानी आदि नागरिक सेवाऐं देने का काम नगरपालिका कराती थी। 


तब नगरपालिका की आय के साधन बहुत सिमित होते थे। टैक्स बसूलना बहुत मुश्किल होता था। नगरपालिका सबलगढ़ एक कालेज संचलित कर रही थी। नगरपालिका प्रशासक होने के नाते में उस कालेज का प्रशासक भी था। कालेज में जब परीक्षाऐं होती तो विद्ययार्थी सुबह आ कर अपना प्रश्न पत्र तथा परीक्षा की कॉपी ले कर घर चले जाते और चार बजे ला कर कालेज में जमा कर देते थे। 


तब हमने यह प्रथा रोकने की कोशिश की। परीक्षा में पुलिस लगा दी। मेरे साथी एस डी ओ पुलिस मेरे जैसे यंग अफसर थे। हम दोनों नए थे, बहुत उत्साहित थे। कालेज के प्राचार्य ने स्टूडेंट्स को हम लोगों के विरुद्ध भड़का दिया। हर छात्र नक़ल कर रहा था। रोज हम लोग सुबह कालेज जाते और नक़ल रोकते थे। 


उस समय हमारे क्षेत्र में रमेश सिकरवार नाम का बहुत बड़ा डाकू था। उसे पकड़ने रोज बड़ी संख्या में पुलिस जताई थी। परीक्षा की तीसरे दिन स्टूडेंट्स ने हम लोगों का घेराव कर दिया। चारों ओर से पथराव हो गया। हमारी गाड़ी तोड़ दी। 


केवल तीन पुलिस के जवान हमारे साथ थे। डी ओ पुलिस जब कालेज आये थे तो थाने पर बोल कर आये थे कि कहीं से पुलिस की गाड़ी लौटे तो कालेज भेज देना। हम लोगों को जान बचने के लिये कालेज की बिल्डिंग मेउ झुपना पड़ा। बिल्डिंग की छत तीन की थी। उस पर पत्थर जब गिरते बहुत आवाज हो रही थी। बहुत भीड़ एकत्र हो गए थी। यह कालेज शहर के बीच में था। 


चारों तरह लोग छत से देख रहे थे। मैंने गोली चलने का आदेश दिया। पुलिस के जवान ने चिल्लाकर गोली चलाने की चेतावनी दी। यहां के लोग बन्दुक की गोली से नहीं डरते। वह नहीं भागे। एक पुलिस बाले ने हवा में गोली चलाई, फिर दुआसरे ने तथा फिर तीसरे ने। यह पुराणी 303 रायफल थी। पुलिस के जवानों को गोली चलाने का अभ्यास नहीं था। दो बंदूकों के बोल्ट फस गये और गोली नहीं चली। लोगों ने गाड़ियों में आग लगा दी। पथरबाजी तेज हो गई। तभी ठाणे से एक खाली पुलिस का ट्रक आया। भीड़ ने समझा पुलिस फ़ोर्स आ गया है। भीड़ भाग  गई। तब हम लोग जान बचा कर निकल सके। यह मेरे जीवन का पहला गोली चलने का अनुभव था। 


उस समय हमारे क्षेत्र में रमेश सिकरवार डाकू का बड़ा आतंक था। वह मुख्य रूप से विजयपुर विकासखण्ड क्षेत्र में ऑपरेट कर रहा था। शासन ने भरी पुलिस बल लगा रखा था। रमेश सिकरवार  चंबल के बीहड़ों में  एक खूंखार डाकू के रूप में जाने जाते थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में हुआ था। 


उनके डाकू बनने के पीछे उसके चाचा द्वारा पुश्तैनी जमीन हड़पने की घटना बताई जाती है। जब पुलिस ने उनकी मदद नहीं की और उन्हें अपमानित किया गया, तो उन्होंने बंदूक उठाकर डाकू का रास्ता अपना लिया। रमेश सिकरवार 1970 और 80 के दशक के बीच चंबल के बीहड़ों में सक्रिय थे। उनके गिरोह में लगभग 32 सदस्य थे। उन पर 250 से ज़्यादा डकैती और 70 से ज़्यादा हत्या के मामले दर्ज थे।


एक घटना में उन्होंने एक ही दिन में 27 मारवाड़ियों की हत्या कर दी थी, क्योंकि उनमें से एक ने उनके गिरोह के बारे में पुलिस को सूचना दी थी। चंबल में उनके नाम का खौफ इतना था कि लोग पुलिस से भी ज्यादा उनसे डरते थे। ये आँकड़े उनके आतंक की भयावहता बताते हैं। उनके नाम का आतंक इतना था कि लोग पुलिस से भी ज़्यादा उनसे डरते थे। वे बिना किसी हिचकिचाहट के हत्या और अपहरण जैसी वारदातों को अंजाम देते थे, जिससे पूरे इलाके में भय का माहौल बना रहता था। 


चंबल के कई डाकू गिरोहों की तरह, रमेश सिकरवार  का गिरोह भी अक्सर ज़मींदारों, साहूकारों और अमीर व्यापारियों को निशाना बनाता था। कभी-कभी वे गांवों में न्याय करने वाले की भूमिका भी निभाते थे, जिसे 'डाकू पंचायत' कहा जाता था।  रमेश सिकरवार और उनके गिरोह को पकड़ने के लिए पुलिस ने चंबल के बीहड़ों में कई बड़े और सघन अभियान चलाए। उनके गिरोह की पुलिस के साथ कई मुठभेड़ें हुईं, जिनमें दोनों तरफ से जानें गईं। हालांकि, बीहड़ों की जटिल भौगोलिक स्थिति और स्थानीय समर्थन के कारण उन्हें पकड़ना बहुत मुश्किल था। 


पुलिस ने रमेश शिकरवार पर भारी इनाम घोषित कर रखा था, जो उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस की बेचैनी को दर्शाता था। पुलिस ने गिरोह के सदस्यों और उनके रिश्तेदारों पर भी दबाव बनाया ताकि वे आत्मसमर्पण करें या रमेश शिकरवार के बारे में जानकारी दें। अधिकारियों को आउट ऑफ़ टर्न प्रोमोशन का आदेश था। कभी-कभी राजस्व अधिकारियों की ड्यूटी पुलिस के साथ लगाई जाती थी। मैंने पुलिस के साथ काम किया था। 


रमेश सिकरवार जैसे बड़े डाकुओं को अक्सर कुछ हद तक राजनीतिक संरक्षण मिलता था, या कम से कम उनके कार्यों पर एक अप्रत्यक्ष राजनीतिक प्रभाव होता था। वोट बैंक की राजनीति, चंबल के बीहड़ों में डाकुओं का अपना एक प्रभाव क्षेत्र होता था। वे गांवों में 'न्याय' करते थे और कई बार गरीबों की मदद भी करते थे। इससे उन्हें ग्रामीण आबादी के बीच एक खास तरह की लोकप्रियता मिल जाती थी। राजनीतिक दल और नेता इस प्रभाव को भुनाने की कोशिश करते थे। डाकुओं के आत्मसमर्पण के समय भी यह देखा गया है कि वे अक्सर अपने राजनीतिक आकाओं या मध्यस्थों के माध्यम से आत्मसमर्पण करते थे, जिससे आत्मसमर्पण को एक राजनीतिक घटना के रूप में पेश किया जा सके।


कानून-व्यवस्था का अभाव और स्थानीय सत्ता, चंबल जैसे दुर्गम इलाकों में पुलिस और प्रशासन की पहुंच सीमित होती थी। ऐसे में, स्थानीय नेता या प्रभावशाली व्यक्ति डाकुओं के साथ एक अघोषित समझौता कर लेते थे ताकि उनके क्षेत्रों में शांति बनी रहे या उनके विरोधियों को निशाना बनाया जा सके। 


डाकू अक्सर स्थानीय राजनीति में भी हस्तक्षेप करते थे, चुनावों को प्रभावित करते थे, और अपने पसंद के उम्मीदवारों को समर्थन देते थे। डाकुओं का प्रभाव और भय, डाकुओं का खौफ इतना होता था कि नेता और पुलिसकर्मी भी सीधे टकराव से बचना चाहते थे। कई बार, उनसे निपटने की बजाय, कुछ नेताओं ने अप्रत्यक्ष रूप से उनसे बातचीत करने या उन्हें नियंत्रित करने की कोशिश की।


मध्य प्रदेश में डकैती की समस्या से निपटने के लिए एक विशेष अधिनियम बनाया गया था, जिसका नाम है "मध्य प्रदेश डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र अधिनियम, 1981" इसे आमतौर पर एंटी-डकैती कानून के नाम से जाना जाता है। यह अधिनियम विशेष रूप से मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों में डकैती और अपहरण के बढ़ते मामलों को प्रभावी ढंग से रोकने, अपराधियों को दंडित करने और उनसे जुड़ी संपत्तियों को जब्त करने के उद्देश्य से लाया गया था। 


ऐतिहासिक रूप से, यह कानून चंबल क्षेत्र के सभी चार जिलों (भिंड, मुरैना, श्योपुर, दतिया) और ग्वालियर, शिवपुरी, पन्ना, रीवा, सतना जैसे जिलों में लागू रहा है, जो डकैती की समस्या से जूझ रहे थे। यह अधिनियम राज्य सरकार को किसी जिले या उसके हिस्से को "डकैती और व्यपहरण प्रभावित क्षेत्र" घोषित करने का अधिकार देता है, यदि वहाँ ऐसे अपराधों की घटनाएं बहुत ज़्यादा हों।  


यह अधिनियम पुलिस को डकैतों और संगठित गिरोहों से निपटने के लिए विशेष शक्तियां प्रदान करता है। इसमें जमानत के प्रावधानों को सख्त करना, दंड को बढ़ाना और सबूत के बोझ को कम करना शामिल है, ताकि अपराधियों को आसानी से जमानत न मिल सके और उन्हें सजा दिलाने में आसानी हो। राज्य सरकार को डकैत द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्ति को जब्त करने का अधिकार देता है। यदि कोई व्यक्ति डकैती प्रभावित क्षेत्र में रहता है और ऐसी संपत्ति अपने कब्जे में रखता है जिसका वह संतोषजनक हिसाब नहीं दे सकता, तो उसे दोषी माना जा सकता है और उसे कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।


यह कानून पुलिस को सूचना देने वाले मुखबिरों को सुरक्षा प्रदान करने का प्रावधान करता है। उस समय डकैतों की सूचना देने वाले मुखबिरों को सरकारी नौकरी भी दी जाती थी। उस समय हमारे जूरिडिक्शन के विजयपुर क्षेत्र को इस अधिनियम के तहत प्रभावित क्षेत्र घोषित किया गया था। 


इस क्षेत्र में सहरिया जनजाति के लोग रहते है। एक तरफ डाकू उन्हें परेशान लगते तो दूसरी तरफ पुलिस पकड़ कर इस कानून में गिरफ्तार कर रही थी। इस कारण परेशान हो कर लोगों ने गांव के गांव खली कर दिये और तहसील कार्यालय में आ गये। इस लोगों के लिए तब विशेष शिविर लगा कर रहने की व्यवस्था की गई। 


हमारे पड़ोसी एस डी ओ पी जैन बड़े उत्साही नौजवान पुलिस अधिकारी थे। उन्होंने अपने मुखबिरों की मदद से रमेश सिकरवार से कई मुलाकातें की और उसे सरेण्डर करवाने का प्रयास किया। उन्हें उनके विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का सहयोग मिल रहा था। लेकिन वह प्रयास असफल हो गया और रमेश सिकरवार ने बस से अपहरण कर चौदह लोगों को उतार कर गोली मार दी।  तब उन्हें उनके विभाग द्वारा इस एक्ट के तहत गिरफतार करने की कार्यवाही शुरू की। वह अंडरग्राउंड रहे। उनका ट्रांसफर कर दिया गया। बड़ी कठिनाइयों के बाद वह बच सके। 


हमारे एक नायब तहसीलदार राजस्व बसूली में बहुत रूचि लेते थे। उनके तहसील दर ने बताया कि वह जीतनी राशि बहुलते थे उतनी सरकारी खजाने में जमा नहीं करते थे। दशमलव का उपयोग करते थे। आप नहीं समझे। मैं भी नहीं समझा था। तहसीलदार ने विस्तार से समझाया जैसे वह सौ रुपये लेंगे तो बिना कार्बन रख किसान को सौ रुपये की रसीद दे देंगे। लेकिन बाद में  कार्बन रख कर दशमलव लगा कर ऑफिस कॉपी में दस रुपये बना कर जमा कर देंगे। इस तरह नब्बे रूपये वह रख लेते थे। यह बहुत अनोखा प्रयोग था। 


सबलगढ़ में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 97 का अनोखा प्रयोग होता था। इस धारा में महत्वपूर्ण प्रावधान था कि यदि किसी व्यक्ति को गलत तरीके से बंधक बनाए जाने या हिरासत में रखे जाने पर उसकी तलाशी और रिहाई के लिए तलाशी वारंट जारी करने की शक्ति उप-विभागीय मजिस्ट्रेट थी। 


आवेदन मिलाने पर यदि उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में परिरुद्ध है, तो वह उस व्यक्ति को ढूंढने के लिए तलाशी वारंट पुलिस को जारी कर सकता था  जिस  पुलिस अधिकारी को ऐसा वारंट निर्देशित किया जाता था , वह उस परिरुद्ध व्यक्ति की तलाशी लेता था। यदि तलाशी के दौरान वह व्यक्ति मिल जाता है, तो उसे तुरंत उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के समक्ष लाया जाता था।


उप-विभागीय मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को सुनेगा और मामले की परिस्थितियों के अनुसार उचित आदेश पारित करेगा। उदाहरण के लिए, यदि यह पाया जाता है कि व्यक्ति को वास्तव में गलत तरीके से बंधक बनाया गया था, तो मजिस्ट्रेट उसे तुरंत रिहा करने का आदेश दे सकता था और यदि आवश्यक हो तो आगे की कानूनी कार्रवाई के निर्देश भी दे सकता था।


इस धारा का उद्देश्य था कि किसी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करना। इस धारा के द्वारा भारत के संविधान द्वारा गारंटीकृत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा करना। यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी व्यक्ति को बिना कानूनी अधिकार या उचित प्रक्रिया के अवैध रूप से हिरासत में न रखा जाए।


यह धारा उन मामलों में तत्काल राहत प्रदान करती थी जहां किसी व्यक्ति को अवैध रूप से कैद किया गया हो  जैसे कि अपहरण या जबरन हिरासत में रखना। यह धारा मजिस्ट्रेट को यह शक्ति देती है कि यदि उसे यह विश्वास करने का कारण है कि कोई व्यक्ति अवैध रूप से बंधक है, तो वह उसे छुड़ाने के लिए तलाशी वारंट जारी कर सके और उस व्यक्ति को न्यायालय में प्रस्तुत कर सके ताकि उसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित की जा सके। 


अब यहां के लोग क्या करते कि इस क्षेत्र में उस समय लड़कियों का अनुपात भूर्ण हत्या के कारण लड़कों की तुलना में बहुत काम था। यहां अन्य राज्यों से लड़कियां खरीद कर लाई जाती और लड़कों की शादियां होती। इस के बाद  उस महिला से एक आवेदन मजिस्ट्रेट को दिवा दिया जाता कि उसे अमुख आदमी ने व्यक्ति अवैध रूप से बंधक बना कर रखा है। 


मजिस्ट्रेट से छुड़ाने के लिए तलाशी वारंट जारी कर  देते। पुलिस पकड़ कर उस लड़की को लाती। वह मजिस्ट्रेट के सामने बयान देती कि वह बालिग है। कोई प्रमाण दिखती और कहती कि वह स्वेक्षा से अमुख व्यक्ति के साथ रहना चाहती है। 


मजिस्ट्रेट  आदेश देते कि इसे पुलिस अभिरक्षा में अमुख व्यक्ति के पास भेजा जाय। वह चली जाती। आवेदक मजिस्ट्रेट के आदेश की नक़ल निकलवा लेता और यह लीगल तरीके से अमुख व्यक्ति के साथ रहती थी। इस धारा का ऐसा अनोखा उपयोग आपने कहीं नहीं देखा होगा। अब हुआ यह कि कैलारस थाने के एक थानेदार एक लड़की का बयान करवाने मेरे घर आये। यह बयां में पहलीवार ले रहा था। मैंने थानेदार को हर बैठाया और अपनी पत्नी की उपस्थिति में उस लड़की का बयान लिखा। वह बहुत खूबसूरत बाइस साल की लड़की थी। 


खूब मेकअप किया था। डार्क लाल लिपिस्टिक लगाई थी। बहुत अच्छा सलवार सूट पहना था। कुछ गहने पहने थे। मुझे कहीं से नहीं लगा कि उसका अपरहण कर जबरन रख गया होगा। में अकेले कमरे में उसके साथ नहीं होना चाहता था। मैंने उसका बयान ले कर जहां वह जाना चाहती थी आदेश कर दिया। करीब चार माह बाद वही थानेदार उसी लड़की को ले कर फिर मेरे घर आये। मुझे शक हुआ। थानेदार ऑफिस क्यों नहीं आये? इतनी जल्दी इस लड़की का फिर अपहण कैसे हो गया? बहुत सवाल थे। 


मेरे तहसीलदार गुरनानी अनुभवी व्यक्ति थे। मेरे पड़ोस में रहते थे। मैंने उन्हें बुलाया। अपनी शंका उन्हें बताई। कमरे में हम दोनों थे। लड़की को अन्दर बुलाया। थानेदार हर बैठे थे। गन गुरनानी ने उस लड़की को धीरे-धीरे बात कर सहज किया। पानी पिलाया। चाय दी। वह यकायक फूट-फूट कर रोने लगी। उसने बताया वह असम की रहने बाली है। पहले उसे कोई आदमी दिल्ली लाया। वहां उसे बेच दिया। उस आदमी ने उसे कैलारस के एक आदमी को बेचा। उस गांव में अल दिन पुलिस की तलाशी किसी झगड़े के कारन हुई। 


थानेदार ने मुझसे पूछताछ की। मैंने पूरी बात बता दी तब थानेदार मुझे अपने साथ ले गया। फिर मुझे बेच कर आपके सामने बयान करबा दिये। मैं डर के मारे कुछ नहीं बोली थी। जैसे उसने कहा मैंने वैसा बयान दिया था। अब यह दोबारा मुझे दूसरे आदमी को बेचना चाह रहा है। मेरा यह पति मुझे बहुत अच्छे से रखता है। 


मैं उससे प्यार करती हूँ। मैं थक गई हूँ। नई जगह नहीं जाना चाहती मझे दो माह का इस पति से गर्भ भी है। वह रो-रो कर अपनी बात बता रही थी। मेने बयान लिखा। मेरे पड़ोसी एस डी ओ पी को बुलाकर प्रकरण में कार्यवाही करने का निर्देश दिया। बाद में वह थानेदार निलंबित हुआ। 


सबलगढ़ में एक बार तांबे के तार की चोरी हो गई। शुरू में टेलीफ़ोन वायर में तांबा उपयोग में आता था। पुलिस ने एक गरीब लड़के को शक में पकड़ कर बंद कर दिया। उस समय पुलिस रिकॉर्ड पर गिरफ्तारी नहीं दिखाती थी। यदि गिरफ्तारी दिखायेंगे तो मजिस्ट्रेट के सामने चौबीस घण्टे के अन्दर पेश करना होता था। उस लड़के से बहुत मार पीट हुई। लेकिन उसने चोरी नहीं कबूली। हर कर थानेदार ने उस पर अपनी मोटर साइकल का पेट्रोल निकाल कर डाल दिया। उसने टेरीलीन की पेंट पहनी थी। थानेदार माचिस पर तीली रखा कर उसे आग लगाने की धमकी दे रहा था। 


यकायक तीली माचिस से रगड़ गई। उस लड़के के पेंट में आग लग गई। पहले आग बुझाने की कोशिश की जब नहीं बुझी तो खींच कर पेंट उतरने लगे। टेरीलीन की पेंट होने के कारण जल कर उसके पांव से चिपक गई थी। जब जोर से कई लोगों ने मिलकर पेंट खींचा तो दोनों पैर की चमड़ी खिंच कर बाहर आ गई नसें तथा हड्डियां दिखने लगी। 


उसे तत्काल अस्पताल में भर्ती करवाया गया। जहां उसकी मौत हो गई। पुलिस अभिरक्षा में मौत होने के कारण उसकी मजिस्ट्रेट जांच मुझे करना पड़ी। जब अस्पताल के मुर्दाघर में मैंने वह लाश देखी तो मेरी रूह कांप गई। इतना वीभत्स दृश्य मैंने तब तक अपने जीवन में नहीं देखा था। कहते है कि क्रिमिनल के साथ व्यवहार करते-करते पुलिस के लोग भी उन्हीं जैसे हो जाते है। 


सबलगढ़ सब-डिवीजन में तब सबलगढ़, विजयपुर तथा कैलारस तीन तहसीलें आती थी हमारे तब दो विधायक होते थे। एक सबलगढ़ के तथा दूसरे  विजयपुर के।  सबलगढ़ विधायक का किस्सा में बता चुका। विजयपुर के विधायक ग्वालियर में रहते थे। वह राजघराने से सम्बन्धित थे। वहुत कम लोगों से मिलते थे। उस समय एस डी ओ को उन के सव डिवीज़न के अन्दर पटवारियों के ट्रांसफर करने के अधिकार होते थे। समय-समय पर सरकार ट्रांसफर पर लगा प्रतिबंध हटाती थी। तब ट्रांसफर हो सकते थे। 


जब शासन ने ट्रांसफर्स पर बैन लगा दिया तब विधायक जी एक पटवारी का ट्रांसफर विजयपुर से सबलगढ़ करवाना चाहते थे। मेरे द्वारा उन्हें सूचित किया गया कि अभी शासन ने ट्रांसफर पर रोक लगा दी है। इस समय मुझे अधिकार नहीं है। केवल सरकार ट्रांसफर कर सकती है। लेकिन वह जिद्द करने लगे। जब मैंने ट्रांसफर नहीं किया तो उन्होंने मेरी शिकायत तत्कालीन मुख्यमंत्री जी से कर दी। 


मेरा ट्रांसफर करने का आदेश कार्यालय से सामान्य प्रशासन विभाग में पहुंचा। मेरे पूर्व कमिश्नर व्ही जी निगम वहां प्रमुख सचिव थे। उन्होंने कलेक्टर मुरैना के माध्यम से मुझे भोपाल बुलाया। मैं भोपाल जा कर उनसे मिला। उन्होंने मुझे से पूछा कि तुम क्या कर रहे हो तुम्हारी बहुत शिकायतें आ रही है। तब मैं शिकायत का मतलब भ्रष्टाचार से सम्बन्धित शिकायत ही समझता था। मैंने उनसे कहा मैंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है। 


उन्होंने विधायक विजयपुर का शिकायती पत्र मुझे दिखाया। इस पत्र में विधायक जी ने लिखा कि मैं भारतीय जनता पार्टी का आदमी हूँ इसलिये मेरा ट्रांसफर सबलगढ़ से किया जाय। मुख्यमंत्री जी ने अपने हाथ से लिया था 'रवीन्द्र पस्तोर इमीडिएटली ट्रांसफर फ्रॉम सबलगढ़ टू एनीवेयर इन एम पी' उस समय प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। निगम साहब ने पूछा मैं अपना ट्रांसफर कहा चाहता हूँ। मेरी कोई चॉइस नहीं थी। राज नेता मानते है कि अधिकारी एक जिले में यदि किसी राजनीतिक पार्टी के प्रीति सहानुभूति रखता है और यदि उनका स्थानान्तरण किसी दूसरे जिले में कर दिया जाए तो वह उनकी पार्टी से सहानुभूति रखने लगेगा। इस लोगों के मन में कितनी गलतफमियां इस लोगों के मन में कितनी गलतफमियां नौकरशाहों के बारे में होती है। 


ट्रांसफर का उपयोग राजनेता के विरूद्ध हथियार की तरह करते है। यह ब्रम्हास्त्र है राजनेताओं के हाथ में। जबकि इस समय भारतीय जनता पार्टी का ग्राउण्ड पर कोई बहुत बड़ा आधार नहीं था। कांग्रेस शुरू से ही भारतीय जनता पार्टी से। लेकिन मुझे स्वप्न में भी ख्याल नहीं था कि कोई मुझ पर इस तरह का आरोप लगा सकता है। और ट्रांसफर का यह आधार हो सकता है। यह मेरे लिए पहला अनुभव था। सरकार कैसे काम कराती है। 


मुरैना प्रदेश के धुर उत्तर में है और छिन्दवाड़ा धुर दक्षिण में। मैंने आसपास किसी भी जिलें में करने का अनुरोध किया। उन्होंने मुझे छिन्दवाड़ा जिले की बहुत तारीफ की और मेरा ट्रांसफर छिन्दवाड़ा हो गया। मैं सबलगढ़ से भारमुक्त हो कर छिन्दवाड़ा जा रहा था। जब मैं ग्वालियर पंहुचा तब मुझे विधायक जी से मिलाने का विचार आया। मैंने एक किलो मिठाई खरीदी और विधायक जी के घर गया। 


मैं पहलीवार उनसे मिल रहा था। वह मुझे देख कर बहुत चौके। मैंने उन्हें प्रणाम कर मिठाई दी तथा मेरा ट्रांसफर करवाने की लिये धन्यवाद दिया। मैंने उनसे कहा कि मेरे भाई जो कांग्रेस के ही विधायक है उन्होंने बहुत प्रयास किये पर ट्रांसफर नहीं हुआ। आप ने करबा दिया। जब उन्होंने मेरी यह बात सुनी तो उनकी ख़ुशी चेहरे से गायब हो गई। विजेता का भाव जाता रहा। मैं छिन्दवाड़ा सामान ले कर पहुंच गया। मुरैना से छिंदवाड़ा तक सड़क मार्ग से दूरी लगभग 628 किलोमीटर है। वहां कोई शासकीय मकान खाली नहीं था इस कारण मुझे परिवार को अपने पैतृक निवास पर छोड़ना पड़ा। 


छिंदवाड़ा 

छिंदवाड़ा जिला मध्य प्रदेश राज्य के दक्षिण-पश्चिमी सतपुड़ा पर्वत श्रेणी में स्थित है। मध्य प्रदेश का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा जिला है। यह माना जाता है कि "छिन्द" (खजूर) के पेड़ों की बहुतायत के कारण इसका नाम "छिंदवाड़ा" पड़ा। 


एक अन्य कहानी के अनुसार, यहाँ शेरों (सिंह) की आबादी अधिक होने के कारण इससे पहले "सिंहद्वार" कहा जाता था। इतिहास भक्त बुलंद राजा के शासन काल से इस स्थान को याद करता है, जिन का राज्य सतपुड़ा पहाड़ियों की श्रेणी में फैला हुआ था और माना जाता है कि उनका शासन तीसरी शताब्दी तक था। 


नीलकंठ गाँव में राष्ट्रकूट वंश से संबंधित एक प्राचीन पट्टिका मिली है, जिसने 7वीं शताब्दी तक शासन किया। इसके बाद गोंडवाना वंश आया, जिसने देवगढ़ को राजधानी बनाकर इस क्षेत्र पर शासन किया। गोंड समुदाय के राजा जाटवा ने देवगढ़ किले का निर्माण करवाया था। बख्त बुलंद राजा इस वंश में सबसे शक्तिशाली थे और उन्होंने सम्राट औरंगजेब के शासनकाल के दौरान मुस्लिम धर्म अपना लिया था। 


बाद में कई शासकों ने यहां राज किया और अंततः 1803 में मराठा शासन समाप्त हो गया। 17 सितंबर 1803 को ईस्ट इंडिया कंपनी ने रघुजी द्वितीय को हराकर इस राज्य पर कब्जा कर लिया, जिससे ब्रिटिश शासन की शुरुआत हुई। 


स्वतंत्रता के बाद, पहले नागपुर को छिंदवाड़ा जिले की राजधानी बनाया गया था, और 1 नवंबर 1956 को इस जिले का पुनर्गठन में छिंदवाड़ा को भोपाल राजधानी बनाकर मध्य प्रदेश में सम्मिलित किया गया।


छिंदवाड़ा रेल और सड़क के महत्वपूर्ण जंक्शन पर बसा हुआ है। इसके आस-पास के पठारी क्षेत्र में कोयला, मैंगनीज, जस्ता, बॉक्साइट और संगमरमर का खनन होता है। कपास का व्यापार और कोयले की ढुलाई नगर की मुख्य गतिविधियां थी। कपास ओटाई तथा आरा मिलें यहाँ के मुख्य उद्योग थे। पठार में व्यापक पैमाने पर पशुपालन होता था। 


स्थानीय स्तर पर यह नगर मिट्टी के बर्तन तथा जस्ता, पीतल व कांसे के आभूषण और चमड़े की मशक के निर्माण के लिए विख्यात था यह नगर स्थानीय व्यापार का केंद्र था और पशु, अनाज तथा इमारती लकड़ी की बिक्री के लिए यहाँ साप्ताहिक हाट लगती थी। पेंच टाइगर रिजर्व, जिसका कुछ हिस्सा छिंदवाड़ा जिले में भी आता है, 1983 में एक राष्ट्रीय उद्यान के रूप में स्थापित किया गया था। यह क्षेत्र अपने समृद्ध वन्यजीवों के लिए जाना जाता है।


छिंदवाड़ा इस समय राजनैतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला था। कमल नाथ सांसद थे। वहां के छह विधयाक मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री थे। इस समय मैं एक कॉलेज के होस्टल में रहता था। हम तेन अधिकारी साथ में रहते थे। अलोक सक्सेना जिला विधिक सहायता अधकारी थे और पी विश्वास जिला पंजीयक थे। हॉस्टल में फर्निश्ड कमरे थे।  


इनमें बिस्तर, अध्ययन मेज, कुर्सी और अलमारी जैसी बुनियादी चीजें शामिल थी। मेस सुविधा नहीं थी. हम लोगों ने एक मराठी बुजुर्ग महिला को खाना बनाने की लिए रखा था। वह कुछ लगड़ाकर चलती थी। खाना बहुत प्यार से बनाती तथा खिलाती थी। हाउसकीपिंग और रखरखाव की सुविथा थी। यह हॉस्टल सेंट जॉन्स ई एल सी चर्च द्वारा संचालित था। 


छिंदवाड़ा के चर्च अपनी धार्मिक सेवाओं के साथ-साथ विभिन्न सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते हैं। छिंदवाड़ा के चर्च अपनी धार्मिक सेवाओं के साथ-साथ विभिन्न सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय रूप से भाग लेते थे। 


यहां क्रिश्चियन आबादी के लिये सेंट मार्क चर्च, सेंट जॉन्स चर्च और सेंट फ्रांसिस जेवियर चर्च, थे। जो  बहुत सारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाते थे। जिससे न केवल उनके अपने सदस्यों को आध्यात्मिक सहायता मिलती, बल्कि वे व्यापक समुदाय में भी सकारात्मक योगदान दे रहे थे। छिंदवाड़ा में ऐसे कॉन्वेंट स्कूल और कॉलेज हैं जो ईसाई मिशनरी या चर्च द्वारा संचालित हैं। 


हमारे कलेक्टर एन पी तिवारी जी थे। वह यहां विगत चार साल से कलेक्टर थे। बहुत कुशल प्रशासक, अनुभवी तथा राजनेताओं से अच्छे सम्बन्ध रखते थे। लेकिन अपने अधीनस्थ अधिकारियों के लिये बहुत गुस्से वाले, कठोर, गाली गलौच और डॉट फटकार करने वाले थे। मेरा अनुभव मुरैना में दोस्ताना व्यवहार करने वाले अधिकारियों के साथ काम करने का रहा था। इस तरह की कार्य संस्कृति मेरे लिए नयी थी। 


शुरू में इस कारण मुझे बहुत दिक्कत हुई। प्रशासन में दो तरह के भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी होते है एक सीधी भर्ती वाले जो यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा द्वारा चयनित होते है और दूसरे राज्य प्रशासनिक सेवाओं के प्रमोटी अधिकारी। तिवारी जी राज्य प्रशासनिक सेवा से प्रमोटी अधिकारी थे। डिप्टी कलेक्टर से प्रमोशन पाकर कलेक्टर बने थे। किसी प्रमोटी अधिकारी के साथ काम करने का मेरा यह पहला अनुभव था। 


सीधी भर्ती के अधिकारी संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा को पास करके आई ए एस बनते हैं। यह एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी अखिल भारतीय स्तर की परीक्षा है जिसमें लाखों उम्मीदवार शामिल होते हैं। 


इस परीक्षा में तीन चरण होते हैं- प्रारंभिक परीक्षा, मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार। शीर्ष रैंक पाने वाले उम्मीदवारों को आई ए एस के लिए चुना जाता है। ये सीधे नवनियुक्त अधिकारी के रूप में सेवा में प्रवेश करते हैं।


पदोन्नत आई ए एस अधिकारी वे अधिकारी होते हैं जो पहले राज्य सिविल सेवा के अधिकारी होते हैं। ये राज्य लोक सेवा आयोग  द्वारा आयोजित परीक्षाओं को पास करके राज्य सेवाओं में शामिल होते हैं। एक निश्चित अवधि की सेवा (आमतौर पर 8-10 वर्ष या उससे अधिक) और उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद, राज्य सिविल सेवा के अधिकारियों को आई ए एस  कैडर में पदोन्नत किया जाता है। 


यह पदोन्नति एक चयन समिति  द्वारा की जाती है जिसमें संघ लोक सेवा आयोग और राज्य सरकार के प्रतिनिधि शामिल होते हैं। ये अधिकारी पहले से ही राज्य प्रशासन में काम कर रहे होते हैं और अपनी सेवा के दौरान ही आई ए एस बनते हैं। 


आई ए एस कैडर में सीधी भर्ती और पदोन्नति के लिए एक निश्चित कोटा निर्धारित है। मोटे तौर पर, लगभग 66% (2/3) पद सीधी भर्ती के लिए होते हैं, जबकि शेष लगभग 33% (1/3) पद पदोन्नति कोटा के लिए होते हैं। यह अनुपात समय-समय पर सरकार द्वारा संशोधित किया जा सकता है।


सीधी भर्ती के अधिकारियों को  लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी , मसूरी में एक लंबा और व्यापक आधारभूत प्रशिक्षण प्राप्त होता है, जिसके बाद व्यावसायिक प्रशिक्षण और जिला प्रशिक्षण शामिल होता है। यह प्रशिक्षण उन्हें अखिल भारतीय सेवाओं के लिए तैयार करता है।


पदोन्नत अधिकारी: इन्हें भी लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी , मसूरी  में 5 सप्ताह का आगमन प्रशिक्षण  प्राप्त होता है, जो उन्हें आई ए एस कैडर की भूमिकाओं और जिम्मेदारियों के लिए उन्मुख करता है। उनका अनुभव उन्हें पहले से ही कई व्यावहारिक पहलुओं से परिचित करा चुका होता है।


सीधी भर्ती के अधिकारी आमतौर पर कम उम्र में (21 से 32 वर्ष की आयु सीमा के भीतर) सेवा में प्रवेश करते हैं। उनके पास सेवा में लंबा करियर होता है।


पदोन्नत आई ए एस अधिकारी आमतौर पर बड़ी उम्र में (अक्सर 40 या 50 के दशक में) आई ए एस  बनते हैं, क्योंकि वे राज्य सेवाओं में पहले ही काफी अनुभव प्राप्त कर चुके होते हैं।


सीधी भर्ती की कैरियर प्रगति आमतौर पर तेज होती है, खासकर शुरुआती वर्षों में। वे जल्दी ही उच्च पदों तक पहुँच सकते हैं, जैसे उप-विभागीय मजिस्ट्रेट, जिला मजिस्ट्रेट , सचिव आदि। उनकी वरिष्ठता उनके संघ लोक सेवा आयोग की रैंक और कैडर आवंटन पर आधारित होती है।


पदोन्नत आई ए एस अधिकारी की करियर प्रगति राज्य सेवाओं में उनके अनुभव के आधार पर होती है, और आई ए एस में पदोन्नति के बाद, उनकी वरिष्ठता सीधी भर्ती अधिकारियों से थोड़ी पीछे हो सकती है। खासकर शुरुआती चरणों में। हालांकि, वे भी उच्च पदों तक पहुँचते हैं, लेकिन उन्हें अक्सर उतनी उच्च केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के अवसर नहीं मिलते, जितनी सीधी भर्ती वालों को मिल सकती है।


दोनों तरह के आई ए एस समान होते है। एक बार जब कोई अधिकारी आई ए एस कैडर में शामिल हो जाता है, चाहे वह सीधी भर्ती से आया हो या पदोन्नति से, तो उसे समान पदनाम, वेतनमान और शक्तियां प्राप्त होती हैं। एक आई ए एस अधिकारी के रूप में, वे जिला कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, राज्य या केंद्र सरकार में विभिन्न मंत्रालयों के सचिव जैसे पदों पर काम करते हैं।


दोनों तरह के आई ए एस अधिकारियों के अधिकार और कर्तव्य अधिकारी के रूप में  समान होते हैं। वे सरकार की नीतियों को लागू करने, कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सार्वजनिक सेवाओं का प्रबंधन करने के लिए जिम्मेदार होते हैं।


यह मिश्रण आई ए एस की ग्रेडेशन लिस्ट में बहुत आसानी से हो जाता है लेकिन प्रशासनिक हलकों में उदभव का यह अन्तर कभी समाप्त नहीं होता है।यह व्यवस्था वर्ण भेद, जाति प्रथा या रंगभेद की व्यवस्था जैसी ही है। जिसमें आप यदि कुछ कर सकते है तो अपनी योग्यता, क्षमता, मेहनत तथा बुद्धि के सहारे अंतर को कम तो कर सकते है लेकिन मिटा नहीं सकते। 


यह जिंदगी के साथ भी और जिंदगी के बाद तक चलने वाली मानसिकता है। यह भेदभाव बहुत हद तक मनोवैज्ञानिक है। जो समाज के लोगों के मन में है बाहर नहीं। धीरे-धीरे यह आपको मनोवैज्ञानिक स्तर पर कमजोर बना देती है। आप इसे रोज हर जगह महसूस करते है। 


कुछ सप्ताह हॉस्टल में रहने की दौरान हम सब भी फ़ोर्स वैचलर थे। उस समय छिंदवाड़ा के सिनेमा घरों में किसी कारण बड़ी अनोखी हड़ताल चल रही थी। सभी टाकिजों ने अपने टिकट की कीमत एक रुपया कर दी थी। हम तीनों रात का खाना खा कर लगभग रोज सेकण्ड शो देखने जाते थे। इस समय कलेक्टर से मिलाने में उनके घर नहीं गया। मुझे कर्टसी विजिट की आदत नहीं थी। मैं बिना बुलाए नहीं जाता था। इस कारण कलेक्टर ने मुझे कोई काम नहीं दिया था। मैंने ऑफिसर्स क्लब की सदस्यता भी नहीं ली थी। 


उन्होंने शुरू में मुझे कुछ हल्का फुल्का काम दे रख्खा था। वह काम में करता। फुर्सत के समय किताबें पड़ता था। 


कलेक्टर रोज सुबह दस बजकर तीस मिनिट पर अधिकारियों की मीटिंग लेते। आप उन्हें आता देख अपनी घड़ी मिला सकते थे। वह समय के बहुत पाबन्द थे। उनका अजीब सिस्टम था। उनके पास रोज डाक आती उसमें से वह कुछ पत्र मीटिंग में लाते। 


यह रोज अधिकारियों की लॉटरी निकलने जैसा था। किस की किस्मत में आज क्या निकलेगा यह केवल वही जानते थे। यह एक तरह का मनोवैज्ञानिक टेक्निक थी दूसरों के मन पर हावी होने की। उनके सम्बन्ध में जानकारी संबंधित अधिकारी से पूछते। उस अधिकारी को कुछ पता नहीं होता था। तो वह जानकारी नहीं दे पता था। 


तब कलेक्टर उसे सार्वजानिक रूप से मीटिंग में डांटते, भला बुरा कहते कभी-कभी वह गुस्से में तमतमा जाते उनका चेहरा लाल हो जाता। उनकी बड़ी-बड़ी ऑंखें लाल हो जाती और उन्हें खुद पर कन्ट्रोल नहीं रहता। वह गलियां तक देने लगते। रोज एक अधिकारी को वह टारगेट करते। मुझे नहीं मालूम ऐसा वह जानबूझ कर करते या अनजाने में। पर यह रोज होता उनकी मीटिंग टॉर्चर चेम्बर में बदल जाती। 


जब उनका मन भर जाता तब बैठक समाप्त हो जाती। सब उनके अधीनस्थ अधिकारी डरते थे। कोई कुछ नहीं कहता था। लोगों ने मुझे बताया था कि एक खान डिप्टी कलेक्टर को इतना डांटा फटकारा कि उन्हें अस्पताल में भर्ती होने पड़ा और कुछ दिन में उनकी मृत्यु हो गई। कलेक्टर ने एक तान्त्रिक अधिकारी की सलाह पर कलेक्टर बंगले के गेट पर दुर्गा माता का मन्दिर बनवा कर प्रायश्चित किया। पर उनका व्यवहार नहीं बदला। वह उस तान्त्रिक अधिकारी से पूछ कर ही महत्वपूर्ण काम करते थे। 


लेकिन कलेक्टर साहब का आदेश था। सो क्लब का सदस्य बन गया। मैं बैडमिंटन खेलता था। कभी-कभी कलेक्टर साहब के साथ खेलने को कहा जाता। हालांकि में बहुत बचता था। उनके साथ खेलना मतलब हारना। यदि अब जीत गए तो ऑफिस में वह आप से बदला लेंगे। 


उनका रीडर बाबू था प्रकाश जैन। कलेक्टर फाइल हस्ताक्षर करने के पहले उसे जांचने देते थे। वह कोई ना कोई गलती निकालता था। चाहें वह मात्रा या ग्रामर की गलती क्यों ना हो।  मुझे कलेक्टर का व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। अभी तक डांट खाने की मेरी बारी नहीं आई थी। हमारे साथ एक और डिप्टी कलेक्टर बी एल कुरील ज्वाइन हुए थे। वह खनिज शाखा के प्रभारी थे। एक दिन कलेक्टर साहब ने मुझे बुलाया और कहा देखों क्या बिना पड़े लिखे धोबी मार्क/हस्ताक्षर कर देते हो। 


उन्होंने एक फाइल मेरी तरफ की। मैंने देखा वह मेरी नहीं है। मुझे गुस्सा आया। मैंने कहा मैं बिना पढ़े हस्ताक्षर नहीं करता। यह फाइल मेरी नहीं है। उन्होंने मुझे हस्ताक्षर दिखाए। मैंने पूछा आप को किसने बताया कि यह मेरे हस्ताक्षर है। उन्होंने प्रकाश बाबू को बुलाया। तब प्रकाश ने कहा यह मेरे हस्ताक्षर है। मैंने बताया कि यह मिस्टर कुरील के हस्ताक्षर है। 


मैं गुस्से से लाल हो गया। मेरा नियंत्रण मेरे पर से चला गया। मैं प्रकाश बाबू को भला बुरा कहने लगा। गालियां दी। धकाया। वह छोटे कद के व्यक्ति थे मैंने कहा इतना मरुंगा कि जितने ऊपर हो उतना निचे गाड़ दूगां। कलेक्टर को गलत जानकारी देते हो। वह दर गया। माफ़ी मांगने लगा। कलेक्टर उठ कर मुझे बिठाने लगे। मैं जीतनी बातें कलेक्टर को बोलना चाहता था वह प्रकाश बाबू को सुना दी। उस दिन कलेक्टर ने मेरा गुस्सा देखा। तब से मुझसे अच्छे से व्यवहार करने लगे। 


कलेक्टर ने कुछ दिन मेरा उनके घर में मिलने जाने का इंतजार किया।मुझे इस रिवाज का पता नहीं था ना ही किसी ने कभी बताया था। मुरैना में भी ऐसी कोई प्रथा थी भी या नहीं मुझे पता ना थी। मैं उनके घर नहीं गया। एक दिन मीटिंग के बाद जब में जाने लगा तो उन्होंने रुकने को कहा। मुझे लगा कि शायद आज मुझे डांटने बाले है। मैं बैठक में जाने के पहले रोज हनुमान चलीसा पड़ता था। मुझे लगता था कि यदि वह ऐसा मुझसे व्यवहार करेगे तो मारपीट हो जाएगी। मेरी क्षमता इतना सुनने की नहीं थी। 


उन्होंने मुझे शाम को छह बजे उनके बंगले पर मिलाने की लिए बुलाया। जब शाम को मैं गया तब वह छिंदवाड़ा के एस डी एम, डी एस राय को डांट रहे थे। वह दोनों कमरे में अकेले थे। कुछ देर बार मिस्टर राय बाहर आये। मुझे देख जबरन मुस्कराये और दौड़ कर बाहर चले गये। कलेक्टर का मूड ख़राब था। मैं बहुत असहज महसूस कर रहा था। कलेक्टर के चपरासी ने आ कर बताया कि साहब मुझे अन्दर बुला रहे है। अब हम दोनों पहलीवार अकेले थे। उन्होंने एक सिगरेट निकाली चपरासी से माचिस मांगी और पीने लगे। 


मुझे याद आया सिगरेट पीने वाले तीन तरह के होते है जो नया-नया सिगरेट पीना सिखते है वह सिगरेट और माचिस दोनों रखते है। जो कुछ अनुभवी होते है और गिनती की सिगरेट पीते है वह दोनों में से एक चीज रखते है या तो सिगरेट या माचिस और जो चेन स्मोकर होता है वह दोनों नहीं रखता है। 


तिवारी जी ने मुझे बाहर चल कर घूमते-घूमते बात करने का आमंत्रण दिया। मुझे यह अच्छा लगा। कलेक्टर बंगला तब लगभग दो सौ अकड़ में होता था। बहुत बड़ा मैदान था. खूब पेड़, बगीचा और खेत थे। हम लोग बाहर आये आकाश में शाम का सूरज डूबने को था। आकाश लालिमा से भरा था। शाम की ठण्डी हवा चल रही थी। तिवारी जी का मूड अच्छा हो गया। वह उनके बारे में बताने लगे। उन्होंने बताया जब वह डिप्टी कलेक्टर बने तो उनके पहले कलेक्टर बैतूल में एम एन बुच थे। वह अपने अधीनस्थों से बहुत मेहनत से काम करबाते थे। 


उनकी ट्रेनिंग के कारण तिवारी जी का कैरियर बना। समय पर प्रमोशन हुए और बहुत अच्छी-अच्छी पोस्टिंग काम करने के लिए मिली। वह मेरे जीवन यात्रा के बारे में पूछने लगे। मैं बता रहा था ,फिर उन्होंने मेरे अनुभव के बारे  में पूंछा। मैंने शायद बहुत बुन्देलखण्ड की टोन में बतया कि कलेक्टरी छोड़ कर सब काम किये है। मेरी टोन उन्हें खटक गई। मैं बुन्देलखण्डी हूँ। वहां बहुत अलग तरीके की टोन चलती है जिसे दूसरी जगह घमंडी टोन माना जाता है। 


उन्होंने कुछ कहा नहीं। पर मुझे उनका चेहरा देख कर लग गया। उनकी बातों में हल्का परिवर्तन आया। फिर मुरैना के कलेक्टरों तथा कमिश्नरों के बारे में बात करने लगे। मैंने उन से मेरी दोस्ताना सम्बन्ध तथा व्यवहार के सम्बन्ध में बताया। धीरे-धीरे वह फिर सहज हो गए। तब मैं उनके मकान अलॉट करने का अनुरोध करने का सोचने लगा। मैंने हिम्मत कर मकान देने का अनुरोध किया। 


उन्होंने आश्वासन दिया कि जो भी पहला घर खाली होगा मुझे दे देगें। मैं नमस्ते कर वापिस हॉस्टल आ गया। अगले दिन उन्होंने कलेक्टरी छोड़ कर अधिकांश ऑफिस के काम मुझे दे दिये। शायद वह मेरी कार्य कुशलता देखना चाहते थे। मुझे घर मिल गया। 


उसके पहले मेरे पास नगर पालिका का एक पुराना लेम्ब्रेटा स्कूटर था। जो किसी से टैक्स ना देने पर कई साल पहले जप्त किया था और मालखाने में पड़ा था। मैंने वह ठीक करवाया और चलाने लगा। जब कहीं बंद हो जाता तो सड़क पर खड़ा कर पैदल या रिक्शा कर आ जाता। नगर पालिका के हमारे सुब इंजीनियर थे मिस्टर जोसफ वह उसे उठवाते सुधरवा कर मेरे घर भेजते थे। 


तब हर किसी अधिकारी का सपना होता था एक बजाज का चेतक स्कूटर लेना। पियाजियो वेस्पा की मूल कंपनी ने भारत में वेस्पा स्कूटर के उत्पादन का लाइसेंस बजाज ऑटो को दिया था। तो, आप सीधे बजाज ऑटो के डीलरों के माध्यम से ही बुकिंग कर सकते थे।


लंबी प्रतीक्षा सूची के कारण वेस्पा स्कूटर को खरीदने के लिए तीन से चार साल तक की लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। बजाज चेतक जैसे अन्य स्कूटरों के लिए तो यह प्रतीक्षा दस से बारह  साल तक की भी हो सकती थी। यह दिखाता तह कि उस समय स्कूटर कितने लोकप्रिय थे और उनकी उपलब्धता कितनी कम थी। 


यह मिडिल क्लास का स्टेटस सिम्बल था। प्रीमियम और "ब्लैक मार्केट" में मांग इतनी ज्यादा थी कि लोग स्कूटर जल्दी पाने के लिए प्रीमियम (अतिरिक्त पैसे) देने को भी तैयार रहते थे। बुकिंग सीधे अधिकृत डीलरों के पास होती थी। आपको एक आवेदन पत्र भरना होता था और एक अग्रिम राशि (एडवांस पेमेंट) भी जमा करनी पड़ती थी। मैंने तीन साल पहले बुकिंग ग्वालियर में की थी अब वह स्कूटर मैंने लोन ले कर लिया था। फिर वह चलाता था। 


एक दिन शाम को में कलेक्टर बंगले गया। मेरे पास नजूल का प्रभार था। कलेक्टर बंगले में घांस, इमली और वनोपज नीलाम करवाने का काम नजूल अधिकारी करते थे। जो पैसा आता वह कलेक्टर साहब की पत्नी ले लेती थी। मैंने इमली की नीलामी करवाई थी। उन्हें नीलामी का पैसा कम लग रहा था। उसी पर बात करने के लिये बुलाया था। जब में कमरे में गया तब वह चपरासी को कमरे में बीड़ी पीने पर डांट रहे थे। मुझे अन्दर बुला लिया बैठाया और खुद सिगरेट सुलगा ली। मुझे हंसी आ गई। वह समझ गये सिगरेट बुझा दी और बात करने लगे।  


वहां ग्रामीण क्षेत्रों में महिला एवं बाल विकास) कार्यक्रम भारत सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और बच्चों के उत्थान के लिए शुरू की गई एक महत्वपूर्ण योजना थी। जिस का मुझे काम दिया था। उसमें एक गाड़ी थी जो मुझे दे दी। ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाएं और बच्चों क सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार करना। उन्हें आय-सृजन गतिविधियों में शामिल होने के अवसर प्रदान करना। उत्पादक संपत्ति और ऋण तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना उनके कौशल को बढ़ाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना। बच्चों के स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा में सुधार करना।


ग्रामीण महिलाओं के 15-20 सदस्यों के समूह बनाना। ये समूह स्व-सहायता समूह की अवधारणा पर आधारित थे। इन समूहों को आय-सृजन गतिविधियों (जैसे सिलाई, कढ़ाई, अचार बनाना, पापड़ बनाना, बेकरी उत्पाद, मोमबत्ती बनाना, साबुन बनाना, मुर्गी पालन, डेयरी, आदि) के लिए प्रोत्साहित करना। महिलाओं को उनकी चुनी हुई गतिविधियों में आवश्यक कौशल प्रशिक्षण प्रदान करना। 


समूहों को एक बार का रिवॉल्विंग फंड  प्रदान किया जाता था, जिसका उपयोग कच्चे माल की खरीद, विपणन और समूह की अन्य जरूरतों के लिए किया जाता था। बाल देखभाल गतिविधियां में  काम करने वाली  महिलाओं के बच्चों के लिए क्रेच सेवाएं और पोषण, टीकाकरण आदि की सुविधा प्रदान की जा सके। स्वास्थ्य, शिक्षा, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता और पोषण जैसी बुनियादी सामाजिक सेवाओं तक महिलाओं और बच्चों की पहुंच में सुधार करना। छिंदवाड़ा में कार्यक्रम का संचालन कर ग्रामीण महिलाओं के सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।


भारत में बीपीएल- गरीबी रेखा से नीचे की अवधारणा उन व्यक्तियों और परिवारों की पहचान करने के लिए एक आर्थिक मापदंड है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और उन्हें सरकारी सहायता और योजनाओं की आवश्यकता है। इसका उद्देश्य उन लोगों को लक्षित करना है जो अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में असमर्थ हैं।गरीबी रेखा को प्रति व्यक्ति मासिक उपभोग व्यय या आय के न्यूनतम स्तर के आधार पर परिभाषित किया जाता रहा है। इसका तात्पर्य यह है कि यदि किसी व्यक्ति का उपभोग व्यय या आय एक निश्चित सीमा से कम है, तो उसे गरीब माना जाता। 


भारतीय अर्थशास्त्री वी.एम. दांडेकर और नीलकांत रथ  ने 1971 में भारत में गरीबी का एक महत्वपूर्ण और व्यवस्थित आकलन प्रस्तुत किया। उनका दृष्टिकोण भारत में गरीबी रेखा के निर्धारण के शुरुआती और प्रभावशाली प्रयासों में से एक था।  दांडेकर और रथ ने गरीबी रेखा को केवल आय के आधार पर नहीं, बल्कि न्यूनतम कैलोरी उपभोग के आधार पर परिभाषित करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने तर्क दिया कि गरीबी रेखा उस उपभोग व्यय पर आधारित होनी चाहिए, जो ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 2250 कैलोरी की न्यूनतम आवश्यकता प्रदान करने के लिए पर्याप्त है। उनका मानना था कि स्वस्थ और सक्रिय जीवन जीने के लिए एक निश्चित मात्रा में कैलोरी का सेवन आवश्यक है। यह कैलोरी मापदंड पोषण विशेषज्ञ पी.वी. सुखात्मे के अनुमानों पर आधारित था।


यह मॉडल मुख्य रूप से भोजन (कैलोरी) पर केंद्रित था और शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, परिवहन, और अन्य गैर-खाद्य वस्तुओं पर होने वाले आवश्यक खर्चों को पूरी तरह से शामिल नहीं करता था। इसके बावजूद, दांडेकर और रथ का कार्य भारतीय अर्थशास्त्र में गरीबी के अध्ययन में एक मील का पत्थर था, जिसने गरीबी की पहचान और उसके मापन के लिए एक ठोस आधार प्रदान किया।

 

भारत सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले परिवारों में गरीबी कम करने के लिए कई योजनाओं को लागू किया गया है, जिनमें से एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम और स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण प्रमुख थे। ये योजनाएँ ग्रामीण गरीबों को सशक्त बनाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से लाई गई थी।


मेरी रूचि ग्रामीण विकास, आजीविका और कृषि क्षेत्र में थी। वैसे तो प्रशासन कुर्सी से चलता है उस पर कोई भी बैठा हो। लेकिन यदि बैठने बाला थोड़ा योग्य व्यक्ति हो तो हजारों लोगों के जीवन में बदलाव का कारण बाह सकता है। गवर्नमेंट बहुत बड़ी प्रशासनिक इकाई है। फिल्ड के अधिकारी नीतिगत निर्णय नहीं लेते है। लेकिन नीतियों तथा उनके तहत बनी शासन की योजनाओं का क्रियान्वयन वह करते है। डिप्टी कलेक्टर का पद सामान्य प्रशासन विभाग के तहत आता है। उन्हें कभी किसी भी विभाग में पदस्थ किया जा सकता है। इस समय मैंने निर्णय लिया कि मैं कम से कम एक विषय में थ्योरी तथा प्रैक्टिकल में महारत हासिल करुंगा। मैंने ग्रामीण विकास विषय को चुना। इसलिए इस विभाग की योजनाओं को लागू करने के लिये मैंने आउट ऑफ़ थे बॉक्स तरीकें विकसित किये। 


एकीकृत ग्रामीण विकास कार्यक्रम और स्वरोजगार के लिए ग्रामीण युवाओं का प्रशिक्षण के कार्यक्रम लागु करने के लिए मैं क्लस्टर स्तर पर कैंप लगाना शुरू किये। ग्रामीण महिलाओं के 15-20 सदस्यों के समूह बनाना। ये समूह स्व-सहायता समूह बनवाना के लिए समबन्धित अधिकारियों के साथ में बहुत काम करता था। बैंकों से जोड़ कर लोन दिलवाता। गतिविधियों के प्रशिक्षण के कार्यक्रम चलता था। 


उन दिनों परिवार नियोजन करवाने की जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होती थी। हम लोगों को महिला तथा पुरुष नशबंदी के लिए लोगों को प्रेरित करते। डर दिखलाते या कभी-कभी लालच देते थे। दिल्ली के पालिका बाजार से इलेक्ट्रॉनिक घड़ियां किलों से टोल कर लाते और नशबंदी करवाने बालों को ईनाम में देते थे। महिलाओं को वर्तनों का सेट दिया जाता था। मैंने छिंदबाड़ा में उस समय देश का सबसे बड़ा नशबंदी कैम्प आयोजित किया था। यह कैम्प तीन दिन चला था तीसरे दिन सुबह जब में हॉस्पिटल से घर आया तो मेरे दरवाजे पर कलेक्टर डिसा ने प्रशंसा पत्र रखवाया था। प्रशंसा पत्र पा कर बहुत गर्व महसूस हुआ था। 


इन दिनों मैं पुलिस के साथ रंगे हाथों रिश्वत लेने को पकड़ने के कारण अधिकारियों के बीच में बहुत फैमस हो गया था। मुरैना में कई लोगों को पकड़ा था। फिर छिंदबाड़ा में चार अधिकारियों को पकड़ चुका था। मुरैना की तुलना में छिंदबाड़ा बहुत शांत जगह थी। बहुत काम लोग कलेक्ट्रेट आते थे। मुरैना में बहुत उग्र स्वाभाव के लोग थे। वहां लोग मुँह पर बोलते। काम तो करना पड़ेगा या तो चांदी का जूता खा कर करों या चमड़े का। चॉइस आप की है। वहां लोग यदि आपसे दोस्ती करेंगे तो अंतिम दम तक और दुश्मनी करगें तो भी अंतिम दम तक। घर का पूरा पैसा लगा कर आपको मिटा देगें। 


इसके उलट छिंदवाड़ा के लोग मीठा बोलते सामने और बुराई करते पीठ पीछे। यदि खाने पर बुलेगें तो एक रोटी की चार भाग करके परोसेंगे। छोटी-छोटी कटोरियों में दाल सब्जी देंगे। बहुत अलग कल्चर था। मेरे लिए बिलकुल नया। मैं ठहरा बुन्देलखण्डी अधिकारी।


वन बंदोबस्त अधिकारी एक महत्वपूर्ण पद होता है जो मुख्य रूप से वन भूमि और वन अधिकारों से संबंधित विवादों को सुलझाने और उनका निपटान करने के लिए जिम्मेदार होता है। वन बंदोबस्त अधिकारी का कार्य वन भूमि पर सरकार के स्वामित्व को स्थापित करने और स्थानीय समुदायों के वैध अधिकारों को सुनिश्चित करते हुए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना है। यह एक जटिल और संवेदनशील कार्य होता है जिसके लिए कानूनी ज्ञान, प्रशासनिक कौशल और निष्पक्षता की आवश्यकता होती है।भारतीय वन अधिनियम  और अन्य संबंधित कानूनों के तहत, उनके मुख्य कर्तव्य हैं: अधिकारों का निर्धारण और रिकॉर्डिंग तैयार करना। 


किसी क्षेत्र को आरक्षित वन या संरक्षित वन  घोषित करने से पहले, अधिकारी का मुख्य कार्य उस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के मौजूदा अधिकारों (जैसे चराई के अधिकार, लकड़ी इकट्ठा करने के अधिकार, पानी के अधिकार, आदि) का पता लगाना और उन्हें दर्ज करना होता है। वे दावेदारों से आवेदन प्राप्त करते हैं और उनकी जांच करते हैं।


वे प्राप्त सभी दावों की गहन जांच करना। इसमें संबंधित व्यक्तियों, ग्रामीणों और स्थानीय अधिकारियों से पूछताछ करना, राजस्व रिकॉर्ड की जांच करना और स्थल पर जाकर सत्यापन करना शामिल है। यह सुनिश्चित करना कि सभी दावे वैध हैं और उनका कानूनी आधार है। दावों की जांच के दौरान या उसके बाद उत्पन्न होने वाली किसी भी आपत्ति या विवाद को सुनना और उनका निपटान करना। यह एक अर्ध-न्यायिक प्रक्रिया होती है जहाँ अधिकारी को साक्ष्यों पर विचार करना होता है और निष्पक्ष निर्णय देना होता है।


यदि किसी व्यक्ति के वैध अधिकार वन के गठन के कारण बाधित होते हैं, तो अधिकारी को मुआवजे (नकदी या भूमि) का निर्धारण करना होता है, या वैकल्पिक व्यवस्था (जैसे अन्य क्षेत्रों में चराई के अधिकार) का प्रस्ताव देना होता है। वन भूमि की सीमाओं का सही ढंग से सीमांकन करवाना और उनके नक्शे तैयार करवाना। यह भविष्य में अतिक्रमण और विवादों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। अधिसूचना और प्रकाशन, अपने निष्कर्षों और निर्णयों को सार्वजनिक सूचना के लिए अधिसूचित करना। इसमें स्थानीय भाषाओं में घोषणाएं और समाचार पत्रों में प्रकाशन शामिल हो सकता है ताकि सभी हितधारकों को जानकारी मिल सके।


सरकार को रिपोर्ट प्रस्तुत करना, अपने सभी निष्कर्षों, निर्णयों और सिफारिशों के साथ एक विस्तृत रिपोर्ट संबंधित राज्य सरकार को प्रस्तुत करना। इस रिपोर्ट के आधार पर ही अंतिम वन अधिसूचना जारी की जाती है। न्यायालयों में प्रतिनिधित्व,यदि बंदोबस्त अधिकारी के निर्णयों के खिलाफ अपील की जाती है, तो उन्हें उच्च न्यायालयों या अन्य न्यायिक मंचों पर सरकार का प्रतिनिधित्व करना पड़ सकता है।


अतिक्रमण हटाना, वन भूमि पर किसी भी प्रकार के अवैध अतिक्रमण को हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया का पालन करना। कुल मिलाकर यह काम बहुत संवेदनशील है इस कारण अधिकारी यह काम नहीं करना चाहते। कोई भी डिप्टी कलेक्टर यह कार्यभार लेने से बचता है। तिवारी जी ने मुझे छिंदवाड़ा का फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर बना दिया। 


फारेस्ट की दृष्टि से छिंदवाड़ा बहुत समृद्ध जिला था। वहां चार डिस्ट्रिक्ट फारेस्ट ऑफिसर तथा कंज़र्वेटर ऑफ़ फारेस्ट के कार्यालय थे। मैं फारेस्ट सेटलमेंट ऑफिसर का पदभार ग्रहण कर कंज़र्वेटर ऑफ़ फारेस्ट से मिलने उन के ऑफिस गया। उन्होंने खड़की से मेरी गाड़ी उनके कार्यालय में आते देखी वह बाहर आ कर खड़े हो गये। 


जब मैंने उन्हें बताया कि मैं कर्टसी विजिट के लिये उनसे मिलने आया हूँ तो उन्होंने राहत की सांस ली और मुझे अपने ऑफिस में ले कर गए। बोले भाई आप की गाड़ी देख कर दर लगा कि कहीं आप ट्रैप करने तो नहीं आये है। 


उन दिनों नगर पालिकाओं के चुनाव समय पर नहीं होते थे। कलेक्टर साहब ने मुझे छिंदवाड़ा नगर पालिका का प्रशासक नियुक्त किया। मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम के तहत नगर पालिका प्रशासक  के कर्तव्य और अधिकार तब लागू होते हैं जब किसी नगरपालिका या नगर परिषद का कार्यकाल समाप्त हो जाता है, या किसी अन्य कारण से निर्वाचित निकाय भंग हो जाता है। ऐसे में राज्य सरकार द्वारा एक प्रशासक की नियुक्ति की जाती है, जो उस नगरीय निकाय के सभी कार्यों का संचालन करता है। 


कलेक्टर कार्यालय में केवल स्थापना शाखा छोड़कर सभी शाखाओं का प्रभार मेरे पास था। मेहनत बहुत थी। लेकिन काम सीखने को भी मिल रहा था। मेरे कलेक्टर मुझे अजमाना छह रहे थे। पर मेरे लिए यह अनुभव बहुत काम आया। में सुबह छह बजे से रात नौ बजे तक काम करता था। कलेक्टर ऑफिस में बहुत काम लोग आते थे। ऑफिस के प्रांगण में नियमित सुबह एक गधा आता दिन भर वहीं घूमता रात को बापिस जाता था। एक दिन हम लोग ऑफिस में मजाक कर रहे थे कि यह किसी पुराने कलेक्टर की आत्मा है जो अभी भी ऑफिस आने का मोह नहीं छोड़ सकीय है और यह मेरी बात पीछे से आ रहे कलेक्टर ने सुन ली। वह बहुत हंसे और प्रांगण में खड़े उस गधे को देख कर बोले अरे मेने तो ध्यान ही नहीं दिया था। 


प्रशासक की भूमिका एक अंतरिम व्यवस्थापक की होती है, जो निर्वाचित निकाय के अभाव में नगरीय निकाय के सुचारू कामकाज को सुनिश्चित करता है। उसके पास वे सभी प्रशासनिक और वित्तीय शक्तियां होती हैं जो सामान्यतः निर्वाचित महापौर/अध्यक्ष और परिषद के पास होती हैं, ताकि शहर के विकास और नागरिकों को सेवाएं प्रदान करने में कोई बाधा न आए।


प्रशासक उस अवधि के लिए, जब तक कि नया निर्वाचित निकाय कार्यभार ग्रहण नहीं कर लेता, नगर पालिका/नगर परिषद के सभी कार्यों और कर्तव्यों का पालन करता है। वह उन सभी शक्तियों का प्रयोग करता है जो अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों और उप-विधियों द्वारा नगरपालिका या उसकी समितियों को प्रदान की गई हैं। 


नगर पालिका के वित्त का प्रबंधन करना, जिसमें बजट तैयार करना, राजस्व संग्रह (जैसे संपत्ति कर, जल कर, सफाई कर, शुल्क आदि), व्यय को नियंत्रित करना और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना शामिल है। सरकारी अनुदानों का प्रभावी उपयोग सुनिश्चित करना।


विकास कार्य और योजनाएं, शहर/कस्बे के विकास और सुधार के लिए योजनाओं को लागू करना। सार्वजनिक सुविधाओं जैसे सड़कें, जल निकासी, सीवरेज, स्ट्रीट लाइट, सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता, पार्कों का रखरखाव आदि से संबंधित कार्यों की निगरानी करना। अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने और नागरिक अधोसंरचना के विकास से संबंधित कार्यों में शामिल होना। 


कर्मचारी प्रबंधन, नगर पालिका कर्मचारियों की भर्ती, पदोन्नति, स्थानांतरण और अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित निर्णय लेना (अधिनियम और नियमों के तहत प्रदत्त शक्तियों के अनुसार)। कर्मचारियों के कल्याण के लिए नीतियों को लागू करना। 


कानूनी और नियामक अनुपालन,  मध्य प्रदेश नगर पालिका अधिनियम और अन्य संबंधित कानूनों, नियमों और उप-विधियों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करना। किसी भी कानूनी विवाद या मुकदमे में नगर पालिका का प्रतिनिधित्व करना। भवन अनुज्ञा  जारी करने, अतिक्रमण हटाने और अवैध निर्माण को नियंत्रित करने संबंधी कानूनी प्रावधानों का पालन करना।


सार्वजनिक सेवाओं का प्रावधान, नागरिकों को आवश्यक सेवाएं (जैसे जन्म/मृत्यु प्रमाण पत्र, विवाह प्रमाण पत्र, जल आपूर्ति, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन आदि) समय पर और कुशलता से प्रदान करना। नागरिकों की शिकायतों का निवारण करना।


राज्य सरकार को रिपोर्ट, नगर पालिका की गतिविधियों, वित्तीय स्थिति और विकास कार्यों की नियमित रिपोर्ट राज्य सरकार को प्रस्तुत करना। राज्य सरकार द्वारा दिए गए निर्देशों और नीतियों का पालन करना। आपातकालीन शक्तियां, आपातकालीन स्थितियों में (जैसे आपदाएं, महामारी) त्वरित निर्णय लेना और आवश्यक कार्रवाई करना।


नगर पालिका प्रशासक का पद अर्द्ध राजनैतिक पद जैसा होता है। उस समय कमल नाथ जी सुपर मुख्य मन्त्री होते थे तथा छिंदबाड़ा से पांच मन्त्री मध्य प्रदेश शासन में थे। इस सब का दखल नगर पालिका के दैनिक काम काज में था। नगर पालिका की नियमित आय बहुत कम थी। राज्य सरकार ने ऑक्ट्रॉय टैक्स जिसे चुंगी कर कहते थे समाप्त कर दिया था। 


पहले हर नगर पालिका को अधिकार था कि वह नगर के प्रवेश मार्गों पर बैरियर लगा कर शहर में आयात तथा निर्यात होने बाले माल पर ऑक्ट्रॉय टैक्स बसूले। आने जाने बाले यात्री वाहनों से यातायात कर बसूले। नगर पालिका की आय के यह मुख्य साधन थे। लेकिन राज्य शासन ने यह कर माफ़ कर दिए। आय कम हो गई और खर्चें बढ़ गये। 


छिंदवाड़ा नगर पालिका में पैसे की कमी का मुझे एक उपाय सुझा कि यदि मैं नगर पालिका की जमीन पर बाजार के लिए दुकानें नीलम कर बना दूं तो पगड़ी के रूप में एडवांस पैसा डिपॉजिट में मिल सकता है और दुकान बनाने के लिए किश्तों में पैसा मिलने से दुकानें बन सकती है। दुकानों से प्रति माह किराया भी आएगा। जिससे कर्मचारियों का वेतन नियमित दिया जा सकता है। मैंने इस योजना को मूर्त रूप दिया और नीलामी में इतना रुपया आया कि टेबल क्लॉथ निकाल कर रुपया बांध कर बैंक में जमा करबाया। ऐसे दो बाजार उस समय बन गए। 


शहर के मकानों पर संपत्ति कर लगता है। बिजली, पानी और सफाई कर लगता है। लेकिन चुने हुए राजनेता को वोट लेना होता है तो वह सख्ती से बसूली नहीं करवा पाते थे। मुझे तो वोट लेना नहीं था। मैंने बहुत सख्ती से वसूली कराना शुरू किया। बकायेदारों की संपत्ति कुर्क करना शुरू किया। नगर पालिका के कर्मचारियों अधिकारियों को इस काम में बहुत दिक्कत हो रही थी। उन की शिकायतें होती, जांच होती और ट्रांसफर होता। सबसे ज्यादा लोग ट्रांसफर से डरते थे। सरकार में यदि आप ज्यादा काम करेंगे तो ज्यादा शिकायतें होती, जांच होती, दंड मिलता और ट्रांसफर होता।  


इसीलिए सरकारी कर्मचारियों और अधिकारीयों द्वारा कम काम किया जाता। जिससे कम शिकायतें होती, कम जांच होती, कम दण्ड मिलता और कम ट्रांसफर होता। लोग कम नाराज होते। लोग ऐसे अधिकारी को गऊ कहते थे। सीधा सदा कथरी औड़के घी पीता और गोबर करता। फर्जी प्रोग्रेस दिखाता। 


तो हुआ यह कि नगर पालिका के कर्मचारियों और अधिकारीयों द्वारा आर्च विशप का बंगला कुर्क कर ताला लगा दिया। चर्च की बिल्डिंग्स पर बहुत बड़ी राशि का सम्पति कर बकाया था। उन्होंने कई सालों से टैक्स जमा नहीं किया था। लोग मेरे पास आये। क्रिश्चियन समुदाय के लिये आर्च विशप बहुत बड़ा सम्मानित व्यक्ति होता है। उन्होंने मुझसे ताला खुलवाने के अनुरोध किया। 


मैंने मना कर दिया कहां की पैसा जमा करदो। ताला खोल देंगे। आर्च विशप ने ताला खोलने की लिए लिए राजनैतिक तथा मानसिक दबाव डाला। अधिकारीयों और कर्मचारियों पर काम का दबाव बनाये रखने के लिए मैंने उनका पक्ष लिया। शुरू में मेरा सरनेम पस्तोर  देख कर लोगों को लगा कि मैं क्रिश्चियन समुदाय का हूँ तो उन्होंने धार्मिक दबाव डाला।जब कई दिन कुछ नहीं हुआ तो दबाव डालने की लिए क्रिश्चियन समुदाय ने हड़ताल कर दी। कमल नाथ से शिकायत कर दी कि नगर पालिका के अधिकारीयों और कर्मचारियों ने क्रिश्चियन समुदाय के धर्म गुरु आर्च विशप का अपमान किया है। 


कमलनाथ ने 1980 में पहली बार छिंदवाड़ा से लोकसभा चुनाव जीता था। वह छिंदवाड़ा लोकसभा सीट से बार-बार  सांसद चुने गए, जो उन्हें सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले लोकसभा सदस्यों में से एक थे।  केंद्रीय मंत्री के रूप में भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही थी। कमलनाथ ने केंद्र सरकार में कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभाला था। क्रिश्चियन समुदाय ने कमल नाथ जी से शिकायत कर दी। कमल नाथ जी ने मुझे तथा कलेक्टर को बुलाया। हम लोग गये। मैंने बहुत दृढ़ता से नगर पालिका का पक्ष रखा। मेरे कलेक्टर और कमलनाथ जी ने नगर पालिका की कार्यवाही को सही माना। वसूली हुई। 


कमल नाथ जी ने जनता से प्राप्त पत्रों को उनकी अनुशंसा के साथ संबंधित विभाग को भेजने के लिये एक स्थानीय स्तर पर कार्यालय बनाया था। जहां प्राप्त पात्र को रजिस्टर कर सम्बंधित विभाग को जाते तथा आवेदक को इस बात की सूचना जाती थी। कलेक्टर कार्यालय में शिकायत शाखा में मासिक प्रगति की समीक्षा होती थी। जब वह किसी गांव में भ्रमण करते तो उनका स्टाफ एक छोटा कार्ड बना कर कमलनाथ जी को देता। वह हथेली में छुपाकर उनमें से नाम ले कर कहते कि इस व्यक्ति ने मुझे पत्र लिखा था उसका काम हो गया है। जब लोग उनका नाम संसद के मुंह से उनके भाषण में सार्वजनिक रूप से सुनते में सांसद के दीवाने हो जाते थे। 


जब कोई व्यक्ति दिल्ली जाता तो जो बंगला उन्हें शासन से मिला था उस में रुक जाते। वह अपने निजी मकान में रहते थे। शासकीय बंगले को गेस्ट हाउस बना दिया गया था। वहां रुकने वाले को खाना भी फ्री में मिलता था। यदि किसी को इलाज कार्बन हो तो दिल्ली के शासकीय हॉस्पिटल में भेजते थे। यदि किसी के पास रिटर्न टिकट के पैसे न हो तो उनके सहायक मिगलानी जी उन्हें पैसा देते। वह हमेशा पांच-पांच रूपये के नॉट देते थे। एक दिन मैंने उनसे पूछा कि बड़े नॉट क्यों नहीं देते तो उन्होंने बताया कि पांच-पांच रूपये के काम नॉट भी गड्डी में बहुत दिखते है। लोग खुश हो जाते है। इसलिए पांच-पांच रूपये के नोटों को देते है। 


कई नेता उनके कुत्ते के साथ फोटो खिचवा कर सांसद से निकटता देखने के लिए साथ रखें। मुझे एक नेता ने बताया की वह कमल नाथ जी का बहुत खास है तब उसने सबूत के तौर पर उनके पामेरियन कुत्ते के साथ फोटो मुझे दिखाया। 


मैंने शहर में नागरिक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए बहुत मेहनत की। शहर के हर बार्ड में समश्या निवारण सप्तम लगाना शुरू किये। नागरिकों के सहयोग से अनेक काम हाथ में लिए। रात में पैदल सड़कों पर चला। ताकि जान्सके की स्ट्रीट लाइट पर्याप्त है या नहीं। मैंने जाना जब आप उसी सड़क पर अलग-अलग तरीकें से चलते है आप की अनुभूति अला=अलग होती है जैसे पैदल, साइकिल, मोटर साइकिल या कार से चलते है। 


जब पैदल चलोगे तभी सड़क के गड्डे, लाइट पर ध्यान जाता है। में रोज सुबह पांच बजे सफाई तथा पानी की सप्लाई देखने जाता था। इस का परिणाम यह हुआ कि लोग टैक्स भी आसानी से जमा करने लगे। जब काम होता है तो काम बोलता है। लेकिन जब काम नहीं हो तो आप को बोलना पड़ता है। 


नगर पालिका की आर्थिक हालत के कारण इतने प्रभावशाली मंत्री और सांसद होने के बाद भी विकास के कोई काम नहीं हो पाते थे। विजय पाटनी जी सरकार में मंत्री थे। वह छिंदवाड़ा के रहने बाले थे। उनकी रूचि नगरपालिका के कामों में बहुत रहती थी। उन्होंने स्थानीय प्रशासन मंत्री शर्मा जी से कुछ विकास कार्यो के लिए राशि आबंटित करने के अनुरोध किया। मंत्री जी ने मुझे प्रस्तावों के साथ मुझे बुलाया। मैं प्रस्ताव लेकर गया। जब मैं बल्लभ भवन मंत्रालय भोपाल शर्मा जी से मिलाने गया। मंत्री जी ने अन्दर कमरे में बुलाया। मैंने देखा वह धोती कुर्ता पहन कर दोनों पैर ऊपर कुर्सी पर किए बैठे है। उनकी धोती घुटनों तक थी आधे पांव दिख रहे थे। माथे पर टीका लगाया था। आंखें बंद किये बैठे थे। वह छत्तीसगढ़ से आते थे। 


मैंने नमस्कार किया। उन्होंने बैठने का इशारा किया। मैं बैठ गया। उन्होंने  आंखें बंद किऐ ही मुझसे प्रस्तावों के बारे में पूछा। मैं बड़े उत्साह से चार पांच कामों के प्रस्ताव ले कर गया था। जो तीन करोड़ के थे। मंत्री जी ने आंखें बंद किये ही कहा पांच लाख रुपया दे रहा हूँ। छिंदवाड़ा को चमन बना देना। उन्होंने आंखें नहीं खोली। कुछ देर कमरे में सन्नाटा छाया रहा। में कुछ नहीं बोला वापस छिंदवाड़ा आगया। 


छिंदवाड़ा में हमारे एक सीनियर साथी थे एम एल मित्तल यह एडीशनल कलेक्टर थे। राजस्व अधिकारी की प्रतिमूर्ती। उनके साथ भोपाल जाना होता था। उनका परिवार भोपाल में रहता था। वह अकेले छिंदवाड़ा में रहते थे। विभागीय जांचों के कारन उनका प्रोमोशन नहीं हो सका। उनके जूनियर आई ए एस बन गये। बहुत अधिक फरस्ट्रेटिड रहते। कलेक्टर के समकक्ष सीनियर थे। कलेक्टर से बनती नहीं थी। शाम को शराब की महफ़िल जमती। हमरे पास सरकारी गाड़ी थी। उन्हें नहीं मिली थी। इस लिए हमारे साथ भोपाल जाते थे। एक बार भोपाल में वह उस बाबू के घर मुझे ले कर गए जो सामान्य प्रशासन विभाग में हम लोगों की स्थापना का काम देखता था। नाम था करीम बाबू। सरकारी माकन में रहते। मित्तल साहब के कई काम वही देखता था। जब हम उनके घर में बैठे मेने देखा कि हर अधिकारी की पूरी कुण्डली उन्हें मौखिक याद थी। नाम, पता, गृह जिला, पद, स्थान, कब से पदस्थ है, विभागीय जाँच आदि सभी जानकारियां। मैं पहलीबार इस तरह के ज्ञानवान से मिला था। करीम मियां ने कहा कभी कोई काम हो तो उनसे मिलू। मिस्टर मित्तल उन्हें उनके प्रकरणों में मादा करने के बदले हर माह कुछ पैसा देते थे। कितना मुझे कभी बताया नहीं। 


इस बीच तिवारी जी कलेक्टर साहब का स्थानांतरण उज्जैन कलेक्टर के रूप में हो गया। राम सिंह नये कलेक्टर बन कर छिंदवाड़ा आ गये। नगर पालिका प्रशासक होने के नाते परम्परा अनुसार मैंने उनका फेयरवेल नगर पालिका कार्यालय में रखा। जब वह अपने सम्बोधन में कर रहे थे "जब में यहां आया तब मेरे पास कुछ नहीं था। अब आपका ढेर सारा प्यार ले कर जा रहा हूँ।" 


तभी पीछे से कोई धीरे से बोला "और चार ट्रक सामान भी ले जा रहा हूँ।" यह उन्होंने सुन लिया। उनका चेहरा लाल हो उठा। सच्ची बात हमेशा बहुत जोर का तमाचा मारती है। नए कलेक्टर राम सिंह पहली बार कलेक्टर बने थे। बहुत समय दिल्ली में रहने के बाद मध्य प्रदेश लौटे थे। 



अमरवाड़ा


मैं इस समय एस डी एम  अमरवाड़ा था और नगर पालिका प्रशासक छिंदवाड़ा भी था। दोनों जगह की दूरी चालीस किलोमीटर से अधिक थी। मैं अमरवाड़ा में रहता था। बच्चे बड़े हो रहे थे। अमरवाड़ा में कोई अच्छे स्कुल नहीं थे। नगर पालिका छिंदवाड़ा में हमेशा कोई ना कोई इमरजेंसी बनी रहती थी। जैसे घर गृहस्थी में हम एक घर की व्यवस्था देखते है उसी तरह नगर पालिका के माध्यम से पूरे शहर की व्यवस्था देखना होती थी। नये कलेक्टर की रेपुटेशन बहुत अच्छी नहीं थी। 


जब में मासिक बैठकों में जाता कलेक्टर मुझे कहते तुम्हारी बहुत शिकायत आ रही है। मैं पूछता क्या है शिकायतें कभी नहीं बताते। बैठकों में लगातार यह बात होती। मैं बहुत गरीब क्षेत्र में काम कर रहा था। श्री लाल शुक्ल का उपन्यास राग दरबारी याद आता। तो मोहन राकेश की कहानी परमात्मा का कुत्ता। में बहुत मेहनत कर रहा था। पर कलेक्टर संतुष्ट नहीं थे। मैंने उन्हें अमरवाड़ा से हटाने का कहा तो स्थानांतरण भी नहीं कर रहे थे। 


उनका बहुत दबाव था। मेरे मित्र फ़ूड ऑफिसर पटेल जी थे। मैंने उनसे सलाह ली क्या करू। लगता है एकाध दिन कलेक्टर से मारपीट हो जाएगी। उन्होंने कुछ पैसा कलेक्टर को देने का सुझाब  दिया। मैंने कभी किसी कलेक्टर को इस तरह पैसा नहीं दिया था। उन्होंने बताया कि यह कलेक्टर तो दफ्तर के बाबुओं से उनकी पोस्टिंग का पैसा लेलेता है। जब कि उनकी पत्नी भी इनकम टैक्स इन्स्पेक्टर थी। कोई कमी ना थी। पर लालच अपार था। बातें बहुत अच्छी करते थे। जो जितना भ्रष्ट होगा उतनी ईमानदारी की बात करेगा। यह मानव स्वाभाव है। 


मेरी आय के दो साधन थे, एक वेतन और दूसरा टीए डीए। वेतन घर खर्च के लिए पत्नी को देता था। तभी मुझे दो माह का टीए डीए मिला था। पटेल जी ने राय दी शाम को कलेक्टर बंगले जाना। एक कागज के लिफाफे में रुपया रख कर दे देना। में शाम को ऐसा ही किया। उन्होंने नहीं पूछा किस बात का पैसा मैं दे रहा हूँ। हम दोनों कमरे में अकेले थे मैंने कांपते हाथों से लिफ़ाफ़ा दिया। उन्होंने नजरे नीची कर लिफाफा ले कर जेब में रख लिया। 


मेरे लिए चाय बुलाई। मेरा मेहनत का पैसा जा रहा था। मैंने हिम्मत कर कहा सर मेरी आय के दो साधन है एक वेतन और दूसरा टीए डीए। वेतन घर खर्च के लिए पत्नी को देता हूँ। टीए डीए का पैसा आप को दे दूंगा। आप अमरवाड़ा के लोगों से मिलते है उनसे मेरे बारे में पूछ लेना कि में रिश्वत लेता हूँ या नहीं। पर आप बार-बार मीटिंग में शिकायत की बात करते है मुझे बहुत बुरा लगता है। उनका चेहरा लाल हो गया। 


उन्होंने लिफाफा निकाल कर मुझे लोटा दिया। बोले कोई बात नहीं। मैंने उन्हें अनुरोध किया कि या तो मुझे एस डी एम अमरवाड़ा रखे या नगर पालिका प्रशासक छिन्दवाड़ा। दो जगह का काम करना मुश्किल हो रहा है। छिदवाड़ा एस डी एम मनीष श्रीवास्तव थे उन्हें हटाना था। तो कुछ दिन बाद मुझे एस डी एम छिदवाड़ा और प्रशासक  नगर पालिका छिन्दवाड़ा पदस्थ कर दिया। उन्होंने फिर कभी मुझसे पैसा की उम्मीद नहीं की। मेरी अच्छी दोस्ती हो गई। उनकी पत्नी की पोस्टिंग दिल्ली में थी। उनका परिवार वहीं था।  वह अकेले रहते थे। अक्सर हम दोनों घंटों बातें करते थे। 


मैं हमेशा उनसे उनके लालच की बात करता। पर उन्हें पैसे की लत लग गई थी। यह जरूरत नहीं थी एडिक्शन था। नोटों की खुशबू किक देती है। एडरनल हारमोन ख़ुशी देता है। एक दफे उन्होंने एक टेपरिकॉर्डर देखने के लिये कही से लाने को कहा। नगर पालिका के प्रशासक होने के कारण दुकानदारों से परिचय था। एक दुकानदार उन दिनों गानों तथा फिल्मों के कैसिट डुप्लीकेट करके बेचता था। 


उसके पास पैनासोनिक कम्पनी का बड़ा दो कैसिट बाला टेपरिकॉर्डर ला कर उनके बंगले पर लगवा दिया। दुकानदार से दो दिन के लिए मांगा था। लेकिन एक सप्ताह हो जाने के बाद भी कलेक्टर ने उसे वापिस नहीं किया। एक दिन जब वह टूर पर बाहर गए थे मैं कलेक्टर बंगला गया और वह टेप रिकॉर्डर उठा कर दूकानदार को वापिस किया। उसके धंधे का नुकसान हो रहा था। तभी जब आप उनके बारे में गूगल करोगे तो ऐसी जानकारी नेट पर उपलब्ध है -


“एक खबर में 'राम सिंह' नाम के एक आई ए एस अधिकारी का उल्लेख हैं, जिन्हें 2014 में मध्य प्रदेश में सेवा से बर्खास्त किया गया था। ये खबर बताती है कि राम सिंह (1972 बैच के आई ए एस अधिकारी) को 22 साल पहले, जब वे केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर दिल्ली मिल्क सप्लाई  के महाप्रबंधक के रूप में तैनात थे, रिश्वत लेते हुए सी बी आई  ने पकड़ा था। उन्हें बाद में पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी।”

 

जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव होना था। बैठक की अध्यक्षता करने की लिए तत्कालीन कलेक्टर राम सिंह ने मुझे नियुक्त किया था। यह सहकारिता क्षेत्र के महत्वपूर्ण चुनावों में से एक होता है। यह चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत होता है। जिसमें विभिन्न स्तरों पर सदस्यों द्वारा प्रतिनिधियों का चयन किया जाता है और अंतिम यही प्रतिनिधि अध्यक्ष का चुनाव करते हैं।


प्राथमिक सहकारी समितियों के चुनाव सबसे पहले प्राथमिक कृषि साख सहकारी समितियों  के सदस्यों का चुनाव होता है। ये समितियां ग्रामीण स्तर पर किसानों और अन्य लोगों को ऋण और अन्य सहकारी सेवाएं प्रदान करती हैं।


जिला सहकारी बैंक के निदेशक मंडल का चुनाव प्राथमिक सहकारी समितियों से चुने गए प्रतिनिधि, जिला सहकारी केंद्रीय बैंकों के निदेशक मंडल के सदस्यों का चुनाव करते हैं। ये निदेशक मंडल ही बैंक के संचालन और नीतियों के निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव अंत में, जिला सहकारी बैंक के निर्वाचित निदेशक मंडल के सदस्य ही मिलकर अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चुनाव करते हैं। कई बार यह चुनाव निर्विरोध भी हो जाता है, खासकर यदि किसी एक दल का बहुमत स्पष्ट हो। अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार को संबंधित सहकारी बैंक या प्राथमिक सहकारी समिति का सदस्य होना चाहिए। कुछ विशिष्ट अयोग्यताएं भी होती हैं, जैसे कि यदि उम्मीदवार किसी अन्य सहकारी संस्था का चूककर्ता /डिफॉल्टर  हो, या उस पर किसी प्रकार का वित्तीय दुर्विनियोग का आरोप हो। 


नामांकन पत्र दाखिल करते समय प्रस्तावक और अनुमोदक का होना आवश्यक होता है, जो उसी निर्वाचन क्षेत्र से संबंधित होते हैं। नियमानुसार अनुसूचित जाति/जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं के लिए कुछ सीटें आरक्षित हो सकती हैं।


जिला सहकारी बैंकों का ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये बैंक किसानों, छोटे व्यापारियों और स्थानीय समुदायों को वित्तीय सहायता प्रदान करते हैं। इसलिए, इनके अध्यक्ष का चुनाव काफी महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि अध्यक्ष की भूमिका बैंक के समग्र विकास, वित्तीय सुदृढ़ता और सदस्यों के हितों की रक्षा में अहम होती है।


छिंदवाड़ा के और मंत्री थे रेवनाथ चौरे। वह सौंसर तहसील के रहने वाले थे। साथ ही छिंदवाड़ा जिले के प्रभारी मंत्री थे।जिस दिन चुनाव होना थे उस रात लगभग एक बजे मुझे कलेक्टर का सन्देश आया कि मंत्री जी सर्किट हाऊस में बुला रहे है। जब मैं सर्किट हाऊस पहुंचा वहां मैंने देखा कि मंत्री जी अन्दर खाना खा रहे है। कलेक्टर तथा पुलिस एस पी बाहर लॉन में घूम रहे है। मुझे ले कर कलेक्टर एक कोने में गए। 


मेरे हाथ में एक सूची दी और बोले कि यदि यह लोग कल जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन भरे तो निरस्त कर देना। मैं उनकी बात सुनकर चौंक गया। मैंने कहा यह जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद का चुनाव है। मैं बिना किसी गलती के नामांकन कैसे निरस्त कर सकता हूँ। वह बहुत देर तक समझाते रहे। 


जब में नहीं माना तो मुझे ले कर अन्दर मंत्री जी के पास ले कर गए। मंत्री जी से बोले यह बात नहीं मान रहा है। मैंने अपनी बात दुहरा दी। मंत्री जी बोले यदि कोई गलती ना भी हो तो तुम नामांकन पेपर पर स्याही गिरा देना और फिर निरस्त कर देना। मैं अपनी बात पर अड़ा रहा। मैंने साफ शब्दों में कहा मुझे चुनाव प्रभारी पद से हटा ले। नियम अनुसार कलेक्टर को ही बैठक की अध्यक्षता करना चाहिए। यदि कलेक्टर मंत्री जी की बात से सहमत है तो वह स्वयं यह कर सकते है। नहीं तो किसी दूसरे डिप्टी कलेक्टर को नियुक्त कर दे। 


आखिरकार रात दो बजे मुझे हटा कर एक दुबे जी डिप्टी कलेक्टर को प्रभारी बनाया गया। उन्होंने उन दोनों के मुताबिक चुनाव करवा दिया। कुछ महीनों बाद दुबे जी रिटायर हो गए। वह जबलपुर के रहने वाले थे। एक बार में उच्च न्यायालय के काम से जबलपुर गया। दुबे जी एक बेंच पर बैठे दिखे। मैं उनके पास गया। नमस्ते की। पूछा क्या हाल है। वह बोले जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन निरस्त करने के प्रकरण में मुझे व्यक्तिगत पक्षकार बनाया है उसी पाप की सजा भुगत रहा हूँ। 


मैं पांच साल नगर पालिका प्रशासक छिंदवाड़ा के पद पर रहा। एक साल बाद चालीस किलोमीटर दूर अमरबाड़ा में एस डी एम के पद पर पोस्टिंग कर दी। लेकिन छिंदवाड़ा की जनता ने मुझे प्रशासक पद से हटाने को ले कर हड़ताल कर दी तब कलेक्टर ने मुझे प्रशासक छिंदवाड़ा और एस डी एम अमरबाड़ा बनाया। इस सब डिवीज़न में उस समय छिंदवाड़ा जिले के अमरवाड़ा, हर्रई और चौरई तहसीलें आती थी। यह तीनों महत्वपूर्ण क्षेत्र थे जो अपनी भौगोलिक स्थिति, आदिवासी संस्कृति और कुछ विकास चुनौतियों के लिए जाने जाते थे। 


अमरवाड़ा छिंदवाड़ा जिले के उत्तर-पूर्व में स्थित है। यह क्षेत्र सघन आदिवासी आबादी वाला और काफी हद तक पथरीला भूभाग है। अमरवाड़ा एक नगर पालिका परिषद थी और एक विधानसभा क्षेत्र भी था ।अमरवाड़ा और हर्रई के इलाके अक्सर पानी की समस्या से जूझते हैं, खासकर गर्मियों में। इसका एक कारण पथरीली चट्टान और तालाबों का कम निर्माण बताया जाता है। 


अमरवाड़ा के औद्योगिक हब बनाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे थे। यह क्षेत्र राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण था।  हर्रई में छिंदवाड़ा जिले का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो अमरवाड़ा के पास स्थित है। यह भी आदिवासी बहुल और पथरीला इलाका था   कुछ स्रोतों में हर्रई में एक किले का उल्लेख भी मिलता है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है। चौरई छिंदवाड़ा जिले में स्थित एक नगर है। राष्ट्रीय राजमार्ग 347 यहां से होकर गुजरता है। चौरई से छिंदवाड़ा, अमरवाड़ा और सिवनी की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। एक विधानसभा क्षेत्र भी है। 


बिछुआ और चांद तहसीलें भी चौरई विधानसभा क्षेत्र में शामिल हैं।  ये तीनों ही क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले के आदिवासी बहुल इलाकों में आते हैं, जहां गोंड और अन्य आदिवासी समुदाय निवास करते हैं। मुख्य रूप से कृषि पर निर्भरता है, जिसमें मक्का, चावल और अन्य स्थानीय फसलें उगाई जाती थी । पथरीले इलाकों के कारण भूजल स्तर में कमी और पेयजल संकट एक सामान्य समस्या थी। 


उस समय यह क्षेत्र छिंदवाड़ा जिले के सबसे गरीब इलाके थे। अमरवाड़ा तहसील कार्यालय एक छोटी से पहाड़ी पर था। एस डी एम तथा तहसीलदार के घर ऊपर ही बने थे। एक जैन साहब मेरे तहसीलदार थे। बहुत बुजुर्ग, अनुभवी तथा काम बोलने बाले थे। उस समय वहां नॉन बैंकिंग ट्रैजरी थी। नगद रुपया तहसील के स्ट्रॉन्ग रूम में रखा जाता था। प्रीतिदिन डोनोमिनेशन बार नोटों की गिनती कर रखते थे। तहसीलदार उसके प्रभारी थे। 


साल में दो बार एस डी एम को फिज़िकल निरीक्षण करना होता था। जब मेरी टीम ने निरीक्षण किया तो डॉबल लॉक में चालीस लाख रुपया कम था। अकउंटेंट से पूछने पर उसने वह रसीद मुझे दिखा कर बताया कि रुपया तहसीलदार को फसल नुकसानी का मब्जा किसानों को बांटने के लिए नगद दिया है। 


मैंने जब उस रसीद को देखा तो वह किसी पेज का फटा टुकड़ा था। अधिकारी कई बार जब किसी कागज पर हस्ताक्षर करते है तो आधा पेज टाइप का होता है तथा बाबू सील बहुत नीचे लगते है। बीच में कुछ हिस्सा खाली होता है। यह रसीद इसी तरह का पेज फाड़ कर बनाई थी। आलस और विश्वास के कारण तहसीलदार रोज डबल लॉक में नोटों की गड्डियों की गिनती नहीं करते। कई-कई दिनों तक कैश बुक पर हस्ताक्षर नहीं करते थे। इसी का फायदा अकाउंटेंट ने उठाया था। तहसीलदार ने बताया कि अभी बहुत महीनों से कोई मब्जा नहीं बाटना था। उन्होंने नकद रुपया नहीं लिया। 


अकसर चालक बाबू उस समय अधिकारी को फायल हस्ताक्षर के लिये लाते है जब या तो वह किसी और उलझन में फसें हो या गाड़ी में बैठकर कहीं जाने बाले हो। तब अधिकारी बिना पढ़े हस्ताक्षर कर देता है और फंस जाता है। यह नहीं करना चाहिए। किसी पर भरोसा नहीं। सब को शक से दिखों। पढ़ कर  हस्ताक्षर करो। यदि कोई अनायास अधिक झुक कर नमस्ते करे, तारीफ करे या मुफ्त का सामान दे समझो यह ट्रैप है। मछली को पकड़ने का कांटा है। मानव स्वाभाव को समझो। मुफ्त में कुछ नहीं मिलता है। हमेशा शतर्क रहना चाहिए। 


इस तरह की घटना की तत्काल रिपोर्ट करना आवश्यक होता है। मैंने कलेक्टर को रिपोर्ट भेज कर पुलिस बुला ली। पुलिस की पूछताछ में अकाउंटेंट ने बताया अकाउंटेंट था वह जुए में बहुत सारा पैसा हार गया था। उसने एक कागज जिस पर नीचे तहसीलदार के दस्खत के डबल लॉक में रखा था। जिस पर चालीस लाख रुपया नगद तहसीलदार को देने की रसीद थी। 


अकाउंटेंट के घर से दस लाख नकद बरामद हुआ। पांच लाख उधारी चुका दिया था। उससे बरामद हुआ। पांच लाख घर में सामान लाने में खर्च किया था। वह पैसा तहसीलदार ने जमा किया तब पुलिस प्रकरण नहीं बना। तहसीलदार सस्पेंड होने से बच गए। वह रिटायर होने वाले थे। यदि सस्पेंड हो जाते तो पेंशन रुक जाती। 


मेरा ऑफिस पहाड़ी के किनारे था। मेरी खड़की से नीचे की सड़क दिखती थी। रोज मैं देखता वकील नीचे से ऊपर ऑफिस में मोटी-मोटी कानून की किताबें अपने किलायंट के सिर पर लदवा कर ऊपर लाते। जब में कोर्ट में बहस सुनता तब कभी-कभी किताब खोल कर कोई पूर्व का फैसला रिफरेन्स की लिए दिखाते। कभी-कभी बस्ता लाते और उसी व्यक्ति के सिर पर लदवा कर वापस ले जाते। 


एक वकील साहब थे नेमा जी। मेरी उनसे बातचीत होती थी। एक दिन मैंने पूछा कि आप लोग जब जरुरत नहीं होती तो इतनी किताबें क्यों लदवा कर लाते है। उन्होंने मुझे वकालात का बिजनिस सीक्रेट बताते हुई राज की बात बताई कि यहां लोग पढ़े लिखे नहीं है तो यहां के वकील उनकी फ़ीस किताबों की संख्या के आधार पर निश्चित करते है। 


जब कोई केस लेकर वकील के पास आता वह कहते कितनी किताबों की वकालत लगवानी है- दो की, तीन की या चार से अधिक किताबों की। व्यक्ति अपनी हैसियत से किताबों की संख्या बताते और वकील फीस। इसलिए हम लोग उतनी किताबें लदवा कर लाते है। यदि किताबें लाद कर व्यक्ति पहाड़ी नहीं चढ़े तो उसे सन्तोष नहीं होगा और वकील को फीस नहीं मिलेगी। ऐसी अनोखी व्यवस्था मुझे और कहीं देखने को नहीं मिली। 


उन दिनों हर्रई का क्षेत्र इतना गरीब था कि सरकारी कर्मचारी रिश्वत में जानवर लेते थे। इस दिनों में लगातार पांच दिन टूर करता। ऐसे-ऐसे दूरदराज के गांवों में जाता जहां सड़के नहीं थी। जंगल के कच्चे रास्ते थे। सार्वजनिक वितरण प्रणाली का सामान कोऑपरेटिव और प्राइवेट दुकानों में भेजने का ठेका मिस्टर बत्रा का था। वह जिला बीस सूत्रीय समिति के सदस्य भी थे। 


उनके ट्रक जब फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के छिंदवाड़ा गोदाम से शक्कर, गेहूं और चावल भरते तो कुछ ट्रैक तो हर्रई जाते और कुछ का सामान छिंदवाड़ा में ही व्यापारियों को कालाबाजारी में बेच देते थे। जब मैं दुकान की जांच करता तो अधिकांश जगह दुकानें नौकर चला रहे होते थे। जिनके नाम दुकाने आबंटित थी वह कभी नहीं मिलते। मिस्टर बत्रा ना जाने क्यों इस बात की शिकायत हर जिला बीस सूत्रीय समिति की बैठक में खुद करते। 


मैंने बहुत दिनों तक जांच की तब पता चला की गरीब आदिवासियों के नाम पूरी तहसील की प्राइवेट दुकानें आवंटित है लेकिन वह सभी दुकानदार वास्तव में मिस्टर बत्रा के नौकर थे। इस तरह उन्होंने पूरी सप्लाई चैन हाईजैक की हुई थी। दुकानें मिस्टर बत्रा के नौकरों के नाम, परिवहन का ठेका मिस्टर बत्रा का, ट्रक मिस्टर बत्रा के और शिकायत कर्त्ता मिस्टर बत्रा। उन्हें उम्मीद नहीं थी कि कोई इतने दुर्गम क्षेत्रों में जा कर इतनी गहराई से जांच करेगा। उस समय वहां के विधायक भी आदिवासी समुदाय से थे। उनका चुनाव का फंडिंग भी मिस्टर बत्रा करते। 


मजा तो तब आया जब विधायक जी और मिस्टर बत्रा एस डी एम की गाड़ी से हर जिला बीस सूत्रीय समिति की बैठक में भाग लेने जाते। रास्ते में आते जाते सब को नाश्ता एस डी एम करवाते। एस डी एम गाड़ी में पीछे बैठते विधायक जी आगे। जिला बीस सूत्रीय समिति की बैठक में शिकायत एस डी एम की। कलेक्टर से डांट खाते एस डी एम। यह सिलसिला मेरी पोस्टिंग से पहले से चल रहा था। मैंने सबसे पहले उन सब को अमरवाड़ा से छिंदवाड़ा अपनी गाड़ी से ले जाना बंद किया। फिर जांच कर सब के विरुद्ध अत्यावश्यक वस्तु अधिनियम में पुलिस केस दर्ज करवाया। सब निजी दुकानें निरस्त की तथा परिवहन का ठेका समाप्त किया।


अब यह पूरी लॉबी मेरी शिकायत करने लगे। मैं एक दिन विधायक जी से समय ले कर रेस्ट हाउस में उनसे मिला। विधायक जी पहले पटवारी  थे पटवारी पद से रिजाइन कर विधायक बने थे। मिस्टर बत्रा कालाबाजारी कर जो कमाते उसका बहुत छोटा हिस्सा नहीं मिलता था। वह मेरी बात समझ गये कि वह छोटे से लालच में अपने वोटर और अपने समुदाय के लोगों का अहित कर रहे है। वह बहुत संवेदनशील व्यक्ति थे। उन्होंने मेरी शिकायत करना बंद कर दी। 


अमरवाड़ा विधायक जी का नियम था कि वह अपने क्षेत्र के बच्चों के जन्म दिवस पर जाते और उन्हें उपहार देते थे। क्षेत्र की जनता से जुड़ने का उनका यह तरीका अनोखा था। यदि आप किसी को प्रभावित करना चाहते हो तो उसके बच्चे से प्यार करो तो बच्चे की माँ प्रशन्न होगी। यदि महिला खुश है तो वह अपने पति को खुश होने के लिए मना लेगी। फार्मूला बिलकुल सीधा था। 


मर्सी मैथ्यू, जिन्हें 'दया बाई' के नाम से जाना जाता, केरल की एक प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता हैं जिन्होंने अपना जीवन मध्य भारत के आदिवासियों, विशेषकर मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले  में रहने वाले गोंड समुदाय के उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।


वह छिंदवाड़ा जिले के बरुल गांव में रहती हैं। उन्होंने इस क्षेत्र में स्कूलों और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं को लाने के लिए संघर्ष किया है और अभियान चलाए हैं। वह गरीबी उन्मूलन के लिए स्वयं सहायता समूहों की स्थापना से भी जुड़ी रही हैं।


दया बाई ने सामाजिक न्याय के लिए अपनी लड़ाई में कई आंदोलनों में भाग लिया है, जिनमें नर्मदा बचाओ आंदोलन भी शामिल रही। उन्होंने बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल के निवासियों और ग्रामीणों का प्रतिनिधित्व करते हुए कई एकल संघर्ष भी किए । उन्होंने 1971 के युद्ध के दौरान बांग्लादेशी शरणार्थियों की सेवा भी की। उन्हें 2007 में वनिता वुमन ऑफ द ईयर अवार्ड और जनवरी 2012 में गुड समैरिटन नेशनल अवार्ड सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।


उनका काम मुख्य रूप से सामाजिक सक्रियता और आदिवासी समुदायों के कल्याण पर केंद्रित रहा। वह मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के अमरवाड़ा क्षेत्र में आदिवासियों के अधिकारों और कल्याण के लिए लगातार काम करती रही हैं।जब में छिंदवाड़ा तथा अमरवाड़ा में पदस्थ था वह अक्सर मुझसे मिलाने आती थी। मैंने उनसे सीखा कि यदि किसी समुदाय में विश्वास पाना हो तो उनके साथ उन जैसे ही रहना होगा। तभी उनकी समस्याओं को अनुभव कर सकते हो। 


मेरे कमिश्नर थे दुबे जी। वह जबलपुर से टूर पर छिदवाड़ा आते। एक दिन उन्होंने पूछा कि करामात शाह बाबा को जानते हो। मैंने ऐसे किसी बाबा का नाम नहीं सुना था। उन्होंने उनसे मिलने का कहा। मेरा भरोसा बाबा लोगों में बिलकुल भी नहीं है।  मैं मिलने नहीं गया। जब वह दुबारा जबलपुर से टूर पर छिदवाड़ा आये तो उन्होंने फिर पूछा। मैंने बहाना बनाया कि काम की व्यस्तता के कारण नहीं जा सका। जल्दी मिल लूंगा। 


वह फिर जबलपुर से टूर पर छिदवाड़ा आने वाले थे मैंने अपने स्टाफ से पूछा उन्होंने बताया कि मोहखेड़ में एक करामात शाह बाबा रहते है। गर्मियों के दिन थे। मैंने बाबा को परवरी से मिलने की खबर भेजी। ऐसे लोग शासकीय अधिकारियों से अच्छे से मिलते है. हम मिलने गए। बाबा का बहुत बड़ा अहाता बना था। वह एक बहुत बड़े कमरे में टीवी पर वीसीआर पर कलर फिल्म देख रहे थे। मिडिल ईस्ट के देशों में उनके बड़े भक्त थे उन्होंने बताया कि यह कालीन टीवी वीसीआर सब उन्हीं लोगों ने भेट में दिए है।उन दिनों यह लेटैस्ट उपकरण थे। बहुत महगें इम्पोर्टेड होते थे।  


बाबा लोगों की समस्या के समाधान बताते थे। उन्हें लगा कि मैं कोई समाधान पूछने आया हूँ। उन्होंने मुझसे पूछा कि आप की क्या समस्या है बताइए। मैंने कहा मेरी कोई समस्या नहीं है में तो श्रद्धा वश केवल मिलने आया हूँ। बाबा के पास लोग तभी जाते है जब उन्हें कोई समस्या का समाधान चाहिए होता है।  


जब मैंने उनसे कहा आप अन्तर्यामी है सब जानते है आप ही बता दे। बोले कि देखो एक सिलेट रखी है और चाक रखी है जब तक कोई हाथ लिखेगा नहीं अक्षर नहीं उभरेंगे। मैंने कोई समस्या नहीं बताई। उन्होंने पकोड़े खिलाये। चाय पिलाई। हम जाने लगे। दोनों खड़े थे। उन्होंने अपना हाथ हवा में धुमाया। एक ताजा गुलाब का फूल उनके हाथ में हवा में से आ गया। उन्होंने वह मुझे दिया। मैं वापस आ गया।  


हमारे साथ छिदवाड़ा में एक दुबे जी सुपरिंडेंट इंजीनियर बिलजी विभाग में थे। उन्हें कर्ण पिशाचनी सिद्ध थी। कर्णपिशाचिनी साधना एक गूढ़ और रहस्यमयी तांत्रिक प्रथा है, और इससे जुड़े साधक आमतौर पर सार्वजनिक रूप से अपनी पहचान या प्रथाओं का प्रचार नहीं करते हैं।कर्णपिशाचिनी साधना भारतीय तंत्र-मंत्र की एक अत्यंत गूढ़ और विवादास्पद साधना मानी जाती है। यह साधना गुप्त शक्तियों और भविष्य जानने की क्षमता प्राप्त करने से जुड़ी हुई है। "कर्ण" का अर्थ है कान, और "पिशाचिनी" का अर्थ है एक प्रकार की पिशाचनी या भूतनी। इस साधना का लक्ष्य एक ऐसी अदृश्य शक्ति या आत्मा को सिद्ध करना होता है जो साधक के कान में भविष्य की बातें या गुप्त जानकारी फुसफुसा कर बताती है।


इस साधना का मुख्य उद्देश्य भविष्य का ज्ञान प्राप्त करना और छिपी हुई बातों को जानना माना जाता है। कहा जाता है कि सिद्ध होने पर कर्ण पिशाचिनी साधक को किसी भी व्यक्ति के बारे में, उसके अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में जानकारी दे सकती है, या किसी घटना के बारे में गुप्त जानकारी प्रदान कर सकती है।

 


वह हमें कई दफे मिठाई हवा से निकाल कर देते थे। एक दिन पटेल साहब फ़ूड अफसर को एक विशेष तरह का पुखराज चाहिए था  जो बाजार में नहीं मिल रहा था। दुबे जी ने हवा में से पुखराज निकाल कर उन्हें मेरे सामने ऑफिस में दिया था। ऐसे तंत्र मंत्र, ज्योतिष, भविष्य वक्ता, कुंडली और हस्तरेखा देखने वाले शासकीय अधिकारियों तथा नेताओं में बहुत पॉपुलर होते है। 


जो जितना अनिश्चितता भरा काम करता है, अनैतिक काम करता है या अपनी योग्यता से अधिक पा जाता है वह इस सब बातों में अटूट भरोसा करता है। जब किसी कर्मचारी या अधिकारी  के विरुद्ध कोई जांच शुरू हो, सस्पेंड हो जाय, ट्रांसफर हो या रिश्वत लेते रंगें हाथों पकड़ा जाय तो वह अपनी गलती नहीं मनाता। वह शनि, राहु और केतु की ख़राब दशा मानता है। वह अपने आप को न सुधार कर ग्रहों की दशा सुधारने में लग जाता है। 


छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश में बाबा करामत अली शाह दरगाह काफी प्रसिद्ध है। यह दरगाह छिंदवाड़ा के टांसरा माल इलाके में स्थित है और इसे एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है। यह दरगाह एक पवित्र स्थान है जहाँ लोग अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए आते हैं। यहां प्रार्थना की जाती हैं और मन्नतें मांगी जाती हैं। यह स्थान शांति और आध्यात्मिक वातावरण के लिए जाना जाता है। यह छिंदवाड़ा के स्थानीय लोगों और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक महत्वपूर्ण आस्था का केंद्र है।


अनुसुइया उइके का छिंदवाड़ा से गहरा नाता है। यह उनका गृह जिला है और उन्होंने यहीं से अपनी छात्र राजनीति और राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। अनुसुइया उइके ने अर्थशास्त्र में एम.ए. और एल.एल.बी. की डिग्री हासिल की है। राजनीति में आने से पहले, उन्होंने 1982 से 1985 तक शासकीय महाविद्यालय तामिया में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। जब में छिंदवाड़ा में कार्यरत था तब अनुसुइया उइके शासकीय महाविद्यालय तामिया में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्य  कर रही थी। उस समय मेरी उनसे मुलाकात हुई। शुरुबात के दिनों में हम लोग आदिवासियों की समस्याओं पर बात करते थे। बाद में वह शासकीय महाविद्यालय तामिया के  सहायक प्राध्यापक के पद को छोड़ कर राजनिति में आ गई। वह विधयक, मंत्री, छत्तीसगढ़ और मणिपुर का राज्यपाल नियुक्त किया गया। 


मैंने एस डी एम छिंदवाड़ा का कार्यभार ग्रहण कर लिया। परिवार को अमरवाड़ा से छिंदवाड़ा शिफ्ट किया। बच्चों को स्कुल में एडमीशन करवा दिया। छिंदवाड़ा में बहुत अच्छे स्कूल थे। अब मेरे पास प्रशाशक नगर पालिका तथा एस डी एम छिंदवाड़ा का कार्यभार  था। मैं बहुत मेहनत से दोनों काम कर पा रहा था।


छिंदवाड़ा जिले में "तामिया" एक बहुत ही खूबसूरत और महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक गाँव और उसी नाम की तहसील का मुख्यालय है, जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। इसे अक्सर "मिनी पचमढ़ी" भी कहा जाता है। तामिया सतपुड़ा पर्वतमाला में स्थित है और घने जंगलों, गहरी घाटियों और पहाड़ों के लुभावने दृश्यों के लिए प्रसिद्ध है। यहां से सूर्योदय और सूर्यास्त के नज़ारे बेहद मनमोहक होते हैं। मानसून के दौरान इसकी सुंदरता और भी बढ़ जाती है, जब झरने पूरी तरह से बहते हैं और पूरा इलाका बादलों से ढका रहता है।


तामिया के पास पातालकोट घाटी एक प्रमुख आकर्षण है। यह घोड़े की नाल के आकार की एक अनोखी भौगोलिक संरचना है, जिसकी गहराई 1200 से 1500 फीट तक है। यह घाटी भारिया जनजाति का निवास स्थान भी है, जो अपनी विशिष्ट जीवन शैली और पारंपरिक ज्ञान के लिए जाने जाते हैं।


मुझे तामिया के इन आदिवासियों के लिए संचालित प्रोजेक्ट का कार्यभार दिया गया। भारत सरकार इन भारिया जनजाति लोगों के लिए खाना पकाने के लिए सोलर कुकर तथा पानी छानने के लिए वाटर फिलटर देना चाह रहे थे। मैंने बताया कि पातालकोट घाटी अपनी अनूठी भौगोलिक संरचना और भारिया जनजाति के निवास स्थान होने के कारण सभी लोग सुबह जल्दी उठकर खाना बना कर साथ काम पर ले जाते है।  इस घाटी में गहरा गड्ढा होने के कारण सुबह सूर्य की किरणें देर से आती है। इस कारण सोलर कुकर पर खाना बनाना इन के लिए संभव नहीं है। लेकिन भारत सरकार ने  भारिया जनजाति को मध्य प्रदेश में "विशेष पिछड़ी जनजाति" का दर्जा दिया है। इनके समग्र विकास और उत्थान के लिए विभिन्न परियोजनाएं और योजनाएं चलाई जा रही हैं। पातालकोट के भारिया जनजाति के विकास का मुख्य उद्देश्य उन्हें मुख्यधारा में लाना, उनकी पारंपरिक संस्कृति और ज्ञान का संरक्षण करना, और उन्हें बेहतर जीवन-यापन के अवसर प्रदान करना है। इसमें कई आयाम शामिल हैं:


मध्य प्रदेश सरकार ने "हैबिटेट राइट्स" (Habitat Rights) के तहत भारिया जनजाति को पातालकोट का मालिक घोषित किया है। इसका मतलब है कि जल, जंगल, ज़मीन, पहाड़ और जलाशयों सहित प्राकृतिक संपदा पर अब भारिया समुदाय का हक होगा।


यह निर्णय वन अधिकार अधिनियम  के तहत आता है, जिसका उद्देश्य आदिवासियों को उनके पारंपरिक निवास स्थान और संसाधनों पर अधिकार दिलाना है। इससे भारिया समुदाय अपनी जरूरतों के लिए वनों का समुचित दोहन कर सकेगा और पातालकोट को संरक्षित रख पाएगा।


बुनियादी सुविधाओं का विकास के तहत  स्वच्छ पेयजल: पातालकोट में स्वच्छ पेयजल की समस्या एक बड़ी चुनौती रही है। इस पर लगातार काम किया जा रहा है, हालाँकि दुर्गम भूभाग और चट्टानी संरचना के कारण यह कार्य चुनौतीपूर्ण है। भारत सरकार की ओर से सोलर कुकर तथा वाटर फ़िल्टर के कैंडिल लगी पल्सटिक बता दी गई। 


कुछ दिन बाद भारत सरकार के संयुक्त सचिव इस परियोजना की प्रगति का मूल्यांकन करने आये। जब उन्हें 1500 फीट नीचे  पैदल के बारे में पता चला तो उन्होंने नीचे  जाने से मना कर दिया। मेरे बहुत जोर देने पर वह पैदल चल कर जब नीचे पहुंचे तब उन्हें बहुत भूख लगा गई। आदिवासियों ने उन्हें सेम फली के बीज ऊबाल कर कहने को दिए। जब उन्होंने महिलाओं से सोलर कुकर दिखाने को कहा तो महिलाऐं अपना-अपना बक्सा ले आई। उन्होंने उसके अन्दर के डब्बों में मसाले रख लिए थे। सोलर पेटी में अपना शृंगार का सामान खा था। और उसके शीशे को मुंह देखने के काम ला रही थी। वाटर फ़िल्टर के केंडिल निकाल कर फेंक दिए थे तथा प्लास्टिक की बाल्टी में डामर लगा कर पानी भर रहे थे। दिल्ली से बनाई विकास योजना की प्रगति उनके सामने थी। अब वह समझ गए थे कि आदिवासियों को सोलर कुकर की जगह सामान रखने का बक्सा तथा पानी भरने के लिए बाल्टी ज्यादा जरूरी थी। 


छिंदवाड़ा के पास एक गांव है लिंगा। लिंगा गांव छिंदवाड़ा नागपुर हाईवे पर है। वहां एक तान्त्रिक ज्योतिषी थे जान राव भाऊ। एक दिन ऑफिस आये। बोले उन्होंने अभी तक सभी एस डी एम को पहने की लिए रत्न जड़ित अंगूठी ग्रह शांति के लिए पहनाई है। वह एक अंगूठी मेरे लिए लाये। यह पुखराज की अंगूठी थी। उन्होंने बताया कि पुखराज रत्न मुख्य रूप से गुरु ग्रह बृहस्पति से संबंधित होता है। ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को ज्ञान, बुद्धि, धन, विवाह, संतान, शिक्षा, मान-सम्मान और आध्यात्मिकता का कारक ग्रह माना जाता है।


पुखराज धारण करने के ज्योतिषीय लाभ यह है कि गुरु ग्रह को मजबूत करता है: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु ग्रह कमजोर या पीड़ित हो, तो पुखराज धारण करने से उसे बल मिलता है और गुरु के शुभ प्रभाव प्राप्त होते हैं। शिक्षा और ज्ञान में वृद्धि: यह छात्रों, शिक्षकों और ज्ञान के क्षेत्र से जुड़े लोगों के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है। यह एकाग्रता और स्मरण शक्ति को बढ़ाता है। 


आर्थिक समृद्धि लाता है। पुखराज धन आगमन के नए मार्ग खोलता है, व्यापार में लाभ मिलता है और आर्थिक समस्याओं से निजात दिलाने में सहायक होता है। वैवाहिक सुख: विवाह में आ रही बाधाओं को दूर करने और वैवाहिक जीवन में खुशहाली लाने के लिए इसे शुभ माना जाता है। संतान सुख: जिन दंपतियों को संतान प्राप्ति में कठिनाई आ रही हो, उनके लिए भी पुखराज लाभकारी हो सकता है।


मान-सम्मान और प्रतिष्ठा में वृद्धि कर यह व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और प्रतिष्ठा दिलाता है। मानसिक शांति और सकारात्मकता पता है।  यह तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को कम करने में मदद करता है और मन को शांति प्रदान करता है। आध्यात्मिक विकास में सहायक है।  गुरु धर्म और आध्यात्मिकता का ग्रह है, इसलिए पुखराज पहनने से आध्यात्मिक प्रवृत्ति बढ़ती है।


किन राशियों और लग्न वालों के लिए लाभकारी काफी है। मुख्य रूप से धनु और मीन राशि के जातकों के लिए पुखराज बहुत शुभ माना जाता है, क्योंकि इन राशियों के स्वामी स्वयं बृहस्पति हैं। इसके अलावा, कुछ विशेष ज्योतिषीय स्थितियों में अन्य राशियों या लग्न वाले लोग भी ज्योतिषी की सलाह पर इसे धारण कर सकते हैं।


उन्होंने पुखराज धारण करने के नियम बताये।  गुरुवार का दिन पुखराज धारण करने के लिए सबसे शुभ होता है। इसे सोने या पंचधातु में धारण करना चाहिए।


पुरुषों को दाएं हाथ की तर्जनी इंडेक्स फिंगर में और महिलाएं किसी भी हाथ की तर्जनी उंगली में पहन सकती हैं। धारण करने से पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध में डुबोकर शुद्ध करना चाहिए। मंत्र जाप, "ॐ बृं बृहस्पतये नमः" मंत्र का 108 बार जाप करने के बाद इसे धारण करना शुभ माना जाता है।


उन्होंने बताया कि ज्योतिषी की सलाह बहुत महत्वपूर्ण है। किसी भी रत्न को धारण करने से पहले हमेशा एक योग्य ज्योतिषी से सलाह लेना अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुंडली में ग्रहों की स्थिति के अनुसार ही रत्न का चुनाव करना चाहिए। बिना उचित मार्गदर्शन के रत्न पहनना हानिकारक हो सकता है।


मैंने बहुत मन किया लेकिन वह अंगूठी पहना दिए। तीन दिन मैंने वह अंगूठी धारण की। हमेशा उसी पर ध्यान रहने लगा। हमेशा कोई ना कोई समस्या याद आने लगी। प्रशासन में समस्याओं की कमी नहीं होती। तीसरे दिन बाद वह फिर मेरे ऑफिस आये। मैंने उन्हें बताया कि इस अंगूठी के कारण मन बहुत चिंता ग्रस्त रहने लगा है।  मैं इसे नहीं पहन सकता। मैंने वह अंगूठी उन्हें वापिस कर दी। उन्होंने एक नवग्रह की अंगूठी निकाली और वह पहनने दी। भाऊ कहने लगे "नवग्रह" शब्द "नौ ग्रह" से बना है और ज्योतिष शास्त्र में इन नौ ग्रहों का व्यक्ति के जीवन पर गहरा प्रभाव माना जाता है। नवग्रह रत्न अंगूठी इन्हीं नौ ग्रहों के शुभ प्रभावों को आकर्षित करने और उनके अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए पहनी जाती है। यह अंगूठी विशेष रूप से इन नौ रत्नों से बनी होती है, जिनमें प्रत्येक रत्न एक विशिष्ट ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है:


सूर्य: माणिक्य (Ruby)


चंद्रमा: मोती (Pearl)


मंगल: मूंगा (Red Coral)


बुध: पन्ना (Emerald)


बृहस्पति (गुरु): पुखराज (Yellow Sapphire)


शुक्र: हीरा (Diamond)


शनि: नीलम (Blue Sapphire)


राहु: गोमेद (Hessonite Garnet)


केतु: लहसुनिया (Cat's Eye)


नवग्रह अंगूठी के ज्योतिषीय लाभ भाऊ ने बताया कि नवग्रह अंगूठी धारण करने के कई ज्योतिषीय लाभ बताए गए हैं, क्योंकि यह सभी नौ ग्रहों को एक साथ प्रभावित करती है:


समग्र ग्रह शांति: माना जाता है कि यह अंगूठी व्यक्ति की कुंडली में मौजूद सभी नौ ग्रहों के नकारात्मक प्रभावों को शांत करती है और उनके सकारात्मक प्रभावों को बढ़ाती है।


सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि: इसे पहनने से शरीर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे साहस, उत्साह और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है।


आर्थिक समृद्धि: यह धन लाभ के मार्ग खुलता है, व्यापार में वृद्धि करती है और आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने में सहायक होती है।


वैवाहिक सुख और संबंधों में मधुरता: वैवाहिक जीवन में सामंजस्य और प्रेम बढ़ाने में यह अंगूठी लाभकारी मानी जाती है।


स्वास्थ्य लाभ: ग्रहों के अशुभ प्रभाव से होने वाली स्वास्थ्य समस्याओं से राहत दिलाने में भी यह सहायक हो सकती है। प्रत्येक रत्न का अपना एक विशिष्ट चिकित्सा गुण भी होता है।


मानसिक शांति: यह तनाव, चिंता और नकारात्मक विचारों को दूर कर मानसिक शांति और स्थिरता प्रदान करती है।


सौभाग्य और सफलता: जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सौभाग्य और सफलता प्राप्त करने में यह सहायक मानी जाती है।


वास्तु दोष निवारण: कुछ मान्यताओं के अनुसार, यह वास्तु दोषों को दूर करने में भी मदद करती है।


किन लोगों के लिए लाभकारी?

नवग्रह अंगूठी उन लोगों के लिए विशेष रूप से लाभकारी हो सकती है जिनकी कुंडली में एक से अधिक ग्रह कमजोर या पीड़ित हों, या जिन्हें सभी ग्रहों का संतुलित आशीर्वाद चाहिए हो। राजनीति, कला और व्यावसायिक क्षेत्र से जुड़े लोग भी इसे धारण करने से लाभ प्राप्त कर सकते हैं।


धारण करने के नियम और महत्वपूर्ण बातें

नवग्रह अंगूठी धारण करते समय कुछ महत्वपूर्ण बातों का ध्यान रखना चाहिए:


धातु: यह आमतौर पर सोने या पंचधातु में पहनी जाती है।


शुद्धिकरण: धारण करने से पहले इसे गंगाजल या कच्चे दूध से शुद्ध करना चाहिए।


ज्योतिषी की सलाह: सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी रत्न या नवग्रह अंगूठी को धारण करने से पहले एक योग्य ज्योतिषी से परामर्श अवश्य लें। ज्योतिषी आपकी कुंडली का विश्लेषण कर यह बता सकते हैं कि नवग्रह अंगूठी आपके लिए कितनी लाभकारी होगा और इसे किस विधि से धारण करना चाहिए। गलत रत्न या गलत विधि से धारण करने से लाभ के बजाय नुकसान भी हो सकता है।


रत्नों का वजन: रत्न शास्त्र के अनुसार, नवग्रह अंगूठी में सभी नौ रत्न समान वजन के होने चाहिए, ताकि सभी ग्रहों का संतुलन बना रहे।


संक्षेप में, नवग्रह अंगूठी को ग्रहों के अशुभ प्रभावों को कम करने और जीवन में सकारात्मकता, समृद्धि और शांति लाने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है, लेकिन इसे हमेशा उचित मार्गदर्शन और विधि-विधान के साथ ही धारण करना चाहिए।


मैं भाऊ की बातों से प्रभावित हो कर वह अंगूठी धारण कर ली। लेकिन एक सप्ताह ही वह पहन पाया। मुझे बहुत असुविधा लगाने लगी। ध्यान हमेशा अंगुली पर रहता। मुझे अच्छा नहीं लगता। मैंने वह अंगूठी भी वापिस कर दी। उस के बाद आज तक कभी कोई अंगूठी पहने की आवश्यकता नहीं हुई। मैं इस विषय में बहुत ज्यादा नहीं जनता। मेरा कोई निजी अनुभव नहीं है। 


मोतीलाल वोरा मध्य प्रदेश के एक प्रमुख राजनेता थे, जिन्होंने दो बार राज्य के मुख्यमंत्री का पद संभाला। उनका राजनीतिक जीवन काफी लंबा और प्रभावशाली रहा।उनका पहला कार्यकाल13 मार्च 1985 से 13 फरवरी 1988 तक था और दूसरा कार्यकाल 25 जनवरी 1989 से 9 दिसंबर 1989 तक रहा। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान में छिन्दवाड़ा में संयुक्त कलेक्टर था तथा एस डी एम तथा प्रशासक नगर पालिका छिन्दवाड़ा के पद पर काम कर रहा था।


एक दिन मुख्यमंत्री के सचिव दुबे जी का फोन आया। उन्होंने मुझे भोपाल बुलाया। मुख्यमंत्री जी मुझसे मिलना चाहते थे। मैं बहुत डर गया। पर मैंने कोई गलती नहीं की थी। मेरी कोई शिकायत भी नहीं थी। मैं कलेक्टर से अनुमति लेकर भोपाल आया। वहां जब में मुख्यमंत्री जी से मिला तो उन्होंने पूछा कि में कौन सा ब्राह्मण हूँ। मैंने बताया कि में जिझौतिया ब्राह्मण हूँ। उन्होंने मेरा गोत्र पूछा मैंने अपना गोत्र कश्यप बताया। उन्होंने कहा मैं दुबे जी से बात कर काम समझ लू। 


जब उन्होंने मेरा कुल गोत्र पूछा तो मुझे लगा कि शायद मेरी शादी की बात हो। मैंने दुबे जी को बताया कि मेरी शादी बहुत पहले हो चुकी है और मेरे दो बच्चे भी है। तब दुबे जी ने बताया कि हम लोगों को मुख्य मंत्री कार्यालय में एक अंडर सेक्रेट्री की आवश्यकता है और मुख्य मंत्री जी को केवल ब्राम्हण कैंडिडेट चाहिए। सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा दस नाम भेजे गए थे। उसमें से मेरा नाम सेलेक्ट हुआ था। जब दुबे जी मुझे काम समझा रहे थे तभी वहां सीधी की विधायक जगबा देवी आयी। उन्होंने देशी अंदाज में दुबे जी को गालियां दी। काम बताया। दुबे जी का लंच उनके बॉक्स से खा कर चली गई। मैं उन्हें विधायक से डील करते देख रहा था। लेकिन जब तक मेरा ट्रांसफर आदेश निकलता मुख्य मंत्री जी ने अपना पद छोड़ दिया। मैं भोपाल जाने से बच गया। 


इन दिनों भारतीय जनता पार्टी बहुत छोटा राजनैतिक दाल था। धीरे-धीरे उसके सदस्य बाद रहे थे। छिंदवाड़ा कांग्रेस का गढ़ पाना जाता था। सभी विधायक तथा सांसद कांग्रेस के थे। भारतीय जनता पार्टी के नेता थे प्रतुल चन्द द्विवेदी। उनका अपना काम करने का अनोखा तरीका था। वह केवल एक रुपया साल का चन्दा लेते थे। होली के दिन बहुत बड़ा अखिल भारतीय कवि सम्मेलन करवाते थे। नगर पालिका प्रशासक होने के नाते में उन की बहुत मदद करता था।  


मेरे घर पर हर रविवार हमारे साथी अधिकारी आते थे। हम लोग तीन पत्ती ताश खेलते थे। चाय नाश्ता होता। हालांकि अधिकारियों को शराब, सिगरेट तथा नॉनवेज खाना फ्री उपलब्ध थे। पर मेरी कभी इस चीजों में रूचि नहीं थी। इसलिए हमारे घर में यह नहीं चलता था। सादा खेल और खाना पीना था। उन दिनों भोपाल में देवी शरण, हीरा लाल त्रिवेदी, कवीन्द्र कियावत और बहुत सारे लोग राज्य प्रशासनिक सेवा संघ बना रहे थे। राज्य प्रशासनिक सेवा संघ भोपाल  का इतिहास सीधे तौर पर मध्य प्रदेश राज्य के गठन और राज्य प्रशासनिक सेवा के विकास से जुड़ा हुआ है।


मध्य प्रदेश राज्य का गठन 1 नवंबर 1956 को हुआ था। इस नए राज्य के गठन के साथ, विभिन्न घटक राज्यों (जैसे मध्य भारत, विंध्य प्रदेश, भोपाल राज्य और महाकौशल क्षेत्र) के प्रशासनिक अधिकारियों का एकीकरण हुआ। इन अधिकारियों के हितों की रक्षा, उनकी समस्याओं का निराकरण और उनकी सेवा शर्तों में सुधार के लिए एक संगठित मंच की आवश्यकता महसूस की गई। इसकी आवश्यकता को पूरा करने के लिए राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल का गठन किया गया।


हालांकि, संघ की स्थापना की सटीक तिथि या वर्ष सार्वजनिक रूप से व्यापक रूप से उपलब्ध नहीं है, यह स्पष्ट है कि उसका जन्म मध्य प्रदेश राज्य के पुनर्गठन और राज्य प्रशासनिक सेवा के ढांचे के साथ ही हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य राज्य प्रशासनिक सेवा (जो आमतौर पर डिप्टी कलेक्टर, संयुक्त कलेक्टर, अपर कलेक्टर जैसे पदों पर कार्यरत होते हैं) के अधिकारियों के हितों का प्रतिनिधित्व करना और सरकार के समक्ष उनकी मांगों को प्रस्तुत कर रहा है।


राज्य प्रशासनिक सेवा संघ, भोपाल, अपने गठन के बाद से ही निम्नलिखित प्रमुख उद्देश्यों को लेकर कार्य करता रहा है-


अधिकारियों के हितों की रक्षा, राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की सेवा शर्तों, पदोन्नति, वेतनमान, कार्यभार और अन्य संबंधित मुद्दों पर सरकार के साथ संवाद स्थापित करना।


समस्याओं का निराकरण, अधिकारियों को कार्यस्थल पर आने वाली समस्याओं को हल करने में मदद करना और उनके लिए बेहतर कामकाजी माहौल सुनिश्चित करना।


पदोन्नति और कैरियर विकास: भारतीय प्रशासनिक सेवा  में पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाना और राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों के कैरियर विकास के लिए नीतियां बनाने में योगदान देना। प्रशासनिक सुधारों में भागीदारी, राज्य के प्रशासनिक ढांचे और नीतियों में सुधार के लिए अपने सुझाव देना। सामुदायिक और सामाजिक गतिविधियां, संघ अपने सदस्यों के बीच सौहार्द स्थापित करने और विभिन्न सामाजिक व सामुदायिक गतिविधियों में भी भाग लेता है।


पिछले कुछ दशकों में, संघ ने राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों की विभिन्न मांगों को लेकर कई बार सरकार से संवाद किया है। इन मांगों में वेतन विसंगतियां दूर करना, पदोन्नति के अवसरों को बढ़ाना, अतिरिक्त जिम्मेदारियों के लिए उचित मानदेय, और सेवा सुरक्षा जैसे मुद्दे शामिल रहे हैं।


संघ समय-समय पर अपनी नई कार्यकारिणी का गठन करता है और निर्वाचित सदस्य अधिकारियों की ओर से सरकार से बातचीत करते हैं। हाल ही में, खबरों में देखा गया है कि राज्य प्रशासनिक सेवा संघ की नई कार्यकारिणी ने मुख्यमंत्री सहित अन्य वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात कर लंबित मांगों से अवगत कराया है।


यह संघ राज्य प्रशासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, क्योंकि यह सीधे उन अधिकारियों का प्रतिनिधित्व करता है जो राज्य के जमीनी स्तर पर नीतियों को लागू करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


राज्य प्रशासनिक सेवा संघ भोपाल का इतिहास मध्य प्रदेश के प्रशासनिक ढांचे के विकास और राज्य प्रशासनिक अधिकारियों के अधिकारों व कल्याण की लड़ाई का इतिहास है। यह राज्य प्रशासन में एक महत्वपूर्ण हितधारक है, जो अपने सदस्यों के हितों की रक्षा और प्रशासन की बेहतरी के लिए लगातार प्रयासरत रहता है।


पहले डिप्टी कलेक्टर से सीधे भारतीय प्रशासनिक सेवा में पदोन्नति होती थी। डिप्टी कलेक्टर से संयुक्त कलेक्टर, अपर कलेक्टर जैसे पदों पर पदोन्नति का प्रावधान नहीं था उतर प्रदेश सम्भवतः पहला राज्य था जहां त्रिस्तरीय पदोन्नति की सबसे पहले व्यवस्था हुई। मैं छिंदवाड़ा में संघ का प्रभारी था। हम लोगों ने जिला इकाई का गठन किया था।  


राज्य प्रशासनिक सेवा संघ भोपाल में राज्य स्तरीय कार्यकारणी ने बहुत मेहत की। त्रिस्तरीय मदोन्नति का प्रावधान राज्य शासन से करवाया और बहुत सरे निर्णय हुए। भोपाल में शासन से भवन बनाने के लिए जमीं अलॉट करबाई जिस पर आज बहुत बढ़िया गेस्टहॉउस बना हुआ है।


​​हम हमेशा शासकीय काम से भोपाल आते थे। एकबार में भोपाल में छिंदवाड़ा में पदस्थ डी एस राय के घर मिलाने गया। उस समय एन पी  तिवारी कलेक्टर से पदोन्नत हो कर उज्जैन में कमिश्नर पदस्थ थे। मैं और राय साहब दोनों तिवारी जी के व्यवहार की बुराई कर रहे थे। क्योंकि  डी एस राय जब छिंदवाड़ा में एस डी एम थे तब उन्होंने एन पी  तिवारी कलेक्टर की बहुत सेवा की थी। लेकिन कुछ मतभेदों के कारण एन पी  तिवारी कलेक्टर ने उन्हें एस डी एम के पद से हटा दिया था। 


जिसका डी एस राय को बहुत बुरा लगा था। उन्हें अपमानित किया गया था। इसलिए उन्होंने अपना ट्रांसफर भोपाल करावा किया था। सुबह का समय था। रविवार की छुट्टी थी। हम लोग चाय पि रहे थे। तभी वहां एन पी  तिवारी उज्जैन, कमिश्नर आ गए। हम दोनों हक्का बक्का रह गए। मैंने सोचा 'थिंक ऑफ़  डेविल एंड डेविल इस हियर' कहावत कितनी सही है। मैंने हाथ जोड़ कर प्रणाम किया। डी एस राय  ने आदत के मुताबिक उनके चरण छुए। वह बैठ गए।  


एन पी  तिवारी को पता था कि मुझे उनका व्यवहार अच्छा नहीं लगता था। उन्होंने वह विषय निकाल कर बात करना शुरू किया। डी एस राय ने एकाएक पलटा कहते हुए उनके व्यवहार की बहुत तारीफ करना शुरू कर दी। में भौचक हो कर एक बार डी एस राय की और देखता तो दूसरी बार एन पी  तिवारी जी की तरह। मेरा मुँह खुला रह गया , आंखें फटी की फटी। में एकटक देख रहा था। डी एस राय कहने लगे सर आपसे बहुत कुछ सीखा। आपके कारण जिन्दगी बदल गई। आपकी डांट आशीर्वाद था। वगैरा वगैरा। तिवारी जी ने मुझ से पूछा कि मुझे उनका व्यवहार कैसा लगा। मैंने हिम्मत कर कहा कि मुझे उनका व्यवहार कभी भी अच्छा नहीं लगा।


एन पी तिवारी जी ने अपने प्रोवेशन काल के अनुभव सुनाएँ जब वह बैतूल में पदस्थ थे और उनके कलेक्टर एम एन बुच ने उन्हें डांट-डांट कर काम सिखाया था। तिवारी जी ने गर्व से कहा कि उसी डांट का परिणाम था कि वह सबसे काम समय में डिप्टी कलेक्टर से कलेक्टर बन सके। मैं उनके तर्क से सहमत नहीं था। मेने बड़ी विनम्रता से कहा हम सब अब वयस्क है बिना डांट खाये ज्यादा सीख सकते है।  


तिवारी जी ने मुझे धमकाने के अंदाज में कहा कि उन्होंने मेरी वार्षिक गोपनीय चरित्रावली अभी नहीं लिखी है। मैंने अनुरोध किया कि मैंने अपने काम की रिपोर्ट फॉर्म में भर कर भेज दी है। अब मर्जी आपकी है कि आप मेरे काम का मूल्यांकन कैसे करते है। कुछ देर बाद मुझे दूसरी जगह काम से जाना था में उठ कर उन दोनों को प्रणाम कर चला गया। 


अमरबाड़ा में एक हायर सेकेंडरी के प्राध्यापक थे मिस्टर जैन। वह मुझ से मिलने आते थे। उन्होंने मुझे ओशो की कुछ किताबें पड़ने को दी। उन्हें पढ़ कर तथा उनके केसिट सुन कर मेरा जीवन दर्शन बदल गया। तब से में नियमित ओशो को पढ़ता सुनता रहा हूँ। हर व्यख्या अदभुत है। जीवन को देखने का नया नजरिया। ओशो, जिन्हें मूल रूप से चंद्र मोहन जैन के नाम से जाना जाता था, 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद आध्यात्मिक गुरुओं और दार्शनिकों में से एक थे। उनका जन्म 11 दिसंबर 1931 को मध्य प्रदेश के रायसेन जिले के कुचवाड़ा गाँव में हुआ था और उन्होंने 19 जनवरी 1990 को पुणे में अपना देह त्याग दिया।

चंद्र मोहन जैन का जन्म एक दिगंबर जैन परिवार में हुआ था। वे अपने माता-पिता की ग्यारह संतानों में सबसे बड़े थे। बचपन से ही वे बहुत ही जिज्ञासा और विद्रोही स्वभाव के थे। वे किसी भी स्थापित परंपरा या विश्वास को बिना परखे स्वीकार नहीं करते थे। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने ननिहाल में पूरी की।


उन्होंने जबलपुर के हितकारिणी कॉलेज में दर्शनशास्त्र का अध्ययन किया और बाद में सागर विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 21 वर्ष की आयु (21 मार्च 1953) में उन्हें जबलपुर में मौलश्री वृक्ष के नीचे 'संबोधि' (ज्ञानोदय) की प्राप्ति हुई, जिससे वे अपने जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ मानते थे।


प्राध्यापक और आचार्य रजनीश:

एम.ए. करने के बाद, उन्होंने कुछ समय तक रायपुर विश्वविद्यालय में दर्शनशास्त्र के प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। हालांकि, उनके अपरंपरागत विचार और जीवनशैली के कारण उन्हें जल्द ही जबलपुर विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया। 1960 के दशक में, वे 'आचार्य रजनीश' के नाम से प्रसिद्ध हुए और उन्होंने देश भर में यात्रा करके प्रवचन देने शुरू किए। वे पारंपरिक धर्मों, सामाजिक संरचनाओं और राजनीतिक प्रणालियों के कटु आलोचक थे।


भगवान श्री रजनीश और पुणे आश्रम:

1970 के दशक में, उन्होंने अपने शिष्यों को 'नव-संन्यासी' के रूप में दीक्षित करना शुरू किया, जो पारंपरिक संन्यास से अलग था और जिसमें जीवन को पूर्णता से जीने पर जोर दिया जाता था। 1974 में, उन्हें पुणे, भारत में अपना अंतर्राष्ट्रीय ध्यान रिसॉर्ट (अब ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट) स्थापित किया। इस दौरान उन्हें 'भगवान श्री रजनीश' के नाम से जाना जाने लगा। उनके आश्रम में दुनियाभर से लोग ध्यान और आध्यात्मिक खोज के लिए आने लगे।


रजनीशपुरम और विवाद:

1980 के दशक की शुरुआत में, ओशो अपने कई अनुयायियों के साथ अमेरिका चले गए और ओरेगन में 'रजनीशपुरम' नामक एक समुदाय की स्थापना की। यह समुदाय एक स्व-पर्याप्त शहर के रूप में विकसित हुआ, लेकिन स्थानीय अधिकारियों और पड़ोसियों के साथ कई विवादों में उलझ गया, जिसमें प्रवासी, भूमि उपयोग और आपराधिक गतिविधियां शामिल थीं। 1985 में, ओशो को अमेरिका से निर्वासित कर दिया गया और उन्हें 21 देशों में प्रवेश से वंचित कर दिया गया।


ओशो के रूप में वापसी और अंतिम वर्ष:

अमेरिका से लौटने के बाद, वे दुनिया के विभिन्न हिस्सों में घूमते रहे और अंततः पुणे लौट आए। 1989 में, उन्होंने अपना नाम 'ओशो' रख लिया, जिसका अर्थ है 'सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला' या 'राजहंस' (एक बौद्ध शब्द)। उन्होंने अपने अंतिम वर्ष पुणे आश्रम में ही बिताए, जहाँ वे प्रवचन देते रहे और ध्यान विधियों का विकास करते रहे। 19 जनवरी 1990 को उनका निधन हो गया।


ओशो का दर्शन (Philosophy of Osho)

ओशो का दर्शन किसी एक परंपरा या धर्म से बंधा हुआ नहीं था। उन्होंने दुनिया भर के दर्शनों, धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं (जैसे ज़ेन बौद्ध धर्म, सूफीवाद, ताओवाद, तंत्र, योग, वेदांत, ईसाई धर्म, यहूदी धर्म, आदि) का गहन अध्ययन किया और उनसे प्रेरणा ली, लेकिन उन्हें अपनी अनूठी शैली में प्रस्तुत किया। उनके दर्शन के कुछ प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:


वर्तमान में जीना (Living in the Present Moment): ओशो का मानना था कि अधिकांश लोग या तो अतीत की स्मृतियों में जीते हैं या भविष्य की चिंताओं में खोए रहते हैं। वे वर्तमान क्षण की शक्ति और सुंदरता को खो देते हैं। उनका जोर 'यहीं और अभी' जीने पर था, क्योंकि केवल वर्तमान ही वास्तविक है।


सजगता और साक्षी भाव (Awareness and Witnessing): यह ओशो के दर्शन का केंद्रीय स्तंभ है। वे सिखाते थे कि हमें अपने विचारों, भावनाओं और कार्यों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन उससे जुड़ना नहीं चाहिए। बस एक साक्षी की तरह देखना, बिना निर्णय दिए। यह साक्षी भाव व्यक्ति को मन की गुलामी से मुक्त करता है और आंतरिक शांति प्रदान करता है।


ध्यान: ओशो ने ध्यान को जीवन जीने की कला के रूप में देखा। उन्होंने कई नई और अनूठी ध्यान विधियों का विकास किया, जैसे गतिशील ध्यान (Dynamic Meditation), कुंडलिनी ध्यान (Kundalini Meditation), नटराज ध्यान (Nataraj Meditation), आदि। ये विधियां शरीर की ऊर्जा को मुक्त करने और मन को शांत करने पर केंद्रित थी। उनका मानना था कि ध्यान कोई क्रिया नहीं, बल्कि एक अवस्था है – मन की शांति और जागरूकता की अवस्था।


प्रेम और यौनता: ओशो ने प्रेम और यौनता के प्रति एक बहुत ही खुले और स्वीकार्य दृष्टिकोण का प्रचार किया। उनका मानना था कि समाज ने यौनता को दबा दिया है, जिससे कई मनोवैज्ञानिक समस्याएं पैदा हुए हैं। उन्होंने यौन ऊर्जा को एक रचनात्मक और आध्यात्मिक शक्ति के रूप में देखा, जिसे दबाने के बजाय समझना और रूपांतरित करना चाहिए। उनका प्रसिद्ध सूत्र था, "प्रेम एक फूल है, कामवासना उसकी जड़।"


अस्तित्ववाद और व्यक्तित्व: ओशो ने व्यक्ति की स्वतंत्रता और उसके अद्वितीय अस्तित्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति अपने आप में पूर्ण है और उसे किसी बाहरी सत्ता (भगवान, समाज, धर्म) द्वारा निर्धारित नियमों या विश्वास का पालन नहीं करना चाहिए। स्वयं को जानना और अपनी सच्चाई के अनुसार जीना ही सच्ची आध्यात्मिक यात्रा है।


धर्मों और परंपराओं की आलोचना: ओशो ने संगठित धर्मों, उनकी कट्टरता, पाखंड और मनुष्य को बांधने वाली रूढ़ियों की कड़ी आलोचना की। उनका मानना था कि धर्मों ने मनुष्य को ईश्वर से दूर कर दिया है, जबकि ईश्वर भीतर ही है। उन्होंने किसी भी विशेष धर्म का प्रचार नहीं किया, बल्कि "धार्मिकता" (धर्म-भाव) पर जोर दिया, जो कि व्यक्तिगत अनुभव और आंतरिक खोज पर आधारित है।


अहंकार का विसर्जन (Dissolution of Ego): ओशो के अनुसार, अहंकार ही मनुष्य के दुखों का मूल कारण है। अहंकार एक झूठी पहचान है जो समाज और अनुभवों से बनती है। उन्होंने अहंकार को तोड़ने और "शून्य" होने की बात की, जहां व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को जान सके।


आनंद और उत्साह (Joy and Celebration): ओशो का मानना था कि जीवन एक उत्सव है और इसे पूरी तरह से आनंद के साथ जीना चाहिए। उन्होंने दुख और पीड़ा को स्वीकार करने और उनसे सीखने के लिए कहा, लेकिन उनमें फंसने के बजाय जीवन के हर पल का उत्सव मनाने पर जोर दिया।


ओशो का दर्शन केवल बौद्धिक अवधारणाओं का संग्रह नहीं था, बल्कि यह एक अनुभवात्मक और परिवर्तनकारी मार्ग था। उन्होंने अपने शिष्यों को स्वयं प्रयोग करने और अपनी सच्चाई जानने के लिए प्रेरित किया, बजाय इसके कि वे किसी गुरु या शास्त्र पर आँख बंद करके विश्वास करें। उनकी शिक्षाएं आज भी लाखों लोगों को प्रभावित कर रही हैं, और उनके प्रवचनों की विशाल पुस्तकालय विभिन्न भाषाओं में उपलब्ध है।


पण्डित श्री राम शर्मा आचार्य गायत्री परिवार के बाद यह दूसरे व्यक्ति थे जिन्होंने मेरे ऊपर बहुत प्रभाव छोड़ा। छिंदवाड़ा में काम करते हुए पांच साल हो गए थे। जीवन एक ढर्रे पर चल रहा था। मुझे लगाने लगा था कि प्रशासनिक सुधार तथा सेवाओं को जिस उचाई तक में ले जा सकता था ले कर पहुंच चुका था। नया करने को कुछ दिख नहीं रहा था। 


मुझे लगता था कि अंग्रेजों ने शासकीय सेवाओं में ट्रांसफर पॉलिसी शायद इसी लिए  बनाई थी। जिस में तीन साल में ट्रांसफर का प्रावधान होता था। एक साल अधिकारी  क्षेत्र को समझे दूसरी साल क्षेत्र के लोग अधिकारी को समझे और जब दोनों एक दूसरे को समझ जाय तो अधिकारी का ट्रांसफर हो जाया। कितनी सुंदर पॉलिसी। लेकिन आप को नहीं पता कि भगवान ने आप के लिए क्या सोचा है। तभी एक घटना ने मेरा जीवन बदल दिया। 


सो हुआ यह की छब्बीस जनवरी का दिन था। एस डी एम और नगर पालिका प्रशासक होने के नाते मुझे नगर में कई जगह झंडा वन्दन करने जाना होता था। इस दिन भी सुबह छह बजे से जा कर अलग-अलग जगह कार्यक्रम कर नौ बजे के पूर्व मुझे जिले के मुख्य कार्क्रम स्थल पुलिस ग्राऊंड पर पहुंचना था। एक जगह जब में झण्डा फहरा रहा था तब वहां बिना आमंत्रण के वहां की विधायक मैडम शुक्ला आ गई। झंडा बंदन के बाद जब मैं अपनी गाड़ी में बैठ रहा था तो मैडम ने उन्हें भी पुलिस ग्राऊंड ले जाने का आग्रह किया। उन दिनों महिन्द्रा जीप में आगे केवल ड्रायवर और एक व्यक्ति के बैठने को सीट होती थी। मैं पीछे नहीं बैठना चाहता था। मैडम शुक्ल आगे बैठ गई। मैंने ड्राइवर से पीछे बैठने का कहा और खुद गाड़ी चलाने लगा। शहर की सड़क लोगों से भरी थी। गाड़ी बहुत धीमी चल रही थी। हम लोग समय पर  मुख्य कार्क्रम स्थल पुलिस ग्राऊंड पर पहुंच गए। प्रभारी मंत्री महोदय ने झंडा फहराया। कार्यक्रम जब समाप्त हो रहा था तभी एक पुलिस अधिकारी मेरे पास आये उन्होंने कहा कि शहर में मैंने अपनी गाड़ी से एक एक्सीडेंट कर दिया है। 


उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति उनके घर के सामने उनकी साइकिल पर एक छोटी लड़की को बैठा कर साइकिल स्टैण्ड पर खड़ी कर घर के अंदर कुछ लेने गये। तभी आप की गाड़ी वहां से निकली। जिससे साइकिल टकराकर गिर गई। लड़की को सिर में चोट आई है। बहार बहुत भीड़ जमा है। बाहर लोग हंगामा कर रहे है। वह भीड़ आपके बिरुद्ध कार्यवाही की मांग कर रही है। 


मैंने उन्हें बताया की गाड़ी में ही चला रहा था। उसमें विधयाक तथा पीछे छह लोग और बैठे थे। हमारी गाड़ी बहुत धीमी चल रही थी। किसी से नहीं टकराई। आप सबसे पूछ लो। लेकिन वह बोले कि आप के विरुद्ध माहौल बन रहा है आप पीछे से घर चले जाओ। मुझे बहुत बुरा लगा। उन्होंने एक पुलिस गार्ड के साथ मुझे घर भेज दिया। शहर में हंगामा हो गया। अगले दिन शहर बंद रहा। अखबारों में खबर छपी की में बहुत तेजी से गाड़ी चला रहा था। नशे में चूर था। पद का घमंड और ना जाने क्या क्या छापा था। शहर में चार दिन से हड़ताल चल रही थी। थानेदार मेरी गाड़ी जांच के लिए जब्त कर ले गए। मेरे ऊपर पहला पुलिस केस दर्ज हुआ। जो अपराध कभी हुआ ही नहीं वह भीड़ तंत्र के कारण मुझ पर थोपा जा रहा था। कलेक्टर पुलिस एस पी का जोर था की शहर की हड़ताल किसी तरह समाप्त हो। 


विधायक ने अपने व्यान में बताया कि उन्हें नहीं पता कि साइकिल गाड़ी टकराने से गिरी या नहीं। साइकिल दूसरी तरफ गिरी थी। सड़क की तरह नहीं गिरी। जमीं पर पड़े एक छोटे से कंकड़ से लड़की के सिर पर हलकी चोट थी। डॉक्टर को कोई घाव नहीं मिला। वह भारतीय जनता पार्टी से जुड़ा सोनी परिवार था। मैंने उस लड़की को नागपुर सिटी स्कैन करवा कर न्यूरो सर्जन को दिखवाया। 


कोई चोट नहीं थी। पर लोग मानाने को तैयार नहीं थे। साइकिल से गाड़ी छुई भी नहीं थी। किसी दुर्घटना का कोई निशान नहीं था। इन दिनों में घर में अकेला था। मुझसे मिलने कोई अधिकारी नहीं आया। मैंने सारे नेताओं, विधायक तथा सांसद जी को पूरी घटना बताई। किसी ने मेरा साथ नहीं दिया। सब ने कहा उन्हें जनता का साथ देना होगा। आंदोलन कुछ गुंडों के हाथों में चला गया था। सभी पत्रकार लोकल थे। मेरे विरुद्ध बिना गबाह सबूत के आरोप पर आरोप लगा रहे थे। मिडिया का यह चहेरा मैंने पहलीबार देखा था। 


भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष प्रतुल चन्द्र द्विवेदी जो मेरे मित्र होने का दावा रोज करते थे। सच का साथ देने को तैयार नहीं थे। भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की पार्टी थी। कांग्रेस की सरकार थी और में था सरकारी अधिकारी। जिस शहर को मैंने अपने जीवन के बेहतरीन पांच साल दिए। रात दिन ईमानदारी से मेहनत कर काम किया। उस जगह ना एक अधिकारी ना ही एक नेता जनता का कोई व्यक्ति मेरे साथ नहीं था। 


हर रविवार जो मेरे घर में पार्टी करते खाते-पीते दोस्ती का डैम भरते। लिंक दुःख सुख में मैंने साथ दिया सब कहां गायब हो गए। अपने आप का मैंने आत्मवलोकन किया। मेरी गाड़ी पुलिस ने जप्त करली। जमानती धाराओं में केस दर्ज किया। मैंने जमानत करवाई। शहर की हड़ताल समाप्त हो गई। बाहर पुराना रूटीन लोट आया पर मेरे अन्दर सब कुछ बदल गया। लोगों से मिलाना जुलना बंद कर दिया। पार्टी खेलकूद क्लब जाना बाद कर दिया ओशो की अंतरदृष्टि के इस घटना को समझने में मदद की। 


मैं बहिर्मुखी से अन्तर्मुखी हो गया। अब न किसी को बुलाया ना किसी के घर जाता। निमंत्रण, शादी समारोह, होली दीवाली मिलन सब बंद। किताबों से फिर दोस्ती हो गई। कुछ माह बाद मेरे होशंगाबाद के स्थानांतरण के आदेश आ गए। इस समय हमारे कलेक्टर थे अंटोनी डिसा साहब। बहुत भले ईमानदार आदमी। एंटोनी डिसा जिन्हें "टिनो" के नाम से भी जाना जाता है, 


मध्य प्रदेश कैडर के एक सेवानिवृत्त भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी हैं। वे अपनी प्रशासनिक सेवाओं के साथ-साथ एक लेखक और कवि के रूप में भी जाने जाते हैं। जन्म 9 अक्टूबर 1956 को भुसावल, महाराष्ट्र में। उन्होंने भुसावल के सेंट अलॉयसियस स्कूल से अपनी स्कूली शिक्षा प्राप्त की। मुंबई विश्वविद्यालय से एम.ए. में गोल्ड मेडलिस्ट रहे। 1976 में कॉलेज के सर्वश्रेष्ठ छात्र के लिए रोटरी पुरस्कार प्राप्त किया। पत्नी मालुशा डीसा।


करियर और प्रमुख पद, मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव, वे 2013 से लेकर 2017 में अपनी सेवानिवृत्ति तक मध्य प्रदेश राज्य के 29 वें मुख्य सचिव रहे। उन्होंने आर. परशुराम का स्थान लिया और उनके बाद बसंत प्रताप सिंह ने यह पद संभाला। जिला कलेक्टर: उन्होंने छिंदवाड़ा जिले के जिला कलेक्टर के रूप में कार्य किया।


प्रशासक: जबलपुर नगर निगम के प्रशासक रहे। आवास आयुक्त: मध्य प्रदेश के आवास आयुक्त के रूप में भी सेवाएं दीं।

केंद्रीय सरकार में भूमिकाएं: उन्होंने केंद्र सरकार में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली: निदेशक: पर्यावरण और वन मंत्रालय (भारत) में निदेशक। नियंत्रक (Controller): मुंबई में भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) के नियंत्रक। संयुक्त सचिव: वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय (भारत) में संयुक्त सचिव, जहां उन्होंने विदेश व्यापार नीति और WTO में भारत की वार्ताओं का काम देखा।


अंतर्राष्ट्रीय अनुभव: उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में पांच साल तक सेवा दी, जहां वे दक्षिण-दक्षिण औद्योगिक सहयोग के लिए UNIDO केंद्र के निदेशक रहे।


सेवानिवृत्ति के बाद: सेवानिवृत्ति के बाद भी एंटोनी डीसा सक्रिय हैं। वे मध्य प्रदेश रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (RERA) के पहले अध्यक्ष रहे हैं।


वर्तमान में, वे अपने गृहनगर गोवा में रहते हैं। उन्हें मापसा अर्बन को-ऑपरेटिव बैंक (MUCB) के परिसमापक (Liquidator) के रूप में नियुक्त किया गया है।


एक लेखक और कवि के रूप में: एंटोनी डीसा एक चर्चित लेखक और कवि भी हैं। उनकी कई रचनाएं प्रकाशित हुई हैं और उन्हें साहित्यिक सम्मान भी मिले हैं: उनके कई लेख टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित हुए हैं। उनकी कुछ कविताओं को पोएट्री सोसाइटी ऑफ इंडिया और पोएट्री द्वारा संकलित किया गया है।


उनकी कहानी "टैमेरिंड (इमली)" को हाल ही में 'कॉमनवेल्थ शॉर्ट स्टोरी प्राइज 2025' के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है। यह कहानी मध्य प्रदेश के ग्रामीण जीवन पर आधारित है। उन्होंने तीन अन्य किताबें भी लिखी है:

बच्चों के लिए एक रहस्य कथा "The Curious Case of the Nandikote Nawab", जिसे सीबीएसई स्कूलों ने अपनी पठन सूची में शामिल किया है।


उन्हें 2017 और 2019 में टाइम्स ऑफ इंडिया राष्ट्रीय लघुकथा प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। ये दोनों कहानियां भी मध्य प्रदेश पर आधारित है। एंटोनी डिसा एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी हैं, जिन्होंने एक कुशल प्रशासक के रूप में अपनी सेवाएं दीं और अब एक सफल लेखक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहे हैं। 


​​वह नए-नए आये थे मेरे काम से बहुत प्रभावित थे। वह मुझे कार्यमुक्त नहीं करना चाहते थे। वह मेरा ट्रांसफर निरस्त करवाना चाहते थे। उन्होंने मुझे बुला कर पूछा की तुम क्यों जाना चाहते हो। मैंने कहा जहां अधिकारी को लोकल बच्चे अंकल कहने लगे उसे चले जाना चाहिए। उन्होंने कहा तुम होशंगाबाद जा कर कलेक्टर से मिल आओ। जगह देख आओ फिर निश्चित करो। हालांकि मैं जाने का मन बना चुका था पर उनकी बात नहीं टाल सका। होशंगाबाद  आया। वहां मैडम अजीता बाजपेई पांडे कलेक्टर थी। 


मैं छिंदवाड़ा से एक दिन होशंगाबाद आया। कलेक्टर से मिला। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। वह बहुत अच्छे से मिली। 


बाद मैं एक्सीडेंट का पुलिस केस कोर्ट से निरस्त हो गया था। लेकिन सोनी परिवार ने व्यक्तिगत केश कोर्ट में लगा दिया। मेने मिस्टर भाटिया को वकील नियुक्त किया। वह केश बहुत दिनों चला और उन दिनों होशंगाबाद से छिंदवाड़ा जाना, कोर्ट के गलियारों में बेच पर बैठना। कोर्ट के चपरासी द्वारा नाम पुकारा जाना बहुत अपमानजनक था। मानसिक कष्ट बहुत था।


पिछले सालों से मैंने एक डायरी लिखना शुरू किया कि शासन में कितने तरीके रिश्वत खाने के है। मैंने देखा कर्यालयों में दो तरह के पैसों का भ्रष्टाचार  किया जाता है ,एक शासकीय बजट का पैसे और दूसरा निजी लोगों का पैसा। बजट कुछ खरीदी करने या निर्माण के काम करने के लये सरकार द्वारा जिलों के अधिकारियों को आबंटित किया जाता था। जिसका बिल बना कर ट्रैजरी में लगाना होता। जिला ट्रैजरी अफसर पैसा शासन के कहते से निकल कर विभाग के बैंक कहते में ट्रांसफर करते और अदिकारी पैसे चैक से निकल कर भुगतान करते थे। तो जब भी कोई भुगतान होता काम करने वाला ठेकेदार या सामान का सप्लायर कुल श्री का दस प्रतिशत कमीशन जिला अधिकारी के अकाउंटेंट को रिश्वत के देता जो अधिकारी से चपरासी तक के बीच बांटा जाता था। इस बेईमानी के काम को बहुत ईमानदारी के साथ किया जाता। जब तक इस सप्लाई चेन का कोई स्टेकहोल्डर शिकायत ना करे बहुत ख़ामोशी से यह सिस्टम काम करता। सभी निर्माण कार्य करने वाले विभाग ऐसे ही काम करते। 


इनकी शिकायत सबसे कम होती। चर्चा भी काम होती। यह सरकारी खजाने की राशि में से रिश्वत ली जाती है। इस लिए देने वाले को पहले से पता होता है कि उसे कुल भुगतान में से कितना प्रतिशत राशि रिश्वत में देना होगी उतनी रशै बड़ा कर वह टेण्डर में कीमत लिखता है। ठेकेदार की जेब से पैसा नहीं जाता इसलिये वह इस की बात नहीं करता है। 


दूसरा जैसे पुलिस, पटवारी, इंस्पेक्टर कोई जांच करते। कानून तोड़ते किसी को पकड़ते। व्यपार करने के लिए लाइसेंस लें हो या कोई अनुमति शासन की किसी विभाग के लेने की रिश्वत मांगी जाती। इसका कोई फिक्स रेट नहीं है। इस कारण कोई कुछ लेते तो दूसरा कुछ और यह राशि मांगने बाले और देने बाले के बिच मोलभाव से तय होती है। यह राशि वक्तिगत जेब से देना होती इसलिये देने बाला वयक्ति रिश्वत देने से पहले अपने सर्किल में बात शुरू कर देता है। इस तरह की रिश्वत लेने का बहुत प्रचार होता है। कई बार रिश्वत की राशि को बहुत बड़ा-चढ़ा कर बताया जाता है। समाज में अखबारों में मिडिया राजनेताओं में इस बात की खूब चर्चा होती है। यह निजी पैसे का भ्रष्टाचार है। 


पहली पीढ़ी के नेता तथा अधिकारी समाजिक बदनामी से बहुत डरते थे। सामजिक दबाब में भ्रष्टाचार काम होता था। धीरे-धीरे मेने सामाजिक मूल्यों मान्यताओं में बदलाब देखा है। अब यह मायने नहीं रखता कि आपने पैसे कैसे कमाया। अब समाज में यह देखा जाता है कि पैसा कितना कमाया। सामजिक मूल्य बदल जाने से मानसिकता में बदलाव आया है अब कोई रिश्वत में पकड़ा जाना या छापा डलना या काली कमाई का जब्त होना केवल सूचना के लिये खबर रह गई है। अब स्केल का सवाल है। जितने ज्यादा आप पैसे कमा रहे है समाज में उतना आदर पा रहे है। धार्मिक आयोजन हो रहे है। मंदिर बन रहे है। सामजिक कार्यक्रम में चन्दा दे रहे है। अधिकारियों, राजनेताओं, ठेकेदारों और सप्लयारों के संगठन बन गए है। कंसल्टेण्ट, सोशल इन्फुलेन्सर, लॉबियाष्ट जैसे पदनाम समाज में इज्जत की निगाहों से देखे जाते है। अभी भी में अपनी डायरी मेंटेन कर रहा हूँ। 


 होशंगाबाद 


छिंदवाड़ा जा कर होशंगाबाद कलेक्टर से हुई मुलाकात का विवरण मैंने कलेक्टर साहब को सुना दिया और भार मुक्त करने के अनुरोध किया। मैं कार्यालय में दी जाने वाली फेयरवेल पार्टी को तेरहवीं मानता हूँ। जैसे मरने के बाद तेरहवीं  परिवार को मज़बूरी में सामजिक दर के कारण करना होती है उसी तरह कार्यालय में फेयरवेल पार्टी के लिये चन्दा देते है। मैं हमेशा कोशिश करता हूँ कि जो बात मुझे बुरी लगती है वह दूसरों को भी बुरी लगेगी। मैं उन बातों को करने से बचता हूँ। 


जब किसी का ट्रांसफर हो गया तो वह इस कार्यालय के लोगों के लिये किसी काम का नहीं रहा तो उसके लिये चन्दा किस बात का। यह अर्थदण्ड क्यों। मेरे ऐसे ही विचारों के कारण हर बात के लिए अपनी व्याख्या रखता हूँ और उसे मैंने 'पस्तोर डॉक्टराइन' नाम दिया है। सामान्यतः मेरी यह व्याख्या प्रचलित मान्यताओं से अलग हटकर या कभी-कभी विपरीत होती है। मैंने उधार की जिन्दगी को कभी नहीं जीना चाहा। मैं किसी की कार्बन कॉपी नहीं बनाना चाहता। चाहे वह कितनी ही खूबसूरत क्यों ना हो। मैं ओरिजनल जिन्दगी गड़ने की कोशिश करता हूँ चाहे वह कितनी भी कठिन, छोटी या बदसूरत ही क्यों ना हो। तो अब आप समझ गए होंगे कि मैं कभी भी अपने ट्रांसफर पर फेयरवेल पार्टी क्यों नहीं लेता था। 


होशंगाबाद जिले में स्थित आदमगढ़ पहाड़ियों पर पाए गए शैलचित्र और पाषाण उपकरण दर्शाते हैं कि यह क्षेत्र पाषाण काल और मध्य पाषाण काल से ही मानव बस्तियों का केंद्र रहा है। ये शैलचित्र लगभग 20,000 साल पुराने माने जाते हैं और मानव जीवन की गतिविधियों, पशुओं के चित्रण, युद्ध और शिकार के दृश्यों को दर्शाते हैं। यहां जिराफ जैसे कुछ अनोखे चित्र भी मिले हैं, जो अन्य शैलचित्रों में दुर्लभ हैं।


नामकरण (होशंगशाह): शहर का नाम 15वीं शताब्दी में मालवा के दूसरे सुल्तान होशंगशाह गोरी (1405-1435 ई.) के नाम पर "होशंगाबाद" पड़ा। होशंगशाह ने 1405 ई. में यहाँ एक छोटा किला बनवाया था, जैसा कि ऐतिहासिक अभिलेखों में पहली बार दर्ज किया गया है। 


नर्मदा के पार होशंगाबाद के उत्तर-पश्चिम में स्थित गिन्नौरगढ़ का किला गढ़ा-मंडला के गोंड साम्राज्य के अधीन रहा। बाद में, होशंगाबाद भी कुछ समय के लिए गिन्नौर शासकों के नियंत्रण में था। 1742 ई. में पेशवा बालाजी बाजीराव ने गंजाल नदी के पश्चिम में हंडिया की राजधानी सिरकर पर कब्जा कर लिया।1740 ई. से 1775 ई. के बीच, गंजाल के पूर्व में पड़ने वाले सिवनी मालवा, होशंगाबाद और सोहागपुर तहसील के शेष रियासतें धीरे-धीरे नागपुर के भोंसला राजा के कब्जे में आ गईं। भंवरगढ़ में उनके सूबेदार बेनीसिंह ने 1796 में होशंगाबाद किले पर कब्जा कर लिया। 


1802 से 1808 तक होशंगाबाद और सिवनी पर भोपाल नवाब का कब्जा रहा, लेकिन 1808 में नागपुर के भोंसला राजा ने इसे फिर से हासिल कर लिया।18वीं सदी के अंत तक यह क्षेत्र सिंधिया के हाथों में आ गया था। अंग्रेजों का नियंत्रण: 1817 के अंतिम एंग्लो-मराठा युद्ध में, होशंगाबाद पर अंग्रेजों का कब्जा हो गया और 1818 में अप्पा साहिब भोंसला द्वारा किए गए अनंतिम समझौते के तहत इसे अंग्रेजों को सौंप दिया गया।


सेठानी घाट, होशंगाबाद में नर्मदा नदी के किनारे स्थित एक प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण घाट है। यह शहर के प्रमुख आकर्षणों में से एक है। सेठानी घाट अपनी सुंदरता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है। यह नर्मदा जयंती जैसे त्योहारों पर विशेष आयोजनों का केंद्र होता है, जहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। यह घाट नर्मदा नदी में स्नान और पूजा-अर्चना के लिए एक पवित्र स्थान माना जाता है।


होशंगाबाद में कलेक्टर ने मुझ बहुत दिनों तक कोई ढंग का काम नहीं दिया। मुझे प्रांगण में बाहर एक कमरा बैठने की लिया दिया गया। सामने नर्मदा होने से गर्मियों में वहां दिन में नदी की रेत बहुत गर्म हो जाती है कि उस कमरे में बैठना मुस्किल हो जाता था। बिना काम के बैठना और भी कठिन था। किसी ज़माने में मुरैना मैं मेरे एक नायब तहसीलदार थे मिस्टर पटेल उन्हें कलेक्टर ने ए डी एम बना रखा था। जबकि सीनियर्टी से उन्हें मुझे ए डी एम बनाना चाहिए था। 


वह चाहती थी कि मैं उनसे उनके घर पर मिल कर यह पद मांगू। लेकिन मैंने यह करना उचित नहीं समझा। मेरे पास गाड़ी भी नहीं थी। मैं अपना स्कूटर बेच चूका था। मुझे वाहन लोन चुकाना था। में रेस्ट हाउस में रुका था। मैंने एक रिक्शे बाले को रोज मुझे ले जाने तथा लाने के लिए लगाया था। कलेक्टर के जो चहेते ऑफिसर्स थे उन्हें माकन, गाड़ी, चपरासी तथा अच्छे पद मिले हुए थे। 


मैं रोज रिक्शे से सेठानी घाट जाता पोहा, जलेबी तथा लस्सी का नाश्ता कर रिक्शे से ऑफिस आता। दिन भर कमरा बंद कर बैठता। किताबें पड़ता। मैंने होशंगाबाद कॉलेज के पुस्तकालय की सदस्यता ले ली थी। कुछ फायलें आती थी। मैंने अपने स्टाफ को कहा कि दोपहर में किबाड़ खोलू तो पुरानी फायलें ले जाना और नई दे जाना। दिन भर में दरबाजा बंद रखता। मेरे पास काम नहीं था मैं कलेक्टर को चाहता नहीं था तो ना तो कोई मिलने आता ना बात करता। 


कुछ दिन बुरा लगा। फिर मजा आने लगा। छिंदवाड़ा के मानसिक तनाव के बाद मुझे जरूरत भी थी बहुत आराम की। मेरे मन के मनौविज्ञान को समझने की। सोचता भगवान कितना दयालू है। कुछ दिन बाद मुझे एक शासकीय मकान मिल गया। परिवार तथा सामान ले आया। एक साइकिल खरीद ली बाजार जा कर सब्जी सामान लेन की लिए। यहां मेरा कोई सोशल सर्किल नहीं था। और मुझे ओशो को पद कर एकांत और अकेलेपन का अर्थ समझ में आ गया था। हर सप्ताह नया उपन्यास पड़ लेता था। 


ना तो मुझे किसी मीटिंग में बुलाया जाता ना किसी कार्यक्रम में। वेतन पूरा काम धेले का नहीं। शासकीय दामाद का अर्थ समझ आया। मुझे कोई जल्दी नहीं थी। अखबारों में लेख लिखने लगा। हर सप्ताह एक लेख लिखता। गांव, गरीबी और बेरोजगारी मेरे प्रिय विषय। कलेक्टर बीच-बीच में उनके भरोसे के लोगों से मेरे बारे में पूछती रहती थी। मैं क्या करता हूँ? किस्से मिलता हूँ? मैं कार्यालय के टी क्लब भी नहीं जाता था। सब के लिए अजनबी, अजूबा था। किसी को मेरे बारे में कुछ पता नहीं। सब कलेक्टर को मेरी दिनचर्या बताते कि मैं ठीक समय पर रोज ऑफिस आता हूँ। कमरा बंद कर दिन भर बैठता हूँ। सही समय पर शाम को रिक्शे में बैठ कर घर चला जाता हूँ। मुझे कभी ना तो बुरा लगता ना किसी से बात करने की इच्छा। 


एक दिन शाम को में घर जाने की लिए निकल रहा था तभी कलेक्टर का चपरासी दौड़ता हुआ आया। बोला मेडम बुला रही है। मैं जैसा था चला गया। उन्होंने बैठने को कहा। फिर मेरे बारे में बातें करने लगी। पूछने लगी मैं आजकल क्या करता हूँ। मैंने उन्हें सही-सही बताया और कहा की बहुत सालों से कई उपन्यास पड़ने की आकांक्षा थी जो आपकी मेहरबानी से अब पूरी हो रही है। उस समय मेरे हाथ में विमल राय की किताब 'कौड़ियों के मोल' किताब थी। वह बहुत मोटी किताब है। 


वह उस किताब को देख कर हंस दी। अजिता वाजपेई के पिता भोपाल में बिरला के लाइजन अफसर थे। उनकी सरकार में बहुत पैठ थी। मैडम बहुत पढ़ी-लिखी तो थी ही खूब खूबसूरत भी थी। अपने विद्यार्थी जीवन में यूथ कांग्रेस में महामंत्री भी रही थी। प्रदेश में कांग्रेस का शासन था तो सभी उन्हें जानते थे। उनके बारे में यह सब बहुत सी बातें उन्होंने खुद बताई थी। अमित पण्डे जी से उन्होंने शादी की थी। इसलिए वह दो सरनेम अपने नाम के साथ लगाती थी। 


हमारे यहां रिवाज रहा है कि जब लड़की की शादी होती है तो वह पति के सरनेम का उपयोग करती। लेकिन जब से नारी स्वत्रंता का आंदोलन भारत में चला तब से कुछ महिलाऐं पिता के साथ पति का सरनेम उपयोग में लाने लगी है। उन्हें अपने आप पर बहुत मान था जिसे दूसरे घमण्ड कहते थे और हो भी क्यों ना। महिला हट और राजहठ साथ-साथ थे। 


उन्होंने यकायक मुझे कहा की वह मुझ इटारसी का एस डी एम बना रही है और मुझे अभी रात को ही चार्ज लेना है। मैंने अनुरोध किया कि में इटारसी नहीं जाना चाहता। मेरे बच्चे होशंगाबाद में पद रह है और यदि बीच सत्र में स्कुल बदलेगा तो उनको दिक्कत होगी। मुझे पता था कि इटारसी  एस डी एम का कोई शासन से पद स्वीकृत नहीं है। इसलिये ना तो वहां इटारसी का एस डी एम का कोई ऑफिस है, ना गाड़ी और नहीं घर। वह मिस्टर सक्सेना इटारसी के एस डी एम थे। वह मेरे पूर्व परिचित थे। 


वहां की समस्या वह बताते रहते थे। रेलवे जंक्शन होने के कारण प्रोटोकॉल की ड्यूटी बहुत है। भोपाल तक से अधिकारी ट्रेन लेने के लिए इटारसी आते। उनके टिकिट, खाना और दूसरी व्यवस्थाएं। जिसके लिए कोई बजट नहीं। हर माह पटवारी, राजस्व निरीक्षक, नायब तहसीलदार तथा तहसीलदार  चंदा देते। पटवारी किसानों से रिश्वत लेते और प्रोटोकॉल फण्ड में जमा करते। यह व्यवस्था वर्षों से चली आ रही है। अभी भी जारी है। राजस्व विभाग में भ्रष्टाचार की एक जड़ यह चन्दा है। शासन सभी अधिकारियों को टीए डीए देती है। 


लेकिन जब वरिष्ठ अधिकारी भ्रमण पर आते है तब गेस्ट हाउस या सर्किट हाउस का खर्च इसी फंदे से होता है जो तहसीलदार करते है। यह उनकी ड्यूटी का अभिन्न अंग है। राजस्व अधिकारी संघ, पटवारी संघ और राजस्व निरीक्षक संघ को कभी इस व्यवस्था का विरोध करते नहीं देखा। क्योंकि जो रुपया जनता से लिया जाता है उसका छोटा हिस्सा इस फण्ड में जाता शेष निजी फंड में। 


मुझे समझ नहीं आया कि मिस्टर सक्सेना तो उनके खास अधिकारी थे अब उन्हें हटा कर मुझे क्यों भेज रही है? उन्होंने कहा तुम बच्चों को सेशन अंत तक होशंगाबाद में ही रखो। तुम्हरा शासकीय घर रहेगा। फिर मेने कहा मेरे पास गाड़ी नहीं है रात को कैसे जायेगे। उन्होंने सिंचाई विभाग की एक गाड़ी मुझे दे दी। मेरा आदेश टाइप हो कर आ गया। 


इटारसी


उन्होंने तत्काल जाने को कहा। रात को चार्ज लेना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने सुबह जाने का अनुरोध किया। लेकिन त्रिया हट बीच में आ गया। मुझे अपने तर्कों के सब हथियार डाल कर सरेण्डर करना पड़ा मैं रात दस बजे सक्सेना जी के पास पंहुचा। वह सोने जा रहे थे। वह एस दी एम का पद कसी भी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते थे। उन्होंने मैडम को खुश रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी थीं। आदेश देखकर चौंक गये। उन्होंने चार्ज नहीं देने का मन बना लिया था। 


उन्होंने दो तीन नेताओं को फोन लगाएं। विधायक को फोन लगाया। इटारसी से विजय दुबे काकू भाई मंत्री थे उन्हें फोन लगाया। उस समय लेंड लाईन फोन होते थे। जहां हम सक्सेना जी के घर में बैठे थे उनका फोन बही था। मैडम को फोन लगाने की हिम्मत उनमें नहीं थी। अब मुझे एहसास हुआ कि वह क्यों मुझे रात को चार्ज लेने की जिद कर रही थी। वह जानती थी कि यदि सक्सेना को समय मिलेगा तो वह उनके आदेश को निरस्त करवा लेंगे। अंतिम रात एक बजे उन्होंने चार्ज दे दिया। 


इटारसी जंक्शन रेलवे स्टेशन मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित एक बेहद महत्वपूर्ण और भारत के सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शनों में से एक है। यह भारतीय रेलवे नेटवर्क के पश्चिम मध्य रेलवे  क्षेत्र के भोपाल मंडल के अंतर्गत आता है। इटारसी भारत के भौगोलिक केंद्र में स्थित है, और यह उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम को जोड़ने वाले कई प्रमुख रेलवे मार्गों का केंद्र बिंदु है। 


इसे "भारत का दिल" भी कहा जाता है क्योंकि यह देश के विभिन्न हिस्सों से आने-जाने वाली ट्रेनों के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। सबसे व्यस्त जंक्शनों में से एक: इटारसी भारत का 8वां सबसे व्यस्त रेलवे जंक्शन है। यहाँ से प्रतिदिन 300 से 420 से अधिक ट्रेनें गुजरती हैं, जिसमें यात्री और मालगाड़ियां दोनों शामिल हैं। यह पंडित दीनदयाल उपाध्याय जंक्शन और नागपुर जंक्शन के बाद सबसे महत्वपूर्ण जंक्शन स्टेशनों में से एक है।


लोकोमोटिव शेड: इटारसी में एक बड़ा लोकोमोटिव शेड है, जहाँ डीजल और इलेक्ट्रिक इंजनों का रखरखाव किया जाता है। कई ट्रेनों का यहां लोकोमोटिव बदला जाता है, खासकर जब वे एक इलेक्ट्रिक ट्रैक से डीजल ट्रैक या इसके विपरीत जाती हैं।


इटारसी का इतिहास मुख्य रूप से 19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी की शुरुआत में भारतीय रेलवे के विकास के साथ शुरू होता है। इससे पहले, यह एक छोटा सा ग्रामीण क्षेत्र था। इटारसी नाम की उत्पत्ति के बारे में कई धारणाएं हैं। सबसे प्रचलित धारणा यह है कि यह दो शब्दों से बना है। ईंट जिसका अर्थ है ईंट।तारसी एक प्रकार का पेड़। यह माना जाता है कि यहाँ ईंट भट्टे थे या ईंटों का व्यापार होता था, और "तारसी" नामक पेड़ों की बहुतायत थी, जिससे इसका नाम "ईंट-तारसी" से बदलकर इटारसी पड़ गया।


1866-1869: के आसपास ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे (GIPR) ने नागपुर से इटारसी तक और फिर इटारसी से जबलपुर तक रेल लाइन बिछाई। इससे इटारसी एक महत्वपूर्ण रेलवे केंद्र बन गया।1884: में भोपाल रियासत तक रेलवे लाइन का विस्तार हुआ, जिससे इटारसी की केंद्रीय भूमिका और भी मजबूत हो गई।


1866-1869: के आसपास ग्रेट इंडियन पेनिन्सुलर रेलवे (GIPR) ने नागपुर से इटारसी तक और फिर इटारसी से जबलपुर तक रेल लाइन बिछाई। इससे इटारसी एक महत्वपूर्ण रेलवे केंद्र बन गया।1884: में भोपाल रियासत तक रेलवे लाइन का विस्तार हुआ, जिससे इटारसी की केंद्रीय भूमिका और भी मजबूत हो गई। इटारसी शहर का इतिहास अविभाज्य रूप से भारतीय रेलवे के इतिहास से जुड़ा हुआ है। यह एक ऐसा शहर है जो रेल के पहियों पर विकसित हुआ और आज भी अपनी पहचान और प्रगति के लिए अपने रेलवे जंक्शन पर बहुत अधिक निर्भर करता है।


अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व, इटारसी एक उपखंड है, तो  उपखंड का प्रमुख राजस्व अधिकारी होता है। वह भूमि अभिलेखों  के रखरखाव, राजस्व वसूली, सीमांकन विवादों के निपटारे और विभिन्न राजस्व मामलों में अपील सुनने का कार्य करता है। कानून और व्यवस्था बनाए रखने में भी उसकी भूमिका होती है। वह तहसीलदार और नायब तहसीलदार जैसे अधिकारियों के कार्यों का पर्यवेक्षण करता है।


तहसीलदार/नायब तहसीलदार, इटारसी तहसील में तहसीलदार प्रमुख प्रशासनिक अधिकारी होता है। वह अपने क्षेत्र में राजस्व संग्रह, भूमि अभिलेखों का प्रबंधन, जाति प्रमाण पत्र, निवास प्रमाण पत्र जैसे विभिन्न प्रमाण पत्र जारी करने, और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करने के लिए जिम्मेदार होता है। नायब तहसीलदार तहसीलदार की सहायता करते हैं और छोटे प्रशासनिक कार्यों को संभालते हैं। पटवारी ग्राम स्तर पर भूमि अभिलेखों और राजस्व संबंधी कार्यों को देखते हैं, और वे तहसीलदार के अधीन कार्य करते हैं।


ग्रामीण विकास योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए इटारसी एक विकासखंड ब्लॉक भी  है। यहां एक जनपद पंचायत  है, जिसके निर्वाचित सदस्य ग्रामीण क्षेत्रों के विकास संबंधित निर्णयों में भाग लेते हैं। एक मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत का प्रशासनिक प्रमुख होता है, जो विभिन्न ग्रामीण विकास योजनाओं  के क्रियान्वयन का पर्यवेक्षण करता है।


अनुविभागीय अधिकारी पुलिस अनुविभाग स्तर पर कानून और व्यवस्था का सर्वोच्च अधिकारी होता है। इटारसी में  पुलिस थाने का नेतृत्व थाना प्रभारी करता हैं। वे अपने अधिकार क्षेत्र में कानून और व्यवस्था बनाए रखने, अपराधों की जांच करने और अपराधियों को पकड़ने के लिए जिम्मेदार होते हैं।


इटारसी में एक नगर पालिका है, जो शहर के स्थानीय शासन और नागरिक सुविधाओं के लिए जिम्मेदार है। यह इटारसी शहर की स्थानीय स्वशासन इकाई है।इसमें वार्डों से सीधे चुने गए पार्षद होते हैं। एक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष  का चुनाव किया जाता है। परिषद शहर के विकास और नागरिक सुविधाओं से संबंधित प्रस्तावों और नीतियों पर निर्णय लेती है। मुख्य नगर पालिका अधिकारी  सीएमओ नगर पालिका का प्रशासनिक प्रमुख होता है। वह राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक अधिकारी होता है। वह परिषद द्वारा लिए गए निर्णयों को लागू करने, नगर पालिका के कर्मचारियों का प्रबंधन करने, बजट तैयार करने और शहर की नागरिक सुविधाओं जैसे स्वच्छता, जल आपूर्ति, सड़क रखरखाव, स्ट्रीट लाइट, ड्रेनेज, और जन्म-मृत्यु पंजीकरण आदि को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार होता है। वह राज्य सरकार और नगर पालिका के बीच एक कड़ी के रूप में भी कार्य करता है।


जब मैंने वहां कार्यभार सम्हाला तब वहां की नगर पालिका भंग हो गई। मुझे प्रशासक नगर पालिका का चार्ज भी दिया गया। 


इटारसी शहर राजनीतिक रूप से बहुत जागरूक शहर था। जहां स्थानीय प्रेस भी महत्वपूर्ण भुक्तिका निभाया था। इटारसी में कई हिंदी समाचार पत्रों के स्थानीय संस्करण या रिपोर्टर सक्रिय रहते हैं। ये समाचार पत्र शहर और आसपास के क्षेत्रों की स्थानीय खबरों, राजनीतिक गतिविधियों, अपराध, विकास कार्यों और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रमों को कवर करते हैं। कुछ प्रमुख दैनिक समाचार पत्र जिनके यहाँ ब्यूरो या रिपोर्टर हो सकते हैं, उनमें शामिल थे दैनिक भास्कर, नई दुनिया, 



स्थानीय केबल न्यूज़ चैनल, कुछ स्थानीय केबल नेटवर्क भी होते थे जो इटारसी और नर्मदापुरम जिले की स्थानीय खबरें प्रसारित करते हैं। ये चैनल आमतौर पर छोटे स्तर पर संचालित होते हैं और समुदाय-आधारित समाचारों पर ध्यान केंद्रित करते थे। आकाशवाणी के स्थानीय या क्षेत्रीय स्टेशन से भोपाल से इटारसी के लिए भी समाचार और कार्यक्रम प्रसारित करते थे।


नगर पालिका में हजारों समस्याएं हमेशा कड़ी रहती थी। मैंने रहने के लिए इटारसी विकास प्राधिकरण के भवन को चुना। मिस्टर सक्सेना किराये के घर में रहते थे। इस भवन में हमारा अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय था। जिसे मैंने तहसील कार्यालय में स्थानान्तरित करने का निर्णय लिया। मैं अपने स्टाफ को अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय तहसील कार्यालय में स्थानान्तरित करने का निर्देश दे कर होशंगाबाद आ गया। अगले दिन रविवार था। नगर पालिका के लोगो ने अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व  कार्यालय का सामान तहसील कार्यालय में स्थानान्तरित कर दिया। अगले दिन एक लोकल न्यूज़ पेपर ने खबर छपी कि अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय चोरी हो गया है। 


मुझे कलेक्टर ने बुला कर पूछा कि अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय क्यों हटाया। उनसे क्यों नहीं पूछा। मैंने उन्हें बताया कि उस भवन में मैं रहुँगा। इसलिए अनुविभागीय अधिकारी, राजस्व का कार्यालय तहसील कार्यालय में शिफ्ट कर दिया है। वह बोली कि इटारसी बहुत संवेदनशील शहर है वहां में कोई भी काम उनसे बिना पूछे ना करू। उन्होंने कार्यालय दोबारा उसी बिल्डिंग में शिफ्ट करने का निर्देश दिया। मैंने वह नहीं माना। वह बहुत नाराज हो गई। 


उन्होंने फिर बुला कर उनकी बात दोहराई और कार्यालय को सिफ्ट ना करने को कहा। जब मैंने कारण जानना चाहा तो उन्होंने मंत्री जी का नाम लिया। तब वहां विजय दुबे काकू भाई विधायक तथा मंत्री थे। वह सरकार में सामान्य प्रशासन राज्य मंत्री के पद पर थे। मैं इटारसी आ कर उनसे मिला और उन्हें मैंने कार्यालय सिफ्ट करने के अपने निर्णय से राजी कर लिया। कलेक्टर मैडम मेरे इस काम से खुश नहीं हुई। उन्होंने दोबारा कार्यालय पुराने भवन में शिफ्ट करने को नहीं कहा। मैंने उस भवन को ठीक करवा कर अपना परिवार होशंगाबाद से इटारसी शिफ्ट कर लिया। 


अब तक मुझे प्रशासन करने की कुछ समझ विकसित हो गई थी। मैंने पस्तोर डॉक्टराइन के तहत शासकीय अधिकारियों कर्मचारियों के व्यवहार को समझने की कोशिश की। में अक्सर सोचता कि आम आदमी के साथ शासकीय कार्यालयों के लोग हमेशा अच्छा बर्ताव क्यों नहीं करते। काम समय पर क्यों नहीं होते। हमेशा काम टालने, निर्णय ना लेते की प्रवृत्ति क्यों होती है। ज्यादातर लोग नेगेटिव क्यों सोचते। योजनाओं का क्रियान्वयन प्रभावी क्यों नहीं होता। 


लोग मज़बूरी में सहायता न कर फायदा क्यों उठाते है। मैने जब लोगों को बहुत बारीकी से देखना समझाना शुरू किया कि व्यक्ति का जो स्वाभाव है वह मज़बूरी में किसी दूसरे तरह का काम कर रहा है। स्वाभव के अनुरूप काम न कर पाने के कारण वह रोज अपने अन्दर लड़ रहा है। इसलिये बहार उसका व्यवहार सकारात्मक होता है। दूसरे हर व्यक्ति सोचता है कि जो उसकी योग्यता है उस के अनुरूप उसे काम नहीं दिया गया है। चपरासी बाबू बनना चाहता है। बाबू बड़े बाबू बनना चाहता है। बड़े बाबू अधिकारी बनना चाहता है और कलेक्टर चीफ सेक्रेटरी बनना चाहता है। अपने वर्तमान जीवन से कोई संतुष्ट नहीं है। 


यदि आप सरकारी दफ्तर में जाये और बाबू बिलकुल खाली बैठा होगा लेकिन आप को देख कर वह अपने आप को बिजी देखने के लिए कभी इस फाइल को उठाता है कभी उस फाइल को। कभी टेबल की दराज खिल कर कुछ मिलेगा। लेकिन आप की तरफ नहीं देखेगा। वह नो बडी से समबडी बनाने की कोशिश कर रहा है। वह आपको बताना चाहता है कि उसके पास बहुत ताकत है। 


कार्यालय के प्रति उदासीनता दिखती है कि वह अन्दर से सन्तुष्ट नहीं है। इसी कारण अधिकांश लोग बीमारियों के शिकार है। उन्हें हिपरटेंशन, इन्सोमिनिया, ब्लड प्रेशर, हार्ट और कभी-कभी कैंसर जैसी बीमारियां पकड़ लेती है।अब एक साधारण बात देखें एक सरकारी आदमी अपने घर के ड्राइंग रूम में बमुश्किल एक घंटा भी नहीं बैठता पर उसे सजा कर रखता है और दूसरी ओरकार्यालय की कुर्सी टेबिल पर आठ से दस घण्टे अपने जीवन के व्यतीत करात है उसे गन्दा धूल से भरा रखता है। उसके पास कम से काम तीन साल पुराने कैलेंडर टांगे होते है। 


वह उन्हें उतर कर नहीं सकता। पुरानी  फायलें अलमारियों में बहरी पड़ी है और चालू फायलें बाहर धूल खा रही है। डस्ट बिन महीनों से खाली नहीं हुआ है। टेबिल क्लाथ फट रहा है। इन सब को वह अपना नहीं मानता इसलिए ठीक नहीं करता। वह सोचता है कि यह सरकारी काम है। कोई और साफ सफाई करेगा। जब्कि फायलों पर जमी धूल और फफूद उसके फेफड़ों को बीमार कर रहे है। चारो और बिखरी फायलें प्राण वायु को सोख रही है। वह शाम तक थक जाता है। उसे पर्याप्त प्राण वायु नहीं मिलती है। 


मैं लोगों को इन बातों के प्रति जागरूक करने की कोशिश करता रहा हूँ और बहुत अच्छे परिणाम आये है।मैंने कार्यालय साफ सुथरा रखने का हर ऑफिस में अभियान चलाया। लोगों को बताया की तुम उनका काम करो या ना करो काम से काम व्यवहार तो आदमी जैसा करो। लोगों की समस्याओं को समझो अपने अधिकारों को जानो और देखों क्या कुछ सकारात्मक कर सकते हो। क्या कल पर टालने की जगह आज कोई निर्णय ले सकते हो। 


मेरे हिसाब से नियम कानून हमें एक स्पेस देता है जो नदी के दो किनारों की तरह होते है जिससे विवेक का अधिकार कहते है। कोई कानून हाँ या ना में नहीं होता है। अब यह हमारा चुनाव है कि हम निगेटिव सोच कर निर्णय लगे या सकरात्मक सोच के साथ। आपकेदेखने का नजरिया है आप की नजरे है वह क्या देख रही है। कानून की आप कैसे व्याख्या कर रहे हो। मैं आप को गलत काम करने या कानून तोड़ने अधिकार क्षेत्र के बाहर जा कर काम करने की सलाह नहीं दे रहा हूँ। में नजरियां बदलने की बात कर रहा हूँ। यह बदलाव आपके जीवन को खुशियों से भर देता है।  


मैं आप को एक उदाहरण से समझता हूँ। इटारसी रेलवे स्टेशन पर जब गाड़ी रुकती तब लोग प्लेटफॉर्म पर आते। रेलवे पुलिस गरीब लोगों को पकड़ लेती। उन पर उस समय के कानून दण्ड प्रिक्रिया संहिता की धारा 107 या 109 लगाते कि और उसके विरुद्ध प्रकरण बनाते कि अमुख व्यक्ति प्लेटफॉर्म नम्बर तीन पर अपराध करने की नियत से अपनी उपस्थिति बाथरूम में धुस कर छुपा रहा था। या अपनी पहचान सही नहीं बता रहा था। पुलिस को अपराध रोकने के लिए हर माह टारगेट दिया जाता था कि कितने लोगों को अरेस्ट करना है। 


इस गरीब व्यक्ति का सामान उसके डिब्बे में ट्रेन के साथ चला गया। परिवार बिछड़ गया। उसके पास वकील लगाने को पैसा नहीं है। कई लोग हिन्दी नहीं बोल पाते थे। खासकर दक्षिण भारत के लोग। इन्होंने बस इतनी गलती की कि वह प्लेटफॉर्म पर उतरे थे। उन्हें सामन्यता जेल भज दिया जाता था। महीनों तक उनके परिवार को पता नहीं होता कि आदमी कहा गायब हो गया। वर्षो जेल में बिना किसी अपराध के बंद रहता। 


अब भारतीय दण्ड संहिता में यह प्रावधान है कि यदि वह व्यक्ति जमानत या व्यक्तिगत मुचलका दे कर यह लिख दे कि वह छह माह तक कोई अपराध नहीं करेगा तो कार्यपालिक मजिस्ट्रेट उसे जमानत मुचलके पर छोड़ सकता है या उसे वचन बंध कर प्रकरण समाप्त कर सकता है। मैंने अपने रीडर से कहा कि ऐसे प्रकरणों में हम उससे लिखत में लगे कि वह साल भर हमारे अधिकार क्षेत्र में कोई अधराध घटित नहीं करेगा। उसे उनके मुचलके पर छोड़ देंगे। मैं किसी बेकसूर आदमी को जेल नहीं भेजुंगा। मैंने सीक्लोस्टाइल करबा कर कागज तैयार कर करयही दिए। जब कोई आदमी आता है उसे रहा कर प्रकरण निपटा देता था। मुझे पता था कि पुलिस वकील मेरे इस काम से खुश नहीं होंगे। एक मासिक बैठक में पुलिस अधीक्षक ने कलेक्टर से मेरी शिकायत की। मैं अभूता सरे पुलिस केस ले कर गया था। पुलिस की समस्या यह है कि थाने की मुन्शी बहुत पड़े लिखे नहीं होते। वह एक जैसे वाक्य बना कर सभी प्रकरणों में एक जैसा दिखता था। 


सब में यही लिखा था कि अमुक व्यक्ति प्लेटफार्म नम्बर तीन पर अपराध करने की नियत से अपनी उपस्थिति बाथरूम में घुस कर छुपा रहा था। या अपनी पहचान सही नहीं बता रहा था। मैंने पुलिस अधीक्षक को वह प्रकरण पढ़ कर सुनाए कि रेलवे का बाथरूम एक कमरे का है। उसमें कोई व्यक्ति अपने को कैसे छुपा सकता है। सब लोग मेरी बात समझ गए। मैंने अपना काम जारी रखा। किसी को जेल नहीं भेजा। सब को जमानत मुचके पर छोड़ता रहा। किसी वकील की जरुरत नहीं रही। मेरा रीडर ही फॉर्म भर देता है दस्खत कर देता आदमी चला जाता था। 


प्रशासन जब भी कोई कार्यक्रम या अभियान व्यापक स्तर पर चलना चाहता है तो उस को चलने की जवाबदारी कलेक्टर की होती है। वह कार्यक्रम चाहे किसी भी विभाग से संबंधित हो। पहली वार मध्य प्रदेश में तेंदूपत्ता खरीदी नीति बनाई गई। मध्यप्रदेश तेंदूपत्ता (व्यापार विनियमन) अधिनियम, 1964 और इसके तहत बनाई गई नियमावली द्वारा  तेंदूपत्ता के व्यापार में राज्य का एकाधिकार स्थापित करना और तेंदूपत्ता संग्राहकों के हितों की रक्षा करना था।  तेंदूपत्ता के व्यापार पर राज्य सरकार का एकाधिकार है। किसी अन्य व्यक्ति या ठेकेदार को तेंदूपत्ता का व्यापार करने की अनुमति नहीं थी।


संग्रहण सहकारी समितियों के माध्यम से: तेंदूपत्ता का संग्रहण प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियों (के माध्यम से किया जाना था। इन समितियों को संग्राहकों से सीधे तेंदूपत्ता खरीदी था। नीति का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य तेंदूपत्ता संग्राहकों, विशेषकर जनजातीय समुदाय को आर्थिक लाभ पहुंचाना है। राज्य सरकार तेंदूपत्ता संग्राहकों को उचित पारिश्रमिक देने के लिए संग्रहण दर में वृद्धि करना तथा तेंदूपत्ता के व्यापार से होने वाले शुद्ध लाभ का एक हिस्सा संग्राहकों के साथ बांटा जाना था। बिचौलियों को खत्म करने और भ्रष्टाचार को रोकने के लिए, सरकार संग्राहकों को तेंदूपत्ता के बोनस की राशि सीधे उनके खाते में पहुंचाने का प्रयास किया जाना था। मध्य प्रदेश में तेंदूपत्ता के व्यापार के लिए एक त्रिस्तरीय सहकारी संरचना बनाई गई। शीर्ष स्तर पर मध्य प्रदेश राज्य लघु वनोपज (व्यापार एवं विकास) सहकारी संघ मर्यादित (M.P. State Minor Forest Produce Federation)। द्वितीय स्तर पर  जिला वनोपज सहकारी संघ (District Forest Produce Cooperative Unions), तथा प्राथमिक स्तर पर प्राथमिक वनोपज सहकारी समितियां (Primary Forest Produce Cooperative Societies)। 


तेंदूपत्ता उगाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को, यदि उनके द्वारा उगाए गए पत्तों की मात्रा एक मानक बोरे से अधिक होने की संभावना हो, तो अपना पंजीकरण कराना अनिवार्य है। तेंदूपत्ता व्यापार विनियमन अधिनियम का उल्लंघन करने पर भारी जुर्माना और कारावास का प्रावधान है। सरकार तेंदूपत्ता खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और उसकी निगरानी करने पर जोर दे रही है ताकि संग्राहकों को उनके हक का पूरा लाभ मिल सके। यह नीति मध्य प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, विशेषकर वनवासी समुदायों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह उन्हें आय का एक महत्वपूर्ण स्रोत प्रदान करती है।


इस योजना को शुरू करवाने में राजस्व अधिकारियों को वन विभाग के अधिकारियों को सहायता करना था ,कलेक्टर ने तेंदू पत्ता संग्रहण का टारगेट हम लोगों को दिया था। जिसकी साप्ताहिक समीक्षा होती थी। मजा तो जब आया जब कलेक्टर यह देखने लगे कि किसने कितने लम्बे तेंदू पत्ता का संग्रहण किया है। हम लोग लम्बे से लम्बा पत्ता ढूढ़ कर बैठक में ले जाते थे। 


एस डी  एम को मध्य प्रदेश राज्य में  राजस्व कानूनों के तहत  "राजस्व न्यायालय"  के रूप में शक्तियां प्राप्त होती हैं।


जब एस डी  एम   इन राजस्व मामलों में न्यायिक या अर्ध-न्यायिक क्षेत्र में कार्य करता है, तो उसके द्वारा पारित आदेशों के खिलाफ उच्च राजस्व अधिकारियों (जैसे कलेक्टर, संभागीय आयुक्त, या राजस्व बोर्ड) के समक्ष अपील या पुनरीक्षण (रिवीजन) दायर किया जा सकता है।


उदाहरण के लिए, भूमि विवाद, नामांतरण (mutation), सीमांकन, भूमि अभिलेखों से संबंधित मामले, अतिक्रमण हटाना आदि ऐसे मामले हैं जहाँ एस डी  एम  राजस्व न्यायालय के रूप में कार्य करता है। ऐसे मामलों में, उसके निर्णयों की समीक्षा या पुनरीक्षण उच्च राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जा सकता है।


यह समझना महत्वपूर्ण है कि एस डी  एम  का न्यायालय पूर्ण सिविल न्यायालय नहीं है। सिविल न्यायालयों को संपत्ति के स्वामित्व, अधिकार और हित से संबंधित सभी प्रकार के दीवानी मामलों को तय करने का व्यापक अधिकार होता है।


यदि कोई मामला विशुद्ध रूप से संपत्ति के स्वामित्व या अन्य सिविल अधिकारों से जुड़ा है, तो एस डी  एम  अक्सर पक्षकारों को सिविल न्यायालय में जाने का निर्देश देता है। एस डी  एम  केवल कब्जे से संबंधित विवादों (जैसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 145 के तहत) में अंतरिम आदेश दे सकता है, लेकिन स्वामित्व का अंतिम फैसला सिविल कोर्ट ही करती है।


पुनरीक्षण  बनाम अपील,  जब किसी निर्णय से असंतुष्ट पक्ष उस निर्णय को उच्च प्राधिकारी के समक्ष चुनौती देता है, तो वह अपील कहलाती है। राजस्व मामलों में, एस डी  एम के आदेशों के खिलाफ कलेक्टर या उच्च अधिकारी के पास अपील दायर की जा सकती है। पुनरीक्षण एक ऐसी शक्ति है जिसके तहत एक उच्च न्यायालय या प्राधिकारी निचली अदालत या प्राधिकारी के रिकॉर्ड को यह देखने के लिए मांग सकता है कि क्या कोई आदेश कानूनी रूप से सही था, या उसमें कोई प्रक्रियात्मक त्रुटि थी। राजस्व बोर्ड या संभागीय आयुक्त अक्सर एस डी  एम  के आदेशों की वैधानिकता या औचित्य की जांच के लिए पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते हैं, खासकर जब अपील का कोई प्रावधान न हो या विशिष्ट परिस्थितियों में।


प्रशासनिक और कार्यकारी कार्य, एस डी  एम  के पास व्यापक प्रशासनिक और कार्यकारी शक्तियां भी होती हैं, जैसे कानून और व्यवस्था बनाए रखना, विभिन्न लाइसेंस जारी करना (जैसे हथियार लाइसेंस), विवाह पंजीकरण, चुनाव संबंधी कार्य आदि। इन कार्यों में "सिविल परीक्षण" की अवधारणा अलग होती है और आमतौर पर इसमें प्रशासनिक अपीलों या न्यायिक समीक्षा  का मार्ग होता है, न कि सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत परीक्षण।


एस डी  एम  के पास सीधे तौर पर सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत व्यापक "सिविल पुनरीक्षण" अधिकार नहीं होते हैं, जैसे कि सिविल न्यायालयों या उच्च न्यायालयों के पास होते हैं। हालांकि, जब वे राजस्व मामलों में न्यायिक या अर्ध-न्यायिक क्षमता में कार्य करते हैं, तो उनके निर्णयों की समीक्षा या अपील उच्च राजस्व अधिकारियों जैसे कलेक्टर, संभागीय आयुक्त या राजस्व बोर्ड द्वारा की जा सकती है। यदि मामला विशुद्ध रूप से सिविल प्रकृति का है (जैसे संपत्ति के स्वामित्व का विवाद), तो एस डी  एम  आमतौर पर पक्षकारों को संबंधित सिविल न्यायालय में जाने का निर्देश देगा।


मेरे कमिश्नर थे आदित्य विजय सिंह। वह बहुत ईमानदार, मिलनसार, हंसमुख तथा सरल अधिकारी थे। वह जब भी आते कलेक्टर या तो टूर पर चली जाती या छुट्टी ले लेती थी। उन्हें अटेंड करने की जिम्मेदारी मेरी होती थी। बहुत काम मोके होते जब कलेक्टर उनके साथ होती थी। वह अकसर तवा डैम के गेस्ट हाउस में रुकते थे। तवा बांध नर्मदा नदी पर नहीं, बल्कि नर्मदा की एक प्रमुख सहायक नदी, तवा नदी पर बना हुआ है। तवा नदी सतपुड़ा पर्वत श्रृंखला से निकलती है। यह मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में स्थित है और इटारसी से इसकी दूरी लगभग 30-35 किलोमीटर है। तवा बांध का निर्माण कार्य 1958 में शुरू हुआ था और यह 1978 में बनकर तैयार हुआ। 


इस बांध का मुख्य उद्देश्य सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है। यह नर्मदापुरम और हरदा जिलों में हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा प्रदान करता है, जिससे किसानों को काफी लाभ होता है। तवा बांध एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल भी है, खासकर मानसून के मौसम में जब बांध के गेट खोले जाते हैं। यहां का प्राकृतिक सौंदर्य, शांत वातावरण और आसपास की हरियाली पर्यटकों को आकर्षित करती है। यहाँ नौकायन और अन्य जल-पर्यटन गतिविधियां भी उपलब्ध हैं। यह नर्मदा घाटी परियोजना का हिस्सा है तथा तवा बांध नर्मदा घाटी परियोजना के तहत निर्मित बड़े बांधों में से एक है। तवा जलाशय सतपुड़ा राष्ट्रीय उद्यान और बोरी वन्यजीव अभ्यारण्य की पश्चिमी सीमा बनाता है, जिससे इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा मिलता है।


एक बार कमिश्नर की टीम हमारे कार्यालय का निरिक्षण करने आई। उन्होंने कुछ कोर्ट कैसेस में कुछ छोटी-छोटी गलतियां निजकर कर रिपोर्ट में लिखी। जब कमिश्नर साहब आये तो उन्होंने मुझे कहा कि मुझे तो शासन ने पढ़ने के लिए रीडर दिया है। राजस्व कोर्ट में जो बाबू काम करता है उसे रीडर कहते है। तो वह पढ़ता है। क्या तुम्ह पढ़ते हो। मैं उनका मजाक समझ नहीं सका। मैंने कहा सर में खुद पढ़ता हूँ। उन्होंने कहा कि फिर यह गलतियां क्यों है। मैंने प्रत्युत्पन्नमति से जवाब दिया कि सर कुछ छोटी-छोटी गलतियां मैंने जानबूझ कर छोड़ दी है ताकि कुछ कैसेस की अपील आपके कोर्ट में हो सके। आखिर ऊपर के कोर्ट के लोगों की भी तो बच्चे है। वह मेरी बात पर खूब हँसे। 



इटारसी के पास कैसला जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में PRADAN (Professional Assistance for Development Action) नामक गैर-सरकारी संगठन का कार्य ग्रामीण विकास और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण रहा है। PRADAN एक प्रतिष्ठित भारतीय NGO है जिसे 1983 में दीप जोशी, वेद आर्य और विजय महाजन जैसे दूरदर्शी व्यक्तियों द्वारा स्थापित किया गया था।



दीप जोशी (जो आईआईटी कानपुर और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र थे) वेद आर्य और विजय महाजन (आईआईटी दिल्ली और आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र) दोनों ही देश के ग्रामीण इलाकों में गरीबी और पिछड़ेपन से गहराई से प्रभावित थे। उन्होंने महसूस किया कि ग्रामीण गरीबों की मदद करने के लिए केवल धन या सरकारी योजनाएं पर्याप्त नहीं होंगी, बल्कि उन्हें ऐसे पेशेवरों की आवश्यकता है जो सहानुभूति, ज्ञान और जमीनी स्तर पर काम करने की इच्छा रखते हों। इसी सोच के साथ, उन्होंने 1983 में PRADAN की स्थापना की।


PRADAN का मूल दर्शन यह रहा है कि अच्छी तरह से शिक्षित और प्रेरित पेशेवर ग्रामीण समुदायों के साथ मिलकर काम करके उनकी आजीविका में सुधार ला सकते हैं। वे "प्रदान" (समाज को वापस देना) की भावना में विश्वास करते थे और इसे शिक्षित पुरुषों और महिलाओं के लिए एक पूर्ण और व्यवहार्य पेशा मानते थे।


PRADAN ने मध्य प्रदेश में कई वर्षों से काम किया है, और इटारसी-कैसला क्षेत्र में उनका हस्तक्षेप इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य ग्रामीण आजीविका को मजबूत करना है। PRADAN का काम हमेशा समुदाय को समझने और विश्वास बनाने से शुरू होता है। कैसला जैसे आदिवासी और ग्रामीण बहुल क्षेत्रों में, PRADAN के प्रारंभिक कार्यकर्ताओं ने गाँव में रहकर स्थानीय आबादी की आजीविका के पैटर्न, सामाजिक संरचनाओं और सामना की जाने वाली विशिष्ट चुनौतियों का गहन अध्ययन किया होगा। उन्होंने देखा होगा कि कैसला में कृषि की अनिश्चितता, वन उत्पादों पर निर्भरता, पानी की कमी और महिलाओं के लिए सीमित अवसर प्रमुख मुद्दे थे।


PRADAN के काम की मुख्य रणनीति महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन और उन्हें सशक्त बनाना है। कैसला में भी, उन्होंने स्थानीय महिलाओं को छोटे-छोटे समूहों में संगठित किया। इन समूहों को नियमित रूप से मिलने, छोटी बचत करने और सदस्यों को आपस में ऋण देने के लिए प्रोत्साहित किया गया। यह वित्तीय अनुशासन और सामूहिक निर्णय लेने की शुरुआत थी।


SHGs के मजबूत होने के बाद, PRADAN ने महिलाओं की आजीविका बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया। उन्हें विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए कौशल प्रशिक्षण दिया गया:


कृषि में सुधार: बेहतर फसल पद्धतियाँ, जैविक खेती, सब्जियों की खेती (जो अधिक आय देती है), और छोटे पैमाने पर पशुधन जैसे मुर्गी पालन या बकरी पालन।


गैर-कृषि आधारित कार्य: स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके हस्तशिल्प, सिलाई, खाद्य प्रसंस्करण जैसी गतिविधियाँ।


वित्तीय साक्षरता: महिलाओं को बैंक खातों का प्रबंधन करने, सरकारी योजनाओं के तहत ऋण प्राप्त करने और अपने छोटे व्यवसायों की योजना बनाने के लिए प्रशिक्षित किया गया।


PRADAN ने SHGs को बैंकों से जोड़कर उन्हें संस्थागत ऋण प्राप्त करने में मदद की, जिससे वे अपनी आजीविका गतिविधियों का विस्तार कर सकें। उन्होंने महिलाओं को अपने उत्पादों को सीधे बाजार तक पहुंचाने में भी सहायता की, जिससे उन्हें बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और अपनी मेहनत का उचित मूल्य प्राप्त करने में मदद मिली।


SHGs केवल आर्थिक मंच नहीं थे; वे महिलाओं को सामाजिक मुद्दों पर सामूहिक रूप से आवाज उठाने के लिए भी सशक्त करते थे। कैसला में इन समूहों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और महिलाओं के अधिकारों जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने का काम किया होगा। उन्होंने घरेलू हिंसा, बाल विवाह और शराबबंदी जैसी समस्याओं के खिलाफ भी आवाज उठाई। कैसला में PRADAN के दशकों के काम का एक गहरा और स्थायी प्रभाव पड़ा है। आय में वृद्धि: SHGs से जुड़ी महिलाओं और उनके परिवारों की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार हुआ। मैंने ग्रामीण विकास की रणनीति को इस संस्था का काम देखा कर बहुत कुछ सीखा और उन्हें लागू किया। 


इटारसी और उसके आसपास के गांवों में, जहां कृषि और मजदूरी जीवन का आधार हैं, सामाजिक-आर्थिक विषमताएँ गहरी जड़ें जमाए हुए थीं। इन्हीं परिस्थितियों में, सुनील और राज नारायण नामक दो समर्पित व्यक्तियों ने समाजवाद और न्याय के आदर्शों से प्रेरित होकर एक महत्वपूर्ण यात्रा शुरू की। इसका उद्देश्य था हाशिये पर खड़े समुदायों को सशक्त करना और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत आवाज उठाना।


सुनील और राज नारायण, दोनों ही डॉ. राम मनोहर लोहिया के विचारों से गहरे प्रभावित थे। लोहिया का "सप्त क्रांति" का सिद्धांत, जिसमें जाति, लिंग, संपत्ति, शास्त्र और रंग जैसी असमानताओं के खिलाफ संघर्ष शामिल था, उनके प्रेरणा स्रोत था। उन्होंने महसूस किया कि इटारसी के गाँवों में व्याप्त शोषण और भ्रष्टाचार, लोहियावादी सिद्धांतों के सीधे खिलाफ हैं। उन्होंने गाँव-गाँव जाकर किसानों और मजदूरों के छोटे-छोटे समूह बनाए, उन्हें उनके अधिकारों के बारे में जागरूक किया। यह संगठन का सबसे शुरुआती और महत्वपूर्ण कदम था, जिसमें राज नारायण की जमीनी पकड़ और सुनील की वैचारिक स्पष्टता ने अहम भूमिका निभाई। 


यह लोग हर माह अपने सदस्यों से सम्पर्क करें मात्र एक रुपये चंदे के रूप में लेते थे। उनका उद्देश्य चन्दा एकत्रित करना नहीं था। इस बहाने वह लोगों से मिल कर जानकारियां एकत्र करते थे। न्याय के लिए लड़ाई: छोटे-मोटे मामलों में,, या किसी मजदूर को पूरी मजदूरी न मिलना, वे स्थानीय प्रशासन से सीधे बात करते और जरूरत पड़ने पर छोटे-मोटे धरने-प्रदर्शन भी करते।


इन वर्षों में, सुनील और राजनारायण की जोड़ी ने इटारसी के गांव में एक विश्वसनीय नाम बना लिया था। राज नारायण अपनी बुलंद आवाज और निडरता के लिए जाने जाते थे, जबकि सुनील अपनी संगठनात्मक क्षमता और गहरी समझ के लिए।


'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण पैदल यात्रा इटारसी से भोपाल' तक निकली थी। छात्रों और स्थानीय लोहियावादी संगठन के कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर, एक विशाल 'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण यात्रा' की योजना बनाई। यह यात्रा इटारसी से शुरू होकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल गई थी। जिसका मुख्य उद्देश्य राज्यव्यापी भ्रष्टाचार के खिलाफ लोगों को एकजुट करना और सरकार पर दबाव बनाना था यह 'भ्रष्टाचार विरोधी जन जागरण यात्रा' मध्य प्रदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक मजबूत आवाज बनकर उभरी। 


जब मेरी पोस्टिंग यहां हुई तो मैंने उन्हें मिलाने के लिये बुलाया। मैंने उनसे कहा कि यदि वह जनता के बीच काम करना चाहते है तो पहले समस्या से मुझे सूचित करें। यदि मैं वह समस्या सुलझाने में कामयाब न हो सकूँ तब वह आंदोलन करे। वह इस बात पर सहमत हो गये। उनका सूचना तंत्र हमारे सूचना तंत्र से ज्यादा कुशल था। मैं प्रशासन में सुधार लेन की लिए प्रतिबद्ध था। 


इटारसी, मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) जिले में एक प्रमुख रेलवे जंक्शन और कृषि प्रधान क्षेत्र है। यहाँ और इसके आसपास के ग्रामीण इलाकों में बिजली की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर हाई-टेंशन (उच्च वोल्टेज) बिजली लाइन बिछाई जा रही थी। यह हाई-टेंशन लाइनें खेतों के ऊपर से गुजरती है, जिससे किसानों को अपनी कृषि गतिविधियों, जैसे ट्रैक्टर चलाना, फसल काटना या ऊँचे उपकरण इस्तेमाल करने में दिक्कत आती है। 


कई बार तारों के नीचे फसल खराब हो जाती है या उसमें आग लगने का खतरा रहता है। किसानों को  उनकी जमीन से गुजरने वाली हाई-टेंशन लाइनों या टावरों के लिए उचित मुआवजा दिया जाना था। मैंने राजस्व की टीम बना कर खेतों तथा पेड़ों का सर्वे करवा कर उचित, मुआवजा देने के लिए किसानों के खातों में राशियां ट्रांसफर की थी। जिससे किसानों में असंतोष न फैले।


एक दिन सुनील तथा राज नारायण ने मेरे कार्यालय आ कर शिकायत की कि जो मुआवजा की राशि बैंक खाते में जमा की गई थी उसे तहसीलदार, बैंक ब्रांच ऑफिसर, राजस्व निरीक्षक, पटवारी  तथा बिजली विभाग के अधिकारियों ने नकद राशि निकाल कर उसे छह नोटों से ढेर लगा कर आपस में बांट ली है। किसान को एक हिस्सा मिला है। 


अलग-अलग नोटों की बहुत सारी गाड़ियां थी गिनने का समय नहीं था इसलिए ढेर लगा कर बांटा गया। मेरे लिए इस तरह रुपया बांटने के नया मामला था। मैंने उनसे पूछा कि वह पुलिस कार्यवाही चाहते है या रुपया वापस करना। उन्होंने कहा किसानों का पैसा वापस हो जाए तो अच्छा है। पुलिस कार्यवाही में कब पैसा मिलेगा या नहीं निश्चित नहीं है। 


मैंने कहा कि देखो में प्रयास करता हूँ। सबसे पहले मैंने अपने आवास पर पटवारी को बुलाया। पहले उसने मना किया फिर जब पुलिस तथा सस्पेंड करने का डर दिखाया तो वह टूट गया। उसने पैसा लेना स्वीकार किया। मैंने अपनी गाड़ी से उसे उसके घर भेज कर रुपया मंगा लिया। फिर एक-एक कर अधिकारियों को बुलाया और पहले उन्होंने मना किया पर जब पटवारी से आमना-सामना करवाया तब लोगों ने माल लिया। घटना दो दिन पहले की थी अतः सभी राशि वसूल हो गई। 


फिर सुनील तथा राज नारायण ने कहा कि इन्हीं अधिकारियों ने जैसे पैसा लिया है बैसे ही गांव में वापिस किया जाए। सब बहुत डरे थे कि कहीं लोग उन्हें मारे नहीं। मैंने पुलिस फ़ोर्स के साथ उन्हें गांव भेजा और पहली बार लोगों ने इस तरह रिश्वत का पैसा बापिस होते हुए देखा। यह अभूत सफल अभियान था। 


इटारसी में तीन साल पूरे हो जाने पर मेरा स्थानांतरण सीहोर जिले में हो गया। 



सीहोर 


यहां हमारे कलेक्टर थे अजय सिंह। जब मैं उनसे मिला वह बहुत सरल स्वभाव के अधिकारी थे। उन्होंने पूछा कि तुम क्या काम करना चाहते हो। मैंने कहा सर यह आपका निर्णय होगा जो भी आप काम देंगे में बहुत मेहनत से करूंगा। 


अजय सिंह 1983 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी थे। उन्हें मध्य प्रदेश कैडर आवंटित किया गया था, और राज्य पुनर्गठन (वर्ष 2000 में) के बाद वह छत्तीसगढ़ कैडर में चले गए। उन्हें 11 जनवरी 2018 को छत्तीसगढ़ का मुख्य सचिव नियुक्त किया गया था। मुख्य सचिव के पद पर रहने से पहले और उसके बाद भी, अजय सिंह ने छत्तीसगढ़ सरकार में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, जिनमें कृषि आयुक्त और कृषि एवं जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अपर मुख्य सचिव जैसे पद शामिल थे। जब वह कृषि आयुक्त थे तो कई बार उन्होंने अधिकारियों को ट्रेनिंग देते मुझे बुलाया था। 


सीहोर में स्थित शुगर मिल, जिसे पहले भोपाल शुगर इंडस्ट्रीज लिमिटेड के नाम से जाना जाता था, अब बंद हो चुकी है और एक खंडहर में तब्दील हो गई है। यह कभी सीहोर की पहचान थी और इस क्षेत्र के लिए रोजगार का एक महत्वपूर्ण स्रोत थी।

इस शुगर मिल की स्थापना 1938 में भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्लाह खान ने की थी। यह उस समय की एक आधुनिक और महत्वपूर्ण औद्योगिक इकाई थी। एक समय था जब सीहोर शुगर मिल द्वारा उत्पादित चीनी को गुणवत्ता के लिए जाना जाता था और उसके क्षेत्र को औद्योगिक पहचान दिलाई थी। यहां हजारों लोगों को रोजगार मिलता था, जिससे आसपास के क्षेत्रों से भी लोग काम करने के लिए आते थे। शुरू में मुझे इसी मिल के गेस्ट हाउस में ठहराया गया था। तब यह भवन बहुत पुराना था। कुछ दिन बाद मुझे आष्टा का एस डी एम बना दिया गया। 



आष्टा 

आष्टा मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है। यह इंदौर और भोपाल के लगभग बीच में, पार्वती नदी के किनारे बसा हुआ है। आष्टा का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है और इसकी पहचान कई पौराणिक कथाओं और ऐतिहासिक घटनाओं से होती है। यह स्थान ऋषि अष्टावक्र की तपोभूमि था। आष्टा शहर का नाम प्रसिद्ध ऋषि अष्टावक्र के नाम पर पड़ा है। मान्यता है कि यह स्थान उनकी तपोभूमि रहा है। ऋषि अष्टावक्र की तपोभूमि आष्टा शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर, आष्टा-शुजालपुर रोड पर एक पहाड़ी पर स्थित है।


 स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, आष्टा को माता पार्वती का पीहर (मायका) माना जाता है। शहर से निकली पार्वती नदी और उसके किनारे स्थित शिव मंदिर इस मान्यता को पुष्ट करते हैं। शहरवासी भगवान भोलेनाथ को अपना दामाद मानते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस पार्वती-शंकर मंदिर में लंकापति रावण भी भगवान शिव की स्तुति करने आता था।



यादव राजाओं का प्रभाव, कुछ मान्यताओं के अनुसार, 13वीं शताब्दी में विदर्भ के देवगिरी यादव राजाओं का राज्य यहां तक फैला हुआ था। कहा जाता है कि यादव राजा महादेव और रामचंद्र के मंत्री हिमाद्री ने यहां आठ मंदिरों का निर्माण कराया था, जिसके कारण शहर का नाम 'आष्टा' पड़ा।


मराठा शैली के मंदिर, पार्वती नदी के किनारे स्थित शिव-पार्वती मंदिर का निर्माण कालांतर में मराठा शैली के अनुरूप पूर्व मुखी किया गया था। यह मंदिर अपने ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है।


ब्रिटिश भारत के दौरान, यह क्षेत्र मिर्ज़ा अमजद बेग के अधिकार में था, जिन्हें वर्तमान आष्टा के संस्थापक के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने न केवल शहर में परिवहन व्यवस्था लाई, बल्कि पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए शिक्षा प्रणाली भी स्थापित की।


किला जैन मंदिर: आष्टा में एक पहाड़ी पर एक प्राचीन जैन मंदिर है, जिसे स्थानीय लोग "किला" कहते हैं। इसमें भगवान नेमिनाथ जी की प्रमुख प्रतिमा स्थापित है। खेड़ापति हनुमान मंदिर: एक तालाब के पास हनुमान जी का मंदिर है जिसे खेड़ापति मंदिर के नाम से जाना जाता है। ईलाही माता मंदिर, यह भी आष्टा में स्थित एक प्रमुख धार्मिक स्थल है। भंवरा गांव, आष्टा शहर से लगभग 15 किमी दूर भंवरा गांव में नवरात्रि के दौरान विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन किया जाता है।


वर्तमान में आष्टा अपनी अनाज मंडी विशेषकर सोयाबीन और गेहूं के लिए जाना जाता है, जो इस क्षेत्र के कृषि व्यापार का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यह शहर भोपाल-इंदौर राजमार्ग पर स्थित होने के कारण तेजी से विकास कर रहा है।


आष्टा के किला बिल्डिंग में उस समय तहसील तथा एस डी एम तथा तहसील कार्यालय लगते थे। ऊपरी मंजिल पर एस डी एम  का आवास था। यह एक पहाड़ी पर स्थित था। भवन बहुत जर्जर हालत में था। किसी तरह मरम्मत करवा कर ऑफिस तथा आवास मेंटेन किया जा रहा था। 


हमारे एक रीडर थे शर्मा जी। शायद उन्हें भरोसा नहीं था कि में राजस्व प्रकरण सुन कर निर्णय ले सकता हूँ। ज्ब भी मैं कोर्ट में केस सुनने बैठता वह मेरे कान मेउ कुछ कहने लगते। वहां वकील तथा पक्षकार भी होते थे। मैंने एक दो बार उन्हें ऐसा नहीं करने को कहा। लेकिन वह आदत से मजबूर थे। एक दिन वह मेरे कण में कुछ कहने की कोशिश कर रहे थे तब मैंने उन्हें पकड़ कर जोर से कहा शर्मा जी आज तय कर लेते है कि केस कौन सुनेगा। यदि आप को लगता है कि मुझ में इतना ज्ञान नहीं है तो मैं आप की जगह बैठता हूँ और केस आप सुने। और यदि आप को ऐसा लगे कि में केस सुन सकता हूँ तो आप अपनी जगह बैठो। उस दिन के बाद शर्मा जी ने मेरे कान में कुछ नहीं कहा।


मैं कई वर्षों से रिश्वत लेने के तरीके जब देखा तब एक डायरी में लिखता था। तहसील कार्यालय के एक बाबू का पहले निधन हो गया था।  एक दिन उसकी विधवा पत्नी ने आ कर शिकायत कि कि तहसील के नाजिर बाबू ने उनकी ग्रेच्युटी के पैसे काट कर काम किया है। उन्होंने रिश्वत ली है। जब मैंने तहसीलदार के माध्यम से जांच करवाई तो शिकायत सही निकली। 


मृतक बाबू और नाजिर बाबू दोनों अच्छे दोस्त थे। साथ का उठना बैठना था। जब मैंने देखा कि एक बाबू अपने मरे दोस्त की पत्नी से रिश्वत ले सकता है तो मुझे अब डायरी बनाने की जरुरत नहीं रहीं।  मैंने अपनी वह डायरी पार्वती नदी के जल में प्रवाहित कर दी।  मुझे पता चल चुका था कि हर सरकारी कर्मचारी अधिकारी के हस्ताक्षर की कीमत है। जो देनी ही पड़ेगी। ‘बाप बड़ा ना भैय्या सबसे बड़ा रुपैय्या।’ हर की कीमत है। सभी बिकाऊ है। यह बेईमानी नहीं नजराना है। जो देना ही पड़ेगा। मैंने पस्तोर डॉक्टराइन के तहत एक पैरोडी बनाई थी- ‘रहिमन पैसा राखिये, बिन पैसा सब सून। पैसा गए न उबरे मानुष मोती चून।’ 


हम भारतीयों के डी एन ए में ही बेईमानी के जीन्स है। हम लोग बातें बहुत आध्यात्म की करते है। आत्मा परमात्मा तथा सनातन में भरोसा दिखते है। लेकिन ईमानदार केबल बही है जिन्हें बेईमानी करने का अवसर नहीं मिला है। हमारे चरित्र की सच्ची परीक्षा तभी होती है जब अवसर हो और हम सच्चरित्र बने रहें बिना किसी डर के, बिना किसी लालच के तो हम अच्छे चरित्र के व्यक्ति है। मेरा मानना  है कि प्रशासन में एक स्तर ऐसा होना ही चाहिए जहां व्यक्ति भरोसा कर सके कि उसके साथ न्याय होगा। 


आष्टा नगर पालिका के प्रशासक के रूप में काम करते हुए जब नागरिकों से चर्चा की कि नगर की सबसे बड़ी समस्या है? तब उन्होंने बताया कि शहर का बस स्टेण्ड बहुत छोटा है। बसों की संख्या बढ़ जाने के कारण यात्रियों को बहुत असुविधा होती है। सुविधा ना होने के कारण शहर का विकास रुक गया है। तब हम लोगों ने नया बस स्टेण्ड बनाया। छिंदवाड़ा की तरह दुकानें नीलाम कर पैसा जुटाया। नया बस स्टैंड बहुत सुविधाजनक था।


मैंने रायपुर में अपनी पी एच डी अधूरी छोड़ दी थी। उसे पूरा करने के लिये मैंने बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी भोपाल के रीजनल प्लानिंग विभाग से माइक्रो लेवल प्लानिंग विषय पर काम करने के लिए रजिस्ट्रेशन करवाया। पहले मेरे गाइड थे श्री हरी मोहन अवस्थी जी। जो टीकमगढ़ में मुझे भूगोल पढ़ाते थे। फिर मेरे को-गाइड श्री हनुमान सिंह यादव जो  बरकतुल्लाह यूनिवर्सिटी भोपाल के रीजनल प्लानिंग विभाग के हेड थे। 


आष्टा के विशेष सन्दर्भ में मैंने यह डिग्री पूरी की। इसके लिए बहुत मेहनत की। आष्टा विकास खण्ड का ग्राउंड लेवल का डाटा जमा किया तथा डेवलपमेंट का एक मॉडल बनाया। जिसे बाद में सीईओ जिला पंचायत तथा कलेक्टरों को जी आई एस पैकिंग के माध्यम के तैयार करने का ट्रेनिंग प्रोग्राम बना कर अधिकारियों को ट्रेंड किया। 


बहुत बाद में मध्य प्रदेश शासन द्वारा या मॉडल 'पञ्च-जा' के नाम से लागू किया गया। मेरे ऐसा मानना था कि स्वतंत्रता के समय सरकार एकमात्र सर्विस प्रोवाइडर थी। लेकिन बाद में प्राइवेट सेक्टर तथा एन जी औ भी सर्विस प्रोवाइडर बन गये। स्कूल, कॉलेज तथा अस्पताल प्राइवेट सेक्टर में खुल गये। बस सर्विस टेलीफोन जैसी सेवाएं सरकार के साथ प्राइवेट सेक्टर देने लगा। 


तो पहले सरकारी विभाग जो सेवाएं मोनोपॉली में देते थे उनकी अब तुलना होने लगी। जनता सरकारी कर्मचरियों से बेहतर सेवाएं देने की मांग करने लगे। तब मुझे लगा कि एक अधिकारी के रूप में मुझे कमसे कम एक सेक्टर में थ्योरी तथा प्रैक्टिकल कर अपनी काम करने की समझ को बढ़ाना चहिए। तब मैंने ग्रामीण विकास, कृषि तथा रोजगार सृजन को अपना पेंशन बनाया। मैंने आपकी सेवा के चौदह साल अलग अलग समय ग्रामीण विकास विभाग में अपनी स्वेक्षा से काम किया। 


भारतीय प्रशासन में अधिकारी की पोस्टिंग किसी भी विभाग में काम करने के लिए होती है। जब अधिकारी कुर्सी पर बैठता है तब कुर्सी के प्रभाव में नीचे की टीम काम कराती है। तब अधिकारी को गलतफहमी हो जाती है कि उसे इस विषय का बहुत ज्ञान है। वह बहुत अच्छा टीम लीडर है। लेकिन ऐसा होता नहीं है। प्राइवेट सेक्टर में लीडर को टीम चुनने का अधिकार होता है। शासन में टीम विभाग से मिलती है। 


प्राइवेट सेक्टर में लीडर को टारगेट किया जाता है, संसाधन दिये जाते है कि निर्धारित समय सीमा में टारगेट प्राप्त करना है। लेकिन सरकार में कानून नियम गाइडलाइन होती है उनकी निगरानी के लिये अलग-अलग एजेंसियां होती है। वह देखती है कि लक्ष्य प्राप्त करने में आपने इनका पालन लिया या नहीं। सरकारी विभागों में ऑडिट, भ्रष्टाचार और प्रक्रियाओं की देखरेख के लिए जिम्मेदार कुछ प्रमुख एजेंसियां और विभाग निम्नलिखित हैं:


नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक- यह भारत सरकार और राज्य सरकारों के खातों का ऑडिट करने वाली एक सर्वोच्च संस्था है। 

आंतरिक लेखा परीक्षा निदेशालय- यह विभिन्न मंत्रालयों और विभागों के आंतरिक खातों की जांच करता है।

केंद्रीय सतर्कता आयोग- यह केंद्र सरकार के विभागों में भ्रष्टाचार रोकने के लिए एक शीर्ष संस्था है।


केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो- यह भ्रष्टाचार और अन्य गंभीर अपराधों की जांच करता है।


लोकपाल और लोकायुक्त- ये सरकारी अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच करते हैं।


प्रवर्तन निदेशालय- यह मनी लॉन्ड्रिंग और विदेशी मुद्रा कानूनों के उल्लंघन की जांच करता है।


कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्रालय- यह सरकारी कर्मचारियों से संबंधित नीतियों, भर्ती, प्रशिक्षण और लोक शिकायतों का प्रबंधन करता है।


प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग- यह सरकारी प्रक्रियाओं में सुधार और नागरिकों की शिकायतों के निवारण पर काम करता है।

सरकारी विभागों में गुणवत्ता, खरीद और समय-सीमा की देखरेख करने वाली कुछ प्रमुख एजेंसियां और विभाग निम्नलिखित हैं:


भारतीय मानक ब्यूरो- यह भारत में वस्तुओं की गुणवत्ता के लिए मानक तय करता है और उन्हें प्रमाणित करता है।


केंद्रीय लोक निर्माण विभाग- यह सरकारी भवनों और बुनियादी ढांचे के निर्माण में गुणवत्ता मानकों को सुनिश्चित करता है।


राष्ट्रीय राजमार्ग और अवसंरचना विकास निगम लिमिटेड- यह सड़कों और राजमार्गों के निर्माण में गुणवत्ता की देखरेख करता है।


गुणवत्ता नियंत्रण परिषद- यह विभिन्न क्षेत्रों में गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए एक राष्ट्रीय निकाय है।


वित्त मंत्रालय- यह खरीद से संबंधित नीतियों और दिशानिर्देशों को जारी करता है।


सरकारी ई-मार्केटप्लेस- यह सरकारी विभागों के लिए वस्तुओं और सेवाओं की ऑनलाइन खरीद के लिए एक मंच है।


रक्षा मंत्रालय- यह रक्षा खरीद से संबंधित नीतियों और प्रक्रियाओं को नियंत्रित करता है।


भारतीय रेलवे- यह रेलवे से संबंधित खरीद की देखरेख करता है।


सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय- यह विभिन्न सरकारी परियोजनाओं और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की निगरानी करता है, जिसमें उनकी समय-सीमा भी शामिल है।


नीति आयोग- यह विभिन्न सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की प्रगति और समय-सीमा की निगरानी और मूल्यांकन करता है।


संबंधित मंत्रालय और विभाग: प्रत्येक मंत्रालय और विभाग अपने-अपने कार्यक्रमों और परियोजनाओं की समय-सीमा की निगरानी के लिए जिम्मेदार होता है।


यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इन एजेंसियों की भूमिकाएं आपस में जुड़ी हुई हैं और वे सरकारी कामकाज में दक्षता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करती हैं।


सरकारी कर्मचारियों के लिए विभिन्न प्रकार के अधिनियमों और नियमों का एक सेट होता है, जो उनकी सेवा की शर्तों, आचरण, अवकाश और अन्य संबंधित मामलों को नियंत्रित करता है। ये नियम केंद्र सरकार और राज्य सरकारों के लिए अलग-अलग हो सकते हैं। यहाँ कुछ प्रमुख अधिनियमों और नियमों के नाम दिए गए हैं:


मूलभूत नियम- ये नियम सरकारी कर्मचारियों की सेवा की सामान्य शर्तों, वेतन, भत्ते और अन्य मामलों को नियंत्रित करते हैं।


 सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965- ये नियम सरकारी कर्मचारियों के वर्गीकरण, पदोन्नति, निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित हैं।


 सिविल सेवा (आचरण) नियम, 1964- ये नियम सरकारी कर्मचारियों के आचरण और व्यवहार को नियंत्रित करते हैं, जिसमें उनकी व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन से संबंधित कुछ प्रतिबंध भी शामिल हैं।


 सिविल सेवा (अवकाश) नियम, 1972- ये नियम विभिन्न प्रकार के अवकाशों, जैसे अर्जित अवकाश, चिकित्सा अवकाश, मातृत्व अवकाश और पितृत्व अवकाश, और उनकी पात्रता और प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।


 सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1972- ये नियम सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति के बाद की पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य लाभों को नियंत्रित करते हैं।


प्रत्येक राज्य सरकार के अपने स्वयं के नियम और अधिनियम होते हैं, जो केंद्र सरकार के नियमों के समान हो सकते हैं या उनसे भिन्न हो सकते हैं। ये नियम सरकारी अधिकारियों को उनके कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के बारे में मार्गदर्शन देते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि वे एक निर्धारित आचार संहिता का पालन करें।

 

सरकार में कर्मचारियों की वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन  से संबंधित नियम समय-समय पर जारी किए गए परिपत्रों और निर्देशों पर आधारित होते हैं। इन नियमों का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के प्रदर्शन का मूल्यांकन करना और पदोन्नति, वेतन वृद्धि और अन्य सेवा-संबंधित निर्णयों में पारदर्शिता लाना है।


एसीआर का मुख्य उद्देश्य कर्मचारियों के काम, आचरण और समग्र प्रदर्शन का मूल्यांकन करना है। यह मूल्यांकन पदोन्नति, समयमान वेतनमान और अन्य प्रशासनिक निर्णयों के लिए एक आधार प्रदान करता है। एसीआर की रिपोर्टिंग और समीक्षा के लिए एक निश्चित पदानुक्रम होता है। रिपोर्टिंग अधिकारी, कर्मचारी के प्रदर्शन का मूल्यांकन करता है। समीक्षा अधिकारी, रिपोर्टिंग अधिकारी द्वारा दिए गए मूल्यांकन की समीक्षा करता है। अंत में, एक स्वीकारकर्ता प्राधिकारी  भी हो सकता है, जो रिपोर्ट को अंतिम रूप देता है।


एसीआर को एक निर्धारित समय-सीमा में लिखा जाना चाहिए। इसके लिए सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा समय-समय पर परिपत्र जारी किए जाते हैं, जिसमें एसीआर लिखने की प्रक्रिया और समय-सीमा का उल्लेख होता है। सरकार ने एसीआर प्रक्रिया को पारदर्शी और सुगम बनाने के लिए इसे ऑनलाइन कर दिया है। अब एसीआर को ऑनलाइन माध्यम से लिखा, समीक्षा और स्वीकार किया जाता है।


यदि किसी कर्मचारी की एसीआर में कोई प्रतिकूल टिप्पणी  होती है, तो उसे इसकी सूचना दी जाती है। कर्मचारी को इन प्रतिकूल प्रविष्टियों के खिलाफ अभ्यावेदन  प्रस्तुत करने का अधिकार होता है। पदोन्नति के लिए एसीआर रिपोर्ट का बहुत महत्व होता है।


पदोन्नति नीति के तहत, अधिकारियों/कर्मचारियों की एसीआर रिपोर्ट देखी जाती है। उदाहरण के लिए, पदोन्नति के लिए पिछले कुछ वर्षों की एसीआर में कुछ निश्चित ग्रेडिंग (जैसे, 'उत्कृष्ट' या 'बहुत अच्छा') होना आवश्यक हो सकता है। क्लास वन अधिकारियों के लिए पिछले पांच वर्षों की एसीआर का मूल्यांकन किया जाता है। यदि किसी कर्मचारी की एसीआर उपलब्ध नहीं है, तो उसे पदोन्नति के लिए पात्र नहीं माना जाता है। हर सरकारी कर्मचारी को इन नियमों को जानना तथा उनका पालन करना आवश्यक है।


मध्य प्रदेश सरकार में डिप्टी कलेक्टरों की पदोन्नति एक महत्वपूर्ण विषय था। बहुत मांग करने के बाद सरकार ने त्रिस्तरीय पदोन्नति करने का निर्णय लिया था।  जिसके लिए सरकार ने "मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम" लागू किए थे। इन नियमों का उद्देश्य पदोन्नति प्रक्रिया को पारदर्शी, निष्पक्ष और समयबद्ध बनाना है, जो पिछले कई सालों से रुकी हुई थी। डिप्टी कलेक्टरों को आमतौर पर उनके सेवाकाल में तीन प्रमुख पदोन्नति दी गई। 


डिप्टी कलेक्टर से संयुक्त कलेक्टर यह डिप्टी कलेक्टर के पद पर पहली पदोन्नति होती है।


संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर  यह दूसरी पदोन्नति होती है।


अपर कलेक्टर से कलेक्टर  यह तीसरी पदोन्नति होती है, जो सेवा के उच्च स्तर पर होती है।


इन पदोन्नतियों से संबंधित प्रमुख नियम और नीतियां, जो "मध्य प्रदेश लोक सेवा पदोन्नति नियम में शामिल हैं।


नए नियमों के अनुसार, प्रथम श्रेणी  के पदों पर पदोन्नति 'योग्यता-सह-वरिष्ठता' के सिद्धांत पर आधारित होगी। इसका मतलब है कि केवल वरिष्ठता ही नहीं, बल्कि अधिकारी के प्रदर्शन और योग्यता को भी समान महत्व दिया जाएगा। इसमें अधिकारी की गोपनीय चरित्रावली  का मूल्यांकन, सेवा रिकॉर्ड और अन्य प्रदर्शन मापदंड शामिल होंगे। 


पदोन्नति के लिए कर्मचारियों की एसीआर का मूल्यांकन अनिवार्य होगा। नियमों के अनुसार, पदोन्नति के लिए पिछले 5 वर्षों की एसीआर में न्यूनतम निर्धारित ग्रेडिंग (जैसे 'उत्कृष्ट' या 'बहुत अच्छा') प्राप्त करना आवश्यक होगा। यदि किसी कर्मचारी की एसीआर उपलब्ध नहीं है, तो उसे पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा।


पदोन्नति के लिए विभागीय पदोन्नति समिति की बैठक आयोजित होने वाली थी जिसमें मेरा नाम था। संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर  के पद पर पदोन्नत  था। 


समिति में मुख्य सचिव कुछ सचिव और विभागाध्यक्ष शामिल थे साथ ही सामान्य प्रशासन विभाग के उप-सचिव स्तर के अधिकारी भी सदस्य थे। डीपीसी का मुख्य कार्य पात्र अधिकारियों की सूची तैयार करना और उनकी योग्यता का मूल्यांकन करना था। यदि किसी अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई चल रही है या कोई दंड प्रभावी है, तो उसे पदोन्नति के लिए उपयुक्त नहीं माना जाएगा।


मुझे सामान्य प्रशासन से बताया गया कि होशंगाबाद में पदस्थापना के दौरान के एसीआर  उपलब्ध नहीं है। मैंने तत्कालीन कलेक्टर मैडम अजीता वाजपेयी से भोपाल जा कर संपर्क किया। उन्होंने बताया कि मेरा सेल्फ असिस्मेंट उपलब्ध नहीं है। मैंने उन्हें हाथ हाथ दूसरी कॉपी दे कर एसीआर लिखने का अनुरोध किया। कुछ दिन बाद फिर सामान्य प्रशासन से फोन आया कि मेरी एसीआर अभी भी नहीं लिखी है। 


मैं फिर  मैडम अजीता वाजपेयी से मिला। उस समय वह पशुपालन विभाग में डिप्टी सेक्रेटरी के पद पर पदस्थ थी। उन्होंने बताया कि काम की अधिकता के कारण नहीं लिख सकी। मुझे गुस्सा आ गया। इस पद पर कोई काम नहीं होता है। मैंने सोचा कि वह ऐसा क्यों कर रही है। मेरा कभी उनसे कोई विवाद नहीं हुआ। काम भी मैंने बहुत मेहनत से किया था। मैंने  गुस्सा पर काबू कर अनुरोध किया कि यदि वह समय पर नहीं भेजेगी  मेरा प्रमोशन नहीं होगा। आप केवल एसीआर लिख रही है किस्मत नहीं। उन्होंने मेरी एसीआर समय पर भेज दी और मुझे संयुक्त कलेक्टर से अपर कलेक्टर  पर यह दूसरी पदोन्नति मिल गई। 

नया बस स्टेण्ड बन जाने के कारण भोपाल इंदौर रोड पर सड़क के किनारे विश्व हिन्दू परिषद ने गायत्री मन्दिर के पास सरकारी जमीन पर शमशान के सामने सड़क के किनारे दुकानें बना कर लोगों को किराये पर उठा दी। एक व्यापारी थे अनोखी लाल खण्डेलवाल जो इस समिति के अध्यक्ष थे। वह चाहते थे कि दुकानों के किराए की आय से शमशान का रख रखाव किया जाएगा। लेकिन सर्कार की नजरों में यह अतिक्रमण था। 


एक दिन सुबह तीन बजे रात को मैंने पुलिस तथा नगर पालिका की मदद से सभी दुकानें गिरा कर मलबा हटवा दिया। सुबह लोगों ने देखा कि अतिक्रमण हटा दिया गया है। तब हिन्दुओं ने बहुत बड़ा जलूस निकला। मुस्लमान इस आंदोलन में शामिल नहीं हुए। मैं प्रशासन का मुखिया था तो में स्वाभिविक टारगेट हो गया। राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार थी। मुख्य मंत्री थे सुन्दर लाल पटवा जी। वह भोपाल में अतिक्रमण हटवा कर रोड़ चौड़ी करवा रहे थे। यह मुसलमानों के अतिक्रमण थे। वहां रोज आंदोलन हो रहा था। 


चार दिन से आष्टा बंद था। मैंने नेताओं के प्रतिनिधियों को बुला कर बात की पर कोई समाधान नहीं निकला। धीरे-धीरे आंदोलन कमजोर होता गया और एक सप्ताह बाद समाप्त हो सका। मुरैना में ट्रेनिंग के दौरान वहां के एडिशनल कलेक्टर ने मुझे समझाया था कि जब जुलूस, प्रदर्शन हो तो जल्दी बात करने नेताओं को नहीं बोलना चाहिए। उन्हें नारे लगाने दो। आंदोलन करने दो। जब थक जायगे तब खुद बंद कर देंगे। 


एक बार जब मुरैना में जलूस ऑफिस में आया तो मेरी ड्यूटी उनका मांग पत्र लेने की थी। मैंने एडिशनल कलेक्टर से चल कर गेट पर ज्ञापन लेने का अनुरोध किया। उन्होंने दुकान से चाय मगाई। जब हम लोग चाय पी रहे थे आंदोलन करने बाले नेता माइक पर भाषण देने को ले कर लड़ पड़े और ज्ञापन दिए बिना वापिस चले गए। आष्टा के आंदोलन में मैंने यहीं रणनीति अपनाई। 


भोपाल में अतिक्रमण हटाने का बहुत बड़ा अभियान प्रशासन द्वारा चलाया जा रहा था। सुंदरलाल पटवा के मुख्यमंत्री रहते हुए, भोपाल में अतिक्रमण के खिलाफ एक बड़ा अभियान चलाया गया था। यह अभियान उनकी दूसरी मुख्यमंत्री अवधि (5 मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992) के दौरान हुआ था। यह अभियान पटवा सरकार की एक महत्वपूर्ण कार्रवाई मानी जाती है, जिसने शहर को अतिक्रमण से मुक्त कराने का प्रयास किया।


इस अभियान के दौरान भोपाल में सड़कों पर हुए अतिक्रमण को हटाया गया था। इस अभियान के प्रभारी बाबूलाल गौर थे, जिन्हें इसी अभियान के बाद "बुलडोजर मंत्री" या "बुलडोजर लाल" कहा जाने लगा था। उन्होंने सख्ती से कार्रवाई करते हुए कई अवैध अतिक्रमणों को हटवाया था। उस समय भोपाल के कलेक्टर एम ए खान थे जो विभागीय पदोन्नति से उद्योग विभाग से प्रोमोट हुए थे। वहां अपर कलेक्टर के पद पर सुशील कुमार त्रिवेदी थे जो पब्लिसिटी डिपार्टमेंट से अपर कलेक्टर प्रोमोट हुए थे। इन दोनों अधिकारियों का बैकग्राउंड राजस्व अधिकारी का नहीं होने से वह भू राजस्व संहिता के तहत कोई भी आदेश पारित करते अपील कोर्ट कोई न कोई गलती निकाल कर उनके आदेश पर स्थगन आदेश दे देते थे।


उस समय भोपाल में अतिक्रमण अभियान के लिए एक समिति थी जिस में बाबूलाल गौर, स्थानीय शासन मंत्री, लक्ष्मी नारायण शर्मा,  सहकारिता मंत्री  तथा लक्ष्मी नारायण गुप्ता, राजस्व मंत्री थे। नरेश नारद प्रमुख सचिव, पर्यावरण  समिति के संयोजक थे। इस समिति ने सामान्य प्रशासन विभाग से योग्य, ईमानदार तथा राजस्व मामलों के जानकार पांच अपर कलेक्टरों के नाम मांगे गए थे। जिस में से एक चयनित अधिकारी को अपर कलेक्टर भोपाल, राजस्व पदस्थ किया जाना था। समिति ने मेरे नाम का चयन किया। मेरी पदस्थापना  अपर कलेक्टर भोपाल, राजस्व, भोपाल के पद पर हो गई। जब से भोपाल जिला बना था इस पद पर केवल आई ए एस अधिकारी ही पदस्थ होते थे। मैं पहला अपर कलेक्टर भोपाल, राजस्व था जो राज्य प्रशासनिक सेवा का अधिकारी था। मुझे तत्काल पदभार ग्रहण करने का आदेश दिया गया। मैं आष्टा से भोपाल आ गया।  

भोपाल 

​​भोपाल में मैं लोक निर्माण विभाग के गेस्ट हाउस में ठहरा था। मेरा नाम अतिक्रमण अभियान के लिए गठित मंत्रियों की समिति द्वारा चयनित था। इससे कलेक्टर भोपाल बहुत खुश नहीं थे। उन्होंने बहुत दिनों तक मुझे कोई कार्यभार नहीं सौंपा था। मैं नियमित ऑफिस आता था और बिना कुछ किये शाम को गेस्ट हाउस लौट आता था। आखिरकार एक दिन रात को कलेक्टर ने कार्य विभाजन किया और मुझे अपर कलेक्टर भोपाल, राजस्व के साथ ऑफिस की अधिकांश भाषाओं का प्रभारी बना दिया गया। जो व्यक्ति आदेश ले कर आया था उसने कहा कि कलेक्टर चाहते है कि में अभी कार्यभार मिस्टर त्रिवेदी के घर जा कर ले लू। इटारसी की कहानी फिर दोहराई जाने वाली थी। मैंने मन कर दिया। अगले दिन मैंने  हैंडेड ओवर ताकें ओवर का फार्म भर कर मिस्टर त्रिवेदी के घर भेज दिया। उन्होंने हस्ताक्षर कर दिये। एक औपचारिकता पूरी हो गई। 


जब मेरी पोस्टिंग भोपाल में हुई तो मेरे ज्वाइन करने के कुछ दिन बाद मेरे कलेक्टर ने पूछा कि में क्या जिले के प्रभारी मंत्री जी से कॉर्टसी/औपचारिक भेट करने गया हूँ या नहीं। मेरे प्रभारी मंत्री बाबू लाल गौर स्थानीय शासन मंत्री थे। समय ले कर में उनसे मिलाने गया। मिलते समय मैंने नोटिश किया कि वह हमेशा नज़रे निचे किये बात करते रहे। एक बार भी उन्होंने मेरी तरफ नहीं देखा। नजरे नहीं मिलाई। नुझे बहुत बुरा लगा। मैंने यह बात कलेक्टर को बताई उन्होंने कहा कि यह मंत्री जी की आदत है। वह कभी नजर मिला कर बात नहीं करते है। बाद में अनेक मौको पर मैने देखा यह उनकी आदत थी। 


भू-राजस्व संहिता का कार्यान्वयन: ए.डी.एम. भू-राजस्व संहिता, 1959 के तहत राजस्व न्यायालय के रूप में कार्य करते हैं। वे राजस्व से संबंधित विवादों, जैसे भूमि विवाद, सीमा विवाद, अतिक्रमण, और नामांतरण (mutation) के मामलों का निपटारा करते हैं। ए.डी.एम. राजस्व न्यायालय में लंबित मामलों की सुनवाई करते हैं और कानून के अनुसार निर्णय देते हैं।

मैंने काम शुरू कर दिया। मेरे कलेक्टर चाहते थे कि मैं कोई भी निर्णय लेने के पहले उनसे पूछ कर निर्णय करू। लेकिन यह हरबार मेरे लिए सम्भव नहीं हो पता था। मैंने उन्हें बताया कि मुझे काम करते हुए दस साल से ऊपर हो गए है हुए मुझे इतनी समझ है कि कब कोनसा निर्णय लेने है। नियम कानून क्या है। समाज पर क्या असर होगा आदि। उन्हें रात में नींद नहीं आती थी। हमेशा चिंतित रहते थे। उन्होंने मुख्य मंत्री तथा हर मंत्री के घर तथा ऑफिस मेंएक आदमी ऐसा सेट किया था जो पल पल की खबर उन्हें देता रहता। यहां तक कि मंत्री जी सो गए। मंत्री जी उठ गए। 


उन्होंने कौन सी फाइल पर क्या लिखा आदि आदि। वह रात को अकेले कलेक्टर की गाड़ी में बैठ कर सड़क पर घूमते रहते थे। मुझे रोज दस बजे से पहले सोने की आदत रही है। कुछ दिन रात में में उनके साथ गया। एक दिन मैंने मजाक में उन्हें कहा ऐसा लगता है जैसे कलेक्टर के साथ नहीं किसी फ़िल्मी डॉन के साथ काम कर रहा हूँ। मैंने उन्हें बताया कि आप को सब कुछ समय से पहले तथा योग्यता से ज्यादा मिला है। इतनी चिंता किस बात की। उन्होंने कहा इसलिए चिंता रहती है कि यह मुझसे छीन नहीं जाय। इस बात की चिंता रहती है। 


उन्हें किसी से नहीं सुनने की आदत नहीं थी। वह खुद किसी को नहीं नहीं बोलते थे। कोई भी मंत्री या मुख्यमंत्री के यहां से कोई काम बताया जाता चाहे वह नियम से हो या नहीं हो। उनके अधिकार क्षेत्र में हो या नहीं हो वह आदेश निकाल देते थे। पहले वह भोपाल नगर निगम के प्रशासक भी रहे थे। वहां भी इसी तरह आदेश दे कर ऑफिस की फाइल गायब कर देते थे। उनके एक सलाहकार थे उनसे पूछ कर निर्णय करते थे। यह सलाहकार हर फाइल को पद कर एक ब्रीफ बना कर उन्हें देते थे। तब वह हस्ताक्षर करते थे। जब भी वह मेरी फाइलें उन्हें भेजते और वह कोई कमी निकालते तो मेरी हमेशा बहस हो जाती। मुझे नियम से काम करने की आदत थी। मैं किसी भी लालच या दबाव में आये बिना ही अपने विवेक तथा नियम कानून से निर्णय लेने का आदि था। किसी भी कीमत पर में नियम विरुद्ध निर्णय नहीं लेता था। हम दोनों के काम करने का तरीका बहुत अलग था। 


भोपाल में जमीं की खूब हेराफेरी होती थी। शहर में लोग बहुत कीमते जमीने फर्जी हिबानामा तथा बख्सीसनामा बना कर हड़प रहे थे। भोपाल में नबाबी शासन के दौरान "हिबनामा" और "बख्शीशनामा" भूमि प्रशासन और संपत्ति हस्तांतरण से संबंधित महत्वपूर्ण प्रणालियाँ थीं। ये दोनों ही मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) के सिद्धांतों पर आधारित थीं। हिबनामा का मतलब है "उपहार विलेख" या "Gift Deed"। यह एक कानूनी दस्तावेज़ था जिसके माध्यम से एक व्यक्ति अपनी संपत्ति या उसके किसी हिस्से को दूसरे व्यक्ति को उपहार के रूप में हस्तांतरित करता था। यह हस्तांतरण बिना किसी प्रतिफल (consideration) के होता था। यानी, उपहार देने वाला व्यक्ति बदले में कुछ नहीं लेता था। यह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत मान्य था, जिसमें उपहार के कुछ नियम होते हैं, जैसे कि यह तुरंत हस्तांतरित हो जाना चाहिए और इसमें गवाहों की उपस्थिति भी आवश्यक हो सकती है। संपत्ति को किसी भी व्यक्ति को दिया जा सकता था, चाहे वह रिश्तेदार हो या बाहरी व्यक्ति। इसका उपयोग अक्सर परिवार के सदस्यों, जैसे कि बच्चों या पत्नियों, को संपत्ति देने के लिए किया जाता था।


 बख्शीश नामा का मतलब है "दान विलेख" या "Deed of Gift in consideration of services rendered"। यह भी एक प्रकार का उपहार ही था, लेकिन इसमें एक महत्वपूर्ण अंतर था। यह किसी सेवा या कार्य के बदले में दिया जाने वाला उपहार था। इसका उपयोग अक्सर किसी व्यक्ति द्वारा की गई विशेष सेवाओं या निष्ठा के सम्मान में संपत्ति प्रदान करने के लिए किया जाता था। उदाहरण के लिए, किसी वफादार नौकर, अधिकारी या सैनिक को उसकी सेवाओं के लिए इनाम के रूप में जमीन या संपत्ति दी जाती थी। हालांकि यह तकनीकी रूप से उपहार था, लेकिन इसमें एक तरह का 'प्रतिफल' निहित था - सेवाएँ। यह इसे हिबानामा से अलग बनाता है, जहाँ कोई प्रतिफल नहीं होता। यह भी मुस्लिम कानून के तहत एक वैध दस्तावेज़ था और संपत्ति के हस्तांतरण को कानूनी रूप से मान्यता देता था।


भोपाल के नबाबी शासन में, हिबानामा और बख्शीश नामा दोनों ही संपत्ति के हस्तांतरण के महत्वपूर्ण साधन थे। जहाँ हिबानामा शुद्ध उपहार था, जो बिना किसी शर्त या प्रतिफल के दिया जाता था, वहीं बख्शीश नामा किसी सेवा या वफादारी के बदले दिया जाने वाला एक इनाम था। इन प्रणालियों ने भोपाल रियासत में भूमि और संपत्ति के प्रशासन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


लोग नवाब के शासन काल के पुराने स्टाम्प पेपर बाजार से खरीद कर हिबानामा या बक्सीसनामा पुरानी उर्दू भाषा में लिखते। आलू काट काट उसपर नवाब की सील बना कर काली स्याही से लगा लेते थे। पटवारी तथा तहसीलदार से मिलकर नामान्तरण करबा कर शासकीय रिकार्ड में नाम दर्ज करवा लेते। बैरसिया तहसील में निजी काम कीमत की सड़क से दूर की जमीनों की अदला बदली शासकीय सड़क के किनारे की कीमती जमीनों से कर रहे थे। यह खेल बहुत पुराना था। यह सब प्रकरण मेरे राजस्व न्यायलय में चलते थे। मुझे कानून और नियम की किताबें पड़ कर काम करने की पुरानी आदत के कारण लोगों के प्रकरण में निरस्त कर देता था। 


भोपाल में फाइल आप के पास आये उसके पहले या तो किसी नेता या मंत्री का या किसी बहुत सीनियर अधिकारी का फोन आ जाता था। दफ्तर में कोई गोपनीयता नहीं थी। भ्रष्टाचार चरम पर था। जिले के सभी अधिकारी सुबह से उनके मंत्री के बंगले जाते और दोपहर बाद ऑफिस आते थे। मुझे किसी की बंगले जा कर मिलाने की आदत नहीं थी।  में बहुत निडर अधिकारी था। मुझे पद पर बने रहने का लालच नहीं था। गलत काम करने की जगह में स्थानांतरण पर जाने के लिए हमेशा मानसिक रूप से तैयार रहता था। 


भोपाल में मुझे मेरे इन्हीं गुणों के कारण पोस्टिंग मिली थी। मेरा कोई गॉड फादर नहीं था। मुझे कोई सीनियर अधियकारी, नेता या मंत्री नहीं जनता था। मैं मानता हूँ कि हर बेईमान आदमी को ईमानदार साथी ही चाहिए होता है। मैं किसी भी कीमत पर अपने इन गुणों के कारनसमझौता नहीं करना चाहता था। भोपाल में अतिक्रमण के कारण हटाए जा रहे लोगों को बैकल्पिक स्थान अलॉट किये जा रहे थे। कलेक्टर कागज के टुकड़े पर लिख देते थे। यह नहीं देखते कि भूमि किस विभाग की है। उसे आवंटित करने का अधिकार कलेक्टर के पास है भी या नहीं। 


भोपाल में सरकारी भूमि आवंटन के नियम, विशेषकर 'RBC' (Revenue Book Circular) के तहत, काफी विस्तृत और समय-समय पर संशोधित होते रहे हैं। यहाँ भोपाल में सरकारी भूमि आवंटन से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं का विवरण दिया गया है। मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 (MP Land Revenue Code, 1959): सरकारी भूमि के प्रबंधन और आवंटन का मूल आधार यही कानून है। इसके तहत, कलेक्टर या अन्य अधिकृत अधिकारी को भू-राजस्व और भूमि प्रबंधन से संबंधित अधिकार दिए गए हैं। राजस्व पुस्तक परिपत्र (Revenue Book Circular - RBC): यह एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है जो भू-राजस्व संहिता के प्रावधानों को विस्तार से स्पष्ट करता है और सरकारी भूमि के विभिन्न प्रकार के आवंटन के लिए दिशा निर्देश देता है। RBC समय-समय पर संशोधित होता रहता है और यह नियमों को अधिक स्पष्ट और व्यावहारिक बनाता है।


मध्य प्रदेश नजूल भूमि निर्वर्तन निर्देश,  (MP Nazul Bhumi Nirvartan Nirdesh, ): यह निर्देश खासतौर पर नजूल (सरकारी) भूमि के आवंटन और प्रबंधन के लिए जारी किए गए हैं। इन नियमों ने पुराने अस्थायी पट्टे (temporary lease) के प्रावधानों को खत्म कर स्थायी पट्टे (permanent lease) की व्यवस्था को लागू किया है।


2. भूमि आवंटन के प्रकार:


सरकारी भूमि का आवंटन विभिन्न उद्देश्यों के लिए किया जाता है। RBC और अन्य नियमों के अनुसार, इसके मुख्य प्रकार हैं:


औद्योगिक उद्देश्यों के लिए: उद्योग स्थापित करने, लघु, सूक्ष्म और मध्यम उद्यमों (MSME) को बढ़ावा देने के लिए भूमि आवंटित की जाती है। इसके लिए "ई-बिडिंग" जैसी पारदर्शी प्रक्रियाएं भी अपनाई गई है।


शैक्षणिक और स्वास्थ्य उद्देश्यों के लिए: स्कूल, कॉलेज, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक कल्याणकारी संस्थानों को रियायती दरों पर या निर्धारित प्रक्रिया के तहत भूमि दी जाती है।


आवासीय उद्देश्यों के लिए:


मुख्यमंत्री आवासीय भू-अधिकार योजना: इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में पात्र परिवारों को न्यूनतम मूलभूत आवश्यकताओं के लिए आवासीय भूखंड उपलब्ध कराए जाते हैं।


भूमिहीन व्यक्तियों के लिए: शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भूमिहीन और गरीब परिवारों को आवासीय पट्टे दिए जाते हैं।


सार्वजनिक उपयोग के लिए: सड़क, पार्क, सार्वजनिक सुविधाएं, सरकारी कार्यालयों के निर्माण के लिए भूमि का आवंटन किया जाता है।


3. आवंटन की प्रक्रिया:


आवेदन: इच्छुक व्यक्ति या संस्था को निर्धारित प्रारूप में आवेदन करना होता है। आजकल कई प्रक्रियाओं को ऑनलाइन कर दिया गया है ताकि पारदर्शिता बढ़ाई जा सके।


पात्रता की जाँच: आवेदन की पात्रता की जांच की जाती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति, पूर्व में धारित भूमि, और आवेदन के उद्देश्य शामिल होते हैं।


मूल्य निर्धारण: भूमि का मूल्य कलेक्टर गाइडलाइन (Collector Guideline) के अनुसार निर्धारित किया जाता है। आवंटन के उद्देश्य के आधार पर प्रीमियम, विकास शुल्क और वार्षिक भू-भाटक (lease rent) का प्रावधान होता है।


पट्टा जारी करना: सभी औपचारिकताएं पूरी होने के बाद, सक्षम अधिकारी (जैसे कलेक्टर या एसडीएम) द्वारा पट्टा जारी किया जाता है। यह पट्टा स्थायी या निश्चित अवधि का हो सकता है।


शर्तों का पालन: आवंटित भूमि का उपयोग केवल इसी उद्देश्य के लिए किया जा सकता है जिसके लिए वह दी गई है। यदि भू-उपयोग में बदलाव किया जाता है, तो आवंटन रद्द किया जा सकता है।


4. विशेष प्रावधान:


नजूल भूमि: भोपाल में बड़ी मात्रा में नजूल भूमि है, जिसके आवंटन के लिए विशेष निर्देश हैं।


पारदर्शिता: सरकार ने ऑनलाइन भूमि आवंटन प्रणाली (Online Land Allotment System) जैसी पहल की है, जिससे प्रक्रिया में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी है।


अनियमितताओं पर कार्रवाई: यदि किसी आवंटित भूमि का गलत उपयोग होता है, तो प्रशासन द्वारा आवंटन रद्द कर भूमि को वापस लेने की कार्रवाई की जाती है।


यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सरकारी भूमि आवंटन के नियम बहुत विशिष्ट और विस्तृत होते हैं, और किसी भी वास्तविक आवेदन के लिए नवीनतम सरकारी गजट, नियमों और परिपत्रों का अध्ययन करना आवश्यक है।पचमढ़ी और भोपाल में शासकीय भूमि आवंटन  के अधिकार कलेक्टर को नहीं है। इन जगहों पर केवल राज्य सरकार को भूमि आवंटन के अधिकार थे। कलेक्टर के अधिकार अपर कलेक्टर को दिए जा सकते है। दोनों की समान अधिकारिता कानून में है। भोपाल कलेक्टर ने यह सभी काम मुझे सौप दिया। मैंने अधिकारिता रहित काम करने से मना कर दिया। मेरी शिकायत अतिक्रमण अभियान के लिए गठित मंत्रियों की समिति में मेरे कलेक्टर द्वारा की गई। 


समिति के पूछने पर मैंने उन्हें क़ानूनी प्राबधान बताए। वह सभी बहुत नाराज हुए। विशेषकर समिति के सचिव। उन्होंने कहा कि अब जूनियर अधिकारी हमें कानून सिखायेगे। मैने विनम्रता पूर्वक सभी किताबें उन्हें पद कर सुनाई। उन्होंने कहा की भी तक हजारों लोगों को कलेक्टर ने जो जमीनें आवंटित की है वह गलत है। मैंने कहा नियम तो यही है। वह गलत है। फिर दूसरे विभाग की जमीं बिना उसकी सहमति के नहीं आवंटित की जा सकती है। यह बड़ी मुहीम थी। सभी अधिकारी डरे हुए थे। कोई भी विभाग आपत्ति नहीं कर रहा था। सभी को बात समझ में आ गई और नियम अनुसार आवंटन करने का निर्णय हुआ। प्रकरण राज्य शासन को भेजे गए। 


मध्य प्रदेश में सरकारी भूमि को निजी भूमि में हस्तांतरित करने के नियम मुख्य रूप से मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 और राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC) द्वारा शासित होते हैं। यह प्रक्रिया सीधी नहीं होती, बल्कि कुछ विशेष परिस्थितियों और नियमों के तहत ही संभव होती है।


RBC के तहत प्रमुख नियम और प्रावधान:


सरकारी भूमि का वर्गीकरण: सरकारी भूमि को कई श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है, जैसे नजूल भूमि, आबादी भूमि, वन भूमि, चारागाह, आदि। हर श्रेणी के लिए आवंटन और हस्तांतरण के नियम अलग-अलग होते हैं। उदाहरण के लिए, नजूल भूमि के आवंटन के लिए नजूल भूमि निर्वर्तन निर्देश,  लागू होते हैं, जिसमें पट्टा देने के प्रावधान होते हैं।


पट्टा (Lease): सरकारी भूमि का आवंटन अक्सर स्थायी स्वामित्व के बजाय पट्टे पर किया जाता है। पट्टा एक निश्चित अवधि के लिए होता है और इसमें भूमि के उपयोग से संबंधित शर्तें शामिल होती हैं। यदि पट्टे की शर्तों का उल्लंघन होता है, तो पट्टा रद्द किया जा सकता है।


भू-स्वामी अधिकार (Bhumiswami Rights): भू-राजस्व संहिता की धारा 158 के तहत, कुछ शर्तों के अधीन, पट्टेदार को भू-स्वामी अधिकार दिए जा सकते हैं। एक बार भू-स्वामी अधिकार मिलने के बाद, व्यक्ति निजी भूमि के मालिक की तरह ही भूमि का उपयोग और हस्तांतरण कर सकता है। हालांकि, इसमें भी कुछ प्रतिबंध हो सकते हैं, जैसे कि आदिवासी वर्ग की भूमि को गैर-आदिवासी को हस्तांतरित करने पर प्रतिबंध।


भूमि व्यपवर्तन (Diversion): यदि कोई व्यक्ति सरकारी पट्टे पर मिली भूमि का उपयोग उसके निर्धारित उद्देश्य से अलग किसी अन्य उद्देश्य के लिए करना चाहता है (उदाहरण के लिए, कृषि भूमि का आवासीय उपयोग), तो उसे सक्षम अधिकारी (जैसे उपखंड अधिकारी) से भूमि व्यपवर्तन की अनुमति लेनी होती है। इसके लिए एक निर्धारित प्रक्रिया और शुल्क होता है।


अतिक्रमण का व्यवस्थापन (Regularization of Encroachment): कुछ विशेष परिस्थितियों में और सरकार द्वारा जारी किए गए नियमों के तहत, सरकारी भूमि पर किए गए अतिक्रमण का व्यवस्थापन (नियमितीकरण) किया जा सकता है। इसके लिए अतिक्रमणकर्ता को निर्धारित राशि का भुगतान करना होता है। हाल ही के वर्षों में, छोटे भूखंडों पर रहने वाले गरीबों को पट्टे देने की योजनाएं भी लागू की गई हैं।


हस्तांतरण पर प्रतिबंध: भू-राजस्व संहिता की धारा 165 के तहत कुछ विशेष प्रकार की भूमि के हस्तांतरण पर प्रतिबंध है, जैसे कि अनुसूचित जनजाति के सदस्यों की भूमि। ऐसी भूमि के हस्तांतरण के लिए कलेक्टर की अनुमति आवश्यक होती है।


संक्षेप में, सरकारी भूमि का सीधे तौर पर निजी भूमि में हस्तांतरण दुर्लभ होता है। यह अधिकतर पट्टे के माध्यम से होता है, और पट्टेदार को भू-स्वामी अधिकार मिलने के बाद ही वह भूमि का निजी मालिक बन सकता है। इसके लिए सभी कानूनी प्रक्रियाओं और शर्तों का पालन करना अनिवार्य है। 


भोपाल की बैरसिया तहसील में पहले शासकीय भूमि आवंटित करावा कर उसे कीमती जमीन में अदला बदली के सैकड़ों केस मेरे न्यायलय में लंबित थे। लोग केस लंबित होने की शिकायत सहकारिता मंत्री से कर रहे थे वह वहां से विधायक थे। उन्होंने मुझे उक्त प्रकरण शीघ्र निराकाण करने का निर्देश दिया। मैंने एक सप्ताह में निपटने का वादा उनसे किया। मध्य प्रदेश में जमीन की अदला-बदली (विनिमय) एक कानूनी प्रक्रिया है जो मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 के प्रावधानों और राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC) में दिए गए दिशानिर्देशों के तहत होती है। यह प्रक्रिया केवल दो निजी व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि निजी और सरकारी भूमि के बीच भी हो सकती है।


विनिमय के सामान्य नियम:


कलेक्टर की अनुमति: सरकारी भूमि से किसी निजी भूमि की अदला-बदली करने के लिए कलेक्टर की पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक होती है। यह अनुमति उप-जिला अधिकारी (Sub-divisional officer) द्वारा नहीं दी जा सकती, बल्कि सीधे कलेक्टर द्वारा ही दी जाती है।


समान मूल्य की शर्त: अदला-बदली की जाने वाली दोनों भूमियों का बाजार मूल्य लगभग बराबर होना चाहिए। यदि एक भूमि का मूल्य दूसरी से 10% से अधिक होता है, तो विनिमय की अनुमति नहीं दी जा सकती।


समान उपयोग की शर्त: दोनों भूमियों का उपयोग एक जैसा होना चाहिए। जैसे, उपजाऊ कृषि भूमि की अदला-बदली बंजर भूमि से नहीं की जा सकती। दोनों ही भूमियाँ या तो उपजाऊ हो या बंजर, इस बात का ध्यान रखा जाता है।


क्षेत्रफल का अंतर: विनिमय की जाने वाली भूमियों के क्षेत्रफल में 25% से अधिक का अंतर नहीं होना चाहिए। यदि क्षेत्रफल का अंतर 25% से अधिक होता है, तो विनिमय की अनुमति नहीं दी जाती है।


जनहित को ध्यान: विनिमय से जनहित पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए। सार्वजनिक उपयोग, जैसे कि तालाब, चारागाह, या कब्रिस्तान जैसी भूमि की अदला-बदली तभी की जा सकती है जब कलेक्टर यह सुनिश्चित कर लें कि यह जनहित में है और इससे कोई नुकसान नहीं होगा।


RBC के तहत प्रक्रिया:


आवेदन: भूमि की अदला-बदली के इच्छुक व्यक्ति को एक लिखित आवेदन कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। इस आवेदन में दोनों भूमियों का विवरण, उनका मूल्य, क्षेत्रफल और उपयोग का विवरण शामिल होता है।


जाँच: आवेदन प्राप्त होने के बाद, राजस्व अधिकारी (पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम) द्वारा भूमियों का निरीक्षण किया जाता है। वे भूमियों के मूल्य, उपयोग और जनहित पर पड़ने वाले प्रभाव की जांच करते हैं।


प्रस्ताव और स्वीकृति: जांच रिपोर्ट के आधार पर, कलेक्टर विनिमय को स्वीकृति दे सकते हैं या उसे अस्वीकार कर सकते हैं। स्वीकृति देने से पहले यह सुनिश्चित किया जाता है कि सभी कानूनी और RBC के नियम पूरे किए गए हैं।


पंजीकरण: कलेक्टर से अनुमति मिलने के बाद, विनिमय पत्र (Exchange Deed) का पंजीकरण रजिस्ट्रार कार्यालय में कराना अनिवार्य होता है। इसके बिना विनिमय कानूनी रूप से मान्य नहीं होता।


यह प्रक्रिया सुनिश्चित करती है कि सरकारी और निजी भूमियों की अदला-बदली पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से हो, और इससे किसी भी पक्ष या सार्वजनिक हित को नुकसान न पहुँचे।


मैंने इन कानूनों का उल्लेख करते हुए डिटेल आदेश तैयार करवाया। यह सभी प्रकरण बहुत प्रभावशाली लोगों के थे। मैंने सेकड़ों पकरण नियम बिरुद्ध होने से निरस्त कर दिए। बैरसिया में इससे बहुत बड़ा आन्दोलन खड़ा हो गया। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। कलेक्टर को मंत्री ने बुलाया। उन्होंने फिर मेरी शिकायत मंत्री से की। कलेक्टर ने कहा कि इस तरह का निर्णय लेने के पहले मुझे उनसे पूछना चाहिए था। मैंने कहा यह अधिकार अपने मुझे दिए है। जो नियम के अनुसार होगा मैं करुंगा। मंत्री जी ने बैरसिया में एक मीटिंग बुलाई। 


कलेक्टर मेरे साथ नहीं गए। सभी प्रकरण ले कर में गया। मैंने सबको क़ानूनी प्राबधान बताए और कारण गनाये क्यों केस निरस्त हुए। वहां गांव से बसों में भर कर लोगों को लाया गया था। वह चिल्लाने लगे। उन्होंने नेताओं के प्रतिनिधियों तथा बैरसिया के अधिकारी कर्मचारियों को जमीं दिलाने के नाम पर पैसा बसूलने के आरोप लगाना शुरू कर दिए। बहुत हंगामा हो गया। भरी पुलिस बल लगाया गया। मंत्री जी को पूरी बात समझ में आ गई। उन्होंने मेरा साथ दिया। हम लोग बड़ी मुश्किल से भीड़ में से निकल सके। 


मेरे कोर्ट में शर्मीला टैगोर के अनेक प्रकरण थे। भोपाल की कोहेफिजा की जमीं नबाब पटौदी की थी। जो आयशा बेगम के नाम थी। बहुत बाद मेउ मुझे पता चला कि शर्मीला टैगोर का शादी का नाम आयशा बेगम है। एक केस बहुत चर्चित रहा। भोपाल के युवा कांग्रेस के नेता थे मस्सू मियां। भोपाल से कुछ किलोमीटर दूर मस्सू मियां ने शासकीय तथा निजी लगभग तीन सौ एकड़ से अधिक भूमियों पर कब्ज़ा कर लिया था। उन्होंने दो शासकीय तालाब भी अपने कब्जे में कर लिए थे। बहुत पुलिस फ़ोर्स लगा कर उनका अतिक्रमण हटाया गया था। उनके चार सौ से अधिक जानवर आवारा हो कर इलाके मेउ घूम रहे थे। उनका आतंक इतना अधिक था कि कोर व्यक्ति नीलामी में उन्हें नहीं खरीदता था। उन प्रकरणों पर कांग्रेस पार्टी के सभी राज्य स्तरीय नेता मेरे ऊपर दबाब बना रहे थे। मैंने उनसे कहा कि के भी मुझसे लालच या दवाब में निर्णय नहीं करवा सकता है। मैं नियम से निर्णय करुगा। आप लोग मुझ पर भरोसा कर सकते है। 


ग्वालियर की राजमाता सिंधिया के सलाहकार थे सरदार आंग्रे वह मस्सू मियां की खाली शासकीय जमीन एक शिक्षा के ट्रस्ट के नाम चाहते थे। भारतीय जनता पार्टी में उस समय उनका बहुत मान था। उन्होंने यह पार्टी बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया था। जब भी उन प्रकरणों की सुनबाई होती वह ग्वालियर से भोपाल आते। तत्कालीन राजस्व मन्त्री के बंगले में मुझे उन सभी प्रकरणों के साथ बुलाया जाता। उस मीटिंग में राजस्व मंत्री के आलावा सहकारीयता मंत्री तथा स्थानीय शासन मंत्री होते थे। वह बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व के मालिक थे।  कद सवा छह फुट। भरी बजन। गांजा सिर। काला रंग। बड़ी बड़ी लाल आँखें। रौबदार चेहरा। वह चूड़ीदार पायजामा तथा अचकन पहनते। तख्त पर लेटे रहते। हम सब नीचे पीड़ा पर बैठते। आज की कार्यबाही क्या रहीं मैंने नोटशीट पर क्या लिखा सब बताना पड़ता था। उन्हें बहुत जल्दी वह जमीन चाहिए थी। चार पांच बैठकों के बाद वह समझ गये कि जमीं इतनी जल्दी उन्हें नहीं मिल पाएगी। एक बैठक में वह बहुत नाराज हो गए। उन्होंने मेरे सामने राजस्व मातृ जी से मेरी ओर इसारा कर कहा यह लड़का तुम सब को बेबकूफ बना रहा है। यह यहां आता है कहानी सुनाता है। तुम्हारा नाश्ता खाता है। इससे जमीं नहीं मिलेगी।मंत्री जी ने मुझे जल्दी करने को कहा। मैंने बहुत विनम्रता से अपनी बात कहीं। लेकिन वह बहुत नाराज हो गए।  मैं उन सब को नमस्ते कर बहार आ गया। 


अग्रेजों के समय गांव के विस्तृत नक़्शे खसरे बना दिए गए थे। उस समय शहर बहुत छोटे थे। इसलिए नजूल की जमीनों के नक़्शे खेतों के आकर के बड़े बड़े थे। मौके पर लोगों ने छोटे छोटे प्लाट ले कर माकन बना लिए थे। जमीनों की कीमतें बाद जाने के कारण बहुत विवाद हो रहे थे। भोपाल में यह बहुत बड़ी समस्या थी। इसी का फायदा भू माफिया उठता था। पटवारी, राजस्व निरीक्षक तथा तहसीलदार मिला कर जमीनों की इस हेराफेरी में बहुत गहरे तक जुड़े थे। भोपाल तहसीलदार के पद पर पदस्थ होना बहुत जोड़ तोड़ का काम था। बहुत चतुर चालाक व्यक्ति ही काम कर पता था। भोपाल में सभी वरिष्ठ अधिकारी तथा सभी नेता लोगों की जमीनों के झगड़े चलते रहते थे। बिल्डर लॉबी बहुत पावरफुल थी। प्रकरणों की जांच करना, सीमांकन, नामांतरण, बटवारा आदि सभी तरह के विवादों की अपीलें मुझे सुनना होती थी। 


भोपाल में मेरे साथ एक अधिकारी मिस्टर सिंह थे। वह ए डी एम भोपाल थे। उनका स्थानांतरण हो गया था। किसी दूसरे अधिकारी की पोस्टिंग नहीं हुई थी। कलेक्टर ने यह कार्यभार भी मुझे सौप दिया था। उन्होंने कहा कि जब तक कोई अधिकारी नहीं आता है तब तक तुम अस्थायी रूप से यह काम भी देखलो। मैंने यह काम का प्रभार लेकिया। भोपाल के अपर जिला दण्डाधिकारी  ए डी एम  के कानून और व्यवस्था बनाए रखने के कार्य और कर्तव्य काफी महत्वपूर्ण और विस्तृत होते हैं। यद्यपि कलेक्टर जिले का सर्वोच्च कार्यकारी और प्रशासनिक प्रमुख होता है, लेकिन ए.डी.एम. उनकी अनुपस्थिति में या उनके निर्देशन में ये सभी कार्य संभालते हैं। ए.डी.एम. को अक्सर कलेक्टर के समान ही शक्तियाँ और कर्तव्य प्राप्त होते हैं, विशेषकर राजस्व और मजिस्ट्रेट के कार्यों में। जिला मजिस्ट्रेट के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करते हुए शांति व्यवस्था बनाए रखना के लिए ए.डी.एम. को जिले में शांति, सद्भाव और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी दी जाती है। वे किसी भी संभावित तनाव या सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए निवारक उपाय करते हैं। किसी भी क्षेत्र में शांति भंग होने की आशंका होने पर ए.डी.एम. भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता  की धारा 144 के तहत निषेधाज्ञा जारी कर सकते हैं। इसके तहत, चार या उससे अधिक लोगों के एक जगह इकट्ठा होने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है। लाठी चार्ज और गोली चलाने का आदेश: गंभीर परिस्थितियों में, जब भीड़ नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तो ए.डी.एम. पुलिस को लाठी चार्ज या यहां तक कि गोली चलाने का आदेश दे सकते हैं। यह एक बहुत ही गंभीर और दुर्लभ कदम होता है, जिसे केवल असाधारण परिस्थितियों में ही उठाया जाता है। ए.डी.एम. जिला जेलों का नियमित निरीक्षण करते हैं ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कैदियों को उचित सुविधाएँ मिल रही हैं और जेल प्रशासन सही ढंग से काम कर रहा है। कानून और व्यवस्था की बैठकों की अध्यक्षता करना एक काम होता है।  ए.डी.एम. पुलिस अधीक्षक  के साथ मिलकर नियमित बैठकें आयोजित करते हैं ताकि जिले की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा की जा सके। वे पुलिस को आवश्यक निर्देश और सहायता प्रदान करते हैं, खासकर जब कोई बड़ा आयोजन, धरना प्रदर्शन या जुलूस होता है। कुछ मामलों में, ए.डी.एम. पुलिस द्वारा की गई जाँच का पर्यवेक्षण करते हैं, खासकर जब कोई गंभीर आपराधिक मामला या अप्रत्याशित घटना होती है। आपदा की स्थिति में जिम्मेदारी: बाढ़, भूकंप, आग या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान, ए.डी.एम. राहत और बचाव कार्यों का समन्वय करते हैं। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि प्रभावित क्षेत्रों में भोजन, पानी, और चिकित्सा सहायता जैसी आवश्यक राहत सामग्री समय पर पहुंचाई जाए।  ए.डी.एम. विभिन्न प्रकार के लाइसेंस जारी करने के लिए अधिकृत होते हैं, जैसे शस्त्र लाइसेंस, पटाखों के लाइसेंस, और अन्य व्यापार लाइसेंस। जनता की वे जनता दरबार लगाकर लोगों की शिकायतों को सुनते हैं और उनका समाधान करने का प्रयास करते हैं। भोपाल के ए.डी.एम. की भूमिका बहुआयामी है। वे कलेक्टर के दाहिने हाथ के रूप में कार्य करते हैं और जिला प्रशासन के लिए कानून और व्यवस्था, राजस्व, और नागरिक सुरक्षा के मोर्चे पर एक महत्वपूर्ण स्तंभ होते हैं।

मैंने शनिवार को ए.डी.एम. का कार्यभार लिया था। राम मन्दिर विवाद चल रहा था। भोपाल का माहौल बहुत तनाव पूर्ण था। मैंने धारा 144 का आदेश तैयार करवा कर कलेक्टर तो हस्ताक्षर करने भेजा। उन्होंने बताया कि उनकी पुलिस अधीक्षक से बात हो गई है। अभी यह आदेश जारी करने की जरुरत नहीं है। मैंने फायल अपने साथ रख ली। अगले दिन 6 दिसंबर 1992 को  रविवार  था।अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे को गिराए जाने के बाद पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, और इसका सबसे भयानक असर मुंबई के बाद भोपाल में देखने को मिला था। यह घटना भारतीय इतिहास की एक काली तारीख के रूप में दर्ज है, जिसने भोपाल के सामाजिक ताने-बाने को बुरी तरह से प्रभावित किया।


राम जन्मभूमि विवाद और भोपाल के दंगों का एक  कारण था। अतिक्रमण हटाने के अभियान के कारण मुस्लिम समाज में भरी असंतोष था। भारतीय जनता पार्टी को वे विरोधी पार्टी मानते है। अयोध्या में बाबरी मस्जिद के विध्वंस की खबर फैलते ही, भोपाल में सांप्रदायिक तनाव बहुत ज्यादा बढ़ गया। 7 दिसंबर 1992 की सुबह, जहांगीराबाद जैसे इलाकों में हिंसा शुरू हो गई। इस हिंसा में कई सरकारी इमारतों और हिंदू परिवारों को निशाना बनाया गया। अयोध्या की घटना ने भोपाल के पुराने बुधवारा जैसे इलाकों में हिंसा को भड़का दिया, जिसे शहर के "एपिसेंटर" के रूप में जाना जाता है। इस हिंसा में 139 से अधिक लोगों की जान चली गई, जिससे भोपाल दंगों में मरने वालों की संख्या के मामले में मुंबई के बाद देश में तीसरा सबसे प्रभावित शहर बन गया था।


दंगों के दौरान प्रशासन पर भी सवाल उठे थे। कहा जाता है कि कर्फ्यू लगाने में देरी हुई, जिससे हिंसा और बढ़ गई। उस समय के भोपाल कलेक्टर और एसपी को कर्फ्यू लगाने की अनुमति के लिए मुख्यमंत्री के पास लंबा इंतजार करना पड़ा था। इस घटना का राजनीतिक असर भी गहरा था। उस समय के भोपाल उत्तर से निर्दलीय विधायक आरिफ अकील को गिरफ्तार कर सागर जेल भेज दिया गया था। इसके अलावा, मध्य प्रदेश के कई नेता, जैसे उमा भारती, जयभान सिंह पवैया और राजमाता विजयाराजे सिंधिया, भी बाबरी विध्वंस मामले के आरोपियों में शामिल थे। यह घटना भोपाल के सांप्रदायिक सद्भाव पर एक गहरा आघात थी। शहर, जो अपनी मिली-जुली संस्कृति के लिए जाना जाता था, इस घटना के बाद से सांप्रदायिक तनाव का शिकार हो गया।


दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद भोपाल में हुए सांप्रदायिक दंगों की जाँच के लिए एक न्यायिक जाँच आयोग का गठन किया गया था, जिसने प्रशासन, पुलिस और राजनेताओं की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए थे।


न्यायिक जाँच आयोग और उसकी रिपोर्ट से यह सामने आया है कि 1992 के दंगों के बाद सरकार ने घटना की जाँच के लिए कदम उठाए थे। इन जाँचों में अक्सर प्रशासन, पुलिस और राजनेताओं की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे।


प्रशासन की भूमिका के बारे में कहा गया कि विलंब से कर्फ्यू लगाना सबसे बड़ा आरोप यह था।  दंगों के दौरान प्रशासन ने कर्फ्यू लगाने में देरी की। कहा जाता है कि तत्कालीन कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को कर्फ्यू का आदेश लेने के लिए मुख्यमंत्री के आवास पर लंबा इंतजार करना पड़ा था। इस देरी को हिंसा के बढ़ने का एक प्रमुख कारण माना जाता है।


अधिकारियों का तबादला हो गया।  दंगों के बाद, भोपाल के कलेक्टर एमए खान और एसपी सुभाष अत्रे को रातोंरात बदल दिया गया था, जिसने यह संकेत दिया कि सरकार उनकी भूमिका से संतुष्ट नहीं थी। कलेक्टर के रूप में प्रवेश शर्मा तथा पुलिस अधीक्षक के रूप में सुरेंद्र सिंह को भोपाल का नया पुलिस अधीक्षक बनाया गया था।


पुलिस की भूमिका में पक्षपात के आरोप मुख्य थे।  कुछ रिपोर्टों में पुलिस पर पक्षपातपूर्ण कार्रवाई का आरोप लगाया गया था। यह आरोप था कि पुलिस ने कुछ समूहों के खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं की, जिससे हिंसा और बढ़ गई। हिंसा रोकने में विफलता भी एक बहुत बड़ा आरोप था।  पुलिस दंगों को तुरंत नियंत्रित करने में विफल रही, जिससे कई लोगों की जान गई और संपत्ति को भारी नुकसान हुआ।


राजनेताओं की भूमिका भी संदिग्ध थी। मुख्यमंत्री का रवैया वहुत सकारात्मक नहीं था। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुंदरलाल पटवा पर यह आरोप लगाया गया था कि उन्होंने कर्फ्यू लगाने के आदेश को मंजूरी देने में जानबूझकर देरी की, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।


विधायक की गिरफ्तारी की गई। भोपाल उत्तर के निर्दलीय विधायक आरिफ अकील को दंगों के दौरान गिरफ्तार कर लिया गया था और उन्हें सागर जेल भेज दिया गया था। यह गिरफ्तारी भी राजनीतिक रूप से संवेदनशील मानी गई थी। उस समय कुछ राजनेताओं पर भड़काऊ भाषण देने और सांप्रदायिक तनाव बढ़ाने का भी आरोप लगा था, जैसा कि बाबरी विध्वंस मामले में भी कुछ नेताओं के नाम सामने आए थे।


1992 के भोपाल दंगों में प्रशासन की ढिलाई, पुलिस की कथित पक्षपातपूर्ण कार्रवाई और राजनेताओं के विलंबित फैसलों ने स्थिति को और भी खराब कर दिया था। इन घटनाओं ने भोपाल के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य पर एक गहरा और स्थायी प्रभाव छोड़ा।





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